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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

वह सहायकोंको पाकर शीघ्र ही उठ खड़ा होता है ।। २८ ।। अक्रोधनो ह्यव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रियः । राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव ।। २९ ।। जिसमें क्रोधका अभाव होता है, जो दुर्व्यसनोंसे दूर रहता है, जिसका दण्ड भी कठोर नहीं होता तथा जो अपनी इन्द्रियोंपर विजय पा लेता है, वह राजा हिमालयके समान सम्पूर्ण प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है ।। २९ ।। प्राज्ञस्त्यागगुणोपेतः पररन्ध्रेषु तत्परः । सुदर्शः सर्ववर्णानां नयापनयवित् तथा ।। ३० ।। क्षिप्रकारी जितक्रोधः सुप्रसादो महामनाः । अरोषप्रकृतियुक्तः क्रियावानविकत्थनः ।। ३१ ।। आरब्धान्येव कार्याणि सुपर्यवसितानि च । यस्य सङ्गः प्रदृश्यन्ति स राजा राजसत्तमः ।। ३२ ।। जो बुद्धिमान्, त्यागी, शत्रुओंकी दुर्बलता जाननेके प्रयत्नमें तत्पर, देखनेमें सुन्दर, सभी वर्णोंके न्याय और अन्यायको समझनेवाला, शीघ्र कार्य करनेमें समर्थ, क्रोधपर विजय पानेवाला, आश्रितोंपर कृपा करनेवाला, महामनस्वी, कोमल स्वभावसे युक्त, उद्योगी, कर्मठ तथा आत्मप्रशंसासे दूर रहनेवाला है, जिस राजाके आरम्भ किये हुए सभी कार्य सुन्दर रूपसे समाप्त होते दिखायी देते हैं, वह समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। पुत्रा इव पितुर्गेहे विषये यस्य मानवाः । निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तमः ।। ३३ ।। जैसे पुत्र अपने पिताके घरमें निर्भीक होकर रहते हैं, उसी प्रकार जिस राजाके राज्यमें मनुष्य निर्भय होकर विचरते हैं, वह सब राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। ३३ ।। अगूढविभवा यस्य पौरा राष्ट्रनिवासिनः । नयापनयवेत्तारः स राजा राजसत्तमः ।। ३४ ।। जिसके राज्य अथवा नगरमें निवास करनेवाले लोग (चोरोंसे भय न होनेके कारण) अपने धनको छिपाकर न रखते हों तथा न्याय और अन्यायको समझते हों, वह राजा समस्त राजाओंमें श्रेष्ठ है ।। ३४ ।। स्वकर्मनिरता यस्य जना विषयवासिनः । असंघातारता दान्ताः पाल्यमाना यथाविधि ।। ३५ ।। वश्या नेया विधेयाश्च न च संघर्षशीलिनः । विषये दानरुचयो नरा यस्य स पार्थिवः ।। ३६ ।। जिसके राज्यमें निवास करनेवाले लोग विधिपूर्वक सुरक्षित एवं पालित होकर अपने-अपने कर्ममें संलग्न, शरीरमें आसक्ति न रखनेवाले और जितेन्द्रिय हों, अपने वशमें रहते

हों, शिक्षा देने और ग्रहण करने योग्य हों, आज्ञा पालन करते हों, कलह और विवादसे दूर रहते हों और दान देनेकी रुचि रखते हों, वह राजा श्रेष्ठ है ।। ३५—३६ ।।

न यस्य कूटं कपटं न माया न च मत्सरः ।
विषये भूमिपालस्य तस्य धर्मः सनातनः ।। ३७ ।।
जिस भूपालके राज्यमें कूटनीति, कपट, माया तथा ईर्ष्याका सर्वथा अभाव हो उसीके द्वारा सनातन धर्मका पालन होता है ।। ३७ ।।

यः सत्करोति ज्ञानानि ज्ञेये परहिते रतः ।
सतां वर्त्मानुगस्त्यागी स राजा राज्यमर्हति ।। ३८ ।।
जो ज्ञान एवं ज्ञानियोंका सत्कार करता है, शास्त्रके ज्ञातव्य विषयको समझने तथा परहित-साधन करनेमें संलग्न रहता है, सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाला और स्वार्थत्यागी है, वही राजा राज्य चलानेके योग्य समझा जाता है ।। ३८ ।।

यस्य चाराश्च मन्त्राश्च नित्यं चैव कृताकृताः ।
न ज्ञायन्ते हि रिपुभिः स राजा राज्यमर्हति ।। ३९ ।।
जिसके गुप्तचर, गुप्त विचार, निश्चय किए हुए करने योग्य कर्म और किये हुए कर्म शत्रुओंद्वारा कभी जाने न जा सकें, वही राजा राज्य पानेका अधिकारी है ।।

श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना ।
आख्याते राजचरिते नृपतिं प्रति भारत ।। ४० ।।
भारत! महात्मा भार्गवने पूर्वकालमें किसी राजाके प्रति राजोचित कर्तव्यका वर्णन करते समय इस श्लोकका गान किया था ।। ४० ।।

राजानं प्रथमं विन्देत् ततो भार्यां ततो धनम् ।
राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ।। ४१ ।।
‘मनुष्य पहले राजाको प्राप्त करे। उसके बाद पत्नीका परिग्रह और धनका संग्रह करे। लोकरक्षक राजाके न होनेपर कैसे भार्या सुरक्षित रहेगी और किस तरह धनकी रक्षा हो सकेगी?’ ।। ४१ ।।

तद्राज्ये राज्यकामानां नान्यो धर्मः सनातनः ।
ऋते रक्षां तु विस्पष्टां रक्षा लोकस्य धारिणी ।। ४२ ।।
राज्य चाहनेवाले राजाओंके लिये राज्यमें प्रजाओंकी भलीभाँति रक्षाको छोड़कर और कोई सनातन धर्म नहीं है, रक्षा ही जगत्को धारण करनेवाली है ।। ४२ ।।

प्राचेतसेन मनुना श्लोकौ चेमावुदाहृतौ ।
राजधर्मेषु राजेन्द्र ताविहैकमनाः शृणु ।। ४३ ।।
राजेन्द्र! प्राचेतस मनुने राजधर्मके विषयमें ये दो श्लोक कहे हैं। तुम एकचित होकर उन दोनों श्लोकोंको यहाँ सुनो ।। ४३ ।।

षडेतान् पुरुषो जह्याद् भिन्नां नावमिवार्णवे ।

अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम् ॥ ४४ ॥
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रियवादिनीम् ।
ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम् ॥ ४५ ॥
‘जैसे समुद्रकी यात्रामें टूटी हुई नौकाका त्याग कर दिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्यको चाहिये कि वह उपदेश न देनेवाले आचार्य, वेदमन्त्रोंका उच्चारण न करनेवाले ऋत्विज्, रक्षा न कर सकने-वाले राजा, कटु वचन बोलनेवाली स्त्री, गाँवमें रहनेकी इच्छा रखनेवाले ग्वाले और जंगलमें रहनेकी कामना करनेवाले नाई—इन छः व्यक्तियोंका त्याग कर दे’ ॥ ४४-४५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥


* यदि शत्रुपर चढ़ाई की जाय और वह अपनेसे बलवान् सिद्ध हो तो उससे मेल कर लेना ‘सन्धि’ नामक गुण है। यदि दोनोंमें समान बल हो तो लड़ाई जारी रखना ‘विग्रह’ है। यदि शत्रु दुर्बल हो तो उस अवस्थामें उसके दुर्ग आदिपर जो आक्रमण किया जाता है, उसे ‘यान’ कहते हैं। यदि अपने ऊपर शत्रु की ओरसे आक्रमण हो और शत्रु का पक्ष प्रबल जान पड़े तो उस समय अपनेको दुर्ग आदिमें छिपाये रखकर जो आत्मरक्षा की जाती है, वह ‘आसन’ कहलाता है। यदि चढ़ाई करनेवाला शत्रु मध्यम श्रेणीका हो तो ‘द्वैधीभाव’ का सहारा लिया जाता है। उसमें ऊपरसे दूसरा भाव दिखाया जाता है और भीतर दूसरा ही भाव रखा जाता है। जैसे आधी सेना दुर्गमें रखकर आत्मरक्षा करना और आधीको भेजकर शत्रुओंके अन्न आदि सामग्रीपर कब्जा करना आदि कार्य ‘द्वैधीभाव’ नीतिके अन्तर्गत हैं। आक्रमणकारीसे पीड़ित होनेपर किसी मित्र राजाका सहारा लेकर उसके साथ लड़ाई छेड़ना ‘समाश्रय’ कहलाता है।

* मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग (किला), खजाना और दण्ड—ये पाँच ‘प्रकृति’ कहे गये हैं। ये ही अपने और शत्रुपक्षके मिलाकर ‘दशवर्ग’ कहलाते हैं, यदि दोनोंके मन्त्री आदि समान हों तो ये स्थानके हेतु होते हैं। अर्थात् दोनों पक्षकी स्थिति कायम रहती है, अगर अपने पक्षमें इनकी अधिकता हो तो ये वृद्धिके साधक होते हैं और कमी हो तो क्षयके कारण बनते हैं।

भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें

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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भीष्मद्वारा राज्यरक्षाके साधनोंका वर्णन तथा संध्याके समय युधिष्ठिर आदिका विदा होना और रास्तेमें स्नान-संध्यादि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर हस्तिनापुरमें प्रवेश

भीष्म उवाच

एतत् ते राजधर्माणां नवनीतं युधिष्ठिर ।
बृहस्पतिर्हि भगवान् न्याय्यं धर्मं प्रशंसति ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! यह मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, राजधर्मरूपी दूधका माखन है। भगवान् बृहस्पति इस न्यायानुकूल धर्मकी ही प्रशंसा करते हैं ॥ १ ॥

विशालाक्षश्च भगवान् काव्यश्चैव महातपाः ।
सहस्राक्षो महेन्द्रश्च तथा प्राचेतसो मनुः ॥ २ ॥
भरद्वाजश्च भगवांस्तथा गौरशिरा मुनिः ।
राजशास्त्रप्रणेतारो ब्रह्मण्या ब्रह्मवादिनः ॥ ३ ॥
रक्षामेव प्रशंसन्ति धर्मं धर्मभृतां वर ।
राज्ञां राजीवताम्राक्ष साधनं चात्र मे शृणु ॥ ४ ॥

इनके सिवा भगवान् विशालाक्ष, महातपस्वी शुक्राचार्य, सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र, प्राचेतस मनु, भगवान् भरद्वाज और मुनिवर गौरशिरा—ये सभी ब्राह्मणभक्त और ब्रह्मवादी लोग राजशास्त्रके प्रणेता हैं, ये सब राजाके लिये प्रजापालनस्वरूप धर्मकी ही प्रशंसा करते हैं। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ कमलनयन युधिष्ठिर! इस रक्षात्मक धर्मके साधनोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ २—४ ॥

चारश्च प्रणिधिश्चैव काले दानममत्सरात् ।
युक्त्यादानं न चादानमयोगेन युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
सतां संग्रहणं शौर्यं दाक्ष्यं सत्यं प्रजाहितम् ।
अनार्जवैराजर्वैश्च शत्रुपक्षस्य भेदनम् ॥ ६ ॥
केतनानां च जीर्णानामवेक्षा चैव सीदताम् ।
द्विविधस्य च दण्डस्य प्रयोगः कालचोदितः ॥ ७ ॥
साधूनामपरित्यागः कुलीनानां च धारणम् ।
निचयश्च निचेयानां सेवा बुद्धिमतामपि ॥ ८ ॥
बलानां हर्षणं नित्यं प्रजानामन्ववेक्षणम् ।
कार्येष्वखेदः कोशस्य तथैव च विवर्धनम् ॥ ९ ॥

पुरगुप्तिरविश्वासः पौरसंघातभेदनम् । अरिमध्यस्थमित्राणां यथावच्चान्वेक्षणम् ॥ १० ॥ उपजापश्च भृत्यानामात्मनः पुरदर्शनम् । अविश्वासः स्वयं चैव परस्याश्वासनं तथा ॥ ११ ॥ नीतिधर्मानुसरणं नित्यमुत्थानमेव च । रिपूणामनवज्ञानं नित्यं चानार्यवर्जनम् ॥ १२ ॥ युधिष्ठिर! गुप्तचर (जासूस) रखना, दूसरे राष्ट्रोंमें अपना प्रतिनिधि (राजदूत) नियुक्त करना, सेवकोंको उनके प्रति ईर्ष्या न रखते हुए समयपर वेतन और भत्ता देना, युक्तिसे कर लेना, अन्यायसे प्रजाके धनको न हड़पना, सत्पुरुषोंका संग्रह करना, शूरता, कार्यदक्षता, सत्यभाषण, प्रजाका हित-चिन्तन, सरल या कुटिल उपायोंसे भी शत्रुपक्षमें फूट डालना, पुराने घरोंकी मरम्मत एवं मन्दिरोंका जीर्णोद्धार कराना, दीन-दुखियोंकी देखभाल करना, समयानुसार शारीरिक और आर्थिक दोनों प्रकारके दण्डका प्रयोग करना, साधु पुरुषोंका त्याग न करना, कुलीन मनुष्योंको अपने पास रखना, संग्रहयोग्य वस्तुओंका संग्रह करना, बुद्धिमान् पुरुषोंका सेवन करना, पुरस्कार आदिके द्वारा सेनाका हर्ष और उत्साह बढ़ाना, नित्य-निरन्तर प्रजाकी देख-भाल करना, कार्य करनेमें कष्टका अनुभव न करना, कोषको बढ़ाना, नगरकी रक्षाका पूरा प्रबन्ध करना, इस विषयमें दूसरोंके विश्वासपर न रहना, पुरवासियोंने अपने विरुद्ध कोई गुटबंदी की हो तो उसमें फूट डलवा देना, शत्रु, मित्र और मध्यस्थोंपर यथोचित दृष्टि रखना, दूसरोंके द्वारा अपने सेवकोंमें भी गुटबंदी न होने देना, स्वयं ही अपने नगरका निरीक्षण करना, स्वयं किसीपर भी पूरा विश्वास न करना, दूसरोंको आश्वासन देना, नीतिधर्मका अनुसरण करना, सदा ही उद्योगशील बने रहना, शत्रुओंकी ओरसे सावधान रहना और नीच कर्मों तथा दुष्ट पुरुषोंको सदाके लिये त्याग देना—ये सभी राज्यकी रक्षाके साधन हैं ॥ ५—१२ ॥

उत्थानं हि नरेन्द्राणां बृहस्पतिरभाषत । राजधर्मस्य तन्मूलं श्लोकांश्चात्र निबोध मे ॥ १३ ॥ बृहस्पतिने राजाओंके लिये उद्योगके महत्त्वका प्रतिपादन किया है। उद्योग ही राजधर्मका मूल है। इस विषयमें जो श्लोक हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ १३ ॥

उत्थानेनामृतं लब्धमुत्थानेनासुरा हताः । उत्थानेन महेन्द्रेण श्रेष्ठ्यं प्राप्तं दिवीह च ॥ १४ ॥ 'देवराज इन्द्रने उद्योगसे ही अमृत प्राप्त किया, उद्योगसे ही असुरोंका संहार किया तथा उद्योगसे ही देवलोक और इहलोकमें श्रेष्ठता प्राप्त की ॥ १४ ॥

उत्थानवीरः पुरुषो वाग्वीरानधितिष्ठति । उत्थानवीरान् वाग्वीरा रमयन्त उपासते ॥ १५ ॥

'जो उद्योगमें वीर है, वह पुरुष केवल वाग्वीर पुरुषोंपर अपना आधिपत्य जमा लेता है। वाग्वीर विद्वान् उद्योगवीर पुरुषोंका मनोरञ्जन करते हुए उनकी उपासना करते हैं।। १५ ।। उत्थानहीनो राजा हि बुद्धिमानपि नित्यशः। प्रधर्षणीयः शत्रूणां भुजङ्ग इव निर्विषः।। १६ ।। 'जो राजा उद्योगहीन होता है, वह बुद्धिमान् होनेपर भी विषहीन सर्पके समान सदैव शत्रुओंके द्वारा परास्त होता रहता है।। १६ ।। न च शत्रुरवज्ञेयो दुर्बलोऽपि बलीयसा। अल्पोऽपि हि दहत्यग्निर्विषमल्पं हिनस्ति च।। १७ ।। 'बलवान् पुरुष कभी दुर्बल शत्रुकि भी अवहेलना न करे अर्थात् उसे छोटा समझकर उसकी ओरसे लापरवाही न दिखावे; क्योंकि आग थोड़ी-सी हो तो भी जला डालती है और विष कम मात्रामें हो तो भी मार डालता है।। १७ ।। एकाङ्गेनापि सम्भूतः शत्रुदुर्गमुपाश्रितः। सर्वं तापयते देशमपि राज्ञः समृद्धिनः।। १८ ।। 'चतुरङ्गिणी सेनाके एक अङ्गसे भी सम्पन्न हुआ शत्रु दुर्गका आश्रय लेकर समृद्धिशाली राजाके समूचे देशको भी संतप्त कर डालता है' ।। १८ ।। राज्ञो रहस्यं यद् वाक्यं जयार्थं लोकसंग्रहः। हृदि यच्चास्य जिह्यं स्यात् कारणेन च यद् भवेत् ।। १९ ।। यच्चास्य कार्यं वृजिनमार्जवेनैव धारयेत् । दम्भनार्थं च लोकस्य धर्मिष्ठामाचरेत् क्रियाम् ।। २० ।। राजाके लिये जो गोपनीय रहस्यकी बात हो, शत्रुओंपर विजय पानेके लिये वह जो लोगोंका संग्रह करता हो, विजयके ही उद्देश्यसे उसके हृदयमें जो कार्य छिपा हो अथवा उसे जो न करने योग्य असत्-कार्य करना हो, वह सब कुछ उसे सरलभावसे ही छिपाये रखना चाहिये। वह लोगोंमें अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखनेके लिये सदा धार्मिक कर्मोंका अनुष्ठान करे।। राज्यं हि सुमहत् तन्त्रं धार्यते नाकृतात्मभिः । न शक्यं मृदुना वोढुमायास्सथानमुत्तमम् ।। २१ ।। राज्य एक बहुत बड़ा तन्त्र है। जिन्होंने अपने मनको वशमें नहीं किया है, ऐसे क्रूर- स्वभाववाले राजा उस विशाल तन्त्रको सँभाल नहीं सकते। इसी प्रकार जो बहुत कोमल प्रकृतिके होते हैं, वे भी इसका भार वहन नहीं कर सकते। उनके लिये राज्य बड़ा भारी जंजाल हो जाता है ।। २१ ।। राज्यं सर्वामिषं नित्यमार्जवेनेह धार्यते । तस्मान्मिश्रेण सततं वर्तितव्यं युधिष्ठिर ।। २२ ।।

युधिष्ठिर! राज्य सबके उपभोगकी वस्तु है; अतः सदा सरल भावसे ही उसकी सँभाल की जा सकती है। इसलिये राजामें क्रूरता और कोमलता दोनों भावोंका सम्मिश्रण होना चाहिये ॥ २२ ॥ यद्यप्यस्य विपत्तिः स्याद् रक्षमाणस्य वै प्रजाः । सोऽप्यस्य विपुलो धर्म एवंवृत्ता हि भूमिपाः ॥ २३ ॥ प्रजाकी रक्षा करते हुए राजाके प्राण चले जायें तो भी वह उसके लिये महान् धर्म है। राजाओंके व्यवहार और बर्ताव ऐसे ही होने चाहिये ॥ २३ ॥ एष ते राजधर्माणां लेशः समनुवर्णितः । भूयस्ते यत्र संदेहस्तद् ब्रूहि कुरुसत्तम ॥ २४ ॥ कुरुश्रेष्ठ! यह मैंने तुम्हारे सामने राजधर्मोंका लेशमात्र वर्णन किया है। अब तुम्हें जिस बातमें संदेह हो, वह पूछो ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच ततो व्यासश्च भगवान् देवस्थानोऽश्म एव च । वासुदेवः कृपश्चैव सात्यकिः संजयस्तथा ॥ २५ ॥ साधु साध्विति संहृष्टाः पुष्यमाणैरिवाननैः । अस्तुवंश्च नरव्याघ्रं भीष्मं धर्मभृतां वरम् ॥ २६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीका यह वक्तव्य सुनकर भगवान् व्यास, देवस्थान, अश्म, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण, कृपाचार्य, सात्यकि और संजय बड़े प्रसन्न हुए और हर्षसे खिले हुए मुखोंद्वारा साधुवाद देते हुए धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह भीष्मजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ २५-२६ ॥ ततो दीनमना भीष्ममुवाच कुरुसत्तमः । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां पादौ तस्य शनैःस्पृशन् ॥ २७ ॥ श्व इदानीं स्वसन्देहं प्रक्ष्यामि त्वां पितामह । उपैति सविता ह्यस्तं रसमापीय पार्थिवम् ॥ २८ ॥ तत्पश्चात् कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने मन-ही-मन दुखी हो दोनों नेत्रोंमें आँसू भरकर धीरेसे भीष्मजीके चरण छुए और कहा—'पितामह! इस समय भगवान् सूर्य अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीके रसका शोषण करके अस्ताचलको जा रहे हैं; इसलिये अब मैं कल आपसे अपना संदेह पूछूँगा' ॥ ततो द्विजातीनभिवाद्य केशवः कृपश्च ते चैव युधिष्ठिरादयः । प्रदक्षिणीकृत्य महानदीसुतं ततो रथानारुरुहुर्मुदान्विताः ॥ २९ ॥

तदनन्तर ब्राह्मणोंको प्रणाम करके भगवान् श्रीकृष्ण, कृपाचार्य तथा युधिष्ठिर आदिने महानदी गङ्गाके पुत्र भीष्मजीकी परिक्रमा की। फिर वे प्रसन्नतापूर्वक अपने रथोंपर आरूढ़ हो गये ॥ २९ ॥

दृषद्वतीं चाप्यवगाह्य सुव्रताः कृतोदकार्थाः कृतजप्यमङ्गलाः । उपास्य संध्यां विधिवत् परंतपा- स्ततः पुरं ते विविशुर्गजाह्वयम् ॥ ३० ॥

फिर दृषद्वती नदीमें स्नान करके उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वे शत्रुसंतापी वीर विधिपूर्वक संध्या, तर्पण और जप आदि मङ्गलकारी कर्मोंका अनुष्ठान करके वहाँसे हस्तिनापुरमें चले आये ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरादिस्वस्थानगमनेऽष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिर आदिका अपने निवासस्थानको प्रस्थानविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥

ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन

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एकोनषष्टितमोऽध्यायः

ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रका तथा राजा पृथुके चरित्रका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

ततः कल्यं समुत्थाय कृतपूर्वाह्निकक्रियाः ।
ययुस्ते नगराकारै रथैः पाण्डवयादवाः ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर दूसरे दिन सबेरे उठकर पाण्डव और यदुवंशी वीर पूर्वाह्नकालके नित्यकर्म पूर्ण करनेके अनन्तर नगराकार विशाल रथोंपर सवार हो हस्तिनापुरसे चल दिये ॥ १ ॥

प्रतिपद्य कुरुक्षेत्रं भीष्ममासाद्य चानघ ।
सुखां च रजनीं पृष्ट्वा गाङ्गेयं रथिनां वरम् ॥ २ ॥
व्यासादीनभिवाद्यर्षीन् सर्वैस्तैश्चाभिनन्दिताः ।
निषेदुरभितो भीष्मं परिवार्य समन्ततः ॥ ३ ॥

निष्पाप नरेश! कुरुक्षेत्रमें जा रथियोंमें श्रेष्ठ गङ्गा-नन्दन भीष्मजीके पास पहुँचकर उनसे सुखपूर्वक रात बीतनेका समाचार पूछकर व्यास आदि महर्षियोंको प्रणाम करके उन सबके द्वारा अभिनन्दित हो वे पाण्डव और श्रीकृष्ण भीष्मजीको सब ओरसे घेरकर उनके पास ही बैठ गये ॥ २-३ ॥

ततो राजा महातेजा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्भीष्मं प्रतिपूज्य यथाविधि ॥ ४ ॥

तब महातेजस्वी राजा धर्मराज युधिष्ठिरने भीष्मजीका विधिपूर्वक पूजन करके उनसे दोनों हाथ जोड़कर कहा ॥ ४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

य एष राजन् राजेति शब्दश्चरति भारत ।
कथमेष समुत्पन्नस्तन्मे ब्रूहि परंतप ॥ ५ ॥

**युधिष्ठिर बोले—**शत्रुओंको संताप देनेवाले भरत-वंशी नरेश! लोकमें जो यह राजा शब्द चल रहा है, इसकी उत्पत्ति कैसे हुई है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥

तुल्यपाणिभुजग्रीवस्तुल्यबुद्धीन्द्रियात्मकः ।
तुल्यदुःखसुखात्मा च तुल्यपृष्ठमुखोदरः ॥ ६ ॥
तुल्यशुक्रास्थिमज्जा च तुल्यमांसासृगेव च ।
निःश्वासोच्छ्वासतुल्यश्चतुल्यप्राणशरीरवान् ॥ ७ ॥
समानजन्ममरणः समः सर्वैर्गुणैर्नृणाम् ।

विशिष्टबुद्धीन् शूरांश्च कथमेकोऽधितिष्ठति ॥ ८ ॥ जिसे हम राजा कहते हैं, वह सभी गुणोंमें दूसरोंके समान ही है। उसके हाथ, बाँह और गर्दन भी औरोंकी ही भाँति हैं। बुद्धि और इन्द्रियाँ भी दूसरे लोगोंके ही तुल्य हैं। उसके मनमें भी दूसरे मनुष्योंके समान ही सुख-दुःखका अनुभव होता है। मुँह, पेट, पीठ, वीर्य, हड्डी, मज्जा, मांस, रक्त, उच्छ्वास, निःश्वास, प्राण, शरीर, जन्म और मरण आदि सभी बातें राजामें भी दूसरोंके समान ही हैं। फिर वह विशिष्ट बुद्धि रखनेवाले अनेक शूरवीरोंपर अकेला ही कैसे अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेता है? ॥ ६—८ ॥

कथमेको महीं कृत्स्नां शूरवीरार्यसंकुलाम् ।
रक्षत्यपि च लोकस्य प्रसादमभिवाञ्छति ॥ ९ ॥
अकेला होनेपर भी वह शूरवीर एवं सत्पुरुषोंसे भरी हुई इस सारी पृथ्वीका कैसे पालन करता है और कैसे सम्पूर्ण जगत्की प्रसन्नता चाहता है? ॥ ९ ॥

एकस्य तु प्रसादेन कृत्स्नो लोकः प्रसीदति ।
व्याकुले चाकुलः सर्वो भवतीति विनिश्चयः ॥ १० ॥
यह निश्चित रूपसे देखा जाता है कि एकमात्र राजाकी प्रसन्नतासे ही सारा जगत् प्रसन्न होता है और उस एकके ही व्याकुल होनेपर सब लोग व्याकुल हो जाते हैं ॥ १० ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन भरतर्षभ ।
कृत्स्नं तन्मे यथातत्त्वं प्रब्रूहि वदतां वर ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसका क्या कारण है? यह मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! यह सारा रहस्य मुझे यथावत् रूपसे बताइये ॥ ११ ॥

नैतत् कारणमल्पं हि भविष्यति विशाम्पते ।
यदेकस्मिन् जगत् सर्वं देववद् याति संनतिम् ॥ १२ ॥
प्रजानाथ! यह सारा जगत् जो एक ही व्यक्तिको देवताके समान मानकर उसके सामने नतमस्तक हो जाता है, इसका कोई स्वल्प कारण नहीं हो सकता ॥ १२ ॥

भीष्म उवाच

नियतस्त्वं नरव्याघ्र शृणु सर्वमशेषतः ।
यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृतयुगेऽभवत् ॥ १३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**पुरुषसिंह! आदि सत्ययुगमें जिस प्रकार राजा और राज्यकी उत्पत्ति हुई, वह सारा वृत्तान्त तुम एकाग्र होकर सुनो ॥ १३ ॥

न वै राज्यं न राजाऽऽसीन्न च दण्डो न दाण्डिकः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ १४ ॥
पहले न कोई राज्य था, न राजा, न दण्ड था और न दण्ड देनेवाला, समस्त प्रजा धर्मके द्वारा ही एक-दूसरेकी रक्षा करती थी ॥ १४ ॥

पाल्यमानास्तथान्योन्यं नरा धर्मेण भारत । खेदं परमुपाजग्मुस्ततस्तान् मोह आविशत् ॥ १५ ॥ भारत! सब मनुष्य धर्मके द्वारा परस्पर पालित और पोषित होते थे। कुछ दिनोंके बाद सब लोग पारस्परिक संरक्षणके कार्यमें महान् कष्टका अनुभव करने लगे; फिर उन सबपर मोह छा गया ॥ १५ ॥

ते मोहवशमापन्ना मनुजा मनुजर्षभ । प्रतिपत्तिविमोहाच्च धर्मस्तेषामनीनशत् ॥ १६ ॥ नरश्रेष्ठ! जब सारे मनुष्य मोहके वशीभूत हो गये, तब कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे शून्य होनेके कारण उनके धर्मका नाश हो गया ॥ १६ ॥

नष्टायां प्रतिपत्तौ च मोहवश्या नरास्तदा । लोभस्य वशमापन्नाः सर्वे भरतसत्तम ॥ १७ ॥ भरतभूषण! कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान नष्ट हो जानेपर मोहके वशीभूत हुए सब मनुष्य लोभके अधीन हो गये ॥

अप्राप्तस्याभिमर्शं तु कुर्वन्तो मनुजास्ततः । कामो नामापरस्तत्र प्रत्यपद्यत वै प्रभो ॥ १८ ॥ फिर जो वस्तु उन्हें प्राप्त नहीं थी, उसे पानेका वे प्रयत्न करने लगे। प्रभो! इतनेहीमें वहाँ काम नामक दूसरे दोषने उन्हें घेर लिया ॥ १८ ॥

तांस्तु कामवशं प्राप्तान् रागो नाम समस्पृशत् । रक्ताश्च नाभ्यजानन्त कार्याकार्ये युधिष्ठिर ॥ १९ ॥ युधिष्ठिर! कामके अधीन हुए उन मनुष्योंपर क्रोध नामक शत्रुने आक्रमण किया। क्रोधके वशीभूत होकर वे यह न जान सके कि क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य? ॥ १९ ॥

अगम्यागमनं चैव वाच्यावाच्यं तथैव च । भक्ष्याभक्ष्यं च राजेन्द्र दोषादोषं च नात्यजन् ॥ २० ॥ राजेन्द्र! उन्होंने अगम्यागमन, वाच्य-अवाच्य, भक्ष्य-अभक्ष्य तथा दोष-अदोष कुछ भी नहीं छोड़ा ॥ २० ॥

विप्लुते नरलोके वै ब्रह्म चैव ननाश ह । नाशाच्च ब्रह्मणो राजन् धर्मो नाशमथागमत् ॥ २१ ॥ इस प्रकार मनुष्यलोकमें धर्मका विप्लव हो जानेपर वेदोंके स्वाध्यायका भी लोप हो गया। राजन्! वैदिक ज्ञानका लोप होनेसे यज्ञ आदि कर्मोंका भी नाश हो गया ॥ २१ ॥

नष्टे ब्रह्मणि धर्मे च देवांस्त्रासः समाविशत् । ते त्रस्ता नरशार्दूल ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ २२ ॥

इस प्रकार जब वेद और धर्मका नाश होने लगा, तब देवताओंके मनमें भय समा गया। पुरुषसिंह! वे भयभीत होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ २२ ॥ प्रसाद्य भगवन्तं ते देवं लोकपितामहम् । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे दुःखवेगसमाहताः ॥ २३ ॥ लोकपितामह भगवान् ब्रह्माको प्रसन्न करके दुःखके वेगसे पीड़ित हुए समस्त देवता उनसे हाथ जोड़कर बोले— ॥ २३ ॥ भगवन् नरलोकस्थं ग्रस्तं ब्रह्म सनातनम् । लोभमोहादिभिर्भावैस्ततो नो भयमाविशत् ॥ २४ ॥ ‘भगवन्! मनुष्यलोकमें लोभ, मोह आदि दूषित भावोंने सनातन वैदिक ज्ञानको विलुप्त कर डाला है; इसलिये हमें बड़ा भय हो रहा है ॥ २४ ॥ ब्रह्मणश्च प्रणाशेन धर्मो व्यनशदीश्वर । ततः स्म समतां याता मर्त्यैस्त्रिभुवनेश्वर ॥ २५ ॥ ‘ईश्वर! तीनों लोकोंके स्वामी परमेश्वर! वैदिक ज्ञानका लोप होनेसे यज्ञ-धर्म नष्ट हो गया। इससे हम सब देवता मनुष्योंके समान हो गये हैं ॥ २५ ॥ अधो हि वर्षमस्माकं नरास्तूर्ध्वप्रवर्षिणः। क्रियाव्युपरमात् तेषां ततो गच्छाम संशयम् ॥ २६ ॥ ‘मनुष्य यज्ञ आदिमें घीकी आहुति देकर हमारे लिये ऊपरकी ओर वर्षा करते थे और हम उनके लिये नीचेकी ओर पानी बरसाते थे; परंतु अब उनके यज्ञकर्मका लोप हो जानेसे हमारा जीवन संशयमें पड़ गया है ॥ अत्र निःश्रेयसं यन्नस्तद् ध्यायस्व पितामह । त्वत्प्रभावसमुत्थोऽसौ स्वभावो नो विनश्यति ॥ २७ ॥ ‘पितामह! अब जिस उपायसे हमारा कल्याण हो सके, वह सोचिये। आपके प्रभावसे हमें जो दैवस्वभाव प्राप्त हुआ था, वह नष्ट हो रहा है’ ॥ २७ ॥ तानुवाच सुरान् सर्वान् स्वयम्भूर्भगवांस्ततः । श्रेयोऽहं चिन्तयिष्यामि व्येतु वो भीःसुरर्षभाः ॥ २८ ॥ तब भगवान् ब्रह्माने उन सब देवताओंसे कहा—‘सुरश्रेष्ठगण! तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये। मैं तुम्हारे कल्याणका उपाय सोचूँगा’ ॥ २८ ॥ ततोऽध्यायसहस्राणां शतं चक्रे स्वबुद्धिजम् । यत्र धर्मस्तथैवार्थः कामश्चैवाभिवर्णितः ॥ २९ ॥ त्रिवर्ग इति विख्यातो गण एष स्वयम्भुवा । तदनन्तर ब्रह्माजीने अपनी बुद्धिसे एक लाख अध्यायोंका एक ऐसा नीतिशास्त्र रचा, जिसमें धर्म, अर्थ और कामका विस्तारपूर्वक वर्णन है। जिसमें इन वर्गोंका वर्णन हुआ है, वह प्रकरण ‘त्रिवर्ग’ नामसे विख्यात है ॥

चतुर्थो मोक्ष इत्येव पृथगर्थः पृथग्गुणः ॥ ३० ॥ चौथा वर्ग मोक्ष है; उसके प्रयोजन और गुण इन तीनों वर्गोंसे भिन्न हैं ॥ ३० ॥ मोक्षस्यास्ति त्रिवर्गोऽन्यः प्रोक्तः सत्त्वं रजस्तमः । स्थानं वृद्धिः क्षयश्चैव त्रिवर्गश्चैव दण्डजः ॥ ३१ ॥ मोक्षका त्रिवर्ग दूसरा बताया गया है। उसमें सत्त्व, रज और तमकी गणना है। दण्डजनित त्रिवर्ग उससे भिन्न है। स्थान, वृद्धि और क्षय—ये ही उसके भेद हैं (अर्थात् दण्डसे धनियोंकी स्थिति, धर्मात्माओंकी वृद्धि और दुष्टोंका विनाश होता है) ॥ ३१ ॥ आत्मा देशश्च कालश्चाप्युपायाः कृत्यमेव च । सहायाः कारणं चैव षड्वर्गो नीतिजः स्मृतः ॥ ३२ ॥ ब्रह्माजीके नीतिशास्त्रमें आत्मा, देश, काल, उपाय, कार्य और सहायक—इन छः वर्गोंका वर्णन है। ये छहों नीतिद्वारा संचालित होनेपर उन्नतिके कारण होते हैं ॥ ३२ ॥ त्रयी चान्वीक्षिकी चैव वार्ता च भरतर्षभ । दण्डनीतिश्च विपुला विद्यास्तत्र निदर्शिताः ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस ग्रन्थमें वेदत्रयी (कर्मकाण्ड), आन्वीक्षिकी (ज्ञानकाण्ड), वार्ता (कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य) और दण्डनीति—इन विपुल विद्याओंका निरूपण किया गया है ॥ ३३ ॥ अमात्यरक्षा प्रणिधी राजपुत्रस्य लक्षणम् । चारश्च विविधोपायः प्रणिधेयः पृथग्विधः ॥ ३४ ॥ साम भेदः प्रदानं च ततो दण्डश्च पार्थिव । उपेक्षा पञ्चमी चात्र कात्स्न्येन समुदाहृता ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजीके उस नीतिशास्त्रमें मन्त्रियोंकी रक्षा (उन्हें कोई फोड़ न ले, इसके लिये सतर्कता), प्रणिधि (राजदूत), राजपुत्रके लक्षण, गुप्तचरोंके विचरणके विविध उपाय, विभिन्न स्थानोंमें विभिन्न प्रकारके गुप्तचरोंकी नियुक्ति, साम, दान, भेद, दण्ड और उपेक्षा—इन पाँचों उपायोंका पूर्णरूपसे प्रतिपादन किया गया है ॥ ३४-३५ ॥ मन्त्रश्च वर्णितः कृत्स्नस्तथा भेदार्थ एव च । विभ्रमश्चैव मन्त्रस्य सिद्ध्यसिद्धोश्च यत् फलम् ॥ ३६ ॥ सब प्रकारकी मन्त्रणा, भेदनीतिके प्रयोगके प्रयोजन, मन्त्रणामें होनेवाले भ्रम या उसके फूटनेके भय तथा मन्त्रणाकी सिद्धि और असिद्धिके फलका भी इस शास्त्रमें वर्णन है ॥ ३६ ॥ संधिश्च त्रिविधाभिख्यो हीनो मध्यस्तथोत्तमः । भयसत्कारवित्ताख्यं कात्स्न्येन परिवर्णितम् ॥ ३७ ॥ संधिके तीन भेद हैं—उत्तम, मध्यम और अधम, इनकी क्रमशः वित्तसंधि, सत्कारसंधि और भयसंधि—ये तीन संज्ञाएँ हैं। धन लेकर जो संधि की जाती है, वह वित्तसंधि उत्तम है।

सत्कार पाकर की हुई दूसरी संधि मध्यम है और भयके कारण की जानेवाली तीसरी संधि अधम मानी गयी है। इन सबका उस ग्रन्थमें विस्तारपूर्वक वर्णन है ॥ ३७ ॥

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सत्कार पाकर की हुई दूसरी संधि मध्यम है और भयके कारण की जानेवाली तीसरी संधि अधम मानी गयी है। इन सबका उस ग्रन्थमें विस्तारपूर्वक वर्णन है ॥ ३७ ॥

महाभारत

राजासे हीन प्रजाकी ब्रह्माजीसे राजाके लिये प्रार्थना

यात्राकालाश्च चत्वारस्त्रिवर्गस्य च विस्तरः ।
विजयो धर्मयुक्तश्च तथार्थविजयश्च ह ॥ ३८ ॥
आसुरश्चैव विजयस्तथा कार्त्स्न्येन वर्णितः ।
लक्षणं पञ्चवर्गस्य त्रिविधं चात्र वर्णितम् ॥ ३९ ॥

शत्रुओंपर चढ़ाई करनेके चार* अवसर, त्रिवर्गके विस्तार, धर्म-विजय, अर्थ-विजय तथा आसुर-विजयका भी उक्त ग्रन्थमें पूर्णरूपसे वर्णन किया गया है। मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, सेना और कोष—इन पाँच वर्गोंके उत्तम, मध्यम और अधम भेदसे तीन प्रकारके लक्षणोंका भी प्रतिपादन किया गया है ॥ ३८-३९ ॥

प्रकाशश्चाप्रकाशश्च दण्डोऽथ परिशब्दितः ।

प्रकाशोऽष्टविधस्तत्र गुह्यश्च बहुविस्तरः ॥ ४० ॥ प्रकट और गुप्त दो प्रकारकी सेनाओंका भी वर्णन किया गया है। उनमें प्रकट सेना आठ प्रकारकी बतायी गयी है और गुप्त सेनाका विस्तार बहुत अधिक कहा गया है ॥ ४० ॥

रथा नागा हयाश्चैव पादाताश्चैव पाण्डव । विष्टिनौवश्चराश्चैव देशिका इति चाष्टमम् ॥ ४१ ॥ अङ्गान्येतानि कौरव्य प्रकाशानि बलस्य तु । कुरुवंशी पाण्डुनन्दन! हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, बेगारमें पकड़े गये बोझ ढोनेवाले लोग, नौकारोही, गुप्तचर तथा कर्तव्यका उपदेश करनेवाले गुरु—ये सेनाके प्रकट आठ अङ्ग हैं ॥ ४१ १/२ ॥

जङ्गमाजङ्गमाश्रोक्ताश्चूर्णयोगा विषादयः ॥ ४२ ॥ सेनाके गुप्त अङ्ग हैं जङ्गम (सर्पादिजनित) और अजङ्गम (पेड़-पौधोंसे उत्पन्न) विष आदि चूर्णयोग अर्थात् विनाशकारक ओषधियाँ ॥ ४२ ॥

स्पर्शे चाभ्यवहार्ये चाप्युपांशुर्विविधः स्मृतः । अरिर्मित्र उदासीन इत्येतेऽप्यनुवर्णिताः ॥ ४३ ॥ यह गोपनीय दण्डसाधन (विष आदि) शत्रुपक्षके लोगोंके वस्त्र आदिके साथ स्पर्श कराने अथवा उनके भोजनमें मिला देनेके उपयोगमें आता है। विभिन्न मन्त्रोंके जपका प्रयोग भी पूर्वोक्त नीतिशास्त्रमें बताया गया है। इसके सिवा इस ग्रन्थमें शत्रु, मित्र और उदासीनका भी बारंबार वर्णन किया गया है ॥ ४३ ॥

कृत्स्ना मार्गगुणाश्चैव तथा भूमिगुणाश्च ह । आत्मरक्षणमाश्वासः सर्गाणां चान्ववेक्षणम् ॥ ४४ ॥ तथा मार्गके समस्त गुण, भूमिके गुण, आत्मरक्षाके उपाय, आश्वासन तथा रथ आदिके निर्माण और निरीक्षण आदिका भी वर्णन है ॥ ४४ ॥

कल्पना विविधाश्चापि नृनागरथवाजिनाम् । व्यूहाश्च विविधाभिख्या विचित्रं युद्धकौशलम् ॥ ४५ ॥ उत्पाताश्च निपाताश्च सुयुद्धं सुपलायितम् । शस्त्राणां पालनं ज्ञानं तथैव भरतर्षभ ॥ ४६ ॥ सेनाको पुष्ट करनेवाले अनेक प्रकारके योग, हाथी, घोड़ा, रथ और मनुष्य-सेनाकी भाँति-भाँतिकी व्यूह-रचना, नाना प्रकारके युद्धकौशल, जैसे ऊपर उछल जाना, नीचे झुककर अपनेको बचा लेना, सावधान होकर भलीभाँति युद्ध करना, कुशलतापूर्वक वहाँसे निकल भागना—इन सब उपायोंका भी इस ग्रन्थमें वर्णन है। भरतश्रेष्ठ! शस्त्रोंके संरक्षण और प्रयोगके ज्ञानका भी उसमें उल्लेख है ॥ ४५-४६ ॥

बलव्यसनमुक्तं च तथैव बलहर्षणम् ।

पीड़ा चापदकालश्च पत्तिज्ञानं च पाण्डव ॥ ४७ ॥ पाण्डुकुमार! विपत्तिसे सेनाओंका उद्धार करना, सैनिकोंका हर्ष और उत्साह बढ़ाना, पीड़ा और आपत्तिके समय पैदल सैनिकोंकी स्वामिभक्तिकी परीक्षा करना—इन सब बातोंका उस शास्त्रमें वर्णन किया गया है ॥ ४७ ॥ तथा खातविधानं च योगः संचार एव च । चोरैराटविकैश्चोग्रैः परराष्ट्रस्य पीड़नम् ॥ ४८ ॥ अग्निदैर्गरदैश्चैव प्रतिरूपककारकैः । श्रेणिमुख्योपजापेन वीरुधश्छेदनेन च ॥ ४९ ॥ दूषणेन च नागानामातङ्कजननेन च । आराधनेन भक्तस्य प्रत्ययोपार्जनेन च ॥ ५० ॥ दुर्गके चारों ओर खाई खुदवाना, सेनाका युद्धके लिये सुसज्जित होना तथा रणयात्रा करना, चोरों और भयानक जंगली लुटेरोंद्वारा शत्रुके राष्ट्रको पीड़ा देना, आग लगानेवाले, जहर देनेवाले, छद्मवेशधारी लोगोंद्वारा भी शत्रुको हानि पहुँचाना तथा एक-एक शत्रुदलके प्रधान-प्रधान लोगोंमें भेद उत्पन्न करना, फसल और पौधोंको काट लेना, हाथियोंको भड़काना, लोगोंमें आतङ्क उत्पन्न करना, शत्रुओंमें अनुरक्त पुरुषको अनुनय आदिके द्वारा फोड़ लेना और शत्रुपक्षके लोगोंमें अपने प्रति विश्वास उत्पन्न कराना आदि उपायोंसे शत्रुके राष्ट्रको पीड़ा देनेकी कलाका भी ब्रह्माजीके उक्त ग्रन्थमें वर्णन किया गया है ॥ ४८—५० ॥ सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य ह्रासवृद्धिसमञ्जसम् । दूतसामर्थ्यसंयोगात् सराष्ट्रस्य विवर्धनम् ॥ ५१ ॥ अरिमध्यस्थमित्राणां सम्यक् चोक्तं प्रपञ्चनम् । अवमर्दः प्रतीघातस्तथैव च बलीयसाम् ॥ ५२ ॥ सात अङ्गोंसे युक्त राज्यके ह्रास, वृद्धि और समान भावसे स्थिति, दूतके सामर्थ्यसे होनेवाली अपनी और अपने राष्ट्रकी वृद्धि, शत्रु, मित्र और मध्यस्थोंका विस्तारपूर्वक सम्यक् विवेचन, बलवान् शत्रुओंको कुचल डालने तथा उनसे टक्कर लेनेकी विधि आदिका उक्त ग्रन्थमें वर्णन किया गया है ॥ ५१-५२ ॥ व्यवहारः सुसूक्ष्मश्च तथा कण्टकशोधनम् । श्रमो व्यायामयोगश्च त्यागो द्रव्यस्य संग्रहः ॥ ५३ ॥ शासनसम्बन्धी अत्यन्त सूक्ष्म व्यवहार, कण्टक-शोधन (राज्यकार्यमें विघ्न डालनेवालेको उखाड़ फेंकना), परिश्रम, व्यायाम-योग तथा धनके त्याग और संग्रहका भी उसमें प्रतिपादन किया गया है ॥ ५३ ॥ अभृतानां च भरणं भृतानां चान्ववेक्षणम् । अर्थस्य काले दानं च व्यसने चाप्रसङ्गिता ॥ ५४ ॥

जिनके भरण-पोषणका कोई उपाय न हो, उनके जीवननिर्वाहका प्रबन्ध करना, जिनके भरण-पोषणकी व्यवस्था राज्यकी ओरसे की गयी हो उनकी देखभाल करना, समयपर धनका दान करना, दुर्व्यसनमें आसक्त न होना आदि विविध विषयोंका उस ग्रन्थमें उल्लेख है।।

तथा राजगुणाश्चैव सेनापतिगुणाश्च ह । कारणं च त्रिवर्गस्य गुणदोषास्तथैव च ॥ ५५ ॥ राजाके गुण, सेनापतिके गुण, अर्थ, धर्म और कामके साधन तथा उनके गुण-दोषका भी उसमें निरूपण किया गया है ॥ ५५ ॥

दुश्चेष्टितं च विविधं वृत्तिंश्चैवानुवर्तिनाम् । शङ्कितत्वं च सर्वस्य प्रमादस्य च वर्जनम् ॥ ५६ ॥ अलब्धलाभो लब्धस्य तथैव च विवर्धनम् । प्रदानं च विवृद्धस्य पात्रेभ्यो विधिवत्ततः ॥ ५७ ॥ विसर्गोऽर्थस्य धर्मार्थं कामहेतुकमुच्यते । चतुर्थं व्यसनाघाते तथैवात्रानुवर्णितम् ॥ ५८ ॥ भाँति-भाँतिकी दुश्चेष्टा, अपने सेवकोंकी जीविकाका विचार, सबके प्रति सशङ्क रहना, प्रमादका परित्याग करना, अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करना, प्राप्त हुई वस्तुको सुरक्षित रखते हुए उसे बढ़ाना और बढ़ी हुई वस्तुका सुपात्रोंको विधिपूर्वक दान देना—यह धनका पहला उपयोग है। धर्मके लिये धनका त्याग उसका दूसरा उपयोग है, कामभोगके लिये उसका व्यय करना तीसरा और संकट-निवारणके लिये उसे खर्च करना उसका चौथा उपयोग है। इन सब बातोंका उस ग्रन्थमें भलीभाँति वर्णन किया गया है ॥ ५६—५८ ॥

क्रोधजानि तथोग्राणि कामजानि तथैव च । दशोक्तानि कुरुश्रेष्ठ व्यसनान्यत्र चैव ह ॥ ५९ ॥ कुरुश्रेष्ठ! क्रोध और कामसे उत्पन्न होनेवाले जो यहाँ दस प्रकारके भयंकर व्यसन हैं, उनका भी इस ग्रन्थमें उल्लेख है ॥ ५९ ॥

मृगयाक्षास्तथा पानं स्त्रियश्च भरतर्षभ । कामजान्यहुराचार्यः प्रोक्तानीह स्वयम्भुवा ॥ ६० ॥ भरतश्रेष्ठ! नीतिशास्त्रके आचार्योंने जो मृगया, द्यूत, मद्यपान और स्त्रीप्रसङ्ग—ये चार प्रकारके कामजनित व्यसन बताये हैं, उन सबका इस ग्रन्थमें ब्रह्माजीने प्रतिपादन किया है ॥ ६० ॥

वाक्पारुष्यं तथोग्रत्वं दण्डपारुष्यमेव च । आत्मनो निग्रहस्त्यागो ह्यर्थदूषणमेव च ॥ ६१ ॥ वाणीकी कटुता, उग्रता, दण्डकी कठोरता, शरीरको कैद कर लेना, किसीको सदाके लिये त्याग देना और आर्थिक हानि पहुँचाना—ये छः प्रकारके क्रोधजनित व्यसन उक्त

ग्रन्थमें बताये गये हैं ।। ६१ ।। यन्त्राणि विविधान्येव क्रियास्तेषां च वर्णिताः । अवमर्दः प्रतीघातः केतनानां च भञ्जनम् ।। ६२ ।। नाना प्रकारके यन्त्रों और उनकी क्रियाओंका भी वर्णन किया गया है। शत्रुके राष्ट्रको कुचल देना, उसकी सेनाओंपर चोट करना और उनके निवास-स्थानोंको नष्ट-भ्रष्ट कर देना—इन सब बातोंका भी इस ग्रन्थमें उल्लेख है ।। ६२ ।। चैत्यद्रुमावमर्दश्च रोधः कर्मानुशासनम् । अपस्करोऽथ वसनं तथोपायाश्च वर्णिताः ।। ६३ ।। शत्रुकी राजधानीके चैत्य वृक्षोंका विध्वंस करा देना, उसके निवास-स्थान और नगरपर चारों ओरसे घेरा डालना आदि उपायोंका तथा कृषि एवं शिल्प आदि कर्मोंका उपदेश, रथके विभिन्न अवयवोंका निर्माण, ग्राम और नगर आदिमें निवास करनेकी विधि तथा जीवननिर्वाहके अनेक उपायोंका भी उक्त ग्रन्थमें वर्णन है ।। ६३ ।। पणवानकशङ्खानां भेरीणां च युधिष्ठिर । उपार्जनं च द्रव्याणां परिमर्दश्च तानि षट् ।। ६४ ।। युधिष्ठिर! ढोल, नगारे, शंख, भेरी आदि रणवाद्योंको बजाने, मणि, पशु, पृथ्वी, वस्त्र, दास-दासी तथा सुवर्ण—इन छः प्रकारके द्रव्योंका अपने लिये उपार्जन करने तथा शत्रुपक्षकी इन वस्तुओंका विनाश कर देनेका भी इस शास्त्रमें उल्लेख है ।। ६४ ।। लब्धस्य च प्रशमनं सतां चैवाभिपूजनम् । विद्वद्भिरेकीभावश्च दानहोमविधिज्ञता ।। ६५ ।। मङ्गलालम्भनं चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया । आहारयोजनं चैव नित्यमास्तिक्यमेव च ।। ६६ ।। अपने अधिकारमें आये हुए देशोंमें शान्ति स्थापित करना, सत्पुरुषोंका सत्कार करना, विद्वानोंके साथ एकता (मेल-जोल) बढ़ाना, दान और होमकी विधिको जानना, माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श करना, शरीरको वस्त्र और आभूषणोंसे सजाना, भोजनकी व्यवस्था करना और सर्वदा आस्तिक बुद्धि रखना—इन सब बातोंका भी उस ग्रन्थमें वर्णन है ।। ६५-६६ ।। एकेन च यथोत्थेयं सत्यत्वं मधुरा गिरः । उत्सवानां समाजानां क्रियाः केतनजास्तथा ।। ६७ ।। मनुष्य अकेला होकर भी किस प्रकार उत्थान (उन्नति) करे? इसका विचार, सत्यता, उत्सवों और समाजोंमें मधुर वाणीका प्रयोग तथा गृहसम्बन्धी क्रियाएँ—इन सबका वर्णन किया गया है ।। ६७ ।। प्रत्यक्षाश्च परोक्षाश्च सर्वाधिकरणेष्वथ । वृत्तेर्भरतशार्दूल नित्यं चैवान्वेक्षणम् ।। ६८ ।।

