मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
८३८ मार्क्सवाद और रामराज्य जाती है। परंतु यदि धर्मनिष्ठा है, तो अपराधी स्वयं अपराध व्यक्त करके शुद्धिके लिये दण्ड माँगता है । भारतमें आज भी गोहत्या आदि होनेपर अपराधी 'मिताक्षरासे' व्यवस्था माँगने स्वयं जाता है । वैसे तो सभीको धर्मात्मा तथा ईश्वरविश्वासी होना चाहिये । विशेषकर अमात्यमण्डल और उससे भी अधिक राजाको वैसा अवश्य होना चाहिये । गुणवान् पुरुष थोड़े होनेसे दुर्लभ होते हैं । अतः जहाँतक हो सके, अधिकार थोड़े ही लोगोंके हाथमें होने चाहिये । इसीलिये राजा और अमात्योंका हर समय बदलते रहना ठीक नहीं, यही राजतन्त्रका अभिप्राय है । युद्ध आदिके समय लोकतन्त्रमें भी एकहीके हाथमें अधिकार देने पड़ते हैं। अधिक लोगोंकी अपेक्षा थोड़े लोगोंको साधु-सज्जन बनानेमें सरलता होती है । यदि वंशपरम्पराका राजा हो, तो वह अपने ऊपर अधिक जिम्मेदारीका अनुभव करता है । अतः यथासम्भव वैसा ही राजा होना चाहिये । यदि वैसा न मिले, तो किसी योग्य व्यक्तिको राष्ट्रपति बनाना चाहिये । शीघ्र बदलते रहनेसे किसी योग्य व्यक्तिको भी अपनी नीति कार्यान्वित करनेका पूरा समय नहीं मिल पाता । इसके अतिरिक्त सामान्य व्यक्तिको थोड़े ही दिनोंमें स्वार्थसिद्धिकी चिन्ता लग जाती है, जिससे प्रजाके कल्याणमें बाधा पड़ती है । अतः यह आवश्यक है कि राजा या राष्ट्रपतिको जीवनपर्यन्त या दीर्घकालके लिये नियुक्त किया जाय । किंतु कर्त्तव्यच्युत होनेपर उसको हटाना आवश्यक है। राजाके स्थानकी पूर्ति उसका योग्य उत्तराधिकारी न होनेपर मन्त्रियोंद्वारा होनी चाहिये । मन्त्रिमण्डलमें किसीकी मृत्यु होने अथवा किसीके हटानेपर शेष मन्त्रियोंके परामर्शसे राजाको नयी नियुक्ति करनी चाहिये । राजा, अमात्य, कोष, सेना और न्याय—ये राज्यके पाँच मुख्य विषय हैं। ग्राम, मण्डल, प्रान्तके भेदसे उत्तरोत्तर अधिक शक्तिशाली अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये । कोषके लिये सर्वत्र कर-संग्रह विभाग रहने चाहिये । रक्षा- विभाग तथा न्यायविभागकी भी उचित व्यवस्था होनी चाहिये । रक्षाके लिये सेना दो प्रकारकी होनी चाहिये—एक वह जो प्रतिदिनकी शान्ति स्थापित रखे अर्थात् पुलिस और दूसरी वह, जो विशेष अवसरपर शत्रुके साथ युद्ध करे । न्यायालय प्रत्येक विभागके लिये पृथक्-पृथक् होना चाहिये । मण्डल और प्रान्तमें बड़े-बड़े न्यायालय और सम्पूर्ण राष्ट्रका एक सर्वोच्च न्यायालय होना चाहिये । अन्तिम न्यायालयमें अमात्यमण्डल तथा राजाको न्याय करनेका अधिकार होना चाहिये । न्यायाध्यक्षके पदपर धर्मात्मा, विद्वान् तथा सदा- चारी व्यक्तियोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये । सम्पूर्ण स्थितिका पूर्ण परिचय रखनेके लिये गुप्तचरविभाग होना चाहिये । उसका कार्य केवल अपराधी या
उपसंहार ८३०
राजाके विरोधियोंका पता लगाना ही नहीं, किंतु लोकसेवी, परोपकारी, सदा- चारी विद्वानों तथा दुखी आर्तोके सम्बन्धमें भी सरकारको सूचित करते रहना चाहिये, जिससे निग्रहानुग्रह आदिमें पूरी सहायता मिल सके । कोषका उपयोग उपर्युक्त विभागोंके सचालन, शस्त्रास्त्रनिर्माण तथा सग्रह, यातायात- साधनोंका निर्माण तथा व्यवस्था और राष्ट्रके स्वास्थ्य तथा शिक्षा आदिमें होना चाहिये प्रचार, यातायात, परराष्ट्रसम्बन्ध एक विभागमे, डाक, तार, शिक्षा, स्वास्थ्य दूसरेसे और उद्योग, खाद्य आदि तीसरे विभागसे सम्बद्ध हों तो अच्छा है । इसी तरह कोष, न्याय एव सेनाकी व्यवस्था होनी चाहिये । आजकल एक सबसे बडा विभाग व्यवस्थापनका अर्थात् कानून बनानेका है, जिसके लिये धारासभाओका निर्वाचन होता है । परन्तु अपने यहाँ तो इसकी आवश्यकता ही नहीं। केवल विशिष्ट विद्वानोंकी एक निर्णेत्री परिषद् होनी चाहिये, जो मनु, याज्ञवल्क्य, वृहस्पति, नारद, अङ्गिरा, पराशर आदिके मतानुसार ठीक-ठीक व्यवस्था दे सके । अहिंदुओके लिये उनके धर्मशास्त्रा- नुसार उनके आचार्योंकी व्यवस्था होनी चाहिये । भारतीय धर्मशास्त्र और राजनीतिके सम्यक् विद्वान् ही व्यवहारमें शास्त्रार्थके अधिकारी होंगे । व्यवहार- निर्णायक न्यायाध्यक्ष स्वधर्मनिष्ठ एवं ईश्वर-विश्वासी होना चाहिये । अमात्य- मण्डलको राजाके आज्ञानुसार सभी कर्मचारियोके नियोजन, पृथक्करण, संशोधन आदिका अधिकार होना चाहिये । गुप्तचरोंके अतिरिक्त विशिष्ट व्यक्तियोंकी एक अन्वेषण-समितिद्वारा जटिल विषयोंकी जानकारी प्राप्त करनेका प्रयत्न होना चाहिये । अमात्यमण्डलके सदस्य और राजा सर्वसाधारणके लिये दुर्दर्श, दुर्लभ न होकर सुदर्श और सुलभ रहे, जिसमें प्रजा उनसे अपनी स्थिति निवेदन कर सके । ऐसे अनेक स्थान होने चाहिये, जहाँ नियतसमयपर अर्थी आकर अमात्यों या राजासे मिल सके । मन्त्री तथा राजाओंको भी गुप्त वेषसे प्रजाकी स्थिति तथा राजकर्मचारियोंका व्यवहार जानना चहिये । इस मार्गसे गुप्त तथा जटिल रहस्योंका भी पता लग सकता है । हिंसा मद्यपान, व्यभिचार, द्यूत आदिपर कडा नियन्त्रण होना चाहिये । प्रत्येक पदपर सच्चे और शुद्ध अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये । पुलिस प्रजाकी सेवक बनकर नम्रतापूर्वक काम करे, पर साथ ही दुष्टदमनार्थ आवश्यक उग्रताका निषेध न होना चाहिये । प्राचीन ढगपर ग्रामपचायतें विधिवत् स्थापित होनी चाहिये । आपसी झगड़े वही तय हुआ करे, जिसमे न्यायालय जानेकी आवश्यकता ही न पड़े । पंचायतोंका काम ठीक होता है या नहीं, इसकी देख-रेखके लिये एक निरीक्षक-विभाग होना चाहिये । क्रय विक्रयके सम्बन्धमें यथासम्भव ऐसा प्रबन्ध होना चाहिये कि अन्नवाले अन्न, तेलवाले तेल, गुड़वाले गुड़ दें । नाई, धोवी आदि अपना काम करें जिसके बदलेमें
