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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति

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षोडशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

योगका वर्णन और उसके साधनसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति

याज्ञवल्क्य उवाच

सांख्यज्ञानं मया प्रोक्तं योगज्ञानं निबोध मे ।
यथाश्रुतं यथादृष्टं तत्त्वेन नृपसत्तम ॥ १ ॥
**याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! मैं सांख्यसम्बन्धी ज्ञान तो तुम्हें बतला चुका। अब जैसा मैंने देखा, सुना या समझा है, उसके अनुसार योगशास्त्रका तात्त्विक ज्ञान मुझसे सुनो ॥ १ ॥

नास्ति सांख्यसमं ज्ञानं नास्ति योगसमं बलम् ।
तावुभावेकचर्यौ तावुभावनिधनौ स्मृतौ ॥ २ ॥
सांख्यके समान कोई ज्ञान नहीं है। योगके समान कोई बल नहीं है। इन दोनोंका लक्ष्य एक है और वे दोनों ही मृत्युका निवारण करनेवाले माने गये हैं ॥ २ ॥

पृथक् पृथक् प्रपश्यन्ति येऽप्यबुद्धिरता नराः ।
वयं तु राजन् पश्याम एकमेव तु निश्चयात् ॥ ३ ॥
राजन्! जो मनुष्य अज्ञानपरायण हैं, वे ही इन दोनों शास्त्रोंको सर्वथा भिन्न मानते हैं। हम तो विचारके द्वारा पूर्ण निश्चय करके दोनोंको एक ही समझते हैं ॥ ३ ॥

यदेव योगाः पश्यन्ति तत् सांख्यैरपि दृश्यते ।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ॥ ४ ॥
योगी जिस तत्त्वका साक्षात्कार करते हैं, वही सांख्योंद्वारा भी देखा जाता है; अतः जो सांख्य और योगको एक देखता है, वही तत्त्वज्ञानी है ॥ ४ ॥

रुद्रप्रधानानिपरान् विद्धि योगानरिंदम ।
तेनैव चाथ देहेन विचरन्ति दिशो दश ॥ ५ ॥
शत्रुदमन नरेश! योग-साधनोंमें रुद्र अर्थात् प्राण प्रधान है। इन सबको तुम सर्वश्रेष्ठ समझो। प्राणको अपने वशमें कर लेनेपर योगी इसी शरीरसे दसों दिशाओंमें स्वच्छन्द विचरण कर सकते हैं ॥ ५ ॥

यावद्धि प्रलयस्तात सूक्ष्मेणाष्टगुणेन ह ।
योगेन लोकान् विचरन् सुखं संन्यस्य चानघ ॥ ६ ॥
प्रिय निष्पाप भूपाल! जबतक मृत्यु न हो जाय, तबतक ही योगी योगबलसे स्थूल शरीरको यहीं छोड़कर अष्टविध ऐश्वर्यसे युक्त सूक्ष्मशरीरके द्वारा लोक-लोकान्तरोंमें

सुखपूर्वक विचरण करता है ।। ६ ।। वेदेषु चाष्टगुणिनं योगमाहुर्मनीषिणः । सूक्ष्ममष्टगुणं प्राहुर्नेतरं नृपसत्तम ।। ७ ।। नृपश्रेष्ठ! मनीषी पुरुषोंका कहना है कि वेदमें स्थूल और सूक्ष्म दो प्रकारके योगोंका वर्णन है। उनमें स्थूल योग अणिमा आदि आठ प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है और सूक्ष्म योग ही (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—इन आठ गुणों (अंगों) से युक्त है; दूसरा नहीं ।। ७ ।। द्विगुणं योगकृत्यं तु योगानां प्राहुरुत्तमम् । सगुणं निर्गुणं चैव यथा शास्त्रनिदर्शनम् ।। ८ ।। योगका मुख्य साधन दो प्रकारका बताया गया है—सगुण और निर्गुण (सबीज और निर्बीज)। ऐसा ही शास्त्रोंका निर्णय है ।। ८ ।। धारणं चैव मनसः प्राणायामश्च पार्थिव । एकाग्रता च मनसः प्राणायामस्तथैव च ।। ९ ।। पृथ्‍वीनाथ! किसी विशेष देशमें चित्तको स्थापित करनेका नाम 'धारणा' है। मनकी धारणाके साथ किया जानेवाला प्राणायाम सगुण है और देश-विशेषका आश्रय न लेकर मनको निर्बीज समाधिमें एकाग्र करना निर्गुण प्राणायाम कहलाता है ।। ९ ।। प्राणायामो हि सगुणो निर्गुणं धारयेन्मनः । यद्यदृश्यति मुञ्चन् वै प्राणान् मैथिलसत्तम । वाताधिक्यं भवत्येव तस्मात् तं न समाचरेत् ।। १० ।। सगुण प्राणायाम मनको निर्गुण अर्थात् वृत्तिशून्य करके स्थिर करनेमें सहायक होता है। मैथिलशिरोमणे! यदि पूरक आदिके समय नियत देवता आदिका ध्यानद्वारा साक्षात्कार किये बिना ही कोई प्राणवायुका रेचन करता है तो उसके शरीरमें वायुका प्रकोप बढ़ जाता है; अतः ध्यान-रहित प्राणायामको नहीं करना चाहिये ।। १० ।। निशायाः प्रथमे यामे चोदना द्वादश स्मृताः । मध्ये स्वप्यात् परे यामे द्वादशैव तु चोदनाः ।। ११ ।। रातके पहले पहरमें वायुको धारण करनेकी बारह प्रेरणाएँ बतायी गयी हैं। मध्य रात्रिमें रात्रिके बिचले दो पहरोंमें सोना चाहिये तथा पुनः अन्तिम प्रहरमें बारह प्रेरणाओंका ही अभ्यास करना चाहिये* ।। ११ ।। तदेवमुपशान्तेन दान्तेनैकान्तशीलिना । आत्मारामेण बुद्धेन योक्तव्योऽऽत्मा न संशयः ।। १२ ।। इस प्रकार प्राणायामके द्वारा मनको वशमें करके शान्त और जितेन्द्रिय हो एकान्तवास करनेवाले आत्माराम ज्ञानीको चाहिये कि मनको परमात्मामें लगावे। इसमें संशय नहीं है ।। १२ ।।

पञ्चानामिन्द्रियाणां तु दोषानाक्षिप्य पञ्चधा ।

शब्दं रूपं तथा स्पर्शं रसं गन्धं तथैव च ॥ १३ ॥

प्रतिभामपवर्गं च प्रतिसंहृत्य मैथिल ।

इन्द्रियग्राममखिलं मनस्यभिनिवेश्य ह ॥ १४ ॥

मनस्तथैवाहंकारे प्रतिष्ठाप्य नराधिप ।

अहंकारं तथा बुद्धौ बुद्धिं च प्रकृतावपि ॥ १५ ॥

एवं हि परिसंख्याय ततो ध्यायन्ति केवलम् ।

विरजस्कमलं नित्यमनन्तं शुद्धमव्रणम् ॥ १६ ॥

तस्थुषं पुरुषं नित्यमभेद्यमजरामरम् ।

शाश्वतं चाव्ययं चैव ईशानं ब्रह्म चाव्ययम् ॥ १७ ॥

मिथिलानरेश! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये इन्द्रियोंके पाँच दोष हैं। इन

दोषोंको दूर करे। फिर लय और विक्षेपको शान्त करके सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मनमें स्थिर करे।

नरेश्वर! तत्पश्चात् मनको अहंकारमें, अहंकारको बुद्धिमें और बुद्धिको प्रकृतिमें स्थापित

करे। इस प्रकार सबका लय करके योगी पुरुष केवल उस परमात्माका ध्यान करते हैं, जो

रजोगुणसे रहित, निर्मल, नित्य, अनन्त, शुद्ध, छिद्ररहित, कूटस्थ, अन्तर्यामी, अभेद्य,

अजर, अमर, अविकारी, सबका शासन करनेवाला और सनातन ब्रह्म है ॥

युक्तस्य तु महाराज लक्षणान्युपधारय ।

लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् ॥ १८ ॥

महाराज! अब समाधिमें स्थित हुए योगीके लक्षण सुनो। जैसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे

सोता है, उसी प्रकार योगयुक्त पुरुषके चित्तमें सदा प्रसन्नता बनी रहती है—वह समाधिसे

विरत होना नहीं चाहता। यही उसकी प्रसन्नताकी पहचान है ॥ १८ ॥

निर्वाते तु यथा दीपो ज्वलेत् स्नेहसमन्वितः ।

निश्चलोर्ध्वशिखस्तद्वद् युक्तमाहुर्मनीषिणः ॥ १९ ॥

जैसे तेलसे भरा हुआ दीपक वायुशून्य स्थानमें एकतार जलता रहता है। उसकी शिखा

स्थिरभावसे ऊपरकी ओर उठी रहती है, उसी तरह समाधिनिष्ठ योगीको भी मनीषी पुरुष

स्थिर बताते हैं ॥ १९ ॥

पाषाण इव मेघोत्थैर्यथा बिन्दुभिराहतः ।

नालं चालयितुं शक्यस्तथा युक्तस्य लक्षणम् ॥ २० ॥

जैसे बादलकी बरसायी हुई बूँदोंके आघातसे पर्वत चंचल नहीं होता, उसी तरह अनेक

प्रकारके विक्षेप आकर योगीको विचलित नहीं कर सकते। यही योगयुक्त पुरुषकी पहचान

है ॥ २० ॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्विविधैर्गीतवादितैः ।

क्रियमाणैर्न कम्पेत युक्तस्यैतन्निदर्शनम् ॥ २१ ॥

उसके पास बहुत-से शंख और नगाड़ोंकी ध्वनि हो और तरह-तरहके गाने-बजाने किये जायँ तो भी उसका ध्यान भंग नहीं हो सकता। यही उसकी सुदृढ़ समाधिकी पहचान है ॥ २१ ॥

तैलपात्रं यथा पूर्णं कराभ्यां गृह्य पूरुषः ।
सोपानमारुहेद् भीतस्तर्ज्यमानोऽसिपाणिभिः ॥ २२ ॥
संयतात्मा भयात् तेषां न पात्राद् बिन्दुमुत्सृजेत् ।
तथैवोत्तरमागम्य एकाग्रमनसस्तथा ॥ २३ ॥
स्थिरत्वादिन्द्रियाणां तु निश्चलत्वात् तथैव च ।
एवं युक्तस्य तु मुनेर्लक्षणान्युपलक्षयेत् ॥ २४ ॥
जैसे मनको संयममें रखनेवाला सावधान मनुष्य हाथोंमें तेलसे भरा कटोरा लेकर सीढ़ीपर चढ़े और उस समय बहुतसे पुरुष हाथमें तलवार लेकर उसे डराने-धमकाने लगें तो भी वह उनके डरसे एक बूँद भी तेल पात्रसे गिरने नहीं देता, उसी प्रकार योगकी ऊँची स्थितिको प्राप्त हुआ एकाग्रचित्त योगी इन्द्रियोंकी स्थिरता और मनकी अविचल स्थितिके कारण समाधिसे विचलित नहीं होता। योगसिद्ध मुनिके ऐसे ही लक्षण समझने चाहिये ॥ २२—२४ ॥

स्वयुक्तः पश्यते ब्रह्म यत् तत्परममव्ययम् ।
महत्तस्तमसो मध्ये स्थितं ज्वलनसंनिभम् ॥ २५ ॥
जो अच्छी तरह समाधिमें स्थित हो जाता है, वह महान् अन्धकारके बीचमें प्रकाशित होनेवाली प्रज्वलित अग्निके समान हृदयदेशमें स्थित अविनाशी (ज्ञानस्वरूप) परब्रह्मका साक्षात्कार करता है ॥ २५ ॥

एतेन केवलं याति त्यक्त्वा देहमसाक्षिकम् ।
कालेन महता राजन् श्रुतिरेषा सनातनी ॥ २६ ॥
राजन्! इस साधनाके द्वारा मनुष्य दीर्घकालके पश्चात् इस अचेतन देहका परित्याग करके केवल (प्रकृतिके संसर्गसे रहित) परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। ऐसी सनातन श्रुति है ॥ २६ ॥

एतद्धि योगं योगानां किमन्यद् योगलक्षणम् ।
विज्ञाय तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥ २७ ॥
यही योगियोंका योग है। इसके सिवा योगका और क्या लक्षण हो सकता है? इसे जानकर मनीषी पुरुष अपने-आपको कृतकृत्य मानते हैं ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे
षोडशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकका संवादविषयक तीन सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१६ ॥


* एक प्राणायाममें पूरक, कुम्भक और रेचकके भेदसे तीन प्रेरणाएँ समझनी चाहिये। इस प्रकार जहाँ बारह प्रेरणाओंके अभ्यासका विधान किया गया है, वहाँ चार-चार प्राणायाम करनेकी विधि समझनी चाहिये। तात्पर्य यह कि रातके पहले और पिछले पहरोंमें ध्यानपूर्वक चार-चार प्राणायामोंका नित्य अभ्यास करना योगीके लिये अत्यन्त आवश्यक है।

विभिन्न अंगोंसे प्राणोंके उत्क्रमणका फल तथा मृत्युसूचक लक्षणोंका वर्णन और मृत्युको जीतनेका उपाय

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सप्तदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

विभिन्न अंगोंसे प्राणोंके उत्क्रमणका फल तथा मृत्युसूचक लक्षणोंका वर्णन और मृत्युको जीतनेका उपाय

याज्ञवल्क्य उवाच

तथैवोत्क्रममाणं तु शृणुष्वावहितो नृप ।
पद्भ्यामुत्क्रममाणस्य वैष्णवं स्थानमुच्यते ॥ १ ॥
**याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—**नरेश्वर! देह-त्यागके समय मनुष्यके जिन-जिन अंगोंसे निकलकर प्राण जिन-जिन ऊर्ध्वलोकोंमें जाते हैं, उनके विषयमें बता रहा हूँ; तुम सावधान होकर सुनो। पैरोंके मार्गसे प्राणोंके उत्क्रमण करनेपर मनुष्यको भगवान् विष्णुके परमधामकी प्राप्ति होती बतायी जाती है ॥ १ ॥
जङ्घाभ्यां तु वसून् देवानाप्नुयादिति नः श्रुतम् ।
जानुभ्यां च महाभागान् साध्यान् देवानवाप्नुयात् ॥ २ ॥
जिसके प्राण दोनों पिण्डलियोंके मार्गसे बाहर निकलते हैं, वह वसु नामक देवताओंके लोकमें जाता है; ऐसा हमने सुन रखा है। घुटनोंसे प्राणत्याग करनेपर महाभाग साध्य-देवताओंके लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥
पायुनोत्क्रममाणस्तु मैत्रं स्थानमवाप्नुयात् ।
पृथिवीं जघनेनाथ ऊरुभ्यां च प्रजापतिम् ॥ ३ ॥
जिसके प्राण गुदामार्गसे निकलकर ऊपरकी ओर जाते हैं, वह मित्रदेवताके उत्तम स्थानको पाता है। कटिके अग्रभागसे प्राण निकलनेपर पृथ्वीलोककी और दोनों जाँघोंसे निकलनेपर प्रजापतिलोककी प्राप्ति होती है ॥
पार्श्वाभ्यां मरुतो देवान् नाभ्यामिन्द्रत्वमेव च ।
बाहुभ्यामिन्द्रमेवाहुरुरसा रुद्रमेव च ॥ ४ ॥
दोनों पसलियोंसे प्राणोंका निष्क्रमण हो तो मरुत् नामक देवताओंकी, नाभिसे हो तो इन्द्रपदकी, दोनों भुजाओंसे हो तो भी इन्द्रपदकी ही और वक्षःस्थलसे हो तो रुद्रलोककी प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥
ग्रीवया तु मुनिश्रेष्ठं नरमाप्नोत्यनुत्तमम् ।
विश्वेदेवान् मुखेनाथ दिशः श्रोत्रेण चाप्नुयात् ॥ ५ ॥
ग्रीवासे प्राणोंका निष्क्रमण होनेपर मनुष्य मुनियोंमें श्रेष्ठ परम उत्तम नरका सांनिध्य प्राप्त करता है। मुखसे प्राणत्याग करनेपर वह विश्वेदेवोंको और श्रोत्रसे

प्राण त्यागनेपर दिशाओंकी अधिष्ठात्री देवियोंको प्राप्त होता है ।। ५ ।। घ्राणेन गन्धवहनं नेत्राभ्यामग्निमेव च । भ्रूभ्यां चैवाश्विनौ देवौ ललाटेन पितॄनथ ।। ६ ।। नासिकासे प्राणोंका उत्क्रमण हो तो मनुष्य वायुदेवताको, दोनों नेत्रोंसे हो तो अग्निदेवताको, दोनों भौंहोंसे हो तो अश्विनीकुमारोंको और ललाटसे हो तो पितरोंको प्राप्त होता है ।। ६ ।। ब्रह्माणमाप्नोति विभुं मूर्ध्ना देवाग्रजं तथा । एतान्युत्क्रमणस्थानान्युक्तानि मिथिलेश्वर ।। ७ ।। मस्तकसे प्राणोंका परित्याग करनेपर मनुष्य देवताओंके अग्रज भगवान् ब्रह्माजीके लोकको जाता है। मिथिलेश्वर! ये प्राणोंके निष्क्रमणके स्थान बताये गये हैं ।। ७ ।। अरिष्टानि प्रवक्ष्यामि विहितानि मनीषिभिः । संवत्सरवियोगस्य सम्भवन्ति शरीरिणः ।। ८ ।। अब मैं ज्ञानी पुरुषोंद्वारा नियत किये हुए अमंगल अथवा मृत्युको सूचित करनेवाले उन चिह्नोंका वर्णन करता हूँ, जो देहधारीके शरीर छूटनेमें केवल एक वर्ष शेष रह जानेपर उसके सामने प्रकट होते हैं ।। ८ ।। योऽरुन्धतीं न पश्येत दृष्टपूर्वां कदाचन । तथैव ध्रुवमित्याहुः पूर्णेन्दुं दीपमेव च ।। ९ ।। खण्डाभासं दक्षिणतस्तेऽपि संवत्सरायुषः । जो कभी पहलेकी देखी हुई अरुन्धती और ध्रुवको न देख पाता हो तथा पूर्णचन्द्रमाका मण्डल और दीपककी शिखा जिसे दाहिने भागसे खण्डित जान पड़े, ऐसे लोग केवल एक वर्षतक जीवित रहनेवाले होते हैं ।। ९ १/२ ।। परचक्षुषि चात्मानं ये न पश्यन्ति पार्थिव ।। १० ।। आत्मच्छायाकृतीभूतं तेऽपि संवत्सरायुषः । पृथ्वीनाथ! जो लोग दूसरेके नेत्रोंमें अपनी परछाईं न देख सकें, उनकी आयु भी एक ही वर्षतक शेष समझनी चाहिये ।। १० १/२ ।। अतिद्युतिरतिप्रज्ञा अप्रज्ञा चाद्युतिस्तथा ।। ११ ।। प्रकृतेर्विक्रियापत्तिः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् । यदि मनुष्यकी बहुत बढ़ी-चढ़ी कान्ति भी अत्यन्त फीकी पड़ जाय, अधिक बुद्धिमत्ता भी बुद्धिहीनतामें परिणत हो जाय और स्वभावमें भी भारी उलट-फेर हो जाय तो यह उसके छः महीनेके भीतर ही होनेवाली मृत्युका सूचक है ।। ११ १/२ ।। दैवतान्यवजानाति ब्राह्मणैश्च विरुध्यते ।। १२ ।।

कृष्णश्यावच्छविच्छायः षण्मासान्मृत्युलक्षणम् ।
जो काले रंगका होकर भी पीला पड़ने लगे, देवताओंका अनादर करे और ब्राह्मणोंके साथ विरोध करे, वह भी छः महीनेसे अधिक नहीं जी सकता, यह उक्त लक्षणोंसे सूचित होता है ।। १२ १/२ ।।
ऊर्णनाभेर्यथा चक्रं छिद्रं सोमं प्रपश्यति ।। १३ ।।
तथैव च सहस्रांशुं सप्तरात्रेण मृत्युभाक् ।
जो मनुष्य सूर्य और चन्द्रमाके मण्डलको मकड़ीके जालेके समान छिद्रयुक्त देखता है, वह सात रातमें ही मृत्युका भागी होता है ।। १३ १/२ ।।
शवगन्धमुपाघ्राति सुरभिं प्राप्य यो नरः ।। १४ ।।
देवतायतनस्थस्तु सप्तरात्रेण मृत्युभाक् ।
जो देवमन्दिरमें बैठकर वहाँकी सुगन्धित वस्तुमें सड़े मुर्देकी-सी दुर्गन्धका अनुभव करता है, वह सात दिनमें ही मृत्युको प्राप्त हो जाता है ।। १४ १/२ ।।
कर्णनासावनमनं दन्तदृष्टिविरागिता ।। १५ ।।
संज्ञालोपो निरूष्मत्वं सद्योमृत्युनिदर्शनम् ।
अकस्माच्च स्रवेद् यस्य वाममक्षि नराधिप ।। १६ ।।
मूर्धतश्चोत्पतेद् धूमः सद्यो मृत्युनिदर्शनम् ।
नरेश्वर! जिसके नाक और कान टेढ़े हो जायँ, दाँत और नेत्रोंका रंग बिगड़ जाय, जिसे बेहोशी होने लगे, जिसका शरीर ठंडा पड़ जाय तथा जिसकी बायीं आँखसे अकस्मात् आँसू बहने और मस्तकसे धुआँ उठने लगे, उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है। उपर्युक्त लक्षण तत्काल होनेवाली मृत्युके सूचक हैं ।।
एतावन्ति त्वरिष्टानि विदित्वा मानवोऽत्मवान् ।। १७ ।।
निशि चाहनि चात्मानं योजयेत् परमात्मनि ।
प्रतीक्षमाणस्तत्कालं यत्कालं प्रेतता भवेत् ।। १८ ।।
इन मृत्युसूचक लक्षणोंको जानकर मनको वशमें रखनेवाला साधक रात-दिन परमात्माका ध्यान करे और जिस समय मृत्यु होनेवाली हो, उस कालकी प्रतीक्षा करता रहे ।। १७-१८ ।।
अथास्य नेष्टं मरणं स्थातुमिच्छेदिमां क्रियाम् ।
सर्वगन्धान् रसांश्चैव धारयीत नराधिप ।। १९ ।।
नरेश्वर! यदि योगीको मृत्यु अभीष्ट न हो, अभी वह इस जगत्में रहना चाहे तो यह क्रिया करे। पूर्वोक्त रीतिसे पंचभूतविषयक धारणा करके पृथ्वी आदि तत्त्वोंपर विजय प्राप्त करते हुए सम्पूर्ण गन्धों, रसों तथा रूप आदि विषयोंको अपने वशमें करे* ।। १९ ।।

