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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

संवत्सरानृतून् मासान् पक्षानथ लवान् क्षणान् ।। १४ ।। चन्द्रमा तथा तारोंसहित आकाश, नक्षत्र, ग्रह, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, लव और क्षणोंकी सृष्टि भी उन्होंने ही की ।। १४ ।।

ततः शरीरं लोकस्थं स्थापयित्वा पितामहः । जनयामास भगवान् पुत्रानुत्तमतेजसः ।। १५ ।। मरीचिमृषिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । वसिष्ठाङ्गिरसौ चोभौ रुद्रं च प्रभुमीश्वरम् ।। १६ ।। तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने लौकिक शरीर धारण करके मुनिवर मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अङ्गिरा तथा स्वभाव एवं ऐश्वर्यसे सम्पन्न रुद्र—इन तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया ।। १५-१६ ।।

प्राचेतसस्तथा दक्षः कन्याषष्टिमजीजनत् । ता वै ब्रह्मर्षयः सर्वाः प्रजार्थं प्रतिपेदिरे ।। १७ ।। प्रचेताओके पुत्र दक्षने साठ कन्याओंको जन्म दिया। उन सबको प्रजाकी उत्पत्तिके लिये ब्रह्मर्षियोंने पत्नीरूपमें प्राप्त किया ।। १७ ।।

ताभ्यो विश्वानि भूतानि देवाः पितृगणास्तथा । गन्धर्वाप्सरसश्चैव रक्षांसि विविधानि च ।। १८ ।। पतत्रिमृगमीनाश्च प्लवङ्गाश्च महोरगाः । तथा पक्षिगणाः सर्वे जलस्थलविचारिणः ।। १९ ।। उद्भिदः स्वेदजाश्चैव साण्डजाश्च जरायुजाः । जज्ञे तात जगत् सर्वं तथा स्थावरजङ्गमम् ।। २० ।। उन्हीं कन्याओंसे समस्त प्राणी, देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, नाना प्रकारके राक्षस, पशु, पक्षी, मत्स्य, वानर, बड़े-बड़े नाग, जल और स्थलमें विचरनेवाले सब प्रकारके पक्षिगण, उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज प्राणी उत्पन्न हुए। तात! इस प्रकार सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत् उत्पन्न हुआ ।। १८—२० ।।

भूतसर्गमिमं कृत्वा सर्वलोकपितामहः । शाश्वतं वेदपठितं धर्मं प्रयुयुजे ततः ।। २१ ।। सर्वलोकपितामह ब्रह्माने इन समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करके उनके ऊपर वेदोक्त सनातनधर्मके पालनका भार रखा ।। २१ ।।

तस्मिन् धर्मे स्थिता देवाः सहाचार्यपुरोहिताः । आदित्या वसवो रुद्राः ससाध्या मरुदश्विनः ।। २२ ।। आचार्य और पुरोहितगणोंसहित देवता, आदित्य, वसुगण, रुद्रगण, साध्यगण, मरुद्गण तथा अश्विनीकुमार—ये सभी उस सनातन धर्ममें प्रतिष्ठित हुए ।। २२ ।।

भृग्वत्र्यङ्गिरसः सिद्धाः काश्यपाश्च तपोधनाः ।

वसिष्ठगौतमागस्त्यास्तथा नारदपर्वतौ ॥ २३ ॥ ऋषयो वालखिल्याश्च प्रभासाः सिकतास्तथा । घृतपाः सोमवायव्या वैश्वानरमरीचिपाः ॥ २४ ॥ अकृष्टाश्चैव हंसाश्च ऋषयो वाग्नियोनयः । वानप्रस्थाः पृश्नयश्च स्थिता ब्रह्मानुशासने ॥ २५ ॥ भृगु, अत्रि और अङ्गिरा—ये सिद्ध मुनि, तपस्याके धनी काश्यपगण, वसिष्ठ, गौतम, अगस्त्य, देवर्षि नारद, पर्वत, वालखिल्य ऋषि, प्रभास, सिकत, घृतप (घी पीकर रहनेवाले), सोमप (सोमपान करनेवाले), वायव्य (वायु पीकर रहनेवाले), मरीचिप (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले) और वैश्वानर तथा अकृष्ट (बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए अन्नसे जीविका चलानेवाले), हंसमुनि (संन्यासी), अग्निसे उत्पन्न होनेवाले ऋषिगण, वानप्रस्थ और पृश्निगण—ये सभी महात्मा ब्रह्माजीकी आज्ञाके अधीन रहकर सनातनधर्मका पालन करने लगे ॥ २३-२५ ॥

दानवेन्द्रास्त्वतिक्रम्य तत् पितामहशासनम् । धर्मस्यापचयं चक्रुः क्रोधलोभसमन्विताः ॥ २६ ॥ परंतु दानवेश्वरोंने क्रोध और लोभसे युक्त हो ब्रह्माजीकी उस आज्ञाका उल्लंघन करके धर्मको हानि पहुँचाना आरम्भ किया ॥ २६ ॥

हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षो विरोचनः । शम्बरो विप्रचित्तिश्च विराधो नमुचिर्बलिः ॥ २७ ॥ एते चान्ये च बहवः सगणा दैत्यदानवाः । धर्मसेतुमतिक्रम्य रेमिरेऽधर्मनिश्चयाः ॥ २८ ॥ हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, विरोचन, शम्बर, विप्रचित्ति, विराध, नमुचि और बलि—ये तथा और भी बहुत-से दैत्य और दानव अपने दलके साथ धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करके अधर्म करनेका ही दृढ़ निश्चय लेकर आमोद-प्रमोदमें जीवन व्यतीत करने लगे ॥ २७-२८ ॥

सर्वे तुल्याभिजातीया यथा देवास्तथा वयम् । इत्येवं धर्ममास्थाय स्पर्धमानाः सुरर्षिभिः ॥ २९ ॥ वे सभी दैत्य कहते थे कि 'हम और देवता एक ही जातिके हैं; अतः जैसे देवता हैं वैसे हम हैं।' इस प्रकार जातीय धर्मका आश्रय लेकर दैत्यगण देवर्षियोंके साथ स्पर्धा रखने लगे ॥ २९ ॥

न प्रियं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत । त्रीनुपायानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधुः प्रजाः ॥ ३० ॥ भरतनन्दन! वे न तो प्राणियोंका प्रिय करते थे और न उनपर दयाभाव ही रखते थे। वे साम, दाम और भेद—इन तीनों उपायोंको लाँघकर केवल दण्डके द्वारा समस्त प्रजाओंको

