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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

तेजसा यशसा चैव युक्तो भवति निर्मलः ॥ १९६ ॥
इतना ही नहीं, वह इसी शरीरसे भगवान् शिवके गणोंकी समानता प्राप्त कर लेता है तथा तेज और यशसे सम्पन्न होकर निर्मल हो जाता है ॥ १९६ ॥
न राक्षसाः पिशाचा वा न भूता न विनायकाः ।
विघ्नं कुर्युगृहे तस्य यत्रायं पठ्यते स्तवः ॥ १९७ ॥
जिसके यहाँ इस स्तोत्रका पाठ होता है, उसके घरमें राक्षस, पिशाच, भूत और विनायक कभी कोई विघ्न नहीं करते हैं ॥ १९७ ॥
शृणुयाच्चैव या नारी तद्भक्ता ब्रह्मचारिणी ।
पितृपक्षे भर्तृपक्षे पूज्या भवति देववत् ॥ १९८ ॥
जो नारी भगवान् शंकरमें भक्तिभाव रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करती हुई इस स्तोत्रको सुनती है, वह पितृकुल और पतिकुलमें देवताके समान आदरणीय होती है ॥ १९८ ॥
शृणुयाद् यः स्तवं कृत्स्नं कीर्तयेद् वा समाहितः ।
तस्य सर्वाणि कर्माणि सिद्धिं गच्छन्त्यभीक्ष्णशः ॥ १९९ ॥
जो एकाग्रचित्त होकर इस सम्पूर्ण स्तोत्रको सुनता अथवा पढ़ता है, उसके सारे कार्य सदा ही सिद्ध होते रहते हैं ॥ १९९ ॥
मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचानुकीर्तितम् ।
सर्वं सम्पद्यते तस्य स्तवस्यास्यानुकीर्तनात् ॥ २०० ॥
वह मनसे जिस वस्तुके लिये चिन्तन करता है अथवा वाणीसे जिस मनोरथकी याचना करता है, उसका वह सारा अभीष्ट इस स्तोत्रके बार-बार पाठसे सिद्ध हो जाता है ॥ २०० ॥
देवस्य च गुहस्यापि देव्या नन्दीश्वरस्य च ।
बलिं सुविहितं कृत्वा दमेन नियमेन च ॥ २०१ ॥
ततस्तु युक्तो गृह्णीयान्नामान्याशु यथाक्रमम् ।
ईप्सितान् लभते सोऽर्थान् भोगान् कामांश्च मानवः ॥ २०२ ॥
मृतश्च स्वर्गमाप्नोति तिर्यक्षु च न जायते ।
इत्याह भगवान् व्यासः पराशरसुतः प्रभुः ॥ २०३ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह इन्द्रियोंको संयममें रखकर शौच-संतोष आदि नियमोंका पालन करते हुए महादेवजी, कार्तिकेय, पार्वतीदेवी और नन्दिकेश्वरको विधिपूर्वक पूजोपहार समर्पित करे, फिर एकाग्रचित्त होकर क्रमशः इन सहस्र नामोंका पाठ करे। ऐसा करनेसे मनुष्य शीघ्र ही मनोवाञ्छित पदार्थों, भोगों और कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा मृत्युके पश्चात् स्वर्गमें जाता है। उसे पशु-पक्षी आदिकी योनिमें जन्म नहीं लेना पड़ता है। इस प्रकार सर्वसमर्थ पराशरनन्दन भगवान् व्यासजीने इस स्तोत्रका माहात्म्य बतलाया है ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दक्षप्रोक्तशिवसहस्रनामस्तवे चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दक्षद्वारा कथित शिवसहस्रनामस्तोत्रविषयक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८४ ॥

अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन

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पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

अध्यात्मज्ञानका और उसके फलका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह विद्यते ।
यदध्यात्मं यतश्चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! शास्त्रमें पुरुषके लिये जो यह अध्यात्मतत्त्व बताया गया है, वह अध्यात्म क्या है और उसकी उत्पत्ति कहाँसे हुई है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

सर्वज्ञानं परं बुद्ध्या यन्मां त्वमनुपृच्छसि ।
तद् व्याख्यास्यामि ते तात तस्य व्याख्यामिमां शृणु ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— तात! तुम मुझसे जिस अध्यात्मतत्त्वको पूछ रहे हो, वह बुद्धिके द्वारा सभी विषयोंका उत्तम ज्ञान प्रदान करनेवाला है। मैं तुमसे उसकी व्याख्या करूँगा, तुम उस व्याख्याको ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।
महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ॥ ३ ॥
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये पाँच महाभूत समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ॥ ३ ॥

स तेषां गुणसंघातः शरीरं भरतर्षभ ।
सततं हि प्रलीयन्ते गुणास्ते प्रभवन्ति च ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! प्राणियोंका शरीर उन्हीं पाँचों महाभूतोंका कार्यसमूह है। वे कार्यरूपमें परिणत भूतगण सदा लीन होते और प्रकट होते रहते हैं ॥ ४ ॥

ततः सृष्टानि भूतानि तानि यान्ति पुनः पुनः ।
महाभूतानि भूतेभ्य ऊर्मयः सागरे यथा ॥ ५ ॥
जैसे महाभूत सूक्ष्म भूतोंसे प्रकट होते और उन्हींमें लयको प्राप्त होते हैं; तथा जैसे लहरें समुद्रसे प्रकट होकर फिर उसीमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार परमात्मासे समस्त प्राणी उत्पन्न होते और पुनः उसीमें लीन हो जाते हैं ॥ ५ ॥

प्रसारयित्वेहाङ्गानि कूर्मः संहरते यथा ।
तद्वद् भूतानि भूतानामल्पीयांसि स्थवीयसाम् ॥ ६ ॥

