महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
गजाह्वये चैव बभूव राजन् ।
यथा पूर्वं गच्छतां पाण्डवानां
द्यूते राजन् कौरवाणां सभायाः ॥ १२ ॥
राजन्! जैसे पूर्वकालमें द्यूतक्रीड़ाके समय कौरवसभासे निकलकर वनवासके लिये पाण्डवोंके प्रस्थान करनेपर हस्तिनापुरके नागरिकोंका समुदाय दुःखमें डूब गया था, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके जाते समय भी समस्त पुरवासी शोकसे संतप्त हो उठे थे ॥ १२ ॥
या नापश्यंश्चन्द्रमसं न सूर्यं
रामाः कदाचिदपि तस्मिन् नरेन्द्रे ।
महावनं गच्छति कौरवेन्द्रे
शोकेनार्ता राजमार्गं प्रपेदुः ॥ १३ ॥
रनिवासकी जिन रमणियोंने कभी बाहर आकर सूर्य और चन्द्रमाको भी नहीं देखा था, वे ही कौरवराज धृतराष्ट्रके महावनके लिये प्रस्थान करते समय शोकसे व्याकुल होकर खुली सड़कपर आ गयी थीं ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्याणे
पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका नगरसे निकलनाविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2320)
षोडशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रासादहर्म्येषु वसुधायां च पार्थिव ।
नारीणां च नराणां च निःस्वनः सुमहानभूत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—पृथ्वीनाथ! तदनन्तर महलों और अट्टालिकाओंमें तथा पृथ्वीपर भी रोते हुए नर-नारियोंका महान् कोलाहल छा गया ॥ १ ॥
स राजा राजमार्गेण नृनारीसंकुलेन च ।
कथंचिन्निर्ययौ धीमान् वेपमानः कृताञ्जलिः ॥ २ ॥
सारी सड़क पुरुषों और स्त्रियोंकी भीड़से भरी हुई थी। उसपर चलते हुए बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र बड़ी कठिनाईसे आगे बढ़ पाते थे। उनके दोनों हाथ जुड़े हुए थे और शरीर काँप रहा था ॥ २ ॥
स वर्द्धमानद्वारेण निर्ययौ गजसाह्वयात् ।
विसर्जयामास च तं जनौघं स मुहुर्मुहुः ॥ ३ ॥
राजा धृतराष्ट्र वर्धमान नामक द्वारसे होते हुए हस्तिनापुरसे बाहर निकले। वहाँ पहुँचकर उन्होंने बारंबार आग्रह करके अपने साथ आये हुए जनसमूहको विदा किया ॥ ३ ॥
वनं गन्तुं च विदुरो राज्ञा सह कृतक्षणः ।
संजयश्च महामात्रः सूतो गावलगणिस्तथा ॥ ४ ॥
विदुर और गवलगणकुमार महामात्र सूत संजयने राजाके साथ ही वनमें जानेका निश्चय कर लिया था ॥ ४ ॥
कृपं निवर्तयामास युयुत्सुं च महारथम् ।
धृतराष्ट्रो महीपालः परिदाप्य युधिष्ठिरे ॥ ५ ॥
महाराज धृतराष्ट्रने कृपाचार्य और महारथी युयुत्सुको युधिष्ठिरके हाथों सौंपकर लौटाया ॥ ५ ॥
निवृत्ते पौरवर्गे च राजा सान्तःपुरस्तदा ।
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातो निवर्तितुमियेष ह ॥ ६ ॥
पुरवासियोंके लौट जानेपर अन्तःपुरकी रानियोंसहित राजा युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रकी आज्ञा लेकर लौट जानेका विचार किया ॥ ६ ॥
सोऽब्रवीन्मातरं कुन्तीं वनं तमनुजग्मुषीम् । अहं राजानमन्विष्ये भवती विनिवर्तताम् ॥ ७ ॥ वधूपरिवृता राज्ञि नगरं गन्तुमर्हसि । राजा यात्वेष धर्मात्मा तापस्ये कृतनिश्चयः ॥ ८ ॥ उस समय उन्होंने वनकी ओर जाती हुई अपनी माता कुन्तीसे कहा—'रानी मा! आप अपनी पुत्र-वधुओंके साथ लौटिये, नगरको जाइये। मैं राजाके पीछे-पीछे जाऊँगा; क्योंकि ये धर्मात्मा नरेश तपस्याके लिये निश्चय करके वनमें जा रहे हैं, अतः इन्हें जाने दीजिये' ॥ इत्युक्ता धर्मराजेन बाष्पव्याकुललोचना । जगामैव तदा कुन्ती गान्धारीं परिगृह्य ह ॥ ९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुन्तीके नेत्रोंमें आँसू भर आया तो भी वे गान्धारीका हाथ पकड़े चलती ही गयीं ॥ ९ ॥
कुन्त्युवाच सहदेवे महाराज माप्रसादं कृथाः क्वचित् । एष मामनुरक्तो हि राजंस्त्ववां चैव सर्वदा ॥ १० ॥ जाते-जाते ही कुन्तीने कहा—महाराज! तुम सहदेवपर कभी अप्रसन्न न होना। राजन्! यह सदा मेरे और तुम्हारे प्रति भक्ति रखता आया है ॥ १० ॥ कर्णं स्मरेथाः सततं संग्रामेष्वपलायिनम् । अवकीर्णो हि समरे वीरो दुष्प्रज्ञया तदा ॥ ११ ॥ संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले अपने भाई कर्णको भी सदा याद रखना, क्योंकि मेरी ही दुर्बुद्धिके कारण वह वीर युद्धमें मारा गया ॥ ११ ॥ आयसं हृदयं नूनं मन्दाया मम पुत्रक । यत् सूर्यजमपश्यन्त्याः शतधा न विदीर्यते ॥ १२ ॥ बेटा! मुझ अभागिनीका हृदय निश्चय ही लोहेका बना हुआ है; तभी तो आज सूर्यनन्दन कर्णको न देखकर भी इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते ॥ १२ ॥ एवं गते तु किं शक्यं मया कर्तुमरिंदम । मम दोषोऽयमत्यर्थं ख्यापितो यन्न सूर्यजः ॥ १३ ॥ शत्रुदमन! ऐसी दशामें मैं क्या कर सकती हूँ। यह मेरा ही महान् दोष है कि मैंने सूर्यपुत्र कर्णका तुमलोगोंको परिचय नहीं दिया ॥ १३ ॥ तन्निमित्तं महाबाहो दानं दद्यास्त्वमुत्तमम् । सदैव भ्रातृभिः सार्धं सूर्यजस्यारिमर्दन ॥ १४ ॥ महाबाहो! शत्रुमर्दन! तुम अपने भाइयोंके साथ सदा ही सूर्यपुत्र कर्णके लिये भी उत्तम दान देते रहना ॥ १४ ॥
द्रौपद्याश्च प्रिये नित्यं स्थातव्यमरिकर्शन । भीमसेनोऽर्जुनश्चैव नकुलश्च कुरूद्वह ।। १५ ।। समाधेयास्त्वया राजंस्त्वय्यद्य कुलधूर्गता । शत्रुसूदन! मेरी बहू द्रौपदीका भी सदा प्रिय करते रहना। कुरुश्रेष्ठ! तुम भीमसेन, अर्जुन और नकुलको भी सदा संतुष्ट रखना। आजसे कुरुकुलका भार तुम्हारे ही ऊपर है ।। १५१/२ ।।
श्वश्रूश्वशुरयोः पादान् शुश्रूषन्ती वने त्वहम् ।। १६ ।। गान्धारीसहिता वत्स्ये तापसी मलपङ्किनी । अब मैं वनमें गान्धारीके साथ शरीरपर मैल एवं कीचड़ धारण किये तपस्विनी बनकर रहूँगी और अपने इन सास-ससुरके चरणोंकी सेवामें लगी रहूँगी ।। १६१/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितो वशी । विषादमगमद् धीमान् न च किंचिदुवाच ह ।। १७ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! माताके ऐसा कहनेपर अपने मनको वशमें रखनेवाले धर्मात्मा एवं बुद्धिमान् युधिष्ठिर भाइयोंसहित बहुत दुःखी हुए। वे अपने मुँहसे कुछ न बोले ।। १७ ।।
मुहूर्तमिव तु ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । उवाच मातरं दीनश्चिन्ताशोकपरायणः ।। १८ ।। दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर चिन्ता और शोकमें डूबे हुए धर्मराज युधिष्ठिरने मातासे दीन होकर कहा— ।। १८ ।।
किमिदं ते व्यवसितं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि । न त्वामभ्यनुजानामि प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। १९ ।। 'माताजी! आपने यह क्या निश्चय कर लिया? आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मैं आपको वनमें जानेकी अनुमति नहीं दे सकता। आप मुझपर कृपा कीजिये ।। १९ ।।
पुरोद्यतान् पुरा ह्यस्मानुत्साह्य प्रियदर्शने । विदुलाया वचोभिस्त्वं नास्मान् संत्यक्तुमर्हसि ।। २० ।। 'प्रियदर्शने! पहले जब हमलोग नगरसे बाहर जानेको उद्यत थे, आपने विदुलाके वचनोंद्वारा हमें क्षत्रियधर्मके पालनके लिये उत्साह दिलाया था। अतः आज हमें त्यागकर जाना आपके लिये उचित नहीं है ।। २० ।।
निहत्य पृथिवीपालान् राज्यं प्राप्तमिदं मया । तव प्रज्ञामुपश्रुत्य वासुदेवान्नरर्षभात् ।। २१ ।।
'पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे आपका विचार सुनकर ही मैंने बहुत-से राजाओंका संहार करके इस राज्यको प्राप्त किया है ॥ २१ ॥ क्व सा बुद्धिरियं चाद्य भवत्या यच्छ्रुतं मया । क्षत्रधर्मे स्थितिं चोक्त्वा तस्याश्च्यवितुमिच्छसि ॥ २२ ॥ 'कहाँ आपकी वह बुद्धि और कहाँ आपका यह विचार? मैंने आपका जो विचार सुना है, उसके अनुसार हमें क्षत्रिय-धर्ममें स्थित रहनेका उपदेश देकर आप स्वयं उससे गिरना चाहती हैं ॥ २२ ॥ अस्मानुत्सृज्य राज्यं च स्नुषा हीमा यशस्विनि । कथं वत्स्यसि दुर्गेषु वनेष्वद्य प्रसीद मे ॥ २३ ॥ 'यशस्विनी मा! भला आप हमको, अपनी इन बहुओंको और इस राज्यको छोड़कर अब उन दुर्गम वनोंमें कैसे रह सकेंगी; अतः हमलोगोंपर कृपा करके यहीं रहिये' ॥ २३ ॥ इति बाष्पकला वाचः कुन्ती पुत्रस्य शृण्वती । सा जगामाश्रुपूर्णाक्षी भीमस्तामिदमब्रवीत् ॥ २४ ॥ अपने पुत्रके ये अश्रुगद्गद वचन सुनकर कुन्तीके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये तो भी वे रुक न सकीं। आगे बढ़ती ही गयीं। तब भीमसेनने उनसे कहा— ॥ २४ ॥ यदा राज्यमिदं कुन्ति भोक्तव्यं पुत्रनिर्जितम् । प्राप्तव्या राजधर्मांश्च तदेयं ते कुतो मतिः ॥ २५ ॥ 'माताजी! जब पुत्रोंके जीते हुए इस राज्यके भोगनेका अवसर आया और राजधर्मके पालनकी सुविधा प्राप्त हुई, तब आपको ऐसी बुद्धि कैसे हो गयी? ॥ २५ ॥ किं वयं कारिताः पूर्वं भवत्या पृथिवीक्षयम् । कस्य हेतोः परित्यज्य वनं गन्तुमभीप्ससि ॥ २६ ॥ 'यदि ऐसा ही करना था तो आपने इस भूमण्डलका विनाश क्यों करवाया? क्या कारण है कि आप हमें छोड़कर वनमें जाना चाहती हैं? ॥ २६ ॥ वनाच्चापि किमानीता भवत्या बालका वयम् । दुःखशोकसमाविष्टौ माद्रीपुत्राविमौ तथा ॥ २७ ॥ 'जब आपको वनमें ही जाना था, तब आप हमको और दुःख-शोकमें डूबे हुए उन माद्रीकुमारोंको बाल्यावस्थामें वनसे नगरमें क्यों ले आयीं? ॥ २७ ॥ प्रसीद मातर्मा गास्त्वं वनमद्य यशस्विनि । श्रियं यौधिष्ठिरीं मातर्भुङ्क्ष्व तावद् बलार्जिताम् ॥ २८ ॥ 'मेरी यशस्विनी मा! आप प्रसन्न हों। आप हमें छोड़कर वनमें न जायँ। बलपूर्वक प्राप्त की हुई राजा युधिष्ठिरकी उस राजलक्ष्मीका उपभोग करें' ॥ २८ ॥ इति सा निश्चिताैवाशु वनवासाय भाविनी । लालप्यतां बहुविधं पुत्राणां नाकरोद् वचः ॥ २९ ॥
शुद्ध हृदयवाली कुन्ती देवी वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय कर चुकी थीं; अतः नाना प्रकारसे विलाप करते हुए अपने पुत्रोंका अनुरोध उन्होंने नहीं माना ॥ २९ ॥
द्रौपदी चान्वयाच्छ्वश्रूं विषण्णवदना तदा ।
वनवासाय गच्छन्तीं रुदती भद्रया सह ॥ ३० ॥
