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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

भाषाटीकासमेत । ( २१३ ) करोत्यजस्रं रुधिरप्रवृत्तिमसाध्यमेतद्रुधिरात्मकं तु । रक्तक्षयोपद्रवपीडितत्वात्पाण्डुर्भवेत्सोऽर्बुदपीडितस्तु ॥ ४ ॥ दुष्ट भये दोष रुधिरको तथा नसोंको संकोच कर तथा पीडित कर मांसके गोलेको प्रगट करे वह यत्किंचित् पकनेवाला तथा कुछ स्रावयुक्त हो, मांसपिंडको ऊंचा करता हो और मांसांकुरसे व्याप्त और शीघ्र बढनेवाला होता है. उसमें रुधिर निर- न्तर बहा करें, यह रक्तार्बुद असाध्य है। वह रक्तार्बुदपीडितरोगी रक्तक्षयके उप- द्रवोंकरके पीडित होनेसे उसका वर्ण पीला हो जाय । ये रक्तार्बुदके लक्षण हैं ॥ मांसार्बुदकी संप्राप्ति । मुष्टिप्रहारादिभिरर्दितेऽङ्गे मांसं प्रदुष्टं जनयेद्धि शोथम् ॥ ५ ॥ अवेदनं स्निग्धमनन्यवर्णमपाकमश्मोपममप्रचाल्यम् । प्रदुष्टमांसस्य नरस्य गाढमेतद्भवेन्मांसपरायणस्य ॥ ६ ॥ मांसार्बुदं त्वेतदसाध्यमुक्तं- मुक्काआदिका लगनेसे अंगमें पीडा होय, उस पीडासे दुष्ट भया मांस सो सूजन उत्पन्न करे, उस सूजनमें पीडा नहीं होय और वह चिकनी देहके वर्ण होय पके नहीं, पत्थरके समान कठिन, हले नहीं ऐसा होय है । जिस मनुष्यका मांस बिगड जाय और नित्य मांसको खाया करे उसको यह अर्बुदरोग होता है । यह मांसार्बुद असाध्य कहा है । कोई मांसार्बुदका भेद रसोली कहते हैं ॥ साध्यमें असाध्य प्रकार । -साध्येष्वपीमानि तु वर्जयेच्च । संप्रस्रुतं मर्मणि यच्च जातं स्रोतःसु या यच्च भवेदचाल्यम् ॥ ७ ॥ साध्यमें भी यह इन लक्षणोंवाला अर्बुदरोग वर्जित है, स्राव ( झरे ) और मर्मस्थानमें प्रगट भया हो, अथवा नासा आदि स्रोत ( मार्ग ) में प्रगट हो और जो स्थित हो, वह असाध्य है ॥ अध्यर्बुदके लक्षण । यज्जायतेऽन्यत्खलु पूर्वजाते ज्ञेयं तदध्यर्बुदमर्बुदज्ञैः । पहले जिस ठिकानेपर अर्बुद भया होय उसी ठिकानेपर दूसरा अर्बुद प्रगट होय उसको अध्यर्बुद कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

(२२०) माधवनिदान ।

(२२०) माधवनिदान । द्विरर्बुदके लक्षण । यद्वन्द्वजातं युगपत्क्रमाद्वा द्विरर्बुदं तच्च भवेदसाध्यम् ॥ ८ ॥ एक कालमें दो अर्बुद, अथवा एकके पिछाडी दूसरा अर्बुद क्रमसे प्रगट होय उसको द्विरर्बुद कहते हैं, यह असाध्य हैं ॥ अर्बुद न पकनेका कारण । न पाकमायान्ति कफाधिकत्वान्मेदोबहुत्वाच्च विशेषतस्तु । दोषस्थिरत्वाद् ग्रथनाच्च तेषां सर्वार्बुदान्येव निसर्गतस्तु ॥ ९ ॥ कफ अधिक होनेसे अथवा विशेषकरके मेद अधिक होनेसे, तथा दोषोंके स्थिर होनेसे अथवा दोषोंके ग्रन्थिरूप होनेसे सर्व प्रकारकी अर्बुद स्वभावसे ही पके नहीं हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकाया- मर्बुदनिदानं समाप्तम् ॥ अथ श्लीपदनिदानम् । श्लीपदकी सम्प्राप्ति । यः सज्ज्वरो वंक्षणजो भृशार्तिः शोथो नृणां पाद्गतः क्रमेण । तच्छ्लीपदं स्यात्करकर्णनेत्रशिश्रौष्ठनासास्वपि केचिदाहुः ॥ १ ॥ जो सूजन अत्यन्त पीडायुक्त प्रथम वंक्षणमें उत्पन्न होकर धीरे धीरे पैरोंमें आवै उसके साथ ज्वर भी हो सो इस रोगको श्लीपद कहते हैं। यह श्लीपद हाथ, कान, नेत्र, शिश्न, ओठ, नाक इनमें भी होती है, ऐसे कोई कहते हैं ॥ वातजश्लीपद । वातजं कृष्णरूक्षं च स्फुटितं तीव्रवेदनम् । अनिमित्तरुजं तस्य बहुशो ज्वर एव च ॥ २ ॥ वातकी श्लीपद काली, रूखी, फटी और जिसमें तीव्र पीडा होय, बिना कारणके दूखे और उसमें ज्वर बहुत होय ॥

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भाषाटीकासमेत । (२२१) पित्तजश्लीपद । पित्तजं पीतसंकाशं दाहज्वरयुतं मृदु । पित्तकी श्लीपद पीले रंगकी, दाह और ज्वरयुक्त होय तथा नरम होय है ॥ श्लैष्मिकश्लीपद । श्लैष्मिकं स्निग्धवर्णं च श्वेतं पाण्डु गुरु स्थिरम् ॥ ३ ॥ कफकी श्लीपदका वर्ण चिकना, सफेद, पीला, भारी और कठिन होय है ॥ असाध्य लक्षण । वल्मीकमिव सञ्जातं कण्टकैरुपचीयते । अब्दात्मकं महत्तच्च वर्जनीयं विशेषतः ॥ ४ ॥ सर्पकी बांबीके समान बढी हुई और जिसके ऊपर कांटे होयँ, ऐसी एक वर्षकी होगई हो और बडी होय उसको वैद्य त्याग दे ॥ श्लीपदमें कफको प्राधान्य अव्यभिचारकरके है उसको कहते हैं- त्रीण्यप्येतानि जानीयाच्छ्लीपदानि कफोच्छ्रयात् । गुरुत्वं च महत्त्वं च यस्मान्नास्ति विना कफात् ॥ ५ ॥ इन पूर्वोक्त तीनों श्लीपदोंमें कफकी अधिकता है कारण इसका यह है कि, भारी और महत्त्व ये दोनों कफके बिना नहीं होते ॥ श्लीपद कौनसे देशमें उत्पन्न होता है उसको कहते हैं- पुराणोदकभूयिष्ठाः सर्वर्तुषु च शीतलाः । ये देशास्तेषु जायन्ते श्लीपदानि विशेषतः ॥ ६ ॥ वर्षार्ऋतुमें पानी अधिक वर्षे परन्तु पृथ्वीके नीचे होनेसे सूखे नहीं इसीसे पुराने पानीका संचय ( इकट्ठा ) होय और सर्व ऋतुमें सरदी रहाकरे ऐसे जो अनूपदेश ( पूर्व आदि देश ) उनमें यह श्लीपदरोग विशेषकरके होय है । जांगल देशोंमें अग्निका अधिक अंश होय है इससे उन देशोंमें जलको पुरातनत्व नहीं होय है और अनूपदेशमें गरमी मन्द पडनेसे उष्ण ऋतुमें भी शीतलता होय है, हाथ कान आदिमें श्लीपदरोगकी शंका होनेसे दोषोंके कोपद्वारा ज्वर करके श्लीपदको जान ले ॥ असाध्य लक्षण । यच्छ्लेष्मलाहारविहारजातं पुंसः प्रकृत्या च कफात्मकस्य । सास्रावमत्युन्नतसर्वलिङ्गं सकण्डुरं श्लेष्मयुतं विवर्ज्यम् ॥ ७ ॥

