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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

ऋषियोंद्वारा कुरुक्षेत्रकी सीमा और महिमाका वर्णन

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त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

ऋषियोंद्वारा कुरुक्षेत्रकी सीमा और महिमाका वर्णन

ऋषय ऊचुः

प्रजापतेरुत्तरवेदिरुच्यते
सनातनं राम समन्तपञ्चकम् ।
समीजिरे यत्र पुरा दिवौकसो
वरेण सत्रेण महावरप्रदाः ॥ १ ॥

ऋषियोंने कहा— बलरामजी! समन्तपंचक क्षेत्र सनातन तीर्थ है। इसे प्रजापतिकी उत्तरवेदी कहते हैं। वहाँ प्राचीनकालमें महान् वरदायक देवताओंने बहुत बड़े यज्ञका अनुष्ठान किया था ॥ १ ॥

पुरा च राजर्षिवरेण धीमता
बहूनि वर्षाण्यमितेन तेजसा ।
प्रकृष्टमेतत् कुरुणा महात्मना
ततः कुरुक्षेत्रमितीह पप्रथे ॥ २ ॥

पहले अमित तेजस्वी बुद्धिमान् राजर्षिप्रवर महात्मा कुरुने इस क्षेत्रको बहुत वर्षोंतक जोता था, इसलिये इस जगत्में इसका नाम कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध हो गया ॥ २ ॥

राम उवाच

किमर्थं कुरुणा कृष्टं क्षेत्रमेतन्महात्मना ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कथ्यमानं तपोधनाः ॥ ३ ॥

बलरामजीने पूछा— तपोधनो! महात्मा कुरुने इस क्षेत्रको किसलिये जोता था? मैं आपलोगोंके मुखसे यह कथा सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

ऋषय ऊचुः

पुरा किल कुरुं राम कर्षन्तं सततोत्थितम् ।
अभ्येत्य शक्रस्त्रिदिवात् पर्यपृच्छत कारणम् ॥ ४ ॥

ऋषि बोले— राम! सुना जाता है कि पूर्वकालमें सदा प्रत्येक शुभ कार्यके लिये उद्यत रहनेवाले कुरु जब इस क्षेत्रको जोत रहे थे, उस समय इन्द्रने स्वर्गसे आकर इसका कारण पूछा ॥ ४ ॥

इन्द्र उवाच

किमिदं वर्तते राजन् प्रयत्नेन परेण च ।

राजर्षे किमभिप्रेतं येनेयं कृष्यते क्षितिः ॥ ५ ॥
**इन्द्रने प्रश्न किया—**राजन्! यह महान् प्रयत्नके साथ क्या हो रहा है? राजर्षे! आप क्या चाहते हैं, जिसके कारण यह भूमि जोत रहे हैं? ॥ ५ ॥

कुरुरुवाच
इह ये पुरुषाः क्षेत्रे मरिष्यन्ति शतक्रतो ।
ते गमिष्यन्ति सुकृताँल्लोकान् पापविवर्जितान् ॥ ६ ॥
**कुरुने कहा—**शतक्रतो! जो मनुष्य इस क्षेत्रमें मरेंगे, वे पुण्यात्माओंके पापरहित लोकोंमें जायँगे ॥ ६ ॥

अवहस्य ततः शक्रो जगाम त्रिदिवं पुनः ।
राजर्षिरप्यनिर्विण्णः कर्षत्येव वसुंधराम् ॥ ७ ॥
तब इन्द्र उनका उपहास करके स्वर्गलोकमें चले गये। राजर्षि कुरु उस कार्यसे उदासीन न होकर वहाँकी भूमि जोतते ही रहे ॥ ७ ॥

आगम्यागम्य चैवैनं भूयोभूयोऽवहस्य च ।
शतक्रतुरनिर्विण्णं पृष्ट्वा पृष्ट्वा जगाम ह ॥ ८ ॥
शतक्रतु इन्द्र अपने कार्यसे विरत न होनेवाले कुरुके पास बारंबार आते और उनसे पूछ-पूछकर प्रत्येक बार उनकी हँसी उड़ाकर स्वर्गलोकमें चले जाते थे ॥ ८ ॥

यदा तु तपसोग्रेण चकर्ष वसुधां नृपः ।
ततः शक्रोऽब्रवीद् देवान् राजर्षैर्यच्चिकीर्षितम् ॥ ९ ॥
जब राजा कुरु कठोर तपस्यापूर्वक पृथ्वीको जोतते ही रह गये, तब इन्द्रने देवताओंसे राजर्षि कुरुकी वह चेष्टा बतायी ॥ ९ ॥

एतच्छ्रुत्वाब्रुवन् देवाः सहस्राक्षमिदं वचः ।
वरेण च्छन्द्यतां शक्र राजर्षैर्यदि शक्यते ॥ १० ॥
यह सुनकर देवताओंने सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे कहा—'शक्र! यदि सम्भव हो तो राजर्षि कुरुको वर देकर अपने अनुकूल किया जाय ॥ १० ॥

यदि ह्यत्र प्रमीता वै स्वर्गं गच्छन्ति मानवाः ।
अस्माननिष्ट्वा क्रतुभिर्भागो नो न भविष्यति ॥ ११ ॥
'यदि यहाँ मरे हुए मानव यज्ञोंद्वारा हमारा पूजन किये बिना ही स्वर्गलोकमें चले जायँगे, तब तो हमलोगोंका भाग सर्वथा नष्ट हो जायगा' ॥ ११ ॥

आगम्य च ततः शक्रस्तदा राजर्षिमब्रवीत् ।
अलं खेदेन भवतः क्रियतां वचनं मम ॥ १२ ॥
मानवा ये निराहारा देहं त्यक्ष्यन्त्यतन्द्रिताः ।
युधि वा निहताः सम्यगपि तिर्यग्गता नृप ॥ १३ ॥

