महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विमाने योजयित्वा च ऋषीन् नियममास्थितान् ॥ २१ ॥
अब्रह्मण्यो बलोपेतो मत्तो मदबलेन च ।
कामवृत्तः स दुष्टात्मा वाहयामास तानृषीन् ॥ २२ ॥
**शल्य कहते हैं—**राजन्! सुन्दर मुखवाली शची देवीसे ऐसा कहकर नहुषने उन्हें विदा कर दिया और यम-नियमका पालन करनेवाले बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंका अपमान करके अपनी पालकीमें जोत दिया। वह ब्राह्मणद्रोही नरेश बल पाकर उन्मत्त हो गया था। मद और बलसे गर्वित हो स्वेच्छाचारी दुष्टात्मा नहुषने उन महर्षियोंको अपना वाहन बनाया ॥ २१-२२ ॥
नहुषेण विसृष्टा च बृहस्पतिमथाब्रवीत् ।
समयोऽल्पावशेषो मे नहुषेणेह यः कृतः ॥ २३ ॥
उधर नहुषसे विदा लेकर इन्द्राणी बृहस्पतिके यहाँ गयीं और इस प्रकार बोलीं—'देवगुरो! नहुषने मेरे लिये जो समय निश्चित किया है, उसमें थोड़ा ही शेष रह गया है ॥ २३ ॥
शक्रं मृगय शीघ्रं त्वं भक्तायाः कुरु मे दयाम् ।
बाढमित्येव भगवान् बृहस्पतिरुवाच ताम् ॥ २४ ॥
'आप शीघ्र इन्द्रका पता लगाइये। मैं आपकी भक्त हूँ। मुझपर दया कीजिये।' तब भगवान् बृहस्पतिने 'बहुत अच्छा' कहकर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ २४ ॥
न भेतव्यं त्वया देवि नहुषाद् दुष्टचेतसः ।
न ह्येष स्थास्यति चिरं गत एष नराधमः ॥ २५ ॥
'देवि! तुम दुष्टात्मा नहुषसे डरो मत। यह नराधम अब अधिक समयतक यहाँ ठहर नहीं सकेगा। इसे गया हुआ ही समझो ॥ २५ ॥
अधर्मज्ञो महर्षीणां वाहनाच्च ततः शुभे ।
इष्टिं चाहं करिष्यामि विनाशायस्य दुर्मतेः ॥ २६ ॥
शक्रं चाधिगमिष्यामि मा भैस्त्वं भद्रमस्तु ते ।
'शुभे! यह पापी धर्मको नहीं जानता। अतः महर्षियोंको अपना वाहन बनानेके कारण शीघ्र नीचे गिरेगा। इसके सिवा मैं भी इस दुर्बुद्धि नहुषके विनाशके लिये एक यज्ञ करूँगा। साथ ही इन्द्रका भी पता लगाऊँगा। तुम डरो मत। तुम्हारा कल्याण होगा' ॥ २६ ½ ॥
ततः प्रज्वाल्य विधिवज्जुहाव परमं हविः ॥ २७ ॥
बृहस्पतिर्महातेजा देवराजोपलब्धये ।
हुत्वाग्निं सोऽब्रवीद् राजञ्छक्रमन्विष्यतामिति ॥ २८ ॥
तदनन्तर महातेजस्वी बृहस्पतिने देवराजकी प्राप्तिके लिये विधिपूर्वक अग्निको प्रज्वलित करके उसमें उत्तम हविष्यकी आहुति दी। राजन्! अग्निमें आहुति देकर उन्होंने अग्निदेवसे कहा—'आप इन्द्रदेवका पता लगाइये' ॥ २७-२८ ॥
तस्माच्च भगवान् देवः स्वयमेव हुताशनः । स्त्रीवेषमद्भुतं कृत्वा तत्रैवान्तरधीयत ।। २९ ।।
उस हवनकुण्डसे साक्षात् भगवान् अग्निदेव प्रकट होकर अद्भुत स्त्रीवेष धारण करके वहीं अन्तर्धान हो गये ।। २९ ।।
स दिशः प्रदिशश्चैव पर्वतानि वनानि च । पृथिवीं चान्तरिक्षं च विचिन्त्याथ मनोगतिः । निमेषान्तरमात्रेण बृहस्पतिमुपागमत् ।। ३० ।।
मनके समान तीव्र गतिवाले अग्निदेव सम्पूर्ण दिशाओं, विदिशाओं, पर्वतों और वनोंमें तथा भूतल और आकाशमें भी इन्द्रकी खोज करके पलभरमें बृहस्पतिके पास लौट आये ।। ३० ।।
अग्निरुवाच
बृहस्पते न पश्यामि देवराजमिह क्वचित् । आपः शेषताः सदा चापः प्रवेष्टुं नोत्सहाम्यहम् ।। ३१ ।।
**अग्निदेव बोले—**बृहस्पते! मैं देवराजको तो इस संसारमें कहीं नहीं देख रहा हूँ, केवल जल शेष रह गया है, जहाँ उनकी खोज नहीं की है। परंतु मैं कभी भी जलमें प्रवेश करनेका साहस नहीं कर सकता ।। ३१ ।।
न मे तत्र गतिर्ब्रह्मन् किमन्यत् करवाणि ते ।
तमब्रवीद् देवगुरुरपो विश महाद्युते ।। ३२ ।।
ब्रह्मन्! जलमें मेरी गति नहीं है। इसके सिवा तुम्हारा दूसरा कौन कार्य मैं करूँ? तब देवगुरुने कहा—‘महाद्युते! आप जलमें भी प्रवेश कीजिये’ ।। ३२ ।।
अग्निरुवाच
नापः प्रवेष्टुं शक्ष्यामि क्षयो मेऽत्र भविष्यति ।
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि स्वस्ति तेऽस्तु महाद्युते ।। ३३ ।।
**अग्निदेव बोले—**मैं जलमें नहीं प्रवेश कर सकूँगा; क्योंकि उसमें मेरा विनाश हो जायगा। महातेजस्वी बृहस्पते! मैं तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम्हारा कल्याण हो (मुझे जलमें जानेके लिये न कहो)। ।। ३३ ।।
अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् ।
तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ।। ३४ ।।
जलसे अग्नि, ब्राह्मणसे क्षत्रिय तथा पत्थरसे लोहेकी उत्पत्ति हुई है। इनका तेज सर्वत्र काम करता है। परंतु अपने कारणभूत पदार्थोंमें आकर बुझ जाता है ।। ३४ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि बृहस्पत्यग्निसंवादे
पञ्चदशोऽध्यायः ।। १५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें बृहस्पति-अग्निसंवादविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५ ।।
षोडशोऽध्यायः
बृहस्पतिद्वारा अग्नि और इन्द्रका स्तवन तथा बृहस्पति एवं लोकपालोंकी इन्द्रसे बातचीत
बृहस्पतिरुवाच
त्वमग्ने सर्वदेवानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् ।
त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि साक्षिवत् ॥ १ ॥
बृहस्पति बोले— अग्निदेव! आप सम्पूर्ण देवताओंके मुख हैं। आप ही देवताओंको हविष्य पहुँचानेवाले हैं। आप समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें साक्षीकी भाँति गूढ़भावसे विचरते हैं ॥ १ ॥
त्वामाहुरेकं कवयस्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः ।
त्वया त्यक्तं जगच्चेदं सद्यो नश्येद्धुताशन ॥ २ ॥
विद्वान् पुरुष आपको एक बताते हैं। फिर वे ही आपको तीन प्रकारका कहते हैं। हुताशन! आपके त्याग देनेपर यह सम्पूर्ण जगत् तत्काल नष्ट हो जायगा ॥ २ ॥
कृत्वा तुभ्यं नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् ।
गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् ॥ ३ ॥
ब्राह्मणलोग आपकी पूजा और वन्दना करके अपनी पत्नियों तथा पुत्रोंके साथ अपने कर्मोंद्वारा प्राप्त चिरस्थायी स्वर्गीय सुख लाभ करते हैं ॥ ३ ॥
त्वमेवाग्ने हव्यवाहस्त्वमेव परमं हविः ।
यजन्ति सत्रैस्त्वामेव यज्ञैश्च परमाध्वरे ॥ ४ ॥
अग्ने! आप ही हविष्यको वहन करनेवाले देवता हैं। आप ही उत्कृष्ट हवि हैं। याज्ञिक विद्वान् पुरुष बड़े-बड़े यज्ञोंमें अवान्तर सत्रों और यज्ञोंद्वारा आपकी ही आराधना करते हैं ॥ ४ ॥
सृष्ट्वा लोकांस्त्रीनिमान् हव्यवाह
प्राप्ते काले पचसि पुनः समिद्धः ।
त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति-
स्त्वमेवाग्ने भवसि पुनः प्रतिष्ठा ॥ ५ ॥
हव्यवाहन! आप ही सृष्टिके समय इन तीनों लोकोंको उत्पन्न करके प्रलयकाल आनेपर पुनः प्रज्वलित हो इन सबका संहार करते हैं। अग्ने! आप ही सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थान हैं और आप ही पुनः इसके प्रलयकालमें आधार होते हैं ॥ ५ ॥
त्वामग्ने जलदानाहुर्विद्युतश्च मनीषिणः ।
दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः ॥ ६ ॥ अग्निदेव! मनीषी पुरुष आपको ही मेघ और विद्युत् कहते हैं। आपसे ही ज्वालाएँ निकलकर सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध करती हैं ॥ ६ ॥ त्वय्यापो निहिताः सर्वास्त्वयि सर्वमिदं जगत् । न तेऽस्त्यविदितं किंचित् त्रिषु लोकेषु पावक ॥ ७ ॥ पावक! आपमें ही सारा जल संचित है। आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है। तीनों लोकोंमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो ॥ ७ ॥ स्वयोनिं भजते सर्वो विशस्वापोऽविशङ्कितः । अहं त्वां वर्धयिष्यामि ब्राह्मैर्मन्त्रैः सनातनैः ॥ ८ ॥ समस्त पदार्थ अपने-अपने कारणमें प्रवेश करते हैं। अतः आप भी निःशंक होकर जलमें प्रवेश कीजिये। मैं सनातन वेदमन्त्रोंद्वारा आपको बढ़ाऊँगा ॥ ८ ॥ एवं स्तुतो हव्यवाट् स भगवान् कविरुत्तमः । बृहस्पतिमथोवाच प्रीतिमान् वाक्यमुत्तमम् । दर्शयिष्यामि ते शक्रं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ९ ॥ इस प्रकार स्तुति की जानेपर हविष्य वहन करनेवाले श्रेष्ठ एवं सर्वज्ञ भगवान् अग्निदेव प्रसन्न होकर बृहस्पतिसे यह उत्तम वचन बोले—'ब्रह्मन्! मैं आपको इन्द्रका दर्शन कराऊँगा, यह मैं आपसे सत्य कह रहा हूँ' ॥ ९ ॥
शल्य उवाच
प्रविश्यापस्ततो वह्निः ससमुद्राः सपल्वलाः । आससाद सरस्तच्च गूढो यत्र शतक्रतुः ॥ १० ॥ शल्य कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर अग्निदेव छोटे गड्ढेसे लेकर बड़े-से-बड़े समुद्रतकके जलमें प्रवेश करके पता लगाते हुए क्रमशः उस सरोवरमें जा पहुँचे, जहाँ इन्द्र छिपे हुए थे ॥ १० ॥ अथ तत्रापि पद्मानि विचिन्वन् भरतर्षभ । अपश्यत् स तु देवेन्द्रं बिसमध्यगतं स्थितम् ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! उसमें भी कमलोंके भीतर खोज करते हुए अग्निदेवने एक कमलके नालमें बैठे हुए देवेन्द्रको देखा ॥ ११ ॥ आगत्य च ततस्तूर्णं तमाचष्ट बृहस्पतेः । अणुमात्रेण वपुषा पद्मतन्त्वाश्रितं प्रभुम् ॥ १२ ॥ वहाँसे तुरंत लौटकर अग्निदेवने बृहस्पतिको बताया कि भगवान् इन्द्र सूक्ष्म शरीर धारण करके एक कमलनालका आश्रय लेकर रहते हैं ॥ १२ ॥ गत्वा देवर्षिगन्धर्वैः सहितोऽथ बृहस्पतिः ।
पुराणैः कर्मभिर्देवं तुष्टाव बलसूदनम् ॥ १३ ॥ तब बृहस्पतिजीने देवर्षियों और गन्धर्वोंके साथ वहाँ जाकर बलसूदन इन्द्रके पुरातन कर्मोंका वर्णन करते हुए उनकी स्तुति की— ॥ १३ ॥ महासुरो हतः शक्र नमुचिर्दारुणस्त्वया । शम्बरश्च बलश्चैव तथोभौ घोरविक्रमौ ॥ १४ ॥ 'इन्द्र! आपने अत्यन्त भयंकर नमुचि नामक महान् असुरको मार गिराया है। शम्बर और बल दोनों भयंकर पराक्रमी दानव थे; परंतु उन्हें भी आपने मार डाला ॥ १४ ॥ शतक्रतो विवर्धस्व सर्वाञ्छत्रून् निषूदय । उत्तिष्ठ शक्र सम्पश्य देवर्षींश्च समागतान् ॥ १५ ॥ 'शतक्रतो! आप अपने तेजस्वी स्वरूपसे बढ़िये और समस्त शत्रुओंका संहार कीजिये। इन्द्रदेव! उठिये और यहाँ पधारे हुए देवर्षियोंका दर्शन कीजिये ॥ १५ ॥ महेन्द्र दानवान् हत्वा लोकास्त्रातास्त्वया विभो । अपां फेनं समासाद्य विष्णुतेजोऽतिबृंहितम् । त्वया वृत्रो हतः पूर्वं देवराज जगत्पते ॥ १६ ॥ 'प्रभो महेन्द्र! आपने कितने ही दानवोंका वध करके समस्त लोकोंकी रक्षा की है। जगदीश्वर देवराज! भगवान् विष्णुके तेजसे अत्यन्त शक्तिशाली बने हुए समुद्रफेनको लेकर आपने पूर्वकालमें वृत्रासुरका वध किया ॥ १६ ॥ त्वं सर्वभूतेषु शरण्य ईड्य- स्त्वया समं विद्यते नेह भूतम् । त्वया धार्यन्ते सर्वभूतानि शक्र त्वं देवानां महिमानं चकर्थ ॥ १७ ॥ 'आप सम्पूर्ण भूतोंमें स्तवन करने योग्य और सबके शरणदाता हैं। आपकी समानता करनेवाला जगत्में दूसरा कोई प्राणी नहीं है। शक्र! आप ही सम्पूर्ण भूतोंको धारण करते हैं और आपने ही देवताओंकी महिमा बढ़ायी है ॥ १७ ॥ पाहि सर्वांश्च लोकांश्च महेन्द्र बलमाप्नुहि । एवं संस्तूयमानश्च सोऽवर्धत शनैः शनैः ॥ १८ ॥ 'महेन्द्र! आप शक्ति प्राप्त कीजिये और सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा कीजिये।' इस प्रकार स्तुति की जानेपर देवराज इन्द्र धीरे-धीरे बढ़ने लगे ॥ १८ ॥ स्वं चैव वपुरास्थाय बभूव स बलान्वितः । अब्रवीच्च गुरुं देवो बृहस्पतिमवस्थितम् ॥ १९ ॥ अपने पूर्व शरीरको प्राप्त करके वे बल-पराक्रमसे सम्पन्न हो गये। तत्पश्चात् इन्द्रने वहाँ खड़े हुए अपने गुरु बृहस्पतिसे कहा— ॥ १९ ॥ किं कार्यमवशिष्टं वो हतस्त्वाष्ट्रो महासुरः ।
वृत्रश्च सुमहाकायो यो वै लोकाननाशयत् ॥ २० ॥ ‘ब्रह्मन्! त्वष्टाका पुत्र विशालकाय महासुर वृत्र, जो सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर रहा था, मेरे द्वारा मारा गया; अब आपलोगोंका कौन-सा बचा हुआ कार्य करूँ?’ ॥ २० ॥
बृहस्पतिरुवाच
मानुषो नहुषो राजा देवर्षिगणतेजसा । देवराज्यमनुप्राप्तः सर्वान् नो बाधते भृशम् ॥ २१ ॥ बृहस्पति बोले— देवेन्द्र! मनुष्य-लोकका राजा नहुष देवर्षियोंके प्रभावसे देवताओंका राज्य पा गया है, जो हम सब लोगोंको बड़ा कष्ट दे रहा है ॥ २१ ॥
इन्द्र उवाच
कथं च नहुषो राज्यं देवानां प्राप दुर्लभम् । तपसा केन वा युक्तः किंवीर्यो वा बृहस्पते ॥ २२ ॥ (तत् सर्वं कथयध्वं मे यथेन्द्रत्वमुपेयिवान् ।) इन्द्र बोले— बृहस्पते! नहुषने देवताओंका दुर्लभ राज्य कैसे प्राप्त किया? वह किस तपस्यासे संयुक्त है? अथवा उसमें कितना बल और पराक्रम है? उसे किस प्रकार इन्द्रपदकी प्राप्ति हुई है? ये सारी बातें आप सब लोग मुझे बताइये ॥ २२ ॥
