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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

‘ब्रह्मन्! आप जैसी आज्ञा देते हैं, निश्चय ही वैसा ही होगा। जब महर्षि व्यास आपको पुकारेंगे, तब हम सब लोग उन्हें उत्तर देंगी’ ।। ३१ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकाभिपतने
द्वात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ।। ३३२ ।।
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवजीका ऊर्ध्वगमनविषयक तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३३२ ।।

३३३-

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त्रयस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

शुकदेवजीकी परमपद-प्राप्ति तथा पुत्र-शोकसे व्याकुल व्यासजीको महादेवजीका आश्वासन देना

भीष्म उवाच

इत्येवमुक्त्वा वचनं ब्रह्मर्षिः सुमहातपाः ।
प्रातिष्ठत शुकः सिद्धिं हित्वा दोषांश्चतुर्विधान् ॥ १ ॥
तमो ह्यष्टविधं हित्वा जहौ पञ्चविधं रजः ।
ततः सत्त्वं जहौ धीमांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! यह वचन कहकर महातपस्वी शुकदेवजी सिद्धि पानेके उद्देश्यसे आगे बढ़ गये। बुद्धिमान् शुकने चार प्रकारके दोषोंका, आठ प्रकारके तमोगुणका तथा पाँच प्रकारके रजोगुणका परित्याग करके सत्त्वगुणको भी त्याग दिया*; यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ १-२ ॥

ततस्तस्मिन् पदे नित्ये निर्गुणे लिङ्गवर्जिते ।
ब्रह्मणि प्रत्यतिष्ठत् स विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् वे नित्य निर्गुण एवं लिंगरहित ब्रह्मपदमें स्थित हो गये। उस समय उनका तेज धूमहीन अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहा था ॥ ३ ॥

उल्कापाता दिशां दाहो भूमिकम्पस्तथैव च ।
प्रादुर्भूतः क्षणे तस्मिंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४ ॥
उसी क्षण उल्काएँ टूटकर गिरने लगीं। दिशाओंमें दाह होने लगा और धरती डोलने लगी। यह सब आश्चर्यकी-सी घटना घटित हुई ॥ ४ ॥

द्रुमाः शाखाश्च मुमुचुः शिखराणि च पर्वताः ।
निर्घातशब्दैश्च गिरिर्हिमवान् दीर्यतीव ह ॥ ५ ॥
वृक्षोंने अपनी शाखाएँ अपने-आप तोड़कर गिरा दीं। पर्वतोंने अपने शिखर भंग कर दिये। वज्रपातके शब्दोंसे गिरिराज हिमालय विदीर्ण-सा होता जान पड़ता था ॥ ५ ॥

न बभासे सहस्रांशुर्न जज्वल च पावकः ।
ह्रदाश्च सरितश्चैव चुक्षुभुः सागरास्तथा ॥ ६ ॥
सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी। आग प्रज्वलित नहीं होती थी। सरोवर, सरिता और समुद्र सभी क्षुब्ध हो उठे ॥

ववर्ष वासवस्तोयं रसवच्च सुगन्धि च ।
ववौ समीरणश्चापि दिव्यगन्धवहः शुचिः ॥ ७ ॥

इन्द्रने सरस और सुगन्धित जलकी वर्षा की तथा दिव्य गन्ध फैलाती हुई परम पवित्र वायु चलने लगी।।

स शृङ्गे प्रथमे दिव्ये हिमवन्मेरुसम्भवे । संश्लिष्टे श्वेतपीते द्वे रुक्मरूप्यमये शुभे ॥ ८ ॥ शतयोजनविस्तारे तिर्यगूर्ध्वं च भारत । उदीचीं दिशमास्थाय रुचिरे संददर्श ह ॥ ९ ॥ भरतनन्दन! आगे बढ़नेपर श्रीशुकदेवजीने पर्वतके दो दिव्य एवं सुन्दर शिखर देखे, जो एक-दूसरेसे सटे हुए थे। उनमेंसे एक हिमालयका शिखर था और दूसरा मेरु पर्वतका। हिमालयका शिखर रजतमय होनेके कारण श्वेत दिखायी देता था और सुमेरुका स्वर्णमय शृंग पीले रंगका था। इन दोनोंकी लंबाई-चौड़ाई और ऊँचाई सौ-सौ योजनकी थी। उत्तरदिशाकी ओर जाते समय ये दोनों सुरम्य शिखर शुकदेवजीकी दृष्टिमें पड़े ॥ ८-९ ॥

सोऽविशङ्केन मनसा तदैवाभ्यपतच्छुकः । ततः पर्वतशृङ्गे द्वे सहसैव द्विधाकृते ॥ १० ॥ अदृश्येतां महाराज तदद्भुतमिवाभवत् । उन्हें देखकर वे पूर्ववत् निःशंक मनसे उनके ऊपर चढ़ गये। फिर तो वे दोनों पर्वतशिखर सहसा दो भागोंमें बँट गये और बीचसे फटे हुए-से दिखायी देने लगे। महाराज! यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ १० ½ ॥

ततः पर्वतशृङ्गाभ्यां सहसैव विनिःसृतः ॥ ११ ॥ न च प्रतिजघानास्य स गतिं पर्वतोत्तमः । तत्पश्चात् उन पर्वतशिखरोंसे वे सहसा आगे निकल गये। वह श्रेष्ठ पर्वत उनकी गतिको रोक न सका ॥

ततो महानभूच्छब्दो दिवि सर्वदिवौकसाम् ॥ १२ ॥ गन्धर्वाणामृषीणां च ये च शैलनिवासिनः । यह देख सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों तथा जो उस पर्वतपर रहनेवाले दूसरे लोग थे, उन सबने बड़े जोरसे हर्षनाद किया। उनकी हर्षध्वनि आकाशमें चारों ओर गूँज उठी ॥ १२ ½ ॥

दृष्ट्वा शुकमतिक्रान्तं पर्वतं च द्विधाकृतम् ॥ १३ ॥ साधु साध्विति तत्रासीन्नादः सर्वत्र भारत । भारत! शुकदेवजीको पर्वत लाँघकर आगे बढ़ते और उस पर्वतको दो टुकड़ोंमें विदीर्ण होते देख वहाँ सब ओर 'साधु-साधु' शब्द सुनायी पड़ने लगे ॥ १३ ½ ॥

स पूज्यमानो देवैश्च गन्धर्वैर्ऋषिभिस्तथा ॥ १४ ॥ यक्षराक्षससंघैश्च विद्याधरगणैस्तथा । दिव्यैः पुष्पैः समाकीर्णमन्तरिक्षं समन्ततः ॥ १५ ॥