ते स्वर्गभाजो राजेन्द्र भविष्यन्ति महामते ।
तब इन्द्रने वहाँसे आकर राजर्षि कुरुसे कहा—‘नरेश्वर! आप व्यर्थ कष्ट क्यों उठाते हैं? मेरी बात मान लीजिये। महामते! राजेन्द्र! जो मनुष्य और पशु-पक्षी यहाँ निराहार रहकर देह त्याग करेंगे अथवा युद्धमें मारे जायँगे, वे स्वर्गलोकके भागी होंगे’ ॥ १२-१३ १/२ ॥
तथास्त्विति ततो राजा कुरुः शक्रमुवाच ह ॥ १४ ॥
ततस्तमभ्यनुज्ञाप्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
जगाम त्रिदिवं भूयः क्षिप्रं बलनिषूदनः ॥ १५ ॥
तब राजा कुरुने इन्द्रसे कहा—‘देवराज! ऐसा ही हो’ तदनन्तर कुरुसे विदा ले बलसूदन इन्द्र फिर शीघ्र ही प्रसन्नचित्तसे स्वर्गलोकमें चले गये ॥ १४-१५ ॥
एवमेतद् यदुश्रेष्ठ कृष्टं राजर्षिणा पुरा ।
शक्रेण चाभ्यनुज्ञातं ब्रह्माद्यैश्च सुरैस्तथा ॥ १६ ॥
यदुश्रेष्ठ! इस प्रकार प्राचीनकालमें राजर्षि कुरुने इस क्षेत्रको जोता और इन्द्र तथा ब्रह्मा आदि देवताओंने इसे वर देकर अनुगृहीत किया ॥ १६ ॥
नातः परतरं पुण्यं भूमेः स्थानं भविष्यति ।
इह तप्स्यन्ति ये केचित्तपः परमकं नराः ॥ १७ ॥
देहत्यागेन ते सर्वे यास्यन्ति ब्रह्मणः क्षयम् ।
भूतलका कोई भी स्थान इससे बढ़कर पुण्यदायक नहीं होगा। जो मनुष्य यहाँ रहकर बड़ी भारी तपस्या करेंगे, वे सब लोग देहत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जायँगे ॥
ये पुनः पुण्यभाजो वै दानं दास्यन्ति मानवाः ॥ १८ ॥
तेषां सहस्रगुणितं भविष्यत्यचिरेण वै ।
जो पुण्यात्मा मानव वहाँ दान देंगे, उनका वह दान शीघ्र ही सहस्रगुना हो जायगा ॥ १८ १/२ ॥
ये चेह नित्यं मनुजा निवत्स्यन्ति शुभैषिणः ॥ १९ ॥
यमस्य विषयं ते तु न द्रक्ष्यन्ति कदाचन ।
जो मानव शुभकी इच्छा रखकर यहाँ नित्य निवास करेंगे, उन्हें कभी यमका राज्य नहीं देखना पड़ेगा ॥ १९ १/२ ॥
यक्ष्यन्ति ये च क्रतुभिर्महद्भिर्मनुजेश्वराः ॥ २० ॥
तेषां त्रिविष्टपे वासो यावद्भूमिर्धरिष्यति ।
जो नरेश्वर यहाँ बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करेंगे, वे जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक स्वर्गलोकमें निवास करेंगे ॥ २० १/२ ॥
अपि चात्र स्वयं शक्रो जगौ गाथां सुराधिपः ॥ २१ ॥
कुरुक्षेत्रनिबद्धां वै तां शृणुष्व हलायुध ।

हलायुध! स्वयं देवराज इन्द्रने कुरुक्षेत्रके सम्बन्धमें यहाँ जो गाथा गायी है, उसे आप सुनिये ॥ २१ १/२ ॥ पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद् वायुना समुदीरिताः । अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् ॥ २२ ॥ ‘कुरुक्षेत्रसे वायुद्वारा उड़ायी हुई धूलियाँ भी यदि ऊपर पड़ जायँ तो वे पापी मनुष्यको भी परमपदकी प्राप्ति कराती हैं ॥ २२ ॥ सुरर्षभा ब्राह्मणसत्तमाश्च तथा नृगाद्या नरदेवमुख्याः । इष्ट्वा महाहैः क्रतुभिर्नृसिंहाः संत्यज्य देहान् सुगतिं प्रपन्नाः ॥ २३ ॥ ‘श्रेष्ठ देवताओ! यहाँ ब्राह्मणशिरोमणि तथा नृप आदि मुख्य-मुख्य पुरुषसिंह नरेश महान् यज्ञोंका अनुष्ठान करके देहत्यागके पश्चात् उत्तम गतिको प्राप्त हुए हैं ॥ तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं रामह्रदानां च मचक्रुकस्य च । एतत् कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं प्रजापतेरुत्तरवेदिरुच्यते ॥ २४ ॥ ‘तरन्तुक, अरन्तुक, रामह्रद (परशुराम कुण्ड) तथा मचक्रुक—इनके बीचका जो भूभाग है, यही समन्तपंचक एवं कुरुक्षेत्र है। इसे प्रजापतिकी उत्तरवेदी कहते हैं ॥ २४ ॥ शिवं महापुण्यमिदं दिवौकसां सुसम्मतं सर्वगुणैः समन्वितम् । अतश्च सर्वे निहता नृपा रणे यास्यन्ति पुण्यां गतिमक्षयां सदा ॥ २५ ॥ ‘यह महान् पुण्यप्रद, कल्याणकारी, देवताओंका प्रिय एवं सर्वगुणसम्पन्न तीर्थ है। अतः यहाँ रणभूमिमें मारे गये सम्पूर्ण नरेश सदा पुण्यमयी अक्षय गति प्राप्त करेंगे’ ॥ इत्युवाच स्वयं शक्रः सह ब्रह्मादिभिस्तदा । तच्चानुमोदितं सर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥ २६ ॥ ब्रह्मा आदि देवताओंसहित साक्षात् इन्द्रने ऐसी बातें कही थीं तथा ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीने इन सारी बातोंका अनुमोदन किया था ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने कुरुक्षेत्रकथने त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें कुरुक्षेत्रकी महिमाका वर्णनविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा

हुआ ।। ५३ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2875)

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चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

प्लक्षप्रस्रवण आदि तीर्थों तथा सरस्वतीकी महिमा एवं नारदजीसे कौरवोंके विनाश और भीम तथा दुर्योधनके युद्धका समाचार सुनकर बलरामजीका उसे देखनेके लिये जाना

वैशम्पायन उवाच

कुरुक्षेत्रं ततो दृष्ट्वा दत्त्वा दायांश्च सात्वतः ।
आश्रमं सुमहद् दिव्यमगमज्जनमेजय ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सात्वतवंशी बलरामजी कुरुक्षेत्रका दर्शन कर वहाँ बहुत-सा धन दान करके उस स्थानसे एक महान् एवं दिव्य आश्रममें गये ॥ १ ॥

मधूकाम्रवणोपेतं प्लक्षन्यग्रोधसंकुलम् ।
चिरबिल्वयुतं पुण्यं पनसार्जुनसंकुलम् ॥ २ ॥
तं दृष्ट्वा यादवश्रेष्ठः प्रवरं पुण्यलक्षणम् ।
पप्रच्छ तानृषीन् सर्वान् कस्याश्रमवरस्त्वयम् ॥ ३ ॥
महुआ और आमके वन उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। पाकड़ और बरगदके वृक्ष वहाँ अपनी छाया फैला रहे थे। चिलबिल, कटहल और अर्जुन (समूह)-के पेड़ चारों ओर भरे हुए थे। पुण्यदायक लक्षणोंसे युक्त उस पुण्यमय श्रेष्ठ आश्रमका दर्शन करके यादवश्रेष्ठ बलरामजीने उन समस्त ऋषियोंसे पूछा कि 'यह सुन्दर आश्रम किसका है?' ॥ २-३ ॥

ते तु सर्वे महात्मानमूचू राजन् हलायुधम् ।
शृणु विस्तरशो राम यस्यायं पूर्वमाश्रमः ॥ ४ ॥
राजन्! तब वे सभी ऋषि महात्मा हलधरसे बोले—'बलरामजी! पहले यह आश्रम जिसके अधिकारमें था, उसकी कथा विस्तारपूर्वक सुनिये— ॥ ४ ॥

अत्र विष्णुः पुरा देवस्तप्तवांस्तप उत्तमम् ।
अत्रास्य विधिवद् यज्ञाः सर्वे वृत्ताः सनातनाः ॥ ५ ॥
'प्राचीनकालमें यहाँ भगवान् विष्णुने उत्तम तपस्या की है, यहीं उनके सभी सनातन यज्ञ विधिपूर्वक सम्पन्न हुए हैं ॥ ५ ॥