पीड़ा देने लगे ॥ ३० ॥ न जग्मुः संविदं तैश्च दर्पादसुरसत्तमाः । अथ वै भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिरुपस्थितः ॥ ३१ ॥ तदा हिमवतः शृङ्गे सुरम्ये पद्मतारके । शतयोजनविस्तारे मणिरत्नचयाचिते ॥ ३२ ॥ वे असुरश्रेष्ठ घमण्डमें भरकर उन प्रजाओंके साथ बातचीत भी नहीं करते थे। तदनन्तर ब्रह्मर्षियोंसहित भगवान् ब्रह्मा हिमालयके सुरम्य शिखरपर उपस्थित हुए। वह इतना ऊँचा था कि आकाशके तारे उसपर विकसित कमलके समान जान पड़ते थे। उसका विस्तार सौ योजनका था। वह मणियों तथा रत्नसमूहोंसे व्याप्त था ॥ ३१-३२ ॥ तस्मिन् गिरिवरे पुत्र पुष्पितद्रुमकानने । तस्थौ स विबुधश्रेष्ठो ब्रह्मा लोकार्थसिद्धये ॥ ३३ ॥ बेटा नकुल! जहाँके वृक्ष और वन फूलोंसे भरे हुए थे, उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर सुरश्रेष्ठ ब्रह्माजी सम्पूर्ण जगत्का कार्य सिद्ध करनेके लिये ठहर गये ॥ ३३ ॥ ततो वर्षसहस्रान्ते वितानमकरोत् प्रभुः । विधिना कल्पदृष्टेन यथावच्चोपपादितम् ॥ ३४ ॥ ऋषिभिर्यज्ञपटुभिर्यथावत् कर्मकर्तृभिः । समिद्भिः परिसंकीर्णं दीप्यमानैश्च पावकैः ॥ ३५ ॥ काञ्चनैर्यज्ञभाण्डैश्च भ्राजिष्णुभिरलंकृतम् । वृतं देवगणैश्चैव प्रवरैर्यज्ञमण्डलम् ॥ ३६ ॥ तथा ब्रह्मर्षिभिश्चैव सदस्यैरुपशोभितम् । तदनन्तर कई सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भगवान् ब्रह्माने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार वहाँ एक यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञकुशल महर्षियों तथा अन्य कार्यकर्ताओंने यथावत् विधिके अनुसार उस यज्ञका सम्पादन किया। वहाँ यज्ञवेदियोंपर समिधाएँ फैली हुई थीं। जगह-जगह अग्निदेव प्रज्वलित हो रहे थे। चमचमाते हुए सुवर्णनिर्मित यज्ञपात्र यज्ञमण्डपकी शोभा बढ़ाते थे। वह यज्ञमण्डल श्रेष्ठ देवताओं तथा सभासद् बने हुए महर्षियोंसे सुशोभित होता था ॥ ३४-३६ १/२ ॥ तत्र घोरतमं वृत्तमृषीणां मे परिश्रुतम् ॥ ३७ ॥ चन्द्रमा विमलं व्योम यथाभ्युदिततारकम् । विकीर्याग्निं तथा भूतमुत्थितं श्रूयते तदा ॥ ३८ ॥ उस समय वहाँ एक अत्यन्त भयंकर घटना घटित हुई, जिसे मैंने ऋषियोंके मुँहसे सुना था। जैसे ताराओंके उगनेपर निर्मल आकाशमें चन्द्रमाका उदय हो, उसी प्रकार उस यज्ञमण्डपमें अग्निको इधर-उधर बिखेरकर एक भयंकर भूत प्रकट हुआ, ऐसा सुना जाता है ॥ ३७-३८ ॥

नीलोत्पलसवर्णामं तीक्ष्णदंष्ट्रं कृशोदरम् ।
प्रांशुं सुदुर्धर्षतरं तथैव ह्यमितौजसम् ॥ ३९ ॥
उसके शरीरका रंग नीलकमलके समान श्याम था, दाढ़ें अत्यन्त तीखी दिखायी देती थीं; और उसका पेट अत्यन्त कृश था। वह बहुत ऊँचा, परम दुर्धर्ष और अमित तेजस्वी जान पड़ता था ॥ ३९ ॥
तस्मिन्नुत्पतमाने च प्रचचाल वसुन्धरा ।
महोर्मिकलितावर्तश्चुक्षुभे स महोदधिः ॥ ४० ॥
उसके उत्पन्न होते ही धरती डोलने लगी, समुद्र क्षुब्ध हो उठा और उसमें उत्ताल तरंगोंके साथ भँवरें उठने लगीं ॥
पेतुरुल्का महोत्पाताः शाखाश्च मुमुचुर्द्रुमाः ।
अप्रशान्ता दिशः सर्वाः पवनश्चाशिवो ववौ ॥ ४१ ॥
आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं, बड़े-बड़े उत्पात प्रकट होने लगे, वृक्ष स्वयं ही अपनी शाखाओंको गिराने लगे, सम्पूर्ण दिशाएँ अशान्त हो गयीं और अमङ्गलकारी वायु प्रचण्ड वेगसे बहने लगी ॥ ४१ ॥
मुहुर्मुहुश्च भूतानि प्राव्यथन्त भयात् तथा ।
ततः स तुमुलं दृष्ट्वा तं च भूतमुपस्थितम् ॥ ४२ ॥
महर्षिसुरगन्धर्वानुवाचेदं पितामहः ।
सभी प्राणी भयके मारे बारंबार व्यथित हो उठते थे। उस भयानक भूतको उपस्थित हुआ देख पितामह ब्रह्माने महर्षियों, देवताओं तथा गन्धर्वोंसे कहा— ॥ ४२ १/२ ॥
मयैवं चिन्तितं भूतमसिर्नामैष वीर्यवान् ॥ ४३ ॥
रक्षणार्थाय लोकस्य वधाय च सुरद्विषाम् ।
‘मैंने ही इस भूतका चिन्तन किया था। यह असि नामधारी प्रबल आयुध है। इसे मैंने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा तथा देवद्रोही असुरोंके वधके लिये प्रकट किया है ॥ ४३ १/२ ॥
ततस्तद्रूपमुत्सृज्य बभौ निस्त्रिंश एव सः ॥ ४४ ॥
विमलस्तीक्ष्णधारश्च कालान्तक इवोद्यतः ।
तत्पश्चात् वह भूत उस रूपको त्यागकर तीस अङ्गुलसे कुछ बड़े खड्गके रूपमें प्रकाशित होने लगा। उसकी धार बड़ी तीखी थी। वह चमचमाता हुआ खड्ग काल और अन्तकके समान उद्यत प्रतीत होता था ॥ ४४ १/२ ॥
ततः स शितिकण्ठाय रुद्रायर्षभकेतवे ॥ ४५ ॥
ब्रह्मा ददावसिं तीक्ष्णमधर्मप्रतिवारणम् ।
इसके बाद ब्रह्माजीने अधर्मका निवारण करनेमें समर्थ वह तीखी तलवार वृषभचिह्नित ध्वजावाले नीलकण्ठ भगवान् रुद्रको दे दी ॥ ४५ १/२ ॥
ततः स भगवान् रुद्रो महर्षिजनसंस्तुतः ॥ ४६ ॥

प्रगृह्यासिममेयात्मा रूपमन्यच्चकार ह । चतुर्बाहुः स्पृशन् मूर्ध्ना भूस्थितोऽपि दिवाकरम् ॥ ४७ ॥ उस समय महर्षिगण रुद्रदेवकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। तब अप्रमेयस्वरूप भगवान् रुद्रने वह तलवार लेकर एक-दूसरा चतुर्भुज रूप धारण किया जो भूतलपर खड़ा होकर भी अपने मस्तकसे सूर्यदेवका स्पर्श कर रहा था ॥ ४६-४७ ॥

ऊर्ध्वदृष्टिर्महालिङ्गो मुखाज्ज्वालाः समुत्सृजन् । विकुर्वन् बहुधा वर्णान् नीलपाण्डुरलोहितान् ॥ ४८ ॥ उसकी दृष्टि ऊपरकी ओर थी, वह महान् चिह्न धारण किये हुए था। मुखसे आगकी लपटें छोड़ रहा था और अपने अङ्गोंसे नील, श्वेत तथा लोहित (लाल) अनेक प्रकारके रंग प्रकट कर रहा था ॥ ४८ ॥