ससांख्यधारणं चैव विदितात्मा नरर्षभ । जयेच्च मृत्युं योगेन तत्परेणान्तरात्मना ॥ २० ॥ नरश्रेष्ठ! सांख्य और योगके अनुसार धारणा-पूर्वक आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करके ध्यानयोगके द्वारा अन्तरात्माको परमात्मामें लगा देनेसे योगी मृत्युको जीत लेता है ॥ २० ॥

गच्छेत् प्राप्याक्षयं कृत्स्नमजन्म शिवमव्ययम् । शाश्वतं स्थानमचलं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥ २१ ॥ ऐसा करनेसे वह उस सनातन पदको प्राप्त करता है, जो अशुद्ध चित्तवाले पुरुषोंको दुर्लभ है तथा जो अक्षय, अजन्मा, अचल, अविकारी, पूर्ण एवं कल्याणमय है ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि याज्ञवल्क्यजनकसंवादे सप्तदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें याज्ञवल्क्य और जनकका संवादविषयक तीन सौ सतरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१७ ॥


* धारणाद्वारा पंचभूतोंपर विजय या अधिकार प्राप्त करके योगी जन्म, जरा, मृत्यु आदिको जीत लेता है; इस विषयमें यह सूत्र भी प्रमाण है—
पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पंचात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥
'ध्यानयोगका साधन करते-करते जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच महाभूतोंका उत्थान हो जाता है अर्थात् जब साधकका इन पाँचों महाभूतोंपर अधिकार हो जाता है और इन पाँचों महाभूतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली योगविषयक पाँचों सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, उस समय योगाग्निमय शरीरको प्राप्त कर लेनेवाले उस योगीके शरीरमें न तो रोग होता है, न बुढ़ापा आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है। अभिप्राय यह कि उसकी इच्छाके बिना उसका शरीर नष्ट नहीं हो सकता (योगद० ३।४६, ४७)।

३१८-

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अष्टादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः

याज्ञवल्क्यद्वारा अपनेको सूर्यसे वेदज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग सुनाना, विश्वावसुको जीवात्मा और परमात्माकी एकताके ज्ञानका उपदेश देकर उसका फल मुक्ति बताना तथा जनकको उपदेश देकर विदा होना

याज्ञवल्क्य उवाच

अव्यक्तस्थं परं यत् तत् पृष्टस्तेऽहं नराधिप ।
परं गुह्यमिमं प्रश्नं शृणुष्वावहितो नृप ॥ १ ॥
याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—नरेश्वर! तुमने जो मुझसे अव्यक्तमें स्थित परब्रह्मके विषयमें प्रश्न किया है, वह अत्यन्त गूढ़ है। उसके विषयमें ध्यान देकर सुनो ॥ १ ॥

यथाऽऽर्षेणेह विधिना चरताऽवनतेन ह ।
मयाऽऽदित्यादवाप्तानि यजूंषि मिथिलाधिप ॥ २ ॥
मिथिलापते! पूर्वकालमें मैंने शास्त्रोक्त विधिसे व्रतका आचरण करते हुए नतमस्तक होकर भगवान् सूर्यसे जिस प्रकार शुक्लयजुर्वेदके मन्त्र उपलब्ध किये थे, वह सब प्रसंग सुनो ॥ २ ॥

महता तपसा देवस्तपिष्णुः सेवितो मया ।
प्रीतेन चाहं विभुना सूर्येणोक्तस्तदानघ ॥ ३ ॥
निष्पाप नरेश! पहलेकी बात है, मैंने बड़ी भारी तपस्या करके तपनेवाले भगवान् सूर्यकी आराधना की थी। उससे प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने मुझसे कहा— ॥ ३ ॥

वरं वृणीष्व विप्रर्षे यदिष्टं ते सुदुर्लभम् ।
तत् ते दास्यामि प्रीतात्मा मत्प्रसादो हि दुर्लभः ॥ ४ ॥
‘ब्रह्मर्षे! तुम्हारी जैसी इच्छा हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो। वह अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी मैं तुम्हें दे दूँगा; क्योंकि मेरा मन तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट है। मेरा कृपा-प्रसाद प्रायः दुर्लभ है’ ॥ ४ ॥

ततः प्रणम्य शिरसा मयोक्तस्तपतां वरः ।
यजूंषि नोपयुक्तानि क्षिप्रमिच्छामि वेदितुम् ॥ ५ ॥
तब मैंने मस्तक झुकाकर तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्यको प्रणाम किया और उनसे कहा—‘प्रभो! मैं शीघ्र ही ऐसे यजुर्मन्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ' जो आजसे पहले

दूसरे किसीके उपयोगमें नहीं आये हैं' ।। ५ ।। ततो मां भगवानाह वितरिष्यामि ते द्विज । सरस्वतीह वाग्भूता शरीरं ते प्रवेक्ष्यति ।। ६ ।। ततो मामाह भगवानास्यं स्वं विवृतं कुरु । विवृतं च ततो मेऽस्यं प्रविष्टा च सरस्वती ।। ७ ।। तब भगवान् सूर्यने मुझसे कहा—'ब्रह्मन्! मैं तुम्हें यजुर्वेद प्रदान करता हूँ। तुम अपना मुँह खोलो। वाङ्मयी सरस्वती देवी तुम्हारे शरीरमें प्रवेश करेंगी।' यह सुनकर मैंने मुँह खोल दिया और सरस्वती देवी उसमें प्रविष्ट हो गयीं ।। ६-७ ।। ततो विदह्यमानोऽहं प्रविष्टोऽम्भस्तदानघ । अविज्ञानादमर्षाच्च भास्करस्य महात्मनः ।। ८ ।। निष्पाप नरेश! सरस्वतीके प्रवेश करते ही मैं तापसे जलने लगा और जलमें घुस गया। महात्मा भास्करकी महिमाको न जानने तथा अपनेमें सहनशीलता न होनेके कारण मुझे उस समय विशेष कष्ट हुआ था ।। ८ ।। ततो विदह्यमानं मामुवाच भगवान् रविः । मुहूर्तं सह्यतां दाहस्ततः शीतीभविष्यति ।। ९ ।। तदनन्तर मुझे तापसे दग्ध होता देख भगवान् सूर्यने कहा—'तात! तुम दो घड़ीतक इस तापको सहन करो। फिर यह स्वयं ही शीतल एवं शान्त हो जायगा' ।। शीतीभूतं च मां दृष्ट्वा भगवानाह भास्करः । प्रतिष्ठास्यति ते वेदः सखिलः सोत्तरो द्विज ।। १० ।। जब मैं पूर्ण शीतल हो गया, तब मुझे देखकर भगवान् भास्करने कहा—'विप्रवर! खिल और उपनिषदों-सहित सम्पूर्ण वेद तुम्हारे भीतर प्रतिष्ठित होंगे ।। १० ।। कृत्स्नं शतपथं चैव प्रणेष्यसि द्विजर्षभ । तस्यान्ते चापुनर्भावे बुद्धिस्तव भविष्यति ।। ११ ।। 'द्विजश्रेष्ठ! तुम सम्पूर्ण शतपथका भी प्रणयन (सम्पादन) करोगे। इसके बाद तुम्हारी बुद्धि मोक्षमें स्थिर होगी ।। ११ ।। प्राप्स्यसे च यदिष्टं तत् सांख्ययोगेप्सितं पदम् । एतावदुक्त्वा भगवानस्तमेवाभ्यवर्तत ।। १२ ।। 'तुम उस अभीष्ट पदको प्राप्त करोगे, जिसे सांख्यवेत्ता तथा योगी भी पाना चाहते हैं।' इतना कहकर भगवान् सूर्य वहीं अदृश्य हो गये ।। १२ ।। ततोऽनुव्याहृतं श्रुत्वा गते देवे विभावसौ । गृहमागत्य संहृष्टोऽचिन्तयं वै सरस्वतीम् ।। १३ ।। मैंने सूर्यदेवका वह कथन सुना। फिर जब वे चले गये, तब मैंने घर आकर प्रसन्नतापूर्वक सरस्वतीका चिन्तन किया ।। १३ ।।