अत्रैव ब्राह्मणी सिद्धा कौमारब्रह्मचारिणी ।
योगयुक्ता दिवं याता तपःसिद्धा तपस्विनी ॥ ६ ॥
'यहीं कुमारावस्थासे ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाली एक सिद्ध ब्राह्मणी रहती थी, जो तपःसिद्ध तपस्विनी थी। वह योगयुक्त होकर स्वर्गलोकमें चली गयी ॥ ६ ॥

बभूव श्रीमती राजन् शाण्डिल्यस्य महात्मनः । सुता धृतव्रता साध्वी नियता ब्रह्मचारिणी ॥ ७ ॥ ‘राजन्! नियमपूर्वक व्रतधारण और ब्रह्मचर्यपालन करनेवाली वह तेजस्विनी साध्वी महात्मा शाण्डिल्यकी सुपुत्री थी’ ॥ ७ ॥ सा तु तप्त्वा तपो घोरं दुष्करं स्त्रीजनेन ह । गता स्वर्गं महाभागा देवब्राह्मणपूजिता ॥ ८ ॥ ‘स्त्रियोंके लिये जो अत्यन्त दुष्कर था, ऐसा घोर तप करके देवताओं और ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हुई वह महान् सौभाग्यशालिनी देवी स्वर्गलोकको चली गयी थी’ ॥ ८ ॥ श्रुत्वा ऋषीणां वचनमाश्रमं तं जगाम ह । ऋषींस्तानभिवाद्याथ पार्श्वे हिमवतोऽच्युतः ॥ ९ ॥ संध्याकार्याणि सर्वाणि निर्वर्त्यारुरुहेऽचलम् । ऋषियोंका वचन सुनकर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले बलरामजी उस आश्रममें गये। वहाँ हिमालयके पार्श्वभागमें उन ऋषियोंको प्रणाम करके संध्या-वन्दन आदि सब कार्य करनेके अनन्तर वे हिमालयपर चढ़ने लगे ॥ ९½ ॥ नातिदूरं ततो गत्वा नगं तालध्वजो बली ॥ १० ॥ पुण्यं तीर्थवरं दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः । प्रभावं च सरस्वत्याः प्लक्षप्रस्रवणं बलः ॥ ११ ॥ जिनकी ध्वजापर तालका चिह्न सुशोभित होता है, वे बलरामजी उस पर्वतपर थोड़ी ही दूर गये थे कि उनकी दृष्टि एक पुण्यमय उत्तम तीर्थपर पड़ी। वह सरस्वतीकी उत्पत्तिका स्थान प्लक्षप्रस्रवण नामक तीर्थ था। उसका दर्शन करके बलरामजीको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ १०-११ ॥ सम्प्राप्तः कारपवनं प्रवरं तीर्थमुत्तमम् । हलायुधस्तत्र चापि दत्त्वा दानं महाबलः ॥ १२ ॥ आप्लुतः सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ । संतर्पयामास पितॄन् देवांश्च रणदुर्मदः ॥ १३ ॥ तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्ब्राह्मणैः सह । मित्रावरुणयोः पुण्यं जगामाश्रममच्युतः ॥ १४ ॥ फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थमें गये। महाबली हलधरने वहाँके निर्मल, पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जलमें गोता लगाकर ब्राह्मणोंको दान दे देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् रणदुर्मद बलरामजी यतियों और ब्राह्मणोंके साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुणके पवित्र आश्रमपर गये ॥ १२—१४ ॥ इन्द्रोऽग्निरर्यमा चैव यत्र प्राक् प्रीतिमाप्नुवन् । तं देशं कारपवनाद् यमुनायां जगाम ह ॥ १५ ॥

स्नात्वा तत्र च धर्मात्मा परां प्रीतिमवाप्य च ।
ऋषिभिश्चैव सिद्धैश्च सहितो वै महाबलः ॥ १६ ॥
उपविष्टः कथाः शुभ्राः शुश्राव यदुपुङ्गवः ।
जहाँ पूर्वकालमें इन्द्र, अग्नि और अर्यमाने बड़ी प्रसन्नता प्राप्त की थी, वह स्थान यमुनाके तटपर है। कारपवनसे उस तीर्थमें जाकर महाबली धर्मात्मा बलरामने स्नान करके बड़ा हर्ष प्राप्त किया। फिर वे यदुपुंगव बलभद्र ऋषियों और सिद्धोंके साथ बैठकर उत्तम कथाएँ सुनने लगे ॥ १५-१६ ½ ॥

तथा तु तिष्ठतां तेषां नारदो भगवानृषिः ॥ १७ ॥
आजगामाथ तं देशं यत्र रामो व्यवस्थितः ।
इस प्रकार वे लोग वहीं ठहरे हुए थे, तबतक देवर्षि भगवान् नारद भी उनके पास उसी स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ बलरामजी विराजमान थे ॥ १७ ½ ॥

जटामण्डलसंवीतः स्वर्णचीरो महातपाः ॥ १८ ॥
हेमदण्डधरो राजन् कमण्डलुधरस्तथा ।
कच्छपीं सुखशब्दां तां गृह्य वीणां मनोरमाम् ॥ १९ ॥
राजन्! महातपस्वी नारद जटामण्डलसे मण्डित हो सुनहरा चीर धारण किये हुए थे। उन्होंने कमण्डलु, सोनेका दण्ड तथा सुखदायक शब्द करनेवाली कच्छपी नामक मनोरम वीणा भी ले रखी थी ॥ १८-१९ ॥

नृत्ये गीते च कुशलो देवब्राह्मणपूजितः ।
प्रकर्ता कलहानां च नित्यं च कलहप्रियः ॥ २० ॥
वे नृत्य-गीतमें कुशल, देवताओं तथा ब्राह्मणोंसे सम्मानित, कलह करानेवाले तथा सदैव कलहके प्रेमी हैं ॥ २० ॥

तं देशमगमद् यत्र श्रीमान् रामो व्यवस्थितः ।
प्रत्युत्थाय च तं सम्यक् पूजयित्वा यतव्रतम् ॥ २१ ॥
देवर्षिं पर्यपृच्छत् स यथा वृत्तं कुरून् प्रति ।
वे उस स्थानपर गये, जहाँ तेजस्वी बलराम बैठे हुए थे। उन्होंने उठकर नियम और व्रतका पालन करनेवाले देवर्षिका भलीभाँति पूजन करके उनसे कौरवोंका समाचार पूछा ॥ २१ ½ ॥

ततोऽस्याकथयद् राजन् नारदः सर्वधर्मवित् ॥ २२ ॥
सर्वमेतद् यथावृत्तमतीव कुरुसंक्षयम् ।
राजन्! तब सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता नारदजीने उनसे यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता दिया कि कुरुकुलका अत्यन्त संहार हो गया है ॥ २२ ½ ॥

ततोऽब्रवीद् रौहिणेयो नारदं दीनया गिरा ॥ २३ ॥
किमवस्थं तु तत् क्षत्रं ये तु तत्राभवन् नृपाः ।

