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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

कथं न प्रत्युदेत्यद्य स्मयमाना यथा पुरा ॥ ६३ ॥ अब सुदर्शन फिर पुकार-पुकारकर इस प्रकार कहने लगे—‘मेरी वह साध्वी पत्नी कहाँ है? वह सुशीला कहाँ चली गयी? मेरी सेवासे बढ़कर कौन गुरुतर कार्य उसपर आ पड़ा। वह पतिव्रता, सत्य बोलनेवाली और सदा सरलभावसे रहनेवाली है। आज पहलेकी ही भाँति मुसकराती हुई वह मेरी अगवानी क्यों नहीं कर रही है?’ ।। ६२-६३ ।।

उटजस्थस्तु तं विप्रः प्रत्युवाच सुदर्शनम् । अतिथिं विद्धि सम्प्राप्तं ब्राह्मणं पावके च माम् ॥ ६४ ॥ यह सुनकर आश्रमके भीतर बैठे हुए ब्राह्मणने सुदर्शनको उत्तर दिया—‘अग्निकुमार! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैं ब्राह्मण हूँ और तुम्हारे घरपर अतिथिके रूपमें आया हूँ॥ ६४ ॥

अनया छन्द्यमानोऽहं भार्यया तव सत्तम । तैस्तैरतिथिसत्कारैर्ब्रह्मन्नेषा वृता मया ॥ ६५ ॥ ‘साधुशिरोमणे! तुम्हारी इस पत्नीने अतिथि-सत्कारके द्वारा मेरी इच्छा पूर्ण करनेका वचन दिया है। ब्रह्मन्! तब मैंने इसे ही वरण कर लिया है ।। ६५ ।।

अनेन विधिना सेयं मामर्च्छति शुभानना । अनुरूपं यदत्रान्यत् तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ ६६ ॥ ‘इसी विधिके अनुसार यह सुमुखी इस समय मेरी सेवामें उपस्थित हुई है। अब यहाँ तुम्हें दूसरा जो कुछ उचित प्रतीत हो, वह कर सकते हो’ ।। ६६ ।।

कूटमुद्गरहस्तस्तु मृत्युस्तं वै समन्वगात् । हीनप्रतिज्ञमत्रैनं वधिष्यामीति चिन्तयन् ॥ ६७ ॥ इसी समय मृत्यु हाथमें लोहदण्ड लिये सुदर्शनके पीछे आकर खड़ी हो गयी। वह सोचती थी कि अब तो यह अपनी प्रतिज्ञा तोड़ बैठेगा। इसलिये इसे यहीं मार डालूँगी ।। ६७ ।।

सुदर्शनस्तु मनसा कर्मणा चक्षुषा गिरा । त्यक्तेर्ष्यस्त्यक्तमन्युश्च स्मयमानोऽब्रवीदिदम् ॥ ६८ ॥ परंतु सुदर्शन मन, वाणी, नेत्र और क्रियासे भी ईर्ष्या तथा क्रोधका त्याग कर चुके थे। वे हँसते-हँसते यों बोले— ।। ६८ ।।

सुरतं तेऽस्तु विप्राग्र्य प्रीतिर्हि परमा मम । गृहस्थस्य हि धर्मोऽग्र्यः सम्प्राप्तातिथिपूजनम् ॥ ६९ ॥ ‘विप्रवर! आपकी सुरत कामनापूर्ण हो। इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता है; क्योंकि घरपर आये हुए अतिथिका पूजन करना गृहस्थके लिये सबसे बड़ा धर्म है ।। ६९ ।।

अतिथिः पूजितो यस्य गृहस्थस्य तु गच्छति । नान्यस्तस्मात् परो धर्म इति प्राहुर्मनीषिणः ॥ ७० ॥

'जिस गृहस्थके घरपर आया हुआ अतिथि पूजित होकर जाता है उसके लिये उससे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है—ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ।। ७० ।।

प्राणा हि मम दाराश्च यच्चान्यद् विद्यते वसु । अतिथिभ्यो मया देयमिति मे व्रतमाहितम् ।। ७१ ।। 'मेरे प्राण, मेरी पत्नी तथा मेरे पास और जो कुछ धन-दौलत हैं, वह सब मेरी ओरसे अतिथियोंके लिये निछावर है, ऐसा मैंने व्रत ले रखा है ।। ७१ ।।

निःसंदिग्धं यथा वाक्यमेतन्मे समुदाहृतम् । तेनाहं विप्र सत्येन स्वयमात्मानमालभे ।। ७२ ।। 'ब्रह्मन्! मैंने जो यह बात कही है, इसमें संदेह नहीं है। इस सत्यको सिद्ध करनेके लिये मैं स्वयं ही अपने शरीरको छूकर शपथ खाता हूँ ।। ७२ ।।

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । बुद्धिरात्मा मनः कालो दिशश्चैव गुणा दश ।। ७३ ।। नित्यमेव हि पश्यन्ति देहिनां देहसंश्रिताः । सुकृतं दुष्कृतं चापि कर्म धर्मभृतां वर ।। ७४ ।। 'धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, नेत्र, बुद्धि, आत्मा, मन, काल और दिशाएँ—से दस गुण (वस्तुएँ) सदा ही प्राणियोंके शरीरमें स्थित होकर उनके पुण्य और पापकर्मको देखा करते हैं ।। ७३-७४ ।।

यथैषा नानृता वाणी मयाद्य समुदीरिता । तेन सत्येन मां देवाः पालयन्तु दहन्तु वा ।। ७५ ।। 'आज मेरी कही हुई यह वाणी यदि मिथ्या नहीं है तो इस सत्यके प्रभावसे देवता मेरी रक्षा करें, अथवा मिथ्या होनेपर मुझे जलाकर भस्म कर डालें' ।। ७५ ।।

ततो नादः समभवद् दिक्षु सर्वासु भारत । असकृत् सत्यमित्येवं नैतन्मिथ्येति सर्वतः ।। ७६ ।। भरतनन्दन! सुदर्शनके इतना कहते ही सम्पूर्ण दिशाओंसे बारंबार आवाज आने लगी—'तुम्हारा कथन सत्य है। इसमें झूठका लेश भी नहीं है' ।। ७६ ।।

उटजात् तु ततस्तस्मान्निष्क्राम स वै द्विजः । वपुषा द्यां च भूमिं च व्याप्य वायुरिवोद्यतः ।। ७७ ।। तत्पश्चात् वह ब्राह्मण उस आश्रमसे बाहर निकला। वह अपने शरीरसे वायुकी भाँति पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हो गया ।। ७७ ।।

स्वरेण विप्रः शैक्षेण त्रीँल्लोकाननुनादयन् । उवाच चैनं धर्मज्ञं पूर्वमामन्त्र्य नामतः ।। ७८ ।। शिक्षाके अनुकूल उदात्त आदि स्वरसे तीनों लोकोंको प्रतिध्वनित करते हुए उस ब्राह्मणने पहले धर्मज्ञ सुदर्शनको सम्बोधित करके उससे इस प्रकार कहा— ।। ७८ ।।

धर्मोऽहमस्मि भद्रं ते जिज्ञासार्थं तवानघ । प्राप्तः सत्यं च ते ज्ञात्वा प्रीतिर्मे परमा त्वयि ॥ ७९ ॥ ‘निष्पाप सुदर्शन! तुम्हारा कल्याण हो। मैं धर्म हूँ और तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये यहाँ आया हूँ। तुममें सत्य है—यह जानकर मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हुआ हूँ ।। ७९ ।।

विजितश्च त्वया मृत्युर्योऽयं त्वामनुगच्छति । रन्ध्रान्वेषी तव सदा त्वया धृत्या वशी कृतः ॥ ८० ॥ ‘तुमने इस मृत्युको, जो सदा तुम्हारा छिद्र ढूँढ़ती हुई तुम्हारे पीछे लगी रहती थी, जीत लिया। तुमने अपने धैर्यसे मृत्युको वशमें कर लिया है ।। ८० ।।

