भारतकोश
संग्रह पर लौटें

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः प्रतिज्ञाविरोधः ॥ ४ ॥ गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यमिति प्रतिज्ञा, रूपांदितोऽर्थान्तरस्यानुपलब्धेरिति हेतुः, सोऽयं प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः । कथम् ! यदि गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्, रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिर्नोपपद्यते । अथ रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिः, 'गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्' इति नोपपद्यते, गुणव्यतिरिक्तं च द्रव्यं रूपादिभ्यश्चा- र्थान्तरस्यानुपलब्धिरिति विरुध्यते = व्याहन्यते, न सम्भवतीति ॥ ४ ॥ पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्थापनयनं प्रतिज्ञासंन्यासः ॥ ५ ॥ 'अनित्यः शब्द ऐन्द्रियकत्वात्' इत्युक्ते परो ब्रूयात्—'सामान्यमैन्द्रियकं न चानित्यमेवं शब्दोऽप्यैन्द्रियको न चानित्यः' इति । एवं प्रतिषिद्धे पक्षे यदि ब्रूयात्—'कः पुनराह अनित्यः शब्दः' इति ! सोऽयं प्रतिज्ञातार्थनिह्नवः प्रतिज्ञा- संन्यास इति ॥ ५ ॥ अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरम् ॥ ६ ॥ निदर्शनम्—'एकप्रकृतीदं व्यक्तम्' इति प्रतिज्ञा, कस्माद्धेतोः ? एकप्रकृतीनां विकाराणां परिमाणात् । मृत्पूर्वकाणां शरावादीनां दृष्टं परिमाणम् । यावान् प्रकृतेर्व्यूहो भवति तावान् विकार इति, दृष्टं च प्रतिविकारं परिमाणम् । प्रतिज्ञा तथा हेतु का परस्पर विरोध 'प्रतिज्ञाविरोध' कहलाता है ॥ ४ ॥ 'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह प्रतिज्ञा हुई । 'रूपादि से अर्थान्तर की उपलब्धि न होने से'—यह हेतु है । यहाँ प्रतिज्ञा-हेतु का विरोध है । कैसे ? यदि द्रव्य गुण- व्यतिरिक्त है तो रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि उपपन्न नहीं होती । तथा यदि रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि है तो 'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह उपपन्न नहीं होता । द्रव्य गुणव्यतिरिक्त हो तथा रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि भी हो ये दोनों विषय परस्पर विरुद्ध हैं, यों विरुद्ध होने से ये दोनों बातें (प्रतिज्ञा और हेतु) एक साथ सम्भव नहीं ॥ ४ ॥ स्वपक्षप्रतिषेध होने पर प्रतिज्ञातार्थ को छिपाना 'प्रतिज्ञा-संन्यास' कहलाता है ॥ ५ ॥ 'शब्द अनित्य है, ऐन्द्रियक होने से' ऐसा कहने पर प्रतिवादी कहे—'सामान्य ऐन्द्रियक है, पर अनित्य नहीं है; इसी तरह शब्द भी ऐन्द्रियक है; वह भी अनित्य नहीं' । यों प्रतिषिद्ध होने पर वादी यदि यह कहें—'हमने कब कहा कि शब्द अनित्य है !' यह प्रतिज्ञातार्थनिह्नव (उसको छिपाना या उससे हट जाना) 'प्रतिज्ञासंन्यास' कहलाता हैं ॥५॥ सामान्य रूप से उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर उसमें कुछ 'विशेष' लगाकर सिद्धि चाहने वाले का 'हेत्वन्तर' निग्रहस्थान होता है ॥ ६ ॥ उदाहरण—वादी ( साङ्ख्यमतानुयायी ) की प्रतिज्ञा है—'व्यक्त एकप्रकृति है', किस हेतु से ? 'एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण होने से' । मृत्तिका से बने शरावादि में परिमाण देखा जाता है, जितने प्रकार की प्रकृति का संस्थान होता है उन सभी का विकार देखा जाता है। प्रत्येक विकार में परिमाण भी देखा जाता है । यह परिमाण

पादानात् । अथ नोपादीयते ? दृष्टान्ते हेत्वर्थस्यानिदर्शितस्य साधकाभावानु-

७. सू० ] निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७३ अस्ति चेदं परिमाणं प्रतिव्यक्तम्, तदेकप्रकृतीनां विकाराणां परिमाणात्पश्यामः- व्यक्तमिदमेकप्रकृतीति । अस्य व्यभिचारेण प्रत्यवस्थानम्-नानाप्रकृतीनामेकप्रकृतीनां च विकाराणां दृष्टं परिमाणमिति । एवं प्रत्यवस्थिते आह-एकप्रकृतिसमन्वये सति शरावादि- विकाराणां परिमाणदर्शनात्, सुखदुःखमोहसमन्वितं हीदं व्यक्तं परिमितं गृह्यते, तत्र प्रकृत्यन्तररूपसमन्वयाभावे सत्येकप्रकृतित्वमिति । तदिदमविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषं ब्रुवतो हेत्वन्तरं भवति । सति च हेत्वन्तरभावे पूर्वस्य हेतोरसाधकत्वान्निग्रहस्थानम्, हेत्वन्तरवचने सति यदि हेत्वर्थनिदर्शनो दृष्टान्त उपादीयते ? नेदं व्यक्तमेकप्रकृति भवति; प्रकृत्यन्तरो- पादानात् । अथ नोपादीयते ? दृष्टान्ते हेत्वर्थस्यानिदर्शितस्य साधकाभावानु- पपत्तेरानर्थक्याद्धेतोरनिवृत्तं निग्रहस्थानमिति ॥ ६ ॥ निग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ ७-१० ] प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम् ॥ ७ ॥ यथोक्तलक्षणे पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहे हेतुतः साध्यसिद्धौ प्रकृतायां ब्रूयात् नित्यः शब्दो ऽस्पर्शत्वादिति हेतोः । हेतुर्नाम हिनोतेर्धातोस्तुन् प्रत्यये कृदन्तपदम्, प्रत्येक में व्यक्त है । यों एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण से सांख्यानुयायी मानते हैं— 'यह व्यक्त एकप्रकृति है' । प्रतिवादी इसका व्यभिचार से निषेध करता है—'नानाप्रकृतिक तथा एकप्रकृतिक ऐसे दोनों तरह के विकारों का परिमाण लोक में देखा जाता है' । यों, प्रतिषेध किये जाने पर वादी फिर कहता है—'एकप्रकृतिसमन्वय होने की अवस्था में शरावादि विकारों में परिमाण देखा जाने से, सुख-दुःख-मोह-समन्वित यह व्यक्त विशिष्टतया ही गृहीत होता है, तात्पर्य यह है कि इस हेतु में प्रकृत्यन्तररूप समन्वय के अभाव होने पर एक- प्रकृतित्व है' । यों यह, सामान्यरूपेण उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर, हेतुविशेष का निवेश करने पर वादी का हेत्वन्तर हो जाता है । हेत्वन्तरत्व हो जाने पर हेतु के असाधक हो जाने से वह निग्रहस्थान हो गया । हेत्वन्तरवचन होने पर भी, यदि हेत्वर्थनिदर्शन ( साध्य- साधनभाव का व्याप्यव्यापकभाव से निदर्शन ) के लिये दृष्टान्त का उपादान किया जाता है तो प्रकृत्यन्तरोपादान की संभावना से यह व्यक्त का एकप्रकृतित्व नहीं सिद्ध होता । तथा यदि उपादान नहीं किया जाता तो अनिदर्शित हेत्वर्थ में साधकत्व का उपपादन न होने से दृष्टान्त का हेतु निग्रहस्थान रह ही गया ॥ ६ ॥ प्रकृत अर्थ से असम्बद्ध अर्थ कहना 'अर्थान्तर' निग्रहस्थान है ॥ ७ ॥ यथोक्तलक्षण पक्षप्रतिपक्षपरिग्रह में हेतु से साध्य-सिद्धि करना चाहने पर कोई कहे— 'शब्द नित्य है' । इस में 'अस्पर्शत्व होने से' हेतु दे । यहाँ 'हेतु' शब्द 'हि गतो वृद्धौ च'

