सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

उस रक्त पीनेवाले कीड़ेने कर्णकी जाँघके पास पहुँचकर उसे छेद दिया; परंतु गुरुजीके जागनेके भयसे कर्ण न तो उसे फेंक सका और न मार ही सका॥ संदश्यमानस्तु तथा कृमिणा तेन भारत। गुरोः प्रबोधनाशङ्की तमुपैक्षत सूर्यजः॥ ८॥ भरतनन्दन! वह कीड़ा उसे बारंबार डँसता रहा तो भी सूर्यपुत्र कर्णने कहीं गुरुजी जाग न उठें, इस आशंकासे उसकी उपेक्षा कर दी॥ ८॥ कर्णस्तु वेदनां धैर्यादसह्यां विनिगृह्य ताम्। अकम्पयन्नव्यथयन् धारयामास भार्गवम्॥ ९॥ यद्यपि कर्णको असह्य वेदना हो रही थी तो भी वह धैर्यपूर्वक उसे सहन करके कम्पित और व्यथित न होता हुआ परशुरामजीको गोदमें लिये रहा॥ ९॥ यदास्य रुधिरेणाङ्गं परिस्पृष्टं भृगूद्वहः। तदाबुध्यत तेजस्वी संत्रस्तश्चेदमब्रवीत्॥ १०॥ जब उसका रक्त परशुरामजीके शरीरमें लग गया, तब वे तेजस्वी भार्गव जाग उठे और भयभीत होकर इस प्रकार बोले—॥ १०॥ अहोऽस्म्यशुचितां प्राप्तः किमिदं क्रियते त्वया। कथयस्व भयं त्यक्त्वा याथातथ्यमिदं मम॥ ११॥ ‘अरे! मैं तो अशुद्ध हो गया! तू यह क्या कर रहा है? भय छोड़कर मुझे इस विषयमें ठीक-ठीक बता'॥ तस्य कर्णस्तदाऽऽचष्ट कृमिणा परिभक्षणम्। ददर्श रामस्तं चापि कृमिं सूकरसंनिभम्॥ १२॥ तब कर्णने उनसे कीड़ेके काटनेकी बात बतायी। परशुरामजीने भी उस कीड़ेको देखा, वह सूअरके समान जान पड़ता था॥ १२॥ अष्टपादं तीक्ष्णदंष्ट्रं सूचीभिरिव संवृतम्। रोमभिः संनिरुद्धाङ्गमलर्कं नाम नामतः॥ १३॥ उसके आठ पैर थे और तीखी दाढ़ें। सूई-जैसी चुभनेवाली रोमावलियोंसे उसका सारा शरीर भरा तथा रुँधा हुआ था। वह 'अलर्क' नामसे प्रसिद्ध कीड़ा था॥ स दृष्टमात्रो रामेण कृमिः प्राणानवासृजत्। तस्मिन्नेवासृजि क्लिन्नस्तदद्भुतमिवाभवत्॥ १४॥ परशुरामजीकी दृष्टि पड़ते ही उसी रक्तसे भीगे हुए उस कीड़ेने प्राण त्याग दिये, वह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ १४॥ ततोऽन्तरिक्षे ददृशे विश्वरूपः करालवान्। राक्षसो लोहितग्रीवः कृष्णाङ्गो मेघवाहनः॥ १५॥

तदनन्तर आकाशमें सब तरहके रूप धारण करनेमें समर्थ एक विकराल राक्षस दिखायी दिया, उसकी ग्रीवा लाल थी और शरीरका रंग काला था। वह बादलोंपर आरूढ था ।। १५ ।।

स रामं प्राञ्जलिर्भूत्वा बभाषे पूर्णमानसः । स्वस्ति ते भृगुशार्दूल गमिष्येऽहं यथागतम् ।। १६ ।। मोक्षितो नरकादस्माद् भवता मुनिसत्तम । भद्रं तवास्तु वन्दे त्वां प्रियं मे भवता कृतम् ।। १७ ।। उस राक्षसने पूर्णमनोरथ हो हाथ जोड़कर परशु-रामजीसे कहा—'भृगुश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। मैं जैसे आया था, वैसे लौट जाऊँगा। मुनिप्रवर! आपने इस नरकसे मुझे छुटकारा दिला दिया। आपका भला हो। मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपने मेरा बड़ा प्रिय कार्य किया है' ।। १६-१७ ।।

तमुवाच महाबाहुर्जामदग्न्यः प्रतापवान् । कस्त्वं कस्माच्च नरकं प्रतिपन्नो ब्रवीहि तत् ।। १८ ।। तब महाबाहु प्रतापी जमदग्निनन्दन परशुरामने उससे पूछा—'तू कौन है? और किस कारणसे इस नरकमें पड़ा था? बतलाओ' ।। १८ ।।

सोऽब्रवीदहमासं प्राग् दंशो नाम महासुरः ।
पुरा देवयुगे तात भृगोस्तुल्यवया इव ॥ १९ ॥
उसने उत्तर दिया—'तात! प्राचीनकालके सत्ययुगकी बात है। मैं दंश नामसे प्रसिद्ध एक महान् असुर था। महर्षि भृगुके बराबर ही मेरी भी अवस्था रही ॥ १९ ॥
सोऽहं भृगोः सुदयितां भार्यामपहरं बलात् ।
महर्षेरभिशापेन कृमिभूतोऽपतं भुवि ॥ २० ॥
'एक दिन मैंने भृगुकी प्राणप्यारी पत्नीका बलपूर्वक अपहरण कर लिया। इससे महर्षिने शाप दे दिया और मैं कीड़ा होकर इस पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २० ॥
अब्रवीद्धि स मां क्रुद्धस्तव पूर्वपितामहः ।
मूत्रश्लेष्माशनः पाप निरयं प्रतिपत्स्यसे ॥ २१ ॥
'आपके पूर्व पितामह भृगुजीने शाप देते समय कुपित होकर मुझसे इस प्रकार कहा—'ओ पापी! तू मूत्र और लार आदि खानेवाला कीड़ा होकर नरकमें पड़ेगा' ॥ २१ ॥
शापस्यान्तो भवेद् ब्रह्मन्नित्येवं तमथाब्रुवम् ।
भविता भार्गवाद् रामादिति मामब्रवीद् भृगुः ॥ २२ ॥
'तब मैंने उनसे कहा—'ब्रह्मन्! इस शापका अन्त भी होना चाहिये।' यह सुनकर भृगुजी बोले—'भृगुवंशी परशुरामसे इस शापका अन्त होगा' ॥ २२ ॥
सोऽहमेनां गतिं प्राप्तो यथा न कुशलं तथा ।
त्वया साधो समागम्य विमुक्तः पापयोनितः ॥ २३ ॥
'वही मैं इस गतिको प्राप्त हुआ था, जहाँ कभी कुशल नहीं बीता। साधो! आपका समागम होनेसे मेरा इस पापयोनिसे उद्धार हो गया' ॥ २३ ॥
एवमुक्त्वा नमस्कृत्य ययौ रामं महासुरः ।
रामः कर्णं च सक्रोधमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २४ ॥
परशुरामजीसे ऐसा कहकर वह महान् असुर उन्हें प्रणाम करके चला गया। इसके बाद परशुरामजीने कर्णसे क्रोधपूर्वक कहा— ॥ २४ ॥
अतिदुःखमिदं मूढ न जातु ब्राह्मणः सहेत् ।
क्षत्रियस्येव ते धैर्यं कामया सत्यमुच्यताम् ॥ २५ ॥
'ओ मूर्ख! ऐसा भारी दुःख ब्राह्मण कदापि नहीं सह सकता। तेरा धैर्य तो क्षत्रियके समान है। तू स्वेच्छासे ही सत्य बता, कौन है?' ॥ २५ ॥
तमुवाच ततः कर्णः शापाद् भीतः प्रसादयन् ।
ब्रह्मक्षत्रान्तरे जातं सूतं मां विद्धि भार्गव ॥ २६ ॥
राधेयः कर्ण इति मां प्रवदन्ति जना भुवि ।
प्रसादं कुरु मे ब्रह्मन्नस्त्रलुब्धस्य भार्गव ॥ २७ ॥