८४० मार्क्सवाद और रामराज्य उन्हे अन्न मिले । यथासम्भव नकद क्रय-विक्रयके स्थानपर वस्तु-विनिमय होना चाहिये और जिसका जो परम्पराप्राप्त व्यवसाय है, उसे वही करना चाहिये । इस तरह परस्पर सम्बन्ध स्थापित रखनेमें सुविधा होगी । जहाँतक हो प्रजाको विशुद्ध क्षत्रियवंशका राजा, विद्वान् ब्राह्मण पुरोहित तथा महामात्य बनाना चाहिये । न्यायाध्यक्ष तथा अध्यापकके पदपर भी ब्राह्मणोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये । सेनापतिके पदपर पवित्र वीर क्षत्रिय तथा सैनिक भी अधिक- तर कुलीन क्षत्रिय ही होने चाहिये । कोषाध्यक्ष वैश्य तथा सेवाध्यक्ष शूद्र होने चाहिये । चर्मके व्यापारो तथा यन्त्रोंके अध्यक्ष चर्मकार होने चाहिये । शुचिता (सफाई) विभागका अध्यक्ष अन्त्यज होना चाहिये । इसी तरह प्रायः सभी यन्त्र, शिल्प, कल-कारखाने आदिपर शूद्रोंका ही प्राधान्य रहना चाहिये । सर्वसाधारणके व्यवहारमें आनेवाली राष्ट्रकी भाषा हिंदी होनी चाहिये । पर विशिष्ट विवरणोंमें संस्कृतका प्रयोग आवश्यक है । राजाको उदार, सौम्य, धार्मिक, निर्व्यसन, विद्वान्, शुद्ध तथा रहस्यज्ञ होना चाहिये । उसे वेदान्त, न्याय तथा दण्डनीतिका विद्वान् और अपने दोषोंका ज्ञाता होना चाहिये । कोई काम करनेके पहले उसपर उसे स्वयं तथा मन्त्रियोंके साथ एकान्तमें अच्छी तरह विचार करना चाहिये । किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्यमें शुभ मुहूर्त्त, नीति और आथर्वणिक प्रयोगोंका उपयोग किया जा सकता है। अच्छा तो यह है कि राजा योग्य व्यक्तियोंद्वारा श्रौत-स्मार्त्त- कर्मोंका अनुष्ठान करता रहे। राजाका कर्त्तव्य है कि वह अप्राप्त धन, भूमि आदि वस्तु धर्ममार्गसे प्राप्त करे, प्राप्तकी रक्षा करे तथा उन्हे बढाये और फिर उन्हे पात्रोमे प्रदान भी करे । दत्त वस्तुओंका आगामी राजाओंद्वारा भी पालन होता रहे, इसलिये दानपत्र आदिका उचित उल्लेख होना चाहिये । राज- धानी ऐसे प्रदेशमें होनी चाहिये जो रम्य हो और जहाँ मनुष्योंके लिये अन्न तथा पशुओके लिये चारा पर्याप्त मिल सके । वहाँ विस्तृत दुर्ग (किला) बनवाना चाहिये, जिसमें जन, धनकी पूर्ण रक्षा हो सके । राजाको चाहिये कि वह विद्वान् ब्राह्मणोंके प्रति क्षमाशील, शत्रुओंके प्रति क्रोधयुक्त और भृत्यवर्ग तथा प्रजाओके प्रति पिताके समान हो । प्रजाके पुण्यका छठा भाग राजाको मिलता है, अतः न्यायसे प्रजाका पालन ही राजाके लिये सबसे बड़ा धर्म और दान है । अन्यायियोंसे ठीक रक्षा न कर सकनेके कारण प्रजाके पापोंका आधा भाग राजाको मिलता है, अतः उसे सदा सावधान रहना चाहिये । राजनीतिके अयोग्यौँ, नास्तिकोंके हाथमें जाते ही विद्वानोंके भी मुँह बंद हो जाते हैं । शुक्राचार्यके पुत्र षण्डामर्क-जैसे योग्य विद्वान् भी हिरण्यकशिपु-जैसोंको ही ईश्वर बतलाने लगते हैं । वे किसी अयोग्य शासकको भी 'त्वमर्कस्त्वं सोमः' (शिवमहिम्न०) कहने लगते हैं । शासकोसे भयभीत विद्वान् स्पष्ट सत्य कहनेमे हिचकने लगते हैं ।
आचार्य, साधु-संत भी या तो चुप साध लेते हैं, या सरकारी साधुसमाजमें प्रविष्ट होकर ईश्वर गुणगानके बदले सरकारका गुणगान करने लगते हैं । गोहत्या, धर्म- हत्या, शास्त्रहत्या जैसे जघन्य कृत्योंको होते देखकर भी वे मौन रह जाते हैं और इन सबके प्रवर्तक, प्रेरक सरकारका गुणगान करते हैं। रावणकी मायासे बने अनेकों हनुमान् देखकर जैसे बन्दर भ्रममें पड़ गये कि इनमेंसे कौन रामके हनुमान् हैं, कौन रावणके हनुमान्, उसी तरह जनता भी भ्रममें पड़ जाती है कि कौन रामके साधुसंत हैं और कौन सरकारी साधुसंत ? शास्त्र एवं धर्मके नियन्त्रण शून्य उच्छृङ्खल शासक जनताके धर्मके साथ धनका भी अपहरण कर लेते हैं। राष्ट्रिय- करण, समाजीकरण आदि नामोंसे जनताकी व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदि छीन लेते हैं। जनताके व्यक्ति शासनयन्त्रके नगण्य पुर्जे बन जाते हैं। शासन- यन्त्र तानाशाह शासकोंके हाथका खिलौना बन जाता है। उच्छृङ्खल शासकोंकी इच्छा ही कानून-कायदा बन जाती है। सनातन सत्य, न्याय, विवेक, शास्त्र-मन्त्र लुप्त हो जाते हैं। धनहीन होनेके कारण जनतामे ऐसे शासनके विरोधकी भी शक्ति नहीं रह जाती। आजके सरकारी साधुसमाजका यह प्रस्ताव कि 'साधुसमाज गोहत्या- बन्दी आन्दोलनका समर्थन नहीं कर सकता, क्योंकि वह ऐसे अपराधी साधुओं द्वारा चलाया गया है जिनसे साधु-समाजकी सत्ताको बहुत ठेस पहुँची है' आँख खोल देनेवाला है। विश्वनाथमन्दिर-हरिजनप्रवेश, हिन्दू-विवाह, तलाक आदि प्रश्नोंपर सरकारी साधुओं एवं सरकारी पण्डितोंका चुप रहना भी एक विचित्र बात है। आचार्य कहे जानेवाले लोगोंकी भीषण निद्रा या जान-बूझकर आँख मीचनेकी बात भी इसी ओर संकेत करती है कि राजनीतिके विप्लुत होनेके बाद सब विद्याएँ व्यर्थ हो जाती हैं।
राजनीतिमें किसका अधिकार
कई लोग कहते हैं कि विद्वानों, महात्माओंको राजनीतिमें नहीं पड़ना चाहिये, परंतु राजनीतिका विद्वान् होना चाहिये । वे समारोहके साथ सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं कि राजनीतिका विद्वान् होना ही विद्वान्का अन्तिम कृत्य है, पर प्रत्यक्ष राजनीतिमें भाग लेना नहीं। वे समर्थ रामदास और चाणक्यकी प्रशंसा करते हुए भी उनके कर्तृत्वको दुर्लक्ष्य करते हैं। वे लोग 'मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायाम्' (म० शां० ६३ । २८) का भी यही अर्थ करते हैं कि 'राजनीतिके जाने बिना त्रयी डूब जाती है'। पर 'दण्डनीति' का 'दण्डनीतिज्ञान' अर्थ करना असङ्गत है। वे इस बातपर ध्यान नहीं देते कि ब्रह्मज्ञानसे भिन्न सभी ज्ञान पराङ्ग ही होते हैं, स्वतन्त्र नहीं । भट्टपादकुमारिलका स्पष्ट कहना है कि 'सर्वमेव हि विज्ञानं संस्कारत्वेन गम्यते। पराङ्गं चात्मविज्ञानादन्यमित्यवधार्यताम्॥' (त प्रवार्तिक) पीछे कहा गया है कि सक्रिय विद्वानोंसे ही राजाको आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एव दण्डनीतिका विचार करना चाहिये— 'तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेत' का० नी० २ । २) ब्रह्मात्मविज्ञान तो स्वसत्तामात्रसे अविद्या, तत्कार्यका निवर्तक होनेसे पुरुषार्थरूप है । ऐसे कतिपय स्थलोंको छोड़कर अन्यत्र सर्वत्र ही ज्ञान कर्तव्यके
बिना सफल नहीं होता। 'जानाति इच्छति अथ करोति' यह क्रम प्रसिद्ध है। जाननेसे इच्छा होती है, इच्छासे क्रिया होती है। 'यः क्रियावान् स पण्डितः' (सुभा० भं०) की कहावत प्रसिद्ध ही है। प्रयोगहीन शिल्पविज्ञान एवं शस्त्रादि- विज्ञानके तुल्य प्रयोगहीन राजनीति-विज्ञान भी व्यर्थ ही रहता है। क्रियाहीन तर्क-वितर्क एवं ज्ञान-विज्ञान, बुद्धि-व्यायाममात्र ही रह जाता है। रावणके समयमें ज्ञान-विज्ञानवाले ऋषियोंकी कमी न थी। फिर भी ऋषियोंका वध चालू था। रक्तघटका उपहार देनेपर भी रावणको संतोष नहीं हुआ था। ऋषियोंकी अस्थियोंका पहाड़ लग गया था। अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछा मुनिन्ह लागि अति दाया॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥ (रामचरितमानस अरण्यकाण्ड) उस समय विश्वामित्रकी सक्रिय राजनीति ही सफल हुई। उसीके द्वारा राम मैदानमें आये और दुष्टोंका दर्प-दलन करके त्रयी-धर्मकी रक्षा एवं साधु- सत्पुरुषोंका पोषण किया। हाँ, जहाँ राजनीतिके योग्य प्रयोक्ता एवं प्रयोग-साधन ठीक उपलब्ध हों, वहाँ विद्वान् केवल उपदेशमात्र कर सकता है, परंतु जहाँ प्रयोक्ता, प्रयोग-साधन नहीं, वहाँ उनका अन्वेषण एवं निर्माण भी विद्वान्का ही काम है। राजाके अभावमें यह सब उत्तरदायित्व विद्वान्पर ही आता है। 'चाणक्य' ने यही सब किया था, समर्थ रामदासने भी यही किया। शुक्र, बृहस्पति आदि भी अनेक ढंगसे सक्रिय राजनीतिका प्रवर्तन करते थे। हाँ, विद्वान् राज्याधिकारके प्रलोभनमें न पड़े, यह अवश्य ठीक है। अतः ठीक राजनीति बिना त्रयी एव तत्प्रोक्त धर्म संकटग्रस्त हो जाता है। प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून्। ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ (मनुस्मृ० ९।३२७) प्रजापतिने सृष्टि रचकर वैश्योंको पशु दिया, ब्राह्मण एवं राजाको सारी प्रजा दी। अतः राजाके अभावमें विद्वानोंपर सर्वाधिक भार आ जाता है। विद्वान्, आस्तिक, सद्गृहस्थ एवं साधु-सत्पुरुषोंके बिना राजनीति सर्वथा उच्छृङ्खल लोगोंके हाथमें चली जाती है, फिर तो गुण्डागर्दीका ही शासन होने लगता है। अतः धार्मिक लोगोंके प्रवेशसे ही समस्या हल हो सकती है। यह ठीक है कि 'सच्छिक्षा एवं सद्विद्याके प्रचारसे सद्बुद्धि होती है, सद्बुद्धिसे सदिच्छा एवं सदिच्छासे सत्प्रयत्न होता है और सत्प्रयत्न ही सब प्रकारके सत्फलोंका स्रोत होता है। परंतु आज तो शिक्षा भी स्वतन्त्र विद्वानोंके हाथमें नहीं है। जिस विचारके शासक हैं, उसी विचारका समर्थन करनेवाली आजकी शिक्षा बनती जा रही है। स्वतन्त्र विद्वान्, स्वतन्त्र विद्यालय एवं उनके छात्र भी सरकारी-शिक्षाके प्रभावसे स्पष्ट ही प्रभावित हैं। कथावाचक, मण्डलेश्वर आदि भी उसी ढंगकी कथा कहनेमें लाभका अनुभव करते हैं। घोर नास्तिक उच्छृङ्खल मिनिस्टरों, सरकारी पदाधिका-
रियोंकी भी विद्वान्, महन्त, मण्डलेश्वर प्रशंसा करते फिरते हैं। इस दृष्टिसे नास्तिकोंके हाथसे राजनीतिका उद्धार करना योग्य धार्मिक, सुशील लोगोंके हाथमें राजनीति लानेके लिये विद्वान्का प्रयत्न अत्यावश्यक है ही। महाभारतका स्पष्ट वचन है— क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात् प्रवृत्त पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्माः ॥ (महा० शां० ६४ । १०१) परमेश्वरसे सर्वप्रथम राजधर्मका ही आविर्भाव हुआ। उसके पीछे राजधर्मके अङ्गभूत अन्य धर्मोंका प्रादुर्भाव हुआ । अतः राजधर्म—राजनीतिके नष्ट होनेपर त्रयीधर्मके डूब जानेकी बात आती है । अराजकता या उच्छृङ्खल राजाके धर्महीन अधार्मिक राज्यमें कोई धर्म पनप ही नहीं सकता । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वके लौकिक-पारलौकिक, अभ्युदय एव निःश्रेयसके सम्पादन- में होनेवाले सब प्रकारके विघ्नोंको रोककर सब प्रकारकी सुविधा उपस्थित करना भारतीय राजधर्म, राजनीति या क्षात्र-धर्मका मूलमन्त्र है । भले ही कभी राजनीति राजाओ, राजमन्त्रियों एव राजकीय पुरुषोंतक ही सीमित रहे, उसमें सर्वसाधारणका प्रवेश आवश्यक भी ठहरे, तब भी विशिष्ट विद्वानोंके लिये तो कभी भी राजनीति उपेक्ष्य नहीं रही है । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वको लौकिक पारलौकिक विनाशसे बचाना, उनको अभ्युदय, निःश्रेयस- प्राप्तिसे वञ्चित होनेसे बचाना क्षात्र या राजाका धर्म है । वही क्षात्रधर्म है, वही राजनीति है। इसीलिये राजाकी प्रशंसा है— 'नराणां च नराधिपम्' (गी० १०।२७) 'नाविष्णुः पृथिवीपतिः।' (दे० भा०) 'महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ।' (मनु० ७।८) 'राजा ईश्वररूप है, नरोंमें नराधिप ईश्वरीय विभूति है, विष्णुके अतिरिक्त पृथिवीपति नहीं हो सकता, वह कोई मनुष्यरूपमे विशेष दिव्य शक्ति है इत्यादि'। उस प्रकारके राजधर्मका पालन श्रुताध्ययनसम्पन्न धर्मज्ञ, सत्यवादी, रागद्वेषविहीन, विद्वानोंकी सहायता विना राजा भी नहीं कर सकता। इसीलिये राजाके लिये आवश्यक है कि वह ऐसे विद्वानोंको अपना सभासद् बनाये-- श्रुताध्ययनसम्पन्ना धर्मज्ञाः सत्यवादिन । राज्ञा सभासदः कार्या रिपौ मित्रे च ये समाः ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति २ । २) शासनाारूढ शासककी भूल या प्रमादको रोकनेके लिये परम निरपेक्ष विरक्त विद्वान् भी लोककल्याण-कामनासे राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे । इतना ही नहीं, कभी-कभी तो वेन-जैसे अन्यायी राजाको, जो समझाने-बुझानेसे भी न माने, शासनाधिकारसे च्युत या नष्ट भी कर देते थे एव उनके स्थानमें पृथु-जैसे योग्य शासकको प्रतिष्ठित करते थे। यह भी लोक-कल्याणार्थ विद्वानोंके राजनीतिमें हस्तक्षेपका उदाहरण है। 'इतिहास' बतलाता है कि हमारे प्रमुख राजनीतिज्ञ