न चास्ति शक्तिस्त्रैलोक्ये कस्यचित् पुरुषोत्तम । पतिव्रतामिमां साध्वीं तवोद्वीक्षितुमप्युत ॥ ८१ ॥ ‘पुरुषोत्तम! तीनों लोकोंमें किसीकी भी ऐसी शक्ति नहीं है जो तुम्हारी इस सती-साध्वी पतिव्रता पत्नीकी ओर कलुषित भावनासे आँख उठाकर देख भी सके’ ।। ८१ ।।

रक्षिता त्वद्गुणैरेषा पतिव्रतगुणैस्तथा । अधृष्या यदियं ब्रूयात् तथा तन्नान्यथा भवेत् ॥ ८२ ॥ ‘यह तुम्हारे गुणोंसे तथा अपने पातिव्रत्यके गुणोंद्वारा भी सदा सुरक्षित है। कोई भी इसका पराभव नहीं कर सकता। यह जो बात अपने मुँहसे निकालेगी वह सत्य ही होगी।

मिथ्या नहीं हो सकती ॥ ८२ ॥
एषा हि तपसा स्वेन संयुक्ता ब्रह्मवादिनी ।
पावनार्थं च लोकस्य सरिच्छ्रेष्ठा भविष्यति ॥ ८३ ॥
अर्धेनौघवती नाम त्वामर्धेनानुयास्यति ।
शरीरेण महाभागा योगो ह्यस्या वशे स्थितः ॥ ८४ ॥
‘अपने तपोबलसे युक्त यह ब्रह्मवादिनी नारी संसारको पवित्र करनेके लिये अपने आधे शरीरसे ओघवती नामवाली श्रेष्ठ नदी होगी और आधे शरीरसे यह परम सौभाग्यवती सती तुम्हारी सेवामें रहेगी। योग सदा इसके वशमें रहेगा ॥ ८३-८४ ॥
अनया सह लोकांश्च गन्तासि तपसार्जितान् ।
यत्र नावॄत्तिमभ्येति शाश्वतांस्तान् सनातनान् ॥ ८५ ॥
‘तुम भी इसके साथ अपनी तपस्यासे प्राप्त हुए उन सनातन लोकोंमें जाओगे जहाँसे फिर इस संसारमें लौटना नहीं पड़ता ॥ ८५ ॥
अनेन चैव देहेन लोकांस्त्वमभिपत्स्यसे ।
निर्जितश्च त्वया मृत्युरैश्वर्यं च तवोत्तमम् ॥ ८६ ॥
‘तुम इसी शरीरसे उन दिव्य लोकोंमें जाओगे; क्योंकि तुमने मृत्युको जीत लिया है और तुम्हें उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त है ॥ ८६ ॥
पञ्चभूतान्यतिक्रान्तः स्ववीर्याच्च मनोजवः ।
गृहस्थधर्मेणानेन कामक्रोधौ च ते जितौ ॥ ८७ ॥
‘अपने पराक्रमसे पञ्चभूतोंको लाँघकर तुम मनके समान वेगवान् हो गये हो। इस गृहस्थ-धर्मके आचरणसे ही तुमने काम और क्रोधपर विजय पा ली है’ ॥ ८७ ॥
स्नेहो रागश्च तन्द्री च मोहो द्रोहश्च केवलः ।
तव शुश्रूषया राजन् राजपुत्र्या विनिर्जिताः ॥ ८८ ॥
‘राजन्! राजकुमारी ओघवतीने भी तुम्हारी सेवाके बलसे स्नेह (आसक्ति), राग, आलस्य, मोह और द्रोह आदि दोषोंको जीत लिया है’ ॥ ८८ ॥