श्रुतमेतन्मया पूर्वं सर्वमेव तपोधन ॥ २४ ॥
विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ।
तब रोहिणीनन्दन बलरामने दीनवाणीमें नारदजीसे पूछा—‘तपोधन! जो राजा लोग वहाँ उपस्थित हुए थे, उन सब क्षत्रियोंकी क्या अवस्था हुई है, यह सब तो मैंने पहले ही सुन लिया था। इस समय कुछ विशेष और विस्तृत समाचार जाननेके लिये मेरे मनमें अत्यन्त उत्सुकता हुई है’ ॥

नारद उवाच
पूर्वमेव हतो भीष्मो द्रोणः सिन्धुपतिस्तथा ॥ २५ ॥
हतो वैकर्तनः कर्णः पुत्राश्चास्य महारथाः ।
भूरिश्रवा रौहिणेय मद्रराजश्च वीर्यवान् ॥ २६ ॥
नारदजीने कहा—रोहिणीनन्दन! भीष्मजी तो पहले ही मारे गये। फिर सिंधुराज जयद्रथ, द्रोण, वैकर्तन कर्ण तथा उसके महारथी पुत्र भी मारे गये हैं। भूरिश्रवा तथा पराक्रमी मद्रराज शल्य भी मार डाले गये ॥

एते चान्ये च बहवस्तत्र तत्र महाबलाः ।
प्रियान् प्राणान् परित्यज्य जयार्थं कौरवस्य वै ॥ २७ ॥
राजानो राजपुत्राश्च समरेष्वनिवर्तिनः ।
ये तथा और भी बहुत-से महाबली राजा और राजकुमार जो युद्धसे पीछे हटनेवाले नहीं थे, कुरुराज दुर्योधनकी विजयके लिये अपने प्यारे प्राणोंका परित्याग करके स्वर्गलोकमें चले गये हैं ॥ २७ १/२ ॥

अहतांस्तु महाबाहो शृणु मे तत्र माधव ॥ २८ ॥
धार्तराष्ट्रबले शेषास्त्रयः समितिमर्दनाः ।
कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् ॥ २९ ॥
महाबाहु माधव! जो वहाँ नहीं मारे गये हैं, उनके नाम भी मुझसे सुन लो। दुर्योधनकी सेनामें कृपाचार्य, कृतवर्मा और पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा—ये शत्रुदलका मर्दन करनेवाले तीन ही वीर शेष रह गये हैं ॥ २८-२९ ॥

तेऽपि वै विद्रुता राम दिशो दश भयात् तदा ।
दुर्योधने हते शल्ये विद्रुतेषु कृपादिषु ॥ ३० ॥
ह्रदं द्वैपायनं नाम विवेश भृशदुःखितः ।
परंतु बलरामजी! जब शल्य मारे गये, तब ये तीनों भी भयके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें पलायन कर गये थे। शल्यके मारे जाने और कृप आदिके भाग जानेपर दुर्योधन बहुत दुःखी हुआ और भागकर द्वैपायनसरोवरमें जा छिपा ॥ ३० १/२ ॥

शयानं धार्तराष्ट्रं तु सलिले स्तम्भिते तदा ॥ ३१ ॥

पाण्डवाः सह कृष्णेन वाग्भिरुग्राभिरार्दयन् ।
जब दुर्योधन जलको स्तम्भित करके उसके भीतर सो रहा था, उस समय पाण्डवलोग भगवान् श्रीकृष्णके साथ वहाँ आ पहुँचे और अपनी कठोर बातोंसे उसे कष्ट पहुँचाने लगे ॥ ३१ १/२ ॥
स तुद्यमानो बलवान् वाग्भी राम समन्ततः ॥ ३२ ॥
उत्थितः स हृदाद् वीरः प्रगृह्य महतीं गदाम् ।
बलराम! जब सब ओरसे कड़वी बातोंद्वारा उसे व्यथित किया जाने लगा, तब वह बलवान् वीर विशाल गदा हाथमें लेकर सरोवरसे उठ खड़ा हुआ ॥ ३२ १/२ ॥
स चाप्युपगतो योद्धुं भीमेन सह साम्प्रतम् ॥ ३३ ॥
भविष्यति तयोरद्य युद्धं राम सुदारुणम् ।
यदि कौतूहलं तेऽस्ति व्रज माधव मा चिरम् ।
पश्य युद्धं महाघोरं शिष्ययोर्यदि मन्यसे ॥ ३४ ॥
इस समय वह भीमके साथ युद्ध करनेके लिये उनके पास जा पहुँचा है। राम! आज उन दोनोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होगा, माधव! यदि तुम्हारे मनमें भी उसे देखनेका कौतूहल हो तो शीघ्र जाओ। यदि ठीक समझो तो अपने दोनों शिष्योंका वह महाभयंकर युद्ध अपनी आँखोंसे देख लो ॥ ३३-३४ ॥

वैशम्पायन उवाच
नारदस्य वचः श्रुत्वा तानभ्यर्च्य द्विजर्षभान् ।
सर्वान् विसर्जयामास ये तेनाभ्यागताः सह ॥ ३५ ॥
गम्यतां द्वारकां चेति सोऽन्वशादनुयायिनः ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! नारदजीकी बात सुनकर बलरामजीने अपने साथ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें विदा कर दिया और सेवकोंको आज्ञा दे दी कि तुम लोग द्वारका चले जाओ ॥ ३५ १/२ ॥
सोऽवतीर्याचलश्रेष्ठात् प्लक्षप्रस्रवणाच्छुभात् ॥ ३६ ॥
ततः प्रीतमना रामः श्रुत्वा तीर्थफलं महत् ।
विप्राणां संनिधौ श्लोकमगायदिममच्युतः ॥ ३७ ॥
फिर वे प्लक्षप्रस्रवण नामक शुभ पर्वतशिखरसे नीचे उतर आये और तीर्थ-सेवनका महान् फल सुनकर प्रसन्नचित्त हो अच्युत बलरामने ब्राह्मणोंके समीप इस श्लोकका गान किया— ॥ ३६-३७ ॥
सरस्वतीवाससमा कुतो रतिः
सरस्वतीवाससमाः कुतो गुणाः ।
सरस्वतीं प्राप्य दिवं गता जनाः

सदा स्मरिष्यन्ति नदीं सरस्वतीम् ॥ ३८ ॥

‘सरस्वती नदीके तटपर निवास करनेमें जो सुख और आनन्द है, वह अन्यत्र कहाँसे मिल सकता है? सरस्वतीतटपर निवास करनेमें जो गुण हैं, वे अन्यत्र कहाँ हैं? सरस्वतीका सेवन करके स्वर्गलोकमें पहुँचे हुए मनुष्य सदा सरस्वती नदीका स्मरण करते रहेंगे’ ॥ ३८ ॥

सरस्वती सर्वनदीषु पुण्या
सरस्वती लोकशुभावहा सदा ।
सरस्वतीं प्राप्य जनाः सुदुष्कृतं
सदा न शोचन्ति परत्र चेह च ॥ ३९ ॥

‘सरस्वती सब नदियोंमें पवित्र है। सरस्वती सदा सम्पूर्ण जगत्‌का कल्याण करनेवाली है। सरस्वतीको पाकर मनुष्य इहलोक और परलोकमें कभी पापोंके लिये शोक नहीं करते हैं’ ॥ ३९ ॥