कर्ण परशुरामजीके शापके भयसे डर गया। अतः उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा—'भार्गव! आप यह जान लें कि मैं ब्राह्मण और क्षत्रियसे भिन्न सूतजातिमें पैदा हुआ हूँ। भूमण्डलके मनुष्य मुझे राधापुत्र कर्ण कहते हैं। ब्रह्मन्! भृगुनन्दन! मैंने अस्त्रके लोभसे ऐसा किया है! आप मुझपर कृपा करें ।। २६-२७ ।।
पिता गुरुर्न संदेहो वेदविद्याप्रदः प्रभुः ।
अतो भार्गव इत्युक्तं मया गोत्रं तवान्तिके ।। २८ ।।
'इसमें संदेह नहीं कि वेद और विद्याका दान करनेवाला शक्तिशाली गुरु पिताके ही तुल्य है; इसलिये मैंने आपके निकट अपना गोत्र भार्गव बताया है' ।। २८ ।।
तमुवाच भृगुश्रेष्ठः सरोषः प्रदहन्निव ।
भूमौ निपतितं दीनं वेपमानं कृताञ्जलिम् ।। २९ ।।
यह सुनकर भृगुश्रेष्ठ परशुरामजी इतने रोषमें भर गये, मानो वे उसे दग्ध कर डालेंगे। उधर कर्ण हाथ जोड़ दीन भावसे काँपता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब वे उससे बोले— ।। २९ ।।
यस्मान्मिथ्योपचरितो ह्यस्त्रलोभादिह त्वया ।
तस्मादेतद्धि ते मूढ ब्रह्मास्त्रं प्रतिभास्यति ।। ३० ।।
अन्यत्र वधकालात् ते सदृशेन समीयुषः ।
'मूढ़! तूने ब्रह्मास्त्रके लोभसे झूठ बोलकर यहाँ मेरे साथ मिथ्याचार (कपटपूर्ण व्यवहार) किया है, इसलिये जबतक तू संग्राममें अपने समान योद्धाके साथ नहीं भिड़ेगा और तेरी मृत्युका समय निकट नहीं आ जायगा, तभीतक तुझे इस ब्रह्मास्त्रका स्मरण बना रहेगा ।। ३० १/२ ।।
अब्राह्मणे न हि ब्रह्म ध्रुवं तिष्ठेत् कदाचन ।। ३१ ।।
गच्छेदानीं न ते स्थानमनृतस्येह विद्यते ।
न त्वया सदृशो युद्धे भविता क्षत्रियो भुवि ।। ३२ ।।
'जो ब्राह्मण नहीं है, उसके हृदयमें ब्रह्मास्त्र कभी स्थिर नहीं रह सकता। अब तू यहाँसे चला जा। तुझ मिथ्यावादीके लिये यहाँ स्थान नहीं है, परंतु मेरे आशीर्वादसे इस भूतलका कोई भी क्षत्रिय युद्धमें तेरी समानता नहीं करेगा' ।। ३१-३२ ।।
एवमुक्तः स रामेण न्यायेनोपजगाम ह ।
दुर्योधनमुपागम्य कृतास्त्रोऽस्मीति चाब्रवीत् ।। ३३ ।।
परशुरामजीके ऐसा कहनेपर कर्ण उन्हें न्यायपूर्वक प्रणाम करके वहाँसे लौट आया और दुर्योधनके पास पहुँचकर बोला—'मैंने सब अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लिया' ।। ३३ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कर्णास्त्रप्राप्तिर्नाम
तृतीयोऽध्यायः ।। ३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कर्णको अस्त्रकी प्राप्तिनामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ।। ३ ।।

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्थोऽध्यायः

कर्णकी सहायतासे समागत राजाओंको पराजित करके दुर्योधनद्वारा स्वयंवरसे कलिंगराजकी कन्याका अपहरण

नारद उवाच

कर्णस्तु समवाप्यैवमस्त्रं भार्गवनन्दनात् ।
दुर्योधनेन सहितो मुमुदे भरतर्षभ ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भार्गवनन्दन परशुरामसे ब्रह्मास्त्र पाकर कर्ण दुर्योधनके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥ १ ॥

ततः कदाचिद् राजानः समाजग्मुः स्वयंवरे ।
कलिङ्गविषये राजन् राज्ञश्चित्राङ्गदस्य च ॥ २ ॥
राजन्! तदनन्तर किसी समय कलिंगदेशके राजा चित्रांगदके यहाँ स्वयंवरमहोत्सवमें देश-देशके राजा एकत्र हुए ॥ २ ॥

श्रीमद्राजपुरं नाम नगरं तत्र भारत ।
राजानः शतशस्तत्र कन्यार्थे समुपागमन् ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! कलिंगराजकी राजधानी राजपुर नामक नगरमें थी, वह नगर बड़ा सुन्दर था। राजकुमारीको प्राप्त करनेके लिये सैकड़ों नरेश वहाँ पधारे ॥ ३ ॥

श्रुत्वा दुर्योधनस्तत्र समेतान् सर्वपार्थिवान् ।
रथेन काञ्चनाङ्गेन कर्णेन सहितो ययौ ॥ ४ ॥
दुर्योधनने जब सुना कि वहाँ सभी राजा एकत्र हो रहे हैं तो वह स्वयं भी सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो कर्णके साथ गया ॥ ४ ॥

