न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
अवयवविपर्यासवचनं न सूत्रार्थः१। कस्मात् ?
६८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० अवयवविपर्यासवचनं न सूत्रार्थः१। कस्मात् ? "यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः। अर्थतो ह्यसमर्थानामानन्तर्यमकारणम्” ॥ इत्येतद्वचनाद्विपर्यसिनोक्तो हेतुरुदाहरणसाधर्म्यात्तथा वैधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुलक्षणं न जहाति। अजहद्धेतुलक्षणं न हेत्वाभासो भवतीति । 'अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम्' ( ५. २. ११) इति निग्रहस्थानमुक्तम्, तदेवेदं पुनरुच्यत इति, अतस्तन्न सूत्रार्थः ॥ ९ ॥ छलप्रकरणम् [ १०-१७ ] छललक्षणम् अथ छलम्। वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम् ॥ १० ॥ न सामान्यलक्षणे छलं शक्यमुदाहर्तुम्, विभागे तूदाहरणानि ॥ १० ॥ [बौद्ध नैयायिक इस सूत्र का अन्यथा व्याख्यान करते हैं-'प्रतिज्ञा' के बाद उदाहर- णादि का पूर्वकाल हेतुवचन के उस काल को अतिक्रान्त कर जाता है, अतः यह हेतुवचन 'कालात्ययापदिष्ट' है। इसका खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं-] प्रतिज्ञादि अवयवों में विपर्यास बताना सूत्र का अर्थ नहीं है; क्योंकि- 'जिसका जिसके साथ अर्थसम्बन्ध होता है, वह अर्थसम्बन्ध उसके दूरस्थ होने पर भी हो ही जाएगा, असमर्थ का अर्थ से आनन्तर्य विरोधी नहीं हुआ करता' । इस वचनप्रमाण द्वारा विपर्यास से कहा हुआ हेतु भी उदाहरण के सादृश्य या वैसादृश्य से अपने हेतुत्व को नहीं छोड़ेगा । यतः उसने अपना हेतुलक्षण नहीं छोड़ा, तब वह हेतु हेत्वाभास क्यों कर हो सकेगा ! दूसरी बात यह भी है-आगे निग्रहस्थानवर्णनप्रसङ्ग (५. २. ११) में भी 'अवयव- विपर्यासबोधक अप्राप्तकाल' नामक निग्रहस्थान बताया जायेगा, इस सूत्र का उपर्युक्त अर्थ करने पर वहाँ पुनरुक्ति दोष होगा, अतः यह सूत्रार्थ नहीं है ॥९ ॥ प्रतिवादी के अभिमत अर्थ से विरुद्ध कल्पनोपपादन वचनविघात 'छल' कहलाता है ॥ १० ॥ [वादी, प्रमादी या प्रतिवादी द्वारा समीचीन उत्तर न देने की हालत में विजय- कामना से तदाभास उत्तर भी दे डालता है, सूत्रकार उसी का अब विवेचन कर रहे हैं। इनमें 'जात्युत्तर' स्वपक्ष में भी हानि पहुँचा डालता है, अतः उससे पहले छल का बोध कराना ही उचित है ।] इस छल के सामान्य लक्षण का उदाहरण मिलना असम्भव हैं । हाँ, इसका विभाग करने पर उन विभागों के उदाहरण दिये जा सकते हैं ॥ १० ॥ १. बौद्धाभिमतसूत्रार्थखण्डने प्रक्रमते भाष्यकारः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१२. सू० ] छलप्रकरणम् ६९
१२. सू० ] छलप्रकरणम् ६९ विभागश्च— तत्त्रिविधम्—वाक्छलम्, सामान्यच्छलम्, उपचारच्छलं चेति ॥ ११ ॥ वाक्छललक्षणम् तेषाम्— अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम् ॥ १२ ॥ 'नवकम्बलोऽयं माणवकः' इति प्रयोगः। अत्र 'नवः कम्बलोऽस्य' इति वक्तु- रभिप्रायः। विग्रहे तु विशेषः, न समासे। तत्रायं छलवादी वक्तुरभिप्रायादवि- वक्षितमन्यमर्थम्—'नव कम्बला अस्येति तावदभिहितं भवता' इति कल्पयति, कल्पयित्वा चासम्भवेन प्रतिषेधति—'एकोऽस्य कम्बलः कुतो नव कम्बलाः' इति। तदिदं सामान्यशब्दे वाचि छलं वाक्छलमिति। अस्य प्रत्यवस्थानम्—सामान्यशब्दस्यानेकार्थत्वेऽन्यतराभिधानकल्पनायां विशेषवचनम्। 'नवकम्बलः' इत्यनेकार्थाभिधानम्—'नवः कम्बलोऽस्य' इति, 'नव कम्बला अस्य' इति। एतस्मिन् प्रयुक्ते येयं कल्पना 'नव कम्बला अस्य' इत्येतद्भवताऽभिहितं तच्च न सम्भवति' इति, एतस्यामन्यतराभिधानकल्पनायां
अतः अब उसका विभाग किया जा रहा है— १. वाक्छल, २. सामान्यछल, तथा ३. उपचारछल—यों वह तीन प्रकार का होता है ॥ ११ ॥ उनमें समासादिवृत्तिविषयक वाक्छल का व्याख्यान करते हैं— सामान्येन कथित अर्थ में वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध अर्थ की कल्पना 'वाक्छल' कहलाता है ॥ १२ ॥ जैसे 'नवकम्बल वाला यह माणवक है' इस वाक्य में 'नवकम्बल' शब्द से वक्ता का अभिप्राय बहुव्रीहि समास द्वारा 'नवीन कम्बल वाला' में है। इस शब्द के विग्रह में विशेषता है, समास में नहीं। वहाँ यह छलवादी, वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध अन्य अर्थ—'नौ हैं कम्बल जिसके' की कल्पना कर असम्भव अर्थ से उसका खण्डन करता है—'अरे इसके पास तो एक ही कम्बल है, नौ कहाँ से आये !' यह सामान्येन कथित अर्थबोधक वाक् (वाणी) में छल 'वाक्छल' कहलाता है। इसका प्रतीकार यों है—सामान्य शब्द के अनेकार्थक होनेपर किसी एक की कल्पना के लिये विशेषतया कथन करना पड़ता है। 'नवकम्बल' यह शब्द अनेकार्थाभिधायी है— 'नया है कम्बल जिसके' या 'नौ हैं कम्बल जिसके'। इस शब्दप्रयोग में आपकी 'नौ हैं कम्बल जिसके' यह कल्पना सम्भव नहीं है; क्योंकि अनेकों में किसी विशिष्ट एक की
७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० विशेषो वक्तव्यः । यस्माद्विशेषोऽर्थविशेषु विज्ञायते—अयमर्थोऽनेनाभिहित इति, स च विशेषो नास्ति । तस्मान्मिथ्याभियोगमात्रमेतदिति । प्रसिद्धश्च लोके शब्दार्थसम्बन्धोऽभिधानाभिधेयनियमनियोगः । 'अस्याभि- धानस्यायमर्थोऽभिधेयः' इति समानः सामान्यशब्दस्य, विशेषो विशिष्टशब्दस्य । प्रयुक्तपूर्वाश्चेमे शब्दा अर्थे प्रयुज्यन्ते, नाप्रयुक्तपूर्वाः । प्रयोगश्चार्थसम्प्रत्ययार्थः, अर्थप्रत्ययाच्च व्यवहार इति । तत्रैवमर्थगत्यर्थे शब्दप्रयोगे सामर्थ्यात् सामान्य- शब्दस्य प्रयोगनियमः । 'अजां ग्रामं नय', 'सर्पिराहर', 'ब्राह्मणं भोजय' इति सामान्यशब्दाः सन्तोऽर्थावयवेषु प्रयुज्यन्ते । सामर्थ्याद्यत्रार्थक्रियादेशना सम्भवति तत्र प्रवर्तन्ते, नार्थसामान्ये; क्रियादेशनाऽसम्भवात् । एवमयं सामान्यशब्दः 'नव- कम्बलः' इति योऽर्थः सम्भवति-'नवः कम्बलोऽस्य' इति, तत्र प्रवर्तते; यस्तु न सम्भवति-'नव कम्बला अस्य' इति, तत्र न प्रवर्तते । सोऽयमनुपपद्यमानार्थ- कल्पनया परवाक्योपालम्भस्ते न कल्पत इति ॥ १२ ॥ सामान्यच्छललक्षणम् सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम् ॥ १३ ॥ कल्पना करने से पूर्व तद्बोधक कोई विशिष्ट वचन करना चाहिए, जिससे वह विशेष अर्थ जाना जा सके कि इस शब्द द्वारा यहाँ यही अर्थ बोधित है । वैसा विशेष यहाँ कुछ नहीं कहा गया, अतः आपका यह अभियोग मिथ्या है । लोक में समग्र शब्दार्थ-सम्बन्ध अभिधानाभिधेय-नियम से जुड़ा हुआ है—इस शब्द का यही अर्थ अभिधेय है । सामान्य के बोधक शब्द के साधारण तथा विशेष शब्द के विशिष्ट अर्थ होंगे । पहले कभी उस अर्थ के लिये प्रयुक्त हुए शब्द ही आज उस अर्थ में प्रयुक्त किए जा सकते हैं, अपूर्व नहीं; क्योंकि शब्दों का प्रयोग अर्थज्ञान के लिए होता है, अर्थज्ञान से व्यवहार चलता है । इस प्रकार, अर्थज्ञान के लिए शब्द-प्रयोग मानने पर प्रकाशक होने से उस अर्थ में सामान्यशब्द का प्रयोग-नियम भी मानना उचित है । 