३७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० पदं च नामाख्यातोपसर्गनिपाताः, अभिधेयस्य क्रियान्तरयोगाद्विशिष्यमाणरूपः शब्दो नाम१, क्रियाकारक समुदायः, कारकसङ्ख्याविशिष्टक्रियाकालयोगाभि- धाय्याख्यातम्, धात्वर्थमात्रं च कालाभिधानविशिष्टम्, प्रयोगेष्वर्थादभिद्य- मानरूपा निपाताः, उपसृज्यमानाः क्रियाद्योतका उपसर्गा इत्येवमादि— तदर्थान्तरं वेदितव्यमिति ॥ ७ ॥ वर्णक्रमनिर्देशवन्निरर्थकम् ॥ ८ ॥ यथा 'नित्यः शब्दः कचटतपाः, जबगडदशत्वात्, झभञ्घढधषवत्' इति । एवम्प्रकारं निरर्थकम् । अभिधानाभिधेयभावानुपपत्तौ अर्थगतेरभावाद् वर्णा एवं क्रमेण निर्दिश्यन्त इति ॥ ८ ॥ परिषत्प्रतिवादिभ्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञातमविज्ञातार्थम् ॥ ९ ॥ यद्वाक्यं परिषदा प्रतिवादिना च त्रिरभिहितमपि न विज्ञायते श्लिष्ट- ( स्वा० ११, पाणिनीय धातु२) इस धातु से 'कमिमनिजनिगाभायाहिभ्यश्च' इस कृदन्त ( उणादि ) सूत्र से 'तु' प्रत्यय होकर निष्पन्न हुआ है । पद चार प्रकार के होते हैं—१. नाम, २. आख्यात ( तिङन्त ), ३. उपसर्ग, तथा ४. निपात । अभिधेय के क्रियान्तर- सम्बन्ध होने पर विशिष्यमाण रूप 'शब्द' नाम कहलाता है । क्रियाकारक समुदाय या कारक एवं संख्याविशिष्ट क्रिया-कालसम्बन्ध को बतलाने वाला 'आख्यात' कहलाता है । उसमें केवल धात्वर्थ कालाभिधानविशिष्ट होता है । 'निपात' प्रयोगों में अर्थों से अभिद्यमान रूप होते हैं । धातु के समीप में पहले प्रयुक्त होनेवाले 'उपसर्ग' कहलाते हैं । इत्यादि अर्थान्तर जानना चाहिये । यह अर्थान्तरनिग्रहस्थान—वादी, प्रतिवादी— दोनों को ही हो सकता है ॥ ७ ॥ वर्णक्रमनिर्देश की तरह अवाचक-प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है ॥ ८ ॥ जैसे—'कचटतप शब्द नित्य है, ज ब ग ड द श होने से, झ भ ञ घ ढ ध ष' की तरह, इस प्रकार का अवाचक प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है । अभिधानाभिधेय की अनुपपत्ति होने से अर्थबोध नहीं होगा—ऐसा मानकर यहाँ वर्ण का ही क्रमशः निर्देश गया है । इसी तरह भाषानभिज्ञ वादी को अपनी भाषा में हेतु देना भी 'निरर्थक' निग्रह- स्थान है ॥ ८ ॥ परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहने पर भी यदि न समझ पावे तो उसे 'अविज्ञातार्थ' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ ९ ॥ जो वाक्य परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार बोलने पर भी न समझ में आवे. क्योंकि या तो वह वाक्य श्लिष्टपद हो, जैसे—श्वेत दौड़ता है'; या अप्रतीत प्रयोग हो, १. 'यथा वृक्षस्तिष्ठति, वृक्षं च्छिनत्तीति भिन्नक्रियायोगाद्विशिष्यमाणरूपो वृक्ष- शब्दः'—इति तात्पर्याचार्याः । २. द्र०—माधवीया धातुवृत्तिः अस्मत्सम्पादिता ।

१२. सू० ] निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् ३७५

१२. सू० ] निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् ३७५ शब्दमप्रतीतप्रयोगमतिद्रुतोच्चरितमित्येवमादिना कारणेन तदविज्ञातम्— अविज्ञातार्थम् । असामर्थ्यसंवरणाय प्रयुक्तमिति निग्रहस्थानमिति ॥ ९ ॥ पौर्वापर्ययोगादप्रतिसम्बद्धार्थमपार्थकम् ॥ १० ॥ यत्रानेकस्य पदस्य वाक्यस्य वा पौर्वापर्येणान्वययोगो नास्ति इत्यसम्बद्धार्थ- त्वं गृह्यतं तत्समुदायार्थस्यापायादपार्थकम् । यथा—दश दाडिमानि, षडपूपाः, कुण्डम्, अजाजिनम्, पललपिण्डः, अथ रोरुकमेतत्, कुमार्याः पाय्यम्, तस्याः पिता अप्रतिशीन इति ॥ १० ॥ निग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ ११-१३ ] अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम् ॥ ११ ॥ प्रतिज्ञादीनामवयवानां यथालक्षणमर्थवशात् क्रमः, तत्रावयवविपर्यासेन वचनमप्राप्तकालमसम्बद्धार्थं निग्रहस्थानमिति ॥ ११ ॥ हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम् ॥ १२ ॥ प्रतिज्ञादीनामन्यतमेनाप्यवयवेन हीनं न्यूनं निग्रहस्थानम्; साधनाभावे साध्यासिद्धिरिति ॥ १२ ॥ जैसे 'जर्फरीतु, तुर्फरीतु' आदि; या बहुत शीघ्रता में बोला जाता हो । इन अवस्थाओं में वह अविज्ञातवाक्य 'अविज्ञातार्थ' कहलाता है। ऐसा प्रयोग अपना असामर्थ्य छिपाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है ॥ ९ ॥ पौर्वापर्य सम्बन्ध से असम्बद्धार्थक को 'अपार्थक' कहते हैं ॥ १० ॥ जहाँ अनेक पदों या वाक्यों का पौर्वापर्य से अन्वयसम्बन्ध न बनता हो उसे असम्बद्धार्थ (परस्परसाकांक्षत्वरहित) कहते हैं। उस समुदाय का कोई अर्थ न लगने से वह 'अपार्थक' निग्रहस्थान है। जैसे—'दस अनार, छह पूए, कुण्ड, अज की चर्म, पललपिण्ड, यह रौरुक है, कुमारी का पेय, उसका पिता अप्रतिशीन (वृद्ध) हैं'—इत्यादि क्लिष्ट (असम्बद्ध) शब्दप्रयोग से एक वाक्य बोल दिया जाये जो कि अपार्थक (परस्परासम्बद्धार्थक) है ॥ १० ॥ अवयवों का विपर्यस्त वचन 'अप्राप्तकाल' कहलाता हैं ॥ ११ ॥ प्रतिज्ञादि पांचों अवयवों का लक्षणनिर्देशानुसार अर्थ की आकांक्षावश क्रम नियत है। वहाँ अवयव-विपर्यास से बोलना असम्बद्धार्थक होता है अतः वह 'अप्राप्तकाल' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ ११ ॥ किसी एक अवयव से हीन को 'न्यून' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ १२ ॥ प्रतिज्ञादि अवयवों में से किसी एक अवयव से हीन प्रयोग को 'न्यून' निग्रहस्थान कहते हैं; क्योंकि अवयवन्यूनता में साधनोपपादन न होने से साध्य की सिद्धि नहीं बनेगी ॥ १२ ॥

पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् [ १४-१५ ]

३७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० हेतूदाहरणाधिकमधिकम् ॥ १३ ॥ एकेन कृतत्वाद् अन्यतरस्यानर्थक्यमिति तदेतन्नियमाभ्युपगमे वेदित- व्यमिति ॥ १३ ॥ पुनरुक्तनिग्रहस्थानप्रकरणम् [ १४-१५ ] शब्दार्थयोः पुनर्वचनं पुनरुक्तमन्यत्रानुवादात् ॥ १४ ॥ अन्यत्रानुवादात् शब्दपुनरुक्तमर्थपुनरुक्तं वा, नित्यः शब्दो नित्यः शब्द इति शब्दपुनरुक्तम्। अर्थपुनरुक्तम्-अनित्यः शब्दो निरोधधर्मको ध्वनिरिति ॥ १४ ॥ अनुवादे त्वपुनरुक्तं शब्दाभ्यासादर्थविशेषोपपत्तेः' ॥ १५ ॥ यथा हेत्वपदेशात् प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं निगमनमिति ॥ १५ ॥ अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनम् ॥ १६ ॥ पुनरुक्तमिति प्रकृतम्। निदर्शनम्-उत्पत्तिधर्मकत्वादनित्यमित्युक्त्वा अर्थादापन्नस्य योऽभिधायकः शब्दस्तेन स्वशब्देन ब्रूयाद्-अनुत्पत्तिधर्मकं नित्यम् इति, तच्च पुनरुक्तं वेदितव्यम्। अर्थसम्प्रत्ययार्थे शब्दप्रयोगे प्रतीतः सोऽर्थोऽर्था- पत्त्येति ॥ १६ ॥ हेतु तथा उदाहरणों की अधिकता से 'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता हैं ॥ १३ ॥ एक ही हेतु तथा उदाहरण से काम चल जाने पर भी पुनः हेतु आदि का प्रयोग 'अधिक' निग्रहस्थान कहलाता है। परन्तु परिषद् या प्रतिवादी की जिज्ञासा हो तो अधिक हेतु या उदाहरण दिये जा सकते हैं, तब निग्रहस्थान नहीं होता ॥ १३ ॥ शब्द या अर्थ का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' कहलाता है; अनुवाद को छोड़ कर ॥ १४ ॥ अनुवाद को छोड़कर, पुनरुक्त निग्रहस्थान 'शब्द पुनरुक्त' तथा 'अर्थ-पुनरुक्त'- यों दो प्रकार का है। जैसे 'शब्द नित्य है, शब्द नित्य है'-यह 'शब्दपुनरुक्त' हुआ। 'शब्द अनित्य है, ध्वनि निरोधधर्मक है'-यह 'अर्थपुनरुक्त' हुआ ॥ १४ ॥ अनुवाद में दो बार बोलना 'पुनरुक्त' नहीं होता, क्योंकि वहाँ शब्द के दुहराने से अर्थविशेष का बोध होता है ॥ १५ ॥ जैसे हेतुकथन के अनन्तर प्रतिज्ञा का पुनः दुहराना 'निगमन' कहलाता है ॥ १५ ॥ अर्थादापन्न (अर्थ से गृहीत) का स्वशब्द से पुनर्वचन भी ॥ १६ ॥ 'पुनरुक्त' कहलाता है। उदाहरण है जैसे-'उत्पत्तिधर्मक होने से अनित्य हैं'- कहकर अर्थादापन्न वस्तु के बोधक शब्द को पुनः कहना कि 'अनुत्पत्तिधर्मक अनित्य होता है।' यह अर्थादापन्न का पुनर्वचन 'पुनरुक्त' समझना चाहिये। अर्थज्ञान के लिए शब्द-प्रयोग होने पर जिस अर्थ को अवगत कराता है वह अर्थ अर्थापत्ति से भी गृहीत हो सकता है। अतः उसका पुनर्वचन निग्रहस्थान माना गया है ॥ १६ ॥ १. न्यायसूचीनिबन्धेऽसंगृहीतमपीदं सूत्रं वार्तिकस्वारस्येनात्र गृहीतम् ।

२०. सू० ] उत्तरविरोघिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७७

२०. सू० ] उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् ३७७ उत्तरविरोधिनिग्रहस्थानचतुष्कप्रकरणम् [ १७-२० ] विज्ञातस्य परिषदा त्रिरभिहितस्याप्यप्रत्युच्चारणमननुभाषणम् ॥ १७ ॥ विज्ञातस्य वाक्यार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना वा त्रिरभिहितस्य यदप्रत्यु- च्चारणं तदननुभाषणं नाम निग्रहस्थानमिति । अप्रत्युच्चारयन् किमाश्रयं परपक्षप्रतिषेधं ब्रूयात् ! ॥ १७ ॥ अविज्ञातं चाज्ञानम् ॥ १८ ॥ विज्ञातार्थस्य परिषदा, प्रतिवादिना त्रिरभिहितस्य यदविज्ञानं तदज्ञानं निग्रहस्थानमिति । अयं खल्वविज्ञाय कस्य प्रतिषेधं ब्रूयादिति ॥ १८ ॥ उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा ॥ १९ ॥ परपक्षप्रतिषेध उत्तरम्, तद्यदा न प्रतिपद्यते तदा निगृहीतो भवति ॥ १९ ॥ कार्यव्यासङ्गात् कथाविच्छेदो विक्षेपः ॥ २० ॥ यत्र कर्तव्यं व्यासज्य कथां व्यवच्छिनत्ति—'इदं मे करणीयं विद्यते तस्मिन्न- वसिते पश्चात्कथयामि' इति विक्षेपो नाम निग्रहस्थानम् । एकनिग्रहावसानायां कथायां स्वयमेव कथान्तरं प्रतिपद्यत इति ॥ २० ॥ परिषद् द्वारा जाने हुए अर्थ का तीन बार कहे जाने पर भी उच्चारण न करना 'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १७ ॥ परिषद् द्वारा जाने अर्थ को प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहे जाने पर भी ( ज्ञात वाक्यार्थ का ) उच्चारण न करना 'अननुभाषण' निग्रहस्थान कहलाता है । ( वादी ) उच्चारण नहीं करता है तो किसका सहारा लेकर प्रतिवादी का खण्डन करेगा ! ॥१७॥ जिसे न समझ पाये वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १८ ॥ प्रतिवादी द्वारा तीन बार उक्त तथा परिषद् द्वारा ज्ञात अर्थ को वादी जब न समझ पावे वह 'अज्ञान' निग्रहस्थान है । यह बिना जाने किसका खण्डन करेगा ! ॥ १८ ॥ उत्तर न देना 'अप्रतिभा' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ १९ ॥ परपक्ष का खण्डन 'उत्तर' कहलाता है, उसे जब नहीं समझता या वह नहीं स्फुरित होता है तो वादी निगृहीत हो जाता है ॥ १९ ॥ कार्य-व्यासक्तिव्याज से कथाविच्छेद करना 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता है ॥२०॥ जहाँ अन्य कार्य में व्यासक्त दिखाकर कथा ( वाद ) को रोक दे कि 'आज तो अब मुझे कुछ कार्य है, उसको पूरा कर उत्तर दे सकूँगा' यह 'विक्षेप' निग्रहस्थान कहलाता है । यद्यपि कार्यव्यासङ्ग से कथा रोक देने पर स्पष्टतः यह तो सिद्ध नहीं होता कि वादी को उत्तर नहीं आया, अतः कथा से उठ गया; क्योंकि हो सकता है कि कार्यावसान के बाद वह उचित उत्तर दे सके, परन्तु इस वर्तमान कथा में तो उत्तर न दे पाने से अभी तो उसका निग्रह हो ही गया । जब कार्यावसानान्तर उत्तर देगा तो वह प्रारम्भ दूसरी कथा का ही कहलायेगा ॥ २० ॥

मतानुज्ञादिनिग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ २१-२३ ]