सासको इस प्रकार वनवासके लिये जाती देख द्रौपदीके मुखपर भी विषाद छा गया। वह सुभद्राके साथ रोती हुई स्वयं भी कुन्तीके पीछे-पीछे जाने लगी ॥ ३० ॥
सा पुत्रान् रुदतः सर्वान् मुहुर्मुहुरवेक्षती ।
जगामैव महाप्राज्ञा वनाय कृतनिश्चया ॥ ३१ ॥
कुन्तीकी बुद्धि विशाल थी। वे वनवासका पक्का निश्चय कर चुकी थीं; इसलिये अपने रोते हुए समस्त पुत्रोंकी ओर बार-बार देखती हुई वे आगे बढ़ती ही चली गयीं ॥ ३१ ॥
अन्वयुः पाण्डवास्तां तु सभृत्यान्तःपुरास्तथा ।
ततः प्रमृज्य साश्रूणि पुत्रान् वचनमब्रवीत् ॥ ३२ ॥
पाण्डव भी अपने सेवकों और अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ उनके पीछे-पीछे जाने लगे। तब उन्होंने आँसू पोंछकर अपने पुत्रोंसे इस प्रकार कहा ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि कुन्तीवनप्रस्थाने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें कुन्तीका वनको प्रस्थानविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2325)
सप्तदशोऽध्यायः
कुन्तीका पाण्डवोंको उनके अनुरोधका उत्तर
कुन्त्युवाच
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि पाण्डव ।
कृतमुद्धर्षणं पूर्वं मया वः सीदतां नृपाः ॥ १ ॥
**कुन्ती बोली—**महाबाहु पाण्डुनन्दन! तुम जैसा कहते हो, वही ठीक है। राजाओ! पूर्वकालमें तुम नाना प्रकारके कष्ट उठाकर शिथिल हो गये थे, इसलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित किया था ॥ १ ॥
द्यूतापहृतराज्यानां पतितानां सुखादपि ।
ज्ञातिभिः परिभूतानां कृतमुद्धर्षणं मया ॥ २ ॥
जूएमें तुम्हारा राज्य छीन लिया गया था। तुम सुखसे भ्रष्ट हो चुके थे और तुम्हारे ही बन्धु-बान्धव तुम्हारा तिरस्कार करते थे, इसलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साह प्रदान किया था ॥ २ ॥
कथं पाण्डोर्न नश्येत संततिः पुरुषर्षभाः ।
यशश्च वो न नश्येत इति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ३ ॥
श्रेष्ठ पुरुषो! मैं चाहती थी कि पाण्डुकी संतान किसी तरह नष्ट न हो और तुम्हारे यशका भी नाश न होने पाये। इसलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित किया था ॥ ३ ॥
यूयमिन्द्रसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः ।
मा परेषां मुखप्रेक्षाः स्थेत्येवं तत् कृतं मया ॥ ४ ॥
तुम सब लोग इन्द्रके समान शक्तिशाली और देवताओंके तुल्य पराक्रमी होकर जीविकाके लिये दूसरोंका मुँह न देखो, इसलिये मैंने वह सब किया था ॥ ४ ॥
कथं धर्मभृतां श्रेष्ठो राजा त्वं वासवोपमः ।
पुनर्वने न दुःखी स्या इति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ५ ॥
तुम धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ और इन्द्रके समान ऐश्वर्यशाली राजा होकर पुनः वनवासका कष्ट न भोगो, इसी उद्देश्यसे मैंने तुम्हें युद्धके लिये उत्साहित किया था ॥ ५ ॥
नागायुतसमप्राणः ख्यातविक्रमपौरुषः ।
नायं भीमोऽत्ययं गच्छेदिति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ६ ॥
ये दस हजार हाथियोंके समान बलशाली और विख्यात बल-पराक्रमसे सम्पन्न भीमसेन पराजयको न प्राप्त हों; इसीलिये मैंने युद्धके हेतु उत्साह दिलाया था ॥
भीमसेनादवरजस्तथायं वासवोपमः ।
विजयो नावसीदेत इति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ७ ॥
भीमसेनके छोटे भाई ये इन्द्रतुल्य पराक्रमी विजय-शील अर्जुन शिथिल होकर न बैठ जायँ, इसीलिये मैंने उत्साह दिलाया था ॥ ७ ॥
नकुलः सहदेवश्च तथैमौ गुरुवर्तिनौ ।
क्षुधा कथं न सीदेतामिति चोद्धर्षणं कृतम् ॥ ८ ॥
गुरुजनोंकी आज्ञाके पालनमें लगे रहनेवाले ये दोनों भाई नकुल और सहदेव भूखका कष्ट न उठावें, इसके लिये मैंने तुम्हें उत्साह दिलाया था ॥ ८ ॥
इयं च बृहती श्यामा तथात्यायतलोचना ।
वृथा सभातले क्लिष्टा मा भूदिति च तत् कृतम् ॥ ९ ॥
यह ऊँचे कदवाली श्यामवर्णा विशाललोचना मेरी बहू भरी सभामें पुनः व्यर्थ अपमानित होनेका कष्ट न भोगे, इसी उद्देश्यसे मैंने वह सब किया था ॥ ९ ॥
प्रेक्षतामेव वो भीम वेपन्तीं कदलीमिव ।
स्त्रीधर्मिणीमरिष्टाङ्गीं तथा द्यूतपराजिताम् ॥ १० ॥
दुःशासनो यदा मौर्ख्याद् दासीवत् पर्यकर्षत ।
तदैव विदितं मह्यं पराभूतमिदं कुलम् ॥ ११ ॥
भीमसेन! तुम सब लोगोंके देखते-देखते केलेके पत्तेकी तरह काँपती हुई, जूएमें हारी गयी, रजस्वला और निर्दोष अंगवाली द्रौपदीको दुःशासनने मूर्खतावश जब दासीकी भाँति घसीटा था, तभी मुझे मालूम हो गया था कि अब इस कुलका पराभव होकर ही रहेगा ॥
निषण्णाः कुरवश्चैव तदा मे श्वशुरादयः ।
सा दैवं नाथमिच्छन्ती व्यलपत् कुररी यथा ॥ १२ ॥
मेरे श्वशुर आदि समस्त कौरव चुपचाप बैठे थे और द्रौपदी अपने लिये रक्षक चाहती हुई भगवान्को पुकार-पुकारकर कुररीकी भाँति विलाप कर रही थी ॥
केशपक्षे परामृष्टा पापेन हतबुद्धिना ।
यदा दुःशासनेनैषा तदा मुह्याम्यहं नृपाः ॥ १३ ॥
