भारतकोश
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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

माधवनिदान

माधवनिदान खेमराज श्रीकृष्णदास बम्बई प्रकाशन CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

माधवनिदानम्

विद्वद्वरमाधवप्रणीतं-रुग्विनिश्चयापरनामकम् माधवनिदानम् श्रीकृष्णलालात्मजदत्तरामेण कृतया हिन्दीटीकया समलंकृतम् खेमराज श्रीकृष्णदास बम्बई प्रकाशन संस्करण- जुलाई २००७, सम्वत् २०६४ मूल्य १२५ रुपये मात्र ! CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

प्रस्तावना. —o-<<❖>>-o— भरतखंडमें वैद्यशास्त्रमें रोगके निदान, वैद्य, रोगी, औषध इत्यादिकोंका वर्णन, आचार, गुणागुण जिनमें वर्णन किये ऐसे सूत्रस्थान, चिकित्सा, शारीरक इत्यादिकों- का विस्तारसे अच्छे तरहका विचार जिनमें किया ऐसे बहुत ग्रंथ एकएक विषयक- रके प्रसिद्ध हैं तैसे निदानोंमें और रुग्विनिश्चय जिसको “माधवनिदान” कहते हैं वोही प्रसिद्ध है. जैसे- “निदाने माधवः प्रोक्तः सूत्रस्थाने तु वाग्भटः । शारीरे सुश्रुतः प्रोक्तश्चरकस्तु चिकित्सिते” ॥ सब निदानग्रंथोंमें “माधवनिदान” श्रेष्ठ है, सूत्रस्थानमें 'वाग्भट' अच्छा, शारीर- स्थानमें 'सुश्रुत' उत्तम और चिकित्सा नाम औषधविचारमें 'चरक' बहुत अच्छा है । इस ग्रंथका कर्त्ता ग्रंथनामसेही माधव मालूम पडता है । पंडितमाधवके सब शास्त्रोंमें ग्रंथ हैं. इस ग्रंथकी भाषा काशीआदि नगरोंमें भई है, परंतु ऐसी कहींभी नहीं. इस टीकामें सब शब्द प्रसिद्ध बालकोंकेभी समझमें जल्दी आजायँ ऐसे हैं और इसमें “मधुकोश, आतङ्कदर्पण” इत्यादि टीकाके आशयकीभी पंक्तिकी भाषा बनाई और शंकासमाधान लिखा है और बहुतसे निदान जो आजतक किसी टीकाकारने नहीं लिखे सो प्रसंगवशसे इसमें लिखदीनेहैं-जैसे चरकके मतसे क्लीबका निदान इत्यादि. और अँग्रेजी मतसे हकीमके मतसे जो निदान हैं वेभी लिखे हैं और परिशिष्टमेंभी शुक्र, आर्तव, गर्भ, स्नायु इत्यादि निदानका अन्य ग्रंथोंसे प्रमाण लेके इसकी भाषा बनाई है. इस भाषाके बनानेवाले प्रसिद्ध आयुर्वेदोद्धारक माथुरपंडित दत्तरामजी हैं इन्होंने भाषाकरके दो आवृत्तियें दिल्लीमें और मथुरामें छपायीथीं अब इनसे कृपापूर्वक सब हक लेके यहाँ उक्त पंडितसेही शुद्ध कराके और बढाके हमने छापी सो इस ग्रंथकूं इस प्रतिसे और दिल्ली और मथुरामें छपे पुस्तकसेभी कोई छापनेका अधिकारी नहीं है. इति प्रार्थना. भवदीयशुभाकांक्षी- खेमराज श्रीकृष्णदास, “श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम् यन्त्रालयाध्यक्ष-बंबई.

माधवनिदानकी-विषयानुक्रमणिका ।

श्रीः । माधवनिदानकी-विषयानुक्रमणिका ।


विषय.पृष्ठाङ्क.विषय.पृष्ठाङ्क.
प्रथम भाग १.सम्पूर्ण सन्निपातोंकी उत्पत्ति और
मंगलाचरणसम्प्राप्ति ग्रन्थान्तरोंसे२६
ग्रन्थकर्ताकी प्रतिज्ञा,,सन्निपादि तेरह सन्निपातोंके नाम,,
अन्य निदानग्रन्थोंसे इसकी उत्तमतातेरह सन्निपातोंकी मर्यादा२७
रोग जाननेके पांच उपायउक्त सन्निपातोंमें साध्यासाध्य विचार,,
निदानके पर्यायवाचक शब्दअसाध्य कृच्छ्रसाध्यके लक्षण,,
व्याधिके प्राग्रूपका लक्षण,,सन्निपादित्रयोदश सन्निपातोंके पृथक्पृथक् लक्षण२८
व्याधिके रूपके पर्याय शब्द१ सान्निपातिक, २ अन्तक, ३ रुग्दाह,,
उपशयके लक्षण,,४ चित्तभ्रम ५ शीतांग, ६ तन्द्रिक ७ कण्ठकुब्ज२९
क्रमसे उदाहरण८ कर्णक, ९ भुग्ननेत्र, १० रक्तष्ठीवी३०
अनुपशयके लक्षण११ प्रलापक, १२ जिह्वक,,
सम्प्राप्तिके लक्षण,,१३ अभिन्यास, सन्निपातोपद्रव३१
सम्प्राप्तिके भेद,,त्रिदोषज्वरोंकी साधारण मर्यादा,,
संख्यारूप सम्प्राप्तिके लक्षणधातुपाकलक्षण, मलपाकलक्षण, आगंतुकज्वर३२
विकल्परूप सम्प्राप्तिके लक्षण,,विषजन्य आगंतुकज्वर३३
प्राधान्यरूपसम्प्राप्तिके लक्षण,,औषधगन्धजनित ज्वर,,
बलरूपसम्प्राप्तिके लक्षण,,कामज्वरके लक्षण,,
कालरूपसम्प्राप्तिके लक्षण, निदानपंचकका उपसंहार१०भय शोक और कोपज्वरके लक्षण,,
कहे हुए निदानादिपंचकद्वारा रोगनिवृत्तिरूपअभिचार और अभिघातज्वरके लक्षण,,
सिद्धिको इच्छा करके अवश्य जानने योग्य१२भूताभिशंगज्वरके लक्षण,,
ज्वरनिदानम् ।विषमज्वरकी सम्प्राप्ति३४
ज्वरकी प्रधानता ज्वरकी उत्पत्ति१२धातुगतज्वरके नाम,,
ज्वरकी सम्प्राप्ति१३संततज्वरके लक्षण,,
ज्वरके लक्षण, ज्वरका पूर्वरूप१४सततकादिकोंके लक्षण३५
वातज्वरके लक्षण, पित्तज्वरके लक्षण१५वत्कृष्टदोषभेदकरके तृतीयक चतुर्थकोंके
कफज्वरके लक्षण, वातपित्तज्वरके लक्षण१६दूसरे लक्षण,,
वातकफज्वरके लक्षण, पित्तकफज्वरके लक्षण१७विषमज्वरके भेद३६
सन्निपातज्वरके लक्षण,,वातबलासकज्वर, प्रलेपकज्वर३७
सन्निपातोंके भेद१९विषमज्वरविशेषभेद,,
मतान्तरभेद२३इन्होंका विपरीत द्वितीय ज्वर३८
कुम्भीपाक १, प्रौर्णनाव २, प्रलापी ३,,शीतपूर्वकज्वरके लक्षण,,
अन्तर्दाह ४, दण्डपात ५, अन्तक ६२४दाहपूर्वकज्वरके लक्षण,,
एणीदाह ७, हारिद्र ८,,सप्तधातुगत ज्वर ।
अजघोष ९, भूतहास १०, यन्त्रपीड ११२५रसगत ज्वरके लक्षण३८
संन्यास १२, संशोषी १३,,रक्तगत ज्वरके लक्षण३९