'अजा को गाँव ले जाओ', 'घी लाओ', ब्राह्मण को खिलाओ' आदि शब्द सामान्य होते हुए अपने अपने किसी एक अर्थ में ही प्रयुक्त होते हैं। जैसे ये अपनी सामर्थ्य से, जहाँ विशेष अर्थक्रियादेशना सम्भव हो, वहीं प्रवृत्त होते हैं। अर्थसामान्य में क्रियादेशना सम्भव नहीं होती । इस रीति से 'नवकम्बल' यह सामान्यशब्द 'नये कम्बल वाला' इस अर्थ में ही प्रयुक्त होता है, 'नौ कम्बल वाला' यह अर्थ वक्ता के अभिप्राय में अन्वित नहीं, अतः उस अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता । इसलिए प्रकृत में उपपन्न न होनेवाली अर्थकल्पना से परवादी के वाक्य का उपालम्भ उचित नहीं है ॥ १२ ॥ अतिसामान्य योग से सम्भव अर्थ की असम्भव अर्थकल्पना करना 'सामान्यच्छल' कहलाता है ॥ १३ ॥
१३. सू० ] छलप्रकरणम् ७१
१३. सू० ] छलप्रकरणम् ७१ 'अहो खल्वसौ ब्राह्मणो विद्याऽऽचरणसम्पन्नः' इत्युक्ते कश्चिदाह—'सम्भ- वति ब्राह्मणे विद्याऽऽचरणसम्पत्' इति । अस्य वचनस्य विघातोऽर्थविकल्पो- पपत्त्याऽसम्भूतार्थकल्पनया क्रियते—यदि ब्राह्मणे विद्याचरणसम्पत्सम्भवति व्रात्येऽपि सम्भवेत्, व्रात्योऽपि ब्राह्मणः, सोऽप्यस्तु विद्याचरणसम्पन्नः । यद्वि- वक्षितमर्थमाप्नोति चात्येति च तदतिसामान्यम् । यथा—ब्राह्मणत्वं विद्याचरण- सम्पदं क्वचिदाप्नोति, क्वचिदत्येति । सामान्यनिमित्तं छलं सामान्यच्छलमिति । अस्य च प्रत्यवस्थानम्—अविवक्षितहेतुकस्य विषयानुवादः, प्रशंसार्थत्वाद् वाक्यस्य । तदत्रासंभूतार्थकल्पनानुपपत्तिः । यथा—सम्भवन्त्यस्मिन् क्षेत्रे शालय इति । अनिराकृतमविवक्षितं च बीजजन्म, प्रवृत्तिविषयस्तु क्षेत्रं प्रशस्यते । सोऽयं क्षेत्रानुवादः, नास्मिन् शालयो विधीयन्त इति । बीजात्तु शालिनिर्वृत्तिः सती न विवक्षिता । एवं सम्भवति ब्राह्मणे विद्याचरणसम्पदिति सम्पद्विषयो ब्राह्मणत्वम्, न सम्पद्धेतुः, न चात्र हेतुर्विवक्षितः । विषयानुवादस्त्वयं प्रशंसार्थत्वाद् वाक्यस्य, सति ब्राह्मणत्वे सम्पद्धेतुः समर्थ इति । विषयं च प्रशंसता वाक्येन यथा हेतुतः किसी के 'अहो, यह ब्राह्मण विद्याशीलसम्पन्न हैं'—ऐसा कहने पर, कोई कहे— 'ब्राह्मण में विद्याशीलसम्पन्नता सम्भव हैं' । इस वचन का विघात अर्थ-विकल्पोपपत्ति द्वारा असम्भूत अर्थकल्पना से करता है—यदि ब्राह्मण में विद्याचरणशीलता सम्भव है तो व्रात्य ( संस्काररहित ) में भी वह सम्भव क्यों नहीं ! क्योंकि व्रात्य भी जाति से तो ब्राह्मण ही है, वह भी विद्याचरणसम्पन्न हो सकता है । जो धर्म विवक्षित अर्थविशेष को ग्रहण भी कर ले तथा अतिरिक्त में भी रहे वह 'अतिसामान्य' है । जैसे—'ब्राह्मणत्व' विद्याचरणरूप सम्पत्ति को कहीं ग्रहण भी कर सकता है, कहीं छोड़ कर अतिरिक्त में भी रह सकता है । ऐसा सामान्याश्रित छल 'सामान्यच्छल' कहलाता है । इसका प्रतीकार यह है—यहाँ अविवक्षितहेतुत्व रहने से पुरुष का विषया-( संपद्वि- षया-)नुवाद हुआ है; क्योंकि वाक्य स्तुतिपरक है । अतः यहाँ असंभूतार्थकल्पना नहीं बनेगी । जैसे—'इस खेत में धान पैदा होता हैं' इस वाक्य में बीजजन्म न तो निराकृत ही है, न विवक्षित है; अपितु खेत ही प्रवृत्तिविषय है, उसी की प्रशंसा की गयी है । इस वाक्यप्रयोग में उस प्रशस्त क्षेत्र का अनुवादमात्र है; यहाँ धान का विधान नहीं है, न तो बीज से चावल की उत्पत्ति करना है । इसी प्रकार ब्राह्मण में विद्याचरण-संपद्वि- षय का अनुवादमात्र किया जाता है, कोई नयी विद्या या शालीनता उसमें अब प्रतिष्ठित नहीं की जाती कि उसे उस संपद् का हेतु मानें । वाक्य के प्रशंसार्थक होने से यह विष- यानुवादमात्र है—ब्राह्मणत्व के रहते उक्त संपद्धेतु होता हुआ वह समर्थ है । (विषय की CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० फलनिर्वृत्तिर्न प्रत्याख्यायते । तदेवं सति वचनविघातोऽसम्भूतार्थकल्पनया नोपपद्यत इति ॥ १३ ॥ उपचारच्छललक्षणम् धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम् ॥ १४ ॥ अभिधानस्य धर्मो यथार्थप्रयोगः । धर्मविकल्पः = अन्यत्र दृष्टस्यान्यत्र प्रयोगः । तस्य निर्देशे धर्मविकल्पनिर्देशे¹ । यथा—मञ्चाः क्रोशन्तीति अर्थ- सद्भावेन प्रतिषेधः—'मञ्चस्थाः पुरुषा क्रोशन्ति, न तु मञ्चाः क्रोशन्ति' । का पुनरत्रार्थविकल्पोपपत्तिः ? अन्यथा प्रयुक्तस्यान्यार्थकल्पनम्, भक्त्या प्रयोगे प्राधान्येन कल्पनमुपचारविषयं छलमुपचारच्छलम् । उपचारो नीतार्थः सहचरणादिनिमित्तेन, अतद्भावे तद्वदभिधानम् = उपचार इति । अत्र समाधिः—प्रसिद्धे प्रयोगे वक्तुर्यथाभिप्रायं शब्दार्थयोरभ्यनुज्ञा प्रतिषेधो वा, न च्छन्दतः । प्रधानभूतस्य शब्दस्य भाक्तस्य च गुणभूतस्य प्रयोग उभयोर्लोक- सिद्धः । सिद्धे प्रयोगे यथा वक्तुरभिप्रायः, तथा शब्दार्थावनुज्ञेयौ प्रतिषेध्यौ वा, न प्रशंसा करता हुआ उक्त वाक्य हेतु से फलसंपन्नता का प्रत्याख्यान नहीं करता । इस रीति से असंभूतार्थकल्पना द्वारा वचनविघात वाद में उचित नहीं है ॥ १३ ॥ स्वभावविकल्पनिर्देशक वाक्य में अर्थ की सत्ता का निषेध करना 'उपचारच्छल' कहलाता है ॥ १४ ॥ यथार्थप्रयोग ही शब्द का स्वभाव है, स्वभाव ( धर्म ) विकल्प से तात्पर्य है—अन्यत्र दृष्ट का अन्यत्र प्रयोग । उस स्वभावविकल्प के निर्देशक पदप्रयोग ( वाक्य ) में ( अर्थ की सत्ता का निषेध 'उपचारछल' कहलाता है ) । जैसे—'मञ्चाः क्रोशन्ति' इस वाक्य में अभिप्रेतार्थ की सत्ता का निषेध करके 'मञ्चस्थ पुरुष चिल्ला रहे हैं,' 'न कि मञ्च चिल्ला रहे हैं'—ऐसा कहना । यहाँ अर्थविकल्पोपपादन क्या है ? अन्य अर्थ में प्रयुक्त की अन्य अर्थकल्पना । गौणार्थ से प्रयुक्त वाक्य में मुख्य अर्थ की कल्पना ही उपचारविषयक छल है, अतः यह 'उपचारच्छल' है । 'उपचार' से तात्पर्य है सहचारादि निमित्त द्वारा अर्थ को अन्यत्र ले जाया जाये । संक्षेप में, 'अतत्त्व में तत्त्वकथन' उपचार कहलाता है । इस ( उपचारछल ) का प्रतीकार यह है—शक्य या भाक्त अर्थ में प्रसिद्ध प्रयोग का शब्दार्थ की अभ्यनुज्ञा या उनका निषेध वक्ता के अभिप्रायाधीन होता हैं, न कि स्वेच्छया । प्रधानभूत ( मुख्य ) शब्द का गौण या भाक्त उभयविध अर्थ में प्रयोग लोक में देखा जाता है । सिद्ध प्रयोग में जैसा वक्ता का अभिप्राय हो वैसे ही शब्द, अर्थ की स्वीकृति या अस्वीकृति देना चाहिये, स्वेच्छा नहीं । जब वक्ता का प्रधानभूत अर्थ में १. वार्त्तिककृत्तु 'धर्मविकल्पेन निर्देशे वाक्ये' इत्येवं व्याचष्टे । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१७. सू० ] छलप्रकरणम् ७३