३७८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० मतानुज्ञादिनिग्रहस्थानत्रिकप्रकरणम् [ २१-२३ ] स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात् परपक्षे दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा ॥ २१ ॥ यः परेण चोदितं दोषं स्वपक्षेऽभ्युपगम्यानुद्धृत्य वदति—भवत्पक्षेऽपि समानो दोष इति—स स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात् परपक्षे दोषं प्रसञ्जयन् परमत- मनुजानातीति मतानुज्ञा नाम निग्रहस्थानमापद्यत इति ॥ २१ ॥ निग्रहस्थानप्राप्तस्यानिग्रहः पर्यनुयोज्योपेक्षणम् ॥ २२ ॥ पर्यनुयोज्यो नाम निग्रहोपपत्त्या चोदनीयः, तस्योपेक्षणं निग्रहस्थानं प्राप्तो- सीत्यननयोगः। एतच्च कस्य पराजय इत्यनुयुक्तया परिषदा वचनीयम्, न खलु निग्रहं प्राप्तः स्वकौपीनं विवृणुयादिति ॥ २२॥ अनिग्रहस्थाने निग्रहस्थानाभियोगो निरनुयोज्यानुयोगः ॥ २३ ॥ निग्रहस्थानलक्षणस्य मिथ्याऽध्यवसायादनिग्रहस्थाने निगृहीतोऽसीति परं ब्रुवन् निरनुयोज्यानुयोगान्निगृहीतो वेदितव्य इति ॥ २३ ॥ कथकान्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् [ २४-२५ ] सिद्धान्तमभ्युपेत्यानियमात् कथाप्रसङ्गोऽपसिद्धान्तः ॥ २४ ॥ स्वपक्ष में दोषस्वीकृति से परपक्ष में दोष दिखाना 'मतानुज्ञा' निग्रहस्थान है ॥२१॥ जो प्रतिवादी द्वारा उठाये गये दोष को अपने मत में स्वीकार करके उसको खंडित न कर कहे—'आपके पक्ष में यह दोष है', तो वह अपने पक्ष में दोष स्वीकार करता हुआ तथा परपक्ष में दोष दिखाता हुआ परपक्ष को स्वीकार करता है, यह 'मतानुज्ञा' निग्रहस्थान है ॥ २१ ॥ निग्रहस्थानप्राप्त वादी का निग्रह न करना 'पर्यनुयोज्योपेक्षण' निग्रहस्थान है ॥२२॥ पर्यनुयोज्य का अर्थ है—निग्रहोपपादन से अभियोज्य ( तिरस्करणीय )। उसकी उपेक्षा अर्थात् 'तुम निग्रहस्थान को प्राप्त हो गये हो' ऐसा न कहना यही अननुयोग है। यहाँ किसकी पराजय हुई यह परिषद् को ही निर्णय करना चाहिये। अन्यथा जो निगृहीत हो चुका, वह स्वयं अपना निगृहीतत्व क्यों स्वीकार करेगा ! ॥ २२ ॥ अनिग्रहस्थानप्राप्त को निगृहीत करना 'निरनुयोज्यानुप्रयोग' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ २३ ॥ निग्रहस्थानलक्षणक मिथ्याध्यवसाय से अनिग्रहस्थान में भी परपक्ष को 'तुम निग्रह- स्थान को प्राप्त हो चुके हो'—ऐसा कहनेवाला 'निरनुयोज्यानुयोग' निग्रहस्थान से निगृहीत हो जाता है ॥ २३ ॥ सिद्धान्त की प्रतिज्ञा करके उसमें नियम से न रह कर अन्य रीति से वाद उठाना 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान कहलाता है ॥ २४ ॥

२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९

२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९ कस्यचिदर्थस्य तथाभावं प्रतिज्ञाय प्रतिज्ञातार्थविपर्ययाद् अनियमात् कथां प्रसञ्जयतोऽपसिद्धान्तो वेदितव्यः। यथा 'न सदात्मानं जहाति, न सतो विनाशः, नासदात्मानं लभते, नासदुत्पद्यते' इति सिद्धान्तमभ्युपेत्य स्वपक्षं व्यवस्थापयति- 'एकप्रकृतीदं व्यक्तं विकाराणामन्वयदर्शनात् । मृदन्वितानां शरावादीनां दृष्टमेकप्रकृतित्वम्, तथा चायं व्यक्तभेदः सुखदुःखमोहान्वितो दृश्यते, तस्मात् समन्वयदर्शनात् सुखादिभिरेकप्रकृतीदं शरीरम्' इति । एवमुक्तवाननुयुज्यते-'अथ प्रकृतिविकार इति कथं लक्षितव्यमिति' ? यस्यानवस्थितस्य धर्मान्तरनिवृत्तौ धर्मान्तरं प्रवर्त्तते सा प्रकृतिः, यच्च धर्मान्तरं प्रवर्त्तते निवर्त्तते वा स विकार इति । सोऽयं प्रतिज्ञातार्थविपर्यासादनियमात् कथां प्रसञ्जयति, प्रतिज्ञातं खल्वनेन- नासदाविर्भवति न सत्तिरोभवतीति । सदसतोश्च तिरोभावाविर्भावमन्तरेण न कस्यचित्प्रवृत्तिः प्रवृत्त्युपरमश्च भवति । मृदि खल्ववस्थितायां भविष्यति शरा- वादिलक्षणं धर्मान्तरमिति प्रवृत्तिर्भवति, अभूदिति च प्रवृत्त्युपरमः, तदेतन्मृद्धर्मा- णमापि न स्यात् । एवं प्रत्यवस्थितो यदि सतश्चात्महानमसतरचात्मलाभम- भ्युपैति तदस्यानपसिद्धान्तो निग्रहस्थानं भवति, अथ नाभ्युपैति पक्षोऽस्य न सिध्यति ॥ २४ ॥ किसी अर्थ के तथात्व ( तद्वस्तुनिष्ठितत्व ) को प्रतिज्ञात कर उस अर्थ से विपरीत अनियम से कथा-प्रसङ्ग करने वाले का 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान समझना चाहिये । जैसे कोई वादी 'सत् अपने स्वत्व को नहीं छोड़ता, सत् का नाश नहीं होता, असत् स्वरूप में नहीं रहता, असत् उत्पन्न नहीं होता।' इस सिद्धान्त को स्वीकार कर स्वपक्ष स्थापित करता हैं-'यह व्यक्त एक-प्रकृति है, विकारों में प्रकृति का सम्बन्ध देखा जाने से । मृत्तिकान्वित शरावादि लोक में एकप्रकृतिक देखे जाते हैं, तथा च-यह व्यक्तभेद ( शरीर ) सुखदुःखमोहान्वित देखा जाता है, अतः इस समन्वयदर्शन से यह शरीर- सुखादि के समन्वय से एकप्रकृति है।' ऐसा कहनेवाले इस वादी को पूछना चाहिये- 'यह प्रकृति है, यह विकार है ?'-यह भेद कैसे करें ? जिसके रहते धर्मान्तर की निवृत्ति होने पर धर्मान्तर प्रवृत्त होता है वह 'प्रकृति' होती है तथा जो धर्मान्तर प्रवृत्त तथा निवृत्त होता रहता है, वह 'विकार' कहलाता है। यों, प्रतिज्ञातार्थ के विपर्यास द्वारा वादी नियम-भङ्ग कर कथा प्रारम्भ करता है। इसने प्रतिज्ञा की थी-असत् का आविर्भाव नहीं होता, सत् का तिरोभाव नहीं होता' । सत् असत् के तिरोभाव, आविर्भाव के विना किसी की प्रवृत्ति तथा निवृत्ति नहीं होती ! मृत्तिका के रहने पर ही शरा- वादिलक्षण धर्मान्तर होगा, अतः प्रवृत्ति हो जाती है, 'था' इस तरह विनाश हो जाता है। यह स्थिति मृत्तिका के विकारों में ( उत्पाद-विनाश ) नहीं हो पायेगी। इस तरह प्रतिषेध करने पर, यदि वादी सत् का नाश तथा असत् का उत्पाद स्वीकार करता है, तो यह उसका 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान हो जायेगा; यदि नहीं स्वीकार करता है तो उसका पक्ष सिद्ध नहीं होगा।

