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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

(प्राक् संध्यातो विमोक्तव्यो रक्षितव्यश्च नित्यशः । एवं रमस्व भीमेन यावद् गर्भस्य वेदनम् ।। एष ते समयो भद्रे शुश्रूष्यश्चाप्रमत्तया । नित्यानुकूलया भूत्वा कर्तव्यं शोभनं त्वया ।।

संध्याकाल आनेसे पहले ही इन्हें छोड़ देना होगा और नित्य-निरन्तर इनकी रक्षा करनी होगी। इस शर्तपर तुम भीमसेनके साथ सुखपूर्वक तबतक रहो, जबतक कि तुम्हें यह पता न चल जाय कि तुम्हारे गर्भमें बालक आ गया है। भद्रे! यही तुम्हारे लिये पालन करनेयोग्य नियम है। तुम्हें सावधान होकर भीमसेनकी सेवा करनी चाहिये और नित्य उनके अनुकूल होकर सदा उनकी भलाईमें संलग्न रहना चाहिये।

युधिष्ठिरेणैवमुक्ता कुन्त्या चाङ्केऽधिरोपिता । भीमार्जुनान्तरगता यमाभ्यां च पुरस्कृता ।। तिर्यग् युधिष्ठिरे याति हिडिम्बा भीमगामिनी । शालिहोत्रसरो रम्यमासेदुस्ते जलार्थिनः ।। तत् तथेति प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा । वनस्पतितलं गत्वा परिमृज्य गृहं यथा ।। पाण्डवानां च वासं सा कृत्वा पर्णमयं तथा ।

आत्मनश्च तथा कुन्त्या एकोद्देशे चकार सा ।। पाण्डवास्तु ततः स्नात्वा शुद्धाः संध्यामुपास्य च । तृषिताः क्षुत्पिपासाार्ता जलमात्रेण वर्तयन् ।। शालिहोत्रस्ततो ज्ञात्वा क्षुधार्तान् पाण्डवांस्तदा । मनसा चिन्तयामास पानीयं भोजनं महत् । ततस्ते पाण्डवाः सर्वे विश्रान्ताः पृ्थया सह ।। यथा जतुगृहे वृत्तं राक्षसेन कृतं च यत् । कृत्वा कथा बहुविधाः कथान्ते पाण्डुनन्दनम् ।। कुन्तिराजसुता वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत् ।।

युधिष्ठिरके यों कहनेपर कुन्तीने हिडिम्बाको अपने हृदयसे लगा लिया। तदनन्तर वह युधिष्ठिरसे कुछ दूरीपर रहकर भीमके साथ चल पड़ी। वह चलते समय भीम और अर्जुनके बीचमें रहती थी। नकुल और सहदेव सदा उसे आगे करके चलते थे। (इस प्रकार) वे (सब) लोग जल पीनेकी इच्छासे शालिहोत्र मुनिके रमणीय सरोवरके तटपर जा पहुँचे। वहाँ कुन्ती तथा युधिष्ठिरने पहले जो शर्त रखी थी, उसे स्वीकार करके हिडिम्बा राक्षसीने वैसा ही कार्य करनेकी प्रतिज्ञा की। तत्पश्चात् उसने वृक्षके नीचे जाकर घरकी तरह झाड़ू लगायी और पाण्डवोंके लिये निवास-स्थानका निर्माण किया। उन सबके लिये पर्णशाला तैयार करनेके बाद उसने अपने और कुन्तीके लिये एक दूसरी जगह कुटी बनायी। तदनन्तर पाण्डवोंने स्नान करके शुद्ध हो संध्योपासना किया और भूख-प्याससे पीड़ित होनेपर भी केवल जलका आहार किया। उस समय शालिहोत्र मुनिने उन्हें भूखसे व्याकुल जान मन-ही-मन उनके लिये प्रचुर अन्न-पानकी सामग्रीका चिन्तन किया (और उससे पाण्डवोंको भोजन कराया)। तदनन्तर कुन्तीदेवीसहित सब पाण्डव विश्राम करने लगे। विश्रामके समय उनमें नाना प्रकारकी बातें होने लगीं—किस प्रकार लाक्षागृहमें उन्हें जलानेका प्रयत्न किया गया तथा फिर राक्षस हिडिम्बने उन लोगोंपर किस प्रकार आक्रमण किया इत्यादि प्रसंग उनकी चर्चाके विषय थे। बातचीत समाप्त होनेपर कुन्तिराजकुमारी कुन्तीने पाण्डुनन्दन भीमसेनसे इस प्रकार कहा।

कुन्त्युवाच

यथा पाण्डुस्तथा मान्यस्तव ज्येष्ठो युधिष्ठिरः । अहं धर्मविधानेन मान्या गुरुतरा तव ।। तस्मात् पाण्डुहितार्थं मे युवराज हितं कुरु । निकृता धार्तराष्ट्रेण पापेनाकृतबुद्धिना । दुष्कृतस्य प्रतीकारं न पश्यामि वृकोदर ।। तस्मात् कतिपयाहेन योगक्षेमं भविष्यति ।।

क्षेमं दुर्गमिमं वासं वसिष्यामो यथासुखम् ।
इदमद्य महत् दुःखं धर्मकृच्छ्रं वृकोदर ॥
दृष्ट्वैव त्वां महाप्राज्ञ अनङ्गाभिप्रचोदिता ।
युधिष्ठिरं च मां चैव वरयामास धर्मतः ॥
धर्मार्थं देहि पुत्रं त्वं स नः श्रेयः करिष्यति ।
प्रतिवाक्यं तु नेच्छामि ह्यावाभ्यां वचनं कुरु ॥)
**कुन्ती बोली—**युवराज! तुम्हारे लिये जैसे महाराज पाण्डु माननीय थे, वैसे ही बड़े भाई युधिष्ठिर भी हैं। धर्मशास्त्रकी दृष्टिसे मैं उनकी अपेक्षा भी अधिक गौरवकी पात्र तथा सम्माननीय हूँ। अतः तुम महाराज पाण्डुके हितके लिये मेरी एक हितकर आज्ञाका पालन करो। वृकोदर! अपवित्र बुद्धिवाले पापात्मा दुर्योधनने हमारे साथ जो दुष्टता की है, उसके प्रतिशोधका उपाय मुझे कोई नहीं दिखायी देता। अतः कुछ दिनोंके बाद भले ही हमारा योगक्षेम सिद्ध हो। यह निवासस्थान अत्यन्त दुर्गम होनेके कारण हमारे लिये कल्याणकारी सिद्ध होगा। हम यहाँ सुखपूर्वक रहेंगे। महाप्राज्ञ भीमसेन! आज यह हमारे सामने अत्यन्त दुःखद धर्मसंकट उपस्थित हुआ है कि हिडिम्बा तुम्हें देखते ही कामसे प्रेरित हो मेरे और युधिष्ठिरके पास आकर धर्मतः तुम्हें पतिके रूपमें वरण कर चुकी है। मेरी आज्ञा है कि तुम उसे धर्मके लिये एक पुत्र प्रदान करो। वह हमारे लिये कल्याणकारी होगा। मैं इस विषयमें तुम्हारा कोई प्रतिवाद नहीं सुनना चाहती। तुम हम दोनोंके सामने प्रतिज्ञा करो।