१७. सू० ] छलप्रकरणम् ७३ च्छन्दतः। यदि वक्ता प्रधानशब्दं प्रयुङ्क्ते ? यथाभूतस्याभ्यनुज्ञा, प्रतिषेधो वा, न च्छन्दतः। अथ गुणभूतम् ? तदा गुणभूतस्य। यत्र तु वक्ता गुणभूतं शब्दं प्रयुङ्क्ते, प्रधानभूतमभिप्रेत्य परः प्रतिषेधति, स्वमनीषया प्रतिषेधोऽसौ भवति, न परोपालम्भ इति ॥ १४ ॥ वाक्छलमेवोपचारच्छलम्, तदविशेषात् ? ॥ १५ ॥ न वाक्छलादुपचारच्छलं भिद्यते; तस्याप्यर्थान्तरकल्पनाया अविशेषात्। इहापि 'स्थान्यर्थो गुणशब्दः, प्रधानशब्दः स्थानार्थः'—इति कल्पयित्वा प्रति- षिध्यत इति ? ॥ १५ ॥ न; तदर्थान्तरभावात् ॥ १६ ॥ न वाक्छलमेवोपचारच्छलम्; तस्यार्थसद्भावप्रतिषेधस्यार्थान्तरभावात्। कुतः ? अर्थान्तरकल्पनातः। अन्या ह्यर्थान्तरकल्पना, अन्योऽर्थसद्भावप्रतिषेध इति ॥ १६ ॥ अविशेषे वा किञ्चित्साधर्म्यादेकच्छलप्रसङ्गः ॥ १७ ॥ तात्पर्य हो तो मुख्य अर्थ की स्वीकृति या अस्वीकृति देना चाहिये, जब गौण अर्थ अभि- प्रेत हो तो गौण की। परन्तु जब वक्ता गौण अर्थ के अभिप्राय से प्रयोग करे और प्रतिवादी प्रधानभूत अर्थ मानकर उसको वाद में रोके तो यह प्रतिवादी का स्वेच्छया ( मनमाना ) प्रयोग है। इससे वादी का प्रतिषेध करना उचित नहीं है ॥ १४ ॥ वाक्छल से उपचारच्छल में कोई भेद न होने से उसे वाक्छल ही क्यों न मान लिया जाये ? ॥ १५ ॥ वाक्छल से उपचारच्छल में कोई भेद नहीं होता; क्योंकि वाक्छल में भी 'नव' शब्द का 'संख्यार्थक नव' अर्थ कल्पित किया जाता है, इसी प्रकार उपचारच्छल में भी मञ्च- स्थपुरुषबोधक 'मञ्च' शब्द को मञ्च अर्थ से कल्पित करके वादी का प्रतिषेध किया जाता है तो उपचारच्छल को भी वाक्छल ही क्यों न मान लें ? ॥ १५ ॥ अर्थभेद होने से उपचारच्छल को वाक्छल नहीं कहा जा सकता ॥ १६ ॥ वाक्छल ही उपचारच्छल नहीं हो सकता; क्योंकि उस उपचारच्छल में अर्थसद्भाव- प्रतिषेध यह अर्थान्तर (भेद) है। किससे ? अर्थान्तरकल्पना से। अर्थान्तरकल्पना दूसरी बात है; तथा जो अर्थ है उसका निषेध करना दूसरी बात। अतः अर्थान्तरकल्पनारूप वाक्छल में अर्थसद्भावप्रतिषेधरूप उपचारच्छल का समावेश नहीं हो सकता ॥ १६ ॥ कुछ सादृश्य से यदि अविशेष मानेंगे तो एक सामान्यछल ही रह जायेगा ॥१७॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् [ १८-२० ]
७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [१. अ० २. आ० छलस्य द्वित्वमभ्यनुज्ञाय त्रित्वं प्रतिषिध्यते; किञ्चित्साधर्म्यात् । यथा चायं हेतुस्त्रित्वं प्रतिषेधति, तथा द्वित्वमप्यभ्यनुज्ञातं प्रतिषेधति; विद्यते हि किञ्चित्साधर्म्यं द्वयोरपीति । अथ द्वित्वं किञ्चित्साधर्म्यान्न निवर्तते, त्रित्वमपि न निवर्त्स्यति ॥ १७ ॥ लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् [ १८-२० ] जातिलक्षणम् अत ऊर्ध्वम्— साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः ॥ १८ ॥ प्रयुक्ते हि हेतौ यः प्रसङ्गो जायते स जातिः । स च प्रसङ्गः साधर्म्य- वैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानम् = उपालम्भः, प्रतिषेध इति । 'उदाहरणसाधर्म्यात्साध्य- साधनं हेतुः' इत्यस्योदाहरणवैधर्म्येण प्रत्यवस्थानम् । उदाहरणवैधर्म्यात्साध्य- साधनं हेतुः' इत्यस्योदाहरणसाधर्म्येण प्रत्यवस्थानम् । प्रत्यनीकभावाज्जाय- मानोऽर्थो जातिरिति ॥ १८ ॥ निग्रहस्थानलक्षणम् विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम् ॥ १९ ॥ कुछ सादृश्य होने के कारण छल का द्वित्व स्वीकार करके यदि उसके त्रित्व (तीन प्रकार) का निषेध करते हैं तो जैसे यह सादृश्यहेतु उसके त्रित्व का प्रतिषेध करेगा, उसी तरह उसके द्वित्व का भी निषेध कर सकता है; क्योंकि बाकी दो (वाक्छल तथा सामान्य छल) में भी तो किञ्चित् सादृश्य है ही । किञ्चित् सादृश्य से यदि द्वित्व निवृत्त नहीं हो पाता तो उस हेतु से त्रित्व भी कैसे निवृत्त होगा ! अतः छल को तीन प्रकार का ही मानना चाहिये ॥ १७ ॥ इसके बाद— सादृश्य या वैसादृश्य द्वारा हेतुप्रतिषेध 'जाति' कहलाता है ॥ १८ ॥ (छल में साधर्म्य-वैधर्म्य नहीं होते, साधर्म्य या वैधर्म्यमात्र से सम्यक् प्रतिषेध किया भी नहीं जा सकता, बल्कि प्रयोग से किया जा सकता है । इसलिये) हेतु का साधर्म्य वैधर्म्य से जो प्रसङ्ग होता है वह 'जाति' कहलाता है । वह प्रसङ्ग साधर्म्य या वैधर्म्य से प्रत्यवस्थान = उपालम्भ अर्थात् प्रतिषेध कहलाता है । उदाहरण-साधर्म्य से साध्य- साधक हेतु का उदाहरण-वैधर्म्य से प्रतिषेध करना अथवा उदाहरण-वैधर्म्य से साध्य- साधक हेतु का उदाहरण-साधर्म्य से प्रतिषेध करना संक्षेप में विरोधी रूप से उत्पन्न अर्थ 'जाति' है ॥ १८ ॥ विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्ति 'निग्रहस्थान' कहलाता है ॥ १९ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२०. सू० ] लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् . ७५
२०. सू० ] लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् . ७५ विपरीता कुत्सिता वा प्रतिपत्तिर्विप्रतिपत्तिः । विप्रतिपद्यमानः पराजयं प्राप्नोति । निग्रहस्थानं खलु पराजयप्राप्तिः । अप्रतिपत्तिस्त्वारम्भविषयेऽप्यारम्भः = परेण स्थापितं वा न प्रतिषेधति, प्रतिषेधं वा नोद्धरति । असमासाच्च नैते एव निग्रहस्थाने इति ॥ १९ ॥ किं पुनर्दृष्टान्तवज्जातिनिग्रहस्थानयोरभेदः ? अथ सिद्धान्तवद्द्भेदः ? इत्यत आह- तद्विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम् ॥ २० ॥ तस्य साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिबहुत्वम्, तयोश्च विप्रतिपत्त्यप्रतिपत्त्योर्विकल्पान्निग्रहस्थानबहुत्वम् । नानाकल्पः = विकल्पः । विविधो वा कल्पः = विकल्पः । तत्राननुभाषणम्, अज्ञानम्, अप्रतिभा, विक्षेपः मतानुज्ञा, पर्यनुयोज्योपेक्षणम्-इत्यप्रतिपत्तिर्निग्रहस्थाम् । शेषस्तु विप्रतिपत्तिरिति॥ इमे प्रमाणादयः पदार्था उद्दिष्टा लक्षिता यथालक्षणं परीक्षिस्यन्त इति त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिर्वेदितव्येति ॥ २० ॥ इति वात्स्यानीये न्यायभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ।