बिभ्रत्कृष्णाजिनं वासो हेमप्रवरतारकम् । नेत्रं चैकं ललाटेन भास्करप्रतिमं वहन् ॥ ४९ ॥ शुशुभातेऽतिविमले द्वे नेत्रे कृष्णपिङ्गले । उसने काले मृगचर्मको वस्त्रके रूपमें धारण कर रक्खा था, जिसमें सुवर्णनिर्मित तारे जड़े हुए थे। वह अपने ललाटमें सूर्यके समान एक तेजस्वी नेत्र धारण करता था। उसके सिवा काले और पिङ्गलवर्णके दो अत्यन्त निर्मल नेत्र और शोभा पा रहे थे ॥ ४९ १/२ ॥

ततो देवो महादेवः शूलपाणिर्भगाक्षिहा ॥ ५० ॥ सम्प्रगृह्य तु निस्त्रिंशं कालाग्निसमवर्चसम् । त्रिकूटं चर्म चोद्यम्य सविद्युतमिवाम्बुदम् । चचार विविधान् मार्गान् महाबलपराक्रमः ॥ ५१ ॥ विधुन्वन्नसिमाकाशे तथा युद्धचिकीर्षया । तदनन्तर भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न शूलपाणि भगवान् महादेव काल और अग्निके तुल्य तेजस्वी खड्गको तथा बिजलीसहित मेघके समान चमकीली तीन कोनोंवाली ढालको हाथमें लेकर भाँति-भाँतिके मार्गोंसे विचरने लगे; और युद्ध करनेकी इच्छासे वह तलवार आकाशमें घुमाने लगे ॥ ५०-५१ १/२ ॥

तस्य नादं विनदतो महाहासं च मुञ्चतः ॥ ५२ ॥ बभौ प्रतिभयं रूपं तदा रुद्रस्य भारत । भरतनन्दन! उस समय जोर-जोरसे गर्जते और महान् अट्टहास करते हुए रुद्रदेवका स्वरूप बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ५२ १/२ ॥

तद्रूपधारिणं रुद्रं रौद्रकर्मचिकीर्षया ॥ ५३ ॥ निशम्य दानवाः सर्वे हृष्टाः समभिदुद्रुवुः । भयानक कर्म करनेकी इच्छासे वैसा ही रूप धारण करनेवाले रुद्रदेवको देखकर समस्त दानव हर्ष और उत्साहमें भरकर उनके ऊपर टूट पड़े ॥ ५३ १/२ ॥

अश्मभिश्चाभ्यवर्षन्त प्रदीप्तैश्च तथोल्मुकैः ।। ५४ ।। घोरैः प्रहरणैश्चान्यैः क्षुरधारैरयोमयैः । कुछ लोग पत्थर बरसाने लगे, कुछ जलते लुआठे चलाने लगे, दूसरे भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे काम लेने लगे और कितने ही लोहनिर्मित छुरोंकी तीखी धारोंसे चोट करने लगे ।। ५४ ½ ।।

ततस्तु दानवानीकं सम्प्रणेतारमच्युतम् ।। ५५ ।। रुद्रं दृष्ट्वा बलोद्धूतं प्रमुमोह चचाल च । तत्पश्चात् दानवदलने देखा कि देवसेनापतिका कार्य सँभालनेवाले उत्कट बलशाली रुद्रदेव युद्धसे पीछे नहीं हट रहे हैं, तब वे मोहित और विचलित हो उठे ।। ५५ ½ ।।

चित्रं शीघ्रपदत्वाच्च चरन्तमसिपाणिनम् ।। ५६ ।। तमेकमसुराः सर्वे सहस्रमिति मेनिरे । शीघ्रतापूर्वक पैर उठानेके कारण विचित्र गतिसे विचरण करनेवाले एकमात्र खड्गधारी रुद्रदेवको वे सब असुर सहस्रोंके समान समझने लगे ।। ५६ ½ ।।

छिन्दन् भिन्दन् रुजन् कृन्तन् दारयन् पोथयन्नपि ।। ५७ ।। अचरद् वैरिसङ्घेषु दावाग्निरिव कक्षगः । जैसे सूखी लकड़ी और घास-फूँसमें लगा हुआ दावानल वनके समस्त वृक्षोंको जला देता है, उसी प्रकार भगवान् रुद्र शत्रुसमुदायमें दैत्योंको मारते-काटते, चीरते-फाड़ते, घायल करते, छेदते तथा विदीर्ण और धराशायी करते हुए विचरने लगे ।। ५७ ½ ।।

असिवेगप्रभग्नास्ते छिन्नबाहूरुवक्षसः ।। ५८ ।। सम्पर्कीर्णान्त्रगात्राश्च पेतुरुर्व्यां महाबलाः । तलवारके वेगसे उन सबमें भगदड़ मच गयी। कितनोंकी भुजाएँ और जाँघें कट गयीं। बहुतोंके वक्षःस्थल विदीर्ण हो गये और कितनोंके शरीरोंसे आँतें बाहर निकल आयीं। इस प्रकार वे महाबली दैत्य मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ५८ ½ ।।

अपरे दानवा भग्नाः खड्गपातावपीडिताः ।। ५९ ।। अन्योन्यमभिनर्दन्तो दिशः सम्प्रतिपेदिरे । दूसरे दानव तलवारकी चोटसे पीड़ित हो भाग खड़े हुए और एक-दूसरेको डाँट बताते हुए उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण ली ।। ५९ ½ ।।

भूमिं केचित् प्रविविशुः पर्वतानपरे तथा ।। ६० ।। अपरे जग्मुराकाशमपरेऽम्भः समाविशन् । कितने ही धरतीमें घुस गये, बहुत-से पर्वतोंमें छिप गये, कुछ आकाशमें उड़ चले और दूसरे बहुत-से दानव पानीमें समा गये ।। ६० ½ ।।

तस्मिन् महति संवृत्ते समरे भृशदारुणे ।। ६१ ।।

बभूव भूः प्रतिभया मांसशोणितकर्दमा ।
वह अत्यन्त दारुण महान् युद्ध आरम्भ होनेपर पृथ्वीपर रक्त और मांसकी कीच जम गयी। जिससे वह अत्यन्त भयंकर प्रतीत होने लगी ।। ६१ १/२ ।।
दानवानां शरीरैश्च पतितैः शोणितोक्षितैः ।। ६२ ।।
समाकीर्णा महाबाहो शैलैरिव सकिंशुकैः ।
महाबाहो! खूनसे लथपथ होकर गिरी हुई दानवोंकी लाशोंसे ढकी हुई यह भूमि पलाशके फूलोंसे युक्त पर्वत-शिखरोंद्वारा आच्छादित-सी जान पड़ती थी ।। ६२ १/२ ।।
स रुद्रो दानवान् हत्वा कृत्वा धर्मोत्तरं जगत् ।। ६३ ।।
रौद्रं रूपमथोत्क्षिप्य चक्रे रूपं शिवं शिवः ।
दानवोंका वध करके जगत्‌में धर्मकी प्रधानता स्थापित करनेके पश्चात् भगवान् रुद्रदेवने उस रौद्ररूपको त्याग दिया। फिर वे कल्याणकारी शिव अपने मङ्गलमय रूपसे सुशोभित होने लगे ।। ६३ १/२ ।।
ततो महर्षयः सर्वे सर्वे देवगणास्तथा ।। ६४ ।।
जयेनाद्भुतकल्पेन देवदेवं तथार्चयन् ।
तत्पश्चात् सम्पूर्ण महर्षियों और देवताओंने उस अद्भुत विजयसे संतुष्ट हो देवाधिदेव महादेवकी पूजा की ।।
ततः स भगवान् रुद्रो दानवक्षतजोक्षितम् ।। ६५ ।।
असिं धर्मस्य गोप्तारं ददौ सत्कृत्य विष्णवे ।
तदनन्तर भगवान् रुद्रने दानवोंके खूनसे रँगे हुए उस धर्मरक्षक खड्गको बड़े सत्कारके साथ भगवान् विष्णुके हाथमें दे दिया ।। ६५ १/२ ।।
विष्णुर्मरीचये प्रादान्मरीचिर्भगवानपि ।। ६६ ।।
महर्षिभ्यो ददौ खड्गमृषयो वासवाय च ।
भगवान् विष्णुने मरीचिको, मरीचिने महर्षियोंको और महर्षियोंने इन्द्रको वह खड्ग प्रदान किया ।। ६६ १/२ ।।
महेन्द्रो लोकपालेभ्यो लोकपालास्तु पुत्रक ।। ६७ ।।
मनवे सूर्यपुत्राय ददुः खड्गं सुविस्तरम् ।
बेटा! फिर महेन्द्रने लोकपालोंको और लोकपालोंने सूर्य-पुत्र मनुको वह विशाल खड्ग दे दिया ।। ६७ १/२ ।।
ऊचुश्चैनं तथा वाक्यं मानुषाणां त्वमीश्वरः ।। ६८ ।।
असिना धर्मगर्भेण पालयस्व प्रजा इति ।
तलवार देकर उन्होंने मनुसे कहा—'तुम मनुष्योंके शासक हो; अतः इस धर्मगर्भित खड्गसे प्रजाका पालन करो ।। ६८ १/२ ।।