( ४ ) माधवनिदानकी-

( ४ ) माधवनिदानकी- विषय. पृष्ठाङ्क. विषय. पृष्ठाङ्क. मांसगत ज्वरके लक्षण ३९ ग्रहणीरोगकी सम्प्राप्तिपूर्वक सामान्य लक्षण ५३ मेदोगत ज्वरके लक्षण ,, ग्रहणीके पूर्वरूप ,, अस्थिगत ज्वरके लक्षण ,, वातग्रहणीका निदान ५४ मज्जागत ज्वरके लक्षण, शुक्रगत ज्वरके लक्षण ,, वातजसंग्रहणीका रूप ,, प्राकृत और वैकृत ज्वरका लक्षण ४० पित्तग्रहणीके लक्षण ,, प्राकृतज्वरोंकी चिकित्साके निमित्त उत्पत्तिक्रम ,, कफग्रहणीकी उत्पत्ति ५५ चिकित्सा करनेके निमित्त आम पच्यमान और त्रिदोषकी ग्रहणीके लक्षण ,, निराम ज्वरके लक्षण ४१ ( संग्रहणी लक्षण ) ,, ज्वरके दश उपद्रव, पच्यमान ज्वरके लक्षण ४२ डाक्टरीमतके अनुसार परीक्षा व कारण ५७ पक्वज्वर किंवा निरामज्वरके लक्षण ,, अशरोगनिदानम् । ग्रन्थान्तरसे जीर्णज्वरके लक्षण ,, संख्या रूप सम्प्राप्ति ५७ साध्यज्वरके लक्षण, असाध्यज्वरके लक्षण ,, सम्प्राप्तिपूर्वक अर्शका रूप ,, गम्भीरज्वरके लक्षण ४३ वातकी बवासीरके कारण ५८ दूसरे असाध्यज्वरके लक्षण और असाध्य लक्षण ,, पित्तकी बवासीरके कारण ,, ज्वरमुक्तिके पूर्वरूप ४४ कफकी बवासीरके कारण ,, ज्वरमुक्तिके लक्षण ४५ द्वंद्वज बवासीरके कारण ,, इंग्रेजीमतानुसार ज्वरनिदान । त्रिदोषकी बवासीरके कारण ५९ ज्वरकी उत्पत्ति,-१शरदी ४५ वातकी बवासीरके लक्षण ,, २-मन्दवायु, ३-गरिष्ठ भाजेन ४६ पित्तकी बवासीरके लक्षण ६० अनेकप्रकारके ज्वरोंके ल० कुंकुमज्वरके लक्षण कफकी बवासीरके लक्षण ,, यकृत वा कलेजाज्वरके लक्षण ,, सन्निपातके और सहज बवासीरके लक्षण ६१ अतिसारनिदानम्। रक्तार्शके लक्षण ,, अतिसाररोगकी संप्राप्ति ४७ रक्तार्शानदानके वातादिभेदकरके लक्षण ६२ अतिसारके पूर्वरूप, वातातिसारके लक्षण ४८ कफसम्बन्धके लक्षण ,, पित्तातिसारके लक्षण, कफातिसारके लक्षण ,, बवासीरका पूर्वरूप ,, सन्निपातातिसारक लक्षण ,, सुखसाध्यके लक्षण ६३ शोकातिसारके लक्षण ४९ कृच्छ्रसाध्य लक्षण ,, शोकातिसारके कृच्छ्रसाध्यत्व लक्षण ,, असाध्यके लक्षण, याप्यलक्षण ६४ आमातिसारके लक्षण ,, रोगी, वैद्य, औषध और सेवकके लक्षण ,, आमके लक्षण, पक्क लक्षण, असाध्य लक्षण ५० वैद्यलक्षण ,, दूसरे असाध्य लक्षण ५१ निषिद्धवैद्यके लक्षण ,, अतिसारके उपद्रव, असाध्य लक्षण ,, रोगीके लक्षण, उत्तम ओषधिके लक्षण ६५ रक्तातिसारके लक्षण ,, दुष्ट ओषधिके लक्षण, दूतके लक्षण ,, प्रवाहिकाकी सम्प्राप्ति ५२ उपद्रवसे असाध्यत्व ६६ प्रवाहिकाके वातादि भेदकरके लक्षण ,, चर्मकीलकी सम्प्राप्ति ,, अतिसार चला गया होय इसके लक्षण ,, वातादिभेदकरके उसके लक्षण ६७ ग्रहणीनिदानम् । मन्दाग्निरोगनिदानम् । ग्रहणीकी सम्प्राप्ति ५३ अजर्णिरोग, समाग्न्यादिकोंके लक्षण ६७

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अजीर्णनिदानम् । | साध्य होनेके कारण ८४

विषयानुक्रमणिका । ( ५ )

विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक.

अजीर्णनिदानम् । | साध्य होनेके कारण ८४ अजीर्णके कारण ६९ | दोषभेदसे साध्यासाध्य लक्षण ८५ आमादिक अजीर्णोंके लक्षण ७० | रक्तपित्तके उपद्रव, असाध्य लक्षण ,, विदग्धाजीर्णके लक्षण, विष्टब्ध अजीर्णके लक्षण ,, | दूसरे असाध्य लक्षण ८६ रसशेष अजीर्णके लक्षण, अजीर्णके उपद्रव ,, | राजयक्ष्मनिदानम् । बहुत भोजन ही अजीर्णका हेतु है ७१ | राजयक्ष्माकी विशिष्टसम्प्राप्ति ८७ विषूचिकाकी निरुक्ति ,, | राजयक्ष्माके पूर्वरूप, त्रिरूपक्षयके लक्षण ८८ विषूचिकाके लक्षण, अलसकके लक्षण ७२ | एकादशरूप षड्रूप और त्रिरूप शोषके लक्षण ,, विलम्बिकाके लक्षण ,, | साध्यासाध्य विचार, असाध्य लक्षण ८९ अजीर्ण जन्य आमके दूसरे कार्यान्तर ,, | कौनसे रोगीको औषध देना योग्य है? ९० विषूचिका और अलसक इनके असाध्य लक्षण ७३ | असाध्य लक्षण ,, अजीर्ण जाता रहा उसके लक्षण ,, | व्यवायशोषीके लक्षण ,, कृमिरोगनिदानम् । | शोकशोषीके लक्षण, जराशोषीके लक्षण ९१ बाह्यकृमियोंके नाम, कृमिरोगका कारण ७४ | अध्वप्रशोषीके लक्षण ,, कौन कारणसे कौनसी कृमि प्रगट होती है ,, | व्यायामशोषीके लक्षण ९२ पेटमें कृमि पडगई हों उसके लक्षण ७५ | व्रणशोष होनेके तीन कारण ,, कफकी कृमिके लक्षण ,, | उरःक्षतका पूर्वरूप ९३ रुधिरकी कृमिके लक्षण ७६ | क्षतक्षीणेके असाध्य लक्षण, साध्यलक्षण ९४ विष्ठासे प्रगट कृमिके लक्षण ,, | कासनिदानम् । पाण्डुरोगनिदानम् । | कारण सम्प्राप्ति और निरुक्ति ९४ पाण्डुरोगके कारण और सम्प्राप्तिके लक्षण ७७ | कासका पूर्वरूप, वातकी खांसीके लक्षण ९५ पाण्डुरोगके पूर्वरूप, वातपांडुरोगके लक्षण ,, | पित्तकी खांसीके लक्षण, कफकी खांसीके लक्षण ,, पित्तजपांडुरोगके लक्षण, कफपांडुरोगीके लक्षण ७८ | क्षतकासलक्षण, क्षयकी खांसीके लक्षण ९६ सन्निपातयुक्त पांडुरोगके असाध्य लक्षण ,, | साध्यासाध्यविचार ९७ मिट्टीखानेसे प्रगट पांडुरोगकी सम्प्राप्ति ,, | हिक्का-श्वासनिदानम् । पांडुके विशेष लक्षण, असाध्य पांडुरोगके लक्षण ७९ | हिक्काका स्वरूप और निरुक्ति ९८ कामलाके लक्षण ८० | हिक्काके भेद और सम्प्राप्ति ,, कुम्भकामलाके लक्षण ८१ | हिक्काके पूर्वरूप, अन्नजाके लक्षण ,, असाध्य कामलाके लक्षण ,, | यमलाके लक्षण, क्षुद्राके लक्षण ९९ कुम्भकामलाके असाध्य लक्षण ८२ | गंभीराके लक्षण, महती हिचकीके लक्षण ,, हलीमक रोगके लक्षण ,, | हिचकीके असाध्य लक्षण ,, पानकी लक्षण ,, | यमिकाके असाध्य लक्षण, यमिकाके साध्य लक्षण १०० रक्तपित्तनिदानम् । | श्वासनिदानम् । रक्तपित्तका पूर्वरूप, कफयुक्त रक्तपित्तके लक्षण ८३ | श्वासके पूर्वरूपके लक्षण १०० वातिक रक्तपित्तके लक्षण ,, | श्वासरोगकी सम्प्राप्ति, महाश्वासके लक्षण १०५ पैत्तिक रक्तपित्तके लक्षण ,, | ऊर्ध्वश्वासके लक्षण ,, द्विदोषजादि रक्तपित्तके लक्षण ८४ | ऊपरकोही श्वास ले नीचे नहीं आवे यह जो ऊर्ध्वगादिकोंका साध्यासाध्यविचार ,, | कहा उसमें कारण ,,