वैशम्पायन उवाच

तथेति तत् प्रतिज्ञाय भीमसेनोऽब्रवीदिदम् ।
शृणु राक्षसि सत्येन समयं ते वदाम्यहम् ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! 'बहुत अच्छा' कहकर भीमसेनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की (और हिडिम्बाके साथ गान्धर्व-विवाह कर लिया)। तत्पश्चात् भीमसेन हिडिम्बासे इस प्रकार बोले—'राक्षसी! सुनो, मैं सत्यकी शपथ खाकर तुम्हारे सामने एक शर्त रखता हूँ ॥ १९ ॥

यावत् कालेन भवति पुत्रस्योत्पादनं शुभे ।
तावत् कालं गमिष्यामि त्वया सह सुमध्यमे ॥ २० ॥
'शुभे! सुमध्यमे! जबतक तुम्हें पुत्रकी उत्पत्ति न हो जाय तभीतक मैं तुम्हारे साथ विहारके लिये चलूँगा' ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच

तथेति तत् प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तदा ।
भीमसेनमुपादाय सोर्ध्वमाचक्रमे ततः ॥ २१ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब 'ऐसा ही होगा' यह प्रतिज्ञा करके हिडिम्बा राक्षसी भीमसेनको साथ ले वहाँसे ऊपर आकाशमें उड़ गयी ।। २१ ।। शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च । मृगपक्षिविघुष्टेषु रमणीयेषु सर्वदा ।। २२ ।। कृत्वा च परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता । संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम् ।। २३ ।। तथैव वनदुर्गेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । सरस्सु रमणीयेषु पद्मोत्पलयुतेषु च ।। २४ ।। नदीद्वीपप्रदेशेषु वैदूर्यसिकतासु च । सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च ।। २५ ।। काननेषु विचित्रेषु पुष्पितद्रुमवल्लिषु । हिमवद्गिरिकुञ्जेषु गुहासु विविधासु च ।। २६ ।। प्रफुल्लशतपत्रेषु सरस्स्वमलवारिषु । सागरस्य प्रदेशेषु मणिहेमचितेषु च ।। २७ ।। पल्वलेषु च रम्येषु महाशालवनेषु च । देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु ।। २८ ।। गुह्यकानां निवासेषु तापसायतनेषु च । सर्वर्तुफलरम्येषु मानसेषु सरस्सु च ।। २९ ।। बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम् । रमयन्ती तथा भीमं तत्र तत्र मनोजवा ।। ३० ।। उसने रमणीय पर्वतशिखरोंपर, देवताओंके निवास-स्थानोंमें तथा जहाँ बहुत-से पशु-पक्षी मधुर शब्द करते रहते हैं, ऐसे सुरम्य प्रदेशोंमें सदा परम सुन्दर रूप धारण करके, सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो मीठी-मीठी बातें करके पाण्डुनन्दन भीमसेनको सुख पहुँचाया। इसी प्रकार पुष्पित वृक्षों और लताओंसे सुशोभित दुर्गम वनोंमें, कमल और उत्पल आदिसे अलंकृत रमणीय सरोवरोंमें, नदियोंके द्वीपोंमें तथा जहाँकी वालुका वैदूर्य-मणिके समान है, जिनके घाट, तटवर्ती वन तथा जल सभी सुन्दर एवं पवित्र हैं, उन पर्वतीय नदियोंमें, विकसित वृक्षों और लता-वल्लरियोंसे विभूषित विचित्र काननोंमें, हिमवान् पर्वतके कुंजों और भाँति-भाँतिकी गुफाओंमें, खिले हुए कमलसमूहसे युक्त निर्मल जलवाले सरोवरोंमें, मणियों और सुवर्णसे सम्पन्न समुद्र-तटवर्ती प्रदेशोंमें, छोटे-छोटे सुन्दर तालाबोंमें, बड़े-बड़े शाल-वृक्षोंके जंगलोंमें, पवित्र देववनोंमें, पर्वतीय शिखरोंपर, गुह्यकोंके निवासस्थानोंमें, सभी ऋतुओंके फलोंसे सम्पन्न तपस्वी मुनियोंके सुरम्य आश्रमोंमें तथा मानसरोवर एवं अन्य जलाशयोंमें घूम-फिरकर हिडिम्बाने परम सुन्दर रूप धारण करके

पाण्डुनन्दन भीमसेनके साथ रमण किया। वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी, अतः उन-उन स्थानोंमें भीमसेनको आनन्द प्रदान करती हुई विचरती रहती थी॥ २२-३०॥

प्रजज्ञे राक्षसी पुत्रं भीमसेनान्महाबलम्।
विरूपाक्षं महावक्त्रं शङ्कुकर्णं बिभीषणम्॥ ३१॥
कुछ कालके पश्चात् उस राक्षसीने भीमसेनसे एक महान् बलवान् पुत्र उत्पन्न किया, जिसकी आँखें विकराल, मुख विशाल और कान शंकुके समान थे। वह देखनेमें बड़ा भयंकर जान पड़ता था॥ ३१॥