ततो मुहुर्मुहुः प्रीत्या प्रेक्षमाणः सरस्वतीम् ।
हयैर्युक्तं रथं शुभ्रमातिष्ठत परंतपः ॥ ४० ॥

तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजी बारंबार प्रेमपूर्वक सरस्वती नदीकी ओर देखते हुए घोड़ोंसे जुते उज्ज्वल रथपर आरूढ़ हुए ॥ ४० ॥

स शीघ्रगामिना तेन रथेन यदुपुङ्गवः ।
दिदृक्षुरभिसम्प्राप्तः शिष्ययुद्धमुपस्थितम् ॥ ४१ ॥

उसी शीघ्रगामी रथके द्वारा तत्काल उपस्थित हुए दोनों शिष्योंका युद्ध देखनेके लिये यदुपुंगव बलरामजी उनके पास जा पहुँचे ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने
चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2881)

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

बलरामजीकी सलाहसे सबका कुरुक्षेत्रके समन्तपंचक तीर्थमें जाना और वहाँ भीम तथा दुर्योधनमें गदायुद्धकी तैयारी

वैशम्पायन उवाच

एवं तदभवद् युद्धं तुमुलं जनमेजय।
यत्र दुःखान्वितो राजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम्॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार वह तुमुल युद्ध हुआ, जिसके विषयमें अत्यन्त दुःखी हुए राजा धृतराष्ट्रने इस तरह प्रश्न किया॥ १॥

धृतराष्ट्र उवाच

रामं संनिहितं दृष्ट्वा गदायुद्ध उपस्थिते।
मम पुत्रः कथं भीमं प्रत्ययुध्यत संजय॥ २॥
धृतराष्ट्र बोले— संजय! गदायुद्ध उपस्थित होनेपर बलरामजीको निकट आया देख मेरे पुत्रने भीमसेनके साथ किस प्रकार युद्ध किया?॥ २॥

संजय उवाच

रामसांनिध्यमासाद्य पुत्रो दुर्योधनस्तव।
युद्धकामो महाबाहुः समहृष्यत वीर्यवान्॥ ३॥
संजयने कहा— राजन्! बलरामजीको निकट पाकर युद्धकी इच्छा रखनेवाला आपका शक्तिशाली पुत्र महाबाहु दुर्योधन बड़ा प्रसन्न हुआ॥ ३॥
दृष्ट्वा लाङ्गलिनं राजा प्रत्युत्थाय च भारत।
प्रीत्या परमया युक्तः समभ्यर्च्य यथाविधि॥ ४॥
आसनं च ददौ तस्मै पर्यपृच्छदनामयम्।
भरतनन्दन! हलधरको देखते ही राजा युधिष्ठिर उठकर खड़े हो गये और बड़े प्रेमसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करके उन्हें बैठनेके लिये उन्होंने आसन दिया तथा उनके स्वास्थ्यका समाचार पूछा॥ ४ ½॥
ततो युधिष्ठिरं रामो वाक्यमेतदुवाच ह॥ ५॥
मधुरं धर्मसंयुक्तं शूराणां हितमेव च।
तब बलरामने युधिष्ठिरसे मधुर वाणीमें शूरवीरोंके लिये हितकर धर्मयुक्त वचन कहा—॥ ५ ½॥

मया श्रुतं कथयतामृषीणां राजसत्तम ॥ ६ ॥ कुरुक्षेत्रं परं पुण्यं पावनं स्वर्ग्यमेव च । दैवतैर्ऋषिभिर्जुष्टं ब्राह्मणैश्च महात्मभिः ॥ ७ ॥ ‘नृपश्रेष्ठ! मैंने माहात्म्य-कथा कहनेवाले ऋषियोंके मुखसे यह सुना है कि कुरुक्षेत्र परम पावन पुण्यमय तीर्थ है। वह स्वर्ग प्रदान करनेवाला है। देवता, ऋषि तथा महात्मा ब्राह्मण सदा उसका सेवन करते हैं ॥ ६-७ ॥

तत्र वै योत्स्यमाना ये देहं त्यक्ष्यन्ति मानवाः । तेषां स्वर्गे ध्रुवो वासः शक्रेण सह मारिष ॥ ८ ॥ ‘माननीय नरेश! जो मानव वहाँ युद्ध करते हुए अपने शरीरका त्याग करेंगे, उनका निश्चय ही स्वर्गलोकमें इन्द्रके साथ निवास होगा ॥ ८ ॥

तस्मात् समन्तपञ्चकमितो याम द्रुतं नृप । प्रथितोत्तरवेदी सा देवलोके प्रजापतेः ॥ ९ ॥ तस्मिन् महापुण्यतमे त्रैलोक्यस्य सनातने । संग्रामे निधनं प्राप्य ध्रुवं स्वर्गे भविष्यति ॥ १० ॥ ‘अतः नरेश्वर! हम सब लोग यहाँसे शीघ्र ही समन्तपंचक तीर्थमें चलें। वह भूमि देवलोकमें प्रजापतिकी उत्तरवेदीके नामसे प्रसिद्ध है। त्रिलोकीके उस परम पुण्यतम सनातन तीर्थमें युद्ध करके मृत्युको प्राप्त हुआ मनुष्य निश्चय ही स्वर्गलोकमें जायगा’ ॥ ९-१० ॥

तथेत्युक्त्वा महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । समन्तपञ्चकं वीरः प्रायादभिमुखः प्रभुः ॥ ११ ॥ ततो दुर्योधनो राजा प्रगृह्य महतीं गदाम् । पद्भ्याममर्षी द्युतिमानगच्छत् पाण्डवैः सह ॥ १२ ॥ महाराज! तब ‘बहुत अच्छा’, कहकर वीर राजा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर समन्तपंचक तीर्थकी ओर चल दिये। उस समय अमर्षमें भरा हुआ तेजस्वी राजा दुर्योधन हाथमें विशाल गदा लेकर पाण्डवोंके साथ पैदल ही चला ॥ ११-१२ ॥

तथाऽऽयान्तं गदाहस्तं वर्मणा चापि दंशितम् । अन्तरिक्षचरा देवाः साधु साध्वित्यपूजयन् ॥ १३ ॥ गदा हाथमें लिये कवच धारण किये दुर्योधनको इस प्रकार आते देख आकाशमें विचरनेवाले देवता साधु-साधु कहकर उसकी प्रशंसा करने लगे ॥ १३ ॥

वातिकाश्चारणा ये तु दृष्ट्वा ते हर्षमागताः । स पाण्डवैः परिवृतः कुरुराजस्तवात्मजः ॥ १४ ॥ मत्तस्येव गजेन्द्रस्य गतिमास्थाय सोऽव्रजत् ।

वातिक और चारण भी उसे देखकर हर्षसे खिल उठे। पाण्डवोंसे घिरा हुआ आपका पुत्र कुरुराज दुर्योधन मतवाले गजराजकी-सी गतिका आश्रय लेकर चल रहा था ।। १४ १/२ ।।