शासकोंने अपनी राजनीतिका बागडोर तपःपूत, लोक-हितैषी, राग-द्वेषविहीन ऋषियोंके ही हाथमें दे रक्खा था। देवराज इन्द्रकी राजनीति देवगुरु बृहस्पतिके हाथमें थी, दैत्यराज बलिकी राजनीति महर्षि शुक्राचार्यके हाथमें थी तथा रामचन्द्र- की राजनीति वसिष्ठके हाथमें थी। धर्मराज युधिष्ठिरकी राजनीति धौम्य, व्यास, कृष्ण, विदुर आदिके हाथमें थी। चन्द्रगुप्तकी राजनीति महर्षि चाणक्यके हाथमें थी तथा शिवाकी राजनीति भी समर्थ रामदासके हाथमें थी। वस्तुतः जैसे बिना अङ्कुशके हस्ती, बिना लगामके घोडा आदि हानिकारक होते हैं, वैसे ही अङ्कुश एवं नियन्त्रणके बिना शासन भी हानिकारक होता है। राज्यश्रीसम्पन्न राजापर भी अङ्कुश होना ही चाहिये। इसी अर्थमें राजापर धर्मका नियन्त्रण होना चाहिये। यही बृहदारण्यक 'क्षत्रस्य क्षत्रम्' (१।४।१४) के अनुसार धर्मनियन्त्रित राजतन्त्रका सिद्धान्त है। धर्म- कर्म, संस्कृति, धर्मसंस्थाकी रक्षा तभी हो सकती है, जब धर्म-नियन्त्रित शासक हो। अन्यथा उच्छृङ्खल शासक सबको ही चौपट कर देता है।
सत्पुरुषोंसे एक निवेदन
कुछ लोग कहते हैं कि उपासना या ज्ञान तो मनकी चीज है। सब कुछ गड़बड़ होनेपर भी महात्मा या विद्वान्को इन टंटोंसे दूर रहकर भजन ही करना चाहिये। ठीक है, परन्तु शास्त्र एवं धर्म-स्थान नष्ट हो जानेपर विद्वानो या महात्माओंका षण्डामर्कके तुल्य सरकारीकरण हो जानेपर भजन करनेका, धार्मिक होनेका मन भी कैसे बन सकेगा ? आखिर धार्मिक, आध्यात्मिक भावनाओंसे ओत- प्रोत मन भी तो शास्त्रों एवं सत्पुरुषोंकी कृपासे ही बनता है, बिना शास्त्रादिके वैसा मन भी नही बन सकता है। यदि प्रह्लादने भी यही सोचा होता कि चलो पितासे विवाद कौन करे ? मनमें ही रामनाम जपते रहेंगे, ऊपरसे पिताकी ही बात मान ले तो आज कोई राम-नाम लेनेवाला रह सकता था ? परंतु जब सच्चाईके साथ प्रह्लादने अपने जीवनको संकटमे डालकर भी सिद्धान्तकी रक्षा की, तभी संसारमें सिद्धान्तकी स्थिरता रह सकी है। इस तरह विद्वान् एवं महात्मा राजतन्त्र शासन- मे भी राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे, फिर अब तो जनतन्त्र-शासन है। इस सिद्धान्त- के अनुसार तो शासनकी सर्वोच्चसत्ता जनतामें ही निहित होती है। अतः वास्तविक राजा जनता ही होती है, अतः राजनीतिक दक्षता सम्पादन करना प्रत्येक व्यक्तिका परम कर्तव्य है, फिर तो जनताके धन एवं धर्मकी रक्षाका उत्तरदायित्व जनतापर ही होता है। इसलिये जनताके प्रत्येक व्यक्तिका कर्तव्य होता है कि वह उदारता, गम्भीरता और दक्षताके साथ राष्ट्र एवं धर्मका हिताहित देखकर कर्तव्यका निर्धारण एवं पालन करे। जहाँ न राजतन्त्र हो, न जनतन्त्र हो; किंतु अधिनायकतन्त्र डिक- टेटरशिप हो, वहाँपर तो विशिष्ट दक्ष राजनीतिज्ञ विद्वानो एव महात्माओके सिवा दूसरा कोई कुछ कर ही नहीं सकता है। जनताका संग्रह, उसे प्रोत्साहन देना एवं क्रान्तिके लिये उसे तैयार करना भी राजनीतिज्ञोके ही वशकी बात है। ऐसे समयमें धर्म एवं धर्मशास्त्रोंकी रक्षाके लिये विद्वानोंको सामने आना पड़ता है। इसी अभिप्रायसे कहा गया है कि—
उपसंहार ८३५ स्थापयध्वमिमं मार्गं प्रयत्नेनापि हे द्विजाः । स्थापिते वैदिके मार्गे सकलं सुस्थिरं भवेत् ॥ (सूतसंहिता, ज्ञानयोगख० २० । ५४) विद्वानोंको वैदिक धर्मकी स्थापनाके लिये सुदृढ प्रयत्न करना चाहिये । वैदिक-धर्मके स्थिर होनेपर सब कुछ स्थिर हो जायगा । यही यह भी कहा गया है कि जो समर्थ होनेपर भी सर्व प्रकारसे धर्मरक्षार्थ प्रयत्नशील नहीं होता, वह पापका भागी होता है । माता-पिताकी, गुरुजनोंकी या जनसमूहके धन धर्म एवं प्राणोंका विनाश हो रहा हो, कोई समर्थ पुरुष बैठे-बैठे तमाशा देखे, कुछ प्रयत्न न करे, यह प्रत्यक्ष ही पाप है— यश्च स्थापयितुं शक्तो नैव कुर्याद् विमोहितः । तस्य हन्ता न पापीयानिति वेदान्तनिर्णयः ॥ (सूतसंहिता, २ । २० । ५५) किंतु जो समर्थ न होनेपर भी यथाशक्ति धर्मशास्त्र मर्यादाकी रक्षाके लिये प्रयत्न करता है, वह उसी पुण्यके प्रभावसे सब पापोंसे मुक्त होकर सम्यक् ज्ञानका भागी होता है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि यम कहे जाते हैं । यह निवृत्तिमार्गानुसारियोंके लिये बड़े ही महत्त्वके हैं । शौच, संतोष, स्वाध्याय आदिमें कुछ गड़बड़ी क्षम्य भी हो सकती है, परंतु यमके सेवनमें तो पूर्ण तत्परता होनी चाहिये । इसीलिये कहा गया है—'यमान् सेवेत सततं नियमान् मत्परः क्वचित्' (श्रीमद्भा०) यमोंका सेवन सर्वदा ही करना चाहिये। नियमोंमें सातत्य न होनेपर भी काम चल सकता है। अहिंसा आदिका अभिप्राय है—मनसा, वाचा, कर्मणा, प्राणिरक्षण करना, प्राणियोंको पीड़ा न पहुँचाना। यही लोकरक्षण, प्राणिरक्षण, धर्मरक्षण राजनीतिका मुख्य लक्ष्य है, यही क्षत-त्राण है। इसी कारण महात्माओंकी इन कार्योंमें प्रवृत्ति होती थी । कालकवृक्षीय-जैसे अरण्यवासी, चाणक्य-जैसे बालब्रह्मचारी, समर्थ स्वामी-जैसे निवृत्तिनिष्ठ लोग भी उस काममें संलग्न हुए । फिर भले ही इस काममें सफलता मिले अथवा न मिले, समुचित प्रयत्न कभी निष्फल नहीं होता । उसका अदृष्ट फल तो अवश्य ही प्राप्त हो जाता है, तभी तो भगवान् कृष्णने कहा था— यः स्थापयितुमुद्युक्तः श्रद्धयैवाक्षमोऽपि सन् । सर्वपापविनिर्मुक्तः सम्यग् ज्ञानमवाप्नुयात् ॥ धर्मकार्यं यतञ्छक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानवः । प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र मे नास्ति संशयः ॥ (महा० उद्यो० ७३ । ३) इन सब बातोंसे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान दुस्समयपर जब कि जनताके धन धर्मपर संकट उपस्थित है, विशिष्ट विद्वानों, महात्माओं तथा धार्मिक सद्गृहस्थोंको भी राजनीतिसे न डरकर आगे आना चाहिये और धर्म-रक्षणके लिये जो भी आवश्यक कार्य हो करना चाहिये । परिणाम निश्चयेन शुभ ही होगा । शिवमस्तु सर्वजगतः । शम् ॥
