खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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और श्रीहर्ष जैसे प्रतिभाशाली कवियों के लिए विभिन्न प्रान्तों के आचार-व्यवहार का ज्ञान कोई बड़ी बात नहीं। श्रीहर्ष की चिन्तामणि-मन्त्र पर भक्ति, नल के विवाह में बारातियों के भोजन में मद्य-मांस का प्रयोग और श, ष, स; ण, न; व, ब; य, ज तथा ष, क्ष एवं ख की समानता भी उन्हें बङ्गाली नहीं सिद्ध कर सकती। मन्त्र-तन्त्रवाद केवल बङ्गाल की ही चलन नहीं। क्षत्रिय राजा के विवाह में मद्य-मांस का प्रयोग भी बंगाल के ही आचार को इंगित नहीं करता। उपर्युक्त शब्दों का साम्य भी आलंकारिकों ने तत्तत् अलंकार बनाने में मान लिया है। आचार्य श्रीरघुवर मिठ्ठलाल शास्त्री तथा डा० सु० कु० दे ने तो अनेक पुष्ट प्रमाणों से श्रीहर्ष के बंगाली होने के वाद का खण्डन किया है। कुछ लोग 'आदिशूर द्वारा साथ में लाये हुए चार ब्राह्मणों में एक ये हैं' यह कह- कर श्रीहर्ष को वंगवासी सिद्ध करना चाहते हैं। किन्तु वह भी ठीक नहीं जँचता। कारण यदि आदिशूर उन्हें बंगाल में लानेवाले माने जायँ, तो श्रीहर्ष को अपने काव्य में उनका कुछ वर्णन तो करना ही चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके विपरीत उन्होंने कान्यकुब्जेश्वर का वर्णन कर उनके द्वारा बहुमान करने की ही बात लिखी है। इसलिए यही निष्कर्ष निकलता है कि वे कान्यकुब्ज प्रान्त के थे। उनका विशेष निवास काशी या कन्नौज में होता था। प्रबन्धकोश और चाण्डू पण्डित द्वारा भी इसीका समर्थन होता है। हम समझते हैं कि इस विषय में भी डा० चण्डिकाप्रसाद का अनुमान ही बहुत कुछ सही है, कारण उसमें अनेक अन्तःसाक्ष्य और बहिःसाक्ष्य दिये गये हैं। वे लिखते हैं कि “यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय, तो नैषध में ही स्वयं श्रीहर्ष अपने प्रिय (जन्म) प्रदेश का उल्लेख करते पाये जाते हैं। चाहे हम इसे मनुष्य की दुर्बलता कहें, चाहे सहज धर्म होता यही है कि न चाहते हुए भी मनुष्य हृदय को प्रिय लगनेवाली वस्तु की ओर बरबस संकेत कर ही देता है। कालिदास ने मेघ को बे-रास्ते भी चलकर उज्जियिनी अवश्य पहुँचने की सलाह दी है'।” “श्रीहर्ष ने भी कीर (तोते) के मुख से नव-दम्पती नल-दमयन्ती का वर्णन करवाते हुए अपने प्रिय प्रदेश के प्रति अपना प्रेमोद्गार व्यक्त करवा दिया है। कीर कहता है : 'जिस प्रकार गङ्गा-यमुना दो नदियों का हार पहने, जन-मन को प्रिय लगनेवाले 'मध्यदेश' से युक्त तथा 'अन्तर्वेदि' प्रान्त से सुशोभित वसुमती को धारण किये हुए, चन्द्रमा के प्रकाश से उल्लासित (ऊर्मिल) सागर की शोभा होती है, उसी प्रकार धवल (मुक्ता) हार-समन्वित अतिरम्य कटिप्रदेशवाली प्रिया को गोद में लिये हुए आप उसके मुख- चन्द्र से प्रफुल्लित हो रहे हैं'।"
१. 'वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां ।' सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूरूज्जयिन्याः मेघदूत, पूर्वमेघ । २ 'एतां धरामिव सरिच्छवि-हारिहारा-मुल्लासितस्वमदमाननचन्द्रभा बिभ्रद् विभासि पयसामिव राशिरन्तर्वेद्दिश्रियं जनमनःप्रियमध्यदे (नैषध,
“यहाँ नल-दमयन्ती के लिए जिस उपमान की कल्पना की गयी, वह एक प्रकार से असंभव या अज्ञात वस्तु है। कहाँ सागर और कहाँ मध्यदेश ? इतनी कठिन दूरी की उपेक्षा कर कवि ने मध्यदेश की भूमि को सागर की गोद में बैठाकर एक उपमान गढ़ा किया है। जब सागर और नदी के संयोग से भी काम चल सकता था, तब मध्यदेश को बीच में लाने की क्या आवश्यकता थी ? इसका केवल एक ही समाधान है कि वह प्रान्त कवि का अपना जन्मप्रान्त था। ‘जनमनःप्रियम्’ विशेषण इस भाव को और भी पुष्ट करता है।” “इतना ही नहीं, श्रीहर्ष ने उस प्रान्त की राजधानी ‘महोदय’ (कन्नौज) नगरी का भी नामोल्लेख करते हुए वर्णन किया है। वहीं कीर दमयन्ती की प्रशंसा करता हुआ कहता है : ‘सुन्दरी, तुम भगवान् कामदेव की राजनगरी हो और तुम्हारे कुचों पर की गयी यह मकर-रचना उस राजा की मकरांकित पताका है। महोदय (कन्नौज या महान्- अभ्युदय) के महोत्सव से युक्त इस नगरी (तुम) में तुम्हारी भौंहों को कौन कामदेव का तोरण न कहेगा’ ?” “यदि ये वर्णन दमयन्ती के स्वयंवर में आये हुए किसी नरेश के प्रसंग में किये गये होते, तो उनसे कोई अन्य संकेत समझा जाता। किन्तु यहाँ एक नितान्त भिन्न प्रसंग में अलङ्कार के सहारे कवि ने इन स्थानों का जिस भावना के साथ उल्लेख किया है, उससे उसका यही अभिप्राय निकाला जा सकता है कि इन स्थानों से कवि का कोई हार्दिक सम्बन्ध अवश्य था। “बाह्य साक्ष्य से भी श्रीहर्ष का कन्नौज प्रान्त का होना सिद्ध होता है। फर्रुखाबाद जिले में कन्नौज के पास ‘मीरासराय’ नामक एक कस्बा है, जहाँ कन्नौज का रेलवे स्टेशन है। यहाँ विशेष बस्ती कान्यकुब्ज मिश्रों की है। ये लोग स्मार्त और शाक्त हैं और अपने को श्रीहर्ष का वंशज बतलाते हैं। इनका कहना है कि ‘हम लोग पहले त्रिपाठी थे, परन्तु श्रीहर्ष ने एक यज्ञ किया, जिससे हम ‘मिश्र’ कहे जाने लगे। ये लोग श्रीहर्ष का किसी राजा द्वारा सम्मानित होना भी बतलाते हैं। : “इस प्रकार अन्तः तथा बाह्य दोनों साक्ष्यों के आधार पर श्रीहर्ष कन्नौज प्रान्त के ठहरते हैं। साथ ही उन्हें काशी से भी विशेष प्रेम था। चाण्डू पण्डित ने भी उनका काशी में निवास करना बतलाया है। स्वयंवर-सभा में काशिराज का वर्णन करते हुए श्रीहर्ष ने काशी का बड़े अनुराग के साथ वर्णन किया है : ‘वाराणसी भूलोक से परे है, वह साक्षात् देवलोक में वाससम्पन्ना है। अतएव उस तीर्थ में मरनेवालों को मुक्ति ही
१. ‘चेतोभवस्य भवती कुचपत्रराज-थानीयकेतुमकरा ननु राजधानी । अस्या महोदयमहत्सुशि मीनकेतोः के तोरणं तदधि न ब्रुवते भ्रुवौ ते ॥’ (नैषध, २१।१३५) २. ‘...श्रीकाश्यां मुक्तिचेतेन मुक्तरूपस्वरूपो गङ्गादर्शनादिना धर्मकर्म- सम्पादनेन’ इत्यादि। (चाण्डू पण्डित : नैषधदीपिका का प्रारम्भ)।