जैसे कछुआ यहाँ अपने अंगोंको फैलाकर फिर समेट लेता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंके शरीर आकाश आदि पाँच महाभूतोंसे उत्पन्न होते और फिर उन्हींमें लीन हो जाते हैं॥ ६ ॥ आकाशात् खलु यो घोषः संघातस्तु महीगुणः । वायोःप्राणो रसस्त्वद्भ्यो रूपं तेजस उच्यते ॥ ७ ॥ शरीरमें जो शब्द होता है, वह आकाशका गुण है। यह स्थूल शरीर पृथिवीका गुण या कार्य है। प्राण वायुका, रस जलका तथा रूप तेजका गुण बताया जाता है॥ ७ ॥ इत्येतन्मयमेवैतत् सर्वं स्थावरजङ्गमम् । प्रलये च तमभ्येति तस्मादुद्दिश्यते पुनः ॥ ८ ॥ इस प्रकार यह समस्त स्थावर-जङ्गम शरीर पञ्चभूतमय ही है। प्रलयकालमें यह परमात्मामें ही लीन होता है और सृष्टिके आरम्भमें पुनः उन्हींसे प्रकट हो जाता है॥ महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत् । विषयान् कल्पयामास यस्मिन् यदनुपश्यति ॥ ९ ॥ सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले ईश्वरने समस्त प्राणियोंमें पञ्चमहाभूतोंका ही विभागपूर्वक समावेश किया है। देहके भीतर जिस भूतके स्थित होनेसे मनुष्य जो कार्य देखता है, वह बताता हूँ; सुनो॥ ९ ॥ शब्दश्रोत्रे तथा खानि त्रयमाकाशयोनिजम् । रसः स्नेहश्च जिह्वा च अपामेते गुणाः स्मृताः ॥ १० ॥ शब्द, श्रोत्रेन्द्रिय और सम्पूर्ण छिद्र—ये तीन आकाशके कार्य हैं। रस, स्नेह तथा जिह्वा—ये तीनों जलके गुण या कार्य माने गये हैं॥ १० ॥ रूपं चक्षुर्विपाकश्च त्रिविधं ज्योतिरुच्यते । घ्रेयं घ्राणं शरीरं च एते भूमिगुणाः स्मृताः ॥ ११ ॥ रूप, नेत्र और परिपाक—इन तीन गुणोंके रूपमें तेजकी ही स्थिति बतायी जाती है। गन्ध, घ्राण तथा शरीर—ये तीनों भूमिके गुण माने गये हैं॥ ११ ॥ प्राणः स्पर्शश्च चेष्टा च वायोरैते गुणाः स्मृताः । इति सर्वगुणा राजन् व्याख्याताः पाञ्चभौतिकाः ॥ १२ ॥ प्राण, स्पर्श और चेष्टा—ये तीनों वायुके गुण बताये गये हैं। राजन्! इस प्रकार मैंने समस्त पाञ्चभौतिक गुणोंकी व्याख्या कर दी॥ १२ ॥ सत्त्वं रजस्तमः कालः कर्म बुद्धिश्च भारत । मनःषष्ठानि चैतेषु ईश्वरः समकल्पयत् ॥ १३ ॥ भरतनन्दन! ईश्वरने इन प्राणियोंके शरीरोंमें सत्त्व, रज, तम, काल, कर्म, बुद्धि तथा मनसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंकी कल्पना की है॥ १३ ॥ यदूर्ध्वं पादतलयोरवाङ् मूर्ध्नश्च पश्यसि ।

एतस्मिन्नेव कृत्स्नेयं वर्तते बुद्धिरन्तरे ॥ १४ ॥
पैरोंके तलुओंसे लेकर ऊपरकी ओर और मस्तकसे नीचेकी ओर जितना भी शरीर है, इसके भीतर यह बुद्धि पूर्णरूपसे व्याप्त हो रही है ॥ १४ ॥

इन्द्रियाणि नरे पञ्च षष्ठं तु मन उच्यते ।
सप्तमीं बुद्धिमेवाहुः क्षेत्रज्ञः पुनरष्टमः ॥ १५ ॥
मानव-शरीरमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और छठा मन बताया जाता है। बुद्धिको सातवीं और क्षेत्रज्ञको आठवाँ कहते हैं ॥ १५ ॥

इन्द्रियाणि च कर्ता च विचेतव्यानि भागशः ।
तमः सत्त्वं रजश्चैव तेऽपि भावास्तदाश्रयाः ॥ १६ ॥
पाँच इन्द्रियाँ और जीवात्मा—इन सबको कार्य-विभागके अनुसार अलग-अलग समझना चाहिये। सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण तथा उनके सात्त्विक, राजस और तामस भाव जीवात्माके ही आश्रित हैं ॥ १६ ॥

चक्षुरालोचनायैव संशयं कुरुते मनः ।
बुद्धिरध्यवसानाय साक्षी क्षेत्रज्ञ उच्यते ।
तमः सत्त्वं रजश्चेति कालः कर्म च भारत ॥ १७ ॥
गुणैर्नेनीयते बुद्धिर्बुद्धिरेवेन्द्रियाणि च ।
मनःषष्ठानि सर्वाणि बुद्ध्याभावे कुतो गुणाः ॥ १८ ॥
नेत्र आदि इन्द्रियाँ दर्शन आदि कार्योंके लिये हैं। मन संशय करता है और बुद्धि उस विषयका ठीक-ठीक निश्चय करनेके लिये है। क्षेत्रज्ञ (आत्मा)-को साक्षी बताया जाता है। भरतनन्दन! सत्त्व, रज, तम, काल और कर्म—इन पाँच गुणोंद्वारा बुद्धि बार-बार विभिन्न विषयोंकी ओर ले जायी जाती है। बुद्धि मनसहित सम्पूर्ण इन्द्रियोंका संचालन करती है। यदि बुद्धि न हो तो ये गुण—इन्द्रिय आदि कैसे कोई कार्य कर सकते हैं ॥

येन पश्यति तच्चक्षुः शृण्वती श्रोत्रमुच्यते ।
जिघ्रती भवति घ्राणं रसती रसना रसान् ॥ १९ ॥
स्पर्शनं स्पर्शती स्पर्शान् बुद्धिविक्रियतेऽसकृत् ।
यदा प्रार्थयते किञ्चित् तदा भवति सा मनः ॥ २० ॥
बुद्धि जिसके द्वारा देखती है, उस इन्द्रियका नाम दृष्टि या नेत्र है। वही अपने वृत्तिविशेषके द्वारा जब सुनने लगती है, तब श्रोत्र कहलाती है। गन्धको ग्रहण करते समय वह घ्राण बन जाती है। रसास्वादन करते समय रसना कहलाती है और स्पर्शोंका अनुभव करते समय वही स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) नाम धारण करती है। इस प्रकार बुद्धि बार-बार विकृत होती है। जब वह कुछ प्रार्थना (याचना) करती है, तब मन बन जाती है ॥

अधिष्ठानानि बुद्ध्या हि पृथगेतानि पञ्चधा ।
इन्द्रियाणीति तान्याहुस्तेषु दुष्टेषु दुष्यति ॥ २१ ॥

