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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

तस्मात् पुत्रक गच्छ त्वं शिष्टमल्पं च नः प्रभो ।
'तुम लोगोंके रहनेसे हमलोगोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ेगा। मैं तुम्हारे स्नेहपाशमें बँधकर उत्तम तपस्यासे गिर जाऊँगी, अतः सामर्थ्यशाली पुत्र! चले जाओ। अब हमलोगोंकी आयु बहुत थोड़ी रह गयी है' ।। ४११/२ ।।
एवं संस्तम्भितं वाक्यैः कुन्त्या बहुविधैर्मनः ।। ४२ ।।
सहदेवस्य राजेन्द्र राज्ञश्चैव विशेषतः ।
राजेन्द्र! इस तरह अनेक प्रकारकी बातें कहकर कुन्तीने सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरके मनको धीरज बँधाया ।। ४२१/२ ।।
ते मात्रा समनुज्ञाता राज्ञा च कुरुपुङ्गवाः ।। ४३ ।।
अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठमामन्त्रयितुमारेभन् ।
माता तथा धृतराष्ट्रकी आज्ञा पाकर कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंने कुरुकुलतिलक धृतराष्ट्रको प्रणाम किया और उनसे विदा लेनेके लिये इस प्रकार कहा— ।। ४३१/२ ।।

युधिष्ठिर उवाच
राज्यं प्रतिगमिष्यामः शिवेन प्रतिनन्दिताः ।। ४४ ।।
अनुज्ञातास्त्वया राजन् गमिष्यामो विकल्मषाः ।
**युधिष्ठिर बोले—**महाराज! आपके आशीर्वादसे आनन्दित होकर हमलोग कुशलपूर्वक राजधानी लौट जायेंगे। राजन्! इसके लिये आप हमें आज्ञा दें। आपकी आज्ञा पाकर हम पापरहित हो यहाँसे यात्रा करेंगे ।। ४४१/२ ।।
एवमुक्तः स राजर्षिर्धर्मराज्ञा महात्मना ।। ४५ ।।
अनुजज्ञे स कौरव्यमभिनन्द्य युधिष्ठिरम् ।
महात्मा धर्मराजके ऐसा कहनेपर राजर्षि धृतराष्ट्रने कुरुनन्दन युधिष्ठिरका अभिनन्दन करके उन्हें जानेकी आज्ञा दे दी ।। ४५१/२ ।।
भीमं च बलिनां श्रेष्ठं सान्त्वयामास पार्थिवः ।। ४६ ।।
स चास्य सम्यङ्मेधावी प्रत्यपद्यत वीर्यवान् ।
इसके बाद राजा धृतराष्ट्रने बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेनको सान्त्वना दी। बुद्धिमान् एवं पराक्रमी भीमसेनने भी उनकी बातोंको यथार्थरूपसे ग्रहण किया—हृदयसे स्वीकार किया ।। ४६१/२ ।।
अर्जुनं च समाश्लिष्य यमौ च पुरुषर्षभौ ।। ४७ ।।
अनुजज्ञे स कौरव्यः परिष्वज्याभिनन्द्य च ।
गान्धार्या चाभ्यनुज्ञाताः कृतपादाभिवादनाः ।। ४८ ।।
जनन्या समुपाघ्राताः परिष्वक्ताश्च ते नृपम् ।
चक्रुः प्रदक्षिणं सर्वे वत्सा इव निवारणे ।। ४९।

पुनः पुनर्निरीक्षन्तः प्रचक्रुस्ते प्रदक्षिणम् ।
तदनन्तर धृतराष्ट्रने अर्जुन और पुरुषप्रवर नकुल-सहदेवको छातीसे लगा उनका अभिनन्दन करके विदा किया। इसके बाद उन पाण्डवोंने गान्धारीके चरणोंमें प्रणाम करके उनकी आज्ञा ली। फिर माता कुन्तीने उन्हें हृदयसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा। जैसे बछड़े अपनी माताका दूध पीनेसे रोके जानेपर बार-बार उसकी ओर देखते हुए उसके चारों ओर चक्कर लगाते हैं, उसी प्रकार पाण्डवोंने राजा तथा माताकी ओर बार-बार देखते हुए उन नरेशकी परिक्रमा की ।। ४७—४९ १/२ ।।
द्रौपदीप्रमुखाश्चैव सर्वाः कौरवयोषितः ।। ५० ।।
न्यायतः श्वशुरे वृत्तिं प्रयुज्य प्रययुस्ततः ।
श्वश्रूभ्यां समनुज्ञाताः परिष्वज्याभिनन्दिताः ।। ५१ ।।
संदिष्टाश्चेति कर्तव्यं प्रययुर्भर्तृभिः सह ।
द्रौपदी आदि समस्त कौरवस्त्रियोंने अपने श्वशुरको न्यायपूर्वक प्रणाम किया। फिर दोनों सासुओंने उन्हें गलेसे लगाकर आशीर्वाद दे, जानेकी आज्ञा दी और उन्हें उनके कर्तव्यका उपदेश भी दिया। तत्पश्चात् वे अपने पतियोंके साथ चली गयीं ।। ५०-५१ १/२ ।।
ततः प्रजज्ञे निनदः सूतानां युज्यतामिति ।। ५२ ।।
उष्ट्राणां क्रोशतां चापि हयानां हेषतामपि ।
ततो युधिष्ठिरो राजा सदारः सहसैनिकः ।
नगरं हास्तिनपुरं पुनरायात् सबान्धवः ।। ५३ ।।
तदनन्तर सारथियोंने 'रथ जोतो, रथ जोतो' की पुकार मचायी। फिर ऊँटोंके चिग्घाड़ने और घोड़ोंके हिनहिनानेकी आवाज हुई। इसके बाद अपने घरकी स्त्रियों, भाइयों और सैनिकोंके साथ राजा युधिष्ठिर पुनः हस्तिनापुर नगरको लौट आये ।। ५२-५३ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि युधिष्ठिरप्रत्यागमे षट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत पुत्रदर्शनपर्वमें युधिष्ठिरका प्रत्यागमनविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६ ।।

(नारदागमनपर्व)

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(नारदागमनपर्व)

सप्तत्रिंशोऽध्यायः

नारदजीसे धृतराष्ट्र आदिके दावानलमें दग्ध हो जानेका हाल जानकर युधिष्ठिर आदिका शोक करना

वैशम्पायन उवाच

द्विवर्षोपनिवृत्तेषु पाण्डवेषु यदृच्छया ।
देवर्षिर्नारदो राजन्नाजगाम युधिष्ठिरम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंको तपोवनसे आये जब दो वर्ष व्यतीत हो गये, तब एक दिन देवर्षि नारद दैवेच्छासे घूमते-घामते राजा युधिष्ठिरके यहाँ आ पहुँचे ॥ १ ॥

तमभ्यर्च्य महाबाहुः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
आसीनं परिविश्वस्तं प्रोवाच वदतां वरः ॥ २ ॥
महाबाहु कुरुराज युधिष्ठिरने नारदजीकी पूजा करके उन्हें आसनपर बिठाया। जब वे आसनपर बैठकर थोड़ी देर विश्राम कर चुके, तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार पूछा ॥ २ ॥

चिरात्तु नानुपश्यामि भगवन्तमुपस्थितम् ।
कच्चित् ते कुशलं विप्र शुभं वा प्रत्युपस्थितम् ॥ ३ ॥
‘भगवन्! इधर दीर्घकालसे मैं आपकी उपस्थिति यहाँ नहीं देखता हूँ। ब्रह्मन्! कुशल तो है न? अथवा आपको शुभकी ही प्राप्ति होती है न? ॥ ३ ॥

के देशाः परिदृष्टास्ते किं च कार्यं करोमि ते ।
तद् ब्रूहि द्विजमुख्य त्वं त्वं ह्यस्माकं परा गतिः ॥ ४ ॥
‘विप्रवर! इस समय आपने किन-किन देशोंका निरीक्षण किया है? बताइये मैं आपकी क्या सेवा करूँ? क्योंकि आप हमलोगोंकी परम गति हैं’ ॥ ४ ॥

नारद उवाच

चिरदृष्टोऽसि मेत्येवमागतोऽहं तपोवनात् ।
परिदृष्टानि तीर्थानि गङ्गा चैव मया नृप ॥ ५ ॥

नारदजीने कहा—नरेश्वर! बहुत दिन पहले मैंने तुम्हें देखा था, इसीलिये मैं तपोवनसे सीधे यहाँ चला आ रहा हूँ। रास्तेमें मैंने बहुत-से तीर्थों और गङ्गाजीका भी दर्शन किया है॥ ५॥

युधिष्ठिर उवाच

वदन्ति पुरुषा मेऽद्य गङ्गातीरनिवासिनः।
धृतराष्ट्रं महात्मानमास्थितं परमं तपः ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर बोले—भगवान्! गङ्गाके किनारे रहनेवाले मनुष्य मेरे पास आकर कहा करते हैं कि महामनस्वी महाराज धृतराष्ट्र इन दिनों बड़ी कठोर तपस्यामें लगे हुए हैं॥
अपि दृष्टस्त्वया तत्र कुशली स कुरूद्वहः।
गान्धारी च पृथा चैव सूतपुत्रश्च संजयः ॥ ७ ॥
क्या आपने भी उन्हें देखा है? वे कुरुश्रेष्ठ वहाँ कुशलसे तो हैं न? गान्धारी, कुन्ती तथा सूतपुत्र संजय भी सकुशल हैं न?॥ ७॥
कथं च वर्तते चाद्य पिता मम स पार्थिवः।
श्रोतुमिच्छामि भगवन् यदि दृष्टस्त्वया नृपः ॥ ८ ॥
आजकल मेरे ताऊ राजा धृतराष्ट्र कैसे रहते हैं? भगवन्! यदि आपने उन्हें देखा हो तो मैं उनका समाचार सुनना चाहता हूँ॥ ८॥

नारद उवाच

स्थिरीभूय महाराज शृणु वृत्तं यथातथम् ।
यथा श्रुतं च दृष्टं च मया तस्मिंस्तपोवने ॥ ९ ॥
नारदजीने कहा—महाराज! मैंने उस तपोवनमें जो कुछ देखा और सुना है, वह सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक बतला रहा हूँ। तुम स्थिरचित्त होकर सुनो ॥ ९॥
वनवासनिवृत्तेषु भवत्सु कुरुनन्दन।
कुरुक्षेत्रात् पिता तुभ्यं गङ्गाद्वारं ययौ नृप ॥ १० ॥
गान्धार्या सहितो धीमान् वध्वा कुन्त्या समन्वितः।
संजयेन च सूतेन साग्निहोत्रः सयाजकः ॥ ११ ॥
कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले नरेश! जब तुमलोग वनसे लौट आये, तब तुम्हारे बुद्धिमान् ताऊ राजा धृतराष्ट्र गान्धारी, बहू कुन्ती, सूत संजय, अग्निहोत्र और पुरोहितके साथ कुरुक्षेत्रसे गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-को चले गये ॥ १०-११ ॥
आतस्थे स तपस्तीव्रं पिता तव तपोधनः।
वीटां मुखे समाधाय वायुभक्षोऽभवन्मुनिः ॥ १२ ॥
वहाँ जाकर तपस्याके धनी तुम्हारे ताऊने कठोर तपस्या आरम्भ की। वे मुँहमें पत्थरका टुकड़ा रखकर वायुका आहार करते और मौन रहते थे ॥ १२ ॥

वने स मुनिभिः सर्वैः पूज्यमानो महातपाः । त्वगस्थिमात्रशेषः स षण्मासानभवन्नृपः ॥ १३ ॥ उस वनमें जितने ऋषि रहते थे, वे लोग उनका विशेष सम्मान करने लगे। महातपस्वी धृतराष्ट्रके शरीरपर चमड़ेसे ढकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया था। उस अवस्थामें उन्होंने छः महीने व्यतीत किये ॥ १३ ॥