ततः शङ्खनिनादेन भेरीणां च महास्वनैः ॥ १५ ॥
सिंहनादैश्च शूराणां दिशः सर्वाः प्रपूरिताः ।
उस समय शंखोंकी ध्वनि, रणभेरीयोंके गम्भीर घोष और शूरवीरोंके सिंहनादोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठी थीं ।। १५ १/२ ।।

ततस्ते तु कुरुक्षेत्रं प्राप्ता नरवरोत्तमाः ॥ १६ ॥
प्रतीच्यभिमुखं देशं यथोद्दिष्टं सुतेन ते ।
दक्षिणेन सरस्वत्याः स्वयनं तीर्थमुत्तमम् ॥ १७ ॥
तस्मिन् देशे त्वनिरिणे ते तु युद्धमरोचयन् ।
तदनन्तर वे सभी श्रेष्ठ नरवीर आपके पुत्रके साथ पश्चिमाभिमुख चलकर पूर्वोक्त कुरुक्षेत्रमें आ पहुँचे। वह उत्तम तीर्थ सरस्वतीके दक्षिण तटपर स्थित एवं सद्गतिकी प्राप्ति करानेवाला था। वहाँ कहीं ऊसर भूमि नहीं थी। उसी स्थानमें आकर सबने युद्ध करना पसंद किया ।। १६-१७ १/२ ।।

ततो भीमो महाकोटिं गदां गृह्याथ वर्मभृत् ॥ १८ ॥
बिभ्रद्रूपं महाराज सदृशं हि गरुत्मतः ।
फिर तो भीमसेन कवच पहनकर बहुत बड़ी नोकवाली गदा हाथमें ले गरुडका-सा रूप धारण करके युद्धके लिये तैयार हो गये ।। १८ १/२ ।।

अवबद्धशिरस्त्राणः संख्ये काञ्चनवर्मभृत् ॥ १९ ॥
रराज राजन् पुत्रस्ते काञ्चनः शैलराडिव ।
तत्पश्चात् दुर्योधन भी सिरपर टोप लगाये सोनेका कवच बाँधे भीमके साथ युद्धके लिये डट गया। राजन्! उस समय आपका पुत्र सुवर्णमय गिरिराज मेरुके समान शोभा पा रहा था ।। १९ १/२ ।।

वर्मभ्यां संयतौ वीरौ भीमदुर्योधनावुभौ ॥ २० ॥
संयुगे च प्रकाशेते संरब्धाविव कुञ्जरौ ।
कवच बाँधे हुए दोनों वीर भीमसेन और दुर्योधन युद्धभूमिमें कुपित हुए दो मतवाले हाथियोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। २० १/२ ।।

रणमण्डलमध्यस्थौ भ्रातरौ तौ नरर्षभौ ॥ २१ ॥
अशोभेतां महाराज चन्द्रसूर्याविवोदितौ ।
महाराज! रणमण्डलके बीचमें खड़े हुए ये दोनों नरश्रेष्ठ भ्राता उदित हुए चन्द्रमा और सूर्यके समान शोभा पा रहे थे ।। २१ १/२ ।।

तावन्योन्यं निरीक्षेतां क्रुद्धाविव महाद्विपौ ॥ २२ ॥
दहन्तौ लोचनै राजन् परस्परवधैषिणौ ।
राजन्! क्रोधमें भरे हुए दो गजराजोंके समान एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले वे दोनों वीर परस्पर इस प्रकार देखने लगे, मानो नेत्रोंद्वारा एक-दूसरेको भस्म कर डालेंगे ॥ २२ १/२ ॥

सम्प्रहृष्टमना राजन् गदामादाय कौरवः ॥ २३ ॥
सृक्किणी संलिहन् राजन् क्रोधरक्तेक्षणः श्वसन् ।
ततो दुर्योधनो राजन् गदामादाय वीर्यवान् ॥ २४ ॥
भीमसेनमभिप्रेक्ष्य गजो गजमिवाह्वयत् ।
नरेश्वर! तदनन्तर शक्तिशाली कुरुवंशी राजा दुर्योधन प्रसन्नचित्त हो गदा हाथमें ले क्रोधसे लाल आँखें करके गलफरोंको चाटता और लंबी साँसें खींचता हुआ भीमसेनकी ओर देखकर उसी प्रकार ललकारने लगा, जैसे एक हाथी दूसरे हाथीको पुकार रहा हो ॥

अद्रिसारमयीं भीमस्तथैवादाय वीर्यवान् ॥ २५ ॥
आह्वयामास नृपतिं सिंहं सिंहो यथा वने ।
उसी प्रकार पराक्रमी भीमसेनने लोहेकी गदा लेकर राजा दुर्योधनको ललकारा, मानो वनमें एक सिंह दूसरे सिंहको पुकार रहा हो ॥ २५ १/२ ॥

तावुद्यतगदापाणी दुर्योधनवृकोदरौ ॥ २६ ॥
संयुगे च प्रकाशेतां गिरी सशिखराविव ।
दुर्योधन और भीमसेन दोनोंकी गदाएँ ऊपरको उठी थीं। उस समय रणभूमिमें वे दोनों शिखरयुक्त दो पर्वतोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २६ १/२ ॥

तावुभौ समतिक्रुद्धावुभौ भीमपराक्रमौ ॥ २७ ॥
उभौ शिष्यौ गदायुद्धे रौहिणेयस्य धीमतः ।
दोनों ही अत्यन्त क्रोधमें भरे थे। दोनों भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले थे और दोनों ही गदायुद्धमें बुद्धिमान् रोहिणीनन्दन बलरामजीके शिष्य थे ॥ २७ १/२ ॥

उभौ सदृशकर्माणौ यमवासवयोरिव ॥ २८ ॥
तथा सदृशकर्माणौ वरुणस्य महाबलौ ।
वासुदेवस्य रामस्य तथा वैश्रवणस्य च ॥ २९ ॥
सदृशौ तौ महाराज मधुकैटभयोर्युधि ।
उभौ सदृशकर्माणौ तथा सुन्दोपसुन्दयोः ॥ ३० ॥
रामरावणयोश्चैव वालिसुग्रीवयोस्तथा ।
तथैव कालस्य समौ मृत्योश्चैव परंतपौ ॥ ३१ ॥
महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों महाबली वीर यमराज, इन्द्र, वरुण, श्रीकृष्ण, बलराम, कुबेर, मधु, कैटभ, सुन्द, उपसुन्द, राम, रावण तथा बालि और सुग्रीवके