ततः स्वयंवरे तस्मिन् सम्प्रवृत्ते महोत्सवे ।
समाजग्मुर्नृपतयः कन्यार्थे नृपसत्तम ॥ ५ ॥
नृपश्रेष्ठ! वह स्वयंवरमहोत्सव आरम्भ होनेपर राजकन्याको पानेके लिये जो बहुत-से नरेश वहाँ पधारे थे, उनके नाम इस प्रकार हैं ॥ ५ ॥

शिशुपालो जरासंधो भीष्मको वक्र एव च ।
कपोतरोमा नीलश्च रुक्मी च दृढविक्रमः ॥ ६ ॥
शृगालश्च महाराजः स्त्रीराज्याधिपतिश्च यः ।
अशोकः शतधन्वा च भोजो वीरश्च नामतः ॥ ७ ॥
शिशुपाल, जरासंध, भीष्मक, वक्र, कपोतरोमा, नील, सुदृढ़ पराक्रमी रुक्मी, स्त्रीराज्यके स्वामी महाराज शृगाल, अशोक, शतधन्वा, भोज और वीर ॥ ६-७ ॥

एते चान्ये च बहवो दक्षिणां दिशमाश्रिताः । म्लेच्छाश्चार्याश्च राजानः प्राच्योदीच्यास्तथैव च ॥ ८ ॥ ये तथा और भी बहुत-से नरेश दक्षिण दिशाकी उस राजधानीमें गये। उनमें म्लेच्छ, आर्य, पूर्व और उत्तर सभी देशोंके राजा थे ॥ ८ ॥

काञ्चनाङ्गदिनः सर्वे शुद्धजाम्बूनदप्रभाः । सर्वे भास्वरदेहाश्च व्याघ्रा इव बलोत्कटाः ॥ ९ ॥ उन सबने सोनेके बाजूबंद पहन रखे थे। सभीकी अंगकान्ति शुद्ध सुवर्णके समान दमक रही थी। सबके शरीर तेजस्वी थे और सभी व्याघ्रके समान उत्कट बलशाली थे ॥ ९ ॥

ततः समुपविष्टेषु तेषु राजसु भारत । विवेश रङ्गं सा कन्या धात्रीवर्षवरान्विता ॥ १० ॥ भारत! जब सब राजा स्वयंवर-सभामें बैठ गये, तब उस राजकन्याने धाय और खोजोंके साथ रंगभूमिमें प्रवेश किया ॥ १० ॥

ततः संश्राव्यमाणेषु राज्ञां नामसु भारत । अत्यक्रामद् धार्तराष्ट्रं सा कन्या वरवर्णिनी ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! तत्पश्चात् जब उसे राजाओंके नाम सुना-सुनाकर उनका परिचय दिया जाने लगा, उस समय वह सुन्दरी राजकुमारी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके सामनेसे होकर आगे बढ़ने लगी ॥ ११ ॥

दुर्योधनस्तु कौरव्यो नामर्षयत लङ्घनम् । प्रत्यषेधच्च तां कन्यामसत्कृत्य नराधिपान् ॥ १२ ॥ कुरुवंशी दुर्योधनको यह सहन नहीं हुआ कि राजकन्या उसे लाँघकर अन्यत्र जाय। उसने समस्त नरेशोंका अपमान करके उसे वहीं रोक लिया ॥ १२ ॥

स वीर्यमदमत्तत्वाद भीष्मद्रोणावुपाश्रितः । रथमारोप्य तां कन्यामाजहार नराधिपः ॥ १३ ॥ राजा दुर्योधनको भीष्म और द्रोणाचार्यका सहारा प्राप्त था; इसलिये वह बलके मदसे उन्मत्त हो रहा था। उसने उस राजकन्याको रथपर बिठाकर उसका अपहरण कर लिया ॥ १३ ॥

तमन्वगाद् रथी खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् । कर्णः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः पृष्ठतः पुरुषर्षभ ॥ १४ ॥ पुरुषोत्तम! उस समय शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण रथपर आरूढ़ हो हाथमें दस्ताने बाँधे और तलवार लिये दुर्योधनके पीछे-पीछे चला ॥ १४ ॥

ततो विमर्दः सुमहान् राज्ञामासीद् युयुत्सताम् । संनह्यतां तनुत्राणि रथान् योजयतामपि ॥ १५ ॥

तदनन्तर युद्धकी इच्छावाले राजाओंमेंसे कुछ लोग कवच बाँधने और कुछ रथ जोतने लगे। उन सब लोगोंमें बड़ा भारी संग्राम छिड़ गया ॥ १५ ॥

तेऽभ्यधावन्त संक्रुद्धाः कर्णदुर्योधनावुभौ ।
शरवर्षाणि मुञ्चन्तो मेघाः पर्वतयोरिव ॥ १६ ॥

जैसे मेघ दो पर्वतोंपर जलकी धारा बरसा रहे हों, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए वे नरेश कर्ण और दुर्योधन दोनोंपर टूट पड़े तथा उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ १६ ॥

कर्णस्तेषामापततामेकैकेन शरेण ह ।
धनूंषि च शरव्रातान् पातयामास भूतले ॥ १७ ॥

कर्णने एक-एक बाणसे उन सभी आक्रमणकारी नरेशोंके धनुष और बाण-समूहोंको भूतलपर काट गिराया ॥

ततो विधनुषः कांश्चित् कांश्चिदुद्यतकार्मुकान् ।
कांश्चिच्चोद्धहतो बाणान् रथशक्तिगदास्तथा ॥ १८ ॥
लाघवाद् व्याकुलीकृत्य कर्णः प्रहरतां वरः ।
हतसूतांश्च भूयिष्ठानवजिग्ये नराधिपान् ॥ १९ ॥

तदनन्तर प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ कर्णने जल्दी-जल्दी बाण मारकर उन सब राजाओंको व्याकुल कर दिया, कोई धनुषसे रहित हो गये, कोई अपने धनुषको ऊपर ही उठाये रह गये, कोई बाण, कोई रथशक्ति और कोई गदा लिये रह गये। जो जिस अवस्थामें थे, उसी अवस्थामें उन्हें व्याकुल करके कर्णने उनके सारथियोंको मार डाला और उन बहुसंख्यक नरेशोंको परास्त कर दिया ॥

ते स्वयं वाहयन्तोऽश्वान् पाहि पाहीति वादिनः ।
व्यपेयुस्ते रणं हित्वा राजानो भग्नमानसाः ॥ २० ॥

वे पराजित भूपाल भग्नमनोरथ हो स्वयं ही घोड़े हाँकते और 'बचाओ बचाओ,' की रट लगाते हुए युद्ध छोड़कर भाग गये ॥ २० ॥

दुर्योधनस्तु कर्णेन पाल्यमानोऽभ्ययात् तदा ।
हृष्टः कन्यामुपादाय नगरं नागसाह्वयम् ॥ २१ ॥

दुर्योधन कर्णसे सुरक्षित हो राजकन्याको साथ लिये राजी-खुशी हस्तिनापुर वापस आ गया ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दुर्योधनस्य स्वयंवरे कन्याहरणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दुर्योधनके द्वारा स्वयंवरमें राजकन्याका अपहरण नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चमोऽध्यायः

कर्णके बल और पराक्रमका वर्णन, उसके द्वारा जरासंधकी पराजय और जरासंधका कर्णको अंगदेशमें मालिनी नगरीका राज्य प्रदान करना

नारद उवाच

आविष्कृतबलं कर्णं श्रुत्वा राजा स मागधः ।
आह्वयद् द्वैरथेनाजौ जरासंधो महीपतिः ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं—राजन्! कर्णके बलकी ख्याति सुनकर मगधदेशके राजा जरासंधने द्वैरथ युद्धके लिये उसे ललकारा ॥ १ ॥

तयोः समभवद् युद्धं दिव्यास्त्रविदुषोर्द्वयोः ।
युधि नानाप्रहरणैरन्योन्यमभिवर्षतोः ॥ २ ॥
वे दोनों ही दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता थे। उन दोनोंमें युद्ध आरम्भ हो गया। वे रणभूमिमें एक दूसरेपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥

क्षीणबाणौ विधनुषौ भग्नखड्गौ महीं गतौ ।
बाहुभिः समसज्जेतामुभावपि बलान्वितौ ॥ ३ ॥
दोनोंके ही बाण क्षीण हो गये, धनुष कट गये और तलवारोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये। तब वे दोनों बलशाली वीर पृथ्वीपर खड़े हो भुजाओंद्वारा मल्लयुद्ध करने लगे ॥ ३ ॥

बाहुकण्टकयुद्धेन तस्य कर्णोऽथ युध्यतः ।
बिभेद संधिं देहस्य जरया श्लेषितस्य हि ॥ ४ ॥
कर्णने बाहुकण्टक युद्धके द्वारा जरा नामक राक्षसीके जोड़े हुए युद्धपरायण जरासंधके शरीरकी संधिको चीरना आरम्भ किया* ॥ ४ ॥

स विकारं शरीरस्य दृष्ट्वा नृपतिरात्मनः ।
प्रीतोऽस्मीत्यब्रवीत् कर्णं वैरमुत्सृज्य दूरतः ॥ ५ ॥
राजा जरासंधने अपने शरीरके उस विकारको देखकर वैरभावको दूर हटा दिया और कर्णसे कहा—'मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ' ॥ ५ ॥

प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनीं नगरीमथ ।
अङ्गेषु नरशार्दूल स राजाऽऽसीत् सपत्नजित् ॥ ६ ॥
पालयामास चम्पां च कर्णः परबलार्दनः ।
दुर्योधनस्यानुमते तवापि विदितं तथा ॥ ७ ॥

साथ ही उसने प्रसन्नतापूर्वक कर्णको अंगदेशकी मालिनी नगरी दे दी। नरश्रेष्ठ! शत्रुविजयी कर्ण तभीसे अंगदेशका राजा हो गया था। इसके बाद दुर्योधनकी अनुमतिसे शत्रु-सैन्यसंहारी कर्ण चम्पा नगरी—चम्पारनका भी पालन करने लगा। यह सब तो तुम्हें भी ज्ञात ही है॥

एवं शस्त्रप्रतापेन प्रथितः सोऽभवत् क्षितौ । त्वद्धितार्थं सुरेन्द्रेण भिक्षितो वर्मकुण्डले ॥ ८ ॥

इस प्रकार कर्ण अपने शस्त्रोंके प्रतापसे समस्त भूमण्डलमें विख्यात हो गया। एक दिन देवराज इन्द्रने तुमलोगोंके हितके लिये कर्णसे उसके कवच और कुण्डल माँगे ॥ ८ ॥

स दिव्ये सहजे प्रादात् कुण्डले परमार्जिते । सहजं कवचं चापि मोहितो देवमायया ॥ ९ ॥

देवमायासे मोहित हुए कर्णने अपने शरीरके साथ ही उत्पन्न हुए दोनों दिव्य कुण्डलों और कवचको भी इन्द्रके हाथमें दे दिया ॥ ९ ॥

विमुक्तः कुण्डलाभ्यां च सहजेन च वर्मणा । निहतो विजयेनाजौ वासुदेवस्य पश्यतः ॥ १० ॥

इस प्रकार जन्मके साथ ही उत्पन्न हुए कवच और कुण्डलोंसे हीन हो जानेपर कर्णको अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णके देखते-देखते मारा था ॥ १० ॥

ब्राह्मणस्याभिशापेन रामस्य च महात्मनः । कुन्त्याश्च वरदानेन मायया च शतक्रतोः ॥ ११ ॥ भीष्मावमानात् संख्यायां रथस्यार्धानुकीर्तनात् । शल्यात् तेजोवधाच्चापि वासुदेवनयेन च ॥ १२ ॥

एक तो उसे अग्निहोत्री ब्राह्मण तथा महात्मा परशुरामजीके शाप मिले थे। दूसरे, उसने स्वयं भी कुन्तीको अन्य चार भाइयोंकी रक्षाके लिये वरदान दिया था। तीसरे, इन्द्रने माया करके उसके कवच-कुण्डल ले लिये। चौथे, महारथियोंकी गणना करते समय भीष्मजीने अपमानपूर्वक उसे बार-बार अर्धरथी कहा था। पाँचवें, शल्यकी ओरसे उसके तेजको नष्ट करनेका प्रयास किया गया था और छठे, भगवान् श्रीकृष्णकी नीति भी कर्णके प्रतिकूल काम कर रही थी—इन सब कारणोंसे वह पराजित हुआ ॥ ११-१२ ॥

रुद्रस्य देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च । कुबेरद्रोणयोश्चैव कृपस्य च महात्मनः ॥ १३ ॥ अस्त्राणि दिव्यान्यादाय युधि गाण्डीवधन्वना । हतो वैकर्तनः कर्णो दिवाकरसमद्युतिः ॥ १४ ॥

इधर, गाण्डीवधारी अर्जुनने रुद्र, देवराज इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, द्रोणाचार्य तथा महात्मा कृपके दिये हुए दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये थे; इसीलिये युद्धमें उन्होंने सूर्यके समान तेजस्वी वैकर्तन कर्णका वध किया ।। १३-१४ ।।