ततः प्रवृत्तातिशुभा स्वरव्यञ्जनभूषिता । ओङ्कारमादितः कृत्वा मम देवी सरस्वती ॥ १४ ॥ मेरे स्मरण करते ही स्वर और व्यंजन-वर्णोंसे विभूषित अत्यन्त मंगलमयी सरस्वतीदेवी ॐकारको आगे करके मेरे सम्मुख प्रकट हुई ॥ १४ ॥ ततोऽहमर्घ्यं विधिवत् सरस्वत्यै न्यवेदयम् । तपतां च वरिष्ठाय निषण्णस्तत्परायणः ॥ १५ ॥ तब मैंने सरस्वतीदेवी तथा तपनेवालोंमें श्रेष्ठ भगवान् भास्करको अर्घ्य निवेदन किया और उन्हींका चिन्तन करता हुआ बैठ गया ॥ १५ ॥ ततः शतपथं कृत्स्नं सरहस्यं ससंग्रहम् । चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ॥ १६ ॥ उस समय बड़े हर्षके साथ मैंने रहस्य, संग्रह और परिशिष्टभागसहित समस्त शतपथका संकलन किया ॥ १६ ॥ कृत्वा चाध्ययनं तेषां शिष्याणां शतमुत्तमम् । विप्रियार्थं सशिष्यस्य मातुलस्य महात्मनः ॥ १७ ॥ ततः सशिष्येण मया सूर्येणेव गभस्तिभिः । व्यस्तो यज्ञो महाराज पितुस्तव महात्मनः ॥ १८ ॥ महाराज! तदनन्तर मैंने अपने सौ उत्तम शिष्योंको शतपथका अध्ययन कराया। इसके बाद शिष्यसहित अपने महामनस्वी मामाका (जो पहले मुझे तिरस्कृत कर चुके थे) अप्रिय करनेके लिये किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्यकी भाँति शिष्योंसे सुशोभित हो मैंने तुम्हारे पिता महात्मा राजा जनकके यज्ञका अनुष्ठान कराया ॥ १७-१८ ॥ मिषतो देवलस्यापि ततोऽर्धं हृतवानहम् । स्ववेददक्षिणायार्थे विमर्दे मातुलेन ह ॥ १९ ॥ उस समय अपने वेदकी दक्षिणाके लिये मामाके द्वारा विशेष आग्रह होनेपर महर्षि देवलके सामने ही मैंने आधी दक्षिणा उन्हें दे दी और आधी स्वयं ग्रहण की ॥ १९ ॥ सुमन्तुनाथ पैलेन तथा जैमिनिना च वै । पित्रा ते मुनिभिश्चैव ततोऽहमनुमानितः ॥ २० ॥ तदनन्तर सुमन्तु, पैल, जैमिनि, तुम्हारे पिता तथा अन्य ऋषि-मुनियोंने मेरा बड़ा आदर-सत्कार किया ॥ २० ॥ दश पञ्च च प्राप्तानि यजूंष्यर्कान्मयानघ । तथैव रोमहर्षण पुराणमवधारितम् ॥ २१ ॥ निष्पाप नरेश! इस प्रकार मैंने सूर्यदेवसे शुक्लयजुर्वेदकी पंद्रह शाखाएँ प्राप्त कीं। इसी तरह रोमहर्षण सूतसे मैंने पुराणोंका अध्ययन किया ॥ २१ ॥ बीजमेतत् पुरस्कृत्य देवीं चैव सरस्वतीम् ।

सूर्यस्य चानुभावेन प्रवृत्तोऽहं नराधिप ॥ २२ ॥
कर्तुं शतपथं चेदमपूर्वं च कृतं मया ।
यथाभिलषितं मार्गं तथा तच्चोपपादितम् ॥ २३ ॥
नरेश्वर! तदन्तर मैंने बीजरूप प्रणव और सरस्वती देवीको सामने करके भगवान् सूर्यकी कृपासे शतपथकी रचना आरम्भ की और इस अपूर्व ग्रन्थको पूर्ण कर लिया और जो मोक्षका मार्ग मुझे अभीष्ट था, उसका भी भलीभाँति सम्पादन किया ॥ २२-२३ ॥
शिष्याणामखिलं कृत्स्नमनुज्ञातं ससंग्रहम् ।
सर्वे च शिष्याः शुचयो गताः परमहर्षिताः ॥ २४ ॥
फिर मैंने शिष्योंको वह सारा ग्रन्थ रहस्य और संग्रह-सहित पढ़ाया और उन्हें घर जानेकी अनुमति दे दी। फिर वे सभी शुद्ध आचार-विचारवाले शिष्य अत्यन्त हर्षित हो अपने-अपने घरको चले गये ॥ २४ ॥
शाखाः पञ्चदशेमास्तु विद्या भास्करदेशिताः ।
प्रतिष्ठाप्य यथाकामं वेद्यं तदनुचिन्तयम् ॥ २५ ॥
इस प्रकार सूर्यदेवके द्वारा उपदेश की हुई शुक्लयजुर्वेद विद्याकी इन पंद्रह शाखाओंका ज्ञान प्राप्त करके मैंने इच्छानुसार वेद्यतत्त्वका चिन्तन किया है ॥ २५ ॥
किमत्र ब्रह्मण्यमृतं किं च वेद्यमनुत्तमम् ।
चिन्तयंस्तत्र चागत्य गन्धर्वो मामपृच्छत ॥ २६ ॥
विश्वावसुस्ततो राजन् वेदान्तज्ञानकोविदः ।
राजन्! एक समय वेदान्तज्ञानमें कुशल विश्वावसु नामक गन्धर्व मेरे पास आया एवं इस बातका विचार करते हुए कि यहाँ ब्राह्मण-जातिके लिये हितकर क्या है? सत्य और सर्वोत्तम ज्ञातव्य वस्तु क्या है? मुझसे पूछने लगा ॥ २६ १/२ ॥
चतुर्विंशांस्ततोऽपृच्छत् प्रश्नान् वेदस्य पार्थिव ॥ २७ ॥
पञ्चविंशतिमं प्रश्नं पप्रच्छान्वीक्षिकीं तदा ।
विश्वाविश्वं तथाश्वाश्वं मित्रं वरुणमेव च ॥ २८ ॥
पृथ्वीनाथ! तत्पश्चात् उन्होंने वेदके सम्बन्धमें चौबीस प्रश्न पूछे। फिर आन्वीक्षिकी विद्याके सम्बन्धमें पचीसवाँ प्रश्न उपस्थित किया। वे चौबीस प्रश्न इस प्रकार हैं—१. विश्वा क्या है? २. अविश्व क्या है? ३. अश्वा क्या है? ४. अश्व क्या है? ५. मित्र क्या है? ६. वरुण क्या है? ॥ २७-२८ ॥
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञोऽज्ञः कस्तपा अतपास्तथा ।
सूर्याति सूर्य इति च विद्याविद्ये तथैव च ॥ २९ ॥
७. ज्ञान क्या है? ८. ज्ञेय क्या है? ९. ज्ञाता क्या है? १०. अज्ञ क्या है? ११. क कौन है? १२. कौन तपस्वी है? १३. और कौन अतपस्वी है? १४. कौन सूर्य है? १५. तथा कौन अतिसूर्य? १६. और विद्या क्या है? १७. तथा अविद्या क्या है? ॥ २९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2089)

