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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

राजन्! तत्पश्चात् उन्होंने शीघ्र ही पचीस बाणोंसे शलपुत्रको घायल कर दिया तथा उसके घोड़ों एवं दोनों पृष्ठरक्षकोंको भी मृत्युके मुखमें डाल दिया ॥ २३ ॥ स हताश्वे रथे तिष्ठन् ददर्श भरतर्षभ । पुत्रः सांयमनेः पुत्रं पाञ्चाल्यस्य महात्मनः ॥ २४ ॥ भरतश्रेष्ठ! जिसके घोड़े मार दिये गये थे, उसी रथपर खड़े हुए शलके पुत्रने महामना धृष्टद्युम्नके पुत्रको देखा ॥ २४ ॥ स प्रगृह्य महाघोरं निस्त्रिंशवरमायसम् । पदातिस्तूर्णमानर्च्छद् रथस्थं पुरुषर्षभः ॥ २५ ॥ तब पुरुषश्रेष्ठ शलपुत्र तुरंत ही एक अत्यन्त भयंकर लोहेकी बनी हुई बड़ी तलवार हाथमें ले पैदल ही रथपर बैठे हुए पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नकी ओर चला ॥ २५ ॥ तं महौघमिवायान्तं खात् पतन्तमिवोरगम् । भ्रान्तावरणनिस्त्रिंशं कालोत्सृष्टमिवान्तकम् ॥ २६ ॥ दीप्यमानमिवादित्यं मत्तवारणविक्रमम् । अपश्यन् पाण्डवास्तत्र धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २७ ॥ उस युद्धमें पाण्डवों तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने मतवाले गजराजके समान पराक्रमी और सूर्यके समान दीप्तिमान् शलपुत्रको आते देखा। वह महान् वेगशाली जलप्रवाह, आकाशसे गिरते हुए सर्प तथा कालकी भेजी हुई मृत्युके समान जान पड़ता था। उसके हाथमें नंगी तलवार थी ॥ २६-२७ ॥ तस्य पाञ्चालदायादः प्रतीपमभिधावतः । शितनिस्त्रिंशहस्तस्य शरावरणधारिणः ॥ २८ ॥ बाणवेगमतीतस्य तथाभ्याशमुपेयुषः । त्वरन् सेनापतिः क्रुद्धो बिभेद गदया शिरः ॥ २९ ॥ वह विरोधभाव लेकर धावा कर रहा था। उसके हाथमें तीखी तलवार थी। उसने अपने अंगोंमें कवच धारण कर रखा था। वह बाणके वेगको लाँघकर अत्यन्त निकट आ पहुँचा था। उस दशामें पांचालराजकुमार सेनापति धृष्टद्युम्नने तुरंत क्रोधपूर्वक गदासे आघात करके उसके मस्तकको विदीर्ण कर दिया ॥ २८-२९ ॥ तस्य राजन् सनिस्त्रिंशं सुप्रभं च शरावरम् । हतस्य पततो हस्ताद् वेगेन न्यपतद् भुवि ॥ ३० ॥ राजन्! उसके मारे जानेपर शरीरसे चमकीला कवच और हाथसे तलवार उसके गिरनेके साथ ही वेगपूर्वक पृथ्वीपर गिरी ॥ ३० ॥ तं निहत्य गदाग्रेण स लेभे परमां मुदम् । पुत्रः पाञ्चालराजस्य महात्मा भीमविक्रमः ॥ ३१ ॥

पाञ्चालराजका भयानक पराक्रमी पुत्र महामना धृष्टद्युम्न गदाके अग्रभागसे शलपुत्रको मारकर अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ ३१॥ तस्मिन् हते महेष्वासे राजपुत्रे महारथे।
हाहाकारो महानासीत् तव सैन्यस्य मारिष॥ ३२॥
आर्य! उस महाधनुर्धर महारथी राजकुमारके मारे जानेपर आपकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया॥ ३२॥
ततः सांयमनिः क्रुद्धो दृष्ट्वा निहतमात्मजम्।
अभिदुद्राव वेगेन पाञ्चाल्यं युद्धदुर्मदम्॥ ३३॥
अपने पुत्रको मारा गया देख संयमनकुमार शलने कुपित होकर रणदुर्मद पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नपर बड़े वेगसे धावा किया॥ ३३॥
तौ तत्र समरे शूरौ समेतौ युद्धदुर्मदौ।
ददृशुः सर्वराजानः कुरवः पाण्डवास्तथा॥ ३४॥
युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले वे दोनों शूरवीर उस समरभूमिमें एक दूसरेसे भिड़ गये। कौरव और पाण्डव दोनों पक्षोंके समस्त भूपाल उनका युद्ध देखने लगे॥ ३४॥
ततः सांयमनिः क्रुद्धः पार्षतं परवीरहा।
आजघान त्रिभिर्बाणैस्तोत्रैरिव महाद्विपम्॥ ३५॥
तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले शलने जैसे महावत किसी महान् गजराजको अंकुशोंसे मारे, उसी प्रकार द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नको क्रोधपूर्वक तीन बाणोंसे घायल किया॥ ३५॥
तथैव पार्षतं शूरं शल्यः समितिशोभनः।
आजघानोरसि क्रुद्धस्ततो युद्धमवर्तत॥ ३६॥
इसी प्रकार संग्राममें शोभा पानेवाले शल्यने भी क्रुद्ध होकर शूरवीर धृष्टद्युम्नकी छातीपर प्रहार किया। फिर तो वहाँ भयंकर युद्ध छिड़ गया॥ ३६॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थयुद्धदिवसे सांयमनिपुत्रवधे एकषष्टितमोऽध्यायः॥ ६१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें चौथे दिनके युद्धमें शलपुत्रके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३६ १/२ श्लोक हैं।]

अध्याय (पृष्ठ 1863)

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विषष्टितमोऽध्यायः

धृष्टद्युम्न और शल्य आदि दोनों पक्षके वीरोंका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार

धृतराष्ट्र उवाच

दैवमेव परं मन्ये पौरुषादपि संजय ।
यत् सैन्यं मम पुत्रस्य पाण्डुसैन्येन बाध्यते ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले—संजय! मैं पुरुषार्थकी अपेक्षा भी दैवको ही प्रधान मानता हूँ, जिससे मेरे पुत्र दुर्योधनकी सेना पाण्डवोंकी सेनासे पीड़ित हो रही है ॥ १ ॥

नित्यं हि मामकांस्तात हतानेव हि शंससि ।
अव्यग्रांश्च प्रहृष्टांश्च नित्यं शंससि पाण्डवान् ॥ २ ॥
तात! तुम प्रतिदिन मेरे ही सैनिकोंके मारे जानेकी बात कहते हो और पाण्डवोंको सदा व्यग्रतासे रहित तथा हर्षोल्लाससे परिपूर्ण बताते हो ॥ २ ॥

हीनान् पुरुषकारेण मामकानद्य संजय ।
पतितान् पात्यमानांश्च हतानेव च शंससि ॥ ३ ॥
संजय! आजकल मेरे पुत्र और सैनिक पुरुषार्थसे हीन हो रहे हैं और शत्रुओंने उन्हें धराशायी किया एवं मार डाला है। प्रतिदिन वे शत्रुओंके हाथसे मारे ही जा रहे हैं। उनके सम्बन्धमें तुम सदा ऐसे ही समाचार देते हो ॥ ३ ॥

युध्यमानान् यथाशक्ति घटमानाञ्जयं प्रति ।
पाण्डवा हि जयन्त्येव जीयन्ते चैव मामकाः ॥ ४ ॥
मेरे बेटे विजयके लिये यथाशक्ति चेष्टा करते और लड़ते हैं, तो भी पाण्डव ही विजयी होते और मेरे पुत्रोंकी ही पराजय होती है ॥ ४ ॥

सोऽहं तीव्राणि दुःखानि दुर्योधनकृतानि च ।
श्रोष्यमि सततं तात दुःसहानि बहूनि च ॥ ५ ॥
तात! ऐसा जान पड़ता है कि मुझे दुर्योधनके कारण सदा अत्यन्त दुःसह एवं तीव्र दुःखकी ही बहुत-सी बातें सुननी पड़ेंगी ॥ ५ ॥

तमुपायं न पश्यामि जीयेरन् येन पाण्डवाः ।
मामका विजयं युद्धे प्राप्नुयुर्येन संजय ॥ ६ ॥
संजय! मैं ऐसा कोई उपाय नहीं देखता, जिससे पाण्डव हार जायँ और मेरे पुत्रोंको युद्धमें विजय प्राप्त हो ॥ ६ ॥

संजय उवाच

क्षयं मनुष्यदेहानां गजवाजिरथक्षयम् । शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा तवैवापनयो महान् ॥ ७ ॥ संजयने कहा— राजन्! उस युद्धमें मानवशरीरोंका भारी संहार हुआ है। हाथी, घोड़े और रथोंका भी विनाश देखा गया है। वह सब आप स्थिर होकर सुनिये। यह आपके ही महान् अन्यायका फल है ॥ ७ ॥

धृष्टद्युम्नस्तु शल्येन पीडितो नवभिः शरैः । पीडयामास संक्रुद्धो मद्राधिपतिमायसैः ॥ ८ ॥ शल्यके बाणोंसे पीड़ित होकर धृष्टद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे और उन्होंने लोहेके बने हुए नौ बाणोंसे मद्रराज शल्यको गहरी पीड़ा पहुँचायी ॥ ८ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम पार्षतस्य पराक्रमम् । न्यवारयत यस्तूर्णं शल्यं समितिशोभनम् ॥ ९ ॥ वहाँ हमलोगोंने धृष्टद्युम्नका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि उन्होंने संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले राजा शल्यको तुरंत ही आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ९ ॥

नान्तरं दृश्यते तत्र तयोश्च रथिनोस्तदा । मुहूर्तंमिव तद् युद्धं तयोः सममिवाभवत् ॥ १० ॥ उस समय उन दोनों महारथियोंमें पराक्रमकी दृष्टिसे कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था। दो घड़ीतक दोनोंमें समान-सा युद्ध होता रहा ॥ १० ॥

ततः शल्यो महाराज धृष्टद्युम्नस्य संयुगे । धनुश्चिच्छेद भल्लेन पीतेन निशितेन च ॥ ११ ॥ महाराज! तदनन्तर राजा शल्यने युद्धस्थलमें शाणपर तीक्ष्ण किये हुए पीले रंगके भल्ल नामक बाणसे धृष्टद्युम्नका धनुष काट दिया ॥ ११ ॥

अथैनं शरवर्षेण च्छादयामास संयुगे । गिरिं जलागमे यद्वज्जलदा जलवृष्टिभिः ॥ १२ ॥ इसके बाद जैसे बादल बरसातमें पर्वतपर जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार उन्होंने धृष्टद्युम्नपर रणभूमिमें बाणोंकी वर्षा करके उन्हें सब ओरसे ढक दिया ॥ १२ ॥

अभिमन्युस्ततः क्रुद्धो धृष्टद्युम्ने च पीडिते । अभिदुद्राव वेगेन मद्रराजरथं प्रति ॥ १३ ॥ तदनन्तर धृष्टद्युम्नके पीड़ित होनेपर क्रोधमें भरे हुए अभिमन्युने मद्रराज शल्यके रथपर बड़े वेगसे आक्रमण किया ॥ १३ ॥

ततो मद्राधिपरथं कार्ष्णिः प्राप्यातिकोपनः । आर्त्तायनिममेयात्मा विव्याध निशितैः शरैः ॥ १४ ॥ मद्रराजके रथके निकट पहुँचकर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न अर्जुनकुमारने अपने पैने बाणोंद्वारा ऋतायनपुत्र राजा शल्यको घायल कर दिया ॥ १४ ॥

ततस्तु तावका राजन् परीप्सन्तोऽर्जुनिं रणे । मद्रराजरथं तूर्णं परिवार्यावतस्थिरे ॥ १५ ॥ राजन्! तब आपके पुत्र रणभूमिमें अभिमन्युको बन्दी बनानेकी इच्छासे तुरंत वहाँ आये और मद्रराज शल्यके रथको चारों ओरसे घेरकर युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ १५ ॥

दुर्योधनो विकर्णश्च दुःशासनविविंशती । दुर्मर्षणो दुःसहश्च चित्रसेनोऽथ दुर्मुखः ॥ १६ ॥ सत्यव्रतश्च भद्रं ते पुरुमित्रश्च भारत । एते मद्राधिपरथं पालयन्तः स्थिता रणे ॥ १७ ॥ भारत! आपका भला हो। दुर्योधन, विकर्ण, दुःशासन, विविंशति, दुर्मर्षण, दुःसह, चित्रसेन, दुर्मुख, सत्यव्रत तथा पुरुमित्र—ये आपके पुत्र मद्रराजके रथकी रक्षा करते हुए युद्धभूमिमें डटे हुए थे ॥ १६-१७ ॥

तान् भीमसेनः संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । द्रौपदेयाऽभिमन्युश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ १८ ॥ धार्तराष्ट्रान् दश रथान् दशैव प्रत्यवारयन् । नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो विशाम्पते ॥ १९ ॥ आपके इन दस महारथी पुत्रोंको क्रोधमें भरे हुए भीमसेन, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव, पाँचों भाई द्रौपदीकुमार और अभिमन्यु—इन दस ही महारथियोंने रोका। प्रजानाथ! ये सब लोग नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार कर रहे थे ॥ १८-१९ ॥

अभ्यवर्तन्त संहृष्टाः परस्परवधैषिणः । ते वै समेयुः संग्रामे राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ २० ॥ राजन्! ये सब एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखकर हर्ष और उत्साहके साथ क्षत्रियोंका सामना करते थे। आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप ही इन सब योद्धाओंकी आपसमें भिड़न्त हुई थी ॥ २० ॥

तस्मिन् दशरथे क्रुद्धे वर्तमाने महाभये । तावकानां परेषां वा प्रेक्षका रथिनोऽभवन् ॥ २१ ॥ जिस समय ये दसों महारथी क्रोधमें भरकर अत्यन्त भयंकर युद्धमें लगे हुए थे, उस समय आपकी और पाण्डवोंकी सेनाके दूसरे रथी दर्शक होकर देखते थे ॥

शस्त्राण्यनेकरूपाणि विसृजन्तो महारथाः । अन्योन्यमभिनर्दन्तः सम्प्रहारं प्रचक्रिरे ॥ २२ ॥ किंतु आपके और पाण्डवोंके वे महारथी वीर एक-दूसरेपर अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए गर्जते और युद्ध करते थे ॥ २२ ॥

ते तदा जातसंरम्भाः सर्वेऽन्योन्यं जिघांसवः ।

अन्योन्यमभिमर्दन्तः स्पर्धमानाः परस्परम् ॥ २३ ॥
उस समय उन सबमें क्रोध भरा हुआ था। सभी एक दूसरेके वधकी इच्छा रखते थे। सबमें परस्पर लाग-डाँट थी और सभी सबको कुचलनेकी चेष्टा करते थे ॥ २३ ॥
अन्योन्यस्पर्धया राजन् ज्ञातयः सङ्गता मिथः ।
महास्त्राणि विमुञ्चन्तः समापेतुरमर्षिणः ॥ २४ ॥
महाराज! वे सब आपसमें कुटुम्बी—भाई-बन्धु थे, परंतु परस्पर स्पर्धा रखनेके कारण लड़ रहे थे। एक दूसरेके प्रति अमर्षमें भरकर बड़े-बड़े अस्त्रोंका प्रहार करते हुए आक्रमण-प्रत्याक्रमण करते थे ॥ २४ ॥
दुर्योधनस्तु संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नं महारणे ।
विव्याध निशितैर्बाणैश्चतुर्भिः समरे द्रुतम् ॥ २५ ॥
दुर्योधनने कुपित होकर उस महासंग्राममें अपने चार तीखे बाणोंद्वारा तुरंत ही धृष्टद्युम्नको बींध दिया ॥
दुर्मर्षणश्च विंशत्या चित्रसेनश्च पञ्चभिः ।
दुर्मुखो नवभिर्बाणैर्दुःसहश्चापि सप्तभिः ॥ २६ ॥
विविंशतिः पञ्चभिश्च त्रिभिर्दुःशासनस्तथा ।
तान् प्रत्यविध्यद् राजेन्द्र पार्षतः शत्रुतापनः ॥ २७ ॥
एकैकं पञ्चविंशत्या दर्शयन् पाणिलाघवम् ।
दुर्मर्षणने बीस, चित्रसेनने पाँच, दुर्मुखने नौ, दुःसहने सात, विविंशतिने पाँच तथा दुःशासनने तीन बाणोंसे उन सबको बींध डाला। राजेन्द्र! तब शत्रुओंको संताप देनेवाले धृष्टद्युम्नने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए दुर्योधन आदिमेंसे प्रत्येकको पचीस-पचीस बाणोंसे घायल किया ॥ २६-२७ १/२ ॥
सत्यव्रतं च समरे पुरुमित्रं च भारत ॥ २८ ॥
अभिमन्युरविध्यत् तु दशभिर्दशभिः शरैः ।
भारत! अभिमन्युने समरभूमिमें सत्यव्रत और पुरुमित्रको दस-दस बाणोंसे पीड़ित किया ॥ २८ १/२ ॥
माद्रीपुत्रौ तु समरे मातुलं मातृनन्दनौ ॥ २९ ॥
अविध्येतां शरैस्तीक्ष्णैस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
माताको आनन्दित करनेवाले माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने अपने मामा शल्यको पैने बाणोंसे घायल कर दिया। यह अद्भुत-सी बात हुई ॥ २९ १/२ ॥
ततः शल्यो महाराज स्वस्रीयौ रथिनां वरौ ॥ ३० ॥
शरैर्बहुभिरानर्च्छत् कृतप्रतिकृतैषिणौ ।
छाद्यमानौ ततस्तौ तु माद्रीपुत्रौ न चलतुः ॥ ३१ ॥

महाराज! तदनन्तर शल्यने किये हुए प्रहारका बदला चुकानेकी इच्छा रखनेवाले रथियोंमें श्रेष्ठ अपने दोनों भानजोंको अनेक बाणोंसे पीड़ित किया। उनके बाणोंसे आच्छादित होनेपर भी नकुल-सहदेव विचलित नहीं हुए ।। ३०-३१ ।।

अथ दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः ।
विधित्सुः कलहस्यान्तं गदां जग्राह पाण्डवः ॥ ३२ ॥
तदनन्तर महाबली पाण्डुपुत्र भीमसेनने दुर्योधनको देखकर झगड़ेका अन्त कर डालनेकी इच्छासे गदा उठा ली ।। ३२ ।।

तमुद्यतगदं दृष्ट्वा कैलासमिव शृङ्गिणम् ।
भीमसेनं महाबाहुं पुत्रास्ते प्राद्रवन् भयात् ॥ ३३ ॥
गदा उठाये हुए महाबाहु भीमसेनको एक शिखरसे युक्त कैलास पर्वतके समान उपस्थित देख आपके सभी पुत्र भयके मारे भाग गये ।। ३३ ।।

दुर्योधनस्तु संक्रुद्धो मागधं समचोदयत् ।
अनीकं दशसाहस्रं कुञ्जराणां तरस्विनाम् ॥ ३४ ॥
तब दुर्योधनने कुपित होकर मगधदेशीय दस हजार हाथियोंकी वेगशाली सेनाको युद्धके लिये प्रेरित किया ।। ३४ ।।

गजानीकेन सहितस्तेन राजा सुयोधनः ।
मागधं पुरतः कृत्वा भीमसेनं समभ्ययात् ॥ ३५ ॥
उस गजसेनाके साथ मागधको आगे करके दुर्योधनने भीमसेनपर आक्रमण किया ।। ३५ ।।

आपतन्तं च तं दृष्ट्वा गजानीकं वृकोदरः ।
गदापाणिरवारोहद् रथात् सिंह इवोन्नदन् ॥ ३६ ॥
उस गजसेनाको आते देख भीमसेन हाथमें गदा लेकर सिंहके समान गर्जना करते हुए रथसे उतर पड़े ।। ३६ ।।

अद्रिसारमयीं गुर्वी प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
अभ्यधावद् गजानीकं व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ३७ ॥
लोहेकी उस विशाल एवं भारी गदाको लेकर वे मुँह बाये हुए कालके समान उस गजसेनाकी ओर दौड़े ।। ३७ ।।

स गजान् गदया निघ्नन् व्यचरत् समरे बली ।
भीमसेनो महाबाहुः सवज्र इव वासवः ॥ ३८ ॥
बलवान् महाबाहु भीमसेन वज्रधारी इन्द्रके समान गदासे हाथियोंका संहार करते हुए समरांगणमें विचरने लगे ।। ३८ ।।

तस्य नादेन महता मनोहृदयकम्पिना ।
व्यत्यचेष्टन्त संहृत्य गजा भीमस्य गर्जतः ॥ ३९ ॥

मन और हृदयको कँपा देनेवाली गर्जते हुए भीमसेनकी उस भीषण गर्जनासे सब हाथी एकत्र हो भयके मारे निश्चेष्ट एवं अचेत-से हो गये ॥ ३९ ॥

ततस्तु द्रौपदीपुत्राः सौभद्रश्च महारथः ।
नकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ४० ॥
पृष्ठं भीमस्य रक्षन्तः शरवर्षेण वारणान् ।
अभ्यवर्षन्त धावन्तो मेघा इव गिरीन् यथा ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् द्रौपदीके पाँचों पुत्र, महारथी अभिमन्यु, नकुल-सहदेव तथा द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न—ये सब लोग भीमसेनके पृष्ठभागकी रक्षा करते हुए हाथियोंपर उसी प्रकार दौड़-दौड़कर बाण-वर्षा करने लगे, जैसे बादल पर्वतोंपर पानीकी बूँदें बरसाते हैं ॥ ४०-४१ ॥

क्षुरैः क्षुरप्रैर्भल्लैश्च पीतैश्चाञ्जलिकैः शितैः ।
व्यहरन्नुत्तमाङ्गानि पाण्डवा गजयोधिनाम् ॥ ४२ ॥
पाण्डव रथी क्षुर, क्षुरप्र, पीले रंगके भल्ल तथा तीखे आंजलिक नामक बाणोंद्वारा हाथीसवार योद्धाओंके मस्तक काट-काटकर गिराने लगे ॥ ४२ ॥

शिरोभिः प्रपतद्भिश्च बाहुभिश्च विभूषितैः ।
अश्मवृष्टिरिवाभाति पाणिभिश्च सहाङ्कुशैः ॥ ४३ ॥
उनके शिरों, बाजूबन्दविभूषित भुजाओं और अंकुशोंसहित हाथोंके गिरनेसे ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशसे ओले और पत्थरोंकी वर्षा हो रही हो ॥ ४३ ॥

हतोत्तमाङ्गाः स्कन्धेषु गजानां गजयोधिनः ।
अदृश्यन्ताचलाग्रेषु द्रुमा भग्नशिखा इव ॥ ४४ ॥
मस्तक कट जानेपर भी हाथियोंकी पीठपर टिके हुए गजारोही योद्धाओंके धड़ पर्वतके शिखरोंपर स्थित हुए शिखाहीन वृक्षोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ४४ ॥

धृष्टद्युम्नहतानन्यान्पश्याम महागजान् ।
पततः पात्यमानांश्च पार्षतेन महात्मना ॥ ४५ ॥
हमलोगोंोंने धृष्टद्युम्नके द्वारा मारे गये बहुत-से हाथियोंको देखा, महामना द्रुपदकुमारकी मार खाकर बहुत-से हाथी गिरे और गिराये जा रहे थे ॥ ४५ ॥

मागधोऽथ महीपालो गजमैरावणोपमम् ।
प्रेषयामास समरे सौभद्रस्य रथं प्रति ॥ ४६ ॥
इसी समय मगधदेशीय भूपालने युद्धस्थलमें अभिमन्युके रथकी ओर ऐरावतके समान एक विशाल हाथीको प्रेरित किया ॥ ४६ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य मागधस्य महाग़जम् ।
जघानैकेषुना वीरः सौभद्रः परवीरहा ॥ ४७ ॥
मगधनरेशके उस विशाल गजको आते देख शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले वीर सुभद्राकुमारने उसे एक ही बाणसे मार डाला ॥ ४७ ॥

तस्यावर्जितनागस्य कार्ष्णिः परपुरंजयः । राज्ञो रजतपुङ्खेन भल्लेनापाहरच्छिरः ॥ ४८ ॥ फिर शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले अर्जुनपुत्र अभिमन्युने मरनेपर भी हाथीको न छोड़नेवाले मगधराजका मस्तक रजतमय पंखवाले भल्लके द्वारा काट गिराया ॥ ४८ ॥

विगाह्य तद् गजानीकं भीमसेनोऽपि पाण्डवः । व्यचरत् समरे मृद्नन् गजानिन्द्रो गिरीनिव ॥ ४९ ॥ उधर पाण्डुनन्दन भीमसेन भी गजसेनामें घुसकर पर्वतोंको विदीर्ण करनेवाले देवेन्द्रके समान हाथियोंको रौंदते हुए समरांगणमें विचरने लगे ॥ ४९ ॥

एकप्रहारनिहतान् भीमसेनेन दन्तिनः । अपश्याम रणे तस्मिन् गिरीन् वज्रहतानिव ॥ ५० ॥ महाराज! उस युद्धस्थलमें हमने वज्रके मारे हुए पर्वतोंकी भाँति भीमसेनके एक ही प्रहारसे दन्तार हाथियोंको भी मरते देखा था ॥ ५० ॥

भग्नदन्तान् भग्नकरान् भग्नसक्थांश्च वारणान् । भग्नपृष्ठत्रिकानन्यान् निहतान् पर्वतोपमान् ॥ ५१ ॥ नदतः सीदतश्चान्यान् विमुखान् समरे गतान् । विद्रुतान् भयसंविग्नांस्तथा विशकृतोऽपरान् ॥ ५२ ॥ किन्हींके दाँत टूट गये, किन्हींकी सूँड़ कट गयी, कितनोंकी जाँघें टूट गयीं, किन्हींकी पीठ टूट गयी और कितने ही पर्वतोंके समान विशालकाय गजराज मारे गये, कुछ चिग्घाड़ रहे थे, कुछ कष्टसे कराह रहे थे, कुछ युद्धभूमिसे विमुख होकर भागने लगे थे और कुछ भयसे व्याकुल होकर मल-मूत्र कर रहे थे। इन सबको मैंने अपनी आँखों देखा था ॥ ५१-५२ ॥

भीमसेनस्य मार्गेषु पतितान् पर्वतोपमान् । अपश्यं निहतान् नागान् राजन् निष्ठीवतोऽपरान् ।। ५३ ।। भीमसेनके मार्गोंमें उनके द्वारा मारे गये पर्वतोपम हाथी पड़े दिखायी दिये। राजन्! अन्य बहुत-से हाथियोंको मैंने मुँहसे फेन फेंकते देखा था ।। ५३ ।।

वमन्तो रुधिरं चान्ये भिन्नकुम्भा महागजाः । विह्वलन्तो गता भूमिं शैला इव धरातले ।। ५४ ।। कितने ही विशालकाय हाथी खून उगल रहे थे और उनके कुम्भस्थल फट गये थे। बहुत-से व्याकुल होकर इस भूतलपर पर्वतोंके समान पड़े थे ।। ५४ ।।

मेदोरुधिरदिग्धाङ्गो वसामज्जासमुक्षितः । व्यचरत् समरे भीमो दण्डपाणिरिवान्तकः ।। ५५ ।। भीमसेनका सारा शरीर मेदा तथा रक्तसे लिए हो रहा था। वे वसा और मज्जासे नहा गये थे और हाथमें गदा लिये दण्डपाणि यमराजके समान उस युद्धभूमिमें विचर रहे थे ।। ५५ ।।

गजानां रुधिरक्लिन्नां गदां बिभ्रद् वृकोदरः । घोरः प्रतिभयश्चासीत् पिनाकीव पिनाकधृक् ।। ५६ ।। हाथियोंके खूनसे भीगी हुई गदा धारण किये भीमसेन पिनाकधारी भगवान् रुद्रके समान घोर एवं भयंकर दिखायी देते थे ।। ५६ ।।

सम्मथ्यमानाः क्रुद्धेन भीमसेनेन दन्तिनः । सहसा प्राद्रवन् क्लिष्टा मृद्नन्तस्तव वाहिनीम् ।। ५७ ।।

क्रोधमें भरे हुए भीमसेन हाथियोंको मथे डालते थे; अतः वे उनके द्वारा अत्यन्त क्लेश पाकर आपकी सेनाको कुचलते हुए सहसा युद्धस्थलसे भाग चले ॥ ५७ ॥ तं हि वीरं महेष्वासं सौभद्रप्रमुखा रथाः । पर्य्यरक्षन्त युध्यन्तं वज्रायुधमिवामराः ॥ ५८ ॥ जैसे देवता वज्रधारी इन्द्रकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार सुभद्रकुमार आदि पाण्डव योद्धा युद्धमें तत्पर हुए महाधनुर्धर वीर भीमसेनकी सब ओरसे रक्षा करते थे ॥ ५८ ॥ शोणिताक्तां गदां बिभ्रदुक्षितां गजशोणितैः । कृतान्त इव रौद्रात्मा भीमसेनो व्यदृश्यत ॥ ५९ ॥ खूनमें सनी तथा हाथियोंके रक्तसे भीगी हुई गदा लिये रौद्ररूपधारी भीमसेन यमराजके समान दिखायी देते थे ॥ ५९ ॥ व्यायच्छमानं गदया दिक्षु सर्वासु भारत । अपश्याम रणे भीमं नृत्यन्तमिव शंकरम् ॥ ६० ॥ भारत! भीमसेन गदा लेकर सम्पूर्ण दिशाओंमें व्यायाम-सा कर रहे थे। समरभूमिमें भीमको हमलोगोंने ताण्डव-नृत्य करते हुए भगवान् शंकरके समान देखा था ॥ ६० ॥ यमदण्डोपमां गुर्वीमिन्द्राशनिसमस्वनाम् । अपश्याम महाराज रौद्रां विशसनीं गदाम् ॥ ६१ ॥ महाराज! भीमसेनकी भारी और भयंकर गदा सबका संहार करनेवाली है। हमें तो वह यमदण्डके समान दिखायी देती थी। प्रहार करनेपर उससे इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान आवाज होती थी ॥ ६१ ॥ विमिश्रां केशमज्जाभिः प्रदिग्धां रुधिरेण च । पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याभिघ्नतः पशून् ॥ ६२ ॥ रक्तसे भीगी तथा केश और मज्जासे मिली हुई उस गदाको हमने प्रलयकालमें क्रोधसे भरकर समस्त पशुओं (जीवों)-का संहार करनेवाले रुद्रदेवके पिनाकके समान समझा था ॥ ६२ ॥ यथा पशूनां संघातं यष्ट्या पालः प्रकालयेत् । तथा भीमो गजानीकं गदया समकालयत् ॥ ६३ ॥ जैसे चरवाहा पशुओंके झुंडको डंडेसे हाँकता है, उसी प्रकार भीमसेन हाथियोंके समूहको अपनी गदासे हाँक रहे थे ॥ ६३ ॥ गदया वध्यमानास्ते मार्गणैश्च समन्ततः । स्वान्यनीकानि मृद्नन्तः प्राद्रवन् कुञ्जरास्तव ॥ ६४ ॥ महाराज! चारों ओरसे गदा और बाणोंकी मार पड़नेपर आपकी सेनाके वे समस्त हाथी अपने ही सैनिकोंको कुचलते हुए भाग रहे थे ॥ ६४ ॥ महावात इवाभ्राणि विधमित्वा स वारणान् ।

अतिष्ठत् तुमुले भीमः श्मशान इव शूलभृत् ॥ ६५ ॥
जैसे आँधी बादलोंको छिन्न-भिन्न करके उड़ा देती है, उसी प्रकार भीमसेन उस भयंकर युद्धमें हाथियोंकी सेनाको नष्ट करके श्मशानभूमिमें त्रिशूलधारी भगवान् शंकरके समान खड़े थे ॥ ६५ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थदिवसे भीमयुद्धे
द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें चौथे दिन भीमसेनका युद्धविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1873)

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त्रिषष्टितमोऽध्यायः

युद्धस्थलमें प्रचण्ड पराक्रमकारी भीमसेनका भीष्मके साथ युद्ध तथा सात्यकि और भूरिश्रवाकी मुठभेड़

संजय उवाच

हते तस्मिन् गजानीके पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
भीमसेनं घ्नतेत्येवं सर्वसैन्यान्यचोदयत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! हाथियोंकी उस सेनाके मारे जानेपर आपके पुत्र दुर्योधनने समस्त सैनिकोंको आज्ञा दी कि सब मिलकर भीमसेनको मार डालो ॥ १ ॥

ततः सर्वाण्यनीकानि तव पुत्रस्य शासनात् ।
अभ्यद्रवन् भीमसेनं नदन्तं भैरवान् रवान् ॥ २ ॥
तदनन्तर आपके पुत्रकी आज्ञासे समस्त सेनाएँ भैरव गर्जना करती हुई भीमसेनपर टूट पड़ीं ॥ २ ॥

तं बलौघमपर्यन्तं देवैरपि सुदुःसहम् ।
आपतन्तं सुदुष्पारं समुद्रमिव पर्वणि ॥ ३ ॥
सेनाका वह अनन्त वेग देवताओंके लिये भी दुःसह था। पूर्णिमाको बढ़े हुए समुद्रके समान अपार जान पड़ता था ॥

रथनागाश्वकलिलं शङ्खदुन्दुभिनादितम् ।
अनन्तरथपादातं रजसा सर्वतो वृतम् ॥ ४ ॥
वह सैन्य-समुद्र रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरा हुआ था। शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे कोलाहलपूर्ण हो रहा था। उसमें रथ और पैदलोंकी संख्या नहीं बतायी जा सकती थी तथा उस सेनामें सब ओर धूल व्याप्त हो रही थी ॥ ४ ॥

तं भीमसेनः समरे महोदधिमिवापरम् ।
सेनासागरमक्षोभ्यं वेलेव समवारयत् ॥ ५ ॥
दूसरे महासागरके समान उस अक्षोभ्य सैन्यसमुद्रको युद्धमें भीमसेनने तटप्रदेशकी भाँति रोक दिया ॥ ५ ॥

तदाश्चर्यमपश्याम पाण्डवस्य महात्मनः ।
भीमसेनस्य समरे राजन् कर्मातिमानुषम् ॥ ६ ॥
राजन्! उस समय संग्रामभूमिमें हमलोगोंने महामना पाण्डुनन्दन भीमसेनका अत्यन्त आश्चर्यमय अतिमानुष कर्म देखा था ॥ ६ ॥

उदीर्णान् पार्थिवान् सर्वान् साश्वान् सरथकुञ्जरान् ।

असम्भ्रमं भीमसेनो गदया समवारयत् ॥ ७ ॥
घोड़े, हाथी तथा रथसहित जितने भी भूपाल वहाँ आगे बढ़ रहे थे, उन सबको केवल गदाकी सहायतासे भीमसेनने बिना किसी घबराहटके रोक दिया ॥ ७ ॥
स संवार्य बलौघांस्तान् गदया रथिनां वरः ।
अतिष्ठत् तुमुले भीमो गिरिर्मेरुरिवाचलः ॥ ८ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ भीमसेन उस सारे सैन्यसमूहको गदाद्वारा रोककर उस भयंकर युद्धमें मेरु पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रहे ॥ ८ ॥
तस्मिन् सुतुमुले घोरे काले परमदारुणे ।
भ्रातरश्चैव पुत्राश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ९ ॥
द्रौपदेयाऽभिमन्युश्च शिखण्डी चापराजितः ।
न प्राजहन् भीमसेनं भये जाते महाबलम् ॥ १० ॥
उस महान् भयंकर तथा अत्यन्त दारुण भयके समय महाबली भीमसेनको उनके भाई, पुत्र, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, अभिमन्यु और अपराजित वीर शिखण्डी—ये कोई भी छोड़कर नहीं गये ॥ ९-१० ॥
ततः शैक्वायसीं गुर्वी प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
अधावत् तावकान् योधान् दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् पूर्णतः फौलादकी बनी हुई विशाल एवं भारी गदा हाथमें लेकर भीमसेन दण्डपाणि यमराजकी भाँति आपके सैनिकोंपर टूट पड़े ॥ ११ ॥
पोथयन् रथवृन्दानि वाजीवृन्दानि चाभिभूः ।
कर्षयन् रथवृन्दानि बाहुवेगेन पाण्डवः ॥ १२ ॥
विनिघ्नन् व्यचरत् संख्ये युगान्ते कालवद् विभुः ।
फिर वे प्रभावशाली बलवान् पाण्डुनन्दन रथियों और घोड़ोंके समूहको नष्ट करके अपनी भुजाओंके वेगसे रथोंके समुदायको खींचते और नष्ट करते हुए प्रलयकालके यमराजकी भाँति संग्रामभूमिमें विचरने लगे ॥ १२ १/२ ॥
ऊरुवेगेन संकर्षन् रथजालानि पाण्डवः ॥ १३ ॥
बलानि सम्ममर्द्राशु नड्वलानीव कुञ्जरः ।
पाण्डुनन्दन भीम अपने महान् वेगसे रथसमूहोंको खींचकर नष्ट कर देते और शीघ्र ही सारी सेनाको उसी प्रकार रौंद डालते थे, जैसे हाथी नरकुलके पौधोंको ॥
मृद्नन् रथेभ्यो रथिनो गजेभ्यो गजयोधिनः ॥ १४ ॥
सादिनश्चाश्वपृष्ठेभ्यो भूमौ चापि पदातिनः ।
गदया व्यधमत् सर्वान् वातो वृक्षानिवौजसा ॥ १५ ॥
भीमसेनो महाबाहुस्तव पुत्रस्य वै बले ।

महाबाहु भीमसेन रथोंसे रथियोंको, हाथियोंसे हाथी-सवारोंको, घोड़ोंकी पीठोंसे घुड़सवारोंको और पृथ्वीपर पैदलोंको मसलते हुए गदासे आपके पुत्रकी सेनाके सब लोगोंको उसी प्रकार नष्ट कर देते थे, जैसे हवा अपने वेगसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है ।। सापि मज्जावसामांसैः प्रदिग्धा रुधिरेण च ।। १६ ।। अदृश्यत महारौद्रा गदा नागाश्वपातनी । हाथियों और घोड़ोंको मार गिरानेवाली उनकी वह गदा भी मज्जा, वसा, मांस तथा रक्तमें सनकर बड़ी भयानक दिखायी देती थी ।। १६ १/२ ।। तत्र तत्र हतैश्चापि मनुष्यगजवाजिभिः ।। १७ ।। रणाङ्गणं समभवन्मृरावाससंनिभम् । जहाँ-तहाँ मरकर गिरे हुए मनुष्य, हाथी और घोड़ोंसे वह सारी रणभूमि मृत्युके निवासस्थान-सी प्रतीत होती थी ।। १७ १/२ ।। पिनाकमिव रुद्रस्य क्रुद्धस्याभिघ्नतः पशून् ।। १८ ।। यमदण्डोपमामुग्रामिन्द्राशनिसमस्वनाम् । ददृशुर्भीमसेनस्य रौद्रीं विशसनीं गदाम् ।। १९ ।। भीमसेनकी उस संहारकारिणी भयंकर गदाको लोगोंने प्रलयकालमें पशुओं (जीवों)-का संहार करनेवाले रुद्रके पिनाक और यमदण्डके समान भयंकर देखा। उसकी आवाज इन्द्रके वज्रके समान थी ।। १८-१९ ।। आविद्धयतो गदां तस्य कौन्तेयस्य महात्मनः । बभौ रूपं महाघोरं कालस्येव युगक्षये ।। २० ।। अपनी गदाको घुमाते हुए महामना कुन्तीकुमार भीमसेनका रूप युगान्त-कालके यमराजके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था ।। २० ।। तं तथा महतीं सेनां द्रावयन्तं पुनः पुनः । दृष्ट्वा मृत्युमिवायान्तं सर्वे विमनसोऽभवन् ।। २१ ।। उस विशाल सेनाको बारंबार भगानेवाले भीमसेनको मौतके समान सामने आते देख समस्त योद्धाओंका मन उदास हो जाता था ।। २१ ।। यतो यतः प्रेक्षते स्म गदामुद्यम्य पाण्डवः । तेन तेन स्म दीर्यन्ते सर्वसैन्यानि भारत ।। २२ ।। भारत! भीमसेन गदा उठाकर जिस-जिस ओर देखते थे, उधर-उधरसे सारी सेनाओंमें दरार पड़ जाती थी (वहाँके सैनिक भागकर स्थान खाली कर देते थे) ।। २२ ।। प्रदारयन्तं सैन्यानि बलेनामितविक्रमम् । ग्रसमानमनीकानि व्यादितास्यमिवान्तकम् ।। २३ ।। तं तथा भीमकर्माणं प्रगृहीतमहागदम् । दृष्ट्वा वृकोदरं भीष्मः सहसैव समभ्ययात् ।। २४ ।।

अपने बलसे सेनाको विदीर्ण करनेवाले भीमसेन सम्पूर्ण सैनिकोंको अपना ग्रास बनानेके लिये मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ते थे। उस समय बड़ी भारी गदा उठाये हुए भयंकर पराक्रमी भीमसेनको देखकर भीष्मजी सहसा वहाँ पहुँचे ॥ २३-२४ ॥ महता रथघोषेण रथेनादित्यवर्चसा । छादयन् शरवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ २५ ॥ वे सूर्यके समान तेजस्वी तथा पहियोंके गम्भीर घोषसे युक्त विशाल रथपर आरूढ़ हो बरसते हुए मेघके समान बाणोंकी वर्षासे सबको आच्छादित करते हुए वहाँ आये थे ॥ २५ ॥ तमायान्तं तथा दृष्ट्वा व्यात्ताननमिवान्तकम् । भीष्मं भीमो महाबाहुः प्रत्युदीयादमर्षितः ॥ २६ ॥ मुँह फैलाये हुए यमराजके समान भीष्मजीको आते देख महाबाहु भीमसेन अमर्षमें भरकर उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ २६ ॥ तस्मिन् क्षणे सात्यकिः सत्यसंधः शिनिप्रवीरोऽभ्यपतत् पितामहम् । निघ्नन्नमित्रान् धनुषा दृढेन संकंपयंस्तव पुत्रस्य सैन्यम् ॥ २७ ॥ उस समय शिनिवंशके प्रमुख वीर सत्यप्रतिज्ञ सात्यकि अपने सुदृढ़ धनुषसे शत्रुओंका संहार करते और आपके पुत्रकी सेनाको कँपाते हुए पितामह भीष्मपर चढ़ आये ॥ २७ ॥ तं यान्तमश्वै रजतप्रकाशैः शरान् वपन्तं निशितान् सुपुङ्खान् । नाशक्नुवन् धारयितुं तदानीं सर्वे गणा भारत ये त्वदीयाः ॥ २८ ॥ भारत! चाँदीके समान श्वेत घोड़ोंद्वारा जाते और सुन्दर पंखयुक्त तीखे बाणोंकी वर्षा करते हुए सात्यकिको उस समय आपके समस्त सैनिकगण रोक न सके ॥ २८ ॥ अविध्यदेनं दशभिः पृषत्कै- रलम्बुषो राक्षसऽसौ तदानीम् । शरैश्चतुर्भिः प्रतिविद्ध्य तं च नप्ता शिनेरभ्यपतद् रथेन ॥ २९ ॥ केवल अलम्बुष नामक राक्षसने उस समय उन्हें दस बाणोंसे घायल किया। तब शिनिके पौत्रने भी उस राक्षसको चार बाणोंसे बींधकर बदला चुकाया और रथके द्वारा भीष्मपर धावा किया ॥ २९ ॥ अन्वागतं वृष्णिवरं निशम्य तं शत्रुमध्ये परिवर्तमानम् ।

प्रद्रावयन्तं कुरुपुङ्गवांश्च पुनः पुनश्च प्रणदन्तमाजौ ॥ ३० ॥ योधास्त्वदीयाः शरवर्षैरवर्षन् मेघा यथा भूधरमम्बुवेगैः । तथापि तं धारयितुं न शेकु- र्मध्यन्दिने सूर्यमिवातपन्तम् ॥ ३१ ॥ वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुष सात्यकि आकर शत्रुओंके बीचमें विचर रहे हैं और युद्धस्थलमें कौरवसेनाके मुख्य-मुख्य वीरोंको भगाते हुए बारंबार गर्जना कर रहे हैं; यह सुनकर आपके योद्धा उनपर उसी प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगे, जैसे मेघ पर्वतपर जलकी धाराएँ गिराते हैं, इतनेपर भी वे दोपहरके तपते हुए सूर्यकी भाँति उन्हें रोक न सके ॥ ३०-३१ ॥ न तत्र कश्चिन्नविषण्ण आसी- दृते राजन् सोमदत्तस्य पुत्रात् । स वै समादाय धनुर्महात्मा भूरिश्रवा भारत सौमदत्तिः ॥ ३२ ॥ दृष्ट्वा रथान् स्वान् व्यपनीयमानान् प्रत्युद्ययौ सात्यकिं योद्धुमिच्छन् ॥ ३३ ॥ राजन्! उस समय वहाँ सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवाको छोड़कर दूसरा कोई ऐसा योद्धा नहीं था, जो विषाद-ग्रस्त न हुआ हो। भारत! सोमदत्तकुमार महामना भूरिश्रवाने अपने रथियोंको विवश होकर भागते देख धनुष ले युद्ध करनेकी इच्छासे सात्यकिपर चढ़ाई की ॥ ३२-३३ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सात्यकिभूरिश्रवःसमागमे त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें सात्यकिभूरिश्रवा-समागमविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1878)

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चतुःषष्टितमोऽध्यायः

भीमसेन और घटोत्कचका पराक्रम, कौरवोंकी पराजय तथा चौथे दिनके युद्धकी समाप्ति

संजय उवाच

ततो भूरिश्रवा राजन् सात्यकिं नवभिः शरैः ।
प्राविध्यद् भृशसंक्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तब भूरिश्रवाने अत्यन्त क्रुद्ध होकर सात्यकिको नौ बाणोंसे उसी प्रकार बींध डाला, जैसे महान् गजराजको अंकुशोंद्वारा पीड़ित किया जाता है ॥ १ ॥

कौरवं सात्यकिश्चैव शरैः संनतपर्वभिः ।
अवारयदमेयात्मा सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ २ ॥
तब अमेय आत्मबलसम्पन्न सात्यकिने भी झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे सब लोगोंके देखते-देखते कुरुवंशी भूरिश्रवाको रोक दिया ॥ २ ॥

ततो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः परिवारितः ।
सौमदत्तिं रणे यत्तः समन्तात् पर्यवारयत् ॥ ३ ॥
यह देख भाइयोंसहित राजा दुर्योधनने युद्धके लिये उद्यत होकर भूरिश्रवाको चारों ओरसे घेरकर उसकी रक्षामें तत्पर हो गये ॥ ३ ॥

तं चैव पाण्डवाः सर्वे सात्यकिं रभसं रणे ।
परिवार्य स्थिताः संख्ये समन्तात् सुमहौजसः ॥ ४ ॥
उधर महान् तेजस्वी समस्त पाण्डव भी युद्धमें वेगपूर्वक आगे बढ़नेवाले सात्यकिको सब ओरसे घेरकर समरभूमिमें डट गये ॥ ४ ॥

भीमसेनस्तु संक्रुद्धो गदामुद्यम्य भारत ।
दुर्योधनमुखान् सर्वान् पुत्रांस्ते पर्यवारयत् ॥ ५ ॥
भारत! क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने गदा उठाकर आपके दुर्योधन आदि सब पुत्रोंको अकेले ही रोक दिया ॥