( ६ ) माधवनिदानकी-

( ६ ) माधवनिदानकी- विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. छिन्नश्वासके लक्षण, तमकश्वासके लक्षण १०२ मदात्ययनिदानम् । प्रतमकके लक्षण १०३ विधिसे मद्य पीनेका लक्षण १२० प्रतमकके दूसरे लक्षण और कारण ,, विधिसे मद्य पीनेके दूसरे गुण १२१ क्षुद्रश्वासके लक्षण और साध्यासाध्य १०४ पूर्वमदके लक्षण, द्वितीय मदके लक्षण १२२ स्वरभेदनिदानम् । तृतीय मदके लक्षण, चतुर्थ मदके लक्षण ,, वातस्वरभेदके लक्षण, पित्तज स्वरभेदके लक्षण १०५ विधिहीन मद्यसेवनसे होनेवाले विकार १२३ कफके स्वरभेदके लक्षण ,, वातमदात्ययके लक्षण १२४ सन्निपातके स्वरभेदके लक्षण ,, पित्तमदात्ययके लक्षण, कफमदात्ययके लक्षण ,, क्षयजन्यस्वरभेदके लक्षण १०६ सन्निपात मदात्ययके लक्षण, परमदके लक्षण ,, मेदके स्वरभेदका लक्षण, असाध्य लक्षण ,, पानाजीर्णके लक्षण, पानविभ्रमके लक्षण १२५ अरोचकनिदानम् । पानविभ्रमके असाध्य लक्षण ,, वातजादि अरुचियोंके लक्षण १०६ पानविभ्रमके उपद्रव १२६ शोकादि अरुचिके लक्षण १०७ दाहनिदानम् । विकृतिके स्थानान्तर ,, मद्यजन्य दाहके लक्षण १२६ छर्दिर्निदानम् । रक्तज और पित्तज दाहके लक्षण ,, छर्दिके कारण और निरुक्ति १०८ प्यास रोकनेके लक्षण ,, छर्दिके पूर्वरूप, वातकी छर्दिके लक्षण ,, शस्त्राघातज दाहके लक्षण १२७ पित्तकी छर्दिके लक्षण, कफकी छर्दिके लक्षण १०९ धातुक्षयजन्यदाहके लक्षण ,, त्रिदोषकी छर्दिके लक्षण, असाध्य छर्दिके लक्षण ,, क्षतज दाहके लक्षण, मर्माभिघातज दाहके लक्षण ,, आगन्तुजछर्दिके लक्षण, कृमिकी छर्दिके लक्षण ११० अथोन्मादनिदानम् । कृमिके साध्यासाध्य लक्षण, कृमिके उपद्रव ,, उन्मादके सामान्य कारण और सम्प्राप्ति १२८ तृष्णानिदानम् । उन्मादका स्वरूप, विशेष लक्षण १२९ तृष्णाकी सम्प्राप्ति, अन्नजादि तृष्णाकी सम्प्राप्ति १११ पित्तज उन्मादके कारण और लक्षण ,, वातकी तृषाके लक्षण ११२ कफजन्य उन्मादके कारण और लक्षण १३० पित्तकी तृषाके लक्षण, कफकी तृषाके लक्षण ,, सन्निपात उन्मादके लक्षण ,, क्षतजतृष्णाके लक्षण, क्षयजतृष्णाके लक्षण ११३ शोकज उन्मादके लक्षण ,, आमजतृष्णाके लक्षण, अन्नजतृष्णाके लक्षण ,, विषजन्य उन्मादके लक्षण १३१ उपसर्गज तृषाके लक्षण, असाध्य तृषाके लक्षण ११४ विषज उन्मादके असाध्य लक्षण ,, मूर्च्छानिदानम् । भूतज उन्मादके लक्षण ,, निदान और सम्प्राप्ति ११५ देवग्रहजके लक्षण ,, मूर्च्छाका पूर्वरूप, वातकी मूर्च्छाके लक्षण ११६ असुर पीडितके लक्षण, गन्धर्वग्रहजके लक्षण १३२ पित्तकी मूर्च्छाके लक्षण, कफकी मूर्च्छाके लक्षण ,, यक्षग्रहजके लक्षण, पितृग्रहजके लक्षण ,, सन्निपातकी मूर्च्छाके लक्षण ११७ सर्पग्रहयुक्तके लक्षण १३३ रक्तकी मूर्च्छाके लक्षण ,, राक्षसग्रहपीडितके लक्षण ,, विष और मद्यसे उत्पन्न मूर्च्छा ११८ पिशाचजुष्टके लक्षण ,, रक्तजादितीन मूर्च्छाओंके लक्षण ,, प्रसंगवशसे ब्रह्मराक्षस और भूतोन्मादके ,, मूर्च्छा, भ्रम, तन्द्रा और निद्रा इनके भेद ,, ग्रन्थान्तरोंसे लक्षण ,, तन्द्राके लक्षण, संन्यासके भेद ११९ भूतोन्मादके लक्षण १३४ संन्यासके लक्षण ,, देवादिकोंका आवेशसमय ,, CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

विषयानुक्रमणिका। ( ७ )

विषय.पृष्ठांक.विषय.पृष्ठांक.
अपस्मारनिदानम् ।साध्यासाध्यके ज्ञानार्थ और दोषोंका सम्बन्ध१४७
अपस्मार रोगकी निरुक्ति१३६अर्दितरोगके लक्षण"
अपस्मारकी निदानपूर्वक सम्प्राप्ति"अर्दितरोगके असाध्य लक्षण१४८
वाग्भटके मतसे निदान"आक्षेपकसे लेकर अर्दितपर्यन्त रोगोंका वेग"
अपस्मारके सामान्य लक्षण, पूर्वरूप१३७हनुग्रहके लक्षण"
वातज अपस्मारके लक्षण"मन्यास्तम्भके लक्षण, जिह्वास्तम्भके लक्षण१४९
पित्तकी मृगीके लक्षण१३८शिराग्रहके लक्षण, गृध्रसीके लक्षण"
कफकी मृगीके लक्षण"विश्वाचीके लक्षण, कोष्टुशीर्षके लक्षण१५०
सन्निपातकी मृगीके लक्षण"खंज और पांगुलेके लक्षण"
मृगीके असाध्य लक्षण"कलायखंजके लक्षण, वातकंटकुकके लक्षण"
मृगीरोगकी पाली१३९पादहर्षके लक्षण१५१
वातव्याधिनिदानम् ।अंसशोष अपबाहुकके लक्षण"
वातव्याधिकी सम्प्राप्ति१३९मूकादिक तीन रोगोंके लक्षण"
वातव्याधिके पूर्वरूप व लक्षण१४०तूनीरोगके लक्षण"
कोष्ठाश्रितवायुके कार्य१४१प्रतूनीके लक्षण, आध्मानरोगके लक्षण१५२
सर्वांगकुपित वायुके कार्य"प्रत्याध्मानके लक्षण, वाताष्ठीलाके लक्षण"
गुदामें स्थित वायुके कार्य"प्रत्यष्ठीलाके लक्षण, मूत्रावरोधके लक्षण१५३
आमाशयस्थित वायुके कार्य१४२कम्पवायुके लक्षण, खल्लीके लक्षण"
पक्वाशयस्थ वायुके कार्य"ऊर्ध्ववातके लक्षण"
इन्द्रियोंमें स्थित वायुके कार्य"प्रलापके लक्षण, रसाज्ञानके लक्षण१५४
रसधातुगत वायुके लक्षण"अनुक्तवातरोगसंग्रह"
रक्तगतवायुके लक्षण"साध्यासाध्य विचार"
मांसमेदोगत वायुके लक्षण"वातव्याधिके उपद्रव"
मज्जास्थिगत वायुके लक्षण१४३असाध्य लक्षण१५५
शुक्रगत वायुके लक्षण"प्रकृतिस्थ पंचवायुके लक्षण"
शिरागत वायुके लक्षण"वातरक्तनिदानम् ।
स्नायुगत और संधिगत वायुके लक्षण"वातरक्तकी संप्राप्ति१५६
पित्त और कफ इनसे आवृत हुई प्राणादिक वायुके लक्षण"वातरक्तका पूर्वरूप"
आक्षेपकके सामान्य लक्षण१४४वातरक्तको अन्य दोषोंका संसर्ग होनेसे उसके न्यारे २ लक्षण१५७
आक्षेपकके दो भेद"रक्ताधिकके लक्षण"
दंडागतानकके लक्षण१४५पित्ताधिकके लक्षण"
अन्तरायाम और बहिरायाम इनके साधारण रूप"कफाधिकके लक्षण१५८
अन्तरायामके लक्षण"पैरोंमें रोगकी उपेक्षा करनेसे अनेक दोषोंकी उत्पत्ति"
बाह्यायामके लक्षण१४६असाध्य लक्षण"
असाध्यत्व"उपद्रव"
पक्षाघातके लक्षण"साध्यासाध्यविचार१५९
सर्वांगरोगेके लक्षण१४७