बृहस्पतिरुवाच
देवा भीताः शक्रमकामयन्त त्वया त्यक्तं महदैन्द्रं पदं तत् । तदा देवाः पितरोऽथर्षयश्च गन्धर्वमुख्याश्च समेत्य सर्वे ॥ २३ ॥ गत्वाब्रुवन् नहुषं तत्र शक्र त्वं नो राजा भव भुवनस्य गोप्ता । तानब्रवीन्नहुषो नास्मि शक्त आप्यायध्वं तपसा तेजसा माम् ॥ २४ ॥ बृहस्पति बोले— शक्र! आपने जब उस महान् इन्द्र-पदका परित्याग कर दिया, तब देवतालोग भयभीत होकर दूसरे किसी इन्द्रकी कामना करने लगे। तब देवता, पितर, ऋषि तथा मुख्य गन्धर्व—सब मिलकर राजा नहुषके पास गये। शक्र! वहाँ उन्होंने नहुषसे इस प्रकार कहा—‘आप हमारे राजा होइये और सम्पूर्ण विश्वकी रक्षा कीजिये।’ यह सुनकर नहुषने उनसे कहा—‘मुझमें इन्द्र बननेकी शक्ति नहीं है, अतः आपलोग अपने तप और तेजसे मुझे आप्यायित (पुष्ट) कीजिये’ ॥ २३-२४ ॥ एवमुक्तैर्वर्धितश्चापि देवै
राजाभवन्नहुषो घोरवीर्यः ।
त्रैलोक्ये च प्राप्य राज्यं महर्षीन्
कृत्वा वाहान् याति लोकान् दुरात्मा ॥ २५ ॥
उसके ऐसा कहनेपर देवताओोंने उसे तप और तेजसे बढ़ाया। फिर भयंकर पराक्रमी राजा नहुष स्वर्गका राजा बन गया। इस प्रकार त्रिलोकीका राज्य पाकर वह दुरात्मा नहुष महर्षियोंको अपना वाहन बनाकर सब लोकोंमें घूमता है ॥ २५ ॥
तेजोहरं दृष्टिविषं सुघोरं
मा त्वं पश्येर्नहुषं वै कदाचित् ।
देवाश्च सर्वे नहुषं भृशार्ता
न पश्यन्ते गूढरूपाश्चरन्तः ॥ २६ ॥
वह देखनेमात्रसे सबका तेज हर लेता है। उसकी दृष्टिमें भयंकर विष है। वह अत्यन्त घोर स्वभावका हो गया है। तुम नहुषकी ओर कभी देखना नहीं। सब देवता भी अत्यन्त पीड़ित हो गूढरूपसे विचरते रहते हैं; परंतु नहुषकी ओर कभी देखते नहीं हैं ॥ २६ ॥
शल्य उवाच
एवं वदत्यङ्गिरसां वरिष्ठे
बृहस्पतौ लोकपालः कुबेरः ।
वैवस्वतश्चैव यमः पुराणो
देवश्च सोमो वरुणश्चाजगाम ॥ २७ ॥
**शल्य कहते हैं—**राजन्! अंगिराके पुत्रोंमें श्रेष्ठ बृहस्पति जब ऐसा कह रहे थे, उसी समय लोकपाल कुबेर, सूर्यपुत्र यम, पुरातन देवता चन्द्रमा तथा वरुण भी वहाँ आ पहुँचे ॥ २७ ॥
ते वै समागम्य महेन्द्रमूचु-
र्दिष्ट्या त्वाष्ट्रो निहतश्चैव वृत्रः ।
दिष्ट्या च त्वां कुशलिनमक्षतं च
पश्यामो वै निहतारिं च शक्र ॥ २८ ॥
वे सब देवराज इन्द्रसे मिलकर बोले—'शक्र! बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपने त्वष्टाके पुत्र वृत्रासुरका वध किया। हमलोग आपको शत्रु का वध करनेके पश्चात् सकुशल और अक्षत देखते हैं, यह भी बड़े आनन्दकी बात है' ॥ २८ ॥
स तान् यथावच्च हि लोकपालान्
समेत्य वै प्रीतमना महेन्द्रः ।
उवाच चैनान् प्रतिभाष्य शक्रः
संचोदयिष्यन्नहुषस्यान्तरेण ॥ २९ ॥
उन लोकपालोंसे यथायोग्य मिलकर महेन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उन सबको सम्बोधित करके राजा नहुषके भीतर बुद्धिभेद उत्पन्न करनेके लिये प्रेरणा देते हुए कहा— ॥ २९ ॥
राजा देवानां नहुषो घोररूप- स्तत्र साह्यं दीयतां मे भवद्भिः । ते चाब्रुवन् नहुषो घोररूपो दृष्टिविषस्तस्य बिभीम ईश ॥ ३० ॥
‘इन देवताओंका राजा नहुष बड़ा भयंकर हो रहा है। उसे स्वर्गसे हटानेके कार्यमें आपलोग मेरी सहायता करें।’ यह सुनकर उन्होंने उत्तर दिया—‘देवेश्वर! नहुष तो बड़ा भयंकर रूपवाला है। उसकी दृष्टिमें विष है। अतः हमलोग उससे डरते हैं’ ॥ ३० ॥
त्वं चेद् राजानं नहुषं पराजये- स्ततो वयं भागमर्हाम शक्र । इन्द्रोऽब्रवीद् भवतु भवानपां पति- र्यमः कुबेरश्च मयाभिषेकम् ॥ ३१ ॥ सम्प्राप्नुवन्त्वद्य सहैव दैवतै रिपुं जयाम तं नहुषं घोरदृष्टिम् । ततः शक्रं ज्वलनोऽप्याह भागं प्रयच्छ मह्यं तव साह्यं करिष्ये । तमाह शक्रो भविताग्ने तवापि चेन्द्राग्न्योर्वै भाग एको महाक्रतौ ॥ ३२ ॥
‘शक्र! यदि आप हमारी सहायतासे राजा नहुषको पराजित करनेके लिये उद्यत हैं तो हम भी यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी हों।’ इन्द्रने कहा—‘वरुणदेव! आप जलके स्वामी हों, यमराज और कुबेर भी मेरे द्वारा अपने-अपने पदपर अभिषिक्त हों। देवताओंसहित हम सब लोग भयंकर दृष्टिवाले अपने शत्रु नहुषको परास्त करेंगे।’ तब अग्निने भी इन्द्रसे कहा—‘प्रभो! मुझे भी भाग दीजिये, मैं आपकी सहायता करूँगा।’ तब इन्द्रने उनसे कहा—‘अग्निदेव! महायज्ञमें इन्द्र और अग्निका एक सम्मिलित भाग होगा, जिसपर तुम्हारा भी अधिकार रहेगा’ ॥ ३२ ॥
शल्य उवाच
एवं संचिन्त्य भगवान् महेन्द्रः पाकशासनः । कुबेरं सर्वयक्षाणां धनानां च प्रभुं तथा ॥ ३३ ॥
शल्य कहते हैं— राजन्! इस प्रकार सोच-विचारकर पाकशासन भगवान् महेन्द्रने कुबेरको सम्पूर्ण यक्षों तथा धनका अधिपति बना दिया ॥ ३३ ॥
वैवस्वतं पितॄणां च वरुणं चाप्यपां तथा ।
आधिपत्यं ददौ शक्रः संचिन्त्य वरदस्तथा ॥ ३४ ॥
इसी प्रकार वरदायक इन्द्रने खूब सोच-समझकर वैवस्वत यमको पितरोंका तथा वरुणको जलका स्वामित्व प्रदान किया ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्रवरुणादिसंवादे षोडशोऽध्यायः
॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें इन्द्रवरुणादिसंवादविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३४ १/२ श्लोक हैं।]
सप्तदशोऽध्यायः
अगस्त्यजीका इन्द्रसे नहुषके पतनका वृत्तान्त बताना
शल्य उवाच
अथ संचिन्तयानस्य देवराजस्य धीमतः ।
नहुषस्य वधोपायं लोकपालैः सदैवतैः ॥ १ ॥
तपस्वी तत्र भगवानगस्त्यः प्रत्यदृश्यत ।
सोऽब्रवीदर्च्य देवेन्द्रं दिष्ट्या वै वर्धते भवान् ॥ २ ॥
विश्वरूपविनाशेन वृत्रासुरवधेन च ।
दिष्ट्याद्य नहुषो भ्रष्टो देवराज्यात् पुरंदर ।
दिष्ट्या हतारिं पश्यामि भवन्तं बलसूदन ॥ ३ ॥
**शल्य कहते हैं—**युधिष्ठिर! जिस समय बुद्धिमान् देवराज इन्द्र देवताओं तथा लोकपालोंके साथ बैठकर नहुषके वधका उपाय सोच रहे थे, उसी समय वहाँ तपस्वी भगवान् अगस्त्य दिखायी दिये। उन्होंने देवेन्द्रकी पूजा करके कहा—‘सौभाग्यकी बात है कि आप विश्वरूपके विनाश तथा वृत्रासुरके वधसे निरन्तर अभ्युदयशील हो रहे हैं। बलसूदन पुरंदर! यह भी सौभाग्यकी ही बात है कि आज नहुष देवताओंके राज्यसे भ्रष्ट हो गये। बलसूदन! सौभाग्यसे ही मैं आपको शत्रुहीन देख रहा हूँ' ॥ १—३ ॥
इन्द्र उवाच
स्वागतं ते महर्षेऽस्तु प्रीतोऽहं दर्शनात् तव ।
पाद्यमाचमनीयं च गामर्घ्यं च प्रतीच्छ मे ॥ ४ ॥
**इन्द्र बोले—**महर्षे! आपका स्वागत है, आपके दर्शनसे मुझे बड़ी प्रसन्नता मिली है, आपकी सेवामें यह पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय तथा गौ समर्पित है। आप मेरी दी हुई ये सब वस्तुएँ ग्रहण कीजिये ॥ ४ ॥
शल्य उवाच
पूजितं चोपविष्टं तमासने मुनिसत्तमम् ।
पर्यपृच्छत देवेशः प्रहृष्टो ब्राह्मणर्षभम् ॥ ५ ॥
एतदिच्छामि भगवन् कथ्यमानं द्विजोत्तम ।
परिभ्रष्टः कथं स्वर्गान्नहुषः पापनिश्चयः ॥ ६ ॥
**शल्य कहते हैं—**युधिष्ठिर! मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य जब पूजा ग्रहण करके आसनपर विराजमान हुए, उस समय देवेश्वर इन्द्रने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन विप्रशिरोमणिसे पूछा
—'भगवन्! द्विजश्रेष्ठ! मैं आपके शब्दोंमें यह सुनना चाहता हूँ कि पापपूर्ण विचार रखनेवाला नहुष स्वर्गसे किस प्रकार भ्रष्ट हुआ है?' ।।
शृणु शक्र प्रियं वाक्यं यथा राजा दुरात्मवान् ।
स्वर्गाद् भ्रष्टो दुराचारो नहुषो बलदर्पितः ॥ ७ ॥
**अगस्त्यजीने कहा—**इन्द्र! बलके घमंडमें भरा हुआ दुराचारी और दुरात्मा राजा नहुष जिस प्रकार स्वर्गसे भ्रष्ट हुआ है, वह प्रिय समाचार सुनो ॥ ७ ॥
श्रमार्ताश्च वहन्तस्तं नहुषं पापकारिणम् ।
देवर्षयो महाभागास्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ ८ ॥
महाभाग देवर्षि तथा निर्मल अन्तःकरणवाले ब्रह्मर्षि पापाचारी नहुषका बोझ ढोते-ढोते परिश्रमसे पीड़ित हो गये थे ॥ ८ ॥
पप्रच्छुर्नहुषं देव संशयं जयतां वर ।
य इमे ब्रह्मणा प्रोक्ता मन्त्रा वै प्रोक्षणे गवाम् ॥ ९ ॥
एते प्रमाणं भवत उताहो नेति वासव ।
नहुषो नेति तानाह तमसा मूढचेतनः ॥ १० ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ इन्द्र! उस समय उन महर्षियोंने नहुषसे एक संदेह पूछा—‘देवेन्द्र! गौओंके प्रोक्षणके विषयमें जो ये मन्त्र वेदमें बताये गये हैं, इन्हें आप प्रामाणिक मानते हैं या नहीं।' नहुषकी बुद्धि तमोमय अज्ञानके कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही थी। उसने महर्षियोंको उत्तर देते हुए कहा—‘मैं इन वेदमन्त्रोंको प्रमाण नहीं मानता' ॥ ९-१० ॥
ऋषय ऊचुः
अधर्मे सम्प्रवृत्तस्त्वं धर्मं न प्रतिपद्यसे ।
प्रमाणमेतदस्माकं पूर्वं प्रोक्तं महर्षिभिः ॥ ११ ॥
**ऋषिगण बोले—**तुम अधर्ममें प्रवृत्त हो रहे हो, इसलिये धर्मका तत्त्व नहीं समझते हो। पूर्वकालमें महर्षियोंने इन सब मन्त्रोंको हमारे लिये प्रमाणभूत बताया है ॥ ११ ॥
अगस्त्य उवाच
ततो विवदमानः स मुनिभिः सह वासव ।
अथ मामस्पृशन्मूर्ध्नि पादेनाधर्मपीडितः ॥ १२ ॥
**अगस्त्यजी कहते हैं—**इन्द्र! तब नहुष मुनियोंके साथ विवाद करने लगा और अधर्मसे पीड़ित होकर उस पापीने मेरे मस्तकपर पैरसे प्रहार किया ॥ १२ ॥
तेनाभूद्गततेजाश्च निःश्रीकश्च महीपतिः ।
ततस्तं तमसाऽऽविग्नमवोचं भृशपीडितम् ॥ १३ ॥
इससे उसका सारा तेज नष्ट हो गया। वह राजा श्रीहीन हो गया। तब तमोगुणमें डूबकर अत्यन्त पीड़ित हुए नहुषसे मैंने इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥
यस्मात् पूर्वैः कृतं राजन् ब्रह्मर्षिभिरनुष्ठितम् ।
अदुष्टं दूषयसि मे यच्च मूर्द्धन्यस्पृशः पदा ॥ १४ ॥
यच्चापि त्वमृषीन् मूढ ब्रह्मकल्पान् दुरासदान् ।। १५ ।।
वाहान् कृत्वा वाहयसि तेन स्वर्गाद्धतप्रभः ।
ध्वंस पाप परिभ्रष्टः क्षीणपुण्यो महीतले ।। १६ ।।
‘राजन्! पूर्वकालके ब्रह्मर्षियोंने जिसका अनुष्ठान किया है—जिसे प्रमाणभूत माना है, उस निर्दोष वेदमतको जो तुम सदोष बताते हो—उसे अप्रामाणिक मानते हो, इसके सिवा तुमने जो मेरे सिरपर लात मारी है तथा पापात्मा मूढ़! जो तुम ब्रह्माजीके समान दुर्धर्ष तेजस्वी ऋषियोंको वाहन बनाकर उनसे अपनी पालकी धुलवा रहे हो, इससे तेजोहीन हो गये हो। तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया है। अतः स्वर्गसे भ्रष्ट होकर तुम पृथ्वीपर गिरो ।। १४—१६ ।।
दशवर्षसहस्राणि सर्परूपधरो महान् ।
विचरिष्यसि पूर्णेषु पुनः स्वर्गमवाप्स्यसि ।। १७ ।।
‘वहाँ दस हजार वर्षोंतक तुम महान् सर्पका रूप धारण करके विचरोगे और उतने वर्ष पूर्ण हो जानेपर पुनः स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे’ ।। १७ ।।
एवं भ्रष्टो दुरात्मा स देवराज्यादरिंदम ।
दिष्ट्या वर्धामहे शक्र हतो ब्राह्मणकण्टकः ।। १८ ।।
शत्रुदमन शक्र! इस प्रकार दुरात्मा नहुष देवताओंके राज्यसे भ्रष्ट हो गया। ब्राह्मणोंका कण्टक मारा गया। सौभाग्यकी बात है कि अब हमलोगोंकी वृद्धि हो रही है।। त्रिविष्टपं प्रपद्यस्व पाहि लोकाञ्छचीपते । जितेन्द्रियो जितामित्रः स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ १९ ॥ शचीपते! अब आप अपनी इन्द्रियों और शत्रुओंपर विजय पा गये हैं। महर्षिगण आपकी स्तुति करते हैं, अतः आप स्वर्गलोकमें चलें और तीनों लोकोंकी रक्षा करें ।। १९ ।।
शल्य उवाच
ततो देवा भृशं तुष्टा महर्षिगणसंवृताः । पितरश्चैव यक्षाश्च भुजगा राक्षसास्तथा ॥ २० ॥ गन्धर्वा देवकन्याश्च सर्वे चाप्सरसां गणाः । सरांसि सरितः शैलाः सागराश्च विशाम्पते ॥ २१ ॥ शल्य कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर महर्षियोंसे घिरे हुए देवता, पितर, यक्ष, नाग, राक्षस, गन्धर्व, देवकन्याएँ तथा समस्त अप्सराएँ बहुत प्रसन्न हुईं। सरिताएँ, सरोवर, शैल और समुद्र भी बहुत संतुष्ट हुए ।। २०-२१ ।। उपागम्याब्रुवन् सर्वे दिष्ट्या वर्धसि शत्रुहन् । हतश्च नहुषः पापो दिष्ट्यागस्त्येन धीमता । दिष्ट्या पापसमाचारः कृतः सर्पो महीतले ॥ २२ ॥ वे सब लोग इन्द्रके पास आकर बोले—‘शत्रुहन्! आपका अभ्युदय हो रहा है, यह सौभाग्यकी बात है। बुद्धिमान् अगस्त्यजीने पापी नहुषको मार डाला और उस पापाचारीको पृथ्वीपर सर्प बना दिया, यह भी हमारे लिये बड़े हर्ष तथा सौभाग्यकी बात है’ ।। २२ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्रागस्त्यसंवादे नहुषभ्रंशे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें इन्द्र और अगस्त्यके संवादके प्रसंगमें नहुषके पतनसे सम्बन्ध रखनेवाला सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७ ।।
अष्टादशोऽध्यायः
इन्द्रका स्वर्गमें जाकर अपने राज्यका पालन करना, शल्यका युधिष्ठिरको आश्वासन देना और उनसे विदा लेकर दुर्योधनके यहाँ जाना
शल्य उवाच
ततः शक्रः स्तूयमानो गन्धर्वाप्सरसां गणैः ।
ऐरावतं समारुह्य द्विपेन्द्रं लक्षणैर्युतम् ॥ १ ॥
पावकः सुमहातेजा महर्षिश्च बृहस्पतिः ।
यमश्च वरुणश्चैव कुबेरश्च धनेश्वरः ॥ २ ॥
सर्वैर्देवैः परिवृतः शक्रो वृत्रनिषूदनः ।
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च यातस्त्रिभुवनं प्रभुः ॥ ३ ॥
शल्य कहते हैं— युधिष्ठिर! तत्पश्चात् वृत्रासुरको मारनेवाले भगवान् इन्द्र गन्धर्वों और अप्सराओंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए उत्तम लक्षणोंसे युक्त गजराज ऐरावतपर आरूढ़ हो महान् तेजस्वी अग्निदेव, महर्षि बृहस्पति, यम, वरुण, धनाध्यक्ष कुबेर, सम्पूर्ण देवता, गन्धर्वगण तथा अप्सराओंसे घिरकर स्वर्ग-लोकको चले ।। १—३ ।।
स समेत्य महेन्द्राण्या देवराजः शतक्रतुः ।
मुदा परमया युक्तः पालयामास देवराट् ॥ ४ ॥
सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्र अपनी महारानी शचीसे मिलकर अत्यन्त आनन्दित हो स्वर्गका पालन करने लगे ।। ४ ।।
ततः स भगवांस्तत्र अङ्गिराः समदृश्यत ।
अथर्ववेदमन्त्रैश्च देवेन्द्रं समपूजयत् ॥ ५ ॥
तदनन्तर वहाँ भगवान् अंगिराने दर्शन दिया और अथर्ववेदके मन्त्रोंसे देवेन्द्रका पूजन किया ।। ५ ।।
ततस्तु भगवानिन्द्रः संहृष्टः समपद्यत ।
वरं च प्रददौ तस्मै अथर्वाङ्गिरसे तदा ॥ ६ ॥
इससे भगवान् इन्द्र उनपर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उस समय अथर्वांगिरसको यह वर दिया— ।। ६ ।।
अथर्वाङ्गिरसो नाम वेदेऽस्मिन् वै भविष्यति ।
उदाहरणमेतद्धि यज्ञभागं च लप्स्यसे ॥ ७ ॥
‘ब्रह्मन्! आप इस अथर्ववेदमें अथर्वांगिरस नामसे विख्यात होंगे और आपको यज्ञभाग भी प्राप्त होगा। इस विषयमें मेरा यह वचन ही उदाहरण (प्रमाण) होगा’ ।। ७ ।।
एवं सम्पूज्य भगवानथर्वाङ्गिरसं तदा ।
व्यसर्ज्यन्महाराज देवराजः शतक्रतुः ।। ८ ।।
महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार देवराज भगवान् इन्द्रने उस समय अथर्वांगिरसकी पूजा करके उन्हें विदा कर दिया ।। ८ ।।
सम्पूज्य सर्वांस्त्रिदशानृषींश्चापि तपोधनान् ।
इन्द्रः प्रमुदितो राजन् धर्मेणापालयत् प्रजाः ।। ९ ।।
राजन्! इसके बाद सम्पूर्ण देवताओं तथा तपोधन महर्षियोंकी पूजा करके देवराज इन्द्र अत्यन्त प्रसन्न हो धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करने लगे ।। ९ ।।
एवं दुःखमनुप्राप्तमिन्द्रेण सह भार्यया ।
अज्ञातवासश्च कृतः शत्रूणां वधकाङ्क्षया ।। १० ।।
युधिष्ठिर! इस प्रकार पत्नीसहित इन्द्रने बारंबार दुःख उठाया और शत्रुओंके वधकी इच्छासे अज्ञातवास भी किया ।। १० ।।
नात्र मन्युस्त्वया कार्यों यत् क्लिष्टोऽसि महावने ।
द्रौपद्या सह राजेन्द्र भ्रातृभिश्च महात्मभिः ।। ११ ।।
राजेन्द्र! तुमने अपने महामना भाइयों तथा द्रौपदीके साथ महान् वनमें रहकर जो क्लेश सहन किया है, उसके लिये तुम्हें अनुताप नहीं करना चाहिये ।। ११ ।।
एवं त्वमपि राजेन्द्र राज्यं प्राप्स्यसि भारत ।
वृत्रं हत्वा यथा प्राप्तः शक्रः कौरवनन्दन ।। १२ ।।
भरतवंशी कुरुकुलनन्दन महाराज! जैसे इन्द्रने वृत्रासुरको मारकर अपना राज्य प्राप्त किया था, इसी प्रकार तुम भी अपना राज्य प्राप्त करोगे ।। १२ ।।
दुराचारश्च नहुषो ब्रह्मद्विट् पापचेतनः ।
अगस्त्यशापाभिहतो विनष्टः शाश्वतीः समाः ।। १३ ।।
एवं तव दुरात्मानः शत्रवः शत्रुसूदन ।