भीमनादं सुताम्रोष्ठं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाबलम्।
महेष्वासं महावीर्यं महासत्त्वं महाभुजम्॥ ३२॥
महाजवं महाकायं महामायमरिंदमम्।
दीर्घघोणं महोरस्कं विकटोद्ध्वपिण्डिकम्॥ ३३॥
उसकी आवाज बड़ी भयानक थी। सुन्दर लाल-लाल ओठ, तीखी दाढ़ें, महान् बल, बहुत बड़ा धनुष, महान् पराक्रम, अत्यन्त धैर्य और साहस, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, महान् वेग और विशाल शरीर—ये उसकी विशेषताएँ थीं। वह महामायावी राक्षस अपने शत्रुओंका दमन करनेवाला था। उसकी नाक बहुत बड़ी, छाती चौड़ी तथा पैरोंकी दोनों पिंडलियाँ टेढ़ी और ऊँची थीं॥ ३२-३३॥

अमानुषं मानुषजं भीमवेगं महाबलम्।
यः पिशाचानतीत्यान्यान् बभूवातीव राक्षसान्॥ ३४॥
यद्यपि उसका जन्म मनुष्यसे हुआ था तथापि उसकी आकृति और शक्ति अमानुषिक थी। उसका वेग भयंकर और बल महान् था। वह दूसरे पिशाचों तथा राक्षसोंसे बहुत अधिक शक्तिशाली था॥ ३४॥

बालोऽपि यौवनं प्राप्तो मानुषेषु विशाम्पते।
सर्वास्त्रेषु परं वीरः प्रकर्षमगमद् बली॥ ३५॥
राजन्! अवस्थामें बालक होनेपर भी वह मनुष्योंमें युवक-सा प्रतीत होता था। उस बलवान् वीरने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंमें बड़ी निपुणता प्राप्त की थी॥ ३५॥

सद्यो हि गर्भान् राक्षस्यो लभन्ते प्रसवन्ति च।
कामरूपधराश्चैव भवन्ति बहुरूपिकाः॥ ३६॥
राक्षसियाँ जब गर्भ धारण करती हैं, तब तत्काल ही उसको जन्म दे देती हैं। वे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली और नाना प्रकारके रूप बदलनेवाली होती हैं॥ ३६॥

प्रणम्य विकचः पादावगृह्णात् स पितुस्तदा।
मातुश्च परमेष्वासस्तौ च नामास्य चक्रतुः॥ ३७॥
उस महान् धनुर्धर बालकने पैदा होते ही पिता और माताके चरणोंमें प्रणाम किया। उसके सिरमें बाल नहीं उगे थे। उस समय पिता और माताने उसका इस प्रकार नामकरण

किया ।। ३७ ।। घटो हास्योत्कच इति माता तं प्रत्यभाषत । अब्रवीत् तेन नामास्य घटोत्कच इति स्म ह ।। ३८ ।। बालककी माताने भीमसेनसे कहा—‘इसका घट (सिर) उत्कच* अर्थात् केशरहित है।’ उसके इस कथनसे ही उसका नाम घटोत्कच हो गया ।। ३८ ।। अनुरक्तश्च तानासीत् पाण्डवान् स घटोत्कचः । तेषां च दयितो नित्यमात्मनित्यो बभूव ह ।। ३९ ।। घटोत्कचका पाण्डवोंके प्रति बड़ा अनुराग था और पाण्डवोंको भी वह बहुत प्रिय था। वह सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहता था ।। ३९ ।। संवाससमयो जीर्ण इत्याभाष्य ततस्तु तान् । हिडिम्बा समयं कृत्वा स्वां गतिं प्रत्यपद्यत ।। ४० ।। तदनन्तर हिडिम्बा पाण्डवोंसे यह कहकर कि भीमसेनके साथ रहनेका मेरा समय समाप्त हो गया, आवश्यकताके समय पुनः मिलनेकी प्रतिज्ञा करके अपने अभीष्ट स्थानको चली गयी ।। ४० ।। घटोत्कचो महाकायः पाण्डवान् पृथाया सह । अभिवाद्य यथान्यायमब्रवीच्च प्रभाष्य तान् ।। ४१ ।। किं करोम्यहमार्याणां निःशङ्कं वदतानघाः । तं ब्रुवन्तं भैमसेनिं कुन्ती वचनमब्रवीत् ।। ४२ ।। तत्पश्चात् विशालकाय घटोत्कचने कुन्तीसहित पाण्डवोंको यथायोग्य प्रणाम करके उन्हें सम्बोधित करके कहा—‘निष्पाप गुरुजन! आप निःशंक होकर बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’ इस प्रकार पूछनेवाले भीमसेनकुमारसे कुन्तीने कहा— ।। ४१-४२ ।। त्वं कुरूणां कुले जातः साक्षाद् भीमसमो ह्यसि । ज्येष्ठः पुत्रोऽसि पञ्चानां साहाय्यं कुरु पुत्रक ।। ४३ ।। ‘बेटा! तुम्हारा जन्म कुरुकुलमें हुआ है। तुम मेरे लिये साक्षात् भीमसेनके समान हो। पाँचों पाण्डवोंके ज्येष्ठ पुत्र हो, अतः हमारी सहायता करो’ ।। ४३ ।।

वैशम्पायन उवाच

पृथायाप्येवमुक्तस्तु प्रणम्यैव वचोऽब्रवीत् । यथा हि रावणो लोके इन्द्रजिच्च महाबलः । वर्ष्मवीर्यसमो लोके विशिष्टश्चाभवं नृषु ।। ४४ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुन्तीके यों कहनेपर घटोत्कचने प्रणाम करके ही उनसे कहा—‘दादीजी! लोकमें जैसे रावण और मेघनाद बहुत बड़े बलवान् थे, उसी

प्रकार इस मानव-जगत्में मैं भी उन्हींके समान विशालकाय और महापराक्रमी हूँ; बल्कि उनसे भी बढ़कर हूँ ॥ ४४ ॥

कृत्यकाल उपस्थास्ये पितॄनिति घटोत्कचः । आमन्त्र्य रक्षसां श्रेष्ठः प्रतस्थे चोत्तरां दिशम् ॥ ४५ ॥ ‘जब मेरी आवश्यकता होगी, उस समय मैं स्वयं अपने पितृवर्गकी सेवामें उपस्थित हो जाऊँगा।’ यों कहकर राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच पाण्डवोंसे आज्ञा लेकर उत्तर दिशाकी ओर चला गया ॥ ४५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1127)