- समाप्तश्चायं प्रथमोऽध्यायः * विपरीत या निन्दित प्रतिपादन 'विप्रतिपत्ति' होता है, इस तरह विप्रतिपद्यमान पुरुष वाद में पराजय प्राप्त करता है । पराजय-प्राप्ति ही 'निग्रहस्थान' है । 'अप्रतिपत्ति' उसे कहते हैं कि वादी आवश्यक विषय में भी आरम्भ न करे अथवा प्रतिवादी द्वारा स्थापित पक्ष का खण्डन या मण्डन न करे । यहाँ द्वन्द्व समास न करने में अभिप्राय यह है कि ये ही दो निग्रहस्थान नहीं हैं, अपितु अन्य भी हैं ॥ १९ ॥ क्या पूर्वोक्त 'दृष्टान्त' की तरह जाति और निग्रहस्थान में अभेद है या 'सिद्धान्त' की तरह उनमें भेद है ? इसपर सूत्रकार कहते हैं— उनके अनेक विकल्पों के कारण जाति और निग्रहस्थान बहुत से हैं ॥ २० ॥ उस 'साधर्म्य वैधर्म्य से प्रतिषेध' रूप जाति के बहुत से विकल्प होने के कारण जाति अनेक प्रकार की है । इसी तरह विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्तिरूप निग्रहस्थान के भी अनेक विकल्प होने के कारण वह भी अनेक प्रकार का है । नाना या विविध कल्पनाएँ जिसमें हों, वह 'विकल्प' कहलाता है । उनमें अननुभाषण, अज्ञान, अप्रतिभा, विक्षेप, मतानुज्ञा, पर्यनुयोज्य की उपेक्षा—ये अप्रतिपत्तिरूप निग्रहस्थान हैं, शेष विप्रतिपत्तिरूप निग्रहस्थान हैं ॥ इन प्रमाणादि पदार्थों के उद्देश व लक्षण किये जा चुके; अब लक्षणानुसारी परीक्षा आगामी अध्याय में की जायेगी—शास्त्र की यही त्रिधा प्रवृत्ति समझनी चाहिये ॥२०॥ वात्स्यायनीयन्यायभाष्यसहित न्यायदर्शन के प्रथमाध्याय का द्वितीयाह्निक समाप्त ॥ ⁂ प्रथम अध्याय समाप्त ⁂ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
संशयपरीक्षाप्रकरणम् [ १-७ ]
अथ द्वितीयोऽध्यायः [ प्रथमाह्निकम् ] अत ऊर्ध्वं प्रमाणादिपरीक्षा । सा च ‘विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः’ ( १. १. ४१ ) इत्यग्रे विमर्श एव परीक्ष्यते— संशयपरीक्षाप्रकरणम् [ १-७ ] [ पूर्वपक्षः ] समानानेकधर्माध्यवसायादन्यतरधर्माध्यवसायाद्वा न संशयः ॥ १ ॥ समानस्य धर्मस्याध्यवसात्संशयः, न धर्ममात्रात् । अथ वा—‘समानमनयोर्धर्ममुपलभे’ इति धर्मधर्मिग्रहणे संशयाभाव इति । अथ वा—समानधर्माध्यवसायादर्थान्तरभूते धर्मिणि संशयोऽनुपपन्नः, न जातु रूपस्यार्थान्तरभूतस्याध्यवसायादर्थान्तरभूते स्पर्शे संशय इति । अथ वा—नाध्यवसायादर्थावधारणादनवधारणज्ञानं संशय उपपद्यते, कार्य- कारणयोः सारूप्याभावादिति । एतेनानेकधर्माध्यवसायादिति व्याख्यातम् । अन्यतरधर्माध्यवसायाच्च संशयो न भवति, ततो ह्यन्यतरावधारणमेवेति ॥ १ ॥ अब आगे प्रमाणादि की लक्षणानुसारो परीक्षा की जायेगी । उस परीक्षा में “संशय करके पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अर्थ का निश्चय ही ‘निर्णय’ कहलाता है” ( १. १. ४१ ) इस लक्षण से परीक्षा में संशय का प्रथम स्थान है, अतः सर्वप्रथम संशय पर ही विचार करते हैं— समान धर्म के अध्यवसाय से, अनेक धर्मों के अध्यवसाय से तथा अन्यतर धर्म के अध्यवसाय से संशय नहीं होता ॥ १ ॥ समान धर्म के अध्यवसाय से संशय होता है, धर्ममात्र के अज्ञायमान रहते संशय नहीं होता । अथवा धर्म-धर्मिग्रहण में—‘इस दोनों के समान धर्म उपलब्ध हैं’ इतने से भी संशय नहीं कहला सकता । अथवा—समान धर्माध्यवसाय से अर्थान्तरभूत धर्मी में संशय नहीं बन सकता; क्योंकि यह कभी नहीं होता कि अर्थान्तरभूत ‘रूप’ के अध्यवसाय से अर्थान्तरभूत ‘स्पर्श’ में संशय होने लगे । अथवा—अर्थावधारणात्मक अध्यवसाय से अनवधारणज्ञानरूप संशय नहीं हो सकता; क्योंकि कार्यकारण की सरूपता नहीं मिलती । जैसे अवधारण निश्चय है, संशय ज्ञान है । इसी तरह ‘अनेक धर्म के अध्यवसाय से’ इस वाक्य का व्याख्यान भी समझना चाहिये । अन्यतर धर्माध्यवसाय से भी संशय नहीं होता, बल्कि उससे अन्यतरावधारण ही होता है ॥ १ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
पादन नहीं कर सकते । और यदि यह अव्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित नहीं है तो
. ४ . सू० ] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ७७ विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च ॥ २ ॥ न प्रतिपत्तिमात्रादव्यवस्थामात्राद्वा संशयः, किं तर्हि ? विप्रतिपत्तिमुपल- भमानस्य संशयः । एवमव्यवस्थायामपीति । अथ वा—अस्त्यात्मेत्येके, नास्त्या- त्मेत्यपरे मन्यन्ते—इत्युपलब्धेः कथं संशयः स्यादिति । तथोपलब्धिरव्यवस्थिता, अनुपलब्धिश्चाव्यवस्थितेति विभागेनाध्यवसिते संशयो नोपपद्यत इति ॥ २ ॥ विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः ॥ ३ ॥ यां च विप्रतिपत्तिं भवान् संशयहेतुं मन्यते, सा सम्प्रतिपत्तिः सा हि द्वयोः प्रत्यनीकधर्मविषया । तत्र यदि विप्रतिपत्तेः संशयः, सम्प्रतिपत्तेरेव संशय इति ॥ ३ ॥ अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः ॥ ४ ॥ न संशयः । यदि तावदियमव्यवस्था आत्मनि एव व्यवस्थिता ? व्यवस्थाना- दव्यवस्था न भवतीत्यनुपपन्नः संशयः । अथ अव्यवस्थाऽऽत्मनि न व्यवस्थिता ? विप्रतिपत्ति-अध्यवसाय या अव्यवस्था-अध्यवसाय से भी संशय नहीं होता ॥ २ ॥ अप्रतिपत्ति या अव्यवस्था के अध्यवसायमात्र से संशय नहीं होता, अपितु विप्रति- पत्ति समझने वाले को संशय होता है । इसी तरह अव्यवस्था में समझें । अथवा— 'आत्मा है' यह एक मानते हैं, 'आत्मा नहीं है' यह दूसरे; यह उपलब्धि है तो इतने से संशय कैसे होगी ? तथा जब उपलब्धि भी अव्यवस्थित है, अनुपलब्धि भी अव्यव- स्थित है तब इस विभाग से अध्यवसित विषय के बारे में संशय कैसे कहला सकता है ? ॥ २ ॥ विरुद्धकोटिद्वयज्ञान में भी सम्प्रतिपत्ति (निर्णय) के कारण संशय नहीं हो सकता ॥३॥ जिसको आप विप्रतिपत्ति ('आत्मा है, आत्मा नहीं है'—ऐसा विरुद्धकोटिद्वयज्ञान) कहते हैं वह तो वस्तुतः सम्प्रतिपत्ति ही है; क्योंकि वह दो सम्प्रतिपत्तिविरुद्ध धर्मों को विषय करती हुई अपने अपने विषय में निर्णय ही कराती है । वैसे स्थल में यदि आप विप्रतिपत्ति के कारण संशय बतला रहे हैं तो वह सम्प्रतिपत्ति ने ही संशय बतला रहे हैं ॥ ३ ॥ उपलब्धिव्यवस्था तथा अनुपलब्धिव्यवस्था से होनेवाला संशय भी उक्त अव्यवस्थाओं के व्यवस्थित (निश्चित) होने से ॥ ४ ॥ संशय नहीं कहला सकता । यदि यह अव्यवस्था (सत्ता या असत्ता) अपने में अव- स्थित है तो यह भी एक प्रकार की व्यवस्था ही है, इसे 'अव्यवस्था' कहकर संशयोप- पादन नहीं कर सकते । और यदि यह अव्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित नहीं है तो CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
७८ वात्स्यायनभाष्यसहित न्यायदर्शने [२. अ० १. आ०