भीष्म उवाच

शुक्लानां तु सहस्रेण वाजिनां रथमुत्तमम् ।
युक्तं प्रगृह्य भगवान् वासवोऽप्याजगाम तम् ॥ ८९ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर भगवान् इन्द्र भी श्वेत रंगके एक हजार घोड़ोंसे जुते हुए उत्तम रथको लेकर उनसे मिलनेके लिये आये ॥ ८९ ॥
मृत्युरात्मा च लोकांश्च जिता भूतानि पञ्च च ।
बुद्धिः कालो मनो व्योम कामक्रोधौ तथैव च ॥ ९० ॥

इस प्रकार सुदर्शनने अतिथि-सत्कारके पुण्यसे मृत्यु, आत्मा, लोक, पञ्चभूत, बुद्धि, काल, मन, आकाश, काम और क्रोधको भी जीत लिया ॥ ९० ॥

तस्माद् गृहाश्रमस्थस्य नान्यद् दैवतमस्ति वै ।
ऋतेऽतिथिं नरव्याघ्र मनसैतद् विचारय ॥ ९१ ॥
पुरुषसिंह! इसलिये तुम अपने मनमें यह निश्चित विचार कर लो कि गृहस्थ पुरुषके लिये अतिथिको छोड़कर दूसरा कोई देवता नहीं है ॥ ९१ ॥

अतिथिः पूजितो यद्धि ध्यायते मनसा शुभम् ।
न तत् क्रतुशतेनापि तुल्यमाहुर्मनीषिणः ॥ ९२ ॥
यदि अतिथि पूजित होकर मन-ही-मन गृहस्थके कल्याणका चिन्तन करे तो उससे जो फल मिलता है उसकी सौ यज्ञोंसे भी तुलना नहीं हो सकती अर्थात् सौ यज्ञोंसे भी बढ़कर है। ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है ॥ ९२ ॥

पात्रं त्वतिथिमासाद्य शीलाढ्यं यो न पूजयेत् ।
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ ९३ ॥
जो गृहस्थ सुपात्र और सुशील अतिथिको पाकर उसका यथोचित सत्कार नहीं करता, वह अतिथि उसे अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है ॥ ९३ ॥

एतत् ते कथितं पुत्र मयाऽऽख्यानमनुत्तमम् ।
यथा हि विजितो मृत्युर्गृहस्थेन पुराभवत् ॥ ९४ ॥
बेटा! तुम्हारे प्रश्नके अनुसार पूर्वकालमें गृहस्थने जिस प्रकार मृत्युपर विजय पायी थी, वह उत्तम उपाख्यान मैंने तुमसे कहा ॥ ९४ ॥

धन्यं यशस्यमायुष्यमिदमाख्यानमुत्तमम् ।
बुभूषताभिमन्तव्यं सर्वदुश्चरितापहम् ॥ ९५ ॥
यह उत्तम आख्यान धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है। इससे सब प्रकारके दुष्कर्मोंका नाश हो जाता है, अतः अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषको सदा ही इसके प्रति आदरबुद्धि रखनी चाहिये ॥ ९५ ॥

इदं यः कथयेद् विद्वानहन्यहनि भारत ।
सुदर्शनस्य चरितं पुण्याँल्लोकानवाप्नुयात् ॥ ९६ ॥
भरतनन्दन! जो विद्वान् सुदर्शनके इस चरित्रका प्रतिदिन वर्णन करता है वह पुण्यलोकोंको प्राप्त होता है* ॥ ९६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुदर्शनोपाख्याने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुदर्शनका उपाख्यानविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

* इस अध्यायमें वर्णित चरित्र असाधारण शक्तिसम्पन्न पुरुषोंके हैं। आजकलके साधारण मनुष्योंको इसके उस अंशका अनुकरण नहीं करना चाहिये जिसमें स्त्रीके लिये अपने शरीर-प्रदानकी बात कही गयी है। अतिथिको अन्न, जल, बैठनेके लिये आसन, रहनेके लिये स्थान, सोनेके लिये बिस्तर और वस्त्र आदि वस्तुएँ अपनी शक्तिके अनुसार समर्पित करनी चाहिये। मीठे वचनोंद्वारा उसका आदर-सत्कार भी करना चाहिये। इतना ही इस अध्यायका तात्पर्य है।

