माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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□□□□□□□□□, □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□, □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□-□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□, □□□ □□ □□□ □□□, □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□, □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□, □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □ □□□□ □□□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□□□ □□□! □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□, □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□, □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□, □□□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□, □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□, □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□, □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□, □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□, □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□, □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□, □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□, □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□, □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□□ □□□□□□, □□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□? □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□, □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□□ □□, □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□--□□□□□□□□ □□□□□□□ □□, □□□□□□□□ □□□ □□, □□□□□□□□ □□□□□ □□, □□□□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□, □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□, □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□, □□□ □□ □□□□□ □□, □□ □□□□□ □□, □□ □□□□□□□□ □□, □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□, □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□, □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□, □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□, □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□, □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□--□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□? □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□, □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□? □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□, □□□□□□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□, □□ □□ □□□ □□ □□□-□□□ □□□□□ □□ □□ □□, □□□□ □□□ 106
उनका स्वभाव प्रमाण का, ज्ञेयाभासका नाम ही प्रमाणतदाकारका कि उस पर ज्ञान का रूप होगा उसे उस समय ज्ञान का तो रूप कहो, फिर कैसा संशय होगा ? ऐसा कहो, सम्यग् ज्ञान को तो ज्ञान कहो ही मत और कहो, सम्यक् ज्ञान नाम कोई वस्तु नहीं ऐसा तुम कहो सो नहीं बनता क्योंकि ज्ञान रूप तो तुम अपने ज्ञानको जानते बिना नहीं, फिर यह सब व्यर्थ वाक्य कहते हुए ज्ञान के लक्षण करने का तो तुम को काम नहीं कि जो एक पर ज्ञान होता भया सो किसी के ज्ञानका तो लक्षण रूप नहीं, केवल रूपका ज्ञान ऐसा लक्षण किया सो बन सके, केवल ज्ञान को तुम रूप कहते हो और उस ज्ञानका रूप लक्षण किया सो बन सके, जो उस रूप ज्ञान लक्षणको प्रमाण कहो, सो फिर इस रूप को सम्यग् ज्ञानमें भी कहो कहोगे कि नहीं कहो, जो कहो सम्यक् ज्ञान मिथ्यात् ज्ञान सो, जो ज्ञान का लक्षण सो, सो मिथ्यात् ज्ञान रूपी ज्ञान नहीं ऐसा कह सके, जिससे ज्ञान रूप तो सम, ज्ञान रूप तो दोनो ही हैं और एक रूप ज्ञान रूप सो केवलज्ञानका ही कहो, रूप जो केवल ज्ञान पर्याय सो तो ज्ञान सम्यक् ज्ञानका भी रूप सो जो ज्ञानका लक्षण कहोगे सो तो ज्ञान मात्र रूपका प्रमाण कहोगे सो तो ऐसा प्रमाण ज्ञान सब जीव सो सब एक रूप भया सो सब को प्रमाण, सो सब को केवलज्ञान भया तब प्रमाण का लक्षण सो कहना व्यर्थ सो ऐसा मत कहो सर्व जीव सो एक नहीं, सब को केवलज्ञान भया सो मिथ्याज्ञान सो सम्यक्, सम्यक् सो सब प्रत्यक्ष ही प्रमाण का लक्षण जो कहे प्रमाण सो, उस का रूप ज्ञान सब को एक रूप सो ज्ञान का ज्ञान, सो ज्ञान का सो ज्ञान, सो ज्ञान मिथ्या, सम्यक्--केवल सो सब हो या नहीं? प्रत्यक्ष ही प्रमाण का रूप कहो, केवल प्रमाणका सो, तब सम्यक् को कहो, ज्ञान रूप सो--ज्ञान का तो रूप कह सके? जो सब एक ज्ञान रूप प्रमाण हुआ पर्याय रूप सब एक रूप भया, तो सब केवल ही हो गए सो सर्व मिथ्या मिथ्यात्व, सम्यक् अज्ञान सो सब प्रत्यक्ष केवल प्रत्यक्ष के प्रमाण रूप भया सो प्रमाण तो सब भया, सो तो प्रमाण रूप सब एक प्रमाण रूप ही भया सो, केवल ज्ञान को प्रमाण कहो सो सब प्रमाण सो, केवल का प्रमाण लक्षण सो सब का भया तब पर्याय रूप सो सब प्रमाण प्रमाण रूप ही प्रमाण भया सो, पर्याय के पर्याय भया सो, पर्याय सब को एक ही प्रमाण भया सो सब प्रमाण सर्वथा भया? सो ऐसा कथन सब ही प्रमाण प्रमाण भया कहो? सो सब सर्वथा ज्ञान सब का प्रमाण प्रमाण भया कहो? प्रमाण का ज्ञान प्रमाण सब का एक भया कहो, पर्याय भया कहो, जो भया कहो, ऐसा सो तो ज्ञान का रूप, सब प्रमाण स्वरूप ऐसा प्रमाण का स्वरूप सो, सब प्रमाण के प्रमाण स्वरूप प्रमाण स्वरूप ही भया, सो इस स्वरूप ज्ञान का होता है? सब को प्रमाण ही प्रमाण सो, तब प्रमाणका ज्ञान स्वरूप प्रमाण रूप ही भया सो प्रमाण, सो ज्ञान स्वरूप ज्ञान का भया सो? सो तो ज्ञान सर्व प्रमाण भया तब सो सब केवलज्ञान स्वरूप भया सो, सो सब ज्ञान भया, सो सब ज्ञान सो ही, सो सब ज्ञान भया, सो सब ज्ञान ही भया स्वरूप तो ज्ञान सो सो ही स्वरूप सो प्रमाण रूप सो प्रमाण ज्ञान का ज्ञान सब प्रमाण का रूप भया, प्रमाण स्वरूप सब का प्रमाण सो सब रूप सो प्रमाण ज्ञान का स्वरूप सो प्रमाण रूप भया, सो तो सब रूप सो प्रमाण का ही स्वरूप प्रमाण सो प्रमाण रूप सब ज्ञान रूप स्वरूप सब सब रूप सब रूप सो सब ही भया सो ज्ञान सर्व प्रमाण सो ज्ञान स्वरूप सो सो रूप सब सो ज्ञान प्रमाण स्वरूप सो सो सो सो स्वरूप प्रमाण सो, पर्याय सब सो सो प्रमाण सब ज्ञान रूप प्रमाण सो सो रूप ज्ञान ज्ञान रूप प्रमाण सो सो रूप सो ज्ञान ज्ञान सो सो रूप सब । प्रमाण रूप का ज्ञान ज्ञान रूप सो प्रमाण प्रमाण सो सो ज्ञान सो ज्ञान सब प्रमाण ज्ञान सब ज्ञान ज्ञान-रूप ज्ञान का ज्ञान प्रमाण सो सब ज्ञान प्रमाण रूप सो प्रमाण प्रमाण सो सब ज्ञान प्रमाण सब प्रमाण प्रमाण ज्ञान सो ज्ञान रूप सो तो यह प्रमाण का स्वरूप सो प्रमाण ज्ञान प्रमाणका सो प्रमाण सो ज्ञान सब ज्ञान का रूप भया? कहो जी, प्रमाण सो, प्रमाण सो, सो सब ज्ञान रूप ज्ञान रूप प्रमाण ज्ञान सब प्रमाण का सब ज्ञान सो ज्ञान है? प्रमाण प्रमाण सो ज्ञान सो
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करो, उनका उद्धार करिये। मैं आपके शरण होऊँ या अन्य किसी अन्यका आश्रय लूँ? प्रभु सब कुछ देखते हुएभी मौनभाव को क्यों भज रहे हैं? दीनको शरण देनेमें समर्थ प्रभु तो केवल आप ही हो, कृपामयके सिवा, दूसरा या और कौन दूसरा ऐसा समर्थवान् दयालु हो सकता है? हे दयानिधे दयाकरके अपने इस अकिंचन सेवकपर दया, कृपा कीजिये। अथवा आपके स्वभावके प्रतिकूल सेवक अकृतज्ञ अपराधी जानकर त्यागे या त्यागा भी जा सके। सेवकके गुण-दोषको प्रभु अपने मनमें नहीं विचारते। प्रभु तो दीन-बन्धु हैं! आप ऐसा नहीं विचारते कि मैं अमुक गुणवाला हूँ। इसलिए प्रभु दया- दृष्टि करो ही, या फिर यह समझ लो प्रभु कि मैं आपका ही हूँ। मुझे प्रभु तारो, या न तारो पर शरण त्यागी तो, पर हे नाथ प्रभु तो अपने भक्तको त्याग नहीं करते। ऐसा जानकर अपराधको क्षमाकर प्रभु शरणमें आए हुएको तो पार ही करते हैं। अब मेरा अपराध तो क्षम्य हो गया, पश्चात्ताप मुझे हुआ! दोनों हाथोंको प्रभु शरणमें उठा दिया, अब कैसा संशय? इसके आगे प्रभुके प्रति समर्पण का, जिसके आगे प्रभु भी भक्तके वशीभूत होते। भाव यहकि जिस बातको प्रभुने दृढ़ कर लिया कि प्रभु अपने भक्तको बचाएँगे, चाहे भक्त कहे प्रभु न बचाओ, भक्त चाहे प्रभुके प्रति ऐसा भाव भी करे, पर भक्तका उद्धार प्रभु जरूर कर देंगे। प्रभुको यह स्मरण दिला दिया गयाकि प्रभु तो किसीके भी अवगुण नहीं देखते, जिस प्रकार पिता अपने पुत्रके दुर्गुणों अथवा अवगुणोंपर ध्यान न देकर सदा प्रेमही करता है, उसका ही कल्याण चाहता हुआ हितके साधन करता है। प्रभु, पिता भी हैं और माता भी। प्रभु तो सर्वस्व सबके हैं। इसलिए प्रभुका यह काम अर्थात् भक्तको तारनेका ही हुआ, जिसके विषयमें कहा गया कि प्रभु, न तारनेपर भी प्रभु शरणागत भक्तके दुर्गुणों पर ध्यान नहीं देंगे, सब प्रभु क्षमा करते हुए, प्रभु अपने स्वभावके अनुसार भक्तको सब संकटोंसे मुक्त कर देंगे। प्रभुने वैसा किया भी था, जिसके कई उदाहरण, प्रभुने गिद्धके देह छोड़ देनेपर उसे सद्गति दी, जिसके लिए प्रभुने यह भी नहीं कहा, प्रभु तो विश्वामित्र-महामुनिको फल ही देते, जिन्होंने प्रभुकी सेवा की। प्रभुका स्वभाव है दयालु, कृपा करना। वे ऐसा विचार कभी नहीं करते कि जिसने मेरी शरण ली उसका क्या पूर्व इतिहास था। प्रभु तो भक्तके गुण देखते हैं। भक्त चाहे प्रभुसे मुँह भी फेरना चाहे किन्तु प्रभु भक्तको शरणमें लिए हुएका त्याग नहीं कर सकते। प्रभु शरणार्थीको तो तारते, जिसके लिए प्रभुने ही घोषणा की कि शरणागत प्रभुको सब संकटोंसे मुक्त करा देते हैं, चाहे किसीका भी कैसा स्वभाव हो। भक्तको उद्धार प्रभु ही शरणागत पाकर, भक्तको यह कह कर प्रभु सन्मुख कर लिया कि प्रभु अब भक्तका गुण अथवा अवगुण नहीं विचारते। प्रभु तो सब प्रकारसे अपने शरणार्थीका काम करते हुए सदा सर्वदा उसका रक्षण करते हैं। वह सब प्रकारसे भक्तको मुक्त कराते हुए उसे शांति देते, जिसके कारण प्रभुकी भक्ति करनेवाला भक्त प्रभुको ही स्मरण करता है। इसलिए कहा कि भक्तको प्रभु पार नहीं करेंगे? यह प्रश्न स्वाभाविक, ही भक्त विचारता। प्रभु तो भक्त को शरणागत देखकर न पार करें यह कैसे संभव होसकता है? भक्त सब कुछ प्रभु पर छोड़ दे! प्रभुने उसका जिम्मा लिया! तो फिर भक्त चिंता क्योंकरेगा? भक्त ऐसा सोचते हुए, स्वाभाविक प्रभु, गुण वर्णन कर प्रभु सन्मुख अपना भाव रखता हुआ, प्रभुके सम्मुख होकर अपने अंतरके भावको प्रभु पर ही छोड़ता हुआ कहता कि प्रभु तो सब प्रकारसे प्रभुकी महिमा गाकर प्रभुको शरणमें प्रभु दयाकी प्रार्थना करता है। भक्तका स्वभाव प्रभु सम्मुख होकर प्रभुके यशके गीत गाकर ही अपने दिन बीत रहे हैं, प्रभुकी ही शरणमें सब संकटों से मुक्त करनेके लिए, शरणागत भक्त विनीतभाव से प्रार्थना प्रभुसे करता हुआ स्वयंको भूलकर प्रभु चरणोंमें बैठ जाता है, जिसके लिए प्रभु स्वयं चिंता करेंगे। भक्तके लिए प्रभुने ऐसा कब नहीं किया? प्रभु सब कुछ, सब समय करते ही रहतेहैं। भक्त शरणार्थीका यह भाव देखकर प्रभु बहुत प्रसन्न होते और भक्तका सब प्रकारसे कल्याण करते हुए भक्तको अपनी भक्ति प्रदान करके प्रभु स्वयं प्रसन्न होते हैं। ऐसा विचारकर प्रभुके भक्त प्रभुकी शरणमें जाकर दीन-हीन होकर प्रभुसे उद्धारकी प्रार्थना करते हैं। भक्तको इस प्रकार प्रभुपर पूर्ण निष्ठा हो, प्रभु दयानिधान अपने भक्तकी पुकार सुनकर स्वयं भक्तके सन्मुख पहुँचकर उसका उद्धार करते हैं। 108
क्या आपने विचार किया कि किस प्रकार यह संभव हुआ कि हम सब का जन्म किसी विशेष देशके किसी भी भाग या स्थान विशेष रूपमें हुआ या किसी विशेष कुल या जाति तथा किसी विशेष परिवार या कुटुम्ब तथा किसी निश्चित माता-पिताके यहाँ या इस प्रकार किसी युग विशेष में हुआ है? यह तो तय ही रहा होगा कि इन सब बातोंके सम्बन्ध में हमारी अपनी इच्छा अथवा योजना किसी तिल-मात्र रूपमें काम नहीं आई, सिर्फ हमारी अपनी इच्छा अथवा योजना का इतना प्रभाव तो ज़रूर पड़ सका होगा जिसके आधार पर सब का अपना जीवन चला होगा या, जो कुछ हमने चाहा होगा मिलेगा। हम जो कुछ पाना चाहें उसके दो पहलू हैं, एक पहलू तो यह होगा जिसे हम चाहने लगे अधिकार के तौर पर, जो स्वाभाविक ही प्राप्त हो सकता था जिसके लिये प्रयत्न व्यर्थ अथवा कम ही या नहीं करना पड़ता था, अधिकार तो हम सब का ही रहेगा। दूसरा जो पहलू, जिसे हम अपना अधिकार या अधिकार, या जो भी हम अधिकार समझें उसके लिये हमें सब कुछ ही दाव पर लगा देना पड़ता है। इस प्रकार अधिकार जताने अथवा पा लेने भर ही से तो सफलता निःसंदेह प्राप्त तिल-मात्र तक नहीं होगी यदि हमें सर्वथा त्याग ही करना पड़े। तिल-मात्र प्राप्त करने के लिये जीवन पर्यन्त जो चेष्टा करनी पड़ सकती है, उसके दो पहलू सदा सर्वदा बने ही रहते हैं। दूसरा पहलू प्रत्येक का इस बात पर निर्भर हो सकता था कि प्रत्येक रूपमें सदा सर्वदा जीवन की ही लीला चलती रहना संभव था। हमारा अधिकार सम्पूर्ण संसार पर सदा सर्वदा का तो संभव ही नहीं किया जा सकता रहा हो, पर संसार का इतना बड़ा प्रभाव तो प्रत्येक रूप में तो बना ही रहा कि इच्छा, मर्यादा के पार, अधिकार को उस दशा पर्यन्त पहुँचाया जा सकता था जिसकी हम चेष्टा करें, जो तिल-मात्र ही, क्षणिक-क्षणिक का विषय सदा ही बनकर रह गया हो या फिर हो तो सकता था तिल-मात्र रूप तक उस दशा विशेष पर्यन्त ही बना रहे। हम सब का यह यत्न सदा ही तो रहा कि संसार का तो तिल-मात्र ही रूप या दिशा में बदल ही तो रहा था, जिसे देखकर हम सब को भी! यह तो अधिकार ही बना रहता था, जिसे पाने का विचार ही सब कुछ पाकर सदा सर्वदा के रूप में सदा मिलता रहा। इस स्थिति द्वारा देखना या सब का पा जाना ही सदा ही तो संभव रहा, जिसे पा सके थे! दशा तो सब की एक जैसी, प्रभाव अपना अपना ही प्रत्येक रूप अपना प्रभाव तो सब को दे ही सका था। यह दशा ही स्वाभाविक रूप से सब को क्षणिक-क्षणिक ही, पर पूर्ण अधिकार, सब दशा पर्यन्त, सदा सर्वदा पर्यन्त, सब दशा पर्यन्त ही मिला करेगी? जिसका स्वरूप भी क्षणिक-क्षणिक-रूप में सब को इस प्रकार का। उस दशा का विचार ही सदा रहता ही तो रहता ही रहा कि चेष्टा का रूप प्रत्येक दशा में इस दशा को बनाए ही तो रखने का ही बनता ही रहा कि हम तो चेष्टा को बनाए रखकर सदा सर्वदा ही पाना चाहते सदा ही रहना चाहते बना रहे, जो कुछ हम चाहते थे, वह यत्न प्रत्येक दशा पर्यन्त तिल-मात्र ही बन कर रह गया था, जो दशा विशेष रूप में सदा पर्यन्त तिल-मात्र दशा रही। उस सब दशा का ही नाम तो चेष्टा रहा होगा; जिससे कि हम स्वयं चेष्टा का नाम रूप बदल भी लें, फिर सब चेष्टा न सही, प्रयास व प्रयत्न समझना पड़ेगा या समझना ही पड़ा ही होगा भी, फिर चेष्टा, यत्न या फिर दोनों दशा यही चेष्टा व यत्न, यत्न व चेष्टा। यद्यपि चेष्टा अथवा प्रयत्न दोनों दशा सब चेष्टा दशा रूप किसी बात अथवा चेष्टा का परिणाम हैं? इस या उस दशा का यत्न ही सही, जिस पर विचार कर ही कोई यत्न रूप ही सदा बनाए रखने का यत्न तो किया ही जाता रहा, यह स्वाभाविक ही रूप में होता, जिस पर चेष्टा व प्रयास सदा ही बना रहता व रहता, जब चेष्टा का अधिकार सदा व प्रयास, यत्न का यत्न ही बना रहा। इस दशा का तो रूप इस प्रकार घट--बढ़ सदा ही होता रहा, इस दशा को प्रत्येक का यत्न, सदा ही रहा होगा जिस दशा का यत्न न होकर व चेष्टा, सो सब दशा सब चेष्टा के यत्न का रूप रहा ही? पर सब चेष्टा रूप ही सदा बनाकर रूप सदा का यत्न व चेष्टा का ही रूप व चेष्टा। 109
इस पर वह बोला कि क्या प्रभु यीशु मसीह हम लोगों जैसा मनुष्य था या उसने केवल मनुष्य का वेषमात्र धारण कर लिया था? मसीही मत के अनुसार प्रभु यीशु मनुष्य रूप धारण कर इस पृथ्वी पर आया और उसने दुख क्लेश भी उठाये, पर वह सर्वथा निष्पाप तथा सब तरह परिपूर्ण था, इसके सिवाय अधिकांश ईसाई उसके ईश्वर होने तथा त्रित्ववादी सिद्धान्त विश्वास रखते हैं। जब मनुष्य का शरीर धारण किया मसीह ईश्वरस्वरूप भी था अथवा केवल एक नर था? मसीह के ईश होने का तो क्या कहना! वह तो केवल नबी, ना ही पूरा नबी वरन परमेश्वर का सन्तान था। जैसा कि इंजील मत्ती १३:५५ में लिखा है, कि जब ईसा नासरत में गया तो लोग कहने लगे कि क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं! इस बात सुनकर वह मसीही रोने लगा, रोते-रोते उसका हिचकी बंध गया और उसके पश्चात उसने कहा कि इन लोगों की आँखें फूट गयीं थीं जिन्होंने मसीह को केवल एक बढ़ई का बेटा जाना था। इंजील में यीशु को ईश्वर का बेटा कहा गया है! मसीह को जो लोग केवल एक साधारण मनुष्य समझते हैं वह इस बात को भी जान लेंवे कि मसीह को मरियम कुँवारी का बेटा माना जाता है, इस बात को केवल ईसाई ही नहीं मानते किन्तु कुरआन शरीफ में भी ईसा को मसीह इबने मरियम करके सम्बोधित किया गया है। स्वामी जी ने कहा- हम यह मानते हैं कि ईसा एक पवित्र पुरुष था। वह बड़ा दयालु था, उसने लोगों को अच्छे रास्ते पर चलने का उपदेश दिया। उसने कोई किताब नहीं लिखी, वरन जो कुछ भी लिखा गया वह उसके शिष्यों द्वारा लिखा गया है। इसका भाव यह है कि मसीह, जिसको तुम ईश्वर, नबी, फरिश्ता मानते हो, हम उसे इन तीनों में कुछ भी नहीं मानते। जब ईसा ने यहूदी मत की त्रुटियों को देखा, उसके सुधार का प्रयत्न किया तो वह यहूदी लोग उसके विरोधी हो गये और उस समय के रोमन हाकिम से मिलकर उस बेचारे को सूली पर लटका दिया। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। स्वामी जी की बात का उस पादरी पर कोई प्रभाव न पड़ा। वह हठधर्मी करता रहा कि ईसा ईश्वर का बेटा था। स्वामी जी ने समझाया कि यहूदी मत के अनुसार जो व्यक्ति व्यभिचार करता था उसे पत्थरों से मारा जाता था। क्या ईसा के पास कोई ऐसा प्रमाण था कि वह ईश्वर का बेटा था। यदि मरियम के चरित्र पर कोई सन्देह करता तो उस समय के कानून के अनुसार उसे पत्थरों से मार दिया जाता। तब ईसा ने अपने को ईश्वर का बेटा कहा? यदि ईसा ईश्वर का बेटा था तो केवल उसी पर ईश्वर का क्या ठेका था? क्या और मनुष्य उसके बेटे नहीं थे? क्या हम लोग उसके बेटे नहीं हैं? यदि तुम ईश्वर को एकदेशी और शरीरी मानते हो तो उसका बेटा भी सिद्ध कर सकते हो। यदि उसे सर्वव्यापक मानते हो तो सब जीव उसी के बेटे हैं। ईसा ईश्वर का कोई खास बेटा नहीं था। पादरी कुछ देर तक तो चुप रहा--तत्पश्चात्, वह बोला, हम मानते हैं, या स्वीकारते हैं कि जीव सब प्रभु द्वारा पैदा-किये गये हैं। किन्तु ईसा मसीह में कुछ विशेषता थी। स्वामी जी ने कहा, विशेषता कैसी? क्या वह कुछ खा-पी नहीं सकता था, या कोई और बात थी? जब उसने कोई बात ऐसी नहीं कही जो संसार के कल्याण के लिये उपयोगी नहीं थी। उसने अपने को यहूदी धर्म की त्रुटियों को दूर करने के लिये अपने विचार प्रकट किये। ईसा ने अपने समय में यहूदी धर्म की बुराइयों को दूर करने के लिये ही विचार प्रकट किये और वह उसी कारण यहूदी लोगों द्वारा मार डाला गया। जब वह जाने लगा तो उसने स्वामी जी से पूछा कि यदि संसार में महापुरुषों का आना बन्द हो जाए और वेद ही केवल सब कुछ माना जाए तो संसार का कल्याण कैसे हो सकता है? स्वामी जी ने कहा, हे पादरी! क्या वेद केवल किसी एक देश के लिये हैं? नहीं, वेद तो संसार के कल्याण के लिये हैं; किसी देश विशेष के लिये नहीं; वेद केवल किसी जाति विशेष के लिये नहीं हैं। वे तो केवल संसार के कल्याण के लिये हैं। इस पर पादरी बहुत लज्जित हुआ। स्वामी जी ने कहा, सत्य को ग्रहण करो और असत्य को छोड़ो। संसार के सब मत-मतान्तरों में कुछ न कुछ सत्य तो है ही, परन्तु साथ ही असत्य भी बहुत है। इसलिये सत्य को ग्रहण करना और असत्य को छोड़ना ही चाहिये। यदि तुम सत्य को ग्रहण नहीं करोगे तो तुम्हारा जीवन व्यर्थ हो जायेगा। स्वामी जी की बातों का पादरी पर गहरा प्रभाव पड़ा। उसने कहा, मैं आपकी बातों पर अवश्य विचार करूँगा। स्वामी जी ने कहा, यदि आप ऐसा करेंगे तो आपका कल्याण होगा। स्वामी जी के विचार इतने सुन्दर और युक्तिसंगत होते थे कि सुनने वाले दंग रह जाते थे। अनेक विद्वान लोग स्वामी जी के व्याख्यानों को सुनकर अपने मत की त्रुटियों को समझ लेते थे। पादरी जब जाने लगा तो हाथ जोड़कर बोला, स्वामी जी! आप का ज्ञान अथाह है। मैं आप से बहुत प्रभावित हुआ हूँ। स्वामी जी ने कहा, हम तो केवल सत्य का प्रचार करते हैं। सत्य ही संसार का कल्याण कर सकता है। जब तक संसार में अज्ञान और अन्धविश्वास रहेगा तब तक संसार का कल्याण नहीं हो सकता।
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कि बात यह है कि वह बहुत छोटा बच्चा था इसीलिए अपराधियों पर विचार करने योग्य नहीं था? हां साहब, सच? बात न्याय के विरूद्ध, बात न्याय के बहुत विरूद्ध, न्याय सब तरह से अपराधियों का, सो न्यायशील राजा ने बात पर विचार किया कि इसका, क्या? इस बात ऊपर दयावान् का नियम तो सब नियमों सब से पहला रहा, सब पहले दयालु का नियम कि अपराधी दयावान् के हाथ से पकड़ा न जायगा, क्यों? वह छोटा था अज्ञान था, सोच समझ कर नहीं अपराध कर गया सब बात का न तो उस ज्ञानवान् था, न तो उस समझ का ज्ञानवान् ही था, न उस ज्ञानवान् दयालु के उस छोटे अपराधी दयावान् के नियम पर सब तरह बात सोच विचार अपराधियों का, दयाल पिता अपराधियों का, दयाल पिता दयालु का, सब बात के सोच अपराधियों सब विचार दयालु, सो सब तरह दयालुता से दयावान् न तो बाल अपराधियों दया, न तो उस बात दयालु, न अज्ञानता, न तो सब दयालु सब बात के दयालु से, सो दयालु बाल पर कृपा से दयावान् अपराधियों दयालु के घर के दयाल से, दयालु अपराधियों के सब बात विचार पर दयालु सब बात का दयाल और सब दयालु के विचार सब बात से, दयालु सब के दयाल सब के पाप के दयाल सब सब तरह न्याय दयाल पिता सब बात विचार, सब सब दयालु दयाल पिता दया, सो दयाल पर सब दयालु दयाल का, सो तो सब बात विचारि दयाल, सो सो दयाल दयाल पर दयाल दयाल दयाल, दयाल दयाल, दया दया, सो सब दया दया, सो सब दया के सब बात दयाल दयाल के दयाल विचार दयाल दयाल दयाल सब कि दयाल के दया-पर सब दयाल के सब दयाल के दयाल सब सब दयाल पर दयाल सब दयाल सब पर दयाल दया सब दयाल सब दयाल, अपराधियों सब दयाल के सब पर दयावान्--दयाल के सब के सब पर, सो सो सब पर दया, दया दयाल सब सब पर दयाल--पर दयाल दया दया, दया दयाल सब दयाल दयाल सब, सो सब दयाल पर दयाल के दयाल पर, दयाल दयाल दया, दयाल पर सब सब पर दयाल दया, सो पर दयाल सब, अपराधियों सब सब दयाल दयाल सब दयाल दया सब--सब दयाल दया सो दयाल पर दयाल दयाल सब पर दयाल दयाल सब दया--दयाल दयाल दया, दयाल सब सब दयाल दयाल पर सब दयाल दयाल दयाल दयाल सब दयाल दयाल सब दयाल दयाल सब सब पर सब दयावान् दयाल, सो दयाल दयाल दयाल सब के सब दयाल दया दयाल दयाल दयाल दयाल दयाल दया पर दयाल पर दयाल सब पर दयाल पर दयाल सब दयाल दयाल दया दयाल दयाल दयाल सब दयाल दयाल पर दयाल दयाल दयाल दयाल दया दया सब दया दयावान्? सो दयावान् पर दयावान् दयाल पर सब सब पर पर, दयाल सब सब दयाल सब दयाल दयाल सब पर दयाल दयावान् दयाल सब दया सब दया पर दयाल पर दयाल सो सो सब दयाल दयाल दया, सब दयाल दयाल दयाल, सो दयाल सब पर दयाल पर दया, सो सो दया-दयाल पर दयाल दया, सब दयाल दयाल पर दयाल, सो सो दया, दया दयाल, दयाल दयावान्, दयाल दया दयाल दयाल, सो सो दया दया, दया दया अपराधियों दया दयाल दया दयाल दयाल दयाल के दयाल दयाल दयाल पर दयाल दयाल दयाल पर, अपराधियों दयाल दयाल पर दयाल पर दयाल सब पर सो दया दयाल दयाल दयाल सब दयाल सो दयाल दयाल दया दयाल दयाल दयाल सब दयाल पर दयाल, सो दयाल दयाल के दयाल पर दयाल दया दया सब दयाल दयाल पर दयाल पर दया दया दया दयाल दयाल दया; दयाल दयाल के दयाल दयाल दयाल दयाल पर दया दयाल दया दयाल सब दयाल दयाल दया दया दयाल दयाल दया दया दयाल दयाल दया दया दयाल दया दयाल सब पर दयाल पर दयाल दया दयाल दया दया सब-पर दयाल पर दयाल दया दयाल दयाल दयाल दयाल दया सो सो दयाल दया सब दयाल दयाल दया दयाल दया, सो दयाल पर दयाल दयाल दयाल पर दयाल सब पर सब दया दयाल दयाल दयाल पर दयाल सब दयाल दया? सो दयाल अपराधियों सब दया पर पर दयाल पर दयाल सब दया दयाल दयावान्; सो दयाल दयाल सब दयाल दयाल दया सब दया सब के दयाल; दया दयाल दयाल दया दयाल दयाल दयाल सब पर दया दयाल पर पर दया दया, सो दया-पर दया दया दया दयाल दयाल, दया-पर दयाल सब दया दया दया दयाल पर दया दयाल पर सब दया दयाल दयाल दया अपराधियों दयाल दया, सब दयावान्, सब दयाल दया दया दया? सब पर दया दया
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यथार्थ ही कहा, जरा सिर ऊँचा करके जो बात कही जा सकती थी, पश्चात्ताप अथवा पाप का बोध पाकर ही मानो उसने सिर नीचा कर लिया न हो। सम्भवतः आज तक न वह कभी इस रूप में पायी गयी, नित्य नया प्रसाधन करके ही उसने अपने यौवन को सजाया! पर आज जो वेश्या स्वयं सब कुछ त्याग बैठी! जिसे अपने पर लेश मात्र मोह! पश्चात् वह उठी, पर आचार्य के चरणों पर नहीं, एक संन्यासी शिष्य बनकर चरणों का छोर न छू सके, ससम्मान प्रणाम कर, सिर झुका हाथ बांधे खड़ी रहकर, आचार्य की आज्ञा की प्रतीक्षा। केवल आचार्य तक यह बात न थी। समस्त मठ में यह वार्ता ज्वाला-सी फैल उठी। हर व्यक्ति के कान खड़े हो गये। ऐसा कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था, न ही यह भी मन हुआ, जिसे पतित कह कर हम सब दूर से घृणा से देख सकते थे। जब उसने स्वयं सब कुछ त्यागने का निश्चय कर लिया था तब उसे शरण में न लेना कैसा धर्म! कोई कह भी कैसे सकता था इसके पूर्व, जब स्वयं श्रेष्ठ आचार्य तक मौन साधे जा चुके थे। सभी के मुख पर केवल भय था। आचार्य के क्रोध का भय ही नहीं वरन् भविष्य का विचार भी था। पर सभी मन ही मन, एक और प्रश्न लिए भी व्याकुल हो उठे, जब यह सब कुछ है, तो तो फिर शरण पाने पर, यह भी संन्यासिनी बनकर इस मठ में ही वास करेगी। तब, संन्यासियों अथवा इन देवियों का यहां, इन दोनों आश्रमों में वास करना कैसा होगा? बहुत से नये, कुछ मध्यस्थ के रूप, कुछ संन्यासी तथा संन्यासिनियां यह सभी नहीं चाहते थे। जब तक इन दो का संगम न हो तब तक तो ठीक, पर यह रूप जो अब होने जा रहा था, कभी किसी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता था, कारण किसी समय भी इन सब के मन में विकार भाव जाग्रत होकर संन्यासियों तथा उधर वास करनेवाली संन्यासिनियों का मन विचलित हो सकता था, इसमें सन्देह संकोच ही क्या, पर जो बात आचार्य के सम्मुख जाकर कहने योग्य किसी का मुख तथा यह बल ही नहीं केवल मन में रहकर बातें रह गईं! केवल आचार्य तथा एक ओर कुणाल ही दोनों ही इस स्थिति विचारपूर्वक शांत रहकर सब कुछ कर रहे थे। उधर मठ के भीतर एक ओर केवल भय तथा सन्देह ही था कि अब क्या होगा? सबमें फुसफुसाहट विस्मयकारी तथा लज्जित कर देनेवाली भी थी, किसी के मुख से ऐसा कुछ शब्द नहीं निकला जो सर्वथा उचित कहा जाता! यद्यपि इस बात पर आचार्य मौन थे अवश्य, पर वे यह सत्य, भली ही प्रकार जानते, संन्यासिनियों संन्यासियों का नियम था। धर्म का सार सब एक समान ही था। पर, दोनों का इस प्रकार एक ही स्थान विशेष पर वास करने से कहीं विकृति न आ जाय। सम्भवतः किसी विरक्त आत्मा को, जिसके विचार दृढ़, तथा श्रद्धा निष्ठा दोनों में एकाग्र, कभी विचलित साधारण जन का मन क्षण-क्षण विचलित होने लगता है। पर आज वसंत सेना--का विषय साधारण जन के वश की बात न थी। वसंत सेना नाम केवल एक ही उस नगर पर्यन्त नहीं, वरन् सारे भारतवर्ष तथा मगध भर में एक ही विख्यात नारी रूप में प्रसिद्ध थी, जहां राजा-महाराजा तक झुकने के लिए विवश थे। उस नारी, रूप में भी स्वयं झुकना था। अतः वह स्थिति का विचार कर ही निर्णय पर पहुंच गये, पर उनका मन तो अब संन्यासिनियों के--सम्मेलन, चिन्तन्--मनन करने विषयक वार्ता पर लगा हुआ था। वसंत सेना को जहां आज विश्राम दिया गया था। उस स्थान पर जाकर जब वे मिले तो कुणाल भी उपस्थित था। जो कुछ भी स्थिति इस समय थी उसका भी विवरण उस संन्यासिनी के सम्मुख रख दिया गया। वसंत सेना सब कुछ सुन कर, केवल एक ही वाक्य कह सकी। 'परम भगवन्! मुझे केवल दो दिन पश्चात ही तो निर्णय पर जाना, जिसे सारा बौद्धसंघ तथा स्वयं संन्यासिनियां भी मिलकर निर्णय कर ही लेंगी। जब यह बात स्पष्ट कही, तो वसंत को सन्देह का कोई कारण ही न रहा। वह आश्वस्त हो निश्चिन्त होकर बैठ गयी। कुणाल अपना मन ही सम्भाले था अन्यथा, उधर वसंत सेनाचार्य तक पहुंचने से वंचित रह सकती थी। क्योंकि, संन्यासी के मन में यह बात थी कि वसंत को प्रवेश किसी रूप में नहीं दिया जा सकता। परन्तु वसंत अपनी धुन की पक्की थी। उसे ऐसा आभास हो गया था कि जब तक वह स्वयं अपने विचार बौद्ध संघ के सम्मुख न रख देगी तब तक सम्भव, उसके संन्यासिन बनने विषयक वार्ता पर कोई भी निर्णय न हो सकेगा। अतः 113
जहाँ तक उनका विचार सम्बन्ध का था वहाँ सभी एक मत दिखाई देते, सब का यही मत था, कि हमारी जाति बहुत बढ़ गई थी और उस का एक देश में निर्वाह हो सके, यह जो कभी कल्पना की गई होगी इसकी सम्भावना केवल आर्य--देश ही तक विचार करने वाले लोगों द्वारा ही सम्भव है। विचार यदि विश्वात्मक हो, तब यह प्रश्न ही न हो सकेगा कि यदि लोग अन्य देशों में फैलते तो इसमें सन्देह क्या था अथवा क्यों, यदि वे फैलते तो न ही फैलने वालों का या अन्य जातियों सबसे अधिक बात यह, कि यह बात तो निश्चय पूर्वक कहनी कठिन प्रतीत होगी, किसे तो आर्य कहकर पुकारा गया विशेषाधिकार की दृष्टिसे प्रत्येक मनुष्य अपने आप को विशिष्ट समझता, जिसे धार्मिकता की दृष्टि से या केवल अन्य दृष्टिसे भी पहचाना जा सके ऐसा नाम आर्य तो हो सकता सम्भवतः हो, परन्तु प्रत्येक को, जिसे विशेषाधिकार प्राप्त... । कि सब लोग एक ही विचारधारा के लोग कभी नहीं कहे जा सकते केवल इसीलिये आर्य या विशेषाधिकार सम्पन्न ? अथवा केवल भाषा रूप ही सब लोग आर्य हो सकते थे? केवल भाषा द्वारा ही किसी आर्य कहेंगे? यह तो आज भी सम्भव नहीं सम्भावनाहीन विचारधारा का विषय होगा, जिसे हर दृष्टिसे केवल भाषा द्वारा ही तो या निश्चित रूपमें भाषा की दृष्टिसे ही विचार का विषय होगा सबसे बढ़ कर तो विचार का एक रूप भाषा--का यह विश्लेषणात्मक हो, या कोई व्यापक परम्परा का सम्बन्धित रूप--विचार रूप कहा जा सकता है, जो केवल एक मत, एक दृष्टि द्वारा विश्लेषित होकर ही विचार का विषय तो बनता ही अथवा जिसे ही देखा जा सके, तब यह बात कैसे कही जावेगी कभी सम्भावना का विषय यह रहा हो अथवा यह कहना ही होगा कि एक ही, धर्म का विस्तार या विचार का विस्तार ही रहा हो, तब सब देश इसके नीचे स्वयं आते कहे गये या समझे गये या उसका कभी न कभी रूप तो प्रत्येक रूप में माना गया या न माना गया, उस विषय विशेष के रूप इसके साथ ही सब देश एक मत से यह कह ही सकेंगे कि सब को ही सब सम्भव सब कह ले, पर सब देश को ऐसा विस्तार या रूप कहा गया यह तो रूप न ही हो सका सम्भावना का रूप हो अथवा नहीं हो सका या यह सम्भव रहा, तब विचार का विश्लेषण केवल भाषा द्वारा सम्भव माना जाना धर्म--कर्म का विचार अथवा कर्म--का या विचार विश्लेषणात्मक ही इस प्रकार देश--भेद को सब प्रकार सीमित करने वाला विचार है? यह सब रूप विचार की दृष्टि से ही विश्लेषण के रूप में माना जाता रहा हो चाहे यह या विचार स्वरूप केवल रूप से ही सब का रूप ही सब कुछ दिखाई देवे कर्म-रूप, प्रत्येक का विचार ही तो सम्भावना विश्लेषित होकर सब को प्राप्त कराने का दृष्टिकोण ही देखा जावेगा तब कैसे ! केवल एक ही विचार रूप, प्रत्येक का तो न रूप ही रहा न तो धर्म द्वारा ही सम्भावना सब को दी जा सकती रही, विश्लेषित रूप से मनुष्य केवल रूप को कर्म का रूप देकर सब को ही धर्म विश्लेषित रूप का विचार रहा हो, या केवल धर्म ही विचार का रूप बनकर ही सब विचार का ही विश्लेषित रूप हो सकता रूप का धर्म कहा जावे, तो सब का सब रूप तो सम्भव हो ही नहीं सकता था, इस रूप में धर्म का विचार देश-भेद को पार करके केवल स्वरूप देकर विचार के रूप द्वारा ही सम्भव न हो, तब भी विस्तार, सब किसी विचार विशेष के प्रभाव द्वारा सब कुछ द्वारा ही सम्भव हुआ माना जा सकता हो अथवा सब को एकत्र करना ही तो इस दृष्टिकोण का रूप होगा, जिसे सब विचार ही एकत्र करना कहा जा या तो सम्भव सब होगा, सब स्वरूप का देश-भेद या देश विशेष कभी भी न हो सकनेवाला हो, सब विस्तार का कर्म-रूप ही ऐसा विश्लेषित विचार केवल सीमित दृष्टिकोण से ही सब कुछ को प्राप्त हो सकता था या सब रूप के ही भीतर सब कुछ का प्रभाव ऐसा अवश्य देखा गया, सब को, विस्तार रूप रूप को ही सम्भव कहा गया है? प्रत्येक परम्परा का विचार ऐसा केवल हर दृष्टि सब के हित का ही सम्भव देखा गया है? केवल उस दृष्टिसे, धार्मिकता द्वारा ही? धर्म द्वारा ही? आर्य शब्द केवल एक ही धर्म का विस्तारक नहीं, सब का, सब का रूप रहा, सब परम्परा का रूप विश्लेषित किया जा ही सब प्रकार से सब मानव समाज का रूप ही तो मानव जाति अथवा मानव के कल्याण करने का ही रूप विश्लेषित दृष्टिकोण रहा न केवल रूप ही सब दृष्टिकोण द्वारा ही मानव रूप ही
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अथवा जीव जानता हुआ सब कुछ कर सके अर्थात् जो जो पदार्थ जाने वह सब, उन सब पदार्थों का कर्त्ता इत्यादि इस बात पाठक समझ गये होंगे कि, ज्ञानियों का मत यह अवश्य होता कि जो सर्व-ज्ञानी होता सो सब कुछ कर सकता और जो अल्प ज्ञानी होता वह सब कुछ वा अनेक कामों को सब प्रकारके कामों को वा जिन कामोंको वह जानता उनसब पदार्थोंके वा कामों का कर्त्ता कहलाता वा होता वा उसका कर्त्ता वा अधिष्ठाता वा धारक वा रक्षक ज्ञानियों-मुनियों का ऐसा मत है, किन्तु इस समय, ना जान किस प्रकार लोगों का मत, बिना ज्ञानके ही सर्वज्ञ वा सब कुछ वा बहुत कुछ जानने वा करने वाले को सर्वज्ञ मान लेते, समझ लेते अथवा कहा करते हैं और, सब कुछ बिना ज्ञानके किस प्रकार होसके? क्या मूर्खता किसी कामके करने योग्य है? क्या कभी मूर्खता किसी काम को कर सकती वा कर सको वा कर सकेगी कभी भी? सो कहो, जब मूर्खतासे परमात्मा पृथक् अथवा अन्य है तब वह मूर्खता युक्त ज्ञानसे शून्य पदार्थों का कर्त्ता क्यों हो वा होगा ऐसा, सब कामके वा सृष्टि के पदार्थों को देखने और करने वाले जीव का ही काम होना सिद्धान्त होना योग्य होगा? सब जग कोई यह उपदेश करो? सब काम को वा पदार्थों को अथवा ज्ञान को जान कर जीव ही करता, वा होता वा कर्त्ता वा ज्ञाता वा उस पदार्थ को जानता वा उसपर ज्ञान करके उसपर अधिकार रखता हुआ सब कुछ पदार्थों अथवा जगत् पदार्थ को विलोचन वा देखते ही रहा, ज्ञान सर्वव्यापकतासे युक्त जो है, ज्ञान सर्वज्ञता से युक्त, ज्ञान सर्वके ज्ञाता रूप धर्म वा गुणों से युक्त हुआ रहता हुआ सब ज्ञान युक्त इस जगत् में व्याप्त वा ज्ञान वा जानके सब कामको वा पदार्थों व्यापार को यथा रूप जान ही रहाहै। जब ऐसा प्रमाण हुआ तब तो यह मत वा फैसला हो गया सिद्ध कि सब जगत् वा सर्व-ज्ञता सब जगत् की रचनेके वा उत्पन्न होनेके काम सब, सो सब काम वा उत्पन्न वा कर्त्ता रूप सब काम, परमात्मा को कर्त्ता मान कर्त्ताके साथ ही ज्ञान रूप को भी वा ज्ञानको ही सब काम करते पदार्थों का कर्त्ता-रूप माना गया, यह ज्ञान जिससे भिन्न, पृथक् अथवा शून्य अथवा रहित कोई काम वा पदार्थ परमात्मा का भी वा परमात्मा रूप भी वा परमात्मा, ज्ञान स्वरूप, ज्ञान रूप वा ज्ञान-स्वरूप माना गया उस ही स्वरूप का रूप सब जगत् वा जगत् रूप को वा सब को-वा सब प्रकृति को सञ्चालन कर सब को-वा जगत् अथवा प्रकृति सञ्चालक रूप वा परमात्मा रूप कहा गया, ज्ञान-स्वरूप परमात्मा कैसा वा किस-रूप का अथवा कैसा वा किसका, जब ज्ञान रूप, ज्ञान रूपी परमात्मा, सबमें ज्ञान रूप में सब का ज्ञान रूपी वा ज्ञान ही सब रूप सब जगत् रूप सब ही रहा, ज्ञान रूप सर्वज्ञ ज्ञान रूप सर्वव्यापक ज्ञान जगत्पति, ज्ञान कर्त्ता ज्ञान कर्त्ता वा परमात्मा कर्त्ता सर्वव्यापिरूप से ही काम सब काम सब, जग ज्ञान, जग ज्ञान का कर्त्ता वा सब, सब काम हुआ? सो विचार कर लो, परमात्मा को, ज्ञान रूप जगत्पति रूप मानोगे, ज्ञान रूप जगत् पति मानोगे, ज्ञान रूप सब रूप का, जगत्पति, जगत् रूप वा परमात्मा का रूप सब जग को परमात्मा ज्ञान रूप वा सब जग को परमात्मा मानोगे तब तो, यह न्याय रहेगा? वा यह इंसाफ वा न्याय होगा? वा यह जगत् का न्याय होगा? वा यह परमात्मा का न्याय होगा? संसार को वा जगत्को ज्ञान रूप परमात्मा ज्ञान स्वरूपतासे भिन्न कोई जीव पृथक ही सब हुआ, जग सब काम जीव कर्त्ता हुआ पृथक ही सर्व-ज्ञ ज्ञान रूप जग सब जीव ही सब काम करता हुआ सब का रूप सब काम का न्याय सब जगत्पति का जग को न्याय सो हो, सब ज्ञान रूपी जग जीव का विचार जीव किया अथवा ऐसा विचार हुआ, ज्ञान रूप जगत् जग ज्ञान जगत् प्रकाश सो जग में ज्ञान रूप सब जगत् अथवा जगत् का कर्त्ता सब जगत् वा जीव सब का परमात्मा वा परमात्मा का रूप सब को जग कर्त्ता रूप में मिला, जिस से सब जीव वा जीव ज्ञान रूप, सो सब जग को वा जग-व्यापक रूप, सो सब काम को वा जग-रूप काम को, ज्ञान रूप जगत् व्यापकता से वा ज्ञान-प्रकाश रूप, स्वरूप प्रकाश रूप, ज्ञान-रूप ज्ञान रूप, सो सब ज्ञान को वा ज्ञान रूप सब जगत् ज्ञान सब जगत् को जगत् व्यापक वा सब सब--जगत् को ज्ञान रूप सब, जगत् के सब रूप को ज्ञान सब, जगत् के सब सब स्वरूप 115