( ८ ) माधवनिदानकी-

( ८ ) माधवनिदानकी- ──────────────────────────────────────────────────────────────────────────────────────── विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. ──────────────────────────────────────────────────────────────────────────────────────── ऊरुस्तंभनिदानम्। | पित्तजहृद्रोगके लक्षण, कफजहृद्रोगके लक्षण १७८ ऊरुस्तंभका पूर्वरूप १६० | त्रिदोषजहृद्रोगके लक्षण, कृमिजहृद्रोगके लक्षण ,, ऊरुस्तंभके लक्षण ,, | सबोंके उपद्रव १७९ असाध्यलक्षण १६१ | मूत्रकृच्छ्रनिदानम्। आमवातनिदानम्। | मूत्रकृच्छ्रकी संप्राप्ति १७९ आमवातके सामान्य लक्षण १६२ | वातिकमूत्रकृच्छ्रके लक्षण १८० जब आमवात अत्यन्त बढगया होय उसके लक्षण ,, | पैत्तिकमूत्रकृच्छ्रके लक्षण, कफजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ,, आमवातका विशेष लक्षण, साध्यासाध्यविचार १६३ | सन्निपातज मूत्रकृच्छ्रके लक्षण ,, शूलनिदानम्। | शल्यजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण, मलमूत्रकृच्छ्रके लक्षण ,, वातशूलके कारण और लक्षण १६४ | अश्मरीजन्मके लक्षण ,, पित्तशूलके कारण और लक्षण ,, | शुक्रजके लक्षण १८१ कफशूलके कारण और लक्षण १६५ | अश्मरी और शर्करा इनके साम्य और अवांतर भेद ,, सन्निपातशूलके लक्षण, आमशूलके लक्षण ,, | मूत्राघातनिदानम्। द्वंद्वजशूलोंके लक्षण, ग्रन्थ्यांतरोक्त शूलके स्थान १६६ | वातकुण्डलिक़ाके लक्षण १८१ शूलके उपद्रव, परिणामशूलनिदान ,, | अष्ठीलाके लक्षण, वातवस्तिके लक्षण १८२ वातिक परिणामशूलके लक्षण १६७ | मूत्रातीतके लक्षण ,, पैत्तिक परिणामशूलके लक्षण ,, | मूत्रजठरके लक्षण, मूत्रोत्संगके लक्षण १८३ श्लैष्मिक परिणामशूलके लक्षण ,, | मूत्रक्षयके लक्षण, मूत्रग्रन्थिके लक्षण ,, द्विदोषज और त्रिदोषजके लक्षण ,, | मूत्रशुक्रके लक्षण, उष्णवातके लक्षण १८४ अन्नके उपद्रवसे प्रगट शूलके लक्षण ,, | मूत्रसादके लक्षण, विड्‌विघातके लक्षण ,, उदावर्तनिदानम्। | बस्तिकुण्डलरोगके लक्षण, साध्यासाध्यके लक्षण १८५ उदावर्तके कारण १६८ | कुण्डलीभूतके लक्षण ,, तेरह उदावर्त्तोंके क्रमसे लक्षण ,, | अश्मरीरोगनिदानम्। आनाहरोगनिदान, असाध्य लक्षण १७१ | अश्मरीकी संप्राप्ति, अश्मरीका पूर्वरूप १८६ गुल्मनिदानम्। | पथरीके सामान्य लक्षण ,, गुल्मके सामान्यरूप, गुल्मकी सम्प्राप्ति १७२ | वातकी पथरीके लक्षण १८७ गुल्मके पूर्वरूप ,, | पित्तकी पथरीके लक्षण, कफकी पथरीके लक्षण ,, गुल्मके साधारण लक्षण १७३ | शुक्राश्मरीके लक्षण, पथरीशर्कराके उपद्रव १८८ वातगुल्मके कारण और लक्षण ,, | असाध्य लक्षण ,, पित्तगुल्मके कारण और लक्षण १७४ | उत्तर भाग। कफके और सन्निपातके गुल्मका कारण और लक्षण,, | प्रमेहनिदानम्। द्वन्द्वज गुल्मके लक्षण ,, | कफपित्तवातप्रमेहाँकी क्रमसे संप्राप्ति १८९ सन्निपातगुल्मके लक्षण १७५ | प्रमेहका दोषदूष्यसंग्रह, प्रमेहका पूर्वरूप १९० रक्तगुल्मके लक्षण ,, | सामान्य लक्षण, प्रमेहके कारण ,, असाध्य लक्षण १७६ | कफकी १० प्रमेहाँके लक्षण १९१ हृद्रोगनिदानम्। | पित्तकी ६ प्रमेहाँके लक्षण ,, हृद्रोगकी संप्राप्ति और सामान्य लक्षण १७७ | वातकी ४ प्रमेहाँके लक्षण १९२ वातजहृद्रोगके लक्षण १७८ | कफप्रमेहके उपद्रव, पित्तप्रमेहके उपद्रव ,, ──────────────────────────────────────────────────────────────────────────────────────── CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

वातप्रमेहके उपद्रव १९२ | शोथका निदान, शोथका पूर्वरूप २०७

विषयानुकमणिका । ( ९ ) विषय. पृष्ठाङ्क. | विषय. पृष्ठाङ्क. वातप्रमेहके उपद्रव १९२ | शोथका निदान, शोथका पूर्वरूप २०७ प्रमेहके असाध्य लक्षण, दूसरे असाध्य लक्षण १९३ | शोथका सामान्य लक्षण, वातशोथके लक्षण " कुलपरम्परागत अन्य विकारोंका असाध्यत्व " | पित्तजशोथके लक्षण, कफजशोथके लक्षण २०८ मधुमेहोत्पत्ति, आवरणके लक्षण " | द्वंद्वज और सन्निपातज शोथके लक्षण " मधुमेहशब्दकी प्रवृत्तिविषयनिमित्त १९४ | अभिघातज शोथके लक्षण " प्रमेहपीडिकानिदानम् । | विषज शोथके लक्षण २०९ सब पिडिओंके लक्षण १९४ | दोष सूजनके उत्पत्ति स्थान " पिटिकाकी उत्पत्ति १९५ | सूजनके कृच्छ्रादि भेद " असाध्यपिटिकाके लक्षण " | असाध्य लक्षण, शोथके उपद्रव २१० मेदोनिदानम् । | अण्डवृद्धिनिदानम् । मेदका कारण और सम्प्राप्ति १९६ | अण्डवृद्धिकी सम्प्राप्ति २११ मेदस्वी पुरुषके लक्षण " | वातकी अण्डवृद्धिके लक्षण " मेदस्वीकी अवस्थाविशेष " | पित्तकी अण्डवृद्धिके लक्षण " अत्यन्त मेद बढनेका परिणाम, स्थूल लक्षण १९७ | कफकी अण्डवृद्धिके लक्षण " कार्श्यनिदानम् । | रक्तज-मेदज अण्डवृद्धिके लक्षण २१२ ग्रन्थान्तरोक्त कार्श्यनिदान १९७ | मूत्रवृद्धिके लक्षण, आंत्रवृद्धिके लक्षण " कृशमनुष्यके लक्षण १९८ | इसकी औषध न करनेका परिणाम २१३ अतिकृशको वर्जनीय वस्तु " | असाध्य लक्षण " अतिकृशके रोगका वर्णन " | वर्ध्मरोगनिदान " कोई स्थूल होनेपर भी निर्बल | गलगंडनिदानम् । होता है इसका कारण १९९ | गलगंडकी सम्प्राप्ति, वातिक गलगण्डके लक्षण २१४ असाध्य कार्श्य " | कफज गलगण्डके लक्षण, मेदजगलगण्डके लक्षण २१५ उदररोगनिदानम् । | असाध्य लक्षण " उदररोगका कारण १९९ | गण्डमालानिदानम् । उदरकी सम्प्राप्ति २०० | अपचीके लक्षण, असाध्यके और साध्य लक्षण २१६ उदरके सामान्यरूप, उदररोगकी संख्या " | ग्रन्थिनिदानम् । वातोदरके लक्षण " | वातजग्रंथिके लक्षण, पित्तकी ग्रंथिके लक्षण २१७ पित्तोदरके लक्षण, कफोदरके लक्षण २०१ | कफकी ग्रन्थिक लक्षण, मेदजग्रंथिके लक्षण " सन्निपातोदरके लक्षण २०२ | शिराजग्रंथिके लक्षण " प्लीहोदरके लक्षण " | साध्यासाध्यके लक्षण २१८ यकृद्दाल्युदरके लक्षण, इसमें दोषोंका सम्बन्ध २०३ | अर्बुदनिदानम् । बद्धगुदोदरके लक्षण " | अर्बुदकी संप्राप्ति २१८ क्षतोदरके लक्षण २०४ | रक्तार्बुदके लक्षण " जलोदरकी उत्पत्ति सह लक्षण " | मांसार्बुदकी सम्प्राप्ति २१९ साध्यासाध्य विचार २०५ | साध्यमें असाध्यप्रकार " जातोदकके लक्षण चरकमेंसे " | अध्यर्बुदके लक्षण " असाध्य लक्षण, दूसरे असाध्य लक्षण २०६ | द्विरर्बुदके लक्षण २२० शोथरोगनिदानम्। | अर्बुद न पकनेका कारण " शोथकी संप्राप्ति २०६ |