गान्धारी तु जलाहारी कुन्ती मासोपवासिनी । संजयः षष्ठभक्तेन वर्तयामास भारत ॥ १४ ॥ भारत! गान्धारी केवल जल पीकर रहने लगीं। कुन्तीदेवी एक महीनेतक उपवास करके एक दिन भोजन करती थीं और संजय छठे समय अर्थात् दो दिन उपवास करके तीसरे दिन संध्याको आहार ग्रहण करते थे ॥ १४ ॥

अग्नींस्तु याजकास्तत्र जुहुवुर्विधिवत् प्रभो । दृश्यतोऽदृश्यतश्चैव वने तस्मिन् नृपस्य वै ॥ १५ ॥ प्रभो! राजा धृतराष्ट्र उस वनमें कभी दिखायी देते और कभी अदृश्य हो जाते थे। यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण वहाँ उनके द्वारा स्थापित की हुई अग्निमें विधिवत् हवन करते रहते थे ॥ १५ ॥

अनिकेतोऽथ राजा स बभूव वनगोचरः । ते चापि सहिते देव्यौ संजयश्च तमन्वयुः ॥ १६ ॥ अब राजाका कोई निश्चित स्थान नहीं रह गया। वे वनमें सब ओर विचरते रहते थे। गान्धारी और कुन्ती ये दोनों देवियाँ साथ रहकर राजाके पीछे-पीछे लगी रहती थीं। संजय भी उन्हींका अनुसरण करते थे ॥

संजयो नृपतेर्नेता समेषु विषमेषु च । गान्धार्याश्च पृथा चैव चक्षुरासीदनिन्दिता ॥ १७ ॥ ऊँची-नीची भूमि आ जानेपर संजय ही राजा धृतराष्ट्रको चलाते थे और अनिन्दिता सती-साध्वी कुन्ती गान्धारीके लिये नेत्र बनी हुई थीं ॥ १७ ॥

ततः कदाचिद् गङ्गायाः कच्छे स नृपसत्तमः । गङ्गायामाप्लुतो धीमानाश्रमाभिमुखोऽभवत् ॥ १८ ॥ तदनन्तर एक दिनकी बात है, बुद्धिमान् नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्रने गङ्गाके कछारमें जाकर उनके जलमें डुबकी लगायी और स्नानके पश्चात् वे अपने आश्रमकी ओर चल पड़े ॥ १८ ॥

अथ वायुः समुद्भूतो दावाग्निरभवन्महान् । ददाह तद् वनं सर्वं परिगृह्य समन्ततः ॥ १९ ॥ इतनेहीमें वहाँ बड़े जोरकी हवा चली। जिससे उस वनमें बड़ी भारी दावाग्नि प्रज्वलित हो उठी। उसने चारों ओरसे उस सारे वनको जलाना आरम्भ किया ॥

दह्यत्सु मृगयूथेषु द्विजिह्वेषु समन्ततः ।
वराहाणां च यूथेषु संश्रयत्सु जलाशयान् ॥ २० ॥
सब ओर मृगोंके झुंड और सर्प दग्ध होने लगे। वनैले सूअर भाग-भागकर जलाशयोंकी शरण लेने लगे ॥ २० ॥

समाविद्धे वने तस्मिन् प्राप्ते व्यसन उत्तमे ।
निराहारतया राजन् मन्दप्राणविचेष्टितः ॥ २१ ॥
असमर्थोऽपसरणे सुकृशे मातरौ च ते ।
राजन्! सारा वन आगसे घिर गया और उन लोगोंपर बड़ा भारी संकट आ गया। उपवास करनेसे प्राणशक्ति क्षीण हो जानेके कारण राजा धृतराष्ट्र वहाँसे भागनेमें असमर्थ थे, तुम्हारी दोनों माताएँ भी अत्यन्त दुर्बल हो गयी थीं; अतः वे भी भागनेमें असमर्थ थीं ॥ २११/२ ॥

ततः स नृपतिर्दृष्ट्वा वह्निमायान्तमन्तिकात् ॥ २२ ॥
इदमाह ततः सूतं संजयं जयतां वरः ।
तदनन्तर विजयी पुरुषोंमें श्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने उस अग्निको निकट आती जान सूत संजयसे इस प्रकार कहा— ॥ २२१/२ ॥

गच्छ संजय यत्राग्निर्न त्वां दहति कर्हिचित् ॥ २३ ॥
वयमत्राग्निना युक्ता गमिष्यामः परां गतिम् ।
‘संजय! तुम किसी ऐसे स्थानमें भाग जाओ, जहाँ यह दावाग्नि तुम्हें कदापि जला न सके। हमलोग तो अब यहीं अपनेको अग्निमें होम कर परम गति प्राप्त करेंगे’ ॥ २३१/२ ॥

तमुवाच किलोद्विग्नः संजयो वदतां वरः ॥ २४ ॥
राजन् मृत्युरनिष्टोऽयं भविता ते वृथाग्निना ।
न चोपायं प्रपश्यामि मोक्षणे जातवेदसः ॥ २५ ॥
तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ संजयने अत्यन्त उद्विग्न होकर कहा—‘राजन्! इस लौकिक अग्निसे आपकी मृत्यु होना ठीक नहीं है, (आपके शरीरका दाह-संस्कार तो आहवनीय अग्निमें होना चाहिये।) किंतु इस समय इस दावानलसे छुटकारा पानेका कोई उपाय भी मुझे नहीं दिखायी देता ॥ २४-२५ ॥

यदत्रानन्तरं कार्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति ।
इत्युक्तः संजयेनेदं पुनराह स पार्थिवः ॥ २६ ॥
‘अब इसके बाद क्या करना चाहिये—यह बतानेकी कृपा करें।’ संजयके ऐसा कहनेपर राजाने फिर कहा— ॥ २६ ॥