मिलती है। अन्यथा मुक्ति के अतिरिक्त स्वर्ग से बड़ा कौन पद है, जो अधिक आनन्द देगा¹ ?" आदि। अन्त में जब स्वयंवर में देवगण प्रसन्न होकर नल-दमयन्ती को वरदान देने लगते हैं, उसी प्रसंग में इन्द्र नल को एक यह भी वरदान देते हैं : 'राजन्, तुम्हारे निवास के लिए वाराणसी के समीप असी नदी के पास तुम्हारे नाम की नगरी होगी । मोक्षाभिलाषी होने पर भी काशी में तुम्हारा निवास इसलिए नहीं बनाया गया कि वहाँ रहकर तुम्हें दमयन्ती के साथ संभोग-सुख भोगने में संकोच करना पड़े²।" "देवों के जितने.वरदानों का नैषध में उल्लेख हुआ है, प्रायः सभी महाभारत में कहे गये हैं। किन्तु वाराणसी के समीप नल के नाम से बसनेवाली नगरी के वरदान का वहाँ कोई उल्लेख नहीं हुआ है। नल की कथा जहाँ-जहाँ मिलती है, कहीं भी इस वरदान की चर्चा नहीं है। अतः यह श्रीहर्ष द्वारा कल्पित ही समझ पड़ता है। अब प्रश्न उठता है कि इस कल्पना का आधार• या मूल क्या है ? कवि ने यह एक नूतन वरदान क्यों दिलवाया ? इसका एकमात्र उत्तर यही समझ पड़ता है कि श्रीहर्ष के समय काशी के समीप, असी के समीप असी के उस पार कोई ऐसा गाँव या नगर रहा होगा, जिसका नाम नल के नाम पर पड़ता था तथा जो बहुत पुराना बसा हुआ बताया जाता था, जिसे देखकर कवि ने यह कल्पना कर डाली। "इस कल्पना से यह भी सहज में अनुमान लगाया जा सकता है कि श्रीहर्ष काशी में रहते समय या तो काशी के पास उसी नल-नामवाले गाँव में रहते थे या उस गाँव से इन का कोई विशेष-सम्बन्ध था। आज भी काशी के समीप असी के पार नरोत्तमपुर, नरियापुर ( नलपुर ) तथा नैषढ़ा (नैषधपुर) तीन गाँव हैं। इन्हींमें से किसी एक के प्रति श्रीहर्ष का यह संकेत ज्ञात होता है।" श्रीशुक्लजी का श्रीहर्ष के स्थानसम्बन्धी यह अनुमान अभी तो अन्वेषकों के लिए अद्यतन और विशेष परिष्कृत मालूम पड़ता है। संभव है, इससे आगे इसके साधक-बाधक और भी प्रमाण प्रकाश में आयें। किन्तु आज इतने से सन्तोष मानने में कोई बाधा नहीं दीखती। कान्यकुब्जेश्वर जयचन्द्र के सम्मानित आश्रित श्रीहर्ष का काशी में रहना इसलिए भी समर्थित हो सकता है कि उक्त नरेश का उन दिनों काशी पर भी शासन था, जो पीछे उद्धृत ११८६ ई० के उनके दानपत्र से स्पष्ट है। बहुत संभव है कि उक्त नरेश ने काशी-निवास के लिए श्रीहर्ष को यह नलपुर गाँव दिया हो, जिनकी कीर्ति-वैजयन्ती फहराने में नैषध के रूप में कवि ने अपनी समस्त कवि-प्रतिभा उड़ेल दी
१. “वाराणसी निविशते न वमुन्धरायां तत्र स्थितिर्मखभुजां भुवने निवासः । तत्तीर्थमुक्तवपुषामत एव मुक्तिः स्वर्गात्परं पदमुदेतु मुदे तु कीदृक् ॥” --( नैषध, ११ । ११६ २. “त्वोपवाराणसि नामचिह्नं वासाय पारेसि पुरं पुराऽस्ति । निर्वातुमिच्छोरपि तन्न भैमीसम्भोगसङ्कोचभियाऽधिकाशि ॥” -(नैषध
( १० ) है । इस प्रकार श्रीहर्ष का जन्मस्थान मध्यप्रदेश ( अन्तर्वेद ) का कन्नौज और दूसरा प्रिय निवासस्थान वाराणसी सिद्ध होता है । इस प्रकार श्रीहर्ष के समय और स्थान का कुछ निर्णय हो जाने के बाद उनके चरित्र और व्यक्तित्व का भी आभास प्राप्त करना प्रासंगिक होगा । इस विषय में कुछ तो चरित्र यत्र-तत्र उनके उल्लेख और कुछ वृद्धपरम्परागत गाथाओं का आश्रय लिया जाय, जैसा कि स्वर्गीय त्यक्त-महामहोपाध्याय लक्ष्मण शास्त्री द्राविड़ ने 'खण्डन-खण्डखाद्य' ( विद्यासागरी-सहित, चौखंवा संस्कृत सीरीज, वाराणसी का प्रकाशन, १६१२ ई० ) की भूमिका में लिया है, तो उनका चरित्र इस प्रकार होगा । श्रीहीर नामक एक पण्डित थे । उनकी पत्नी का नाम 'मामल्लदेवी' था । एक- बार श्रीहीर किसी राजसभा में पहुँचे, तो वहाँ उनसे एक महापण्डित से शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें श्रीहीर हार गये । तभी से पराभव के दुःख से अत्यन्त सन्तप्त हो उन्होंने भगवती दुर्गा का आराधन किया । उनकी आराधना से भगवती ने प्रसन्न हो उन्हें वर दिया कि आपको समस्त वादियों के खण्डन में कुशल पुत्र होगा । भगवती की कृपा से मामल्लदेवी में उनके द्वारा पुत्र भी हुआ, पर पराभव का शल्य उन्हें चुभता ही रहा, जिससे वे असमय ही रोगाक्रान्त हो चल बसे । मरने के पूर्व उन्होंने पुत्र को बुलाकर कहा : 'वत्स ! मेरे विजेता को जीत कर जब तुम अपनी कीर्ति-वैजयन्ती फहराओगे, तभी परलोकगत भी मेरी आत्मा शान्ति पायेगी ।' छोटे बालक ने पिता के समक्ष प्रतिज्ञा की कि 'जब तक आपके विजेता को जीत न लूँगा, तब तक लोगों को मुँह न दिखाऊँगा ।' पिता के स्वर्गवास के बाद किसी तरह उनका और्ध्वदैहिक कर्म कर तथा अपने आप्तजनों पर परिवार का भार डालकर अत्यन्त दुःखित बालक श्रीहर्ष पिता की इच्छा को सफल करने के निमित्त देश-देशान्तरों में घूमा और चोटी के विद्वानों से भक्तिभाव- पूर्वक उसने विविध शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया । उन्हें एक साधक भी मिल गये, जिन्होंने उन्हें 'चिन्तामणि' नामक मन्त्र दे उसके अनुष्ठान की सलाह दी । किसी नदी के तीर भगवती त्रिपुरसुन्दरी के एक जीर्ण-शीर्ण मन्दिर में बैठ उन्होंने उक्त चिन्तामणि-मन्त्र का जपानुष्ठान किया । इस तरह पाँच वर्ष तप करने के बाद भगवती त्रिपुराम्बा प्रसन्न हुईं और उन्होंने कहा : 'वत्स ! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो ।' श्रीहर्ष ने कहा : मातः ! यदि सचमुच प्रसन्न हो, तो विद्यादान देकर अनुगृहीत करो ।' वरदान देकर
१. स्वर्गीय श्रीभागवताचार्य ने अपनी 'खण्डन-भूमिका' में पिता-पुत्र की वचन-प्रतिश्रुति की यह कथा लिखी है । "बचपन में पिता मर गये और माँ ने बालक को किसी प्रकार पाला । पाँच वर्ष होने पर उसने किसीके मुख से पिता के अपमान की यह कथा सुनी और वह तप के लिए गया ।" वही उन्होंने लिखा है ।