एवमतादाम्याद्व्यवस्था न भवतीति संशयाभाव इति ॥ ४ ॥ तथाऽत्यन्तसंशयस्तद्धर्मसातत्योपपत्तेः ॥ ५ ॥ येन कल्पेन भवान् समानधर्मोपपत्तेः संशय इति मन्यते, तेन खल्वत्यन्त- संशयः प्रसज्यते, समानधर्मोपपत्तेरनुच्छेदात् संशयानुच्छेदः । न ह्ययमतद्धर्मा धर्मी विमृश्यमाणो गृह्यते, सततं तु तद्धर्मा भवतीति ॥ ५ ॥ [ सिद्धान्तपक्षः ] अस्य प्रतिषेधप्रपञ्चस्य संक्षेपेणोद्धारः— यथोक्ताध्यवसायादेव तद्विशेषापेक्षात् संशये नासंशयो नात्यन्तसंशयो वा ॥ ६ ॥ संशयानुत्पत्तिः संशयानुच्छेदश्च न प्रसज्यते । कथम् ? यत्तावत् समान- धर्माध्यवसायः संशयहेतुः, न समानधर्ममात्रमिति । एवमेतत्, कस्मादेवं नोच्यते इति ? 'विशेषापेक्षः' इति वचनात् तत्सिद्धेः । विशेषस्यापेक्षा = उसका अपने साथ तादात्म्य न होने से उनमें वह अव्यवस्था घट नहीं सकेगी, तब भी अव्यवस्था के कारण संशय कहाँ होगा ? ॥ ५ ॥ यों तो फिर सदा सर्वत्र संशय होने लगेगा; क्योंकि समानधर्मोपपत्ति तो संशय का कारण सदैव हो सकती है ॥ ५ ॥ जिस नय से आप 'समानधर्मोपत्ति से संशय होता हैं'—ऐसा मानते हैं उस नय में सदा ही संशय होता रहेगा; क्योंकि समानधर्मोपपत्ति समाप्त नहीं होगी और संशय का नैरन्तर्य भी चालू रहेगा । यह निश्चित है कि तद्धर्माभाववान् धर्मी तो कभी विमर्श का विषय नहीं बन सकेगा; क्योंकि तद्धर्म तो उसमें निरन्तर रहेगा ही । [यों इन पाँच सूत्रों से पाँच प्रकार के संशय के लक्षणों पर पूर्वपक्षी ने आपत्ति की है ।] ॥ ५ ॥ इस विस्तृत आपत्ति ( प्रतिषेध ) का संक्षेप से उद्धार ( निराकरण ) किया जा रहा है— यथोक्त (१. १. २३) समानधर्मादि के अध्यवसाय (ज्ञान) से ही उन उन पदार्थों के भेदक धर्म के ज्ञान की अपेक्षा से संशयोत्पत्ति मानने पर पूर्वोक्त असंशय या सदैव संशय नहीं होगा ॥ ६ ॥ पूर्वपक्षी द्वारा कथित संशय के अभाव, तथा संशय का अनुच्छेद (संशयनैरन्तर्य)— दोनों का ही प्रसङ्ग नहीं है; क्योंकि हमने समानधर्माध्यवसाय को संशय का हेतु कहा था, न कि समानधर्ममात्र को । ठीक है, फिर लक्षण में भी ऐसा ही क्यों नहीं पढ़ देते ? विभे- दक धर्म की आवश्यकता के बोधक 'विशेषापेक्ष' शब्द से ही समानधर्माध्यवसाय का बोध
६. सू०] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ७९
६. सू०] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ७९ आकाङ्क्षा, सा चानुपलभ्यमाने विशेषे समर्था । न चोक्तम्—समानधर्मापेक्ष इति । समाने च धर्मे कथमाकाङ्क्षा न भवेद्, यद्ययं प्रत्यक्षः स्यात् । एतेन सामर्थ्येन विज्ञायते—समानधर्माध्यवसायादिति । उपपत्तिवचनाद्वा । समानधर्मोपपत्तेरित्युच्यते, न चान्या सद्भावसंवेद- नादृते समानधर्मोपपत्तिरस्ति । अनुपलभ्यमानसद्भावो हि समानो धर्मो- ऽविद्यमानवद्भवतीति । विषयशब्देन वा विषयिणः प्रत्ययस्याभिधानम् । यथा लोके 'धूमेनाग्नि- रनुमीयते, इत्युक्ते 'धूमदर्शनेनाग्निरनुमीयते' इति ज्ञायते । कथम् ? दृष्ट्वा हि धूममथाग्निमनुमिनोति, नादृष्टे । न च वाक्ये दर्शनशब्दः श्रूयते, अनुजानाति च वाक्यस्यार्थप्रत्यायकत्वम्, तेन मन्यामहे—विषयशब्देन विषयिणः प्रत्ययस्या- भिधानं बोद्धाऽनुजानाति । एवमिहापि समानधर्मशब्देन समानधर्माध्यवसाय- माहेति । यथोहित्वा—'समानमनयोर्धर्ममुपलभे' इति धर्मधर्मिग्रहणे संशयाभावः इति ? पूर्वदृष्टविषयमेतत् । 'यावहमर्थाँ पूर्वमद्राक्षं तयोः समानं धर्ममुपलभे, होता है। यहाँ विशेष ( विभेदक ) की अपेक्षा अर्थात् आकांक्षा यह 'विशेषापेक्ष' का अर्थ है। यह आकांक्षा विभेदक के अनुपलब्ध होने पर ही हो सकती है। अतएव 'समानधर्मापेक्ष' हमने नहीं कहा; क्योंकि समान धर्म होने मात्र से आकांक्षा कैसे नहीं होगी ? यदि यह प्रत्यक्ष हो । अतः समानधर्माध्यवसाय सामर्थ्यसिद्ध है । 'उपपत्ति' वचन से भी पूर्वपक्षी की आपत्ति निराकृत हो सकती है। समानधर्म की उपपत्ति से—ऐसा कहा गया है, क्योंकि सद्भावसंवेदन (स्वसत्ताक ज्ञान) के अतिरिक्त अन्य समानधर्मोपपत्ति क्या होगी ! अनुपलभ्यमान सत्ता वाले समानधर्म को तो न रहने के समान ही समझा जाता है। अथवा—विषयवाचक (समानधर्म) शब्द से विषयिणी प्रतीति का ज्ञान भी कहा जाता है। जैसे—लोक में 'धूम से अग्नि का अनुमान होता है,' ऐसा कहने पर 'धूम- दर्शन से अग्नि का अनुमान कर सकता है, बिना देखे नहीं । प्रयुक्त वाक्य में 'दर्शन' शब्द होता नहीं फिर भी वाक्य ने अर्थ का ज्ञान करा दिया—आप भी ऐसा मानते हैं, इससे यह सिद्ध होता है कि 'विषयवाचक शब्द से विषयक प्रत्यय का ज्ञान होता है'। इसी प्रकार उक्त वाक्य में इसी नय से 'समानधर्म' शब्द से 'समानधर्माध्यवसाय' कहा गया है। और जैसा कि पूर्वपक्षी ने तर्क करके कहा था—'इन दोनों के समान धर्मों को मैं पा रहा हूँ' ऐसे धर्म-धर्मी के ज्ञान में संशय नहीं होता, क्योंकि यह पूर्वदृष्ट है; जैसे 'मैंने जिन दो (धर्म-धर्मी) को पहले देखा था, उन को वैसे देख रहा हूँ, परन्तु दोनों का विशेष
ध्यवसायमात्रं संशयहेतुमुपाददीत स एवं वाच्य इति ।
८० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० १. आ०
विशेषं नोपलभे इति, कथं नु विशेषं पश्येयं येनान्यतरमवधारयेयम्' इति । न चैतत् समानधर्मोपलब्धौ धर्मधर्मिग्रहणमात्रेण निवर्तत इति । यच्चोक्तम्—'नार्थान्तराध्यवसायादन्यत्र संशयः' इति ? यो ह्यर्थान्तरा- ध्यवसायमात्रं संशयहेतुमुपाददीत स एवं वाच्य इति । यत्पुनेरतत्—'कार्यकारणयोः सारूप्याभावात्' इति ? कारणस्य भावा- भावयोः कार्यस्य भावाभावौ कार्यकारणयोः सारूप्यम् । यस्योत्पादाद् यदुत्पद्यते, यस्य चानुत्पादान्नोत्पद्यते तत्कारणम्, कार्यमितरदित्येतत्सारूप्यम् । अस्ति च संशयकारणे संशये चैतदिति ।१ एतेनानेकधर्माध्यवसायादिति प्रतिषेधः परिहृत इति । यत्पुनरेतदुक्तम्—'विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च न संशयः' इति ? 'पृथक्प्रवादयोर्व्याहतमर्थमुपलभे विशेषं च न जानामि नोपलभे येनान्यतर- मवधारयेयम्, तत्कोऽत्र विशेषः स्याद्येनैकतरमवधारयेयम्'–इति संशयो विप्रति- पत्तिजनितः, अयं न शक्यो विप्रतिपत्तिसम्प्रतिपत्तिमात्रेण निवर्त्तयितुमिति । (विभेदक) नहीं जान पा रहा हूँ, कैसे इनका विभेदक जानूँ ताकि इन में से किसी एक की सत्ता का निश्चय कर सकूँ" यह विशेषाकांक्षा समानधर्म की उपलब्धि होने पर धर्म- धर्मी के ज्ञान मात्र से दूर नहीं हो सकती, उस दशा में संशय तो होगा ही । यह जो कहा—'अर्थान्तर रूप के संशयहेतु से स्पर्श में संशय नहीं हो सकता', तो जो अर्थान्तरज्ञानमात्र को संशयहेतु समझ रहा है, उससे ऐसा कहिये । पुनः यह जो कहा—'कार्य तथा कारण का सादृश्य न होने से संशय नहीं हो सकता', इसका उत्तर यह है कि कारण के होने या न होने पर कार्य का होना या न होना ही कार्यकारण का सादृश्य है । जिसके उत्पन्न होने से जो उत्पन्न होता हो तथा जिसके उत्पन्न न होने से उत्पन्न न होता हो वह कारण है, बाकी दूसरा कार्य है । यही सादृश्य है। यह सादृश्य संशय के कारण में तथा स्वयं संशय में रहता ही है। इसी युक्ति से पूर्वपक्षी के अनेकधर्माध्यवसायवान् कह कर जो प्रतिषेध किया था, उसका भी खण्डन हो जाता है। और यह जो पूर्वपक्षी ने कहा था—'विप्रतिपत्ति और अध्यवसाय से संशय नहीं हो सकता', उसका उत्तर यह है—" 'आत्मा हैं' तथा 'आत्मा नहीं हैं'—इन दो प्रवादों (मतों) में विरुद्ध धर्मों को पा रहा हूँ, विशेष को नहीं जान पा रहा हूँ, न मुझे मिल ही रहा है कि जिससे किसी एक के बारे में निश्चय कर सकूँ"—यह संशय विप्रतिपत्ति- जनित है, विप्रतिपत्ति या संप्रतिपत्तिमात्र कहने से वह दूर नहीं हटाया जा सकता ।