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( २२२ ) माधवनिदान ।

( २२२ ) माधवनिदान । जो श्लीपद कफकारक आहार विहारसे प्रगट भया तथा कफप्रकृतिवाले पुरुषके कफसे प्रगट भया होय, तथा स्रावयुक्त तथा जिस दोषसे प्रगट भया होय उस दोषके लक्षण उसमें बढ़ गये होयँ, जिसमें खुजली बहुत होय और कफयुक्त होय सो श्लीपदरोगी वैद्यकरके त्याज्य है ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरानिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां श्लीपदनिदानं समाप्तम् ॥ अथ विद्रधिनिदानम् । त्वग्रक्तमांसमेदांसि प्रदुष्यास्थिसमाश्रिताः । दोषाः शोथं शनैर्घोरं जनयन्त्युच्छ्रिता भृशम् ॥ १ ॥ महाशूलं रुजावन्तं वृत्तं वाप्यथवायतम् । स विद्रधिरिति ख्यातो विज्ञेयः षड्विधश्च सः ॥ २ ॥ पृथग्दोषैः समस्तैश्च क्षतेनाप्यसृजा तथा । षण्णामपि हि तेषां तु लक्षणं संप्रचक्षते ॥ ३ ॥ अत्यन्त बढ़े तथा अस्थि ( हड्डी ) का आश्रय करके रहनेवाले वातादिदोष त्वचा, रुधिर, मांस और मेद इनको दुष्ट कर धीरे धीरे भयंकर शोथ उत्पन्न करे, उसकी जड हड्डीपर्यन्त पहुँच जाय, उत्पत्तिकालमें अत्यंत पीडाकारक तथा गोल अथवा लंबा जो शोथ ( सूजन ) होय उसको विद्रधि कहते हैं पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १, क्षत ( घाव ) से १ और रुधिरसे १ मिलकर छः प्रकारकी विद्रधि होय हैं, उन छःहों विद्रधिके लक्षण कहते हैं ॥ वातजविद्रधिके लक्षण । कृष्णोऽरुणो वा विषमो भृशमत्यर्थवेदनः । चित्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिर्वातसंभवः ॥ ४ ॥ जो विद्रधि काली लाल विषम कहिये कदाचित् छोटी कदाचित् मोटी हो अत्यन्त वेदनायुक्त और उसका प्रगट होना तथा पाक ये नाना प्रकारके होयँ उसको वातविद्रधि कहते हैं ॥ पित्तकी विद्रधिके लक्षण । पक्वोदुम्बरसंकाशः श्यावो वा ज्वरदाहवान् । क्षिप्रोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिः पित्तसंभवः ॥ ५ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (२२३) पित्तकी विद्रधि पके गूलरके समान होय, अथवा काला वर्ण होय, ज्वर, दाह- करनेवाली प्रगट होय और उसका पाक शीघ्र होय ॥ कफकी विद्रधिके लक्षण । शरावसदृशः पाण्डुः शीतः स्निग्धोऽल्पवेदनः । चिरोत्थानप्रपाकश्च विद्रधिः कफसंभवः ॥ ६ ॥ कफकी विद्रधि शराव (मिट्टीके शराव) सदृश बडी होय, पीला वर्ण, शीतल, चिकनी, अल्पपीडा होय, उसकी उत्पत्ति और पाक देरमें होय है ॥ पकनेके अनन्तर उनका स्राव । तनुपीतसिताश्चैषामास्रावाः क्रमशः स्मृताः । ये तीन प्रकार विद्रधि पकनेके अनन्तर होते हैं। इनसे वातादिकोंके क्रमसे अर्थात् वातसे पतली, पित्तसे पीली, कफसे सफेद राध निकलती है ॥ सन्निपातकी विद्रधिका लक्षण । नानावर्णरुजा स्रावो घाटालो विषमो महान् । विषमं पच्यते चापि विद्रधिः सान्निपातिकः ॥ ७ ॥ सन्निपातकी विद्रधिमें अनेक प्रकारका वर्ण काला पीला आदि अनेक प्रकारका पीडा, जैसे तोद, दाह, खुजली, पीडा तथा अनेक प्रकारकी स्राव जैसे पतला पीला सफेद स्राव होय 'घाताल' कहिये नीचे स्थूल होय और ऊपर पतली होय अर्थात् अग्रभाग अति ऊंचा होय, छोटी बडी कदाचित् पके कदाचित् नहीं पके ऐसी होय॥ आगन्तुजविद्रधिकी सम्प्राप्ति । तैस्तैर्भावैरभिहते क्षते वाऽपथ्यकारिणः । क्षतोष्मावायुविसृतः सरक्तं पित्तमीरयेत् ॥ ८ ॥ ज्वरस्तृष्णा च दाहश्च जायते तस्य देहिनः । आगन्तुर्विद्रधिर्ज्ञेयः पित्तविद्रधिलक्षणः ॥ ९ ॥ तिन तिन भाव कहिये लकडी पत्थर ढेला आदिका अभिघात (चोट लगना पिच जाना इत्यादि) होनेसे, अथवा तलवार, तीर बरछी इत्यादिके लगनेसे, घाव होजानेसे, अपथ्य करनेवाले पुरुषके कुपित वायुकरके विस्तृत (फैला) क्षतोष्मा (घावकी गरमी) और रुधिरसहित पित्तको कोप करे, उस पुरुषके ज्वर, प्यास और दाह होयँ और उसमें पित्तकी विद्रधिके लक्षण मिलते हों इनको आगं- तुज विद्रधि जाननी ॥