( १० ) माधवनिदानकी-

( १० ) माधवनिदानकी-

विषय.पृष्ठाङ्क.विषय.पृष्ठाङ्क.
श्लीपदनिदानम् ।आगन्तुजव्रणनिदानम् ।
श्लीपदकी सम्प्राप्ति, वातजश्लीपद२२०व्रणकी संख्या और सम्प्राप्ति२३२
पित्तजश्लीपद, श्लैष्मिक श्लीपद२२१छिन्नके लक्षण, भिन्नके लक्षण२३३
असाध्य लक्षणकोष्ठके लक्षण, कोष्ठके भेदोंके लक्षण
श्लीपदमें कफको प्राधान्यआमाशयस्थित रक्तके लक्षण२३४
श्लीपद कौनसे देशमें उत्पन्न होयपक्वाशयस्थके लक्षण, विद्धव्रणके लक्षण
असाध्य लक्षणक्षतके लक्षण, पिच्चितके लक्षण
विद्रधिनिदानम् ।घृष्टके लक्षण, सशल्‍यव्रणके लक्षण, कोष्ठके लक्षण२३५
वातजविद्रधिके लक्षण२२२असाध्य कोष्ठभेद
पित्तकी विद्रधिके लक्षणमांस, शिरा, स्नायु और अस्थि और सन्धि
कफकी विद्रधिके लक्षण२२३इन मर्मोंमें चोट लगनेके सामान्य लक्षण
पकनेके अनन्तर उनका स्रावमर्मरहित शिराविद्धके लक्षण२३६
सन्निपातकी विद्रधिके लक्षणस्नायुविद्धके लक्षण, संधिविद्धिके लक्षण२३६
आगन्तुजविद्रधिकी सम्प्राप्तिहड्डी विन्ध गईहो उसके लक्षण
रक्तजविद्रधिके लक्षण, अन्तर्विद्रधिके लक्षण२२४शिरादिमर्मविद्ध लक्षण
विद्रधिके स्थानमांसविद्धके लक्षण, सर्वव्रणके उपद्रव२३७
स्रावनिर्गम, विद्रधिमें साध्यासाध्य२२५भग्ननिदानम् ।
असाध्य लक्षणभग्नके दो प्रकार, संधिभग्नके लक्षण२३७
व्रणनिदानम् ।संधिभग्नके सामान्य लक्षण
वातादिभेदसे व्रणके लक्षण२२६कांडभग्नकथन२३८
कच्चे फोडेके लक्षण, पच्यमानव्रणके लक्षणकांडभग्नके सामान्य लक्षण, कष्टसाध्यके लक्षण२३९
पक्वव्रणके लक्षण२२७असाध्य लक्षण
पकनेके समय तीनों दोषोंका सम्बन्ध२२८असावधानतासे असाध्यता२४०
राध न निकालनेसे परिणामअस्थिविशेष करके भग्नविशेष
आमादिलक्षणज्ञानसे वैद्यके गुणदोषनाडीव्रणनिदानम् ।
अपक्व पक्वकी उपेक्षा करनेमें दोषनाडीव्रणसंख्या-रूप सम्प्राप्ति२४१
शारीरव्रणनिदानम् ।वातजनाडीव्रणके लक्षण, पित्तके नाडीव्रणके लक्षण
वातिक व्रण, पित्तव्रणके लक्षण२२९कफनाडीव्रणके लक्षण२४२
कफव्रणके लक्षण, रक्तज द्वन्द्वज व्रणके लक्षणसन्निपातजनाडीव्रणके लक्षण
सुखव्रणके लक्षण२३०शल्यजनाडीव्रणके लक्षण, साध्यासाध्य लक्षण
कृच्छ्र साध्य और असाध्यके लक्षणभगन्दरनिदानम् ।
दुष्टव्रणके लक्षण, शुद्धव्रणके लक्षणभगन्दरका पूर्वरूप, शतपोनकके लक्षण२४३
भरनेवाले व्रणके लक्षणउष्ट्रशिरोधरके लक्षण
जो व्रण भरगया हो उसके लक्षण२३१परिस्रावी भगन्दरके लक्षण२४४
व्याधिविशेष करके व्रणकां कृच्छ्रसाध्यत्वशम्बूकावर्तके लक्षण, उन्मार्गिभगन्दरके लक्षण
साध्यासाध्य लक्षण, असाध्यव्रणके लक्षणसाध्यासाध्य लक्षण, असाध्यके लक्षण
दूसरे असाध्य लक्षणउपदंशनिदानम् ।
व्रणरोगमें अपथ्य२३२उपदंशके कारण, वातोपदंशके लक्षण२४५

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विषयानुक्रमणिका । ( ११ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. पित्तोपदंश व रक्तोपदंशके लक्षण २४५ विचर्चिकाके लक्षण, वातजादिक कुष्ठोंके लक्षण २५६ कफोपदंशके लक्षण ,, रसादि सप्तधातुगतकुष्ठोंके लक्षण २५७ सन्निपातोपदंशके लक्षण ,, रक्तगतकुष्ठके लक्षण, मांसगतकुष्ठके लक्षण ,, असाध्य लक्षण २४६ मेदोगतकुष्ठके लक्षण, अस्थिमज्जागतकुष्ठके लक्षण ,, लिंगवार्तके लक्षण ,, शुक्रार्तवगतकुष्ठके लक्षण ,, फिरंगरोगनिदानम् । साध्यादिभेद २५८ फिरंगशब्दकी निरुक्ति २४७ कुष्ठमें प्रधानदोषके लक्षण ,, विप्रकृष्टनिदान ,, किलासनिदान २५९ इसका रूप, फिरंग रोगके उपद्रव ,, वातादिभेदसे उनके लक्षण ,, साध्यासाध्य कष्टसाध्यत्व २४८ श्वित्रके साध्यासाध्य लक्षण ,, शूकदोषनिदानम् । किलासके असाध्य लक्षण, सांसर्गिक रोग २६० सर्षपिकाके लक्षण २४८ शीतपित्तोद्दर्दकोठनिदानम् । अष्ठीलाके लक्षण ,, शीतपित्तके निदान और सम्प्राप्ति व पूर्वरूप २६१ ग्रन्थितके लक्षण २४९ उद्दर्दके लक्षण, उद्दर्दका दूसरा धर्म ,, कुंभिकाके लक्षण, अलजीके लक्षण ,, कोठके लक्षण २६२ मृदितके लक्षण, संमूढपिटिकाके लक्षण ,, अम्लपित्तनिदानम् । अवमन्थके लक्षण, पुष्करिकाके लक्षण ,, निदानपूर्वकअम्लपित्तका स्वरूप २६२ स्पर्शहानिके लक्षण २५० अम्लपित्तके लक्षण, अधोगत अम्लपित्तके लक्षण ,, उत्तमाके लक्षण, शतपोनकके लक्षण ,, ऊर्ध्वगतअम्लपित्तके लक्षण २६३ त्वक्पाकके लक्षण, शोणितार्बुदके लक्षण ,, कफपित्तजन्यअम्लपित्तके लक्षण ,, मांसार्बुदके लक्षण, मांसपाकके लक्षण ,, अम्लपित्तके साध्यासाध्यविचार ,, विद्रधिके लक्षण २५१ अम्लपित्तमें केवल वायुका और वातकफका संसर्ग ,, तिलकालकके लक्षण ,, वातयुक्त अम्लपित्तके लक्षण २६४ असाध्य शूकदोषके लक्षण ,, कफयुक्त अम्लपित्तके लक्षण ,, कुष्ठनिदानम् । वातकफयुक्त अम्लपित्तके लक्षण ,, दोषाधिक्यसे कुष्ठके भेद २५२ कफपित्तयुक्त अम्लपित्तके लक्षण ,, कुष्ठके पूर्वरूप ,, विसर्पनिदानम् । सप्तमहाकुष्ठोंके लक्षण २५३ विसर्पका निदानपूर्वक संख्यादिकथन २६५ औदुंबरकुष्ठके लक्षण, मंडलकुष्ठके लक्षण ,, वातविसर्पके लक्षण ,, ऋक्षजिह्वकुष्ठके लक्षण २५४ पित्तविसर्पके लक्षण, कफविसर्पके लक्षण २६६ पुण्डरीककुष्ठके लक्षण, सिध्मकुष्ठके लक्षण ,, सन्निपातज विसर्पके लक्षण, अग्निविसर्पके लक्षण ,, काकणकुष्ठके लक्षण ,, ग्रंथिविसर्पके लक्षण, कर्दमविसर्पके लक्षण २६७ ग्यारह क्षुद्रकुष्ठोंके लक्षण, किटिभकुष्ठके लक्षण ,, क्षतजविसर्पके लक्षण, विसर्पके उपद्रव २६८ वैपादिक कुष्ठके लक्षण २५५ साध्यासाध्य लक्षण २६९ अलसकुष्ठके लक्षण, दद्रुमण्डलके लक्षण ,, विस्फोटकनिदानम् । चर्मदलके लक्षण, पामाकुष्ठके लक्षण ,, विस्फोटकके लक्षण, विस्फोटकस्वरूप २६९ कच्छूकुष्ठके लक्षण ,, वातविस्फोटकके लक्षण, पित्तविस्फोटकके लक्षण २७० विस्फोटककुष्ठके लक्षण, शतारुकुष्ठके लक्षण २५६

( १२ ) माधवनिदानकी-

( १२ ) माधवनिदानकी- विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. कफविस्फोटकके लक्षण २७० | कक्षा ( कखलाई ) के लक्षण २७९ कफपित्तात्मकविस्फोटकके लक्षण ,, | गन्धमालाके लक्षण २८० वातपित्तात्मक विस्फोटकके लक्षण ,, | अग्निरोहिणी ( कालीफुन्सी ) ,, कफवातात्मकविस्फोटकके लक्षण ,, | चिप्पके लक्षण, अनुशयके लक्षण ,, सन्निपातविस्फोटकके लक्षण ,, | विदारिकाके लक्षण ,, रक्तजविस्फोटकके लक्षण २७१ | शर्कराके लक्षण २८१ साध्यासाध्यविचार, विस्फोटकके उपद्रव ,, | शर्करादके लक्षण ,, मसूरिकानिदानम् । | पाददारीके लक्षण, कदर ( ठेक ) के लक्षण ,, कारण और संप्राप्ति २७१ | अलसक ( खारुवा ) के लक्षण २८२ मसूरिकाके पूर्वरूप २७२ | इन्द्रलुप्त ( चाई ) के लक्षण ,, वातकी मसूरिकाके लक्षण ,, | दारुणकके लक्षण, अरूंषिकाके लक्षण २८३ पित्तकी मसूरिकाके लक्षण ,, | पलित ( सफेद बाल ) के लक्षण ,, रक्तजमसूरिकाके लक्षण, कफजमसूरिकाके लक्षण २७३ | मुखदूषिकाके लक्षण ,, त्रिदोषजमसूरिकाके लक्षण ,, | पद्मिनीकंटकके लक्षण २८४ चर्मपिटिकाके लक्षण ,, | जतुमणि ( लहसन ) के लक्षण ,, रोमांतिकाके लक्षण २७४ | माष ( मस्सा ) के लक्षण ,, रसादिसप्तधातुगतके लक्षण ,, | तिलकालक ( तिल ) के लक्षण ,, रसगतमसूरिकाके लक्षण ,, | न्यच्छके लक्षण २८५ रक्तगत मसूरिकाके लक्षण ,, | व्यंग ( झांई ) के लक्षण नीलिकाके लक्षण ,, मांसगतके लक्षण, मेदोगतके लक्षण ,, | परिवर्त्तिकाके लक्षण ,, अस्थिमज्जागतके लक्षण २७५ | अवपाटिकाके लक्षण, निरुद्धप्रकाशके लक्षण २८६ शुक्रगतके लक्षण ,, | सन्निरुद्धगुदके लक्षण, अहिपूतनके लक्षण २८७ सप्तधातुगतमसूरिकाके दोषके | वृषणकच्छूके लक्षण ,, संबंधसे लक्षण ,, | गुदभ्रंशके लक्षण २८८ धातुगत और दोषज मसूरि | शूकरदंष्ट्रके लक्षण ,, कामे कौन कौन साध्य | मुखरोगनिदानम् । कष्टसाध्य मसूरिकाके लक्षण २७६ | मुखरोगोंकी संख्या २८८ असाध्य मसूरिकाके लक्षण ,, | ओष्ठरोगकी संप्राप्ति २८९ सर्व मसूरिकाके अवस्थाविशेष करके लक्षण ,, | वातिक ओष्ठरोगके लक्षण ,, मसूरिकाके उपद्रव २७७ | पैत्तिकके लक्षण, श्लैष्मिकके लक्षण ,, क्षुद्ररोगनिदानम् । | सान्निपातिकके लक्षण, रक्तजके लक्षण ,, अजगल्लिकाके लक्षण २७७ | मांसजके लक्षण २९० यवप्रख्याके लक्षण, अन्त्रालजीके लक्षण ,, | मेदोजके लक्षण, अभिघातजके लक्षण ,, विवृतापिडिकाके लक्षण २७८ | दन्तमूलगत १६ रोग । कच्छपिकाके लक्षण, वल्मीकपिटिकाके लक्षण ,, | शीतादके लक्षण २९० इन्द्रवृद्धाके लक्षण, गर्दभिकाके लक्षण ,, | दन्तपुप्पुटके लक्षण, दन्तवेष्टके लक्षण २९१ पाषाणगर्दभके लक्षण २७९ | शौषिरके लक्षण, महाशौषिरके लक्षण ,, पनशिकाके लक्षण, जालगर्दभके लक्षण ,, | परिदरके लक्षण, उपकुशके लक्षण २९२ इरिवेलिकाके लक्षण ,, | CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

विषयानुक्रमणिका । ( १३ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. वैदर्भके लक्षण, खलीवर्धनके लक्षण,करालके लक्षण २९२ कृमिकर्णके लक्षण ३०४ अधिमांसकके लक्षण, नाड़ीव्रणके लक्षण २९३ कानमें पतंगादि कीड़ा धरनेके कारण " दन्तगत ८ रोग । द्विविधकर्णविद्रधिके लक्षण " दालनके लक्षण, कृमिदन्तकके लक्षण २९३ कर्णपाकके लक्षण, पूतिकर्णके लक्षण " भंजनकके लक्षण " वातजके लक्षण ३०५ दन्तहर्षके लक्षण, दन्तर्र्शकराके लक्षण २९४ पित्तजके लक्षण, कफजके लक्षण " कपालिकाके लक्षण, श्यावदंतके लक्षण " सन्निपातजके लक्षण " हनुमोक्षके लक्षण २९५ कर्णपालीके रोग । जिह्वागत ५ रोग । कर्णशोथके लक्षण ३०५ वातजके लक्षण, पित्तजके लक्षण, कफजके लक्षण २९५ परिपोटकके लक्षण ३०६ अलासके लक्षण " उत्पातके लक्षण " उपजिह्वके लक्षण २९६ उन्मन्थकके ल०, दुःखवर्धनके लक्षण " तालुगत ९ रोग । परिलेहीके लक्षण " कण्ठशुण्डीके लक्षण, तुण्डिकेरीके लक्षण २९६ नासारोगनिदानम् । अधुषके लक्षण, कच्छपके लक्षण, अर्बुदके लक्षण " पीनसके लक्षण ३०७ मांससंघातके लक्षण, तालुपुप्पुटके लक्षण २९७ पूतिनस्यके ल०, नासापाकके लक्षण " तालुशोष तथा तालुपाकके लक्षण " पूयरक्तके लक्षण, क्षवथु ( छींक ) के लक्षण " कंठगत १७ रोग । आगन्तुजक्षवथुके लक्षण ३०८ पांचरोहिणीकी सामान्य सम्प्राप्ति २९७ भ्रंशथुके ल०, दीप्तके लक्षण " वातजाके लक्षण " प्रतिनाहके लक्षण, नासास्रावके लक्षण " पित्तजाके लक्षण, कफजाके लक्षण २९८ नासापरिशोषके लक्षण " त्रिदोषजाक लक्षण, रक्तजाके लक्षण " चिकित्साभेदार्थ पीनसके आमपक्वके लक्षण ३०९ कंठशालूकके लक्षण, अधिजिह्वकके लक्षण " प्रतिश्यायकी संप्राप्ति " वलयके लक्षण, " चयादिक्रमसे इसका दूसरा निदान " घलासके लक्षण, एकवृंदके लक्षण, वृंदके लक्षण २९९ पूर्वरूपके लक्षण, वातिक प्रतिश्यायके लक्षण ३१० शतघ्नीके लक्षण, गिलायुके लक्षण ३०० पैत्तिकप्रतिश्यायके लक्षण, श्लैष्मिकप्रतिश्यायके लक्षण,, गलविद्रधिके लक्षण, गलोघके लक्षण " सान्निपातिकके लक्षण, दुष्टप्रतिश्यायके लक्षण ३११ स्वरघ्नेके लक्षण " रक्तप्रतिश्यायके लक्षण, " मांसतानके लक्षण ३०१ असाध्य लक्षण, प्रतिश्यायके अन्यविकार ३१२ विदारीके लक्षण, मुखपाक ( मुख आना ) " नेत्ररोगनिदानम् । वातजके लक्षण, पित्तजके लक्षण " नेत्ररोगका कारण ३१३ कफजके लक्षण, असाध्यमुखरोगके लक्षण " सुश्रुतमतसे नेत्ररोगकी सम्प्राप्ति " कर्णरोगनिदानम् । अभिष्यंद ( नेत्र आनाके ) लक्षण ३१४ कर्णशूलके लक्षण, कर्णनादके लक्षण ३०२ वाताभिष्यन्दके लक्षण, पित्ताभिष्यन्दके लक्षण " बाधिर्य ( बहराके ) लक्षण ३०३ कफजाभिष्यन्दके लक्षण " कर्णक्ष्वेडके लक्षण, कर्णस्रावके लक्षण " रक्तजाभिष्यन्दके लक्षण ३१५ कर्णकण्डूके लक्षण, कर्णगूथके लक्षण " अभिष्यन्दसे अधिमन्थकी उत्पत्ति " कर्णप्रतिनाहके लक्षण " दूसरे सामान्य लक्षण "