बुद्धिके ये जो पृथक्-पृथक् पाँच अधिष्ठान हैं, इन्हींको इन्द्रिय कहते हैं। इन इन्द्रियोंके दूषित होनेपर बुद्धि भी दूषित हो जाती है ॥ २१ ॥ पुरुषे तिष्ठती बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ।
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदपि शोचति ॥ २२ ॥
साक्षी आत्माके आश्रित रहनेवाली बुद्धि सात्त्विक, राजस और तामस तीन भावोंमें (जो सुख-दुःख और मोहरूप हैं) स्थित होती है, इसीलिये कभी (सत्त्वगुणका उद्रेक होनेपर) उसे आनन्द प्राप्त होता है और कभी (रजोगुणकी अधिकता होनेपर) वह दुःख-शोकका अनुभव करती है ॥ २२ ॥
न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते ।
सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतान् परिवर्तते ॥ २३ ॥
कभी (तमोगुणकी अधिकतासे मोहाच्छन्न होनेपर) उसका न सुखसे संयोग होता है न दुःखसे (वह निद्रा और आलस्य आदिमें मग्न रहती है)। इस प्रकार यह भावात्मिका बुद्धि इन तीन भावोंका अनुसरण करती है ॥ २३ ॥
सरितां सागरो भर्ता यथा वेलामिवोर्मिवान् ।
इति भावगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते ॥ २४ ॥
जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र उत्ताल तरंगोंसे युक्त होनेपर भी अपनी तटभूमिका उल्लंघन नहीं करता है, उसी प्रकार सात्त्विक आदि भावोंसे युक्त बुद्धि तीनों गुणोंका उल्लंघन नहीं करती। भावनामय मनमें ही चक्कर लगाती रहती है ॥ २४ ॥
प्रवर्तमानं तु रजस्तद्भावेनानुवर्तते ।
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता ॥ २५ ॥
कथंचिदुपपद्यन्ते पुरुषे सात्त्विका गुणाः ।
जब रजोगुणकी प्रवृत्ति होती है तब बुद्धि राजसिक भावका अनुसरण करती है। यदि पुरुषमें किसी प्रकार अधिक हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्तमें शान्ति उपलब्ध हो तो ये सात्त्विक गुण हैं ॥ २५½ ॥
परिदाहस्तथा शोकः संतापोऽपूर्तिरक्षमा ॥ २६ ॥
लिङ्गानि रजसस्तानी दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः ।
जब शरीर या मनमें किसी कारणसे या अकारण ही दाह, शोक, संताप, अपूर्णता (लोभ-लिप्सा) और असहनशीलताके भाव दिखायी देते हों तो उन्हें रजोगुणके चिह्न समझना चाहिये ॥ २६½ ॥
अविद्या रागमोहौ च प्रमादः स्तब्धता भयम् ॥ २७ ॥
असमृद्धिस्तथा दैन्यं प्रमोहः स्वप्नतन्द्रिता ।
कथंचिदुपवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥ २८ ॥

यदि किसी प्रकार अविद्या, राग, मोह, प्रमाद, स्तब्धता, भय, दरिद्रता, दीनता, प्रमोह (मूर्च्छा), स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि दोष आ घेरते हों तो उन्हें तमोगुणके ही विविध रूप जाने ।। २७-२८ ।।

तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ।
वर्तते सात्त्विको भाव इत्युपेक्षेत तत् तथा ॥ २९ ॥
ऐसी स्थितिमें शरीर अथवा मनके भीतर यदि कोई प्रसन्नताका भाव हो तो वह सात्त्विक भाव है, ऐसा विचार करना चाहिये ।। २९ ।।

अथ यद् दुःखसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः ।
प्रवृत्तं रज इत्येव तदसंरभ्य चिन्तयेत् ॥ ३० ॥
जब अपने लिये अप्रसन्नताका हेतु और दुःखयुक्त भाव अनुभवमें आये तब रजोगुणकी प्रवृत्ति हुई है—ऐसा अपने मनमें विचार करे तथा वैसे किसी कार्यका आरम्भ न करके उसकी ओरसे अपना ध्यान हटा ले ।।

अथ यन्मोहसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ ३१ ॥
इसी प्रकार शरीर या मनमें जो मोहयुक्त भाव अतर्कित या अविज्ञातरूपसे उपस्थित हो गया हो, उसके विषयमें यही निश्चय करे कि यह तमोगुण है ।। ३१ ।।

इति बुद्धिगतीः सर्वा व्याख्याता यावतीरिह ।
एतद् बुद्ध्वा भवेद् बुद्धः किमन्यद् बुद्धलक्षणम् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार बुद्धिकी जितनी अवस्थाएँ हैं उनकी व्याख्या यहाँ कर दी गयी। यह सब जानकर मनुष्य ज्ञानी हो जाता है। इसके सिवा ज्ञानीका और क्या लक्षण हो सकता है? ।। ३२ ।।

सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं विद्धि सूक्ष्मयोः ।
सृजतेऽत्र गुणानेक एको न सृजते गुणान् ॥ ३३ ॥
बुद्धि और क्षेत्रज्ञ (आत्मा)—ये दोनों सूक्ष्मतत्त्व हैं। इन दोनोंमें जो अन्तर है, उसे समझो। इनमेंसे एक अर्थात् बुद्धि तो गुणोंकी सृष्टि करती है और दूसरा (आत्मा) गुणोंकी सृष्टि नहीं करता—केवल साक्षीभावसे देखता रहता है ।। ३३ ।।

पृथग्भूतौ प्रकृत्या तु सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा ।
यथा मत्स्योऽद्भिरन्यः स्यात् सम्प्रयुक्तो भवेत् तथा ॥ ३४ ॥
वे दोनों बुद्धि और क्षेत्रज्ञ स्वभावतः एक-दूसरेसे भिन्न हैं, परंतु सदा परस्पर मिले हुए-से प्रतीत होते हैं। जैसे मछली जलसे भिन्न है तो भी उससे सदा संयुक्त रहती है, उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा परस्पर भिन्न होते हुए भी अभिन्न रहते हैं ।। ३४ ।।

न गुणा विदुरात्मानं स गुणान् वेद सर्वतः ।
परिद्रष्टा गुणानां तु संस्रष्टा मन्यते यथा ॥ ३५ ॥

सत्त्व आदि गुण जड होनेके कारण आत्माको नहीं जानते; परंतु आत्मा चेतन है, इसलिये गुणोंको पूर्णरूपसे जानता है। वह गुणोंका साक्षी है तथापि मूढ़ मनुष्य उसे गुणोंसे संश्लिष्ट या संयुक्त समझते हैं ।। ३५ ।।

आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य गुणसर्गेण चेतना ।
सत्त्वमस्य सृजन्त्यन्ये गुणान् वेद कदाचन ।। ३६ ।।
बुद्धि जब सत्त्वादि गुणोंकी सृष्टि करती है, उस समय जीवात्मा उसका आश्रय नहीं होता। अन्य गुणोंकी रचना बुद्धि ही करती है और उन गुणोंको जीव कभी जानता है ।। ३६ ।।

सृजते हि गुणान् सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ।
सम्प्रयोगस्तयोरेष सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्ध्रुवः ।। ३७ ।।
बुद्धि गुणोंको उत्पन्न करती है और आत्मा केवल देखता है। बुद्धि और आत्माका यह सम्बन्ध अनादि है ।। ३७ ।।

इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थं क्रियते बुद्धिरन्तरा ।
निश्चक्षुर्भिरजानद्भिरिन्द्रियाणि प्रदीपवत् ।। ३८ ।।
ज्ञानशक्तिरहित न जाननेवाली इन्द्रियाँ वस्तुओंको प्रकाशित करनेके लिये बुद्धिको बीचमें करती हैं। इन्द्रियाँ तो वस्तुको प्रकट करनेमें दीपककी भाँति केवल सहायक हैं ।। ३८ ।।

एवं स्वभावमेवैतत् तद् बुद्ध्वा विहरेन्नरः ।
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च स वै विगतमत्सरः ।। ३९ ।।
इस प्रकार ‘आत्मा असंग एवं निर्लेप है’ इस बातको जानकर मनुष्य शोक, हर्ष और द्वेषका परित्याग करके विचरण करे ।। ३९ ।।

स्वभावसिद्धमेवैतद् यदिमान् सृजते गुणान् ।
ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तन्तुवद् गुणाः ।। ४० ।।
जैसे मकड़ी जाला बुनती है, उसी प्रकार बुद्धि गुणोंकी सृष्टि करती है—यह स्वभावसिद्ध है। अतएव गुणोंको जालेके समान और बुद्धिको मकड़ीके समान जानना चाहिये ।। ४० ।।

प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते प्रवृत्तिर्नोपलभ्यते ।
एवमेके व्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे ।। ४१ ।।
वे गुण नष्ट होनेपर पुनः वापस नहीं आते; क्योंकि फिर उनकी प्रवृत्ति उपलब्ध नहीं होती। एक श्रेणीके विद्वानोंका ऐसा ही निश्चय है। दूसरी श्रेणीके लोग उन नष्ट हुए गुणोंकी पुनरावृत्ति भी मानते हैं ।। ४१ ।।

इतीदं हृदयग्रन्थिं बुद्धिचिन्तामयं दृढम् ।
विमुच्य सुखमासीत विशोकश्छिन्नसंशयः ।। ४२ ।।

इस प्रकार बुद्धिकी चिन्तास्वरूप इस सुदृढ़ हृदयग्रन्थिको त्यागकर शोक और संशयसे रहित हो सुखपूर्वक रहना चाहिये ।। ४२ ।। ताम्येयुः प्रच्युताः पृथ्वीं मोहपूर्णां नदीं नराः । यथा गाधमविद्वांसो बुद्धियोगमयं तथा ।। ४३ ।। जलकी गहराईको न जाननेवाले मनुष्य जैसे नदीके तल-प्रदेशमें जाकर दुःखका अनुभव करते हैं, उसी प्रकार बुद्धियोग (ज्ञान)-से अनभिज्ञ सभी मनुष्य इस मोहपूर्ण विशाल संसारनदीमें पड़कर क्लेश भोगते हैं ।। ४३ ।। नैव ताम्यन्ति विद्वांसः प्लवन्तः पारमम्भसः । अध्यात्मविदुषो धीरा ज्ञानं तु परमं प्लवः ।। ४४ ।। जो तैरनेकी कला जानते हैं, वे तैरकर अगाध जलसे पार हो जाते हैं। उन्हें कष्ट नहीं भोगना पड़ता। उसी प्रकार अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता धीर पुरुष अनायास संसार-सागरको पार कर जाते हैं। उनके लिये परम ज्ञान ही जहाज बन जाता है ।। ४४ ।। न भवति विदुषां महद्भयं यदविदुषां सुमहद्भयं भवेत् । न हि गतिरधिकास्ति कस्यचित् सकृदुपदर्शयतीह तुल्यताम् ।। ४५ ।। अज्ञानियोंको जिस संसारसे महान् भय बना रहता है, उससे ज्ञानियोंको वह गुरुतर भय तनिक भी नहीं प्राप्त होता है। ज्ञानी पुरुषोंमेंसे किसीको भी अधिक या न्यून गति नहीं प्राप्त होती—वे सब समान गतिके भागी होते हैं। ‘सकृद्विभातो ह्येष ब्रह्मलोकः’ इत्यादि श्रुति यहाँ ज्ञानियोंकी गतिकी समानता दिखाती है ।। ४५ ।। यत् करोति बहुदोषमेकत- स्तच्च दूषयति यत्पुरा कृतम् । नाप्रियं तदुभयं करोत्यसौ यच्च दूषयति यत् करोति च ।। ४६ ।। अज्ञानावस्थामें मनुष्य जो अनेक दोषसे युक्त कर्म करता है और वह पहलेके जो कर्म कर चुका है, उनके लिये शोक करता है। इसके सिवा अज्ञानावस्थामें जो वह दूसरेके किये हुए अप्रिय कर्मको दोषरूपमें देखता है और राग आदि दोषके कारण स्वयं जो दूषित कर्म करता है, वह दोनों ही प्रकारका कार्य वह ज्ञान होनेके बाद नहीं करता है ।। ४६ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पाञ्चभौतिके पञ्चाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २८५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पाञ्चभौतिक तत्त्वोंका वर्णनविषयक दो सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २८५ ।।



समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन

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षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

समङ्गके द्वारा नारदजीसे अपनी शोकहीन स्थितिका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

शोकाद् दुःखाच्च मृत्योश्च त्रसन्ते प्राणिनः सदा ।
उभयं नो यथा न स्यात् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! संसारके सभी प्राणी सदा शोक, दुःख और मृत्युसे डरते रहते हैं; अतः आप हमें ऐसा उपदेश दें, जिससे हमलोगोंको उन दोनोंका भय न रहे ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादं समङ्गस्य च भारत ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन! इस विषयमें विद्वान् पुरुष देवर्षि नारद और समङ्गके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

नारद उवाच

उरसेव प्रणमसे बाहुभ्यां तरसीव च ।
सम्प्रहृष्टमना नित्यं विशोक इव लक्ष्यसे ॥ ३ ॥
**नारदजीने पूछा—**समङ्गजी! दूसरे लोग तो सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं; परंतु आप हृदयसे प्रणाम करते जान पड़ते हैं। मालूम होता है, आप इस संसारसागरको अपनी इन दोनों भुजाओंसे ही तैरकर पार हो जायँगे। आपका मन नित्य प्रसन्न रहता है तथा आप सदा शोकशून्य-से दिखायी देते हैं ॥ ३ ॥

उद्वेगं न हि ते किंचित् सुसूक्ष्ममपि लक्षये ।
नित्यतृप्त इव स्वस्थो बालवच्च विचेष्टसे ॥ ४ ॥
मैं आपके चित्तमें कभी कोई थोड़ा-सा भी उद्वेग नहीं देख पाता हूँ। आप नित्य तृप्तकी भाँति अपने-आपमें ही स्थित रहकर बालकोंके समान चेष्टा करते हैं (इसका क्या कारण है?) ॥ ४ ॥

समङ्ग उवाच

भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वमेतत् तु मानद ।
तेषां तत्त्वानि जानामि ततो न विमना ह्यहम् ॥ ५ ॥
**समङ्गजीने कहा—**दूसरोंको मान देनेवाले देवर्षे! मैं भूत, वर्तमान और भविष्य इन सबका स्वरूप तथा तत्त्व जानता हूँ; इसलिये मेरे मनमें कभी विषाद नहीं होता ॥ ५ ॥

उपक्रमानहं वेद पुनरेव फलोदयान् । लोके फलानि चित्राणि ततो न विमना ह्यहम् ॥ ६ ॥ मुझे कर्मोंके आरम्भका तथा उनके फलोदयकालका भी ज्ञान है और लोकमें जो भाँति-भाँतिके कर्मफल प्राप्त होते हैं, उनको भी मैं जानता हूँ; इसलिये मेरे मनमें कभी खेद नहीं होता ॥ ६ ॥

अगाधाश्चाप्रतिष्ठाश्च गतिमन्तश्च नारद । अन्धा जडाश्च जीवन्ति पश्यास्मानपि जीवतः ॥ ७ ॥ नारदजी! देखिये, जैसे जगत्में गम्भीर, अप्रतिष्ठित, प्रगतिशील, अन्धे और जड मनुष्य भी जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जी रहे हैं ॥ ७ ॥

विहितेनैव जीवन्ति अरोगाङ्गा दिवौकसः । बलवन्तोऽबलाश्चैव तस्मादस्मान् सभाजय ॥ ८ ॥ नीरोग शरीरवाले देवता, बलवान् और निर्बल सभी अपने प्रारब्ध-विधानके अनुसार जीवन धारण करते हैं; अतः हम भी प्रारब्धपर ही अवलम्बित रहकर किसी कर्मका आरम्भ नहीं करते हैं, इसलिये हमारे प्रति भी आप आदर बुद्धि रखें (अकर्मण्य समझकर हमारा निरादर न करें) ॥ ८ ॥

सहस्रिणोऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनस्तथा । शाकेन चान्ये जीवन्ति पश्यास्मानपि जीवतः ॥ ९ ॥ जिनके पास हजारों रुपये हैं, वे भी जीते हैं। जिनके पास सैकड़ों रुपयोंका संग्रह है, वे भी जीवन धारण करते हैं। दूसरे लोग सागसे ही जीवन-निर्वाह करते हैं। उसी तरह हमें भी जीवित समझिये ॥ ९ ॥

यदा न शोचेमहि किं नु नः स्याद् धर्मेण वा नारद कर्मणा वा । कृतान्तवश्यानि यदा सुखानि दुःखानि वा यन्न विधर्षयन्ति ॥ १० ॥ नारदजी! जब अज्ञान दूर हो जानेके कारण हम शोक ही नहीं करते हैं तो धर्म अथवा लौकिक कर्मसे हमारा क्या प्रयोजन है। सारे सुख और दुःख कालके अधीन होनेके कारण क्षणभंगुर हैं, अतः वे ज्ञानी पुरुषको पराभूत नहीं कर सकते हैं ॥ १० ॥

यस्मै प्राज्ञाः कथयन्ते मनुष्याः प्रज्ञामूलं हीन्द्रियाणां प्रसादः । मुह्यन्ति शोचन्ति तथेन्द्रियाणि प्रज्ञालाभो नास्ति मूढेन्द्रियस्य ॥ ११ ॥ ज्ञानी पुरुष जिसके लिये कहा करते हैं, उस प्रज्ञाकी जड़ है इन्द्रियोंकी निर्मलता। जिसकी इन्द्रियाँ मोह और शोकमें मग्न हैं, उस मोहाच्छन्न इन्द्रियवाले पुरुषको कभी

प्रज्ञाका लाभ नहीं मिल सकता ॥ ११ ॥

मूढस्य दर्पः स पुनर्मोह एव
मूढस्य नायं न परोऽस्ति लोकः ।
न ह्येव दुःखानि सदा भवन्ति
सुखस्य वा नित्यशो लाभ एव ॥ १२ ॥

मूढ़ मनुष्यको गर्व होता है। उसका वह गर्व मोहरूप ही है। मूढ़के लिये न तो यह लोक सुखद होता है ओर न परलोक ही। किसीको भी न तो सदा दुःख ही उठाने पड़ते हैं और न नित्य, निरन्तर सुखका ही लाभ होता है ॥ १२ ॥

भवात्मकं सम्परिवर्तमानं
न मादृशःसंज्वरं जातु कुर्यात् ।
इष्टान् भोगान् नानुरुध्येत् सुखं वा
न चिन्तयेद् दुःखमभ्यागतं वा ॥ १३ ॥

संसारके स्वरूपको परिवर्तित होता देख मेरे-जैसा मनुष्य कभी संताप नहीं करता है। अभीष्ट भोग अथवा सुखका भी अनुसरण नहीं करता तथा दुःख आ जाय तो उसके लिये चिन्तित नहीं होता ॥ १३ ॥

समाहितो न स्पृहयेत् परेषां
नानागतं चाभिनन्देच्च लाभम् ।
न चापि हृष्येद् विपुलेऽर्थलाभे
तथार्थनाशे च न वै विषीदेत् ॥ १४ ॥

सब प्रकारसे उपरत महापुरुष दूसरोंसे कुछ भी नहीं चाहता। भविष्यमें होनेवाले अर्थलाभका भी अभिनन्दन नहीं करता। बहुत-सी सम्पत्ति पाकर हर्षित नहीं होता तथा धनका नाश हो जानेपर भी खेद नहीं करता ॥ १४ ॥

न बान्धवा न च वित्तं न कौल्यं
न च श्रुतं न च मन्त्रा न वीर्यम् ।
दुःखात् त्रातुं सर्व एवोत्सहन्ते
परत्र शीलेन तु यान्ति शान्तिम् ॥ १५ ॥

बन्धु-बान्धव, धन, उत्तम कुल, शास्त्राध्ययन, मन्त्र तथा पराक्रम—ये सब-के-सब मिलकर भी किसीको दुःखसे छुटकारा नहीं दिला सकते हैं। परलोकमें मनुष्य उत्तम स्वभावके कारण ही शान्ति पाते हैं ॥ १५ ॥

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य नायोगाद् विन्दते सुखम् ।
धृतिश्च दुःखत्यागश्चेत्युभयं तु सुखं नृप ॥ १६ ॥

जिसका चित्त योगयुक्त नहीं है, उसे समत्व बुद्धि नहीं प्राप्त होती। योगके बिना कोई सुख नहीं पाता है। नरेश्वर! दुःखोंके सम्बन्धका त्याग और धैर्य—ये ही दोनों सुखके कारण