श्रीहरिः श्रीहरिकृष्णदासजी गोयन्दकाद्वारा अनुवादित संस्कृत पुस्तकें १-श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य-[ हिंदी-अनुवादसहित ] इसमें मूल श्लोक, भाष्य, हिंदीमें भाष्यार्थ, टिप्पणी तथा अन्तमें शब्दानुक्रमणिका भी दी गयी है। साइज २२x२९ आठपेजी, पृष्ठ ५२०, तिरंगे चित्र ३, मूल्य २.७५ २-श्रीमद्भगवद्गीता रामानुजभाष्य-[ हिंदी-अनुवादसहित ] आकार डिमाई आठपेजी, पृष्ठ-संख्या ६०८, तीन बहुरंगे चित्र, कपड़ेकी जिल्द, मूल्य .. २.५० इसमें भी शांकरभाष्यकी तरह ही श्लोक, श्लोकार्थ, मूल भाष्य तथा उसके सामने ही हिंदी अर्थ दिया है। कई जगह टिप्पणी भी दी गयी है। ३-वेदान्त-दर्शन-[ हिंदी-व्याख्यासहित ] इसमे ब्रह्मसूत्रका सरल भाषामें अनुवाद तथा व्याख्या दी गयी है। साइज डिमाई आठपेजी, पृष्ठ ४१६, तिरंगा चित्र, सजिल्द मूल्य २.०० ४-पातञ्जलयोगदर्शन-[ हिंदी-व्याख्यासहित ] इसमें महर्षि पतञ्जलिकृत योगदर्शन सम्पूर्ण मूल, उसका शब्दार्थ एवं प्रत्येक सूत्रका दूसरे सूत्रसे सम्बन्ध दिखाते हुए उन सूत्रों- की सरल भाषामें व्याख्या की गयी है। अकारादि-क्रमसे सूत्रोंकी वर्णानुक्रमणिका भी दी गयी है। आकार २०x३०-१६ पेजी, पृष्ठ १९२, मूल्य .७५ पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर) सूचीपत्र मुफ्त मँगवाइये।
श्रीहरिः गीताप्रेस, गोरखपुरकी गीताएँ श्रीमद्भगवद्गीता-तत्त्वविवेचनी—'कल्याण' के 'गीता-तत्त्वाङ्क' में प्रकाशित गीता विषयक २५१५ प्रश्न और उनके उत्तरके रूपमें विवेचनात्मक ढंगकी हिंदी-टीकाका संशोधित संस्करण, टीकाकार—श्रीजयदयालजी गोयन्दका, पृष्ठ ६८४, रंगीन चित्र ४, मूल्य ४.०० श्रीमद्भगवद्गीता-[ श्रीशांकरभाष्यका सरल हिंदी-अनुवाद ] इसमें मूल भाष्य तथा भाष्यके सामने ही अर्थ लिखकर पढ़ने और समझनेमे सुगमता कर दी गयी है । पृष्ठ ५२०, चित्र ३, मूल्य .. २.७५ श्रीमद्भगवद्गीता-[ श्रीरामानुजभाष्यका सरल हिंदी अनुवाद ] आकार डिमाई आठपेजी, पृष्ठ ६०८, तीन तिरंगे चित्र, सजिल्द मूल्य २.७० श्रीमद्भगवद्गीता-मूल, पदच्छेद, अन्वय, साधारण भाषाटीका, टिप्पणी, प्रधान और सूक्ष्म विषय एवं 'त्यागसे भगवत्प्राप्ति' लेखसहित, मोटा टाइप, कपड़ेकी जिल्द, पृष्ठ ५७२, रंगीन चित्र ४, मूल्य १.२५ श्रीमद्भगवद्गीता-[ मझली ] प्रायः सभी विषय १।) वाली नं० ४ के समान, विशेषता यह है कि श्लोकोंके सिरेपर भावार्थ छुपा हुआ है, साइज और टाइप कुछ छोटे, पृष्ठ ४६८, रंगीन चित्र ४, मूल्य .. .७० श्रीमद्भगवद्गीता-प्रत्येक अध्यायके माहात्म्यसहित, सटीक, मोटे अक्षरोंमें, लाहौरी ढंगकी, तिरंगा चित्र, पृष्ठ ४२४, मूल्य .. .८७ श्रीमद्भगवद्गीता-श्लोक, साधारण भाषाटीका, टिप्पणी, प्रधान विषय, मोटा टाइप, पृष्ठ २१६, मूल्य .. .५० श्रीमद्भगवद्गीता-मूल, मोटे अक्षरवाली, सचित्र, पृष्ठ २१६, मूल्य अजिल्द .३१ श्रीमद्भगवद्गीता-केवल भाषा, अक्षर मोटे हैं, १ चित्र, पृष्ठ १९२, मूल्य .२५ श्रीमद्भगवद्गीता-पञ्चरत्न, मूल, सचित्र, मोटे टाइप, गुटका साइज, पृष्ठ १८४, मूल्य .२० श्रीमद्भगवद्गीता-साधारण भाषाटीका, पाकेट साइज, सचित्र, पृष्ठ ३५२, मूल्य .१६ श्रीमद्भगवद्गीता-मूल, तावीजी साइज २×२।। इंच, पृष्ठ २९६, सजिल्द मूल्य .६२ श्रीमद्भगवद्गीता-विष्णुसहस्रनामसहित, पृष्ठ १२८, सचित्र, मूल्य .. पता—गीताप्रेस, गो० गीताप्रेस ( गोरखपुर )
संस्कृतकी कुछ मूल तथा सानुवाद पुस्तकें श्रीमद्भगवद्गीता-तत्त्वविवेचनी-पृष्ठ ६८४, चित्र ४, सजिल्द, मूल्य ˙ ˙ ˙ ४.०० श्रीमद्भगवद्गीता [बड़ी]-पृष्ठ ५७२, चित्र ४ सजिल्द, मूल्य ˙ १.२५ ईशावास्योपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ ५२, मूल्य .२० केनोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १४२, मूल्य ˙ ˙ .५० कठोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १७८, मूल्य ˙ ˙ .५६ प्रश्नोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १२८, मूल्य ˙ .४५ मुण्डकोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १२२, मूल्य .४५ माण्डूक्योपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ २८४, मूल्य १.०० ऐतरेयोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, पृष्ठ १०४, मूल्य ˙ .३७ तैत्तिरीयोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ २५२, मूल्य .८१ श्वेताश्वतरोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ २६८, मूल्य .८७ ईशावास्योपनिषद्-अन्वय तथा सरल हिंदी-व्याख्यासहित, पृष्ठ १६, मूल्य .०६ श्रीमद्भागवतमहापुराण-दो खण्डोमे, सटीक, पृष्ठ २०३२, चित्र रंगीन २६, १५.०० श्रीमद्भागवतमहापुराण-मूल मोटा टाइप, पृष्ठ ६९२, चित्र १, सजिल्द मू० ६.०० श्रीमद्भागवतमहापुराण-मूल, गुटका, सजिल्द, पृष्ठ ७६८, सचित्र, मूल्य ३.०० श्रीविष्णुपुराण-सानुवाद, पृष्ठ ६२४, चित्र ८, सजिल्द, मूल्य ४.०० अध्यात्मरामायण-सानुवाद, पृष्ठ ४००, सचित्र, कपड़ेकी जिल्द, मूल्य ३.०० पातञ्जलयोगदर्शन-मूल, पृष्ठ २०, मूल्य ˙ ˙ ˙ ˙ .०२ श्रीदुर्गासप्तशती-सानुवाद, पृष्ठ २४०, सचित्र, मूल्य .७५ श्रीदुर्गासप्तशती-मूल, पृष्ठ १५२, सचित्र, मूल्य ˙ .५० लघुसिद्धान्तकौमुदी-(संस्कृतके विद्यार्थियोंके लिये) पृष्ठ ३६८, मूल्य .७५ सूक्ति-सुधाकर-सुन्दर श्लोक-संग्रह, सानुवाद, पृष्ठ २६६, मूल्य ˙ ˙ ˙ .६२ स्तोत्ररत्नावली-चुने हुए स्तोत्र, सानुवाद, सचित्र, पृष्ठ ३२०, मूल्य ˙ ˙ ˙ .५० प्रेमदर्शन-नारद-भक्ति-सूत्रोकी विस्तृत टीका, सचित्र, पृष्ठ १९२, मूल्य .३१ विवेक-चूडामणि-सानुवाद, सचित्र, पृष्ठ १८४, मूल्य ˙ ˙ .३१ अपरोक्षानुभूति-शङ्करस्वामिकृत सानुवाद, पृष्ठ ४०, सचित्र, मूल्य ˙ ˙ ˙ .१६ मनुस्मृति-द्वितीय अध्याय, सार्थ, .१० | संध्या-विधिसहित, पृष्ठ १६, मूल्य .०३ श्रीविष्णुसहस्रनाम-सटीक .१० | शारीरकमीमांसादर्शन-मूल, .०५ श्रीविष्णुसहस्रनाम-मूल, पृष्ठ ४८, .०५ | श्रीरामगीता-सटीक, पृष्ठ ४०, .०५ शाण्डिल्यभक्तिसूत्र-सटीक, .१० | प्रश्नोत्तरी-सटीक, पृष्ठ ३२, .०३ मूलरामायण-सानुवाद, पृष्ठ २४ .०८ | नारद-भक्ति-सूत्र-सटीक, पृष्ठ २४, .०२ गोविन्द-दामोदर-स्तोत्र-सटीक, .०६ | सहस्रश्लोकी गीता-सटीक ०१ संध्योपासनविधि-अर्थसहित, .०६ | पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)
