महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
न शेषमनु कल्प्येन निष्कारणमहेतुकम् ।। ८९ ।।
मेरे उस वाक्यमें न्यूनपदत्व नामक दोष नहीं रहेगा, कष्टकर शब्दोंका प्रयोग नहीं होगा, उसका क्रमरहित उच्चारण नहीं होगा। उसमें दूसरे पदोंके अध्याहार और लक्षणकी आवश्यकता नहीं होगी। यह वाक्य निष्प्रयोजन और युक्तिशून्य भी नहीं होगा ।। ८९ ।।
कामात् क्रोधाद् भयाल्लोभाद् दैन्याच्चानार्यकात् तथा ।
ह्रीतोऽनुक्रोशतो मानान्न वक्ष्यामि कथंचन ।। ९० ।।
मैं काम, क्रोध, भय, लोभ, दैन्य, अनार्यता, लज्जा, दया तथा अभिमानसे किसी तरह कोई बात नहीं बोलूँगी ।। ९० ।।
वक्ता श्रोता च वाक्यं च यदा त्वविकलं नृप ।
सममेति विवक्षायां तदा सोऽर्थः प्रकाशते ।। ९१ ।।
नरेश्वर! बोलनेकी इच्छा होनेपर जब वक्ता, श्रोता और वाक्य—तीनों अविकलभावसे सम-स्थितिमें आ जाते हैं, तब वक्ताका कहा हुआ अर्थ प्रकाशित होता है (श्रोताके समझमें आ जाता है) ।। ९१ ।।
वक्तव्ये तु यदा वक्ता श्रोतारमवमन्य वै ।
स्वार्थमाह परार्थं तत् तदा वाक्यं न रोहति ।। ९२ ।।
जब बोलते समय वक्ता श्रोताकी अवहेलना करके दूसरेके लिये अपनी बात कहने लगता है, उस समय वह वाक्य श्रोताके हृदयमें प्रवेश नहीं करता है ।।
अथ यः स्वार्थमुत्सृज्य परार्थं प्राह मानवः ।
विशङ्का जायते तस्मिन् वाक्यं तदपि दोषवत् ।। ९३ ।।
और जो मनुष्य स्वार्थ त्यागकर दूसरेके लिये कुछ कहता है, उस समय उसके प्रति श्रोताके हृदयमें आशंका उत्पन्न होती है, अतः वह वाक्य भी दोषयुक्त ही है ।। ९३ ।।
यस्तु वक्ता द्वयोरर्थमविरुद्धं प्रभाषते ।
श्रोतुश्चैवात्मनश्चैव स वक्ता नेतरो नृप ।। ९४ ।।
परंतु नरेश्वर! जो वक्ता अपने और श्रोता दोनोंके लिये अनुकूल विषय ही बोलता है, वही वास्तवमें वक्ता है, दूसरा नहीं ।। ९४ ।।
तदर्थवदिदं वाक्यमुपेतं वाक्यसम्पदा ।
अविक्षिप्तमना राजन्नेकाग्रः श्रोतुमर्हसि ।। ९५ ।।
अतः राजन्! आप स्थिरचित्त एवं एकाग्र होकर यह वाक्यसम्पत्तिसे युक्त सार्थक वचन सुनिये ।। ९५ ।।
कासि कस्य कुतश्चेति त्वयाहमभिचोदिता ।
तत्रोत्तरमिदं वाक्यं राजन्नेकमनाः शृणु ।। ९६ ।।
महाराज! आपने मुझसे पूछा था कि आप कौन हैं, किसकी हैं और कहाँसे आयी हैं? अतः इसके उत्तरमें मेरा यह कथन एकचित्त होकर सुनिये ।। ९६ ।।
यथा जतु च काष्ठं च पांसवश्चोदबिन्दवः ।
संश्लिष्टानि तथा राजन् प्राणिनामिह सम्भवः ॥ ९७ ॥
राजन्! जैसे काठके साथ लाह और धूलके साथ पानीकी बूंदें मिलकर एक हो जाती हैं, उसी प्रकार इस जगत्में प्राणियोंका जन्म कई तत्त्वोंके मेलसे होता है ॥
शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धः पञ्चेन्द्रियाणि च ।
पृथगात्मान आत्मानं संश्लिष्टा जतुकाष्ठवत् ॥ ९८ ॥
न चैषां चोदना काचिदस्तीत्येष विनिश्चयः ।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध तथा पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ—ये आत्मासे पृथक् होनेपर भी काष्ठमें सटे हुए लाहके समान आत्माके साथ जुड़े हुए हैं; परंतु इनमें स्वतन्त्र कोई प्रेरणा-शक्ति नहीं है। यही विद्वानोंका निश्चय है ॥ ९८ १/२ ॥
एकैकस्येह विज्ञानं नास्त्यात्मनि तथा परे ॥ ९९ ॥
न वेद चक्षुश्चक्षुष्ट्वं श्रोत्रं नात्मनि वर्तते ।
इनमेंसे एक-एक इन्द्रियको न तो अपना ज्ञान है और न दूसरेका। नेत्र अपने नेत्रत्वको नहीं जानता। इसी प्रकार कान भी अपने विषयमें कुछ नहीं जानता ॥ ९९ १/२ ॥
तथैव व्यभिचारेण न वर्तन्ते परस्परम् ॥ १०० ॥
प्रश्लिष्टं च न जानन्ति यथाऽऽप इव पांसवः ।
इसी तरह ये इन्द्रियाँ और विषय परस्पर एक-दूसरेसे मिल-जुलकर भी नहीं जान सकते। जैसे कि जल और धूल परस्पर मिलकर भी अपने सम्मिश्रणको नहीं जानते ॥ १०० १/२ ॥
बाह्यानन्यानपेक्षन्ते गुणांस्तानपि मे शृणु ॥ १०१ ॥
रूपं चक्षुः प्रकाशश्च दर्शने हेतवस्त्रयः ।
शरीरस्थ इन्द्रियाँ विषयोंका प्रत्यक्ष अनुभव करते समय अन्यान्य बाह्य गुणोंकी अपेक्षा रखती हैं। उन गुणोंको आप मुझसे सुनिये। रूप, नेत्र और प्रकाश—ये तीन किसी वस्तुको प्रत्यक्ष देखनेमें हेतु हैं ॥ १०१ १/२ ॥
यथैवात्र तथान्येषु ज्ञानज्ञयेषु हेतवः ॥ १०२ ॥
ज्ञानज्ञेयान्तरे तस्मिन् मनो नामापरो गुणः ।
विचारयति येनायं निश्चये साध्वसाधुनी ॥ १०३ ॥
जैसे प्रत्यक्ष दर्शनमें ये तीन हेतु हैं, उसी प्रकार अन्यान्य ज्ञान और ज्ञेयमें भी तीन-तीन हेतु जानने चाहिये। ज्ञान और ज्ञातव्य विषयोंके बीचमें किसी ज्ञानेन्द्रियके अतिरिक्त मन नामक एक दूसरा गुण भी रहता है, जिससे यह जीवात्मा किसी विषयमें भले-बुरेका निश्चय करनेके लिये विचार करता है ॥
द्वादशस्त्वपरस्तत्र बुद्धिर्नाम गुणः स्मृतः ।
येन संशयपूर्वेषु बोद्धव्येषु व्यवस्यति ॥ १०४ ॥
वहीं एक और बारहवाँ गुण भी है, जिसका नाम है बुद्धि। जिससे किसी ज्ञातव्य विषयमें संशय उत्पन्न होनेपर मनुष्य एक निश्चयपर पहुँचता है ।। १०४ ।।
अथ द्वादशके तस्मिन् सत्त्वं नामापरो गुणः ।
महासत्त्वोऽल्पसत्त्वो वा जन्तुर्येनानुमीयते ।। १०५ ।।
उस बारहवें गुण बुद्धिमें सत्त्वनामक एक (तेरहवाँ) गुण है, जिससे महासत्त्व और अल्पसत्त्व प्राणीका अनुमान किया जाता है ।। १०५ ।।
अहं कर्तेति चाप्यन्यो गुणस्तत्र चतुर्दशः ।
ममायमिति येनायं मन्यते न ममेति च ।। १०६ ।।
उस सत्त्वमें 'मैं कर्ता हूँ' ऐसे अभिमानसे युक्त अहंकार नामक एक अन्य चौदहवाँ गुण है, जिससे जीवात्मा 'यह वस्तु मेरी है और यह वस्तु मेरी नहीं है' ऐसा मानता है ।। १०६ ।।