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तृतीयोऽध्यायः

विश्वामित्रको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति कैसे हुई—इस विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न

युधिष्ठिर उवाच

ब्राह्मण्यं यदि दुष्प्राप्यं त्रिभिर्वर्णैर्नराधिप ।
कथं प्राप्तं महाराज क्षत्रियेण महात्मना ॥ १ ॥
विश्वामित्रेण धर्मात्मन् ब्राह्मणत्वं नरर्षभ ।
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— महाराज! नरेश्वर! यदि अन्य तीन वर्णोंके लिये ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है तो क्षत्रियकुलमें उत्पन्न महात्मा विश्वामित्रने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया? धर्मात्मन्! नरश्रेष्ठ पितामह! इस बातको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ, आप मुझे बताइये ॥ १-२ ॥

तेन ह्यमितवीर्येण वसिष्ठस्य महात्मनः ।
हतं पुत्रशतं सद्यस्तपसापि पितामह ॥ ३ ॥
पितामह! अमित पराक्रमी विश्वामित्रने अपनी तपस्याके प्रभावसे महात्मा वसिष्ठके सौ पुत्रोंको तत्काल नष्ट कर दिया था ॥ ३ ॥

यातुधानाश्च बहवो राक्षसास्तिग्मतेजसः ।
मन्युनाऽऽविष्टदेहेन सृष्टाः कालान्तकोपमाः ॥ ४ ॥
उन्होंने क्रोधके आवेशमें आकर बहुत-से प्रचण्ड तेजस्वी यातुधान एवं राक्षस रच डाले थे जो काल और यमराजके समान भयानक थे ॥ ४ ॥

महान् कुशिकवंशश्च ब्रह्मर्षिशतसंकुलः ।
स्थापितो नरलोकेऽस्मिन् विद्वद्ब्राह्मणसंस्तुतः ॥ ५ ॥
इतना ही नहीं, इस मनुष्य-लोकमें उन्होंने उस महान् कुशिक-वंशको स्थापित किया जो अब सैकड़ों ब्रह्मर्षियोंसे व्याप्त और विद्वान् ब्राह्मणोंसे प्रशंसित है ॥ ५ ॥

ऋचीकस्यात्मजश्चैव शुनःशेपो महातपाः ।
विमोक्षितो महासत्रात् पशुतामप्युपागतः ॥ ६ ॥
ऋचीक (अजीगर्त) का महातपस्वी पुत्र शुनःशेप एक यज्ञमें यज्ञ-पशु बनाकर लाया गया था; किंतु विश्वामित्रजीने उस महायज्ञसे उसको छुटकारा दिला दिया ॥ ६ ॥

हरिश्चन्द्रक्रतौ देवांस्तोषयित्वाऽऽत्मतेजसा ।
पुत्रतामनुसम्प्राप्तो विश्वामित्रस्य धीमतः ॥ ७ ॥