सूत्रकार को कहना चाहिये था ? इसी के समाधान के लिये सूत्र में 'यथोक्त' पद दिया

३८० वात्स्यायनभाष्यसहितं न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० हेत्वाभासाश्च यथोक्ताः ॥ २५ ॥ हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानानि । किं पुनर्लक्षणान्तरयोगाद् हेत्वाभासा निग्रहस्थानत्वमापन्नाः, यथा प्रमाणानि प्रमेयत्वम् ? इत्यत आह—यथोक्ता इति । हेत्वाभासलक्षणेनैव निग्रहस्थानभाव इति । त इमे प्रमाणादयः पदार्था उद्दिष्टा लक्षिताः परीक्षिताश्चेति ॥ २५ ॥ योऽक्षपादमृषिं न्यायः प्रत्यभाद् वदतां वरम् । तस्य वात्स्यायन इदं भाष्यजातमवर्तयत् ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ✾ समाप्तं चेदं न्यायदर्शनम् ✾ • और यथोक्त हेत्वाभास भी ॥ २५ ॥ निग्रहस्थान है । क्या जैसे प्रमेयादि लक्षण के योग से प्रमाण कभी-कभी प्रमेय बन जाते हैं, उसी तरह हेत्वाभास भी किसी अन्य लक्षण के योग से निग्रहस्थान बनते हैं ? तो उनका लक्षण सूत्रकार को कहना चाहिये था ? इसी के समाधान के लिये सूत्र में 'यथोक्त' पद दिया है । अर्थात् पूर्वोक्त हेत्वाभास-लक्षणों से ही उनमें निग्रहस्थानत्व आ जायेगा । इस प्रकार ये प्रमाणादि पदार्थ क्रमशः गिना दिये गये, उनका लक्षण कर दिया गया, तथा तत्त्वजिज्ञासु जनों के हितार्थ उनकी यथातथ परीक्षा कर दी गयी ॥ २५ ॥ यह न्यायशास्त्र ऋषिश्रेष्ठ अक्षपाद (गौतम) को अलौकिक शक्ति द्वारा ज्ञानगोचर हुआ था, उसी न्यायशास्त्र के भाष्यरूप इस व्याख्यान की वात्स्यायन ने रचना की ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य( सहित न्यायदर्शन )में पञ्चम अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ✾ पञ्चम अध्याय भी समाप्त ✾ • ✾ न्यायदर्शन समाप्त ✾

सूत्र-सूची

सूत्र-सूची अस्मद्गृहीतो ग्रन्थेऽस्मिन् गौतमः सूत्रसंग्रहः। वाचस्पत्यनुकूलोऽयं दीयते साक्षरक्रमः॥ अणुश्यामानित्यत्ववदेतत्० २७१ अभिव्यक्तौ चाभिभवात् २०२ अणुश्यामानित्यत्ववद्वा ३१४ अभ्यासात् १५२ अत्यन्तप्रायैकदेश० ११९ अभ्युपेत्य कालभेदे० १२८ अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं० २१ अयसोऽयस्कान्ताभिगमस० १९१ अध्यापनादप्रतिषेधः १५१ अरण्यगुहापुलिनादिषु० ३३९ अनर्थापत्तावर्थापत्त्य० १३८ अर्थादापन्नस्य स्वशब्देन० ३७६ अनवस्थाकारित्वादनवस्था० ३३० अर्थापत्तितः प्रतिपक्षासिद्धे० ३५६ अनवस्थायित्वे च० १६५ अर्थापत्तिरप्रमाणमने० १३८ अनिग्रहस्थाने निग्रह० ३७९ अलातचक्रदर्शनं० २६१ अनित्यत्वग्रहाद् बुद्धे० २३७ अवयवनाशेऽप्यवयव्युप० १८२ अनिमित्ततो भावोत्पत्तिः २८४ अवयवविपर्यासवचनम्० ३७५ अनिमित्तनिमित्तत्वान्ना० २८५ अवयवान्तरभावेऽप्यवृत्ते० ३२२ अनियमे नियमान्नियमः १६६ अवयवावयविप्रसङ्गश्चैव० ३२५ अनुक्तस्यार्थापत्तेः० ३५६ अविज्ञातं चाज्ञानम् ३७७ अनुपलब्भात्मकत्वाद० १५० अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे० ५४ अनुपलब्भात्मकत्वादनुप० ३६० अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तु० ६९ अनुपलब्भादप्यनुपलब्धि० १५० अविशेषे वा किञ्चित्साधर्म्यं० ७३ अनुवादे त्वपुनरुक्तं ३७६ अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे० ३७२ अनुवादोपपत्तेश्च १२९ अव्यक्तग्रहणमनवस्था० २५३ अनेकद्रव्यसमवायात्० १९९ अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थित० ७७ अनैकान्तिकः सव्यभिचारः ६३ अव्यूहाविष्टम्भविभुत्वानि० ३२७ अन्तर्बहिश्च कार्यं० ३२७ असत्यर्थे नाभाव इति १४१ अन्यदन्यस्मादन्य० १५३ अस्पर्शत्वात् १५० अपरीक्षिताभ्युपगमात्तद्विशेष० ४६ अस्पर्शत्वादप्रतिषेधः १५७ अपवर्गेऽप्येवं प्रसङ्गः ३३९ अश्रवणकारणानुपलब्धेः १५४ अप्तेजोवायूनां पूर्वं० २१५ अप्रतिघातात्सन्निकर्षोपपत्तिः २०४ आकाशव्यतिभेदात्तदनुपपत्तिः ३२६ अप्रत्यभिज्ञाने च० २२६ आकाशासर्वगतत्वं वा ३२७ अप्रत्यभिज्ञानं च० २२६ आकृतिः तदपेक्षत्वात् सत्त्व० १७१ अप्राप्यग्रहणं काचाभ्रपटल० २०३ आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या० १७३ अभावाद्भावोत्पत्तिः २८०

३८२ न्यायदर्शन- आत्मनित्यत्वे प्रेत्य० २७८ कर्मकारितश्चेन्द्रियाणां० २०० आत्मप्रेरणयहच्छा० २३९ कर्माकाशसाधर्म्या० २२२ आत्मशरीरेन्द्रियार्थबुद्धिमन्० २५ कर्मानवस्थायिग्रहणात् २५२ आदर्शोदकयोः प्रसाद० २०६ कारणद्रव्यस्य प्रदेश० १४७ आदित्यरश्मेः स्फटिकान्त० २०४ कारणान्तरादपि तद्धर्मो० ३५९ आदिमत्त्वादेन्द्रियकत्वात् १४३ कार्यव्यासङ्गात्कथाविच्छेदो० ३७७ आप्तोपदेशः शब्दः २४ कार्यान्तरत्वे प्रयत्नाहेतुत्व० ३६५ आप्तोपदेशसामर्थ्या० १२३ कालात्ययापदिष्टः कालातीतः ६७ आश्रयव्यतिरेकाद् वृक्ष० ३०० कालान्तरेणानिष्पत्ते० २९८ किंचित्साधर्म्यादुप० ३४८ इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःख० २७ कृतताकर्त्तव्यतोपपत्ते० ११९ इन्द्रियान्तरविकारात् १८३ कृत्स्नैकदेशावृत्तित्वाद० ३२१ इन्द्रियार्थपञ्चत्वात् २१० कृष्णसारे सत्युपलम्भाद्० १९७ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं १७ कुड्यान्तरितानुपलब्धे० २०४ इन्द्रियैर्मनसः० २३६ केशसमूहे तैमिरिकोपलब्धि० ३२३ क्रमनिर्देशादप्रतिषेधः २८१ ईश्वरः कारणम् २८२ क्रमवृत्तित्वादयुगपद् ० २२६ क्वचिद्धर्मानुपपत्तेः० ३५७ उत्तरस्याप्रतिपत्तिरप्रतिभा ३७७ क्वचिद्विनाशकारणानुपलब्धेः० २३२ उत्पादव्ययदर्शनात् ३०० क्वचिन्निवृत्तिदर्शनादनिवृत्ति० ९४ उदाहरणसाधर्म्यात् साध्य० ४८ उदाहरणापेक्षस्तथेत्युप० ५१ क्षीरविनाशे कारणानुपलब्धि० २३० उपपत्तिकारणाभ्यनुज्ञाना० ३५९ क्षुदादिभिः प्रवर्त्तनाच्च ३३८ उपलब्धेरद्विप्रवृत्तित्वाद् १२२ गन्धक्लेदपाकव्यूहाव० १९५ उपलभ्यमाने चानुपलब्धे० १५४ गन्धत्वाद्यव्यतिरेकाद्० २११ उभयकारणोपपत्तेरु० ३५८ गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः० ३० उभय साधर्म्यात् प्रक्रियासिद्धेः ३५४ गन्धरसरूपस्पर्शशब्दानां० २१४ उभयोः पक्षयोरन्यतरस्या० १५२ गुणान्तरापत्त्युपमर्द० १६६ गोत्वाद् गोसिद्धिवत्तत्सिद्धिः ३४६ ऋणक्लेशप्रवृत्त्यनुबन्धाद् ० ३०५ घटादिनिष्पत्तिदर्शनात् ३४९ एकधर्मोपपत्तेरविशेषे ३५७ एकविनाशे द्वितीयाविनाशा० १८२ घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्० २९ एकस्मिन्भेदाभावाद् ३२२ . एकैकश्येनोत्तरोत्तरगुण० २१५ एतेनानियमः प्रत्युक्तः २६७ चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् २८ ऐन्द्रियकत्वाद्रूपा० २५९ जातिविशेषे चानियमात् १२६

सूत्रसूची [ ३८३

सूत्रसूची [ ३८३ ज्ञस्येच्छाद्वेषनिमित्त० २४३ तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि १७९ ज्ञातुर्ज्ञानसाधनोपपत्तेः० १८४ तदभावे नास्त्यनन्यता १५३ ज्ञानग्रहणाभ्यासस्तद्विद्यैश्च० ३४१ तदयौगपद्यलिङ्गत्वाच्च० ९८ ज्ञानलिङ्गत्वादात्मनो० ९७ तदर्थं यमनियमाभ्यामात्म० ३४० ज्ञानविकल्पानां च० ३६१ तदसंशयः पूर्वहेतुप्रसिद्धत्वात् ३२० ज्ञानसमवेतात्मप्रदेश० २३७ तदात्मगुणत्वेऽपि तुल्यम् २३५ ज्ञानायौगपद्यादेकं २६१ तदात्मगुणसद्भावादप्रतिषेधः १८४ तदाश्रयत्वादपृथग्० ३३१ तं शिष्यगुरुसब्रह्मचारि० ३४१ तदुपलब्धिरितरेतरद्रव्य० २२१ तत्कारित्वादहेतुः २८३ तद्विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थान० ७५ तत्रिविधं वाक्छलं सामान्य० ६९ तद्विनिवृत्तौ वा प्रमाण० ९२ तत्रैराश्यं रागद्वेषमोहा० २७५ तद्विपर्ययाद्वा विपरीतम् ५० तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाण० ८७ तद्व्यवस्थानं तु भूयस्त्वात् २२० तत्प्रामाण्ये वा० १४० तद्व्यवस्थानादेवात्मसद्भावाद० १७७ तत्त्वप्रधानभेदाच्च० ३३६ तन्त्राधिकरणाभ्युपगम० ४४ तत्त्वभाक्तयोर्नानात्व० १४६ तन्निमित्तं त्ववयव्यभिमानः ३१९ तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं० ३४२ तयोरप्यभावो वर्तमानाभावे० ११६ तत्सम्बन्धात्फलनिष्पत्ते० ३०१ तल्लिङ्गत्वादिच्छा० २४४ तत्सिद्धेरलक्षितेष्वहेतुः १४१ तल्लक्षणावरोधादप्रतिषेधः २८७ तथाऽत्यन्तसंशयस्तद्धर्म० ७८ ताभ्यां विगृह्य कथनम् ३४३ तथा दोषाः २७५ तेनैव तस्याग्रहणाच्च २२१ तथाभावादुत्पन्नस्य० ३५२ ते विभक्त्यन्ताः पदम् १६८ तथा वैधर्म्यात् ४८ तेषां मोहः पापीयान् २७६ तथाऽऽहारस्य २६५ तेषु चावृत्तेरवयव्यभावः ३२१ तथेत्युपसंहारादुपमान० १२१ तैश्चापदेशो ज्ञानविशेषाणाम् ९९ तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्गः ३५ त्वक्पर्यन्तत्वाच्छरीरस्य २५९ तददृष्टकारितमिति० २६८ त्वग्व्यतिरेकात् २०७ तदनित्यत्वमग्नेर्दाह्य० २८६ त्रैकाल्याप्रतिषेधश्च० ८७ तदनुपलब्धेरनुपलम्भा० १४९ त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः ८६ तदनुपलब्धेरनुपलम्भाद्० ३६० त्रैकाल्यासिद्धेर्हेतोर्हेतुसमः ३५५ तदनुपलब्धेरहेतुः १९८ तदन्तरालानुलब्धे० १५१ दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थ० १७५ तदप्रामाण्यमनृत० १२६ दिग्देशकालाकाशेष्वप्येवं० ९७ तदभावश्चापवर्गे ३४० दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्या० १२

३८४ ] न्यायदर्शन- दुःखविकल्पे सुखाभिमानाच्च ३०४ न पयसः परिणाम० २३१ दृष्टानुमितानां नियोग० २०६ न पाकजगुणान्तरोत्पत्तेः २५७ दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः १८२ न पार्थिवाप्ययोः० २१६ दृष्टान्तस्य कारणानपदेशात् ३५० न पुत्रपशुस्त्रीपरिच्छद० ३०१ दृष्टान्ते च साध्यसाधन० ३६३ न पुरुषकर्माभावे २८३ दोषनिमित्तं रूपादयो० ३१८ न प्रत्यक्षेण यावत्तावदप्युप० १०३ दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानाद० ३१८ न प्रदीपप्रकाशवत्तत्सिद्धेः ९२ द्रव्यगुणधर्मभेदाच्चोप० १९९ न प्रलयोऽणुसद्भावात् ३२५ द्रव्यविकारवैषम्यवद् १६१ न प्रवृत्तिः प्रतिसन्ध्याय० ३१३ द्रव्ये स्वगुणपरगुणोप० २५६ न बुद्धिलक्षणाधिष्ठान० २१२ द्विविधस्यापि हेतो० १६० न युगपद्ग्रहणात् २२५ धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भाव० ७२ न युगपदनेकक्रियोपलब्धेः २६१ धारणाऽऽकर्षणोपपत्तेश्च १०७ न युगपदर्थानुपलब्धेः २०९ न रात्रावप्यनुपलब्धेः २०२ न कर्मकर्तृसाधन० १२७ न रूपादीनामितरेतर० २५९ न कर्मानित्यत्वात् १५१ न लक्षणावस्थितापेक्षा० १४१ न कारणावयवभावात् २९७ न विकारधर्मानुपपत्तेः १६१ न कार्याश्रयकर्तृवधात् १८० न विनष्टेभ्योऽनिष्पत्तेः २८१ न केशनखादिष्वनुपलब्धेः २५८ न विषयव्यवस्थानात् १७६ नक्तञ्चरनयनरश्मिदर्शनाच्च २०३ न व्यवस्थानुपपत्तेः २८९ न क्लेशसन्ततेः ३१४ न शब्दगुणोपलब्धेः २२१ न गत्यभावात् २२७ न सङ्कल्पनिमित्तत्वाच्च ३१५ न घटाद् घटानिष्पत्तेः २७९ न सङ्कल्पनिमित्तत्वाद्रागादीनाम् १९३ न घटाभावसामान्यनित्य० १४५ न सद्यः कालान्तरो० २९८ न चतुष्ट्वम् ऐतिह्यार्थापत्ति० १३६ न सर्वगुणानुलब्धेः ३१५ न चावयव्यवयवाः ३२२ न साध्यसमत्वात् २६४ न चैकदेशोपलब्धिरवयवि० १०४ न सामयिकत्वाच्छब्दार्थ० १२५ न तदनवस्थानात् १७० न सुखस्याप्यन्तरालनिष्पत्तेः ३०२ न तदर्थबहुत्वात् २१० न स्मरणकालानियमात् २३९ न तदर्थान्तरभावात् ७३ न स्मृतेः स्मर्तव्यविषयत्वात् १८३ न तदाशुगतित्वान्मनसः २३१ न स्वभावसिद्धिरापेक्षित्वात् २९५ न तद्विकाराणां सुवर्ण० १६२ न स्वभावसिद्धेर्भावानाम् २९३ न दोषलक्षणावरोधा० २७७ न हेतुतः साध्यसिद्धेः० ३५५ न निष्पन्नावश्यम्भावित्वात् ३३९

सूत्रसूची [ ३८५

सूत्रसूची [ ३८५ नाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् २७१ नियमानियमौ तु० २४५ नाकृतिव्यक्त्यपेक्षत्वा० १७२ निरवयवत्वादहेतुः २९७ नाणुनित्यत्वात् १५१ निर्दिष्टकारणाभावे० ३५९ नातीतानागतयोः० २८१ नेतरेतरधर्मप्रसङ्गात् २०५ नातीतानागतयोरितरे० ११६ नेन्द्रियार्थयोस्तद्विनाशेऽपि० २३४ नातुल्यप्रकृतीनां १६१ नैकदेशत्राससादृश्येभ्यो० ११४ नात्मप्रतिपत्तिहेतूनं० १८६ नैकप्रत्यनीकभावात् २७६ नात्ममनसोः सन्निकर्षाभावे० ९६ नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते० १८१ नानित्यता नित्यत्वात् २८६ नोत्पत्तिकारणानपदेशात् २३६ नानुमीयमानस्य प्रत्यक्षतो० १९८ नोत्पत्तितत्कारणोपलब्धेः २८७ नानुवादपुनरुक्तयोर्विशेषः १३२ नोत्पत्तिनिमित्तत्वान्माता० २६४ नानेकलक्षणैरेकभाव० २९० नोत्पत्तिविनाश० २८७ नान्तःशरीरवृत्ति० २३८ नोत्पत्तिविनाशकारणो० २३० नान्यत्र प्रवृत्त्यभावात् १९१ नोष्णशीतवर्षाकालनिमित्तत्वात् १९० नान्यत्वेऽप्यभ्यास० १५२ न्यूनसमाधिकोपलब्धे० १६० नाप्रत्यक्षे गव्ये प्रमाणार्थ० १२० नाभावप्रामाण्यं० १४० पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्था० ३७२ नार्थविशेषप्राबल्यात् १०१ पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलन० १८९ नार्थविशेषप्राबल्यात् ३३८ परं वा ऋतेः ३२६ नासन्न सन्न सदसत् २९९ परश्वादिष्वारम्भनिवृत्ति० २४४ निःश्वासोच्छ्वासो० १९५ परिशेषाद्यथोक्त० २४८ निग्रहस्थानप्राप्तस्यानिग्रहः० ३७८ परिषत्प्रतिवादिभ्यां० ३७४ नित्यमनित्यभावादनित्ये० ३६३ पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः० ८३ नित्यत्वप्रसङ्गश्च० २७० पाणिनिमित्तप्रश्लेषा० १५६ नित्यत्वेऽविकारादनित्यत्वे० १६३ पात्रचयान्तानुपपत्तेश्च ३१२ नित्यस्याप्रत्याख्यानं २८६ पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः १९५ नित्यानामतीन्द्रियत्वा० १६४ पार्थिवाप्यतैजसं० १९५ निमित्तनैमित्तिकभावाद० २७७ पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः ३३ निमित्तनैमित्तिकोपपत्तेश्च० २७७ पूर्वकृतफलानुबन्धा० २६३ निमित्तानिमित्तयोरर्था० २८५ पूरणप्रदाहपाटनानुप० १२४ नियमश्च निरनुमानः १८४ पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ० ८३ नियमहेत्वभावाद्यथा० २२९ पूर्वकृतफलानुबन्धात्तदुत्पत्तिः २६३ नियमानियमविरोधादनियमे १६६ पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धा० १८८ न्या० द० : २५

३८६ ] न्यायदर्शन- पृथक्त्वावयवेभ्योऽवृत्तेः ३२१ प्रमाणतरूचार्थप्रतिपत्तेः ३३२ पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशमिति० ३० प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां० ९१ पौर्वापर्यायोगादप्रतिसम्बद्धार्थं० ३७५ प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजन० ५ प्रकृतादर्थादप्रतिसम्बद्धार्थं० ३७३ प्रमाणानुपपत्त्युपपत्तिभ्याम् ३३२ प्रकृतिविवृद्धौ० १६० प्रमेया च तुला प्रामाण्यवत् ८९ प्रकृत्यनियमात् १६६ प्रयत्नकार्यानेकत्वात्कार्यसमः ३६५ प्रणिधाननिबन्धाभ्यास० २५० प्रवर्त्तनालक्षणाः दोषाः ३२ प्रणिधानलिङ्गादिज्ञानाना० २४१ प्रवृत्तिदोषजनितोऽर्थः फलम् ३४ प्रतिज्ञातार्थप्रतिषेधधर्मं० ३७१ प्रवृत्तिर्यथोक्ता २७४ प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरं० ३७० प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिः ३२ प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगम० ४७ प्रसिद्धसाधर्म्यात्साध्यसाधन० २३ प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः० ३७२ प्रसिद्धसाधर्म्यादुपमान० १२० प्रतिदृष्टान्तधर्माभ्यनुज्ञा० ३७० प्रागुच्चारणादनुपलब्धे० १४८ प्रतिदृष्टान्तहेतुत्वे च० ३५१ प्रागुत्पत्तेः कारणाभावादनु० ३५२ प्रतिद्वन्द्विसिद्धेः पाकजानाम० २५७ प्रागुत्पत्तेरभावानित्यत्व० ३१४ प्रतिपक्षहीनमपि वा० ३४२ प्रागुत्पत्तेरभावोपपत्तेश्च १४२ प्रतिपक्षात्प्रकरणसिद्धेः० ३५४ प्राङ् निष्पत्तेर्वृक्षफलवत् २९८ प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य० ३६७ प्राप्तौ चानियमात् २६५ प्रतिषेधविप्रतिषेधे० ३६७ प्राप्य साध्यमप्राप्य वा० ३४९ प्रतिषेधानुपपत्तेश्च० ३५६ प्रीतेरात्माश्रयत्वात्० ३०० प्रतिषेधाप्रामाण्यं० १३९ प्रत्याहाराभ्यांसकृतात् १९० प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः ३६६ प्रतिषेध्ये नित्यमनित्य० ३६४ बाधनानिर्वृत्तेर्वेदयतः ३०३ प्रत्यर्क्षनिमित्तत्वाच्चेन्द्रियार्थयोः ९८ बाधनालक्षणं दुःखम् ३४ प्रत्यक्षमनुमानमेकदेश० १०२ बाह्यप्रकाशानुग्रहाद० २०२ प्रत्यक्षलक्षणानुपपत्ति० ९६ बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरम् ३१ प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं० ८३ बुद्धिसिद्धं तु तदसत् ३०० प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः० १५ बुद्धेश्चैवं निमित्तसद्भावो० ३३६ प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षसिद्धेः १२० बुद्ध्या विवेचनात्तु भावानां० ३३१ प्रदीपाचिंःसन्तत्यभिव्यक्त० २५५ प्रदीपोपादानप्रसङ्ग० ३५१ भूतगुणविशेषोपलब्धेः० २१४ प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणं० ३०६ भूतेभ्यो मूर्त्युपादान० २६४ प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः ५९ मध्यन्दिनोल्काप्रकाशा० २०१