धर्मसेतुमतिक्रान्ताः स्थूलसूक्ष्मात्मकारणात् ।। ६९ ।।
विभज्य दण्डं रक्ष्यास्तु धर्मतो न यदृच्छया ।
दुर्वाचा निग्रहो दण्डो हिरण्यबहुलस्तथा ।। ७० ।।
व्यङ्गता च शरीरस्य वधो वानल्पकारणात् ।
असेरेतानि रूपाणि दुर्वारादीनि निर्दिशेत् ।। ७१ ।।
'जो लोग स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीरको सुख देनेके लिये धर्मकी मर्यादाका उल्लंघन करें, उन्हें न्यायपूर्वक पृथक्-पृथक् दण्ड देना। धर्मपूर्वक समस्त प्रजाकी रक्षा करना, किसीके प्रति स्वेच्छाचार न करना। कटुवचनसे अपराधीका दमन करना 'वाग्दण्ड' कहलाता है। जिसमें अपराधीसे बहुतसा सुवर्ण वसूल किया जाय, वह 'अर्थदण्ड' कहलाता है। शरीरके किसी अङ्गविशेषका छेदन करना 'काय-दण्ड' कहा गया है। किसी महान् अपराधके कारण अपराधीका जो वध किया जाता है, वह "प्राणदण्ड" के रूपमें प्रसिद्ध है। ये चारों दण्ड तलवारके दुर्निवार या दुर्धर्ष रूप हैं। यह बात समस्त प्रजाको बता देनी चाहिये ।। ६९—७१ ।।
असेरेवं प्रमाणानि परिपाल्य व्यतिक्रमात् ।
स विसृज्याथ पुत्रं स्वं प्रजानामधिपं ततः ।। ७२ ।।
मनुः प्रजानां रक्षार्थं क्षुपाय प्रददावसिम् ।
क्षुपाज्जग्राह चेक्ष्वाकुरिक्ष्वाकोश्च पुरूरवाः ।। ७३ ।।
'जब प्रजाके द्वारा धर्मका उल्लङ्घन हो जाय तो खड्गके द्वारा प्रमाणित (साधित) होनेवाले इन दण्डोंका यथायोग्य प्रयोग करके धर्मकी रक्षा करनी चाहिये।' ऐसा कहकर लोकपालोंने अपने पुत्र प्रजापालक मनुको विदा कर दिया। तत्पश्चात् मनुने प्रजाकी रक्षाके लिये वह खड्ग क्षुपको दे दिया। क्षुपसे इक्ष्वाकु और इक्ष्वाकुसे पुरूरवाने उस तलवारको ग्रहण किया ।। ७२-७३ ।।
आयुश्च तस्माल्लेभे तं नहुषश्च ततो भुवि ।
ययातिर्नहुषाच्चापि पूरुस्तस्माच्च लब्धवान् ।। ७४ ।।
पुरूरवासे आयुने, आयुसे नहुषने, नहुषसे ययातिने और ययातिसे पूरुने इस भूतलपर वह खड्ग प्राप्त किया ।। ७४ ।।
अमूर्तरयसस्तस्मात्ततो भूमिशयो नृपः ।
भरतश्चापि दौष्यन्तिर्लेभे भूमिशयादसिम् ।। ७५ ।।
पूरुसे अमूर्तरया, अमूर्तरयासे राजा भूमिशयने और भूमिशयसे दुष्यन्तकुमार भरतने उस खड्ग को ग्रहण किया ।। ७५ ।।
तस्माल्लेभे च धर्मज्ञो राजनैलविलस्तथा ।
ततस्त्वैलविलाल्लेभे धुन्धुमारो नरेश्वरः ।। ७६ ।।

राजन्! उनसे धर्मज्ञ ऐलविलने वह तलवार प्राप्त की। ऐलविलसे वह महाराज धुन्धुमारको मिली ॥ ७६ ॥
धुन्धुमाराच्च काम्बोजो मुचुकुन्दस्ततोऽलभत् ।
मुचुकुन्दान्मरुत्तश्च मरुत्तादपि रैवतः ॥ ७७ ॥
रैवताद् युवनाश्वश्च युवनाश्वात्ततो रघुः ।
इक्ष्वाकुवंशजस्तस्माद्धरिणाश्वः प्रतापवान् ॥ ७८ ॥
हरिणाश्वादसिं लेभे शुनकः शुनकादपि ।
उशीनरो वै धर्मात्मा तस्माद् भोजः स यादवः ॥ ७९ ॥
यदुभ्यश्च शिबिर्लेभे शिबेश्चापि प्रतर्दनः ।
प्रतर्दनादष्टकश्च पृषदश्वोऽष्टकादपि ॥ ८० ॥
धुन्धुमारसे काम्बोजने, काम्बोजसे मुचुकुन्दने, मुचुकुन्दसे मरुत्तने, मरुत्तसे रैवतने, रैवतसे युवनाश्वने, युवनाश्वसे इक्ष्वाकुवंशी रघुने, रघुसे प्रतापी हरिणाश्वने, हरिणाश्वसे शुनकने, शुनकसे धर्मात्मा उशीनरने, उशीनरसे यदवंशी भोजने, यदुवंशियोंसे शिबिने, शिबिसे प्रतर्दनने, प्रतर्दनसे अष्टकने तथा अष्टकसे पृषदश्वने वह तलवार प्राप्त की ॥ ७७—८० ॥
पृषदश्वाद् भरद्वाजो द्रोणस्तस्मात् कृपस्ततः ।
ततस्त्वं भ्रातृभिः सार्धं परमासिमवाप्तवान् ॥ ८१ ॥
पृषदश्वसे भरद्वाजवंशी द्रोणाचार्यने और द्रोणाचार्यसे कृपाचार्यने खड्गविद्या प्राप्त की। फिर कृपाचार्यसे भाइयों सहित तुमने उस उत्तम खड्गका उपदेश प्राप्त किया है ॥ ८१ ॥
कृत्तिकास्तस्य नक्षत्रमसेरग्निश्च दैवतम् ।
रोहिणी गोत्रमस्याथ रुद्रश्च गुरुरुत्तमः ॥ ८२ ॥
उस ‘असि’ का नक्षत्र कृत्तिका है, देवता अग्नि है, गोत्र रोहिणी है तथा उत्तम गुरु रुद्रदेव हैं ॥ ८२ ॥
असेरष्टौ हि नामानि रहस्यानि निबोध मे ।
पाण्डवेय सदा यानि कीर्तयन् लभते जयम् ॥ ८३ ॥
पाण्डुनन्दन! असिके आठ गोपनीय नाम हैं। उन्हें मेरे मुँहसे सुनो। उन नामोंका कीर्तन करनेवाला पुरुष युद्धमें विजय प्राप्त करता है ॥ ८३ ॥
असिर्विशसनः खड्गस्तीक्ष्णधारो दुरासदः ।
श्रीगर्भो विजयश्चैव धर्मपालस्तथैव च ॥ ८४ ॥
१. असि, २. विशसन, ३. खड्ग, ४. तीक्ष्णधार, ५. दुरासद, ६. श्रीगर्भ, ७. विजय और ८. धर्मपाल-ये ही वे आठ नाम हैं ॥ ८४ ॥
अग्रयः प्रहरणानां च खड्गो माद्रवतीसुत ।