भगवती अन्तर्भूत हो गयीं। चिन्तामणि-मन्त्र का जप और देवी के वर से श्रीहर्ष ने तर्क, अलङ्कार, वेद, वेदाङ्ग आदि निखिल विद्याओं में असाधारण पाण्डित्य प्राप्त कर लिया। फलस्वरूप जल्पकथा में वे ऐसे अपूर्व उत्तर देने लगे, जिन्हें पण्डित भी समझ न पाते थे। किन्तु लोगों को वह समझ में न आने से उनके उद्देश्य की सिद्धि नहीं हो सकती थी। इसलिए पुनः उन्होंने वाग्देवी की उपासना की। वाग्देवी ने प्रत्यक्ष होकर कहा : 'वत्स, यह अतिप्रज्ञा भी तुम्हारे लिए अहितकर हो रही है। इसलिए मध्यरात्रि में सिर पर पानी डालो और जब वह पूरा तर हो जाय, तो दही खाकर सो जाओ। इससे कफ बढ़कर थोड़ी जड़ता आ जायगी। फिर तुम्हारी वाणी सभी समझ पायेंगे। श्रीहर्ष ने वैसा ही किया और सफल-मनोरथ हुए। फिर वे कान्यकुब्जाधीश्वर के दरबार में आये और दरबार के समक्ष दो श्लोक पढ़े। एक श्लोक राजा की प्रशंसा का था और दूसरा अपने पिता के विजेता उस बूढ़े पण्डित को लक्ष्य कर कहा गया था, जो दरबार में उपस्थित था। श्लोक इतना प्रभावशाली रहा कि उसे सुनते ही उक्त पण्डित ने अपनी हार मान ली। राजा ने प्रसन्न हो श्रीहर्ष को अपना राजकवि बना लिया, और ताम्बूल-द्वय और उच्च आसन दिया, जो तत्कालीन बहुत बड़ा सम्मान माना जाता होगा। वहाँ उन्होंने अनेक ग्रन्थ रचे, जिनमें खण्डनखण्ड- खाद्य और नैषधीय-चरित आज उपलब्ध हैं। राजा के विशेष आग्रह पर उन्होंने 'नैषधीय- चरित' महाकाव्य लिखा। कहा जाता है कि काश्मीर के साहित्य-ग्रन्थ और इनके नैषध की तुलना में भारती ने इनके ग्रन्थ के विरुद्ध निर्णय दिया और काश्मीर के ग्रन्थ को श्रेष्ठता दी; कारण इन्होंने अपने ग्रन्थ में सरस्वती की निन्दा की थी। किन्तु श्रीहर्ष ने बाद में अपने उस अंश का स्पष्टीकरण कर उन्हें मना लिया। ये अपना महाकाव्य लेकर काश्मीर के तत्कालीन राजा माधवदेव के पास गये, तो दरबारी पण्डितों ने इन्हें दरबार से मिलने नहीं दिया। एक दिन ये एक कुँए के पास जप करने बैठे थे। वहाँ दो कुमारियाँ दरबार के लिए जल भरने आयीं। दोनों में जल भरने पर कुछ विवाद हुआ और मार-पीट तक की नौबत आयी। अन्ततः झगड़ा राजा तक पहुँचा। राजा ने विवाद के साक्षी की माँग की। उन्होंने जपकर्ता को ही अपना एकमात्र साक्षी बताया। श्रीहर्ष दरबार में बुलाये गये। राजा द्वारा पूछने पर उन्होंने कहा कि 'मैं इनकी भाषा तो नहीं जानता, दोनों द्वारा कही वर्णानुपूर्वी को अवश्य सुना सकता हूँ।' उन्होंने अक्षर-अक्षर दोनों कुमारियों के विवाद की आनुपूर्वी कह सुना दी। राजा इनकी असाधारण धारणा-शक्ति पर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और पूरा परिचय प्राप्त कर उसने इनका वस्त्र, आभूषण आदि से बड़ा सम्मान किया। काश्मीरनरेश से सम्मानित हो श्रीहर्ष पुनः अपने आश्रयदाता कान्यकुब्जाधीश्वर के यहाँ आकर रहने लगे। नैषध और खण्डन की उक्तियों के प्रकाश में श्रीहर्ष के व्यक्तित्व का विचार किया जाय, तो कहना होगा कि वे समस्त विद्याओं एवं कलाओं में पूर्ण निष्णात थे। फिर भी किसीके गुणों को व्यक्त न करना वे वाणी की व्यर्थता मानते थे। वे व्यक्तित्व राजसुख और राजवैभव का अनुभव कर चुके थे तथा विलास- सामग्रियाँ भी उन्हें पूर्ण सुलभ थीं। फिर भी वे उनके अधीन न होकर
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जितेन्द्रिय बने रहे। उनका विश्वास था कि ज्ञान से निर्मल-चित्त पुरुष को विषयैकतानता कभी आसक्त नहीं कर सकती। वे सिद्ध समाधियोगी थे। फिर भी उनका योगशुद्ध हृदय पिशुनता को कभी सहन नहीं कर सकता था। मुनिवृत्ति उन्हें प्रिय थी और अयाचित व्रत को वे सर्वोपरि मानते थे। फिर भी उन्होंने अनेक स्थलों पर दान की महत्ता और आवश्यकता मानी है। कृतज्ञता और उपकारी के प्रति प्रत्युपकार पर उनका विशेष आग्रह रहा। भगवद्भक्ति, धर्मनिष्ठा और आस्तिकता तो उनमें पदे-पदे दीखती है। फिर भी आपद्धर्म के लिए ('निषिद्धमप्याचरणीयमापदि') भी कह के उन्होंने अवसर का निर्वाह भी अच्छी तरह किया है। वे बौद्धमत के खण्डनकर्ता होते हुए भी उस मत के प्रति पूरी उदारता रखते थे। स्वयं ऋजुमार्ग के समर्थक होते हुए भी कुटिल व्यक्ति से सरलता बरतना उन्हें कभी पसन्द न था। चाटुकार तो वे थे ही नहीं। निर्भी- कता उनकी रग-रग में भरी थी। फिर भी जनापवाद से उन्हें भय था (नैषध ३।५१), जब कि वे उसकी विशेष परवाह नहीं करते थे। कुल मिलाकर वे सर्वाङ्गपूर्ण व्याव- हारिक और त्रिगुणातीत पारमार्थिक दोनों कूलों को जोड़नेवाले अद्वितीय सेतु कहे जा सकते हैं। इतने महान् प्रतिभाशाली सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र श्रीहर्ष ने अनेक ग्रन्थ और अनेक काव्य लिखे होंगे। किन्तु नैषध और खण्डन के अनुसार¹ अबतक उनके १० ग्रन्थों का पता चलता है, जिनमें आज केवल दो ही उपलब्ध हो रहे हैं। उनके ग्रन्थ-रचना नाम निम्नलिखित हैं : १. अर्णव-वर्णन : इसमें नामानुसार समुद्र का वर्णन बताया जाता है। २. शिवशक्ति-सिद्धि : इसे कोई शिव नामक राजा की वीरता के वर्णनपरक बताते हैं तो कोई गौरी-गिरीश के माहात्म्य-वर्णनपरक मानते हैं। ३. साहसाङ्कचम्पू : इसमें 'साहसाङ्क' उपाधिधारी राजा का चरित्र वर्णित होगा, यह तो स्पष्ट ही है। किन्तु यह 'साहसाङ्क' कौन है, यही प्रश्न है। विक्रम को यह उपाधि प्राप्त थी, अतः इसे विक्रम-चरित्र-वर्णन भी कहा जा सकता है। किन्तु नैषध में 'नवसाहसाङ्कचरिते चम्पूकृतः' इस प्रकार ग्रन्थ- कार द्वारा उल्लेख होने से और उसके टीकाकार नारायण के इस विवरण में कि 'नवो यः साहसाङ्कोपनाम राजेत्यादि' नवत्व विशेषण का स्वारस्य देखते हुए इसे 'अभिनवसाहसाङ्क' कान्यकुब्जेश्वर का ही वर्णन मानना ठीक दीखता है। ४. छन्दःप्रशस्ति : नाम से तो मालूम पड़ता है कि यह छन्दोग्रन्थ है, किन्तु कुछ लोग इसे छन्द नामक राजा की प्रशस्ति भी मानते हैं। ५. विजय-प्रशस्ति : यह तो प्रायः निर्विवाद है कि इस ग्रन्थ में कान्यकुब्जाधीश्वर गोविन्दचन्द्र के पुत्र और जयचन्द्र के पिता विजयचन्द्र की प्रशस्ति का वर्णन है। श्रीहर्ष को बंगाली बतानेवाले इस 'विजय' को विजयसेन नामक बंग-
१. खण्डन और नैषध तो उपलब्ध ही हैं। 'ईश्वराभिसन्धि' का उल्लेख खण्डन में है। क्रमशः शेष ग्रन्थों का उल्लेख नैषध के निम्नलिखित स्थलों में है : ६।१६०; १८।१५४; २२।१५१; १७।१२२; ५।१३८; ५।१३८; ७।११० और ४।१२३ ।