क्षिप्रं नाशं गमिष्यन्ति कर्णदुर्योधनादयः ।। १४ ।।
शत्रुसूदन! दुराचारी, ब्राह्मणद्रोही और पापात्मा नहुष जिस प्रकार अगस्त्यके शापसे ग्रस्त होकर अनन्त वर्षोंके लिये नष्ट हो गया, इसी प्रकार तुम्हारे दुरात्मा शत्रु कर्ण और दुर्योधन आदि शीघ्र ही विनाशके मुखमें चले जायँगे ।। १३-१४ ।।
ततः सागरपर्यन्तां भोक्ष्यसे मेदिनीमिमाम् ।
भ्रातृभिः सहितो वीर द्रौपद्या च सहानया ।। १५ ।।
वीर! तत्पश्चात् तुम अपने भाइयों तथा इस द्रौपदीके साथ समुद्रोंसे घिरे हुए इस समस्त भूमण्डलका राज्य भोगोगे ।। १५ ।।
उपाख्यानमिदं शक्रविजयं वेदसम्मितम् ।
राज्ञा व्यूढेष्वनीकेषु श्रोतव्यं जयमिच्छता ॥ १६ ॥
शत्रुओंकी सेना जब मोर्चा बाँधकर खड़ी हो, उस समय विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजाको यह ‘इन्द्रविजय’ नामक वेदतुल्य उपाख्यान अवश्य सुनना चाहिये ॥ १६ ॥
तस्मात् संश्रावयामि त्वां विजयं जयतां वर ।
संस्तूयमाना वर्धन्ते महात्मानो युधिष्ठिर ॥ १७ ॥
अतः विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें यह ‘इन्द्रविजय’ नामक उपाख्यान सुनाया है; क्योंकि जब महात्मा देवताओंकी स्तुति-प्रशंसा की जाती है, तब वे मानवकी उन्नति करते हैं ॥ १७ ॥
क्षत्रियाणामभावोऽयं युधिष्ठिर महात्मनाम् ।
दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर! दुर्योधनके अपराधसे तथा भीमसेन और अर्जुनके बलसे यह महामना क्षत्रियोंके संहारका अवसर उपस्थित हो गया है ॥ १८ ॥
आख्यानमिन्द्रविजयं य इदं नियतः पठेत् ।
धूतपाप्मा जितस्वर्गः परत्रेह च मोदते ॥ १९ ॥
जो पुरुष नियमपरायण हो इस इन्द्रविजय नामक उपाख्यानका पाठ करता है, वह पापरहित हो स्वर्गपर विजय पाता तथा इहलोक और परलोकमें भी सुखी होता है ॥ १९ ॥
न चारिजं भयं तस्य नापुत्रो वा भवेन्नरः ।
नापदं प्राप्नुयात् कांचिद् दीर्घमायुश्च विन्दति ।
सर्वत्र जयमाप्नोति न कदाचित् पराजयम् ॥ २० ॥
वह मनुष्य कभी संतानहीन नहीं होता, उसे शत्रुजनित भय नहीं सताता, उसपर कोई आपत्ति नहीं आती, वह दीर्घायु होता है, उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती है तथा कभी उसकी पराजय नहीं होती है ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमाश्वासितो राजा शल्येन भरतर्षभ ।
पूजयामास विधिवच्छल्यं धर्मभृतां वरः ॥ २१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ जनमेजय! शल्यके इस प्रकार आश्वासन देनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने उनका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ २१ ॥
श्रुत्वा तु शल्यवचनं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
प्रत्युवाच महाबाहुर्मद्रराजमिदं वचः ॥ २२ ॥
शल्यकी बात सुनकर कुन्तीपुत्र महाबाहु युधिष्ठिर मद्रराजसे यह वचन बोले— ॥ २२ ॥ भवान् कर्णस्य सारथ्यं करिष्यति न संशयः । तत्र तेजोवधः कार्यः कर्णस्यार्जुनसंस्तवः ॥ २३ ॥ ‘मामाजी! जब अर्जुनके साथ कर्णका युद्ध होगा, उस समय आप कर्णका सारथ्य करेंगे, इसमें संशय नहीं है। उस समय आप अर्जुनकी प्रशंसा करके कर्णके तेज और उत्साहका नाश करें (यही मेरा अनुरोध है)’ ॥
शल्य उवाच एवमेतत् करिष्यामि यथा मां सम्प्रभाषसे । यच्चान्यदपि शक्ष्यामि तत् करिष्याम्यहं तव ॥ २४ ॥ **शल्य बोले—**राजन्! तुम जैसा कह रहे हो, ऐसा ही करूँगा और भी (तुम्हारे हितके लिये) जो कुछ मुझसे हो सकेगा, वह सब तुम्हारे लिये करूँगा ॥
वैशम्पायन उवाच ततस्त्वामन्त्र्य कौन्तेयाञ्छल्यो मद्राधिपस्तदा । जगाम सबलः श्रीमान् दुर्योधनमरिंदम ॥ २५ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुदमन जनमेजय! तदनन्तर समस्त कुन्तीकुमारोंसे विदा लेकर श्रीमान् मद्रराज शल्य अपनी सेनाके साथ दुर्योधनके यहाँ चले गये ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि शल्यगमने अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें शल्यगमनविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