( २२४) माधवनिदान ।

( २२४) माधवनिदान । रक्तजविद्रधिके लक्षण । कृष्णस्फोटावृतः श्यावस्तीव्रदाहरुजाकरः । पित्तविद्रधिलिङ्गस्तु रक्तविद्रधिरुच्यते ॥ १० ॥ काले फोडोंसे व्याप्त, श्यामवर्ण, पीडा और ज्वर ये उसमें तीव्र होयँ तथा पित्तकी विद्रधिके लक्षणों करके युक्त होंय, उसको रक्तविद्रधि जानना ॥ अन्तर्विद्रधिके लक्षण । पृथक् संभूय वा दोषाः कुपिता गुल्मरूपिणम् । वल्मीकवत्समुन्नद्धमंतः कुर्वन्ति विद्रधिम् ॥ ११ ॥ कुपित भये पृथक् २ अथवा मिलेहुये दोष शरीरमें गोलेके और बांबीके समान बडी विद्रधि उत्पन्न करे हैं ॥ विद्रधिके स्थान । गुदे बस्तिमुखे नाभ्यां कुक्षौ वंक्षणयोस्तथा । वृक्कयोः प्लीह्नि यकृति हृदये क्लोम्नि चाप्यथ ॥ १२ ॥ एषामुक्तानि लिङ्गानि बाह्यविद्रधिलक्षणैः । गुदे वातनिरोधस्तु बस्तौ कृच्छ्राल्पमूत्रता ॥ १३ ॥ नाभ्यां हिक्का तथाऽऽटोपः कुक्षौ मारुतकोपनम् । कटिपृष्ठग्रहस्तीव्रो वंक्षणोत्थे च विद्रधौ ॥ १४ ॥ वृक्कयोः पार्श्वसंकोचः प्लीह्रयुच्छ्वासावरोधनम् । सर्वाङ्गप्रग्रहस्तीव्रो हृदि कम्पश्च जायते । श्वासो यकृति हिक्का च क्लोम्नि पेपीयते पयः॥ १५ ॥ गुद, बस्ति, मुख, नाभि, कूख, वंक्षण, वृक्क, (कूख पिंडी प्लीह) यकृत् (कलेजा), हृदय, क्लोम (प्यासका स्थान ) इन ठिकानोंपर विद्रधि होती है, इनके लक्षण बाह्यविद्रधिके समान जानने । गुदामें विद्रधि होनेसे अधोवायुका रोध होय । वस्तिमें- अर्थात् मूत्राशयमें होनेसे कठिनतासे थोडा २ मूते, नाभिमें होनेसे हिचकी तथा गुडगुड शब्द होता है । कूखमें-होनेसे पवनका कोप होय । वंक्षणमें-होनेसे कमर और पीठका बलपूर्वक जकड जाना होय । कूखके पिंडमें होनेसे पसवाडोंका संकोच होय । प्लीहामें होनेसे श्वास रुकजाय । हृदयमें-होनेसे सब अंग जकडजाय और कम्प होय । कलेजेमें होनेसे श्वास और हिचकी होय । क्लोममें-अर्थात् पिपासा- स्थानमें विद्रधि होनेसे बारंबार पानी पीनेकी इच्छा होय है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (२२५) स्रावनिर्गम । नाभेरुपरिजाः पक्वा यान्त्यूर्ध्वमितरे त्वधः । अधः स्रुतेषु जीवेत्तु स्रुतेषूर्ध्वं न जीवति ॥ १६ ॥ नाभिके ऊपर जो विद्रधि होय उनके पकनेसे जो स्राव कहिये राध आदिका बहना होय वह मुखके रास्ते होय है और नाभिके नीचे होनेसे जो स्राव होय वह गुदाके मार्गसे होय है और नाभिके समीप होनेवाली विद्रधियोंका स्राव दोनों मार्गोंसे होय । जिनका स्राव नीचेके मार्ग हो वह रोगी जीवे और ऊपरके मार्ग जिसका स्राव होय वह रोगी बचे नहीं ॥ विद्रधिमें साध्यासाध्य । हृन्नाभिवस्तिवर्ज्या ये तेषु भिन्नेषु बाह्यतः । जीवेत्कदाचित्पुरुषो नेतरेषु कथंचन ॥ १७ ॥ साध्या विद्रधयः पञ्च विवर्ज्यः सान्निपातिकः । आमपक्वविदग्धत्वं तेषां शोथवदादिशेत् ॥ १८ ॥ हृदय, नाभि और वस्ति इन ठिकानोंको छोडकर प्रगट जो विद्रधि अर्थात् प्लीहा क्लोम इत्यादि ठिकाने बाहर फूटनेसे कदाचित् पुरुष बचजाय और ठिका- नेपर फूटनेसे नहीं बचे । पहली पांच विद्रधि साध्य हैं, सन्निपातकी विद्रधि असाध्य है, इन विद्रधियोंको आम, पक्व और विदग्ध ये तीन अवस्था शोथरोगके समान जाननी चाहिये ॥ असाध्य लक्षण । आध्मातं बद्धनिष्यन्दं छर्दिहिक्कातृषान्वितम् । रुजाश्वाससमायुक्तं विद्रधिर्नाशयेन्नरम् ॥ १९॥ अफरायुक्त, मूत्र रुकगया होय, हिचकी, वमन और प्यास इनसे पीडित शूल, श्वास इन करके युक्त ऐसे मनुष्यके विद्रधिरोग असाध्य होय है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां विद्रधिनिदानं समाप्तम् ॥ ९

( २२६ ) माधवनिदान ।

( २२६ ) माधवनिदान । अथ व्रणनिदानम् । एकदेशोत्थितः शोथो व्रणानां पूर्वरक्षणम् । षड्विधः स्यात्पृथक् सर्वैरक्तागन्तुनिमित्तजः ॥ १ ॥ शोथाः षडेते विज्ञेयाः प्रागुक्तैः शोथलक्षणैः । विशेषः कथ्यते तेषां पक्वापक्वविनिश्चये ॥ २ ॥ एक ठिकानेपर सूजन उत्पन्न होनेसे जाने कि, इसके व्रण ( फोडा ) होगा सो व्रणरोग पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १, रुधिरसे १ और आगंतुज १ ऐसे मिल- कर छः प्रकारका है, इन छहों व्रणोंमें जो प्रथम सूजन होय उसके लक्षण शोथरोग- लक्षणके समान जानने । इनमें पक्व ( पकने ) अपक्व ( न पकने ) के विषयमें जो विशेषता है उसको इस जगह कहते हैं ॥ वातादिभेदसे व्रणके पाक । विषमं पच्यते वातात्पित्तोत्थश्चाचिराच्चिरम् । कफजः पित्तवच्छोफो रक्तागंतुसमुद्भवः ॥ ३ ॥ बादीसे विषम पाक होय अर्थात् कहीं पके, कहीं नहीं पके, पित्तसे बहुत जल्दी पके, कफका फोडा देरमें पके और रुधिरका तथा आगन्तुज फोडेका पकना पित्तके समान अर्थात् जल्दी पके है ॥ कच्चे फोडेका लक्षण । मन्दोष्मताऽल्पशोथत्वं काठिन्यं त्वक्सवर्णता । मन्दवेदनता चैव शोथानामामलक्षणम् ॥ ४ ॥ सूजन हाथके छूनेसे थोडी गरम लगे, थोडी सूजन होय, फोडेका स्थान करडा होय तथा देहके रंग समान उसका रंग होय और उसमें पीडा मन्द होय ये कच्ची सूजनके लक्षण हैं ॥ पच्यमानव्रणके लक्षण । दह्यते दहनेनेव क्षारेणेव च पच्यते । पिपीलिकागणेनेव दश्यते छिद्यते तथा ॥ ५ ॥ भिद्यते चैव शस्त्रेण दंडेनेव च ताड्यते । पीड्यते पाणिनेवान्तः सूचीभिरिव तुद्यते ॥ ६ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