अथ पञ्चदशो राजन् गुणस्तत्रापरः स्मृतः ।
पृथक्कलासमूहस्य सामग्र्यं तदिहोच्यते ।। १०७ ।।
गुणस्त्वेवापरस्तत्र संघात इव षोडशः ।
राजन्! उस अहंकारमें वासना नामक एक गुण और माना गया है, जो पंद्रहवाँ है। वहाँ पृथक्-पृथक् कलाओंके समूहकी जो समग्रता है, वह एक अन्य गुण है। वह संघातकी भाँति यहाँ सोलहवाँ कहा जाता है ।। १०७ १/२ ।।
प्रकृतिर्व्यक्तिरित्येतौ गुणौ यस्मिन् समाश्रितौ ।। १०८ ।।
जिसमें प्रकृति (माया) और व्यक्ति (प्रकाश)—ये दो गुण आश्रित हैं (यहाँतक सब अठारह हुए) ।। १०८ ।।
सुखासुखे जरामृत्यू लाभालाभौ प्रियाप्रिये ।
इति चैकोनविंशोऽयं द्वन्द्वयोग इति स्मृतः ।। १०९ ।।
सुख और दुःख, जरा और मृत्यु, लाभ और हानि तथा प्रिय और अप्रिय इत्यादि द्वन्द्वोंका जो योग है, यह उन्नीसवाँ गुण माना गया है ।। १०९ ।।
ऊर्ध्वं चैकोनविंशत्या कालो नामापरो गुणः ।
इतीमं विद्धि विंशत्या भूतानां प्रभवाप्ययम् ।। ११० ।।
इस उन्नीसवें गुणसे परे काल नामक दूसरा गुण और है। इसे बीसवाँ गुण समझिये। इसीसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और लय होते हैं ।। ११० ।।
विंशकश्चैव संघातो महाभूतानि पञ्च च ।
सदसद्भावयोगौ तु गुणावन्यौ प्रकाशकौ ।। १११ ।।
इन बीस गुणोंका समुदाय एवं पाँच महाभूत तथा सद्भावयोग३. और असद्भावयोग३—ये दो अन्य प्रकाशक गुण, ये सब मिलकर सत्ताईस हैं ।। १११ ।।
इत्येवं विंशकश्चैव गुणाः सप्त च ये स्मृताः ।
विधिः शुक्लं बलं चेति त्रय एते गुणाः परे ।। ११२ ।।
ये जो बीस और सात गुण बताये गये हैं, इनके सिवा तीन गुण और हैं—विधि³, शुक्र४ और बल५ ।।
विंशतिर्दश चैवं हि गुणाः संख्यानतः स्मृताः ।
समग्रा यत्र वर्तते तच्छरीरमिति स्मृतम् ।। ११३ ।।
इस प्रकार गणना करनेसे बीस और दस तीस गुण होते हैं। ये सारे-के-सारे गुण जहाँ विद्यमान हैं, उसको शरीर कहा गया है ।। ११३ ।।
अव्यक्तं प्रकृतिं त्वासां कलानां कश्चिदिच्छति ।
व्यक्तं चासां तथा चान्यः स्थूलदर्शी प्रपश्यति ।। ११४ ।।
कोई-कोई विद्वान् अव्यक्त प्रकृतिको इन तीस कलाओंका उपादान कारण मानते हैं। दूसरे स्थूलदर्शी विचारक व्यक्त अर्थात् परमाणुओंको कारण मानते हैं तथा कोई-कोई अव्यक्त और व्यक्तको अर्थात् प्रकृति और परमाणु—इन दोनोंको उनका उपादान कारण समझते हैं ।। ११४ ।।
अव्यक्तं यदि वा व्यक्तं द्वयीमथ चतुष्टयीम् ।
प्रकृतिं सर्वभूतानां पश्यन्त्यध्यात्मचिन्तकाः ।। ११५ ।।
अव्यक्त हो, व्यक्त हो, दोनों हों अथवा चारों (ब्रह्म, माया, जीव और अविद्या) कारण हों, अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले विद्वान् प्रकृतिको ही सम्पूर्ण भूतोंका उपादान कारण समझते हैं ।। ११५ ।।
येयं प्रकृतिरव्यक्ता कलाभिर्व्यक्ततां गता ।
अहं च त्वं च राजेन्द्र ये चाप्यन्ये शरीरिणः ।। ११६ ।।
राजेन्द्र! यह जो अव्यक्त प्रकृति सबका उपादान कारण है, यही पूर्वोक्त तीस कलाओंके रूपमें व्यक्तभावको प्राप्त हुई है। मैं, आप तथा जो अन्य शरीरधारी हैं, उन सबके शरीरोंकी उत्पत्ति प्रकृतिसे ही हुई है ।। ११६ ।।
बिन्दुन्यासादयोऽवस्थाः शुक्रशोणितसम्भवाः ।
यासामेव निपातेन कललं नाम जायते ।। ११७ ।।
प्राणियोंकी वीर्यस्थापनासे लेकर रजोवीर्यसंयोग-सम्भूत कुछ ऐसी अवस्थाएँ हैं, जिनके सम्मिश्रणसे ही 'कलल' नामक एक पदार्थ उत्पन्न होता है ।। ११७ ।।
कललाद् बुद्बुदोत्पत्तिः पेशी च बुद्बुदात् स्मृता ।
पेश्यास्त्वङ्गाभिनिर्वृत्तिर्नखरोमाणि चाङ्गतः ।। ११८ ।।
कललसे बुद्बुदकी उत्पत्ति होती है। बुद्बुदसे मांसपेशीका प्रादुर्भाव माना गया है। पेशीसे विभिन्न अंगोंका निर्माण होता है और अंगोंसे रोमावलियाँ तथा नख प्रकट होते हैं ।। ११८ ।।
सम्पूर्णे नवमे मासि जन्तोर्जातस्य मैथिल । जायते नामरूपत्वं स्त्री पुमान् वेति लिङ्गतः ॥ ११९ ॥ मिथिलानरेश! गर्भमें नौ मास पूर्ण हो जानेपर जीव जन्म ग्रहण करता है। उस समय उसे नाम और रूप प्राप्त होता है तथा वह विशेष प्रकारके चिह्नसे स्त्री अथवा पुरुष समझा जाता है ॥ ११९ ॥
जातमात्रं तु तद्रूपं दृष्ट्वा ताम्रनखाङ्गुलि । कौमारं रूपमापन्नं रूपतो नोपलभ्यते ॥ १२० ॥ जिस समय बालकका जन्म होता है, उस समय उसका जो रूप देखनेमें आता है, उसके नख और अंगुलियाँ ताँबेके समान लाल-लाल होती हैं, फिर जब वह कुमारावस्थाको प्राप्त होता है तो उस समय उसका पहलेका वह रूप नहीं उपलब्ध होता है ॥ १२० ॥
कौमाराद् यौवनं चापि स्थावीर्यं चापि यौवनात् । अनेन क्रमयोगेन पूर्वं पूर्वं न लभ्यते ॥ १२१ ॥ इसी प्रकार कुमारावस्थासे जवानीको और जवानीसे बुढ़ापेको वह प्राप्त होता है। इस क्रमसे उत्तरोत्तर अवस्थामें पहुँचनेपर पूर्व पूर्व अवस्थाका रूप नहीं देखनेमें आता है ॥
कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेदः क्षणे क्षणे । वर्तते सर्वभूतेषु सौक्ष्म्यात् तु न विभाव्यते ॥ १२२ ॥ सभी प्राणियोंमें विभिन्न प्रयोजनकी सिद्धिके लिये जो पूर्वोक्त कलाएँ हैं, उनके स्वरूपमें प्रतिक्षण भेद या परिवर्तन हो रहा है; परंतु वह इतना सूक्ष्म है कि जान नहीं पड़ता ॥ १२२ ॥
न चैषामत्ययो राजन् लक्ष्यते प्रभवो न च । अवस्थायामवस्थायां दीपस्येवार्चिषो गतिः ॥ १२३ ॥ राजन्! प्रत्येक अवस्थामें इन कलाओंका लय और उद्भव होता रहता है, किंतु दिखायी नहीं देता है; ठीक उसी तरह जैसे दीपककी लौ क्षण-क्षणमें मिटती और उत्पन्न होती रहती है, पर दिखायी नहीं देती ॥ १२३ ॥
तस्याप्येवंप्रभावस्य सदश्वस्येव धावतः । अजस्रं सर्वलोकस्य कः कुतो वा न वा कुतः ॥ १२४ ॥ कस्येदं कस्य वा नेदं कुतो वेदं न वा कुतः । सम्बन्धः कोऽस्ति भूतानां स्वैरप्यवयवैरिह ॥ १२५ ॥ जैसे दौड़ता हुआ अच्छा घोड़ा इतनी तीव्र गतिसे एक स्थानको छोड़कर दूसरे स्थानपर पहुँच जाता है कि कुछ कहते नहीं बनता, उसी प्रकार यह प्रभावशाली लोक निरन्तर वेगपूर्वक एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें जा रहा है, अतः उसके विषयमें यह प्रश्न नहीं बन सकता कि 'कौन कहाँसे आता है और कौन कहाँसे नहीं आता है, यह किसका है? किसका
नहीं है? किससे उत्पन्न हुआ है और किससे नहीं हुआ है? प्राणियोंका अपने अंगोंके साथ भी यहाँ क्या सम्बन्ध है?' अर्थात् कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ।। १२४-१२५ ।। यथाऽऽदित्यान्मणेर्वापि वीरुद्भ्यश्चैव पावकः। जायन्त्येवं समुदायात् कलानामिव जन्तवः ।। १२६ ।। जैसे सूर्यकी किरणोंका सम्पर्क पाकर सूर्यकान्त-मणिसे आग प्रकट हो जाती है, परस्पर रगड़ खानेपर काठसे अग्निका प्रादुर्भाव हो जाता है, इसी प्रकार पूर्वोक्त कलाओंके समुदायसे जीव जन्म ग्रहण करते हैं ।। १२६ ।। आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं यथा त्वमनुपश्यसि । एवमेवात्मनाऽऽत्मानमन्यस्मिन् किं न पश्यसि ।। १२७ ।। जैसे आप स्वयं अपने द्वारा अपनेहीमें आत्माका दर्शन करते हैं, उसी प्रकार अपने द्वारा दूसरोंमें आत्माका दर्शन क्यों नहीं करते हैं? ।। १२७ ।। यद्यात्मनि परस्मिंश्च समतामध्यवस्यसि । अथ मां कासि कस्येति किमर्थमनुपृच्छसि ।। १२८ ।। यदि आप अपनेमें और दूसरेमें भी समभाव रखते हैं तो मुझसे बारंबार क्यों पूछते हैं कि 'आप कौन हैं और किसकी हैं?' ।। १२८ ।। इदं मे स्यादिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य मैथिल । कासि कस्य कुतो वेति वचनैः किं प्रयोजनम् ।। १२९ ।। मिथिलानरेश! 'यह मुझे प्राप्त हो जाय, यह न हो।' इत्यादि रूपसे जो द्वन्द्वविषयक चिन्ता प्राप्त होती है, उससे यदि आप मुक्त हैं तो 'आप कौन हैं? किसकी हैं? अथवा कहाँसे आयी हैं?' इन वचनोंद्वारा प्रश्न करनेसे आपका क्या प्रयोजन है? ।। १२९ ।। रिपौ मित्रेऽथ मध्यस्थे विजये संधिविग्रहे । कृतवान् यो महीपालः किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम् ।। १३० ।। शत्रु-मित्र और मध्यस्थके विषयमें, विजय, संधि और विग्रहके अवसरोंपर जिस भूपालने यथोचित कार्य किये हैं, उसमें जीवन्मुक्तका क्या लक्षण है? ।। १३० ।। त्रिवर्गं सप्तधा व्यक्तं यो न वेदेह कर्मसु । सङ्गवान् यस्त्रिवर्गेण किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम् ।। १३१ ।। धर्म, अर्थ और कामको त्रिवर्ग कहते हैं। यह सात रूपोंमें अभिव्यक्त होता है। जो कर्मोंमें इस त्रिवर्गको नहीं जानता तथा जो सदा त्रिवर्गसे सम्बन्ध रखता है, ऐसे पुरुषमें जीवन्मुक्तका क्या लक्षण है? ।। १३१ ।। प्रिये वाप्यप्रिये वापि दुर्बले बलवत्यपि । यस्य नास्ति समं चक्षुः किं तस्मिन् मुक्तलक्षणम् ।। १३२ ।। प्रिय अथवा अप्रियमें, दुर्बल अथवा बलवान्में जिसकी समदृष्टि नहीं है, उसमें मुक्तका क्या लक्षण है? ।।
तदयुक्तस्य ते मोक्षे योऽभिमानो भवेन्नृप । सुहृद्भिः संनिवार्यस्तेऽविरक्तस्येव भेषजम् ।। १३३ ।। नरेश्वर! वास्तवमें आप योगयुक्त नहीं हैं तथापि आपको जो जीवन्मुक्तिका अभिमान हो रहा है, वह आपके सुहृदोंको दूर कर देना चाहिये अर्थात् यह नहीं मानना चाहिये कि आप जीवन्मुक्त हैं, ठीक उसी तरह जैसे अपथ्यशील रोगीको दवा देना बंद कर दिया जाता है ।। १३३ ।।
तानि तानि तु संचिन्त्य सङ्गस्थानान्यरंदिम । आत्मनाऽऽत्मनि सम्पश्येत् किमन्यन्मुक्तलक्षणम् ।। १३४ ।। शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज! नाना प्रकारके जो-जो पदार्थ हैं, उन सबको आसक्तिके स्थान समझकर अपने द्वारा अपनेहीमें अपनेको देखे। इसके सिवा मुक्तका और क्या लक्षण हो सकता है? ।। १३४ ।।
इमान्यन्यानि सूक्ष्माणि मोक्षमाश्रित्य कानिचित् । चतुरङ्गप्रवृत्तानि सङ्गस्थानानि मे शृणु ।। १३५ ।। राजन्! अपने मोक्षका आश्रय लेकर भी ये और दूसरे जो कुछ चार अंगोंमें प्रवृत्त आसक्तिके जो सूक्ष्म स्थान हैं, उनको भी अपना रखा है, उन्हें बताती हूँ, आप मुझसे सुनें ।। १३५ ।।
य इमां पृथिवीं कृत्स्नामेकच्छत्रां प्रशास्ति ह । एक एव स वै राजा पुरमध्यावसत्युत ।। १३६ ।। जो इस सारी पृथिवीका एकच्छत्र शासन करता है, वह एक ही सार्वभौम नरेश भी एकमात्र नगरमें ही निवास करता है ।। १३६ ।।
तत्पुरे चैकमेवास्य गृहं यदधितिष्ठति । गृहे शयनमप्येकं निशायां यत्र लीयते ।। १३७ ।। उस नगरमें भी उसके लिये एक ही महल होता है, जिसमें वह निवास करता है। उस महलमें भी उसके लिये एक ही शय्या होती है, जिसपर वह रातमें सोता है ।। १३७ ।।
शय्यार्धं तस्य चाप्यत्र स्त्रीपूर्वमधितिष्ठति । तदनेन प्रसङ्गेन फलेनैवेह युज्यते ।। १३८ ।। उस शय्याके भी आधे भागपर राजाकी स्त्रीका अधिकार होता है; अतः इस प्रसंगसे वह बहुत अल्प फलका ही भागी होता है ।। १३८ ।।
एवमेवोपभोगेषु भोजनाच्छादनेषु च । गुणेषु परिमेयेषु निग्रहानुग्रहं प्रति ।। १३९ ।। परतन्त्रः सदा राजा स्वल्पेष्वपि प्रसज्जते । संधिविग्रहयोगे च कुतो राज्ञः स्वतन्त्रता ।। १४० ।।