महेश्वरप्रणीतश्च पुराणे निश्चयं गतः ॥ ८५ ॥
(एतानि चैव नामानि पुराणे निश्चितानि वै ।)
माद्रीनन्दन! खड्ग सब आयुधोंमें श्रेष्ठ है। भगवान् रुद्रने सबसे पहले इसका संचालन किया था। पुराणमें इसकी श्रेष्ठताका निश्चय किया गया है। उपर्युक्त सारे नाम पुराणोंमें निश्चितरूपसे कहे गये हैं॥ ८५॥

पृथूस्तूत्पादयामास धनुराद्यमरंदमः ।
तेनेयं पृथिवी दुग्धा सस्यानि सुबहून्यपि ।
धर्मेण च यथापूर्वं वैन्येन परिरक्षिता ॥ ८६ ॥
शत्रुदमन पृथुने सबसे पहले धनुषका उत्पादन किया था और उन्होंने ही इस पृथ्वीसे नाना प्रकारके शस्यों (अन्नके बीजों) का दोहन किया था। उन वेनकुमार पृथुने पहलेके ही समान धर्मपूर्वक इस पृथ्वीकी रक्षा की थी॥ ८६॥

तदेतदार्षं माद्रेय प्रमाणं कर्तुमर्हसि ।
असेश्च पूजा कर्तव्या सदा युद्धविशारदैः ॥ ८७ ॥
माद्रीनन्दन! यह ऋषियोंका बताया हुआ मत है। तुम्हें इसे प्रमाण मानकर इसपर विश्वास करना चाहिये। युद्धविशारद पुरुषोंको सदा ही खड्ग की पूजा करनी चाहिये॥ ८७॥

इत्येष प्रथमः कल्पो व्याख्यातस्ते सुविस्तरात् ।
असेरुत्पत्तिसंसर्गो यथावद् भरतर्षभ ॥ ८८ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने असि (खड्ग) की उत्पत्ति का प्रसङ्ग तुम्हें विस्तारपूर्वक और यथावत्रूपसे बताया है। इससे यह सिद्ध हुआ कि खड्ग ही आयुधोंमें सबसे प्रथम प्रकट हुआ है॥ ८८॥

सर्वथैतदिदं श्रुत्वा खड्गसाधनमुत्तमम् ।
लभते पुरुषः कीर्तिं प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ८९ ॥
खड्गप्राप्तिका यह उत्तम प्रसङ्ग सब प्रकारसे सुनकर पुरुष इस संसारमें कीर्ति पाता है और देहत्यागके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है॥ ८९॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि खड्गोत्पत्तिकथने
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें खड्गकी उत्पत्तिका कथनविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६६॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ½ श्लोक मिलाकर कुल ८९½ श्लोक हैं)

धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय

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सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तवति भीष्मे तु तूष्णींभूते युधिष्ठिरः ।
पप्रच्छावसथं गत्वा भ्रातॄन् विदुरपञ्चमान् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह कहकर जब भीष्मजी चुप हो गये, तब राजा युधिष्ठिरने घर जाकर अपने चारों भाइयों तथा पाँचवें विदुरजीसे प्रश्न किया— ॥ १ ॥

धर्मे चार्थे च कामे च लोकवृत्तिः समाहिता ।
तेषां गरीयान् कतमो मध्यमः को लघुश्च कः ॥ २ ॥
'लोगोंकी प्रवृत्ति प्रायः धर्म, अर्थ और कामकी ओर होती है। इन तीनोंमें कौन सबसे श्रेष्ठ, कौन मध्यम और कौन लघु है?' ॥ २ ॥

कस्मिंश्चात्मा निधातव्यस्त्रिवर्गविजयाय वै ।
संहृष्टा नैष्ठिकं वाक्यं यथावद् वक्तुमर्हथ ॥ ३ ॥
'इन तीनोंपर विजय पानेके लिये विशेषतः किसमें मन लगाना चाहिये। आप सब लोग हर्ष और उत्साहके साथ इस प्रश्नका यथावत्रूपसे उत्तर दें और वही बात कहें, जिसपर आपकी पूरी आस्था हो' ॥ ३ ॥

ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः प्रथमं प्रतिभानवान् ।
जगाद विदुरो वाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन् ॥ ४ ॥
तब अर्थकी गति और तत्त्वको जाननेवाले प्रतिभाशाली विदुरजीने धर्मशास्त्रका स्मरण करके सबसे पहले कहना आरम्भ किया ॥ ४ ॥

विदुर उवाच

बाहुश्रुत्यं तपस्त्यागः श्रद्धा यज्ञक्रिया क्षमा ।
भावशुद्धिर्दया सत्यं संयमश्चात्मसम्पदः ॥ ५ ॥
**विदुरजी बोले—**राजन्! बहुत-से शास्त्रोंका अनुशीलन, तपस्या, त्याग, श्रद्धा, यज्ञकर्म, क्षमा, भावशुद्धि, दया, सत्य और संयम—ये सब आत्माकी सम्पत्ति हैं ॥ ५ ॥

एतदेवाभिपद्यस्व मा तेऽभूच्चलितं मनः ।
एतन्मूलौ हि धर्मार्थावेतदेकपदं हि मे ॥ ६ ॥

युधिष्ठिर! तुम इन्हींको प्राप्त करो। इनकी ओरसे तुम्हारा मन विचलित नहीं होना चाहिये। धर्म और अर्थकी जड़ ये ही हैं। मेरे मतमें ये ही परम पद हैं ।। ६ ।।

धर्मेणैवर्षयस्तीर्णा धर्मे लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
धर्मेण देवा ववृधुर्धर्मे चार्थः समाहितः ।। ७ ।।
धर्मसे ही ऋषियोंने संसार-समुद्रको पार किया है। धर्मपर ही सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं। धर्मसे ही देवताओंकी उन्नति हुई है और धर्ममें ही अर्थकी भी स्थिति है ।। ७ ।।

धर्मो राजन् गुणः श्रेष्ठो मध्यमो ह्यर्थ उच्यते ।
कामो यवीयानिति च प्रवदन्ति मनीषिणः ।। ८ ।।
राजन्! धर्म ही श्रेष्ठ गुण है, अर्थको मध्यम बताया जाता है और काम सबकी अपेक्षा लघु है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ।। ८ ।।

तस्माद् धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मना ।
तथा च सर्वभूतेषु वर्तितव्यं यथात्मनि ।। ९ ।।
अतः मनको वशमें करके धर्मको अपना प्रधान ध्येय बनाना चाहिये और सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये, जैसा हम अपने लिये चाहते हैं ।। ९ ।।