आसीत् किल महाराज शुकाभिपतने तदा । महाराज! देवता, गन्धर्व, ऋषि, यक्ष, राक्षस और विद्याधरोंने उनका पूजन किया। वहाँसे शुकदेवजीके ऊपर उठते समय उनके चढ़ाये हुए दिव्य पुष्पोंकी वर्षासे वहाँ सब ओरका सारा आकाश छा गया ॥ १४-१५ १/२ ॥

ततो मन्दाकिनीं रम्यामुपरिष्टादभिव्रजन् ॥ १६ ॥ शुको ददर्श धर्मात्मा पुष्पितद्रुमकाननाम् । राजन्! धर्मात्मा शुकने ऊर्ध्वलोकमें जाते समय खिले हुए वृक्षों और वनोंसे सुशोभित रमणीय मन्दाकिनी (आकाशगंगा) का दर्शन किया ॥ १६ १/२ ॥

तस्यां क्रीडन्त्यभिरतास्ते चैवाप्सरसां गणाः ॥ १७ ॥ शून्याकारं निराकाराः शुकं दृष्ट्वा विवाससः । उसमें बहुत-सी अप्सराएँ स्नान एवं जलक्रीड़ा कर रही थीं। यद्यपि वे नंगी थीं, तो भी शुकदेवजीको शून्याकार (बाह्यज्ञानसे रहित एवं आत्मनिष्ठ) देख अपने शरीरको ढकने या छिपानेके लिये उद्यत नहीं हुईं ॥

तं प्रक्रामन्तमाज्ञाय पिता स्नेहसमन्वितः ॥ १८ ॥ उत्तमां गतिमास्थाय पृष्ठतोऽनुससार ह । उन्हें इस प्रकार सिद्धिके लिये उत्क्रमण करते जान उनके पिता वेदव्यासजी भी स्नेहवश उत्तम गतिका आश्रय ले उनके पीछे-पीछे जाने लगे ॥ १८ १/२ ॥

शुकस्तु मारुतादूर्ध्वं गतिं कृत्वान्तरिक्षगाम् ॥ १९ ॥ दर्शयित्वा प्रभावं स्वं ब्रह्मभूतोऽभवत् तदा । उधर शुकदेव वायुसे आकाशगामिनी ऊर्ध्वगतिका आश्रय ले अपना प्रभाव दिखाकर तत्काल ब्रह्मीभूत हो गये ॥

महायोगगतिं त्वन्यां व्यासोत्थाय महातपाः ॥ २० ॥ निमेषान्तरमात्रेण शुकाभिपतनं ययौ । स ददर्श द्विधा कृत्वा पर्वताग्रं शुकं गतम् ॥ २१ ॥ महातपस्वी व्यासजी दूसरी महायोगसम्बन्धिनी गतिका अवलम्बन करके ऊपरको उठे और पलक मारते-मारते उस स्थानपर जा पहुँचे, जहाँसे उन पर्वत-शिखरोंको दो भागोंमें विदीर्ण करके शुकदेवजी आगे बढ़े थे। वह स्थान शुकाभिपतनके नामसे प्रसिद्ध हो गया था। उन्होंने उस स्थानको देखा ॥ २०-२१ ॥

शशंसुर्ऋषयस्तत्र कर्म पुत्रस्य तत् तदा । ततः शुकेति दीर्घेण शब्देनाक्रन्दितस्तदा ॥ २२ ॥ वहाँ रहनेवाले ऋषियोंने आकर व्यासजीसे उनके पुत्रका वह अलौकिक कर्म कह सुनाया। तब व्यासजीने शुकदेवका नाम लेकर बड़े जोरसे रोदन किया ॥ २२ ॥

स्वयं पित्रा स्वरेणोच्चैस्त्रींल्लोँकाननुनाद्य वै ।

शुकः सर्वगतो भूत्वा सर्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ २३ ॥
प्रत्यभाषत धर्मात्मा भो शब्देनानुनादयन् ।
जब पिताने उच्च स्वरसे तीनों लोकोंको गुँजाते हुए पुकारा, तब सर्वव्यापी, सर्वात्मा एवं सर्वतोमुख होकर धर्मात्मा शुकने 'भोः' शब्दसे सम्पूर्ण जगत्को प्रतिध्वनित करते हुए पिताको उत्तर दिया ॥ २३ १/२ ॥

तत एकाक्षरं नादं भोरित्येव समीरयन् ॥ २४ ॥
प्रत्याहरज्जगत् सर्वमुच्चैः स्थावरजङ्गमम् ।
उसीके साथ-साथ सम्पूर्ण चराचर जगत्ने उच्च स्वरसे 'भोः' इस एकाक्षर शब्दका उच्चारण करते हुए उत्तर दिया ॥

ततः प्रभृति चाद्यापि शब्दानुच्चारितान् पृथक् ॥ २५ ॥
गिरिगह्वरपृष्ठेषु व्याहरन्ति शुकं प्रति ।
तभीसे आजतक पर्वतोंके शिखरपर अथवा गुफाओंके आस-पास जब-जब आवाज दी जाती है, तब-तब वहाँके चराचर निवासी प्रतिध्वनिके रूपमें उसका उत्तर देते हैं, जैसा कि उन्होंने शुकदेवजीके लिये किया था ॥

अन्तर्हितः प्रभावं तु दर्शयित्वा शुकस्तदा ॥ २६ ॥
गुणान् संत्यज्य शब्दादीन् पदमभ्यगमत् परम् ।
इस प्रकार अपना प्रभाव दिखलाकर शुकदेवजी अन्तर्धान हो गये और शब्द आदि गुणोंका परित्याग करके परमपदको प्राप्त हुए ॥ २६ १/२ ॥

महिमानं तु तं दृष्ट्वा पुत्रस्यामिततेजसः ॥ २७ ॥
निषसाद गिरिप्रस्थे पुत्रमेवानुचिन्तयन् ।
अपने अमिततेजस्वी पुत्रकी यह महिमा देखकर व्यासजी उसीका चिन्तन करते हुए उस पर्वतके शिखरपर बैठ गये ॥ २७ १/२ ॥

ततो मन्दाकिनीतीरे क्रीडन्तोऽप्सरसां गणाः ॥ २८ ॥
आसाद्य तमृषिं सर्वाः सम्भ्रान्ता गतचेतसः ।
जले निलिल्यिरे काश्चित् काश्चिद् गुल्मान् प्रपेदिरे ॥ २९ ॥
उस समय मन्दाकिनीके तटपर क्रीड़ा करती हुई समस्त अप्सराएँ महर्षि व्यासको अपने निकट पाकर बड़ी घबराहटमें पड़ गयीं, अचेत-सी हो गयीं। कोई जलमें छिप गयीं और कोई लताओंकी झुरमुटमें ॥