इसी प्रकार उपभोग, भोजन, आच्छादन तथा अन्यान्य परिमित विषयोंके सेवनमें और दुष्टोंके दमन एवं शिष्ट पुरुषोंके प्रति अनुग्रहके विषयमें भी राजा सदा ही परतन्त्र है। इसी प्रकार वह बहुत थोड़े कार्योंमें भी स्वतन्त्र नहीं है तो भी उनमें आसक्त रहता है। संधि और विग्रह करनेमें भी राजाको कहाँ स्वतन्त्रता प्राप्त है? ।। १३९-१४० ।।
स्त्रीषु क्रीडाविहारेषु नित्यमस्यास्वतन्त्रता ।
मन्त्रे चामात्यसमितौ कुतस्तस्य स्वतन्त्रता ।। १४१ ।।
स्त्री-सहवास, क्रीड़ा और विहारमें भी उसे सदा परतन्त्रता रहती है। मन्त्रियोंकी सभामें बैठकर मन्त्रणा करते समय भी उसे कहाँ स्वतन्त्रता रहती है ।। १४१ ।।
यदा ह्याज्ञापयत्यन्यांस्तत्रास्योक्ता स्वतन्त्रता ।
अवशः कार्य ते तत्र तस्मिंस्तस्मिन् क्षणे स्थितः ।। १४२ ।।
राजा जिस समय दूसरोंको कुछ करनेकी आज्ञा देता है, उस समय वहाँ उसकी स्वतन्त्रता बतायी जाती है; परंतु ऐसे अवसरोंपर भी भिन्न-भिन्न क्षणोंमें राजासनपर बैठा हुआ नरेश सलाह देनेवाले मन्त्रियोंद्वारा अपनी इच्छाके विपरीत करनेके लिये विवश कर दिया जाता है ।। १४२ ।।
स्वप्रकामो न लभते स्वप्नं कार्यार्थिभिर्जनैः ।
शयने चाप्यनुज्ञातः सुप्त उत्थाप्यतेऽवशः ।। १४३ ।।
वह सोना चाहता है, परंतु कार्यार्थी मनुष्योंद्वारा घिरा रहनेके कारण सोने नहीं पाता। शय्यापर सोये हुए राजाको भी लोगोंके अनुरोधसे विवश होकर उठना पड़ता है ।। १४३ ।।
स्नाह्यालभ पिब प्राश जुहुध्यग्नीन् यजेत्यपि ।
ब्रवीहि शृणु चापीति विवशः कार्यते परैः ।। १४४ ।।
'महाराज! स्नान कीजिये, तेल लगवाइये, पानी पीजिये, भोजन कीजिये, आहुति दीजिये, अग्निहोत्रमें संलग्न होइये, अपनी कहिये और दूसरोंकी सुनिये।' इत्यादि बातें कह-कहकर दूसरे लोग राजाको वैसा करनेके लिये विवश कर देते हैं ।। १४४ ।।
अभिगम्याभिगम्यैव याचन्ते सततं नराः ।
न चाप्युत्सहते दातुं वित्तरक्षी महाजनान् ।। १४५ ।।
याचक मनुष्य सदा निकट आ-आकर राजासे धनकी याचना करते हैं; किंतु जो लोग दानके श्रेष्ठ पात्र हैं, उनके लिये भी वह कुछ देनेका साहस नहीं करता। अपने धनको सर्वथा सुरक्षित रखना चाहता है ।। १४५ ।।
दाने कोषक्षयोऽप्यस्य वैरं चास्याप्रयच्छतः ।
क्षणेनास्योपवर्तन्ते दोषा वैराग्यकारकाः ।। १४६ ।।
यदि सबको धनका दान करे तो उसका खजाना ही खाली हो जाय और किसीको कुछ न दे तो सबके साथ वैर बढ़ जाय। उसके सामने क्षण-क्षणमें ऐसे दोष उपस्थित होते हैं, जो उसे राज-काजसे विरक्त कर देते हैं ।। १४६ ।।
प्राज्ञान् शूरांस्तथैवाढ्यानेकस्थानपि शङ्कते । भयमप्यभये राज्ञो यैश्च नित्यमुपास्यते ॥ १४७ ॥ विद्वानों, शूरवीरों तथा धनियोंको भी जब वह एक स्थानपर जुटा हुआ देख लेता है, तब उसके मनमें उनके प्रति शंका उत्पन्न हो जाती है। जहाँ भयका कोई कारण नहीं है, वहाँ भी राजाको भय होता है। जो लोग सदा उसके पास उठते-बैठते या सेवामें रहते हैं, उनसे भी वह सशंक बना रहता है ॥ १४७ ॥
तथा चैते प्रदुष्यन्ति राजन् ये कीर्तिता मया । तथैवास्य भयं तेभ्यो जायते पश्य यादृशम् ॥ १४८ ॥ राजन्! मैंने जिनका नाम लिया है, वे विद्वान् और शूरवीर आदि अपने प्रति राजाकी आशंका देखकर सचमुच ही उसके प्रति दुर्भाव रखने लगते हैं और फिर उनसे राजाको जैसा भय प्राप्त होता है, उसको आप स्वयं ही समझ लें ॥ १४८ ॥
सर्वः स्वे स्वे गृहे राजा सर्वः स्वे स्वे गृहे गृही । निग्रहानुग्रहान् कुर्वंस्तुल्यो जनक राजभिः ॥ १४९ ॥ जनक! सब लोग अपने-अपने घरमें राजा हैं और सभी अपने-अपने घरमें गृहस्वामी हैं, सभी किसीको दण्ड देते और किसीपर अनुग्रह करते हैं; अतः वे सब लोग राजाओंके समान ही हैं ॥ १४९ ॥
पुत्रा दारास्तथैवात्मा कोशो मित्राणि संचयाः । परैः साधारणा ह्येते तैस्तैरेवास्य हेतुभिः ॥ १५० ॥ स्त्री, पुत्र, शरीर, कोष, मित्र तथा संग्रह—ये सब वस्तुएँ राजाओंकी भाँति दूसरोंके पास भी साधारणतया रहते ही हैं। जिन कारणोंसे वह राजा कहलाता है, उन्हीं युक्तियोंसे दूसरे लोग भी उसके समान ही कहे जा सकते हैं ॥ १५० ॥
हतो देशः पुरं दग्धं प्रधानः कुञ्जरो मृतः । लोकसाधारणेष्fragment: लोकसाधारणेष् + वे + षु -> लोकसाधारणेष्वेषु मिथ्याज्ञानेन तप्यते ॥ १५१ ॥ ‘हाय! देश नष्ट हो गया, सारा नगर आगसे जल गया और वह प्रधान हाथी मर गया।’ यद्यपि ये सब बातें सब लोगोंके लिये साधारण हैं—सबपर समान रूपसे ये कष्ट प्राप्त होते हैं तथापि राजा अपने मिथ्याज्ञानके कारण केवल अपनी ही हानि समझकर संतप्त होता रहता है ॥ १५१ ॥
अमुक्तो मानसैर्दुःखैरिच्छाद्वेषभयोद्भवैः । शिरोरोगादिभी रोगैस्तथैवाभिनियन्तृभिः ॥ १५२ ॥ इच्छा, द्वेष और भयजनित मानसिक दुःख राजाको कभी नहीं छोड़ते हैं। सिरदर्द आदि शारीरिक रोग भी उसे सब ओरसे नियन्त्रणमें रखकर व्याकुल किये रहते हैं ॥ १५२ ॥
द्वन्द्वैस्तैस्तैस्त्वपहतः सर्वतः परिशङ्कितः ।
बहुप्रत्यर्थिकं राज्यमुपास्ते गणयन्निशाः ।। १५३ ।।
वह नाना प्रकारके द्वन्द्वोंसे आहत और सब ओरसे शंकित हो रातें गिनता हुआ अनेक शत्रुओंसे भरे हुए राज्यका सेवन करता है ।। १५३ ।।
तदल्पसुखमत्यर्थं बहुदुःखमसारवत् ।
तृणाग्निज्वलनप्रख्यं फेनबुद्बुदसंनिभम् ।। १५४ ।।
को राज्यमभिपद्येत प्राप्य चोपशमं लभेत् ।
जिसमें सुख तो बहुत थोड़ा, किंतु दुःख बहुत अधिक है, जो सर्वथा सारहीन है, जो घास-फूसमें लगी आगके समान क्षणस्थायी और फेन तथा बुद्बुदके समान क्षणभंगुर है, ऐसे राज्यको कौन ग्रहण करेगा? और ग्रहण कर लेनेपर कौन शान्ति पा सकता है? ।।
ममेदमिति यच्चेदं पुरं राष्ट्रं च मन्यसे ।। १५५ ।।
बलं कोशममात्यांश्च कस्यैतानि न वा नृप ।
नरेश्वर! आप जो इस नगरको, राष्ट्रको, सेनाको तथा कोष और मन्त्रियोंको भी 'ये सब मेरे हैं' ऐसा कहते हुए अपना मानते हैं, वह आपका भ्रम ही है। मैं पूछती हूँ, ये सब किसके हैं और किसके नहीं हैं? ।।
मित्रामात्यपुरं राष्ट्रं दण्डः कोशो महीपतिः ।। १५६ ।।
सप्ताङ्गस्यास्य राज्यस्य त्रिदण्डस्येव तिष्ठतः ।
अन्योन्यगुणयुक्तस्य कः केन गुणतोऽधिकः ।। १५७ ।।
मित्र, मन्त्री, नगर, राष्ट्र, दण्ड, कोष और राजा-ये राज्यके सात अंग हैं। जैसे मेरे हाथमें त्रिदण्ड है, वैसे आपके हाथमें यह राज्य स्थित है। आपका सात अंगोंवाला राज्य और मेरा त्रिदण्ड-ये दोनों परस्पर उत्कृष्ट गुणोंसे युक्त हैं। फिर इनमेंसे कौन किस गुणके कारण अधिक है? ।। १५६-१५७ ।।
तेषु तेषु हि कालेषु तत्तदङ्गं विशिष्यते ।
येन यत् सिध्यते कार्यं तत् प्राधान्याय कल्पते ।। १५८ ।।
राज्यके जो सात अंग हैं, उनमें सभी समय-समयपर अपनी विशिष्टता सिद्ध करते हैं। जिस अंगसे जो कार्य सिद्ध होता है, उसके लिये उसीकी प्रधानता मानी जाती है ।। १५८ ।।
सप्ताङ्गश्चैव संघातस्त्रयश्चान्ये नृपोत्तम ।
सम्भूय दशवर्गोऽयं भुङ्क्ते राज्यं हि राजवत् ।। १५९ ।।
नृपश्रेष्ठ! उक्त सात अंगोंका समुदाय और तीन अन्य शक्तियाँ (प्रभु-शक्ति, उत्साहशक्ति और मन्त्रशक्ति)—ये सब मिलकर राज्यके दस वर्ग हैं। ये दसों वर्ग संगठित होकर राजाके समान ही राज्यका उपभोग करते हैं ।। १५९ ।।
यश्च राजा महोत्साहः क्षत्रधर्मे रतो भवेत् ।
स तुष्येद् दशभागेन ततस्त्वन्यो दशावरैः ।। १६० ।।
जो राजा महान् उत्साही और क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर होता है, वह 'कर' के रूपमें प्रजाकी आयका दसवाँ भाग लेकर संतुष्ट हो जाता है तथा उससे भिन्न साधारण भूपाल दसवें भागसे कम लेकर भी संतोष कर लेते हैं ।। १६० ।।
नास्त्यसाधारणो राजा नास्ति राज्यमराजकम् ।
राज्येऽसति कुतो धर्मो धर्मेऽसति कुतः परम् ।। १६१ ।।
साधारण प्रजा न हो तो कोई राजा नहीं हो सकता। राजा न हो तो राज्य नहीं टिक सकता। राज्य न हो तो धर्म कैसे रह सकता है और धर्म न हो तो परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? ।। १६१ ।।
योऽप्यत्र परमो धर्मः पवित्रं राजराज्ययोः ।
पृथिवी दक्षिणा यस्य सोऽश्वमेधेन युज्यते ।। १६२ ।।
यहाँ राजा और राज्यके लिये जो परम धर्म और परम पवित्र वस्तु है, उसे सुनिये। जिसकी पृथिवी दक्षिणा-रूपमें दे दी जाती है अर्थात् जो अपनी राज्यभूमिका दान कर देता है, वह अश्वमेध यज्ञके पुण्यफलका भागी होता है ।।
साहमेतानि कर्माणि राजदुःखानि मैथिल ।
समर्था शतशो वक्तुमथवापि सहस्रशः ।। १६३ ।।
मिथिलानरेश! जो राजाको दुःख देनेवाले हैं, ऐसे सैकड़ों और हजारों कर्म मैं यहाँ बता सकती हूँ ।। १६३ ।।
स्वदेहेनाभिषङ्गो मे कुतः परपरिग्रहे ।
न मामेवंविधां युक्तामीदृशं वक्तुमर्हसि ।। १६४ ।।
मेरी तो अपने ही शरीरमें आसक्ति नहीं है, फिर दूसरेके शरीरमें कैसे हो सकती है? इस प्रकार योगयुक्त रहनेवाली मुझ संन्यासिनीके प्रति आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ।। १६४ ।।
ननु नाम त्वया मोक्षः कृत्स्नः पञ्चशिखाच्छ्रुतः ।
सोपायः सोपनिषदः सोपासङ्गः सनिश्चयः ।। १६५ ।।
तस्य ते मुक्तसङ्गस्य पाशानाक्रम्य तिष्ठतः ।
छत्रादिषु विशेषेषु पुनः सङ्गः कथं नृप ।। १६६ ।।
नरेश्वर! जब आपने महर्षि पंचशिखाचार्यसे उपाय (निदिध्यासन), उपनिषद् (उसके श्रवण-मनन), उपासंग (यम-नियम आदि योगाङ्ग) और निश्चय (ब्रह्म और जीवात्माकी एकताका अनुभव)—इन सबके सहित सम्पूर्ण मोक्षशास्त्रका श्रवण किया है, आप आसक्तियोंसे मुक्त हो गये हैं और सम्पूर्ण बन्धनोंको काटकर खड़े हैं, तब आपकी छत्र-चवँर आदि विशेष-विशेष वस्तुओंमें आसक्ति कैसे हो रही है? ।। १६५-१६६ ।।
श्रुतं ते न श्रुतं मन्ये मृषा वापि श्रुतं श्रुतम् ।
अथवा श्रुतसंकाशं श्रुतमन्यच्छ्रुतं त्वया ।। १६७ ।।
मैं समझती हूँ कि आपने पंचशिखाचार्यसे शास्त्रका श्रवण करके भी श्रवण नहीं किया है अथवा उनसे यदि कोई शास्त्र सुना है तो उसे सुनकर भी मिथ्या कर दिया है; या यह भी हो सकता है कि आपने वेदशास्त्र-जैसा प्रतीत होनेवाला कोई और ही शास्त्र उनसे सुना हो ॥ १६७ ॥ अथापीमासु संज्ञासु लौकिकीषु प्रतिष्ठसे । अभिषङ्गावरोधाभ्यां बद्धस्त्वं प्राकृतो यथा ॥ १६८ ॥ इतनेपर भी यदि आप 'विदेहराज' 'मिथिलापति' आदि इन लौकिक नामोंमें ही प्रतिष्ठित हो रहे हैं तो आप दूसरे साधारण मनुष्योंकी भाँति आसक्ति और अवरोधसे ही बँधे हुए हैं ॥ १६८ ॥ सत्त्वेनानुप्रवेशो हि योऽयं त्वयि कृतो मया । किं तवापकृतं तत्र यदि मुक्तोऽसि सर्वशः ॥ १६९ ॥ यदि आप सर्वथा मुक्त हैं तो मैंने जो बुद्धिके द्वारा आपके भीतर प्रवेश किया है, इसमें आपका क्या अपराध किया है? ॥ १६९ ॥ नियमो ह्येष वर्णेषु यतीनां शून्यवासिता । शून्यमावेशयन्त्या च मया किं कस्य दूषितम् ॥ १७० ॥ इन सभी वर्णोंमें यह नियम प्रसिद्ध है कि संन्यासियोंको एकान्त स्थानमें रहना चाहिये। मैंने भी आपके शून्य शरीरमें निवास करके किसकी किस वस्तुको दूषित कर दिया है? ॥ १७० ॥ न पाणिभ्यां न बाहुभ्यां पादोरुभ्यां न चानघ । न गात्रावयवैरन्यैः स्पृशामि त्वां नराधिप ॥ १७१ ॥ निष्पाप नरेश! न तो हाथोंसे, न भुजाओंसे, न पैरोंसे, न जाँघोंसे और न शरीरके दूसरे ही अवयवोंसे मैं आपका स्पर्श कर रही हूँ ॥ १७१ ॥ कुले महति जातेन ह्रीमता दीर्घदर्शिना । नैतत्सदसि वक्तव्यं सद्वाऽसद्वा मिथः कृतम् ॥ १७२ ॥ आप महान् कुलमें उत्पन्न, लज्जाशील तथा दीर्घदर्शी पुरुष हैं। हम दोनोंने परस्पर भला या बुरा जो कुछ भी किया है, उसे आपको इस भरी सभामें नहीं कहना चाहिये ॥ १७२ ॥ ब्राह्मणा गुरवश्चेमे तथा मान्या गुरूत्तमाः । त्वं चाथ गुरुरप्येषामेवमन्योन्यगौरवम् ॥ १७३ ॥ यहाँ ये सभी वर्णोंके गुरु ब्राह्मण विद्यमान हैं। इन गुरुओंकी अपेक्षा भी उत्तम कितने ही माननीय महापुरुष यहाँ बैठे हैं तथा आप भी राजा होनेके कारण इन सबके लिये गुरुस्वरूप हैं। इस प्रकार आप सबका गौरव एक दूसरेपर अवलम्बित है ॥ १७३ ॥ तदेवमनुसंदृश्य वाच्यावाच्यं परीक्षता ।
स्त्रीपुंसोः समवायोऽयं त्वया वाच्यो न संसदि ॥ १७४ ॥
अतः इस प्रकार विचार करके यहाँ क्या कहना चाहिये और क्या नहीं, इसको जाँच-बूझ लेना आवश्यक है। इस भरी सभामें आपको स्त्री-पुरुषोंके संयोगकी चर्चा कदापि नहीं करनी चाहिये ॥ १७४ ॥
यथा पुष्करपर्णस्थं जलं तत्पर्णमस्पृशत् ।
तिष्ठत्यस्पृशती तद्वत् त्वयि वत्स्यामि मैथिल ॥ १७५ ॥
मिथिलानरेश! जैसे कमलके पत्तेपर पड़ा हुआ जल उस पत्तेका स्पर्श नहीं करता है, उसी प्रकार मैं आपका स्पर्श न करती हुई आपके भीतर निवास करूँगी ॥ १७५ ॥
यदि वाप्यस्पृशन्त्या मे स्पर्शं जानासि कञ्चन ।
ज्ञानं कृतमबीजं ते कथं तेनेह भिक्षुणा ॥ १७६ ॥
यद्यपि मैं स्पर्श नहीं कर रही हूँ तो भी यदि आप मेरे स्पर्शका अनुभव करते हैं तो मुझे यह कहना पड़ता है कि उन संन्यासी महात्मा पंचशिखने आपको ज्ञानका उपदेश कैसे कर दिया? क्योंकि आपने उसे निर्बीज कर दिया? ॥ १७६ ॥
स गार्हस्थ्याच्च्युतश्च त्वं मोक्षं चानाप्य दुर्विदम् ।
उभयोरन्तराले वै वर्तसे मोक्षवार्तिकः ॥ १७७ ॥
परस्त्रीके स्पर्शका अनुभव करनेके कारण आप गार्हस्थ्यधर्मसे तो गिर गये और दुर्बोध एवं दुर्लभ मोक्ष भी नहीं पा सके, अतः केवल मोक्षकी बात करते हुए आप गार्हस्थ्य और मोक्ष दोनोंके बीचमें लटक रहे हैं ॥
न हि मुक्तस्य मुक्तेन ज्ञस्यैकत्वपृथक्त्वयोः ।
भावाभावसमायोगे जायते वर्णसंकरः ॥ १७८ ॥
जीवन्मुक्त ज्ञानीका जीवन्मुक्त ज्ञानीके साथ, एकत्वका पृथक्त्वके साथ तथा भाव (आत्मा) का अभाव (प्रकृति) के साथ संयोग होनेपर वर्णसंकरताकी उत्पत्ति नहीं हो सकती ॥ १७८ ॥
वर्णाश्रमाः पृथक्त्वेन दृष्टार्थस्यापृथक्त्विनः ।
नान्यदन्यदिति ज्ञात्वा नान्यदन्यत्र वर्तते ॥ १७९ ॥
मैं मानती हूँ कि समस्त वर्ण और आश्रम पृथक्-पृथक् बताये गये हैं। तथापि जिसे ब्रह्मका साक्षात्कार हो गया है, जो अभेदज्ञानसे सम्पन्न है और यह जानकर सारा बर्ताव करता है कि आत्मासे भिन्न दूसरी किसी वस्तुकी सत्ता नहीं है तथा अन्य वस्तु अपनेसे भिन्न दूसरी वस्तुमें विद्यमान नहीं है, उसका किसी अन्यके साथ संयोग होना सम्भव नहीं है; अतः वर्णसंकरता नहीं हो सकती ॥ १७९ ॥
पाणौ कुण्डं तथा कुण्डे पयः पयसि मक्षिका ।
आश्रिताश्रययोगेन पृथक्त्वेनाश्रिताः पुनः ॥ १८० ॥
हाथमें कुंडी है, कुंडीमें दूध है और दूधमें मक्खी पड़ी हुई है। ये तीनों परस्पर पृथक् होते हुए भी आधाराधेय-भाव सम्बन्धसे एक दूसरेके आश्रित हो एक साथ हो गये हैं॥ १८०॥
न तु कुण्डे पयोभावः पयश्चापि न मक्षिका। स्वयमेवाप्नुवन्त्येते भावा ननु पराश्रयम्॥ १८१॥ फिर भी कुंडीमें दुग्धत्व नहीं आया है और दूध भी मक्खी नहीं बन गया है। ये सारे आधेय पदार्थ स्वयं ही अपनेसे भिन्न आधारको प्राप्त होते हैं॥ १८१॥
पृथक्त्वादाश्रमाणां च वर्णान्यत्वे तथैव च। परस्परपृथक्त्वाच्च कथं ते वर्णसंकरः॥ १८२॥ सारे आश्रम पृथक्-पृथक् हैं तथा चारों वर्ण भी भिन्न हैं। जब इनमें परस्पर पार्थक्य बना हुआ है, तब पृथक्त्वको जाननेवाले आपके वर्णका संकर कैसे हो सकता है?॥ १८२॥
नास्मि वर्णोत्तमा जात्या न वैश्या नावरा तथा। तव राजन् सवर्णास्मि शुद्धयोनिरविप्लुता॥ १८३॥ राजन्! मैं जातिसे ब्राह्मणी नहीं हूँ और न वैश्या अथवा शूद्रा ही हूँ। मैं तो आपके समान वर्णवाली क्षत्रिया ही हूँ। मेरा जन्म शुद्ध वंशमें हुआ है और मैंने अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन किया है॥ १८३॥
प्रधानो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः। कुले तस्य समुत्पन्नां सुलभां नाम विद्धि माम्॥ १८४॥ आपने प्रधान नामक राजर्षिका नाम अवश्य सुना होगा। मैं उन्हींके कुलमें उत्पन्न हुई हूँ। आपको मालूम होना चाहिये कि मेरा नाम सुलभा है॥ १८४॥
द्रोणश्च शतशृङ्गश्च चक्रद्वारश्च पर्वतः। मम सत्रेषु पूर्वेषां चिता मघवता सह॥ १८५॥ मेरे पूर्वजोंके यज्ञोंमें देवराज इन्द्रके सहयोगसे द्रोण, शतशृंग और चक्रद्वार नामक पर्वत यज्ञवेदीमें ईंटोंकी जगह चुने गये थे॥ १८५॥
साहं तस्मिन् कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे। विनीता मोक्षधर्मेषु चराम्येका मुनिव्रतम्॥ १८६॥ मेरा जन्म उसी महान् कुलमें हुआ है। मैंने अपने योग्य पतिके न मिलनेपर मोक्षधर्मकी शिक्षा ली तथा मुनिव्रत धारण करके मैं अकेली विचरती रहती हूँ॥
नास्मि सत्रप्रतिच्छन्ना न परस्वापहारिणी। न धर्मसंकरकरी स्वधर्मेऽस्मि धृतव्रता॥ १८७॥ मैंने संन्यासिनीका छद्मवेष नहीं धारण किया है। मैं पराये धनका अपहरण नहीं करती हूँ और न धर्मसंकरता ही फैलाती हूँ। मैं दृढ़तापूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करती हुई अपने
धर्ममें स्थित रहती हूँ ॥ १८७ ॥ नास्थिरा स्वप्रतिज्ञायां नासमीक्ष्य प्रवादिनी । नासमीक्ष्यागता चेह त्वत्सकाशं जनाधिप ॥ १८८ ॥ जनेश्वर! मैं अपनी प्रतिज्ञासे कभी विचलित नहीं होती हूँ। बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं बोलती हूँ और आपके पास भी यहाँ खूब सोच-विचारकर ही आयी हूँ ॥ १८८ ॥ मोक्षे ते भावितां बुद्धिं श्रुत्वाहं कुशलैषिणी । तव मोक्षस्य चाप्यस्य जिज्ञासार्थमिहागता ॥ १८९ ॥ मैंने सुना था कि आपकी बुद्धि मोक्षधर्ममें लगी हुई है, अतः आपकी मंगलाकांक्षिणी होकर आपके इस मोक्षज्ञानका मर्म जाननेके लिये मैं यहाँ आयी हूँ ॥ १८९ ॥ न वर्गस्था ब्रवीम्येतत् स्वपक्षपरपक्षयोः । मुक्तो व्यायच्छते यश्च शान्तौ यश्च न शाम्यति ॥ १९० ॥ मैं स्वपक्ष और परपक्षमेंसे अपने पक्षमें स्थित हो पक्षपातपूर्वक यह बात नहीं कह रही हूँ, आपके हितको दृष्टिमें रखकर बोलती हूँ; क्योंकि जो वाणीका व्यायाम नहीं करता और जो शान्त परब्रह्ममें निमग्न रहता है, वही मुक्त है ॥ १९० ॥ यथा शून्ये पुरागारे भिक्षुरेकां निशां वसेत् । तथाहं त्वच्छरीरेऽस्मिन्निमां वत्स्यामि शर्वरीम् ॥ १९१ ॥ जैसे नगरके किसी सूने घरमें संन्यासी एक रात निवास कर लेता है, इसी तरह आपके इस शरीरमें मैं आजकी रात रहूँगी ॥ १९१ ॥ साहं मानप्रदानेन वागातिथ्येन चार्चिता । सुप्ता सुशरणं प्रीता श्वो गमिष्यामि मैथिल ॥ १९२ ॥ आपने मुझे बड़ा सम्मान दिया। अपनी वाणीरूप आतिथ्यके द्वारा मेरा भलीभाँति सत्कार किया। मिथिलानरेश! अब मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके शरीररूपी सुन्दर गृहमें सोकर कल सबेरे यहाँसे चली जाऊँगी ॥ १९२ ॥
भीष्म उवाच
इत्येतानि स वाक्यानि हेतुमन्त्यर्थवन्ति च । श्रुत्वा नाधिजगौ राजा किञ्चिदन्यदतः परम् ॥ १९३ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! सुलभाके ये युक्तियुक्त और सार्थक वचन सुनकर राजा जनक इसके बाद और कोई बात नहीं बोले ॥ १९३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि सुलभाजनकसंवादे विंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३२० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें सुलभा और जनकका संवादविषयक तीन सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२० ॥
१. 'इह घटो अस्ति (यहाँ घड़ा है)'—इत्यादि रूपसे जो सत्तासूचक व्यवहार होता है, उसका नाम 'सद्भावयोग' है। २. 'इह घटो नास्ति (यहाँ घड़ा नहीं है)'—इत्यादि रूपसे जो असत्तासूचक व्यवहार होता है, वही 'असद्भावयोग' है। ३. यहाँ 'विधि' शब्दसे वासनाके बीजभूत धर्म और अधर्म समझने चाहिये। ४. वासनाका उद्बोधक संस्कार ही 'शुक्र' है। ५. वासनाके अनुसार विषयकी प्राप्तिके अनुकूल जो यत्न है, वही 'बल' है।
व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना
एकविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
व्यासजीका अपने पुत्र शुकदेवको वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान करना
युधिष्ठिर उवाच
कथं निर्वेदमापन्नः शुको वैयासकिः पुरा ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! पूर्वकालमें व्यासपुत्र शुकदेवको किस प्रकार वैराग्य प्राप्त हुआ था? मैं यह सुनना चाहता हूँ। इस विषयमें मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥
अव्यक्तव्यक्ततत्त्वानां निश्चयं बुद्धिनिश्चयम् ।
वक्तुमर्हसि कौरव्य देवस्याजस्य या कृतिः ॥ २ ॥
कुरूनन्दन! इसके सिवा आप मुझे व्यक्त और अव्यक्त तत्त्वोंका बुद्धिद्वारा निश्चित किया हुआ स्वरूप बतलाइये तथा अजन्मा भगवान् नारायणका जो चरित्र है, उसे भी सुनानेकी कृपा करें ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
प्राकृतेन सुवृत्तेन चरन्तमकुतोभयम् ।
अध्याप्य कृत्स्नं स्वाध्यायमन्वशाद् वै पिता सुतम् ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! पुत्र शुकदेवको साधारण लोगोंकी भाँति आचरण करते और सर्वथा निर्भय विचरते देख पिता श्रीव्यासजीने उन्हें सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कराया और फिर यह उपदेश दिया ॥ ३ ॥
व्यास उवाच
धर्मं पुत्र निषेवस्व सुतीक्ष्णौ च हिमातपौ ।
क्षुत्पिपासे च वायुं च जय नित्यं जितेन्द्रियः ॥ ४ ॥
व्यासजीने कहा— बेटा! तुम सदा धर्मका सेवन करते रहो और जितेन्द्रिय होकर कड़ीसे कड़ी सर्दी, गर्मी, भूख-प्यासको सहन करते हुए प्राणवायुपर विजय प्राप्त करो ॥ ४ ॥
सत्यमार्जवमक्रोधमनसूयां दमं तपः ।
अहिंसां चानृशंस्यं च विधिवत् परिपालय ॥ ५ ॥
सत्य, सरलता, अक्रोध, दोषदर्शनका अभाव, इन्द्रिय-संयम, तप, अहिंसा और दया आदि धर्मोंका विधिपूर्वक पालन करो ॥ ५ ॥
सत्ये तिष्ठ रतो धर्मे हित्वा सर्वमनार्जवम् । देवतातिथिशेषेण मात्रां प्राणस्य संलिह ।। ६ ।। सत्यपर डटे रहो तथा सब प्रकारकी वक्रता छोड़कर धर्ममें अनुराग करो। देवताओं और अतिथियोंका सत्कार करके जो अन्न बचे, उसीका प्राणरक्षाके लिये आस्वादन करो ।। ६ ।।
फेनमात्रोपमे देहे जीवे शकुनिवत् स्थिते । अनित्ये प्रियससंवासे कथं स्वपिषि पुत्रक ।। ७ ।। बेटा! यह शरीर जलके फेनकी तरह क्षणभंगुर है। इसमें जीव पक्षीकी तरह बसा हुआ है और यह प्रियजनोंका सहवास भी सदा रहनेवाला नहीं है। फिर भी तुम क्यों सोये पड़े हो? ।। ७ ।।
अप्रमत्तेषु जाग्रत्सु नित्ययुक्तेषु शत्रुपु । अन्तरं लिप्समानेषु बालस्त्वं नावबुध्यसे ।। ८ ।। तुम्हारे शत्रु सर्वदा सावधान, जो हुए, सर्वथा उद्यत और तुम्हारे छिद्रोंको देखनेमें लगे हुए हैं; परंतु तुम अभी बालक हो, इसलिये समझ नहीं रहे हो ।। ८ ।।
अहःसु गण्यमानेषु क्षीयमाणे तथाऽऽयुषि । जीविते लिख्यमाने च किमुत्थाय न धावसि ।। ९ ।। तुम्हारी आयुके दिन गिने जा रहे हैं। आयु क्षीण होती जा रही है और जीवन मानो कहीं लिखा जा रहा है (समाप्त हो रहा है)। फिर तुम उठकर भागते क्यों नहीं हो? (शीघ्रतापूर्वक कर्तव्यपालनमें लग क्यों नहीं जाते हो?) ।। ९ ।।
ऐहलौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् । पारलौकिककार्येषु प्रसुप्ता भृशनास्तिकाः ।। १० ।। अत्यन्त नास्तिक मनुष्य केवल इस लोकके स्वार्थको चाहते हुए शरीरमें मांस और रक्तको बढ़ाने-वाली चेष्टा ही करते रहते हैं। पारलौकिक कार्योंकी ओरसे तो वे सदा सोये ही रहते हैं ।। १० ।।
धर्माय येऽभ्यसूयन्ति बुद्धिमोहान्विता नराः । अपथा गच्छतां तेषामनुयाताऽपि पीड्यते ।। ११ ।। जो बुद्धिके व्यामोहमें डूबे हुए मनुष्य धर्मसे द्वेष करते हैं, वे सदा कुमार्गसे ही चलते हैं। उनकी तो बात ही क्या है, उनके अनुयायियोंको भी कष्ट भोगना पड़ता है ।। ११ ।।
ये तु तुष्टाः श्रुतिपरा महात्मानो महाबलाः । धर्म्यं पन्थानमारूढास्तानुपास्स्व च पृच्छ च ।। १२ ।।
इसलिए जो महान् धर्मबलसे सम्पन्न महात्मा पुरुष संतुष्ट और श्रुतिपरायण होकर सर्वदा धर्मपथपर ही आरूढ़ रहते हैं, तुम उन्हींकी सेवामें रहो और उन्हींसे अपना कर्तव्य पूछो ।। १२ ।।
उपधार्य मतं तेषां बुधानां धर्मदर्शिनाम् ।
नियच्छ परया बुद्ध्या चित्तमुत्पथगामि वै ।। १३ ।।
उन धर्मदर्शी विद्वानोंका मत जानकर तुम अपनी श्रेष्ठ बुद्धिके द्वारा अपने कुपथगामी मनको काबूमें करो ।। १३ ।।
आद्यकालिकया बुद्ध्या दूरे श्व इति निर्भयाः ।
सर्वभक्ष्या न पश्यन्ति कर्मभूमिमचेतसः ।। १४ ।।
जिसकी केवल वर्तमान सुखपर ही दृष्टि रहती है, उस बुद्धिके द्वारा भावी परिणामको बहुत दूर जानकर जो निर्भय रहते और सब प्रकारके अभक्ष्य पदार्थोंको खाते रहते हैं, वे बुद्धिहीन मनुष्य इस कर्मभूमिके महत्त्वको नहीं देख पाते हैं ।। १४ ।।
धर्मं निःश्रेणिमास्थाय किंचित् किंचित् समारुह ।
कोषकारवदात्मानं वेष्टयन्नानुबुध्यसे ।। १५ ।।
तुम धर्मरूपी सीढ़ीको पाकर धीरे-धीरे उसपर चढ़ते जाओ। अभी तो तुम रेशमके कीड़ेकी तरह अपने-आपको वासनाओंके जालसे ही लपेटते जा रहे हो, तुम्हें चेत नहीं हो रहा है ।। १५ ।।
नास्तिकं भिन्नमर्यादं कूलपातमिव स्थितम् ।
वामतः कुरु विस्रब्धो नरं वेणुमिवोद्धृतम् ।। १६ ।।
जो नास्तिक हो, धर्मकी मर्यादा भंग कर रहा हो और किनारेको तोड़-फोड़कर गिरा देनेवाले नदीके महान् जल-प्रवाहकी भाँति स्थित हो, ऐसे मनुष्यको उखाड़े हुए बाँसकी तरह बिना किसी हिचकके त्याग दो ।। १६ ।।
कामं क्रोधं च मृत्युं च पञ्चेन्द्रियजलां नदीम् ।
नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर ।। १७ ।।
काम, क्रोध, मृत्यु और जिसमें पाँच इन्द्रियरूपी जल भरा हुआ है, ऐसी विषयासक्तिरूपी नदीको तुम सात्त्विकी धृतिरूप नौकाका आश्रय ले पार कर लो और इस प्रकार जन्म-मृत्युरूपी दुर्गम संकटसे पार हो जाओ ।। १७ ।।
मृत्युनाभ्याहते लोके जरया परिपीडिते ।
अमोघासु पतन्तीषु धर्मपोतेन संतर ।। १८ ।।
सारा संसार मृत्युके थपेड़े खाता हुआ वृद्धावस्थासे पीड़ित हो रहा है। ये रातें प्राणियोंकी आयुका अपहरण करके अपनेको सफल बनाती हुई बीत रही हैं। तुम धर्मरूपी नौकापर चढ़कर भवसागरसे पार हो जाओ ।।
तिष्ठन्तं च शयानं च मृत्युरन्वेषते यदा । निर्वृत्तिं लभते कस्मादकस्मान्मृत्युनाशितः ॥ १९ ॥ मनुष्य खड़ा हो या सो रहा हो, मृत्यु निरन्तर उसे खोजती फिरती है। जब इस प्रकार तुम अकस्मात् मृत्युके ग्रास बन जानेवाले हो, तब इस तरह निश्चिन्त एवं शान्त कैसे बैठे हो? ॥ १९ ॥
संचिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् । वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति ॥ २० ॥ मनुष्य भोगसामग्रियोंके संचयमें लगा ही रहता है और उनसे तृप्त भी नहीं होने पाता है कि भेड़के बच्चेको उठा ले जानेवाली बाघिनकी भाँति मौत उसे अपनी दाढ़में दबाकर चल देती है ॥ २० ॥
क्रमशः संचितशिखो धर्मबुद्धिमयो महान् । अन्धकारे प्रवेष्टव्यं दीपो यत्नेन धार्यताम् ॥ २१ ॥ यदि तुम्हें इस संसाररूपी अन्धकारमें प्रवेश करना है तो हाथमें उस धर्म-बुद्धिमय महान् दीपकको यत्नपूर्वक धारण कर लो, जिसकी शिखा क्रमशः प्रज्वलित हो रही हो ॥ २१ ॥
सम्पतन् देहजालानि कदाचिदिह मानुषे । ब्राह्मण्यं लभते जन्तुस्तत् पुत्र परिपालय ॥ २२ ॥ बेटा! जीव अनेक प्रकारके शरीरोंमें जन्मता-मरता हुआ कभी इस मानव-योनिमें आकर ब्राह्मणका शरीर पाता है, अतः तुम ब्राह्मणोचित कर्तव्यका पालन करो ॥
ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं न कामार्थाय जायते । इह क्लेशाय तपसे प्रेत्य त्वनुपमं सुखम् ॥ २३ ॥ ब्राह्मणका यह शरीर भोग भोगनेके लिये नहीं पैदा होता है। यह तो यहाँ क्लेश उठाकर तपस्या करने और मृत्युके पश्चात् अनुपम सुख भोगनेके लिये रचा गया है ॥ २३ ॥
ब्राह्मण्यं बहुभिरवाप्यते तपोभि- स्तल्लब्ध्वा न रतिपरेण हेलितव्यम् । स्वाध्याये तपसि दमे च नित्ययुक्तः क्षेमार्थी कुशलपरः सदा यतस्व ॥ २४ ॥ बहुत समयतक बड़ी भारी तपस्या करनेसे ब्राह्मणका शरीर मिलता है। उसे पाकर विषयानुरागमें फँसकर बरबाद नहीं करना चाहिये। अतः यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो कुशलप्रद कर्ममें संलग्न हो सदा स्वाध्याय, तपस्या और इन्द्रियसंयममें पूर्णतः तत्पर रहनेका प्रयत्न करो ॥ २४ ॥