( १४ ) माधवनिदानकी-

( १४ ) माधवनिदानकी-

विषय.पृष्ठांक.विषय.पृष्ठांक.
दोषभेदसे कालमर्यादाके लक्षण३१५नेत्रकी सन्धिके रोग ।
नेत्ररोगके सामान्य लक्षण,,पूयालसके ल०, उपनाहके लक्षण३२९
निरामके लक्षण, शोथसहित नेत्रपाकके लक्षण३१६स्राव अथवा नेत्रनाडीके लक्षण,,
हताधिमन्थके लक्षण,,पर्वणी व अलजीके ल०, कृमिग्रंथिके लक्षण३३०
वातपर्ययके लक्षण, शुष्काक्षिपाकके लक्षण३१७वर्त्मरोग (मर्मस्थानके) रोग ।
अन्यतोवातके लक्षण, अम्लाध्युषितके लक्षण,,उत्संगपिडिकाके लक्षण३३०
शिरोत्पातके लक्षण, शिराहर्षके लक्षण३१८कुंभिकाके लक्षण३३१
नेत्रोंके काले रंगमें रोग ।पोथकीके लक्षण, वर्त्मशर्कराके लक्षण,,
सव्रण शुक्र लक्षण, सव्रण शुक्रके साध्यासाध्य ल०३१८अर्शोवर्त्मके लक्षण, शुष्कार्र्शके लक्षण,,
अव्रण शुक्रके लक्षण३१९अञ्जनके लक्षण,,
अव्रण अवस्था विशेषकरके साध्य लक्षण,,बहलवर्त्मके लक्षण३३२
सव्रण अवस्थाभेदकरके असाध्य लक्षण,,वर्त्मबन्धके लक्षण,,
दूसरे असाध्य लक्षण,,क्लिष्टवर्त्मके लक्षण, वर्त्मकद्दमके लक्षण,,
अक्षिपाकात्ययके लक्षण, अजकाजातके लक्षण३२०श्याववर्त्मके लक्षण,,
दृष्टिके रोग ।प्रक्लिन्नवर्त्मके लक्षण३३३
पहले पटलमें दोष जानेसे उसके लक्षण३२०अक्लिन्नवर्त्मके लक्षण, वातहतवर्त्मके लक्षण,,
दृष्टिका प्रमाण सुश्रुत मतसे,,अर्बुदके लक्षण, निमेषके लक्षण,,
प्रसंगवशसे पटल (मण्डल) का भेद,,शोणितार्शके लक्षण३३४
द्वितीयपटलस्थितदोषके लक्षण३२१लगणके लक्षण, बिसवर्त्मके लक्षण,,
तृतीयपटलगतदोषके लक्षण,,कुम्भनके लक्षण,,
चतुर्थपटलगततिमिरके लक्षण३२२पक्ष्मकोपके लक्षण३३५
तृतीयपटलाश्रितकाचदोषकी दूसरी संज्ञा,,पक्ष्मशातके लक्षण, नेत्ररोगोंकी संख्या,,
दोषविशेष करके रूपका दीखना३२३शिरोरोगनिदानम् ।
पित्तसे दूसरे परिम्लायी संज्ञक तिमिर, लक्षण,,वातजके लक्षण, पैत्तिकके लक्षण३३६
रोगभेदसे लिंगनाशको षड्विधत्व३२४श्लैष्मिकके लक्षण, सान्निपातिकके लक्षण,,
वातिकरोगके विशेष लक्षण,,रक्तजके लक्षण३३७
दृष्टिमण्डलगत रोगके लक्षण,,क्षयजके लक्षण, कृमिजके लक्षण,,
सर्वदृष्टिरोगकी संख्या, पित्तविदग्धके लक्षण३२५सूर्यावर्त्तके लक्षण, अनंतवातके लक्षण,,
दिवांधके लक्षण, कफविदग्धदृष्टिके लक्षण,,अर्धावभेद (आधीसीसी) के लक्षण३३८
नक्तान्ध (रतौंधी) के लक्षण,,शंखकके लक्षण,,
धूमदर्शीके लक्षण, ह्रस्वदृष्टिके लक्षण३२६प्रदररोगनिदानम् ।
नकुलान्ध्यके लक्षण, गम्भीरदृष्टिके लक्षण,,प्रदररोगके सामान्य रूप-उपद्रवके लक्षण३३९
आगन्तुकलिंगनाशके लक्षण,,श्लैष्मिकके लक्षण३४०
आनिमित्तके लक्षण३२७पैत्तिकके लक्षण,,
अर्र्मरोग (५) प्रकारका है,,वातिकके लक्षण, त्रिदोषजके लक्षण,,
शुक्तिरोगके लक्षण, अर्जुनके लक्षण३२८विशुद्धार्तवके लक्षण,,
पिष्टकके लक्षण, जालके लक्षण,,योनिव्यापत्तिनिदानम् ।
शिराजपिटिकाके लक्षण, बलासके लक्षण३२९योनिके बीस रोगोंके लक्षण३४१
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विषयानुक्रमणिका । ( १५ ) विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. स्राव और पातके लक्षण ३४३ स्थावरविषके सामान्य लक्षण ३५६ गर्भ अकालमें कैसे गिरे इसका निदानपूर्वक दृष्टान्त ,, विष देनेवालेके ढूँढनेके निमित्त लक्षण ,, प्रसूत होते समय मूढगर्भ होनेका लक्षण ,, मूलादिविषोंके लक्षण ३५७ मूढ गर्भकी आठ प्रकारकी गति ३४४ विषलिप्तशस्त्रहतके लक्षण ,, असाध्य मूढगर्भ और गर्भिणीके लक्षण ,, सर्पविष यह अति तीक्ष्ण है इसीसे प्रथम मृतगर्भके लक्षण ३४५ सर्पोंकी जाति कथन ,, गर्भमरण हेतु ,, सर्पोंके भेद ३५९ गर्भिणीके दूसरे असाध्य लक्षण ,, भोगीसर्पके काटनेपर वातादिकोंके लक्षण ,, सूतिकारोगनिदानम् । विशिष्टदेशमें तथा विशिष्ट नक्षत्रमें काटनेके प्रसूतिरोगकी उत्पत्ति, असाध्य लक्षण ३४६ असाध्य लक्षण ३६० स्तनरोगनिदानम् । गर्मी होनेसे विषके जोरका लक्षण ,, स्तन्य ( दूध ) के रोग ३४७ दूसरे असाध्य लक्षण ,, वातादिकसे दूषित दूधके लक्षण ,, दूषितविषके लक्षण, तूषीविषके लक्षण ३६१ शुद्धदूधके लक्षण ३४८ स्थान भेदकरके उसके विशिष्ट लक्षण ३६२ बालरोगनिदानम् । दूषीविषकी निरुक्ति ,, वातदूषित दूधके ( रोग ) ३४९ इन दोनों विषोंके लक्षण ३६३ पित्तदूषित दूधके रोग ,, दूषीविषके साध्यादि लक्षण ,, कफदूषित दूधके रोग ,, लूताविषकी उत्पत्ति ,, बालकोंकी अन्तर्गत पीडा जाननेका उपाय ,, उनके काटनेके सामान्य लक्षण ३६४ द्वन्द्वज और सन्निपातज दूषित दुग्धके रोग ३५० दूषीविष लूताके काटनेके लक्षण ,, कुक्कूणकके लक्षण ,, प्राणहरलूताके लक्षण ,, पारिगर्भिकके लक्षण ३५१ दूषीविषआखुके लक्षण ,, तालुकण्टक लक्षण ,, प्राणहरमूषकविषके लक्षण ३६५ महापद्मविसर्पके लक्षण ,, कृकलास ( सरट ) के काटेके लक्षण ,, और विकार जो बालकोंके होत उनका लक्षण ,, वृश्चिकविषके लक्षण ,, सामान्यग्रहजुष्टके लक्षण ३५२ वृश्चिकविषके असाध्य लक्षण ३६६ स्कन्दग्रहगृहीत बालकके लक्षण ,, कणभदष्टके लक्षण ,, स्कन्दापस्मारके लक्षण ३५३ उच्चिटिंगर ( झींगर ) विषके लक्षण ,, शकुनिग्रहके लक्षण ,, मण्डूक ( मेढक ) के विषके लक्षण ,, रेवतीग्रहके लक्षण ,, विषैले मत्स्य ( मछली ) के विषके लक्षण ३६७ पूतनाग्रहके लक्षण ,, सविषजलौका ( जोंक ) के विषके लक्षण ,, अन्धपूतनाग्रहके लक्षण ,, गृहगोधिका ( छिपकली ) के विषके लक्षण ,, शीतपूतनाग्रहके लक्षण ३५४ शतपदी ( कानखजूरा ) के विषके लक्षण ,, मुखमण्डिकाग्रहके लक्षण ,, मशक ( मच्छर वा डांस ) के विषके लक्षण ,, नैगमेय ग्रहके लक्षण ,, असाध्यमशकक्षतके लक्षण ३६८ विषरोगनिदानम् । सविषमक्षिका ( मक्खी ) दंशके लक्षण ,, विषके स्थान ३५५ चतुष्पादादिकोंके विषके साधारण लक्षण ,, जंगमविषके सामान्य लक्षण ३५६ विष उतर गया हो उसके लक्षण ,,