हैं॥ १६॥
प्रियं हि हर्षजननं हर्ष उत्सेकवर्धनः।
उत्सेको नरकायैव तस्मात् तान् संत्यजाम्यहम्॥ १७॥
प्रिय वस्तु हर्षजनक होती है। हर्ष अभिमानको बढ़ाता है और अभिमान नरकमें ही डुबानेवाला है। इसलिये मैं इन तीनोंका त्याग करता हूँ॥ १७॥
एतान् शोकभयोत्सेकान् मोहनान् सुखदुःखयोः।
पश्यामि साक्षिवल्लोके देहस्यास्य विचेष्टनात्॥ १८॥
शोक, भय और अभिमान—ये प्राणियोंको सुख-दुःखमें डालकर मोहित करनेवाले हैं; इसलिये जबतक यह शरीर चेष्टा कर रहा है, तबतक मैं इन सबको साक्षीकी भाँति देखता हूँ॥ १८॥
अर्थकामौ परित्यज्य विशोको विगतज्वरः।
तृष्णामोहौ तु संत्यज्य चरामि पृथिवीमिमाम्॥ १९॥
अर्थ और कामको त्यागकर एवं तृष्णा और मोहका सर्वथा परित्याग करके मैं शोक और संतापसे रहित हुआ इस पृथ्वीपर विचरता हूँ॥ १९॥
न च मृत्योर्न चाधर्मान्न लोभान्न कुतश्चन।
पीतामृतस्येवात्यन्तमिह वामुत्र वा भयम्॥ २०॥
जैसे अमृत पीनेवालेको मृत्युसे भय नहीं होता, उसी प्रकार मुझे भी इहलोक या परलोकमें मृत्यु, अधर्म, लोभ तथा दूसरे किसीसे भी भय नहीं है॥ २०॥
एतद् ब्रह्मन् विजानामि महत् कृत्वा तपोऽव्ययम्।
तेन नारद सम्प्राप्तो न मां शोकः प्रबाधते॥ २१॥
ब्रह्मन्! मैंने महान् और अक्षय तप करके यही ज्ञान पाया है; अतः नारदजी! शोककी परिस्थिति उपस्थित होकर भी मुझे व्याकुल नहीं कर सकती॥ २१॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि समङ्गनारदसंवादे
षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें समङ्ग और नारदजीका संवादविषयक दो सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८६॥


२८७-

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सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

नारदजीका गालव मुनिको श्रेयका उपदेश

युधिष्ठिर उवाच

अतत्त्वज्ञस्य शास्त्राणां सततं संशयात्मनः ।
अकृतव्यवसायस्य श्रेयो ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! जो शास्त्रोंके तत्त्वको नहीं जानता, जिसका मन सदा संशयमें ही पड़ा रहता है तथा जिसने परमार्थके लिये कोई निश्चित ध्येय नहीं बनाया है, उस पुरुषका कल्याण कैसे हो सकता है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

गुरुपूजा च सततं वृद्धानां पर्युपासनम् ।
श्रवणं चैव शास्त्राणां कूटस्थं श्रेय उच्यते ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! सदा गुरुजनोंकी पूजा, वृद्ध पुरुषोंकी सेवा और शास्त्रोंका श्रवण—ये तीन कल्याणके अमोघ साधन बताये जाते हैं ॥ २ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गालवस्य च संवादं देवर्षेर्नारदस्य च ॥ ३ ॥
इस विषयमें भी जानकार मनुष्य देवर्षि नारद और महर्षि गालवके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

स्वाश्रमं समनुप्राप्तं नारदं देववर्चसम् ।
वीतमोहक्लमं विप्रं ज्ञानतृप्तं जितेन्द्रियः ।
श्रेयस्कामो यतात्मानं नारदं गालवोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
एक समयकी बात है, कल्याणकी इच्छा रखनेवाले जितेन्द्रिय गालव मुनिने अपने आश्रमपर पधारे हुए देवोपम तेजस्वी ब्राह्मण, मोह और क्लान्तिसे रहित, ज्ञानानन्दसे परिपूर्ण एवं मनको वशमें रखनेवाले देवर्षि नारदजीसे इस प्रकार पूछा— ॥ ४ ॥

यैः कश्चित् सम्मतो लोके गुणैश्च पुरुषो मुने ।
भवत्यनपगान् सर्वास्तान् गुणान् लक्षयामहे ॥ ५ ॥
‘मुने! संसारमें कोई भी पुरुष जिन गुणोंद्वारा सम्मानित होता है, उन समस्त गुणोंका मैं आपमें कभी अभाव नहीं देखता हूँ ॥ ५ ॥

भवानेवंविधोऽस्माकं संशयं छेत्तुमर्हति ।
अमूढश्चिरमूढानां लोकतत्त्वमजानताम् ॥ ६ ॥

‘लोक-तत्त्वके ज्ञानसे शून्य और चिरकालसे अज्ञानमें पड़े हुए हम-जैसे लोगोंके संशयका निवारण सर्वगुणसम्पन्न आप-जैसा ज्ञानी महात्मा ही कर सकता है ।। ६ ।।

ज्ञाने ह्येवं प्रवृत्तिः स्यात् कार्याणामविशेषतः ।
यत् कार्यं न व्यवस्थास्तद् भवान् वक्तुमर्हति ।। ७ ।।
‘मुने! शास्त्रोंमें बहुत-से कर्तव्यकर्म बताये गये हैं, उनमेंसे अमुक कर्मके इस प्रकार करनेसे ज्ञानमार्गमें प्रवृत्ति हो सकती है, इसका विशेषरूपसे हमें निश्चय नहीं हो पाता है; अतः हमारे लिये जो कर्तव्य हो और जिसका निर्धारण हम न कर पाते हों, उसे आप ही हमें बतानेकी कृपा करें ।। ७ ।।

भगवन्नाश्रमाः सर्वे पृथगाचारदर्शिनः ।
इदं श्रेय इदं श्रेय इति सर्वे प्रबोधिताः ।। ८ ।।
‘भगवन्! सभी आश्रमोंवाले पृथक्-पृथक् आचारका दर्शन कराते हैं तथा ‘यह श्रेष्ठ है’ यह श्रेष्ठ है’ ऐसा उपदेश देते हुए वे (अपने ही सिद्धान्तोंकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन करते हैं और) सभी मनुष्योंकी बुद्धिमें यही बात जमा देते हैं ।। ८ ।।

तांस्तु विप्रस्थितान् दृष्ट्वा शास्त्रैः शास्त्राभिनन्दिनः ।
स्वशास्त्रैः परितुष्टांश्च श्रेयो नोपलभामहे ।। ९ ।।
‘जिनके मनमें वह बात बैठ गयी है, उन सबको उन शास्त्रोंके उपदेशके अनुसार नाना प्रकारके आचार-मार्गसे चलते और अपने-अपने शास्त्रोंका अभिनन्दन करते देखकर जैसे हम अपनी मान्यतामें संतुष्ट हैं, वैसे ही उन्हें भी संतुष्ट पाकर हमारे मनमें संशय उत्पन्न हो गया है। हम यह ठीक-ठीक निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि परम कल्याणकी प्राप्तिका सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है? ।। ९ ।।

शास्त्रं यदि भवेदेकं श्रेयो व्यक्तं भवेत् तदा ।
शास्त्रैश्च बहुभिर्भूयः श्रेयो गुह्यं प्रवेशितम् ।। १० ।।
‘यदि शास्त्र एक होता तो श्रेयकी प्राप्तिका उपाय भी एक ही होनेके कारण वह स्पष्टरूपसे समझमें आ जाता, परंतु बहुत-से शास्त्रोंने नाना प्रकारसे वर्णन करके श्रेयको गुह्य अवस्थामें पहुँचा दिया है—उसे अत्यन्त गूढ़ बना डाला है ।। १० ।।

एतस्मात् कारणाच्छ्रेयः कलिलं प्रतिभाति मे ।
ब्रवीतु भगवांस्तन्मे उपसन्नोऽस्म्यधीहि भोः ।। ११ ।।
‘इस कारणसे मुझे श्रेयका स्वरूप संशयाच्छन्न जान पड़ता है। भगवान्! अब आप ही मुझे उसका उपदेश दें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझ शिष्यको श्रेयोमार्गका बोध करायें’ ।। ११ ।।