समान पराक्रम दिखानेवाले थे तथा काल एवं मृत्युके समान जान पड़ते थे ।। २८—३१ ।। अन्योन्यमभिधावन्तौ मत्ताविव महाद्विपौ । वासितासंगमे दृप्तौ शरदीव मदोत्कटौ ।। ३२ ।। उभौ क्रोधविषं दीप्तं वमन्तावुरगाविव । अन्योन्यमभिसंरब्धौ प्रेक्षमाणावरिंदमौ ।। ३३ ।। जैसे शरद्-ऋतुमें मैथुनकी इच्छावाली हथिनीसे समागम करनेके लिये दो मतवाले हाथी मदोन्मत्त होकर एक-दूसरेपर धावा करते हों, उसी प्रकार अपने बलका गर्व रखनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेसे टक्कर लेनेको उद्यत थे। शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों योद्धा दो सर्पोंके समान प्रज्वलित क्रोधरूपी विषका वमन करते हुए एक-दूसरेको रोषपूर्वक देख रहे थे ।। ३२-३३ ।। उभौ भरतशार्दूलौ विक्रमेण समन्वितौ । सिंहाविव दुराधर्षौ गदायुद्धविशारदौ ।। ३४ ।। भरतवंशके वे विक्रमशाली सिंह दो जंगली सिंहोंके समान दुर्जय थे और दोनों ही गदायुद्धके विशेषज्ञ माने जाते थे ।। ३४ ।। नखदंष्ट्रायुधौ वीरौ व्याघ्राविव दुरुत्सहौ । प्रजासंहरणे क्षुब्धौ समुद्राविव दुस्तरौ ।। ३५ ।। लोहिताङ्गाविव क्रुद्धौ प्रतपन्तौ महारथौ । पंजों और दाढ़ोंसे प्रहार करनेवाले दो व्याघ्रोंके समान उन दोनों वीरोंका वेग शत्रुओंके लिये दुःसह था। प्रलयकालमें विक्षुब्ध हुए दो समुद्रोंके समान उन्हें पार करना कठिन था। वे दोनों महारथी क्रोधमें भरे हुए दो मंगल ग्रहोंके समान एक-दूसरेको ताप दे रहे थे ।। ३५ १/२ ।। पूर्वपश्चिमजौ मेघौ प्रेक्षमाणावरिंदमौ ।। ३६ ।। गर्जमानौ सुविषमं क्षरन्तौ प्रावृषीव हि । जैसे वर्षा-ऋतुमें पूर्व और पश्चिम दिशाओंमें स्थित दो वृष्टिकारक मेघ भयंकर गर्जना कर रहे हों, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर एक-दूसरेको देखते हुए भयानक सिंहनाद कर रहे थे ।। रश्मियुक्तौ महात्मानौ दीप्तिमन्तौ महाबलौ ।। ३७ ।। ददृशाते कुरुश्रेष्ठौ कालसूर्याविवोदितौ । महामनस्वी महाबली कुरुश्रेष्ठ दुर्योधन और भीमसेन प्रखर किरणोंसे युक्त, प्रलयकालमें उगे हुए दो दीप्तिशाली सूर्योंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ।। ३७ १/२ ।। व्याघ्राविव सुसंरब्धौ गर्जन्ताविव तोयदौ ।। ३८ ।। जहृषाते महाबाहू सिंहकेसरिणाविव ।

रोषमें भरे हुए दो व्याघ्रों, गरजते हुए दो मेघों और दहाड़ते हुए दो सिंहोंके समान वे दोनों महाबाहु वीर हर्षोत्फुल्ल हो रहे थे ॥ ३८ ½ ॥

गजाविव सुसंरब्धौ ज्वलिताविव पावकौ ॥ ३९ ॥
ददृशाते महात्मानौ सशृङ्गाविव पर्वतौ ।
वे दोनों महामनस्वी योद्धा परस्पर कुपित हुए दो हाथियों, प्रज्वलित हुई दो अग्नियों और शिखरयुक्त दो पर्वतोंके समान दिखायी देते थे ॥ ३९ ½ ॥

रोषात् प्रस्फुरमाणोष्ठौ निरीक्षन्तौ परस्परम् ॥ ४० ॥
तौ समेतौ महात्मानौ गदाहस्तौ नरोत्तमौ ।
उन दोनोंके ओठ रोषसे फड़क रहे थे। वे दोनों नरश्रेष्ठ एक-दूसरेपर दृष्टिपात करते हुए हाथमें गदा ले परस्पर भिड़नेके लिये उद्यत थे ॥ ४० ½ ॥

उभौ परमसंहृष्टावुभौ परमसम्मतौ ॥ ४१ ॥
सदश्वाविव हेषन्तौ बृहन्ताविव कुञ्जरौ ।
वृषभाविव गर्जन्तौ दुर्योधनवृकोदरौ ॥ ४२ ॥
दैत्याविव बलोन्मत्तौ रेजतुस्तौ नरोत्तमौ ।
दोनों अत्यन्त हर्ष और उत्साहमें भरे थे। दोनों ही बड़े सम्मानित वीर थे। मनुष्योंमें श्रेष्ठ वे दुर्योधन और भीमसेन हींसते हुए दो अच्छे घोड़ों, चिग्घाड़ते हुए दो गजराजों और हँकड़ते हुए दो साँड़ों तथा बलसे उन्मत्त हुए दो दैत्योंके समान शोभा पाते थे ॥ ४१-४२ ½ ॥

ततो दुर्योधनो राजन्निदमाह युधिष्ठिरम् ॥ ४३ ॥
भ्रातृभिः सहितं चैव कृष्णेन च महात्मना ।
रामेणामितवीर्येण वाक्यं शौटीर्यसम्मतम् ॥ ४४ ॥
केकयैः सृञ्जयैर्दृप्तं पञ्चालैश्च महात्मभिः ।
राजन्! तदनन्तर दुर्योधनने अमितपराक्रमी बलराम, महात्मा श्रीकृष्ण, महामनस्वी पांचाल, सृंजय, केकयगण तथा अपने भाइयोंके साथ खड़े हुए अभिमानी युधिष्ठिरसे इस प्रकार गर्वयुक्त वचन कहा— ॥ ४३-४४ ½ ॥

इदं व्यवसितं युद्धं मम भीमस्य चोभयोः ॥ ४५ ॥
उपोपविष्टाः पश्यध्वं सहितैर्नृपपुङ्गवैः ।
‘वीरो! मेरा और भीमसेनका जो यह युद्ध निश्चित हुआ है, इसे आप लोग सभी श्रेष्ठ नरेशोंके साथ निकट बैठकर देखिये’ ॥ ४५ ½ ॥

श्रुत्वा दुर्योधनवचः प्रत्यपद्यन्त तत्तथा ॥ ४६ ॥
ततः समुपविष्टं तत् सुमहद्राजमण्डलम् ।
विराजमानं ददृशे दिवीवादित्यमण्डलम् ॥ ४७ ॥

तेषां मध्ये महाबाहुः श्रीमान् केशवपूर्वजः ।

उपविष्टो महाराज पूज्यमानः समन्ततः ।। ४८ ।।

शुशुभे राजमध्यस्थो नीलवासाः सितप्रभः ।

नक्षत्रैरिव सम्पूर्णो वृतो निशि निशाकरः ।। ४९ ।।

दुर्योधनकी यह बात सुनकर सब लोगोंने उसे स्वीकार कर लिया, फिर तो राजाओंका

वह विशाल समूह वहाँ सब ओर बैठ गया। नरेशोंकी वह मण्डली आकाशमें सूर्यमण्डलके

समान दिखायी दे रही थी। उन सबके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णके बड़े भ्राता तेजस्वी

महाबाहु बलरामजी विराजमान हुए। महाराज! सब ओरसे सम्मानित होते हुए

नीलाम्बरधारी, गौरकान्ति बलभद्रजी राजाओंके बीचमें वैसे ही शोभा पा रहे थे, जैसे रात्रिमें

