महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०१- उत्तंककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना २०२- उत्तंकका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह २०३- ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधु-कैटभका वध २०४- धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना २०५- पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य २०६- कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन २०७- कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन २०८- धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन २०९- धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन २१०- विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन २११- पंचमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन २१२- तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन २१३- प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय २१४- माता-पिताकी सेवाका दिग्दर्शन २१५- धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना २१६- कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान २१७- अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति २१८- अंगिराकी संततिका वर्णन २१९- बृहस्पतिकी संततिका वर्णन २२०- पांचजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन २२१- अग्निस्वरूप तप और भानु (मनुकी) संततिका वर्णन २२२- सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुनः उनका प्राकट्य २२३- इन्द्रके द्वारा केशीके हाथसे देवसेनाका उद्धार २२४- इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन