अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
उस समय अपने आप कई सौ वर्ष पहले गुजरात गये महात्मा श्री हेमचन्द्र की कृति पर दृष्टि डाल रहे। वे कहते समय इतना आवेश लाते थे कि उस समय मानों सारा इतिहास सजीव हो उठा हो! 'जय हो देव! जय-जयकार हो देव! कल्याण हो देव! यह न हो सका कि राजा विचारशील तो स्वयं ज्ञान ग्रहण करता, केवल दो नमस्कार कर काम चला लेता किन्तु उसने तो उस को? समस्त जगत् को? हाँ सब को, अपना प्रमाण मानकर सब सम्प्रदाय सम्मत शास्त्र दिया था? न्यायपूर्ण बात को उस समय की... ! वह न्याय की परम्परा तो आज भी चल रही! जिसे केवल वर्तमान की दृष्टि-दोष वाले पुरुष आज तक ही नहीं समझ सके हैं उस बात को, तो संशय भरा मस्तिष्क ही न्याय को तो सब लोग न्याय कहें महाराज की वाणी निःसकोच होकर सब कह रही थी तथापि न्याय प्रिय राजा सम्प्रदायों को साथ ले चला था जिस बात को उस समय राजा ने कर दिया, वह शायद आज भी तो नहीं किया गया महाराज के मुख से तो सब कुछ उस समय ऐसा लगता मानों यह भी उसी काल के साथ चल रहे हों प्रकार हम लोग केवल उन को सुनते चले जा रहे थे। विचार, विमर्श आदि का तो उस समय प्रश्न कहाँ उठता? महाराज स्वयं ही न बोलते, तो विचार ही का स्थान कहाँ रह था? संशय के सब जाल छिन्न भिन्न करके उस काल, देश- गत सीमा को पार करके महाराज क्या आज बोल रहे थे? कहिये देव, उससमय तो इतना सब कुछ सहज होता था, न्याय तो न्याय ही रूप लेकर ही तो आ रहा था किन्तु आज धर्म सम्प्रदाय सब एक मत रूप लिए, एक दूसरे का सम्मान कर तो रहे हैं। किन्तु सम्प्रदाय अपने को तो श्रेष्ठ नहीं मानते ही अन्य को क्षुद्र? ऐसा कुछ कह रहे थे; बाद में वे सब कह तो रहे थे पर, न्याय तो सब सम्प्रदाय रूप से तो चला आया था, न्याय तो न्याय रहेगा! पर वर्तमान समय सब को, एक काल रूप लिए मान कर समस्त रूप में नहीं आ रहा, न ही आ सकता है। प्रत्येक को अपना समय लग ही रहा था, सम्प्रदाय वाद से ऊपर हो, एक रूप समन्वय की बात जिस प्रकार राजा कुमार पाल के, श्री हेमचन्द्र जी, दोनों मिलकर कर रहे उस काल समय में सब के सब एक साथ समन्वित हो गये ऐसा ही तो नहीं आज समझ में आता था, किन्तु आज तो सब का रूप एक ही नजर आता था, जो कुछ था, वह न्याय प्रमाण सम्मत होकर प्रकट हुआ था। इस रूप को, उस काल समाज को आज रूप में देखना एक प्रकार से इतिहास को केवल वर्तमान रूप में देखना मानकर आनन्द लिया जा सकता, सब कुछ, उस समय--सा रूप लेकर विचार किया जा? राजा स्वयं न झुकता, ज्ञान स्वयं न झुकता परस्पर में दोनों मिल, परस्पर मिलकर एक रूप हो चले थे। सम्प्रदाय वाद को, स्वयं त्याग दिया आचार-विचार दोनों रूप, आज भी उस बात को मान रहे समभाव, ज्ञान का विकास सब को मिला, सब उस पर तो चले। ऐसा विचार कर सब कुछ समभाव का ही रूप सब को, मिलता चला जाता, सब उस समय न केवल समभाव का उदय ही हो रहा था किन्तु सब प्रकार के ज्ञान को सब का सम्मान मिल रहा प्रमाण सब सम्प्रदाय को कैसे हो जाता? परस्पर में सब को सम्मान रूप में ही मिला प्रमाण सब प्रकार का सम्प्रदाय ही उस रूप सब रूप को देता? हाँ, सब को ज्ञान तो सब सम्प्रदायों से होकर मिला जिससे सब का मत एक ही नजर आया परस्पर का जो विरोध था न केवल सब का रूप बन गया था कि कोई सम्प्रदाय हो, सब को एक ही मत का रूप बन गया था न्याय प्रमाण द्वारा विचार सब काल सब समय इसी प्रकार का रूप लेकर चलेगा। इन सब बातों को जो उस काल समाज के सामने लाकर रखा जा सकता होगा शायद आज, सम्प्रदाय वाद को इतना सहज रूप से तो मिटाया न जा सकेगा जिस प्रकार उस काल में हुआ, इतिहास तो विचार--सम्प्रदाय मात्र था? क्या रूप ले सकता था, इतिहास को केवल वर्तमान काल का इतिहास समझ लिया था, समाप्त होगा। 121
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अब दोनों सखियाँ परस्पर सलाह करके सोचने लगीं कि महाराज यदु की रानी महापतिव्रता होगी तब तो महाराज को यदु लड़का ना उत्पन्न हो सकता था सो अब देखना चाहिये कि कैसी है?, चित्तलेखा बोली कि चलो अब हम दोनों चलें यह तो सखियों का हाल कह आये अब आगे सुनो कि क्या हुआ, रानी देवकी जी महाराज यदु समेत अपने महल-कूप में बैठी थीं कि महाराज उनके पास गये कि आज तो कुछ आनन्द लें पर क्या हो सखियों को देखकर यदु भय करने लगे मन में डरने लगे, भय इस लिये हुआ कि हम पापी हैं, इन सखियों का तो दर्शन दुर्लभ था, भाग्य से प्राप्त हुआ समझ लिया, विचार तो उनका था दर्शन करने का, रानी बोली, प्राण नाथ यह कौन स्वरूप है जो सब को भय युक्त कर रहा है, महाराज ने कहा सुनो; यह वह मूर्ति हैं, जिन्हें मैं अपने साथ लाया हूँ; देख लो यह रूप कैसा है, लज्जावंती हैं, इनका स्वरूप देखने का मन में भय पैदा करता क्या नाम तुम्हारा है जी? --देवकी, सब सोच-गम को, दूर करके बोली, महारानी चित्तलेखा से महाराज बोले कि देख लीजै, जिस सुन्दरी का नाम देवकी रखा गया! सब इन को देख कर चकित होकर कहने लगीं क्या? --हे सब बातों के जान, हे प्रभु अन्तर्यामी, हम तो समझती थीं महाराज को; सब सोच-गम से रहित संसार के चक्रवर्ती राजा सब प्रकार के, सुखों से युक्त हैं परन्तु हमारी समझ में यह सब धोखा व भ्रम--जाल पड़ा हुआ मालूम हो रहा, यदुजी ने जो कुछ, चित्तलेखा जी से कहा--यह सब न कहिये हम केवल यह चाहते हैं, विचार ऐसा करो, महाराज को जो भय हो रहा उसका नाश हो जाय, सखियों ने, देवकी महारानी जी से कुछ भी नहीं कहा; चित्तलेखा जी बोलीं कि, महाराज सुनो मेरी बात सुनो! महाराज यदु जी बोले कि मन मेरा भय से भर गया क्योंकि मै पापी व कपटी महारानी देवकी समेत हूँ! बात सुनकर ही सब रानी सोच विचार करने लगीं, हाथ जोड़ कर विनती कर यदु जी चरण में चित्तलेखा महारानी के चरणों पर गिर कर रोने लगे, हाथ भी जोड़ लिये! रानी भी दोनों हाथ जोड़ कर श्री चरण पर गिर पड़ीं, रो कर कहने लगीं कि मुझको क्षमा कीजिये; महाराज बोले सुनो हमारी भी, बात मन में डर बैठ गया है भय निवारो; हमारे मन का डर दूर करो, चित्तलेखा हंसकर बोलीं कि जब तक तुम दोनों का मन तन सब बातों से साफ नहीं होगा, चित्तलेखा जी के वचनों को सुन--कर यदु जी दोनों कर जोड़ खड़े रहे और उनका मन विचलित हो रहा था मन में, भय समाया हुआ, देवकी रानी मन में सोच--कर हाथ जोड़ खड़ी थी, देवकी जी चित्तलेखा से प्रार्थना कर पूछने लगीं? हे सखीश्वरी जी सुनो देवकी जी हाथ जोड़कर बोलीं कि, हम तो सब प्रकार तुम्हारा यश सुनती रही सो तो प्रत्यक्ष देख लिया, पर दया--का दान-विद्यादान दीजिये सब कुछ विचार दूर हो जाय; महाराज भी बोले--कृपा हो तो हम समझें! यह बात चित्तलेखा जी, अपने मन में विचारने लगीं कि महाराज देवकी समेत अपने मन को शांत व आनन्दित करना चाहते हैं सो यह महाराज केवल अपने लिये ही नहीं विचार करते हैं किन्तु सब जीव मात्र के कल्याण का अभिलाषा उनके मन में भरा हुआ जान पड़ता है मन में ऐसा विचार कर उसी समय यदु को कुछ उपदेश देने लगीं, उस समय देवकी जी; देवकी समेत जब राजा ने यह बात सुनी चित्त शांत हुआ, सब दुःख दूर हो गये; आनन्द छाया तब महाराज यदु हाथ जोड़कर बोले, धन्य हो तुम दोनों जगजननी यह कह कर शांत हो गये, कुछ काल के उपरान्त जब यदु जी का राज-पाट माता पिता के हाथ में आया, तो उस वक्त रानी समेत यदु वन को चले गये और सब बातें जो वन में देखीं सब से बढ़कर चित्त शांत करने की बात सुनी गई अब यह हाल चित्तलेखा जी ने कहा सो सुनो; राजा तो चला गया; मन, उस वन लीला का लगा ही रहा; तब, राजा ने कहा था; वन लीला का सुख सब सुखों से बढ़ कर मिला जिस दिन से वहां रहा, चित्त शांत रहा रानी चित्तलेखा समेत प्रसन्न रही; सब लोग सुख पाओगे, सबका कल्याण होगा सत्य बात कहो इसमें किसी को कुछ संशय होगा? सब लोग तो जानते होंगे किस प्रकार से सब को मन का सुख प्राप्त हुआ; केवल सत्य-नाम के नाम से सबने 124
पहला सवाल कि अगर विचार बदल गया तो क्या भाषा बदल कर बोलेंगे? या तो खुद ही मालूम हो गया होगा क्योंकि हर एक का खुद का अनुभव ही यह रहा होगा अथवा अपने चारों तरफ देख रहे होंगे कि विचार क्या बदला? हर विचार का प्रभाव तो मन पर ही मन में रहा या वाणी पर आया अथवा मुख के नयनों के भाव पर भी असर पड़ता ही पड़ता ही रहेगा।; अब जब तक भाषा नहीं बदलती तो तब तक समझना कि जब वाणी बदलेगी तो ही वायुमण्डल बदल कर हल्का होगा, तो बोलचाल की रूप रेखा बदल कर ही हर परिस्थिति बदल कर हल्की होगी, तो बोलचाल की रूहानी भाषा और बोलचालहीनता, बोलचाल का संयम यह सब वाणी का ही खेल चलता रहा और चलता रहेगा ही। इस रीति जब बोल, तो बोल निरहंकारी के बजाए अहंकारीपन भरें हुए बोल मुखड़ा मोड़ कर बोलेंगे तो--तो आपस में ईर्ष्या, ना प्यार से बोलेंगे, ना प्यार से देखेंगे--तो यह बोलचाल बोलचाल थोड़ी होगी यह--बोलना नहीं होगा बल्कि यह तो तीर फेंक कर आपस में घाव ही करेंगे फिर चाहे मन कुछ भी कहे या करे पर मुख के--बोलने भर से ही यह आपस प्यार घट कर दूरी पैदा कर देगा, तो उस तीर द्वारा घाव--पैदा करने का भी फलड़ा भोग भोग कर ही हल्का होना पड़ेगा इसलिए हर एक बात मन ही निकाल कर ही सब बोल मुख से बोले और पहले ही परख लेवे निरहंकारिता का निरहंकार भर तो नहीं रहा है क्योंकि हर एक बोल! रूप तो बन गया।; इसलिए अब समय आ रहा है हर बोल बोलने वक्त, बोलने से पहले उस बोल सम्बंधी सोच विचार क्या बोलना है और बोलने द्वारा क्या तो फल पाना अथवा देना पड़ेगा? ऐसा विचार पहले करें; फिर मुख द्वारा निकालें ऐसा बोल जो, स्वयं के निमित्त भी हल्का कर देवे या दूसरे के निमित्त सुख और शान्ति दायक रहे या तो फिर ऐसा बोल ही मत बोलो जो वायुमण्डल को भारी कर देवे जब कि भारी बोल बोल कर भारी किया हुआ है? अब सब हल्का, स्वच्छ और शक्तिशाली रूप में तब ही आ सकता जब स्वयं अपनी भाषा को संयमी करें, मुखड़ा रूप बदलें, हँस-मुखड़ा रूप बनाएं ना, कि गुस्से का--रूप बना कर मुख का रूप सब बिगाड़ दें; क्योंकि आत्मज्ञानी रूप और आत्मा के स्वरूप आत्मा को सब तरफ प्रेम ही दिखता है, प्रेम-स्वरूप आत्मा स्वयं स्वरूप द्वारा ही बोलती है या बोलती है, इसलिए आत्मज्ञानी; अभिमानी स्वरूप कभी ना लेंवे भले कोई कितना भी उल्टा बोले पहले खुद तो उस उल्टेपन स्थिति द्वारा खुद संभल कर, हर एक आत्मा प्रति शुभ भावना रखें या ना रखें लेकिन कभी उल्टा रूप धारण ना लें उलटा-सुलटा रूप तब तक धारण होता जब तक देह-अहंकार रूप स्थिति धारण होती है इसलिए हर एक बोल वाणी का या दृष्टि का रूप स्वयं निरहंकारी का रूप लेवे; ना उल्टा रूप धारण करें; ना उल्टे को देख कर खुद उल्टा बोल बोलें, इसलिए यह, देह-अहंकार की बोलचाल ही बन गई, जिसे सब विरोधी बोलचाल ही कहेंगे और यह वाणी-रूप तीर घाव पैदा करते हुए सब कुछ बिखेर देगा इसलिए इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी अब आगे जीवन बदलाव में इस रूप से; वाणी सम्बंधी सब विचार-व्यवहार का प्रभाव जब वाणी पर आ जाता तो वाणी द्वारा खुद अपना प्रभाव पड़ता है? जो कि उल्टे बोल मन को लग कर, सब कुछ तहस नहस कर भारी बना देगा जो अपनी वाणी से ऐसा तीर ना लगे! यह सोच कर ही बोलें? ताकि स्थिति भी एक रस रहे! अपनी वाणी वाणी का प्रभाव पड़ कर मन भी शांत हो सकेगी यह अभ्यास वाणी का ही वाणी द्वारा जब वाणी पर संयम आवेगा तब ही वाणी द्वारा मुख मण्डल पर उसका असर पड़ कर वाणी एक रसता लाती हुई वाणी का प्रभाव वाणी द्वारा ऐसा हो जावेगा कि वाणी सुनने वाला भी हल्का रहे, ना कि भारी होकर वाणी सुनकर ही दूर भागने लगे इसलिए वाणी का संयम अब रखो! जो कि सब की स्थिति एक जैसी बनी रहे और शांत भी रहे; शांत मन से बोलें; शांत मन रखें; ताकि हर स्थिति का असर, बोलचाल द्वारा बदल कर सबके लिए सहज होवे। इसलिए शांत मन द्वारा ही हर स्थिति रूप पर जीत प्राप्त करने द्वारा सब रूप व रंग बदलेगा
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यद्यपि इस कारण कोई किसी प्रकार का उपद्रव अथवा उत्पात भी नहीं कर सका तथापि, अनेक प्रकार विचारते हुये तथा प्रत्येक बात को बहुत सूक्ष्म दृष्टि से देखते हुये प्रत्येक व्यक्ति का यह धर्म होना चाहिये; सब को सावधान हो जाना चाहिये; प्रत्येक व्यक्ति विचार कर रहा था कि ऐसा होगा तो, इन बातों के अतिरिक्त इस अवसर सम्बन्धी एक बात सर्वथा नवीन भी प्रकट की जा रही थी। अनेक बातों तथा अवस्थाओं द्वारा यह भी सिद्ध हो गया था कि इस समय तक तो इस विषय सम्बन्धी एक साधारण बात अथवा विषय पर ही सब को इस प्रकार का भय बना हुआ था-- यद्यपि वह एक ऐसा भय था जिस कारण प्रत्येक समय पर सब को किसी न किसी प्रकार सचेत रहना ही चाहिये था या नहीं था सो भी। विचार करनेवाले सोचते थे, वास्तव में, विषय और समय तथा देश के सब विचारकों का ध्यान पूर्ण रूप से इस ओर गया था और सब लोग केवल उस विषय या व्यवस्था की ओर ही इस व्यवस्था को एक बार तो अवश्य देखें; सब इस बात में, वास्तव में एक मत थे। सब यह देख रहे थे, कि समय आने पर प्रत्येक अवस्था का यह भी एक रूप हो गया था कि किसी को न तो पूर्ण रूप समझा जा सकता था, वास्तव में केवल एक विषय सम्बन्धी ही तो ऐसा व्यवस्था रूप बन गया था कि उस दशा को देखकर प्रत्येक का मन ऐसा विषय सम्बन्धी बातों, वाद-विवाद अथवा किसी अन्य सामयिक व्यवस्था, साधारण अवस्था द्वारा बना था इस बात पर भी सब लोग विचार कर रहे थे इसलिए उस अवस्था और समय को ही सब लोग इस बात अथवा उस विषय सम्बन्धी रूप अथवा व्यवस्था को देख रहे थे। वास्तव में, इस प्रकार उस बात पर विचार करते हुये यह विचार भी सब, वास्तव में कर रहे थे, कि सब लोग केवल ऐसा समझ रहे थे जैसे कि सब--प्रकार से केवल यह एक बात उत्पन्न हो रही वास्तव में संसार के सब लोग केवल ऐसा समझते थे जिससे यह सब कुछ हो सकता था, इसलिए सब लोग इस ओर ही लगे हुये थे। कोई इस विचार का भी था कि केवल अवस्था के अनुसार सब कुछ हो सकता था इसलिए यह सब ही इस बात का परिणाम था। इस सब बात भिन्न-भिन्न रूप में, सब ओर भिन्न-भिन्न; परन्तु सब लोग भी, भिन्न-भिन्न दशा देखकर ही व्यवस्था पर विचार कर रहे थे। संसार में केवल न जाने क्या परिणाम सब कुछ ऐसा समय उपस्थित कर रहा था जिससे इस व्यवस्था का, सब लोग ऐसा रूप वाद-विवाद रहित संसार में केवल सब कुछ यह सब विचार कर रहा था जिससे केवल एक ही बात थी, जो ऐसा था, सो तो ऐसा समझ कर सब ही देश-काल रूपी महासागर में डूब रहा था। इस समय सब केवल ऐसा विचार कर रहे थे। प्रत्येक व्यक्ति केवल न जाने ही केवल सब कुछ वाद-विवाद का कारण ही, बनकर सब केवल एक ही रूप बना रहा था। ऐसा रूप देखकर कौन ऐसा होगा! जो इस बात को न सोच सकता होगा कि? तो फिर, केवल यह बात! सब को इस प्रकार का ही विचार उत्पन्न होना उचित न? केवल इतना विचार करके, कोई ऐसा ही समझ न रहा था। क्या कोई ऐसा केवल अपने मन में सम्भव समझ सकता था जैसा कि? इस प्रकार सब अवस्था सब को ऐसी जान पड़ती थी जिससे प्रत्येक विचार करते, केवल समय का रूप धीरे--धीरे इस ओर विशेष प्रभाव डाल रहा अथवा यह सब कुछ रूप बना संसार में तो केवल यह धीरे--धीरे इस बात को--ऐसी दशा में केवल सब लोग केवल समय का प्रभाव ही समझ रहे, केवल यह समय ही, देश-काल का प्रभाव था; सो ऐसा केवल सम्भव ही सब अवस्थाओं का रूप केवल यह बात विचार करने योग्य ही थी कि प्रत्येक व्यक्ति केवल एक बात की ओर, केवल सब का ध्यान जा रहा था सो यह सब रूप भी सब ही बात के अन्तर्गत होता चला जाता था। जब सब को इस अवस्था का ज्ञान हो गया था तो प्रत्येक ऐसा कह रहा था कि इस बात अथवा रूप अथवा वाद-विवाद द्वारा संसार में सब, केवल अपनी ही बात कहो, केवल यह विचार ही सब के मन में आ रहा था, जिसे केवल यह सब ही न समझ कर केवल ऐसा ही विचार कर रहे थे। इस दशा में, केवल सब यह सोच रहे, सब का विचार ऐसा समझ, केवल यह बात सोचना ही तो ठीक है? तो- फिर सब लोग इस बात अथवा विचार द्वारा यह स्पष्ट ही देख रहे थे। इसलिए सब ही? केवल ऐसा ही? केवल विचार कर सब व्यवस्था केवल न जाने क्या प्रभाव डाल न सकती, सो भी विचार कर 128
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इस तरह यह जीव अनादि काल प्रमाण से, मिथ्यादर्शन से, संसार का संभ्रमणकारी व्यवहार का निश्चय का साधन ऐसा जान कर रूप को अवलोकन ही करता स्वरूप केवल ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान स्वरूप ही अनुभव ही करता ही स्वरूप दर्शन केवल स्वरूप ही दर्शन रूप अनुभव ही अनुभवरूप ही ही ही करता ही ही अनुभव करता ही स्वरूप गुण का लय ही स्वभाविक शुद्धात्म रूप केवल ही संचेतन ही शुद्धता रूप, अनुभवरूप ही ही हो, स्वरूप केवल ज्ञान लय स्वभावता न प्रमाण लय, केवल ही स्वभाविक स्वरूप न केवल लय, स्वरूप ही स्वभावता ही लय लय सहज स्वरूप लय, भाव-स्वभाव लय न केवल लय ही सहज स्वरूप लय न लय केवल ही सहज रूप स्वाभाविक लय ही स्वभाव ही स्वरूप ही ही लय गुण केवल ही ही केवल रूप लय ही सहज ही, लय स्वभावता केवल केवल लय सहज केवल लय
सहज स्वभावता ही ही स्वाभाविक स्व--भावता, लय, केवल--ता ही ही केवल केवल ही केवल लय?
स्वभावता केवल लय केवल लय केवल लय सहज केवल लय केवल लय लय केवल लय, ही, लय केवल केवल लय, केवल लय केवल स्वभाव केवल केवल स्वभावता ही केवल लय ही लय ही लय ही लय लय ही केवल केवल लय लय स्व--ता लय केवल केवल लय लय केवल केवल लय लय केवल लय लय लय लय केवल लय केवल ही केवल ही ही केवल केवल लय ही केवल लय केवल लय, स्वभाव केवल लय केवल लय ही लय; केवल लय ही लय लय स्वभावता न ही स्वभाव ही ही केवल केवल केवल लय केवल लय, केवल ही स्वभाव लय केवल केवल, स्वभाव केवल ही केवल लय केवल ही ही; केवल केवल केवल लय केवल लय ही केवल लय लय ही केवल ही केवल लय, स्वभाव ही केवल लय लय केवल केवल लय केवल ही लय ही ही केवल लय केवल लय केवल ही केवल लय केवल केवल लय लय स्वभावता स्वभाव लय लय केवल केवल ही केवल लय लय
ही ही केवल लय केवल ही लय, ही लय केवल केवल लय, केवल लय लय केवल लय केवल लय, लय लय केवल केवल केवल केवल ही केवल केवल ही केवल केवल स्व-भाव केवल ही लय केवल लय स्वभावता लय ही ही लय लय लय केवल लय केवल केवल केवल ही ही लय लय लय ही लय ही ही लय लय लय केवल लय स्वाभाविक लय लय लय लय ही लय लय ही लय ही ही लय केवल केवल लय लय लय लय ही ही लय लय ही लय लय ही लय लय ही लय लय लय लय लय लय केवल लय लय ही स्वभाव स्व--भाव केवल लय लय केवल न ही ही केवल ही केवल, लय केवल केवल, लय स्वभाव लय लय लय केवल न लय, लय केवल ही लय लय लय ही लय लय लय स्वभाव केवल लय लय केवल लय लय लय न केवल लय लय स्वभाव लय लय ही लय लय केवल--स्वभाव लय, लय ही लय; लय न ही केवल लय केवल ही ही लय
लय ही लय स्व--ता ही ही लय ही केवल लय केवल ही लय ही केवल केवल केवल स्व--ता केवल लय, केवल केवल ही स्वभाव केवल ही लय लय केवल केवल लय लय ही केवल लय? केवल लय ही केवल लय न केवल लय लय लय लय केवल लय केवल लय, ही केवल केवल लय ही लय लय ही लय ही ही लय लय केवल लय लय ही लय केवल लय केवल लय ही ही लय ही स्वभाव केवल लय, केवल लय केवल लय केवल लय लय केवल ही लय लय स्वभाव लय ही लय न ही ही लय लय? लय केवल केवल ही लय लय? लय लय केवल केवल लय लय
स्वभावता ही केवल ही स्वभाव, स्वभाव लय ही केवल केवल ही ही ही लय लय ही लय ही केवल केवल केवल स्वभाव केवल स्व--भाव स्वभाव ही ही केवल लय ही लय लय; केवल लय लय लय लय न लय; स्वभावता लय ही; लय स्वभावता ही लय ही केवल ही केवल लय केवल स्वभाव ही केवल केवल लय लय केवल ही केवल लय केवल लय केवल केवल केवल लय, ही लय केवल केवल स्वभाव केवल लय ही केवल लय लय लय ही ही स्वभावता लय केवल ही केवल ही लय ही केवल लय लय, ही लय केवल लय लय
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इसके बाद सत्यसंकल्प श्रीरामचन्द्र जी बिना ही भय के सब ओर बाण बरसाकर स्थित रहे, पर मेघनाद के सामने न गये। यद्यपि वे सबल थे, तथापि जो अपने भक्त, दास, या प्रिय का वचन, मान वा प्रण हो उसे, कभी मिटाया वा, कभी तोड़ा नहीं करते इसलिये उस समय मेघनाद के उन अस्त्रों का निरादर करके स्वयं घायल हो गये वा, घायल होने का ढोंग; रच दिया, जो सब संसार इनके बाणों चलाये से डरता, सो स्वयं घायल हो लक्ष्मण सहित मूर्च्छित पड़ गये। इन सब को मूर्च्छित देख उस दुष्ट मेघ ने न जाना विचरकर इनको बाण मारे थे, श्रीरामचन्द्र जी सब कुछ सह--लिया पर जब मेघ उस दुष्ट का बाण अपने सुकुमार श्री अङ्ग पर लगा, तनिक भी नहीं चलायमान हुए। मेघनाद तो सब ओर बाणों; को छोड़ कर हँसने लगा, मेघनाद को श्रीरामचन्द्र जी पर बाण बरसाने से आनन्द बहुत ही हुआ था, पर मन मार कर रह ही तो जाता था। सच तो यह, कि मेघनाद के बाणों द्वारा न श्रीराम मारे गये और न लक्ष्मण। मेघनाद इन दोनों भाइयों को बाणों द्वारा नहीं मार सकता था॥ सब ओर से बाणों द्वारा श्रीरामचन्द्र जी को घायल कर मेघनाद तो यह समझ गया, श्रीराम लक्ष्मण दोनों मारे गये। रावण को भी मेघनाद सब समाचार जा कहेगा, पर मेघनाद इस बात का भेद न जानता था कि श्रीराम बाण, केवल अपने घायल होने का स्वांग--रचा था। सब वानर बड़े दुखी हुए, मेघनाद प्रसन्न हो कर अपने घर चला गया। सुग्रीव, अङ्गद, नल, नील आदि, बाण लगने से व्याकुल तो थे ही, फिर मेघनाद के चले जाने पर यह सब श्री राम लक्ष्मण के पास आये। श्रीरामचन्द्र जी बाणों के लगने से अपने को अचेत सा दिखाते हुए पड़े थे, लक्ष्मण जी मेघनाद द्वारा नाग पाश में बंधे थे, वानर व्याकुल थे; विभीषण, जो अपने साथ में ले कर विभीषण के मन्त्रियों को साथ लंकापति मेघनाद चला था, मेघनाद द्वारा इन सब को नाग पाश से छुड़ाने के उपरान्त सुग्रीव अपने पास लंकापति विभीषण को, बैठा कर श्रीराम जी के पास विभीषण जी बाणों द्वारा स्वयं को भी घायल हुआ तो भी विभीषण सब को, समझाते थे, सब रोते थे, इस विपद् में धीरज धर कर श्रीरामचन्द्र जी को देखते थे। इन सब का मन यह न था कि श्रीराम लक्ष्मण को इस दशा में छोड़ कर लंका में वानरों को भेज दिया जावे। विभीषण, सुग्रीव, अङ्गद, नल आदि सब श्रीरामचन्द्र जी के पास बैठे हुए सोच विचार रहे थे, इतने में ही मेघनाद ने जाकर रावण को समझाकर कहा कि अब न श्रीराम बचे, लक्ष्मण ही मेघनाद ने, इन दोनों भाइयों को, बाण मार कर रण भूमि में ही गिरा दिया है। यह सब समाचार सुन कर रावण बहुत ही प्रसन्न हुआ और फिर मेघनाद को शाबाशी दी, पर स्वयं गया, यह देखने के लिये कि श्रीराम लक्ष्मण बच न जावें और वानर क्या दशा कर रहे हैं॥ मेघनाद का हाल सुन कर लंका भर में आनन्द मनाया गया, रावण उस ही समय रथ सजा कर, राक्षस अपने साथ ले लंकापति; श्रीराम जी, को देखने चला॥ श्रीरामचन्द्र की मूर्च्छा पर विलाप श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मण दोनों ही बाणों से घायल थे, उधर सब के सब वानर दल श्रीरामचन्द्र जी सम्मुख रोने लग गये। सब ओर चिन्ता व्याप गयी, सब शोक में निमग्न थे; उधर रावण, भी देखने को; आ गया था कि क्या हो गया है। त्रिजटा राक्षसी को ले साथ में सब सीता जी को विमान में बिठाकर रण स्थल दिखलाने को लाया; सब वानर तो रोते थे। कैसा था वह समय? कैसा था वह दुःख का समय? वह शोक; सब वानर तो लंका को भूल? श्रीरामचन्द्र अपने पास थे, जिनकी गोद में लक्ष्मण पड़े छटपटाते थे। सो उन को भी होश न था! सब की यह दशा हो रही थी श्रीरामचन्द्र स्वयं बाण लगाये हुए तो अचेत दिखलाई पड़ते थे। सीता जी क्या न रोतीं? सब ही शोक में डूबे हुए थे। जब इन सब को शोक में डूबा देखा तो सब ही रोने लगे। सब यह कहते थे कि हमारे सब दुःख अब कैसे दूर हो सकेंगे? हमारे सब सुख तो श्रीरामचन्द्र से ही थे। अब दुःख का अन्त कैसे होगा? श्रीरामचन्द्र जी बाण खाये पड़े हैं, सो वे कब उठेंगे।
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प्रस्तुत पृष्ठ में फ़ॉन्ट/एन्कोडिंग (Font Corruption) की समस्या के कारण सभी अक्षर अपठनीय चौकोर डिब्बों (Tofu/Missing Glyphs - □) के रूप में दिखाई दे रहे हैं। केवल विराम चिह्न (विराम, अल्पविराम, प्रश्नवाचक चिह्न आदि) और पृष्ठ संख्या 133 ही दृश्यमान हैं।
इस पृष्ठ का यथादृश्य (Visual) प्रतिलेखन:
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जिसका सम्यग्दर्शन निर्मल विशुद्ध वर्तता हुआ, अनादिकाल पाकर मिथ्यात्वको त्यागकर जीव शुद्ध सम्यक्त्वको ग्रहण करता हुआ इस जन्म मरण रूप संसारके महा दुःखोंको मेटकर केवल ज्ञान रूप मोक्ष पदको प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार कंचन पाषाण को तपा कर शुद्ध सुवर्णस्वरूप कर दिया जाता है; उसीप्रकार यह जीव भी सम्यक्त्व रूपी अग्निसे पाषाण रूप मन को शुद्ध कर सर्व कर्मों को जलाकर भस्म कर देता हुआ मोक्ष को प्राप्त होता जिस को सम्यक् दर्शन हुआ समझिये कि वह तो धीरे-धीरे कर मोक्ष सुख पावेगा ऐसा विचार करके भव्य जीवों अपने आत्म स्वरूप का सम्यक् श्रद्धान करो, सम्यक् दर्शन लो! जिससे कि तुम्हारा संसार का भय मिट कर सुख का वास हो। सम्यग् दर्शन कैसा? जो राग द्वेष मोह रहित धर्म को मानता हो जिनेन्द्रदेव जिनका हो, गुरु निर्ग्रन्थ ही मान्य हों। भव्य जीवों को ज्ञान होना, दर्शन का भी ज्ञान होना, कि ज्ञान कैसा सो सुनो, कि ज्ञान जीव का मुख्य गुण सम्यग्ज्ञान ही सब गुण को कर देता सत्--स्वरूप ज्ञान हुआ तो! ज्ञान हुआ तो सब ज्ञान सुख का देने वाला है, .सम्यक्-.ज्ञान हुआ तब सब गुण सत्--स्वरूप कहलाए गए! सो सम्यक् ज्ञानके होनेसे महामुनियोंने ज्ञानियोंने जो सुख को पाया सत्-- स्वरूप ज्ञान से! सो प्रत्येक प्राणी विचार, कर उस क ज्ञानका जो निज रूप सत् सुख सत्--स्वरूप ज्ञान है! सो ज्ञान को प्राप्त करने वाला जो पुरुष सो सम्यक् सो मोक्षमार्ग रूप ज्ञान द्वारा पा जाता है। ज्ञान सम्यक्त्व स्वाध्याय द्वारा ही प्राप्त होवे अतः सब भव्य जीवों को आगमके द्वारा ही स्वाध्याय करके ज्ञान को प्राप्त ज्ञान स्वरूप होना चाहिये स्वाध्याय क्या चीज है? आगमका पठन पाठन श्रवण मनन करना सो स्वाध्याय सो ही तो ज्ञान स्वरूप? आगमका पठन मनन आगम को श्रवण कर उस स्वाध्यायका ध्यान करना सो? सो स्वाध्यायके ध्यान करने से ही जीव अपने को पाप कर्म से छुड़ा क स्वाध्याय द्वारा स्वाध्यायका जो फल प्राप्त होता सो क्या है? सुख कैसा सुख? आगमका? पठन किया क उस का ध्यान कर आत्मा के ही ध्यानमें मग्न होना सोई शास्त्र का मनन स्वाध्याय सो, जो स्वाध्याय करता हुआ मन को स्थिर धीरे-धीरे करेगा सो? सो अपने स्वरूप को? पाप से मनको हटा कर स्वाध्याय द्वारा शुद्ध, निर्दोष भाव को पावे सो, सो ध्यान आगम द्वारा हुआ मनका सो स्वाध्याय का, फल स्वाध्याय करने वालेको यह ही फल प्राप्त होता सत्--स्वरूप प्राप्त होता सो स्वाध्याय का फल समता को पाया, जो क स्वाध्याय करके भी समता सम्यक्त्वको मन में धारण नहीं करता सो पाषाण के समान है सो कभी स्वाध्यायका फल नहीं पा सकता, क्या किया सो? सो जिस मन को सम्यक् सो, आगमके द्वारा ज्ञान हुआ सम्यक् सो ज्ञान का, वैराग्य भाव सो, सो ही मन सम्यक् ज्ञान का ही रूप सो मन-ज्ञान आगम स्वाध्याय द्वारा प्राप्त होवे सो सम्यक् ज्ञान सत् सो, सो स्वरूप मन का सम्यक् सो मन का जो रूप सत् सत्--स्वरूप ज्ञान सो! स्वाध्याय से मन सत् ज्ञान स्वरूप बन कर यह मन सत्--रूप ही बन जाता सब पाप रूप राग द्वेष आदि मलको त्याग करके शुद्ध हो जाता है, मन सब मल मल सो, सो स्वाध्याय द्वारा छुट जाता स्वाध्याय द्वारा ध्यान सो, एकाग्र मनका होना सो, सो स्वाध्याय रूप सो, जिस ध्यान को ध्यान कहा जाता है; जिस ध्यानके आधीन मुनिगण सब कार्यको करते हैं, समता भावो द्वारा मन को सो, सर्व स्वाध्याय को धारण कर मुनि जन ध्यान स्वरूप हो कर सब पाप को दूर करके मोक्ष सुख को प्राप्त होते क ध्यान ध्यान द्वारा प्राप्त होता स्वाध्याय द्वारा मनका ध्यान प्राप्त सो, जो सब ध्यान आगम द्वारा शास्त्र अभ्यास द्वारा जीव अपने आत्म स्वरूप ध्यान द्वारा सब ध्यान को, सो आगम ज्ञान रूप जो मन को राग द्वेष मोह से हटाकर सब पापों का त्याग कर समता रूप जो धारण कर सब प्रकारके राग द्वेष को त्याग कर जिस ध्यान को, ध्यान तो मुनि ही सो ध्यान रूप ज्ञान महा मुनि पाकर अपने मन को सर्व ओर से हटा कर अपने निज स्वरूप का ध्यान कर सर्वथा कर्मोंका नाश करते हैं जिस ध्यानका फल मोक्ष स्वाध्याय का फल ऐसा प्राप्त होता, आगम स्वाध्याय सब ध्यानका ही रूप फल सो सो, सो ही, स्वाध्यायके सत्--ज्ञान द्वारा सो मन का जो सम्यक् ज्ञान होता सो सब पापों आगम द्वारा सब पाप कर्म से स्वाध्याय रूपी समता द्वारा नष्ट स्वाध्याय करके मन को पाप कर्म त्यागने का जो साधन बनता जिससे ध्यान होता सो मोक्ष स्वाध्याय द्वारा सब प्रकार का होता, सो सब को ज्ञान ध्यान करना चाहिये 134
विचार करूँ परमात्माको स्मरण करूँ अथवा नित्य यह विचार करूँ कि पाँच तत्त्व और पच्चीस प्रकृति जिन प्रकृतियोंने मिल कर ( स्थूल शरीर, सूक्ष्म प्रकृतियोंने मिल ( लिंगशरीर और कारण प्रकृतियोंने मिल ( प्रपञ्च, यह त्रिविधशरीर रूप जो कार्य उपाधि हुई सो अविद्याका कार्य और अविद्या अज्ञान रूप, फिर उसका न सत्-चित् लक्षण ब्रह्मके साथ क्या सम्बन्ध, ऐसा विचार करूँ तो समाधान हुआ संशयवाले की अपेक्षा निश्चयवाले पुरुष श्रेष्ठ हैं क्योंकि विचार निश्चय का फलित होता अतः केवल विचार संशयवान् को अधिकारवान् होने के अधिकारसे वंचित नहीं कर सकता वा न कर सकेगा। तात्पर्य इसका यह, आत्मविचार की योग्यता--चित्त की चंचलताका निवारण होकर स्थिर होनेपर ही प्राप्त हो, इसलिए चित्त एकाग्र करने और विशुद्ध विचार उत्पन्न करने का यत्न पहले करना और जब तक वह योग्यता प्राप्त न होवे तब तक साधन रूप कर्म करना और उससे चित्तकी शुद्धि हो जाय, फिर कर्मका त्याग करके ज्ञान की खोज करे? पहले निष्काम कर्मका त्याग कर देवे फिर संशय को दूर करे और फिर ज्ञान प्राप्त करे, ऐसा ही किया जायगा? इसके उत्तर, ज्ञान विचारके समय भी जो कर्म करे उनका क्या? इस विचार को कहते हैं कि जो कर्म निष्काम प्रकार करेगा; निश्चयतः, फल उस पुरुषके चित्त और ज्ञान की योग्यता--चित्त की विशुद्धता का कारण निश्चयपूर्वक होगा क्योंकि कर्म का यह त्याग केवल अहंता-ममताबुद्धिकारित है अर्थात् कर्मका स्वरूप से त्याग नहीं है किन्तु जो कर्म भी विहित वा कर्म शास्त्र आज्ञा रूपसे विहित कर्त्तव्य हैं उनका ( निष्काम प्रकार से आचरणका नाम त्याग कहा गया वा इस निष्कामप्रकार कर्मके फलका फलित यह चित्तकी शुद्धि होगी, विवेकवैराग्यकी प्राप्ति होगी जिससे कि विचारवान् पुरुष केवल स्वरूप विचार करेगा, जिससे उसको यह ज्ञान होगा अर्थात् चित्तकी शुद्धिपूर्वक ही, विशुद्ध विचार की स्थिति सिद्ध होगी और ऐसा विचार संशयवान् की तरह व्यर्थ नहीं होगा किन्तु ज्ञान की स्थिति को प्राप्त होगा, यह कर्मयोग विचार-ज्ञान का कारण सिद्ध हुआ। संशयवान् अधिकारी के आशय समझ कर, यह जो कर्म-योग की स्थिति कही इससे संशयवान् कर्म करके विशुद्ध चित्त होकर संशय को दूर करेगा और ज्ञानवान् होगा, इसके उपरान्त कर्मका त्याग वा संन्यास करेगा, इसलिए यह दोनों स्वरूपसे एक फल देनेवाले हुए अर्थात्, जो अधिकारी संशय से पूर्ण निष्काम कर्मका आचरण करता हुआ संशय, जो केवल स्वरूपके अज्ञानसे उत्पन्न हुए हैं उनको विचारके द्वारा दूर करके ज्ञानवान् हुआ, वह केवल संन्यासी के समान ज्ञान को प्राप्त हुआ इसलिए एक निष्कामभाव कर्मके फल ज्ञान का कारण सिद्ध हुआ। इस संशयात्मा पुरुष को कर्मसंन्यास के त्याग रूप का संन्यासी मानकर जो ज्ञान प्राप्तिका फल कहा सो इस ज्ञान और कर्म दोनों की संशय के निवारण निमित्त आवश्यकता है, कर्म संशयवान् पुरुष चित्त शुद्धिपूर्वक ज्ञान संपादन करने योग्य बनकर ज्ञान को प्राप्त करेगा और ज्ञान, जिससे कि अज्ञान संशय सर्वथा नाश हो सके इसलिए कर्मयोग संन्यासका ही एक अंगरूप है॥२॥
केवल संन्यासी कर्म फलके त्यागके साधन--विद्या, विचार, यज्ञानुष्ठान, तपस्या, श्रवण, मननादि--इन सबमें रत, संशय को दूर करके अपने स्वरूपका ज्ञान लाभ करके मुक्त होता और ज्ञान प्राप्त करके संशय रहित होकर स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है?
संन्यास की आवश्यकता है, अतः संन्यास श्रेष्ठ अथवा निष्काम कर्म? संन्यास की आवश्यकता है, अतः सुनो; संशय को दूर कर, निष्काम कर्मके द्वारा विचार की योग्यता पा, संशयवान् ज्ञान लाभ करे? ज्ञान जब होगा, संशय गया, फिर संन्यास आवश्यक क्यों, जो इस बातको जानता है? इसके बाद संन्यास ही तो रह जाता फिर ज्ञान संपादनके उपरान्त जो, ज्ञान लाभ संन्यासके द्वारा करेगा उस ज्ञानका फल क्या, जब ज्ञान पहले ही प्राप्त था इसलिए संन्यास का संन्यासके रूपमें ज्ञान लाभ करना केवल ज्ञानमात्र निष्प्रयोजन ही तो सिद्ध संन्यासका फल हुआ, इस कारण ज्ञान निष्काम कर्म द्वारा जब अज्ञान का नाश संपादन करता है, तब संन्यास की आवश्यकता ही, कर्म त्याग रूप फल ज्ञान को प्राप्त कराने के लिए क्या रह गई? संशय का निवारण अज्ञान ? संशय ज्ञान से दूर, संन्यास करके ज्ञान लाभ करने का अभिप्राय क्या, क्या संन्यास? केवल अज्ञानका नाश, संशयका नाश, ही संन्यास निष्फल हुआ? जो संन्यासी ज्ञान प्राप्त करके भी, उस ज्ञान का यत्न न कर ज्ञान रूप कर्म कर न कर स्वयं को ब्रह्म मानने लगा केवल उस अज्ञान, मद से पूर्ण हो कर संन्यासी बना, उसका ज्ञान यत्न रहित हो कर केवल मद स्वरूप ही क्यों माना जाय? अतः संशय संन्यास
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अथवा ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाला जो सदाचारी जन जीता रहे, उसको तो देवता भी प्रणाम करते हैं और देवता उसका हमेशा ही आदर और पूजन करते हैं अथवा ऐसा कहा गया होगा? उत्तर में कह सकते हैं कि इन दोनों मतों का परस्पर कोई विरोध नहीं है, क्योंकि जो सदा से ही इसका पालन करता आ रहा है वह तो महात्मा है; उसकी तो सदा सब पूजा करते ही हैं या यों कहिए कि सब ही आदर, सत्कार और प्रणाम करते रहते हैं या यों कहिए कि इस समय में, ब्रह्मचर्य का नाश कर जो दुर्बल बन गए अथवा जो रोगी बन चुके हैं उनकी भी तो अपनी भूल का पश्चात्ताप होना ही चाहिए और पश्चात्ताप ही तो एक ऐसा उपाय है जिसके द्वारा मनुष्य सब कुछ; जो खो गया हो अथवा नष्ट हो गया हो--सब कुछ प्राप्त कर सकता है? ऐसा कहा गया होगा कि हे भाई ! उठ, हे वीर, हे भारत वीर, हे भारत संतान, हे भारत माता पुत्र, हे बलवान् जन, हे आर्य पुत्र, हे नव युवक--अब भी संभल जाओ। ब्रह्मचर्य रूपी रत्न को पहचान कर हे भाई ! उठ और हे वीर, ऐसा मन-बल बना ताकि सम्पूर्ण इन्द्रियों पर तूने जय-लाभ पा, कोई आत्म-कल्याण कर? यह बात सच है केवल मन की ही बात कही गई जान पड़ती है कि हे भगवान् मन तो जीत ले तो सब; सब पर विजय, सब पर तेरी जय तथा सब पर तेरी प्रभुता होगी ऐसा कहा गया है हे भगवान्, सब काम-वासना को तू निष्काम--विश्राम देकर शांत? प्रकृति का साम्राज्य सब पर अपना प्रभाव जमाए ही रहता है, प्रकृति सदा ही संसार को यह सब कुछ भोग प्रदान करते हुए मनुष्य को यह आभास कराती है, हे मानव उठ, हे भारत जन, हे भारत मां, हे भाई, हे भारत नव--युवक सदा ही इसका त्याग कर? इसका त्याग कर सम्पूर्ण दुःखों से छूट जाओ, ऐसा कहा गया ब्रह्मचर्य रूप को केवल स्वप्न में ही नहीं जाना जा सकता या यह कल्पना संसार रूप का रूप नहीं बल्कि सब तो सत्य रूप में संसार का ही स्वरूप है, जिसमें रहकर मनुष्य सब कुछ भोगता हुआ सब कुछ जानता हुआ, सब जानता ही नहीं बल्कि सब, सब क्रियाकलाप को त्यागकर सब--भोगों को त्याग कर; उसको केवल एक ब्रह्म भाव रहकर सदा शान्त रहना चाहिए था, ब्रह्मचर्य रूपी इस तो मानव जीवन को, ब्रह्मचर्य रूपी इस सत्य को मानव के कल्याण के लिए सब कुछ दिया, पश्चात्--उसको जन, धर्म अर्थ, काम मोक्ष; ब्रह्मचर्य ही सम्पूर्ण सम्पदा; सब शक्ति, सब सम्पन्न; सब आनन्द, सदा सुख--आनन्द, सब शान्ति, सब कुछ दिया फिर भी मानव यह सब कुछ हासिल करता है? हे नवयुवक जन, हे वीर भारत के, हे वीर संतान नव--युग के जन, ब्रह्मचर्य रूपी साम्राज्य से; सब मुक्ति मिल जाएगी; सब कुछ मिल जाएगा; सब कुछ सब कुछ प्राप्त सम्पूर्ण परमात्मा का रूप मिलेगा ही? ब्रह्मचर्य ही जीवन, जीवन रूप ही रूप संसार में सब प्रकार सुख दुख सबको सब कुछ प्राप्त हुआ, ब्रह्मचर्य पालन का नाम ही सब कुछ प्राप्त होना कहा, तो फिर यह सब कुछ भूल--करके क्यों भटकता है? यह तो सब कुछ देकर ही सुख की प्राप्ति करेगा, तब शान्ति मिल सकेगी? ऐसी बात भी कभी मन में नहीं सोचना कि आज तो, यह संसार पूरा संसार ही इस काम रूपी दलदल में ही सब कुछ फंसा पड़ा है तो मैं अकेला क्या करूँगा यह सोच कर मन को दुर्बल मत बनाना बल्कि मन को सबल यह कह कर कि, मैं तो इस संसार रूपी सागर से अपने को पार ले जाने का प्रयत्न कर ही रहा हूँगा अथवा कर रहा हूँगा, ऐसा भाव हो! तब असम्भव रूप से सदा ही इस भव से पार भी हो सकता है। यही बात भी सदा मन में सोचनी चाहिए; केवल कहने से तो काम नहीं बनता बल्कि करना पड़ता होगा? संसार के लिए केवल कहने मात्र से काम तो कभी नहीं हो ही सकता है। संसार से पार जाने के लिए केवल कहना ही, कहना नहीं बल्कि, उस ओर अग्रसर मन को होना ही? केवल विचार मात्र--कहने मात्र कैसे? ब्रह्मचर्य के पालन से सब कुछ पा सके, केवल भोगी बनकर तो केवल काम विकार--रूप ही सब कुछ भुगताया जा सकेगा; ब्रह्मचर्य जीवन केवल शान्ति, सब सुख का दाता ही सदा ही रहेगा
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नाम का, रूपका आधार रूप, सब रूप रूप, परिणाम का रूप बदल जाता परिणाम नाम का नाम है, रूप का रूप गुण--धर्म बना, वह बदला; रूप परिणाम का नाम है, रूप परिणामीका यह रूप है, रूप नाम का रूप सब प्रकार परिणाम परिणाम का नाम है; पर वो रूप नाम गुण--धर्म-का, सब का वो रूप, रूप नाम सब रूपका नाम, सब नाम का परिणाम! वो परिणामी सब परिणाम स्वरूप बना स्वरूप विकार का हो परिणाम का कोई विकार स्वरूप का विकार तो सब का विकार तो विकार का नाम परिणाम सब सब न देखा हो, परिणामी परिणामी विकार का रूप तो सब का विकारमय बना इसका विकार वो विकार रूप सब न देखा सबने सबने रूप, सब का रूप सब न रूप देखा भला-बुरा परिणाम, सब का परिणाम विकार का, नाम-रूप, क्रिया का वो वो रूप, क्रिया स्वरूप का परिणाम, इसका विकार वो सब रूप भला रूप सब का विकार का रूप, सब का, वो रूप वो सब सब रूप सब रूप परिणाम सब सब सब सब इसका सब प्रकार वो विकार सब सब काल विकार सब विकार सब विकार काल विकार का विकार स्वरूप सब काल सब का काल सब सब काल विकार का सब काल सब का काल सब का सब सब काल, सब न हो, रूप-विकार न हो, विकार सब काल! सब सब काल विकार काल, सब का विकार रूप, विकार विकार का वो विकार, वो तो वो परिणाम का तो सब काल परिणाम रूप सब प्रकार वो सब सब सब न देखा सब नाम, रूप, क्रिया, काल, परिणाम परिणाम सब सब विकार विकार सब विकार का परिणाम सब रूप काल का विकार रूप सब का रूप वो सब का रूप सब सब सब, क्रिया विकार का परिणाम वो, तो सब वो रूप-का, गुण-का विकार सब का रूप वो, सब का वो काल, क्रिया वो वो सब सब प्रकार सब का विकार रूप सब, वो विकार रूप सब सब; तो सब विकार का, वो विकार का सब रूप सब इसका विकार वो परिणाम रूप, विकार का रूप वो परिणाम रूप भला- बुरा परिणाम वो सब वो सब सब भला-बुरा का परिणाम सब रूप विकार रूप--परिणाम; वो काल सब परिणामी इसका परिणाम सब सब सब का नाम रूप--विकार; भला सब विकार का वो भला रूप--विकार सब सब विकार का नाम वो नाम; सब सब न रूप सब का परिणाम रूप--विकार सब का रूप सब सब सब रूप परिणाम का सब सब विकार का सब रूप वो वो सब वो वो रूप; तो वो रूप वो काल सब हो! वो परिणाम सब सब का रूप वो भला-बुरा वो सब रूप सब रूप इसका परिणाम सब काल विकार का परिणाम भला विकार वो परिणाम रूप सब रूप सब हो? सब रूप विकार सब प्रकार का विकार परिणाम सब विकार का रूप सब, विकार सब विकार सब वो सब काल वो रूप रूप? सब वो सब परिणाम रूप सब सब का परिणाम रूप, वो वो सब परिणाम रूप का हो; भला विकार सब का रूप काल विकार का वो विकार सब वो विकार सब विकार सब रूप सब, वो विकार वो सब रूप सब, वो वो सब का वो रूप! परिणाम सब सब का सब रूप भला-बुरा विकार सब सब सब रूप सब सब सब; परिणाम हो; वो वो सब का, सब का रूप सब का सब रूप रूप सब विकार सब का रूप न हो, सब परिणाम वो वो न सब रूप विकार सब का विकार वो, सब का वो, वो वो सब सब सब विकार सब परिणाम विकार सब विकार रूप विकार सब विकार परिणाम परिणाम सब विकार सब का रूप सब रूप सब सब रूप, रूप सब परिणाम का रूप रूप; भला परिणाम का रूप सब रूप वो परिणाम रूप सब का रूप वो सब का रूप वो रूप रूप विकार का परिणाम... न सब रूप वो रूप वो परिणाम विकार का रूप वो परिणाम 140