युष्मत्तेजोविवृद्ध्यर्थं मया ह्युद्धर्षणं कृतम् ।
तदानीं विदुलावाक्यैरिति तद् वित्त पुत्रकाः ॥ १४ ॥
राजाओ! जिसकी बुद्धि मारी गयी थी, उस पापी दुःशासनने जब मेरी इस बहूका केश पकड़कर खींचा था, तभी मैं दुःखसे मोहित हो गयी थी। यही कारण था कि उस समय विदुलाके वचनोंद्वारा मैंने तुम्हारे तेजकी वृद्धिके लिये उत्साहवर्धन किया था। पुत्रो! इस बातको अच्छी तरह समझ लो ॥ १३-१४ ॥
कथं न राजवंशोऽयं नश्येत् प्राप्य सुतान् मम ।
पाण्डोरिति मया पुत्रास्तस्मादुद्धर्षणं कृतम् ॥ १५ ॥
मेरे और पाण्डुके पुत्रोंतक पहुँचकर यह राजवंश किसी तरह नष्ट न हो जाय; इसीलिये मैंने तुम्हारे उत्साहकी वृद्धि की थी ॥ १५ ॥
न तस्य पुत्राः पौत्रा वा क्षतवंशस्य पार्थिव ।
लभन्ते सुकृताँल्लोकान् यस्माद् वंशः प्रणश्यति ॥ १६ ॥
राजन्! जिसका वंश नष्ट हो जाता है, उस कुलके पुत्र या पौत्र कभी पुण्यलोक नहीं पाते; क्योंकि उस वंशका तो नाश ही हो जाता है ॥ १६ ॥
भुक्तं राज्यफलं पुत्रा भर्तुर्मे विपुलं पुरा ।
महादानानि दत्तानि पीतः सोमो यथाविधि ॥ १७ ॥
पुत्रो! मैंने पूर्वकालमें अपने स्वामी महाराज पाण्डुके विशाल राज्यका सुख भोग लिया है, बड़े-बड़े दान दिये हैं और यज्ञमें विधिपूर्वक सोमपान भी किया है ॥ १७ ॥
नाहमात्मफलार्थं वै वासुदेवमचूचुदम् ।
विदुलायाः प्रलापैस्तैः पालनार्थं च तत् कृतम् ॥ १८ ॥
मैंने अपने लाभके लिये श्रीकृष्णको प्रेरित नहीं किया था। विदुलाके वचन सुनाकर जो उनके द्वारा तुम्हारे पास संदेश भेजा था, वह सब तुमलोगोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही किया था ॥ १८ ॥
नाहं राज्यफलं पुत्राः कामये पुत्रनिर्जितम् ।
पतिलोकानहं पुण्यान् कामये तपसा विभो ॥ १९ ॥
पुत्रो! मैं पुत्रके जीते हुए राज्यका फल भोगना नहीं चाहती। प्रभो! मैं तपस्याद्वारा पुण्यमय पतिलोकमें जानेकी कामना रखती हूँ ॥ १९ ॥
श्वश्रूश्वशुरयोः कृत्वा शुश्रूषां वनवासिनोः ।
तपसा शोषयिष्यामि युधिष्ठिर कलेवरम् ॥ २० ॥
युधिष्ठिर! अब मैं अपने इन वनवासी सास-ससुरकी सेवा करके तपके द्वारा इस शरीरको सुखा डालूँगी ॥ २० ॥
निवर्तस्व कुरुश्रेष्ठ भीमसेनादिभिः सह ।
धर्मे ते धीयतां बुद्धिर्मनस्तु महदस्तु च ॥ २१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तुम भीमसेन आदिके साथ लौट जाओ। तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी रहे और तुम्हारा हृदय विशाल (अत्यन्त उदार) हो ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि कुन्तीवाक्ये
सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें कुन्तीका वाक्यविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2328)
अष्टादशोऽध्यायः
पाण्डवोंका स्त्रियोंसहित निराश लौटना, कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका मार्गमें गंगातटपर निवास करना
वैशम्पायन उवाच
कुन्त्यास्तु वचनं श्रुत्वा पाण्डवा राजसत्तम ।
व्रीडिताः संन्यवर्तन्त पाञ्चाल्या सहिताऽनघाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ! कुन्तीकी बात सुनकर निष्पाप पाण्डव बहुत लज्जित हुए और द्रौपदीके साथ वहाँसे लौटने लगे ॥ १ ॥
ततः शब्दो महानेव सर्वेषामभवत् तदा ।
अन्तःपुराणां रुदतां दृष्ट्वा कुन्तीं तथागताम् ॥ २ ॥
प्रदक्षिणमथावृत्य राजानं पाण्डवास्तदा ।
अभिवाद्य न्यवर्तन्त पृथां तामनिवर्त्य वै ॥ ३ ॥
कुन्तीको इस प्रकार वनवासके लिये उद्यत देख रनिवासकी सारी स्त्रियाँ रोने लगीं। उन सबके रोनेका महान् शब्द सब ओर गूँज उठा। उस समय पाण्डव कुन्तीको लौटानेमें सफल न हो राजा धृतराष्ट्रकी परिक्रमा और अभिवादन करके लौटने लगे ॥ २-३ ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
गान्धारीं विदुरं चैव समाभाष्यावगृह्य च ॥ ४ ॥
तब महातेजस्वी अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने गान्धारी और विदुरको सम्बोधित करके उनका हाथ पकड़कर कहा— ॥
युधिष्ठिरस्य जननी देवी साधु निवर्त्यताम् ।
यथा युधिष्ठिरः प्राह तत् सर्वं सत्यमेव हि ॥ ५ ॥
‘गान्धारी और विदुर! तुमलोग युधिष्ठिरकी माता कुन्तीदेवीको अच्छी तरह समझा-बुझाकर लौटा दो। युधिष्ठिर जैसा कह रहे हैं, वह सब ठीक ही है ॥ ५ ॥
पुत्रैश्वर्यं महदिदमपास्य च महाफलम् ।
का नु गच्छेद वनं दुर्गं पुत्रानुत्सृज्य मूढवत् ॥ ६ ॥
पुत्रोंका महान् फलदायक यह महान् ऐश्वर्य छोड़कर और पुत्रोंका त्याग करके कौन नारी मूढ़की भाँति दुर्गम वनमें जायगी? ॥ ६ ॥
राज्यस्थया तपस्तप्तुं कर्तुं दानव्रतं महत् ।
अनया शक्यमेवाद्य श्रूयतां च वचो मम ॥ ७ ॥