नारद उवाच

आश्रमास्तात चत्वारो यथासंकल्पिताः पृथक् ।

तान् सर्वाननुपश्य त्वं समाश्रित्येति गालव ।। १२ ।। **नारदजीने कहा—**तात! आश्रम चार हैं और शास्त्रोंमें उनकी पृथक्-पृथक् व्यवस्था की गयी है। गालव! तुम ज्ञानका आश्रय लेकर उन सबको यथार्थरूपसे जानो ।। १२ ।। तेषां तेषां यथा हि त्वमाश्रमाणां ततस्ततः । नानारूपगुणोद्देशं पश्य विप्र स्थितं पृथक् ।। १३ ।। विप्रवर! उन-उन आश्रमोंके जो नाना प्रकारसे गुण-सम्पन्न धर्म बताये गये हैं, उनकी पृथक्-पृथक् स्थिति है। इस बातको तुम देखो और समझो ।। १३ ।। न यान्ति चैव ते सम्यगभिप्रेतमसंशयम् । अन्येऽपश्यंस्तथा सम्यगाश्रमाणां परां गतिम् ।। १४ ।। जो साधारण मनुष्य हैं, वे उन आश्रमोंके वास्तविक अभिप्रायको भलीभाँति संशयरहित नहीं जान पाते, किंतु उनसे भिन्न जो तत्त्वज्ञ हैं, वे इन आश्रमोंके परमतत्त्वको ठीक-ठीक समझते हैं ।। १४ ।। यत् तु निःश्रेयसं सम्यक् तच्चैवासंशयात्मकम् ।। १५ ।। अनुग्रहं च मित्राणाममित्राणां च निग्रहम् । संग्रहं च त्रिवर्गस्य श्रेय आहुर्मनीषिणः ।। १६ ।। जो अच्छी तरह कल्याण करनेवाला साधन होता है, वह सर्वथा संशयरहित होता है। सुहृदोंपर अनुग्रह करना, शत्रुभाव रखनेवाले दुष्टोंको दण्ड देना तथा धर्म, अर्थ और कामका संग्रह करना—इसे मनीषी पुरुष श्रेय कहते हैं ।। १५-१६ ।। निवृत्तिः कर्मणः पापात् सततं पुण्यशीलता । सद्भिश्च समुदाचारः श्रेय एतदसंशयम् ।। १७ ।। पापकर्मसे दूर रहना, निरन्तर पुण्यकर्मोंमें लगे रहना और सत्पुरुषोंके साथ रहकर सदाचारका ठीक-ठीक पालन करना—यह संशयरहित कल्याणका मार्ग है ।। मार्दवं सर्वभूतेषु व्यवहारेषु चार्जवम् । वाक् चैव मधुरा प्रोक्ता श्रेय एतदसंशयम् ।। १८ ।। सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति कोमलताका बर्ताव करना, व्यवहारमें सरल होना तथा मीठे वचन बोलना—यह भी कल्याणका संदेहरहित मार्ग है ।। १८ ।। दैवतेभ्यः पितृभ्यश्च संविभागोऽतिथिष्वपि । असंत्यागश्च भृत्यानां श्रेय एतदसंशयम् ।। १९ ।। देवताओं, पितरों और अतिथियोंको उनका भाग देना तथा भरण-पोषण करनेयोग्य व्यक्तियोंका त्याग न करना—यह कल्याणका निश्चित साधन है ।। १९ ।। सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् । यद् भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यं ब्रवीम्यहम् ।। २० ।।

सत्य बोलना भी श्रेयस्कर है; परंतु सत्यको यथार्थरूपसे जानना कठिन है। मैं तो उसीको सत्य कहता हूँ, जिससे प्राणियोंका अत्यन्त हित होता हो ॥ अहंकारस्य च त्यागः प्रमादस्य च निग्रहः। संतोषश्चैकचर्या च कूटस्थं श्रेय उच्यते ॥ २१ ॥ अहंकारका त्याग, प्रमादको रोकना, संतोष और एकान्तवास—यह सुनिश्चित श्रेय कहलाता है ॥ २१ ॥ धर्मेण वेदाध्ययनं वेदान्तानां तथैव च। ज्ञानार्थानां च जिज्ञासा श्रेय एतदसंशयम् ॥ २२ ॥ धर्माचरणपूर्वक वेद और वेदाङ्गोंका स्वाध्याय करना तथा उनके सिद्धान्तको जाननेकी इच्छाको जगाये रखना निस्संदेह कल्याणका साधन है ॥ २२ ॥ शब्दरूपरसस्पर्शान् सह गन्धेन केवलान्। नात्यर्थमुपसेवेत श्रेयसोऽर्थी कथंचन ॥ २३ ॥ जिसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छा हो, उस मनुष्यको किसी तरह भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन विषयोंका अधिक सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २३ ॥ नक्तंचर्यां दिवास्वप्रमालस्यं पैशुनं मदम्। अतियोगमयोगं च श्रेयसोऽर्थी परित्यजेत् ॥ २४ ॥ कल्याण चाहनेवाला पुरुष रातमें घूमना, दिनमें सोना, आलस्य, चुगली, मादक वस्तुका सेवन, आहार-विहारका अधिक मात्रामें सेवन और उसका सर्वथा त्याग—ये सब बातें त्याग दे ॥ २४ ॥ आत्मोत्कर्षं न मार्गेत परेषां परिनिन्दया। स्वगुणैरेव मार्गेत विप्रकर्षं पृथग्जनात् ॥ २५ ॥ निर्गुणास्त्वेव भूयिष्ठमात्मसम्भाविता नराः। दोषैरन्यान् गुणवतः क्षिपन्त्यात्मगुणक्षयात् ॥ २६ ॥ दूसरोंकी निन्दा करके अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेका प्रयत्न न करे। साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा जो अपनी उत्कृष्टता है, उसे अपने गुणोंद्वारा ही सिद्ध करे (बातोंसे नहीं)। गुणहीन मनुष्य ही अधिकतर अपनी प्रशंसा किया करते हैं। वे अपनेमें गुणोंकी कमी देखकर दूसरे गुणवान् पुरुषोंके गुणोंमें दोष बताकर उनपर आक्षेप किया करते हैं ॥ २५-२६ ॥ अनूच्यमानास्तु पुनस्ते मन्यन्तु महाजनात्। गुणवत्तरमात्मानं स्वेन मानेन दर्पिताः ॥ २७ ॥ यदि उनको उत्तर दिया जाय तो फिर वे घमंडमें भरकर अपने-आपको महापुरुषोंसे भी अधिक गुणवान् मानने लगें ॥ २७ ॥ अब्रुवन् कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन्। विपश्चिद् गुणसम्पन्नः प्राप्नोत्येव महत् यशः ॥ २८ ॥

