महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१६४-
चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
दोनों सेनाओंका घमासान युद्ध और दुर्योधनका द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये सैनिकोंको आदेश
संजय उवाच
प्रकाशिते तदा लोके रजसा तमसाऽऽवृते ।
समाजग्मुरथो वीराः परस्परवधैषिणः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! उस समय धूल और अन्धकारसे ढकी हुई रणभूमिमें इस प्रकार उजेला होनेपर एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले वीर सैनिक आपसमें भिड़ गये ॥ १ ॥
ते समेत्य रणे राजन् शस्त्रप्रासासिधारिणः ।
परस्परमुदैक्षन्त परस्परकृतागसः ॥ २ ॥
महाराज! समरांगणमें परस्पर भिड़कर वे नाना प्रकारके शस्त्र, प्रास और खड्ग आदि धारण करनेवाले योद्धा, जो परस्पर अपराधी थे, एक-दूसरेकी ओर देखने लगे ॥ २ ॥
प्रदीपानां सहस्रैश्च दीप्यमानैः समन्ततः ।
रत्नाचितैः स्वर्णदण्डैर्गन्धतैलावसिञ्चितैः ॥ ३ ॥
चारों ओर हजारों मशालें जल रही थीं। उनके डंडे सोनेके बने हुए थे और उनमें रत्न जड़े हुए थे। उन मशालोंपर सुगन्धित तेल डाला जाता था ॥ ३ ॥
देवगन्धर्वदीपाद्यैः प्रभाभिरधिकोज्ज्वलैः ।
विरराज तदा भूमिर्ग्रहैर्द्यौरिव भारत ॥ ४ ॥
भारत! उन्हींमें देवताओं और गन्धर्वोंके भी दीप आदि जल रहे थे, जो अपनी विशेष प्रभाके कारण अधिक प्रकाशित हो रहे थे। उनके द्वारा उस समय रणभूमि नक्षत्रोंसे आकाशकी भाँति सुशोभित हो रही थी ॥ ४ ॥
उल्काशतैः प्रज्वलितै रणभूमिर्व्यराजत ।
दह्यमानेव लोकानामभावे च वसुंधरा ॥ ५ ॥
सैकड़ों प्रज्वलित उल्काओं (मशालों)-से वह रणभूमि ऐसी शोभा पा रही थी, मानो प्रलयकालमें यह सारी पृथ्वी दग्ध हो रही हो ॥ ५ ॥
व्यदीप्यन्त दिशः सर्वाः प्रदीपैस्तैः समन्ततः ।
वर्षाप्रदोषे खद्योतैर्वृता वृक्षा इवाबभुः ॥ ६ ॥
उन प्रदीपोंसे सब ओर सारी दिशाएँ ऐसी प्रदीप्त हो उठीं, मानो वर्षाके सायंकालमें जुगनुओंसे घिरे हुए वृक्ष जगमगा रहे हों ॥ ६ ॥
असज्जन्त ततो वीरा वीरेष्वेव पृथक् पृथक् ।
नागा नागैः समाजग्मुस्तुरगा ह्यसादिभिः ॥ ७ ॥
उस समय वीरगण विपक्षी वीरोंके साथ पृथक्-पृथक् भिड़ गये। हाथी हाथियोंके और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ जूझने लगे ॥ ७ ॥
रथा रथवरैरेव समाजग्मुर्मुदा युताः ।
तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ८ ॥
चतुरङ्गस्य सैन्यस्य सम्पातश्च महानभूत् ।
इसी प्रकार रथी श्रेष्ठ रथियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करने लगे। उस भयंकर प्रदोषकालमें आपके पुत्रकी आज्ञासे वहाँ चतुरङ्गिणी सेनामें भारी मारकाट मच गयी ॥
ततोऽर्जुनो महाराज कौरवाणामनीकिनीम् ॥ ९ ॥
व्यधमत् त्वरया युक्तः क्षपयन् सर्वपार्थिवान् ।
महाराज! तदनन्तर अर्जुन बड़ी उतावलीके साथ समस्त राजाओंका संहार करते हुए कौरव-सेनाका विनाश करने लगे ॥ ९ १/२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन् प्रविष्टे संरब्धे मम पुत्रस्य वाहिनीम् ॥ १० ॥
अमृष्यमाणे दुर्धर्षे कथमासीन्मनो हि वः ।
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! क्रोध और अमर्षमें भरे हुए दुर्धर्ष वीर अर्जुन जब मेरे पुत्रकी सेनामें प्रविष्ट हुए, उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई? ॥
किमकुर्वत सैन्यानि प्रविष्टे परपीड़ने ॥ ११ ॥
दुर्योधनश्च किं कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ।
शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले अर्जुनके प्रवेश करनेपर मेरी सेनाओंने क्या किया? तथा दुर्योधनने उस समयके अनुरूप कौन-सा कार्य उचित माना? ॥ ११ १/२ ॥
के चैनं समरे वीरं प्रत्युद्ययुररिंदमाः ॥ १२ ॥
द्रोणं च के व्यरक्षन्त प्रविष्टे श्वेतवाहने ।
समरांगणमें शत्रुओंका दमन करनेवाले कौन-कौन-से योद्धा वीर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े। श्वेतवाहन अर्जुनके कौरव-सेनाके भीतर घुस आनेपर किन लोगोंने द्रोणाचार्यकी रक्षा की ॥ १२ १/२ ॥
केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं के च द्रोणस्य सव्यतः ॥ १३ ॥
के पृष्ठतश्चाप्यभवन् वीरा वीरान् विनिघ्नतः ।
के पुरस्तादगच्छन्त निघ्नन्तः शात्रवान् रणे ॥ १४ ॥
कौन-कौन-से योद्धा द्रोणाचार्यके रथके दाहिने पहियेकी रक्षा करते थे और कौन-कौन-से बायें पहियेकी? कौन-कौन-से वीर वीरोंका वध करनेवाले द्रोणाचार्यके पृष्ठभागके रक्षक
थे और रणमें शत्रुसैनिकोंका संहार करनेवाले कौन-कौन-से योद्धा आचार्यके आगे-आगे चलते थे? ।। १३-१४ ।। यत् प्राविशन्महेष्वासः पञ्चालानपराजितः । नृत्यन्निव नरव्याघ्रो रथमार्गेषु वीर्यवान् ।। १५ ।। महाधनुर्धर, पराक्रमी एवं किसीसे पराजित न होनेवाले पुरुषसिंह द्रोणाचार्यने रथके मार्गोंपर नृत्य-सा करते हुए वहाँ पांचालोंकी सेनामें प्रवेश किया था ।। १५ ।। यो ददाह शरैर्द्रोणः पञ्चालानां रथव्रजान् । धूमकेतुरिव क्रुद्धः कथं मृत्युमुपेयिवान् ।। १६ ।। जिन आचार्य द्रोणने क्रोधमें भरे हुए अग्निदेवके समान अपने बाणोंकी ज्वालासे पांचाल महारथियोंके समुदायोंको जलाकर भस्म कर दिया था, वे कैसे मृत्युको प्राप्त हुए? ।। १६ ।। अव्यग्रानेव हि परान् कथयस्यपराजितान् । हृष्टानुदीर्णान् संग्रामे न तथा सूत मामकान् ।। १७ ।। सूत! तुम मेरे शत्रुओंको तो व्यग्रतारहित, अपराजित, हर्ष और उत्साहसे युक्त तथा संग्राममें वेगपूर्वक आगे बढ़नेवाले ही बता रहे हो; परंतु मेरे पुत्रोंकी ऐसी अवस्था नहीं बताते ।। १७ ।। हतांश्चैव विदीर्णांश्च विप्रकीर्णांश्च शंससि । रथिनो विरथांश्चैव कृतान् युद्धेषु मामकान् ।। १८ ।। सभी युद्धोंमें मेरे पक्षके रथियोंको तुम हताहत, छिन्न-भिन्न, तितर-बितर तथा रथहीन हुआ ही बता रहे हो ।। १८ ।।
संजय उवाच
द्रोणस्य मतमाज्ञाय योद्धुकामस्य तां निशाम् । दुर्योधनो महाराज वश्यान् भ्रातृनुवाच ह ।। १९ ।। कर्णं च वृषसेनं च मद्रराजं च कौरव । दुर्धर्षं दीर्घबाहुं च ये च तेषां पदानुगाः ।। २० ।। **संजय कहते हैं—**कुरुनन्दन महाराज! युद्धकी इच्छावाले द्रोणाचार्यका मत जानकर दुर्योधनने उस रातमें अपने वशवर्ती भाइयोंसे तथा कर्ण, वृषसेन, मद्रराज शल्य, दुर्धर्ष, दीर्घबाहु तथा जो-जो उनके पीछे चलनेवाले थे, उन सबसे इस प्रकार कहा— ।। द्रोणं यत्ताः पराक्रान्ताः सर्वे रक्षन्तु पृष्ठतः । हार्दिक्यो दक्षिणं चक्रं शल्यश्चैवोत्तरं तथा ।। २१ ।। ‘तुम सब लोग सावधान रहकर पराक्रमपूर्वक पीछेकी ओरसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करो। कृतवर्मा उनके दाहिने पहियेकी और राजा शल्य बायें पहियेकी रक्षा करें’ ।। २१ ।।
त्रिगर्तानां च ये शूरा हतशिष्टा महारथाः । तांश्चैव पुरतः सर्वान् पुत्रस्ते समचोदयत् ॥ २२ ॥ राजन्! त्रिगर्तोंके जो शूरवीर महारथी मरनेसे शेष रह गये थे, उन सबको आपके पुत्रने द्रोणाचार्यके आगे-आगे चलनेकी आज्ञा देते हुए कहा— ॥ २२ ॥
आचार्यों हि सुसंयत्तो भृशं यत्ताश्च पाण्डवाः । तं रक्षत सुसंयत्ता निघ्नन्तं शात्रवान् रणे ॥ २३ ॥ ‘आचार्य पूर्णतः सावधान हैं, पाण्डव भी विजयके लिये विशेष यत्नशील एवं सावधान हैं। तुमलोग रणभूमिमें शत्रु-सैनिकोंका संहार करते हुए आचार्यकी पूरी सावधानीके साथ रक्षा करो ॥ २३ ॥
द्रोणो हि बलवान् युद्धे क्षिप्रहस्तः प्रतापवान् । निर्जयेत् त्रिदशान् युद्धे किमु पार्थान् ससोमकान् ॥ २४ ॥ क्योंकि द्रोणाचार्य बलवान्, प्रतापी और युद्धमें शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले हैं। वे संग्राममें देवताओंको भी परास्त कर सकते हैं; फिर कुन्तीके पुत्रों और सोमकोंकी तो बात ही क्या है? ॥ २४ ॥
ते यूयं सहिताः सर्वे भृशं यत्ता महारथाः । द्रोणं रक्षत पाञ्चालाद् धृष्टद्युम्नान्महारथात् ॥ २५ ॥ ‘इसलिये तुम सब महारथी एक साथ होकर पूर्णतः प्रयत्नशील रहते हुए पांचाल महारथी धृष्टद्युम्नसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करो ॥ २५ ॥
पाण्डवीयेषु सैन्येषु न तं पश्याम कञ्चन । यो योधयेद् रणे द्रोणं धृष्टद्युम्नादृते नृपः ॥ २६ ॥ ‘हम पाण्डवोंकी सेनाओंमें धृष्टद्युम्नके सिवा ऐसे किसी वीर नरेशको नहीं देखते, जो रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यके साथ युद्ध कर सके ॥ २६ ॥
तस्मात् सर्वात्मना मन्ये भारद्वाजस्य रक्षणम् । सुगुप्तः पाण्डवान् हन्यात् सृञ्जयांश्च ससोमकान् ॥ २७ ॥ ‘अतः मैं सब प्रकारसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करना ही इस समय आवश्यक कर्तव्य मानता हूँ। वे सुरक्षित रहें तो पाण्डवों, सृञ्जयों और सोमकोंका भी संहार कर सकते हैं ॥ २७ ॥
सृञ्जयेष्वथ सर्वेषु निहतेषु चमूमुखे । धृष्टद्युम्नं रणे द्रौणिर्हनिष्यति न संशयः ॥ २८ ॥ ‘युद्धके मुहानेपर सारे सृञ्जयोंके मारे जानेपर अश्वत्थामा रणभूमिमें धृष्टद्युम्नको भी मार डालेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २८ ॥
तथार्जुनं च राधेयो हनिष्यति महारथः । भीमसेनमहं चापि युद्धे जेष्यामि दीक्षितः ॥ २९ ॥ शेषांश्च पाण्डवान् योधाः प्रसभं हीनतेजसः ।
'योद्धाओ! इसी प्रकार महारथी कर्ण अर्जुनका वध कर डालेगा तथा रणयज्ञकी दीक्षा लेकर युद्ध करनेवाला मैं भीमसेनको और तेजोहीन हुए दूसरे पाण्डवोंको भी बलपूर्वक जीत लूँगा॥ २९ १/२॥
सोऽयं मम जयो व्यक्तो दीर्घकालं भविष्यति।
तस्माद् रक्षत संग्रामे द्रोणमेव महारथम्॥ ३०॥
'इस प्रकार अवश्य ही मेरी यह विजय चिरस्थायिनी होगी, अतः तुम सब लोग मिलकर संग्राममें महारथी द्रोणकी ही रक्षा करो'॥ ३०॥
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनस्तव।
व्यादिदेश तथा सैन्यं तस्मिंस्तमसि दारुणे॥ ३१॥
भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर आपके पुत्र दुर्योधनने उस भयंकर अन्धकारमें अपनी सेनाको युद्धके लिये आज्ञा दे दी॥ ३१॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं रात्रौ भरतसत्तम।
उभयोः सेनयोर्घोरं परस्परजिगीषया॥ ३२॥
भरतसत्तम! फिर तो रात्रिके समय दोनों सेनाओंमें एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे घोर युद्ध आरम्भ हो गया॥ ३२॥
अर्जुनः कौरवं सैन्यमर्जुनं चापि कौरवाः।
नानाशस्त्रसमावापैरन्योन्यं समपीडयन्॥ ३३॥
अर्जुन कौरव-सेनापर और कौरव-सैनिक अर्जुनपर नाना प्रकारके शस्त्र-समूहोंकी वर्षा करते हुए एक-दूसरेको पीड़ा देने लगे॥ ३३॥
द्रौणिः पाञ्चालराजं च भारद्वाजश्च सृञ्जयान्।
छादयांचक्रतुः संख्ये शरैः संनतपर्वभिः॥ ३४॥
अश्वत्थामाने पांचालराज द्रुपदको और द्रोणाचार्यने सृंजयोंको युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया॥ ३४॥
पाण्डुपाञ्चालसैन्यानां कौरवाणां च भारत।
आसीन्निशानको घोरो निघ्नतामितरेतरम्॥ ३५॥
भारत! एक ओरसे पाण्डव और पांचाल-सैनिकोंका और दूसरी ओरसे कौरव योद्धाओंका, जो एक-दूसरेपर गहरी चोट कर रहे थे, घोर आर्तनाद सुनायी पड़ता था॥ ३५॥
नैवास्माभिस्तथा पूर्वैर्दृष्टपूर्वं तथाविधम्।
श्रुतं वा यादृशं युद्धमासीद् रौद्रं भयानकम्॥ ३६॥
हमने तथा पूर्ववर्ती लोगोंने भी वैसा रौद्र एवं भयानक युद्ध न तो पहले कभी देखा था और न सुना ही था, जैसा कि वह युद्ध हो रहा था॥ ३६॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥
१६५-
पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
दोनों सेनाओंका युद्ध और कृतवर्माद्वारा युधिष्ठिरकी पराजय
संजय उवाच
वर्तमाने तदा रौद्रे रात्रियुद्धे विशाम्पते ।
सर्वभूतक्षयकरे धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
अब्रवीत् पाण्डवांश्चैव पञ्चालांश्चैव सोमकान् ।
अभिद्रवत संयात द्रोणमेव जिघांसया ॥ २ ॥
संजय कहते हैं—प्रजानाथ! जब सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाला वह भयंकर रात्रियुद्ध आरम्भ हुआ, उस समय धर्मपुत्र युधिष्ठिरने पाण्डवों, पांचालों और सोमकोंसे कहा—'दौड़ो, द्रोणाचार्यपर ही उन्हें मार डालनेकी इच्छासे आक्रमण करो' ॥ १-२ ॥
राज्ञस्ते वचनाद् राजन् पञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ।
द्रोणमेवाभ्यवर्तन्त नदन्तो भैरवान् रवान् ॥ ३ ॥
राजन्! राजा युधिष्ठिरके आदेशसे पांचाल और सृंजय भयानक गर्जना करते हुए द्रोणाचार्यपर ही टूट पड़े ॥ ३ ॥
तं तु ते प्रतिगर्जन्तः प्रत्युद्यातास्त्वमर्षिताः ।
यथाशक्ति यथोत्साहं यथासत्त्वं च संयुगे ॥ ४ ॥
वे सब-के-सब अमर्षमें भरे हुए थे और युद्धस्थलमें अपनी शक्ति, उत्साह एवं धैर्यके अनुसार बारंबार गर्जना करते हुए द्रोणाचार्यपर चढ़ आये ॥ ४ ॥
कृतवर्मा तु हार्दिक्यो युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ।
द्रोणं प्रति समायान्तं मत्तो मत्तभिव द्विपम् ॥ ५ ॥
जैसे मतवाला हाथी किसी मतवाले हाथीपर आक्रमण कर रहा हो, उसी प्रकार युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यपर धावा करते देख हृदिकपुत्र कृतवर्माने आगे बढ़कर उन्हें रोका ॥ ५ ॥
शैनेयं शरवर्षाणि विकिरन्तं समन्ततः ।
अभ्ययात् कौरवो राजन् भूरिः संग्राममूर्धनि ॥ ६ ॥
राजन्! युद्धके मुहानेपर चारों ओर बाणोंकी बौछार करते हुए शिनिपौत्र सात्यकिपर कुरुवंशी भूरिने धावा किया ॥ ६ ॥
सहदेवमथायान्तं द्रोणप्रेप्सुं महारथम् ।
कर्णो वैकर्तनो राजन् वारयामास पाण्डवम् ॥ ७ ॥
राजन्! द्रोणाचार्यको पकड़नेके लिये आते हुए महारथी पाण्डुपुत्र सहदेवको वैकर्तन कर्णने रोका ॥ ७ ॥ भीमसेनमथायान्तं व्यादितास्यमिवान्तकम् । स्वयं दुर्योधनो राजा प्रतीपं मृत्युमाव्रजत् ॥ ८ ॥ मुँह बाये यमराजके समान अथवा विपक्षी बनकर आयी हुई मृत्युके समान भीमसेनका सामना स्वयं राजा दुर्योधनने किया ॥ ८ ॥ नकुलं च युधां श्रेष्ठं सर्वयुद्धविशारदम् । शकुनिः सौबलो राजन् वारयामास सत्वरः ॥ ९ ॥ राजन्! सम्पूर्ण युद्धकलामें कुशल योद्धाओंमें श्रेष्ठ नकुलको सुबलपुत्र शकुनिने शीघ्रतापूर्वक आकर रोका ॥ ९ ॥ शिखण्डिनमथायान्तं रथेन रथिनां वरम् । कृपः शारद्वतो राजन् वारयामास संयुगे ॥ १० ॥ नरेश्वर! रथसे आते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ शिखण्डीको युद्धस्थलमें शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने रोका ॥ १० ॥ प्रतिविन्ध्यमथायान्तं मयूरसदृशैर्हयैः । दुःशासनो महाराज यत्तो यत्तमवारयत् ॥ ११ ॥ महाराज! मयूरके समान रंगवाले घोड़ोंद्वारा आते हुए प्रयत्नशील प्रतिविन्ध्यको दुःशासनने यत्नपूर्वक रोका ॥ ११ ॥ भैमसेनिमथायान्तं मायाशतविशारदम् । अश्वत्थामा महाराज राक्षसं प्रत्यषेधयत् ॥ १२ ॥ राजन्! सैकड़ों मायाओंके प्रयोगमें कुशल भीमसेन-कुमार राक्षस घटोत्कचको आते देख अश्वत्थामाने रोका ॥ १२ ॥ द्रुपदं वृषसेनस्तु ससैन्यं सपदानुगम् । वारयामास समरे द्रोणप्रेप्सुं महारथम् ॥ १३ ॥ समरांगणमें द्रोणको पराजित करनेकी इच्छावाले सेना और सेवकोंसहित महारथी द्रुपदको वृषसेनने रोका ॥ १३ ॥ विराटं द्रुतमायान्तं द्रोणस्य निधनं प्रति । मद्रराजः सुसंक्रुद्धो वारयामास भारत ॥ १४ ॥ भारत! द्रोणको मारनेके उद्देश्यसे शीघ्रतापूर्वक आते हुए राजा विराटको अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए मद्रराज शल्यने रोक दिया ॥ १४ ॥ शतानीकमथायान्तं नाकुलिं रभसं रणे । चित्रसेनो रुरोधाशु शरैर्द्रोणपरीप्सया ॥ १५ ॥
द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे रणक्षेत्रमें वेगपूर्वक आते हुए नकुलपुत्र शतानीकको चित्रसेनने अपने बाणोंद्वारा तुरंत रोक दिया ॥ १५ ॥
अर्जुनं च युधां श्रेष्ठं प्राद्रवन्तं महारथम् ।
अलम्बुषो महाराज राक्षसेन्द्रो न्यवारयत् ॥ १६ ॥
महाराज! कौरव-सेनापर धावा करते हुए योद्धाओंमें श्रेष्ठ महारथी अर्जुनको राक्षसराज अलम्बुषने रोका ॥
तथा द्रोणं महेष्वासं निघ्नन्तं शात्रवान् रणे ।
धृष्टद्युम्नोऽथ पाञ्चाल्यो हृष्टरूपमवारयत् ॥ १७ ॥
इसी प्रकार रणभूमिमें शत्रुसैनिकोंका संहार करनेवाले, हर्ष और उत्साहसे युक्त, महाधनुर्धर द्रोणाचार्यको पांचाल राजकुमार धृष्टद्युम्नने आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥
तथान्यान् पाण्डुपुत्राणां समायातान् महारथान् ।
तावका रथिनो राजन् वारयामासुरोजसा ॥ १८ ॥
राजन्! इसी तरह आक्रमण करनेवाले पाण्डव-पक्षके अन्य महारथियोंको आपकी सेनाके महारथियोंने बलपूर्वक रोका ॥ १८ ॥
गजारोहा गजैस्तूर्णं संनिपत्य महामृधे ।
योधयन्तश्च मृद्नन्तः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १९ ॥
उस महासमरमें सैकड़ों और हजारों हाथीसवार तुरंत ही विपक्षी गजारोहियोंसे भिड़कर परस्पर जूझने और सैनिकोंको रौंदने लगे ॥ १९ ॥
निशीथे तुरगा राजन् द्रावयन्तः परस्परम् ।
समदृश्यन्त वेगेन पक्षवन्तो यथाऽद्रयः ॥ २० ॥
राजन्! रातके समय एक-दूसरेपर वेगसे धावा करते हुए घोड़े पंखधारी पर्वतोंके समान दिखायी देते थे ॥
सादिनः सादिभिः सार्धं प्रासशक्त्यृष्टिपाणयः ।
समागच्छन् महाराज विनदन्तः पृथक् पृथक् ॥ २१ ॥
महाराज! हाथमें प्रास, शक्ति और ऋष्टि धारण किये घुड़सवार सैनिक पृथक्-पृथक् गर्जना करते हुए शत्रुपक्षके घुड़सवारोंके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ २१ ॥
नरास्तु बहवस्तत्र समाजग्मुः परस्परम् ।
गदाभिर्मुसलैश्चैव नानाशास्त्रैश्च संयुगे ॥ २२ ॥
उस युद्धस्थलमें बहुसंख्यक पैदल मनुष्य गदा और मुसल आदि नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा एक-दूसरेपर आक्रमण करते थे ॥ २२ ॥
कृतवर्मा तु हार्दिक्यो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
वारयामास संक्रुद्धो वेलेवोद्वृत्तमर्णवम् ॥ २३ ॥
जैसे उत्ताल तरंगोंवाले महासागरको तटभूमि रोक देती है, उसी प्रकार धर्मपुत्र युधिष्ठिरको अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए हृदिकपुत्र कृतवर्माने रोक दिया ॥ २३ ॥
युधिष्ठिरस्तु हार्दिक्यं विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः ।
पुनर्विव्याध विंशत्या तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २४ ॥
युधिष्ठिरने कृतवर्माको पहले पाँच बाणोंसे घायल करके फिर बीस बाणोंसे बींध डाला और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ २४ ॥
कृतवर्मा तु संक्रुद्धो धर्मपुत्रस्य मारिष ।
धनुश्छिच्छेद भल्लेन तं च विव्याध सप्तभिः ॥ २५ ॥
माननीय नरेश! तब अत्यन्त कुपित हुए कृतवर्माने भी एक भल्लसे धर्मपुत्र युधिष्ठिरका धनुष काट दिया और उन्हें भी सात बाणोंसे बींध डाला ॥ २५ ॥
अथान्यद् धनुरादाय धर्मपुत्रो महारथः ।
हार्दिक्यं दशभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ २६ ॥
तदनन्तर महारथी धर्मकुमार युधिष्ठिरने दूसरा धनुष लेकर कृतवर्माकी छाती और भुजाओंमें दस बाण मारे ॥
माधवस्तु रणे विद्धो धर्मपुत्रेण मारिष ।
प्राकम्पत च रोषेण सप्तभिश्चार्दयच्छरैः ॥ २७ ॥
आर्य! रणभूमिमें धर्मपुत्र युधिष्ठिरके बाणोंसे घायल होकर कृतवर्मा काँपने लगा और उसने क्रोधपूर्वक युधिष्ठिरको भी सात बाण मारे ॥ २७ ॥
तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा हस्तावापं निकृत्य च ।
प्राहिणोन्निशितान् बाणान् पञ्च राजञ्छिलाशितान् ॥ २८ ॥
राजन्! तब कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने कृतवर्माके धनुष और दस्तानेको काटकर उसके ऊपर पाँच तीखे बाण चलाये जो शिलापर तेज किये गये थे ॥ २८ ॥
ते तस्य कवचं भित्त्वा हेमचित्रं महाधनम् ।
प्राविशन् धरणीं भित्त्वा वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ २९ ॥
जैसे सर्प बाँबीमें घुस जाते हैं, उसी प्रकार वे बाण कृतवर्माके सुवर्णजटित बहुमूल्य कवचको छिन्न-भिन्न करके धरती फाड़कर उसके भीतर घुस गये ॥ २९ ॥
अक्ष्णोर्निमेषमात्रेण सोऽन्यदादाय कार्मुकम् ।
विव्याध पाण्डवं षष्ट्या सूतं च नवभिः शरैः ॥ ३० ॥
कृतवर्माने पलक मारते-मारते दूसरा धनुष हाथमें लेकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको साठ और उनके सारथिको नौ बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३० ॥
तस्य शक्तिममेयात्मा पाण्डवो भुजगोपमाम् ।
चिक्षेप भरतश्रेष्ठ रथे न्यस्य महद् धनुः ॥ ३१ ॥
भरतश्रेष्ठ! तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने विशाल धनुषको रथपर रखकर कृतवर्मापर एक सर्पाकार शक्ति चलायी ॥ ३१ ॥
सा हेमचित्रा महती पाण्डवेन प्रवेरिता ।
निर्भिद्य दक्षिणं बाहुं प्राविशद् धरणीतलम् ॥ ३२ ॥
पाण्डुकुमार युधिष्ठिरकी चलायी हुई वह सुवर्ण-चित्रित विशाल शक्ति कृतवर्माकी दाहिनी भुजाको छेदकर धरतीमें समा गयी ॥ ३२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु गृह्य पार्थः पुनर्धनुः ।
हार्दिक्यं छादयामास शरैः संनतपर्वभिः ॥ ३३ ॥
इसी समय युधिष्ठिरने पुनः धनुष हाथमें लेकर झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा कृतवर्माको ढक दिया ॥ ३३ ॥
ततस्तु समरे शूरो वृष्णीनां प्रवरो रथी ।
व्यश्वसूतरथं चक्रे निमेषार्धाद् युधिष्ठिरम् ॥ ३४ ॥
फिर तो वृष्णिवंशके शूरवीर श्रेष्ठ महारथी कृतवर्माने समरांगणमें आधे निमेषमें ही युधिष्ठिरको घोड़ों, सारथि और रथसे हीन कर दिया ॥ ३४ ॥
ततस्तु पाण्डवो ज्येष्ठः खड्गं चर्म समाददे ।
तदस्य निशितैर्बाणैर्व्यधमन्माधवो रणे ॥ ३५ ॥
तब ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरने ढाल-तलवार हाथमें ले ली। किंतु कृतवर्माने रणक्षेत्रमें तीखे बाण मारकर उनके उस खड्गको नष्ट कर दिया ॥ ३५ ॥
तोमरं तु ततो गृह्य स्वर्णदण्डं दुरासदम् ।
प्रैषयत् समरे तूर्णं हार्दिक्यस्य युधिष्ठिरः ॥ ३६ ॥
तब समरांगणमें युधिष्ठिरने सुवर्णमय दण्डसे युक्त दुर्धर्ष तोमर हाथमें लेकर उसे तुरंत ही कृतवर्मापर चला दिया ॥ ३६ ॥
तमापतन्तं सहसा धर्मराजभुजच्युतम् ।
द्विधा चिच्छेद हार्दिक्यः कृतहस्तः स्मयन्निव ॥ ३७ ॥
धर्मराजके हाथसे छूटकर सहसा अपने ऊपर आते हुए उस तोमरके सिद्धहस्त कृतवर्माने मुसकराते हुए-से दो टुकड़े कर दिये ॥ ३७ ॥
ततः शरशतेनाजौ धर्मपुत्रमवाकिरत् ।
कवचं चास्य संक्रुद्धः शरैस्तीक्ष्णैरदारयत् ॥ ३८ ॥
तब युद्धस्थलमें कृतवर्माने सैकड़ों बाणोंसे धर्मपुत्र युधिष्ठिरको ढक दिया और अत्यन्त कुपित होकर उसने उनके कवचको भी तीखे बाणोंसे विदीर्ण कर डाला ॥ ३८ ॥
हार्दिक्यशरसंछन्नं कवचं तन्महाधनम् ।
व्यशीर्यत रणे राजंस्ताराजालमिवाम्बरात् ॥ ३९ ॥
राजन्! कृतवर्माके बाणोंसे आच्छादित हुआ वह बहुमूल्य कवच आकाशसे तारोंके समुदायकी भाँति रणभूमिमें बिखर गया ॥ ३९ ॥ स छिन्नधन्वा विरथः शीर्णवर्मा शरार्दितः । अपायासीद् रणात् तूर्णं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ४० ॥ इस प्रकार धनुष कट जाने, रथ नष्ट होने और कवच छिन्न-भिन्न हो जानेपर बाणोंसे पीड़ित हुए धर्मपुत्र युधिष्ठिर तुरंत ही युद्धसे पलायन कर गये ॥ ४० ॥ कृतवर्मा तु निर्जित्य धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । पुनर्द्रोणस्य जुगुपे चक्रमेव महात्मनः ॥ ४१ ॥ धर्मात्मा युधिष्ठिरको जीतकर कृतवर्मा पुनः महात्मा द्रोणके रथचक्रकी ही रक्षा करने लगा ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे युधिष्ठिरापयानं नाम पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके अवसरपर युधिष्ठिरका पलायनविषयक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६५ ॥
१६६-
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिके द्वारा भूरिका वध, घटोत्कच और अश्वत्थामाका घोर युद्ध तथा भीमके साथ दुर्योधनका युद्ध एवं दुर्योधनका पलायन
संजय उवाच
भूरिस्तु समरे राजन् शैनेयं रथिनां वरम् ।
आपतन्तमपासेधत् प्रयाणादिव कुञ्जरम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जैसे कोई हाथीको उसके निकलनेके स्थानसे ही रोक दे, उसी प्रकार भूरिने आक्रमण करते हुए रथियोंमें श्रेष्ठ सात्यकिको समरभूमिमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १ ॥
अथैनं सात्यकिः क्रुद्धः पञ्चभिर्निशितैः शरैः ।
विव्याध हृदये तस्य प्रास्रवत् तस्य शोणितम् ॥ २ ॥
यह देख सात्यकि कुपित हो उठे और उन्होंने पाँच तीखे बाणोंसे भूरिकी छाती छेद डाली। उससे रक्तकी धारा बहने लगी ॥ २ ॥
तथैव कौरवो युद्धे शैनेयं युद्धदुर्मदम् ।
दशभिर्निशितैस्तीक्ष्णैरविध्यत भुजान्तरे ॥ ३ ॥
इसी प्रकार युद्धस्थलमें कुरुवंशी भूरिने भी रणदुर्मद सात्यकिकी छातीमें दस तीखे बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३ ॥
तावन्योन्यं महाराज ततक्षाते शरैर्भृशम् ।
क्रोधसंरक्तनयनौ क्रोधाद् विस्फार्य कार्मुके ॥ ४ ॥
महाराज! उन दोनोंके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। वे दोनों ही रोषसे अपने-अपने धनुष खींचकर बाणोंकी वर्षासे एक-दूसरेको अत्यन्त घायल कर रहे थे ॥ ४ ॥
तयोरासीन्महाराज शस्त्रवृष्टिः सुदारुणा ।
क्रुद्धयोः सायकमुचोर्यमान्तकनिकाशयोः ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! उन दोनोंपर अस्त्र-शस्त्रोंकी अत्यन्त भयंकर वर्षा हो रही थी। ये यम और अन्तकके समान कुपित हो परस्पर बाणोंका प्रहार कर रहे थे ॥ ५ ॥
तावन्योन्यं शरै राजन् संछाद्य समवस्थितौ ।
मुहूर्तं चैव तद् युद्धं समरूपमिवाभवत् ॥ ६ ॥
राजन्! वे दोनों ही एक-दूसरेको बाणोंद्वारा आच्छादित करके खड़े थे। दो घड़ीतक उनमें समानरूपसे ही युद्ध चलता रहा ॥ ६ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज शैनेयः प्रहसन्निव । धनुश्चिच्छेद समरे कौरव्यस्य महात्मनः ॥ ७ ॥ महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने हँसते हुए-से समरांगणमें महामना कुरुवंशी भूरिके धनुषको काट दिया ॥ ७ ॥ अथैनं छिन्नधन्वानं नवभिर्निशितैः शरैः । विव्याध हृदये तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ८ ॥ धनुष कट जानेपर उसकी छातीमें सात्यकिने तुरंत ही नौ तीखे बाण मारे और कहा—‘खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुतापनः । धनु रन्यत् समादाय सात्वतं प्रत्यविध्यत ॥ ९ ॥ बलवान् शत्रुके आघातसे अत्यन्त घायल हुए शत्रुतापन भूरिने दूसरा धनुष हाथमें लेकर सात्यकिको भी गहरी चोट पहुँचायी ॥ ९ ॥ स विद्ध्वा सात्वतं बाणैस्त्रिभिरेव विशाम्पते । धनुश्चिच्छेद भल्लेन सुतीक्ष्णेन हसन्निव ॥ १० ॥ प्रजानाथ! तीन बाणोंसे ही सात्यकिको घायल करके भूरिने हँसते हुए-से अत्यन्त तीखे भल्लद्वारा उनके धनुषको भी काट दिया ॥ १० ॥ छिन्नधन्वा महाराज सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः । प्रजहार महावेगां शक्तिं तस्य महोरसि ॥ ११ ॥ महाराज! धनुष कट जानेपर क्रोधातुर हुए सात्यकिने भूरिके विशाल वक्षःस्थलपर एक अत्यन्त वेगशालिनी शक्तिका प्रहार किया ॥ ११ ॥ स तु शक्त्या विभिन्नाङ्गो निपपात रथोत्तमात् । लोहिताङ्ग इवाकाशाद् दीप्तरश्मिर्यदृच्छया ॥ १२ ॥ उस शक्तिसे भूरिके सारे अंग विदीर्ण हो गये और वह अपने उत्तम रथसे नीचे गिर पड़ा, मानो दैववश प्रदीप्त किरणोंवाला मंगलग्रह आकाशसे नीचे गिर गया हो ॥ १२ ॥ तं तु दृष्ट्वा हतं शूरमश्वत्थामा महारथः । अभ्यधावत वेगेन शैनेयं प्रति संयुगे ॥ १३ ॥ शूरवीर भूरिको युद्धस्थलमें मारा गया देख महारथी अश्वत्थामा सात्यकिकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥ १३ ॥ तिष्ठ तिष्ठेति चाभाष्य शैनेयं स नराधिप । अभ्यवर्षच्छरौघेण मेरुं वृष्ट्या यथाम्बुदः ॥ १४ ॥ नरेश्वर! वह सात्यकिसे ‘खड़ा रह, खड़ा रह’ ऐसा कहकर उनके ऊपर उसी प्रकार बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा, जैसे बादल मेरु पर्वतपर जल बरसा रहा हो ॥ १४ ॥ तमापतन्तं संरब्धं शैनेयस्य रथं प्रति ।
घटोत्कचोऽब्रवीद् राजन् नादं मुक्त्वा महारथः ॥ १५ ॥
क्रोधमें भरे हुए अश्वत्थामाको सात्यकिके रथपर आक्रमण करते देख महारथी घटोत्कचने सिंहनाद करके कहा ॥ १५ ॥
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन् द्रोणपुत्र गमिष्यसि ।
एष त्वां निहनिष्यामि महिषं षण्मुखो यथा ॥ १६ ॥
‘द्रोणपुत्र! खड़ा रह, खड़ा रह, मेरे हाथसे जीवित छूटकर नहीं जा सकेगा। जैसे कार्तिकेयने महिषासुरका वध किया था, उसी प्रकार मैं भी तुझे मार डालूँगा ॥ १६ ॥
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ।
इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षो राक्षसः परवीरहा ॥ १७ ॥
द्रौणिमभ्यद्रवत् क्रुद्धो गजेन्द्रमिव केसरी ।
‘आज समरांगणमें मैं तेरी युद्धविषयक श्रद्धा दूर कर दूँगा।’ ऐसा कहकर क्रोधसे लाल आँखें किये, शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले कुपित राक्षस घटोत्कचने अश्वत्थामापर उसी प्रकार धावा किया, जैसे सिंह किसी गजराजपर आक्रमण करता है ॥ १७ १/२ ॥
रथाक्षमात्रैरिषुभिरभ्यवर्षद् घटोत्कचः ॥ १८ ॥
रथिनामृषभं द्रौणिं धाराभिरिव तोयदः ।
जैसे मेघ पर्वतपर जलकी धारा गिराता है, उसी प्रकार घटोत्कच रथियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामापर रथके धुरेके समान मोटे-मोटे बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ १८ १/२ ॥
शरवृष्टिं तु तां प्राप्तां शरैराशीविषोपमैः ॥ १९ ॥
शातयामास समरे तरसा द्रौणिरुत्स्मयन् ।
परंतु अश्वत्थामाने मुसकराते हुए समरभूमिमें अपने ऊपर आयी हुई उस बाण-वर्षाको विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाणोंद्वारा वेगपूर्वक नष्ट कर दिया ॥ १९ १/२ ॥
ततः शरशतैस्तीक्ष्णैर्मर्मभेदिभिराशुगैः ॥ २० ॥
समाचिनोद् राक्षसेन्द्रं घटोत्कचमरिंदमम् ।
तत्पश्चात् मर्मस्थलको विदीर्ण कर देनेवाले सैकड़ों पैने बाणोंद्वारा उसने शत्रुदमन राक्षसराज घटोत्कचको बींध दिया ॥ २० १/२ ॥
स शरैराचितस्तेन राक्षसो रणमूर्धनि ॥ २१ ॥
व्यकाशत महाराज श्वाविच्छललतो यथा ।
महाराज! अश्वत्थामाद्वारा उन बाणोंसे बिंधा हुआ वह राक्षस काँटोंसे भरे हुए साहीके समान सुशोभित हो रहा था ॥ २१ १/२ ॥
ततः क्रोधसमाविष्टो भैमसेनिः प्रतापवान् ॥ २२ ॥
शरैरवचकर्तोग्रैर्द्रौणिं वज्राशनिप्रभैः ।
क्षुरप्रैरर्धचन्द्रैश्च नाराचैः सशिलीमुखैः ॥ २३ ॥
वराहकर्णैर्नालीकैर्विकर्णैश्चाभ्यवीवृषत् । तत्पश्चात् भीमसेनके प्रतापी पुत्र घटोत्कचने क्रोधमें भरकर वज्र एवं बिजलीके समान चमकनेवाले भयंकर बाणोंद्वारा अश्वत्थामाको क्षत-विक्षत कर दिया तथा उसके ऊपर क्षुरप्र, अर्धचन्द्र, नाराच, शिलीमुख, वराहकर्ण, नालीक और विकर्ण आदि अस्त्रोंकी चारों ओरसे वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २२-२३ १/२ ॥ तां शस्त्रवृष्टिमतुलां वज्राशनिसमस्वनाम् ॥ २४ ॥ पतन्तीमुपरि क्रुद्धो द्रौणिरव्यथितेन्द्रियः । सुदुःसहां शरैर्घोरैर्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ॥ २५ ॥ व्यधमत् सुमहातेजा महाभ्राणीव मारुतः । जैसे वायु बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार व्यथारहित इन्द्रियोंवाले महातेजस्वी द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने कुपित हो दिव्यास्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित भयंकर बाणोंसे अपने ऊपर पड़ती हुई उस अत्यन्त दुःसह, अनुपम एवं वज्रपातके समान शब्द करनेवाली अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षाको नष्ट कर दिया ॥ २४-२५ १/२ ॥ ततोऽन्तरिक्षे बाणानां संग्रामोऽन्य इवाभवत् ॥ २६ ॥ घोररूपो महाराज योधानां हर्षवर्धनः । महाराज! तत्पश्चात् अन्तरिक्षमें बाणोंका दूसरा भयंकर संग्राम-सा होने लगा, जो योद्धाओंका हर्ष बढ़ा रहा था ॥ २६ १/२ ॥ ततोऽस्त्रसंघर्षकृतैर्विस्फुलिङ्गैः समन्ततः ॥ २७ ॥ बभौ निशामुखे व्योम खद्योतैरिव संवृतम् । अस्त्रोंके परस्पर टकरानेसे जो चारों ओर चिनगारियाँ छूट रही थीं, उनसे आकाश प्रदोषकालमें जुगनुओंसे व्याप्त-सा जान पड़ता था ॥ २७ १/२ ॥ स मार्गणगणैर्द्रौणिर्दिशः प्रच्छाद्य सर्वतः ॥ २८ ॥ प्रियार्थं तव पुत्राणां राक्षसं समवाकिरत् । द्रोणपुत्रने आपके पुत्रोंका प्रिय करनेके लिये अपने बाणोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करते हुए उस राक्षसको भी ढक दिया ॥ २८ १/२ ॥ ततः प्रवृत्ते युद्धं द्रौणिराक्षसयोर्मृधे ॥ २९ ॥ विगाढे रजनीमध्ये शक्रप्रह्लादयोरिव । तदनन्तर गाढ़ अन्धकारसे भरी हुई आधीरातके समय रणभूमिमें इन्द्र और प्रह्लादके समान अश्वत्थामा और घटोत्कचका घोर युद्ध आरम्भ हुआ ॥ २९ १/२ ॥ ततो घटोत्कचो बाणैर्दशभिर्द्रौणिमाहवे ॥ ३० ॥ जघानोरसि संक्रुद्धः कालज्वलनसंनिभैः ।
अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए घटोत्कचने युद्धस्थलमें कालाग्निके समान दस तेजस्वी बाणोंद्वारा अश्वत्थामाकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३० १/२ ॥ स तैरभ्यायसैर्विद्धो राक्षसेन महाबलः ॥ ३१ ॥ चचाल समरे द्रौणिर्वातनुन्न इव द्रुमः । स मोहमनुसम्प्राप्तो ध्वजयष्टिं समाश्रितः ॥ ३२ ॥ राक्षसद्वारा चलाये हुए उन विशाल बाणोंसे घायल हो महाबली अश्वत्थामा समरांगणमें आँधीके हिलाये हुए वृक्षके समान काँपने लगा। वह ध्वजदण्डका सहारा ले मूर्च्छित हो गया ॥ ३१-३२ ॥ ततो हाहाकृतं सैन्यं तव सर्वं जनाधिप । हतं स्म मेनिरे सर्वे तावकास्तं विशाम्पते ॥ ३३ ॥ नरेश्वर! फिर तो आपकी सारी सेनामें हाहाकार मच गया। प्रजानाथ! आपके समस्त योद्धाओंने यह मान लिया कि अश्वत्थामा मारा गया ॥ ३३ ॥ तं तु दृष्ट्वा तथावस्थमश्वत्थामानमाहवे । पञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव सिंहनादं प्रचक्रिरे ॥ ३४ ॥ रणभूमिमें अश्वत्थामाकी वैसी अवस्था देख पांचाल और सृंजय योद्धा सिंहनाद करने लगे ॥ ३४ ॥ प्रतिलभ्य ततः संज्ञांमश्वत्थामा महाबलः । धनुः प्रपीड्य वामेन करेणामित्रकर्शनः ॥ ३५ ॥ मुमोचाकर्णपूर्णेन धनुषा शरमुत्तमम् । यमदण्डोपमं घोरमुद्दिश्याशु घटोत्कचम् ॥ ३६ ॥ तदनन्तर सचेत हो महाबली शत्रुसूदन अश्वत्थामाने बायें हाथसे धनुषको दबाकर कानतक खींचे हुए धनुषसे घटोत्कचको लक्ष्य करके यमदण्डके समान एक भयंकर एवं उत्तम बाण शीघ्र छोड़ दिया ॥ ३५-३६ ॥ स भित्त्वा हृदयं तस्य राक्षसस्य शरोत्तमः । विवेश वसुधामुग्रः सपुङ्खः पृथिवीपते ॥ ३७ ॥ पृथिवीपते! वह उत्तम एवं भयंकर बाण उस राक्षसकी छाती छेदकर पंखसहित पृथिवीमें समा गया ॥ सोऽतिविद्धो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् । राक्षसेन्द्रः सुबलवान् द्रौणिना रणशालिना ॥ ३८ ॥ महाराज! युद्धमें शोभा पानेवाले अश्वत्थामाद्वारा अत्यन्त घायल हुआ महाबली राक्षसराज घटोत्कच रथके पिछले भागमें बैठ गया ॥ ३८ ॥ दृष्ट्वा विमूढं हैडिम्बं सारथिस्तु रणाजिरात् । द्रौणेः सकाशात् सम्भ्रान्तस्त्वपनिन्ये त्वरान्वितः ॥ ३९ ॥
हिडिम्बाकुमारको मूर्च्छित देख उसका सारथि घबरा गया और तुरंत ही उसे समरांगणसे, विशेषतः अश्वत्थामाके निकटसे दूर हटा ले गया ॥ ३९ ॥
तथा तु समरे विद्ध्वा राक्षसेन्द्रं घटोत्कचम् ।
ननाद सुमहानादं द्रोणपुत्रो महारथः ॥ ४० ॥
इस प्रकार समरभूमिमें राक्षसराज घटोत्कचको घायल करके महारथी द्रोणपुत्रने बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ४० ॥
पूजितस्तव पुत्रैश्च सर्वयोधैश्च भारत ।
वपुषातिप्रजज्वाल मध्याह्न इव भास्करः ॥ ४१ ॥
भरतनन्दन! उस समय सम्पूर्ण योद्धाओं तथा आपके पुत्रोंद्वारा पूजित हुआ अश्वत्थामा अपने शरीरसे मध्याह्न-कालके सूर्यकी भाँति अत्यन्त प्रकाशित हो रहा था ॥ ४१ ॥
भीमसेनं तु युध्यन्तं भारद्वाजरथं प्रति ।
स्वयं दुर्योधनो राजा प्रत्यविध्यच्छितैः शरैः ॥ ४२ ॥
द्रोणाचार्यके रथकी ओर आते हुए युद्धपरायण भीमसेनको स्वयं राजा दुर्योधनने पैने बाणोंसे बींध डाला ॥ ४२ ॥
तं भीमसेनो दशभिः शरैर्विव्याध मारिष ।
दुर्योधनोऽपि विंशत्या शराणां प्रत्यविध्यत ॥ ४३ ॥
माननीय नरेश! तब भीमसेनने भी दुर्योधनको दस बाणोंसे घायल किया। फिर दुर्योधनने भी उन्हें बीस बाण मारे ॥ ४३ ॥
तौ सायकैरवच्छिन्नावदृश्येतां रणाजिरे ।
मेघजालसमाच्छन्नौ नभसीवेन्दुभास्करौ ॥ ४४ ॥
जैसे कभी-कभी चन्द्रमा और सूर्य आकाशमें मेघोंके समूहसे आच्छादित हुए देखे जाते हैं, उसी प्रकार समरांगणमें वे दोनों वीर सायकसमूहोंसे आच्छन्न दिखायी देते थे ॥ ४४ ॥
अथ दुर्योधनो राजा भीमं विव्याध पत्रिभिः ।
पञ्चभिर्भरतश्रेष्ठ तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ४५ ॥
भरतश्रेष्ठ! राजा दुर्योधनने भीमसेनको पाँच बाणोंसे घायल कर दिया और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ ४५ ॥
तस्य भीमो धनुश्छित्त्वा ध्वजं च दशभिः शरैः ।
विव्याध कौरवश्रेष्ठं नवत्या नतपर्वणाम् ॥ ४६ ॥
तब भीमसेनने दस बाण मारकर उसके धनुष और ध्वज काट डाले और झुकी हुई गाँठवाले नब्बे बाणोंसे कौरवश्रेष्ठ दुर्योधनको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४६ ॥
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो धनुरन्यन्महत्तरम् ।
गृहीत्वा भरतश्रेष्ठो भीमसेनं शितैः शरैः ॥ ४७ ॥
अपीडयद् रणमुखे पश्यतां सर्वधन्विनाम् ।
तत्पश्चात् भरतश्रेष्ठ दुर्योधनने कुपित हो दूसरा विशाल धनुष हाथमें लेकर युद्धके मुहानेपर सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते पैने बाणोंद्वारा भीमसेनको पीड़ा देनी आरम्भ की॥ ४७ १/२॥
तान् निहत्य शरान् भीमो दुर्योधनधनुश्च्युतान्॥ ४८॥
कौरवं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत्।
दुर्योधनके धनुषसे छूटे हुए उन सभी बाणोंको नष्ट करके भीमसेनने उस कौरव-नरेशको पचीस बाण मारे॥ ४८ १/२॥
दुर्योधनस्तु संक्रुद्धो भीमसेनस्य मारिष॥ ४९॥
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा दशभिः प्रत्यविध्यत।
आर्य! इससे दुर्योधन अत्यन्त कुपित हो उठा और उसने एक क्षुरप्रसे भीमसेनका धनुष काटकर उन्हें दस बाणोंसे घायल कर दिया॥ ४९ १/२॥
अथान्यद् धनुरदाय भीमसेनो महाबलः॥ ५०॥
विव्याध नृपतिं तूर्णं सप्तभिर्निशितैः शरैः।
तब महाबली भीमसेनने दूसरा धनुष हाथमें लेकर तुरंत ही कौरवनरेशको सात तीखे बाणोंसे बींध डाला॥
तदप्यस्य धनुः क्षिप्रं चिच्छेद लघुहस्तवत्॥ ५१॥
द्वितीयं च तृतीयं च चतुर्थं पञ्चमं तथा।
आत्तमात्तं महाराज भीमस्य धनुरच्छिनत्॥ ५२॥
तव पुत्रो महाराज जितकाशी मदोत्कटः।
दुर्योधनने शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले कुशल योद्धाकी भाँति भीमसेनके उस धनुषको भी शीघ्र ही काट दिया। महाराज! भीमसेनके हाथमें लिये हुए दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवें धनुषको भी विजयसे उल्लसित होनेवाले आपके मदोन्मत्त पुत्रने काट डाला॥ ५१-५२ १/२॥
स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः॥ ५३॥
शक्तिं चिक्षेप समरे सर्वपारशवीं शुभाम्।
मृत्योरिव स्वसारं हि दीप्तां वह्निशिखामिव॥ ५४॥
इस प्रकार जब बारंबार धनुष काटे जाने लगे, तब भीमसेनने समरभूमिमें सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई एक सुन्दर शक्ति चलायी, जो मौतकी सगी बहिनके समान जान पड़ती थी। वह आगकी ज्वालाके समान प्रकाशित हो रही थी॥ ५३-५४॥
सीमन्तमिव कुर्वन्तीं नभसोऽग्निसमप्रभाम्।
अप्राप्तामेव तां शक्तिं त्रिधा चिच्छेद कौरवः॥ ५५॥
पश्यतः सर्वलोकस्य भीमस्य च महात्मनः।
आकाशमें सीमन्तकी रेखा-सी बनाती हुई अग्निके समान देदीप्यमान होनेवाली उस शक्तिके अपने पास आनेसे पहले ही कौरवनरेशने तीन टुकड़े कर दिये। सम्पूर्ण योद्धाओं तथा महामना भीमसेनके देखते-देखते यह कार्य हो गया।। ५५ १/२ ।।
ततो भीमो महाराज गदां गुर्वीं महाप्रभाम्।। ५६।।
चिक्षेपाविध्य वेगेन दुर्योधनरथं प्रति।
महाराज! तब भीमसेनने अपनी अत्यन्त तेजस्विनी गदाको बड़े वेगसे घुमाकर दुर्योधनके रथपर दे मारा।।
ततः सा सहसा वाहांस्तव पुत्रस्य संयुगे।। ५७।।
सारथिं च गदा गुर्वी ममर्दास्य रथं पुनः।
युद्धस्थलमें उस भारी गदाने सहसा आपके पुत्रके चारों घोड़ों, सारथि और रथका भी मर्दन कर दिया।। ५७ १/२ ।।
पुत्रस्तु तव राजेन्द्र भीमाद् भीतः प्रणश्य च।। ५८।।
आरुरोह रथं चान्यं नन्दकस्य महात्मनः।
राजेन्द्र! उस समय आपका पुत्र भीमसेनसे भयभीत हो पहले ही भागकर महामना नन्दकके रथपर जा बैठा था।। ५८ १/२ ।।
ततो भीमो हतं मत्वा तव पुत्रं महारथम्।। ५९।।
सिंहनादं महच्चक्रे तर्जयन् निशि कौरवान्।
उस समय भीमसेनने आपके महारथी पुत्रको मारा गया मानकर रातके समय कौरवोंको डाँट बताते हुए बड़े जोर-जोरसे सिंहनाद किया।। ५९ १/२ ।।
तावकाः सैनिकाश्चापि मेनिरे निहतं नृपम्।
ततोऽतिचुक्रुशुः सर्वे ते हाहेति समन्ततः।। ६०।।
आपके सैनिकोंने भी राजा दुर्योधनको मरा हुआ ही मान लिया था; अतः वे सब ओर जोर-जोरसे हाहाकार करने लगे।। ६०।।
तेषां तु निनदं श्रुत्वा त्रस्तानां सर्वयोधिनाम्।
भीमसेनस्य नादं च श्रुत्वा राजन् महात्मनः।। ६१।।
ततो युधिष्ठिरो राजा हतं मत्वा सुयोधनम्।
अभ्यवर्तत वेगेन यत्र पार्थो वृकोदरः।। ६२।।
राजन्! उन भयभीत हुए सम्पूर्ण योद्धाओंका आर्तनाद तथा महामनस्वी भीमसेनकी गर्जना सुनकर दुर्योधनको मरा हुआ मान राजा युधिष्ठिर बड़े वेगसे उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ कुन्तीकुमार भीमसेन दहाड़ रहे थे।। ६१-६२।।
पञ्चालाः केकया मत्स्याः सृञ्जयाश्च विशाम्पते।
सर्वोद्योगेनाभिजग्मुर्द्रोणमेव युयुत्सया।। ६३।।