न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
अनुपलब्धिसमप्रकरणम् [ २९-३१ ]
३६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० कारणनियमः । यदि च कारणान्तरादप्युपपद्यमानस्य शब्दस्य तदनित्यत्व- मुपपद्यते, किमत्र प्रतिषिध्यत इति ! ॥ २८ ॥ अनुपलब्धिसमप्रकरणम् [ २९-३१ ] न प्रागुच्चारणाद् विद्यमानस्य शब्दस्यानुपलब्धिः, कस्मात् ? आवरणाद्य- नुपलब्धेः । यथा विद्यमानस्योदकादेरर्थस्याऽऽवरणादेरनुपलब्धिः, नैवं शब्दस्या- ग्रहणकारणेनाऽऽवरणादिनाऽनुपलब्धिः, गृह्येत चैतदस्याग्रहणकारणमुदका- दिवत्, न गृह्यते, तस्मादुदकादिविपरीतः शब्दोऽनुपलभ्यमान इति । तदनुपलब्धेरनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्विपरीतोपपत्तेरनुपलब्धिसमः ॥ २९ ॥ तेषामावरणादीनामनुपलब्धिर्नोपलभ्यते, अनुपलब्भान्नास्तीत्यभावोऽस्याः सिद्ध्यति । अभावसिद्धौ हेत्वभावात् तद्विपरीतमस्तित्वमावरणादीनामवधार्यते, तद्विपरीतोपपत्तेर्यत्प्रतिज्ञातम्—'न प्रागुच्चारणाद्विद्यमानस्य शब्दस्यानुपलब्धिः' इति, एतन्न सिद्ध्यति । सोऽयं हेतुरावरणाद्यनुपलब्धेरित्यावरणेषु चाऽऽवरणा- द्यनुपलब्धौ च समयानुपलब्ध्या प्रत्यवस्थितोऽनुपलब्धिसमो भवति ॥ २९ ॥ अस्योत्तरम्— अनुपलब्भात्मकत्वादनुपलब्धेरहेतुः ॥ ३० ॥ से कार्य की उत्पत्ति कही गयी है, न कि कार्यकारणविशेषनियम बतलाया गया है । यदि वहाँ किसी अन्य हेतु से उत्पन्न उस शब्द में अनित्यत्व सिद्ध हो जाये तो किसका प्रतिषेध किया जाता है ! ॥ २८ ॥ अब 'अनुपलब्धिसम' का लक्षण कर रहे हैं— उच्चारण से पूर्व भी शब्द विद्यमान ही है तो उसकी अनुपलब्धि नहीं होगी; क्योंकि उसके आवरण की उपलब्धि नहीं होती । जैसे विद्यमान उदक की आवरण से अनुपलब्धि होती है, ऐसे शब्द का अग्रहणकारण आवरणप्रयुक्त उपलब्ध्वभाव नहीं है । यदि होता तो उसका भी उदकादि के आवरण की तरह अग्रहणकारण आवरण गृहीत होता, गृहीत होता नहीं, अतः मानना पड़ेगा कि उदकादि की अनुपलब्धि से विपरीत (असत् होने से) शब्द की अनुपलब्धि है । आवरण की अनुपलब्धि के अनुपलम्भ से उसके अभाव की सिद्धि होने पर तद्विप- रीतोपपादन से 'अनुपलब्धिसम' होता है ॥ २९ ॥ उन आवरणादिकों की अनुपलब्धि उपलब्ध नहीं होती, उपलब्ध न होने से इस अनुपलब्धि का अभाव सिद्ध होता है । अभाव सिद्ध होने पर हेत्वभाव से तद्विपरीत आवरणादि का अस्तित्व निश्चित होता है । यों इस तद्विपरीतोपपादन से आपका पूर्व प्रतिज्ञात 'उच्चारण से पूर्व विद्यमान शब्द की अनुपलब्धि नहीं होगी'—यह मत सिद्ध नहीं होता । यों यह 'अनुपलब्धि' हेतु आवरणादि तथा आवरणाद्यनुपलब्धि—दोनों को सिद्ध करने में निश्चय करने दे रहा है, अतः यहाँ 'अनुपलब्धिसम' प्रतिषेध है ॥ २९ ॥ इसका उत्तर है— अनुपलब्धि के अनुपलम्भात्मक होने से वह अहेतु है ॥ ३० ॥
३१. सू० ] अनुपलब्धिसमप्रकरणम् ३६१
३१. सू० ] अनुपलब्धिसमप्रकरणम् ३६१ आवरणाद्यनुपलब्धिर्नास्ति; अनुपलब्भादित्यहेतुः । कस्मात् ? अनुप- लम्भात्मकत्वाद्वनुपलब्धेः । उपलम्भाभावमात्रत्वाद्वनुपलब्धेः । यदस्ति तदुप- लब्धेर्विषयः, 'उपलब्ध्या तदस्ति' इति प्रतिज्ञायते । यन्नास्ति तदनुपलब्धेर्विषयः, 'अनुपलभ्यमानं नास्ति' इति प्रतिज्ञायते । सोऽयमावरणाद्यनुपलब्धेरनुपलम्भ उपलब्ध्व्यभावेऽनुपलब्धौ स्वविषये प्रवर्त्तमानो न स्वं विषयं प्रतिषेधयति । अप्रतिषिद्धा चावरणाद्यनुपलब्धिर्हेतुत्वाय कल्पते । आवरणादीनि तु विद्यमान- त्वादुपलब्धेर्विषयाः, तेषामुपलब्ध्या भवितव्यम् । यत्तानि नोपलभ्यन्ते तदुपलब्धेः स्वविषयप्रतिपादिकाया अभावादनुपलम्भादनुपलब्धेर्विषयो गम्यते--न सन्त्या- वरणादीनि शब्दस्याग्रहणकारणीति । अनुपलब्भादनुपलब्धिः सिद्धयति¹, विषयः स तस्येति² ॥ ३० ॥ ज्ञानविकल्पानां च भावाभावसंवेदनादध्यात्मम् ॥ ३१ ॥ अहेतुरिति वर्त्तते । शरीरे शरीरिणां ज्ञानविकल्पानां भावाभावौ 'आवरणाद्यनुपलब्धि अनुपलब्भ होने से नहीं है'—यह अहेतु है; क्योंकि अनुपलब्धि अनुपलब्भस्वरूप है । अर्थात् अनुपलब्धि उपलम्भाभावमात्र है । हम इतनी प्रतिज्ञा करते हैं कि यहाँ जो उपलब्धि का विषय है 'उपलब्धि से वह हैं'; जो नहीं है वह अनुपलब्धि का विषय है । 'अनुपलभ्यमान वह नहीं हैं' । अतः यह आवरणादि का अनुपलब्भ उपलब्ध्ध्र्यभावरूप स्वविषय अनुपलब्धि में प्रवृत्त होता हुआ अपने विषय (अनुपलब्धि) का प्रतिषेध नहीं कर । । यों आवरणाद्यनुपलब्धि अप्रतिषिद्ध होती हुई हेतु बन सकती है । आवरणादि तो विद्यमान होने के कारण उपलब्धि के विषय हैं, न कि अनुपलब्धि के । अतः उनकी उपलब्धि ही होनी चाहिए । जब वे उपलब्ध नहीं होते तब उनकी अनुपलब्धि अभावव्यवस्थापिका बन जाती है, यों अनुपलब्धि नहीं; अपितु स्वविषय की प्रतिपादक उपलब्धि का अभाव अर्थात् योग्यानुपलब्धि ही अभाव को बोधित करती है । तात्पर्य यह है कि स्वविषयप्रतिपादक उपलब्धि के अभाव से आवरणादि की उपलब्धि नहीं होती अतः उनका अभाव कैसे हो पायेगा ? इस पर कहते हैं—अनुपलम्भ से अनुप- लब्धि का विषय गृहीत होता है : अतः ज्ञात होता है कि अनुपलब्धि में आवरणादि शब्द के अग्रहणकारण हो सकते हैं । उपलब्धिनिषेधक अनुपलब्भ प्रमाण से आवरण की अनुपलब्धि होती हुई अपने अनुपलब्भ का विषय सिद्ध होती है ॥ ३० ॥ ज्ञानविकल्पों के भाव (सत्ता) तथा अभाव के आत्मा में अनुभव से भी ॥ ३१ ॥ यह हेतु नहीं हो सकता । प्राणियों के मन द्वारा आत्मा में ज्ञानविकल्पों के भावाभाव १. अनुपलब्भात्तूपलब्धिनिषेधकात् 'प्रमाणात्तूपलब्धिरावरणस्य सिध्यति' इति तात्पर्यकृतः । २. 'विषयः स तस्य । उपलब्धिनिषेधकस्य प्रमाणस्यानुपलब्धिः, ततश्च आवरणाद्य- भाव इति द्रष्टव्यम्' इति तात्पर्यकृतः ।
३६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० संवेदनीयौ—'अस्ति मे संशयज्ञानम्, नास्ति मे संशयज्ञानम्' इति। एवं प्रत्यक्षानु- मानागमस्मृतिज्ञानेषु। सेयमावरणाद्यनुपलब्धिरुपलब्ध्यभावः स्वसंवेद्यः--'नास्ति मे शब्दस्याऽऽवरणाद्युपलब्धिः' इति, नोपलभ्यन्ते शब्दस्याग्रहणकारणान्या- वरणादीनीति। तत्र यदुक्तम्-'तदनुपलब्धेरनुपलम्भादभावसिद्धिः' इति, एतन्नो- पपद्यते ॥ ३१ ॥ अनित्यसमप्रकरणम् [ ३२-३४ ] साधर्म्यात्तुल्यधर्मोपपत्तेः सर्वानित्यत्वप्रसङ्गादनित्यसमः ॥ ३२ ॥ अनित्येन घटेन साधर्म्यात्—'अनित्यः शब्दः' इति ब्रुवतोऽस्ति घटेनानित्येन सर्वभावानां साधर्म्यमिति सर्वस्यानित्यमनिष्टं सम्पद्यते। सोऽयमनित्यत्वेन प्रत्यवस्थानात्--अनित्यसम इति ॥ ३२ ॥ अस्योत्तरम्— साधर्म्यादसिद्धेः प्रतिषेधासिद्धिः प्रतिषेध्यसाधर्म्याच्च ॥ ३३ ॥ प्रतिज्ञाद्यवयवयुक्तं वाक्यं पक्षनिर्वर्तकम्, प्रतिपक्षलक्षणं प्रतिषेधः, तस्य पक्षेण प्रतिषेध्येन साधर्म्यं प्रतिज्ञादियोगः। तद्यद्यनित्यसाधर्म्यादनित्यत्वस्या- अनुभूत होते रहते हैं, जैसे—'यहाँ मुझे संशयज्ञान है' 'यहाँ नहीं है'। इसी तरह प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम तथा स्मृति में भी ज्ञानविकल्प समझ लेने चाहिये। आवरणद्यनुपलब्धि के रूप में उपलब्ध्धयभावस्वरूप से स्वसंवेद्य किया जाता है, जैसे—'मुझे शब्द की आवर- णाद्युपलब्धि नहीं हो रही है।' शब्द के रूप में अग्रहणकारण आवरणादि उपलब्ध नहीं होते! अतः आपका यह कहना कि उसकी अनुपलब्धि के अनुपलम्भ से उसका अभाव सिद्ध होता है—उचित नहीं ॥ ३१ ॥ अब 'अनित्यसम' का लक्षण कर रहे हैं— सादृश्य से तुल्यधर्म की उपपत्ति द्वारा सब में अनित्यत्व के प्रसंग से 'अनित्यसम' प्रतिषेध बनता है ॥ ३२ ॥ जैसे—'अनित्य घट के साधर्म्य से शब्द अनित्य है'—ऐसा कहने पर प्रतिवादी यह कहें कि 'घट भी एक पदार्थ है, उसके साथ पदार्थत्वेन साधर्म्य होने से सब पदार्थ अनित्य होंगे। उसका यह अनित्यत्व से प्रतिषेध 'अनित्यसम' कहलाता है ॥ ३२ ॥ इसका उत्तर— साधर्म्य से असिद्धि मानने पर प्रतिषेध्यसाधर्म्य से प्रतिषेध की भी असिद्धि होने लगेगी ॥ ३३ ॥ प्रतिज्ञाद्यवयवयुक्त वाक्य पक्ष स्थापित करता है। प्रतिषेधवाक्य प्रतिषेधस्थापक है, उसका प्रतिषेध्य पक्ष के साथ प्रतिज्ञाद्यवयव से साधर्म्य है, यद्यपि यदि अनित्यसाधर्म्य