वसनान्याददुः काश्चित् तं दृष्ट्वा मुनिसत्तमम् ।
तां मुक्ततां तु विज्ञाय मुनिः पुत्रस्य वै तदा ॥ ३० ॥
सक्ततामात्मनश्चैव प्रीतोऽभूद् व्रीडितश्च ह ॥ ३१ ॥
कुछ अप्सराओंने मुनिश्रेष्ठ व्यासको देखकर अपने वस्त्र पहन लिये। उस समय अपने पुत्रकी मुक्तता जानकर मुनि बड़े प्रसन्न हुए और अपनी आसक्तिका विचार करके वे बहुत

लज्जित भी हुए ॥ ३०-३१ ॥ तं देवगन्धर्ववृतो महर्षिगणपूजितः । पिनाकहस्तो भगवानभ्यागच्छत शंकरः ॥ ३२ ॥ तमुवाच महादेवः सान्त्वपूर्वमिदं वचः । पुत्रशोकाभिसंतप्तं कृष्णद्वैपायनं तदा ॥ ३३ ॥ इसी समय देवताओं और गन्धर्वोंसे घिरे हुए तथा महर्षियोंसे पूजित पिनाकधारी भगवान् शंकर वहाँ आ पहुँचे और पुत्र-शोकसे संतप्त वेदव्यासजीको सान्त्वना देते हुए कहने लगे— ॥ ३२-३३ ॥ अग्नेर्भूमेरपां वायोरन्तरिक्षस्य चैव ह । वीर्येण सदृशः पुत्रः पुरा मत्तस्त्वया वृतः ॥ ३४ ॥ स तथालक्षणो जातस्तपसा तव सम्भृतः । मम चैव प्रसादेन ब्रह्मतेजोमयः शुचिः ॥ ३५ ॥ ‘ब्रह्मन्! तुमने पहले अग्नि, भूमि, जल, वायु और आकाशके समान शक्तिशाली पुत्र होनेका मुझसे वरदान माँगा था; अतः तुम्हें तुम्हारी तपस्याके प्रभाव तथा मेरी कृपासे पालित वैसा ही पुत्र प्राप्त हुआ। वह ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और परम पवित्र था ॥ ३४-३५ ॥ स गतिं परमां प्राप्तो दुष्प्रापामजितेन्द्रियैः । दैवतैरपि विप्रर्षे तं त्वं किमनुशोचसि ॥ ३६ ॥ ‘ब्रह्मर्षे! इस समय उसने ऐसी उत्तम गति प्राप्त की है, जो अजितेन्द्रिय पुरुषों तथा देवताओंके लिये भी दुर्लभ है, फिर भी तुम उसके लिये क्यों शोक कर रहे हो? ॥ ३६ ॥ यावत् स्थास्यन्ति गिरयो यावत् स्थास्यन्ति सागराः । तावत् तवाक्षया कीर्तिः सपुत्रस्य भविष्यति ॥ ३७ ॥ ‘जबतक इस संसारमें पर्वतोंकी सत्ता रहेगी और जबतक समुद्रोंकी स्थिति बनी रहेगी, तबतक तुम्हारी और तुम्हारे पुत्रकी अक्षय कीर्ति इस संसारमें छायी रहेगी ॥ छायां स्वपुत्रसदृशीं सर्वतोऽनपगां सदा । द्रक्ष्यसे त्वं च लोकेऽस्मिन् मत्प्रसादान्महामुने ॥ ३८ ॥ ‘महामुने! तुम मेरे प्रसादसे इस जगत्में सदा अपने पुत्रसदृश छायाका दर्शन करते रहोगे। वह सब ओर दिखायी देगी, कभी तुम्हारी आँखोंसे ओझल न होगी’ ॥ सोऽनुनीतो भगवता स्वयं रुद्रेण भारत । छायां पश्यन् समावृत्तः स मुनिः परया मुदा ॥ ३९ ॥ भरतनन्दन! साक्षात् भगवान् शंकरके इस प्रकार आश्वासन देनेपर सर्वत्र अपने पुत्रकी छाया देखते हुए मुनिवर व्यास बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने आश्रमपर लौट आये ॥ ३९ ॥ इति जन्म गतिश्चैव शुकस्य भरतर्षभ । विस्तरेण समाख्याता यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ४० ॥

भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुम मुझसे जिसके विषयमें पूछ रहे थे, वह शुकदेवजीके जन्म और परमपद-प्राप्तिकी कथा मैंने तुम्हें विस्तारसे सुनायी है ॥ ४० ॥

एतदाचष्ट मे राजन् देवर्षिनारदः पुरा ।
व्यासश्चैव महायोगी संजल्पेषु पदे पदे ॥ ४१ ॥

राजन्! सबसे पहले देवर्षि नारदजीने यह वृत्तान्त मुझे बताया था। महायोगी व्यासजी भी बातचीतके प्रसंगमें पद-पदपर इस प्रसंगको दुहराया करते हैं ॥ ४१ ॥

इतिहासमिमं पुण्यं मोक्षधर्मोपसंहितम् ।
धारयेद् यः शमपरः स गच्छेत् परमां गतिम् ॥ ४२ ॥

जो पुरुष मोक्षधर्मसे युक्त इस परम पवित्र इतिहासको सुनकर या पढ़कर अपने हृदयमें धारण करेगा, वह शान्तिपरायण हो परमगति (मोक्ष) को प्राप्त होगा ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकोत्पतनसमाप्तिर्नाम
त्रयस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिके वर्णनकी समाप्ति नामक तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३३ ॥


* सत्त्वगुण भी सुख और ज्ञानके सम्बन्धसे बाँधनेवाला होता है। ‘मैं सुखी हूँ, अज्ञानी हूँ,’ ऐसा जो अभिमान हो जाता है, वह ज्ञानीको गुणातीत अवस्थासे वंचित रख देता है। इसलिये यहाँ सत्त्वगुणको भी त्याग देनेकी बात कही गयी है।

३३४-

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चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

बदरिकाश्रममें नारदजीके पूछनेपर भगवान् नारायणका परमदेव परमात्माको ही सर्वश्रेष्ठ पूजनीय बताना

युधिष्ठिर उवाच

गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः ।
य इच्छेत् सिद्धिमास्थातुं देवतां कां यजेत सः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी जो भी सिद्धि पाना चाहे, वह किस देवताका पूजन करे? ॥ १ ॥

कुतो ह्यस्य ध्रुवः स्वर्गः कुतो नैःश्रेयसं परम् ।
विधिना केन जुहुयाद् दैवं पित्र्यं तथैव च ॥ २ ॥
मनुष्यको अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? उसे परम कल्याण किस साधनसे सुलभ हो सकता है? वह किस विधिसे देवताओं तथा पितरोंके उद्देश्यसे होम करे? ॥ २ ॥

मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः ।
स्वर्गतश्चैव किं कुर्याद् येन न च्यवते दिवः ॥ ३ ॥
मुक्त पुरुष किस गतिको प्राप्त होता है? मोक्षका क्या स्वरूप है? स्वर्गमें गये हुए मनुष्यको क्या करना चाहिये, जिससे वह स्वर्गसे नीचे न गिरे? ॥ ३ ॥

देवतानां च को देवः पितॄणां च पिता तथा ।
तस्मात् परतरं यच्च तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ४ ॥
देवताओंका भी देवता और पितरोंका भी पिता कौन है? अथवा उससे भी श्रेष्ठ तत्त्व क्या है? पितामह! इन सब बातोंको आप मुझे बताइये ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

गूढं मां प्रश्नवित् प्रश्नं पृच्छसे त्वमिहानघ ।
न ह्येतत् तर्कया शक्यं वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ ५ ॥

ऋते देवप्रसादाद् वा राजन् ज्ञानागमेन वा ।
गहनं ह्येतदाख्यानं व्याख्यातव्यं तवारिहन् ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**निष्पाप युधिष्ठिर! तुम प्रश्न करना खूब जानते हो। इस समय तुमने मुझसे बड़ा गूढ़ प्रश्न किया है। राजन्! भगवान्‌की कृपा अथवा ज्ञानप्रधान शास्त्रके बिना केवल तर्कके द्वारा सैकड़ों वर्षोंमें भी इन प्रश्नोंका उत्तर नहीं दिया जा सकता। शत्रुसूदन!

यद्यपि यह विषय समझनेमें बहुत कठिन है, तो भी तुम्हारे लिये तो इसकी व्याख्या करनी ही है ।। ५-६ ।।

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादमृषेर्नारायणस्य च ।। ७ ।।
इस विषयमें जानकार लोग देवर्षि नारद और नारायण ऋषिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। ७ ।।

नारायणो हि विश्वात्मा चतुर्मूर्तिः सनातनः ।
धर्मात्मजः सम्बभूव पितैवं मेऽभ्यभाषत ।। ८ ।।
मेरे पिताजीने मुझे यह बताया था कि भगवान् नारायण सम्पूर्ण जगत्के आत्मा, चतुर्मूर्ति और सनातन देवता हैं। वे ही एक समय धर्मके पुत्ररूपसे प्रकट हुए थे ।। ८ ।।

कृते युगे महाराज पुरा स्वायम्भुवेऽन्तरे ।
नरो नारायणश्चैव हरिः कृष्णः स्वयम्भुवः ।। ९ ।।
महाराज! स्वायम्भुव मन्वन्तरके सत्ययुगमें उन स्वयम्भू भगवान् वासुदेवके चार अवतार हुए थे, जिनके नाम इस प्रकार हैं—नर, नारायण, हरि और कृष्ण ।। ९ ।।

तेषां नारायणनरौ तपस्तेपतुरव्ययौ ।
बदर्याश्रममासाद्य शकटे कनकामये ।। १० ।।
उनमेंसे अविनाशी नारायण और नर बदरिकाश्रममें जाकर एक सुवर्णमय रथपर स्थित हो घोर तपस्या करने लगे ।। १० ।।

अष्टचक्रं हि तद् यानं भूतयुक्तं मनोरमम् ।
तत्राद्यौ लोकनाथौ तौ कृशौ धमनिसंततौ ।। ११ ।।
तपसा तेजसा चैव दुर्निरीक्ष्यौ सुरैरपि ।
यस्य प्रसादं कुर्वाते स देवौ द्रष्टुमर्हति ।। १२ ।।
उनका वह मनोरम रथ आठ पहियोंसे युक्त था और उसमें अनेकानेक प्राणी जुते हुए थे। वे दोनों आदिपुरुष जगदीश्वर तपस्या करते-करते अत्यन्त दुर्बल हो गये। उनके शरीरकी नसें दिखायी देने लगीं। तपस्यासे उनका तेज इतना बढ़ गया था कि देवताओंको भी उनकी ओर देखना कठिन हो रहा था। जिनपर वे कृपा करते थे, वही उन दोनों देवेश्वरोंका दर्शन कर सकता था ।। ११-१२ ।।

नूनं तयोरनुमते हृदि हृच्छयचोदितः ।
महामेरोर्गिरेः शृङ्गात् प्रच्युतो गन्धमादनम् ।। १३ ।।
निश्चय ही उन दोनोंकी इच्छाके अनुसार अपने हृदयमें अन्तर्यामीकी प्रेरणा होनेपर देवर्षि नारद महामेरु पर्वतके शिखरसे गन्धमादन पर्वतपर उतर पड़े ।। १३ ।।

नारदः सुमहद्भूतं सर्वलोकानचीचरत् ।
तं देशमगमद् राजन् बदर्याश्रममाशुगः ।। १४ ।।

राजन्! नारदजी सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते थे; अतः वे शीघ्रगामी मुनि बदरिकाश्रमके उस विशाल प्रदेशमें घूमते-घामते आ पहुँचे, जो महान् प्राणियोंसे युक्त था॥ तयोराह्निकवेलायां तस्य कौतूहलं त्वभूत्। इदं तदास्पदं कृत्स्नं यस्मिंल्लोकाः प्रतिष्ठिताः॥ १५॥ सदेवासुरगन्धर्वाः सकिन्नरमहोरगाः। जब वहाँ भगवान् नर और नारायणके नित्यकर्मका समय हुआ, उसी समय नारदजीके मनमें उनके दर्शनके लिये बड़ी उत्कण्ठा हुई। वे सोचने लगे, ‘अहो! यह उन्हीं भगवान्‌का स्थान है, जिनके भीतर देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर और महान् नागोंसहित सम्पूर्ण लोक निवास करते हैं॥ एका मूर्तिरियं पूर्वं जाता भूयश्चतुर्विधा॥ १६॥ धर्मस्य कुलसंताने धर्मदिभिर्विवर्धितः। अहो ह्यनुगृहीतोऽद्य धर्म एभिः सुरैरिह॥ १७॥ नरनारायणाभ्यां च कृष्णेन हरिणा तथा। ‘पहले ये एक ही रूपमें विद्यमान थे; फिर धर्मकी वंश-परम्पराका विस्तार करनेके लिये ये चार विग्रहोंमें प्रकट हुए। इन चारोंने अपने उपार्जित धर्मसे धर्मदेवकी वंश-परम्पराको बढ़ाया है। अहो! इस समय नर, नारायण, कृष्ण और हरि—इन चारों देवताओंने धर्मपर बड़ा अनुग्रह किया है॥ १६-१७ १/२॥ अत्र कृष्णो हरिश्चैव कस्मिंश्चित् कारणान्तरे॥ १८॥ स्थितौ धर्मोत्तरौ ह्येतौ तथा तपसि धिष्ठितौ। ‘इनमेंसे हरि और कृष्ण किसी और कार्यमें संलग्न हैं; परंतु ये दोनों भाई नारायण और नर धर्मको ही प्रधान मानते हुए तपस्यामें संलग्न हैं॥ १८ १/२॥ एतौ हि परमं धाम काऽनयोराह्निकक्रिया॥ १९॥ पितरौ सर्वभूतानां दैवतं च यशस्विनौ। कां देवतां तु यजतः पितॄन् वा कान् महामती॥ २०॥ ‘ये ही दोनों परमधामस्वरूप हैं। इनका यह नित्यकर्म कैसा है? ये दोनों यशस्वी देवता सम्पूर्ण प्राणियोंके पिता और देवता हैं। ये परम बुद्धिमान् दोनों बन्धु भला किस देवताका यजन और किन पितरोंका पूजन करते हैं?’॥ १९-२०॥ इति संचिन्त्य मनसा भक्त्या नारायणस्य तु। सहसा प्रादुरभवत् समीपे देवयोस्तदा॥ २१॥ मन-ही-मन ऐसा सोचकर भगवान् नारायणके प्रति भक्तिसे प्रेरित हो नारदजी सहसा उन देवताओंके समीप प्रकट हो गये॥ २१॥ कृते दैवे च पित्र्ये च ततस्ताभ्यां निरीक्षितः। पूजितश्चैव विधिना यथाप्रोक्तेन शास्त्रतः॥ २२॥

भगवान् नर और नारायण जब देवता और पितरोंकी पूजा समाप्त कर चुके, तब उन्होंने नारदजीको देखा और शास्त्रमें बतायी हुई विधिसे उनका पूजन किया ॥ २२ ॥

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यमपूर्वं विधिविस्तरम् ।
उपोपविष्टः सुप्रीतो नारदो भगवानृषिः ॥ २३ ॥
उनके द्वारा शास्त्रविधिका यह अपूर्व विस्तार और अत्यन्त आश्चर्यजनक व्यवहार देखकर उनके पास ही बैठे हुए देवर्षि भगवान् नारद अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ २३ ॥

नारायणं संनिरीक्ष्य प्रसन्नेनान्तरात्मना ।
नमस्कृत्य महादेवमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २४ ॥
प्रसन्न चित्तसे महादेव भगवान् नारायणकी ओर देखकर नारदजीने उन्हें नमस्कार किया और इस प्रकार कहा ॥ २४ ॥

नारद उवाच

वेदेषु सपुराणेषु साङ्गोपाङ्गेषु गीयसे ।
त्वमजः शाश्वतो धाता माताऽमृतमनुत्तमम् ॥ २५ ॥
नारदजी बोले— भगवान्! अंग और उपांगोंसहित सम्पूर्ण वेदों तथा पुराणोंमें आपकी ही महिमाका गान किया जाता है। आप अजन्मा, सनातन, सबके माता-पिता और सर्वोत्तम अमृतरूप हैं ॥ २५ ॥

प्रतिष्ठितं भूतभव्यं त्वयि सर्वमिदं जगत् ।
चत्वारो ह्याश्रमा देव सर्वे गार्हस्थ्यमूलकाः ॥ २६ ॥
यजन्ते त्वामहरहर्नानामूर्तिसमास्थितम् ।
देव! आपमें ही भूत, भविष्य और वर्तमानकालीन यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है। गार्हस्थ्यमूलक चारों आश्रमोंके सब लोग नाना रूपोंमें स्थित हुए आपकी ही प्रतिदिन पूजा करते हैं ॥ २६ १/२ ॥

पिता माता च सर्वस्य जगतः शाश्वतो गुरुः ।
कं त्वद्य यजसे देवं पितरं कं न विद्महे ॥ २७ ॥
(कमर्चसि महाभाग तन्मे ब्रूहीह पृच्छतः ।)
आप ही सम्पूर्ण जगत्‌के माता, पिता और सनातन गुरु हैं, तो भी आज आप किस देवता और किस पितरकी पूजा करते हैं? यह मैं समझ नहीं पाया। अतः महाभाग! मैं आपसे पूछ रहा हूँ ‘मुझे बताइये कि आप किसकी पूजा करते हैं? ॥ २७ ॥

श्रीभगवानुवाच

अवाच्यमेतद् वक्तव्यमात्मगुह्यं सनातनम् ।
तव भक्तिमतो ब्रह्मन् वक्ष्यामि तु यथातथम् ॥ २८ ॥

नर-नारायणका नारदजीके साथ संवाद

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नर-नारायणका नारदजीके साथ संवाद

श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मन्! तुमने जिसके विषयमें प्रश्न किया है, वह अपने लिये गोपनीय विषय है। यद्यपि यह सनातन रहस्य किसीसे कहने योग्य नहीं है, तथापि तुम-जैसे भक्त पुरुषको तो उसे बताना ही चाहिये; अतः मैं यथार्थ रूपसे इस विषयका वर्णन करूँगा॥ २८॥

यत् तत् सूक्ष्ममविज्ञेयमव्यक्तमचलं ध्रुवम्।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थैश्च सर्वभूतैश्च वर्जितम्॥ २९॥
स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चेति कथ्यते।
त्रिगुणव्यतिरिक्तो वै पुरुषश्चेति कल्पितः॥ ३०॥
तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम।
अव्यक्ता व्यक्तभावस्था या सा प्रकृतिरव्यया॥ ३१॥
जो सूक्ष्म, अज्ञेय, अव्यक्त, अचल और ध्रुव है, जो इन्द्रियों, विषयों और सम्पूर्ण भूतोंसे परे है, वही सब प्राणियोंका अन्तरात्मा है; अतः क्षेत्रज्ञ नामसे कहा जाता है, वही त्रिगुणातीत तथा पुरुष कहलाता है। उसीसे त्रिगुणमय अव्यक्तकी उत्पत्ति हुई है। द्विजश्रेष्ठ! उसीको व्यक्तभावमें स्थित, अविनाशिनी अव्यक्त प्रकृति कहा गया है॥ २९—३१॥

तां योनिमावयोर्र्विद्धि योऽसौ सदसदात्मकः।
आवाभ्यां पूज्यतेऽसौ हि दैवे पित्र्ये च कल्प्यते॥ ३२॥
वह सदसत्स्वरूप परमात्मा ही हम दोनोंकी उत्पत्तिका कारण है, इस बातको जान लो। हम दोनों उसीकी पूजा करते तथा उसीको देवता और पितर मानते हैं॥ ३२॥

नास्ति तस्मात् परोऽन्यो हि पिता देवोऽथवा द्विज।
आत्मा हि नः स विज्ञेयस्ततस्तं पूजयावहे॥ ३३॥
ब्रह्मन्! उससे बढ़कर दूसरा कोई देवता या पितर नहीं है। वही हमलोगोंका आत्मा है, यह जानना चाहिये। अतः हम उसीकी पूजा करते हैं॥ ३३॥

तेनैषा प्रथिता ब्रह्मन् मर्यादा लोकभाविनी।
दैवं पित्र्यं च कर्तव्यमिति तस्यानुशासनम्॥ ३४॥
ब्रह्मन्! उसीने लोकको उन्नतिके पथपर ले जानेवाली यह धर्मकी मार्यादा स्थापित की है। देवताओं और पितरोंकी पूजा करनी चाहिये, यह उसीकी आज्ञा है॥

ब्रह्मा स्थाणुर्मनुर्दक्षो भृगुर्धर्मस्तपो यमः।
मरीचिरङ्गिराऽत्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः॥ ३५॥
वसिष्ठः परमेष्ठी च विवस्वान् सोम एव च।
कर्दमश्चापि यः प्रोक्तः क्रोधो विक्रीत एव च॥ ३६॥
एकविंशतिरुत्पन्नास्ते प्रजापतयः स्मृताः।
तस्य देवस्य मर्यादां पूजयन्तः सनातनीम्॥ ३७॥

ब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्ष, भृगु, धर्म, तप, यम, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, कर्दम, क्रोध, और विक्रीत—ये इक्कीस प्रजापति उसी परमात्मासे उत्पन्न बताये गये हैं तथा उसी परमात्माकी सनातन धर्म-मर्यादाका पालन एवं पूजन करते हैं ।। ३५-३७ ।।

दैवं पित्र्यं च सततं तस्य विज्ञाय तत्त्वतः । आत्मप्राप्तानि च ततः प्राप्नुवन्ति द्विजोत्तमाः ॥ ३८ ॥ श्रेष्ठ द्विज उसीके उद्देश्यसे किये जानेवाले देवता तथा पितृ-सम्बन्धी कार्योंको ठीक-ठीक जानकर अपनी अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेते हैं ।। ३८ ।।

स्वर्गस्था अपि ये केचित् तान् नमस्यन्ति देहिनः । ते तत्प्रसादाद् गच्छन्ति तेनादिष्ट फलां गतिम् ॥ ३९ ॥ स्वर्गमें रहनेवाले प्राणियोंमेंसे भी जो कोई उस परमात्माको प्रणाम करते हैं, वे उसके कृपा-प्रसादसे उसीकी आज्ञाके अनुसार फल देनेवाली उत्तम गतिको प्राप्त करते हैं ।। ३९ ।।

ये हीनाः सप्तदशभिर्गुणैः कर्मभिरेव च । कलाः पञ्चदश त्यक्ता ते मुक्ता इति निश्चयः ॥ ४० ॥ जो पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण तथा मन और बुद्धिरूप सत्रह गुणोंसे, सब कर्मोंसे रहित हो पंद्रह कलाओंको त्याग करके स्थित हैं, वे ही मुक्त हैं, यह शास्त्रका सिद्धान्त है ।। ४० ।।

मुक्तानां तु गतिर्ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कल्पिता । स हि सर्वगुणैश्चैव निर्गुणश्चैव कथ्यते ॥ ४१ ॥ ब्रह्मन्! मुक्त पुरुषोंकी गति क्षेत्रज्ञ परमात्मा निश्चित किया गया है। वही सर्वसद्गुणसम्पन्न तथा निर्गुण भी कहलाता है ।। ४१ ।।

दृश्यते ज्ञानयोगेन आवां च प्रसूतौ ततः । एवं ज्ञात्वा तमात्मानं पूजयावः सनातनम् ॥ ४२ ॥ ज्ञानयोगके द्वारा उसका साक्षात्कार होता है। हम दोनोंका आविर्भाव उसीसे हुआ है—ऐसा जानकर हम दोनों उस सनातन परमात्माकी पूजा करते हैं ।। ४२ ।।

तं वेदाश्चाश्रमाश्चैव नानामतसमाश्रिताः । भक्त्या सम्पूजयन्त्याशु गतिं चैषां ददाति सः ॥ ४३ ॥ चारों वेद, चारों आश्रम तथा नाना प्रकारके मतोंका आश्रय लेनेवाले लोग भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं और वह इन सबको शीघ्र ही उत्तम गति प्रदान करता है ।। ४३ ।।

ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः । एतदभ्यधिकं तेषां यत् ते तं प्रविशन्त्युत ॥ ४४ ॥

जो सदा उसका स्मरण करते तथा अनन्य भावसे उसकी शरण लेते हैं, उन्हें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वे उसके स्वरूपमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ ४४ ॥
इति गुह्यसमुद्देशस्तव नारद कीर्तितः ।
भक्त्या प्रेम्णा च विप्रर्षे अस्मद्भक्त्या च ते श्रुतः ॥ ४५ ॥
नारद! ब्रह्मर्षे! तुममें भगवान्‌के प्रति भक्ति और प्रेम है। हमलोगोंके प्रति भी तुम्हारा भक्तिभाव बना हुआ है। इसलिये हमने तुम्हारे सामने इस गोपनीय विषयका वर्णन किया है और तुम्हें इसे सुननेका शुभ अवसर मिला है ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चतुस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तीन सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/३ श्लोक हैं)

नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग

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पञ्चत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नारदजीका श्वेतद्वीपदर्शन, वहाँके निवासियोंके स्वरूपका वर्णन, राजा उपरिचरका चरित्र तथा पाञ्चरात्रकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग

भीष्म उवाच

स एवमुक्तो द्विपदां वरिष्ठो
नारायणेनोत्तमपूरुषेण ।
जगाद वाक्यं द्विपदां वरिष्ठं
नारायणं लोकहिताधिवासम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! पुरुषोत्तम भगवान् नारायणने जब पुरुषप्रवर नारदजीसे इस प्रकार कहा, तब वे लोकहितके आश्रयभूत पुरुषाग्रगण्य भगवान् नारायणसे यों बोले ॥ १ ॥

नारद उवाच

यदर्थमात्रप्रभवेण जन्म
कृतं त्वया धर्मगृहे चतुर्धा ।
तत् साध्यतां लोकहितार्थमद्य
गच्छामि द्रष्टुं प्रकृतिं तवाद्याम् ॥ २ ॥

नारदजीने कहा— प्रभो! आप समस्त पदार्थोंकी उत्पत्तिके कारण हैं। आपने जिसके लिये धर्मके गृहमें चार स्वरूपोंमें अवतार धारण किया है उस प्रयोजनकी लोकहितके लिये सिद्धि कीजिये। अब मैं (श्वेतद्वीपमें स्थित) आपके आदिविग्रहका दर्शन करने जाता हूँ ॥ २ ॥

पूजां गुरूणां सततं करोमि
परस्य गुह्यं न तु भिन्नपूर्वम् ।
वेदाः स्वधीता मम लोकनाथ
तप्तं तपो नानृतमुक्तपूर्वम् ॥ ३ ॥

लोकनाथ! मैं गुरुजनोंका सदा आदर करता हूँ। किसीकी गुप्त बात पहले कभी दूसरोंके समक्ष प्रकट नहीं की है। मैंने वेदोंका स्वाध्याय किया, तपस्या की और कभी असत्यभाषण नहीं किया है ॥ ३ ॥

गुप्तानि चत्वारि यथागमं मे
शत्रौ च मित्रे च समोऽस्मि नित्यम् ।

तं चादिदेवं सततं प्रपन्न एकान्तभावेन वृणोम्यजस्रम् ॥ ४ ॥ एभिर्विशेषैः परिशुद्धसत्त्वः कस्मान्न पश्येयमनन्तमीशम् । शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार हाथ, पैर, उदर और उपस्थ—इन चारोंकी मैंने रक्षा की है। शत्रु और मित्रके प्रति मैं सदा समानभाव रखता हूँ। इन आदिदेव परमात्मा श्रीनारायणकी निरन्तर शरण लेकर मैं अनन्य-भावसे सदा उन्हींका भजन करता हूँ। इन सब विशेष कारणोंसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया है। ऐसी दशामें मैं उन अनन्त परमेश्वरका दर्शन कैसे नहीं कर सकता हूँ? ॥ ४ १/३ ॥

तत् पारमेष्ठ्यस्य वचो निशम्य नारायणः शाश्वतधर्मगोप्ता ॥ ५ ॥ गच्छेति तं नारदमुक्तवान् स सम्पूजयित्वाऽऽत्मविधिक्रियाभिः । ब्रह्मपुत्र नारदजीका यह वचन सुनकर सनातन धर्मके रक्षक भगवान् नारायणने उनकी विधिवत् पूजा करके उन्हें जानेकी आज्ञा दे दी ॥ ५ १/३ ॥

ततो विसृष्टः परमेष्ठिपुत्रः सोऽभ्यर्चयित्वा तमृषिं पुराणम् ॥ ६ ॥ खमुत्पपातोत्तमयोगयुक्त- स्ततोऽधिमेरौ सहसा निलिल्ये । उनसे विदा लेकर ब्रह्मकुमार नारद उन पुरातन ऋषि नारायणका पूजन करके उत्तम योगसे युक्त हो आकाशकी ओर उड़े और सहसा मेरुपर्वतपर पहुँचकर अदृश्य हो गये ॥ ६ १/३ ॥

तत्रावतस्थे च मुनिर्मुहूर्त- मेकान्तमासाद्य गिरेः स शृङ्गे ॥ ७ ॥ आलोकयन्नुत्तरपश्चिमेन ददर्श चाप्यद्भुतमुक्त रूपम् । मेरुके शिखरपर एकान्त स्थानमें जाकर नारद मुनिने दो घड़ीतक विश्राम किया। फिर वहाँसे उत्तर-पश्चिमकी ओर दृष्टिपात करनेपर उन्होंने पूर्व-वर्णित एक अद्भुत दृश्य देखा ॥ ७ १/३ ॥

क्षीरोदधेर्योत्तरतो हि द्वीपः श्वेतः स नाम्ना प्रथितो विशालः ॥ ८ ॥ मेरोः सहस्रैः स हि योजनानां द्वात्रिंशतोर्ध्वं कविभिर्निरुक्तः ।

अनिन्द्रियाश्चानशनाश्च तत्र
निष्पन्दहीनाः सुसुगन्धिनस्ते ॥ ९ ॥
क्षीरसागरके उत्तरभागमें जो श्वेत नामसे प्रसिद्ध विशाल द्वीप है, वह उनके सामने प्रकट हो गया। विद्वानोंने उस द्वीपको मेरुपर्वतसे बत्तीस हजार योजन ऊँचा बताया है। वहाँके निवासी इन्द्रियोंसे रहित, निराहार तथा चेष्टारहित एवं ज्ञानसम्पन्न होते हैं। उनके अंगोंसे उत्तम सुगन्ध निकलती रहती है ॥ ८-९ ॥

श्वेताः पुमांसो गतसर्वपापा-
श्चक्षुर्मुषः पापकृतां नराणाम् ।
वज्रास्थिकायाः सममानोन्माना
दिव्यावयवरूपाः शुभसारोपेताः ॥ १० ॥
छत्राकृतिशीर्षा मेघौघनिनादाः
सममुष्कचतुष्का राजीवच्छतपादाः ।
षष्ट्या दन्तैर्युक्ताः शुक्लैरष्टाभिर्दंष्ट्राभिर्ये
जिह्वाभिर्ये विश्ववक्त्रं लेलिह्यन्ते सूर्यप्रख्यम् ॥ ११ ॥
उस द्वीपमें सब प्रकारके पापोंसे रहित श्वेत वर्णवाले पुरुष निवास करते हैं। उनकी ओर देखनेसे पापी मनुष्योंकी आँखें चौंधिया जाती हैं। उनके शरीर तथा हड्डियाँ वज्रके समान सुदृढ़ होती हैं। वे मान और अपमानको समान समझते हैं। उनके अंग दिव्य होते हैं। वे शुभ (योगके प्रभावसे उत्पन्न) बलसे सम्पन्न होते हैं। उनके मस्तकका आकार छत्रके समान और स्वर मेघोंकी घटाके गर्जनकी भाँति गम्भीर होता है। उनके बराबर-बराबर चार भुजाएँ होती हैं। उनके पैर सैकड़ों कमलसदृश रेखाओंसे सुशोभित होते हैं। उनके मुँहमें साठ सफेद दाँत और आठ दाढ़ें होती हैं। वे सूर्यके समान कान्तिमान् तथा सम्पूर्ण विश्वको अपने मुखमें रखनेवाले महाकालको भी अपनी जिह्वाओंसे चाट लेते हैं ॥ १०-११ ॥

देवं भक्त्या विश्वोत्पन्नं
यस्मात् सर्वे लोकाः सम्प्रसूताः ।
वेदा धर्मा मुनयः शान्ता
देवाः सर्वे तस्य निसर्गः ॥ १२ ॥
जिनसे सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है, सारे लोक प्रकट हुए हैं, वेद, धर्म, शान्त स्वभाववाले मुनि तथा सम्पूर्ण देवता जिनकी सृष्टि हैं, उन अनन्त शक्ति-सम्पन्न परमेश्वरको श्वेतद्वीपके निवासी भक्तिभावसे अपने हृदयमें धारण करते हैं ॥ १२ ॥

युधिष्ठिर उवाच
अनिन्द्रिया निराहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः ।
कथं ते पुरुषा जाताः का तेषां गतिरुत्तमा ॥ १३ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! श्वेतद्वीपमें रहनेवाले पुरुष इन्द्रिय, आहार, तथा चेष्टासे रहित क्यों होते हैं? उनके शरीरसे सुन्दर गन्ध क्यों निकलती है? उनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है तथा वे किस उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं? ।। १३ ।।
ये च मुक्ता भवन्तीह नरा भरतसत्तम ।
तेषां लक्षणमेतद्धि तच्छ्वेतद्वीपवासिनाम् ।। १४ ।।
तस्मान्मे संशयं छिन्धि परं कौतूहलं हि मे ।
त्वं हि सर्वकथारामस्त्वां चैवोपाश्रिता वयम् ।। १५ ।।
भरतश्रेष्ठ! इस लोकसे मुक्त होनेवाले पुरुषोंका शास्त्रोंमें जो लक्षण बताया गया है, वैसा ही आपने श्वेतद्वीपके निवासियोंका भी बताया है। इसलिये मुझे संदेह होता है, अतः मेरे इस संशयका निवारण कीजिये। इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है। आप सम्पूर्ण ज्ञानमयी कथाओंमें रस लेनेवाले हैं और हम आपके शरणागत हैं ।। १४-१५ ।।

भीष्म उवाच

विस्तीर्णेषा कथा राजन् श्रुता मे पितृसंनिधौ ।
यैषा तव हि वक्तव्या कथासारो हि सा मता ।। १६ ।।
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! यह कथा बहुत विस्तृत है। इसे मैंने अपने पिताजीके निकट सुना था। इस समय जो कथा तुम्हारे सामने कहनी है, वह सम्पूर्ण कथाओंकी सारभूत मानी गयी है ।। १६ ।।
(शान्तनोः कथयामास नारदो मुनिसत्तमः ।
राज्ञा पृष्टः पुरा प्राह तत्राहं श्रुतवान् पुरा ।।)
पूर्वकालमें मेरे पिता महाराज शान्तनुके पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने उनसे यह कथा कही थी। उसी समय वहाँ मैंने भी इसे सुना था ।।
राजोपरिचरो नाम बभूवाधिपतिर्भुवः ।
आखण्डलसखः ख्यातो भक्तो नारायणं हरिम् ।। १७ ।।
पहलेकी बात है, इस पृथ्वीपर एक उपरिचर नामक राजा राज्य करते थे। वे इन्द्रके मित्र और पापहारी भगवान् नारायणके विख्यात भक्त थे ।। १७ ।।
धार्मिको नित्यभक्तश्च पितुर्नित्यमतन्द्रितः ।
साम्राज्यं तेन सम्प्राप्तं नारायणवरात् पुरा ।। १८ ।।
वे धर्मात्मा तथा पिताके नित्य भक्त थे। आलस्यका उनमें सर्वथा अभाव था। पूर्वकालमें भगवान् नारायणके वरसे उन्होंने भूमण्डलका साम्राज्य प्राप्त किया था ।। १८ ।।
सात्वतं विधिमास्थाय प्राक् सूर्यमुखनिःसृतम् ।
पूजयामास देवेशं तच्छेषेण पितामहान् ।। १९ ।।

पितृशेषेण विप्रांश्च संविभज्याश्रितांश्च सः ।
शेषान्नभुक् सत्यपरः सर्वभूतेष्वहिंसकः ॥ २० ॥
जो पहले भगवान् सूर्यके मुखसे प्रकट हुआ था, उस वैष्णव शास्त्रोक्त विधिका आश्रय ले वे प्रथम तो देवेश्वर भगवान् नारायणका पूजन करते। फिर उनकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे पितरोंका, पितरोंकी सेवासे बचे हुए पदार्थोंसे ब्राह्मणोंका तथा अन्य आश्रितजनोंका विभागपूर्वक सत्कार करते थे। सबको देनेके अनन्तर बचे हुए अन्नका भोजन करते थे, सत्यमें तत्पर रहते और किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करते थे ॥ १९-२० ॥
सर्वभावेन भक्तः स देवदेवं जनार्दनम् ।
अनादिमध्यनिधनं लोककर्तारमव्ययम् ॥ २१ ॥
वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अविनाशी, लोककर्ता देवदेव जनार्दनके भजनमें सम्पूर्णभावसे लगे रहते थे ॥ २१ ॥
तस्य नारायणे भक्तिं वहतोऽमित्रकर्षणः ।
एकशय्यासनं देवो दत्तवान् देवराट् स्वयम् ॥ २२ ॥
भगवान् नारायणमें भक्ति रखनेवाले उस शत्रुसूदन नरेशपर प्रसन्न हो देवराज इन्द्र उन्हें अपने साथ एक शय्या और एक आसनपर बिठाया करते थे ॥ २२ ॥
आत्मराज्यं धनं चैव कलत्रं वाहनं तथा ।
यत्तद्भागवतं सर्वमिति तत् प्रोक्षितं सदा ॥ २३ ॥
राजा उपरिचरने अपने राज्य, धन, स्त्री और वाहन आदि सब उपकरणोंको भगवान्‌की ही वस्तु समझकर सब उन्हींको समर्पित कर रखा था ॥ २३ ॥
काम्यनैमित्तिका राजन् यज्ञियाः परमक्रियाः ।
सर्वाः सात्वतमास्थाय विधिं चक्रे समाहितः ॥ २४ ॥
राजन्! वे सदा सावधान रहकर सकाम और नैमित्तिक यज्ञोंकी सम्पूर्ण क्रियाओंको वैष्णवशास्त्रोक्त विधिसे सम्पन्न किया करते थे ॥ २४ ॥
पाञ्चरात्रविदो मुख्यास्तस्य गेहे महात्मनः ।
प्रायणं भगवत्प्रोक्तं भुञ्जते वाग्रभोजनम् ॥ २५ ॥
उन महात्मा नरेशके घरमें पाञ्चरात्र शास्त्रके मुख्य-मुख्य विद्वान् सदा मौजूद रहते थे; और भगवान्‌को समर्पित किया हुआ प्रसाद अथवा भोज्य पदार्थ सबसे पहले वे ही भोजन करते थे ॥ २५ ॥
तस्य प्रशासतो राज्यं धर्मेणामित्रघातिनः ।
नानृता वाक् समभवन्मनो दुष्टं न चाभवत् ॥ २६ ॥
न च कायेन कृतवान् स पापं परमाण्वपि ।