पाण्डवोंकी व्यासजीसे भेंट


धृष्टद्युम्नकी घोषणा

स हि सृष्टो मघवता शक्तिहेतोर्महात्मना ।
कर्णस्याप्रतिवीर्यस्य प्रतियोद्धा महारथः ॥ ४६ ॥
महामना इन्द्रने अनुपम पराक्रमी कर्णकी शक्तिका आघात सहन करनेके लिये घटोत्कचकी सृष्टि की थी। वह कर्णके सम्मुख युद्ध करनेमें समर्थ महारथी वीर था ॥ ४६ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि घटोत्कचोत्पत्तौ
चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें घटोत्कचकी उत्पत्तिविषयक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल ७९ श्लोक हैं)


* कोई-कोई उत्कचका अर्थ 'ऊपर उठे हुए बालोंवाला' भी करते हैं।

१५५-

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पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंको व्यासजीका दर्शन और उनका एकचक्रा नगरीमें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

ते वनेन वनं गत्वा घ्नन्तो मृगगणान् बहून् ।
अपक्रम्य ययु राजंस्त्वरमाणा महारथाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वे महारथी पाण्डव उस स्थानसे हटकर एक वनसे दूसरे वनमें जाकर बहुत-से हिंसक पशुओंको मारते हुए बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़े ॥ १ ॥

मत्स्यांस्त्रिगर्तान् पञ्चालान् कीचकानन्तरेण च ।
रमणीयान् वनोद्देशान् प्रेक्षमाणाः सरांसि च ॥ २ ॥
मत्स्य, त्रिगर्त, पंचाल तथा कीचक—इन जनपदोंके भीतर होकर रमणीय वनस्थलियॉं और सरोवरोंको देखते हुए वे लोग यात्रा करने लगे ॥ २ ॥

जटाः कृत्वाऽऽत्मनः सर्वे वल्कलाजिनवाससः ।
सह कुन्त्या महात्मानो बिभ्रतस्तापसं वपुः ॥ ३ ॥
क्वचिद् वहन्तो जननीं त्वरमाणा महारथाः ।
क्वचिच्छन्देन गच्छन्तस्ते जग्मुः प्रसभां पुनः ॥ ४ ॥
उन सबने अपने सिरपर जटाएँ रख ली थीं। वल्कल और मृगचर्मसे अपने शरीरको ढँक लिया था और तपस्वीका-सा वेष धारण कर रखा था। इस प्रकार वे महारथी महात्मा पाण्डव माता कुन्तीदेवीके साथ कहीं तो उन्हें पीठपर ढोते हुए तीव्र गतिसे चलते थे, कहीं इच्छानुसार धीरे-धीरे पाँव बढ़ाते थे और कहीं पुनः अपनी चाल तेज कर देते थे ॥ ३-४ ॥

ब्राह्मं वेदमधीयाना वेदाङ्गानि च सर्वशः ।
नीतिशास्त्रं च सर्वज्ञा ददृशुस्ते पितामहम् ॥ ५ ॥
पाण्डवलोग सब शास्त्रोंके ज्ञाता थे और प्रतिदिन उपनिषद्, वेद-वेदांग तथा नीतिशास्त्रका स्वाध्याय किया करते थे। एक दिन जब वे स्वाध्यायमें लगे थे, पितामह व्यासजीका दर्शन हुआ ॥ ५ ॥

तेऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं तदा ।
तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे सह मात्रा परंतपाः ॥ ६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डवोंने उस समय महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायनको प्रणाम किया और अपनी माताके साथ वे सब लोग उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ ६ ॥

व्यास उवाच

मयेदं व्यसनं पूर्वं विदितं भरतर्षभाः । यथा तु तैरधर्मेण धार्तराष्ट्रैर्विवासिताः ॥ ७ ॥ तद् विदित्वास्मि सम्प्राप्तश्चिकीर्षुः परमं हितम् । न विषादोऽत्र कर्तव्यः सर्वमेतत् सुखाय वः ॥ ८ ॥

तब व्यासजीने कहा—भरतश्रेष्ठ पाण्डुकुमारो! मैंने पहले ही तुमलोगोंपर आये हुए इस संकटको जान लिया था। धृतराष्ट्रके पुत्रोंने तुम्हें जिस प्रकार अधर्मपूर्वक राज्यसे बहिष्कृत किया है, वह सब जानकर तुम्हारा परम हित करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। इसके लिये तुम्हें विषाद नहीं करना चाहिये; यह सब तुम्हारे भावी सुखके लिये हो रहा है ॥ ७-८ ॥

समास्ते चैव मे सर्वे यूयं चैव न संशयः । दीनतो बालतश्चैव स्नेहं कुर्वन्ति मानवाः । तस्मादभ्यधिकः स्नेहो युष्मासु मम साम्प्रतम् ॥ ९ ॥

इसमें संदेह नहीं कि मेरे लिये तुमलोग और धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधन आदि सब समान ही हैं। फिर भी जहाँ दीनता और बचपन है, वहीं मनुष्य अधिक स्नेह करते हैं; इसी कारण इस समय तुमलोगोंपर मेरा अधिक स्नेह है ॥ ९ ॥

स्नेहपूर्वं चिकीर्षामि हितं वस्तन्निबोधत । इदं नगरमभ्याशे रमणीयं निरामयम् । वसतेह प्रतिच्छन्ना ममागमनकाङ्क्षिणः ॥ १० ॥

मैं स्नेहपूर्वक तुमलोगोंका हित करना चाहता हूँ। इसलिये मेरी बात सुनो। यहाँ पास ही जो यह रमणीय नगर है, इसमें रोग-व्याधिका भय नहीं है। अतः तुम सब लोग यहीं छिपकर रहो और मेरे पुनः आनेकी प्रतीक्षा करो ॥ १० ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं स तान् समाश्वास्य व्यासः सत्यवतीसुतः । एकचक्रामभिगतः कुन्तीमाश्वासयत् प्रभुः ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार पाण्डवोंको भलीभाँति आश्वासन देकर सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यास उन सबके साथ एकचक्रा नगरीके निकट गये। वहाँ उन्होंने कुन्तीको इस प्रकार सान्त्वना दी ॥ ११ ॥

व्यास उवाच

जीवत्पुत्रि सुतस्तेऽयं धर्मनित्यो युधिष्ठिरः । धर्मेण पृथिवीं जित्वा महात्मा पुरुषर्षभः । पृथिव्यां पार्थिवान् सर्वान् प्रशासिष्यति धर्मराट् ॥ १२ ॥

**व्यासजी बोले—**जीवित पुत्रोंवाली बहू! तुम्हारे ये पुत्र नरश्रेष्ठ महात्मा धर्मराज युधिष्ठिर सदा धर्मपरायण हैं; अतः ये धर्मसे ही सारी पृथ्वीको जीतकर भूमण्डलके सम्पूर्ण राजाओंपर शासन करेंगे ।। १२ ।।
पृथिवीमखिलां जित्वा सर्वां सागरमेखलाम् ।
भीमसेनार्जुनबलाद् भोक्ष्यते नात्र संशयः ॥ १३ ॥
भीमसेन और अर्जुनके बलसे समुद्रपर्यन्त सारी वसुधाको अपने अधिकारमें करके ये उसका उपभोग करेंगे; इसमें संशय नहीं है ।। १३ ।।
पुत्रास्तव च माद्रयाश्च सर्व एव महारथाः ।
स्वराष्ट्रे विहरिष्यन्ति सुखं सुमनसः सदा ॥ १४ ॥
तुम्हारे और माद्रीके सभी महारथी पुत्र सदा अपने राज्यमें प्रसन्नचित्त हो सुखपूर्वक विचरेंगे ।। १४ ।।
यक्ष्यन्ति च नरव्याघ्रा निर्जित्य पृथिवीमिमाम् ।
राजसूयाश्वमेधाद्यैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ १५ ॥
पुरुषोंमें सिंहके समान बलवान् पाण्डव इस पृथ्वीको जीतकर प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न राजसूय तथा अश्वमेध आदि यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन करेंगे ।। १५ ।।
अनुगृह्य सुहृद्वर्गं भोगैश्वर्यसुखेन च ।
पितृपैतामहं राज्यमिमे भोक्ष्यन्ति ते सुताः ॥ १६ ॥
तुम्हारे ये पुत्र अपने सुहृदोंके समुदायको उत्तम भोग एवं ऐश्वर्य-सुखके द्वारा अनुगृहीत करके बाप-दादोंके राज्यका पालन एवं उपभोग करेंगे ।। १६ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा निवेश्यैनान् ब्राह्मणस्य निवेशने ।
अब्रवीत् पाण्डवश्रेष्ठमृषिर्द्वैपायनस्तदा ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यों कहकर महर्षि द्वैपायनने इन सबको एक ब्राह्मणके घरमें ठहरा दिया और पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरसे कहा— ।। १७ ।।
इह मासं प्रतीक्षध्वमागमिष्याम्यहं पुनः ।
देशकालौ विदित्वैव लप्स्यध्वं परमां मुदम् ॥ १८ ॥
‘तुमलोग यहाँ एक मासतक मेरी प्रतीक्षा करो। मैं पुनः आऊँगा। देश और कालका विचार करके ही कोई कार्य करना चाहिये; इससे तुम्हें बड़ा सुख मिलेगा’ ।। १८ ।।
स तैः प्राञ्जलिभिः सर्वैस्तथेत्युक्तो नराधिप ।
जगाम भगवान् व्यासो यथागतमृषिः प्रभुः ॥ १९ ॥
राजन्! उस समय सबने हाथ जोड़कर उनकी आज्ञा स्वीकार की। तदनन्तर शक्तिशाली महर्षि भगवान् व्यास जैसे आये थे, वैसे ही चले गये ।। १९ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि एकचक्राप्रवेशे व्यासदर्शने
पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥

इस प्रकार श्रीमद्भारत आदिपर्वके अन्तर्गत हिडिम्बवधपर्वमें पाण्डवोंका एकचक्रानगरीमें प्रवेश और व्यासजीका दर्शनविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५५ ॥

(बकवधपर्व)

⬅ विषय-सूची (TOC)

(बकवधपर्व)

षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मणपरिवारका कष्ट दूर करनेके लिये कुन्तीकी भीमसेनसे बातचीत तथा ब्राह्मणके चिन्तापूर्ण उद्गार

जनमेजय उवाच

एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः ।
अत ऊर्ध्वं द्विजश्रेष्ठ किमकूर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**द्विजश्रेष्ठ! कुन्तीके महारथी पुत्र पाण्डव जब एकचक्रा नगरीमें पहुँच गये, उसके बाद उन्होंने क्या किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

एकचक्रां गतास्ते तु कुन्तीपुत्रा महारथाः ।
ऊषुर्नातिचिरं कालं ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! एकचक्रा नगरीमें जाकर महारथी कुन्तीपुत्र थोड़े दिनोंतक एक ब्राह्मणके घरमें रहे ॥ २ ॥

रमणीयानि पश्यन्तो वनानि विविधानि च ।
पार्थिवानपि चोद्देशान् सरितश्च सरांसि च ॥ ३ ॥
चेरुर्भैक्षं तदा ते तु सर्व एव विशाम्पते ।
बभूवुर्नागराणां च स्वैर्गुणैः प्रियदर्शनाः ॥ ४ ॥
जनमेजय! उस समय वे सभी पाण्डव भाँति-भाँतिके रमणीय वनों, सुन्दर भूभागों, सरिताओं और सरोवरोंका दर्शन करते हुए भिक्षाके द्वारा जीवन-निर्वाह करते थे। अपने उत्तम गुणोंके कारण वे सभी नागरिकोंके प्रीति-पात्र हो गये थे ॥ ३-४ ॥

(दर्शनीया द्विजाः शुद्धा देवगर्भोपमाः शुभाः ।
भैक्षानर्हाश्च राज्यार्हाः सुकुमारास्तपस्विनः ॥
सर्वलक्षणसम्पन्ना भैक्षं नार्हन्ति नित्यशः ।
कार्यार्थिनश्चरन्तीति तर्कयन्त इति ब्रुवन् ॥
बन्धूनामागमान्नित्यमुपचिन्त्य तु नागराः ।
भाजनानि च पूर्णानि भक्ष्यभोज्यैरकारयन् ॥

मौनव्रतेन संयुक्ता भैक्षं गृह्णन्ति पाण्डवाः ।
माता चिरगतान् दृष्ट्वा शोचन्तीति च पाण्डवाः ।
त्वरमाणा निवर्तन्ते मातृगौरवयन्त्रिताः ॥)
उन्हें देखकर नगरनिवासी आपसमें तर्क-वितर्क करते हुए इस प्रकारकी बातें करते थे—'ये ब्राह्मणलोग तो देखने ही योग्य हैं। इनके आचार-विचार शुद्ध एवं सुन्दर हैं। इनकी आकृति देवकुमारोंके समान जान पड़ती है। ये भीख माँगनेयोग्य नहीं, राज्य करनेके योग्य हैं। सुकुमार होते हुए भी तपस्यामें लगे हैं। इनमें सब प्रकारके शुभ लक्षण शोभा पाते हैं। ये कदापि भिक्षा ग्रहण करनेयोग्य नहीं हैं। शायद किसी कार्यवश भिक्षुकोंके वेशमें विचर रहे हैं।' वे नागरिक पाण्डवोंके आगमनको अपने बन्धुजनोंका ही आगमन मानकर उनके लिये भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे भरे हुए पात्र तैयार रखते थे और मौनव्रतका पालन करनेवाले पाण्डव उनसे वह भिक्षा ग्रहण करते थे। हमें आये हुए बहुत देर हो गयी, इसलिये माताजी चिन्तामें पड़ी होंगी—यह सोचकर माताके गौरव-पाशमें बँधे हुए पाण्डव बड़ी उतावलीके साथ उनके पास लौट आते थे।

निवेदयन्ति स्म तदा कुन्त्या भैक्षं सदा निशि ।
तया विभक्तान् भागांस्ते भुञ्जते स्म पृथक् पृथक् ॥ ५ ॥
प्रतिदिन रात्रिके आरम्भमें भिक्षा लाकर वे माता कुन्तीको सौंप देते और वे बाँटकर जिसके लिये जितना हिस्सा देतीं, उतना ही पृथक्-पृथक् लेकर पाण्डवलोग भोजन करते थे ॥ ५ ॥

अर्धं ते भुञ्जते वीराः सह मात्रा परंतपाः ।
अर्धं सर्वस्य भैक्षस्य भीमो भुङ्क्ते महाबलः ॥ ६ ॥
वे चारों वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ आधी भिक्षाका उपयोग करते थे और सम्पूर्ण भिक्षाका आधा भाग अकेले महाबली भीमसेन खाते थे ॥ ६ ॥

तथा तु तेषां वसतां तस्मिन् राष्ट्रे महात्मनाम् ।
अतिचक्राम सुमहान् कालोऽथ भरतर्षभ ॥ ७ ॥
भरतवंशशिरोमणे! इस प्रकार उस राष्ट्रमें निवास करते हुए महात्मा पाण्डवोंका बहुत समय बीत गया ॥ ७ ॥

ततः कदाचित् भैक्षाय गतास्ते पुरुषर्षभाः ।
संगत्या भीमसेनस्तु तत्रास्ते पृथा सह ॥ ८ ॥
तदनन्तर एक दिन नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि चार भाई भिक्षाके लिये गये; किंतु भीमसेन किसी कार्यविशेषके सम्बन्धसे कुन्तीके साथ वहाँ घरपर ही रह गये थे ॥ ८ ॥

अथार्तिजं महाशब्दं ब्राह्मणस्य निवेशने ।
भृशमुत्पतितं घोरं कुन्ती शुश्राव भारत ॥ ९ ॥

भारत! उस दिन ब्राह्मणके घरमें सहसा बड़े जोरका भयानक आर्तनाद होने लगा, जिसे कुन्तीने सुना॥ ९॥

रूरूयमाणांस्तान् दृष्ट्वा परिदेवयतश्च सा ।
कारुण्यात् साधुभावाच्च कुन्ती राजन् न चक्षमे ॥ १० ॥
राजन्! उन ब्राह्मण-परिवारके लोगोंको बहुत रोते और विलाप करते देख कुन्तीदेवी अत्यन्त दयालुता तथा साधु-स्वभावके कारण सहन न कर सकीं॥ १०॥

मथ्यमानेन दुःखेन हृदयेन पृथा तदा ।
उवाच भीमं कल्याणी कृपान्वितमिदं वचः ॥ ११ ॥
वसाम सुसुखं पुत्र ब्राह्मणस्य निवेशने ।
अज्ञाता धार्तराष्ट्रस्य सत्कृता वीतमन्यवः ॥ १२ ॥
उस समय उनका दुःख मानो कुन्तीदेवीके हृदयको मथे डालता था। अतः कल्याणमयी कुन्ती भीमसेनसे इस प्रकार करुणायुक्त वचन बोलीं—‘बेटा! हमलोग इस ब्राह्मणके घरमें दुर्योधनसे अज्ञात रहकर बड़े सुखसे निवास करते हैं। यहाँ हमारा इतना सत्कार हुआ है कि हम अपने दुःख और दैन्यको भूल गये हैं॥ ११-१२॥

सा चिन्तये सदा पुत्र ब्राह्मणस्यास्य किं न्वहम् ।
प्रियं कुर्यामिति गृहे यत् कुर्युरुषिताः सुखम् ॥ १३ ॥
‘इसलिये पुत्र! मैं सदा यही सोचती रहती हूँ कि इस ब्राह्मणका मैं कौन-सा प्रिय कार्य करूँ, जिसे किसीके घरमें सुखपूर्वक रहनेवाले लोग किया करते हैं॥ १३॥

एतावान् पुरुषस्तात कृतं यस्मिन् न नश्यति ।
यावच्च कुर्यादन्योऽस्य कुर्यादभ्यधिकं ततः ॥ १४ ॥
‘तात! जिसके प्रति किया हुआ उपकार उसका बदला चुकाये बिना नष्ट नहीं होता, वही पुरुष है (और इतना ही उसका पौरुष—मानवता है कि) दूसरा मनुष्य उसके प्रति जितना उपकार करे, वह उससे भी अधिक उस मनुष्यका प्रत्युपकार कर दे॥ १४॥

तदिदं ब्राह्मणस्यास्य दुःखमापतितं ध्रुवम् ।
तत्रास्य यदि साहाय्यं कुर्यामुपकृतं भवेत् ॥ १५ ॥
‘इस समय निश्चय ही इस ब्राह्मणपर कोई भारी दुःख आ पड़ा है। यदि उसमें मैं इसकी सहायता करूँ तो वास्तविक उपकार हो सकता है’॥ १५॥

