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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

इस समय मैं जो कुछ करना चाहता हूँ, उसीको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे उतावला हो रहा हूँ। इतनी उतावलीमें रहते हुए मुझे नींद कहाँ और सुख कहाँ? ।।
न स जातः पुमाँल्लोके कश्चिन्न स भविष्यति ।
यो मे व्यावर्तयेदेतां वधे तेषां कृतां मतिम् ॥ २९ ॥
इस संसारमें ऐसा कोई पुरुष न तो पैदा हुआ है और न होगा ही, जो उन पांचालोंके वधके लिये किये गये मेरे इस दृढ़ निश्चयको पलट दे ।। २९ ।।

संजय उवाच

एवमुक्त्वा महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
एकान्ते योजयित्वाश्वान् प्रायादभिमुखः परान् ॥ ३० ॥
संजय कहते हैं— महाराज! ऐसा कहकर प्रतापी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा एकान्तमें घोड़ोंको जोतकर शत्रुओंकी ओर चल दिया ।। ३० ।।
तमब्रूतां महात्मानौ भोजशारद्वतावुभौ ।
किमर्थं स्यन्दनो युक्तः किञ्च कार्यं चिकीर्षितम् ॥ ३१ ॥
उस समय भोजवंशी कृतवर्मा और शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य दोनों महामनस्वी वीरोंने उससे कहा— 'अश्वत्थामन्! तुमने किसलिये रथको जोता है? तुम इस समय कौन-सा कार्य करना चाहते हो? ।। ३१ ।।
एकसार्थप्रयातौ स्वस्त्वया सह नरर्षभ ।
समदुःखसुखौ चापि नावां शङ्कितुमर्हसि ॥ ३२ ॥
'नरश्रेष्ठ! हम दोनों एक साथ तुम्हारी सहायताके लिये चले हैं। तुम्हारे दुःख-सुखमें हमारा समान भाग होगा, तुम्हें हम दोनोंपर संदेह नहीं करना चाहिये' ।।
अश्वत्थामा तु संक्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् ।
ताभ्यां तथ्यं तथाऽऽचख्यौ यदस्यात्मचिकीर्षितम् ॥ ३३ ॥
उस समय अश्वत्थामा पिताके वधका स्मरण करके रोषसे आगबबूला हो रहा था। उसके मनमें जो कुछ करनेकी इच्छा थी, वह सब उसने उन दोनोंसे ठीक-ठीक कह सुनाया ।। ३३ ।।
हत्वा शतसहस्राणि योधानां निशितैः शरैः ।
न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥ ३४ ॥
वह बोला— 'मेरे पिता अपने तीखे बाणोंसे लाखों योद्धाओंका वध करके जब अस्त्र-शस्त्र नीचे डाल चुके थे, उस अवस्थामें धृष्टद्युम्नने उन्हें मारा है ।। ३४ ।।
तं तथैव हनिष्यामि न्यस्तधर्माणमद्य वै ।
पुत्रं पाञ्चालराजस्य पापं पापेन कर्मणा ॥ ३५ ॥

'अतः धर्मका परित्याग करनेवाले उस पापी पांचालराजकुमारको भी मैं उसी प्रकार पापकर्मद्वारा ही मार डालूँगा ।। ३५ ।। कथं च निहतः पापः पाञ्चाल्यः पशुवन्मया । शस्त्रेण विजिताँल्लोकान् नाप्नुयादिति मे मतिः ।। ३६ ।। 'मेरा ऐसा निश्चय है कि मेरे हाथसे पशुकी भाँति मारे गये पापी पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नको किसी तरह भी अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा मिलनेवाले पुण्यलोकोंकी प्राप्ति न हो!! ।। ३६ ।। क्षिप्रं संनद्धकवचौ सखड्गावात्तकार्मुकौ । मामास्थाय प्रतीक्षेतां रथवर्यौ परंतपौ ।। ३७ ।। 'आप दोनों रथियोंमें श्रेष्ठ और शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर हैं। शीघ्र ही कवच बाँधकर खड्ग और धनुष लेकर रथपर बैठ जाइये तथा मेरी प्रतीक्षा कीजिये' ।। ३७ ।। इत्युक्त्वा रथमास्थाय प्रायादभिमुखः परान् । तमन्वगात् कृपो राजन् कृतवर्मा च सात्वतः ।। ३८ ।। राजन्! ऐसा कहकर अश्वत्थामा रथपर आरूढ़ हो शत्रुओंकी ओर चल दिया। कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा भी उसीके मार्गका अनुसरण करने लगे ।। ३८ ।। ते प्रयाता व्यरोचन्त परानभिमुखास्तयः । हूयमाना यथा यज्ञे समिद्धा हव्यवाहनाः ।। ३९ ।। शत्रुओंकी ओर जाते समय वे तीनों तेजस्वी वीर यज्ञमें आहुति पाकर प्रज्वलित हुए तीन अग्नियोंकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे ।। ३९ ।। ययुश्च शिविरं तेषां सम्प्रसुप्तजनं विभो । द्वारदेशं तु सम्प्राप्य द्रौणिस्तस्थौ महारथः ।। ४० ।। प्रभो! वे तीनों पाण्डवों और पांचालोंके उस शिविरके पास गये, जहाँ सब लोग सो गये थे। शिविरके द्वारपर पहुँचकर महारथी अश्वत्थामा खड़ा हो गया ।। ४० ।।

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिगमने पञ्चमोऽध्यायः ।। ५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाका प्रयाणविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।

अध्याय (पृष्ठ 3008)

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षष्ठोऽध्यायः

अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना

धृतराष्ट्र उवाच

द्वारदेशे ततो द्रौणिमवस्थितमवेक्ष्य तौ ।
अकुर्वातां भोजकृपौ किं संजय वदस्व मे ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! अश्वत्थामाको शिविरके द्वारपर खड़ा देख कृतवर्मा और कृपाचार्यने क्या किया? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥

संजय उवाच

कृतवर्माणमामन्त्र्य कृपं च स महारथः ।
द्रौणिर्मन्युपरीतात्मा शिबिरद्वारमागमत् ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! कृतवर्मा और कृपाचार्यको आमन्त्रित करके महारथी अश्वत्थामा क्रोधपूर्ण हृदयसे शिविरके द्वारपर आया ॥ २ ॥

तत्र भूतं महाकायं चन्द्रार्कसदृशद्युतिम् ।
सोऽपश्यद् द्वारमाश्रित्य तिष्ठन्तं लोमहर्षणम् ॥ ३ ॥
वसानं चर्म वैयाघ्रं महारुधिरविस्रवम् ।
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ ४ ॥
बाहुभिः स्वायतैः पीनैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ।
बद्धाङ्गदमहासर्पं ज्वालामालाकुलाननम् ॥ ५ ॥
दंष्ट्राकरालवदनं व्यादितास्यं भयानकम् ।
नयनानां सहस्रैश्च विचित्रैरभिभूषितम् ॥ ६ ॥
वहाँ उसने चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी एक विशालकाय अद्भुत प्राणीको देखा, जो द्वार रोककर खड़ा था, उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस महापुरुषने व्याघ्रका ऐसा चर्म धारण कर रखा था, जिससे बहुत अधिक रक्त चू रहा था, वह काले मृगचर्मकी चादर ओढ़े और सर्पोंका यज्ञोपवीत पहने हुए था। उसकी विशाल और मोटी भुजाएँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये प्रहार करनेको उद्यत जान पड़ती थीं। उनमें बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प बँधे हुए थे तथा उसका मुख आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देता था। उसने मुँह फैला रखा था, जो दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता था। वह भयानक पुरुष सहस्रों विचित्र नेत्रोंसे सुशोभित था ॥ ३—६ ॥

नैव तस्य वपुः शक्यं प्रवक्तुं वेष एव च ।
सर्वथा तु तदालक्ष्य स्फुटेयुरपि पर्वताः ॥ ७ ॥
उसके शरीर और वेषका वर्णन नहीं किया जा सकता। सर्वथा उसे देख लेनेपर पर्वत भी भयके मारे विदीर्ण हो सकते थे ॥ ७ ॥

तस्यास्यान्नासिकाभ्यां च श्रवणाभ्यां च सर्वशः ।
तेभ्यश्चाक्षिसहस्रेभ्यः प्रादुरासन् महार्चिषः ॥ ८ ॥
उसके मुखसे, दोनों नासिकाओंसे, कानोंसे और हजारों नेत्रोंसे भी सब ओर आगकी बड़ी-बड़ी लपटें निकल रही थीं ॥ ८ ॥

तथा तेजोमरीचिभ्यः शङ्खचक्रगदाधराः ।
प्रादुरासन् हृषीकेशाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ९ ॥
उसके तेजकी किरणोंसे शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले सैकड़ों, हजारों विष्णु प्रकट हो रहे थे ॥ ९ ॥

तदत्यद्भुतमालोक्य भूतं लोकभयंकरम् ।
द्रौणिरव्यथितो दिव्यैरस्त्रवर्षैरवाकिरत् ॥ १० ॥
सम्पूर्ण जगत्‌को भयभीत करनेवाले उस अद्भुत प्राणीको देखकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा भयभीत नहीं हुआ, अपितु उसके ऊपर दिव्य अस्त्रोंकी वर्षा करने लगा ॥ १० ॥

द्रौणिमुक्तान् शरांस्तांस्तु तद् भूतं महदग्रसत् ।
उदधेरिव वार्योघान् पावको वडवामुखः ॥ ११ ॥
परंतु जैसे बड़वानल समुद्रकी जलराशिको पी जाता है, उसी प्रकार उस महाभूतने अश्वत्थामाके छोड़े हुए सारे बाणोंको अपना ग्रास बना लिया ॥ ११ ॥

अग्रसत् तांस्तथाभूतं द्रौणिना प्रहितान् शरान् ।
अश्वत्थामा तु सम्प्रेक्ष्य शरौघांस्तान् निरर्थकान् ॥ १२ ॥
रथशक्तिं मुमोचासौ दीप्तामग्निशिखामिव ।
अश्वत्थामाने जो-जो बाण छोड़े, उन सबको वह महाभूत निगल गया। अपने बाण-समूहोंको व्यर्थ हुआ देख अश्वत्थामाने प्रज्वलित अग्निशिखाके समान देदीप्यमान रथशक्ति छोड़ी ॥ १२ ½ ॥

सा तमाहत्य दीप्ताग्रा रथशक्तिरदीर्यत ॥ १३ ॥
युगान्ते सूर्यमाहत्य महोल्केव दिवश्च्युता ।
उसका अग्रभाग तेजसे प्रकाशित हो रहा था। वह रथ-शक्ति उस महापुरुषसे टकराकर उसी प्रकार विदीर्ण हो गयी, जैसे प्रलयकालमें आकाशसे गिरी हुई बड़ी भारी उल्का सूर्यसे टकराकर नष्ट हो जाती है ॥

अथ हेमत्सरुं दिव्यं खड्गमाकाशवर्चसम् ॥ १४ ॥

कोशात् समुद्बबर्हाशु बिलाद् दीप्तमिवोरगम् । तब अश्वत्थामाने सोनेकी मूठसे सुशोभित तथा आकाशके समान निर्मल कान्तिवाली अपनी दिव्य तलवार तुरंत ही म्यानसे बाहर निकाली, मानो प्रज्वलित सर्पको बिलसे बाहर निकाला गया हो ॥ १४ १/२ ॥

ततः खड्गवरं धीमान् भूताय प्राहिणोत् तदा ॥ १५ ॥ स तदासाद्य भूतं वै बिलं नकुलवद् ययौ । फिर बुद्धिमान् द्रोणपुत्रने वह अच्छी-सी तलवार तत्काल ही उस महाभूतपर चला दी; परंतु वह उसके शरीरमें लगकर उसी तरह विलीन हो गयी, जैसे कोई नेवला बिलमें घुस गया हो ॥ १५ १/२ ॥

ततः स कुपितो द्रौणिरिन्द्रकेतुनिभां गदाम् ॥ १६ ॥ ज्वलन्तीं प्राहिणोत् तस्मै भूतं तामपि चाग्रसत् । तदनन्तर कुपित हुए अश्वत्थामाने उसके ऊपर अपनी इन्द्रध्वजके समान प्रकाशित होनेवाली गदा चलायी; परंतु वह भूत उसे भी लील गया ॥ १६ १/२ ॥

ततः सर्वायुधाभावे वीक्षमाणस्ततस्ततः ॥ १७ ॥ अपश्यत् कृतमाकाशमनाकाशं जनार्दनैः । इस प्रकार जब उसके सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गये, तब वह इधर-उधर देखने लगा। उस समय उसे सारा आकाश असंख्य विष्णुओंस भरा दिखायी दिया ॥

तदद्भुततमं दृष्ट्वा द्रोणपुत्रो निरायुधः ॥ १८ ॥ अब्रवीदतिसंतप्तः कृपवाक्यमनुस्मरन् । अस्त्रहीन अश्वत्थामा यह अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखकर कृपाचार्यके वचनोंको बारंबार स्मरण करता हुआ अत्यन्त संतप्त हो उठा और मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगा — ॥ १८ १/२ ॥

ब्रुवतामप्रियं पथ्यं सुहृदां न शृणोति यः ॥ १९ ॥ स शोचत्यापदं प्राप्य यथाहमतिवर्त्य तौ । ‘जो पुरुष अप्रिय किंतु हितकर वचन बोलनेवाले अपने सुहृदोंकी सीख नहीं सुनता है, वह विपत्तिमें पड़कर उसी तरह शोक करता है, जैसे मैं अपने उन दोनों सुहृदोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके कष्ट पा रहा हूँ ॥

शास्त्रदृष्टानविद्वान् यः समतीत्य जिघांसति ॥ २० ॥ स पथः प्रच्युतो धर्मात् कुपथे प्रतिहन्यते । ‘जो मूर्ख शास्त्रदर्शी पुरुषोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके दूसरोंकी हिंसा करना चाहता है, वह धर्ममार्गसे भ्रष्ट हो कुमार्गमें पड़कर स्वयं ही मारा जाता है ॥ २० १/२ ॥

गोब्राह्मणनृपस्त्रीषु सख्युर्मातुर्गुरोस्तथा ॥ २१ ॥

हीनप्राणजडान्धेषु सुप्तभीतोत्थितेषु च । मत्तोन्मत्तप्रमत्तेषु न शस्त्राणि च पातयेत् ॥ २२ ॥ 'गौ, ब्राह्मण, राजा, स्त्री, मित्र, माता, गुरु, दुर्बल, जड, अन्धे, सोये हुए, डरे हुए, मतवाले, उन्मत्त और असावधान पुरुषोंपर मनुष्य शस्त्र न चलाये ॥ २१-२२ ॥ इत्येवं गुरुभिः पूर्वमुपदिष्टं नृणां सदा । सोऽहमुत्क्रम्य पन्थानं शास्त्रदिष्टं सनातनम् ॥ २३ ॥ अमार्गेणैवमारभ्य घोरामापदमागतः । 'इस प्रकार गुरुजनोंने पहले-से ही सब लोगोंको सदाके लिये यह शिक्षा दे रखी है। परंतु मैं उस शास्त्रोक्त सनातन मार्गका उल्लंघन करके बिना रास्तेके ही चलकर इस प्रकार अनुचित कर्मका आरम्भ करके भयंकर आपत्तिमें पड़ गया हूँ ॥ २३ १/२ ॥ तां चापदं घोरतरां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २४ ॥ यदुद्यम्य महत् कृत्यं भयादपि निवर्तते । अशक्तश्चैव तत् कर्तुं कर्म शक्तिबलादिह ॥ २५ ॥ 'मनीषी पुरुष उसीको अत्यन्त भयंकर आपत्ति बताते हैं, जब कि मनुष्य किसी महान् कार्यका आरम्भ करके भयके कारण भी उससे पीछे हट जाता है और शक्ति-बलसे यहाँ उस कर्मको करनेमें असमर्थ हो जाता है ॥ २४-२५ ॥ न हि दैवाद् गरीयो वै मानुषं कर्म कथ्यते । मानुष्यं कुर्वतः कर्म यदि दैवान्न सिध्यति ॥ २६ ॥ स पथः प्रच्युतो धर्माद् विपदं प्रतिपद्यते । 'मानव-कर्म (पुरुषार्थ)-को दैवसे बढ़कर नहीं बताया गया है। पुरुषार्थ करते समय यदि दैववश सिद्धि नहीं प्राप्त हुई तो मनुष्य धर्ममार्गसे भ्रष्ट होकर विपत्तिमें फँस जाता है ॥ २६ १/२ ॥ प्रतिज्ञानं ह्यविज्ञानं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २७ ॥ यदारभ्य क्रियां काञ्चिद् भयादिह निवर्तते । 'यदि मनुष्य किसी कार्यको आरम्भ करके यहाँ भयके कारण उससे निवृत्त हो जाता है तो ज्ञानी पुरुष उसकी उस कार्यको करनेकी प्रतिज्ञाको अज्ञान या मूर्खता बताते हैं ॥ २७ १/२ ॥ तदिदं दुष्प्रणीतेन भयं मां समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ न हि द्रोणसुतः संख्ये निवर्तेत कथंचन । इदं च सुमहद् भूतं दैवदण्डमिवोद्यतम् ॥ २९ ॥ 'इस समय अपने ही दुष्कर्मके कारण मुझपर यह भय आ पहुँचा है। द्रोणाचार्यका पुत्र किसी प्रकार भी युद्धसे पीछे नहीं हट सकता; परंतु क्या करूँ, यह महाभूत मेरे मार्गमें विघ्न डालनेके लिये दैवदण्डके समान उठ खड़ा हुआ है ॥ २८-२९ ॥

न चैतदभिजानामि चिन्तयन्नपि सर्वथा । ध्रुवं येयमधर्मे मे प्रवृत्ता कलुषा मतिः ॥ ३० ॥ तस्याः फलमिदं घोरं प्रतिघाताय कल्पते । तदिदं दैवविहितं मम संख्ये निवर्तनम् ॥ ३१ ॥ ‘मैं सब प्रकारसे सोचने-विचारनेपर भी नहीं समझ पाता कि यह कौन है? निश्चय ही जो मेरी यह कलुषित बुद्धि अधर्ममें प्रवृत्त हुई है, उसीका विघात करनेके लिये यह भयंकर परिणाम सामने आया है, अतः आज युद्धसे मेरा पीछे हटना दैवके विधानसे ही सम्भव हुआ है॥ ३०-३१ ॥

नान्यत्र दैवादुद्यन्तुमिह शक्यं कथंचन । सोऽहमद्य महादेवं प्रपद्ये शरणं विभुम् ॥ ३२ ॥ दैवदण्डमिमं घोरं स हि मे नाशयिष्यति । ‘दैवकी अनुकूलताके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है, जिससे किसी प्रकार फिर यहाँ युद्धविषयक उद्योग किया जा सके; इसलिये आज मैं सर्वव्यापी भगवान् महादेवजीकी शरण लेता हूँ। वे ही मेरे सामने आये हुए इस भयानक दैवदण्डका नाश करेंगे॥ ३२ १/२ ॥

कपर्दिनं देवदेवमुमापतिमनामयम् ॥ ३३ ॥ कपालमालिनं रुद्रं भगनेत्रहरं हरम् । स हि देवोऽत्यगाद् देवांस्तपसा विक्रमेण च । तस्माच्छरणमभ्येमि गिरिशं शूलपाणिनम् ॥ ३४ ॥ ‘भगवान् शंकर तपस्या और पराक्रममें सब देवताओंसे बढ़कर हैं; अतः मैं उन्हीं रोग-शोकसे रहित, जटाजूटधारी, देवताओंके भी देवता, भगवती उमाके प्राणवल्लभ, कपाल-मालाधारी, भगनेत्र-विनाशक, पापहारी, त्रिशूलधारी एवं पर्वतपर शयन करनेवाले रुद्रदेवकी शरणमें जाता हूँ’ ॥ ३३-३४ ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिचिन्तायां षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी चिन्ताविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3013)

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सप्तमोऽध्यायः

अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना

संजय उवाच

एवं संचिन्तयित्वा तु द्रोणपुत्रो विशाम्पते ।
अवतीर्य रथोपस्थाद् देवेशं प्रणतः स्थितः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**प्रजानाथ! ऐसा सोचकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा रथकी बैठकसे उतर पड़ा और देवेश्वर महादेवजीको प्रणाम करके खड़ा हो इस प्रकार स्तुति करने लगा ॥ १ ॥

द्रौणिरुवाच

उग्रं स्थाणुं शिवं रुद्रं शर्वमीशानमीश्वरम् ।
गिरिशं वरदं देवं भवभावनमीश्वरम् ॥ २ ॥
शितिकण्ठमजं शुक्रं दक्षक्रतुहरं हरम् ।
विश्वरूपं विरूपाक्षं बहुरूपमुमापतिम् ॥ ३ ॥
श्मशानवासिनं दृप्तं महागणपतिं विभुम् ।
खट्वाङ्गधारिणं रुद्रं जटिलं ब्रह्मचारिणम् ॥ ४ ॥
मनसा सुविशुद्धेन दुष्करेणाल्पचेतसा ।
सोऽहमात्मोपहारेण यक्ष्ये त्रिपुरघातिनम् ॥ ५ ॥
**अश्वत्थामा बोला—**प्रभो! आप उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र, शर्व, ईशान, ईश्वर और गिरिश आदि नामोंसे प्रसिद्ध वरदायक देवता तथा सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर हैं। आपके कण्ठमें नील चिह्न है। आप अजन्मा एवं शुद्धात्मा हैं। आपने ही दक्षके यज्ञका विनाश किया है। आप ही संहारकारी हर, विश्वरूप, भयानक नेत्रोंवाले, अनेक रूपधारी तथा उमादेवीके प्राणनाथ हैं। आप श्मशानमें निवास करते हैं। आपको अपनी शक्तिपर गर्व है। आप अपने महान् गणोंके अधिपति, सर्वव्यापी तथा खट्वांगधारी हैं, उपासकोंका दुःख दूर करनेवाले रुद्र हैं, मस्तकपर जटा धारण करनेवाले ब्रह्मचारी हैं। आपने त्रिपुरासुरका विनाश किया है। मैं विशुद्ध हृदयसे अपने-आपकी बलि देकर, जो मन्दमति मानवोंके लिये अति दुष्कर है, आपका यजन करूँगा ॥ २—५ ॥

स्तुतं स्तुत्यं स्तूयमानममोघं कृत्तिवाससम् ।
विलोहितं नीलकण्ठमसह्यं दुर्निवारणम् ॥ ६ ॥
शुक्रं ब्रह्मसृजं ब्रह्म ब्रह्मचारिणमेव च ।

व्रतवन्तं तपोनिष्ठमनन्तं तपतां गतिम् ॥ ७ ॥ बहुरूपं गणाध्यक्षं त्र्यक्षं पार्षदप्रियम् । धनाध्यक्षेक्षितमुखं गौरीहृदयवल्लभम् ॥ ८ ॥ कुमारपितरं पिङ्गं गोवृषोत्तमवाहनम् । तनुवाससमत्युग्रमुमाभूषणतत्परम् ॥ ९ ॥ परं परेभ्यः परमं परं यस्मान्न विद्यते । इष्वस्त्रोत्तमभर्तारं दिगन्तं देशरक्षिणम् ॥ १० ॥ हिरण्यकवचं देवं चन्द्रमौलिविभूषणम् । प्रपद्ये शरणं देवं परमेण समाधिना ॥ ११ ॥ पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याघ्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ ॥ ६—११ ॥ इमां चेदापदं घोरां तराम्यद्य सुदुष्कराम् । सर्वभूतोपहारेण यक्ष्येऽहं शुचिना शुचिम् ॥ १२ ॥ यदि मैं आज इस अत्यन्त दुष्कर और भयंकर विपत्तिसे पार पा जाऊँ तो मैं सर्वभूतमय पवित्र उपहार समर्पित करके आप परम पावन परमेश्वरकी पूजा करूँगा ॥ १२ ॥ इति तस्य व्यवसितं ज्ञात्वा योगात् सुकर्मणः । पुरस्तात् काञ्चनी वेदी प्रादुरासीन्महात्मनः ॥ १३ ॥ इस प्रकार अश्वत्थामाका दृढ़ निश्चय जानकर उसके शुभकर्मके योगसे उस महामनस्वी वीरके आगे एक सुवर्णमयी वेदी प्रकट हुई ॥ १३ ॥ तस्यां वेद्यां तदा राजंश्चित्रभानुरजायत ।

स दिशो विदिशः खं च ज्वालाभिरिव पूरयन् ॥ १४ ॥
राजन्! उस वेदीपर तत्काल ही अग्निदेव प्रकट हो गये, जो अपनी ज्वालाओंसे सम्पूर्ण दिशाओं-विदिशाओं और आकाशको परिपूर्ण-सा कर रहे थे ॥ १४ ॥
दीप्तास्यनयनाश्चात्र नैकपादशिरोभुजाः ।
रत्नचित्राङ्गदधराः समुद्यतकरास्तथा ॥ १५ ॥
द्वीपशैलप्रतीकाशाः प्रादुरासन् महागणाः ।
वहीं बहुत-से महान् गण प्रकट हो गये, जो द्वीपवर्ती पर्वतोंके समान बहुत ऊँचे कदके थे। उनके मुख और नेत्र दीप्तिसे दमक रहे थे। उन गणोंके पैर, मस्तक और भुजाएँ अनेक थीं। वे अपनी बाहोंमें रत्न-निर्मित विचित्र अंगद धारण किये हुए थे। उन सबने अपने हाथ ऊपर उठा रखे थे ॥ १५ १/२ ॥
श्ववराहोष्ट्ररूपाश्च हयगोमायुगोमुखाः ॥ १६ ॥
ऋक्षमार्जारवदना व्याघ्रद्वीपिमुखास्तथा ।
काकवक्त्राः प्लवमुखाः शुकवक्त्रास्तथैव च ॥ १७ ॥
महाजगरवक्त्राश्च हंसवक्त्राः सितप्रभाः ।
दार्वाघाटमुखाश्चापि चाषवक्त्राश्च भारत ॥ १८ ॥
उनके रूप कुत्ते, सूअर और ऊँटोंके समान थे; मुँह घोड़ों, गीदड़ों और गाय-बैलोंके समान जान पड़ते थे। किन्हींके मुख रीछोंके समान थे तो किन्हींके बिलावोंके समान। कोई बाघोंके समान मुँहवाले थे तो कोई चीतोंके। कितने ही गणोंके मुख कौओं, वानरों, तोतों, बड़े-बड़े अजगरों और हंसोंके समान थे। भारत! कितनोंकी कान्ति भी हंसोंके समान सफेद थी, कितने ही गणोंके मुख कठफोरवा पक्षी और नीलकण्ठके समान थे ॥ १६—१८ ॥
कूर्मनक्रमुखाश्चैव शिशुमारमुखास्तथा ।
महामकरवक्त्राश्च तिमिवक्त्रास्तथैव च ॥ १९ ॥
हरिवक्त्राः क्रौञ्चमुखाः कपोतेभमुखास्तथा ।
पारावतमुखाश्चैव मद्गुवक्त्रास्तथैव च ॥ २० ॥
इसी प्रकार बहुत-से गण कछुए, नाकें, सूँस, बड़े-बड़े मगर, तिमि नामक मत्स्य, मोर, क्रौंच (कुरर), कबूतर, हाथी, परेवा तथा मद्गु नामक जलपक्षीके समान मुखवाले थे ॥ १९-२० ॥
पाणिकर्णाः सहस्राक्षास्तथैव च महोदराः ।
निर्मांसाः काकवक्त्राश्च श्येनवक्त्राश्च भारत ॥ २१ ॥
तथैवाशिरसो राजन्नृक्षवक्त्राश्च भारत ।
प्रदीप्तनेत्रजिह्वाश्च ज्वालावर्णास्तथैव च ॥ २२ ॥
किन्हींके हाथोंमें ही कान थे। कितने ही हजार-हजार नेत्र और लंबे पेटवाले थे। कितनोंके शरीर मांसरहित, हड्डियोंके ढाँचे मात्र थे। भरतनन्दन! कोई कौओंके समान