क्लीबके लक्षण ३६९ सुश्रुतसे -शुक्रदोषनिदानं ,,

( १६ ) माधव० विषयानुक्रमणिका । विषय. पृष्ठाङ्क. । विषय. पृष्ठांक. परिशिष्ट ( ग्रन्थशेष । कफदूषित शुक्रके लक्षण, शुद्ध शुक्रके लक्षण ३७७ क्लीबके लक्षण ३६९ सुश्रुतसे -शुक्रदोषनिदानं ,, क्लैब्यके सामान्य लक्षण ,, आर्तवदोषके लक्षण, विष्टम्भगर्भके लक्षण ३७८ बीजोपघात क्लीबके लक्षण ,, उपविष्टगर्भके लक्षण ३७९ ध्वजभंगक्लीवकी उत्पत्ति ३७० मन्थरज्वर ( मोतीज्वर ) के लक्षण ,, ध्वजभंगके लक्षण ३७१ अलर्क ( कुत्ते ) के विषनिदान ,, आसेक्य नपुंसकके लक्षण ३७२ उसके काटनेके लक्षण ,, सौगंधिक नपुंसकके लक्षण ,, विषैले अन्य प्राणियोंका संग्रह ,, कुंभिक नपुंसकके लक्षण ,, सविषनिर्विष दंशके लक्षण, असाध्य लक्षण ३८० ईर्ष्याकनपुंसकके लक्षण ३७३ जलसत्रासनामाके लक्षण ,, महाषंढनपुंसकके लक्षण ,, गौधेरकवंशके लक्षण ३८१ नारीषंढ नपुंसकके लक्षण ,, सर्पपिका दंशके लक्षण ,, उक्तश्लोकोंका संग्रह ,, विश्वम्भरादष्टके लक्षण ,, जरासंभव नपुंसकके लक्षण ३७४ अंहिंडकादष्टके लक्षण ३८२ जगसंभव ( दूसरे ) नपुंसकके लक्षण ,, कण्ठूमकादष्टके लक्षण ,, क्षयजक्लीबके लक्षण ,, शूकवृन्दादि दष्टके लक्षण ,, असाध्य नपुंसकके लक्षण ३७५ पिपीलिकादंशके लक्षण ,, शुक्रार्तवदोषनिदानम् ३७६ स्नायुके निदान ,, दूषित शुक्रके भेद ,, ध्वजभंगके संगृहीत श्लोक ,, वातदूषित शुक्रके लक्षण ३७७ रोगानुक्रमणिका ३८३ पित्तदूषित शुक्रके लक्षण ,, टीकाकर्त्ताकी वंशावली ३८४ इति विषयानुक्रमणिका समाप्ता ॥

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ॐ श्रीशं वन्दे । श्रीनिकुञ्जविहारिणे नमः । ❖ माधवनिदानम् । ❖ भाषाटीकासमेतम् । प्रथम भाग । नरवरवपुधारी गोकुलानंदकारी ब्रजयुवतिविहारी रासलीलाप्रचारी । प्रणवहुँ बनवारी कंसको मानमारी सकलविघनटारी लीजिये सुधि हमारी ॥ तथा च—कर्ता भर्त्ता तथा हर्त्ता भोगमोक्षैकदायिनम् । वन्दे श्रीगिरिजाकान्तं शंकरं लोकशंकरम् ॥ परमकारुणिक श्रीसदाशिवचरणाम्बुजचंचरीक श्रीमाधवाचार्य निश्शेषविघ्नविघातार्थं और ग्रन्थकी निर्विघ्नपरिसमाप्तिके निमित्त ग्रन्थके आदिमें मंगलाचरण करते हैं— ( युग्मम् ) प्रणम्य जगदुत्पत्तिस्थितिसंहारकारणम् । स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं त्रैलोक्यशरणं शिवम् ॥ १ ॥ ग्रन्थकर्ताकी प्रतिज्ञा । नानामुनीनां वचनैरिदानीं समासतः सद्भिषजां नियोगात् । सोपद्रवारिष्टनिदानलिङ्गो निबध्यते रोगविनिश्चयोऽयम् ॥ २ ॥ मया अयं रोगविनिश्चयो ग्रन्थः इदानीं समासतः निबध्यते, किं कृत्वा, शिवं प्रणम्य, कथंभूतं शिवं जगदुत्पत्तिस्थितिसंहारकारणम्, पुनः कथंभूतं शिवं स्वर्गा- पवर्गयोर्द्वारम्, पुनः त्रैलोक्यशरणम्, किंविशिष्टो ग्रन्थः सोपद्रवारिष्टनिदानलिंगः, कैः नानामुनीनां वचनैः, कस्मात् सद्भिषजां नियोगात् इत्यन्वयः ॥ जगत्की उत्पत्ति, पालन और प्रलयके प्रधान कारण, स्वर्ग ( सुख ) अपवर्ग ( मोक्षके ) द्वार अर्थात् दाता तथा त्रिलोकीके रक्षक शिवको प्रणाम कर अनेक सुश्रुतादि मुनीश्वरोंके वचनोंके अनुसार उत्तम वैद्योंकी आज्ञासे अब मैं संक्षेपसे २

( २ ) माधवनिदान ।

( २ ) माधवनिदान । रोगविनिश्चय नाम ग्रन्थकी रचना करता हूँ। जिसमें उपद्रव, अरिष्ट, निदान और लिंग ( चिह्न ) इनका लक्षण अच्छी रीतिसे किया गया है ॥ शिष्य-यह अतिसूक्ष्म निदानपंचक सर्वत्र ऋषिमुनियोंके जानने योग्य है उनके वाक्योंका निरादर कर मनुष्यकृत तुम्हारे ग्रन्थमें मनुष्योंकी कैसे प्रवृत्ति होवेगी ? इस कारण माधवाचार्यने-" नानामुनीनां वचनैः " इस पदको धरा अर्थात् अनेक मुनीश्वरोंके वचनोंका आशय ले मैंने यह ग्रन्थ निर्माण किया है, किंतु मेरे मनकी उक्तिसे कल्पित नहीं है। शंका-पहले ही बहुत ग्रन्थ निर्माण करे उपस्थित हैं फिर तुम्हारे इस ग्रन्थको कौन पढ़ेगा ? इस कारण माधवाचार्यने " इदानीम् " पद मूलमें धरा । इस पदका यह आशय है कि, हम ही अनेक मुनीश्वरोंके वचनोंसे अब ऐसा अलौकिक ग्रन्थ रचते हैं कि, पहिले किसी आचार्यने अद्यापि नहीं निर्माण करा । कोई वादी शंका करे कि, तुमने ग्रन्थ रचा भी परन्तु किसीने नहीं पढ़ा तो आपका ग्रन्थ निर्माण करना व्यर्थ होगा, इस कारण माधवाचार्यने " सद्धिषजां नियोगात् " यह पद धरा. इस पदका आशय यह है कि, हमारे पढनेके निमित्त कोई निदानग्रन्थ निर्माण करो ऐसे बुद्धिमान् वैद्योंके कहनेसे इस ग्रन्थकी रचना की है। शंका-श्रीमहादेवजीके हर मृड रुद्र शम्भु इत्यादि नामोंको त्यागकर शिव इस नामको क्यों प्रणाम करा ? उत्तर-इस रोगविनिश्चय ग्रन्थके पठन पाठन करनेवालोंके कल्याणकी इच्छा कर सब कामना देनेवाला कल्याणवाचक शिवनाम विचार इसीको ग्रन्थके आदिमें माधवाचार्यने प्रणाम करा ॥ अन्य निदानग्रन्थोंसे इसकी उत्तमता दिखाते हैं- नानातंत्रविहीनानां भिषजामल्पमेधसाम् । सुखं विज्ञातुमातङ्कमयमेव भविष्यति ॥ ३ ॥ अयमेव ( ग्रन्थः ) अल्पमेधसां भिषजां सुखं यथा भवति तथा आतङ्कं विज्ञातुं भविष्यति । किविशिष्टानां भिषजां नानान्त्रविहीनानामित्यन्वयः ॥ अनेक ग्रन्थोंके विचार करनेमें असमर्थ ऐसे मन्दबुद्धिवाले वैद्योंको सुखपूर्वक रोगाँनके निमित्त यही ग्रन्थ कारण होवेगा. क्योंकि, रोगके जाननाही मुख्य है सो अन्यान्तरोंमें लिखा भी है ॥ १ उपद्रवः-रोगारम्भदोषप्रकोपजन्योऽन्यविकारः।२ अरिष्टम्-नियत मरणख्यापकं लिंगम् । ३ निदानम्-रोगोत्पादको हेतुः । ४ लिङ्गम्-रोगख्यापको हेतुः तेन लिंग्यते ज्ञायते व्याधिरने- नेति व्युत्पत्त्या पूर्वरूपरूपोपशयसंप्राप्तयो विज्ञायन्ते । ५ रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौष- धम् । ततः कर्म भिषक्पश्चाज्ज्ञानपूर्वं समाचरेत् ॥ १ ॥ रोगज्ञानार्थमप्रवादौ यत्नः कार्यो भिषग्वरैः । सति तस्मिन्क्रियारम्भः पुण्याय यशसे श्रिये ॥ २ ॥