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महर्षि याज्ञवल्क्यके स्मरणसे देवी सरस्वतीका प्राकट्य

वेद्यावेद्यं तथा राजन्नचलं चलमेव च । अपूर्वमक्षयं क्षय्यमेतत् प्रश्नमनुत्तमम् ॥ ३० ॥ १८. राजन्! वेद्य क्या है? १९. अवेद्य क्या है? २०. चल क्या है? २१. अचल क्या है? २२. अपूर्व क्या है? २३. अक्षय क्या है? २४. और विनाशशील क्या है? ये ही उनके परम उत्तम प्रश्न हैं ॥ ३० ॥

अथोक्तश्च महाराज राजा गन्धर्वसत्तमः । पृष्टवाननुपूर्वेण प्रश्नमर्थविदुत्तमम् ॥ ३१ ॥ मुहूर्तमुष्यतां तावद्यावदेवं विचिन्तये । बाढमित्येव कृत्वा च तूष्णीं गन्धर्व आस्थितः ॥ ३२ ॥ महाराज! इन प्रश्नोंको सुनकर मैंने गन्धर्वशिरोमणि राजा विश्वावसुसे कहा—'राजन्! आपने क्रमशः बड़े उत्तम प्रश्न उपस्थित किये हैं। आप अर्थके ज्ञाता हैं। थोड़ी देर ठहर जाइये, तबतक मैं आपके इन प्रश्नोंपर विचार कर लेता हूँ।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर गन्धर्वराज चुपचाप बैठे रहे ॥ ३१-३२ ॥

ततोऽनुचिन्तयमहं भूयो देवीं सरस्वतीम् । मनसा स च मे प्रश्नो दध्नो घृतमिवोद्धृतम् ॥ ३३ ॥ तदनन्तर मैंने पुनः सरस्वतीदेवीका मन-ही-मन चिन्तन किया। फिर तो जैसे दहीसे घी निकल आता है, उसी प्रकार उन प्रश्नोंका उत्तर निकल आया ॥ ३३ ॥

तत्रोपनिषदं चैव परिशेषं च पार्थिव । मथ्नामि मनसा तात दृष्ट्वा चान्वीक्षिकीं पराम् ॥ ३४ ॥ राजन्! तात! उस समय मैं वहाँ उपनिषद्, उसके परिशिष्ट भाग और परम उत्तम आन्वीक्षिकी विद्यापर दृष्टिपात करके मनके द्वारा उन सबका मन्थन करने लगा ॥ ३४ ॥

चतुर्थी राजशार्दूल विद्यैषा साम्परायिकी । उदीरिता मया तुभ्यं पञ्चविंशादधिष्ठिता ॥ ३५ ॥ नृपश्रेष्ठ! यह आन्वीक्षिकी विद्या (त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—इन तीन विद्याओंकी अपेक्षासे) चौथी बतायी गयी है। यह मोक्षमें सहायक है। पचीसवें तत्त्वरूप पुरुषसे अधिष्ठित उस विद्याका मैंने तुमसे प्रतिपादन किया था (वही विश्वावसुके निकट भी कही गयी) ॥

अथोक्तस्तु मया राजन् राजा विश्वावसुस्तदा । श्रूयतां यद् भवानस्मान् प्रश्नं सम्पृष्टवानिह ॥ ३६ ॥ राजन्! उस समय मैंने राजा विश्वावसुसे कहा—'गन्धर्वराज! आपने यहाँ मुझसे जो प्रश्न पूछे हैं, उनका उत्तर सुनिये ॥ ३६ ॥

विश्वाविश्वेति यदिदं गन्धर्वेन्द्रानुपृच्छसि । विश्वाव्यक्तं परं विद्याद् भूतभव्यभयंकरम् ॥ ३७ ॥

गन्धर्वपते! आपने जो विश्वा और अविश्व इत्यादि कहकर यह प्रश्नावली उपस्थित की है, उसमें विश्वा अव्यक्त प्रकृतिका नाम है। यह संसार-बन्धनमें डालनेवाली होनेके कारण भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंमें भयंकर है—इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें।।

त्रिगुणं गुणकर्तृत्वादविश्वो निष्कलस्तथा ।
अश्वश्चाश्वा च मिथुनमेवमेवानुदृश्यते ।। ३८ ।।
इस प्रकार विश्वा नामसे प्रसिद्ध जो अव्यक्त प्रकृति है, वह त्रिगुणमयी है; क्योंकि वही त्रिगुणात्मक जगत्‌को उत्पन्न करनेवाली है। उससे भिन्न जो निष्कल (कलाओंसे रहित) आत्मा है, वही अविश्व कहलाता है। इसी तरह अश्व और अश्वाकी जोड़ी भी देखी जाती है (अर्थात् अश्वा अव्यक्त प्रकृति है और अश्व पुरुष) ।।

अव्यक्तं प्रकृतिं प्राहुः पुरुषेति च निर्गुणम् ।
तथैव मित्रं पुरुषं वरुणं प्रकृतिं तथा ।। ३९ ।।
अव्यक्त प्रकृतिको सगुण बताया गया है और पुरुषको निर्गुण। इसी प्रकार वरुणको प्रकृति समझना चाहिये और मित्रको पुरुष ।। ३९ ।।

ज्ञानं तु प्रकृतिं प्राहुर्ज्ञेयं निष्कलमेव च ।
अज्ञश्च ज्ञश्च पुरुषस्तस्मान्निष्कल उच्यते ।। ४० ।।
(भौतिक) ज्ञान शब्दसे प्रकृतिका प्रतिपादन किया गया है और निष्कल आत्माको ज्ञेय बताया गया है। इसी तरह अज्ञ प्रकृति है और उससे भिन्न निष्कल पुरुषको ‘ज्ञाता’ बताया गया है ।। ४० ।।

कस्तपा अतपाः प्रोक्तः कोऽसौ पुरुष उच्यते ।
तपास्तु प्रकृतिं प्राहुरतपा निष्कलः स्मृतः ।। ४१ ।।
क, तपा और अतपाके विषयमें जो प्रश्न उपस्थित किया गया है, उसके विषयमें बताया जाता है। पुरुषको ही ‘क’ कहते हैं। प्रकृतिका ही नाम तपा है और निष्कल पुरुषको अतपा नाम दिया गया है ।। ४१ ।।