एवं शप्तस्तव भ्राता बहुभिश्चापि वञ्चितः ।
न शोच्यः पुरुषव्याघ्र युद्धेन निधनं गतः ।। १५ ।।
पुरुषसिंह युधिष्ठिर! इस प्रकार तुम्हारे भाई कर्णको शाप तो मिला ही था, बहुत लोगोंने उसे ठग भी लिया था, तथापि वह युद्धमें मारा गया है, इसलिये शोक करनेके योग्य नहीं है ।। १५ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कर्णवीर्यकथनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ।। ५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कर्णके पराक्रमका कथन नामक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।


* जहाँ बलवान् योद्धा अपने प्रतिद्वन्द्वीको दुर्बल पा उसकी एक पिण्डलीको पैरसे दबाकर दूसरीको ऊपर उठा सारे शरीरको बीचसे चीर डालता है, वह बाहुकण्टक नामक युद्ध कहा गया है। जैसा कि निम्नांकित वचनसे सूचित होता है—
‘एकां जंघां पदाऽऽक्रम्य परामुद्यम्य पाट्यते । केतकीपत्रवच्छत्रोर्युद्धं तद् बाहुकण्टकम् ।।'
इति

⬅ विषय-सूची (TOC)

षष्ठोऽध्यायः

युधिष्ठिरकी चिन्ता, कुन्तीका उन्हें समझाना और स्त्रियोंको युधिष्ठिरका शाप

वैशम्पायन उवाच

एतावदुक्त्वा देवर्षिर्विरराम स नारदः ।
युधिष्ठिरस्तु राजर्षिर्दध्यौ शोकपरिप्लुतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! इतना कहकर देवर्षि नारद तो चुप हो गये, किंतु राजर्षि युधिष्ठिर शोकमग्न हो चिन्ता करने लगे ॥ १ ॥

तं दीनममनसं वीरं शोकोपहतमातुरम् ।
निःश्वसन्तं यथा नागं पर्यश्रुनयनं तथा ॥ २ ॥
कुन्ती शोकपरीताङ्गी दुःखोपहतचेतना ।
अब्रवीन्मधुराभाषा काले वचनमर्थवत् ॥ ३ ॥
उनका मन बहुत दुखी हो गया। वे शोकके मारे व्याकुल हो सर्पकी भाँति लंबी साँस खींचने लगे। उनकी आँखोंसे आँसू बहने लगा। वीर युधिष्ठिरकी ऐसी अवस्था देख कुन्तीके सारे अंगोंमें शोक व्याप्त हो गया। वे दुःखसे अचेत-सी हो गयीं और मधुर वाणीमें समयके अनुसार अर्थभरी बात कहने लगीं— ॥ २-३ ॥

युधिष्ठिर महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ।
जहि शोकं महाप्राज्ञ शृणु चेदं वचो मम ॥ ४ ॥
‘महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें कर्णके लिये शोक नहीं करना चाहिये। महामते! शोक छोड़ो और मेरी यह बात सुनो ॥ ४ ॥

यातितः स मया पूर्वं भ्रात्र्यं ज्ञापयितुं तव ।
भास्करेण च देवेन पित्रा धर्मभृतां वर ॥ ५ ॥
‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मैंने पहले कर्णको यह बतानेका प्रयत्न किया था कि पाण्डव तुम्हारे भाई हैं। उसके पिता भगवान् भास्करने भी ऐसी ही चेष्टा की ॥ ५ ॥

यद्वाच्यं हितकामेन सुहृदा हितमिच्छता ।
तथा दिवाकरेणोक्तः स्वप्नान्ते मम चाग्रतः ॥ ६ ॥
‘हितकी इच्छा रखनेवाले एक हितैषी सुहृद्को जो कुछ कहना चाहिये, वही भगवान् सूर्यने उससे स्वप्नमें और मेरे सामने भी कहा ॥ ६ ॥

न चैनमशकद् भानुरहं वा स्नेहकारणैः ।
पुरा प्रत्यनुनेतुं वा नेतुं वाप्येकतां त्वया ॥ ७ ॥

'परंतु भगवान् सूर्य एवं मैं दोनों ही स्नेहके कारण दिखाकर अपने पक्षमें करने या तुमलोगोंसे एकता (मेल) करानेमें सफल न हो सके ॥ ७ ॥
ततः कालपरीत: स वैरस्योद्धरणे रतः ।
प्रतीपकारी युष्माकमिति चोपेक्षितो मया ॥ ८ ॥
'तदनन्तर वह कालके वशीभूत हो वैरका बदला लेनेमें लग गया और तुमलोगोंके विपरीत ही सारे कार्य करने लगा; यह देखकर मैंने उसकी उपेक्षा कर दी' ॥ ८ ॥
इत्युक्तो धर्मराजस्तु मात्रा बाष्पाकुलेक्षणः ।
उवाच वाक्यं धर्मात्मा शोकव्याकुलितेन्द्रियः ॥ ९ ॥
भवत्या गूढमन्त्रत्वात् पीडितोऽस्मीत्युवाच ताम् ॥ १० ॥
माताके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरके नेत्रोंमें आँसू भर आया, शोकसे उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं और वे धर्मात्मा नरेश उनसे इस प्रकार बोले—'माँ! आपने इस गोपनीय बातको गुप्त रखकर मुझे बड़ा कष्ट दिया' ॥ ९-१० ॥
शशाप च महातेजाः सर्वलोकेषु योषितः ।
न गुह्यं धारयिष्यन्तीत्येवं दुःखसमन्वितः ॥ ११ ॥
फिर महातेजस्वी युधिष्ठिरने अत्यन्त दुखी होकर सारे संसारकी स्त्रियोंको यह शाप दे दिया कि 'आजसे स्त्रियाँ अपने मनमें कोई गोपनीय बात नहीं छिपा सकेंगी' ॥ ११ ॥
स राजा पुत्रपौत्राणां सम्बन्धिसुहृदां तदा ।
स्मरन्नुद्विग्नहृदयो बभूवोद्विग्नचेतनः ॥ १२ ॥
राजा युधिष्ठिरका हृदय अपने पुत्रों, पौत्रों, सम्बन्धियों तथा सुहृदोंको याद करके उद्विग्न हो उठा। उनके मनमें व्याकुलता छा गयी ॥ १२ ॥
ततः शोकपरीतात्मा सधूम इव पावकः ।
निर्वेदमगमद् धीमान् राजा संतापपीडितः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् शोकसे व्याकुलचित्त हुए बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिर संतापसे पीड़ित हो धूमयुक्त अग्निके समान धीरे-धीरे जलने लगे तथा राज्य और जीवनसे विरक्त हो उठे ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि स्त्रीशापे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें स्त्रियोंको युधिष्ठिरका शापविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका अर्जुनसे आन्तरिक खेद प्रकट करते हुए अपने लिये राज्य छोड़कर वनमें चले जानेका प्रस्ताव करना

वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा शोकव्याकुलचेतनः ।
शुशोच दुःखसंतप्तः स्मृत्वा कर्णं महारथम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरका चित्त शोकसे व्याकुल हो उठा था। वे महारथी कर्णको याद करके दुःखसे संतप्त हो शोकमें डूब गये ॥ १ ॥

आविष्टो दुःखशोकाभ्यां निःश्वसंश्च पुनः पुनः ।
दृष्ट्वार्जुनमुवाचेदं वचनं शोककर्शितः ॥ २ ॥
दुःख और शोकसे आविष्ट हो वे बारंबार लंबी साँस खींचने लगे और अर्जुनको देखकर शोकसे पीड़ित हो इस प्रकार बोले ॥ २ ॥

युधिष्ठिर उवाच

यद्भैक्ष्यमाचरिष्याम वृष्ण्यन्धकपुरे वयम् ।
ज्ञातीन् निष्पुरुषान् कृत्वा नेमां प्राप्स्याम दुर्गतिम् ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**अर्जुन! यदि हमलोग वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी क्षत्रियोंकी नगरी द्वारकामें जाकर भीख माँगते हुए अपना जीवन-निर्वाह कर लेते तो आज अपने कुटुम्बको निर्वंश करके हम इस दुर्दशाको प्राप्त नहीं होते ॥

अमित्रा नः समृद्धार्था वृत्तार्थाः कुरवः किल ।
आत्मानमात्मना हत्वा किं धर्मफलमाप्नुमः ॥ ४ ॥
हमारे शत्रुओंका मनोरथ पूर्ण हुआ (क्योंकि वे हमारे कुलका विनाश देखकर प्रसन्न होंगे)। कौरवोंका प्रयोजन तो उनके जीवनके साथ ही समाप्त हो गया। आत्मीय जनोंको मारकर स्वयं ही अपनी हत्या करके हम कौन-सा धर्मका फल प्राप्त करेंगे? ॥ ४ ॥

धिगस्तु क्षात्रमाचारं धिगस्तु बलपौरुषम् ।
धिगस्त्वमर्षं येनेमामापदं गमिता वयम् ॥ ५ ॥
क्षत्रियोंके आचार, बल, पुरुषार्थ और अमर्षको धिक्कार है! जिनके कारण हम ऐसी विपत्तिमें पड़ गये ॥ ५ ॥

साधु क्षमा दमः शौचं वैराग्यं चाप्यमत्सरः ।
अहिंसा सत्यवचनं नित्यानि वनचारिणाम् ॥ ६ ॥

क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम, बाहर-भीतरकी शुद्धि, वैराग्य, ईर्ष्याका अभाव, अहिंसा और सत्यभाषण—ये वनवासियोंके नित्य धर्म ही श्रेष्ठ हैं ।। ६ ।।
वयं तु लोभान्मोहाच्च दम्भं मानं च संश्रिताः ।
इमामवस्थां सम्प्राप्ता राज्यलाभबुभुत्सया ।। ७ ।।
हमलोग तो लोभ और मोहके कारण राज्यलाभके सुखका अनुभव करनेकी इच्छासे दम्भ और अभिमानका आश्रय लेकर इस दुर्दशामें फँस गये हैं ।। ७ ।।
त्रैलोक्यस्यापि राज्येन नास्मान् कश्चित् प्रहर्षयेत् ।
बान्धवान् निहतान् दृष्ट्वा पृथिव्यां विजयैषिणः ।। ८ ।।
जब हमने पृथ्वीपर विजयकी इच्छा रखनेवाले अपने बन्धु-बान्धवोंको मारा गया देख लिया, तब हमें इस समय तीनों लोकोंका राज्य देकर भी कोई प्रसन्न नहीं कर सकता ।। ८ ।।
ते वयं पृथिवीहेतोरवध्यान् पृथिवीश्वरान् ।
सम्परित्यज्य जीवामो हीनार्था हतबान्धवाः ।। ९ ।।
हाय! हमलोगोंने इस तुच्छ पृथ्वीके लिये अवध्य राजाओंकी भी हत्या की और अब उन्हें छोड़कर बन्धु-बान्धवोंसे हीन हो अर्थ-भ्रष्टकी भाँति जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।। ९ ।।
आमिषे गृध्यमानानामशुभं वै शुनामिव ।
आमिषं चैव नो हीष्टमामिषस्य विसर्जनम् ।। १० ।।
जैसे मांसके लोभी कुत्तोंको अशुभकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार राज्यमें आसक्त हुए हमलोगोंको भी अनिष्ट प्राप्त हुआ है। अतः हमारे लिये मांस-तुल्य राज्यको पाना अभीष्ट नहीं है, उसका परित्याग ही अभीष्ट होना चाहिये ।। १० ।।
न पृथिव्या सकलया न सुवर्णस्य राशिभिः ।
न गवाश्वेन सर्वेण ते त्याज्या य इमे हताः ।। ११ ।।
ये जो हमारे सगे-सम्बन्धी मारे गये हैं, इनका परित्याग तो हमें समस्त पृथ्वी, राशि-राशि सुवर्ण और समूचे गाय-घोड़े पाकर भी नहीं करना चाहिये था ।। ११ ।।
काममन्युपरीतास्ते क्रोधहर्षसमन्विताः ।
मृत्युयानं समारुह्य गता वैवस्वतक्षयम् ।। १२ ।।
वे काम और क्रोधके वशीभूत थे, हर्ष और रोषसे भरे हुए थे, अतः मृत्युरूपी रथपर सवार हो यमलोकमें चले गये ।। १२ ।।
बहुकल्याणसंयुक्तानिच्छन्ति पितरः सुतान् ।
तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च तितिक्षया ।। १३ ।।
सभी पिता तपस्या, ब्रह्मचर्य-पालन, सत्यभाषण तथा तितिक्षा आदि साधनोंद्वारा अनेक कल्याणमय गुणोंसे युक्त बहुत-से पुत्र पाना चाहते हैं ।। १३ ।।
उपवासैस्तथेज्याभिर्व्रतकौतुकमङ्गलैः ।

लभन्ते मातरो गर्भान् मासान् दश च बिभ्रति ॥ १४ ॥
यदि स्वस्ति प्रजायन्ते जाता जीवन्ति वा यदि ।
सम्भाविता जातबलास्ते दद्युर्यदि नः सुखम् ॥ १५ ॥
इह चामुत्र चैवेति कृपणाः फलहेतवः ।
इसी प्रकार सभी माताएँ उपवास, यज्ञ, व्रत, कौतुक और मंगलमय कृत्योंद्वारा उत्तम पुत्रकी इच्छा रखकर दस महीनोंतक अपने गर्भोका भरण-पोषण करती हैं। उन सबका यही उद्देश्य होता है कि यदि कुशलपूर्वक बच्चे पैदा होंगे, पैदा होनेपर यदि जीवित रहेंगे तथा बलवान् होकर यदि अच्छे गुणोंसे सम्पन्न होंगे तो हमें इहलोक और परलोकमें सुख देंगे। इस प्रकार वे दीन माताएँ फलकी आकांक्षा रखती हैं ॥ १४-१५ १/२ ॥

तासामयं समुद्योगो निर्वृत्तः केवलोऽफलः ॥ १६ ॥
यदासां निहताः पुत्रा युवानो मृष्टकुण्डलाः ।
अभुक्त्वा पार्थिवान् भोगानृणान्यनपहाय च ॥ १७ ॥
पितृभ्यो देवताभ्यश्च गता वैवस्वतक्षयम् ॥ १८ ॥
परंतु उनका यह उद्योग सर्वथा निष्फल हो गया; क्योंकि हमलोगोंने उन सब माताओंके नवयुवक पुत्रोंको, जो विशुद्ध सुवर्णमय कुण्डलोंसे अलंकृत थे, मार डाला है। वे इस भूलोकके भोगोंके उपभोगका अवसर न पाकर देवताओं और पितरोंका ऋण उतारे बिना ही यमलोकमें चले गये ॥ १६—१८ ॥

यदैशामम्ब पितरौ जातकामावुभावपि ।
संजातधनरत्नेषु तदैव निहता नृपाः ॥ १९ ॥
माँ! इन राजाओंके माता-पिता जब इनके द्वारा उपार्जित धन और रत्न आदिके उपभोगकी आशा करने लगे, तभी ये मारे गये ॥ १९ ॥

संयुक्ताः काममन्युभ्यां क्रोधहर्षाममञ्जसाः ।
न ते जयफलं किंचिद् भोक्तारो जातु कर्हिचित् ॥ २० ॥
जो लोग कामना और खीझसे युक्त हो क्रोध और हर्षके कारण अपना संतुलन खो बैठते हैं, वे कभी कहीं किंचिन्मात्र भी विजयका फल नहीं भोग सकते ॥ २० ॥

पञ्चालानां कुरूणां च हता एव हि ये हताः ।
न चेत् सर्वानयं लोकः पश्येत् स्वेनैव कर्मणा ॥ २१ ॥
पांचालों और कौरवोंके जो वीर मारे गये, वे तो मर ही गये; नहीं तो आज यह संसार देखता कि वे सब अपने ही पुरुषार्थसे कैसी ऊँची स्थितिमें पहुँच गये हैं ॥ २१ ॥

वयमेवास्य लोकस्य विनाशे कारणं स्मृताः ।
धृतराष्ट्रस्य पुत्रेषु तत् सर्वं प्रतिपत्स्यति ॥ २२ ॥
हमलोग ही इस जगत्के विनाशमें कारण माने गये हैं; परंतु इसका सारा उत्तरदायित्व धृतराष्ट्रके पुत्रोंपर ही पड़ेगा ॥ २२ ॥

सदैव निकृतिप्रज्ञो द्वेष्टा मायोपजीवनः । मिथ्याविनीतः सततमस्मास्वनपकारिषु ॥ २३ ॥ हमलोगोंने कभी कोई बुराई नहीं की थी तो भी राजा धृतराष्ट्र सदा हमसे द्वेष रखते थे। उनकी बुद्धि निरन्तर हमें ठगनेकी ही बात सोचा करती थी। वे मायाका आश्रय लेनेवाले थे और झूठे ही विनय अथवा नम्रता दिखाया करते थे ॥ २३ ॥

न सकामा वयं ते च न चास्माभिर्न तैर्जितम् । न तैर्भुक्तेयमवनिर्न नार्यो गीतवादितम् ॥ २४ ॥ इस युद्धसे न तो हमारी कामना सफल हुई और न वे कौरव ही सफलमनोरथ हुए। न हमारी जीत हुई, न उनकी। उन्होंने न तो इस पृथ्वीका उपभोग किया, न स्त्रियोंका सुख देखा और न गीतवाद्यका ही आनन्द लिया ॥ २४ ॥

नामात्यसुहृदां वाक्यं न च श्रुतवतां श्रुतम् । न रत्नानि परार्घ्यानि न भूर्न द्रविणागमः ॥ २५ ॥ मन्त्रियों, सुहृदों तथा वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता विद्वानोंकी भी बातें वे नहीं सुन सके। बहुमूल्य रत्न, पृथ्वीके राज्य तथा धनकी आयका भी सुख भोगनेका उन्हें अवसर नहीं मिला ॥ २५ ॥

अस्मद्वेषेण संतप्तः सुखं न स्मेह विन्दति । ऋद्धिमस्मासु तां दृष्ट्वा विवर्णो हरिणः कृशः ॥ २६ ॥ दुर्योधन हमसे द्वेष रखनेके कारण सदा संतप्त रहकर कभी यहाँ सुख नहीं पाता था। हमलोगोंके पास वैसी समृद्धि देखकर उसकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। वह चिन्तासे सूखकर पीला और दुर्बल हो गया था ॥

धृतराष्ट्रश्च नृपतिः सौबलेन निवेदितः । तं पिता पुत्रगृद्धित्वादनुमेनेऽनये स्थितः ॥ २७ ॥ अनपेक्ष्यैव पितरं गाङ्गेयं विदुरं तथा । सुबलपुत्र शकुनिने राजा धृतराष्ट्रको दुर्योधनकी यह अवस्था सूचित की। पुत्रके प्रति अधिक आसक्त होनेके कारण पिता धृतराष्ट्रने अन्यायमें स्थित हो उसकी इच्छाका अनुमोदन किया। इस विषयमें उन्होंने अपने पिता (ताऊ) गंगानन्दन भीष्म तथा भाई विदुरसे राय लेनेकी भी इच्छा नहीं की ॥ २७ १/२ ॥

असंशयं क्षयं राजा यथैवाहं तथा गतः ॥ २८ ॥ उनकी इसी दुर्नीतिके कारण निःसंदेह राजा धृतराष्ट्रको भी वैसा ही विनाश प्राप्त हुआ है, जैसा कि मुझे ॥ २८ ॥

अनियम्याशुचिं लुब्धं पुत्रं कामवशानुगम् । यशसः पतितो दीप्ताद् घातयित्वा सहोदरान् ॥ २९ ॥

वे अपने अपवित्र आचार-विचारवाले, लोभी एवं कामासक्त पुत्रको काबूमें न रखनेके कारण उसका तथा उसके सहोदर भाइयोंका वध करवाकर स्वयं भी उज्ज्वल यशसे भ्रष्ट हो गये ॥ २९ ॥ इमौ हि वृद्धौ शोकाग्नौ प्रक्षिप्य स सुयोधनः । अस्मत्प्रद्वेषसंयुक्तः पापबुद्धिः सदैव ह ॥ ३० ॥ हमलोगोंके प्रति सदा द्वेष रखनेवाला पापबुद्धि दुर्योधन इन दोनों वृद्धोंको शोककी आगमें झोंककर चला गया ॥ ३० ॥ को हि बन्धुः कुलीनः संस्तथा ब्रूयात् सुहृज्जने । यथासाववदद् वाक्यं युयुत्सुः कृष्णसंनिधौ ॥ ३१ ॥ संधिके लिये गये हुए श्रीकृष्णके समीप युद्धकी इच्छावाले दुर्योधनने जैसी बात कही थी, वैसी कौन भाई-बन्धु कुलीन होकर भी अपने सुहृदोंके लिये कह सकता है? ॥ ३१ ॥ आत्मनो हि वयं दोषाद् विनष्टाः शाश्वतीः समाः । प्रदहन्तो दिशः सर्वा भास्वरा इव तेजसा ॥ ३२ ॥ हमलोगोंने तेजसे प्रकाशित होनेवाली सम्पूर्ण दिशाओंमें मानो आग लगा दी और अपने ही दोषसे सदाके लिये नष्ट हो गये ॥ ३२ ॥ सोऽस्माकं वैरपुरुषो दुर्मतिः प्रग्रहं गतः । दुर्योधनकृते ह्येतत् कुलं नो विनिपातितम् ॥ ३३ ॥ हमारे प्रति शत्रुताका मूर्तिमान् स्वरूप वह दुर्बुद्धि दुर्योधन पूर्णतः बन्धनमें बँध गया। दुर्योधनके कारण ही हमारे इस कुलका पतन हो गया ॥ ३३ ॥ अवध्यानां वधं कृत्वा लोके प्राप्ताः स्म वाच्यताम् । कुलस्यास्यान्तकरणं दुर्मतिं पापपूरुषम् ॥ ३४ ॥ राजा राष्ट्रेश्वरं कृत्वा धृतराष्ट्रोऽद्य शोचति । हमलोग अवध्य नरेशोंका वध करके संसारमें निन्दाके पात्र हो गये। राजा धृतराष्ट्र इस कुलका विनाश करनेवाले दुर्बुद्धि एवं पापात्मा दुर्योधनको इस राष्ट्रका स्वामी बनाकर आज शोककी आगमें जल रहे हैं ॥ ३४ १/२ ॥ हताः शूराः कृतं पापं विषयः स्वो विनाशितः ॥ ३५ ॥ हत्वा नो विगतो मन्युः शोको मां रुन्धयत्ययम् । हमने शूरवीरोंको मारा, पाप किया और अपने ही देशका विनाश कर डाला। शत्रुओंको मारकर हमारा क्रोध तो दूर हो गया, परंतु यह शोक मुझे निरन्तर घेरे रहता है ॥ ३५ १/२ ॥ धनंजय कृतं पापं कल्याणेनोपहन्यते ॥ ३६ ॥ ख्यापनेनानुतापेन दानेन तपसापि वा । धनंजय! किया हुआ पाप कहनेसे, शुभ कर्म करनेसे, पछतानेसे, दान करनेसे और तपस्यासे भी नष्ट होता है ॥ ३६ १/२ ॥

निवृत्त्या तीर्थगमनाच्छ्रुतिस्मृतिजपेन वा ॥ ३७ ॥ त्यागवांश्च पुनः पापं नालंकर्तुमिति श्रुतिः । त्यागवाञ्जन्ममरणे नाप्नोतीति श्रुतिर्यदा ॥ ३८ ॥ निवृत्तिपरायण होने, तीर्थयात्रा करने तथा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय एवं जप करनेसे भी पाप दूर होता है। श्रुतिका कथन है कि त्यागी पुरुष पाप नहीं कर सकता तथा वह जन्म और मरणके बन्धनमें भी नहीं पड़ता ।।

प्राप्तवर्त्मा कृतमतिर्ब्रह्म सम्पद्यते तदा । स धनंजय निर्द्वन्द्वो मुनिर्ज्ञानसमन्वितः ॥ ३९ ॥ धनंजय! उसे मोक्षका मार्ग मिल जाता है और वह ज्ञानी एवं स्थिर-बुद्धि मुनि द्वन्द्वरहित होकर तत्काल ब्रह्म-साक्षात्कार कर लेता है ॥ ३९ ॥

वनमामन्त्र्य वः सर्वान् गमिष्यामि परंतप । न हि कृत्स्नतमो धर्मः शक्यः प्राप्तुमिति श्रुतिः ॥ ४० ॥ परिग्रहवता तन्मे प्रत्यक्षमरिसूदन । शत्रुओंको तपानेवाले अर्जुन! मैं तुम सब लोगोंसे बिदा लेकर वनमें चला जाऊँगा। शत्रुसूदन! श्रुति कहती है कि 'संग्रह-परिग्रहमें फँसा हुआ मनुष्य पूर्णतम धर्म (परमात्माका दर्शन) नहीं प्राप्त कर सकता।' इसका मुझे प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है ॥ ४० १/२ ॥

मया निसृष्टं पापं हि परिग्रहमभीप्सता ॥ ४१ ॥ जन्मक्षयनिमित्तं च प्राप्तुं शक्यमिति श्रुतिः । मैंने परिग्रह (राज्य और धनके संग्रह) की इच्छा रखकर केवल पाप बटोरा है, जो जन्म और मृत्युका मुख्य कारण है। श्रुतिका कथन है कि 'परिग्रहसे पाप ही प्राप्त हो सकता है' ॥ ४१ १/२ ॥

स परिग्रहमुत्सृज्य कृत्स्नं राज्यं सुखानि च ॥ ४२ ॥ गमिष्यामि विनिर्मुक्तो विशोको निर्ममः क्वचित् । अतः मैं परिग्रह छोड़कर सारे राज्य और इसके सुखोंको लात मारकर बन्धनमुक्त हो शोक और ममतासे ऊपर उठकर, कहीं वनमें चला जाऊँगा ॥ ४२ १/२ ॥

प्रशाधि त्वमिमामुर्वीं क्षेमां निहतकण्टकाम् ॥ ४३ ॥ न ममार्थोऽस्ति राज्येन भोगैर्वा कुरुनन्दन । कुरुनन्दन! तुम इस निष्कण्टक एवं कुशल-क्षेमसे युक्त पृथ्वीका शासन करो। मुझे राज्य और भोगोंसे कोई मतलब नहीं है ॥ ४३ १/२ ॥

एतावदुक्त्वा वचनं कुरुराजो युधिष्ठिरः । उपारमत् ततः पार्थः कनीयानभ्यभाषत ॥ ४४ ॥ इतना कहकर कुरुराज युधिष्ठिर चुप हो गये। तब कुन्तीके सबसे छोटे पुत्र अर्जुनने भाषण देना आरम्भ किया ॥ ४४ ॥