भरतवंशके सिंह युधिष्ठिर! समस्त न्यायालयोंमें जो प्रत्यक्ष और परोक्ष विचार होते हैं तथा वहाँ जो राजकीय पुरुषोंके व्यवहार होते हैं, उन सबका प्रतिदिन निरीक्षण करना चाहिये। इसका भी उक्त शास्त्रमें उल्लेख है ॥ ६८ ॥
अदण्ड्यत्वं च विप्राणां युक्त्या दण्डनिपातनम् ।
अनुजीविस्वजातिभ्यो गुणेभ्यश्च समुद्भवः ॥ ६९ ॥
ब्राह्मणोंको दण्ड न देनेका, अपराधियोंको युक्तिपूर्वक दण्ड देनेका, अपने पीछे जिनकी जीविका चलती हो उनकी, अपने जाति-भाइयोंकी तथा गुणवान् पुरुषोंकी भी उन्नति करनेका उस ग्रन्थमें उल्लेख है ॥ ६९ ॥
रक्षणं चैव पौराणां राष्ट्रस्य च विवर्धनम् ।
मण्डलस्था च या चिन्ता राजन् द्वादशराजिका ॥ ७० ॥
राजन्! पुरवासियोंकी रक्षा, राज्यकी वृद्धि तथा द्वादश* राजमण्डलोंके विषयमें जो चिन्तन किया जाता है, उसका भी इस ग्रन्थमें उल्लेख हुआ है ॥ ७० ॥
द्वासप्ततिविधा चैव शरीरस्य प्रतिक्रिया ।
देशजातिकुलानां च धर्माः समनुवर्णिताः ॥ ७१ ॥
वैद्यक शास्त्रके अनुसार बहत्तर प्रकारकी शारीरिक चिकित्सा तथा देश, जाति और कुलके धर्मोंका भी भलीभाँति वर्णन किया गया है ॥ ७१ ॥
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चात्रानुवर्णिताः ।
उपायाश्चार्थलिप्सा च विविधा भूरिदक्षिण ॥ ७२ ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर! इस ग्रन्थमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका, इनकी प्राप्तिके उपायोंका तथा नाना प्रकारकी धन-लिप्साका भी वर्णन है ॥ ७२ ॥
मूलकर्मक्रिया चात्र मायायोगश्च वर्णितः ।
दूषणं स्रोतसां चैव वर्णितं चास्थिराम्भसाम् ॥ ७३ ॥
इस ग्रन्थमें कोशकी वृद्धि करनेवाले जो कृषि, वाणिज्य आदि मूल कर्म हैं, उनके करनेका प्रकार बताया गया है। मायाके प्रयोगकी विधि समझायी गयी है। स्रोतजल और अस्थिरजलके दोषोंका वर्णन किया गया है ॥ ७३ ॥
यैर्यैरुपायैर्लोकस्तु न चलेदार्यवर्त्मनः ।
तत् सर्वं राजशार्दूल नीतिशास्त्रेऽभिवर्णितम् ॥ ७४ ॥
राजसिंह! जिन-जिन उपायोंद्वारा यह जगत् सन्मार्गसे विचलित न हो, उन सबका इस नीतिशास्त्रमें प्रतिपादन किया गया है ॥ ७४ ॥
एतत् कृत्वा शुभं शास्त्रं ततः स भगवान् प्रभुः ।
देवानुवाच संहृष्टः सर्वान् शक्रपुरोगमान् ॥ ७५ ॥
इस शुभ शास्त्रका निर्माण करके जगत्के स्वामी भगवान् ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए और इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंसे इस प्रकार बोले— ॥ ७५ ॥

उपकाराय लोकस्य त्रिवर्गस्थापनाय च । नवनीतं सरस्वत्या बुद्धिरेषा प्रभाविता ॥ ७६ ॥ 'देवगण! सम्पूर्ण जगत्‌के उपकार तथा धर्म, अर्थ एवं कामकी स्थापनाके लिये वाणीका सारभूत यह विचार यहाँ प्रकट किया गया ॥ ७६ ॥ दण्डेन सहिता ह्येषा लोकरक्षणकारिका । निग्रहानुग्रहरता लोकाननुचरिष्यति ॥ ७७ ॥ 'दण्ड-विधानके साथ रहनेवाली यह नीति सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करनेवाली है। यह दुष्टोंके निग्रह और साधु पुरुषोंके प्रति अनुग्रहमें तत्पर रहकर सम्पूर्ण जगत्‌में प्रचलित होगी ॥ ७७ ॥ दण्डेन नीयते चेदं दण्डं नयति वा पुनः । दण्डनीतिरिति ख्याता त्रीँल्लोँकानभिवर्तते ॥ ७८ ॥ 'इस शास्त्रके अनुसार दण्डके द्वारा जगत्‌का सन्मार्गपर स्थापन किया जाता है अथवा राजा इसके अनुसार प्रजावर्गमें दण्डकी स्थापना करता है; इसलिये यह विद्या दण्डनीतिके नामसे विख्यात है। इसका तीनों लोकोंमें विस्तार होगा ॥ ७८ ॥ षाड्गुण्यगुणसारैषा स्थास्यत्यग्रे महात्मसु । धर्मार्थकाममोक्षाश्च सकला ह्यत्र शब्दिताः ॥ ७९ ॥ 'यह विद्या संधि-विग्रह आदि छहों गुणोंका सारभूत है। महात्माओंमें इसका स्थान सबसे आगे होगा। इस शास्त्रमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंका निरूपण किया गया है' ॥ ७९ ॥ ततस्तां भगवान् नीतिं पूर्वं जग्राह शङ्करः । बहुरूपो विशालाक्षः शिवः स्थाणुरुमापतिः ॥ ८० ॥ तदनन्तर सबसे पहले भगवान् शङ्करने इस नीतिशास्त्रको ग्रहण किया। वे बहुरूप, विशालाक्ष, शिव, स्थाणु, उमापति आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं ॥ ८० ॥ प्रजानामायुषो ह्रासं विज्ञाय भगवान् शिवः । संचिक्षेप ततः शास्त्रं महास्त्रं ब्रह्मणा कृतम् ॥ ८१ ॥ वैशालाक्षमिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत । विशालाक्ष भगवान् शिवने प्रजावर्गकी आयुका ह्रास होता जानकर ब्रह्माजीके रचे हुए इस महान् अर्थसे भरे हुए शास्त्रको संक्षिप्त किया था; इसलिये इसका नाम 'वैशालाक्ष' हो गया। फिर इसे इन्द्रने ग्रहण किया ॥ ८१ ½ ॥ दशाध्यायसहस्राणि सुब्रह्मण्यो महातपाः ॥ ८२ ॥ भगवानपि तच्छास्त्रं संचिक्षेप पुरंदरः । सहस्रैः पञ्चभिस्तात यदुक्तं बाहुदन्तकम् ॥ ८३ ॥