हरिश्चन्द्रके उस यज्ञमें अपने तेजसे देवताओंको संतुष्ट करके विश्वामित्रने शुनःशेपको छुड़ाया था; इसलिये वह बुद्धिमान् विश्वामित्रके पुत्रभावको प्राप्त हो गया ।। ७ ।।
नाभिवादयते ज्येष्ठं देवरातं नराधिप ।
पुत्राः पञ्चाशदेवापि शप्ताः श्वपचतां गताः ।। ८ ।।
नरेश्वर! शुनःशेप देवताओंके देनेसे देवरात नामसे प्रसिद्ध हो विश्वामित्रका ज्येष्ठ पुत्र हुआ। उसके छोटे भाई—विश्वामित्रके अन्य पचास पुत्र उसे बड़ा मानकर प्रणाम नहीं करते थे; इसलिये विश्वामित्रके शापसे वे सब-के-सब चाण्डाल हो गये ।। ८ ।।
त्रिशङ्कुर्बन्धुभिर्मुक्त ऐक्ष्वाकः प्रीतिपूर्वकम् ।
अवाक्शिरा दिवं नीतो दक्षिणामाश्रितो दिशम् ।। ९ ।।
जिस इक्ष्वाकुवंशी त्रिशंकुको भाई-बन्धुओंने त्याग दिया था और जब वह स्वर्गसे भ्रष्ट होकर दक्षिण दिशामें नीचे सिर किये लटक रहा था, तब विश्वामित्रजीने ही उसे प्रेमपूर्वक स्वर्गलोकमें पहुँचाया था ।। ९ ।।
विश्वामित्रस्य विपुला नदी देवर्षिसेविता ।
कौशिकी च शिवा पुण्या ब्रह्मर्षिसुरसेविता ।। १० ।।
देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों और देवताओंसे सेवित, पवित्र, मंगलकारिणी एवं विशाल कौशिकी नदी विश्वामित्रके ही प्रभावसे प्रकट हुई है ।। १० ।।
तपोविघ्नकरी चैव पञ्चचूडा सुसम्मता ।
रम्भा नामाप्सराः शापाद् यस्य शैलत्वमागता ।। ११ ।।
पाँच चोटीवाली लोकप्रिय रम्भा नामक अप्सरा विश्वामित्रजीकी तपस्यामें विघ्न डालने गयी थी, जो उनके शापसे पत्थर हो गयी ।। ११ ।।
तथैवास्य भयाद् बद्ध्वा वसिष्ठः सलिले पुरा ।
आत्मानं मज्जयन् श्रीमान् विपाशः पुनरुत्थितः ।। १२ ।।
तदाप्रभृति पुण्या हि विपाशाभून्महानदी ।
विख्याता कर्मणा तेन वसिष्ठस्य महात्मनः ।। १३ ।।
पूर्वकालमें विश्वामित्रके ही भयसे अपने शरीरको रस्सीसे बाँधकर श्रीमान् वसिष्ठजी अपने-आपको एक नदीके जलमें डुबो रहे थे; परंतु उस नदीके द्वारा पाशरहित (बन्धनमुक्त) हो पुनः ऊपर उठ आये। महात्मा वसिष्ठके उस महान् कर्मसे विख्यात हो वह पवित्र नदी उसी दिनसे 'विपाशा' कहलाने लगी ।। १२-१३ ।।
वाग्भिश्च भगवान् येन देवसेनाग्रगः प्रभुः ।
स्तुतः प्रीतमनाश्चासीच्छापाच्चैनममुञ्चत ।। १४ ।।
वाणीद्वारा स्तुति करनेपर उन विश्वामित्रपर सामर्थ्य शाली भगवान् इन्द्र प्रसन्न हो गये थे और उनको शापमुक्त कर दिया था ।। १४ ।।
ध्रुवस्यौत्तानपादस्य ब्रह्मर्षीणां तथैव च ।

मध्यं ज्वलति यो नित्यमुदीचीमाश्रितो दिशम् ।। १५ ।।
तस्यैतानि च कर्माणि तथान्यानि च कौरव ।
क्षत्रियस्येत्यतो जातमिदं कौतूहलं मम ।। १६ ।।
जो विश्वामित्र उत्तानपादके पुत्र ध्रुव तथा ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों)-के बीचमें उत्तर दिशाके आकाशका आश्रय ले तारारूपसे सदा प्रकाशित होते रहते हैं, वे क्षत्रिय ही रहे हैं। कुरुनन्दन! उनके ये तथा और भी बहुत-से अद्भुत कर्म हैं, उन्हें याद करके मेरे हृदयमें यह जाननेका कौतूहल उत्पन्न हुआ है कि वे ब्राह्मण कैसे हो गये? ।। १५-१६ ।।

किमेतदिति तत्त्वेन प्रब्रूहि भरतर्षभ ।
देहान्तरमनासाद्य कथं स ब्राह्मणोऽभवत् ।। १७ ।।
भरतश्रेष्ठ! यह क्या बात है? इसे ठीक-ठीक बताइये। विश्वामित्रजी दूसरा शरीर धारण किये बिना ही कैसे ब्राह्मण हो गये? ।। १७ ।।