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२९६ मार्क्सवाद और रामराज्य कुटुम्बमें विघटन, वैमनस्यसे नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक सभी प्रकारका पतन और पातक हो सकता है । पर उपर्युक्त लोगोंसे झगड़ा टालनेमें ये विषय उपस्थित ही नहीं होते । अतः समाजके संघटन, धारण-पोषणमें कोई बाधा नहीं पड़ती । धर्मके ही सम्बन्धसे बालक, बूढे, दुर्बल, रोगियोंके आग्रहो, बातों और चिडचिडापनको सहना पड़ता है, जो भौतिक और स्वार्थ-दृष्टिके संघटन- में असम्भव है । ज्येष्ठ भ्राताको पिताके समान और भार्या तथा पुत्रको अपना शरीर समझकर उनसे विवाद बचाना चाहिये । दासवर्गको अपनी छायामें और कन्याको परम दयाका पात्र जानकर उन सबका सहन करना चाहिये । भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः ॥ छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम् । तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेतासंज्वरः सदा ॥ (मनु० ४ । १८५) वास्तवमें इस तरह जो अपने सहवासियोंद्वारा अपनी निन्दा सह लेगा, वही व्यापक संघटनका अधिकारी होगा । किसी भी समाज या राष्ट्रको वशमें लानेके लिये बड़ी सहिष्णुता तथा स्वार्थ त्यागकी अपेक्षा है । अपने कुटुम्बको कुटुम्ब बनानेके बाद ही प्राणी वसुधाको कुटुम्ब बना सकता है । जिसका अपने कुटुम्बमें ही सहयोग नहीं, जो अपने कुटुम्बके ही अधिक्षेपोको नहीं सह सकता, वह दूसरोंके अधिक्षेपोको कैसे सहेगा और कैसे उनके लिये स्वार्थ त्याग करेगा ? अधिक क्या ? दैहिक संघटन भी कम चमत्कारपूर्ण नहीं है । हस्त, पाद, मुख, नेत्रादि एकदूसरेकी विपत्तियोंमें कैसे भाग लेते हैं ! पलके, हाथ आदि नेत्रकी सारी विपत्तिको स्वय लेना चाहती हैं। पैरमें काँटा लगनेपर नेत्र देखनेको उतावले हो उठते हैं; हाथ निकालनेको और मुँह फूँकनेको प्रस्तुत हो उठता है । देहीकी तो बात ही निराली है। यदि कहीं अपने दाँतोसे जीभ कट जाय तो क्या दाँत पत्थरसे तोड़ डाले जायें ? एक अङ्गसे दूसरे अङ्गपर आघात हो तो क्या देही उसे काट दे ? वह तो यही समझता है कि सब मेरे ही हैं । इस दृष्टिसे सर्वत्र व्यापक अनन्त एक आत्माको देखनेवाला पुरुष तो सब देहोको अपना ही अङ्ग समझता है, फिर अपनी देहपर प्रहार करनेवालेको क्या करे, क्योंकि वह भी तो अपना ही है— जिह्वां क्वचित् संदशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् । ( श्रीमद्भा० ११ । २३ । ५१ ) 'सब अपना ही कुटुम्ब है या अपना ही अङ्ग या स्वरूप है', इस दृष्टिसे समाज और राष्ट्र एव विश्वका हित चाहना बड़ी ऊँची बात है । बिना ऐसे भावोंके क्या संघटन सम्भव है ? राष्ट्रका वशीकरण यद्यपि समाजका आधार व्यक्ति है, तथापि बिना संघटनके समाज नहीं बनता।
वर्ग-संघर्ष २०७ संगठित व्यक्तियोका प्रथम समाज कुटुम्ब ही है। उसके संचालनमें जिन गुणोंकी आवश्यकता होती है, वास्तवमें राष्ट्रके संचालनमें भी उन्हीं गुणोंकी आवश्यकता है। कुटुम्बमें भी भिन्न स्वार्थोंका संघर्ष है। किसी-न-किसी तरह उसमें सामञ्जस्य स्थापित करना छोटे, बड़े, बूढे, स्त्री, पुत्र, कलत्र सबको सन्तुष्ट रखना, नीतिद्वारा काम निकालना, किसीके साथ अन्याय न होने देना, अनुशासन और स्वतन्त्रताका उचित अनुपातमें मेल मिलाये रखना, सबको स्नेहके सूत्रमें बाँध रखना और घरके भीतर-बाहर शान्ति बनाये रखना जटिल समस्या है। राष्ट्रके संचालनमें भी ऐसी ही समस्याओंका पग-पगपर सामना करना पड़ता है। अतः जिसने कुटुम्ब-संचालन- में सफलता पा ली, वही राष्ट्र-संगठनमें भी सफल हो सकता है। इसीलिये शास्त्रोंमें कुटुम्बकी रक्षापर बड़ा जोर दिया गया है और सहिष्णुता, उदारता, समता, आज्ञापालन, सौहार्द, सौमनस्य आदि गुणोंकी बड़ी आवश्यकता बतलायी गयी है। कुटुम्बमे जो वास्तवमें एक छोटा मोटा राष्ट्र ही है, जबतक समान-मन, समान- उद्देश्य नहीं बनता एवं जबतक स्नेहसूत्रमें सब बँध नहीं जाते तबतक किसी प्रकारका अभ्युदय असम्भव है। इन सबको सम्पादन करनेके लिये अथर्ववेदके सामनस्य सूक्तमें (३।६।३०) एक अनुष्ठान बतलाया गया है। उसके मन्त्रोंका विधिवत् जप, हवन, अभिषेकद्वारा इस लक्ष्यकी सिद्धि होती है। इन मन्त्रोंके कुछ अंश एवं आशय इस प्रकार हैं—‘सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः’। (३।६।३०।१) अर्थात्—हे विवाद करनेवाले मनुष्यो ! मैं तुमलोगोंका वैमनस्य मिटाकर सौमनस्य करता हूँ। (यह उक्ति जापक, होता या अभिषेक करनेवालेकी है।) मैं तुम्हें समान हृदय, समान चित्तवृत्ति एवं सम्यक् प्रीतिसे सख्य भावसे युक्त बनाना चाहता हूँ। जैसे गौ अपने वत्सको चाहती है, वैसे तुमलोग भी एक दूसरेसे प्रेम करो—‘अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः। जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शंतिवाम्।’ (२) पुत्र पिताका अनुगामी हो, माता पुत्रादिकोंके समान मनवाली और भार्या पतिसे सुखयुक्त मधुर वचन बोलनेवाली हो—‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।’ (३) एक भाई दूसरेसे द्वेष न करे, एक बहन दूसरेसे द्वेष न करे। सब लोग समान रहन-सहन, ज्ञान, कर्मसम्पन्न होकर कल्याणमयी वाणी बोले—‘येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः। तत्कृण्मो ब्रह्म वो गृहे। संज्ञानं पुरुषेभ्यः’ (४) जिस मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रादि देवताओंका परस्पर विवाद, विद्वेष नहीं होता, उसी एक मत्यापादक सामनस्य मन्त्रको तुम्हारे गृहमें प्रयुक्त करता हूँ—‘ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वियौष्ट सराधयन्तः सधुराश्चरन्तः। अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान्व संमनसस्कृणोमि।’ (५) तुमलोग ज्येष्ठ, कनिष्ठभावसे परस्पर अनुरक्त हो। समान चित्त होकर समान कार्यके लिये समान प्रयत्नशील हो। परस्पर वियुक्त न हो, एक दूसरेसे प्रियवाक् बोलते हुए परस्पर मिलो। मैं तुमलोगोंको समान कर्ममें समान मन होकर प्रवृत्त
२९८ मार्क्सवाद और रामराज्य करता हूँ—'समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि ।' ( ६ ) तुमलोगोंकी एक पानीयशाला हो, साथ ही अन्नभाग हो, ( एक जगह ही बैठकर अन्नपानादिका भोग करो, ) मैं तुमलोगोंको एक स्नेहपाशमे बाँधता हूँ । जैसे चारो ओरसे घेरकर अरा नाभी ( चक्र ) का आश्रयण करते हैं, वैसे ही समान फलकी आकांक्षासे तुम एक ही अग्निदेवकी उपासना करो—'सध्रीचीनान्वः संमनसस्कृणोम्येकश्नुष्टीन्संवनेनेन सर्वान् । देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायं प्रातः सौमनसो वोऽस्तु ।' ( ३ । ६ । ३० । ७ ) मैं तुम्हे एक कार्यके लिये एक चित्तसे सहोद्युक्त बनाता हूँ और एक प्रकार ही तुम्हारी व्याप्ति या मुक्ति हो। इस सांमनस्य वशीकरणसे मै तुम सबको वश करता हूँ । जैसे देवता एक मत होकर अजरामरत्व- प्रापक अमृतकी रक्षा करते हुए शोभनमनस्क होते हैं, वैसे ही आपलोग भी सदा शोभनमनस्क हों ।' कितनी उच्च और उदार कामनाएँ हैं । जो लोग अथर्ववेदको जादूगरी, टोनाटामरका पिटारा समझते हैं, उनका ध्यान क्या कभी इस ओर भी जाता है ? कुटुम्बियो एव कुटुम्बोके सौमनस्य, सामनस्यमें सारा राष्ट्र ही नहीं—सारा विश्व स्नेहपाशमें बँधकर एकमत होकर अपने अभीष्टको प्राप्त कर सकता है । सभा, सोसाइटियोंमें केवल प्रस्ताव पास करनेकी वीरता दिखलानेसे कुछ नहीं होता । मनुष्य कितनी ही दृष्टादृष्ट शक्तियोसे घिरा रहता है, सब बाते उसके वशकी नहीं । इसीलिये लौकिक प्रयत्नोंके साथ पारलौकिक प्रयत्नोकी भी आवश्यकता रहती है। सकल्पकी शक्ति बड़ी प्रबल होती है । उनका प्रभाव लौकिक स्थितियोपर भी पडता है । आज कुटुम्ब, राष्ट्र तथा विश्वमें विघटन-ही-विघटन है । 'अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग' सर्वत्र आज यही दिखलायी दे रहा है। जहाँ देखो, वहीं ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, कलह, संघर्षका साम्राज्य है । इनके प्रशमनके आधुनिक सभी उपाय विफल हो रहे हैं। आज वैज्ञानिक अनुसंधानोके पीछे लाखो रुपये उड़ते हैं। असफलता होनेपर भी कुछ नवीन बातोके अनुभव होनेका संतोष कर लिया जाता है । फिर क्यो न कभी कुछ दैवी प्रयत्न करके भी देख लिया जाय ? यदि हमसे कठिन अनुष्ठान नहीं होते तो क्या इतना भी नहीं बन पड़ता कि प्रतिदिन अपनी श्रद्धानुसार कुछ जप, भजन, प्रार्थना विश्वकल्याणार्थ करके देख ले कि उसका फल क्या होता है ? समाजवादमें लोकतन्त्र 'सोवियट कम्युनिज्म' ( रूसी साम्यवाद ) नामक पुस्तकमें फेबियन वेव दम्पतिने लिखा है कि 'जहाँ अमेरिका, ब्रिटेनमें ६० प्रतिशत जनता चुनावमें भाग लेती है, वहाँ सोवियट रूसमें ८० प्रतिशत जनता भाग लेती है । इस आधार- पर मार्क्सवादी सर्वहाराका अधिनायकत्व ही वास्तविक जनतन्त्र है । ब्रिटेन, अमेरिकाका जनतन्त्र तो ढोगमात्र है ।' परंतु दूसरी पार्टीको प्रेस, पत्र, प्रचार
वर्ग-संघर्ष २०० आदिका जहाँ अवकाश ही न हो, दूसरे दलको स्वतन्त्ररूपसे निर्वाचनमें भाग लेनेका अधिकार ही न हो, वहाँ अधिनायकके आदेशानुसार जनताको वोट देना ही पड़े, वहाँ अस्सी प्रतिशत ही क्या शत प्रतिशत वोट पड़ें तो भी क्या आश्चर्य है ? परन्तु क्या उसे स्वतन्त्र जनमत कहा जा सकता है ? वह तो केवल दूसरेकी आँखोंमें धूल झोंकनेके लिये शुद्ध नाटकमात्र है । कहा जाता है कि 'रूसमें मजदूर वर्गको छोड़कर दूसरा कोई वर्ग ही नहीं, अतः दूसरी पार्टीकी वहाँ आवश्यकता नहीं। पूँजीवादी राष्ट्रोंमें विभिन्न वर्ग हैं, अतः उन वर्गोंका प्रतिनिधित्व करनेवाली पार्टियाँ वहाँ आवश्यक होती हैं। इसलिये रूसमें दूसरी पार्टियोंका न होना गुण ही है, दोष नहीं।' परन्तु दूसरा वर्ग है या नहीं, इसका पता तो तब चले, जब कि दूसरोंको मुँह खोलने दिया जाय। दूसरे लोगोंको लेखन, भाषण एवं प्रेस-पत्रकी, सम्पत्ति रखनेकी, निर्वाचन लड़नेकी स्वाधीनता मिल जाय—तभी मालूम हो सकता है कि लोग क्या चाहते हैं ? यों तो सभी पत्रोंद्वारा सरकारी मतको ही जनताका मत बतलाया जाता है । सरकारी मतके विपरीत मतको राष्ट्रविरोधी, जनविरोधी, मानवताविरोधी और न जाने क्या-क्या कहा जाता है। जहाँ कुछ अंशोंमें भी विचार-स्वातन्त्र्य है, वहाँ तो समाजवादी-विचारधारावालोंमें भी पार्टीभेद होता है। जैसे भारतमें ही कम्युनिष्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, क्रान्तिकारी कम्युनिष्ट पार्टी आदिका भेद है। फिर यदि रूसमें मतभेद नहीं है, वर्गभेद नहीं है, तो प्रबल पुलिस एवं प्रबलतम गुप्तचर विभाग किसलिये है । श्रमिकोंका एकाधिपत्य मार्क्सका कहना है कि, 'श्रमजीवियोंके एकाधिपत्यके सिद्धान्तका जन्म- दाता वह स्वयं ही है। उसने १८५२ में अपने एक अमेरिकन मित्रको पत्रमें लिखा था कि वर्ग-कलहका सिद्धान्त यद्यपि पहलेसे ही हुआ था तथापि वर्गोंके अस्तित्वका सम्बन्ध भौतिक उत्पत्तिकी किसी विशेष अवस्थासे होता है और वर्ग- कलहका अन्तिम परिणाम श्रमजीवियोंका एकाधिपत्य स्थापित होना है। यह श्रमजीवियोंका एकाधिपत्य समस्त वर्गोंके लोप होने और एक स्वाधीनतामूलक समानाधिकारसम्पन्न समाजकी स्थापनाके लिये बीचकी सीढ़ी है। उन बातोंका आविष्कारक मैं ही हूँ।' उसने यह भी कहा है कि 'आरम्भमें नये कानूनोंद्वारा जायदादके अधिकार और पूँजीवादियोंके उत्पादनपर जबरदस्ती आक्रमण करना पड़ेगा। तत्पश्चात् सभी प्राचीन प्रणालियोंपर भी आक्रमण करना पड़ेगा।' पूर्वोक्त युक्तियोंसे सिद्ध है कि कम्युनिष्ट आन्दोलन शुद्ध द्वेष एवं ईर्ष्यापर ही अवलम्बित है। उसमें वास्तविकताका लेश भी नहीं है। इनके मतानुसार व्यष्टि लोकतन्त्र या लोककी इच्छाका भी कुछ मूल्य नहीं है। पूँजीपतियोंके विपरीत
३०० मार्क्सवाद और रामराज्य मजदूरतन्त्रकी स्थापना ही इन्हें मान्य है । सहिष्णुता, उदारता, असंकीर्णता, समष्टिलोककल्याणकी कल्पनाका भी इस वादमें कोई स्थान नहीं है। किंतु सभी आकाङ्क्षाएँ आदरणीय नहीं होतीं, वैध आकाङ्क्षाओंका ही समाजमे आदर होता है। किसीके भी सुन्दर भवन, कलत्र, मोटर आदिकी हथियानेकी आकाङ्क्षा शास्त्रीय, धार्मिक, आध्यात्मिक संस्कारशून्य लोगोंको होती ही है। वैधमार्गसे कोई कोटिपति, अर्बुदपति, सर्वभूमिपति बननेकी आकाङ्क्षा और तदनुकूल प्रयत्न करने तथा सफलता पाने आदिमें किसीको कोई आपत्ति नहीं। पर अवैधमार्गसे वैसा प्रयत्न या आकाङ्क्षा सर्वथा अक्षम्य है। अवैध- मार्गसे कोई व्यक्ति या समूह साम्यवादी सरकारकी सम्पत्तिपर अधिकार करना चाहे तो क्या साम्यवादी सरकार ही उसे सहन करेगी। वस्तुतस्तु कम्युनिष्टोंकी कोई भी योजना या सिद्धान्त ऐसा नहीं है, जिसका औचित्य सर्वसम्मत युक्तिसे सिद्ध किया जा सके। अविप्रतिपन्न युक्तियोंसे विप्रतिपन्न वस्तुओंकी सिद्धि की जा सकती है; परंतु कम्युनिष्ट जब किसी भी पुराने सिद्धान्त, पुराने न्याय, पुराने सत्य या पुराने नियमको स्थिर नहीं मानते, तब वे किस सर्वसम्मत आधारपर अपनी बातोंको सिद्ध करेंगे। अद्वैतवादी वेदान्ती यद्यपि ब्रह्मातिरिक्त सभी वस्तुओंका पारमार्थिक बाध करते हैं, तथापि स्वपक्ष-साधन, परपक्ष-बाधनार्थ व्यावहारिक प्रमाण-प्रमेयादि सभी व्यवस्था मानते हैं। परंतु जो कम्युनिष्ट सत्य एवं न्यायको एकरस माननेको तैयार नहीं हैं, उनके औचित्यानौचित्य निर्णयका आधार ही क्या हो सकता है। यह कहा ही जा चुका है कि प्रत्यक्षानुमानागमादि प्रमाणोंके बिना किसी पदार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती। इतिहास भी यदि किसी शिष्ट एवं सत्यवादी आप्तद्वारा लिखित होगा, तब तो वह आगमप्रमाण ही ठहरेगा, तद्भिन्न होनेसे सर्वथा प्रलाप ही होगा। इतिहासलेखकोंकी भी शिष्टता, सत्यवादिताका निर्णय किसी प्रमाणसे ही करना होगा। इसके अतिरिक्त अर्वाचीन, प्राचीन सत्यमें भी यदि भेद हो गया है तब प्राचीन सत्यवादियोंका आधुनिक सत्यके साथ सम्बन्ध भी क्या होगा। सिद्धान्तरूपसे यह भी कहा जा चुका है कि सत्त्वगुण एवं धर्मके संस्कार दृढ होनेसे ही समन्वय एवं सामञ्जस्यकी भावना सफल होती है। रजोगुण, तमोगुण बढनेसे अधर्म, असहिष्णुता आदिकी वृद्धि होती है। वर्गभेद, वर्गकलह ही क्यों, एक वर्गके भीतर भी वर्गभेद उत्पन्न हो जाता है और अन्तमे तो व्यक्ति-व्यक्तिमें भेद, संघर्ष एवं कलहका विकराल रूप प्रकट हो जाता है और फिर उनमें जो प्रबल होता है, उसका आधिपत्य होता है, जो हारता है वह पिसता है। अनेक बार साधनसम्पन्न साधनविहीनोंपर नियन्त्रण करते हैं, तो कई बार साधनविहीन साधनसम्पन्नोंको नष्ट करनेका प्रयत्न करते हैं। कभी-कभी सफल भी हो जाते
वर्ग-संघर्ष ३०१
हैं, अतः श्रेणी, चेतना तथा मजदूरोंका एकाधिपत्य आदि सिद्धान्त कोई महत्त्व नहीं रखते। वर्गभेद, वर्गकलह आदि सब प्रचारमूलक ही हैं। चार-पाँच धूर्तोंने एक बार एक ब्राह्मणसे, जो बकरा लिये जा रहा था, ले लेनेका निश्चय किया। फिर क्या था, एकने कहा—'पण्डितजी ! आप इस श्वानको कहाँ लिये जा रहे हैं।' ब्राह्मणने कहा, 'यह तो बकरा है।' धूर्तने कहा—'आपने कोई नशा खा लिया हैं क्या ! महाराज ! यह तो कुत्ता है।' ब्राह्मण कई प्रकारकी बातें सोचता चला जा रहा था, तबतक दूसरा धूर्त मिला। वह बोला, 'अरे महाराज ! कहाँ तो आप कुत्ता छूते भी न थे, आज न जाने क्यों, उसे कन्धोंपर ही चढ़ा लिया।' ब्राह्मण बोला, 'अरे भाई ! यह कुत्ता नहीं, बकरा है।' धूर्त बोला—'अरे ! आज आपके दिमागमें यह क्या हो गया है, जो कुत्तेको बकरा कह रहे हैं? क्रमशः तीसरे और चौथे धूर्तोंने भी इसी प्रकारकी बातें कहीं और ब्राह्मण सशंक होकर कुत्तेके भ्रममें बकरेको छोड़कर चलता बना। इसी प्रकार वर्गवादियोंके मिथ्या प्रचारसे वर्गभेद, वर्गकलहका सिद्धान्त भी फैलता जा रहा है। असलमें तो यह न कोई सिद्धान्त है और न इसका कोई आधार ही है। साथ ही समस्त वर्गोंका लोप करके मजदूरोंका एकाधिपत्य स्थापित करन तथा समानाधिकारसम्पन्न समाज स्थापित करनेकी जो बात करते हैं, उन्हें इस बातपर भी विचार करना चाहिये कि भले ही प्रचारकी महिमासे किसी वर्गके प्रति विद्वेष उत्पन्न करके, किसी समूहको उत्तेजित करके एक वर्गका विध्वंस होना सम्भव हो सकता है, पर विरोधीवर्ग समाप्त होते ही विजयीवर्गमें ही वर्गभेद उत्पन्न होते हैं । उदाहरणार्थ भारतीय कांग्रेसका अंग्रेजोंके साथ संघर्ष हुआ। संघर्ष समाप्त होनेपर स्वयं कांग्रेसमें ही फूट पड़ गयी। फलतः समाजवादी, प्रजासमाजवादी, नवीन समाजवादी, कम्युनिष्टपार्टी आदि अनेकों पार्टियाँ बन गयीं। रूसमें भी जारशाही समाप्त होते-न-होते कितनी ही पार्टियोंका जन्म हो गया। ट्राटत्स्की-जैसे लोगोंकी हत्या साधारण बात बन गयी। अधिकारारूढ दलद्वारा अनेक बार 'सफाया' किये जानेपर भी वहाँ तद्भिन्न वर्गका अभाव नहीं है, फिर केवल सामूहिक संघटन, हड़ताल, जुलूस या मार-काटके बलसे बहुत बड़े किसान आदि श्रेणीवर्गको समाप्त करना भी यदि उचित हो सकता है, तब तो शस्त्रबल, धनबल या छलछद्मके बलसे मजदूर-किसान वर्गको पद- दलित बनाये रखनेको भी उचित कहनेका कोई साहस कर ही सकता है। अन्यायको रोकना उचित ही है, वह चाहे गरीबोंका हो या अमीरोंका—अन्याय तो अन्याय ही ठहरा। गरीबोंका अन्याय भी न्याय है तथा अमीरोंका न्याय भी अन्याय है, यह बात सभ्य समाजमें नहीं चल सकती। गरीबोंपर होने