आसने शयने स्थाने शांतिं वृश्चिकविद्धवत् ॥ ७ ॥

भाषाटीकासमेत । ( २२७ ) शोषश्चोषो विवर्णः स्यादंगुल्येवावपाट्यते । आसने शयने स्थाने शांतिं वृश्चिकविद्धवत् ॥ ७ ॥ न गच्छेदाततः शोथो भवेदाध्मातवस्तिवत् । ज्वरस्तृष्णाऽरुचिश्चैव पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ ८ ॥ जिस समय व्रण पकनेको होय उस समय ये लक्षण होते हैं-फोडेके स्थानमें अग्निसे जलेहुएके समान जलन होय, खार लगानेकासा चिनमिनावे, चेंटी काटनेकीसी पीडा होय, वह दो टूक करनेके समान तथा शस्त्रसे फाडनेके समान, दण्ड आदिके मारनेके समान तथा हाथसे मीडनेके समान तथा भीतर सूईसे छेदनेके समान पीडा और उसमें अत्यन्त दाह होय, अग्निसे सेकनेके समान उसमें वेदना होय, उस फोडेका रंग बदल जाय, उंगलीके लगानेसे उखारनेकीसी पीडा होय, बैठनेमें सोनेमें खडे रहनेमें वीछू काटनेकीसी घोर पीडा होय, वो पीडा कभी शांत नहीं होय, वो सूजन फूली हुई बस्ती ( मूत्रस्थान ) के सदृश तनीसी होय, उसमें ज्वर, प्यास, अरुचि ये लक्षण होते हैं ॥ पक्वव्रणके लक्षण । वेदनोपशमः शोथो लोहितोऽल्पो न चोन्नतः । प्रादुर्भावो वलीनां च तोदः कण्डूर्मुहुर्मुहुः ॥ ९ ॥ उपद्रवाणां प्रशमो निम्नता स्फुटनं त्वचाम् । बस्ताविवाम्बुसंचारः स्याच्छोथेऽङ्गुलिपीडिते ॥ १० ॥ पूयस्य पीडयत्येकमन्तमन्ते च पीडिते । भक्ताकांक्षा भवेच्चैव शोथानां पक्वलक्षणम् ॥ ११ ॥ व्रण पकनेसे पीडा शांत हो जाय, उसकी सूजन तांबेके रंगकी होय और थोडी होय, ऊंची न होय, उसमें गुलझट पडे, सुई चुभानेकीसी पीडा होय, बारंबार खुजली चले, पित्तके कोपसे दाहादि उपद्रवोंकी शांति हो, स्वभावसे ही व्रणकी जगह गढेला होजाय, त्वचायें फटजाँय, सूजन, अंगुलिसे दबानेसे जैसे बस्तिमें पानी इधर उधर होय उसी प्रकार शोथमें राध इधर उधर होय, व्रणके अन्त अवयवके दबाने- पर राध एक देशको पीडित करती है अर्थात राध एक जगहसे निकलने लगती है, अन्नमें इच्छा हो ये पक्वव्रणके लक्षण हैं ॥

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( २२८ ) माधवनिदान ।

( २२८ ) माधवनिदान । एक दोषसे सूजन उत्पन्न होय उसमें पकनेके समय तीनोंका सम्बन्ध होय है । नर्त्तेऽनिलाद्रुङ्न बिना न पित्तं पाकः कफं वापि बिना न पूयः । तस्माद्धि सर्वे परिपाककाले पचन्ति शोथास्त्रिभिरेव दोषैः ॥ १२ ॥ बादीके बिना पीडा नहीं होय, पित्तके विना पाक नहीं होय और कफके विना राध नहीं होय अर्थात् पकनेके समय तीनों दोषोंके मिलनेसे सब प्रकारकी सूजन पकती है । रक्तपाकलक्षण ग्रन्थांतरोंमें कहे हैं, यथा—“ कफजेषु च शोथेषु गम्भीरं पाकमेत्यसृक् । पक्वं स्निग्धं ततः स्पष्टं यत्र स्यात्क्लिन्नशोफता ॥ त्वक्सावर्ण्य रुजोऽल्पत्वं घनस्पर्शित्वमश्मवत् । रक्तपाकमिति ब्रूयात्तं प्राज्ञो मुक्तसंशयः ॥” राध न निकालनेसे जो परिणाम होय है उसको दृष्टांत देकर कहते हैं- कक्षं समासाद्य यथैव वह्निर्वाय्वीरितः संदहति प्रसह्य । तथैव पूयोऽप्यविनिःसृतो हि मांसं शिराः स्नायु च खादतीह ॥१३॥ फूँसके गंजमें लगीहुई आग पवनकी सहायता पाकर जैसे वह फूँसको जलाकर खाक करदे उसी प्रकार व्रणमें राध न निकालनेसे वह राध मांस, शिरा और स्नायु इनको खाय लेती है ॥ आमादि लक्षणज्ञानसे वैद्यके गुणदोष दिखाते हैं— आमं विदह्यमानं च सम्यक् पक्वं च यो भिषक् । जानीयात्स भवेद्वैद्यः शेषास्तस्करवृत्तयः ॥ १४ ॥ आम ( कच्चा ) पच्यमान और जो अच्छी रीतिसे पकगया हो ऐसे व्रणके लक्षण जो वैद्य जाने है, उसीको वैद्य जानना चाहिये, बाकी सब चोर हैं ॥ अपक्वका छेदन और पकेकी उपेक्षा करनेमें दोष । यश्छिनत्त्याममज्ञानाद्यश्च पक्वमुपेक्षते । श्वपचाविव मन्तव्यौ तावनिश्चितकारिणौ ॥ १५ ॥ जो अज्ञानसे कच्चे फोडेको पका समझकर फोडे और जो पके फोडेको कच्चा समझकर चीरे नहीं ये दोनों अविचारवान् वैद्य चांडालके समान जानने ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्धदीपिकामाथुरी- भाषाटीकायां व्रणशोथनिदानं समाप्तम् ॥