३५. सू० ] अनित्यसमप्रकरणम् ३६३
३५. सू० ] अनित्यसमप्रकरणम् ३६३ सिद्धिः ? साधर्म्यादसिद्धिः प्रतिषेधस्याप्यसिद्धिः, प्रतिषेध्येन साधर्म्यादिति ॥३३॥ दृष्टान्ते च साध्यसाधनभावेन प्रज्ञातस्य धर्मस्य हेतुत्वात् तस्य चोभयथा भावान्नाविशेषः ॥ ३४ ॥ दृष्टान्ते यः खलु धर्मः साध्यसाधनभावेन प्रज्ञायते, स हेतुत्वेनाभिधीयते। स चोभयथा भवति—केनचित् समानः, कुतश्चिद्विशिष्टः। सामान्यात्साधर्म्यम्, विशेषाच्च वैधर्म्यम्। एवं साधर्म्यविशेषो हेतुर्नाविशेषेण साधर्म्यमात्रम्, वैधर्म्यमात्रं वा। साधर्म्यमात्रं वैधर्म्यमात्रं चाऽऽश्रित्य भवानाह—'साधर्म्यात् तुल्यधर्मोपपत्तेः सर्वानित्यत्वप्रसङ्गादनित्यसमः' इति, एतदयुक्तमिति। अविशेषसमप्रतिषेधे (५. १. २४) च यदुक्तं तदपि वेदितव्यम् ॥ ३४ ॥ नित्यसमप्रकरणम् [ ३५-३६ ] नित्यमनित्यभावादनित्ये नित्यत्वोपपत्तेर्नित्यसमः ॥ ३५ ॥ 'अनित्यः शब्दः' इति प्रतिज्ञायते, तदनित्यत्वं किं शब्दे नित्यमथानित्यम् ? यदि तावत् सर्वदा भवति, धर्मस्य सदा भावाद्धर्मिणोऽपि सदा भाव इति नित्यः से अनित्यत्वासिद्धि मानोगे तो साधर्म्य से भी प्रतिषेध की असिद्धि होगी, कारण उसमें प्रतिषेध्यसाधर्म्य भी है। अथ च— दृष्टान्त में साध्य साधन भाव से प्रज्ञात धर्म के हेतुत्व से तथा उसके उभयथा रहने से भी प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ३४ ॥ दृष्टान्त में जो धर्म साध्यसाधनभाव से प्रज्ञात होता है, वह 'हेतु' कहलाता है। वह उभयथा होता है—किसी के साथ वह उनमें सामान्य रूप साधर्म्य से होता है, किसी के साथ विशिष्ट ( भेदक ), अर्थात् वह दोनों में नहीं रहता है। सामान्य से वह 'साधर्म्य' तथा विशेष से 'वैधर्म्य' कहलाता है। इस प्रकार, साधर्म्यविशेष से कहा जानेवाला हेतु सामान्यतया सर्वत्र साधर्म्य या वैधर्म्य नहीं होता । अतः आप का केवल साधर्म्य तथा वैधर्म्य को लेकर यह कहना कि—"साधर्म्य से समानधर्मोपपादन द्वारा सब कुछ की अनित्यत्वप्रसक्ति से 'अनित्यसम' होता है"—अयुक्त ही है। पूर्वोक्त ( ५.१.२४ ) 'अविशेषसम' जाति का प्रतिषेध करते समय हमने जो कुछ कहा है, उसे यहाँ भी समझ लेना चाहिये ॥ ३४ ॥ 'नित्यसम' का लक्षण करते हैं— अनित्यत्व के नित्य रहने तथा अनित्य में नित्यत्व उपपन्न होने से 'नित्यसम' प्रति- षेध होता है ॥ ३५ ॥ 'शब्द अनित्य है' ऐसी प्रतिज्ञा की जा रही है, यहाँ यह अनित्यत्व शब्द में नित्य रहता है या अनित्य ? यदि नित्य रहता है तो इस धर्म के सदा अपेक्षित होने से
३६४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० शब्द इति। अथ न सर्वदा भवति, अनित्यत्वस्याभावान्नित्यः शब्दः। एवं नित्यत्वेन प्रत्यवस्थानात्—नित्यसमः ॥ ३५ ॥ अस्योत्तरम्— प्रतिषेध्ये नित्यमनित्यभावादनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेः प्रतिषेधाभावः ॥ ३६ ॥ प्रतिषेध्ये शब्दे नित्यमनित्यत्वस्य भावादित्युच्यमाने, अनुज्ञातं शब्दस्या- नित्यत्वम्। अनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेश्च नानित्यः शब्द इति प्रतिषेधो नोपपद्यते। अथ नाभ्युपगम्यते नित्यमनित्यत्वस्य भावादिति हेतुर्न भवतीति हेत्वभावात् प्रतिषेधानुपपत्तिरिति। उत्पन्नस्य निरोधादभावः—शब्दस्यानित्यत्वम्, तत्र परिप्रश्नानुपपत्तिः। सोऽयं प्रश्नः—'तदनित्यत्वं किं शब्दे सर्वदा भवति, अथ न?' इत्यनुपपन्नः, कस्मात्? उत्पन्नस्य यो निरोधादभावः शब्दस्य तदनित्यत्वम्, एवं च सत्यधिकरणाधेय- विभागो व्याघातान्नास्तीति। नित्यानित्यत्वविरोधाच्च। नित्यत्वमनित्यत्वं च एकस्य धर्मिणो धर्माविति विरुध्येते, न सम्भवतः। तत्र यदुक्तम्—नित्यमनित्यत्वस्य भावाद् नित्य एव, तदवर्तमानार्थमुक्तमिति ॥ ३६ ॥ तद्वान् धर्मी भी नित्य रहेगा तो अनित्य शब्द नित्य हो गया ! यदि सदा नहीं रहता तो अनित्यत्व के अभाव से पुनः शब्द नित्य हो गया । यों नित्यत्व से प्रतिषेध 'नित्यसम' कहलाता है ॥ ३५ ॥ इसका उत्तर— 'प्रतिषेध्य में अनित्यभाव सर्वदा रहने से अनित्य में भी अनित्यत्वोपपत्ति बन जाने से प्रतिषेध नहीं होगा ॥ ३६ ॥ 'प्रतिषेध्य शब्द में अनित्यत्व के नित्य रहने से' ऐसा कहने पर शब्द का अनित्यत्व स्वीकार कर लिया गया, इस प्रकार अनित्य शब्द में अनित्यत्वोपपत्ति से 'शब्द अनित्य नहीं है' यह प्रतिषेध नहीं बनता। यदि ऐसा नहीं मानते तो अनित्यत्व के नित्य होने से वह हेतु नहीं बनेगा, यों हेत्वभाव से प्रतिषेध नहीं बनेगा । शब्द के अनित्यत्व से तात्पर्य है उत्पन्न के निरोध से अभाव । इस स्थिति में प्रश्न ही नहीं बनता कि क्या 'शब्द में ,अनित्यत्व सर्वदा रहता है या नहीं ?' क्योंकि उत्पन्न के निरोध से अभाव रूप शब्द में अनित्यत्व रहेगा कैसे ? वह है नहीं । इस प्रकार परस्पर विरोध से आधाराधेयविभाग नहीं है । नित्यानित्यविरोध से भी । एक धर्मी में नित्यत्व अनित्यत्व—ये दो धर्म विरुद्ध होने से असम्भव हैं । अतः वह कहना कि 'अनित्यत्व के नित्य रहने से वह नित्य ही है'— अर्थशून्य है ॥ ३६ ॥
३८. सू० ] कार्यसमप्रकरणम् ३६५
३८. सू० ] कार्यसमप्रकरणम् ३६५ कार्यसमप्रकरणम् [ ३७-३८ ] प्रयत्नकार्यनिकत्वात् कार्यसमः ॥ ३७ ॥ प्रयत्नानन्तरीयकत्पादनित्यः शब्द इति-यस्य प्रयत्नानन्तरमात्मलाभः तत् खल्वभूत्वा भवति, यथा घटादिकार्य्यम्, अनित्यमिति च भूत्वा न भवती- त्येतद् विज्ञायते । एवमवस्थिते प्रयत्नकार्यनिकत्वादिति प्रतिषेध उच्यते । प्रयत्नानन्तरमात्मलाभश्च दृष्टो घटादीनाम्, व्यवधानापोहाच्चाभिव्यक्तिर्व्य- वहितानाम्, तत्किं प्रयत्नानन्तरमात्मलाभः शब्दस्य, आहोऽभिव्यक्तिरिति ?- विशेषो नास्ति । कार्य्याविशेषेण प्रत्यवस्थानम्—कार्यसमः ॥ ३७ ॥ अस्योत्तरम्— कार्य्यान्यत्वे प्रयत्नाहेतुत्वमनुपलब्धिकारणोपपत्तेः १ ॥ ३८ ॥ सति कार्य्यान्यत्वे अनुपलब्धिकारणोपपत्तेः प्रयत्नास्याहेतुत्वं शब्दस्याभि- व्यक्तौ । यत्र प्रयत्नान्तरमभिव्यक्तिस्तत्रानुपलब्धिकारणं व्यवधानमुपपद्यते, व्यवधानापोहाच्च । प्रयत्नानन्तरभाविनोऽर्थस्योपलब्धिलक्षणाऽभिव्यक्तिर्भवती- ति । न तु शब्दस्यानुपलब्धिकारणं किञ्चिदुपपद्यते, यस्य प्रयत्नानन्तर- 'कार्यसम' का लक्षण करते हैं— प्रयत्न से उत्पादित कार्यों के अनेक होने से भी शब्द अनित्य है ॥ ३७ ॥ 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से शब्द अनित्य हैं'—यह स्थापनावाक्य है । जिसकी प्रयत्न के बाद सत्ता होती है, वह पहले न होता हुआ होता है, जैसे-घटादि । 'अनित्य' उसे कहते हैं जो होकर न हो । ऐसा मानने पर, प्रयत्न के अनेक कार्य होने से सूत्रोक्त प्रतिषेध कहा जाता है । जैसे एक प्रयत्नानन्तर आत्मलाभ तो घटादि का देखा जाता है । दूसरा प्रयत्नानन्तर व्यवधान के अपोह से व्यवहितों की 'अभिव्यक्ति' देखी जाती है । इनमें से प्रयत्नानन्तर शब्द का आत्मलाभ है या अभिव्यक्ति—इसमें कोई निश्चायक हेतु नहीं दिया । यों कार्यसामान्य से प्रतिषेध 'कार्यसम' कहलाता है ॥ ३७ ॥ इसका उत्तर है— कार्यद्वैविध्य होने पर भी प्रयत्न का अहेतुत्व ही है; अनुपलब्धिकारणोपपादन होने से ॥ ३८ ॥ कार्यद्वैविध्य होने पर भी, अनुपलब्धिकारणोपपादन पहले हो चुका है, अतः शब्द की अभिव्यक्ति में प्रयत्न का अहेतुत्व ही हैं । जहाँ अभिव्यक्ति प्रयत्नानन्तर है, वहाँ अनुपलब्धिकारण व्यवधानरूप होने से उपपन्न होता है । वहाँ व्यवधानापोह से प्रयत्नान्तर- भावी अर्थ की उपलब्धिलक्षण अभिव्यक्ति होती है, शब्द का अनुपलब्धिकारण ऐसा कोई व्यवधान उपपन्न नहीं होता है, जिससे प्रयत्नानन्तर व्यवधान के अपोह से १. 'अनुपलब्धिकारणानुपपत्तेः'—इति पाठ० ।
षट्पक्षीप्रकरणम् [ ३९-४० ]
३६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० मपोहाच्छब्दस्योपलब्धिलक्षणाऽभिव्यक्तिर्भवतीति। तस्मात् 'उत्पद्यते शब्दो नाभिव्यज्यते' इति ॥ ३८ ॥ षट्पक्षीप्रकरणम् [ ३९-४० ] हेतोश्चेदनेकान्तिकत्वमुपपाद्यते, अनैकान्तिकत्वादसाधकः स्याद् इति। यदि चानैकान्तिकत्वादसाधकत्वम्; प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः ॥ ३९ ॥ प्रतिषेधोऽप्यनैकान्तिकः। किञ्चित् प्रतिषेधति, किञ्चिन्नेति—अनैकान्ति- कत्वादसाधक इति। अथ वा—शब्दस्यानित्यत्वपक्षे प्रयत्नानन्तरमुत्पादो नाभिव्यक्तिरिति विशेषहेत्वभावः। नित्यत्वपक्षेऽपि प्रयत्नानन्तरमभिव्यक्ति- र्नोत्पाद इति विशेषहेत्वभावः। सोऽयमुभयपक्षसमो विशेषहेत्वभाव इत्युभय- मप्यनैकान्तिकमिति ॥ ३९ ॥ सर्वत्रैवम् ॥ ४० ॥ शब्द की उपलब्धिलक्षण अभिव्यक्ति होती हो। अतः यही मानना चाहिये कि 'शब्द उत्पन्न होता है न कि अभिव्यक्त' ॥ ३८ ॥ [ इस प्रकार चौबीस जातियों का क्रमशः लक्षण तथा प्रत्याख्यानोपाय बताते हुए, शब्दानित्यत्व भी साथ-साथ सिद्ध कर दिया गया। अब षट्पक्षीरूप कथाभास का प्रसंग उठा रहे हैं— ] 'शब्द अनित्य है, प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण, घट की तरह'—यह स्थापनावादी का प्रथम पक्ष है। यहाँ हेतु में व्यभिचार दोष दिखाकर 'व्यभिचार होने से प्रयत्नानन्तरीयकत्व हेतु शब्दानित्यत्व सिद्ध नहीं कर सकता' यह द्वितीय पक्ष प्रति- वादी का है। यदि व्यभिचार होने से हेतु साध्य का असाधक है तो प्रतिषेध में भी समानदोष है ॥ ३९ ॥ प्रतिषेध भी व्यभिचरित है; क्योंकि वह किसी में नित्यत्व का प्रतिषेध करता है, किसी में नहीं। यों अनैकान्तिक होने से प्रतिषेध भी असाधक है। यह तीसरा पक्ष है। अथवा—शब्द के अनित्यत्वपक्ष में प्रयत्न के पश्चात् उत्पाद है, अभिव्यक्ति नहीं'— इसमें कोई विशेष हेतु नहीं दिया गया। उधर नित्यत्वपक्ष में 'प्रयत्न के पश्चात् अभि- व्यक्ति है, उत्पाद नहीं'—इसमें भी कोई विशेष हेतु नहीं दिया गया। इस प्रकार, दोनों ही पक्षों में विशेषहेत्वभाव समान है, अतः यहाँ अनैकान्तिक दोष है ॥ ३९ ॥ [ प्रसङ्गोपात्त एक बात बीच में ही कह रहे हैं— ] सर्वत्र ऐसा ही है ॥ ४० ॥
४२. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६७
४२. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६७ सर्वेषु साधर्म्यप्रभृतिषु प्रतिषेधहेतुषु यत्र यत्राविशेषो दृश्यते, तत्रोभयोः पक्षयोः समः प्रसज्यत इति ॥ ४० ॥ प्रतिषेधविप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद् दोषः ॥ ४१ ॥ योऽयं प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः-अनैकान्तिकत्वमापद्यते, सोऽयं प्रतिषेधस्य प्रतिषेधेऽपि समानः । तत्र 'अनित्यः शब्दः प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्' इति साधन- वादिनः स्थापना, प्रथमः पक्षः । 'प्रयत्नकार्यनेकत्वात् कार्यसमः' इति दूषण- वादिनः प्रतिषेधहेतुना द्वितीयः पक्षः, स च 'प्रतिषेधः' इत्युच्यते । तस्यास्य 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इति तृतीयः पक्षो 'विप्रतिषेधः' उच्यते । तस्मिन् प्रतिषेधविप्रतिषेधेऽपि समानो दोषोऽनैकान्तिकत्वं चतुर्थः पक्षः ॥ ४१ ॥ प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा ॥४२॥ प्रतिषेधं द्वितीय पक्षं सदोषमभ्युपेत्य तदुद्धारमनुक्त्वाऽनुज्ञाय प्रतिषेध- विप्रतिषेधे तृतीयपक्षे समानमनैकान्तिकत्वमिति समानं दूषणं प्रसजतो दूषणवादिनो मतानुज्ञा प्रसज्यत इति पञ्चमः पक्षः ॥ ४२ ॥ सभी 'साधर्म्यसम' प्रभृति प्रतिषेधहेतुओं ( जातियों ) में, जहाँ जहाँ विशेष नहीं दिखायी देता, वहाँ दोनों ही पक्षों में समान दोष आता है ॥ ४० ॥ [ पुनः प्रकृत में आते हैं-- ] प्रतिषेध के विप्रतिषेध ( खण्डन ) में प्रतिषेध के समान ही दोष हैं ॥ ४१ ॥ यह जो प्रतिषेध में सर्वत्र समान दोष—व्यभिचार—बतलाया था, वह प्रतिषेध के खण्डन में भी समान ही है । यह चतुर्थ पक्ष हुआ । यहाँ क्रमशः—१. 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है'—यह प्रथम- पक्ष है । २. 'प्रयत्न के अनेक कार्य होने से यहाँ कार्यसम दोष है'—यह हेतुपुरस्सर प्रतिषेधात्मक द्वितीयपक्ष है । ३. 'दोनों पक्षों में व्यभिचारदोष समानरूप से है'—यह विप्रतिषेधात्मक तृतीयपक्ष है । तथा ४. 'प्रतिषेध का खण्डन करने में भी व्यभिचाररूप समान दोष है'—यह चतुर्थपक्ष है ॥ ४१ ॥ अब पञ्चमपक्ष कहते हैं— दोषयुक्त को प्रतिषेध मानकर प्रतिषेध के विप्रतिषेध में समानदोष प्रसङ्ग उठाना 'मतानुज्ञा' ( निग्रहस्थान या स्वीकृति ) है ॥ ४२ ॥ प्रतिषेधपरक द्वितीय पक्ष को दोषयुक्त मानकर उसका खण्डन न कह कर, अपितु स्वीकार करके प्रतिषेध के खण्डनपरक तृतीय पक्ष में समान अनैकान्तिकत्व है, अतः ऐसा कहनेवाले को दूषण प्रसक्त होने की दशा में दोषवादी की 'मतानुज्ञा' प्रसक्त हुई । यह पञ्चम पक्ष है ॥ ४२ ॥
