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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

ब्रूयान्निःश्रेयसं नाम कथं कुर्यात् सतां मतम् ॥ १४ ॥ जो अपने अन्त:करणके दुर्भावको छिपाकर, दोषयुक्त हृदयसे कोई सलाह देता है, वह अपने ऊपर विश्वास करनेवाले साधुपुरुषोंके अभीष्ट कल्याणकी सिद्धि कैसे कर सकता है? ॥ १४ ॥

न मित्राण्यर्थकृच्छ्रेषु श्रेयसे चेतराय वा ।
विधिपूर्वं हि सर्वस्य दुःखं वा यदि वा सुखम् ॥ १५ ॥
मित्र भी अर्थसंकटके समय अथवा किसी कामकी कठिनाई आ पड़नेपर न तो कल्याण कर सकते हैं और न अकल्याण ही। सभीके लिये दुःख या सुखकी प्राप्ति भाग्यके अनुसार ही होती है ॥ १५ ॥

कृतप्रज्ञोऽकृतप्रज्ञो बालो वृद्धश्च मानवः ।
ससहायोऽसहायश्च सर्वं सर्वत्र विन्दति ॥ १६ ॥
मनुष्य बुद्धिमान् हो या मूर्ख, बालक हो या वृद्ध तथा सहायकोंके साथ हो या असहाय, वह दैवयोगसे सर्वत्र सब कुछ पा लेता है ॥ १६ ॥

श्रूयते हि पुरा कश्चिदम्बुवीच इतीश्वरः ।
आसीद् राजगृहे राजा मागधानां महीक्षिताम् ॥ १७ ॥
सुना है, पहले राजगृहमें अम्बुवीच नामसे प्रसिद्ध एक राजा राज्य करते थे। वे मागध राजाओंमेंसे एक थे ॥ १७ ॥

स हीनः करणैः सर्वैरुच्छ्वासपरमो नृपः ।
अमात्यसंस्थः सर्वेषु कार्येष्वेवाभवत् तदा ॥ १८ ॥
उनकी कोई भी इन्द्रिय कार्य करनेमें समर्थ नहीं थी, वे (श्वासके रोगसे पीड़ित हो) एक स्थानपर पड़े-पड़े लंबी साँसें खींचा करते थे; अतः प्रत्येक कार्यमें उन्हें मन्त्रीके ही अधीन रहना पड़ता था ॥ १८ ॥

तस्यामात्यो महाकर्णिर्बभूवैकेश्वरस्तदा ।
स लब्धबलमात्मानं मन्यमानोऽवमन्यते ॥ १९ ॥
उनके मन्त्रीका नाम था महाकर्णि। उन दिनों वही वहाँका एकमात्र राजा बन बैठा था। उसे सैनिक बल प्राप्त था, अतः अपनेको सबल मानकर राजाकी अवहेलना करता था ॥ १९ ॥

स राज्ञ उपभोग्यानि स्त्रियो रत्नधनानि च ।
आददे सर्वशो मूढ ऐश्वर्यं च स्वयं तदा ॥ २० ॥
वह मूढ़ मन्त्री राजाके उपभोगमें आनेयोग्य स्त्री, रत्न, धन तथा ऐश्वर्यको भी स्वयं ही भोगता था ॥ २० ॥

तदादाय च लुब्धस्य लोभाल्लोभोऽप्यवर्धत ।
तथा हि सर्वमादाय राज्यमस्य जिहीर्षति ॥ २१ ॥

वह सब पाकर उस लोभीका लोभ उत्तरोत्तर बढ़ता गया। इस प्रकार सारी चीजें लेकर वह उनके राज्यको भी हड़प लेनेकी इच्छा करने लगा ॥ २१ ॥

हीनस्य करणैः सर्वैरुच्छ्वासपरमस्य च ।
यतमानोऽपि तद् राज्यं न शशाकेति नः श्रुतम् ॥ २२ ॥
यद्यपि राजा सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी शक्तिसे रहित होनेके कारण केवल ऊपरको साँस ही खींचा करता था, तथापि अत्यन्त प्रयत्न करनेपर भी वह दुष्ट मन्त्री उनका राज्य न ले सका—यह बात हमने सुन रखी है ॥ २२ ॥

किमन्यद् विहिता नूनं तस्य सा पुरुषेन्द्रता ।
यदि ते विहितं राज्यं भविष्यति विशाम्पते ॥ २३ ॥
मिषतः सर्वलोकस्य स्थास्यते त्वयि तद् ध्रुवम् ।
अतोऽन्यथा चेद् विहितं यतमानो न लप्स्यसे ॥ २४ ॥
राजाका राजत्व भाग्यसे ही सुरक्षित था (उनके प्रयत्नसे नहीं;) (अतः) भाग्यसे बढ़कर दूसरा सहारा क्या हो सकता है? महाराज! यदि आपके भाग्यमें राज्य बदा होगा तो सब लोगोंके देखते-देखते वह निश्चय ही आपके पास रहेगा और यदि भाग्यमें राज्यका विधान नहीं है, तो आप यत्न करके भी उसे नहीं पा सकेंगे ॥ २३-२४ ॥

एवं विद्वन्नुपादत्स्व मन्त्रिणां साध्वसाधुताम् ।
दुष्टानां चैव बोद्धव्यमदुष्टानां च भाषितम् ॥ २५ ॥
राजन्! आप समझदार हैं, अतः इसी प्रकार विचार करके अपने मन्त्रियोंकी साधुता और असाधुताको समझ लीजिये। किसने दूषित हृदयसे सलाह दी है और किसने दोषशून्य हृदयसे, इसे भी जान लेना चाहिये ॥ २५ ॥

द्रोण उवाच

विद्म ते भावदोषेण यदर्थमिदमुच्यते ।
दुष्ट पाण्डवहेतोस्त्वं दोषमाख्यापयस्युत ॥ २६ ॥
द्रोणाचार्यने कहा—ओ दुष्ट! तू क्यों ऐसी बात कहता है, यह हम जानते हैं। पाण्डवोंके लिये तेरे हृदयमें जो द्वेष संचित है, उसीसे प्रेरित होकर तू मेरी बातोंमें दोष बता रहा है ॥ २६ ॥

हितं तु परमं कर्ण ब्रवीमि कुलवर्धनम् ।
अथ त्वं मन्यसे दुष्टं ब्रूहि यत् परमं हितम् ॥ २७ ॥
कर्ण! मैं अपनी समझसे कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाली परम हितकी बात कहता हूँ। यदि तू इसे दोषयुक्त मानता है तो बता, क्या करनेसे कौरवोंका परम हित होगा? ॥ २७ ॥

अतोऽन्यथा चेत् क्रियते यद् ब्रवीमि परं हितम् ।
कुरवो वै विनङ्क्ष्यक्ष्यन्ति नचिरेणैव मे मतिः ॥ २८ ॥

मैं अत्यन्त हितकी बात बता रहा हूँ। यदि उसके विपरीत कुछ किया जायगा तो कौरवोंका शीघ्र ही नाश हो जायगा—ऐसा मेरा मत है ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि द्रोणवाक्ये त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें द्रोणवाक्यविषयक दो सौ तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०३ ॥

२०४-

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चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः

विदुरजीकी सम्मति—द्रोण और भीष्मके वचनोंका ही समर्थन

विदुर उवाच

राजन् निःसंशयं श्रेयो वाच्यस्त्वमसि बान्धवैः ।
न त्वशुश्रूषमाणे वै वाक्यं सम्प्रतितिष्ठति ॥ १ ॥
विदुरजी बोले— राजन्! आपके (हितैषी) बान्धवोंका यह कर्तव्य है कि वे आपको संदेहरहित हितकी बात बतायें। परंतु आप सुनना नहीं चाहते, इसलिये आपके भीतर उनकी कही हुई हितकी बात भी ठहर नहीं पा रही है ॥ १ ॥

प्रियं हितं च तद् वाक्यमुक्तवान् कुरुसत्तमः ।
भीष्मः शांतनवो राजन् प्रतिगृह्णासि तन्न च ॥ २ ॥
तथा द्रोणेन बहुधा भाषितं हितमुत्तमम् ।
तच्च राधासुतः कर्णो मन्यते न हितं तव ॥ ३ ॥
राजन्! कुरुश्रेष्ठ शांतनुनन्दन भीष्मने आपसे प्रिय और हितकी बात कही है; परंतु आप उसे ग्रहण नहीं कर रहे हैं। इसी प्रकार आचार्य द्रोणने अनेक प्रकारसे आपके लिये उत्तम हितकी बात बतायी है; किंतु राधानन्दन कर्ण उसे आपके लिये हितकर नहीं मानते ॥ २-३ ॥

चिन्तयंश्च न पश्यामि राजंस्तव सुहृत्तमम् ।
आभ्यां पुरुषसिंहाभ्यां यो वा स्यात् प्रज्ञयाधिकः ॥ ४ ॥
महाराज! मैं बहुत सोचने-विचारनेपर भी आपके किसी ऐसे परम सुहृद् व्यक्तिको नहीं देखता, जो इन दोनों वीर महापुरुषोंसे बुद्धि या विचारशक्तिमें अधिक हो ॥ ४ ॥

इमौ हि वृद्धौ वयसा प्रज्ञया च श्रुतेन च ।
समौ च त्वयि राजेन्द्र तथा पाण्डुसुतेषु च ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! अवस्था, बुद्धि और शास्त्रज्ञान—सभी बातोंमें ये दोनों बढ़े-चढ़े हैं और आपमें तथा पाण्डवोंमें समानभाव रखते हैं ॥ ५ ॥

धर्मे चानवरौ राजन् सत्यतायां च भारत ।
रामाद् दाशरथेश्चैव गयाच्चैव न संशयः ॥ ६ ॥
भरतवंशी नरेश! ये दोनों धर्म और सत्यवादितामें दशरथनन्दन श्रीराम तथा राजा गयसे कम नहीं हैं। मेरा यह कथन सर्वथा संशयरहित है ॥ ६ ॥

न चोक्तवन्तावाश्रेयः पुरस्तादपि किंचन ।

न चाप्यपकृतं किंचिदनयोर्लक्ष्यते त्वयि ॥ ७ ॥ उन्होंने आपके सामने भी (कभी) कोई ऐसी बात नहीं कही होगी, जो आपके लिये अनिष्टकारक सिद्ध हुई हो तथा इनके द्वारा आपका कुछ अपकार हुआ हो, ऐसा भी देखनेमें नहीं आता ॥ ७ ॥

तावुभौ पुरुषव्याघ्रावनागसि नृपे त्वयि । न मन्त्रयेतां त्वच्छ्रेयः कथं सत्यपराक्रमौ ॥ ८ ॥ महाराज! आपने भी इनका कोई अपराध नहीं किया है; फिर ये दोनों सत्यपराक्रमी पुरुषसिंह आपको हितकारक सलाह न दें, यह कैसे हो सकता है? ॥ ८ ॥

प्रज्ञावन्तौ नरश्रेष्ठावस्मिंल्लोके नराधिप । त्वन्निमित्तमतो नेमौ किंचिज्जिह्मं वदिष्यतः ॥ ९ ॥ नरेश्वर! ये दोनों इस लोकमें नरश्रेष्ठ और बुद्धिमान् हैं, अतः आपके लिये ये कोई कुटिलतापूर्ण बात नहीं कहेंगे ॥ ९ ॥

इति मे नैष्ठिकी बुद्धिर्वर्तते कुरुनन्दन । न चार्थहेतोर्धर्मज्ञौ वक्ष्यतः पक्षसंश्रितम् ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! इनके विषयमें मेरा यह निश्चित विचार है कि ये दोनों धर्मके ज्ञाता महापुरुष हैं, अतः स्वार्थके लिये किसी एक ही पक्षको लाभ पहुँचाने-वाली बात नहीं कहेंगे ॥ १० ॥

एतद्धि परमं श्रेयो मन्येऽहं तव भारत । दुर्योधनप्रभृतयः पुत्रा राजन् यथा तव ॥ ११ ॥ तथैव पाण्डवेयास्ते पुत्रा राजन् न संशयः । तेषु चेदहितं किञ्चिन्मन्त्रयेयुरतद्विदः ॥ १२ ॥ मन्त्रिणस्ते न च श्रेयः प्रपश्यन्ति विशेषतः । अथ ते हृदये राजन् विशेषः स्वेषु वर्तते । अन्तरस्थं विवृण्वानाः श्रेयः कुर्युर्न ते ध्रुवम् ॥ १३ ॥ भारत! इन्होंने जो सम्मति दी है, इसीको मैं आपके लिये परम कल्याणकारक मानता हूँ। महाराज! जैसे दुर्योधन आदि आपके पुत्र हैं, वैसे ही पाण्डव भी आपके पुत्र हैं—इसमें संशय नहीं है। इस बातको न जाननेवाले कुछ मन्त्री यदि आपको पाण्डवोंके अहितकी सलाह दें तो यह कहना पड़ेगा कि वे मन्त्रीलोग, आपका कल्याण किस बातमें है, यह विशेषरूपमें नहीं देख पा रहे हैं। राजन्! यदि आपके हृदयमें अपने पुत्रोंपर विशेष पक्षपात है तो आपके भीतरके छिपे हुए भावको बाहर सबके सामने प्रकट करनेवाले लोग निश्चय ही आपका भला नहीं कर सकते ॥ ११—१३ ॥

एतदर्थमिमौ राजन् महात्मानौ महाद्युती । नोचतुर्विवृतं किंचिन्न ह्येष तव निश्चयः ॥ १४ ॥

महाराज! इसीलिये ये दोनों महातेजस्वी महात्मा आपके सामने कुछ खोलकर नहीं कह सके हैं। इन्होंने आपको ठीक ही सलाह दी है; परंतु आप उसे निश्चितरूपसे स्वीकार नहीं करते हैं ।। १४ ।।

यच्चाप्यशक्यतां तेषामाहतुः पुरुषर्षभौ । तत् तथा पुरुषव्याघ्र तव तद् भद्रमस्तु ते ।। १५ ।।

इन पुरुषशिरोमणियोंने जो पाण्डवोंके अजेय होनेकी बात बतायी है, वह बिलकुल ठीक है। पुरुषसिंह! आपका कल्याण हो ।। १५ ।।

कथं हि पाण्डवः श्रीमान् सव्यसाची धनंजयः । शक्यो विजेतुं संग्रामे राजन् मघवतापि हि ।। १६ ।।

राजन्! दायें-बायें दोनों हाथोंसे बाण चलानेवाले श्रीमान् पाण्डुकुमार धनंजयको साक्षात् इन्द्र भी युद्धमें कैसे जीत सकते हैं? ।। १६ ।।

भीमसेनो महाबाहुर्नागायुतबलो महान् । कथं स्म युधि शक्येत विजेतुममरैरपि ।। १७ ।।

दस हजार हाथियोंके समान महान् बलवान् महाबाहु भीमसेनको युद्धमें देवता भी कैसे जीत सकते हैं? ।। १७ ।।

तथैव कृतिनौ युद्धे यमौ यमसुताविव । कथं विजेतुं शक्यौ तौ रणे जीवितुमिच्छता ।। १८ ।।

इसी प्रकार जो जीवित रहना चाहता है, उसके द्वारा युद्धमें निपुण तथा यमराजके पुत्रोंकी भाँति भयंकर दोनों भाई नकुल-सहदेव कैसे जीते जा सकते हैं? ।। १८ ।।

यस्मिन् धृतिरनुक्रोशः क्षमा सत्यं पराक्रमः । नित्यानि पाण्डवे ज्येष्ठे स जीयेत रणे कथम् ।। १९ ।।

जिन ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरमें धैर्य, दया, क्षमा, सत्य और पराक्रम आदि गुण नित्य निवास करते हैं, उन्हें रणभूमिमें कैसे हराया जा सकता है? ।। १९ ।।

येषां पक्षधरो रामो येषां मन्त्री जनार्दनः । किं नु तैरजितं संख्ये येषां पक्षे च सात्यकिः ।। २० ।।

बलरामजी जिनके पक्षपाती हैं, भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सलाहकार हैं तथा जिनके पक्षमें सात्यकि-जैसा वीर है, वे पाण्डव युद्धमें किसे नहीं परास्त कर देंगे? ।। २० ।।

द्रुपदः श्वशुरो येषां येषां श्यालाश्च पार्षताः । धृष्टद्युम्नमुखा वीरा भ्रातरो द्रुपदात्मजाः ।। २१ ।। सोऽशक्यतां च विज्ञाय तेषामग्रे च भारत । दायाद्यतां च धर्मेण सम्यक् तेषु समाचर ।। २२ ।।

द्रुपद जिनके श्वशुर हैं और उनके पुत्र पृषतवंशी धृष्टद्युम्न आदि वीर भ्राता जिनके साले हैं, भारत! ऐसे पाण्डवोंको रणभूमिमें जीतना असम्भव है। इस बातको जानकर तथा पहले

उनके पिताका राज्य होनेके कारण वे ही धर्मपूर्वक इस राज्यके उत्तराधिकारी हैं, इस बातकी ओर ध्यान देकर आप उनके साथ उत्तम बर्ताव कीजिये ॥ २१-२२ ॥ इदं निर्दिष्टमयशः पुरोचनकृतं महत् । तेषामनुग्रहेणाद्य राजन् प्रक्षालयात्मानः ॥ २३ ॥ राजन्! पुरोचनके हाथों जो कुछ कराया गया, उससे आपका बहुत बड़ा अपयश सब ओर फैल गया है। अपने उस कलंकको आज आप पाण्डवोंपर अनुग्रह करके धो डालिये ॥ २३ ॥ तेषामनुग्रहश्चायं सर्वेषां चैव नः कुले । जीवितं च परं श्रेयः क्षत्रस्य च विवर्धनम् ॥ २४ ॥ पाण्डवोंपर किया हुआ यह अनुग्रह हमारे कुलके सभी लोगोंके जीवनका रक्षक, परम हितकारक और सम्पूर्ण क्षत्रिय जातिका अभ्युदय करनेवाला होगा ॥ २४ ॥ द्रुपदोऽपि महान् राजा कृतवैरश्च नः पुरा । तस्य संग्रहणं राजन् स्वपक्षस्य विवर्धनम् ॥ २५ ॥ राजन्! द्रुपद भी बहुत बड़े राजा हैं और पहले हमारे साथ उनका वैर भी हो चुका है। अतः मित्रके रूपमें उनका संग्रह हमारे अपने पक्षकी वृद्धिका कारण होगा ॥ २५ ॥ बलवन्तश्च दाशार्हा बहवश्च विशाम्पते । यतः कृष्णस्ततः सर्वे यतः कृष्णस्ततो जयः ॥ २६ ॥ पृथ्वीपते! यदुवंशियोंकी संख्या बहुत है और वे बलवान् भी हैं। जिस ओर श्रीकृष्ण रहेंगे, उधर ही वे सभी रहेंगे। इसलिये जिस पक्षमें श्रीकृष्ण होंगे, उस पक्षकी विजय अवश्य होगी ॥ २६ ॥ यच्च साम्नैव शक्येत कार्यं साधयितुं नृप । को दैवशप्तस्तत् कार्यं विग्रहेण समाचरेत् ॥ २७ ॥ महाराज! जो कार्य शान्तिपूर्वक समझाने-बुझानेसे ही सिद्ध हो जा सकता है, उसीको कौन दैवका मारा हुआ मनुष्य युद्धके द्वारा सिद्ध करेगा ॥ २७ ॥ श्रुत्वा च जीवतः पार्थान् पौरजानपदा जनाः । बलवद् दर्शने हृष्टास्तेषां राजन् प्रियं कुरु ॥ २८ ॥ कुन्तीके पुत्रोंको जीवित सुनकर नगर और जनपदके सभी लोग उन्हें देखनेके लिये अत्यन्त उत्सुक हो रहे हैं। राजन्! उन सबका प्रिय कीजिये ॥ २८ ॥ दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः । अधर्मयुक्ता दुष्प्रज्ञा बाला मैषां वचः कृथाः ॥ २९ ॥ दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि—ये अधर्मपरायण, खोटी बुद्धिवाले और मूर्ख हैं; अतः इनका कहना न मानिये ॥ २९ ॥ उक्तमेतत् पुरा राजन् मया गुणवतस्तव ।

दुर्योधनापराधेन प्रजेयं वै विनङ्क्ष्यति ॥ ३० ॥
भूपाल! आप गुणवान् हैं। आपसे तो मैंने पहले ही यह कह दिया था कि दुर्योधनके अपराधसे निश्चय ही यह समस्त प्रजा नष्ट हो जायगी ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि विदुरवाक्ये
चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें विदुरवाक्यविषयक दो सौ चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०४ ॥

२०५-

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पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरका द्रुपदके यहाँ जाना और पाण्डवोंको हस्तिनापुर भेजनेका प्रस्ताव करना

धृतराष्ट्र उवाच

भीष्मः शांतनवो विद्वान् द्रोणश्च भगवानृषिः ।
हितं च परमं वाक्यं त्वं च सत्यं ब्रवीषि माम् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले—विदुर! शांतनुनन्दन भीष्म ज्ञानी हैं और भगवान् द्रोणाचार्य तो ऋषि ही ठहरे। अतः इनका वचन परम हितकारक है। तुम भी मुझसे जो कुछ कहते हो, वह सत्य ही है ॥ १ ॥

यथैव पाण्डोस्ते वीराः कुन्तीपुत्रा महारथाः ।
तथैव धर्मतः सर्वे मम पुत्रा न संशयः ॥ २ ॥
कुन्तीके वीर महारथी पुत्र जैसे पाण्डुके लड़के हैं, उसी प्रकार धर्मकी दृष्टिसे वे सब मेरे भी पुत्र हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥

यथैव मम पुत्राणामिदं राज्यं विधीयते ।
तथैव पाण्डुपुत्राणामिदं राज्यं न संशयः ॥ ३ ॥
जैसे मेरे पुत्रोंका यह राज्य कहा जाता है, उसी प्रकार पाण्डुपुत्रोंका भी यह राज्य है—इसमें भी संशय नहीं है ॥ ३ ॥

क्षत्तारानय गच्छैतान् सह मात्रा सुसत्कृतान् ।
तया च देवरूपिण्या कृष्णया सह भारत ॥ ४ ॥
भरतवंशी विदुर! अब तुम्हीं जाओ और उनकी माता कुन्ती तथा उस देवरूपिणी वधू कृष्णाके साथ इन पाण्डवोंको सत्कारपूर्वक ले आओ ॥ ४ ॥

दिष्ट्या जीवन्ति ते पार्था दिष्ट्या जीवति सा पृथा ।
दिष्ट्या द्रुपदकन्यां च लब्धवन्तो महारथाः ॥ ५ ॥
सौभाग्यकी बात है कि वे कुन्तीपुत्र जीवित हैं। सौभाग्यसे ही कुन्ती भी जीवित है और यह भी बड़े सौभाग्यकी बात है कि उन महारथियोंने द्रुपदकन्याको प्राप्त कर लिया ॥ ५ ॥

दिष्ट्या वर्धामहे सर्वे दिष्ट्या शान्तः पुरोचनः ।
दिष्ट्या मम परं दुःखमपनीतं महाद्युते ॥ ६ ॥
महाद्युते! सौभाग्यसे हम सबकी वृद्धि हो रही है। भाग्यकी बात है कि पापी पुरोचन शान्त हो गया और सौभाग्यसे ही मेरा महान् दुःख मिट गया ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो जगाम विदुरो धृतराष्ट्रस्य शासनात् । सकाशं यज्ञसेनस्य पाण्डवानां च भारत ॥ ७ ॥ समुपादाय रत्नानि वसूनि विविधानि च । द्रौपद्याः पाण्डवानां च यज्ञसेनस्य चैव ह ॥ ८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरजी द्रौपदी, पाण्डव तथा महाराज यज्ञसेनके लिये नाना प्रकारके धन-रत्नोंकी भेंट लेकर राजा द्रुपद और पाण्डवोंके समीप गये ॥ ७-८ ॥ तत्र गत्वा स धर्मज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः । द्रुपदं न्यायतो राजन् संयुक्तमुपतस्थिवान् ॥ ९ ॥ राजन्! वहाँ पहुँचकर सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान् एवं धर्मज्ञ विदुर न्यायके अनुसार बड़े-छोटेके क्रमसे द्रुपद और अन्य लोगोंके साथ हृदयसे लगकर नमस्कार आदिपूर्वक मिले ॥ ९ ॥ स चापि प्रतिजग्राह धर्मेण विदुरं ततः । चक्रतुश्च यथान्यायं कुशलप्रश्नसंविदम् ॥ १० ॥ राजा द्रुपदने भी धर्मके अनुसार विदुरजीका आदर-सत्कार किया। फिर वे दोनों यथोचित रीतिसे एक-दूसरेके कुशल-समाचार पूछने और कहने लगे ॥ १० ॥ ददर्श पाण्डवांस्तत्र वासुदेवं च भारत । स्नेहात् परिष्वज्य स तान् पप्रच्छानामयं ततः ॥ ११ ॥ भारत! विदुरजीने वहाँ पाण्डवों तथा वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको भी देखा और स्नेहपूर्वक उन्हें हृदयसे लगाकर उन सबकी कुशल पूछी ॥ ११ ॥ तैश्चाप्यमितबुद्धिः स पूजितो हि यथाक्रमम् । वचनाद् धृतराष्ट्रस्य स्नेहयुक्तं पुनः पुनः ॥ १२ ॥ पप्रच्छानामयं राजंस्ततस्तान् पाण्डुनन्दनान् । प्रददौ चापि रत्नानि विविधानि वसूनि च ॥ १३ ॥ पाण्डवानां च कुन्त्याश्च द्रौपद्याश्च विशाम्पते । द्रुपदस्य च पुत्राणां यथा दत्तानि कौरवैः ॥ १४ ॥ उन्होंने भी अमित-बुद्धिमान् विदुरजीका क्रमशः आदर-सत्कार किया। तदनन्तर विदुरजीने राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अनुसार बारंबार स्नेहपूर्वक युधिष्ठिर आदि पाण्डुपुत्रोंसे कुशल-मंगल एवं स्वास्थ्यविषयक प्रश्न किया। जनमेजय! फिर विदुरजीने कौरवोंकी ओरसे जैसे दिये गये थे, उसीके अनुसार पाण्डवों, कुन्ती, द्रौपदी तथा द्रुपदके पुत्रोंके लिये नाना प्रकारके रत्न और धन भेंट किये ॥ १२—१४ ॥ प्रोवाच चामितमतिः प्रश्रितं विनयान्वितः । द्रुपदं पाण्डुपुत्राणां संनिधौ केशवस्य च ॥ १५ ॥

अगाध बुद्धिवाले विदुरजी पाण्डवों तथा भगवान् श्रीकृष्णके समीप विनीतभावसे नम्रतापूर्वक बोले— ॥ १५ ॥

विदुर उवाच

राजञ्छृणु सहामात्यः सपुत्रश्च वचो मम ।
धृतराष्ट्रः सपुत्रस्त्वां सहामात्यः सबान्धवः ॥ १६ ॥
अब्रवीत् कुशलं राजन् प्रीयमाणः पुनः पुनः ।
प्रीतिमांस्ते दृढं चापि सम्बन्धेन नराधिप ॥ १७ ॥
विदुरने कहा— राजन्! आप अपने मन्त्रियों और पुत्रोंके साथ मेरी बात सुनें। महाराज धृतराष्ट्रने अपने पुत्र, मन्त्री और बन्धुओंके साथ अत्यन्त प्रसन्न होकर बारंबार आपकी कुशल पूछी है। महाराज! आपके साथ यह जो सम्बन्ध हुआ है, इससे उनको बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ १६-१७ ॥

तथा भीष्मः शांतनवः कौरवैः सह सर्वशः ।
कुशलं त्वां महाप्राज्ञः सर्वतः परिपृच्छति ॥ १८ ॥
इसी प्रकार शांतनुनन्दन महाप्राज्ञ भीष्मजी भी समस्त कौरवोंके साथ सब तरहसे आपकी कुशल पूछते हैं ॥ १८ ॥
भारद्वाजो महाप्राज्ञो द्रोणः प्रियसखस्तव ।
समाशलेषमुपेत्य त्वां कुशलं परिपृच्छति ॥ १९ ॥

आपके प्रिय मित्र महाबुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य भी (मन-ही-मन) आपको हृदयसे लगाकर कुशल पूछ रहे हैं ॥ १९ ॥ धृतराष्ट्रश्च पाञ्चाल्य त्वया सम्बन्धमीयिवान् । कृतार्थं मन्यतेऽऽत्मानं तथा सर्वेऽपि कौरवाः ॥ २० ॥ पांचालनरेश! राजा धृतराष्ट्र आपके सम्बन्धी होकर अपने-आपको कृतार्थ मानते हैं। यही दशा समस्त कौरवोंकी है ॥ २० ॥ न तथा राज्यसम्प्राप्तिस्तेषां प्रीतिकरी मता । यथा सम्बन्धकं प्राप्य यज्ञसेन त्वया सह ॥ २१ ॥ यज्ञसेन! उन्हें राज्यकी प्राप्ति भी उतनी प्रसन्नता देनेवाली नहीं जान पड़ी, जितनी प्रसन्नता आपके साथ सम्बन्धका सौभाग्य पाकर हुई है ॥ २१ ॥ एतद् विदित्वा तु भवान् प्रस्थापयतु पाण्डवान् । द्रष्टुं हि पाण्डुपुत्रांश्च त्वरन्ति कुरवो भृशम् ॥ २२ ॥ यह जानकर आप पाण्डवोंको हस्तिनापुर भेज दें। समस्त कुरुवंशी पाण्डवोंको देखने और मिलनेके लिये अत्यन्त उतावले हो रहे हैं ॥ २२ ॥ विप्रोषिता दीर्घकालमेते चापि नरर्षभाः । उत्सुका नगरं द्रष्टुं भविष्यन्ति तथा पृथा ॥ २३ ॥ दीर्घकालसे ये परदेशमें रह रहे हैं, अतः नरश्रेष्ठ पाण्डव तथा कुन्ती—सभी लोग अपना नगर देखनेके लिये उत्सुक हो रहे होंगे ॥ २३ ॥ कृष्णामपि च पाञ्चालीं सर्वाः कुरुवरस्त्रियः । द्रष्टुकामाः प्रतीक्षन्ते पुरं च विषयाश्च नः ॥ २४ ॥ कौरवकुलकी सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ, हमारे हस्तिनापुर नगर तथा राष्ट्रके सभी लोग पांचालराजकुमारी कृष्णाको देखनेकी इच्छा रखकर उसके शुभागमनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ २४ ॥ स भवान् पाण्डुपुत्राणामाज्ञापयतु मा चिरम् । गमनं सहदाराणामेतदत्र मतं मम ॥ २५ ॥ अतः आप पत्नीसहित पाण्डवोंको हस्तिनापुर चलनेके लिये शीघ्र आज्ञा दीजिये। इस विषयमें मेरी सम्मति यही है ॥ २५ ॥ विसृष्टेषु त्वया राजन् पाण्डवेषु महात्मसु । ततोऽहं प्रेषयिष्यामि धृतराष्ट्रस्य शीघ्रगान् । आगमिष्यन्ति कौन्तेयाः कुन्ती च सह कृष्णया ॥ २६ ॥ राजन्! जब आप महामना पाण्डवोंको जानेकी आज्ञा दे देंगे, तब मैं यहाँसे राजा धृतराष्ट्रके पास शीघ्रगामी दूत भेजूँगा और यह संदेश कहला दूँगा कि कुन्ती तथा कृष्णाके साथ समस्त पाण्डव हस्तिनापुरमें आयेंगे ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि विदुरद्रुपदसंवादे पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें विदुर-द्रुपदसंवादविषयक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०५ ॥

२०६-

⬅ विषय-सूची (TOC)

षडधिकद्विशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंका हस्तिनापुरमें आना और आधा राज्य पाकर इन्द्रप्रस्थ नगरका निर्माण करना एवं भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीका द्वारकाके लिये प्रस्थान

द्रुपद उवाच

एवमेतन्महाप्राज्ञ यथाऽऽत्थ विदुराद्य माम् ।
ममापि परमो हर्षः सम्बन्धेऽस्मिन् कृते प्रभो ॥ १ ॥

**द्रुपद बोले—**महाप्राज्ञ विदुरजी! आज आपने जो कुछ मुझसे कहा है, सब ठीक है। प्रभो! (कौरवोंके साथ) यह सम्बन्ध हो जानेसे मुझे भी महान् हर्ष हुआ है ॥ १ ॥

गमनं चापि युक्तं स्याद् दृढमेषां महात्मनाम् ।
न तु तावन्मया युक्तमेतद् वक्तुं स्वयं गिरा ॥ २ ॥
यदा तु मन्यते वीरः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनार्जुनौ चैव यमौ च पुरुषर्षभौ ॥ ३ ॥
रामकृष्णौ च धर्मज्ञौ तदा गच्छन्तु पाण्डवाः ।
एतौ हि पुरुषव्याघ्रावेषां प्रियहिते रतौ ॥ ४ ॥

महात्मा पाण्डवोंका अपने नगरमें जाना भी अत्यन्त उचित ही है। तथापि मेरे लिये अपने मुखसे इन्हें जानेके लिये कहना उचित नहीं है। यदि कुन्तीकुमार वीरवर युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन और नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेव जाना उचित समझें तथा धर्मज्ञ बलराम और श्रीकृष्ण पाण्डवोंका वहाँ जाना उचित समझते हों तो ये अवश्य वहाँ जायँ; क्योंकि ये दोनों पुरुषसिंह सदा इनके प्रिय और हितमें लगे रहते हैं ॥ २–४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

परवन्तो वयं राजंस्त्वयि सर्वे सहानुगाः ।
यथा वक्ष्यसि नः प्रीत्या तत् करिष्यामहे वयम् ॥ ५ ॥

**युधिष्ठिरने कहा—**राजन्! हम सब लोग अपने सेवकोंसहित सदा आपके अधीन हैं। आप स्वयं प्रसन्नतापूर्वक हमसे जैसा कहेंगे, वही हम करेंगे ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततोऽब्रवीद् वासुदेवो गमनं रोचते मम ।
यथा वा मन्यते राजा द्रुपदः सर्वधर्मवित् ॥ ६ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'मुझे तो इनका जाना ही ठीक जान पड़ता है अथवा सब धर्मोंके ज्ञाता महाराज द्रुपद जैसा उचित समझें, वैसा किया जाय' ॥ ६ ॥

द्रुपद उवाच

यथैव मन्यते वीरो दाशार्हः पुरुषोत्तमः ।
प्राप्तकालं महाबाहुः सा बुद्धिर्निश्चिता मम ॥ ७ ॥
यथैव हि महाभागाः कौन्तेया मम साम्प्रतम् ।
तथैव वासुदेवस्य पाण्डुपुत्रा न संशयः ॥ ८ ॥
**द्रुपद बोले—**दाशार्हकुलके रत्न वीरवर पुरुषोत्तम महाबाहु श्रीकृष्ण इस समय जो कर्तव्य उचित समझते हों, निश्चय ही मेरी भी वही सम्मति है। महाभाग कुन्तीपुत्र इस समय मेरे लिये जैसे अपने हैं, उसी प्रकार इन भगवान् वासुदेवके लिये भी समस्त पाण्डव उतने ही प्रिय एवं आत्मीय हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ ७-८ ॥

न तद् ध्यायति कौन्तेयः पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ।
यथैषां पुरुषव्याघ्रः श्रेयो ध्यायति केशवः ॥ ९ ॥
पुरुषोत्तम केशव जिस प्रकार इन पाण्डवोंके श्रेय (अत्यन्त हित)-का ध्यान रखते हैं, उतना ध्यान कुन्तीनन्दन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर भी नहीं रखते ॥ ९ ॥

(वैशम्पायन उवाच

पृथायास्तु तथा वेश्म प्रविवेश महाद्युतिः ।
पादौ स्पृष्ट्वा पृथायास्तु शिरसा च महीं गतः ।
दृष्ट्वा तु देवरं कुन्ती शुशोच च मुहुर्मुहुः ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उसी प्रकार महातेजस्वी विदुर कुन्तीके भवनमें गये। वहाँ उन्होंने धरतीपर माथा टेककर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। विदुरको आया देख कुन्ती बार-बार शोक करने लगी।

कुन्त्युवाच

वैचित्रवीर्य ते पुत्राः कथंचिज्जीवितास्त्वया ।
त्वत्प्रसादाज्जतुगृहे त्राताः प्रत्यागतास्तव ॥
कूर्मश्चिन्तयते पुत्रान् यत्र वा तत्र वा गतान् ।
चिन्तया वर्धयेत् पुत्रान् यथा कुशलिनस्तथा ॥
तव पुत्रास्तु जीवन्ति त्वं त्राता भरतर्षभ ।
यथा परभृतः पुत्रानरिष्टा वर्धयेत् सदा ।
तथैव तव पुत्रास्तु मया तात सुरक्षिताः ॥

दुःखास्तु बहवः प्राप्ता तथा प्राणान्तिका मया । अतः परं न जानामि कर्तव्यं ज्ञातुमर्हसि ॥

कुन्ती बोली—विदुरजी! आपके पुत्र पाण्डव किसी प्रकार आपके ही कृपाप्रसादसे जीवित हैं। लाक्षागृहमें आपने इन सबके प्राण बचाये हैं और अब यह पुनः आपके समीप जीते-जागते लौट आये हैं। कछुआ अपने पुत्रोंका, वे कहीं भी क्यों न हो, मनसे चिन्तन करता रहता है। इस चिन्तासे ही अपने पुत्रोंका वह पालन-पोषण एवं संवर्धन करता है। उसीके अनुसार जैसे वे सकुशल जीवित रहते हैं, वैसे ही आपके पुत्र पाण्डव (आपकी ही मंगल-कामनासे) जी रहे हैं! भरतश्रेष्ठ! आप ही इनके रक्षक हैं। तात! जैसे कोयलके पुत्रोंका पालन-पोषण सदा कौएकी माता करती है, उसी प्रकार आपके पुत्रोंकी रक्षा मैंने की है। अबतक मैंने बहुत-से प्राणान्तक कष्ट उठाये हैं; इसके बाद मेरा क्या कर्तव्य है, यह मैं नहीं जानती। यह सब आप ही जानें!

वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्ता दुःखार्ता शुशोच परमातुरा । प्रणिपत्याब्रवीत् क्षत्ता मा शोच इति भारत ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—यों कहकर दुःखसे पीड़ित हुई कुन्ती अत्यन्त आतुर होकर शोक करने लगी। उस समय विदुरने उन्हें प्रणाम करके कहा, तुम शोक न करो।

विदुर उवाच

न विनश्यन्ति लोकेषु तव पुत्रा महाबलाः । नचिरेणैव कालेन स्वराज्यस्था भवन्ति ते । बान्धवैः सहिताः सर्वैर्मा शोकं कुरु माधवि ॥)

विदुर बोले—यदुकुलनन्दिनी! तुम्हारे महाबली पुत्र संसारमें (दूसरोंके सतानेसे) नष्ट नहीं हो सकते। अब वे थोड़े ही दिनोंमें समस्त बन्धुओंके साथ अपने राज्यपर अधिकार करनेवाले हैं। अतः तुम शोक मत करो।

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते समनुज्ञाता द्रुपदेन महात्मना । पाण्डवाश्चैव कृष्णश्च विदुरश्च महीपते ॥ १० ॥ आदाय द्रौपदीं कृष्णां कुन्तीं चैव यशस्विनीम् । सविहारं सुखं जग्मुर्नगरं नागसाह्वयम् ॥ ११ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर महात्मा द्रुपदकी आज्ञा पाकर पाण्डव, श्रीकृष्ण और विदुर द्रुपद-कुमारी कृष्णा और यशस्विनी कुन्तीको साथ ले आमोद-प्रमोद करते हुए हस्तिनापुरकी ओर चले ॥ १०-११ ॥

(सुवर्णकक्ष्याग्रैवेयान् सुवर्णाङ्कुशभूषितान् । जाम्बूनदपरिष्कारान् प्रभिन्नकरटामुखान् ।। अधिष्ठितान् महामात्रैः सर्वशस्त्रसमन्वितान् । सहस्रं प्रददौ राजा गजानां वरवर्णिनाम् ।। रथानां च सहस्रं वै सुवर्णमणिचित्रितम् । चतुर्युजां भानुमच्च पञ्चानां प्रददौ तदा ।। सुवर्णपरिबर्हाणां वरचामरमालिनाम् । जात्यश्वानां च पञ्चाशतसहस्रं प्रददौ नृपः ।। दासीनामयुतं राजा प्रददौ वरभूषणम् । ततः सहस्रं दासानां प्रददौ वरधन्विनाम् ।। हैमानि शय्यासनभाजनानि द्रव्याणि चान्यानि च गोधनानि । पृथक् पृथक् चैव ददौ स कोटिं पाञ्चालराजः परमप्रहृष्टः ।। शिबिकानां शतं पूर्णं वाहान् पञ्चशतं नरान् । एवमेतानि पाञ्चालो कन्यार्थे प्रददौ धनम् ।। हरणं चापि पाञ्चाल्या ज्ञातिदेयं तु सौमकिः । धृष्टद्युम्नो ययौ तत्र भगिनीं गृह्य भारत ।। नानद्यमाने बहुभिस्तूर्यशब्दैः सहस्रशः ।।)

उस समय राजा द्रुपदने उन्हें एक हजार सुन्दर हाथी प्रदान किये, जिनकी पीठोंपर सोनेके हौदे कसे हुए थे और गलेमें सोनेके आभूषण शोभा पा रहे थे। उनके अंकुश भी सोनेके ही थे। जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उन सबको सजाया गया था। उनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही थी। बड़े-बड़े महावत उन सबका संचालन करते थे। वे सभी गजराज सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। राजाने पाँचों पाण्डवोंके लिये चार घोड़ोंसे जुते हुए एक हजार रथ दिये, जो सुवर्ण और मणियोंसे विभूषित होनेके कारण विचित्र शोभा धारण करते थे और सब ओर अपनी प्रभा बिखेर रहे थे। इतना ही नहीं, राजाने अच्छी जातिके पचास हजार घोड़े भी दिये, जो सुनहरे साज-बाजसे सुसज्जित और सुन्दर चँवर तथा मालाओंसे अलंकृत थे। इनके सिवा सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित दस हजार दासियाँ भी दीं। साथ ही उत्तम धनुष धारण करनेवाले एक हजार दास पाण्डवोंको भेंट किये। बहुत-सी शय्याएँ, आसन और पात्र भी दिये जो सब-के-सब सुवर्णके बने हुए थे। दूसरे-दूसरे द्रव्य और गोधन भी समर्पित किये। इन सबकी पृथक्-पृथक् संख्या एक-एक करोड़ थी। इस प्रकार पांचालराज द्रुपदने बड़े हर्ष और उल्लासके साथ पाण्डवोंको उपर्युक्त वस्तुएँ अर्पित कीं। सौ पालकियाँ और उनको ढोनेवाले पाँच सौ कहार दिये। इस प्रकार पांचालराजने

अपनी कन्याके लिये ये सभी वस्तुएँ तथा बहुत-सा धन दहेजमें दिया। जनमेजय! धृष्टद्युम्न स्वयं अपनी बहिनका हाथ पकड़कर सवारीपर बैठानेके लिये ले गये। उस समय सहस्रों प्रकारके बाजे एक साथ बज उठे।

श्रुत्वा चाप्यागतान् वीरान् धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।
प्रतिग्रहाय पाण्डूनां प्रेषयामास कौरवान् ॥ १२ ॥
राजा धृतराष्ट्रने पाण्डववीरोंका आगमन सुनकर उनकी अगवानीके लिये कौरवोंको भेजा ॥ १२ ॥

विकर्णं च महेष्वासं चित्रसेनं च भारत ।
द्रोणं च परमेष्वासं गौतमं कृपमेव च ॥ १३ ॥
भारत! विकर्ण, महान् धनुर्धर चित्रसेन, विशाल धनुषवाले द्रोणाचार्य, गौतमवंशी कृपाचार्य आदि भेजे गये थे ॥ १३ ॥

तैस्ते परिवृता वीराः शोभमाना महाबलाः ।
नगरं हास्तिनपुरं शनैः प्रविविशुस्तदा ॥ १४ ॥
(पाण्डवानागताञ्छ्रुत्वा नागरास्तु कुतूहलात् ।
मण्डयाञ्चक्रिरे तत्र नगरं नागसाह्वयम् ॥
मुक्तपुष्पावकीर्णं तज्जलसिक्तं तु सर्वशः ।
धूपितं दिव्यधूपेन मण्डनैश्चापि संवृतम् ॥
पताकोच्छ्रितमाल्यं च पुरमप्रतिमं बभौ ॥
शङ्खभेरीनिनादैश्च नानावादित्रनिःस्वनैः ।)
कौतूहलेन नगरं दीप्यमानमिवाभवत् ।
तत्र ते पुरुषव्याघ्राः शोकदुःखविनाशनाः ॥ १५ ॥
तत उच्चावचा वाचः पौरैः प्रियचिकीर्षुभिः ।
उदीरिता अशृण्वंस्ते पाण्डवा हृदयंगमाः ॥ १६ ॥
इन सबसे घिरे हुए शोभाशाली महाबली वीर पाण्डवोंने तब धीरे-धीरे हस्तिनापुर नगरमें प्रवेश किया। पाण्डवोंका आगमन सुनकर नागरिकोंने कौतूहलवश हस्तिनापुर नगरको (अच्छी तरहसे) सजा रखा था। सड़कोंपर सब ओर फूल बिखेरे गये थे, जलका छिड़काव किया गया था, सारा नगर दिव्य धूपकी सुगन्धसे महँ-महँ कर रहा था और भाँति-भाँतिकी प्रसाधन-सामग्रियोंसे सजाया गया था। पताकाएँ फहराती थीं और ऊँचे गृहोंमें पुष्पहार सुशोभित होते थे। शंख, भेरी तथा नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे वह अनुपम नगर बड़ी शोभा पा रहा था। उस समय कौतूहलवश सारा नगर देदीप्यमान-सा हो उठा। पुरुषसिंह पाण्डव प्रजाजनोंके शोक और दुःखका निवारण करनेवाले थे; अतः वहाँ उनका प्रिय करनेकी इच्छावाले पुरवासियोंद्वारा कही हुई भिन्न-भिन्न प्रकारकी हृदय-स्पर्शिनी बातें सुनायी पड़ीं— ॥ १४—१६ ॥

अयं स पुरुषव्याघ्रः पुनरायाति धर्मवित् । यो नः स्वानिव दायादान् धर्मेण परिरक्षति ॥ १७ ॥ (पुरवासी कह रहे थे—) 'ये ही वे नरश्रेष्ठ धर्मज्ञ युधिष्ठिर पुनः यहाँ पधार रहे हैं, जो धर्मपूर्वक अपने पुत्रोंकी भाँति हमलोगोंकी रक्षा करते थे ॥ १७ ॥

अद्य पाण्डुर्महाराजो वनादिव जनप्रियः । आगतः प्रियमस्माकं चिकीर्षुर्नात्र संशयः ॥ १८ ॥ इनके आनेसे निःसंदेह ऐसा जान पड़ता है, आज प्रजाजनोंके प्रिय महाराज पाण्डु ही मानो हमारा प्रिय करनेके लिये वनसे चले आये हों ॥ १८ ॥

किं नु नाद्य कृतं तात सर्वेषां नः परं प्रियम् । यन्नः कुन्तीसुता वीरा नगरं पुनरागताः ॥ १९ ॥ तात! कुन्तीके वीर पुत्र यदि पुनः इस नगरमें चले आये तो आज हम सब लोगोंका कौन-सा परम प्रिय कार्य नहीं सम्पन्न हो गया ॥ १९ ॥

यदि दत्तं यदि हुतं विद्यते यदि नस्तपः । तेन तिष्ठन्तु नगरे पाण्डवाः शरदां शतम् ॥ २० ॥ यदि हमने दान और होम किया है, यदि हमारी तपस्या शेष है तो उन सबके पुण्यसे ये पाण्डव सौ वर्षतक इसी नगरमें निवास करें' ॥ २० ॥

ततस्ते धृतराष्ट्रस्य भीष्मस्य च महात्मनः । अन्येषां च तदर्हाणां चक्रुः पादाभिवन्दनम् ॥ २१ ॥ इतनेमें ही पाण्डवोंने धृतराष्ट्र, महात्मा भीष्म तथा अन्य वन्दनीय पुरुषोंके पास जाकर उन सबके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ २१ ॥

कृत्वा तु कुशलप्रश्नं सर्वेण नगरेण च । न्यविशन्ताथ वेश्मानि धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ २२ ॥ फिर समस्त नगरवासियोंसे कुशलप्रश्न करके वे राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे राजमहलोंमें गये ॥ २२ ॥

(दुर्योधनस्य महिषी काशिराजसुता तदा । धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां बधूभिः सहिता तदा ॥ पाञ्चालीं प्रतिजग्राह द्रौपदीं श्रिमिवापराम् । पूजयामास पूजार्हां शचीदेवीमिवागताम् ॥ ववन्दे तत्र गान्धारीं माधवी कृष्णया सह । आशिषश्च प्रयुक्त्वा तु पाञ्चालीं परिषस्वजे ॥ परिष्वज्य च गान्धारी कृष्णां कमललोचनाम् । पुत्राणां मम पाञ्चाली मृत्युरेवेत्यमन्यत । सा चिन्त्य विदुरं प्राह युक्तितः सुबलात्मजा ॥

उस समय दुर्योधनकी रानीने, जो काशिराजकी पुत्री थी, धृतराष्ट्रपुत्रोंकी अन्य वधुओंके साथ आकर द्वितीय लक्ष्मीके समान सुन्दरी पांचालराजकुमारी द्रौपदीकी अगवानी की। द्रौपदी सर्वथा पूजाके योग्य थी। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात् शचीदेवीने पदार्पण किया हो। दुर्योधन-पत्नीने उसका भलीभाँति सत्कार किया। वहाँ पहुँचकर कुन्तीने अपनी बहुरानी द्रौपदीके साथ गान्धारीको प्रणाम किया। गान्धारीने आशीर्वाद देकर द्रौपदीको हृदयसे लगा लिया। कमलसदृश नेत्रोंवाली कृष्णाको हृदयसे लगाकर गान्धारी सोचने लगी कि यह पाञ्चाली तो मेरे पुत्रोंकी मृत्यु ही है। यह सोचकर सुबलपुत्री गान्धारीने युक्तिसे विदुरको बुलाकर कहा—

गान्धार्युवाच

कुन्तीं राजसुतां क्षत्तः सवधूं सपरिच्छदाम् ।
पाण्डोर्निवेशनं शीघ्रं नीयतां यदि रोचते ॥
करणेन मुहूर्तेन नक्षत्रेण शुभे तिथौ ।
यथासुखं तथा कुन्ती रंस्यते स्वगृहे सुतैः ॥
**फिर गान्धारीने कहा—**विदुर! यदि तुम्हें जँचे तो राजकुमारी कुन्तीको पुत्रवधूसहित शीघ्र ही पाण्डुके महलमें ले जाओ और वहीं इनका सारा सामान भी पहुँचा दो। उत्तम करण, मुहूर्त और नक्षत्रसहित शुभ तिथिको उस महलमें इन्हें प्रवेश करना चाहिये, जिससे कुन्तीदेवी अपने घरमें पुत्रोंके साथ सुखपूर्वक रह सकें।

वैशम्पायन उवाच

तथेत्येव तदा क्षत्ता कारयामास तत्तदा ॥
पूजयामासुरत्यर्थं बान्धवाः पाण्डवांस्तदा ।
नागराः श्रेणिमुख्याश्च पूजयन्ति स्म पाण्डवान् ॥
भीष्मो द्रोणस्तथा कर्णो बाह्लीकः ससुतस्तदा ।
शासनाद् धृतराष्ट्रस्य अकुर्वन्नतिथिक्रियाम् ॥
एवं विहरतां तेषां पाण्डवानां महात्मनाम् ।
नेता सर्वस्य कार्यस्य विदुरो राजशासनात् ॥)
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! 'बहुत अच्छा' कहकर उसी समय विदुरने वैसी ही व्यवस्था की। सभी बन्धु-बान्धवोंने पाण्डवोंका उस समय अत्यन्त आदर-सत्कार किया। प्रमुख नागरिकों तथा सेठोंने भी पाण्डवोंका पूजन किया। भीष्म, द्रोण, कर्ण तथा पुत्रसहित बाह्लीकने धृतराष्ट्रके आदेशसे पाण्डवोंका आतिथ्य-सत्कार किया। इस प्रकार हस्तिनापुरमें विहार करनेवाले महात्मा पाण्डवोंके सभी कार्योंमें विदुरजी ही नेता थे। उन्हें इसके लिये राजाकी ओरसे आदेश प्राप्त हुआ था।
विश्रान्तास्ते महात्मानः कंचित् कालं महाबलाः ।