एतत् तत्त्वेन मे तात सर्वमाख्यातुमर्हसि ।
मतङ्गस्य यथातत्त्वं तथैवैतद् वदस्व मे ।। १८ ।।
तात! यह सब आप यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें। जैसे मतङ्गको तपस्या करनेसे भी ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त हुआ, वैसी ही बात विश्वामित्रके लिये क्यों नहीं हुई? यह मुझे बताइये ।। १८ ।।

स्थाने मतङ्गो ब्राह्मण्यं नालभद् भरतर्षभ ।
चण्डालयोनौ जातो हि कथं ब्राह्मण्यमाप्तवान् ।। १९ ।।
भरतश्रेष्ठ! मतङ्गको जो ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त हुआ, वह उचित ही था; क्योंकि उसका जन्म चाण्डालकी योनिमें हुआ था; परंतु विश्वामित्रने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया? ।। १९ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विश्वामित्रोपाख्याने
तृतीयोऽध्यायः ।। ३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विश्वामित्रका उपाख्यानविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ।। ३ ।।

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चतुर्थोऽध्यायः

आजमीढके वंशका वर्णन तथा विश्वामित्रके जन्मकी कथा और उनके पुत्रोंके नाम

भीष्म उवाच

श्रूयतां पार्थ तत्त्वेन विश्वामित्रो यथा पुरा ।
ब्राह्मणत्वं गतस्तात ब्रह्मर्षित्वं तथैव च ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा— तात! कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें विश्वामित्रजीने जिस प्रकार ब्राह्मणत्व तथा ब्रह्मर्षित्व प्राप्त किया, वह प्रसंग यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ १ ॥

भरतस्यान्वये चैवाजमीढो नाम पार्थिवः ।
बभूव भरतश्रेष्ठ यज्वा धर्मभृतां वरः ॥ २ ॥
भरतवंशमें अजमीढ नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ! वे राजा अजमीढ यज्ञकर्ता एवं धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे ॥ २ ॥

तस्य पुत्रो महानासीज्जह्नुर्नाम नरेश्वरः ।
दुहितृत्वमनुप्राप्ता गङ्गा यस्य महात्मनः ॥ ३ ॥
उनके पुत्र महाराज जह्नु हुए, जिन महात्मा नरेशके समीप जाकर गंगाजी पुत्रीभावको प्राप्त हुई थीं ॥ ३ ॥

तस्यात्मजस्तुल्यगुणः सिन्धुद्वीपो महायशाः ।
सिन्धुद्वीपाच्च राजर्षिर्बलाकाश्वो महाबलः ॥ ४ ॥
जह्नुके पुत्रका नाम सिन्धुद्वीप था, जो पिताके समान ही गुणवान् और महायशस्वी थे। सिन्धुद्वीपसे महाबली राजा बलाकाश्वका जन्म हुआ था ॥ ४ ॥

वल्लभस्तस्य तनयः साक्षाद्धर्म इवापरः ।
कुशिकस्तस्य तनयः सहस्राक्षसमद्युतिः ॥ ५ ॥
बलाकाश्वका पुत्र वल्लभनामसे प्रसिद्ध हुआ, जो साक्षात् दूसरे धर्मके समान था। वल्लभके पुत्र कुशिक हुए, जो इन्द्रके समान तेजस्वी थे ॥ ५ ॥

कुशिकस्यात्मजः श्रीमान् गाधिर्नाम जनेश्वरः ।
अपुत्रः प्रसवेनार्थी वनवासमुपावसत् ॥ ६ ॥
कुशिकके पुत्र महाराज गाधि हुए, जो दीर्घकालतक पुत्रहीन रह गये। तब संतानकी इच्छासे पुण्यकर्म करनेके लिये वे वनमें रहने लगे ॥ ६ ॥

कन्या जज्ञे सुतात् तस्य वने निवसत: सतः ।
नाम्ना सत्यवती नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ ७ ॥