(सूर्यमव्यक्तमित्युक्तमतिसूर्यस्तु निष्कलः ।
अविद्या प्रकृतिर्ज्ञेया विद्या पुरुष उच्यते ।।)
अव्यक्त प्रकृतिको ही सूर्य और निष्कल पुरुषको अतिसूर्य कहा गया है। प्रकृतिको अविद्या जानना चाहिये और पुरुष विद्या कहलाता है ।।

तथैवावेद्यमव्यक्तं वेद्यः पुरुष उच्यते ।
चलाचलमिति प्रोक्तं त्वया तदपि मे शृणु ।। ४२ ।।
इसी तरह अवेद्य नामसे अव्यक्त प्रकृतिका और वेद्य नामसे पुरुषका प्रतिपादन किया जाता है। आपने जो चल और अचलके विषयमें प्रश्न किया है, उसका भी उत्तर सुनिये ।। ४२ ।।

चलां तु प्रकृतिं प्राहुः कारणं क्षयसर्गयोः । आक्षेपसर्गयोः कर्ता निश्चलः पुरुषः स्मृतः ॥ ४३ ॥ सृष्टि और संहारकी कारणभूता प्रकृतिको 'चला' कहा गया है और सृष्टि तथा प्रलयका कर्ता पुरुष ही निश्चल पुरुष माना गया है ॥ ४३ ॥

तथैव वेद्यमव्यक्तमवेद्यः पुरुषस्तथा । अज्ञावुभौ ध्रुवौ चैव अक्षयौ चाप्युभावपि ॥ ४४ ॥ अजौ नित्यावुभौ प्राहुरध्यात्मगतिनिश्चयाः ॥ ४५ ॥ उसी प्रकार अव्यक्त प्रकृति वेद्य (जाननेमें आनेवाली) है और पुरुष अवेद्य (जाननेमें न आनेवाला)। अध्यात्मतत्त्वका निश्चयात्मक ज्ञान रखनेवाले विद्वान् कहते हैं कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अज्ञ हैं, दोनों ही निश्चल हैं और दोनों ही अक्षय, अजन्मा तथा नित्य हैं ॥ ४४-४५ ॥

अक्षयत्वात् प्रजनने अजमत्राहुरव्ययम् । अक्षयं पुरुषं प्राहुः क्षयो ह्यस्य न विद्यते ॥ ४६ ॥ ज्ञानी पुरुषोंका कथन है कि जन्म ग्रहण करनेपर भी क्षयरहित होनेके कारण यहाँ पुरुषको अजन्मा, अविनाशी और अक्षय कहा गया है; क्योंकि उसका कभी क्षय नहीं होता है ॥ ४६ ॥

गुणक्षयत्वात् प्रकृतिः कर्तृत्वादक्षयं बुधाः । एषा तेऽऽन्वीक्षिकी विद्या चतुर्थी साम्परायिकी ॥ ४७ ॥ गुणोंका क्षय होनेके कारण प्रकृति क्षयशील मानी गयी है और उसका प्रेरक होनेके कारण पुरुषको विद्वानोंने अक्षय कहा है। गन्धर्वराज! यह मैंने आपको चौथी आन्वीक्षिकी विद्या, जो मोक्षमें सहायक है, बतायी है ॥ ४७ ॥

विद्योपेतं धनं कृत्वा कर्मणा नित्यकर्मणि । एकान्तदर्शना वेदाः सर्वे विश्वावसो स्मृताः ॥ ४८ ॥ विश्वावसो! आन्वीक्षिकी विद्यासहित वेद-विद्यारूपी धनका उपार्जन करके प्रयत्नपूर्वक नित्यकर्ममें संलग्न रहना चाहिये। सभी वेद एकान्ततः स्वाध्याय और मनन करनेके योग्य माने गये हैं ॥ ४८ ॥

जायन्ते च म्रियन्ते च यस्मिन्नेते यतश्च्युताः । वेदार्थं ये न जानन्ति वेद्यं गन्धर्वसत्तम ॥ ४९ ॥ गन्धर्वराज! समस्त भूत जिसमें स्थित हैं, जिससे उत्पन्न होते और जिसमें लीन हो जाते हैं, उस वेदप्रतिपाद्य ज्ञेय परमात्माको जो नहीं जानते हैं, वे परमार्थसे भ्रष्ट होकर जन्मते और मरते रहते हैं ॥ ४९ ॥

साङ्गोपाङ्गानपि यदि यश्च वेदानधीयते । वेदवेद्यं न जानीते वेदभारवहो हि सः ॥ ५० ॥

सांगोपांग वेद पढ़कर भी जो वेदोंके द्वारा जाननेके योग्य परमेश्वरको नहीं जानता, वह मूढ़ केवल वेदोंका बोझ ढोनेवाला है ।। ५० ।।
यो घृतार्थी खरीक्षीरं मथेद् गन्धर्वसत्तम ।
विष्ठां तत्रानुपश्येत न मण्डं न च वै घृतम् ।। ५१ ।।
गन्धर्वशिरोमणे! जो घी पानेकी इच्छा रखकर गधीके दूधको मथता है, उसे वहाँ विष्ठा ही दिखायी देती है। उसे न तो वहाँ मक्खन ही मिलता है और न घी ही ।। ५१ ।।
तथा वेद्यमवेद्यं च वेदविद्यो न विन्दति ।
स केवलं मूढमतिर्ज्ञानभारवहः स्मृतः ।। ५२ ।।
इसी प्रकार जो वेदोंका अध्ययन करके भी वेद्य और अवेद्यका तत्त्व नहीं जानता, वह मूढ़बुद्धि मानव केवल ज्ञानका बोझ ढोनेवाला माना गया है ।। ५२ ।।
द्रष्टव्यौ नित्यमेवैतौ तत्परेणान्तरात्मना ।
तथास्य जन्मनिधने न भवेतां पुनः पुनः ।। ५३ ।।
मनुष्यको सदा ही तत्पर होकर अन्तरात्माके द्वारा इन दोनों प्रकृति और पुरुषका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। जिससे बारंबार उसे जन्म-मृत्युके चक्करमें न पड़ना पड़े ।। ५३ ।।
अजस्रं जन्मनिधनं चिन्तयित्वा त्रयीमिमाम् ।
परित्यज्य क्षयमिह अक्षयं धर्ममास्थितः ।। ५४ ।।
संसारमें जन्म और मरणकी परम्परा निरन्तर चलती रहती है—ऐसा सोचकर वैदिक कर्मकाण्डमें बताये हुए सभी कर्मों और उनके फलोंको विनाशशील जानकर उनका परित्याग करके मनुष्यको यहाँ अक्षय धर्मका आश्रय लेना चाहिये ।। ५४ ।।
यदानुपश्यतेऽत्यन्तमहन्यहनि काश्यप ।
तदा स केवलीभूतः षड्विंशमनुपश्यति ।। ५५ ।।
कश्यपनन्दन! जब साधक प्रतिदिन परमात्माके स्वरूपका विचार एवं चिन्तन करने लगता है, तब वह प्रकृतिके संसर्गसे रहित होकर छब्बीसवें तत्त्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ।। ५५ ।।
अन्यश्च शाश्वतोऽव्यक्तस्तथान्यः पञ्चविंशकः ।
तस्य द्वावनुपश्येतां तमेकमिति साधवः ।। ५६ ।।
मूढ़बुद्धि मानव उस आत्माके सम्बन्धमें द्वैतभावसे युक्त धारणा रखते हुए कहते हैं—‘सनातन अव्यक्त परमात्मा दूसरा है और पचीसवाँ तत्त्वरूप जीवात्मा दूसरा, परंतु साधु पुरुष उन दोनोंको एक मानते हैं ।।
ते नैतन्नाभिनन्दन्ति पञ्चविंशकमच्युतम् ।
जन्ममृत्युभयाद् योगाः सांख्याश्च परमैषिणः ।। ५७ ।।
वे जन्म और मृत्युके भयसे रहित होकर परमपद पानेकी इच्छा रखनेवाले सांख्यवेत्ता और योगी जीवात्मा और परमात्माको एक-दूसरेसे भिन्न नहीं मानते हैं। जीव और ईश्वरका