१. वार्त्तिककारस्तु सारूप्यान्तरमाह—विशेषानवधारणं सारूप्यमिति ।
६. सू० ] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ८१
६. सू० ] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ८१ एवमुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थाकृते संशये वेदितव्यमिति । यत्पुनरेतत्–‘विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः’ इति ? विप्रतिपत्तिशब्दस्य योऽर्थः– तदध्यवसायो विशेषापेक्षः संशयः, तस्य च समाख्यान्तरेण न निवृत्तिः । समाने- ऽधिकरणे व्याहतार्थौ प्रवादौ विप्रतिपत्तिशब्दस्यार्थः, तदध्यवसायश्च विशेषा- पेक्षः संशयहेतुः । न चास्य सम्प्रतिपत्तिशब्दे समाख्यान्तरे योज्यमाने संशय- हेतुत्वं निवर्तते । तदिदमकृतबुद्धिसम्मोहनमिति ! यत्पुनः ‘अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः’ इति ? संशय- हेतोरर्थस्याप्रतिषेधादव्यवस्थाभ्यनुज्ञानाच्च निमित्तान्तरेण शब्दान्तरकल्पना । व्यर्था शब्दान्तरकल्पना, अव्यवस्था खलु व्यवस्था न भवति; अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वादिति । नानयोरुपलब्ध्यनुपलब्ध्योः सदसद्विषयत्वं विशेषापेक्षं संशयहेतुर्न भवतीति प्रतिषिध्यते, यावता चाव्यवस्थाऽऽत्मनि व्यवस्थिता न इसी नय से 'उपलब्ध्यव्यवस्थाध्यवसायोपपन्न' संशय के बारे में भी पूर्वपक्षी का खण्डन समझ लेना चाहिये । पूर्वपक्षी ने यह जो 'विप्रतिपत्ति में संप्रतिपत्ति' ( २. १. ३ )—इस सूत्र में 'विप्र- तिपत्ति के कारण उसके सम्प्रतिपत्ति होने से यदि विप्रतिपत्ति से भी संशय माना जायेगा तो यह संप्रतिपत्ति से ही संशय मानना होगा' कहा था ? उसका उत्तर है—'विप्रतिपत्ति' इस शब्द का जो अर्थ है वह उसका विशेषधर्म के ज्ञान की अपेक्षा रखता हुआ संशय का हेतु है, उसका 'संप्रतिपत्ति' यह दूसरा नाम कर देने से संशय की निवृत्ति थोड़े हो जायेगी। समान अधिकरण में विरुद्ध अर्थ वाले दो मत ('आत्मा हैं', 'आत्मा नहीं हैं') 'विप्रतिपत्ति' कहलाते हैं, उनका ज्ञान विशेषधर्म ( ज्ञान ) की अपेक्षा रखने से संशय का कारण बनता है । इसकी 'संप्रतिपत्ति' यह अन्य संज्ञा कर देने से संशय की निवृत्ति कैसे हो जायेगी ! इस तरह तो मूर्खों को बहकाया जा सकता है ! यह जो कहा था—'अव्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित होने के कारण अव्य- वस्थोपलब्धि से संशय नहीं हो सकता' ? इसका उत्तर है—पूर्वपक्षी द्वारा संशय के हेतु- भूत अव्यवस्थारूप अर्थ का प्रतिषेध न करने से तथा अव्यवस्था के स्वीकार करने से अन्य निमित्त को लेकर शब्दान्तर की कल्पना की जा रही है, परन्तु यह शब्दान्तरकल्पना व्यर्थ ही होगी; क्योंकि तब भी अव्यवस्था व्यवस्था नहीं बन सकेगी। वह तो 'अव्यवस्था' इस स्वरूपार्थ में ही व्यवस्थित है, नाम भले ही उसका कुछ रख लें। उन दोनों अव्य- वस्थाओं का सत् तथा असत् विषयों में होना विशेषधर्म (के ज्ञान) की अपेक्षा रखता हुआ संशय का कारण होता है—इसलिये ही उनका प्रतिषेध नहीं किया जा रहा है; अपितु न्या० द० ११
८२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० तावताऽऽत्मानं जहाति, तावता ह्यनुज्ञाताऽव्यवस्था। एवमियं क्रियमाणापि शब्दान्तरकल्पना नार्थान्तरं साधयतीति। यत्पुनरेतत्-‘तथाऽत्यन्तसंशयः तद्धर्मसातत्योपपत्तेः’ इति ? नायं समान- धर्मादिभ्य एव संशयः, किं तर्हि ? तद्विषयाध्यवसायाद् विशेषस्मृतिसहितादित्यतो नात्यन्तसंशय इति। अन्यतरधर्माध्यावसायाद्वा न संशय इति ? तन्न युक्तम्; ‘विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः’ इति (१. १. २३) वचनात् । विशेषश्चान्यतरधर्मः, न तस्मिन्नध्यवसी- यमाने विशेषापेक्षा सम्भवतीति ॥ ६ ॥ यत्र संशयस्तत्रैवमुत्तरोत्तरप्रसङ्गः ॥ ७ ॥ यत्र यत्र संशयपूर्विका परीक्षा शास्त्रे कथायां वा, तत्र तत्रैवं संशये परेण प्रतिषिद्धे समाधिर्वाच्य इति। अतः सर्वपरीक्षाव्यापित्वात् प्रथमं संशयः परीक्षित इति ॥ ७ ॥ अव्यवस्थास्वरूप में व्यवस्थित रहने के कारण वे अपना अव्यवस्थात्व नहीं छोड़ पातीं । इस रूप में पूर्वपक्षी ने भी उनको 'अव्यवस्था' माना है। इसलिये इसकी शब्दान्तर- कल्पना से भी अर्थान्तर की सिद्धि नहीं हो सकेगी। यह जो कहा था—'उस धर्म की निरन्तरोपपत्ति से सदा संशय होने लगेगा' ? इसका उत्तर यह है—केवल समानधर्मादिकों के रहने से ही संशय नहीं होता, अपितु विशेष धर्मों के स्मृतिसहित तद्विषयक अध्यवसाय से होता है, अतः आत्यन्तिक संशय की उपपत्ति नहीं बनेगी । पूर्वपक्षी ने जो यह कहा था—'किसी एक के धर्माध्यवसाय से संशय नहीं होता' ? यह भी युक्त नहीं; हम ' 'विशेष धर्म ( के ज्ञान ) की अपेक्षा रखनेवाला विमर्श 'संशय' होता है" ( १.१.२३ ) ऐसा कह आये हैं । विशेष का मतलब है दो में अन्यतर धर्म, उसका निश्चय होने पर विशेषापेक्षा नहीं होती ॥ ६ ॥ जहां (जिस प्रमाणादि की परीक्षा में) संशय हो वहाँ वहाँ (वैसी परीक्षा में) इसी तरह उत्तरोत्तर प्रयोजनादि में परीक्षा-प्रसङ्ग करना चाहिये ॥ ७ ॥ जहाँ जहाँ, शास्त्र या कथा में, संशयपूर्वक परीक्षा का अवसर आये वहाँ वहाँ इस तरह संशय होने पर प्रतिवादी द्वारा खण्डन करने पर उत्तर देना चाहिये । अतः कथाङ्ग होने, तथा सभी प्रमाणादि पदार्थों की परीक्षा में व्यापक होने के कारण सर्वप्रथम संशय की परीक्षा की गयी है ॥ ७ ॥
११. सू०] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८३