यह राज्यमें रहकर भी तपस्या कर सकती है और महान् दान-व्रतका अनुष्ठान करनेमें समर्थ हो सकती है; अतः यह आज मेरी बात ध्यान देकर सुने ।। ७ ।। गांधारि परितुष्टोऽस्मि वध्वाः शुश्रूषणेन वै । तस्मात् त्वमेनां धर्मज्ञे समनुज्ञातुमर्हसि ।। ८ ।। ‘धर्मको जाननेवाली गान्धारी! मैं बहू कुन्तीकी सेवा-शुश्रूषासे बहुत संतुष्ट हूँ; अतः आज तुम इसे घर लौटनेकी आज्ञा दे दो’ ।। ८ ।। इत्युक्ता सौबलेयी तु राज्ञा कुन्तीमुवाच ह । तत् सर्वं राजवचनं स्वं च वाक्यं विशेषवत् ।। ९ ।। राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर सुबलकुमारी गान्धारीने कुन्तीसे राजाकी आज्ञा कह सुनायी और अपनी ओरसे भी उन्हें लौटनेके लिये विशेष जोर दिया ।। ९ ।। न च सा वनवासाय देवी कृतमतिं तदा । शक्नोत्युपावर्तयितुं कुन्तीं धर्मपरां सतीम् ।। १० ।। परंतु धर्मपरायणा सती-साध्वी कुन्तीदेवी वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय कर चुकी थीं; अतः गान्धारीदेवी उन्हें घरकी ओर लौटा न सकीं ।। १० ।। तस्यास्तां तु स्थितिं ज्ञात्वा व्यवसायं कुरुस्त्रियः । निवृत्तांश्च कुरुश्रेष्ठान् दृष्ट्वा प्ररुरुदुस्तदा ।। ११ ।। कुन्तीकी यह स्थिति और वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय जान कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको निराश लौटते देख कुरुकुलकी सारी स्त्रियाँ फूट-फूटकर रोने लगीं ।। ११ ।। उपावृत्तेषु पार्थेषु सर्वास्वेव वधूषु च । ययौ राजा महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो वनं तदा ।। १२ ।। कुन्तीके सभी पुत्र और सारी बहुएँ जब लौट गयीं, तब महाज्ञानी राजा धृतराष्ट्र वनकी ओर चले ।। पाण्डवाश्चातिदीनास्ते दुःखशोकपरायणाः । यानैः स्त्रीसहिताः सर्वे पुरं प्रविविशुस्तदा ।। १३ ।। उस समय पाण्डव अत्यन्त दीन और दुःख-शोकमें मग्न हो रहे थे। उन्होने वाहनोंपर बैठकर स्त्रियोंसहित नगरमें प्रवेश किया ।। १३ ।। तदहृष्टमनानन्दं गतोत्सवमिवाभवत् । नगरं हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम् ।। १४ ।। उस दिन बालक, वृद्ध और स्त्रियोंसहित सारा हस्तिनापुर नगर हर्ष और आनन्दसे रहित तथा उत्सवशून्य-सा हो रहा था ।। १४ ।। सर्वे चासन् निरुत्साहाः पाण्डवा जातमन्यवः । कुन्त्या हीनाः सुदुःखार्ता वत्सा इव विनाकृताः ।। १५ ।।
समस्त पाण्डवोंका उत्साह नष्ट हो गया था। वे दीन एवं दुखी हो गये थे। कुन्तीसे बिछुड़कर अत्यन्त दुःखसे आतुर हो वे बिना गायके बछड़ोंके समान व्याकुल हो गये थे॥ १५॥
धृतराष्ट्रस्तु तेनाह्ना गत्वा सुमहदन्तरम् । ततो भागीरथीतीरे निवासमकरोत् प्रभुः ॥ १६ ॥ उधर राजा धृतराष्ट्रने उस दिन बहुत दूरतक यात्रा करके संध्याके समय गंगाके तटपर निवास किया॥ १६॥
प्रादुष्कृता यथान्यायमनयो वेदपारगैः । व्यराजन्त द्विजश्रेष्ठैस्तत्र तत्र तपोवने ॥ १७ ॥ वहाँके तपोवनमें वेदोंके पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने जहाँ-तहाँ विधिपूर्वक जो आग प्रकट करके प्रज्वलित की थी, वह बड़ी शोभा पा रही थी ॥ १७॥
प्रादुष्कृताग्निरभवत् स च वृद्धो नराधिपः । स राजाग्नीन् पर्युपास्य हुत्वा च विधिवत् तदा ॥ १८ ॥ संध्यागतं सहस्त्रांशुमुपातिष्ठत भारत । भरतनन्दन! फिर बूढ़े राजा धृतराष्ट्रने भी अग्निको प्रकट एवं प्रज्वलित किया। त्रिविध अग्नियोंकी उपासना करके उनमें विधिपूर्वक आहुति दे राजाने संध्याकालिक सूर्यदेवका उपस्थान किया ॥ १८ १/२ ॥
विदुरः संजयश्चैव राज्ञः शय्यां कुशैस्ततः ॥ १९ ॥ चक्रतुः कुरुवीरस्य गान्धार्याश्चाविदूरतः । तदनन्तर विदुर और संजयने कुरुप्रवीर राजा धृतराष्ट्रके लिये कुशोंकी शय्या बिछा दी। उनके पास ही गान्धारीके लिये एक पृथक् आसन लगा दिया ॥ १९ १/२ ॥
गान्धार्याःसंनिकर्षे तु निषसाद कुशे सुखम् ॥ २० ॥ युधिष्ठिरस्य जननी कुन्ती साधुव्रते स्थिता । गान्धारीके निकट ही उत्तम व्रतमें स्थित हुई युधिष्ठिरकी माता कुन्ती भी कुशासनपर सोयीं और उसीमें उन्होंने सुख माना ॥ २० १/२ ॥
तेषां संश्रवणे चापि निषेदुर्विदुरादयः ॥ २१ ॥ याजकाश्च यथोद्देशं द्विजा ये चानुयायिनः । विदुर आदि भी राजासे उतनी ही दूरपर सोये, जहाँसे उनकी बोली सुनायी दे सके। यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण तथा राजाके साथ आये हुए अन्य द्विज यथायोग्य स्थानपर सोये ॥ २१ १/२ ॥
प्राधीतद्विजमुख्या सा सम्प्रज्वलितपावका ॥ २२ ॥ बभूव तेषां रजनी ब्राह्मीव प्रीतिवर्धिनी ।
उस रातमें मुख्य-मुख्य ब्राह्मण स्वाध्याय करते थे और जहाँ-तहाँ अग्निहोत्रकी आग प्रज्वलित हो रही थी। इससे वह रजनी उन लोगोंके लिये ब्राह्मी निशाके समान आनन्द बढ़ानेवाली हो रही थी ॥ २२ १/२ ॥
ततो रात्र्यां व्यतीतायां कृतपूर्वाह्निकक्रियाः ॥ २३ ॥
हुत्वाग्निं विधिवत् सर्वे प्रययुस्ते यथाक्रमम् ।
उदङ्मुखा निरीक्षन्त उपवासपरायणाः ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् रात बीतनेपर पूर्वाह्निककालकी क्रिया पूरी करके विधिपूर्वक अग्निमें आहुति देनेके पश्चात् वे सब लोग क्रमशः आगे बढ़ने लगे। उन सबने रात्रिमें उपवास किया था और सभी उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके उधर ही देखते हुए चले जा रहे थे ॥ २३-२४ ॥
स तेषामतिदुःखोऽभून्निवासः प्रथमेऽहनि ।
शोचतां शोच्यमानानां पौरजानपदैर्जनैः ॥ २५ ॥
नगर और जनपदके लोग जिनके लिये शोक कर रहे थे तथा जो स्वयं भी शोकमग्न थे, उन धृतराष्ट्र आदिके लिये यह पहले दिनका निवास बड़ा ही दुःखदायी प्रतीत हुआ ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2332)
एकोनविंशोऽध्यायः
धृतराष्ट्र आदिका गङ्गातटपर निवास करके वहाँसे कुरुक्षेत्रमें जाना और शतयूपके आश्रमपर निवास करना
वैशम्पायन उवाच
ततो भागीरथीतीरे मेध्ये पुण्यजनोचिते ।
निवासमकरोद् राजा विदुरस्य मते स्थितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर दूसरा दिन व्यतीत होनेपर राजा धृतराष्ट्रने विदुरजीकी बात मानकर पुण्यात्मा पुरुषोंके रहनेयोग्य भागीरथीके पावन-तटपर निवास किया ॥ १ ॥
तत्रैनं पर्युपातिष्ठन् ब्राह्मणा वनवासिनः ।
क्षत्रविट्शूद्रसंघाश्च बहवो भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ वनवासी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बहुत बड़ी संख्यामें एकत्र होकर राजासे मिलनेको आये ॥ २ ॥
स तैः परिवृतो राजा कथाभिः परिनन्द्य तान् ।
अनुजज्ञे सशिष्यान् वै विधिवत् प्रतिपूज्य च ॥ ३ ॥
उन सबसे घिरे हुए राजा धृतराष्ट्रने अनेक प्रकारकी बातें करके सबको प्रसन्न किया और शिष्योंसहित ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें जानेकी अनुमति दी ॥ ३ ॥
सायाह्ने स महीपालस्ततो गङ्गामुपेत्य च ।
चकार विधिवच्छौचं गान्धारी च यशस्विनी ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् सायंकालमें राजा तथा यशस्विनी गान्धारीदेवीने गङ्गाजीके जलमें प्रवेश करके विधिपूर्वक स्नान-कार्य सम्पन्न किया ॥ ४ ॥
ते चैवान्ये पृथक् सर्वे तीर्थेष्वाप्लुत्य भारत ।
चक्रुः सर्वाः क्रियास्तत्र पुरुषा विदुरादयः ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! वे तथा विदुर आदि पुरुषवर्गके लोग सबने पृथक्-पृथक् घाटोंमें गोता लगाकर संध्योपासन आदि समस्त शुभ कार्य पूर्ण किये ॥ ५ ॥
कृतशौचं ततो वृद्धं श्वशुरं कुन्तिभोजजा ।
गान्धारीं च पृथा राजन् गङ्गातीरमुपानयत् ॥ ६ ॥
राजन्! स्नानादि कर लेनेके पश्चात् अपने बूढ़े श्वशुर धृतराष्ट्र और गान्धारीदेवीको कुन्तीदेवी गङ्गाके किनारे ले आयीं ॥ ६ ॥
राज्ञस्तु याजकैस्तत्र कृतो वेदीपरिस्तरः ।
जुहाव तत्र वह्निं स नृपतिः सत्यसङ्गरः ॥ ७ ॥
वहाँ यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणोंने राजाके लिये एक वेदी तैयार की, जिसपर अग्नि-स्थापना करके उस सत्यप्रतिज्ञ नरेशने विधिवत् अग्निहोत्र किया ॥ ७ ॥
ततो भागीरथीतीरात् कुरुक्षेत्रं जगाम सः ।
सानुगो नृपतिर्वृद्धो नियतः संयतेन्द्रियः ॥ ८ ॥
इस प्रकार नित्यकर्मसे निवृत्त हो बूढ़े राजा धृतराष्ट्र इन्द्रियसंयमपूर्वक नियमपरायण हो सेवकों-सहित गङ्गातटसे चलकर कुरुक्षेत्रमें जा पहुँचे ॥ ८ ॥
तत्राश्रमपदं धीमानभिगम्य स पार्थिवः ।
आससादाथ राजर्षिं शतयूपं मनीषिणम् ॥ ९ ॥
वहाँ बुद्धिमान् भूपाल एक आश्रमपर जाकर वहाँके मनीषी राजर्षि शतयूपसे मिले ॥ ९ ॥
स हि राजा महानासीत् केकयेषु परंतपः ।
स्वपुत्रं मनुजैश्वर्ये निवेश्य वनमाविशत् ॥ १० ॥
वे परंतप राजा शतयूप कभी केकय देशके महाराज थे। अपने पुत्रको राजसिंहासनपर बिठाकर वनमें चले आये थे ॥ १० ॥
तेनासौ सहितो राजा ययौ व्यासाश्रमं प्रति ।
तत्रैनं विधिवद् राजा प्रत्यगृह्णात् कुरूद्वहः ॥ ११ ॥
राजा धृतराष्ट्र उन्हें साथ लेकर व्यास-आश्रमपर गये। वहाँ कुरुश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने विधिपूर्वक व्यासजीकी पूजा की ॥ ११ ॥
स दीक्षां तत्र सम्प्राप्य राजा कौरवनन्दनः ।
शतयूपाश्रमे तस्मिन् निवासमकरोत् तदा ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् उन्हींसे वनवासकी दीक्षा लेकर कौरवनन्दन राजा धृतराष्ट्र पूर्वोक्त शतयूपके आश्रममें लौट आये और वहीं निवास करने लगे ॥ १२ ॥
तस्मै सर्वं विधिं राज्ञे राजाऽऽचचक्षौ महामतिः ।
आरण्यकं महाराज व्यासस्यानुमते तदा ॥ १३ ॥
महाराज! वहाँ परम बुद्धिमान् राजा शतयूपने व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्रको वनमें रहनेकी सम्पूर्ण विधि बतला दी ॥ १३ ॥
एवं स तपसा राजन् धृतराष्ट्रो महामनाः ।
योजयामास चात्मानं तांश्चाप्यनुचरांस्तदा ॥ १४ ॥
राजन्! इस प्रकार महामनस्वी राजा धृतराष्ट्रने अपने-आपको तथा साथ आये हुए लोगोंको भी तपस्यामें लगा दिया ॥ १४ ॥
तथैव देवी गान्धारी वल्कलाजिनधारिणी ।
कुन्त्या सह महाराज समानव्रतचारिणी ॥ १५ ॥
महाराज! इसी प्रकार वल्कल और मृगचर्म धारण करनेवाली गान्धारीदेवी भी कुन्तीके साथ रहकर धृतराष्ट्रके समान ही व्रतका पालन करने लगीं ॥ १५ ॥
कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषा चैव ते नृप ।
संनियम्येन्द्रियग्राममास्थिते परमं तपः ॥ १६ ॥