रथैरनेकसाहस्रैः क्रोधामर्षसमन्वितः ।
नन्दकस्तव पुत्रस्तु भीमसेनं महाबलम् ॥ ६ ॥
विव्याध विशिखैः षड्भिः कङ्कपत्रैः शिलाशितैः ।
तब क्रोध और अमर्षमें भरे हुए आपके पुत्र नन्दकने कई हजार रथियोंके साथ आकर शिलापर तेज किये हुए कंकपत्रयुक्त छः बाणोंसे महाबली भीमसेनको बींध डाला ॥ ६ ½ ॥

दुर्योधनश्च समरे भीमसेनं महारथम् ।। ७ ।।
आजघानोरसि क्रुद्धो मार्गणैर्नवभिः शितैः ।
कुपित हुए दुर्योधनने भी महारथी भीमसेनको उस युद्धमें उनकी छातीको लक्ष्य करके नौ तीखे बाण मारे ।। ७ १/२ ।।

ततो भीमो महाबाहुः स्वरथं सुमहाबलः ।। ८ ।।
आरुरोह रथश्रेष्ठं विशोकं चेदमब्रवीत् ।
तब महाबली महाबाहु भीमसेन अपने श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो गये और सारथि विशोकसे इस प्रकार बोले— ।। ८ १/२ ।।

एते महारथाः शूरा धार्तराष्ट्राः समागताः ।। ९ ।।
मामेव भृशसंक्रुद्धा हन्तुमभ्युद्यता युधि ।
'ये महारथी शूरवीर धृतराष्ट्रपुत्र अत्यन्त कुपित हो युद्धमें मुझे ही मारनेके लिये उद्यत हो यहाँ आये हैं ।। ९ १/२ ।।

मनोरथद्रुमोऽस्माकं चिन्तितो बहुवार्षिकः ।। १० ।।
सफलः सूत चाद्येह योऽहं पश्यामि सोदरान् ।
'सूत! मेरे मनमें बहुत वर्षोंसे जिसका चिन्तन हो रहा था, वह मनोरथरूपी वृक्ष आज सफल होना चाहता है; क्योंकि इस समय यहाँ मैं दुर्योधनके भाइयोंको एकत्र देख रहा हूँ ।। १० १/२ ।।

यत्राशोक समुत्क्षिप्ता रेणवो रथनेमिभिः ।। ११ ।।
प्रयास्यन्त्यन्तरिक्षं हि शरवृन्दैर्दिगन्तरे ।
तत्र तिष्ठति संनद्धः स्वयं राजा सुयोधनः ।। १२ ।।
'विशोक! जहाँ रथके पहियोंसे ऊपर उड़ी हुई धूल बाणसमूहोंके साथ अन्तरिक्ष और दिगन्तमें फैल रही है, वहीं स्वयं राजा दुर्योधन कवच आदिसे सुसज्जित होकर युद्धके लिये खड़ा है ।। ११-१२ ।।

भ्रातरश्चास्य संनद्धाः कुलपुत्रा मदोत्कटाः ।
एतानद्य हनिष्यामि पश्यतस्ते न संशयः ।। १३ ।।
तस्मान्ममाश्वान् संग्रामे यत्तः संयच्छ सारथे ।
'उसके कुलीन और मदोन्मत्त भाई भी वहीं कवच बाँधकर खड़े हैं। आज तुम्हारे देखते-देखते मैं इन सबका विनाश करूँगा, इसमें संशय नहीं है। अतः सारथे! तुम सावधान होकर संग्राममें मेरे घोड़ोंको काबूमें रखो' ।। १३ १/२ ।।

एवमुक्त्वा ततः पार्थस्तव पुत्रं विशाम्पते ।। १४ ।।
विव्याध दशभिस्तीक्ष्णैः शरैः कनकभूषणैः ।
नन्दकं च त्रिभिर्बाणैरभ्यविध्यत् स्तनान्तरे ।। १५ ।।

राजन्! ऐसा कहकर कुन्तीकुमार भीमने स्वर्णभूषित दस तीखे बाणोंद्वारा आपके पुत्र दुर्योधनको बींध डाला और नन्दककी छातीमें भी तीन बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ १४-१५ ॥ तं तु दुर्योधनःषष्ट्या विद्ध्वा भीमं महाबलम् । त्रिभिरन्यैः सुनिशितैर्विशोकं प्रत्यविध्यत ॥ १६ ॥ यह देख दुर्योधनने साठ बाणोंसे महाबली भीमसेनको घायल करके अन्य तीन पैने बाणोंसे सारथि विशोकको भी घायल कर दिया ॥ १६ ॥ भीमस्य च रणे राजन् धनुश्छिच्छेद भासुरम् । मुष्टिदेशे भृशं तीक्ष्णैस्त्रिभिर्भल्लैर्हसन्निव ॥ १७ ॥ राजन्! इसके बाद दुर्योधनने युद्धस्थलमें तीन अत्यन्त तीखे भल्लोंद्वारा हँसते हुए-से भीमके तेजस्वी धनुषको भी बीचसे काट दिया ॥ १७ ॥ समरे प्रेक्ष्य यन्तारं विशोकं तु वृकोदरः । पीडितं विशिखैस्तीक्ष्णैस्तव पुत्रेण धन्विना ॥ १८ ॥ अमृष्यमाणः संरब्धो धनुर्दिव्यं परामृशत् । पुत्रस्य ते महाराज वधार्थं भरतर्षभ ॥ १९ ॥ समाधत्त सुसंक्रुद्धः क्षुरप्रं लोमवाहिनम् । तेन चिच्छेद नृपतेर्भीमः कार्मुकमुत्तमम् ॥ २० ॥ आपके धनुर्धर पुत्रद्वारा समरांगणमें अपने सारथि विशोकको तीखे बाणोंके आघातसे पीड़ित होता देख भीमसेन सह न सके। उन्होंने कुपित होकर अपना दिव्य धनुष हाथमें लिया। महाराज! भरतश्रेष्ठ! फिर आपके पुत्रके वधके लिये अत्यन्त कुपित होकर उन्होंने पंखयुक्त क्षुरप्रका संधान किया और उसके द्वारा राजा दुर्योधनके उत्तम धनुषको काट डाला ॥ १८—२० ॥ सोऽपविद्धय धनुश्छिन्नं पुत्रस्ते क्रोधमूर्च्छितः । अन्यत् कार्मुकमादत्त सत्वरं वेगवत्तरम् ॥ २१ ॥ राजन्! धनुष कटनेपर आपका पुत्र क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा। उसने उस कटे हुए धनुषको फेंककर तुरंत ही उससे भी अधिक वेगशाली दूसरा धनुष ले लिया ॥ २१ ॥ संदधे विशिखं घोरं कालमृत्युसमप्रभम् । तेनाजघान संक्रुद्धो भीमसेनं स्तनान्तरे ॥ २२ ॥ फिर उसके ऊपर काल और मृत्युके समान तेजस्वी भयंकर बाण रखा और कुपित हो उसके द्वारा भीमसेनकी छातीमें गहरा आघात किया ॥ २२ ॥ स गाढविद्धो व्यथितः स्यन्दनोपस्थ आविशत् । स निषण्णो रथोपस्थे मूर्च्छामभिजगाम ह ॥ २३ ॥