नैष मृत्युरनिष्टो नो निःसृतानां गृहात् स्वयम् ।
जलमग्निस्तथा वायुरथवापि विकर्षणम् ॥ २७ ॥
तापसानां प्रशस्यन्ते गच्छ संजय मा चिरम् ।

‘संजय! हमलोग स्वयं गृहस्थाश्रमका परित्याग करके चले आये हैं, अतः हमारे लिये इस तरहकी मृत्यु अनिष्टकारक नहीं हो सकती। जल, अग्नि तथा वायुके संयोगसे अथवा उपवास करके प्राण त्यागना तपस्वियोंके लिये प्रशंसनीय माना गया है; इसलिये अब तुम शीघ्र यहाँसे चले जाओ। विलम्ब न करो’॥ २७½॥ इत्युक्त्वा संजयं राजा समाधाय मनस्तथा ॥ २८ ॥ प्राङ्मुखः सह गान्धार्या कुन्त्या चोपाविशत् तदा । संजयसे ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने मनको एकाग्र किया और गान्धारी तथा कुन्तीके साथ वे पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये॥ २८½॥ संजयस्तं तथा दृष्ट्वा प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ २९ ॥ उवाच चैनं मेधावी युङ्क्ष्वात्मानमिति प्रभो । उन्हें उस अवस्थामें देख मेधावी संजयने उनकी परिक्रमा की और कहा—‘महाराज! अब अपनेको योगयुक्त कीजिये॥ २९½॥ ऋषिपुत्रो मनीषी स राजा चक्रेऽस्य तद् वचः ॥ ३० ॥ सन्निरुध्येन्द्रियग्राममासीत् काष्ठोपमस्तदा । महर्षि व्यासके पुत्र मनीषी राजा धृतराष्ट्रने संजयकी वह बात मान ली। वे इन्द्रियसमुदायको रोककर काष्ठकी भाँति निश्चेष्ट हो गये॥ ३०½॥

गान्धारी च महाभागा जननी च पृथा तव ।। ३१ ।।
दावाग्निना समायुक्ते स च राजा पिता तव ।
संजयस्तु महामात्रस्तस्माद् दावाद्मुच्यत ।। ३२ ।।
इसके बाद महाभागा गान्धारी, तुम्हारी माता कुन्ती तथा तुम्हारे ताऊ राजा धृतराष्ट्र— ये तीनों ही दावाग्निमें जलकर भस्म हो गये; परंतु महामात्य संजय उस दावाग्निसे जीवित बच गये हैं ।। ३१-३२ ।।
गङ्गाकूले मया दृष्टस्तापसैः परिवारितः ।
स तानामन्त्र्य तेजस्वी निवेद्यैतच्च सर्वशः ।। ३३ ।।
प्रययौ संजयो धीमान् हिमवन्तं महीधरम् ।
मैंने संजयको गंगातटपर तापसोंसे घिरा देखा है। बुद्धिमान् और तेजस्वी संजय तापसोंको यह सब समाचार बताकर उनसे विदा ले हिमालयपर्वतपर चले गये ।। ३३ १/२ ।।
एवं स निधनं प्राप्तः कुरुराजो महामनाः ।। ३४ ।।
गान्धारी च पृथा चैव जनन्यौ ते विशाम्पते ।
प्रजानाथ! इस प्रकार महामनस्वी कुरुराज धृतराष्ट्र तथा तुम्हारी दोनों माताएँ गान्धारी और कुन्ती मृत्युको प्राप्त हो गयीं ।। ३४ १/२ ।।

यददृच्छयानुव्रजता मया राज्ञः कलेवरम् ।। ३५ ।।
तयोश्च देव्योरुभयोर्मया दृष्टानि भारत ।
भरतनन्दन! वनमें घूमते समय अकस्मात् राजा धृतराष्ट्र तथा उन देवियोंके मृत शरीर मेरी दृष्टिमें पड़े थे ।। ३५ १/२ ।।
ततस्तपोवने तस्मिन् समाजग्मुस्तपोधनाः ।। ३६ ।।
श्रुत्वा राज्ञस्तदा निष्ठां न त्वशोचन् गतींश्च ते ।
तदनन्तर राजाकी मृत्युका समाचार सुनकर बहुत-से तपोधन उस तपोवनमें आये। उन्होंने उनके लिये कोई शोक नहीं किया; क्योंकि उन तीनोंकी सद्गतिके विषयमें उनके मनमें संशय नहीं था ।। ३६ १/२ ।।
तत्राश्रौषमहं सर्वमेतत् पुरुषसत्तम ।। ३७ ।।
यथा च नृपतिर्दग्धो देव्यौ ते चेति पाण्डव ।
पुरुषप्रवर पाण्डव! जिस प्रकार राजा धृतराष्ट्र तथा उन दोनों देवियोंका दाह हुआ है, यह सारा समाचार मैंने वहीं सुना था ।। ३७ १/२ ।।
न शोचितव्यं राजेन्द्र स्वतः स पृथिवीपतिः ।। ३८ ।।
प्राप्तवानग्निसंयोगं गान्धारी जननी च ते ।
राजेन्द्र! राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और तुम्हारी माता कुन्ती—तीनोंने स्वतः अग्निसंयोग प्राप्त किया था; अतः उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ।। ३८ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा च सर्वेषां पाण्डवानां महात्मनाम् ।। ३९ ।।
निर्याणं धृतराष्ट्रस्य शोकः समभवन्महान् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रका यह परलोकगमनका समाचार सुनकर उन सभी महामना पाण्डवोंको बड़ा शोक हुआ ।। ३९ १/२ ।।
अन्तःपुराणां च तदा महानार्तस्वरोऽभवत् ।। ४० ।।
पौराणां च महाराज श्रुत्वा राजंस्तदा गतिम् ।
महाराज! उनके अन्तःपुरमें उस समय महान् आर्तनाद होने लगा। राजाकी वैसी गति सुनकर पुरवासियोंमें भी हाहाकार मच गया ।। ४० १/२ ।।
अहो धिगिति राजा तु विक्रुश्य भृशदुःखितः ।। ४१ ।।
ऊर्ध्वबाहुः स्मरन् मातुः प्ररुरोद युधिष्ठिरः ।
'अहो! धिक्कार है!' इस प्रकार अपनी निन्दा करके राजा युधिष्ठिर बहुत दुःखी हो गये तथा दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर अपनी माताको याद करके फूट-फूटकर रोने लगे ।। ४१ १/२ ।।
भीमसेनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते ।। ४२ ।।

अन्तःपुरेषु च तदा सुमहान् रुदितस्वनः ।
प्रादुरासीन्महाराज पृथां श्रुत्वा तथागताम् ॥ ४३ ॥
भीमसेन आदि सभी भाई रोने लगे। महाराज! कुन्तीकी वैसी दशा सुनकर अन्तःपुरमें भी रोने-बिलखनेका महान् शब्द सुनायी देने लगा ॥ ४२-४३ ॥

तं च वृद्धं तथा दग्धं हतपुत्रं नराधिपम् ।
अन्वशोचन्त ते सर्वे गान्धारीं च तपस्विनीम् ॥ ४४ ॥
पुत्रहीन बूढ़े राजा धृतराष्ट्र तथा तपस्विनी गान्धारी-देवीको इस प्रकार दग्ध हुई सुनकर सब लोग बारंबार शोक करने लगे ॥ ४४ ॥

तस्मिन्नुपरते शब्दे मुहूर्तादिव भारत ।
निगृह्य बाष्पं धैर्येण धर्मराजोऽब्रवीदिदम् ॥ ४५ ॥
भरतनन्दन! दो घड़ी बाद जब रोने-धोनेकी आवाज बंद हुई, तब धर्मराज युधिष्ठिर धैर्यपूर्वक अपने आँसू पोंछकर नारदजीसे इस प्रकार कहने लगे ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि दावाग्निना
धृतराष्ट्रादिदाहे सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें धृतराष्ट्र आदिका दावाग्निसे दाहविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः

नारदजीके सम्मुख युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिके लौकिक अग्निमें दग्ध हो जानेका वर्णन करते हुए विलाप और अन्य पाण्डवोंका भी रोदन

युधिष्ठिर उवाच

तथा महात्मनस्तस्य तपस्युग्रे च वर्ततः ।
अनाथस्येव निधनं तिष्ठत्स्वास्मासु बन्धुषु ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भगवन्! हम-जैसे बन्धु-बान्धवोंके रहते हुए भी कठोर तपस्यामें लगे हुए महामना धृतराष्ट्रकी अनाथके समान मृत्यु हुई, यह कितने दुःखकी बात है? ॥ १ ॥

दुर्विज्ञेया गतिर्ब्रह्मन् पुरुषाणां मतिर्मम ।
यत्र वैचित्रवीर्योऽसौ दग्ध एवं वनाग्निना ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! मेरा तो ऐसा मत है कि मनुष्योंकी गतिका ठीक-ठीक ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है; जब कि विचित्रवीर्यकुमार धृतराष्ट्रको इस तरह दावानलसे दग्ध होकर मरना पड़ा ॥ २ ॥

यस्य पुत्रशतं श्रीमदभवद् बाहुशालिनः ।
नागायुतबलो राजा स दग्धो हि दवाग्निना ॥ ३ ॥
जिन बाहुबलशाली नरेशके सौ पुत्र थे, जो स्वयं भी दस हजार हाथियोंके समान बलवान् थे, वे ही दावानलसे जलकर मरे हैं, यह कितने दुःखकी बात है? ॥

यं पुरा पर्यवीजन्त तालवृन्तैर्वरस्त्रियः ।
तं गृध्राः पर्यवीजन्त दावाग्निपरिकालितम् ॥ ४ ॥
पूर्वकालमें सुन्दरी स्त्रियाँ जिन्हें सब ओरसे ताड़के पंखोंद्वारा हवा करती थीं, उन्हें दावानलसे दग्ध हो जानेपर गीधोंने अपनी पाँखोंसे हवा की है ॥ ४ ॥

सूतमागधसंघैश्च शयानो यः प्रबोध्यते ।
धरण्यां स नृपः शेते पापस्य मम कर्मभिः ॥ ५ ॥
जो बहुमूल्य शय्यापर सोते थे और जिन्हें सूत तथा मागधोंके समुदाय मधुर गीतोंद्वारा जगाया करते थे, वे ही महाराज मुझ पापीकी करतूतोंसे पृथ्वीपर सो रहे हैं ॥ ५ ॥

न च शोचामि गान्धारीं हतपुत्रां यशस्विनीम् ।
पतिलोकमनुप्राप्तां तथा भर्तृव्रते स्थिताम् ॥ ६ ॥
मुझे पुत्रहीना यशस्विनी गान्धारीके लिये उतना शोक नहीं है, क्योंकि वे पातिव्रत्य-धर्मका पालन करती थीं; अतः पतिलोकमें गयी हैं ॥ ६ ॥

पृथामेव च शोचामि या पुत्रैश्वर्यमृद्धिमत् ।
उत्सृज्य सुमहद् दीप्तं वनवासमरोचयत् ॥ ७ ॥
मैं तो उन माता कुन्तीके लिये ही अधिक शोक करता हूँ, जिन्होंने पुत्रोंके समृद्धिशाली एवं परम समुज्ज्वल ऐश्वर्यको ठुकराकर वनमें रहना पसंद किया था ॥ ७ ॥

धिग् राज्यमिदमस्माकं धिग् बलं धिक् पराक्रमम् ।
क्षत्रधर्मं च धिग् यस्मान्मृता जीवामहे वयम् ॥ ८ ॥
हमारे इस राज्यको धिक्कार है, बल और पराक्रमको धिक्कार है तथा इस क्षत्रिय-धर्मको भी धिक्कार है! जिससे आज हमलोग मृतकतुल्‍य जीवन बिता रहे हैं ॥ ८ ॥

सुसूक्ष्मा किल कालस्य गतिर्द्विजवरोत्तम ।
यत् समुत्सृज्य राज्यं सा वनवासमरोचयत् ॥ ९ ॥
विप्रवर! कालकी गति अत्यन्त सूक्ष्म है, जिससे प्रेरित होकर माता कुन्तीने राज्य त्यागकर वनमें ही रहना ठीक समझा ॥ ९ ॥

युधिष्ठिरस्य जननी भीमस्य विजयस्य च ।
अनाथवत् कथं दग्धा इति मुह्यामि चिन्तयन् ॥ १० ॥
युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुनकी माता अनाथकी भाँति कैसे जल गयी, यह सोचकर मैं मोहित हो जाता हूँ ॥ १० ॥

वृथा संतर्पितो वह्निः खाण्डवे सव्यसाचिना ।
उपकारमजानन् स कृतघ्न इति मे मतिः ॥ ११ ॥
सव्यसाची अर्जुनने जो खाण्डववनमें अग्निदेवको तृप्त किया था, वह व्यर्थ हो गया। वे उस उपकारको याद न रखनेके कारण कृतघ्न हैं—ऐसी मेरी धारणा है ॥ ११ ॥

यत्रादहत् स भगवान् मातरं सव्यसाचिनः ।
कृत्वा यो ब्राह्मणच्छद्म भिक्षार्थी समुपागतः ॥ १२ ॥
धिगग्निं धिक् च पार्थस्य विश्रुतां सत्यसंधताम् ।
जो एक दिन ब्राह्मणका वेश बनाकर अर्जुनसे भीख माँगने आये थे, उन्हीं भगवान् अग्निदेवने अर्जुनकी माँको जलाकर भस्म कर दिया। अग्निदेवको धिक्कार है! अर्जुनकी जो सुप्रसिद्ध सत्यप्रतिज्ञता है, उसको भी धिक्कार है! ॥ १२ १/२ ॥

इदं कष्टतरं चान्यद् भगवन् प्रतिभाति मे ॥ १३ ॥
वृथाग्निना समायोगो यदभूत् पृथिवीपतेः ।
भगवन्! राजा धृतराष्ट्रके शरीरको जो व्यर्थ (लौकिक) अग्निका संयोग प्राप्त हुआ, यह दूसरी अत्यन्त कष्ट देनेवाली बात जान पड़ती है ॥ १३ १/२ ॥

तथा तपस्विनस्तस्य राजर्षेः कौरवस्य ह ॥ १४ ॥
कथमेवंविधो मृत्युः प्रशास्य पृथिवीमिमाम् ।

जिन्होंने पहले इस पृथ्वीका शासन करके अन्तमें वैसी कठोर तपस्याका आश्रय लिया था, उन कुरुवंशी राजर्षिको ऐसी मृत्यु क्यों प्राप्त हुई? ।। १४ १/२ ।। तिष्ठत्सु मन्त्रपूतेषु तस्याग्निषु महावने ।। १५ ।। वृथाग्निना समायुक्तो निष्ठां प्राप्तः पिता मम । हाय, उस महान् वनमें मन्त्रोंसे पवित्र हुई अग्नियोंके रहते हुए भी मेरे ताऊ लौकिक अग्निसे दग्ध होकर क्यों मृत्युको प्राप्त हुए? ।। १५ १/२ ।। मन्ये पृथा वेपमाना कृशा धमनिसंतता ।। १६ ।। हा तात! धर्मराजेति समाक्रन्दन्महाभये । मैं तो समझता हूँ कि अत्यन्त दुर्बल हो जानेके कारण जिनके शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियोंतक स्पष्ट दिखायी देती थीं, वे मेरी माता कुन्ती अग्निका महान् भय उपस्थित होनेपर ‘हा तात! हा धर्मराज!’ कहकर कातर पुकार मचाने लगी होंगी ।। १६ १/२ ।। भीम पर्याप्नुहि भयादिति चैवाभिवाशती ।। १७ ।। समन्ततः परिक्षिप्ता माताभून्मे दवाग्निना । ‘भीमसेन! इस भयसे मुझे बचाओ, ऐसा कहकर चारों ओर चीखती-चिल्लाती हुई मेरी माताको दावानलने जलाकर भस्म कर दिया होगा ।। १७ १/२ ।। सहदेवः प्रियस्तस्याः पुत्रेभ्योऽधिक एव तु ।। १८ ।। न चैनां मोक्षयामास वीरो माद्रवतीसुतः । सहदेव मेरी माताको अपने सभी पुत्रोंसे अधिक प्रिय था; परंतु वह वीर माद्रीकुमार भी माँको उस संकटसे बचा न सका ।। १८ १/२ ।। तच्छ्रुत्वा रुरुदुः सर्वे समालिङ्ग्य परस्परम् ।। १९ ।। पाण्डवाः पञ्च दुःखार्ता भूतानीव युगक्षये । यह सुनकर समस्त पाण्डव एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर रोने लगे। जैसे प्रलयकालमें पाँचों भूत पीड़ित हो जाते हैं, उसी प्रकार उस समय पाँचों पाण्डव दुःखसे आतुर हो उठे ।। १९ १/२ ।। तेषां तु पुरुषेन्द्राणां रुदतां रुदितस्वनः ।। २० ।। प्रासादाभोगसंरुद्धे अन्वरौत्सीत् स रोदसी ।। २१ ।। वहाँ रोदन करते हुए उन पुरुषप्रवर पाण्डवोंके रोनेका शब्द महलके विस्तारसे अवरुद्ध हुए भूतल और आकाशमें गूँजने लगा ।। २०-२१ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि युधिष्ठिरविलापे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।। ३८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें युधिष्ठिरका विलापविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।।


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अध्याय (पृष्ठ 2428)

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एकोनचत्वारिंreflexoऽध्यायः / एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

राजा युधिष्ठिरद्वारा धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्ती—इन तीनोंकी हड्डियोंको गङ्गामें प्रवाहित कराना तथा श्राद्धकर्म करना

नारद उवाच

नासौ वृथाग्निना दग्धो यथा तत्र श्रुतं मया ।
वैचित्रवीर्यो नृपतिस्तत् ते वक्ष्यामि सुव्रत ॥ १ ॥
नारदजीने कहा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रका दाह व्यर्थ (लौकिक) अग्निसे नहीं हुआ है। इस विषयमें मैंने वहाँ जैसा सुना था, वह सब तुम्हें बताऊँगा ॥ १ ॥

वनं प्रविशतानेन वायुभक्षेण धीमता ।
अग्नयः कारयित्वेष्टिमुत्सृष्टा इति नः श्रुतम् ॥ २ ॥
हमारे सुननेमें आया है कि वायु पीकर रहनेवाले वे बुद्धिमान् नरेश जब घने वनमें प्रवेश करने लगे, उस समय उन्होंने याजकोंद्वारा इष्टि कराकर तीनों अग्नियोंको वहीं त्याग दिया ॥ २ ॥

याजकास्तु ततस्तस्य तानग्नीन्निर्जने वने ।
समुत्सृज्य यथाकामं जग्मुर्भरतसत्तम ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उनकी उन अग्नियोंको उसी निर्जन वनमें छोड़कर उनके याजकगण इच्छानुसार अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ३ ॥

स विवृद्धस्तदा वह्निर्वने तस्मिन्नभूत् किल ।
तेन तद् वनमादीप्तमिति ते तापसाब्रुवन् ॥ ४ ॥
कहते हैं, वही अग्नि बढ़कर उस वनमें सब ओर फैल गयी और उसीने उस सारे वनको भस्मसात् कर दिया—यह बात मुझसे वहाँके तापसोंने बतायी थी ॥ ४ ॥

स राजा जाह्नवीतीरे यथा ते कथितं मया ।
तेनाग्निना समायुक्तः स्वेनैव भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे राजा गंगाके तटपर, जैसा कि मैंने तुम्हें बताया है, उस अपनी ही अग्निसे दग्ध हुए हैं ॥

एवमावेदयामासुर्मुनयस्ते ममानघ ।
ये ते भागीरथीतीरे मया दृष्टा युधिष्ठिर ॥ ६ ॥

निष्पाप नरेश! गंगाजीके तटपर मुझे जिनके दर्शन हुए थे, उन मुनियोंने मुझसे ऐसा ही बताया था ॥ ६ ॥

एवं स्वेनाग्निना राजा समायुक्तो महीपते ।
मा शोचिथास्त्वं नृपतिं गतः स परमां गतिम् ॥ ७ ॥
पृथ्वीनाथ! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र अपनी ही अग्निसे दाहको प्राप्त हुए हैं, तुम उन नरेशके लिये शोक न करो। वे परम उत्तम गतिको प्राप्त हुए हैं ॥ ७ ॥

गुरुशुश्रूषया चैव जननी ते जनाधिप ।
प्राप्ता सुमहतीं सिद्धिमिति मे नात्र संशयः ॥ ८ ॥
जनेश्वर! तुम्हारी माता कुन्तीदेवी गुरुजनोंकी सेवाके प्रभावसे बहुत बड़ी सिद्धिको प्राप्त हुई हैं, इस विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है ॥ ८ ॥

कर्तुमर्हसि राजेन्द्र तेषां त्वमुदकक्रियाम् ।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैरेतदत्र विधीयताम् ॥ ९ ॥
राजेन्द्र! अब अपने सब भाइयोंके साथ जाकर तुम्हें उन तीनोंके लिये जलांजलि देनी चाहिये। इस समय यहाँ इसी कर्तव्यका पालन करना चाहिये ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः स पृथिवीपालः पाण्डवानां धुरंधरः ।
निर्ययौ सहसोदर्यः सदारश्च नरर्षभः ॥ १० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब पाण्डव-धुरन्धर पृथ्वीपाल नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर अपने भाइयों और स्त्रियोंके साथ नगरसे बाहर निकले ॥ १० ॥

पौरजानपदाश्चैव राजभक्तिपुरस्कृताः ।
गङ्गां प्रजग्मुरभितो वाससैकेन संवृताः ॥ ११ ॥
उनके साथ राजभक्तिको सामने रखनेवाले पुरवासी और जनपदनिवासी भी थे। वे सब एक वस्त्र धारण करके गंगाजीके समीप गये ॥ ११ ॥

ततोऽवगाह्य सलिले सर्वे ते नरपुङ्गवाः ।
युयुत्सुमग्रतः कृत्वा ददुस्तोयं महात्मने ॥ १२ ॥
उन सभी श्रेष्ठ पुरुषोंने गंगाजीके जलमें स्नान करके युयुत्सुको आगे रखते हुए महात्मा धृतराष्ट्रके लिये जलांजलि दी ॥ १२ ॥

गान्धार्याश्च पृथायाश्च विधिवन्नामगोत्रतः ।
शौचं निर्वर्तयन्तस्ते तत्रोषुर्नगराद् बहिः ॥ १३ ॥
फिर विधिपूर्वक नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए गान्धारी और कुन्तीके लिये भी उन्होंने जल-दान किया। तत्पश्चात् शौचसम्पादन या अशौचनिवृत्तिके लिये प्रयत्न करते हुए वे सब लोग नगरसे बाहर ही ठहर गये ॥ १३ ॥

प्रेषयामास स नरान् विधिज्ञानाप्तकारिणः । गङ्गाद्वारं नरश्रेष्ठो यत्र दग्धोऽभवन्नृपः ॥ १४ ॥ तत्रैव तेषां कृत्यानि गङ्गाद्वारेऽन्वशात् तदा । कर्तव्यानीति पुरुषान् दत्तदेयान्महीपतिः ॥ १५ ॥ नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरने जहाँ राजा धृतराष्ट्र दग्ध हुए थे, उस स्थानपर भी हरिद्वारमें विधि-विधानके जाननेवाले विश्वासपात्र मनुष्योंको भेजा और वहीं उनके श्राद्धकर्म करनेकी आज्ञा दी। फिर उन भूपालने उन पुरुषोंको दानमें देनेयोग्य नाना प्रकारकी वस्तुएँ अर्पित कीं ॥

द्वादशेऽहनि तेभ्यः स कृतशौचो नराधिपः । ददौ श्राद्धानि विधिवद् दक्षिणावन्ति पाण्डवः ॥ १६ ॥ शौच-सम्पादनके लिये दशाह आदि कर्म कर लेनेके पश्चात् पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने बारहवें दिन धृतराष्ट्र आदिके उद्देश्यसे विधिवत् श्राद्ध किया तथा उन श्राद्धोंमें ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणाएँ दीं ॥ १६ ॥

धृतराष्ट्रं समुद्दिश्य ददौ स पृथिवीपतिः । सुवर्णं रजतं गाश्च शय्याश्च सुमहाधनाः ॥ १७ ॥ गान्धार्याश्चैव तेजस्वी पृथायाश्च पृथक् पृथक् । संकीर्त्य नामनी राजा ददौ दानमनुत्तमम् ॥ १८ ॥ तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्तीके लिये पृथक्-पृथक् उनके नाम ले-लेकर सोना, चाँदी, गौ तथा बहुमूल्य शय्याएँ प्रदान कीं तथा परम उत्तम दान दिया ॥ १७-१८ ॥

यो यदिच्छति यावच्च तावत् स लभते नरः । शयनं भोजनं यानं मणिरत्नमथो धनम् ॥ १९ ॥ यानमाच्छादनं भोगान् दासीश्च समलंकृताः । ददौ राजा समुद्दिश्य तयोर्मात्रोर्महीपतिः ॥ २० ॥ उस समय जो मनुष्य जिस वस्तुको जितनी मात्रामें लेना चाहता, वह उस वस्तुको उतनी ही मात्रामें प्राप्त कर लेता था। राजा युधिष्ठिरने अपनी उन दोनों माताओंके उद्देश्यसे शय्या, भोजन, सवारी, मणि, रत्न, धन, वाहन, वस्त्र, नाना प्रकारके भोग तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दासियाँ प्रदान कीं ॥ १९-२० ॥

ततः स पृथिवीपालो दत्त्वा श्राद्धान्यनेकGeneric -> श्राद्धान्यनेकशः । प्रविवेश पुरं राजा नगरं वारणाह्वयम् ॥ २१ ॥ इस प्रकार अनेक बार श्राद्धके दान देकर पृथिवीपाल राजा युधिष्ठिरने हस्तिनापुर नामक नगरमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥

ते चापि राजवचनात् पुरुषा ये गताभवन् । संकल्प्य तेषां कुल्यानि पुनः प्रत्यागमंस्ततः ॥ २२ ॥

॥ आश्रमवासिकपर्व सम्पूर्ण ॥

माल्यैर्गन्धैश्च विविधैरर्चयित्वा यथाविधि । कुल्यानि तेषां संयोज्य तदाचख्युर्महीपतेः ॥ २३ ॥

जो लोग राजाकी आज्ञासे हरिद्वारमें भेजे गये थे, वे उन तीनोंकी हड्डियोंको संचित करके वहाँसे फिर गंगाजीके तटपर गये। फिर भाँति-भाँतिकी मालाओं और चन्दनोंसे विधिपूर्वक उनकी पूजा की। पूजा करके उन सबको गंगाजीमें प्रवाहित कर दिया। इसके बाद हस्तिनापुरमें लौटकर उन्होंने यह सब समाचार राजाको कह सुनाया ॥ २२-२३ ॥

समाश्र्वास्य तु राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । नारदोऽप्यगमद् राजन् परमर्षिर्यथेप्सितम् ॥ २४ ॥

राजन्! तदनन्तर देवर्षि नारदजी धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन देकर अभीष्ट स्थानको चले गये ॥

एवं वर्षाण्यतीतानि धृतराष्ट्रस्य धीमतः । वनवासे तथा त्रीणि नगरे दश पञ्च च ॥ २५ ॥ हतपुत्रस्य संग्रामे दानानि ददतः सदा । ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणां भ्रातृणां स्वजनस्य च ॥ २६ ॥

इस प्रकार जिनके पुत्र रणभूमिमें मारे गये थे, उन राजा धृतराष्ट्रने अपने जाति-भाई, सम्बन्धी, मित्र, बन्धु और स्वजनोंके निमित्त सदा दान देते हुए (युद्ध समाप्त होनेके बाद) पंद्रह वर्ष हस्तिनापुर नगरमें व्यतीत किये थे और तीन वर्ष वनमें तपस्या करते हुए बिताये थे ॥ २५-२६ ॥

युधिष्ठिरस्तु नृपतिर्नातिप्रीतमनास्तदा । धारयामास तद् राज्यं निहतज्ञातिबान्धवः ॥ २७ ॥

जिनके बन्धु-बान्धव नष्ट हो गये थे, वे राजा युधिष्ठिर मनमें अधिक प्रसन्न न रहते हुए किसी प्रकार राज्यका भार सँभालने लगे ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि श्राद्धदाने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें श्राद्धदानविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥


॥ आश्रमवासिकपर्व सम्पूर्ण ॥

अनुष्टुप्(अन्य बड़े छन्द)बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपरकुल योग
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये१०६१(३४)४६॥।११०७॥।
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये१॥××१॥

आश्रमवासिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या — ११०९।


अध्याय (पृष्ठ 2433)

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साम्बके पेटसे यदुवंश-विनाशके लिये मूसल पैदा होनेका ऋषियोंद्वारा शाप