अथ शारीरव्रणनिदानम् ।

भाषाटीकासमेत । (२२९) अथ शारीरव्रणनिदानम् । द्विधा व्रणः स विज्ञेयः शारीरागन्तुभेदतः । दोषैराद्यस्तयोरन्यः शस्त्रादिक्षतसंभवः ॥ १ ॥ शारीर और आगन्तुक इन भेदोंसे वह व्रण दो प्रकारका है, पहिला शारीर दोषोंके कोपसे होय है और दूसरा शस्त्रादि करके घावके होनेसे होता है ॥ वातिकव्रण । स्तब्धः कठिनसंस्पर्शो मन्दस्रावो महारुजः । तुद्यते स्फुरति श्यावो व्रणो मारुतसंभवः ॥ २ ॥ बादीसे प्रगट व्रणमें जकडना तथा हाथके छूनेसे कठिन मालूम होय, उसमेंसे थोडा स्राव होय तथा पीडा बहुत होय सुईके चुभनेकीसी पीडा होय तथा फडकना होय और उसका रंग नीला होय ॥ पित्तव्रणके लक्षण । तृष्णामोहज्वरक्लेददाहदुष्ट्यवदारणैः । व्रणं पित्तकृतं विद्याद्गन्धैः स्रावैश्च पूतिकैः ॥ ३ ॥ प्यास, मोह, ज्वर, क्लेद, दाह, सडना चिदासा होय, बास आवै, दुर्गन्धयुक्त स्राव होय, ये पित्तव्रणके लक्षण हैं ॥ कफव्रणके लक्षण । बहुपिच्छो गुरुः स्निग्धः स्तिमितो मन्दवेदनः । पाण्डुवर्णोऽल्पसंक्लेदी चिरपाकी कफोद्भवः ॥ ४ ॥ कफका स्राव अत्यन्त गाढा, भारी, चिकना, निश्चल, मन्द पीडा, पीला रंग, थोडा स्रवनेवाला और बहुत कालमें पके ॥ रक्तजद्वन्द्वजव्रण । रक्तो रक्तस्रुती रक्ताद्वित्रिजः स्यात्तदन्वयैः ॥ ५ ॥ जो रक्तके कोपसे व्रण होय वह रक्तवर्ण, उसमेंसे रुधिर स्रवे । एक दोष और रुधिरके सम्बन्धसे जो होय वह द्वन्द्व और दो दोष अथवा तीन दोष तथा रुधिर १ “ व्रण गात्रविचूर्णने ” इत्यस्माद्धातोर्व्रणस्य साधुत्वम् । व्रणनिरुक्तिश्च सुश्रुते-“व्रणोति यस्माद्रूढेऽपि व्रणवस्तु न नश्यति । आदेहधारणाज्जन्तोर्व्रणस्तस्मान्निरुच्यते ॥ ” इति ॥

( २३० ) माधवनिदान ।

( २३० ) माधवनिदान । इनके मिलनेसे सन्निपातका व्रण जानना इस प्रकार तीनों दोषोंमें रुधिरके सम्ब- न्धकी कल्पना करनी चाहिये ॥ सुखव्रणके लक्षण । त्वङ्मांसजः सुखे देशे तरुणस्यानुपद्रवः । धीमतोऽभिनवः काले सुखसाध्यः सुखव्रणः ॥ ६ ॥ जो व्रण त्वचा और मांस तथा मर्मरहित स्थानमें उपद्रवरहित होय और जो तरुण तथा हिताहित जाननेवाला पुरुषके हेमन्त शिशिरकालमें नवीन प्रगट होय उसको सुखव्रण कहते हैं, वह सुखसाध्य है ॥ कृच्छ्रसाध्य और असाध्य लक्षण । गुणैरन्यतमैर्हीनस्ततः कृच्छ्रो व्रणः स्मृतः । सर्वैर्विहीनो विज्ञेयः सोऽसाध्यो निरुपक्रमः ॥ ७ ॥ जो पूर्व श्लोकमें लक्षण कह आये उनमेंसे कुछ लक्षण थोडे होनेसे व्रण कृच्छ्र- साध्य होय है और सब गुणरहित होय, बहुत उपद्रवयुक्त होय, वह असाध्य है । उसकी चिकित्सा न करनी चाहिये ॥ दुष्टव्रणके लक्षण । पूतिपूयातिदुष्टासृक्स्राव्युत्सङ्गी चिरस्थितिः । दुष्टो व्रणोऽतिगन्धादिः शुद्धलिङ्गविपर्ययः ॥ ८ ॥ जिसमेंसे दुर्गन्धयुक्त राध और अत्यन्त सडा भया रुधिर बहे, जो ऊपरसे उठा हुआ हो, बहुत दिन रहनेवाला हो, अत्यन्त दुर्गन्ध दुर्वर्ण स्राव पीडायुक्त होय उसको दुष्टव्रण कहते हैं । वह वक्ष्यमाण शुद्धलिंगसे विपरीत होता है ॥ शुद्धव्रणके लक्षण । जिह्वातलाभोऽतिमृदुः श्लक्ष्णः स्निग्धोऽल्पवेदनः । सुव्यवस्थो निरास्रावः शुद्धो व्रण इति स्मृतः ॥ ९ ॥ जो व्रण जीभके नीचे भागके समान अत्यन्त नरम होय, स्वच्छ, चिकना, थोडी पीडायुक्त, भले प्रकारका कहिये ऊंचा आदि जो दुष्ट व्रणादिकमें लक्षण कहे हैं वे न होय, दोषकृत रक्तादिस्रावरहित होय उसको शुद्धव्रण जानना ॥ भरनेवाले व्रणके लक्षण । कपोतवर्णप्रतिमो यस्यान्तः क्लेदवर्जितः । स्थिराश्च पिडिकावन्तो रोहतीति तमादिशेत् ॥ १० ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २३१ ) जिसका घाव कबूतरके रंगसदृश होय और जिसमें क्लेद न बहता होय और घाव स्थिर हो, जिसमें फुन्सीसी मालूम हों उसको वैद्य जाने कि, यह व्रण ( घाव ) स्थिर भरनेवाला है ॥ जो व्रण भरगया हो उसके लक्षण । रूढवर्त्मानमग्रंथिमशूनमरुजं व्रणम् । त्वक्सवर्णं समतलं सम्यग्रूढं तमादिशेत् ॥ ११ ॥ जिसका मार्ग भरगया होय, गांठ रहित होय, सूजन और पीडा जिसमें नहीं होय, त्वचाके समान वर्ण होगया हो, घावका गढेला भरकर बराबर हो गया हो वह व्रण उत्तम भरा जानना ॥ व्याधिविशेषकरके व्रण कृच्छ्रसाध्य होता है सो कहते हैं- कुष्ठिनां विषजुष्टानां शोषिणां मधुमेहिनाम् । व्रणाः कृच्छ्रेण सिध्यन्ति येषां चापि व्रणे व्रणाः ॥ १२ ॥ कोढी पुरुष, विषवाला पुरुष, क्षयीरोगवाला, मधुमेही पुरुष ऐसोंका व्रण बड़े कष्टसे साध्य होता है और जिसके पहले व्रणमें व्रण प्रगट होय, उसके ये व्रण कष्टसाध्य होते हैं ॥ साध्यासाध्य लक्षण । वसां मेदोऽथ मज्जानं मस्तुलुङ्गं च यः स्रवेत् । आगन्तुजो व्रणः सिध्येन्न सिध्येद्दोषसंभवः ॥ १३ ॥ जिस व्रणमेंसे चर्बी, मेद, मज्जा और बस्तिस्नेह ये बहें वह व्रण आगन्तुज होय तो साध्य है और दोषकृत होय तो साध्य नहीं होय ॥ असाध्यव्रणके लक्षण । मद्यागुर्वाज्यसुमनःपद्मचन्दनचम्पकैः । सुगन्धा दिव्यगन्धाश्च मुमूर्षूणां व्रणाः स्मृताः ॥ १४ ॥ मद्य, अगर, घृत, फूल, कमल, चन्दन और चम्पाके फूलके समान अथवा चमत्कारी पारिजात आदि फूलकीसी गन्ध जिस व्रणमेंसे आवे यह व्रण मरनेवाले रोगीके जानना ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । ये च मर्मस्वसंभूता भवन्त्यत्यर्थवेदनाः । दह्यन्ते चान्तरत्यर्थं बहिःशीताश्च ये व्रणाः ॥ १५ ॥ दह्यन्ते बहिरत्यर्थं भवन्त्यंतश्च शीतलाः ।