नरेश बताते हैं; पर श्रीहर्ष बंगाली नहीं, यह पीछे सिद्ध किया ही जा चुका है। ६.गौडो- र्वीश-कुलप्रशस्ति : रघुवंश आदि की तरह इसमें भी गौडदेशीय राजवंश का वर्णन है। ७. ईश्वराभिसन्धि : यह ईश्वर की सत्ता का साधन करनेवाला ग्रन्थ होगा। फलतः अनी- श्वरमतवादी बौद्धों के खण्डनार्थ यह बनाया गया होगा। जहाँ अन्य भी 'अभिसन्धियों' के नाम दीख पड़ते हैं, वे कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं, प्रत्युत इसी ईश्वराभिसन्धि के प्रकरण हैं। ८. स्थैर्य-विचारण प्रकरण : यह बौद्धाभिमत क्षणिकत्व सिद्धान्त को खण्डन कर- वाला ग्रन्थ दीखता है। ६. नैषधीय-चरित : यह आज उपलब्ध है। इसमें नल-दमयन्ती की कथा वर्णित है और संस्कृत के पाँच महाकाव्यों में यह मुकुटमणि माना जाता है। १०. खण्डन-खण्ड-खाद्य : यह तो प्रस्तुत ग्रन्थ ही है। अब प्रश्न उठता है कि इन ग्रन्थों की रचना में पौर्वापर्य का क्रम क्या है ? शेष आठ ग्रन्थों के अनुपलब्ध होने से इस सम्बन्ध में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता। फिर भी स्वर्गीय महामहोपाध्याय श्रीराममिश्र शास्त्री मानते हैं कि 'खण्डन-खण्ड-खाद्य' 'ईश्वराभिसन्धि' के पूर्व और शेष ग्रन्थ उसके बाद रचे गये। किन्तु खण्डन में ही 'शेषञ्च ईश्वराभिसन्धौ स्वप्रकाशवादे निर्वक्ष्यामः' और 'अवोचाम च जल्पे' (श्रीशंकर मिश्र के अनुसार इस वाक्य में 'ईश्वराभिसन्धौ' यह अध्याहृत है) इस प्रकार वर्तमान और अतीत दोनों कालों का 'ईश्वराभिसन्धि' के लिए खण्डन में प्रयोग मिलता है। अतः खण्डन के भाषानुवादकार स्वर्गीय श्रीचण्डीप्रसाद सुकुलजी दोनों का समकालिक निर्माण मानते हैं। स्वर्गीय महामहोपाध्याय श्रीभागवताचार्य लिखते हैं कि "नैषध में 'खण्डन-खण्डतोऽपि सहजात्' (षष्ठसर्गान्त) और खण्डन में 'तथाऽहमकथयं नैषध- चरितस्य परमपुरुषस्तुतौ सर्गे' इस प्रकार दोनों का एक दूसरे में उल्लेख होने से दोनों ग्रन्थ एक ही समय में रचे गये हों, ऐसा हमें लगता है। हमारे मित्र और खण्डन- रूप रत्नाकर के मन्दराचल स्वर्गीय श्रीमोहनलाल उदासीन कहते हैं कि वैदुष्य की परम परिपाकावस्था में ही खण्डन की रचना माननी चाहिए।¹ हमें यही अन्तिम मत युक्तिसंगत प्रतीत होता है। इस दृष्टि से आरंभ में 'ईश्वरा'- भिसन्धि' को छोड़ शेष सात ग्रन्थ, फिर 'नैषध' और सबसे अन्त में 'खण्डन-खण्डखाद्य' और 'ईश्वराभिसन्धि' का रचना-क्रम मानना अनुचित न होगा। विद्वत्ता के साथ अवस्था के परिपाक से भी अद्वैत-भावना का चरम उत्कर्ष करनेवाले खण्डन जैसे ग्रन्थ का ही मेल बैठता है। खण्डन-खण्ड-खाद्य बहिरङ्ग-परीक्षण के बाद अब प्रस्तुत ग्रन्थ का संक्षिप्त अन्तरङ्ग-परीक्षण भी कर लेना उचित होगा। इस ग्रन्थ का 'खण्डन-खण्ड-खाद्य' नाम तो प्रसिद्ध है ही, 'अनिर्वचनी- १. श्रीभागवताचार्य : खण्डन-भूमिका । २. वही ।
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उन्होंने किया है। इस प्रकार विज्ञानवाद लेकर और पदार्थों को अनिर्वचनीय बनाकर जहाँ वे नैयायिकों का खण्डन कर देते हैं, वहाँ बाद में बौद्ध विज्ञानवाद का भी खण्डन कर अपना अद्वैत सद्वाद प्रतिष्ठित करते हैं। वे कहते हैं कि मिथ्याभूत जगत् का आश्रय सत् मानना ही पड़ेगा। सत् के बिना मिथ्यात्व की उपपत्ति ही नहीं हो सकती। किन्तु उस मिथ्या का आश्रय ज्ञान सर्वथा निरपेक्ष है। ज्ञान से भिन्न उसका आश्रय कोई पदार्थ नहीं है। नैयायिकी उन्हें ज्ञान और विषय के सहभाव की जो अनुपपत्ति देते हैं, उस विषय में खण्डनकार कहते हैं कि ज्ञान और विषय का सहभाव नियत ही नहीं है, कारण अतीत के ज्ञान में व्यभिचार हो जाता है। वे ज्ञान और विषय का तादात्म्य भी नहीं मानते। कारण विषय नानारूप होते हैं, जब कि ज्ञान का प्रकाश एकरूप होता है। फिर प्रकाश आन्तर वस्तु है, जब कि विषय बाह्य। इस तरह ज्ञान और विषय का तादात्म्य कथमपि नहीं माना जा सकता। फलतः यही कहना होगा कि सद्रूप ज्ञान में ही सारे पदार्थ कल्पित या मिथ्या हैं। उनका सद्रूप, असद्रूप या सदसद्रूप से निर्वचन न हो सकने से वे अनिर्वचनीय हैं। 'अनिर्वचनी- यतासर्वस्व' या खण्डन के निर्माण में श्रीहर्ष यही अभिप्राय रखते और सिद्ध करते हैं। खण्डनकार ने इस ग्रन्थ में व्यावहारिक जगत् को अत्यन्त सत्य माननेवाले नैया- यिकों के १६ पदार्थों या ७ पदार्थों (न्याय-वैशेषिक भेद से) का खण्डन किया है। सात पदार्थों का प्रसङ्गानुसार यत्र-तत्र खण्डन हुआ है। मुख्यतः गौतम के प्रमाण, प्रमेय आदि १६ पदार्थों का ही खण्डन है। आरंभ में ही उन्होंने प्रमाणादि-स्वीकार को कथा (वाद) का अंग मानने की बात का खण्डनकर 'लक्षण-प्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः' उनके इस सिद्धान्त पर पहला और जोरदार प्रहार किया है। फिर लक्षणों की बात आगे कर बताया कि आप जितने सारे पदार्थ मानते हैं, उनके कोई निर्दुष्ट लक्षण ही नहीं बन पाते। स्वयं प्रमाण और उनके अवान्तर भेदों का तथा लक्षण का ही जब लक्षण नहीं बन पाता, तो औरों की बात ही क्या ? खण्डनोक्त विषयों के वर्गीकरण पर ध्यान देने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। ग्रन्थ की भूमिका में श्रीहर्ष ने सर्वप्रथम प्रमाणादि-स्वीकार के शास्त्रार्थहेतुकत्व का खण्डन किया है, यह हम ऊपर कह ही आये हैं। उसके बाद उन्होंने संक्षेप खण्डन के प्रतिपाद्य विषय में शून्यवाद और अद्वैत (स्वप्रकाश) वाद का प्रतिपादन कर दोनों में परस्पर भेद दिखलाया है। पश्चात् अद्वैत का साधन और भेद का खण्डन किया गया है। इसी प्रसंग में ग्रन्थ-निर्माण का प्रयोजन तत्त्व- निर्णय और विजय बतलाते हुए वाद, जल्प और वितण्डा—शास्त्रार्थके तीनों प्रकारों तथा शून्यवाद, अद्वैतवाद या भेदवाद सभीमें खण्डनोक्त युक्तियों का एक-सा उपयोग है, यह बतलाया। इस तरह ग्रन्थ की भूमिका समाप्त कर ग्रन्थ का मुख्य प्रतिपाद्य विषय शुरू होता है। फिर प्रथम परिच्छेद में—लक्षणसामान्य का और क्रमशः प्रमा, प्रमाण एवं उसके प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धिरूप छः प्रकारों के लक्षणों का खण्डन किया गया। फिर असिद्ध, विरुद्ध, सव्यभिचार,
सत्प्रतिपक्ष और बाध इन पाँच हेत्वाभासों के लक्षणों का खण्डन किया गया है। द्वितीय परिच्छेद में—प्रतिज्ञाहानि, प्रतिज्ञान्तर, प्रतिज्ञाविरोध, प्रतिबन्दी और अपसिद्धान्त इन पाँच निग्रहस्थानों का खण्डन किया गया है। तृतीय परिच्छेद में— केवल किंशब्दार्थ के निर्वचन का खण्डन किया गया है। चतुर्थ परिच्छेद में—भाव, अभाव, विशिष्ट, द्रव्य, गुण, कर्म, विशेष, जाति (सामान्य), आधार, विषय-विषयी- भाव, भेद, कारणत्व, वर्तमानादि काल, प्रागभाव, ध्वंसाभाव, संशय, भावाभाव-विरोध और तर्क का खण्डन किया गया है। इस प्रकार कतिपय प्रमुख पदार्थों का खण्डन करने के बाद ग्रन्थकार ने यह भी बता दिया कि जिन लक्षणों का विस्तार-भय से यहाँ खण्डन नहीं किया गया है, उनका भी इन्हीं युक्तियों से खण्डन कर लिया जाय। ग्रन्थकार ने खण्डन में व्यवहृत अपनी खण्डन-युक्तियों का मार्मिक वर्गीकरण भी कर दिया है। वे कहते हैं : 'तत्तुल्योहस्तदीयं च योजनं विषयान्तरे । शृङ्खला तस्य शेषे न्व त्रिधा भ्रमति मत्क्रिया ॥' अर्थात् किसीसे वाद करने का प्रसंग उपस्थित होने पर हमारे द्वारा इस ग्रन्थ में बतायी गयी युक्तियों के समान युक्तियों की कल्पना कर वादी पर विजय पायें। अथवा उन्हीं युक्तियों की योजना करें। यदि दैववश युक्तियों का स्फुरण न हो, तो घटक अन्य पदार्थों के निर्वचन का प्रश्न कर वादी को परास्त करें। वादि-विजय का श्रीहर्ष का यह शास्त्र अपने ढंग का अद्वितीय है। परवर्ती श्रीचित्सुखाचार्य, श्रीब्रह्मानन्द सरस्वती आदि ने इन युक्तियों का उपयोग कर इसकी कार्यकारिता का प्रमाण उपस्थित कर दिया है। इस प्रकार के वेदान्त-दर्शन के मूर्धन्य इस वादप्रधान दार्शनिक ग्रन्थ का राष्ट्र- भाषा हिन्दी में अनुवाद सचमुच बड़ी टेढ़ीखीर है। कारण एक तो इसके कितने ही स्थल ऐसे हैं, जिनकी ग्रन्थियाँ बड़े-बड़े शब्दज्ञानियों से भी नहीं [आत्म-निवेदन] खुल पातीं। ग्रन्थकार स्वयं ही कहते हैं 'ग्रन्थग्रन्थिरिह क्वचित् क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया।' अर्थात् मैंने जान-बूझकर बड़े परिश्रम से इसमें ऐसी ग्रन्थियाँ बाँध दी हैं, जिन्हें प्राज्ञम्मन्य आसानी से न खोल पायें। दूसरे, इन शास्त्रार्थ-विचारों के अनुरूप शैली और शब्द संस्कृत में ही और उसमें भी तथोक्त परिष्कृत, दार्शनिक भाषा में ही सुलभ हो सकते हैं। साधारण संस्कृत में उन्हें रखा जाय, तो भी वे उतने परिष्कृत रूप में नहीं रह सकते । फिर प्राकृत भाषाओं की बात ही क्या ? फिर भी स्वर्गीय पूज्य श्रीचण्डीप्रसाद सुकुलजी ने आज से करीब ५० वर्ष पूर्व' राष्ट्रभाषा हिन्दी में इसे लाने का जो अपूर्व सत्साहस किया, तदर्थ हिन्दी-जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। कहना होगा कि वे बहुत कुछ इसमें कृतकार्य हुए। फिर भी जैसा कि ऊपर कहा गया है, हिन्दी में इसे लाना मूलतः स्वभाव से दुःशक है, अतः कुछ परिष्कार की *१. इसका प्रथम संस्करण संवत् १६८५ में छपा, पर अनुवादक के कथनानुसार अनुवाद इससे १४ वर्ष पूर्व ही हो चुका था।
( १८ ) आवश्यकता सदैव बनी ही रहेगी। हमारे अध्यक्ष आदरणीय श्री श्रीकृष्ण पन्त जी ने इस द्वितीय संस्करण में मुझे इस सेवा का आदेश दिया, यह मैं उनकी महती कृपा मानता हूँ। किन्तु एक तो मेरा सीमित ज्ञान और दूसरे समय के अत्यधिक संकोच से जितना परिष्कार होना चाहिए, उतना मैं नहीं कर पाया। फिर भी इसका ध्यान रखने का प्रयत्न अवश्य किया है कि परिष्कार के मोह में अपदार्थ न बन जाय। कहीं-कहीं आवश्यक टिप्पणियाँ भी बढ़ा दी गयी हैं। अन्त में परिशिष्ट में खण्डन में ग्रन्थकार द्वारा प्रणीत अकारानुक्रमसहित कारिकाएँ और ग्रन्थ में उद्धृत विभिन्न ग्रन्थों के वचनों का स्थल- निर्देश भी जोड़ दिया गया है। तथापि जो भी इसमें ज्ञात-अज्ञात भूलें हुई हों, ग्रन्थमर्मज्ञ विद्वान् उनको मेरी मान सुधार के सुझाव देने की कृपा करेंगे, तो उनका स्वागत है। प्रस्तुत खण्डन-विमर्श में जिन-जिन पुस्तकों से हमें मदद मिली है, उन सबके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए गुणैकपक्षपाती विद्वानों से इसे अपनाने का हम अनुरोध करते हैं। अच्युत-ग्रन्थमाला, ललिताघाट, वाराणसी } —गोविन्द नरहरि वैजापुरकर वर्षप्रतिपद्, २०१८ वि०
विषयानुक्रमणिका १. मङ्गलाचरण ... ... १ २. प्रयोजन-कथन ... ... २ प्रथम परिच्छेद ३. प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्त्व-खण्डन ... ... ,, ४. शून्यवाद-विचार ... ... १४ ५. स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ... ... २८ ६. शून्यवाद और स्वप्रकाश-विज्ञानवाद का भेद ... ... ४२ ७. अद्वैत में प्रमाण-विचार ... ... ४७ ८. भेद-खण्डन ... ... ६५ ६. (खण्डन के) प्रयोजन का प्रतिपादन ... ... ८२ १०. (लक्षण-) सामान्य के खण्डन की युक्तियाँ ... .... ८६ ११. प्रमालक्षण-खण्डन में तत्त्वपदार्थ का खण्डन ... ... ८७ १२. ,, अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ... ... ६१ १३. ,, स्मृतिभिन्नत्व का खण्डन ... ... ११७ १४. भेद-संसर्गाभाव के भेद का खण्डन ... ... १२५ १५. स्मृति-लक्षण का खण्डन ... ... १४१ १६ अनुभवत्व-विशेष का खण्डन ... ... १४४ १७. तत्त्वानुभवत्व-का खण्डन ... ... ,, १८. याथार्थ्य का खण्डन ... ... १४८ १६. सम्यक्त्व का खण्डन ... ... १५४ २०. अव्यभिचारित्व का खण्डन ... ... १६० २१ अविसंवादित्व का खण्डन ... ... १६१ २२. अबाधितत्वादि का खण्डन ... ... १६६ २३. प्रमालक्षण का सामान्य-खण्डन ... ... १६७ २३. प्रमाण के सामान्य-लक्षण का खण्डन ... ... १६६ २४. (प्रमाण-लक्षण के खण्डन में) प्रथम करणत्व-लक्षण का खण्डन ... ... ,, २५. ,, द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन ... ... १७३ २६. ,, व्यापार-लक्षण का खण्डन ... ... १८३ २७.,, तृतीय करणत्व-लक्षण का खण्डन ... ... १८१ २८. ,, चतुर्थ चरमव्यापारवत्त्व-लक्षण का खण्डन ... ... १६३ २६. प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण (इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्) का खण्डन ... ... १६८