नरेश्वर! वे दोनों नारियाँ इन्द्रियोंको अपने अधीन करके मन, वाणी, कर्म तथा नेत्रोंके द्वारा भी उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गयीं ॥ १६ ॥
त्वगस्थिभूतः परिशुष्कमांसो
जटाजिनी वल्कलसंवृताङ्गः ।
स पार्थिवस्तत्र तपश्चचार
महर्षिवत्तीव्रमपेतमोहः ॥ १७ ॥
राजा धृतराष्ट्रके शरीरका मांस सूख गया। वे अस्थिचर्मावशिष्ट होकर मस्तकपर जटा और शरीरपर मृगछाला एवं वल्कल धारण किये महर्षियोंकी भाँति तीव्र तपस्यामें प्रवृत्त हो गये। उनके चित्तका सम्पूर्ण मोह दूर हो गया था ॥ १७ ॥
क्षत्ता च धर्मार्थविदग्र्यबुद्धिः
ससंजयस्तं नृपतिं सदारम् ।
उपाचरद् घोरतपो जितात्मा
तदा कृशो वल्कलचीरवासाः ॥ १८ ॥
धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा उत्तम बुद्धिवाले विदुरजी भी संजयसहित वल्कल और चीरवस्त्र धारण किये गान्धारी और धृतराष्ट्रकी सेवा करने लगे। वे मनको वशमें करके अपने दुर्बल शरीरसे घोर तपस्यामें संलग्न रहते थे ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि शतयूपाश्रमनिवासे
एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका शतयूपके आश्रमपर निवासविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपःसिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी
विंशोऽध्यायः
नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपःसिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना
वैशम्पायन उवाच
ततस्तत्र मुनिश्रेष्ठा राजानं द्रष्टुमभ्ययुः ।
नारदः पर्वतश्चैव देवलश्च महातपाः ॥ १ ॥
द्वैपायनः सशिष्यश्च सिद्धाश्चान्ये मनीषिणः ।
शतयूपश्च राजर्षिर्वृद्धः परमधार्मिकः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर वहाँ राजा धृतराष्ट्रसे मिलनेके लिये नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, शिष्योंसहित महर्षि व्यास तथा अन्यान्य सिद्ध, मनीषी, श्रेष्ठ मुनिगण आये। उनके साथ परम धर्मात्मा वृद्ध राजर्षि शतयूप भी पधारे थे ॥ १-२ ॥
तेषां कुन्ती महाराज पूजां चक्रे यथाविधि ।
ते चापि तुतुषुस्तस्यास्तापसाः परिचर्यया ॥ ३ ॥
महाराज! कुन्तीदेवीने उन सबकी यथायोग्य पूजा की। वे तपस्वी ऋषि भी कुन्तीकी सेवासे बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३ ॥
तत्र धर्म्याः कथास्तात चक्रुस्ते परमर्षयः ।
रमयन्तो महात्मानं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥ ४ ॥
तात! वहाँ उन महर्षियोंने महात्मा राजा धृतराष्ट्रका मन लगानेके लिये अनेक प्रकारकी धार्मिक कथाएँ कहीं ॥
कथान्तरे तु कस्मिंश्चिद् देवर्षिर्नारदस्ततः ।
कथामिमामकथयत् सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ५ ॥
सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले देवर्षि नारदने किसी कथाके प्रसंगमें यह कथा कहनी आरम्भ की ॥ ५ ॥
नारद उवाच
केकयाधिपतिः श्रीमान् राजाऽऽसीदकुतोभयः ।
सहस्रचित्य इत्युक्तः शतयूपपितामहः ॥ ६ ॥
**नारदजी बोले—**राजन्! पूर्वकालमें सहस्रचित्य नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा थे, जो केकयदेशकी प्रजाका पालन करते थे। उन्हें कभी किसीसे भय नहीं होता था। यहाँ जो ये राजर्षि शतयूप विराज रहे हैं, इनके वे पितामह थे ॥ ६ ॥
स पुत्रे राज्यमासज्य ज्येष्ठे परमधार्मिके । सहस्रचित्यो धर्मात्मा प्रविवेश वनं नृपः ॥ ७ ॥ धर्मात्मा राजा सहस्रचित्य अपने परम धर्मात्मा ज्येष्ठ पुत्रको राज्यका भार सौंपकर तपस्याके लिये इसी वनमें प्रविष्ट हुए ॥ ७ ॥
स गत्वा तपसः पारं दीप्तस्य वसुधाधिपः । पुरंदरस्य संस्थानं प्रतिपेदे महाद्युतिः ॥ ८ ॥ ये महातेजस्वी भूपाल अपनी उद्दीप्त तपस्या पूरी करके इन्द्रलोकको प्राप्त हुए ॥ ८ ॥
दृष्टपूर्वः स बहुशो राजन् सम्पतता मया । महेन्द्रसदने राजा तपसा दग्धकिल्बिषः ॥ ९ ॥ तपस्यासे उनके सारे पाप भस्म हो गये थे। राजन्! इन्द्रलोकमें आते-जाते समय मैंने उन राजर्षिको अनेक बार देखा है ॥ ९ ॥
तथा शैलालयो राजा भगदत्तपितामहः । तपोबलेनैव नृपो महेन्द्रसदनं गतः ॥ १० ॥ इसी प्रकार भगदत्तके पिता महाराजा शैलालय भी तपस्याके बलसे ही इन्द्रलोकको गये हैं ॥ १० ॥
तथा पृषध्रो राजाऽऽसीद् राजन् वज्रधरोपमः । स चापि तपसा लेभे नाकपृष्ठमितो गतः ॥ ११ ॥ महाराज! राजा पृषध्र वज्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी थे। उन्होंने भी तपस्याके बलसे इस लोकसे जानेपर स्वर्गलोक प्राप्त किया था ॥ ११ ॥
अस्मिन्नरण्ये नृपते मान्धातुरपि चात्मजः । पुरुकुत्सो नृपः सिद्धिं महतीं समवाप्तवान् ॥ १२ ॥ भार्या समभवद् यस्य नर्मदा सरितां वरा । सोऽस्मिन्नरण्ये नृपतिस्तपस्तप्त्वा दिवं गतः ॥ १३ ॥ नरेश्वर! मान्धाताके पुत्र पुरुकुत्सने भी, सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा जिनकी पत्नी हुई थी, इसी वनमें तपस्या करके बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त की थी। यहीं तपस्या करके वे नरेश स्वर्गलोकमें गये थे ॥ १२-१३ ॥
शशलोमा च राजाऽऽसीद् राजन् परमधार्मिकः । सम्यगस्मिन् वने तप्त्वा ततो दिवमवाप्तवान् ॥ १४ ॥ राजन्! परम धर्मात्मा राजा शशलोमाने भी इसी वनमें उत्तम तपस्या करके स्वर्ग प्राप्त किया था ॥ १४ ॥
द्वैपायनप्रसादाच्च त्वमपीदं तपोवनम् । राजन्नवाप्य दुष्प्रापां गतिमग्र्यां गमिष्यसि ॥ १५ ॥
नरेश्वर! व्यासजीकी कृपासे तुम भी इसी तपोवनमें आ पहुँचे हो। अब यहाँ तपस्या करके दुर्लभ सिद्धिका आश्रय ले श्रेष्ठ गति प्राप्त कर लोगे ॥ १५ ॥ त्वं चापि राजशार्दूल तपसोऽन्ते श्रिया वृतः । गान्धारीसहितो गन्ता गतिं तेषां महात्मनाम् ॥ १६ ॥ नृपश्रेष्ठ! तुम भी तपस्याके अन्तमें तेजसे सम्पन्न हो गान्धारीके साथ उन्हीं महात्माओंकी गति प्राप्त करोगे ॥ १६ ॥ पाण्डुः स्मरति ते नित्यं बलहन्तुः समीपगः । त्वां सदैव महाराज श्रेयसा स च योक्ष्यति ॥ १७ ॥ महाराज! तुम्हारे छोटे भाई पाण्डु इन्द्रके पास ही रहते हैं। वे सदा तुम्हें याद करते रहते हैं। निश्चय ही वे तुम्हें कल्याणके भागी बनायेंगे ॥ १७ ॥ तव शुश्रूषया चैव गान्धार्याश्च यशस्विनी । भर्तुः सलोकतामेषा गमिष्यति वधूस्तव ॥ १८ ॥ युधिष्ठिरस्य जननी स हि धर्मः सनातनः । तुम्हारी और गान्धारीदेवीकी सेवा करनेसे यह तुम्हारी यशस्विनी बहू युधिष्ठिरजननी कुन्ती अपने पतिके लोकमें पहुँच जायगी। युधिष्ठिर साक्षात् सनातन धर्मस्वरूप हैं (अतः उनकी माता कुन्तीकी सद्गतिमें कोई संदेह ही नहीं है) ॥ १८ १/२ ॥ वयमेतत् प्रपश्यामो नृपते दिव्यचक्षुषा ॥ १९ ॥ प्रवेक्ष्यति महात्मानं विदुरश्च युधिष्ठिरम् । संजयस्तदनुध्यानादितः स्वर्गमवाप्स्यति ॥ २० ॥ नरेश्वर! यह सब हम अपनी दिव्य दृष्टिसे देख रहे हैं। विदुर महात्मा युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश करेंगे और संजय उन्हींका चिन्तन करनेके कारण यहाँसे सीधे स्वर्गको जायँगे ॥ १९-२० ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा कौरवेन्द्रो महात्मा सार्धं पत्न्या प्रीतिमान् सम्बभूव । विद्वान् वाक्यं नारदस्य प्रशस्य चक्रे पूजां चातुलां नारदाय ॥ २१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर महात्मा कौरवराज धृतराष्ट्र अपनी पत्नीके साथ बहुत प्रसन्न हुए। उन विद्वान् नरेशने नारदजीके वचनोंकी प्रशंसा करके उनकी अनुपम पूजा की ॥ २१ ॥ ततः सर्वे नारदं विप्रसंघाः सम्पूजयामासुरतीव राजन् ।
राज्ञः प्रीत्या धृतराष्ट्रस्य ते वै
पुनः पुनः सम्प्रहृष्टास्तदानीम् ॥ २२ ॥
राजन्! तदनन्तर समस्त ब्राह्मण-समुदायने नारदजीका विशेष पूजन किया। राजा धृतराष्ट्रकी प्रसन्नतासे उस समय उन सब लोगोंको बारंबार हर्ष हो रहा था ॥ २२ ॥
नारदस्य तु तद् वाक्यं शशंसुर्द्विजसत्तमाः ।
शतयूपस्तु राजर्षिर्नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २३ ॥
उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने नारदजीके पूर्वोक्त वचनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। तत्पश्चात् राजर्षि शतयूपने नारदजीसे इस प्रकार कहा— ॥ २३ ॥
अहो भगवता श्रद्धा कुरुराजस्य वर्धिता ।
सर्वस्य च जनस्यास्य मम चैव महाद्युते ॥ २४ ॥
‘महातेजस्वी देवर्षे! बड़े हर्षकी बात है कि आपने कुरुराज धृतराष्ट्रकी, यहाँ आये हुए सब लोगोंकी और मेरी भी तपस्याविषयक श्रद्धाको अधिक बढ़ा दिया है ॥ २४ ॥
अस्ति काचिद् विवक्षा तु तां मे निगदतः शृणु ।
धृतराष्ट्रं प्रति नृपं देवर्षे लोकपूजित ॥ २५ ॥
‘लोकपूजित देवर्षे! राजा धृतराष्ट्रके विषयमें मुझे कुछ कहने या पूछनेकी इच्छा हो रही है। अपनी उस इच्छाको मैं बता रहा हूँ, सुनिये ॥ २५ ॥
सर्ववृत्तान्ततत्त्वज्ञो भवान् दिव्येन चक्षुषा ।
युक्तः पश्यसि विप्रर्षे गतिर्या विविधा नृणाम् ॥ २६ ॥
‘ब्रह्मर्षे! आप सम्पूर्ण वृत्तान्तोंके तत्त्वज्ञ हैं। आप योगयुक्त होकर अपनी दिव्य दृष्टिसे मनुष्योंको जो नाना प्रकारकी गति प्राप्त होती है, उसे प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ २६ ॥
उक्तवान् नृपतीनां त्वं महेन्द्रस्य सलोकताम् ।
न त्वस्य नृपतेर्लोकाः कथितास्ते महामुने ॥ २७ ॥
‘महामुने! आपने अनेक राजाओंकी इन्द्रलोक-प्राप्तिका वर्णन किया; किंतु यह नहीं बताया कि ये राजा धृतराष्ट्र किस लोकको जायँगे ॥ २७ ॥
स्थानमप्यस्य नृपतेः श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो ।
त्वत्तः कीदृक् कदा चेति तन्ममाख्याहि तत्त्वतः ॥ २८ ॥
‘प्रभो! इन नरेशको जो स्थान प्राप्त होनेवाला है, उसे भी मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। वह स्थान कैसा होगा और कब प्राप्त होगा—यह मुझे ठीक-ठीक बताइये’ ॥ २८ ॥
इत्युक्तो नारदस्तेन वाक्यं सर्वमनोऽनुगम् ।
व्याजहार सभामध्ये दिव्यदर्शी महातपाः ॥ २९ ॥
शतयूपके इस प्रकार प्रश्न करनेपर दिव्यदर्शी महातपस्वी देवर्षि नारदने उस सभामें सबके मनको प्रिय लगनेवाली यह बात कही ॥ २९ ॥