११. सू०] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८३ प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ ८-२० ] अथ प्रमाणपरीक्षा । प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः ? ॥ ८॥ प्रत्यक्षादीनां प्रमाणत्वं नास्ति, त्रैकाल्यासिद्धेः । पूर्वापरसहभावानुप- पत्तेरित्यर्थः ॥ ८ ॥ अस्य सामान्यवचनस्यार्थविभागः— पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ नेन्द्रियार्थसन्निकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः ? ॥ ९ ॥ गन्धादिविषयं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, तद्यदि पूर्वम्, पश्चाद् गन्धादीनां सिद्धिः ? नेदं गन्धादिसन्निकर्षादुत्पद्यत इति ॥ ९ ॥ पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः प्रमेयसिद्धिः ? ॥ १० ॥ असति प्रमाणे, केन प्रमीयमाणोऽर्थः प्रमेयः स्यात् ? प्रमाणेन खलु प्रमीय- माणोऽर्थः प्रमेयमित्येतत्सिध्यति ॥ १० ॥ युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात् क्रमवृत्तित्वाभावो बुद्धीनाम् ॥ ११ ॥ अब प्रमाण की परीक्षा की जा रही है— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द में प्रामाण्य नहीं बन सकता; क्योंकि प्रमेय पदार्थ की त्रिकाल (भूत, भविष्यत्, वर्तमान) में सिद्धि नहीं हो पाती ॥ ८ ॥ प्रत्यक्षादिकों में प्रमाणत्व नहीं घटेगा; क्योंकि उनके प्रमेय की त्रिकाल में सिद्धि नहीं हो सकती; यतः पूर्वोत्तरसामानाधिकरण्य अनुपपन्न होता है ॥ ८ ॥ पूर्वपक्षी के इस सामान्य वचन का अर्थ यों समझें— प्रमेय से पूर्वकाल में प्रमाण की सिद्धि मानें तो 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से प्रत्यक्ष होता है'—यह सिद्धान्ती का प्रत्यक्ष लक्षण नहीं बनेगा ॥ ९ ॥ गन्धादिविषयक ज्ञान ही प्रत्यक्ष है, वह यदि गन्धादि से पूर्वकाल में उत्पन्न होगा तो उस समय गन्धादि के न रहने से वहाँ सन्निकर्ष किसका बनेगा ? सन्निकर्ष न बनने से प्रत्यक्ष किसका होगा ? ॥ ९ ॥ गन्धादि प्रमेय के अपर (पश्चात्) काल में इस प्रत्यक्ष को सिद्धि मानें तो 'प्रमाणों से प्रमेयसिद्धि' यह सिद्धान्त खण्डित हो जायेगा ॥ १० ॥ गन्धादि प्रमेय के समय प्रमाण के न रहने पर प्रमेय किससे प्रमित होगा ? प्रमाण के सहारे ही प्रमीयमाण अर्थ प्रमेय सिद्ध होता है ॥ १० ॥ यदि उक्त प्रमाण-प्रमेय की एक काल में सिद्धि मानो जाये तो ज्ञान के प्रत्यर्थनियत होने से उसकी क्रमवृत्ति न हो पायेगी ॥ ११ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
८४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० १. आ० यदि प्रमाणं प्रमेयं च युगपद्भवतः, एवमपि गन्धादिष्विन्द्रियार्थेषु ज्ञानानि प्रत्यर्थनियतानि युगपत्सम्भवन्तीति ज्ञानानां प्रत्यर्थनियतत्वात् क्रमवृत्तित्वाभावः । या इमा बुद्धयः क्रमेणार्थेषु वर्त्तन्ते तासां क्रमवृत्तित्वं न सम्भवतीति । व्याघात- श्च 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति । एतावांश्च प्रमाणप्रमेययोः सद्भावविषयः, स चानुपपन्न इति । तस्मात्प्रत्यक्षादीनां प्रमाणत्वं न सम्भवतीति । अस्य समाधिः—उपलब्धिहेतोरुपलब्धिविषयस्य चार्थस्य पूर्वापरसहभावा- नियमाद् यथादर्शनं विभागवचनम् । क्वचिदुपलब्धिहेतुः पूर्वम्, पश्चादुपलब्धि- विषयः, यथा—आदित्यस्य प्रकाश उत्पद्यमानानाम् । क्वचित्पूर्वमुपलब्धिविषयः, पश्चादुपलब्धिहेतुः, यथा—अवस्थितानां प्रदीपः । क्वचिदुपलब्धिहेतुरुपलब्धि- विषयश्च सह भवतः, यथा—धूमेनाग्नेर्ग्रहणमिति । उपलब्धिहेतुश्च प्रमाणम्, प्रमेयं तूपलब्धिविषयः । एवं प्रमाणप्रमेययोः पूर्वापरसहभावेऽनियते यथा अर्थो दृश्यते, तथा विभज्य वचनीय इति । तत्रैकान्तेन प्रतिषेधानुपपत्तिः । सामान्येन खल्वविभज्य प्रतिषेध उक्त इति । यदि प्रमाण तथा प्रमेय की युगपद् सम्भूति मानें तो गन्धादि इन्द्रियार्थों में प्रत्यर्थ- नियत ज्ञान की भी युगपत् उत्पत्ति माननी पड़ेगी, परन्तु ज्ञान के प्रत्यर्थनियत होने से उसमें क्रमवृत्तित्व कैसे आयेगा ! तात्पर्य यह है कि जो बुद्धियाँ क्रमशः अर्थ का अवगाहन करती हैं उनका क्रमवृत्तित्व संभव नहीं है। और 'युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन का इन्द्रिय- त्वसाधक हेतु हैं' (१.१.१६) इस मन के लक्षण का भी विरोध होने लगेगा । प्रमाण- प्रमेय में अस्तित्व यही विषय है, और यही अनुपपन्न होने लगेगा ! अतः प्रत्यक्षादि में प्रमाणत्व सम्भव नहीं—ऐसा पूर्वपक्षी का मत है । समाधान—शास्त्र में उपलब्धि-हेतु और उपलभ्यमान अर्थ का पूर्वकाल या उत्तर- काल में या एक साथ होना—यह नियम न देखा जाने के कारण दर्शनानुसार ही विभाग कहा गया है । कहीं उपलब्धि-हेतु पहले रहता है, उपलब्धि-विषय वाद में, जैसे—उत्पन्न होने वाले पदार्थों के पूर्व सूर्य का प्रकाश । कहीं उपलब्धि-विषय पहले रहता है, उपलब्धि-हेतु बाद में, जैसे—पहले से उपस्थित पदार्थों के लिए दीपक । कहीं उपलब्धि-हेतु तथा उपलब्धि-विषय एक साथ रहते हैं, जैसे धूम से अग्नि का ज्ञान । उपलब्धि-हेतु है प्रमाण तथा उपलब्धि-विषय है प्रमेय । इस प्रकार प्रमाण-प्रमेय का पूर्वापरसहभाव नियत न होने के कारण, अर्थ जैसा देखा जाता है उसी तरह विभाग करके कह दिया जाता है; अतः यहाँ पूर्वपक्षी द्वारा एक एक का नियम मान कर दिये गये दोष नहीं बन सकते । यों पूर्वपक्षी ने विवेचन न कर सामान्येन जो दोष कहे थे वे उक्त समाधान से निरस्त कर दिये गये ।
११. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८५
११. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८५ समाख्याहेतोस्त्रैकाल्ययोगात् तथाभूता समाख्या १ । यत्पुनरिदम्—'पश्चात् सिद्धावसति प्रमाणे प्रमेयं न सिध्यति, प्रमाणेन प्रमीयमाणोऽर्थः प्रमेयमिति विज्ञायते' इति ? प्रमाणमित्येतस्याः समाख्याया उपलब्धेर्हेतुत्वं निमित्तम्, तस्य त्रैकाल्ययोगः । उपलब्धिमकार्षीत्, उपलब्धिं करोति, उपलब्धिं करिष्य- तीति समाख्याहेतोस्त्रैकाल्ययोगात् समाख्या तथाभूता । प्रमितोऽनेनार्थः, प्रमीयते, प्रमास्यते, इति प्रमाणम् । प्रमितम्, प्रमीयते, प्रमास्यते इति च प्रमेयम् । एवं सति—'भविष्यत्यस्मिन् हेतुत उपलब्धिः', 'प्रमास्यतेऽयमर्थः', 'प्रमेयमिदम्'— इत्येतत् सर्वं भवतीति । त्रैकाल्यानभ्यनुज्ञाने च व्यवहारानुपपत्तिः । यश्चैवं नाभ्यनुजानीयात् तस्य 'पाचकमानय पक्ष्यति', 'लावकमानय लविष्यति' इति व्यवहारो नोप- पद्यत इति । 'प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः' ( २. १. ८) इत्येवमादिवाक्यं प्रमाणप्रतिषेधः । तत्रायं प्रष्टव्यः—अथानेन प्रतिषेधेन भवता किं क्रियत समाख्या (संज्ञा-शब्दों) के प्रवृत्तिरूप हेतु से जाति, गुण तथा द्रव्य में त्रैकाल्य-सम्बन्ध रहना चाहिए, तब समाख्या भी त्रैकाल्यसम्बन्ध रखती है। यह जो कहा था—'पश्चात्- काल में सिद्धि मानने पर उस समय प्रमाण के न रहने से प्रमेय सिद्ध नहीं होगा, जब कि प्रमाण से प्रमीयमाण अर्थ ही प्रमेय कहलाता है' ? इसका उत्तर है—'प्रमाण' इस संज्ञा का निमित्त है—'ज्ञान का कारण होना', यह 'ज्ञान का कारण होना' त्रिकाल- सम्बन्धी है । 'इसने उपलब्धि की', 'यह उपलब्धि कर रहा है', 'यह उपलब्धि करेगा' इस प्रकार से 'प्रमाण' संज्ञा त्रैकाल्यसम्बन्धवाली है। अर्थात् 'इससे प्रमेय जाना गया', 'जाना जाता है', 'जानेगा'—इसलिए यह प्रमाण कहलाता है। प्रमेय भी त्रैकाल्य- सम्बन्ध वाला है—'यह जाना गया', 'जाना जाता है' या 'जाना जायेगा।' ऐसा त्रैकाल्य-सम्बन्ध होने पर—'इसमें हेतु से उपलब्धि हो जायेगी', 'यह अर्थ को जानेगा' तथा 'यह जानने योग्य है' यह सब व्यवहार उपपन्न हो जायेंगे । त्रैकाल्य-सम्बन्ध न मानने पर समग्र लोकव्यवहार उच्छिन्न होने लगेगा। जो इस त्रैकाल्यसम्बन्ध को स्वीकार नहीं करता, उसके लिये 'पाचक लाओ, भोजन पकायेगा', 'घास काटनेवाले को लाओ, घास काटेगा'—यह व्यवहार कैसे बनेगा ! पूर्वपक्षी ने यह भी कहा था कि 'त्रिकाल-सम्बन्ध की असिद्धि के कारण प्रत्यक्षादि में प्रामाण्य नहीं बनेगा' ? उसके उत्तर में पूर्वपक्षी से यह पूछना चाहिये कि यह प्रतिषेध १. केषुचित्पुस्तकेषु वाक्यमिदं सूत्रत्वेनोपन्यस्तम्, परन्तु निकाये तथाऽप्रसिद्धत्वादस्मा- भिर्न स्वीकृतम् ।—स० ०
८६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० इति ? किं सम्भवो निवर्त्यते, अथासम्भवो ज्ञाप्यत इति ? तद्यदि सम्भवो निवर्त्यते, सति सम्भवे प्रत्यक्षादीनां प्रतिषेधानुपपत्तिः । अथासम्भवो ज्ञाप्यते, प्रमाणलक्षणं प्राप्तस्तर्हि प्रतिषेधः, प्रमाणासम्भवस्योपलब्धिहेतुत्वादिति ॥ ११ ॥ किं चातः ? त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १२ ॥ अस्य तु विभागः । पूर्वं हि प्रतिषेधसिद्धावसति प्रतिषेध्ये किं तेन प्रतिषिध्यते ! पश्चात्सिद्धौ प्रतिषेधाभावादिति । युगपत्सिद्धौ प्रतिषेध्यसिद्धयभ्यनुज्ञानादनर्थकः प्रतिषेध इति । प्रतिषेधलक्षणे च वाक्येऽनुपपद्यमाने सिद्धं प्रत्यक्षादीनां प्रमाणत्वमिति ॥ १२ ॥ कथम् १ ? सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १३ ॥ 'त्रैकाल्यासिद्धेः' इत्यस्य हेतोर्यद्युदाहरणमुपादीयते, हेत्वर्थस्य साधकत्वं कर के आप क्या करना चाहते हैं ? क्या सम्भव की निवृत्ति कर रहे हैं या असम्भव को बतला रहे हैं ? यदि सम्भव की निवृत्ति कर रहे हैं तो सम्भव होने पर प्रत्यक्षादि की निवृत्ति कैसी ! यदि असम्भव बतला रहे हैं तो असम्भव का ज्ञापन कैसा ? क्योंकि आपका उक्त प्रकारका ज्ञापन भी उक्त प्रमाणों के लक्षण की परिधि में ही आ गया ! आपने ही तो कहा था कि प्रत्यक्षादि में प्रमाण का असम्भव उपलब्धि का कारण है ! ॥ ११ ॥ इससे क्या हुआ ? त्रैकाल्य की सिद्धि न बनने से पूर्वपक्षयुक्त प्रतिषेध नहीं बन सकता ॥ १२ ॥ ( पूर्वपक्षी को उत्तर देने के लिये ) इस सूत्र का वक्ष्यमाण विभागार्थ कर लेना चाहिये । प्रस्तुत प्रमाण की सिद्धि होने पर प्रतिषेध्य के न रहने से वह किसका प्रतिषेध करेगा ? पश्चात् काल में प्रतिषेध्य मानने पर उस समय प्रतिषेध न कर पाने से प्रतिषेध्य की असिद्धि ही रहेगी । युगपत् (एक काल में) सिद्धि मानने पर पूर्वपक्षी द्वारा प्रतिषेध्य की स्वीकृति दे देने से उसका प्रतिषेध निरर्थक हो जायेगा । प्रतिषेध-लक्षणार्थक वाक्य के अनुपपन्न होने से प्रत्यक्षादि में प्रमाणत्व रह ही जायेगा ॥ १२ ॥ कैसे ? क्योंकि सम्पूर्ण प्रमाणों का निषेध करने से भी प्रतिषेध नहीं बन सकेगा ॥ १३ ॥ यदि 'त्रैकाल्यासिद्धि' हेतु का उदाहरण देने का प्रयत्न करे तो उसमें हेत्वर्थसाधकत्व १. पदमिदं क्वचित् सूत्रस्यावतरणरूपेण गृहीतम्, क्वचिच्च व्याख्यानरूपेणेत्युभयथापि समञ्जसमेव प्रतिभाति ।
१५. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८७
१५. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८७ दृष्टान्ते दर्शयितव्यमिति, न च तर्हि प्रत्यक्षादीनामप्रमाण्यम् । अथ प्रत्यक्षादीना- मप्रामाण्यम् ? उपादीयमानमप्युदाहरणं नार्थं साधयिष्यतीति । सोऽयं सर्वप्रमाणै- र्व्याहतो हेतुरहेतुः 'सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः' ( १. २. ६) इति । वाक्यार्थो ह्यस्य सिद्धान्तः । स च वाक्यार्थः- प्रत्यक्षादीनि नार्थं साधयन्तीति । इदं चावयवानामुपादानमर्थस्य साधनायेति । अथ नोपादीयते ? अप्रदर्शितहेत्व- र्थस्य दृष्टान्ते न साधकत्वमिति निषेधो नोपपद्यते; हेतुत्वासिद्धेरिति ॥ १३ ॥ तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः ॥ १४ ॥ प्रतिषेधलक्षणे स्ववाक्ये तेषामवयवाश्रितानां प्रत्यक्षादीनां प्रामाण्येऽभ्यनु- ज्ञायमाने परवाक्येऽप्यवयवाश्रितानां प्रामाण्यं प्रसज्यते; अविशेषादिति । एवं च न सर्वाणि प्रमाणानि प्रतिषिध्यन्त इति । विप्रतिषेध इति 'वि' इत्ययमुपसर्गः संप्रतिपत्त्यर्थे, न व्याघाते; अर्थाभावादिति ॥ १४ ॥ त्रै काल्याप्रतिषेधश्च शब्दादातोद्यसिद्धिवत् तत्सिद्धेः ॥ १५ ॥ किमर्थं पुनरिदमुच्यते ? पूर्वोक्तनिबन्धनार्थम् । यत्तावत्पूर्वोक्तम्- 'उपलब्धि- दिखाना पड़ेगा । इससे प्रत्यक्षादि का अप्रमाणत्व फिर भी नहीं बनेगा । यदि प्रत्यक्षादि का अप्रामाण्य ही मान लें तो दिया हुआ उदाहरण अर्थ को सिद्ध न कर सकेगा- इसलिए वह हेतु हेतु नहीं होगा । अतः यह जिस 'सिद्धान्त का आश्रय लेकर प्रवृत्त है उसका विरोध करने वाला विरुद्ध' (१.२.६) हेत्वाभास होगा; क्योंकि 'प्रत्यक्षादि प्रमाण अर्थ की सिद्धि नहीं करते' यह वाक्यार्थ ही पूर्वपक्षी का सिद्धान्त है, और उसके द्वारा यह प्रतिज्ञादि पांचों अवयवों का ग्रहण भी अर्थसिद्धि के लिये ही करना पड़ता है । यदि इनका ग्रहण न किया जाय तो अप्रदर्शित हेत्वर्थ की दृष्टान्त में साधकता नहीं बनेगी, तब प्रतिषेध भी कैसे हो सकेगा; क्योंकि हेतुत्व ही सिद्ध नहीं हुआ ॥ १३ ॥ अवयवाश्रित प्रत्यक्ष आदि को प्रमाण मानने पर समग्र प्रमाणों का प्रतिषेध सिद्ध न होगा ॥ १४ ॥ प्रतिषेधलक्षणक स्ववाक्य में यदि पूर्वपक्षी उन अवयवों पर आश्रित प्रत्यक्षादि को प्रमाण मानता है तो सिद्धान्ती के वाक्य में अवयवाश्रितत्व समानता के कारण प्रत्यक्षादि को प्रमाण मानना पड़ेगा; इस तरह सब प्रमाण प्रतिषिद्ध कहाँ हुए ! 'विप्रतिषेध' शब्द में 'वि' यह उपसर्ग 'समग्र प्रमाणों के निषेध का यथार्थ ज्ञान' का बोधक है, न कि विरोध का; क्योंकि 'विरोध' अर्थ मानने का कोई प्रयोजन नहीं है ॥ १४ ॥ ध्वनिरूप शब्द से वाद्ययन्त्र की सिद्धि की तरह प्रमाणरूप कारण को सिद्धि होने से प्रमाणों में त्रैकाल्य-प्रतिषेध भी नहीं बनेगा ॥ १५ ॥ यह बात पहले ( २. १. ११ में ) कह ही आये, अब फिर क्यों कही जा रही है ?