वहाँ रहते समय सोमयाग करनेसे राजाके एक कन्या हुई, जिसका नाम सत्यवती था। भूतलपर कहीं भी उसके रूप और सौन्दर्यकी तुलना नहीं थी ॥ ७ ॥

गीताप्रेस, गोरखपुर

देवाधिदेव भगवान् शङ्कर

गीताप्रेस, गोरखपुर

राजा नृगका गिरगिटकी योनिसे उद्धार

गीताप्रेस, गोरखपुर

शिव-पार्वती

गीताप्रेस, गोरखपुर

अर्जुनका भगवान् श्रीकृष्णके साथ प्रश्नोत्तर

गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा उत्तराके मृत बालकको जिलानेकी प्रतिज्ञा

गीताप्रेस, गोरखपुर

पार्वतीजी भगवान् शङ्करको शरीरधारिणी समस्त नदियोंका परिचय दे रही हैं

गीताप्रेस, गोरखपुर

युधिष्ठिरका अपने आश्रित कुत्तेके लिये त्याग

गीताप्रेस, गोरखपुर

पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु

तां वव्रे भार्गवः श्रीमांश्च्यवनस्यात्मसम्भवः।

ऋचीक इति विख्यातो विपुले तपसि स्थितः ॥ ८ ॥
उन दिनों च्यवनके पुत्र भृगुवंशी श्रीमान् ऋचीक विख्यात तपस्वी थे और बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न रहते थे। उन्होंने राजा गाधिसे उस कन्याको माँगा ॥ ८ ॥
स तां न प्रददौ तस्मै ऋचीकाय महात्मने ।
दरिद्र इति मत्वा वै गाधिः शत्रुनिबर्हणः ॥ ९ ॥
शत्रुसूदन गाधिने महात्मा ऋचीकको दरिद्र समझकर उन्हें अपनी कन्या नहीं दी ॥ ९ ॥
प्रत्याख्याय पुनर्यातमब्रवीद् राजसत्तमः ।
शुल्कं प्रदीयतां मह्यं ततो वत्स्यसि मे सुताम् ॥ १० ॥
उनके इनकार कर देनेपर जब महर्षि लौटने लगे तब नृपश्रेष्ठ गाधिने उनसे कहा—'महर्षे! मुझे शुल्क दीजिये, तब आप मेरी पुत्रीको विवाहद्वारा प्राप्त कर सकेंगे' ॥ १० ॥

ऋचीक उवाच

किं प्रयच्छामि राजेन्द्र तुभ्यं शुल्कमहं नृप ।
दुहितुर्ब्रूह्यसंसक्तो माभूत् तत्र विचारणा ॥ ११ ॥
ऋचीकने पूछा— राजेन्द्र! मैं आपकी पुत्रीके लिये आपको क्या शुल्क दूँ? आप निस्संकोच होकर बताइये। नरेश्वर! इसमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥

गाधिरुवाच

चन्द्ररश्मिप्रकाशानां हयानां वातरंहसाम् ।
एकतः श्यामकर्णानां सहस्रं देहि भार्गव ॥ १२ ॥
गाधिने कहा— भृगुनन्दन! आप मुझे शुल्करूपमें एक हजार ऐसे घोड़े ला दीजिये जो चन्द्रमाके समान कान्तिमान् और वायुके समान वेगवान् हों तथा जिनका एक-एक कान श्याम रंगका हो ॥ १२ ॥

भीष्म उवाच

ततः स भृगुशार्दूलश्च्यवनस्यात्मजः प्रभुः ।
अब्रवीद् वरुणं देवमादित्यं पतिमम्भसाम् ॥ १३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तब भृगुश्रेष्ठ च्यवनपुत्र शक्तिशाली महर्षि ऋचीकने जलके स्वामी अदितिनन्दन वरुणदेवके पास जाकर कहा— ॥ १३ ॥
एकतः श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम् ।
सहस्रं वातवेगानां भिक्षे त्वां देवसत्तम ॥ १४ ॥