परंतु जो दूसरे किसीकी निन्दा तथा अपनी प्रशंसा नहीं करता, ऐसा उत्तम गुणसम्पन्न विद्वान् पुरुष ही महान् यशका भागी होता है ॥ २८ ॥ अब्रुवन् वाति सुरभिर्गन्धः सुमनसां शुचिः । तथैवाव्याहरन् भाति विमलो भानुरम्बरे ॥ २९ ॥ फूलोंकी पवित्र एवं मनोरम सुगन्ध बिना कुछ बोले ही महक उठती है। निर्मल सूर्य अपनी प्रशंसा किये बिना ही आकाशमें प्रकाशित होने लगते हैं ॥ २९ ॥ एवमादीनि चान्यानि परित्यक्तानि मेधया । ज्वलन्ति यशसा लोके यानि न व्याहरन्ति च ॥ ३० ॥ इस प्रकार संसारमें और भी बहुत-सी ऐसी बुद्धिसे रहित वस्तुएँ हैं, जो अपनी प्रशंसा नहीं करती हैं, किंतु अपने यशसे जगमगाती रहती हैं ॥ ३० ॥ न लोके दीप्यते मूर्खः केवलात्मप्रशंसया । अपि चापिहितः श्वभ्रे कृतविद्यः प्रकाशते ॥ ३१ ॥ मूर्ख मनुष्य केवल अपनी प्रशंसा करनेसे ही जगत्में ख्याति नहीं पा सकता। विद्वान् पुरुष गुफामें छिपा रहे तो भी उसकी सर्वत्र प्रसिद्धि हो जाती है ॥ असदुच्चैरपि प्रोक्तः शब्दः समुपशाम्यति । दीप्यते त्वेव लोकेषु शनैरपि सुभाषितम् ॥ ३२ ॥ बुरी बात जोर-जोरसे कही गयी हो तो भी वह शून्यमें विलीन हो जाती है, लोकमें उसका आदर नहीं होता है; किंतु अच्छी बात धीरेसे कही जाय तो भी वह संसारमें प्रकाशित होती है—उसका आदर होता और प्रभाव बढ़ता है ॥ ३२ ॥ मूढानामवलिप्तानामसारं भाषितं बहु । दर्शयत्यन्तरात्मानमग्निरूपमिवांशुमान् ॥ ३३ ॥ घमंडी मूर्खोंकी कही हुई असार बातें उनके दूषित अन्तःकरणका ही प्रदर्शन कराती हैं, ठीक उसी तरह जैसे सूर्य सूर्यकान्तमणिके योगसे अपने दाहक अग्निरूपको ही प्रकट करता है ॥ ३३ ॥ एतस्मात् कारणात् प्रज्ञां मृगयन्ते पृथग्विधाम् । प्रज्ञालाभो हि भूतानामुत्तमः प्रतिभाति मे ॥ ३४ ॥ इस कारण कल्याणकी इच्छा रखनेवाले साधु पुरुष अनेक शास्त्रोंके अध्ययनसे नाना प्रकारकी प्रज्ञा (उत्तम बुद्धि) का ही अनुसंधान करते हैं। मुझे तो सभी प्राणियोंके लिये प्रज्ञाका लाभ ही उत्तम जान पड़ता है ॥ नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्नाप्यन्यायेन पृच्छतः । ज्ञानवानपि मेधावी जडवत् समुपाविशेत् ॥ ३५ ॥ बुद्धिमान् पुरुष ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूछे किसीको कोई उपदेश न करे। अन्यायपूर्वक पूछनेपर भी किसीके प्रश्नका उत्तर न दे। जडकी भाँति चुपचाप बैठा

रहे ।। ३५ ।। ततो वासं परीक्षेत धर्मनित्येषु साधुषु । मनुष्येषु वदान्येषु स्वधर्मनिरतेषु च ।। ३६ ।। मनुष्यको सदा धर्ममें लगे रहनेवाले साधु-महात्माओं तथा स्वधर्मपरायण उदार पुरुषोंके समीप निवास करनेकी इच्छा रखनी चाहिये ।। ३६ ।। चतुर्णां यत्र वर्णानां धर्मव्यतिकरो भवेत् । न तत्र वासं कुर्वीत श्रेयोऽर्थी वै कथंचन ।। ३७ ।। जहाँ चारों वर्णोंके धर्मोंका उल्लङ्घन होता हो, वहाँ कल्याणकी इच्छावाले पुरुषको किसी तरह भी नहीं रहना चाहिये ।। ३७ ।। निरारम्भोऽप्ययमिह यथालब्धोपजीवनः । पुण्यं पुण्येषु विमलं पापं पापेषु चाप्नुयात् ।। ३८ ।। किसी कर्मका आरम्भ न करनेवाला और जो कुछ मिल जाय, उसीसे जीवन-निर्वाह करनेवाला पुरुष भी यदि पुण्यात्माओंके समाजमें रहे तो उसे निर्मल पुण्यकी प्राप्ति होती है और पापियोंके संसर्गमें रहे तो वह पापका ही भागी होता है ।। ३८ ।। अपामग्नेस्तथेन्दोश्च स्पर्शं वेदयते यथा । तथा पश्यामहे स्पर्शमुभयोः पुण्यपापयोः ।। ३९ ।। जैसे जल, अग्नि और चन्द्रमाकी किरणोंके संसर्गमें आनेपर मनुष्य क्रमशः शीत, उष्ण और सुखदायी स्पर्शका अनुभव करता है, उसी प्रकार हम पुण्यात्मा और पापियोंके संगसे पुण्य और पाप दोनोंके स्पर्शका प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं ।। ३९ ।। अपश्यन्तोऽनुविषयं भुञ्जते विघसाशिनः । भुञ्जानांश्चात्मविषयान् विषयान् विद्धि कर्मणाम् ।। ४० ।। जो विघसाशी (भृत्यवर्ग ओर अतिथि आदिको भोजन करानेके बाद बचा हुआ भोजन करनेवाले) हैं, वे तिक्त-मधुर रस या स्वादकी आलोचना न करते हुए अन्न ग्रहण करते हैं; किंतु जो अपनी रसनाका विषय समझकर स्वादु और अस्वादुका विचार रखते हुए भोजन करते हैं, उन्हें कर्मपाशमें बँधा हुआ ही समझना चाहिये ।। ४० ।। यत्रागमयमानानामसत्कारेण पृच्छताम् । प्रब्रूयाद् ब्राह्मणो धर्मं त्यजेत् तं देशमात्मवान् ।। ४१ ।। जहाँ ब्राह्मण अनादर एवं अन्यायपूर्वक धर्म-शास्त्रविषयक प्रश्न करनेवाले पुरुषोंको धर्मका उपदेश करता हो, आत्मपरायण साधकको उस देशका परित्याग कर देना चाहिये ।। ४१ ।। शिष्योपाध्यायिकावृत्तिर्यत्र स्यात् सुसमाहिता । यथावच्छास्त्रसम्पन्ना कस्तं देशं परित्यजेत् ।। ४२ ।।