मुखवाले थे तो कोई बाजके समान। राजन्! किन्हीं-किन्हींके तो सिर ही नहीं थे। भारत! कोई-कोई भालूके समान मुखवाले थे। उन सबके नेत्र और जिह्वाएँ तेजसे प्रज्वलित हो रही थीं। अंगोंकी कान्ति आगकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी ॥ २१-२२ ॥ ज्वालाकेशाश्च राजेन्द्र ज्वलद्रोमचतुर्भुजाः । मेषवक्त्रास्तथैवान्ये तथा छागमुखा नृप ॥ २३ ॥ राजेन्द्र! उनके केश भी अग्नि-शिखाके समान प्रतीत होते थे। उनका रोम-रोम प्रज्वलित हो रहा था। उन सबके चार भुजाएँ थीं। नरेश्वर! कितने ही गणोंके मुख भेड़ों और बकरोंके समान थे ॥ २३ ॥ शङ्खाभाः शङ्खवक्त्राश्च शङ्खवर्णास्तथैव च । शङ्खमालापरिकराः शङ्खध्वनिसमस्वनाः ॥ २४ ॥ कितनोंके मुख, वर्ण और कान्ति शंखके सदृश थे। वे शंखकी मालाओंसे अलंकृत थे और उनके मुखसे शंखध्वनिके समान ही शब्द प्रकट होते थे ॥ जटाधराः पञ्चशिखास्तथा मुण्डाः कृशोदराः । चतुर्दंष्ट्राश्चतुर्जिह्वाः शङ्कुकर्णाः किरीटिनः ॥ २५ ॥ कोई समूचे सिरपर जटा धारण करते थे, कोई पाँच शिखाएँ रखते थे और कितने ही मूँड़ मुड़ाये रहते थे। बहुतोंके उदर अत्यन्त कृश थे, कितनोंके चार दाढ़ें और चार जिह्वाएँ थीं। किन्हींके कान खूँटीके समान जान पड़ते थे और कितने ही पार्षद अपने मस्तकपर किरीट धारण करते थे ॥ २५ ॥ मौञ्जीधराश्च राजेन्द्र तथा कुञ्चितमूर्धजाः । उष्णीषिणो मुकुटिनश्चारुवक्त्राः स्वलङ्कृताः ॥ २६ ॥ राजेन्द्र! कोई मूँजकी मेखला पहने हुए थे, किन्हींके सिरके बाल घुँघराले दिखायी देते थे, कोई पगड़ी धारण किये हुए थे तो कोई मुकुट। कितनोंके मुख बड़े ही मनोहर थे। कितने ही सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ २६ ॥ पद्मोत्पलापीडधरास्तथा मुकुटधारिणः । माहात्म्येन च संयुक्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २७ ॥ कोई अपने मस्तकपर कमलों और कुमुदोंका किरीट धारण करते थे। बहुतोंने विशुद्ध मुकुट धारण कर रखा था। वे भूतगण सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें थे और सभी अद्भुत माहात्म्यसे सम्पन्न थे ॥ शतघ्नीवज्रहस्ताश्च तथा मुसलपाणयः । भुशुण्डीपाशहस्ताश्च दण्डहस्ताश्च भारत ॥ २८ ॥ भारत! उनके हाथोंमें शतघ्नी, वज्र, मूसल, भुशुण्डी, पाश और दण्ड शोभा पाते थे ॥ २८ ॥ पृष्ठेषु बद्धेषुधयश्चित्रबाणोत्कटास्तथा ।

सध्वजाः सपताकाश्च सघण्टाः सपरश्वधाः ॥ २९ ॥ उनकी पीठोंपर तरकस बँधे थे। वे विचित्र बाण लिये युद्धके लिये उन्मत्त जान पड़ते थे। उनके पास ध्वजा, पताका, घंटे और फरसे मौजूद थे ॥ २९ ॥

महापाशोद्यतकरास्तथा लगुडपाणयः । स्थूणाहस्ताः खड्गहस्ताः सर्पोच्छितकिरीटिनः ॥ ३० ॥ उन्होंने अपने हाथोंमें बड़े-बड़े पाश उठा रखे थे, कितनोंके हाथोंमें डंडे, खम्भे और खड्ग शोभा पाते थे तथा कितनोंके मस्तकपर सर्पोंके उन्नत किरीट सुशोभित होते थे ॥ ३० ॥

महासर्पाङ्गदधराश्चित्राभरणधारिणः । रजोध्वस्ताः पङ्कदिग्धाः सर्वे शुक्लाम्वरस्रजः ॥ ३१ ॥ कितनोंने बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प धारण कर रखे थे। कितने ही विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थे, बहुतोंके शरीर धूलि-धूसर हो रहे थे। कितने ही अपने अंगोंमें कीचड़ लपेटे हुए थे। उन सबने श्वेत वस्त्र और श्वेत फूलोंकी माला धारण कर रखी थी ॥

नीलाङ्गाः पिङ्गलाङ्गाश्च मुण्डवक्त्रास्तथैव च । भेरीशङ्खमृदङ्गांश्च झर्झरानकगोमुखान् ॥ ३२ ॥ अवादयन् पारिषदाः प्रहृष्टाः कनकप्रभाः । गायमानास्तथैवान्ये नृत्यमानास्तथा परे ॥ ३३ ॥ कितनोंके अंग नील और पिंगलवर्णके थे। कितनोंने अपने मस्तकके बाल मुँड़वा दिये। कितने ही सुनहरी प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। वे सभी पार्षद हर्षसे उत्फुल्ल हो भेरी, शंख, मृदंग, झाँझ, ढोल और गोमुख बजा रहे थे। कितने ही गीत गा रहे थे और दूसरे बहुत-से पार्षद नाच रहे थे ॥ ३२-३३ ॥

लङ्घन्तः प्लवन्तश्च वल्गन्तश्च महारथाः । धावन्तो जवना मुण्डाः पवनोद्धूतमूर्धजाः ॥ ३४ ॥ वे महारथी भूतगण उछलते, कूदते और लाँघते हुए बड़े वेगसे दौड़ रहे थे। उनमेंसे कितने तो माथ मुँड़ाये हुए थे और कितनोंके सिरके बाल हवाके झोंकेसे ऊपरकी ओर उठ गये थे ॥ ३४ ॥

मत्ता इव महानागा विनदन्तो मुहुर्मुहुः । सुभीमा घोररूपाश्च शूलपट्टिशपाणयः ॥ ३५ ॥ वे मतवाले गजराजोंके समान बारंबार गर्जना करते थे। उनके हाथोंमें शूल और पट्टिश दिखायी देते थे। वे घोर रूपधारी और भयंकर थे ॥ ३५ ॥

नानाविरागवसनाश्चित्रमाल्यानुलेपनाः । रत्नचित्राङ्गदधराः समुद्यतकरास्तथा ॥ ३६ ॥

उनके वस्त्र नाना प्रकारके रंगोंमें रँगे हुए थे। वे विचित्र माला और चन्दनसे अलंकृत थे। उन्होंने रत्ननिर्मित विचित्र अंगद धारण कर रखे थे और उन सबके हाथ ऊपरकी ओर उठे हुए थे ।। ३६ ।।

हन्तारो द्विषतां शूराः प्रसह्यासह्यविक्रमाः ।
पातारोऽसृग्वसौघानां मांसान्त्रकृतभोजनाः ।। ३७ ।।
वे शूरवीर पार्षद हठपूर्वक शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ थे। उनका पराक्रम असह्य था। वे रक्त और वसा पीते तथा आँत और मांस खाते थे ।। ३७ ।।

चूडालाः कर्णिकाराश्च प्रहृष्टाः पिठरोदराः ।
अतिह्रस्वातिदीर्घाश्च प्रलम्बाश्चातिभैरवाः ।। ३८ ।।
कितनोंके मस्तकपर शिखाएँ थीं। कितने ही कनेरके फूल धारण करते थे। बहुतेरे पार्षद अत्यन्त हर्षसे खिल उठे थे। कितनोंके पेट बटलोई या कड़ाहीके समान जान पड़ते थे। कोई बहुत नाटे, कोई बहुत मोटे, कोई बहुत लंबे और कोई अत्यन्त भयंकर थे ।। ३८ ।।

विकटाः काललम्बोष्ठा बृहच्छेफाण्डपिण्डिकाः ।
महार्हनानामुकुटा मुण्डाश्च जटिलाः परे ।। ३९ ।।
कितनोंके आकार बहुत विकट थे, कितनोंके काले-काले और लंबे ओठ लटक रहे थे, किन्हींके लिंग बड़े थे तो किन्हींके अण्डकोष। किन्हींके मस्तकोंपर नाना प्रकारके बहुमूल्य मुकुट शोभा पाते थे, कुछ लोग मथमुंडे थे और कुछ जटाधारी ।। ३९ ।।

सार्केन्दुग्रहनक्षत्रां द्यां कुर्युस्ते महीतले ।
उत्सहेरंश्च ये हन्तुं भूतग्रामं चतुर्विधम् ।। ४० ।।
वे सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित सम्पूर्ण आकाश-मण्डलको पृथ्वीपर गिरा सकते थे और चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायका संहार करनेमें समर्थ थे ।। ४० ।।

ये च वीतभया नित्यं हरस्य भृकुटीसहाः ।
कामकारकरा नित्यं त्रैलोक्यस्येश्वरेश्वराः ।। ४१ ।।
वे सदा निर्भय होकर भगवान् शंकरके भ्रूभंगको सहन करनेवाले थे। प्रतिदिन इच्छानुसार कार्य करते और तीनों लोकोंके ईश्वरोंपर भी शासन कर सकते थे ।। ४१ ।।

नित्यानन्दप्रमुदिता वागीशा वीतमत्सराः ।
प्राप्याष्टगुणमैश्वर्यं ये न यास्यन्ति वै स्मयम् ।। ४२ ।।
वे पार्षद नित्य आनन्दमें मग्न रहते थे, वाणीपर उनका अधिकार था। उनके मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या और द्वेष नहीं रह गये थे। वे अणिमा-महिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्यको पाकर भी कभी अभिमान नहीं करते थे ।। ४२ ।।

येषां विस्मयते नित्यं भगवान् कर्मभिर्हरः ।
मनोवाक्कर्मभिर्युक्तैर्नित्यमाराधितश्च यैः ।। ४३ ।।

साक्षात् भगवान् शंकर भी प्रतिदिन उनके कर्मोंको देखकर आश्चर्यचकित हो जाते थे। वे मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा सदा सावधान रहकर महादेवजीकी आराधना करते थे॥ ४३॥
मनोवाक्कर्मभिर्भक्तान् पाति पुत्रानिवौरसान्।
पिबन्तोऽसृग्वसाश्चान्ये क्रुद्धा ब्रह्मद्विषां सदा ॥ ४४ ॥
मन, वाणी और कर्मसे अपने प्रति भक्ति रखनेवाले उन भक्तोंका भगवान् शिव सदा औरस पुत्रोंकी भाँति पालन करते थे। बहुत-से पार्षद रक्त और वसा पीकर रहते थे। वे ब्रह्मद्रोहियोंपर सदा क्रोध प्रकट करते थे॥ ४४॥
चतुर्विधात्मकं सोमं ये पिबन्ति च सर्वदा ।
श्रुतेन ब्रह्मचर्येण तपसा च दमेन च ॥ ४५ ॥
ये समाराध्य शूलाङ्कं भवसायुज्यमागताः ।
अन्न, सोमलताका रस, अमृत और चन्द्रमण्डल—ये चार प्रकारके सोम हैं, वे पार्षदगण इनका सदा पान करते हैं। उन्होंने वेदोंके स्वाध्याय, ब्रह्मचर्यपालन, तपस्या और इन्द्रिय-संयमके द्वारा त्रिशूल-चिह्नित भगवान् शिवकी आराधना करके उनका सायुज्य प्राप्त कर लिया है॥ ४५ १/२ ॥
यैरात्मभूतैर्भगवान् पार्वत्या च महेश्वरः ॥ ४६ ॥
महाभूतगणैर्भुङ्क्ते भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
वे महाभूतगण भगवान् शिवके आत्मस्वरूप हैं, उनके तथा पार्वतीदेवीके साथ भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी महेश्वर यज्ञ-भाग ग्रहण करते हैं॥
नानावादित्रहसितश्वेडितोत्कृष्टगर्जितैः ॥ ४७ ॥
संत्रासयन्तस्ते विश्वमश्वत्थामानमभ्ययुः ।
भगवान् शिवके वे पार्षद नाना प्रकारके बाजे बजाने, हँसने, सिंहनाद करने, ललकारने तथा गर्जने आदिके द्वारा सम्पूर्ण विश्वको भयभीत करते हुए अश्वत्थामाके पास आये ॥ ४७ १/२ ॥
संस्तुवन्तो महादेवं भाः कुर्वाणाः सुवर्चसः ॥ ४८ ॥
विवर्धयिषवो द्रौणेर्महिमानं महात्मनः ।
जिज्ञासमानास्तेजः सौप्तिकं च दिदृक्षवः ॥ ४९ ॥
भीमोग्रपरिघालातशूलपट्टिशपाणयः ।
घोररूपाः समाजग्मुर्भूतसङ्घाः समन्ततः ॥ ५० ॥
भूतोंके वे समूह बड़े भयंकर और तेजस्वी थे तथा सब ओर अपनी प्रभा फैला रहे थे। अश्वत्थामामें कितना तेज है, इस बातको वे जानना चाहते थे और सोते समय जो महान् संहार होनेवाला था, उसे भी देखनेकी इच्छा रखते थे। साथ ही महामनस्वी द्रोणकुमारकी महिमा बढ़ाना चाहते थे; इसीलिये महादेवजीकी स्तुति करते हुए वे चारों ओरसे वहाँ आ

पहुँचे। उनके हाथोंमें अत्यन्त भयंकर परिघ, चलते लुआठे, त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे॥ ४८–५०॥
जनयेयुर्भयं ये स्म त्रैलोक्यस्यापि दर्शनात्।
तान् प्रेक्षमाणोऽपि व्यथां न चकार महाबलः॥ ५१॥
भगवान् भूतनाथके वे गण दर्शन देनेमात्रसे तीनों लोकोंके मनमें भय उत्पन्न कर सकते थे, तथापि महाबली अश्वत्थामा उन्हें देखकर तनिक भी व्यथित नहीं हुआ॥
अथ द्रौणिर्धनुष्पाणिर्बद्धगोधाङ्गुलित्रवान्।
स्वयमेवात्मनात्मानमुपहारमुपाहरत्॥ ५२॥
तदनन्तर हाथमें धनुष लिये और गोहके चर्मके बने दस्ताने पहने हुए द्रोणकुमारने स्वयं ही अपने-आपको भगवान् शिवके चरणोंमें भेंट चढ़ा दिया॥ ५२॥
धनूंषि समिधस्तत्र पवित्राणि शिताः शराः।
हविरात्मवतश्चात्मा तस्मिन् भारत कर्मणि॥ ५३॥
भारत! उस आत्मसमर्पणरूपी यज्ञकर्ममें आत्मबल-सम्पन्न अश्वत्थामाका धनुष ही समिधा, तीखे बाण ही कुशा और शरीर ही हविष्यरूपमें प्रस्तुत हुए॥ ५३॥
ततः सौम्येन मन्त्रेण द्रोणपुत्रः प्रतापवान्।
उपहारं महामन्युरथात्मानमुपाहरत्॥ ५४॥
फिर महाक्रोधी प्रतापी द्रोणपुत्रने सोमदेवता-सम्बन्धी मन्त्रके* द्वारा अपने शरीरको ही उपहारके रूपमें अर्पित कर दिया॥ ५४॥
तं रुद्रं रौद्रकर्माणं रौद्रैः कर्मभिरच्युतम्।
अभिष्टुत्य महात्मानमित्युवाच कृताञ्जलिः॥ ५५॥
भयंकर कर्म करनेवाले तथा अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले महात्मा रुद्रदेवकी रौद्रकर्मोंद्वारा ही स्तुति करके अश्वत्थामा हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला॥

द्रौणिरुवाच

इममात्मानमद्याहं जातमाङ्गिरसे कुले।
स्वग्नौ जुहोमि भगवन् प्रतिगृह्णीष्व मां बलिम्॥ ५६॥
**अश्वत्थामाने कहा—**भगवन्! आज मैं आंगिरस कुलमें उत्पन्न हुए अपने शरीरकी प्रज्वलित अग्निमें आहुति देता हूँ। आप मुझे हविष्यरूपमें ग्रहण कीजिये॥
भवद्भक्त्या महादेव परमेण समाधिना।
अस्यामापदि विश्वात्मन्नुपाकुर्मि तवाग्रतः॥ ५७॥
विश्वात्मन्! महादेव! इस आपत्तिके समय आपके प्रति भक्तिभावसे अपने चित्तको पूर्ण एकाग्र करके आपके समक्ष यह भेंट समर्पित करता हूँ (आप इसे स्वीकार करें)॥
त्वयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चासि वै।

गुणानां हि प्रधानानामेकत्वं त्वयि तिष्ठति ॥ ५८ ॥ प्रभो! सम्पूर्ण भूत आपमें स्थित हैं और आप सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित हैं। आपमें ही मुख्य-मुख्य गुणोंकी एकता होती है ॥ ५८ ॥ सर्वभूताश्रय विभो हविर्भूतमवस्थितम् । प्रतिगृहाण मां देव यद्यशक्याः परे मया ॥ ५९ ॥ विभो! आप सम्पूर्ण भूतोंके आश्रय हैं। देव! यदि शत्रुओंका मेरे द्वारा पराभव नहीं हो सकता तो आप हविष्यरूपमें सामने खड़े हुए मुझ अश्वत्थामाको स्वीकार कीजिये ॥ ५९ ॥ इत्युक्त्वा द्रौणिरास्थाय तां वेदीं दीप्तपावकाम् । संत्यज्यात्मानमारुह्य कृष्णवर्त्मन्युपाविशत् ॥ ६० ॥ ऐसा कहकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा प्रज्वलित अग्निसे प्रकाशित हुई उस वेदीपर चढ़ गया और प्राणोंका मोह छोड़कर आगके बीचमें बैठ गया ॥ ६० ॥ तमूर्ध्वबाहुं निश्चेष्टं दृष्ट्वा हविरुपस्थितम् । अब्रवीद् भगवान् साक्षान्महादेवो हसन्निव ॥ ६१ ॥ उसे हविष्यरूपसे दोनों बाँहें ऊपर उठाये निश्चेष्ट भावसे बैठे देख साक्षात् भगवान् महादेवने हँसते हुए-से कहा— ॥ ६१ ॥ सत्यशौचार्जवत्यागैस्तपसा नियमेन च । क्षान्त्या भक्त्या च धृत्या च बुद्ध्या च वचसा तथा ॥ ६२ ॥ यथावदहमाराद्धः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा । तस्मादिष्टतमः कृष्णादन्यो मम न विद्यते ॥ ६३ ॥ 'अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने सत्य, शौच, सरलता, त्याग, तपस्या, नियम, क्षमा, भक्ति, धैर्य, बुद्धि और वाणीके द्वारा मेरी यथोचित आराधना की है; अतः श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा कोई मुझे परम प्रिय नहीं है ॥ ६२-६३ ॥ कुर्वता तात सम्मानं त्वां च जिज्ञासता मया । पञ्चालाः सहसा गुप्ता मायाश्च बहुशः कृताः ॥ ६४ ॥ 'तात! उन्हींका सम्मान और तुम्हारी परीक्षा करनेके लिये मैंने पांचालोंकी सहसा रक्षा की है और बारंबार मायाओंका प्रयोग किया है ॥ ६४ ॥ कृतस्तस्यैव सम्मानः पञ्चालान् रक्षता मया । अभिभूतास्तु कालेन नैषामद्यास्ति जीवितम् ॥ ६५ ॥ 'पांचालोंकी रक्षा करके मैंने श्रीकृष्णका ही सम्मान किया है; परंतु अब वे कालसे पराजित हो गये हैं, अब इनका जीवन शेष नहीं है' ॥ ६५ ॥ एवमुक्त्वा महात्मानं भगवानात्मनस्तनुम् । आविवेश ददौ चास्मै विमलं खड्गमुत्तमम् ॥ ६६ ॥

महामना अश्वत्थामासे ऐसा कहकर भगवान् शिवने अपने स्वरूपभूत उसके शरीरमें प्रवेश किया और उसे एक निर्मल एवं उत्तम खड्ग प्रदान किया।।

अथाविष्टो भगवता भूयो जज्वल तेजसा ।
वेगवांश्चाभवद् युद्धे देवसृष्टेन तेजसा ॥ ६७ ॥
भगवान्‌का आवेश हो जानेपर अश्वत्थामा पुनः अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो उठा। उस देवप्रदत्त तेजसे सम्पन्न हो वह युद्धमें और भी वेगशाली हो गया ॥ ६७ ॥

तमदृश्यानि भूतानि रक्षांसि च समाद्रवन् ।
अभितः शत्रुशिविरं यान्तं साक्षादिवेश्वरम् ॥ ६८ ॥
साक्षात् महादेवजीके समान शत्रुशिविरकी ओर जाते हुए अश्वत्थामाके साथ-साथ बहुत-से अदृश्य भूत और राक्षस भी दौड़े गये ॥ ६८ ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिकृतशिवार्चने सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें द्रोणपुत्रद्वारा की हुई भगवान् शिवकी पूजाविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥


* वह मन्त्र इस प्रकार है— 'आप्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा वाजस्य सङ्गथे ।।'

अध्याय (पृष्ठ 3023)

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अष्टमोऽध्यायः

अश्वत्थामाके द्वारा रात्रिमें सोये हुए पांचाल आदि समस्त वीरोंका संहार तथा फाटकसे निकलकर भागते हुए योद्धाओंका कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा वध

धृतराष्ट्र उवाच

तथा प्रयाते शिविरं द्रोणपुत्रे महारथे ।
कच्चित् कृपश्च भोजश्च भयार्तौ न व्यवर्तताम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब महारथी द्रोणपुत्र इस प्रकार शिविरकी ओर चला, तब कृपाचार्य और कृतवर्मा भयसे पीड़ित हो लौट तो नहीं गये? ॥ १ ॥

कच्चिन्न वारितौ क्षुद्रै रक्षिभिर्नोपलक्षितौ ।
असह्यमिति मन्वानौ न निवृत्तौ महारथौ ॥ २ ॥
कच्चिदुन्मथ्य शिविरं हत्वा सोमकपाण्डवान् ।
(कृता प्रतिज्ञा सफला कच्चित् संजय सा निशि ।)
कहीं नीच द्वार-रक्षकोंने उन्हें रोक तो नहीं दिया? किसीने उन्हें देखा तो नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि वे दोनों महारथी इस कार्यको असह्य मानकर लौट गये हों? संजय! क्या उस शिविरको मथकर सोमकों और पाण्डवोंकी हत्या करके रातमें अश्वत्थामाने अपनी प्रतिज्ञा सफल कर ली? ॥ २ १/२ ॥

दुर्योधनस्य पदवीं गतौ परमिकां रणे ॥ ३ ॥
पञ्चालैर्निहतौ वीरौ कच्चिन्नास्वपतां क्षितौ ।
कच्चित् ताभ्यां कृतं कर्म तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ४ ॥
वे दोनों वीर पांचालोंके द्वारा मारे जाकर धरतीपर सदाके लिये सो तो नहीं गये? रणभूमिमें मरकर दुर्योधनके ही उत्तम मार्गपर चले तो नहीं गये? क्या उन दोनोंने भी वहाँ कोई पराक्रम किया? संजय! ये सब बातें मुझे बताओ ॥ ३-४ ॥

संजय उवाच

तस्मिन् प्रयाते शिविरं द्रोणपुत्रे महात्मनि ।
कृपश्च कृतवर्मा च शिविरद्वार्यतिष्ठताम् ॥ ५ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! महामनस्वी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा जब शिविरके भीतर जाने लगा, उस समय कृपाचार्य और कृतवर्मा भी उसके दरवाजेपर जा खड़े हुए ॥

अश्वत्थामा तु तौ दृष्ट्वा यत्नवन्तौ महारथौ ।
प्रहृष्टः शनकै राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥

महाराज! उन दोनों महारथियोंको अपना साथ देनेके लिये प्रयत्नशील देख अश्वत्थामाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उनसे धीरेसे इस प्रकार कहा— ।। ६ ।।

यत्तौ भवन्तौ पर्याप्तौ सर्वक्षत्रस्य नाशने ।
किं पुर्नयोधशेषस्य प्रसुप्तस्य विशेषतः ।। ७ ।।
‘यदि आप दोनों सावधान होकर चेष्टा करें तो सम्पूर्ण क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये पर्याप्त हैं। फिर इन बचे-खुचे और विशेषतः सोये हुए योद्धाओंको मारना कौन बड़ी बात है? ।। ७ ।।

अहं प्रवेक्ष्ये शिविरं चरिष्यामि च कालवत् ।
यथा न कश्चिदपि वा जीवन् मुच्येत मानवः ।। ८ ।।
तथा भवद्भ्यां कार्यं स्यादिति मे निश्चिता मतिः ।
‘मैं तो इस शिविरके भीतर घुस जाऊँगा और वहाँ कालके समान विचरूँगा। आपलोग ऐसा करें जिससे कोई भी मनुष्य आप दोनोंके हाथसे जीवित न बच सके, यही मेरा दृढ़ विचार है’ ।। ८ १/२ ।।

इत्युक्त्वा प्राविशद् द्रौणिः पार्थानां शिविरं महत् ।। ९ ।।
अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य विहाय भयमात्मनः ।
ऐसा कहकर द्रोणकुमार पाण्डवोंके विशाल शिविरमें बिना दरवाजेके ही कूदकर घुस गया। उसने अपने जीवनका भय छोड़ दिया था ।। ९ १/२ ।।

स प्रविश्य महाबाहुरुद्देशज्ञश्च तस्य ह ।। १० ।।
धृष्टद्युम्नस्य निलयं शनकैरभ्युपागमत् ।
वह महाबाहु वीर शिविरके प्रत्येक स्थानसे परिचित था, अतः धीरे-धीरे धृष्टद्युम्नके खेमेमें जा पहुँचा ।।

ते तु कृत्वा महत् कर्म श्रान्ताश्च बलवद् रणे ।। ११ ।।
प्रसुप्ताश्चैव विश्वस्ताः स्वसैन्यपरिवारिताः ।
वहाँ वे पांचाल वीर रणभूमिमें महान् पराक्रम करके बहुत थक गये थे और अपने सैनिकोंसे घिरे हुए निश्चिन्त सो रहे थे ।। ११ १/२ ।।

अथ प्रविश्य तद् वेश्म धृष्टद्युम्नस्य भारत ।। १२ ।।
पाञ्चाल्यं शयने द्रौणिरपश्यत् सुप्तमन्तिकात् ।
क्षौमावदाते महति स्पर्ध्यास्तरणसंवृते ।। १३ ।।
माल्यप्रवरसंयुक्ते धूपैश्चूर्णैश्च वासिते ।
भरतनन्दन! धृष्टद्युम्नके उस डेरेमें प्रवेश करके द्रोणकुमारने देखा कि पांचालराजकुमार पास ही बहुमूल्य बिछौनोंसे युक्त तथा रेशमी चादरसे ढकी हुई एक विशाल शय्यापर सो रहा है। वह शय्या श्रेष्ठ मालाओंसे सुसज्जित तथा धूप एवं चन्दन चूर्णसे सुवासित थी ।। १२-१३ १/२ ।।

तं शयानं महात्मानं विश्रब्धमकुतोभयम् ।। १४ ।।
प्राबोधयत पादेन शयनस्थं महीपते ।
भूपाल! अश्वत्थामाने निश्चिन्त एवं निर्भय होकर शय्यापर सोये हुए महामनस्वी धृष्टद्युम्नको पैरसे ठोकर मारकर जगाया ।। १४ ½ ।।
सम्बुध्य चरणस्पर्शादुत्थाय रणदुर्मदः ।। १५ ।।
अभ्यजानादमेयात्मा द्रोणपुत्रं महारथम् ।
अमेय आत्मबलसे सम्पन्न रणदुर्मद धृष्टद्युम्न उसके पैर लगते ही जाग उठा और जागते ही उसने महारथी द्रोणपुत्रको पहचान लिया ।। १५ ½ ।।
तमुत्पतन्तं शयनादश्वत्थामा महाबलः ।। १६ ।।
केशेष्वालभ्य पाणिभ्यां निष्पिपेप महीतले ।
अब वह शय्यासे उठनेकी चेष्टा करने लगा। इतनेहीमें महाबली अश्वत्थामाने दोनों हाथसे उसके बाल पकड़कर पृथ्वीपर पटक दिया और वहाँ अच्छी तरह रगड़ा ।। १६ ½ ।।
सबलं तेन निष्पिष्टः साध्वसेन च भारत ।। १७ ।।
निद्रया चैव पाञ्चाल्यो नाशकच्चेष्टितुं तदा ।
भारत! धृष्टद्युम्न भय और निद्रासे दबा हुआ था। उस अवस्थामें जब अश्वत्थामाने उसे जोरसे पटककर रगड़ना आरम्भ किया, तब उससे कोई भी चेष्टा करते न बना ।। १७ ½ ।।
तमाक्रम्य पदा राजन् कण्ठे चोरसि चोभयोः ।। १८ ।।
नदन्तं विस्फुरन्तं च पशुमारममारयत् ।
राजन्! उसने पैरसे उसकी छाती और गला दोनोंको दबा दिया और उसे पशुकी तरह मारना आरम्भ किया। वह बेचारा चीखता और छटपटाता रह गया ।। १८ ½ ।।
तुदन्नखैस्तु स द्रौणिं नातिव्यक्तमुदाहरत् ।। १९ ।।
आचार्यपुत्र शस्त्रेण जहि मां मा चिरं कृथाः ।
त्वत्कृते सुकृताँल्लोकान् गच्छेयं द्विपदां वर ।। २० ।।
उसने अपने नखोंसे द्रोणकुमारको बकोटते हुए अस्पष्ट वाणीमें कहा—'मनुष्योंमें श्रेष्ठ आचार्यपुत्र! अब देरी न करो। मुझे किसी शस्त्रसे मार डालो, जिससे तुम्हारे कारण मैं पुण्यलोकोंमें जा सकूँ' ।। १९-२० ।।
एवमुक्त्वा तु वचनं विरराम परंतपः ।
सुतः पाञ्चालराजस्य आक्रान्तो बलिना भृशम् ।। २१ ।।
ऐसा कहकर बलवान् शत्रुके द्वारा बड़े जोरसे दबाया हुआ शत्रुसंतापी पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न चुप हो गया ।। २१ ।।
तस्याव्यक्तां तु तां वाचं संश्रुत्य द्रौणिरब्रवीत् ।
आचार्यघातिनां लोका न सन्ति कुलपांसन ।। २२ ।।