भीमसेन उवाच

ज्ञायतामस्य यद् दुःखं यतश्चैव समुत्थितम् ।
विदित्वा व्यवसिष्यामि यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ १६ ॥
भीमसेन बोले—माँ! पहले यह मालूम करो कि इस ब्राह्मणको क्या दुःख है और वह किस कारणसे प्राप्त हुआ है। जान लेनेपर अत्यन्त दुष्कर होगा, तो भी मैं इसका कष्ट दूर

करनेके लिये उद्योग करूँगा ।। १६ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवं तौ कथयन्तौ च भूयः शुश्रुवतुः स्वनम् ।
आर्तिजं तस्य विप्रस्य सभार्यस्य विशाम्पते ।। १७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! वे माँ-बेटे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि पुनः पत्नीसहित ब्राह्मणका आर्तनाद उनके कानोंमें पड़ा ।। १७ ।।
अन्तःपुरं ततस्तस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः ।
विवेश त्वरिता कुन्ती बद्धवत्सेव सौरभी ।। १८ ।।
तब कुन्तीदेवी तुरंत ही उस महात्मा ब्राह्मणके अन्तःपुरमें घुस गयीं—ठीक उसी तरह जैसे घरके भीतर बँधे हुए बछड़ेवाली गाय स्वयं ही उसके पास पहुँच जाती है ।। १८ ।।
ततस्तं ब्राह्मणं तत्र भार्यया च सुतेन च ।
दुहित्रा चैव सहितं ददर्शावनताननम् ।। १९ ।।
भीतर जाकर कुन्तीने ब्राह्मणको वहाँ पत्नी, पुत्र और कन्याके साथ नीचे मुँह किये बैठे देखा ।। १९ ।।

ब्राह्मण उवाच

धिगिदं जीवितं लोके गतसारमनर्थकम् ।
दुःखमूलं पराधीनं भृशमप्रियभागि च ।। २० ।।
**ब्राह्मणदेवता कह रहे थे—**जगत्‌के इस जीवनको धिक्कार है; क्योंकि यह सारहीन, निरर्थक, दुःखकी जड़, पराधीन और अत्यन्त अप्रियका भागी है ।। २० ।।
जीविते परमं दुःखं जीविते परमो ज्वरः ।
जीविते वर्तमानस्य दुःखानामागमो ध्रुवः ।। २१ ।।
जीनेमें महान् दुःख है। जीवनकालमें बड़ी भारी चिन्ताका सामना करना पड़ता है। जिसने जीवन धारण कर रखा है, उसे दुःखोंकी प्राप्ति अवश्य होती है ।। २१ ।।
आत्मा ह्येको हि धर्मार्थौ कामं चैव निषेवते ।
एतैश्च विप्रयोगोऽपि दुःखं परमनन्तकम् ।। २२ ।।
जीवात्मा अकेला ही धर्म, अर्थ और कामका सेवन करता है। इनका वियोग होना भी उसके लिये महान् और अनन्त दुःखका कारण होता है ।। २२ ।।
आहुः केचित् परं मोक्षं स च नास्ति कथंचन ।
अर्थप्राप्तौ तु नरकः कृत्स्न एवोपपद्यते ।। २३ ।।
कुछ लोग चारों पुरुषार्थोंमें मोक्षको ही सर्वोत्तम बतलाते हैं, किंतु वह भी मेरे लिये किसी प्रकार सुलभ नहीं है। अर्थकी प्राप्ति होनेपर तो नरकका सम्पूर्ण दुःख भोगना ही पड़ता है ।। २३ ।।

अर्थेप्सुता परं दुःखमर्थप्राप्तौ ततोऽधिकम्।
जातस्नेहस्य चार्थेषु विप्रयोगे महत्तमम् ॥ २४ ॥
धनकी इच्छा सबसे बड़ा दुःख है, किंतु धन प्राप्त करनेमें तो और भी अधिक दुःख है और जिसकी धनमें आसक्ति हो गयी है*, उसे उस धनका वियोग होनेपर इतना महान् दुःख होता है, जिसकी कोई सीमा नहीं है ॥ २४ ॥

न हि योगं प्रपश्यामि येन मुच्येयमापदः।
पुत्रदारेण वा सार्धं प्राद्रवेयमनामयम् ॥ २५ ॥
मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इस विपत्तिसे छुटकारा पा सकूँ अथवा पुत्र और स्त्रीके साथ किसी निरापद स्थानमें भाग चलूँ ॥ २५ ॥

यतितं वै मया पूर्वं वेत्थ ब्राह्मणि तत् तथा।
क्षेमं यतस्ततो गन्तुं त्वया तु मम न श्रुतम् ॥ २६ ॥
ब्राह्मणी! तुम इस बातको ठीक-ठीक जानती हो कि पहले तुम्हारे साथ किसी ऐसे स्थानमें चलनेके लिये जहाँ सब प्रकारसे अपना भला हो, मैंने प्रयत्न किया था; परंतु उस समय तुमने मेरी बात नहीं सुनी ॥ २६ ॥

इह जाता विवृद्धास्मि पिता चापि ममेति वै।
उक्तवत्यसि दुर्मेधे याच्यमाना मयासकृत् ॥ २७ ॥
मूढमते! मैं बार-बार तुमसे अन्यत्र चलनेके लिये अनुरोध करता। उस समय तुम कहने लगती थीं—'यहीं मेरा जन्म हुआ, यहीं बड़ी हुई तथा मेरे पिता भी यहीं रहते थे' ॥ २७ ॥

स्वर्गतोऽपि पिता वृद्धस्तथा माता चिरं तव।
बान्धवा भूतपूर्वाश्च तत्र वासे तु का रतिः ॥ २८ ॥
अरी! तुम्हारे बूढ़े माता-पिता और पहलेके भाई-बन्धु जिसे छोड़कर बहुत दिन हुए स्वर्गलोकको चले गये, वहीं निवास करनेके लिये यह आसक्ति कैसी? ॥ २८ ॥

सोऽयं ते बन्धुकामाया अशृण्वत्या वचो मम।
बन्धुप्रणाशः सम्प्राप्तो भृशं दुःखकरो मम ॥ २९ ॥
तुमने बंधु-बान्धवोंके साथ रहनेकी इच्छा रखकर जो मेरी बात नहीं सुनी, उसीका यह फल है कि आज समस्त भाई-बंधुओंके विनाशकी घड़ी आ पहुँची है, जो मेरे लिये अत्यन्त दुःखका कारण है ॥ २९ ॥

अथवा मद्दिनाशोऽयं न हि शक्ष्यामि कंचन।
परित्यक्तुमहं बन्धुं स्वयं जीवन् नृशंसवत् ॥ ३० ॥
अथवा यह मेरे ही विनाशका समय है; क्योंकि मैं स्वयं जीवित रहकर क्रूर मनुष्यकी भाँति दूसरे किसी भाई-बंधुका त्याग नहीं कर सकूँगा ॥ ३० ॥

सहधर्मचरीं दान्तां नित्यं मातृसमां मम।
सखायं विहितां देवैर्नित्यं परमिकां गतिम् ॥ ३१ ॥

प्रिये! तुम मेरी सहधर्मिणी और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाली हो। सदा सावधान रहकर माताके समान मेरा पालन-पोषण करती हो। देवताओंने तुम्हें मेरी सखी (सहायिका) बनाया है। तुम सदा मेरी परम गति (सबसे बड़ा सहारा) हो ॥ ३१ ॥ पित्रा मात्रा च विहितां सदा गार्हस्थ्यभागिनीम् । वरयित्वा यथान्यायं मन्त्रवत् परिणीय च ॥ ३२ ॥ तुम्हारा पिता-माताने तुम्हें सदाके लिये मेरे गृहस्थाश्रमकी अधिकारिणी बनाया है। मैंने विधिपूर्वक तुम्हारा वरण करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक तुम्हारे साथ विवाह किया है ॥ ३२ ॥ कुलीनां शीलसम्पन्नामपत्यजननीमपि । त्वामहं जीवितस्यार्थे साध्वीमनपकारिणीम् ॥ ३३ ॥ परित्यक्तुं न शक्ष्यामि भार्यां नित्यमनुव्रताम् । कुत एव परित्यक्तुं सुतं शक्ष्याम्यहं स्वयम् ॥ ३४ ॥ बालमप्राप्तवयसमजातव्यञ्जनाकृतिम् । भर्तुरर्थाय निक्षिप्तां न्यासं धात्रा महात्मना ॥ ३५ ॥ यया दौहित्रजाँल्लोकानांशंसे पितृभिः सह । स्वयमुत्पाद्य तां बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ॥ ३६ ॥ तुम कुलीन, सुशीला और संतानवती हो, सती-साध्वी हो। तुमने कभी मेरा अपकार नहीं किया है। तुम नित्य मेरे अनुकूल चलनेवाली धर्मपत्नी हो। अतः मैं अपने जीवनकी रक्षाके लिये तुम्हें नहीं त्याग सकूँगा। फिर स्वयं ही अपने उस पुत्रका त्याग तो कैसे कर सकूँगा, जो अभी निरा बच्चा है, जिसने युवावस्थामें प्रवेश नहीं किया है तथा जिसके शरीरमें अभी जवानीके लक्षणतक नहीं प्रकट हुए हैं। साथ ही अपनी इस कन्याको कैसे त्याग दूँ, जिसे महात्मा ब्रह्माजीने उसके भावी पतिके लिये धरोहरके रूपमें मेरे यहाँ रख छोड़ा है? जिसके होनेसे मैं पितरोंके साथ दौहित्रजनित पुण्यलोकोंको पानेकी आशा रखता हूँ, उसी अपनी बालिकाको स्वयं ही जन्म देकर मैं मौतके मुखमें कैसे छोड़ सकता हूँ? ॥ ३३-३६ ॥ मन्यन्ते केचिदधिकं स्नेहं पुत्रे पितुर्नराः । कन्यायां केचिदपरे मम तुल्यावुभौ स्मृतौ ॥ ३७ ॥ कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि पिताका अधिक स्नेह पुत्रपर होता है तथा कुछ दूसरे लोग पुत्रीपर ही अधिक स्नेह बताते हैं; किंतु मेरे लिये तो दोनों ही समान हैं ॥ ३७ ॥ यस्यां लोकाः प्रसूतिश्च स्थिता नित्यमथो सुखम् । अपापां तामहं बालां कथमुत्स्रष्टुमुत्सहे ॥ ३८ ॥ जिसपर पुण्यलोक, वंशपरम्परा और नित्य सुख—सब कुछ सदा निर्भर रहते हैं, उस निष्पाप बालिकाका परित्याग मैं कैसे कर सकता हूँ ॥ ३८ ॥ आत्मानमपि चोत्सृज्य तप्स्यामि परलोकगः ।

त्यक्ता ह्येते मया व्यक्तं नेह शक्ष्यन्ति जीवितुम् ॥ ३९ ॥
अपनेको भी त्यागकर परलोकमें जानेपर मैं सदा इस बातके लिये संतप्त होता रहूँगा कि मेरे द्वारा त्यागे हुए ये बच्चे अवश्य ही यहाँ जीवित नहीं रह सकेंगे ॥ ३९ ॥
एषां चान्यतमत्यागो नृशंसो गर्हितो बुधैः ।
आत्मत्यागे कृते चेमे मरिष्यन्ति मया विना ॥ ४० ॥
इनमेंसे किसीका भी त्याग विद्वानोंने निर्दयतापूर्ण तथा निन्दनीय बताया है और मेरे मर जानेपर ये सभी मेरे बिना मर जायँगे ॥ ४० ॥
स कृच्छ्रामहमापन्नो न शक्तस्तर्तुमापदम् ।
अहो धिक् कां गतिं त्वद्य गमिष्यामि सबान्धवः ।
सर्वैः सह मृतं श्रेयो न च मे जीवितं क्षमम् ॥ ४१ ॥
अहो! मैं बड़ी कठिन विपत्तिमें फँस गया हूँ। इससे पार होनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। धिक्कार है इस जीवनको। हाय! मैं बन्धु-बान्धवोंके साथ आज किस गतिको प्राप्त होऊँगा? सबके साथ मर जाना ही अच्छा है। मेरा जीवित रहना कदापि उचित नहीं है ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि ब्राह्मणचिन्तायां
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें ब्राह्मणकी चिन्ताविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/३ श्लोक हैं)


* यावन्तो यस्य संयोगा द्रव्यैरिष्टैर्भवन्त्युत । तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कवः ॥