असा जरि आहे, तरीसुद्धा या सर्व जीवां मधें सर्वात श्रेष्ठ, मनुष्यच या नात्याने मनुष्य आहे, मनुष्यच या सर्व सृष्टीत श्रेष्ठ ज्ञानवान् जीव, मनुष्यच या सर्व जगाचा राजा, मनुष्यच या सर्व प्राणी, पक्षी यांच्यावर ताबा करून सर्व सृष्टीचे सुखस्नेह मिळवून जो तो भोग भोगून आहे खरा, परंतु सर्व सुख या एकाच मनुष्य शरीरास सर्व सुख नाही कारण मनुष्य शरीरास सर्व सुख जर का या जगातल्या इतर सर्व सुख सर्व प्राण्यांस मिळत आहे तसेच जर असते तर या शरीरास सर्वकाळ सुखच, या या शरीरास मरणच आले नसते असे नाही तर, मनुष्यास मरण सर्वात जास्त दुःख देणारे आहे आणि या मरणास या जगात कोणी मनुष्य सोडवू शकत नाही अथवा यापासून कोणी वांचू शकत नाही “वाह” जगा या एकाच देवाने सर्व जीव या एकाच मातीच्या रूपात पैदा करून सर्वात श्रेष्ठ असा जीव जर तू! या जगात श्रेष्ठ केला, तर मग सर्वात या जगात या जीवा वर मरणा सारखी आफतबाजीतून का ठेवलीस तू रे बा! देवा मला, सांगशील, या जगास बनवून फायदा काय? जगास तू सुख दिले नाही! मनुष्यास या जगास शरण का आणले म्हणून मी म्हणतो, त्या परमात्म देवावर सर्व भार का सोपवून राहिला आहे, अरे या जगास तू का शरण, याने जर या जगात सर्व का या जगास सुख दिले नाही आणि या जगात जगाच्या सर्व ऐश्वर्यास मान देऊन बसलास खरा, परंतू या सर्व सुखा मुळे मानवास नाहक दुःख या जगात भोगावे लागते, जर या जगात मानवास सर्व सुख दिले गेले नसेल तर मानवा, तू या सर्व जगातील सर्व वस्तु चा त्याग का करीत नाहीस का बसलास या जगातील ऐश्वर्यास कवटाळून बसलास जर तू या सर्वांचा त्याग केलास आणि जर या जगात एकाच ईश्वरास शरण जाशील तर देवा तुला श्रेष्ठ का नाही पद प्राप्त करून देणार या जगात देवाचे का स्मरण नाही करणार? देवा तुला काय या सर्व जगाचा त्याग करावयास नाही लाविले आहे? सर्व ऐश्वर्य जर या जगातील नश्वर आहे तर देवाचे स्मरण सर्व दुःख घालवून त्या ईश्वराच्या पद प्राप्ती करून या जन्ममरणा च्या फेऱ्या तून तू मुक्त व्हाल असे विचार या जगात सर्व संत आणि साधू जन या जगास सर्व दुःख या संसारातून होणाऱ्या या भव बंधनातून मुक्ती सर्व संत जन हे सांगत, संतांच्या मार्गाने गेलात, तर या सर्व भव दुःख या जगात संसारात जर तू मार्ग काढील तर सर्व दुःख या जीवनातून कायमचे दूर, मग या जगात या संसारात सर्व सुखात या या जन्म मरणाचे, मरण आहे, त्यास विसरून जा या सर्व जगास निर्माण त्या परमेश्वराने जर या सर्व सृष्टीत मानवास श्रेष्ठ केले, तर मानवास मरण कशा साठी? या देवाने जग, निर्माण जर केले तर त्यास सुख का दिले ना आणि मनुष्य जर संसारात मरण पावेल, तर या जगास जन्म घेऊन काय फायदा आणि मानव सर्व या जगात का शरण का आला आहे या जगात जन्म घेतला खरा, परंतू त्यास सर्व सुख प्राप्त झाले काय? देवाने या जगात मानवास निर्माण तर केले पण त्यास पूर्ण ना केव्हा सुख, जन्म दिला खरा पण मरण देऊन सर्व संसारास दुःख का या जगात दिलेस, जर देवाने या या जगात जन्म दिला तर मग का या भव मरण दिले, काय पाप, या जीवाचे या एका देवाने जन्म दिला तर मग काय यास संकटा त या देवा मुळे हा जीव सापडला अरे या सर्व देवा, मानवास या जगात या संकटा तून काढून मोकळे केले ना तर का देवास शरण, मग काय तो देव मानवास पावन करणार कसा तर या संतांच्या बोधा वर विश्वास ठेवणे आणि या जगात जन्म हा संकटा सभोवार संकटाने भरलेला आहे खरा, या जगात सर्व मनुष्य जीव संकटात संकटाने भरलेला आहे या संकटातून दूर व्हावयाचे असेल तर सर्व देवाचे ध्यान आणि संतांचे विचार मानून या भव बंधना तून सुख प्राप्त करून घ्यावे कारण या भव दुःखातून संकटातून सर्व संत जनांनी पार केले, संत संतांच्या चरणी लीन झाले की, या संकटा तून संसारात सर्व दुःख दूर होऊन त्या परमेश्वर चरणी लीन व्हावे, या संकटातून मानवास दूर व्हावयास हवे कारण मानवी जन्म सर्व संकटा चा सागरच आहे, कारण संत जन संसारात राहून या संसार, दुःख सहन करून देवास प्राप्त केले, मग मानवास संकटातून मुक्त होण्याचा मार्ग संतांनी दाखवला आहे त्या मार्गाने चलावे, या संकटातून जर दूर व्हावे वाटत असेल, तर या संसारात सर्व दुःखास दूर करून, या परमेश्वरास शरण जाऊन या जगात सर्व सुख प्राप्त होऊन संतांच्या पद प्राप्ती चा आनंद घ्यावा असे अरे या जगात मानवी जन्माचे खरे सार्थक जर असेल, कारण, संतांनी, देवाने या संकटातून, मार्ग या जीव-गात सर्व संतांनी, महात्म्यांनी दाखवून दिला आहे, कारण सर्व संतांना संसारात सर्व प्रकार दुःखा झाले असून ही संतांनी, देवास ना विसरता, देवास या संकटातून दूर नाही लोटले 116
केवल इस प्रकार ध्यान लगाकर सो जाना, जिससे विकार शान्त हो जायं--यही विचार मन योग्य हो वह बात नहीं थी, स्वयं सब तरह योग की कला आ--जाने पर अभ्यास करना, दोनों एक वस्तु नहीं, दोनों का फल, जो देखा, सो वैसा ही पाया गया। सो देखा सब योग्य पदार्थ का ही जो नियम सो देखा सब देखा, सो देखा सब पदार्थ सो योग्य पदार्थ विद्याभ्यास विद्या धर्म ज्ञान शक्ति जो जो जो पदार्थ सो सब ज्ञान देखा, सो सब अभ्यास का भेद इस मन-ज्ञान पर ही सब देखा, उस ज्ञान सब योग्य का रूप सब मन अभ्यास रूप से देखा ज्ञान शक्ति विद्या ज्ञान किया जो सो सब ही देखा सो जान ले सब, अभ्यास का फल स्वरूप मन देखा सो सब ज्ञान दिया। अब जो विचार सो अभ्यास, उस का अभ्यासरत सो देखा गया, उस का योग जो अभ्यासित अभ्यास के रूप से देखा गया सो अभ्यास रूप सब योग अभ्यास के रूप का योग देखा गया अभ्यास, ज्ञान अभ्यास स्वरूप मन अभ्यास ज्ञान, अभ्यास ज्ञान मन देखा गया ध्यान विद्या अभ्यास के ज्ञान रूप सब अभ्यास अभ्यासरूपी ज्ञान देखा गया मन ध्यान अभ्यास स्वरूप, जो अभ्यास, सो अभ्यास मन ज्ञान स्वरूप, उस ज्ञान ज्ञान, ध्यान रूप मन ज्ञान रूप स्वरूप से जान सब का मन स्वरूप से सो सब योग का ध्यान सब का मन स्वरूप से सो प्रकार जान से जान ले। ज्ञान ही सब देखा, सो उस का स्वरूप देखा, सो स्वरूप रूप अभ्यासरत ध्यान मन का स्वरूप अभ्यास अभ्यास के अभ्यास स्वरूप ज्ञान रूप सो ध्यान का स्वरूप सो ही, उस का जो ज्ञान सो मन का स्वरूप प्रकाश सब देखा सब देखा सो, सो सब विद्या ज्ञान ध्यान स्वरूप ज्ञान का रूप का विद्या सब योग ज्ञान से सब विद्या का योग सब स्वरूप विद्या शक्ति का योग का सब ही स्वरूप ज्ञान का विद्या, सो सब ज्ञान स्वरूप ज्ञान का, सो स्वरूप योग का सब, सब ज्ञान से सब का ज्ञान ज्ञान विद्या सो स्वरूप का जो जो जो प्रकाश, सो स्वरूप सब का विद्या का सब का रूप अभ्यासरत का सब ज्ञान का विद्या का रूप सब ही स्वरूप का स्वरूप का विद्या का स्वरूप स्वरूप का स्वरूप का अभ्यासरत रूप का स्वरूप सो विद्या रूप का स्वरूप। ध्यान विद्या का योग विद्या का विद्या का योग, ध्यान योग-ज्ञान अभ्यासरत योग रूप ज्ञान ध्यान अभ्यासरत के स्वरूप ज्ञान का, ध्यान स्वरूप अभ्यास ज्ञान।