सूत्रसूची [ ३८७

सूत्रसूची [ ३८७ मनः कर्मनिमित्तत्वाच्च० २७० वाक्यविभागस्य० १२९ मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च० १३३ वाक्छलमेवापचारच्छलम्० ७३ महदणुग्रहणात् १९७ विकारधर्मित्वे नित्यत्वाभावात्० १६५ मिथ्योपलब्धेर्विनाशस्तत्त्व० ३३५ विकारप्राप्तानामपुन० १६२ मूर्तिमन्तां च संस्थानोपपत्ते० ३२८ विकारादेशोपदेशात्संशयः १५८ विज्ञातस्य परिषदा० ३७७ यत्र संशयस्तत्रैवमुत्तरोत्तर० ८२ विद्याऽविद्याद्वैविध्यात्संशयः ३२० यत्सिद्धावन्यप्रकरणसिद्धिः ४५ विविधबाधनायोगाद्० ३०२ यथोक्तहेतुत्वाच्चाणु २६२ विधिविहितस्यानुवचन० १३१ यथोक्तहेतुत्वात्पार० २४७ विधिविधायकः १३० यथोक्ताध्यवसायादेव० ७८ विध्यर्थवादानुवाद० १२९ यथोक्तोपपन्नश्छलजाति० ६१ विनाशकारणानुपलब्धेः १५४ यमर्थमधिकृत्य प्रवर्त्तते ४३ विनाशकारणानुपलब्धेः० १५६ यस्मात् प्रकरणचिन्ता स निर्णया० ६५ विनाशकारणानुपलब्धे० २३६ यावच्छरीरभावित्वा० २५६ विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च० ७४ याशब्दसमूहत्यागपरिग्रह० १६९ विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः ७७ युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो० ३२ विप्रतिपत्त्यव्यवस्था० ७७ युगपज्ज्ञेयानुपलब्धेश्च २३४ विप्रतिषेधाच्च न त्वगेका २०९ युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात् ८३ विभक्त्यन्तरोपपत्तेश्च० १५७ विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्याम्० ५६ रश्म्यर्थसन्निकर्ष० १९८ विषयत्वाव्यतिरेकादेकत्वम् २१२ रोधोपघातसादृश्येभ्यो० ११४ विषयप्रत्यभिज्ञानात् २२३ विष्टं ह्यपरं परेण २१६ लक्षणव्यवस्थानादेवाप्रतिषेधः २९१ वीतरागजन्मादर्शनात् १९२ लक्षितेष्वलक्षण० १४० वृत्त्यनुपपत्तेरपि तर्हि न० ३२० लिङ्गतो ग्रहणान्नानुपलब्धिः २३१ व्यक्ताद् घटनिष्पत्ते० २८० लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे० ४३ व्यक्ताद्व्यक्तानां प्रत्यक्ष० २७९ व्यक्तिर्गुणाविशेषाश्रयो० १७३ वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्या० ६८ व्यक्त्याकृतिजातयस्तु० १७३ वर्णक्रमनिर्देशाद्वर्णान्तरार्थंकम् ३७४ व्यक्त्याकृतियुक्तेऽप्यप्रसङ्गात्० १७२ वर्णत्वाव्यतिरेकाद्वर्णं० १६३ व्यक्त्याकृतिजातिसन्निधा० १६८ वर्तमानाभावः पततः० ११५ व्यभिचारादहेतुः २७६ वर्तमानाभावे सर्वाग्रहणं० ११८ व्याघातादप्रयोगः २८०

व्यासक्तमनसः पादव्यथनेन० २४० सम्प्रदानात् १५१

३८८ ] न्यायदर्शन- व्यासक्तमनसः पादव्यथनेन० २४० सम्प्रदानात् १५१ व्याहतत्वादयुक्तम् २९५ सम्बन्धाच्च १२२ व्याहतत्वादहेतुः १०० सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्य० ७० व्याहतत्वादहेतुः ३३१ सर्वं नित्यं पञ्च० २८७ व्यूहान्तराद् द्रव्यान्तरो० २३२ सर्वं पृथग् भाव० २९० सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः० ४५ शब्द ऐतिह्यानर्थान्तर० १३७ सर्वत्रैवम् ३६६ शब्दसंयोगविभवाच्च सर्वगतम् ३२७ सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च० ८६ शब्दार्थयोः पुनर्वचनं ३७६ सर्वमभावो भावेष्वितरेतरा० •२९२ शब्दार्थव्यवस्थानाद० १२४ सर्वमनित्यमुत्पत्ति० २८५ शब्दोऽनुमानमर्थ० १२१ सर्वाग्रहणमवयव्यसिद्धेः १०६ शरीरगुणवैधर्म्यात् २५९ सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात् १८१ शरीरदाहे पातकाभावात् १७८ सव्यभिचारविरुद्धप्रकरण० ६३ शरीरव्यापित्वात् २५८ सहचरणस्थानतादर्थ्यं० १७० शरीरोत्पत्तिनिमित्त० २६६ साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां० ७४ शीघ्रतरगमनोपदेश० १३२ साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपसंहारे० ३४५ श्रुतिप्रामाण्याच्च १९६ साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षा० ३४४ साधर्म्यात्तुल्यधर्मोपपत्तेः ३६२ संख्येकान्तासिद्धिः कारणा० २९६ साधर्म्यात्संशये न संशयो० ३५३ संयोगोपपत्तेश्च ३२९ साधर्म्यादसिद्धेः प्रतिषेधासिद्धिः ३६२ सगुणद्रव्योत्पत्तिवत्तदुत्पत्तिः - १९३ साध्यत्वादवयवनि सन्देहः १०६ सगुणानामिन्द्रियभावात् २२० साध्यत्वादहेतुः २३८ स चतुर्विधः सर्वतन्त्रप्रतितन्त्र० ४४ साध्यदृष्टान्तयोर्धर्म० ३४७ सद्यः कालान्तरे च फल० २९८ साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा ४८ स द्विविधो दृष्टादृष्टार्थत्वात् २५ साध्यसमत्वादहेतुः २२३ सन्तानानुमानविशेषणात् १४६ साध्यसाधर्म्यात्तद्धर्मभावी ४९ स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो० ६२ साध्यातिदेशाच्च० ३४९ समाधिविशेषाभ्यासात् ३३७ साध्याविशिष्टः साध्यत्वात्० ६६ समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः० ४५ सामान्यदृष्ट्यन्तयोरैन्द्रिय० ३५२ समानप्रसवात्मिका जातिः १७४ सामान्यवतो धर्मयोगो० १६३ समानानेकधर्माध्यवसायाद० ७६ सिद्धान्तमभ्युपेत्य० ६४ समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रति० ४० सिद्धान्तमभ्युपेत्यानियमात्० ३७८ समारोपणादात्मन्यप्रतिषेधः ३११ सेनावनवद् ग्रहणमिति० १०८

सूत्रसूची [ ३८९

सूत्रसूची [ ३८९ सुप्तव्यासक्तमनसां ९८ स्वपक्षे दोषाभ्युपगमात् ३७८ सुवर्णादीनां पुनरापत्ते० १६२ स्वप्नविषयाभिमानवदयं० ३३३ सुषुप्तस्य स्वप्नादर्शने० ३१३ स्वविषयानतिक्रमेणेन्द्रियस्य ३२४ स्तुतिर्निन्दा परकृतिः० १३० स्थानान्यत्वे नानात्वाद्० २०७ हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन० ३७५ स्फटिकान्यत्वाभिमानवत्० २२८ हेतूदाहरणाधिकमधिकम् ३७६ स्फटिकेऽप्यपरापरोत्पत्तेः० २२९ हेतूपादानात् प्रतिषेद्ध० २५४ स्मरणं त्वात्मनो० २४९ हेत्वपदेशात्प्रतिज्ञायाः० ५२ स्मरतः शरीरधारणोपपत्ते० २३८ हेत्वभावादसिद्धिः ३३३ स्मृतिसङ्कल्पवच्च० ३३४ हेत्वाभासाश्च यथोक्ताः ३८० स्वपक्षलक्षणापेक्षोपपत्त्यु० ३६८

न्यायसूत्रवृत्ति श्रीविश्वनाथन्यायपञ्चाननकृत

प्रस्तुत भाषान्तर में अधोलिखित ग्रन्थों से सहयोग लिया गया— न्यायवार्त्तिक भा० उद्योतकरकृत न्यायवार्त्तिक-तात्पर्यटीका श्रीवाचस्पतिमिश्रकृत तात्पर्य-परिशुद्धि उदयनाचार्यकृत न्यायमञ्जरी श्रीजयन्तभट्टकृत न्यायसूत्रवृत्ति श्रीविश्वनाथन्यायपञ्चाननकृत भाष्यचन्द्रटीका श्रीरघूत्तमनैयायिकविरचित खद्योतटीका डा० गंगानाथ झा विरचित प्रसन्नपदा टीका श्रीसुदर्शनाचार्यविरचित JAGADGURU VISHWARADHYA JNANA SIMHASAN JNANAMANDIR LIBRARY Jangamawadi Math, Varanasi Acc. No. 2575 1287

[अस्पष्ट मुद्रा / Illegible Stamp] CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri