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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

३५७-

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सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नागपत्नीके द्वारा ब्राह्मणका सत्कार और वार्तालापके बाद ब्राह्मणके द्वारा नागराजके आगमनकी प्रतीक्षा

भीष्म उवाच

स वनानि विचित्राणि तीर्थानि च सरांसि च।
अभिगच्छन् क्रमेण स्म कंचिन्मुनिमुपस्थितः॥ १॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वह ब्राह्मण क्रमशः अनेकानेक विचित्र वनों, तीर्थों और सरोवरोंको लाँघता हुआ किसी मुनिके आश्रमपर उपस्थित हुआ॥ १॥

तं स तेन यथोद्दिष्टं नागं विप्रेण ब्राह्मणः।
पर्यपृच्छद् यथान्यायं श्रुत्वैव च जगाम सः॥ २॥
उस मुनिसे ब्राह्मणने अपने अतिथिके बताये हुए नागका पता पूछा। मुनिने जो कुछ बताया, उसे यथावत्रूपसे सुनकर वह पुनः आगे बढ़ा॥ २॥

सोऽभिगम्य यथान्यायं नागायतनमर्थवित्।
प्रोक्तवानहमस्मीति भोःशब्दालंकृतं वचः॥ ३॥
अपने उद्देश्यको ठीक-ठीक समझनेवाला वह ब्राह्मण विधिपूर्वक यात्रा करके नागके घरपर जा पहुँचा। घरके द्वारपर पहुँचकर उसने 'भोः' शब्दसे विभूषित वचन बोलते हुए पुकार लगायी—'कोई है? मैं यहाँ द्वारपर आया हूँ'॥ ३॥

तत् तस्य वचनं श्रुत्वा रूपिणी धर्मवत्सला।
दर्शयामास तं विप्रं नागपत्नी पतिव्रता॥ ४॥
उसकी वह बात सुनकर धर्मके प्रति अनुराग रखनेवाली नागराजकी परम सुन्दरी पतिव्रता पत्नीने उस ब्राह्मणको दर्शन दिया॥ ४॥

सा तस्मै विधिवत् पूजां चक्रे धर्मपरायणा।
स्वागतेनागतं कृत्वा किं करोमीति चाब्रवीत्॥ ५॥
उस धर्मपरायणा सतीने ब्राह्मणका विधिपूर्वक पूजन किया और स्वागत करते हुए कहा—'ब्राह्मणदेव! आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?'॥ ५॥

ब्राह्मण उवाच

विश्रान्तोऽभ्यर्चितश्चास्मि भवत्या श्लक्ष्णया गिरा।
द्रष्टुमिच्छामि भवति देवं नागमनुत्तमम्॥ ६॥
ब्राह्मणने कहा— देवि! आपने मधुर वाणीसे मेरा स्वागत और पूजन किया। इससे मेरी सारी थकावट दूर हो गयी। अब मैं परम उत्तम नागदेवका दर्शन करना चाहता

हूँ॥ ६ ॥
एतद्धि परमं कार्यमेतन्मे परमेप्सितम् ।
अनेन चार्थेनास्म्यद्य सम्प्राप्तः पन्नगाश्रमम् ॥ ७ ॥
यही मेरा सबसे बड़ा कार्य है और यही मेरा महान् मनोरथ है, मैं इसी उद्देश्यसे आज नागराजके इस आश्रमपर आया हूँ॥ ७ ॥

नागभार्योवाच
आर्यः सूर्यरथं वोढुं गतोऽसौ मासचारिकः ।
सप्ताष्टभिर्दिनैर्विप्र दर्शयिष्यत्यसंशयम् ॥ ८ ॥
**नागपत्नीने कहा—**विप्रवर! मेरे माननीय पतिदेव सूर्यदेवका रथ ढोनेके लिये गये हुए हैं। वर्षमें एक बार एक मासतक उन्हें यह कार्य करना पड़ता है। पंद्रह दिनोंमें ही वे यहाँ दर्शन देंगे—इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
एतद्विदितमार्यस्य विवासकरणं तव ।
भर्तुर्भवतु किं चान्यत् क्रियतां तद् वदस्व मे ॥ ९ ॥
मेरे पतिदेव-आर्यपुत्रके प्रवासका यह कारण आपको विदित हो। उनके दर्शनके सिवा और क्या काम है? यह मुझे बताइये; जिससे वह पूर्ण किया जाय ॥ ९ ॥

ब्राह्मण उवाच
अनेन निश्चयेनाहं साध्वि सम्प्राप्तवानिह ।
प्रतीक्षन्नागमं देवि वत्स्याम्यस्मिन् महावने ॥ १० ॥
**ब्राह्मणने कहा—**सती-साध्वी देवि! मैं उनके दर्शन करनेका निश्चय करके ही यहाँ आया हूँ; अतः उनके आगमनकी प्रतीक्षा करता हुआ मैं इस महान् वनमें निवास करूँगा ॥ १० ॥
सम्प्राप्तस्यैव चाव्यग्रमावेद्योऽहमिहागतः ।
ममाभिगमनं प्राप्तो वाच्यश्च वचनं त्वया ॥ ११ ॥
जब नागराज यहाँ आ जायँ, तब उन्हें शान्तभावसे यह बतला देना चाहिये कि मैं यहाँ आया हूँ। तुम्हें ऐसी बात उनसे कहनी चाहिये, जिससे वे मेरे निकट आकर मुझे दर्शन दें ॥ ११ ॥
अहमप्यत्र वत्स्यामि गोमत्याः पुलिने शुभे ।
कालं परिमिताहारो यथोक्तं परिपालयन् ॥ १२ ॥
मैं भी यहाँ गोमतीके सुन्दर तटपर परिमित आहार करके तुम्हारे बताये हुए समयकी प्रतीक्षा करता हुआ निवास करूँगा ॥ १२ ॥
ततः स विप्रस्तां नागीं समाधाय पुनः पुनः ।
तदेव पुलिनं नद्याः प्रययौ ब्राह्मणर्षभः ॥ १३ ॥

तदनन्तर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण नागपत्नीको बारंबार (नागराजको भेजनेके लिये) जताकर गोमती नदीके तटपर ही चला गया ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने सप्तपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५७ ॥

३५८-

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अष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या तथा नागराजके परिवारवालोंका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना

भीष्म उवाच

अथ तेन नरश्रेष्ठ ब्राह्मणेन तपस्विना ।
निराहारेण वसता दुःखितास्ते भुजङ्गमाः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—नरश्रेष्ठ! तदनन्तर गोमतीके तटपर रहता हुआ वह ब्राह्मण निराहार रहकर तपस्या करने लगा। उसके भोजन न करनेसे वहाँ रहनेवाले नागोंको बड़ा दुःख हुआ ॥ १ ॥

सर्वे सम्भूय सहिता ह्यस्य नागस्य बान्धवाः ।
भ्रातरस्तनया भार्या ययुस्तं ब्राह्मणं प्रति ॥ २ ॥
तब नागराजके भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र सब मिलकर उस ब्राह्मणके पास गये ॥ २ ॥

तेऽपश्यन् पुलिने तं वै विविक्ते नियतव्रतम् ।
समासीनं निराहारं द्विजं जप्यपरायणम् ॥ ३ ॥
उन्होंने देखा, ब्राह्मण गोमतीके तटपर एकान्त प्रदेशमें व्रत और नियमके पालनमें तत्पर हो निराहार बैठा हुआ है और मन्त्रका जप कर रहा है ॥ ३ ॥

ते सर्वे समतिक्रम्य विप्रमभ्यर्च्य चासकृत् ।
ऊचुर्वाक्यमसंदिग्धमातिथेयस्य बान्धवाः ॥ ४ ॥
अतिथि-सत्कारके लिये प्रसिद्ध हुए नागराजके सब भाई-बन्धु ब्राह्मणके पास जा उसकी बारंबार पूजा करके संदेहरहित वाणीमें बोले— ॥ ४ ॥

षष्ठो हि दिवसस्तेऽद्य प्राप्तस्येह तपोधन ।
न चाभिभाषसे किंचिदाहारं धर्मवत्सल ॥ ५ ॥
‘धर्मवत्सल तपोधन! आपको यहाँ आये आज छः दिन हो गये; किंतु अभीतक आप कुछ भोजन लानेके लिये हमें आज्ञा नहीं दे रहे हैं ॥ ५ ॥

अस्मानभिगतश्चासि वयं च त्वामुपस्थिताः ।
कार्यं चातिथ्यमस्माभिर्वयं सर्वे कुटुम्बिनः ॥ ६ ॥
‘आप हमारे घर अतिथिके रूपमें आये हैं और हम आपकी सेवामें उपस्थित हुए हैं। आपका आतिथ्य करना हमारा कर्तव्य है; क्योंकि हम सब लोग गृहस्थ हैं ॥

मूलं फलं वा पर्णं वा पयो वा द्विजसत्तम ।

आहारहेतोरन्नं वा भोक्तुमर्हसि ब्राह्मण ।। ७ ।।
‘द्विजश्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! आप क्षुधाकी निवृत्तिके लिये हमारे लाये हुए फल-मूल, साग, दूध अथवा अन्नको अवश्य ग्रहण करनेकी कृपा करें ।। ७ ।।
त्यक्ताहारेण भवता वने निवसता त्वया ।
बालवृद्धमिदं सर्वं पीड्यते धर्मसंकटात् ।। ८ ।।
‘इस वनमें रहकर आपने भोजन छोड़ दिया है। इससे हमारे धर्ममें बाधा आती है। बालकसे लेकर वृद्धतक हम सब लोगोंको इस बातसे बड़ा कष्ट हो रहा है ।। ८ ।।
न हि नो भ्रूणहा कश्चिज्जातापघ्नृतोऽपि वा ।
पूर्वाशी वा कुले ह्यस्मिन् देवतातिथिबन्धुषु ।। ९ ।।
‘हमारे इस कुलमें कोई भी ऐसा नहीं है, जिसने कभी भ्रूणहत्या की हो, जिसकी संतान पैदा होकर मर गयी हो, जिसने मिथ्या भाषण किया हो अथवा जो देवता, अतिथि एवं बन्धुओंकों अन्न देनेके पहले ही भोजन कर लेता हो' ।। ९ ।।

ब्राह्मण उवाच
उपदेशेन युष्माकमाहारोऽयं कृतो मया ।
द्विरूनं दशरात्रं वै नागस्यागमनं प्रति ।। १० ।।
**ब्राह्मणने कहा—**नागगण! आपलोगोंके इस उपदेशसे ही मैं तृप्त हो गया। आपलोग ऐसा समझें कि मैंने यह आहार ही प्राप्त कर लिया। नागराजके आनेमें केवल आठ रातें बाकी हैं ।। १० ।।
यद्यष्टरात्रेऽतिक्रान्ते नागमिष्यति पन्नगः ।
तदाहारं करिष्यामि तन्निमित्तमिदं व्रतम् ।। ११ ।।
यदि आठ रात बीत जानेपर भी नागराज नहीं आयेंगे तो मैं भोजन कर लूँगा। उनके आगमनके लिये ही मैंने यह व्रत लिया है ।। ११ ।।
कर्तव्यो न च संतापो गम्यतां च यथागतम् ।
तन्निमित्तमिदं सर्वं नैतद् भेत्तुमिहार्हथ ।। १२ ।।
आपलोगोंको इसके लिये संताप नहीं करना चाहिये। आप जैसे आये हैं, वैसे ही घर लौट जाइये। नागराजके दर्शनके लिये ही मेरा यह सारा व्रत और नियम है। अतः आपलोग इसे भंग न करें ।। १२ ।।
ते तेन समनुज्ञाता ब्राह्मणेन भुजङ्गमाः ।
स्वमेव भवनं जग्मुरकृतार्था नरर्षभ ।। १३ ।।
नरश्रेष्ठ! उस ब्राह्मणके इस प्रकार आदेश देनेपर वे नाग अपने प्रयत्नमें असफल हो घरको ही लौट गये ।। १३ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
अष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५८ ॥

नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध

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एकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नागराजका घर लौटना, पत्नीके साथ उनकी धर्मविषयक बातचीत तथा पत्नीका उनसे ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये अनुरोध

भीष्म उवाच

अथ काले बहुतिथे पूर्णे प्राप्तो भुजङ्गमः ।
दत्ताभ्यनुज्ञः स्वं वेश्म कृतकर्मा विवस्वता ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर कई दिनोंका समय पूरा होनेपर जब नागराजका काम पूरा हो गया, तब सूर्यदेवकी आज्ञा पाकर वे अपने घरको लौटे ॥ १ ॥

तं भार्याप्युपचक्राम पादशौचादिभिर्गुणैः ।
उपपन्नां च तां साध्वीं पन्नगः पर्यपृच्छत ॥ २ ॥

वहाँ नागराजकी पत्नी पैर धोनेके लिये जल—पाद्य आदि उत्तम सामग्रियोंके साथ पतिकी सेवामें उपस्थित हुई। अपनी साध्वी पत्नीको समीप आयी देख नागराजने पूछा— ॥ २ ॥

अथ त्वमसि कल्याणि देवतातथिपूजने ।
पूर्वमुक्तेन विधिना युक्ता युक्तेन मत्समम् ॥ ३ ॥

'कल्याणि! मेरे द्वारा बतायी हुई उपयुक्त विधिसे युक्त हो तुम मेरे ही समान देवताओं और अतिथियोंके पूजनमें तत्पर तो रही हो न? ॥ ३ ॥

न खल्वस्यकृतार्थेन स्त्रीबुद्ध्या मार्दवीकृता ।
मद्वियोगेन सुश्रोणि विमुक्ता धर्मसेतुना ॥ ४ ॥

'सुन्दरि! मेरे वियोगने तुम्हें शिथिल तो नहीं कर दिया था? तुम्हारी स्त्री-बुद्धिके कारण कहीं धर्मकी मर्यादा असफल या अरक्षित तो नहीं रह गयी और उसके कारण तुम धर्म-पालनसे विमुख या दूर तो नहीं हो गयी? ॥ ४ ॥

नागभार्योवाच

शिष्याणां गुरुशुश्रूषा विप्राणां वेदधारणम् ।
भृत्यानां स्वामिवचनं राज्ञो लोकानुपालनम् ॥ ५ ॥

नागपत्नीने कहा—शिष्योंका धर्म है गुरुकी सेवा करना, ब्राह्मणोंका धर्म है वेदोंको धारण करना, सेवकोंका धर्म है स्वामीकी आज्ञाका पालन तथा राजाका धर्म है प्रजावर्गका सतत संरक्षण ॥ ५ ॥

सर्वभूतपरित्राणं क्षत्रधर्म इहोच्यते ।

वैश्यानां यज्ञसंवृत्तिरातिथेयसमन्विता ॥ ६ ॥ इस जगत्में समस्त प्राणियोंकी रक्षा करना क्षत्रिय-धर्म बताया जाता है। अतिथि-सत्कारके साथ-साथ यज्ञोंका अनुष्ठान करना वैश्योंका धर्म कहा गया है ॥ ६ ॥

विप्रक्षत्रियवैश्यानां शुश्रूषा शूद्रकर्म तत् । गृहस्थधर्मो नागेन्द्र सर्वभूतहितैषिता ॥ ७ ॥ नागराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—तीनों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका कर्तव्य बताया गया है और समस्त प्राणियोंके हितकी इच्छा रखना गृहस्थका धर्म है ॥ ७ ॥

नियताहारता नित्यं व्रतचर्या यथाक्रमम् । धर्मो हि धर्मसम्बन्धादिन्द्रियाणां विशेषतः ॥ ८ ॥ नियमित आहारका सेवन और विधिवत् व्रतका पालन सबका धर्म है। धर्म-पालनके सम्बन्धसे इन्द्रियोंकी विशेषरूपसे शुद्धि होती है ॥ ८ ॥

अहं कस्य कुतो वापि कः को मे ह भवेदिति । प्रयोजनमतिर्नित्यमेवं मोक्षाश्रमे वसेत् ॥ ९ ॥ ‘मैं किसका हूँ? कहाँसे आया हूँ, मेरा कौन है? तथा इस जीवनका प्रयोजन क्या है?’ इत्यादि बातोंका सदा विचार करते हुए ही संन्यासीको संन्यास-आश्रममें रहना चाहिये ॥ ९ ॥

पतिव्रतात्वं भार्यायाः परमो धर्म उच्यते । त्वोपदेशान्नागेन्द्र तच्च तत्त्वेन वेद्मि वै ॥ १० ॥ नागराज! पत्नीके लिये पातिव्रत्य ही सबसे बड़ा धर्म कहा जाता है। आपके उपदेशसे अपने उस धर्मको मैं अच्छी तरह समझती हूँ ॥ १० ॥

साहं धर्मं विजानन्ती धर्मनित्ये त्वयि स्थिते । सत्पथं कथमुत्सृज्य यास्यामि विपथं पथः ॥ ११ ॥ जब आप—मेरे पतिदेव सदा धर्मपर स्थित रहते हैं, तब धर्मको जानती हुई भी मैं कैसे सन्मार्गका त्याग करके कुमार्गपर पैर रखूँगी? ॥ ११ ॥

देवतानां महाभाग धर्मचर्या न हीयते । अतिथीनां च सत्कारे नित्ययुक्तास्म्यतन्द्रिता ॥ १२ ॥ महाभाग! देवताओंकी आराधना Confirmed: आराधनारूप धर्मचर्यामें कोई कमी नहीं आयी है, अतिथियोंके सत्कारमें भी मैं सदा आलस्य छोड़कर लगी रही हूँ ॥ १२ ॥

सप्ताष्टदिवसास्त्वद्य विप्रस्येहागतस्य वै । तच्च कार्यं न मे ख्याति दर्शनं तव काङ्क्षति ॥ १३ ॥ परंतु आज पंद्रह दिनसे एक ब्राह्मणदेवता यहाँ पधारे हुए हैं। वे मुझसे अपना कोई कार्य नहीं बता रहे हैं। केवल आपका दर्शन चाहते हैं ॥ १३ ॥

गोमत्यास्त्वेष पुलिने त्वद्दर्शनसमुत्सुकः ।

आसीनो वर्तयन् ब्रह्म ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ १४ ॥
वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण वेदोंका पारायण करते हुए आपके दर्शनके लिये उत्सुक हो गोमतीके किनारे बैठे हुए हैं ॥ १४ ॥
अहं त्वनेन नागेन्द्र सत्यपूर्वं समाहिता ।
प्रस्थाप्यो मत्सकाशं स सम्प्राप्तो भुजगोत्तमः ॥ १५ ॥
नागराज! उन्होंने मुझसे पहले सच्ची प्रतिज्ञा करा ली है कि नागराजके आते ही तुम उन्हें मेरे पास भेज देना ॥ १५ ॥
एतच्छ्रुत्वा महाप्राज्ञ तत्र गन्तुं त्वमर्हसि ।
दातुमर्हसि वा तस्य दर्शनं दर्शनश्रवः ॥ १६ ॥
महाप्राज्ञ नागराज! मेरी यह बात सुनकर अब आपको वहाँ जाना चाहिये और ब्राह्मणदेवताको दर्शन देना चाहिये ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
एकोनषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका
उपाख्यानविषयक तीन सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५९ ॥

पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना

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षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना

नाग उवाच

अथ ब्राह्मणरूपेण कं तं समनुपश्यसि ।
मानुषं केवलं विप्रं देवं वाथ शुचिस्मिते ॥ १ ॥
नागने पूछा— पवित्र मुसकानवाली देवि! ब्राह्मणरूपमें तुमने किसका दर्शन किया है? वे ब्राह्मण कोई मनुष्य हैं या देवता? ॥ १ ॥

को हि मां मानुषः शक्तो द्रष्टुकामो यशस्विनि ।
संदर्शनरुचिर्वाक्यमाज्ञापूर्वं वदिष्यति ॥ २ ॥
यशस्विनि! भला, कौन मनुष्य मुझे देखनेकी इच्छा कर सकता है और यदि दर्शनकी इच्छा करे भी तो कौन इस तरह मुझे आज्ञा देकर बुला सकता है? ॥ २ ॥

सुरासुरगणानां च देवर्षीणां च भाविनि ।
ननु नागा महावीर्याः सौरसेयास्तरस्विनः ॥ ३ ॥
वन्दनीयाश्च वरदा वयमप्यनुयायिनः ।
मनुष्याणां विशेषेण नावेक्ष्या इति मे मतिः ॥ ४ ॥
भाविनि! सुरसाके वंशज नाग महापराक्रमी और अत्यन्त वेगशाली होते हैं। वे देवताओं, असुरों और देवर्षियोंके लिये भी वन्दनीय हैं। हमलोग भी अपने सेवकको वर देनेवाले हैं। विशेषतः मनुष्योंके लिये हमारा दर्शन सुलभ नहीं है, ऐसी मेरी धारणा है ॥ ३-४ ॥

नागभार्योवाच

आर्जवेन विजानामि नासौ देवोऽनिलाशन ।
एकं तस्मिन् विजानामि भक्तिमानतिरोषण ॥ ५ ॥
नागपत्नी बोली— अत्यन्त क्रोधी स्वभाववाले वायुभोजी नागराज! उन ब्राह्मणकी सरलतासे तो मैं यही समझती हूँ कि वे देवता नहीं हैं। मुझे उनमें एक बहुत बड़ी विशेषता यह जान पड़ी है कि वे आपके भक्त हैं ॥ ५ ॥

स हि कार्यान्तराकाङ्क्षी जलेप्सुः स्तोकको यथा ।
वर्षं वर्षप्रियः पक्षी दर्शनं तव काङ्क्षति ॥ ६ ॥
जैसे वर्षाके जलका प्रेमी प्यासा पपीहा पक्षी पानीके लिये वर्षाकी बाट जोहता रहता है, उसी प्रकार वे ब्राह्मण किसी दूसरे कार्यको सिद्ध करनेकी इच्छासे आपका दर्शन चाहते

हैं ॥ ६ ॥ हित्वा त्वद्दर्शनं किंचिद् विघ्नं न प्रतिपालयेत् । तुल्योऽप्यभिजने जातो न कश्चित् पर्युपासते ॥ ७ ॥ वे आपका दर्शन छोड़कर दूसरी किसी वस्तुको विघ्न समझते हैं; अतः वह विघ्न उन्हें नहीं प्राप्त होना चाहिये। उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ आपके समान कोई सद्गृहस्थ अतिथिकी उपेक्षा करके घरमें नहीं बैठता है ॥ ७ ॥

तद्रोषं सहजं त्यक्त्वा त्वमेनं द्रष्टुमर्हसि । आशाच्छेदेन तस्याद्य नात्मानं दग्धुमर्हसि ॥ ८ ॥ अतः आप अपने सहज रोषको त्यागकर इन ब्राह्मणदेवताका दर्शन कीजिये। आज इनकी आशा भंग करके अपने-आपको भस्म न कीजिये ॥ ८ ॥

आशया ह्यभिपन्नानामकृत्वाश्रुप्रमार्जनम् । राजा वा राजपुत्रो वा भ्रूणहत्यैव युज्यते ॥ ९ ॥ जो आशा लगाकर अपनी शरणमें आये हों, उनके आँसू जो नहीं पोंछता है, वह राजा हो या राजकुमार, उसे भ्रूणहत्याका पाप लगता है ॥ ९ ॥

मौने ज्ञानफलावाप्तिर्दानेन च यशो महत् । वाग्मित्वं सत्यवाक्येन परत्र च महीयते ॥ १० ॥ मौन रहनेसे ज्ञानरूपी फलकी प्राप्ति होती है, दान देनेसे महान् यशकी वृद्धि होती है। सत्य बोलनेसे वाणीकी पटुता और परलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ॥

भूप्रदानेन च गतिं लभत्याश्रमसम्मिताम् । न्याय्यस्यार्थस्य सम्प्राप्तिं कृत्वा फलमुपाश्नुते ॥ ११ ॥ भूदान करनेसे मनुष्य आश्रम-धर्मके पालनके समान उत्तम गति पाता है। न्यायपूर्वक धनका उपार्जन करके पुरुष श्रेष्ठ फलका भागी होता है ॥ ११ ॥

अभिप्रेतामसंश्लिष्टां कृत्वा चात्महितां क्रियाम् । न याति निरयं कश्चिदिति धर्मविदो विदुः ॥ १२ ॥ अपनी रुचिके अनुकूल कर्म भी यदि पापके सम्पर्कसे रहित और अपने लिये हितकर हो तो उसे करके कोई भी नरकमें नहीं पड़ता है। ऐसा धर्मज्ञ पुरुष जानते हैं ॥ १२ ॥

नाग उवाच

अभिमानैर्न मानो मे जातिदोषेण वै महान् । रोषः संकल्पजः साध्वि दग्धो वागग्निना त्वया ॥ १३ ॥ **नागने कहा—**साध्वि! मुझमें अहंकारके कारण अभिमान नहीं है; अपितु जाति-दोषके कारण महान् रोष भरा हुआ है। मेरे उस संकल्पजनित रोषको अब तुमने अपनी वाणीरूप अग्निसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ १३ ॥

न च रोषादहं साध्वि पश्येयमधिकं तमः । तस्य वक्तव्यतां यान्ति विशेषेण भुजङ्गमाः ॥ १४ ॥ पतिव्रते! मैं रोषसे बढ़कर मोहमें डालनेवाला दूसरा कोई दोष नहीं देखता और क्रोधके लिये सर्प ही अधिक बदनाम हैं ॥ १४ ॥

रोषस्य हि वशं गत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् । तथा शक्रप्रतिस्पर्धी हतो रामेण संयुगे ॥ १५ ॥ इन्द्रसे भी टक्कर लेनेवाला प्रतापी दशानन रावण रोषके ही अधीन होकर युद्धमें श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे मारा गया ॥ १५ ॥

अन्तःपुरगतं वत्सं श्रुत्वा रामेण निर्हृतम् । धर्षणारोषसंविग्नाः कार्तवीर्यसुता हताः ॥ १६ ॥ ‘होमधेनुके बछड़ेका अपहरण करके उसे राजाके अन्तःपुरमें रख दिया गया है’ ऐसा सुनकर परशुरामजीने तिरस्कारजनक रोषसे भरे हुए कार्तवीर्य-पुत्रोंको मार डाला ॥ १६ ॥

जामदग्न्येन रामेण सहस्रनयनोपमः । संयुगे निहतो रोषात् कार्तवीर्यो महाबलः ॥ १७ ॥ महाबली राजा कार्तवीर्य अर्जुन इन्द्रके समान पराक्रमी था; परंतु रोषके ही कारण जमदग्निनन्दन परशुरामके द्वारा युद्धमें मारा गया ॥ १७ ॥

तदेष तपसां शत्रुः श्रेयसां विनिपातकः । निगृहीतो मया रोषः श्रुत्वैवं वचनं तव ॥ १८ ॥ इसलिये आज तुम्हारी बात सुनकर ही तपस्याके शत्रु और कल्याणमार्गसे भ्रष्ट करनेवाले इस क्रोधको मैंने काबूमें कर लिया है ॥ १८ ॥

आत्मानं च विशेषेण प्रशंसाम्यनपायिनी । यस्य मे त्वं विशालाक्षि भार्या गुणसमन्विता ॥ १९ ॥ विशाललोचने! मैं अपनी एवं अपने सौभाग्यकी विशेषरूपसे प्रशंसा करता हूँ, जिसे तुम-जैसी सद्गुणवती तथा कभी विलग न होनेवाली पत्नी प्राप्त हुई है ॥ १९ ॥

एष तत्रैव गच्छामि यत्र तिष्ठत्यसौ द्विजः । सर्वथा चोक्तवान् वाक्यं स कृतार्थः प्रयास्यति ॥ २० ॥ यह लो, अब मैं वहीं जाता हूँ, जहाँ वे ब्राह्मण देवता विराजमान हैं। वे जो कहेंगे वही करूँगा। वे सर्वथा कृतार्थ होकर यहाँसे जायेंगे ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६० ॥

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३६१-

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एकषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नागराज और ब्राह्मणका परस्पर मिलन तथा बातचीत

भीष्म उवाच

स पन्नगपतिस्तत्र प्रययौ ब्राह्मणं प्रति ।
तमेव मनसा ध्यायन् कार्यवत्तां विचारयन् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! यह कहकर नागराज मन-ही-मन उस ब्राह्मणके कार्यका विचार करते हुए उसके पास गये ॥ १ ॥
तमतिक्रम्य नागेन्द्रो मतिमान् स नरेश्वर ।
प्रोवाच मधुरं वाक्यं प्रकृत्या धर्मवत्सलः ॥ २ ॥
नरेश्वर! उसके निकट पहुँचकर बुद्धिमान् नागेन्द्र, जो स्वभावसे ही धर्मानुरागी थे, मधुर वाणीमें बोले— ॥

भो भोः क्षाम्याभिभाषे त्वां न रोषं कर्तुमर्हसि ।
इह त्वमभिसम्प्राप्तः कस्यार्थे किं प्रयोजनम् ॥ ३ ॥
‘हे ब्राह्मणदेव! आप मेरे अपराधोंको क्षमा करें। मुझपर रोष न करें। मैं आपसे पूछता हूँ कि आप यहाँ किसके लिये आये हैं? आपका क्या प्रयोजन है? ॥ ३ ॥
आभिमुख्यादभिक्रम्य स्नेहात् पृच्छामि ते द्विज ।
विविक्ते गोमतीतीरे कं वा त्वं पर्युपाससे ॥ ४ ॥
‘ब्रह्मन्! मैं आपके सामने आकर प्रेमपूर्वक पूछता हूँ कि गोमतीके इस एकान्त तटपर आप किसकी उपासना करते हैं?’ ॥ ४ ॥

ब्राह्मण उवाच

धर्मारण्यं हि मां विद्धि नागं द्रष्टुमिहागतम् ।
पद्मनाभं द्विजश्रेष्ठ तत्र मे कार्यमाहितम् ॥ ५ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! आपको विदित हो कि मेरा नाम धर्मारण्य है। मैं नागराज पद्मनाभका दर्शन करनेके लिये यहाँ आया हूँ। उन्हींसे मुझे कुछ काम है ॥ ५ ॥
तस्य चाहमसांनिध्ये श्रुतवानस्मि तं गतम् ।
स्वजनात् तं प्रतीक्षामि पर्जन्यमिव कर्षकः ॥ ६ ॥
उनके स्वजनोंसे मैंने सुना है कि वे यहाँसे दूर गये हुए हैं, अतः जैसे किसान वर्षाकी राह देखता है, उसी तरह मैं भी उनकी बाट जोहता हूँ ॥ ६ ॥
तस्य चाक्लेशकरणं स्वस्तिकारसमाहितम् ।
आवर्तयामि तद् ब्रह्म योगयुक्तो निरामयः ॥ ७ ॥
उन्हें कोई क्लेश न हो। वे सकुशल घर लौटकर आ जायँ, इसके लिये नीरोग एवं योगयुक्त होकर मैं वेदोंका पारायण कर रहा हूँ ॥ ७ ॥

नाग उवाच

अहो कल्याणवृत्तस्त्वं साधुः सज्जनवत्सलः ।
अवाच्यस्त्वं महाभाग परं स्नेहेन पश्यसि ॥ ८ ॥
**नागने कहा—**महाभाग! आपका आचरण बड़ा ही कल्याणमय है। आप बड़े ही साधु हैं और सज्जनोंपर स्नेह रखते हैं। किसी भी दृष्टिसे आप निन्दनीय नहीं हैं; क्योंकि दूसरोंको स्नेहदृष्टिसे देखते हैं ॥ ८ ॥
अहं स नागो विप्रर्षे यथा मां विन्दते भवान् ।
आज्ञापय यथा स्वैरं किं करोमि प्रियं तव ॥ ९ ॥
ब्रह्मर्षे! मैं ही वह नाग हूँ, जिससे आप मिलना चाहते हैं। आप मुझे जैसा जानते हैं, मैं वैसा ही हूँ। इच्छानुसार आज्ञा दीजिये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? ॥ ९ ॥
भवन्तं स्वजनादस्मि सम्प्राप्तं श्रुतवानहम् ।

अतस्त्वां स्वयमेवाहं द्रष्टुमभ्यागतो द्विज ॥ १० ॥
ब्रह्मन्! अपने स्वजन (पत्नी) से मैंने आपके आगमनका समाचार सुना है; इसलिये स्वयं ही आपका दर्शन करनेके लिये चला आया हूँ ॥ १० ॥
सम्प्राप्तश्च भवानद्य कृतार्थः प्रतियास्यति ।
विस्रब्धो मां द्विजश्रेष्ठ विषये योक्तुमर्हसि ॥ ११ ॥
द्विजश्रेष्ठ! जब आप यहाँतक आ गये हैं, तब अब कृतार्थ होकर ही यहाँसे लौटेंगे; अतः बेखटके मुझे अपने अभीष्ट कार्यके साधनमें लगाइये ॥ ११ ॥
वयं हि भवता सर्वे गुणक्रीता विशेषतः ।
यस्त्वमात्महितं त्यक्त्वा मामेवेहानुरुध्यसे ॥ १२ ॥
आपने हम सब लोगोंको विशेषरूपसे अपने गुणोंसे खरीद लिया है; क्योंकि आप अपने हितकी बातको अलग रखकर मेरे ही कल्याणका चिन्तन कर रहे हैं ॥ १२ ॥

ब्राह्मण उवाच
आगतोऽहं महाभाग तव दर्शनलालसः ।
कंचिदर्थमनर्थज्ञः प्रष्टुकामो भुजङ्गम ॥ १३ ॥
**ब्राह्मणने कहा—**महाभाग नागराज! मैं आपहीके दर्शनकी लालसासे यहाँ आया हूँ। आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, जिसे मैं स्वयं नहीं जानता हूँ ॥ १३ ॥
अहमात्मानमात्मस्थो मार्गमाणोऽऽत्मनो गतिम् ।
वासार्थिनं महाप्रज्ञं चलच्चित्तमुपास्मि ह ॥ १४ ॥
मैं विषयोंसे निवृत्त हो अपने-आपमें ही स्थित रहकर जीवात्माओंकी परमगतिस्वरूप परब्रह्म परमात्माकी खोज कर रहा हूँ, तो भी महान् बुद्धियुक्त गृहमें आसक्त हुए इस चंचल चित्तकी उपासना करता हूँ (अतः मैं न तो आसक्त हूँ और न विरक्त ही हूँ) ॥ १४ ॥
प्रकाशितस्त्वं स्वगुणैर्यशोगर्भर्गभस्तिभिः ।
शशाङ्ककरसंस्पर्शैर्हृद्यैरात्मप्रकाशितैः ॥ १५ ॥
आप चन्द्रमाकी किरणोंकी भाँति सुखद स्पर्शवाले और स्वतः प्रकाशित होनेवाले सुयशरूपी किरणोंसे युक्त अपने मनोरम गुणोंसे ही प्रकाशमान हैं ॥ १५ ॥
तस्य मे प्रश्नमुत्पन्नं छिन्धि त्वमनिलाशन ।
पश्चात् कार्यं वदिष्यामि श्रोतुमर्हति तद् भवान् ॥ १६ ॥
पवनाशन! इस समय मेरे मनमें एक नया प्रश्न उठा है। पहले इसका समाधान कीजिये। उसके बाद मैं आपसे अपना कार्य निवेदन करूँगा और आप उसे ध्यानसे सुनियेगा ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
एकषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६१ ।।

३६२-

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द्विषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नागराजका ब्राह्मणके पूछनेपर सूर्यमण्डलकी आश्चर्यजनक घटनाओंको सुनाना

ब्राह्मण उवाच

विवस्वतो गच्छति पर्ययेण
 वोढुं भवांस्तं रथमेकचक्रम्।
आश्चर्यभूतं यदि तत्र किंचिद्
 दृष्टं त्वया शंसितुमर्हसि त्वम्॥ १॥
ब्राह्मणने कहा— नागराज! आप सूर्यके एक पहियेके रथको खींचनेके लिये बारी-बारीसे जाया करते हैं। यदि वहाँ कोई आश्चर्यजनक बात आपने देखी हो तो उसे बतानेकी कृपा करें॥ १॥

नाग उवाच

आश्चर्याणामनेकानां प्रतिष्ठा भगवान् रविः।
यतो भूताः प्रवर्तन्ते सर्वे त्रैलोक्यसम्मताः॥ २॥
नागने कहा— ब्रह्मन्! भगवान् सूर्य तो अनेकानेक आश्चर्योंके स्थान हैं; क्योंकि तीनों लोकोंमें जितने भी प्राणी हैं, वे सब उन्हींसे प्रेरित होकर अपने-अपने कार्योंमें प्रवृत्त होते हैं॥ २॥

यस्य रश्मिसहस्रेषु शाखास्विव विहंगमाः।
वसन्त्याश्रित्य मुनयः संसिद्धा दैवतैः सह॥ ३॥
जैसे वृक्षकी शाखाओंपर बहुत-से पक्षी बसेरा लेते हैं, उसी प्रकार सूर्यदेवकी सहस्रों किरणोंका आश्रय ले देवताओंसहित सिद्ध और मुनि निवास करते हैं॥ ३॥

यतो वायुर्विनिःसृत्य सूर्यरश्म्याश्रितो महान्।
विजृम्भत्यम्बरे तत्र किमाश्चर्यमतः परम्॥ ४॥
महान् वायुदेव सूर्यमण्डलसे निकलकर सूर्यकी किरणोंका आश्रय ले समूचे आकाशमें फैल जाते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा?॥ ४॥

विभज्य तं तु विप्रर्षे प्रजानां हितकाम्यया।
तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम्॥ ५॥
ब्रह्मर्षे! प्रजाके हितकी कामनासे भगवान् सूर्य उस वायुको अनेक भागोंमें विभक्त करके वर्षा-ऋतुमें जो जलकी वृष्टि करते हैं, उससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा?॥ ५॥