वैशम्पायन उवाच

समाप्तवचने तस्मिन्नर्थशास्त्रविशारदः ।
पार्थो धर्मार्थतत्त्वज्ञो जगौ वाक्यं प्रचोदितः ।। १० ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! विदुरजीकी बात समाप्त होनेपर धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले अर्थशास्त्रविशारद अर्जुनने युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर कहा ।।

अर्जुन उवाच

कर्मभूमिरियं राजन्निह वार्ता प्रशस्यते ।
कृषिर्वाणिज्यगोरक्षं शिल्पानि विविधानि च ।। ११ ।।
**अर्जुन बोले—**राजन्! यह कर्म-भूमि है। यहाँ जीविकाके साधनभूत कर्मोंकी ही प्रशंसा होती है। खेती, व्यापार, गोपालन तथा भाँति-भाँतिके शिल्प—ये सब अर्थप्राप्तिके साधन हैं ।। ११ ।।

अर्थ इत्येव सर्वेषां कर्मणामव्यतिक्रमः ।
न ह्यृतेऽर्थेन वर्तेते धर्मकामाविति श्रुतिः ।। १२ ।।
अर्थ ही समस्त कर्मोंकी मर्यादाके पालनमें सहायक है। अर्थके बिना धर्म और काम भी सिद्ध नहीं होते—ऐसा श्रुतिका कथन है ।। १२ ।।

विषयैरर्थवान् धर्ममाराधयितुमुत्तमम् ।
कामं च चरितुं शक्तो दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।। १३ ।।

धनवान् मनुष्य धनके द्वारा उत्तम धर्मका पालन और अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुर्लभ कामनाओंकी प्राप्ति कर सकता है ॥ १३ ॥ अर्थस्यावयवावेतौ धर्मकामाविति श्रुतिः । अर्थसिद्ध्या विनिर्वृत्तावुभावेतौ भविष्यतः ॥ १४ ॥ श्रुतिका कथन है कि धर्म और काम अर्थके ही दो अवयव हैं। अर्थकी सिद्धिसे उन दोनोंकी भी सिद्धि हो जायगी ॥ १४ ॥ तद्गतार्थं हि पुरुषं विशिष्टतरयोनयः । ब्रह्माणमिव भूतानि सततं पर्युपासते ॥ १५ ॥ जैसे सब प्राणी सदा ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार उत्तम जातिके मनुष्य भी सदा धनवान् पुरुषकी उपासना किया करते हैं ॥ १५ ॥ जटाजिनधरा दान्ताः पङ्कदिग्धा जितेन्द्रियाः । मुण्डा निस्तन्तवश्चापि वसन्त्यर्थार्थिनः पृथक् ॥ १६ ॥ जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले जितेन्द्रिय संयतचित्त शरीरमें पंक धारण किये मुण्डितमस्तक नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी अर्थकी अभिलाषा रखकर पृथक्-पृथक् निवास करते हैं ॥ १६ ॥ काषायवसनाश्चान्ये श्मश्रुला ह्रीनिषेविणः । विद्वांसश्चैव शान्ताश्च मुक्ताः सर्वपरिग्रहैः ॥ १७ ॥ अर्थार्थिनः सन्ति केचिदपरे स्वर्गकांक्षिणः । कुलप्रत्यागमाश्चैके स्वं स्वं धर्ममनुष्ठिताः ॥ १८ ॥ सब प्रकारके संग्रहसे रहित, संकोचशील, शान्त, गेरुआ वस्त्रधारी, दाढ़ी-मूँछ बढ़ाये विद्वान् पुरुष भी धनकी अभिलाषा करते देखे गये हैं। कुछ दूसरे प्रकारके ऐसे लोग हैं जो स्वर्ग पानेकी इच्छा रखते हैं; और कुलपरम्परागत नियमोंका पालन करते हुए अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके धर्मोंका अनुष्ठान कर रहे हैं; किंतु वे भी धनकी इच्छा रखते हैं ॥ १७-१८ ॥ आस्तिका नास्तिकाश्चैव नियताः संयमे परे । अप्रज्ञानं तमोभूतं प्रज्ञानं तु प्रकाशिता ॥ १९ ॥ दूसरे बहुत-से आस्तिक-नास्तिक संयम नियम-परायण पुरुष हैं जो अर्थके इच्छुक होते हैं। अर्थकी प्रधानताको न जानना तमोमय अज्ञान है। अर्थकी प्रधानताका ज्ञान प्रकाशमय है ॥ १९ ॥ भृत्यान् भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजयति सोऽर्थवान् । एतन्मतिमतां श्रेष्ठ मतं मम यथातथम् । अनयोस्तु निबोध त्वं वचनं वाक्यकण्ठयोः ॥ २० ॥

धनवान् वही है जो अपने भृत्योंको उत्तम भोग और शत्रुओंको दण्ड देकर उनको वशमें रखता है। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज! मुझे तो यही मत ठीक जँचता है। अब आप इन दोनोंकी बात सुनिये। इनकी वाणी कण्ठतक आ गयी है, अर्थात् ये दोनों भाई बोलनेके लिये उतावले हो रहे हैं ।। २० ।।

वैशम्पायन उवाच

ततो धर्मार्थकुशलौ माद्रीपुत्रावनन्तरम् ।
नकुलः सहदेवश्च वाक्यं जगदतुः परम् ।। २१ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर धर्म और अर्थके ज्ञानमें कुशल माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने अपनी उत्तम बात इस प्रकार उपस्थित की ।। २१ ।।

नकुलसहदेवावूचतुः

आसीनश्च शयानश्च विचरन्नपि वा स्थितः ।
अर्थयोगं दृढं कुर्याद् योगैरुच्चावचैरपि ।। २२ ।।
नकुल-सहदेव बोले—महाराज! मनुष्यको बैठते, सोते, घूमते-फिरते अथवा खड़े होते समय भी छोटे-बड़े हर तरहके उपायोंसे धनकी आयको सुदृढ़ बनाना चाहिये ।। २२ ।।

अस्मिंस्तु वै विनिर्वृत्ते दुर्लभे परमप्रिये ।
इह कामानवाप्नोति प्रत्यक्षं नात्र संशयः ।। २३ ।।
धन अत्यन्त प्रिय और दुर्लभ वस्तु है। इसकी प्राप्ति अथवा सिद्धि हो जानेपर मनुष्य संसारमें अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण कर सकता है, इसका सभीको प्रत्यक्ष अनुभव है—इसमें संशय नहीं है ।। २३ ।।

योऽर्थो धर्मेण संयुक्तो धर्मो यश्चार्थसंयुतः ।
तद्वि त्वामृतसंवादं तस्मादेतौ मताविह ।। २४ ।।
जो धन धर्मसे युक्त हो और जो धर्म धनसे सम्पन्न हो, वह निश्चितरूपसे आपके लिये अमृतके समान होगा, यह हम दोनोंका मत है ।। २४ ।।

अनर्थस्य न कामोऽस्ति तथार्थोऽधर्मिणः कुतः ।
तस्मादुद्विजते लोको धर्मार्थाद् यो बहिष्कृतः ।। २५ ।।
निर्धन मनुष्यकी कामना पूर्ण नहीं होती और धर्महीन मनुष्यको धन भी कैसे मिल सकता है। जो पुरुष धर्मयुक्त अर्थसे वञ्चित है, उससे सब लोग उद्विग्न रहते हैं ।। २५ ।।