( २० ) ३०. द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण भासमानाकारेन्द्रियसंयोगजम् ) का खण्डन ... २०४ ३१. तृतीय प्रत्यक्ष-लक्षण (साक्षात्कारित्वम् ) का खण्डन ... २२० ३२. चतुर्थ प्रत्यक्ष-लक्षण ( इन्द्रियकरणकानुभूतित्वम् ) का खण्डन ... २२२ ३३. पञ्चम प्रत्यक्ष-लक्षण (ज्ञानाजन्यज्ञानत्वम् ) का खण्डन ... २२७ ३४. षष्ठ प्रत्यक्ष-लक्षण ( षोढासन्निकर्षेतरप्रयुक्तविषयनियमं ज्ञानम् ) का खण्डन ... २३० ३५. सप्तम प्रत्यक्ष-लक्षण ( स्वरूपधीः ) का खण्डन .... ... २३ ३६. अष्टम प्रत्यक्ष-लक्षण ( ज्ञानस्य जातिभेदः कश्चित् साक्षात्त्वम् ) का खण्डन ... २३४ ३७. नवम प्रत्यक्ष-लक्षण (शब्दानुमानोपमानजप्रमितिव्यतिरिक्तत्वे सति प्रमितित्वम् ) का खण्डन ... २४० ३८. अनुमान-खण्डन में अनुमिति-परामर्श का खण्डन .. ... २४८ ३६. ,, व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन ... ... २५४ ४०. ,, उपाधि-लक्षण का खण्डन ... ... २७३ ४१. ,, पक्षता-लक्षण का खण्डन ... ... २८. ४२. उपमान-लक्षण का खण्डन ... ... २८७ ४३. शब्द-लक्षण का खण्डन .... २६७ ४४. अर्थापत्ति-लक्षण का खण्डन् ... ... ३०४ ४५. अनुपलब्धि-लक्षण का खण्डन ... ३०६ ४६. हेत्वाभास-खण्डन में असिद्ध-लक्षण का खण्डन ... ... ३१५ ४७. ,, विरुद्ध-लक्षण का खण्डन ... ... ३२६ ४८. ,, सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ... ... ३३३ ४६. ,, सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ... ... ३४७ ५०. ,, बाध-लक्षण का खण्डन ... ... ३६६ द्वितीय परिच्छेद ५१. प्रतिज्ञाहानि-लक्षण का खण्डन् ... ... ३७६ ५२. प्र तज्ञान्तर-लक्षण का खण्डन .. ... ३८२ ५३. प्रतिज्ञा-विरोध लक्षण का खण्डन् ... ... ३८६ ५४. प्रतिबन्दी-लक्षण का खण्डन ... ... ३६० ५५. अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ... ... ३६७ तृतीय परिच्छेद ५६. सर्वनामार्थ का खण्डन् ... .. ४१३ चतुर्थ परिच्छेद ५७. भावत्व लक्षण का खण्डन् ... ... ४२१ ५८. अभावत्व-लक्षण का खण्डन ... ... ४२६ ५६. विशिष्ट-लक्षण का खण्डन ... ... ४२६ ६०. द्रव्य-लक्षण का खण्डन् ... ... ४३१
( २१ ) ६१. सामान्य-लक्षण का खण्डन ... ... ४४० ६२. सम्बन्ध-लक्षण का खंडन ... ... ४४५ ६३. आधार-लक्षण का खण्डन ... ... ४५० ६४. विषय-विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ... ४५८ ६५. भेद-लक्षण का खण्डन ... ... ४७२ ६६. कारणत्व-लक्षण का खण्डन ... ... ५०२ ६७. वर्त्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ... ... ५१६ ६८. संशय-लक्षण का खण्डन ... ... ५२७ ६६. भावाभाव-विरोध का खण्डन ... ... ५३५ ७०. तर्क-सामान्य-लक्षण का खण्डन ... ... ५४३ ७१. तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ... ... ५५५ ७२. अप्रसङ्गात्मक तर्क का निरूपण ... ... ५६६ ७३. तर्काभास का खण्डन ... ... ५७६ ७४. सर्व-खण्डन-प्रकार का उपदेश ... ... ५७८ ७५. उपसंहार ... ... ५८०
खण्डनखण्डखाद्य भाषानुवादसहित १अविकल्पविषय एकः स्थाणुः पुरुषः श्रुतोऽस्ति यः श्रुतिषु । ईश्वरमुमया • न परं वन्देऽनुमयापि तमधिगतम् ॥ १ ॥ २मानापनोदनविनोदने गिरीशे भासेव सङ्कुचितयोरुचितं तदिन्दोः । भेत्तुं भवानिशितं दुरितं • भवानि ! नम्रीभवानि घनमङ्घ्रिसरोजयोस्ते ॥ २ ॥ श्रेयो दिशतु स श्रीशः सच्चिदानन्दविग्रहः । यज्ज्ञानाद् विरसायन्ते३ पराचां तु निरुक्तयः ॥ १ ॥ अनुमापतये तस्माय्युमापतये सदा । नमोऽस्तु गुरवे सर्ववेदिनेऽपि द्विवेदिने ॥ २ ॥ श्रीहर्षमिश्रकृतखण्डनखण्डखाद्यभाषानुवादकरणे कृतसाहसोऽहम् । यत्पादपङ्कजपरागनिषेवणेन तान् पूज्यपादगुरुदेववरान् नमामि ॥ ३ ॥ मैं केवल उमा से ही नहीं, किन्तु अनुमा से ( अनुमान से या श्रवण, मनन आदि के पीछे मुझसे ) भी. प्राप्त उस परमेश्वर का वन्दन करता हूँ; जो श्रुतियों में अनेक नाम-रूपों से श्रुत, एक, नित्य और निर्विकल्प-समाधि का विषय है ॥ १ ॥ हे भवानि ! मैं संसार में अनादिकाल से संचित पाप को दूर करने के लिए आपके उन चरण-कमलों में नत होता हूँ, जो मान छुड़ाने के लिए प्रियतम के नत १ यहाँ विरोधाभास अलङ्कार है; क्योंकि जो उमा से अधिगत है, वह ( न + उमा = ) अनुमा से अधिगत कैसे होगा ? इस तरह आपाततः विरोध प्रतीत होता है । जो स्थाणु ( शुष्क वृक्ष ) है, वह पुरुष तथा जो निर्विकल्पक ( प्रकाररहित ) ज्ञान का विषय है, वह श्रुत-ज्ञान का विषय कैसे ? यों आपाततः विरोध का भान होता है । २ यहाँ श्लेष अलङ्कार है । प्रथम पक्ष में 'मानः ( ईर्ष्या ) तस्य अपनোদনं ( दूरीकरणं ) तदेव विनोदः ( क्रीड़ा ) ऐसा समास है । द्वितीय पक्ष में 'मानं ( प्रमाणम् ) अपह्नुते अनेनेति मानापनोदनम् अज्ञानं तस्य विनोदः ( दूरीकरणं ) तत्र नते' ऐसा समास है । ३ पराचाम् = बाह्य पदार्थों का । निरुक्तयः = लक्षण ।
२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम 'शब्दार्थनिर्वचनखण्डनया नयन्तः सर्वत्र निर्वचनभावमथर्वगर्बान् । धीरा यथोक्तमपि कीरवदेतदुक्त्वा लोकेषु दिग्विजयकौतुकमातनुध्वम् ॥ ३ ॥ प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन अथ कथायां वादिनो नियममेतादृशं मन्यन्ते - 'प्रमाणादयः होने पर उनके शिरोभूषण चन्द्र की किरणों से औचित्यवश सङ्कुचित हैं। अथवा अज्ञान के नाश के लिए जीवों के नत (उपासना में नम्र) होने पर उनके उपासनारूप चन्द्र की किरणों से सङ्कुचित (साकारता को प्राप्त) हैं ॥ २ ॥ हे धीरो ! आप लोग जैसा लिखा है, वैसा ही (ऊहापोह में रहित भी) इस ग्रन्थ को शुक के तुल्य कहकर पदार्थमात्र के लक्षणों के खण्डन द्वारा अतिगर्व से युक्त पण्डितों को सर्व जगह चुप करते हुए लोक में दिग्विजयस्वरूप क्रीड़ा का विस्तार करें ॥ ३ ॥ १ 'शब्दस्य अर्थः तस्य निर्वचनम्...' ऐसा समास है। विद्यासागरी और शाङ्करी में 'शब्दश्च अर्थश्च...' ऐसा लिखा है। इसमें शब्द विशेषण व्यर्थ हो जायगा, क्योंकि शब्द भी शब्द- शब्द का अर्थ ही है, - 'अर्थनिर्वचन' कहने से ही इष्ट सिद्ध हो जायगा। सच तो यह है कि 'इस शब्द का यह अर्थ है' इस बोध के द्वारा शब्दप्रयोगरूप व्यवहार की सिद्धि ही लक्षण का प्रयोजन है। इससे शब्द के अर्थ का ही लक्षण होता है। २ शास्त्रार्थ के आरम्भ से पहले वादी-प्रतिवादी दोनों मिलकर कुछ नियम मान लेते हैं, इसलिए कि शास्त्रार्थ निर्विघ्न समाप्त हो। जैसे—सत्यनिष्ठ, दोनों से अधिक विद्वान् तथा सीमा के लांघनेवाले को दण्ड देने में समर्थ मध्यस्थ होना चाहिए, वादी को अपना पक्ष प्रमाण- तर्क से सिद्ध करना चाहिए एवं प्रतिवादी को वादी के पक्ष में दोष देना चाहिए, ऐसे बहुत से नियम देश-काल के अनुसार होते हैं। नैयायिक इनसे अधिक एक और नियम सबसे मनवाना चाहते हैं कि 'प्रमाण, प्रमेय आदि सोलह पदार्थ हैं, यह वादी-प्रतिवादी दोनों को शास्त्रार्थ से पहले ही मान लेना चाहिए।' उनका आशय यह है कि यदि प्रतिवादी इस नियम को मान लेगा, तो अपने सिद्धान्त शून्यवाद आदि से गिर जायगा। यदि न मानेगा, तो शास्त्रार्थ का अनधिकारी होने से विद्वत्समाज से बहिष्कृत हो जायगा। इस ग्रन्थ में सबसे प्रथम इसी नियम का खण्डन करते हैं।
सर्वतन्त्रसिद्धान्ततया सिद्धाः पदार्थाः सन्तीति कथकाभ्यामभ्युपेयम् ।¹ तदपरे न क्षमन्ते । तथाहि—प्रमाणादीनां सत्त्वं यदभ्युपेयं कथकेन तत्कस्य हेतोः ? किं तदनभ्युपगच्छद्भ्यां वादिप्रतिवादिभ्यां ¹तदभ्युपगमसाहित्यनियतस्य वाग्व्यवहारस्य प्रवर्तयितुमशक्यत्वात्, उत कथकाभ्यां प्रवर्तनीयवाग्व्यवहारं प्रति हेतुत्वात्, उत लोकसिद्धत्वात्, अथवा तदनभ्युपगमस्य तत्त्वनिर्णयविजय- फलातिप्रसञ्जकत्वात् । न तावदाद्यः, तदनभ्युपगच्छतोऽपि चार्वाक.माध्यमिकादेवाग्विस्तराणां प्रतीयमानत्वात् । तस्यैव वाऽनिष्पत्तौ भवत्स्तन्निरासप्रयासानुपपत्तेः । सोऽयमपूर्वः प्रमाणादिसत्त्वानभ्युपगमात्मा वाक्स्तम्भनमन्त्रो भवताऽभ्यूहितः; नूनं यस्य कथा (शास्त्रार्थ) के आरम्भ से पहले नैयायिक आदि भेदवादी एक ऐसा भी नियम मानते हैं कि सब (तन्त्रों) के सिद्धान्त रूप से सिद्ध 'प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान ये सोलह पदार्थ हैं—वह वादी, प्रतिवादी दोनों को अवश्य मान लेना चाहिए।' अद्वैतवादी वेदान्ती इस नियम को नहीं मानते । वे कहते हैं कि शास्त्रार्थ के आरम्भ से पहले शास्त्रार्थी प्रमाणादि की सत्ता क्यों मान ? क्या इस कारण कि प्रमाणादि के स्वीकार के बिना वाग्व्यवहार (वचन) की प्रवृत्ति नहीं कर सकते, क्योंकि वाग्व्यवहार प्रमाणादि के स्वीकार से नियत (व्याप्य) है ! अर्थात् प्रमाणादि के स्वीकार के बिना नहीं बनता। अथवा इस कारण कि प्रमाणादि का स्वीकार उस वाग्व्यवहार का हेतु है, जिसको वादी, प्रतिवादी दोनों करना चाहते हैं। या इस कारण कि 'प्रमाणादि-स्वीकार शास्त्रार्थ-हेतु है' यह लोक- सिद्ध है। या इस कारण कि शास्त्रार्थ का फल (तत्त्वनिर्णय या विजय) प्रमाणादि-स्वीकार के बिना सिद्ध नहीं हो सकता । प्रथम विकल्प-खण्डन—इनमें पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि चार्वाक, माध्यमिक (बौद्ध) प्रभृति प्रमाणादि को नहीं मानते और उनके भी शास्त्रार्थ में १ इस ग्रन्थ को देखने से ज्ञात होता है कि नियत व्याप्य को कहते हैं। यह ठीक है, क्योंकि 'दण्ड-नियत घट है' ऐसा प्रयोग होता है, 'घट-नियत दण्ड है' ऐसा प्रयोग नहीं होता । परन्तु 'नियतोपस्थितिकः प्रातिपदिकार्थः', 'अन्यथासिद्धिशून्यस्य नियता पूर्ववर्तिता आदि ग्रन्थों के देखने से ज्ञात होता है कि 'नियत' व्यापक को कहते हैं। वह अनुभवविरुद्ध-सा ज्ञात होता है।
४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम प्रमाणाद् भगवता सुरगुरुणा लोकायतकानि सूत्राणि न प्रणीतानि, तथागतेन वा मध्यमागमा नोपदिष्टाः, भगवत्पादेन वा बादरायणीयेषु सूत्रेषु भाष्यं नाभाषि। प्रमाणाद्यनभ्युपगम्यापि प्रवर्तयन्तु नाम ते वाचो भङ्गीः, तास्तु साधनबाधनक्षमा न भवन्ति तावतेति ब्रूम इति चेत्। न; प्रमाणाद्यनभ्युपगम्य प्रवर्तितत्वं तदीयसाधन- बाधनाक्षमतायां न नियामकम्, किन्तु १सद्द्वचनाभासलक्षणयोगित्वमित्यवश्यमभ्युपेयं भवता, येनाभ्युपगम्यापि प्रमाणादीनि प्रवर्तिता मतान्तरानुसारिभिर्व्यवहारा अभ्युपगतप्रमाणादिसत्त्वैर्मतान्तरव्यवहारिभिरपरैस्तथाभूता इति कथ्यन्ते । यदि त्वस्मद्वचसि सद्द्वचनाभासलक्षणं न भवान् दर्शयितुमीष्टे, तदाऽनभ्युपगम्य वाग्व्यवहार देखे जाते हैं। यदि उनके शास्त्रार्थ में वाग्व्यवहार न हो, तो उनके मत के खण्डन के लिए बड़ी-बड़ी पुस्तकें लिखने का आपका परिश्रम व्यर्थ हो जायगा । आपने यह तो विलक्षण वाक्स्तम्भनकारी एक मन्त्र कल्पित किया है, मानो जिसके प्रभाव से भगवान् सुरगुरु (बृहस्पति) ने लोकायत-सूत्रों का प्रणयन न किया हो, तथागत (बुद्धदेव) ने मध्यमागम (शून्यवाद) का उपदेश न दिया हो और श्रीभगवत्पाद (शंकराचार्यजी) ने श्रीवेदव्यासजी के सूत्रों पर भाष्य ही न रचा हो। समर्थन—चार्वाक आदि प्रमाणादि को न मानकर भी वाग्व्यवहार में प्रवृत्त हों। परन्तु उनका वचन प्रमाणादि न मानने के कारण स्वपक्ष के साधन और परपक्ष के बाधन में सक्षम नहीं है। खण्डन—आप लोगों ने जो उनके वचन के खण्डन में बड़ी-बड़ी पुस्तकें लिखी हैं, उन्हीं से यह सिद्ध होता है कि उनके वचन साधन-बाधन में समर्थ हैं। तथ्य तो यह है कि वचन में जो साधन तथा बाधन की अशक्ति है, उसका कारण प्रमाण आदि को न मानकर प्रवृत्ति नहीं है, किन्तु सद्द्वचनाभासत्व है; इसको आप भी अवश्य मानेंगे। अन्यथा यदि प्रमाणादि के अस्वीकार को साधन-बाधन की अशक्ति का कारण मानें, तो यह भी मानना पड़ेगा कि प्रमाणादि-स्वीकार साधन-बाधन की शक्ति का कारण है। पर ऐसा मान नहीं सकते; क्योंकि प्रमाणादि को माननेवाले नैयायिक प्रमाणादि को माननेवाले १ सद्द्वचन = सद्धेतुप्रतिपादक वाक्य और सद्द्वचनाभास = हेत्वाभासप्रतिपादक वाक्य, उसका लक्षण = हेत्वाभासप्रतिपादकवाक्यत्व, तद्योगित्व = उसका सम्बन्ध । विद्यासागरी और शाङ्करी दोनों में यह अर्थ किया है—'सद्द्वचनाभासः = स्फुटाभासो व्यभिचारादिः सल्लक्षणं = साध्याभाववत्सामानाधिकरण्यादि' । समझ में नहीं आता कि असद्धेतु में रहनेवाला यह धर्म वचनरूप सद्द्वचनाभास में कैसे जायगा ?
परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन ५ प्रमाणादीनि भवता प्रवर्त्तितोऽयं व्यवहार इति शतकृत्वस्त्वंया उच्यमानेऽपि नास्माकमादरः । अन्यथा अभ्युपगम्य प्रमाणादीनि भवता प्रवर्त्तितोऽयं व्यवहार इत्येतावता भवदीयो व्यवहाराभास इत्यस्माभिरपि वक्तुं शक्यत एव । ननु यदि प्रमाणादीनि न सन्ति, तदा व्यवहार एव धर्मी कथं सिद्ध्येत, दूषणादिव्यवस्था वा कथं स्यात् ? सर्वविधिनिषेधानां प्रमाणाधीनत्वात् । मैवम् ; न ब्रूमो वयं न सन्ति प्रमाणादीनीति स्वीकृत्य कथाऽऽरभ्येति । किन्नाम सन्ति न सन्ति वा प्रमाणादीनीत्यस्यां चिन्तायामुदासीनैः यथा स्वीकृत्य तानि व्यवह्रियन्ते, तथा व्यवहारिभिरेव कथा प्रवर्त्यतामिति । अन्यथा न सन्ति प्रमाणादीनीति मतमस्माकमारोप्य यदिदं भवता दूषणमुक्तम्, तदपि वक्तुं न शक्यम् । कीदृशीं मर्यादामलम्ब्य प्रवृत्तायां कथायामिदं दूषणमुक्तम् ? किं प्रमाणादीनां सत्त्वमभ्युपगम्य उभाभ्यां वादिभ्यां प्रवर्त्तितायां कथायाम्, उतासत्त्व- मभ्युपेत्य, अथैकेन सत्त्वमपरेणासत्त्वमङ्गीकृत्य ? नाद्यः, अभ्युपगतप्रमाणादिसत्त्वं प्रति एतादृशपर्यनुयोगानवकाशात् । द्वितीये स्वतोऽव्यापत्तेः । न तृतीयः, तथैव कथान्तरस्यापि प्रसक्तेः । मीमांसकों के वचनों को साधन-बाधन में असमर्थ कहते हैं । प्रमाणादि-स्वीकार साधन-बाधन-शक्ति का कारण न होने पर भी यदि आप हमारे वचन में आभा- सत्व (दोष) न दिखा सकें, तो सौ बार भी कहें कि 'प्रमाणादि न मानकर प्रवृत्त होने से आपका यह वाग्व्यवहार प्रमाणाभास (अप्रमाण) है', फिर भी आपके उस वचन में हमें कोई आदर न होगा । फिर यदि वचन में आभासत्व न दिखाकर भी साधन में अक्षमत्व का प्रतिपादन करते रहें, तो हम भी कह सकते हैं कि प्रमाणादि को मानकर प्रवृत्त होने से आपका वचन भी साधन में अक्षम है । समर्थन — यदि प्रमाणादि नहीं हैं, तो वाग्व्यवहाररूप धर्मी (अङ्गी) कैसे सिद्ध होगा और दूषण आदि की व्यवस्था भी कैसे होगी, क्योंकि सभी विधि-निषेध प्रमाण के ही अधीन हैं । खण्डन — हम यह नहीं कहते कि 'प्रमाण आदि नहीं हैं' ऐसा मानकर शास्त्रार्थ का आरम्भ करिये । किन्तु प्रमाणादि हैं या नहीं, इस चिन्ता से उदासीन होकर जैसा आप मानते हैं, वैसा ही मानकर शास्त्रार्थ का आरम्भ करना चाहिए । अन्यथा (प्रमाणादि-स्वीकार को यदि शास्त्रार्थ का अङ्ग मानें तो) 'प्रमाणादि नहीं हैं' ऐसा मेरा मत मानकर जो आप दोष देते हैं कि 'यदि प्रमाणादि नहीं हैं तो व्यवहार-
६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम उभयाभ्युपगमानुरोधित्वाच्च कथानियमस्य । अन्यथा स्वाभिप्रायमालम्ब्य तेनापि त्वद्वचसि यत्किंचिद्वागात्मनि दूषणेऽभिहिते कस्य जयो व्यवतिष्ठताम् ? प्रमाणाभ्युपगन्तुरेव यावन्नियमसंयन्त्रणा महती स्यात् । तस्मात् प्रमाणादिसत्त्वाभ्युपगमौदासीन्येन व्यवहारनियमेन समयं बद्ध्वा प्रवर्तितायां कथायां भवतेदं दूषणमुक्तमित्युचितमेव तथासति स्यात् । योऽयं भवान् स्वाभि- प्रायमपि नावधारयितुं शक्नोति, दूरतस्तस्मिन् पराभिसन्धानावधारणप्रत्याशा । रूप धर्मी कैसे सिद्ध होगा', वह भी नहीं बनेगा । अच्छा, किस मर्यादा (नियम) को मानकर प्रवृत्त शास्त्रार्थ में आप यह दोष देते हैं ? क्या प्रमाणादि के सत्त्व को मानकर वादी-प्रतिवादी दोनों से प्रवृत्त शास्त्रार्थ में, प्रमाण आदि के असत्त्व को मानकर दोनों से प्रवृत्त शास्त्रार्थों के में या एक से सत्त्व और अन्य से असत्त्व को मानकर प्रवृत्त शास्त्रार्थ में ? इनमें प्रथम विकल्प युक्त नहीं है, क्योंकि जो प्रमाणादि को मानते हैं, उनके प्रति 'प्रमाण आदि को न मानने पर व्यवहाररूप धर्मी कैसे सिद्ध होगा', यह दोष देना नहीं बनता । द्वितीय पक्ष में आप भी प्रमाण आदि के न माननेवाले सिद्ध होंगे । तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस शास्त्रार्थ के तुल्य ही अन्य शास्त्रार्थों के भी प्रमाणादि-स्वीकार के बिना ही सिद्ध होने से 'प्रमाणादि का स्वीकार शास्त्रार्थ-हेतु है' यह कथन असङ्गत हो जायगा । शास्त्रार्थ-नियम वादी-प्रतिवादी दोनों के स्वीकार पर निर्भर है । इसलिए भी केवल आपके स्वीकार से प्रमाणादि का स्वीकार शास्त्रार्थ-हेतु नहीं हो सकता । यदि शास्त्रार्थ- नियम को एक के स्वीकार का अनुरोधी मानें, तो इस नियम से प्रतिवादी स्वेच्छा से स्वीकृत 'हुँ फट्' शब्दोच्चारण रूप दोष दे, तो किसकी जय होगी ? बल्कि नियम के एकानुरोधी होने पर प्रमाणादि-स्वीकार को शास्त्रार्थ-हेतु माननेवाले को ही उससे महान् क्लेश होगा । अतः आपने प्रमाण आदि के सत्त्व-असत्त्व में उदा- सीनता से प्रवृत्त शास्त्रार्थ में 'यदि प्रमाणादि को न मानें, तो व्यवहाररूप धर्मी कैसे सिद्ध होगा' यह दोष दिया है, इस बात को हम दोनों यदि मान लें तो अच्छा ही है । जब आप अपना अभिप्राय जानने में असमर्थ हैं, तो 'प्रमाणादि- स्वीकार शास्त्रार्थ में हेतु नहीं है—यह हम कहते हैं, प्रमाणादि ही नहीं है—यह नहीं कहते' हमारे इस अभिप्राय के जानने की आपसे आशा तो अतिदूर है ।
परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन ७ अथ वादीकृत्य ¹दुर्वैतण्डिकं तस्मिन्नुपाधौ बाधोऽभिधीयते इत्येव नेष्यते, शिष्यादयस्तु तस्य कथानधिकारं ज्ञाप्यन्ते । अत एव भगवान् भाष्यकारः—'स² प्रयोजनमनुयुक्तो यदि प्रतिपद्यते' इत्याह स्म, न तु प्रतिपद्यसे इति । मैवम्; शिष्यादीन् प्रत्यपि चार्वाकादेर्दोषोऽयमित्यैवाभिधातव्यम् । कथं च तथा स्यात्, तस्य कथाप्रवेशनाप्रवेशनयोः तद्वाधाऽसम्भवात् । कथायामेव हि निग्रहः । नापि द्वितीयः । तथाहि—स्यादप्येवं यदि कथकप्रवर्तनीयवाग्व्यवहारं प्रति प्रमाणादीनां हेतुता तत्सत्त्वानभ्युपगमे निवर्तेत । न त्वेवं सम्भवति, तथा सति तत्सत्त्वानभ्युपगन्तॄणां वाग्व्यवहारस्वरूपमेव न निष्पद्येत, हेत्वनुपपत्तेः । समर्थन—यहाँ कोई शास्त्रार्थ नहीं होता, आप हमारे ग्रन्थ को उद्धृत कर खण्डन करते हैं। हम भी वैतण्डिक को वादी बनाकर किसी शास्त्रार्थ में प्रमाणादि स्वीकार के शास्त्रार्थ-हेतुत्व को सिद्ध नहीं करते; किन्तु शिष्यों को 'वैतण्डिक के शास्त्रार्थ में अनधिकार' का बोध कराते हैं। इसलिए न्यायभाष्यकार ने 'स प्रयोजनमनुयुक्तो यदि प्रतिपद्यते' ऐसा कहा है। अर्थात् परोक्षवाची तत् शब्द से वैतण्डिक का परामर्श किया और प्रथम पुरुष की क्रिया दी है। इससे 'कीदृशी' इत्यादि विकल्प व्यर्थ है। खंडन—शिष्य से भी आप यही कहेंगे कि चार्वाकादि का कथा में अधिकार नहीं है। पर यह कैसे हो सकता है; क्योंकि यदि उनका अधिकार है तो 'अधिकार नहीं है' यह कथन व्याहत है और यदि अधिकार नहीं है तो शिष्य उनको इस दोष से निगृहीत (विजित) कहाँ करेगा; क्योंकि कथा में ही निग्रह होता है और कथा में उनका अधिकार ही नहीं है। द्वितीय विकल्प-खण्डन—द्वितीय विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि शास्त्रार्थ के प्रमाणादि तो कभी हेतु हो भी सकते हैं, परन्तु उनका स्वीकार कभी भी हेतु नहीं हो सकता । यदि प्रमाणादि-स्वीकार भी हेतु होता, तो शास्त्रार्थ में प्रमाणादि की हेतुता १ शास्त्रार्थ वाद, जल्प और वितण्डा तीन प्रकार के हैं। वाद और जल्प में वादी-प्रतिवादी दोनों स्वपक्ष का साधन और परपक्ष का खण्डन करते हैं। इनमें भेद यह है कि वाद में छल- प्रयोग नहीं होता और उसका फल तत्त्व-निर्णय है। जल्प में छल-प्रयोग भी होता है और उसका फल विजय है। वितण्डा में वादी स्वपक्ष का साधन और प्रतिवादी उसके पक्ष का खण्डन करता है। उसका फल विजय है। वितण्डा से विजय के लिए जो प्रवृत्त हो, उसे 'वैतण्डिक' और दुष्टवैतण्डिक को 'दुर्वैतण्डिक' कहते हैं। २ वह वैतण्डिक यदि शास्त्रार्थ के प्रयोजन पूछने पर मान लेगा, तो प्रमाण भी मान ही लेगा, यह उक्त भाष्य का अर्थ है।