अभेद बतानेवाला जो यह पूर्वोक्त दर्शन अथवा साधुमत है, उसका वे भी अभिनन्दन करते ही हैं ।। ५७ ।।

विश्वावसुरुवाच

पञ्चविंशं यदेतत् ते प्रोक्तं ब्राह्मणसत्तम ।
तथा तन्न तथा चेति तद् भवान् वक्तुमर्हति ।। ५८ ।।

**विश्वावसुने कहा—**ब्राह्मणशिरोमणे! आपने जो यह पचीसवें तत्त्वरूप जीवात्माको परमात्मासे अभिन्न बताया है, उसमें यह संदेह उठता है कि जीवात्मा वास्तवमें परमात्मासे अभिन्न है या नहीं? अतः आप इस बातका स्पष्टरूपसे वर्णन करें ।। ५८ ।।

जैगीषव्यस्यासितस्य देवलस्य मया श्रुतम् ।
पराशरस्य विप्रर्षेर्वार्षगण्यस्य धीमतः ।। ५९ ।।
भृगोः पञ्चशिखस्यास्य कपिलस्य शुकस्य च ।
गौतमस्यार्ष्टिषेणस्य गर्गस्य च महात्मनः ।। ६० ।।
नारदस्यासुरेश्चैव पुलस्त्यस्य च धीमतः ।
सनत्कुमारस्य ततः शुक्रस्य च महात्मनः ।। ६१ ।।
कश्यपस्य पितुश्चैव पूर्वमेव मया श्रुतम् ।

मैंने मुनिवर जैगीषव्य, असित, देवल, ब्रह्मर्षि पराशर, बुद्धिमान् वार्षगण्य, भृगु, पञ्चशिख, कपिल, शुक, गौतम, आर्ष्टिषेण, महात्मा गर्ग, नारद, आसुरि, बुद्धिमान् पुलस्त्य, सनत्कुमार, महात्मा शुक्र तथा अपने पिता कश्यपजीके मुखसे भी पहले इस विषयका प्रतिपादन सुना था ।। ५९—६१ ½ ।।

तदनन्तरं च रुद्रस्य विश्वरूपस्य धीमतः ।। ६२ ।।
दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च दैतेयेभ्यस्ततस्ततः ।
प्राप्तमेतन्मया कृत्स्नं वेद्यं नित्यं वदन्त्युत ।। ६३ ।।

तदनन्तर रुद्र, बुद्धिमान् विश्वरूप, अन्यान्य देवता, पितर तथा दैत्योंसे भी जहाँ-तहाँसे यह सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। वे सब लोग ज्ञेय तत्त्वको पूर्ण और नित्य बतलाते हैं ।। ६२-६३ ।।

तस्मात् तद् वै भवद्बुद्ध्या श्रोतुमिच्छामि ब्राह्मण ।
भवान् प्रबर्हः शास्त्राणां प्रगल्भश्चातिबुद्धिमान् ।। ६४ ।।

ब्राह्मणदेव! अब मैं इस विषयमें आपकी बुद्धिसे किये गये निर्णयको सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप विद्वानोंमें श्रेष्ठ, शास्त्रोंके प्रगल्भ पण्डित और अत्यन्त बुद्धिमान् हैं ।। ६४ ।।

न तवाविदितं किंचिद् भवान् श्रुतिनिधिः स्मृतः ।
कथ्यते देवलोके च पितृलोके च ब्राह्मण ।। ६५ ।।

ऐसा कोई विषय नहीं है, जिसे आप न जानते हों। वैदिक ज्ञानके तो आप भण्डार ही माने जाते हैं। ब्रह्मन्! देवलोक और पितृलोकमें भी आपकी ख्याति है ॥ ६५ ॥ ब्रह्मलोकगताश्चैव कथयन्ति महर्षयः । पतिश्च तपतां शश्वदादित्यस्तव भाषिता ॥ ६६ ॥ ब्रह्मलोकमें गये हुए महर्षि भी आपकी महिमाका वर्णन करते हैं। तपनेवाले तेजस्वी ग्रहोंके पति अदितिनन्दन सनातन भगवान् सूर्यने आपको वेदका उपदेश किया है ॥ सांख्यज्ञानं त्वया ब्रह्मन्नवाप्तं कृत्स्नमेव च । तथैव योगशास्त्रं च याज्ञवल्क्य विशेषतः ॥ ६७ ॥ ब्रह्मन्! याज्ञवल्क्य! आपने सम्पूर्ण सांख्य तथा योगशास्त्रका भी विशेष ज्ञान प्राप्त किया है ॥ ६७ ॥ निःसंदिग्धं प्रबुद्धस्त्वं बुध्यमानश्चराचरम् । श्रोतुमिच्छामि तज्ज्ञानं घृतं मण्डमयं यथा ॥ ६८ ॥ इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि आप पूर्ण ज्ञानी हैं और सम्पूर्ण चराचर जगत्को जानते हैं; अतः मैं माखनमय घीके समान स्वादिष्ट एवं सारभूत वह तत्त्वज्ञान आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥ ६८ ॥

याज्ञवल्क्य उवाच

कृत्स्नधारिणमेव त्वां मन्ये गन्धर्वसत्तम । जिज्ञाससे च मां राजंस्तन्निबोध यथाश्रुतम् ॥ ६९ ॥ याज्ञवल्क्यजीने कहा—अर्थात् मैंने उत्तर दिया—गन्धर्वशिरोमणे! आपको मैं निःसंदेह सम्पूर्ण ज्ञानोंको धारण करनेवाली मेधाशक्तिसे सम्पन्न मानता हूँ। राजन्! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझसे प्रश्न करते और मेरे विचारको जानना चाहते हैं; इसलिये मैंने जैसा सुना है, वह बताता हूँ सुनिये ॥ ६९ ॥ अबुध्यमानां प्रकृतिं बुध्यते पञ्चविंशकः । न तु बुध्यति गन्धर्व प्रकृतिः पञ्चविंशकम् ॥ ७० ॥ गन्धर्व! प्रकृति जड है, इसलिये उसे पचीसवाँ तत्त्व—जीवात्मा तो जानता है; किंतु प्रकृति जीवात्माको नहीं जानती ॥ ७० ॥ अनेन प्रतिबोधेन प्रधानं प्रवदन्ति तत् । सांख्ययोगाश्च तत्त्वज्ञा यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥ ७१ ॥ सांख्य और योगके तत्त्वज्ञानी विद्वान् श्रुतिमें किये हुए निरूपणके अनुसार जलमें प्रतिबिम्बित होनेवाले चन्द्रमाके समान प्रकृतिमें ज्ञानस्वरूप जीवात्माके बोधका प्रतिबिम्ब पड़नेसे उस प्रकृतिको प्रधान कहते हैं ॥ ७१ ॥ पश्यंस्तथैव चापश्यन् पश्यत्यन्यः सदानघ ।