यस्य मण्डलमध्यस्थो महात्मा परमत्विषा।

दीप्तः समीक्षते लोकान् किमाश्चर्यमतः परम् ।। ६ ।। सूर्यमण्डलके मध्यमें उसके अन्तर्यामी महात्मा सूर्यदेव अपनी उत्तम प्रभासे प्रकाशित होते हुए समस्त लोकोंका निरीक्षण करते हैं, उससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा? ।। ६ ।। शुक्रो नामासितः पादो यश्च वारिधरोऽम्बरे । तोयं सृजति वर्षासु किमाश्चर्यमतः परम् ।। ७ ।। शुक्र नामक काला मेघ, जो आकाशमें वर्षाके समय जल उत्पन्न करता है, वह इस सूर्यका ही स्वरूप है। इससे बढ़कर और क्या आश्चर्य होगा? ।। ७ ।। योऽष्टमासांस्तु शुचिना किरणेनोक्षितं पयः । प्रत्यादत्ते पुनः काले किमाश्चर्यमतः परम् ।। ८ ।। सूर्यदेव बरसातमें पृथ्वीपर जो पानी बरसाते हैं, उसे अपनी विशुद्ध किरणोंद्वारा आठ महीनेमें पुनः खींच लेते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या होगी? ।। यस्य तेजोविशेषेषु स्वयमात्मा प्रतिष्ठितः । यतो बीजं मही चेयं धार्यते सचराचरा ।। ९ ।। यत्र देवो महाबाहुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः । अनादिनिधनो विप्र किमाश्चर्यमतः परम् ।। १० ।। विप्रवर! जिन सूर्यदेवके विशिष्ट तेजमें साक्षात् परमात्माका निवास है, जिनसे नाना प्रकारके बीज उत्पन्न होते हैं, जिनके ही सहारे चराचर प्राणियोंसहित यह समस्त पृथ्वी टिकी हुई है तथा जिनके मण्डलमें आदि-अन्तरहित महाबाहु सनातन पुरुषोत्तम भगवान् नारायण विराजमान हैं, उनसे बढ़कर आश्चर्यकी वस्तु और क्या हो सकती है? ।। ९-१० ।। आश्चर्याणामिवाश्चर्यमिदमेकं तु मे शृणु । विमले यन्मया दृष्टमम्बरे सूर्यसंश्रयात् ।। ११ ।। किंतु इन सब आश्चर्योंमें भी एक परम आश्चर्यकी यह बात जो मैंने सूर्यके सहारे निर्मल आकाशमें अपनी आँखों देखी है, उसे बता रहा हूँ—सुनिये ।। ११ ।। पुरा मध्याह्नसमये लोकांस्तपति भास्करे । प्रत्यादित्यप्रतीकाशः सर्वतः समदृश्यत ।। १२ ।। पहलेकी बात है, एक दिन मध्याह्नकालमें भगवान् भास्कर सम्पूर्ण लोकोंको तपा रहे थे। उसी समय दूसरे सूर्यके समान एक तेजस्वी पुरुष दिखायी दिया, जो सब ओरसे प्रकाशित हो रहा था ।। १२ ।। स लोकांस्तेजसा सर्वान् स्वभासा निर्विभासयन् । आदित्याभिमुखोऽभ्येति गगनं पाटयन्निव ।। १३ ।। वह अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करता हुआ मानो आकाशको चीरकर सूर्यकी ओर बढ़ा आ रहा था ।। १३ ।। हुताहुतिरिव ज्योतिर्व्याप्य तेजोमरीचिभिः ।

अनिर्देश्येन रूपेण द्वितीय इव भास्करः ॥ १४ ॥ घीकी आहुति डालनेसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान वह अपनी तेजोमयी किरणोंसे समस्त ज्योति-र्मण्डलको व्याप्त करके अनिर्वचनीयरूपसे द्वितीय सूर्यकी भाँति देदीप्यमान होता था ॥ १४ ॥

तस्याभिगमनप्राप्तौ हस्तौ दत्तौ विवस्वता । तेनापि दक्षिणो हस्तो दत्तः प्रत्यर्चितार्थिना ॥ १५ ॥ जब वह निकट आया, तब भगवान् सूर्यने उसके स्वागतके लिये अपनी दोनों भुजाएँ उसकी ओर बढ़ा दीं। उसने भी उनके सम्मानके लिये अपना दाहिना हाथ उनकी ओर बढ़ा दिया ॥ १५ ॥

ततो भित्त्वैव गगनं प्रविष्टो रश्मिमण्डलम् । एकीभूतं च तत् तेजः क्षणेनादित्यतां गतम् ॥ १६ ॥ तत्पश्चात् आकाशको भेदकर वह सूर्यकी किरणोंके समूहमें समा गया और एक ही क्षणमें तेजोरशिके साथ एकाकार होकर सूर्यस्वरूप हो गया ॥ १६ ॥

तत्र नः संशयो जातस्तयोस्तेजःसमागमे । अनयोः को भवेत् सूर्यो रथस्थो योऽद्यमागतः ॥ १७ ॥ उस समय उन दोनों तेजोंके मिल जानेपर हमलोगोंके मनमें यह संदेह हुआ कि इन दोनोंमें असली सूर्य कौन थे? जो उस रथपर बैठे हुए थे वे, अथवा जो अभी पधारे थे वे? ॥ १७ ॥

ते वयं जातसंदेहाः पर्यपृच्छामहे रविम् । क एष दिवमाक्रम्य गतः सूर्य इवापरः ॥ १८ ॥ ऐसी शंका होनेपर हमने सूर्यदेवसे पूछा—‘भगवन्! ये जो दूसरे सूर्यके समान आकाशको लाँघकर यहाँतक आये थे, कौन थे?’ ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने द्विषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका उपाख्यानविषयक तीन सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६२ ॥