३६८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० स्वपक्षलक्षणापेक्षोपपत्त्युपसंहारे हेतुनिर्देशे परपक्षदोषाभ्युपगमात् समानो दोष इति ॥ ४३ ॥ स्थापनापक्षे प्रयत्नकार्यानिकत्वादिति दोषः स्थापनाहेतुवादिनः स्वपक्ष- लक्षणो भवति । कस्मात् ? स्वपक्षसमुत्थत्वात् । सोऽयं स्वपक्षलक्षणं दोष- मपेक्षमाणोऽनुद्धृत्यानुज्ञाय प्रतिषेधेऽपि समानो दोष इत्युपपद्यमानं दोषं परपक्षे उपसंहरति । इत्थं चानैकान्तिकः प्रतिषेध इति हेतुं निर्दिशति । तत्र स्वपक्ष- लक्षणापेक्षयोपपद्यमानदोषोपसंहारे हेतुनिर्देशे च सत्यनेन परपक्षोऽभ्युपगतो भवति । कथं कृत्वा ? यः परेण प्रयत्नकार्यानेकत्वादित्यादिनाऽनैकान्तिकदोष उक्तः, तमनुद्धृत्य 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इत्याह । एवं स्थापनां सदोषा- मभ्युपेत्य प्रतिषेधेऽपि समानं दोषं प्रसजतः परपक्षाभ्युपगमात् समानो दोषो भवति । यथा परस्य प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधेऽपि समानो दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा प्रसज्यत इति, तथाऽस्यापि स्थापनां सदोषामभ्युपेत्य प्रतिषेधेऽपि समानं दोषं प्रसजतो मतानुज्ञा प्रसज्यत इति । स खल्वयं षष्ठः पक्षः । तत्र खलु स्थापनाहेतुवादिनः प्रथमतृतीयपञ्चमपक्षाः, प्रतिषेधहेतुवादिनः द्वितीयचतुर्थषष्ठपक्षाः । तेषां साध्वसाधुतायां मीमांस्यमानायां चतुर्थषष्ठयोरर्था- अपने पक्ष में दोष के लक्षण की अपेक्षा से हेतु के निर्देश में, परपक्ष में दोष मानने से अथवा उपपादन के उपसंहार से, दोष देखने में समान दोष है ॥ ४३ ॥ 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है'—इस स्थापनापक्ष में प्रयत्न- कार्यनिकत्वहेतु से दोषोद्भावन स्थापनाहेतुवादी (प्रतिपक्षी) का स्वपक्षलक्षण है; क्योंकि वह इसी हेतु से अपना पक्ष समुपस्थापित कर रहा है। वह स्थापनावादी स्वपक्षलक्षण दोष को समझता हुआ भी उसे न हटाकर, यों उसे स्वीकार करता हुआ 'प्रतिषेध में भी समान दोष है' ऐसा कहकर, उपपन्न दोष को परपक्ष में उपसंहृत करता है, और इस तरह प्रतिषेध अनैकान्तिक हेतुदोष का निर्देश करता है। वहाँ स्वपक्षलक्षण की अपेक्षा से उपपद्यमान दोष का उपसंहार तथा हेतु का निर्देश होने पर परपक्ष में दोष स्वीकृत होता है। कैसे ? वह प्रतिपक्षी द्वारा कहा गया 'प्रयत्नकार्यों के अनेक होने से' इत्यादि हेतु में अनैकान्तिक दोष का खण्डन किये बिना, 'प्रतिषेध में भी समान दोष है'—ऐसा कहता है । इसी तरह प्रतिपक्षी की सदोष स्थापना को स्वीकार कर प्रतिषेध में भी समान दोष देते हुए परपक्ष को स्वीकार करता है, अतः उक्त मत में भी समान दोष आता है। अतः जैसे प्रतिपक्षी के प्रतिषेध को सदोष समझकर प्रतिषेध के विप्रतिषेध में समान दोष 'मतानुज्ञा' प्रसक्त होता है, उसी तरह इसके स्थापनापक्ष को भी सदोष मानकर प्रतिषेध में समान दोष प्रसक्त करने वाले को 'मतानुज्ञा' प्रसक्त होगी। यह षष्ठ पक्ष है। यहाँ—प्रथम, तृतीय तथा पञ्चम पक्ष स्थापनाहेतुवादी के हैं; तथा द्वितीय, चतुर्थ एवं षष्ठ पक्ष प्रतिषेधहेतुवादी के हैं। इन पक्षों को साधुता, असाधुता का विचार करने
४३. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६९
४३. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६९ विशेषात् पुनरुक्तदोषप्रसङ्गः । चतुर्थपक्षे समानदोषत्वं परस्योच्यते-प्रतिषेध- विप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद्दोष इति; षष्ठेऽपि परपक्षाभ्युपगमात् समानो दोष इति समानदोषत्वमेवोच्यते, नार्थविशेषः कश्चिदस्ति । समानस्तुतीयपञ्चमयोः पुरुक्तदोषप्रसङ्गः । तृतीयपक्षेऽपि 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इति समानत्व- मभ्युपगम्यते । पञ्चमपक्षेऽपि प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गोऽभ्यु- गम्यते, नार्थविशेषः कश्चिदुच्यत इति । तत्र पञ्चमषष्ठपक्षयोः अर्थाविशेषात् पुनरुक्तदोषः, तृतीयचतुर्थयोर्मतानुज्ञा, प्रथमद्वितीययोर्विशेषहेत्वभाव इति— षट्पक्ष्यामुभयोरसिद्धिः । कदा षट्पक्षी ? यदा 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इत्येवं प्रवर्त्तते, तदोभयोः पक्षयोरसिद्धिः। यदा तु 'कार्यान्यत्वे प्रयत्नाहेतुत्वमनुपलब्धिकारणोपपत्तेः' इत्यनेन तृतीयपक्षो युज्यते, तदा विशेषहेतुवचनात् 'प्रयत्नानन्तरमात्मलाभः शब्दस्य नाभिव्यक्तिः' इति सिद्धः प्रथमपक्षः, न षट्पक्षी प्रवर्त्तत इति ॥ ४३ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये पञ्चमाध्यायस्याद्यमाह्निकम् ० पर चतुर्थ तथा षष्ठ पक्ष में अर्थ भिन्न न होने से पुनरुक्त दोष है; क्योंकि चतुर्थ पक्ष में प्रतिषेध के खण्डन में 'प्रतिषेध दोष की तरह दोष ही हैं'—ऐसा कहकर दूसरे को समानदोष दिया जाता है, तथा षष्ठ पक्ष में भी 'परपक्ष की स्वीकृति से समान दोष ही ही हैं'—ऐसा कहने से समानदोषत्व के अतिरिक्त कोई नयी बात नहीं कही गयी । इसी प्रकार तृतीय तथा पञ्चम पक्ष में भी पुनरुक्त दोष ही है । तृतीय पक्ष में 'प्रतिषेध में भी समान दोष हैं' ऐसा कहने से समानत्व ही कहा जा रहा है, तथा पञ्चमपक्ष में भी प्रतिषेध के खण्डन में समानदोष-प्रसङ्ग स्वीकार किया जा रहा है, कोई नयी बात नहीं कही जा रही । इस प्रकार पञ्चम तथा षष्ठ पक्ष में भिन्न अर्थ न होने से पुनरुक्त दोष है, तृतीय तथा चतुर्थ में मतानुज्ञा है, प्रथम तथा द्वितीय में विशेषहेत्वभाव है—यों इस षट्पक्षी में वादी, प्रतिवादी दोनों में से किसी के भी पक्ष की सिद्धि ( तत्त्वनिर्णय ) नहीं होगी । यह षट्पक्षी कब होती है ? जब 'प्रतिषेध में समान दोष हैं'—ऐसा कहा जाता हैं, तब दोनों ही पक्षों की असिद्धि है । किन्तु जब 'कार्यान्यत्व में प्रयत्नाहेतुत्व अनुपलब्धि- कारणोपपादन से सिद्ध हैं'—ऐसा तीसरा पक्ष रखा जाता है तब विशेषहेतु-वचन से शब्द का प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होना ही सिद्ध होता है, न कि अभिव्यक्ति । यों प्रथम पक्ष ही सिद्ध है—ऐसा तत्त्वनिर्णय हो जाता है । तब यह षट्पक्षी प्रवृत्त नहीं होती ॥ ४३ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में पञ्चमाध्याय का प्रथमाह्निक समाप्त ० न्या० द० ८-२४
३७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० [ द्वितीयमाह्निकम् ] विप्रतिपत्त्यप्रतिपत्त्योर्विकल्पान्निग्रहस्थानबहुत्वमिति सङ्क्षेपेणोक्तम् ( १.२.२०), तदिदानीं विभजनीयम् । निग्रहस्थानानि खलु पराजयवस्तून्य- पराधाधिकरणानि प्रायेण प्रतिज्ञाद्यवयवाश्रयाणि तत्त्ववादिनमतत्त्ववादिनं चाभिसम्प्लवन्ते । तेषां विभागः— प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोधः प्रतिज्ञासंन्यासो हेत्वन्तरमर्थान्तरं निरर्थकमविज्ञातार्थमपार्थकमप्राप्तकालं न्यूनमधिकं पुनरुक्तमननुभाषणमज्ञानम- प्रतिभा विक्षेपो मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षणं निरनुयोज्यानुयोगोऽपसिद्धान्तो हेत्वा- भासाश्च निग्रहस्थानानि ॥ १ ॥ तानीमानि द्वाविंशतिधा विभज्य लक्ष्यन्ते ॥ १ ॥ निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् [ २-६ ] प्रतिदृष्टान्तधर्माभ्यनुज्ञा स्वदृष्टान्ते प्रतिज्ञाहानिः ॥ २ ॥ साध्यधर्मप्रत्यनीकेन धर्मेण प्रत्यवस्थिते प्रतिदृष्टान्तधर्मं स्वदृष्टान्तेऽभ्यनु- जानन् प्रतिज्ञां जहातीति 'प्रतिज्ञाहानिः' । निदर्शनम्—'ऐन्द्रियकत्वादनित्यः 'विप्रतिपत्ति तथा अप्रतिपत्ति के विकल्प से बहुत से निग्रहस्थान हैं' ऐसा हम पीछे ( १. २. २०) संक्षेप से बता आये हैं। उसका अब विस्तार से वर्णन करना चाहिये। निग्रहस्थान वे होते हैं जिनमें जकड़े जाने से वादी या प्रतिवादी पराजय पा सकते हैं। ये निग्रहस्थान पराजयाधिकरण हैं तथा प्रतिज्ञादि अवयवों का आश्रय लिये रहते हैं। और वादी प्रतिवादी को किङ्कर्तव्यविमूढ बनाते हैं, अतः इनका ज्ञान भी होना आवश्यक है। उन निग्रहस्थानों का विभाग ( परिगणन ) यह है— १. प्रतिज्ञाहानि, २. प्रतिज्ञान्तर, ३. प्रतिज्ञाविरोध, ४. प्रतिज्ञासंन्यास, ५. हेत्व- न्तर, ६. अर्थान्तर, ७. निरर्थक, ८. अविज्ञातार्थ, ९. अपार्थक, १०. अप्राप्तकाल, ११. न्यून, १२. अधिक, १३. पुनरुक्त, १४. अननुभाषण, १५. अज्ञान, १६. अप्रतिभा, १७. विक्षेप, १८. मतानुज्ञा, १९. पर्यनुयोज्योपेक्षण, २०. निरनुयोज्यानुयोग, २१. अप- सिद्धान्त तथा २२. हेत्वाभास—ये निग्रहस्थान हैं ॥ १ ॥ इन बाईस प्रकार से विभक्त निग्रहस्थानों का वक्ष्यमाण सूत्रों में लक्षण करेंगे ॥१॥ उनमें प्रथम 'प्रतिज्ञाहानि' निग्रहस्थान का लक्षण कर रहे हैं— परपक्ष के धर्म को मानना अपने पक्ष में 'प्रतिज्ञाहानि' कहलाता है ॥ २ ॥ वादी स्थापनापक्ष उपस्थित करता है, तब प्रतिवादी वादिसाध्यरूप धर्म का विरुद्ध धर्म से प्रत्याख्यान करता है, और प्रतिदृष्टान्त भी कहता है। अब यदि वादी प्रति- वाद्युक्त प्रतिदृष्टान्तधर्म (साध्यविरुद्ध धर्म) को ( स्वदृष्टान्त में ) स्वीकार कर लेता हो तो प्रतिज्ञा को छोड़ बैठता है यह उसकी प्रतिज्ञाहानि है। उदाहरण के लिये—'ऐन्द्रियक
३. सू० ] निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् ३७१
३. सू० ] निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् ३७१ शब्दो घटवत्' इति कृते, अपर आह—'दृष्टमैन्द्रियकत्वं सामान्ये नित्ये, कस्मान्न तथा शब्दः' इति प्रत्यवस्थिते, इदमाह—'यद्यैन्द्रियकं सामान्यं नित्यं कामं घटो नित्योस्तु' इति । स खल्वयं साधकस्य दृष्टान्तस्य नित्यत्वं प्रसञ्जयन्निगमनान्तमेव पक्षं जहाति, पक्षं जहत्प्रतिज्ञां जहातीत्युच्यते; प्रतिज्ञाश्रयत्वात् पक्षस्येति ॥ २ ॥ प्रतिज्ञातार्थ प्रतिषेधेधर्मविकल्पात् तदर्थनिर्देशः प्रतिज्ञान्तरम् ॥ ३ ॥ प्रतिज्ञातार्थः अनित्यः शब्द ऐन्द्रियकत्वात् घटवत्' इत्युक्ते योऽस्य प्रतिषेधः प्रतिदृष्टान्तेन हेतुव्यभिचारः 'सामान्यमैन्द्रियकं नित्यम्' इति, तस्मिंश्च प्रतिज्ञातार्थ- प्रतिषेधे धर्मविकल्पादिति दृष्टान्तप्रतिदृष्टान्तयोः साधर्म्ययोगे धर्मभेदात् 'सामान्य- मैन्द्रियकं सर्वगतम्, ऐन्द्रियकस्त्वसर्वगतो घटः' इति धर्मविकल्पात्तदर्थनिर्देश इति साध्यसिद्धयर्थम्, कथम् ? यथा घटोऽसर्वगतः, एवं शब्दोऽप्यसर्वंगतो घटवदेवा- नित्य इति । 'तत्रानित्यः शब्द' इति पूर्वा प्रतिज्ञा, 'असर्वगतः' इति द्वितीया प्रतिज्ञा प्रतिज्ञान्तरम् । तत्कथं निग्रहस्थानमिति ? न प्रतिज्ञायाः साधनं प्रतिज्ञान्तरम्, किन्तु हेतुदृष्टान्तौ साधनं प्रतिज्ञायाः, तदेतदसाधनोपादान- मनर्थकमिति । आनर्थक्यान्निग्रहस्थानमिति ॥ ३ ॥ होने से शब्द अनित्य है, घट की तरह'—ऐसा प्रयोग करने पर प्रतिवादी कहे—'यह ऐन्द्रियकत्व सामान्य नित्य में भी देखा गया है, तो शब्द भी नित्य क्यों न मान लिया जाये', इसे सुनकर वादी कहे कि 'यदि ऐन्द्रियकसामान्य नित्य है .तो क्यों न घट भी नित्य मान लिया जाये !' यों यह वादी प्रतिवाद्युक्त ऐन्द्रियकत्व हेतु से नित्यत्व स्वीकार कर अपने पक्ष को निगमनान्त तक सिद्ध न कर सका । यों पक्ष को छोड़ता हुआ वह अपनी प्रतिज्ञा से भी च्युत हो गया; क्योंकि प्रतिज्ञा पक्षाश्रित ही होती है ॥ २ ॥ प्रतिज्ञात अर्थ का निषेध होने पर धर्मविकल्प से उस अर्थ के निर्देश को 'प्रतिज्ञान्तर निग्रहस्थान कहते हैं ॥ ३ ॥ वादी (वैशेषिक) द्वारा 'शब्द अनित्य है, ऐन्द्रियक होने से, घट की तरह' यह प्रतिज्ञातार्थ कहने पर, इसका 'सामान्य ऐन्द्रियक नित्य होता है' इस प्रकार प्रतिदृष्टान्त से प्रतिवादी (मीमांसक ने) प्रतिषेध किया, इस ऐन्द्रियक में अनित्यत्व के प्रतिषेध में प्रति- वादी द्वारा 'सामान्य ऐन्द्रियक सर्वगत होता है, यह दृष्टान्त और प्रतिदृष्टान्त में साधर्म्य होते हुए भी धर्मविकल्प है, जैसे सामान्य सर्वगत है । घट असर्वगत इस दशा में असर्व- गतत्व मान कर 'घट असर्वगत होने से अनित्य है तो शब्द भी असर्वगत है, वह भी घट की तरह अनित्य है' । इसके पूर्व 'शब्द अनित्य है' यह प्रतिज्ञा थी, अभी 'शब्द असर्वगत है' यह दूसरी प्रतिज्ञा हुई । इसे ही 'प्रतिज्ञान्तर' कह देते हैं । यह निग्रहस्थान कैसे हुआ ? प्रतिज्ञा का साधन 'प्रतिज्ञान्तर' नहीं, अपितु हेतु दृष्टान्त होते हैं, वह न देकर प्रतिज्ञा का साधन करना 'प्रतिज्ञान्तर' है । यों साधन प्रकट न करने से प्रतिज्ञा निरर्थक हो गयी और वादी पराजित हो गया । अतः यह 'प्रतिज्ञान्तर' निग्रहस्थान है ॥ ३ ॥
३७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः प्रतिज्ञाविरोधः ॥ ४ ॥ गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यमिति प्रतिज्ञा, रूपांदितोऽर्थान्तरस्यानुपलब्धेरिति हेतुः, सोऽयं प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः । कथम् ! यदि गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्, रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिर्नोपपद्यते । अथ रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिः, 'गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्' इति नोपपद्यते, गुणव्यतिरिक्तं च द्रव्यं रूपादिभ्यश्चा- र्थान्तरस्यानुपलब्धिरिति विरुध्यते = व्याहन्यते, न सम्भवतीति ॥ ४ ॥ पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्थापनयनं प्रतिज्ञासंन्यासः ॥ ५ ॥ 'अनित्यः शब्द ऐन्द्रियकत्वात्' इत्युक्ते परो ब्रूयात्—'सामान्यमैन्द्रियकं न चानित्यमेवं शब्दोऽप्यैन्द्रियको न चानित्यः' इति । एवं प्रतिषिद्धे पक्षे यदि ब्रूयात्—'कः पुनराह अनित्यः शब्दः' इति ! सोऽयं प्रतिज्ञातार्थनिह्नवः प्रतिज्ञा- संन्यास इति ॥ ५ ॥ अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरम् ॥ ६ ॥ निदर्शनम्—'एकप्रकृतीदं व्यक्तम्' इति प्रतिज्ञा, कस्माद्धेतोः ? एकप्रकृतीनां विकाराणां परिमाणात् । मृत्पूर्वकाणां शरावादीनां दृष्टं परिमाणम् । यावान् प्रकृतेर्व्यूहो भवति तावान् विकार इति, दृष्टं च प्रतिविकारं परिमाणम् । प्रतिज्ञा तथा हेतु का परस्पर विरोध 'प्रतिज्ञाविरोध' कहलाता है ॥ ४ ॥ 'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह प्रतिज्ञा हुई । 'रूपादि से अर्थान्तर की उपलब्धि न होने से'—यह हेतु है । यहाँ प्रतिज्ञा-हेतु का विरोध है । कैसे ? यदि द्रव्य गुण- व्यतिरिक्त है तो रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि उपपन्न नहीं होती । तथा यदि रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि है तो 'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह उपपन्न नहीं होता । द्रव्य गुणव्यतिरिक्त हो तथा रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि भी हो ये दोनों विषय परस्पर विरुद्ध हैं, यों विरुद्ध होने से ये दोनों बातें (प्रतिज्ञा और हेतु) एक साथ सम्भव नहीं ॥ ४ ॥ स्वपक्षप्रतिषेध होने पर प्रतिज्ञातार्थ को छिपाना 'प्रतिज्ञा-संन्यास' कहलाता है ॥ ५ ॥ 'शब्द अनित्य है, ऐन्द्रियक होने से' ऐसा कहने पर प्रतिवादी कहे—'सामान्य ऐन्द्रियक है, पर अनित्य नहीं है; इसी तरह शब्द भी ऐन्द्रियक है; वह भी अनित्य नहीं' । यों प्रतिषिद्ध होने पर वादी यदि यह कहें—'हमने कब कहा कि शब्द अनित्य है !' यह प्रतिज्ञातार्थनिह्नव (उसको छिपाना या उससे हट जाना) 'प्रतिज्ञासंन्यास' कहलाता हैं ॥५॥ सामान्य रूप से उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर उसमें कुछ 'विशेष' लगाकर सिद्धि चाहने वाले का 'हेत्वन्तर' निग्रहस्थान होता है ॥ ६ ॥ उदाहरण—वादी ( साङ्ख्यमतानुयायी ) की प्रतिज्ञा है—'व्यक्त एकप्रकृति है', किस हेतु से ? 'एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण होने से' । मृत्तिका से बने शरावादि में परिमाण देखा जाता है, जितने प्रकार की प्रकृति का संस्थान होता है उन सभी का विकार देखा जाता है। प्रत्येक विकार में परिमाण भी देखा जाता है । यह परिमाण
पादानात् । अथ नोपादीयते ? दृष्टान्ते हेत्वर्थस्यानिदर्शितस्य साधकाभावानु-
७. सू० ] निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७३ अस्ति चेदं परिमाणं प्रतिव्यक्तम्, तदेकप्रकृतीनां विकाराणां परिमाणात्पश्यामः- व्यक्तमिदमेकप्रकृतीति । अस्य व्यभिचारेण प्रत्यवस्थानम्-नानाप्रकृतीनामेकप्रकृतीनां च विकाराणां दृष्टं परिमाणमिति । एवं प्रत्यवस्थिते आह-एकप्रकृतिसमन्वये सति शरावादि- विकाराणां परिमाणदर्शनात्, सुखदुःखमोहसमन्वितं हीदं व्यक्तं परिमितं गृह्यते, तत्र प्रकृत्यन्तररूपसमन्वयाभावे सत्येकप्रकृतित्वमिति । तदिदमविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषं ब्रुवतो हेत्वन्तरं भवति । सति च हेत्वन्तरभावे पूर्वस्य हेतोरसाधकत्वान्निग्रहस्थानम्, हेत्वन्तरवचने सति यदि हेत्वर्थनिदर्शनो दृष्टान्त उपादीयते ? नेदं व्यक्तमेकप्रकृति भवति; प्रकृत्यन्तरो- पादानात् । अथ नोपादीयते ? दृष्टान्ते हेत्वर्थस्यानिदर्शितस्य साधकाभावानु- पपत्तेरानर्थक्याद्धेतोरनिवृत्तं निग्रहस्थानमिति ॥ ६ ॥ निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ ७-१० ] प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम् ॥ ७ ॥ यथोक्तलक्षणे पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहे हेतुतः साध्यसिद्धौ प्रकृतायां ब्रूयात् नित्यः शब्दो ऽस्पर्शत्वादिति हेतोः । हेतुर्नाम हिनोतेर्धातोस्तुन् प्रत्यये कृदन्तपदम्, प्रत्येक में व्यक्त है । यों एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण से सांख्यानुयायी मानते हैं— 'यह व्यक्त एकप्रकृति है' । प्रतिवादी इसका व्यभिचार से निषेध करता है—'नानाप्रकृतिक तथा एकप्रकृतिक ऐसे दोनों तरह के विकारों का परिमाण लोक में देखा जाता है' । यों, प्रतिषेध किये जाने पर वादी फिर कहता है—'एकप्रकृतिसमन्वय होने की अवस्था में शरावादि विकारों में परिमाण देखा जाने से, सुख-दुःख-मोह-समन्वित यह व्यक्त विशिष्टतया ही गृहीत होता है, तात्पर्य यह है कि इस हेतु में प्रकृत्यन्तररूप समन्वय के अभाव होने पर एक- प्रकृतित्व है' । यों यह, सामान्यरूपेण उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर, हेतुविशेष का निवेश करने पर वादी का हेत्वन्तर हो जाता है । हेत्वन्तरत्व हो जाने पर हेतु के असाधक हो जाने से वह निग्रहस्थान हो गया । हेत्वन्तरवचन होने पर भी, यदि हेत्वर्थनिदर्शन ( साध्य- साधनभाव का व्याप्यव्यापकभाव से निदर्शन ) के लिये दृष्टान्त का उपादान किया जाता है तो प्रकृत्यन्तरोपादान की संभावना से यह व्यक्त का एकप्रकृतित्व नहीं सिद्ध होता । तथा यदि उपादान नहीं किया जाता तो अनिदर्शित हेत्वर्थ में साधकत्व का उपपादन न होने से दृष्टान्त का हेतु निग्रहस्थान रह ही गया ॥ ६ ॥ प्रकृत अर्थ से असम्बद्ध अर्थ कहना 'अर्थान्तर' निग्रहस्थान है ॥ ७ ॥ यथोक्तलक्षण पक्षप्रतिपक्षपरिग्रह में हेतु से साध्य-सिद्धि करना चाहने पर कोई कहे— 'शब्द नित्य है' । इस में 'अस्पर्शत्व होने से' हेतु दे । यहाँ 'हेतु' शब्द 'हि गतो वृद्धौ च'
३७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० पदं च नामाख्यातोपसर्गनिपाताः, अभिधेयस्य क्रियान्तरयोगाद्विशिष्यमाणरूपः शब्दो नाम१, क्रियाकारक समुदायः, कारकसङ्ख्याविशिष्टक्रियाकालयोगाभि- धाय्याख्यातम्, धात्वर्थमात्रं च कालाभिधानविशिष्टम्, प्रयोगेष्वर्थादभिद्य- मानरूपा निपाताः, उपसृज्यमानाः क्रियाद्योतका उपसर्गा इत्येवमादि— तदर्थान्तरं वेदितव्यमिति ॥ ७ ॥ वर्णक्रमनिर्देशवन्निरर्थकम् ॥ ८ ॥ यथा 'नित्यः शब्दः कचटतपाः, जबगडदशत्वात्, झभञ्घढधषवत्' इति । एवम्प्रकारं निरर्थकम् । अभिधानाभिधेयभावानुपपत्तौ अर्थगतेरभावाद् वर्णा एवं क्रमेण निर्दिश्यन्त इति ॥ ८ ॥ परिषत्प्रतिवादिभ्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञातमविज्ञातार्थम् ॥ ९ ॥ यद्वाक्यं परिषदा प्रतिवादिना च त्रिरभिहितमपि न विज्ञायते श्लिष्ट- ( स्वा० ११, पाणिनीय धातु२) इस धातु से 'कमिमनिजनिगाभायाहिभ्यश्च' इस कृदन्त ( उणादि ) सूत्र से 'तु' प्रत्यय होकर निष्पन्न हुआ है । पद चार प्रकार के होते हैं—१. नाम, २. आख्यात ( तिङन्त ), ३. उपसर्ग, तथा ४. निपात । अभिधेय के क्रियान्तर- सम्बन्ध होने पर विशिष्यमाण रूप 'शब्द' नाम कहलाता है । क्रियाकारक समुदाय या कारक एवं संख्याविशिष्ट क्रिया-कालसम्बन्ध को बतलाने वाला 'आख्यात' कहलाता है । उसमें केवल धात्वर्थ कालाभिधानविशिष्ट होता है । 'निपात' प्रयोगों में अर्थों से अभिद्यमान रूप होते हैं । धातु के समीप में पहले प्रयुक्त होनेवाले 'उपसर्ग' कहलाते हैं । इत्यादि अर्थान्तर जानना चाहिये । यह अर्थान्तरनिग्रहस्थान—वादी, प्रतिवादी— दोनों को ही हो सकता है ॥ ७ ॥ वर्णक्रमनिर्देश की तरह अवाचक-प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है ॥ ८ ॥ जैसे—'कचटतप शब्द नित्य है, ज ब ग ड द श होने से, झ भ ञ घ ढ ध ष' की तरह, इस प्रकार का अवाचक प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है । अभिधानाभिधेय की अनुपपत्ति होने से अर्थबोध नहीं होगा—ऐसा मानकर यहाँ वर्ण का ही क्रमशः निर्देश गया है । इसी तरह भाषानभिज्ञ वादी को अपनी भाषा में हेतु देना भी 'निरर्थक' निग्रह- स्थान है ॥ ८ ॥ परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहने पर भी यदि न समझ पावे तो उसे 'अविज्ञातार्थ' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ ९ ॥ जो वाक्य परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार बोलने पर भी न समझ में आवे. क्योंकि या तो वह वाक्य श्लिष्टपद हो, जैसे—श्वेत दौड़ता है'; या अप्रतीत प्रयोग हो, १. 'यथा वृक्षस्तिष्ठति, वृक्षं च्छिनत्तीति भिन्नक्रियायोगाद्विशिष्यमाणरूपो वृक्ष- शब्दः'—इति तात्पर्याचार्याः । २. द्र०—माधवीया धातुवृत्तिः अस्मत्सम्पादिता ।
१२. सू० ] निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् ३७५
१२. सू० ] निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् ३७५ शब्दमप्रतीतप्रयोगमतिद्रुतोच्चरितमित्येवमादिना कारणेन तदविज्ञातम्— अविज्ञातार्थम् । असामर्थ्यसंवरणाय प्रयुक्तमिति निग्रहस्थानमिति ॥ ९ ॥ पौर्वापर्ययोगादप्रतिसम्बद्धार्थमपार्थकम् ॥ १० ॥ यत्रानेकस्य पदस्य वाक्यस्य वा पौर्वापर्येणान्वययोगो नास्ति इत्यसम्बद्धार्थ- त्वं गृह्यतं तत्समुदायार्थस्यापायादपार्थकम् । यथा—दश दाडिमानि, षडपूपाः, कुण्डम्, अजाजिनम्, पललपिण्डः, अथ रोरुकमेतत्, कुमार्याः पाय्यम्, तस्याः पिता अप्रतिशीन इति ॥ १० ॥ निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ ११-१३ ] अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम् ॥ ११ ॥ प्रतिज्ञादीनामवयवानां यथालक्षणमर्थवशात् क्रमः, तत्रावयवविपर्यासेन वचनमप्राप्तकालमसम्बद्धार्थं निग्रहस्थानमिति ॥ ११ ॥ हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम् ॥ १२ ॥ प्रतिज्ञादीनामन्यतमेनाप्यवयवेन हीनं न्यूनं निग्रहस्थानम्; साधनाभावे साध्यासिद्धिरिति ॥ १२ ॥ जैसे 'जर्फरीतु, तुर्फरीतु' आदि; या बहुत शीघ्रता में बोला जाता हो । इन अवस्थाओं में वह अविज्ञातवाक्य 'अविज्ञातार्थ' कहलाता है। ऐसा प्रयोग अपना असामर्थ्य छिपाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है ॥ ९ ॥ पौर्वापर्य सम्बन्ध से असम्बद्धार्थक को 'अपार्थक' कहते हैं ॥ १० ॥ जहाँ अनेक पदों या वाक्यों का पौर्वापर्य से अन्वयसम्बन्ध न बनता हो उसे असम्बद्धार्थ (परस्परसाकांक्षत्वरहित) कहते हैं। उस समुदाय का कोई अर्थ न लगने से वह 'अपार्थक' निग्रहस्थान है। जैसे—'दस अनार, छह पूए, कुण्ड, अज की चर्म, पललपिण्ड, यह रौरुक है, कुमारी का पेय, उसका पिता अप्रतिशीन (वृद्ध) हैं'—इत्यादि क्लिष्ट (असम्बद्ध) शब्दप्रयोग से एक वाक्य बोल दिया जाये जो कि अपार्थक (परस्परासम्बद्धार्थक) है ॥ १० ॥ अवयवों का विपर्यस्त वचन 'अप्राप्तकाल' कहलाता हैं ॥ ११ ॥ प्रतिज्ञादि पांचों अवयवों का लक्षणनिर्देशानुसार अर्थ की आकांक्षावश क्रम नियत है। वहाँ अवयव-विपर्यास से बोलना असम्बद्धार्थक होता है अतः वह 'अप्राप्तकाल' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ ११ ॥ किसी एक अवयव से हीन को 'न्यून' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ १२ ॥ प्रतिज्ञादि अवयवों में से किसी एक अवयव से हीन प्रयोग को 'न्यून' निग्रहस्थान कहते हैं; क्योंकि अवयवन्यूनता में साधनोपपादन न होने से साध्य की सिद्धि नहीं बनेगी ॥ १२ ॥
पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् [ १४-१५ ]
३७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० हेतूदाहरणाधिकमधिकम् ॥ १३ ॥ एकेन कृतत्वाद् अन्यतरस्यानर्थक्यमिति तदेतन्नियमाभ्युपगमे वेदित- व्यमिति ॥ १३ ॥ पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् [ १४-१५ ] शब्दार्थयोः पुनर्वचनं पुनरुक्तमन्यत्रानुवादात् ॥ १४ ॥ अन्यत्रानुवादात् शब्दपुनरुक्तमर्थपुनरुक्तं वा, नित्यः शब्दो नित्यः शब्द इति शब्दपुनरुक्तम्। अर्थपुनरुक्तम्-अनित्यः शब्दो निरोधधर्मको ध्वनिरिति ॥ १४ ॥ अनुवादे त्वपुनरुक्तं शब्दाभ्यासादर्थविशेषोपपत्तेः' ॥ १५ ॥ यथा हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनमिति ॥ १५ ॥ अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनम् ॥ १६ ॥ पुनरुक्तमिति प्रकृतम्। निदर्शनम्-उत्पत्तिधर्मकत्वादनित्यमित्युक्त्वा अर्थादापन्नस्य योऽभिधायकः शब्दस्तेन स्वशब्देन ब्रूयाद्-अनुत्पत्तिधर्मकं नित्यम् इति, तच्च पुनरुक्तं वेदितव्यम्। अर्थसम्प्रत्ययार्थे शब्दप्रयोगे प्रतीतः सोऽर्थोऽर्था- पत्त्येति ॥ १६ ॥ हेतु तथा उदाहरणों की अधिकता से 'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता हैं ॥ १३ ॥ एक ही हेतु तथा उदाहरण से काम चल जाने पर भी पुनः हेतु आदि का प्रयोग 'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता है। परन्तु परिषद् या प्रतिवादी की जिज्ञासा हो तो अधिक हेतु या उदाहरण दिये जा सकते हैं, तब निग्रहस्थान नहीं होता ॥ १३ ॥ शब्द या अर्थ का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' कहलाता है; अनुवाद को छोड़ कर ॥ १४ ॥ अनुवाद को छोड़कर, पुनरुक्त निग्रहस्थान 'शब्द पुनरुक्त' तथा 'अर्थ-पुनरुक्त'- यों दो प्रकार का है। जैसे 'शब्द नित्य है, शब्द नित्य है'-यह 'शब्दपुनरुक्त' हुआ। 'शब्द अनित्य है, ध्वनि निरोधधर्मक है'-यह 'अर्थपुनरुक्त' हुआ ॥ १४ ॥ अनुवाद में दो बार बोलना 'पुनरुक्त' नहीं होता, क्योंकि वहाँ शब्द के दुहराने से अर्थविशेष का बोध होता है ॥ १५ ॥ जैसे हेतुकथन के अनन्तर प्रतिज्ञा का पुनः दुहराना 'निगमन' कहलाता है ॥ १५ ॥ अर्थादापन्न (अर्थ से गृहीत) का स्वशब्द से पुनर्वचन भी ॥ १६ ॥ 'पुनरुक्त' कहलाता है। उदाहरण है जैसे-'उत्पत्तिधर्मक होने से अनित्य हैं'- कहकर अर्थादापन्न वस्तु के बोधक शब्द को पुनः कहना कि 'अनुत्पत्तिधर्मक अनित्य होता है।' यह अर्थादापन्न का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' समझना चाहिये। अर्थज्ञान के लिए शब्द-प्रयोग होने पर जिस अर्थ को अवगत कराता है वह अर्थ अर्थापत्ति से भी गृहीत हो सकता है। अतः उसका पुनर्वचन निग्रहस्थान माना गया है ॥ १६ ॥ १. न्यायसूचीनिबन्धेऽसंगृहीतमपीदं सूत्रं वार्तिकस्वारस्येनात्र गृहीतम् ।
२०. सू० ] उत्तरविरोघिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७७
२०. सू० ] उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७७ उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ १७-२० ] विज्ञातस्य परिषदा त्रिरभिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभाषणम् ॥ १७ ॥ विज्ञातस्य वाक्यार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना वा त्रिरभिहितस्य यदप्रत्यु- च्चारणं तदननुभाषणं नाम निग्रहस्थानमिति । अप्रत्युच्चारयन् किमाश्रयं परपक्षप्रतिषेधं ब्रूयात् ! ॥ १७ ॥ अविज्ञातं चाज्ञानम् ॥ १८ ॥ विज्ञातार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना त्रिरभिहितस्य यदविज्ञानं तदज्ञानं निग्रहस्थानमिति । अयं खल्वविज्ञाय कस्य प्रतिषेधं ब्रूयादिति ॥ १८ ॥ उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा ॥ १९ ॥ परपक्षप्रतिषेध उत्तरम्, तद्यदा न प्रतिपद्यते तदा निगृहीतो भवति ॥ १९ ॥ कार्यव्यासङ्गात् कथाविच्छेदो विक्षेपः ॥ २० ॥ यत्र कर्तव्यं व्यासज्य कथां व्यवच्छिनत्ति—'इदं मे करणीयं विद्यते तस्मिन्न- वसिते पश्चात्कथयामि' इति विक्षेपो नाम निग्रहस्थानम् । एकनिग्रहावसानायां कथायां स्वयमेव कथान्तरं प्रतिपद्यत इति ॥ २० ॥ परिषद् द्वारा जाने हुए अर्थ का तीन बार कहे जाने पर भी उच्चारण न करना 'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १७ ॥ परिषद् द्वारा जाने अर्थ को प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहे जाने पर भी ( ज्ञात वाक्यार्थ का ) उच्चारण न करना 'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है । ( वादी ) उच्चारण नहीं करता है तो किसका सहारा लेकर प्रतिवादी का खण्डन करेगा ! ॥१७॥ जिसे न समझ पाये वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १८ ॥ प्रतिवादी द्वारा तीन बार उक्त तथा परिषद् द्वारा ज्ञात अर्थ को वादी जब न समझ पावे वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान है । यह बिना जाने किसका खण्डन करेगा ! ॥ १८ ॥ उत्तर न देना 'अप्रतिभा' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १९ ॥ परपक्ष का खण्डन 'उत्तर' कहलाता है, उसे जब नहीं समझता या वह नहीं स्फुरित होता है तो वादी निगृहीत हो जाता है ॥ १९ ॥ कार्य-व्यासक्तिव्याज से कथाविच्छेद करना 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता है ॥२०॥ जहाँ अन्य कार्य में व्यासक्त दिखाकर कथा ( वाद ) को रोक दे कि 'आज तो अब मुझे कुछ कार्य है, उसको पूरा कर उत्तर दे सकूँगा' यह 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता है । यद्यपि कार्यव्यासङ्ग से कथा रोक देने पर स्पष्टतः यह तो सिद्ध नहीं होता कि वादी को उत्तर नहीं आया, अतः कथा से उठ गया; क्योंकि हो सकता है कि कार्यावसान के बाद वह उचित उत्तर दे सके, परन्तु इस वर्तमान कथा में तो उत्तर न दे पाने से अभी तो उसका निग्रह हो ही गया । जब कार्यावसानान्तर उत्तर देगा तो वह प्रारम्भ दूसरी कथा का ही कहलायेगा ॥ २० ॥
मतानुज्ञादिनिग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ २१-२३ ]
३७८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० मतानुज्ञादिनिग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ २१-२३ ] स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात् परपक्षे दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा ॥ २१ ॥ यः परेण चोदितं दोषं स्वपक्षेऽभ्युपगम्यानुद्धृत्य वदति—भवत्पक्षेऽपि समानो दोष इति—स स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात् परपक्षे दोषं प्रसञ्जयन् परमत- मनुजानातीति मतानुज्ञा नाम निग्रहस्थानमापद्यत इति ॥ २१ ॥ निग्रहस्थानप्राप्तस्यानिग्रहः पर्यनुयोज्योपेक्षणम् ॥ २२ ॥ पर्यनुयोज्यो नाम निग्रहोपपत्त्या चोदनीयः, तस्योपेक्षणं निग्रहस्थानं प्राप्तो- सीत्यननयोगः। एतच्च कस्य पराजय इत्यनुयुक्तया परिषदा वचनीयम्, न खलु निग्रहं प्राप्तः स्वकौपीनं विवृणुयादिति ॥ २२॥ अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्यानुयोगः ॥ २३ ॥ निग्रहस्थानलक्षणस्य मिथ्याऽध्यवसायादनिग्रहस्थाने निगृहीतोऽसीति परं ब्रुवन् निरनुयोज्यानुयोगान्निगृहीतो वेदितव्य इति ॥ २३ ॥ कथकान्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् [ २४-२५ ] सिद्धान्तमभ्युपेत्यानियमात् कथाप्रसङ्गोऽपसिद्धान्तः ॥ २४ ॥ स्वपक्ष में दोषस्वीकृति से परपक्ष में दोष दिखाना 'मतानुज्ञा' निग्रहस्थान है ॥२१॥ जो प्रतिवादी द्वारा उठाये गये दोष को अपने मत में स्वीकार करके उसको खंडित न कर कहे—'आपके पक्ष में यह दोष है', तो वह अपने पक्ष में दोष स्वीकार करता हुआ तथा परपक्ष में दोष दिखाता हुआ परपक्ष को स्वीकार करता है, यह 'मतानुज्ञा' निग्रहस्थान है ॥ २१ ॥ निग्रहस्थानप्राप्त वादी का निग्रह न करना 'पर्यनुयोज्योपेक्षण' निग्रहस्थान है ॥२२॥ पर्यनुयोज्य का अर्थ है—निग्रहोपपादन से अभियोज्य ( तिरस्करणीय )। उसकी उपेक्षा अर्थात् 'तुम निग्रहस्थान को प्राप्त हो गये हो' ऐसा न कहना यही अननुयोग है। यहाँ किसकी पराजय हुई यह परिषद् को ही निर्णय करना चाहिये। अन्यथा जो निगृहीत हो चुका, वह स्वयं अपना निगृहीतत्व क्यों स्वीकार करेगा ! ॥ २२ ॥ अनिग्रहस्थानप्राप्त को निगृहीत करना 'निरनुयोज्यानुप्रयोग' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ २३ ॥ निग्रहस्थानलक्षणक मिथ्याध्यवसाय से अनिग्रहस्थान में भी परपक्ष को 'तुम निग्रह- स्थान को प्राप्त हो चुके हो'—ऐसा कहनेवाला 'निरनुयोज्यानुयोग' निग्रहस्थान से निगृहीत हो जाता है ॥ २३ ॥ सिद्धान्त की प्रतिज्ञा करके उसमें नियम से न रह कर अन्य रीति से वाद उठाना 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ २४ ॥
२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९
२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९ कस्यचिदर्थस्य तथाभावं प्रतिज्ञाय प्रतिज्ञातार्थविपर्ययाद् अनियमात् कथां प्रसञ्जयतोऽपसिद्धान्तो वेदितव्यः। यथा 'न सदात्मानं जहाति, न सतो विनाशः, नासदात्मानं लभते, नासदुत्पद्यते' इति सिद्धान्तमभ्युपेत्य स्वपक्षं व्यवस्थापयति- 'एकप्रकृतीदं व्यक्तं विकाराणामन्वयदर्शनात् । मृदन्वितानां शरावादीनां दृष्टमेकप्रकृतित्वम्, तथा चायं व्यक्तभेदः सुखदुःखमोहान्वितो दृश्यते, तस्मात् समन्वयदर्शनात् सुखादिभिरेकप्रकृतीदं शरीरम्' इति । एवमुक्तवाननुयुज्यते-'अथ प्रकृतिविकार इति कथं लक्षितव्यमिति' ? यस्यानवस्थितस्य धर्मान्तरनिवृत्तौ धर्मान्तरं प्रवर्त्तते सा प्रकृतिः, यच्च धर्मान्तरं प्रवर्त्तते निवर्त्तते वा स विकार इति । सोऽयं प्रतिज्ञातार्थविपर्यासादनियमात् कथां प्रसञ्जयति, प्रतिज्ञातं खल्वनेन- नासदाविर्भवति न सत्तिरोभवतीति । सदसतोश्च तिरोभावाविर्भावमन्तरेण न कस्यचित्प्रवृत्तिः प्रवृत्त्युपरमश्च भवति । मृदि खल्ववस्थितायां भविष्यति शरा- वादिलक्षणं धर्मान्तरमिति प्रवृत्तिर्भवति, अभूदिति च प्रवृत्त्युपरमः, तदेतन्मृद्धर्मा- णमापि न स्यात् । एवं प्रत्यवस्थितो यदि सतश्चात्महानमसतरचात्मलाभम- भ्युपैति तदस्यानपसिद्धान्तो निग्रहस्थानं भवति, अथ नाभ्युपैति पक्षोऽस्य न सिध्यति ॥ २४ ॥ किसी अर्थ के तथात्व ( तद्वस्तुनिष्ठितत्व ) को प्रतिज्ञात कर उस अर्थ से विपरीत अनियम से कथा-प्रसङ्ग करने वाले का 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान समझना चाहिये । जैसे कोई वादी 'सत् अपने स्वत्व को नहीं छोड़ता, सत् का नाश नहीं होता, असत् स्वरूप में नहीं रहता, असत् उत्पन्न नहीं होता।' इस सिद्धान्त को स्वीकार कर स्वपक्ष स्थापित करता हैं-'यह व्यक्त एक-प्रकृति है, विकारों में प्रकृति का सम्बन्ध देखा जाने से । मृत्तिकान्वित शरावादि लोक में एकप्रकृतिक देखे जाते हैं, तथा च-यह व्यक्तभेद ( शरीर ) सुखदुःखमोहान्वित देखा जाता है, अतः इस समन्वयदर्शन से यह शरीर- सुखादि के समन्वय से एकप्रकृति है।' ऐसा कहनेवाले इस वादी को पूछना चाहिये- 'यह प्रकृति है, यह विकार है ?'-यह भेद कैसे करें ? जिसके रहते धर्मान्तर की निवृत्ति होने पर धर्मान्तर प्रवृत्त होता है वह 'प्रकृति' होती है तथा जो धर्मान्तर प्रवृत्त तथा निवृत्त होता रहता है, वह 'विकार' कहलाता है। यों, प्रतिज्ञातार्थ के विपर्यास द्वारा वादी नियम-भङ्ग कर कथा प्रारम्भ करता है। इसने प्रतिज्ञा की थी-असत् का आविर्भाव नहीं होता, सत् का तिरोभाव नहीं होता' । सत् असत् के तिरोभाव, आविर्भाव के विना किसी की प्रवृत्ति तथा निवृत्ति नहीं होती ! मृत्तिका के रहने पर ही शरा- वादिलक्षण धर्मान्तर होगा, अतः प्रवृत्ति हो जाती है, 'था' इस तरह विनाश हो जाता है। यह स्थिति मृत्तिका के विकारों में ( उत्पाद-विनाश ) नहीं हो पायेगी। इस तरह प्रतिषेध करने पर, यदि वादी सत् का नाश तथा असत् का उत्पाद स्वीकार करता है, तो यह उसका 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान हो जायेगा; यदि नहीं स्वीकार करता है तो उसका पक्ष सिद्ध नहीं होगा।