तस्माद् धर्मप्रधानेन साध्योऽर्थः संयतात्मना ।
विश्वस्तेषु हि भूतेषु कल्पते सर्वमेव हि ।। २६ ।।
इसलिये मनुष्य अपने मनको संयममें रखकर जीवनमें धर्मको प्रधानता देते हुए पहले धर्माचरण करके ही फिर धनका साधन करे; क्योंकि धर्मपरायण पुरुषपर ही समस्त

प्राणियोंका विश्वास होता है और जब सभी प्राणी विश्वास करने लगते हैं तब मनुष्यका सारा काम स्वतः सिद्ध हो जाता है ॥ २६ ॥ धर्मं समाचरेत् पूर्वं ततोऽर्थं धर्मसंयुतम् । ततः कामं चरेत् पश्चात् सिद्धार्थः स हि तत्परम् ॥ २७ ॥ अतः सबसे पहले धर्मका आचरण करे; फिर धर्मयुक्त धनका संग्रह करे। इसके बाद दोनोंकी अनुकूलता रखते हुए कामका सेवन करे। इस प्रकार त्रिवर्गका संग्रह करनेसे मनुष्य सफलमनोरथ हो जाता है ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच

विरेमतुस्तु तद् वाक्यमुक्त्वा तावश्विनोःसुतौ । भीमसेनस्तदा वाक्यमिदं वक्तुं प्रचक्रमे ॥ २८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इतना कहकर नकुल और सहदेव चुप हो गये। तब भीमसेनने इस तरह कहना आरम्भ किया ॥ २८ ॥

भीमसेन उवाच

नाकामः कामयत्यर्थं नाकामो धर्ममिच्छति । नाकामः कामयानोऽस्ति तस्मात् कामो विशिष्यते ॥ २९ ॥ **भीमसेन बोले—**धर्मराज! जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, उसे न तो धन कमानेकी इच्छा होती है और न धर्म करनेकी ही। कामनाहीन पुरुष तो काम (भोग) भी नहीं चाहता है; इसलिये त्रिवर्गमें काम ही सबसे बढ़कर है ॥ २९ ॥ कामेन युक्ता ऋषयस्तपस्येव समाहिताः । पलाशफलमूलादा वायुभक्षाः सुसंयताः ॥ ३० ॥ किसी-न-किसी कामनासे संयुक्त होकर ही ऋषि-लोग तपस्यामें मन लगाते हैं। फल, मूल और पत्ते चबाकर रहते हैं। वायु पीकर मन और इन्द्रियोंका संयम करते हैं ॥ वेदोपवेदेष्वपरे युक्ताः स्वाध्यायपारगाः । श्राद्धयज्ञक्रियायां च तथा दानप्रतिग्रहे ॥ ३१ ॥ कामनासे ही लोग वेद और उपवेदोंका स्वाध्याय करते तथा उसमें पारङ्गत विद्वान् हो जाते हैं। कामनासे ही श्राद्धकर्म, यज्ञकर्म, दान और प्रतिग्रहमें लोगोंकी प्रवृत्ति होती है ॥ ३१ ॥ वणिजः कर्षका गोपाः कारवः शिल्पिनस्तथा । दैवकर्मकृतश्चैव युक्ताः कामेन कर्मसु ॥ ३२ ॥ व्यापारी, किसान, ग्वाले, कारीगर और शिल्पी तथा देवसम्बन्धी कार्य करनेवाले लोग भी कामनासे ही अपने-अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं ॥ ३२ ॥ समुद्रं वा विशन्त्यन्ये नराः कामेन संयुताः ।

कामो हि विविधाकारः सर्वं कामेन संततम् ॥ ३३ ॥ कामनासे युक्त हुए दूसरे मनुष्य समुद्रमें भी घुस जाते हैं। कामनाके विविध रूप हैं तथा सारा कार्य ही कामनासे व्याप्त है ॥ ३३ ॥

नास्ति नासीन्नाभविष्यद् भूतं कामात्मकात् परम् । एतत् सारं महाराज धर्मार्थावत्र संस्थितौ ॥ ३४ ॥ सभी प्राणी कामना रखते हैं। उससे भिन्न कामना-रहित प्राणी न कहीं है, न कभी था और न भविष्यमें होगा ही; अतः यह काम ही त्रिवर्गका सार है। महाराज! धर्म और अर्थ भी इसीमें स्थित हैं ॥ ३४ ॥

नवनीतं यथा दध्नस्तथा कामोऽर्थधर्मतः । श्रेयस्तैलं हि पिण्याकाद् घृतं श्रेय उदश्वितः । श्रेयः पुष्पफलं काष्ठात् कामो धर्मार्थयोर्वरः ॥ ३५ ॥ जैसे दहीका सार माखन है, उसी प्रकार धर्म और अर्थका सार काम है। जैसे खलीसे श्रेष्ठ तेल है, तक्रसे श्रेष्ठ घी है और वृक्षके काष्ठसे श्रेष्ठ उसका फूल और फल है, उसी प्रकार धर्म और अर्थ दोनोंसे श्रेष्ठ काम है ॥ ३५ ॥

पुष्पतो मध्विव रसः काम आभ्यां तथा स्मृतः । कामो धर्मार्थयोर्योनिः कामश्चाथ तदात्मकः ॥ ३६ ॥ जैसे फूलसे उसका मधु-तुल्य रस श्रेष्ठ है, उसी प्रकार धर्म और अर्थसे काम श्रेष्ठ माना गया है। काम धर्म और अर्थका कारण है, अतः वह धर्म और अर्थरूप है ॥ ३६ ॥

नाकामतो ब्राह्मणः स्वन्नमर्थान् नाकामतो ददति ब्राह्मणेभ्यः । नाकामतो विविधा लोकचेष्टा तस्मात् कामः प्राक् त्रिवर्गस्य दृष्टः ॥ ३७ ॥ बिना किसी कामनाके ब्राह्मण अच्छे अन्नका भी भोजन नहीं करते और बिना कामनाके कोई ब्राह्मणोंको धनका दान नहीं करते हैं। जगत्के प्राणियोंको जो नाना प्रकारकी चेष्टा होती है वह बिना कामनाके नहीं होती; अतः त्रिवर्गमें कामका ही प्रथम एवं प्रधान स्थान देखा गया है ॥ ३७ ॥

सुचारुवेषाभिरलंकृताभि- र्मदोत्कटाभिः प्रियदर्शनाभिः । रमस्व योषाभिरुपेत्य कामं कामो हि राजन् परमो भवेन्नः ॥ ३८ ॥ अतः राजन्! आप कामका अवलम्बन करके सुन्दर वेषवाली, आभूषणोंसे विभूषित तथा देखनेमें मनोहर एवं मदमत्त युवतियोंके साथ विहार कीजिये। हमलोगोंको इस जगत्में कामको ही श्रेष्ठ मानना चाहिये ॥ ३८ ॥

बुद्धिर्ममैषा परिखास्थितस्य मा भूद् विचारस्तव धर्मपुत्र। स्यात् संहितं सद्भीरफल्गुसारं ममेति वाक्यं परमानृशंसम्॥ ३९॥ धर्मपुत्र! मैंने गहराईमें पैठकर ऐसा निश्चय किया है। मेरे इस कथनमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरा यह वचन उत्तम, कोमल, श्रेष्ठ, तुच्छतारहित एवं सारभूत है; अतः श्रेष्ठ पुरुष भी इसे स्वीकार कर सकते हैं॥ ३९॥

धर्मार्थकामाः सममेव सेव्या यो ह्येकभक्तः स नरो जघन्यः। तयोस्तु दाक्ष्यं प्रवदन्ति मध्यं स उत्तमो योऽभिरतस्त्रिवर्गे॥ ४०॥ मेरे विचारसे धर्म, अर्थ और काम तीनोंका एक साथ ही सेवन करना चाहिये। जो इनमेंसे एकका ही भक्त है, वह मनुष्य अधम है, जो दोके सेवनमें निपुण है, उसे मध्यम श्रेणीका बताया गया है और जो त्रिवर्गमें समानरूपसे अनुरक्त है, वह मनुष्य उत्तम है॥ ४०॥

प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः। ततो वचः संग्रहविस्तरेण प्रोक्त्वाथ वीरान् विरराम भीमः॥ ४१॥ बुद्धिमान्, सुहृद्, चन्दनसारसे चर्चित तथा विचित्र मालाओं और आभूषणोंसे विभूषित भीमसेन उन वीर बन्धुओंसे संक्षेप और विस्तारपूर्वक पूर्वोक्त वचन कहकर चुप हो गये॥ ४१॥

ततो मुहूर्तादथ धर्मराजो वाक्यानि तेषामनुचिन्त्य सम्यक्। उवाच वाचावितथं स्मयन् वै लब्धश्रुतां धर्मभृतां वरिष्ठः॥ ४२॥ जिन्होंने महात्माओंके मुखसे धर्मका उपदेश सुना है, उन धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने दो घड़ीतक पूर्व वक्ताओंके वचनोंपर भलीभाँति विचार करके मुसकराते हुए यह यथार्थ बात कही॥ ४२॥

युधिष्ठिर उवाच

निःसंशयं निश्चितधर्मशास्त्राः सर्वे भवन्तो विदितप्रमाणाः।

विज्ञातुकामस्य ममेह वाक्य-

मुक्तं यद्वै नैष्ठिकं तच्छ्रुतं मे ।

इदं त्ववश्यं गदतो ममापि

वाक्यं निबोधध्वमनन्यभावाः ॥ ४३ ॥

युधिष्ठिर बोले—बन्धुओ! इसमें संदेह नहीं कि आपलोग धर्मशास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर

विचार करके एक निश्चयपर पहुँच चुके हैं। आपलोगोंको प्रमाणोंका भी ज्ञान प्राप्त है। मैं

सबके विचार जानना चाहता था, इसलिये मेरे सामने यहाँ आपलोगोंने जो अपना-अपना

निश्चित सिद्धान्त बताया है, वह सब मैंने ध्यानसे सुना है। अब आप, मैं जो कुछ कह रहा हूँ,

मेरी उस बातको भी अनन्यचित्त होकर अवश्य सुनिये ॥ ४३ ॥

यो वै न पापे निरतो न पुण्ये

नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे ।

विमुक्तदोषः समलोष्टकाञ्चनो

विमुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धेः ॥ ४४ ॥

जो न पापमें लगा हो और न पुण्यमें, न तो अर्थोपार्जनमें तत्पर हो न धर्ममें, न काममें

ही। वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित मनुष्य दुःख और सुखको देनेवाली सिद्धियोंसे सदाके

लिये मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टीके ढेले और सोनेमें उसका समान भाव हो जाता

है ॥ ४४ ॥

भूतानि जातिस्मरणात्मकानि

जराविकारैश्च समन्वितानि ।

भूयश्च तैस्तैः प्रतिबोधितानि

मोक्षं प्रशंसन्ति न तं च विद्मः ॥ ४५ ॥

जो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाले तथा वृद्धावस्थाके विकारसे युक्त हैं, वे

मनुष्य नाना प्रकारके सांसारिक दुःखोंके उपभोगसे निरन्तर पीड़ित हो मुक्तिकी ही प्रशंसा

करते हैं, परंतु हमलोग उस मोक्षके विषयमें जानते ही नहीं ॥ ४५ ॥

स्नेहेन युक्तस्य न चास्ति मुक्ति-

रिति स्वयम्भूर्भगवानुवाच ।

बुधाश्च निर्वाणपरा भवन्ति

तस्मान्न कुर्यात् प्रियमप्रियं च ॥ ४६ ॥

स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजीका कथन है कि जिसके मनमें आसक्ति है, उसकी कभी

मुक्ति नहीं होती। आसक्तिशून्य ज्ञानी मनुष्य ही मोक्षको प्राप्त होते हैं; अतः मुमुक्षु पुरुषको

चाहिये कि वह किसीका प्रिय अथवा अप्रिय न करे ॥ ४६ ॥

एतत् प्रधानं च न कामकारो

यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ।

भूतानि सर्वाणि विधिर्नियुङ्क्ते विधिर्बलीयानिति वित्त सर्वे ॥ ४७ ॥ इस प्रकार विचार करना ही मोक्षका प्रधान उपाय है, स्वेच्छाचार नहीं। विधाताने मुझे जिस कार्यमें लगा दिया है, मैं उसे ही करता हूँ। विधाता सभी प्राणियोंको विभिन्न कार्योंके लिये प्रेरित करता है। अतः आप सब लोगोंको ज्ञात होना चाहिये कि विधाता ही प्रबल है ॥ ४७ ॥

न कर्मणाऽऽप्नोत्यनवाप्यमर्थं यद्भावि तद्वै भवतीति वित्त । त्रिवर्गहीनोऽपि हि विन्दतेऽर्थं तस्मादहो लोकहिताय गुह्यम् ॥ ४८ ॥ मनुष्य कर्मद्वारा अप्राप्य अर्थ नहीं पा सकता। जो होनहार है, वही होता है; इस बातको तुम सब लोग जान लो। मनुष्य त्रिवर्गसे रहित होनेपर भी आवश्यक पदार्थको प्राप्त कर लेता है; अतः मोक्षप्राप्तिका गूढ़ उपाय (ज्ञान) ही जगत्‌का वास्तविक कल्याण करनेवाला है ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्तदग्र्यं वचनं मनोनुगं समस्तमाज्ञाय ततो हि हेतुमत् । तदा प्रणेदुश्च जहर्षिरे च ते कुरुप्रवीराय च चक्रिरेऽञ्जलिम् ॥ ४९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा युधिष्ठिरकी कही हुई बात बड़ी उत्तम, युक्तियुक्त और मनमें बैठनेवाली हुई। उसे पूर्णरूपसे समझकर वे सब भाई बड़े प्रसन्न हो हर्षनाद करने लगे। उन सबने कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिरको अञ्जलि बाँधकर प्रणाम किया ॥ ४९ ॥

सुचारुवर्णाक्षरचारुभूषितां मनोनुगां निर्धुतवाक्यकण्टकाम् । निशम्य तां पार्थिव पार्थभाषितां गिरं नरेन्द्राः प्रशशंसुरेव ते ॥ ५० ॥ जनमेजय! युधिष्ठिरकी उस वाणीमें किसी प्रकारका दोष नहीं था। वह अत्यन्त सुन्दर स्वर और व्यञ्जनके संनिवेशसे विभूषित तथा मनके अनुरूप थी, उसे सुनकर समस्त राजाओंने युधिष्ठिरकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ५० ॥

स चापि तान् धर्मसुतो महामना- स्तदा प्रतीतान् प्रशशंस वीर्यवान् ।

पुनश्च पप्रच्छ सरिद्वरासुतं ततः परं धर्ममहीनचेतसम् ॥ ५१ ॥ पराक्रमी धर्मपुत्र महामना युधिष्ठिरने भी उन समस्त विश्वासपात्र नरेशों एवं बन्धुजनोंकी प्रशंसा की और पुनः उदारचेता गङ्गानन्दन भीष्मजीके पास आकर उनसे उत्तम धर्मके विषयमें प्रश्न किया ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि षड्जगीतायां सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें षड्जगीताविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६७ ॥