नक्षत्रोंसे घिरे हुए पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित होते हैं ।। ४६—४९ ।।

तौ तथा तु महाराज गदाहस्तौ सुदुःसहौ ।

अन्योन्यं वाग्भिरुग्राभिस्तक्षमाणौ व्यवस्थितौ ।। ५० ।।

महाराज! हाथमें गदा लिये वे दोनों दुःसह वीर एक-दूसरेको अपने कठोर वचनोंद्वारा

पीड़ा देते हुए खड़े थे ।। ५० ।।

अप्रियाणि ततोऽन्योन्यमुक्त्वा तौ कुरुसत्तमौ ।

उदीक्षन्तौ स्थितौ तत्र वृत्रशक्रौ यथाऽऽहवे ।। ५१ ।।

परस्पर कटु वचनोंका प्रयोग करके वे दोनों कुरुकुलके श्रेष्ठतम वीर वहाँ युद्धस्थलमें

वृत्रासुर और इन्द्रके समान एक-दूसरेको देखते हुए युद्धके लिये डटे रहे ।। ५१ ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि युद्धारम्भे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।।

५५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें युद्धका आरम्भविषयक पचपनवाँ

अध्याय पूरा हुआ ।। ५५ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2888)

⬅ विषय-सूची (TOC)

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

दुर्योधनके लिये अपशकुन, भीमसेनका उत्साह तथा भीम और दुर्योधनमें वाग्युद्धके पश्चात् गदायुद्धका आरम्भ

वैशम्पायन उवाच

ततो वाग्युद्धमभवत् तुमुलं जनमेजय ।
यत्र दुःखान्वितो राजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर भीमसेन और दुर्योधनमें भयंकर वाग्युद्ध होने लगा। इस प्रसंगको सुनकर राजा धृतराष्ट्र बहुत दुःखी हुए और संजयसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

धिगस्तु खलु मानुष्यं यस्य निष्ठेयमीदृशी ।
एकादशचमूभर्ता यत्र पुत्रो ममानघ ॥ २ ॥
आज्ञाप्य सर्वान् नृपतीन् भुक्त्वा चेमां वसुंधराम् ।
गदामादाय वेगेन पदातिः प्रस्थितो रणे ॥ ३ ॥

‘निष्पाप संजय! जिसका परिणाम ऐसा दुःखद होता है, उस मानव-जन्मको धिक्कार है! मेरा पुत्र एक दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंका स्वामी था। उसने सब राजाओंपर हुक्म चलाया और सारी पृथ्वीका अकेले उपभोग किया; किंतु अन्तमें उसकी यह दशा हुई कि गदा हाथमें लेकर उसे वेगपूर्वक पैदल ही युद्धमें जाना पड़ा ॥ २-३ ॥

भूत्वा हि जगतो नाथो ह्यनाथ इव मे सुतः ।
गदामुद्यम्य यो याति किमन्यद् भागधेयतः ॥ ४ ॥

‘जो मेरा पुत्र सम्पूर्ण जगत्का नाथ था, वही अनाथकी भाँति गदा हाथमें लेकर युद्धस्थलमें पैदल जा रहा था। इसे भाग्यके सिवा और क्या कहा जा सकता है? ॥ ४ ॥

अहो दुःखं महत् प्राप्तं पुत्रेण मम संजय ।
एवमुक्त्वा स दुःखार्तो विरराम जनाधिपः ॥ ५ ॥

‘संजय! हाय! मेरे पुत्रने बड़ा भारी दुःख उठाया।' ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र दुःखसे पीड़ित हो चुप हो रहे ॥ ५ ॥

संजय उवाच

स मेघनिनदो हर्षात्निनदन्निव गोवृषः ।
आजुहाव तदा पार्थं युद्धाय युधि वीर्यवान् ॥ ६ ॥

**संजयने कहा—**महाराज! उस समय रणभूमिमें मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले पराक्रमी दुर्योधनने हर्षमें भरकर जोर-जोरसे शब्द करनेवाले साँड़की भाँति सिंहनाद करके कुन्तीपुत्र भीमसेनको युद्धके लिये ललकारा ॥ ६ ॥
भीममाह्वयमाने तु कुरुराजे महात्मनि ।
प्रादुरासन् सुघोराणि रूपाणि विविधान्युत ॥ ७ ॥
महामनस्वी कुरुराज दुर्योधन जब भीमसेनका आह्वान करने लगा, उस समय नाना प्रकारके भयंकर अपशकुन प्रकट हुए ॥ ७ ॥
ववुर्वाताः सनिर्घाताः पांशुवर्षं पपात च ।
बभूवुश्च दिशः सर्वास्तिमिरेण समावृताः ॥ ८ ॥
महास्वनाः सनिर्घातास्तुमुला लोमहर्षणाः ।
पेतुस्तथोल्काः शतशः स्फोटयन्त्यो नभस्तलात् ॥ ९ ॥
राहुश्चाग्रसदादित्यमपर्वणि विशाम्पते ।
चकम्पे च महाकम्पं पृथिवी सवनद्रुमा ॥ १० ॥
बिजलीकी गड़गड़ाहटके साथ प्रचण्ड वायु चलने लगी, सब ओर धूलिकी वर्षा होने लगी, सम्पूर्ण दिशाएँ अन्धकारसे आच्छन्न हो गयीं, आकाशसे महान् शब्द तथा वज्रकी-सी गड़गड़ाहटके साथ रोंगटे खड़े कर देनेवाली सैकड़ों भयंकर उल्काएँ भूतलको विदीर्ण करती हुई गिरने लगीं। प्रजानाथ! अमावास्याके बिना ही राहुने सूर्यको ग्रस लिया, वन और वृक्षोंसहित सारी पृथिवी जोर-जोरसे काँपने लगी ॥ ८—१० ॥
रूक्षाश्च वाताः प्रववुर्नीचैः शर्करकर्षिणः ।
गिरीणां शिखराण्येव न्यपतन्त महीतले ॥ ११ ॥
नीचे धूल और कंकड़की वर्षा करती हुई रूखी हवा चलने लगी। पर्वतोंके शिखर टूट-टूटकर पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ ११ ॥
मृगा बहुविधाकाराः सम्पतन्ति दिशो दश ।
दीप्ताः शिवाश्चाप्यनदन् घोररूपाः सुदारुणाः ॥ १२ ॥
नाना प्रकारकी आकृतिवाले मृग दसों दिशाओंमें दौड़ लगाने लगे। अत्यन्त भयंकर एवं घोररूप धारण करनेवाली सियारिनें जिनका मुख अग्निसे प्रज्वलित हो रहा था, अमंगलसूचक बोली बोल रही थीं ॥ १२ ॥
निर्घाताश्च महाघोरा बभूवुर्लोमहर्षणाः ।
दीप्तायां दिशि राजेन्द्र मृगाश्चाशुभवेदिनः ॥ १३ ॥
राजेन्द्र! अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी शब्द प्रकट हो रहे थे, दिशाएँ मानो जल रही थीं और मृग किसी भावी अमंगलकी सूचना दे रहे थे ॥ १३ ॥
उदपानगताश्चापो व्यवर्धन्त समन्ततः ।
अशरीरा महानादाः श्रूयन्ते स्म तदा नृप ॥ १४ ॥