( २३२ ) माधवनिदान ।

( २३२ ) माधवनिदान । प्राणमांसक्षयश्वासकासारोचकपीडिताः ॥ १६ ॥ प्रवृद्धपूयरुधिरा व्रणा येषां च मर्मसु । क्रियाभिः सम्यगारब्धा न सिध्यन्ति च ये व्रणाः । वर्जयेदेव तान्वैद्यः संरक्षन्नात्मनो यशः ॥ १७ ॥ जो व्रण मर्मस्थानमें प्रगट हुए हों और उनमेंसे अत्यन्त पीडा होय वे तथा जिस व्रणके भीतर दाह होय और बाहर शीतल होय वे अथवा बाहर दाह होय और भीतर शीतलता होय वे तथा जिनमें बल मांस इनका क्षय होय, श्वास, खांसी, अरुचि इनसे अत्यन्त पीडित होय ऐसे अथवा जो व्रण मर्मस्थानमें प्रगट भये हों उनमेंसे राध, रुधिर बहुत बहे वे अथवा जिन व्रणोंकी अच्छी चिकित्सा करनेसे भी अच्छे न होयं ऐसे व्रणोंको अपने यशकी रक्षा करनेवाला वैद्य त्याग दे ॥ व्रणरोगमें अपथ्य । व्रणे श्वयथुरायासात्स च रागश्च जागरात् । तौ च रुक् च दिवास्वापात्तांश्च मृत्युश्च मैथुनात् ॥ १८ ॥ परिश्रम करनेसे व्रणमें सूजन होती है और जागनेसे ललोही होती है और दिनमें सोनेसे सूजनपर लाली आकर पीडा होती है और मैथुन करनेसे सूजन लाली पीडा मृत्यु होय ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकायां माधुरीभाषाटीकायां शारीरव्रणनिदानं समाप्तम् ॥

अथागन्तुजव्रणनिदानम् । नानाधारामुखैः शस्त्रैर्नानास्थाननिपातितैः । भवंति नानाकृतयो व्रणास्तांस्तान्निबोध मे ॥ १ ॥ अनेक प्रकारकी धारवाले तथा मुखवाले शस्त्र अनेक ठिकानेपर लगानेसे अनेक प्रकारकी आकृति (स्वरूप) के व्रण होते हैं उनको कहता हूं ॥ व्रणकी संख्या और सम्प्राप्ति । छिन्नं भिन्नं तथा विद्धं क्षतं पिच्चितमेव च । घृष्टमाहुस्तथा षष्ठं तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २ ॥ छिन्न, भिन्न, विद्ध, क्षत, पिच्चित और छठा घृष्ट ऐसे आगन्तुज व्रण छः प्रकारके होते हैं उनके लक्षण कहता हूं ॥

भाषाटीकासमेत । ( २३३ ) छिन्नके लक्षण । तिर्यक्छिन्न ऋजुर्वापि यो व्रणस्त्वायतो भवेत् । गात्रस्य पातनं तद्धि छिन्नमित्यभिधीयते ॥ ३ ॥ जो व्रण तिरछा छिद्रयुक्त, सरल ( सीधा ) अथवा लम्बा होय शरीरके अवयवके एकदेशको गिरानेवाला होय उसको छिन्न व्रण कहते हैं ॥ भिन्नके लक्षण । शक्तिकुंतेषुखड्गाग्रविषाणैराशयो हतः । यत्किंचित्स्रवते तद्धि भिन्नलक्षणमुच्यते ॥ ४ ॥ बर्छी, भाला, बाण, तरवारके अग्रभाग, विषाण ( दांत सींग ) इनसे आशय (धात्वाशय और मलाशय ) को वेधकर थोडासा स्राव होय अर्थात् रुधिर मूत्रादि आशयोंमेसे जो आशय भिन्न हुआ हो उससे उसका स्राव हो, जैसे बस्तिके भिन्न होनेपर मूत्र निकले उसको भिन्न कहते हैं ॥ कोष्ठके लक्षण । स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च । हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥ ५ ॥ आमाशय, अग्न्याशय, पक्वाशय, रक्ताशय ( यकृत् प्लीहा ) हृदय, मलाशय और फुप्फुस इन स्थानोंकी कोष्ठसंज्ञा है ॥ कोष्ठके भेदोंके लक्षण । तस्मिन्भिन्ने रक्तपूर्णे ज्वरो दाहश्च जायते । मूत्रमार्गगुदास्येभ्यो रक्तं घ्राणाच्च गच्छति ॥ ६ ॥ मूर्च्छा श्वासतृषाध्मानमभक्तच्छन्द एव च । विण्मूत्रवातसङ्गश्च स्वेदास्रावोऽक्षिरक्तता ॥ ७ ॥ लोहगंधित्वमास्यस्य गात्रदौर्गन्ध्यमेव च । हृच्छूलं पार्श्वयोश्चापि विशेषं चात्र मे शृणु ॥ ८ ॥ वह कोष्ठ भिन्न होकर रुधिरसे भरजावे तब ज्वर दाह होय है, मूत्रमार्ग, गुदा, मुख और नाक इनमेंसे रुधिर बहै, मूर्च्छा, श्वास, प्यास पेटका फूलना, अन्नमें अरुचि, मल, मूत्र, अधोवायु इनका अवरोध, पसीना बहुत आवे, नेत्रोंमें लाली, मुखमें CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( २३४ ) माधवनिदान ।

( २३४ ) माधवनिदान । लोहेकीसी वास आवे, अंगोंमें दुर्गंध, हृदय और पसवाडोंमें शूल ये लक्षण होते हैं। इनसे जो विशेष लक्षण हैं उनको मुझसे सुन ॥ आमाशयस्थित रक्तके लक्षण । आमाशयस्थे रुधिरे रुधिरं छर्दयत्यपि । आध्मानमतिमात्रं च शूलं च भृशदारुणम् ॥ ९ ॥ आमाशयमें रुधिरका संचय होनेसे रुधिरकी वमन, पेट बहुत फूले और अत्यन्त भयंकर शूल होय ॥ पक्वाशयस्थके लक्षण । पक्वाशयगते चापि रुजा गौरवमेव च । अधःकाये विशेषेण शीतता च भवेदिह ॥ १० ॥ पक्वाशयमें रुधिरका सञ्चय होनेसे शूल, देहमें भारीपना और कमरसे लेकर नीचेके भागमें शीतलता होय है ॥ विद्धव्रणके लक्षण । सूक्ष्मास्यशल्याभिहतं यदङ्गं त्वाशयं विना । उत्तुंडितं निर्गतं वा तद्विद्धमिति निर्दिशेत् ॥ ११ ॥ बारीक अग्रभागवाले सुई आदि शल्यसे आमादि आशय विना जो अंग है उनमें वेध होनेसे 'तुंडित' कहिये उनमेंसे वह शल्य न निकला होय, 'निर्गत' कहिये शल्य निकल गया हो उसको विद्धव्रण कहते हैं ॥ क्षतके लक्षण । नातिच्छिन्नं नातिभिन्नमुभयोर्लक्षणान्वितम् । विषमं व्रणमंगेषु तत्क्षतं त्वभिनिर्दिशेत् ॥ १२ ॥ जिसमें अंग अतिछिन्न तथा अतिभिन्न न भया हो और दोनोंके लक्षण मिलते हों तथा व्रण तिरछा बाँका होय, उसको क्षतव्रण कहते हैं ॥ पिच्चितके लक्षण । प्रहारपीडनाभ्यां तु यदङ्गं पृथुतां गतम् । सास्थि तत्पिच्चितं विद्यान्मज्जारक्तपरिप्लुतम् ॥ १३ ॥ १ शल्यं नाम–विविधतृणकाष्ठपांसुलोष्टारिष्टवालनखपूयास्रावान्तर्गर्भादयः ।

भाषाटीकासमेत । ( २३५ ) जो अंग हाडसहित प्रहार कहिये मुद्गर आदिकी चोट अथवा किंवाड आदिके दबना इत्यादि योगसे पिच जाय, मज्जा रुधिर करके युक्त होय, घाव न होय उसको पिच्चितव्रण कहते हैं ॥ घृष्टके लक्षण । घर्षणादभिघाताद्वा यदंगं विगतत्वचम् । उषास्रावान्वितं तद्धि घृष्टमित्यभिनिर्दिशेत् ॥ १४ ॥ कठिन वस्त्र आदिके घर्षण (घिसने) से, चोटके लगनेसे जिस अंगके ऊपरकी त्वचा जाती रहे तथा आगके समान गरम रुधिर चुचाय उसको घृष्ट कहते हैं॥ सशल्‍यव्रणके लक्षण । श्यावं सशोथं पिटिकान्वितं च मुहुर्मुहुः शोणितवाहिनं च । मृदूद्गतं बुद्बुदतुल्यमांसं व्रणं सशल्यं सरुजं वदंति ॥ १५ ॥ जो व्रण नीला, सूजनयुक्त, मरोडिनसे व्याप्त अथवा बारंबार उनमेंसे रुधिर बहै और नरम होकर ऊपर बबूलेके समान उठा हुआ जिसका मांस होय उस व्रणको सशल्य जानना चाहिये ॥ कोष्ठभेदके लक्षण । त्वचोऽतीत्य शिरादीनि भित्त्वा वा परिहृत्य वा । कोष्ठे प्रतिष्ठितं शल्यं कुर्यादुक्तानुपद्रवान् ॥ १६ ॥ सप्त त्वचाओंमें व्याप्त होकर शिरा, नस, हड्डी इनकी सन्धियोंको वेधकर अथवा सिरा आदिको छोड जो शल्य कोष्ठमें रहा है, उससे आगे कहे हुए लक्षण होते हैं ॥ असाध्यकोष्ठभेद । तत्रांतर्लोहितं पांडु शीतपादकराननम् । शीतोच्छ्वासं रक्तनेत्रमानद्धं परिवर्जयेत् ॥ १७ ॥ जिसका रुधिर आंतोंमें संचित होय अर्थात् बाहर नहीं बहे और जो पीला वर्ण, जिसके हाथ पैर शीतल होय और जो शीतल श्वासको छोडे, जिसके लाल नेत्र होयँ तथा आनाह कहिये पेट फूलना ऐसे रोगीको वैद्य त्याग देय ॥ मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि और सन्धि इन मर्मोंमें चोट लगनेके सामान्य लक्षण । भ्रमः प्रलापः पतनं प्रमोहो विचेष्टनं ग्लानिरथोष्णता च । स्रस्तांगता मूर्छनमूर्ध्ववातस्तीव्रा रुजो वातकृताश्च तास्ताः ॥ १८॥ मांसोदकाभं रुधिरं च गच्छेद्सर्वैन्द्रियार्थोपरमस्तथैव । दशार्द्धसंख्‍येष्वथ विक्षतेषु सामान्यतो मर्मसु लिङ्‌गमुक्तम् ॥ १९ ॥

( २३६ ) माधवनिदान ।

( २३६ ) माधवनिदान । भ्रम, अनर्थभाषण, गिरना, इन्द्रिय और मन इनको मोह, हाथ पैरका फैलाना, ग्लानि, उष्णता, अंगोंमें शिथिलता, मूर्च्छा, श्वासका चढना, वातजन्य तीव्र पीडा, मांसका धोया हुआ पानी ऐसा रुधिर बहे, सर्व इन्द्रिय विकल होयँ अर्थात् सब इन्द्रि- योंका व्यापार बन्द हो जाय ये लक्षण मांस आदि पाच मर्मविद्ध होनेसे होते हैं ॥ मर्मरहितशिराविद्धके लक्षण । सुरेन्द्रगोपप्रतिमं प्रभूतं रक्तं स्रवेत्तत्क्षणजश्च वायुः । करोति रोगान्विविधान्यथोक्ताञ्छिरासु विद्धास्वथवा क्षतासु ॥२०॥ शिरा कहिये ( नाडी ) बिंध जाय, अथवा शिरामें घाव हो जाय उसमेंसे इन्द्र- गोप ( वीरबहूटी कीडों ) के समान लाल तथा पुष्कल रुधिर स्रवे तथा रक्तक्षय होनेसे वायु कुपित होकर अनेक प्रकारके ( आक्षेपकादि ) रोग उत्पन्न करे है ॥ स्नायुविद्धके लक्षण । कौब्ज्यं शरीरावयवावसादः क्रियास्वशक्तिस्तुमुला रुजश्च । चिराद्व्रणो रोहति यस्य चापि तं स्नायुविद्धं पुरुषं व्यवस्येत् ॥ २१ ॥ कुबडापना, शरीरके अवयवोंका गिरना, काम करनेसे असमर्थपना, बहुत पीडा और जिसका व्रण बहुत दिनमें भरे, उसकी स्नायु विद्धभई ऐसे जाने ॥ सन्धिविद्धके लक्षण । शोथाभिवृद्धिस्तुमुला रुजश्च बलक्षयः पर्वसु भेदशोथौ । क्षतेषु संधिष्वचलाचलेषु स्यात्सर्वकर्मोपरमश्च लिङ्गम् ॥ २२ ॥ चल अथवा अचल संधिका वेध होनेसे सूजन बढे, पीडा बहुत होय, शक्तिका नाश होय, संधिमें भेदके समान पीडा होय, सूजन होय, कुछ कार्य करे परन्तु उसमें उपराम होय ॥ हड्डी विंधगई हो उसके लक्षण । घोरा रुजो यस्य निशादिनेषु सर्वास्ववस्थासु च नैति शांतिम् । भिषग्विपाश्चिद्वितार्थसूत्रस्तमस्थिविद्धं पुरुषं व्यवस्येत् ॥ २३ ॥ जिस पुरुषके रातदिन घोर पीडा होय, जाग्रदादि तीनों अवस्थासे शांति नहीं होय उसके अस्थि ( हड्डी ) विंधी है ऐसे श्रेष्ठ वैद्य जाने ॥ मर्मरहितशिरादिकोंके विद्धलक्षण कहके शिरादिमर्मविद्ध लक्षणोंका हवाला देते हैं- यथास्वमेतानि विभावयेत्तु लिङ्गानि मर्मस्वभिताडितेषु । मर्मके ठिकाने चोटके लगनेसे ये पूर्वोक्त लक्षण जानने चाहिये । तुशब्दसे लक्षण और सामान्य लक्षण होते हैं ऐसे जानना ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( २३७ ) मांसमर्मके लक्षण नहीं कहे उनको कहते हैं— पांडुर्विवर्णः स्पृशितं न वेत्ति यो मांसमर्मस्वभिताडितः स्यात्॥२४॥ जो पुरुष मांसमर्मके ठिकाने विद्ध होता है, उसका पीला वर्ण, देहका विवर्ण होय और स्पर्शका ज्ञान न होय ॥ सर्व व्रणके उपद्रव । विसर्पः पक्षघातश्च शिरास्तम्भोऽपतानकः । मोहोन्मादव्रणरुजाज्वरतृष्णा हनुग्रहः ॥ २५ ॥ कासश्छर्दिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथुः । षोडशोपद्रवाः प्रोक्ता व्रणानां व्रणचिन्तकैः ॥ २६ ॥ बिसर्प, पक्षाघात, शिरास्तम्भ, अपतानक, मोह, उन्माद, ज्वर, व्रणकी पीडा, प्यास, हनुग्रह, खांसी, वमन, अतिसार, हिचकी, श्वास और कंप ये व्रणरोगके सोलह उपद्रव व्रणरोगके जाननेवालोंने कहे हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां आगन्तुव्रण ( सद्योव्रण ) निदानं समाप्तम् ॥ अथ भग्ननिदानम् । भग्न दो प्रकारका है एक सव्रण और दूसरा व्रणरहित, इनमें सव्रणको कहकर व्रणरहितको कहते हैं— भग्नं समासाद्द्विविधं हुताश काण्डे च संधौ च हि तत्र संधौ । हे अग्निवेश ! कांडभंग और संधिभंग मिलकर संक्षेपसे भग्नरोग दो प्रकारका है ॥ संधिभंगके लक्षण । उत्पिष्टविश्लिष्टविवर्तितं च तिर्यक्च विक्षिप्तमधश्च षोढा ॥ १ ॥ तहां संधिस्थानका भग्नरोग छः प्रकारका है । उनके नाम कहते हैं—उत्पिष्ट, विश्लिष्ट, विवर्तित, तिर्यक्, विक्षिप्त और अधःक्षिप्त । भग्ननाम टूटनेका है ॥ संधिभंगके सामान्य लक्षण । प्रसारणाकुंचनवर्तनोय्रा रुक्स्पर्शविद्वेषणमेतदुक्तम् । सामान्यतः सन्धिगतस्य लिङ्गं- १ “कांडमस्थिकांडः” काण्डेन नलक्कपालवलयतरुणरुचकानां ग्रहणम् । २ द्वयोरस्थ्नोः संधानं संधिः ॥

( २३८ ) माधवनिदान ।

( २३८ ) माधवनिदान । फैलाते समय, सकोरनेके समय, नीचे करनेसे घोर पीडा होय और स्पर्श सहा न जाय ये संधिभग्नके सामान्य लक्षण हैं ॥ -उत्पिष्टसन्धोः श्वयथुः समन्तात् । विशेषतो रात्रिभवा रुजा च- उत्पिष्टमें संधिके चारों ओर सूजन होय और रात्रिमें पीडा बहुत होय, संधिके हाड दोनों आपसमें घिसे उसको उत्पिष्ट ऐसे कहते हैं ॥ विश्लिष्टे तौ च रुजा च नित्यम् ॥ २ ॥ विश्लिष्ट संधियोंमें सूजन और रात्रिमें पीडा ये होकर सर्व कालमें अत्यन्त पीडा होय और उत्पिष्टकी अपेक्षा इतने लक्षण विश्लिष्टमें विशेष होते हैं अर्थात् संधि शिथिलमात्र होय इसमें हाडके हटनेसे बीचमें गलेटा हो जाय ॥ विवर्तिते पार्श्वरुजश्च तीव्राः- विवर्तित संधिमें दोनों तरफके हाड संधिसे पलटजायँ तब अत्यन्त पीडा होय इस संधिमें हाड दोनों तरफ फिरा करें ॥ तिर्यग्गते तीव्ररुजो भवन्ति । हड्डीके तिरछे हटनेसे पीडा बहुत हो और एक हड्डी संधिस्थान छोडकर टेढी होजाय ॥ क्षिप्तेऽतिशूलं विषमा रुगस्थ्नोः- संधिहड्डी एक उपरको हटजाय तो अत्यन्त पीडा होय और हाडोंमें कम ज्यादा पीडा होय, इस जगह हड्डीकी क्रियासे अथवा दोनों हड्डियोंकी क्रियाकरके दोनों हाड परस्पर समीपसे दूर होजाय ॥ -क्षिप्ते त्वधो रुग्विघटश्च सन्धेः ॥ ३ ॥ संधिकी हड्डी एक नीचेको हटजाय तो पीडा होय और संधिकी विरुद्ध चेष्टा होय, इसमें संधिके हाड परस्पर दूर होयँ परन्तु किंचित् नीचेको गमन करे ॥ अब कांडभग्नको कहते हैं- काण्डे त्वतः कर्कटकाश्वकर्णविचूर्णितं पिच्चितमस्थिच्छालिका । काण्डेषु भग्नं त्वतिपातितं च मज्जागतं च स्फुटितं च वक्रम् ॥ ४ ॥ छिन्नं द्विधा द्वादशधापि काण्डे- कांडभग्न बारह प्रकारके हैं-१ कर्कटक, २ अश्वकर्ण, ३ विचूर्णित, ४ पिच्चित, ५ अस्थिच्छालिका, ६ कांडभग्न, ७ अतिपातित, ८ मज्जागत, ९ स्फुटित,