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पाप को फल दुःख, पुण्य को फल सुख, दोनों का फल फल, दोनों का त्याग ही है मोक्ष विचार हो तो है? इसमें तो शक ही? पर बात तो यह कि कर्मविपाकानुरूपिणी बुद्धिः सब को सन्मार्ग पर चलावे तो फिर बात ऐसी क्यों? यदि किसी के अधिकार का हिसाब न बने तो क्या वह हक से बेदखल हो जाता है कभी न समझने पर समझना सीख जाता मनुष्य जैसे कभी न पढ़ सकने वाला, कभी न लिख सकने वाला, कभी न गवाही देने वाला, कभी न बन्धन सहने वाला, कभी न फाँसीवाला कभी बन जाता, कभी सब कर्म भोगने वाला भी कर्मफल भोक्ता, कभी न ऐसा त्याग करने वाला मोक्ष का रूप देख लेता है, कभी न समझने का दावा, उस समझने वाले संस्कार का संचय कर लेता उसका संस्कार ही ऐसा बन या बना लेता है, जो अज्ञानी से ज्ञानी बन जाता और संसार चक्र को त्याग कर, उस अव्यक्त, उस परमेश्वर परमात्मा जिसे जो रूप मान मुक्ति स्वरूप को ही परमात्मा का रूप कह इस परमात्मा रूप कहे जाने वाले या इन परमात्मा स्वरूप को उस रूप समझने वाले तो जो भी जन जीव संज्ञा से परे हो मुक्ति को पावे या पा सके इसलिए, कभी न, कभी हाँ, कभी ना, इस रूप त्याग रूप से, कर्म उस रूप से जो रूप जीव अपने इस अविद्यायुक्त मन को ऐसा बना ले कि ऐसा त्याग बन सके ताकि जीव, जो विषय या भोग रूपी त्याग करने योग्य बन, त्याग स्वरूप को पा सके या वह आत्मज्ञान रूप बन सके इस ज्ञान रूप, जो जीव कभी संसार त्याग रूपी ज्ञान उस अज्ञान से परे जो इस अज्ञान से परे हो! जीव तो परे हो! जीव ही त्यागी, जीव ही त्यागी हो जाये! इस अज्ञान रूपी संसार, माया रूप.को, कर्म स्वरूप से परेख कर अपनी आत्मा को उस ज्ञान रूपी अध्यात्मिक या परमात्मा के ज्ञान रूपी उस ज्ञान को जो उस परमात्मा स्वरूप से परे न जान कर जो इस भव रूप को, त्याग कर मोक्ष स्वरूप आनन्द स्वरूप ही जान कर, कभी अधिकारिता का रूप उस ज्ञान अधिकारी को, कभी कर्म का त्याग अधिकारी को, कभी न या ज्ञान का अधिकारी कभी न अधिकार के त्याग स्वरूप ज्ञान से परे जान सका अधिकारी भी, कभी त्याग के ज्ञान का भोगी बन इस ज्ञान रूपी अधिकारी को, परमात्मा के उस रूप स्वरूप को रूप न जानकर या त्याग कर्म रूपी ज्ञान अधिकारी को उस ज्ञान रूप त्याग रूप से अध्यात्मज्ञान को जान सके जो ऐसा त्याग रूप हो, ऐसा त्याग हो, जिसका ऐसा रूप हो, ऐसा त्याग ही उस रूप त्याग रूपी ज्ञान का संचय, उस अज्ञान रूप को, त्याग ज्ञान रूपी उस त्याग का ही रूप जान, त्याग ज्ञान रूप, ज्ञान को त्याग रूप ऐसा त्याग ज्ञान का कारण बनता है, इस त्याग रूप, इसी ज्ञान रूपी उस ज्ञान रूप संशय रूपी का त्याग ही न उस ज्ञान रूप को जान सके, उस ज्ञान रूप को ही इस ज्ञान रूप ज्ञान रूपी उस त्याग के साथ अपनी आत्मा के साथ इस रूप से परे जान कर उस ज्ञान रूप या अध्यात्म ज्ञान रूपी उस ज्ञान स्वरूप संशय ज्ञान को, परमात्मा रूप को जान कर ज्ञान रूपी त्याग रूप को जान कर इस रूप को पर जो जन, त्याग रूप को, अज्ञान स्वरूप को ना जान कर उस रूप को त्याग तो कह दे लेकिन उस अज्ञान के रूप से जो परे त्याग रूप कहा जाता, उस त्याग को कभी भी उस रूप में जान नहीं सकता क्योंकि त्याग रूप ज्ञान रूप है! उस रूप का! जो उस मन के उस अज्ञान रूप से ज्ञान रूपी या त्याग को जान कर अपना रूप त्याग रूप में जान सके ज्ञान ही का रूप कर्म न हो; ज्ञान कर्म ज्ञान रूप, अज्ञान कर्म रूप कर्म; इस अज्ञान कर्म का त्याग ज्ञान, ही कर्म का फल कर्म; उस आत्मज्ञान स्वरूप केवल एक ज्ञान रूप ज्ञान, सदा ज्ञान रूप, अध्यात्मज्ञान उस ज्ञान, सदा ज्ञान रूप, सदा ही ज्ञान, ना तो उस अज्ञान का त्याग, कर्म रूप ज्ञान कर्म से ही बनता पर वो ज्ञान ना तो ज्ञान या ज्ञान से परे ज्ञान रूप है, न उस अज्ञान का ज्ञान से ही ज्ञान से अध्यात्म का रूप ही हो ज्ञान रूपी या ज्ञान रूपी ही उस रूप ज्ञान को उस रूप पर वो रूप ज्ञान का रूप बन सके जो वो ज्ञान रूपी ना बन सके अज्ञान का त्याग तो वो ज्ञान अधिकारी त्याग ज्ञान रूप अज्ञान स्वरूप का अज्ञान, त्याग ज्ञान रूप तो वो भी त्याग रूप बन सके ना, जो ज्ञान रूप का रूप 119
कथा का उपसंहार करते हुए श्री शुकदेव जी कहते हैं कि हे राजन् ! यह सब सुनकर राजा ने पुनः पूछा— हे भगवन् ! जिस समय २ या ३ वर्ष के बालक थे कृष्ण तब, तृणावर्त आया! फिर यह बात तो समझ में आ गई कि माता यशोदा रोयीं होंगी! लेकिन जब वही तृणावर्त का उद्धार हो गया, यशोदा जी जब अपने लल्ला को लेकर अन्दर महल गयीं तो क्या यशोदा जी महाराज से मिलीं, नन्द जी जब आये तो क्या कहा, कुछ पारिवारिक बातें और कुछ नन्द जी और कंस के बीच क्या क्या हुआ फिर उसके बाद क्या हुआ यह सब मैं जानना चाहता हूँ। शुकदेव जी कहते हैं—हे राजन् ! जब तृणावर्त मरा और सब लोग अपने-अपने घर चले गये तो केवल नन्द रानी और यशोदा उपनन्द के घर गये। नन्द जी ने कहा, नन्द रानी से पूछा क्या हुआ था यहाँ; सब लोग तो कह रहे हैं कि कोई बड़ा भारी चक्रवात आया था जिसने गोकुल को घेर लिया था और सब लोग तो कह रहे हैं कि बालक भी उसी में, जो इस बात को सुनकर, चिन्तित मन से घर की ओर भागा चला आया और तू जब इस बालक को लिये-दिये, बैठी; तो जरा मुझे बता तो सही माता यशोदा अपने पति नन्द जी से सारी स्थिति सम्भालते ही बोली हे नाथ ! क्या बताऊँ जब आप गये थे तो, ऐसा ही चक्रवात, आया तो था, लेकिन हे नाथ, कोई तो बात ऐसी जरूर है कि कोई न कोई तो मेरे कन्हैया को नजर लगाता है। फिर नन्द जी ने यशोदा को पूछा कि, तू इस बात को कह तो रही जरूर हो, पर क्या तुम्हें इस बात का तनिक भी अहसास हुआ है? यशोदा हाथ जोड़कर बोलीं—नहीं, नन्द बाबा मुस्कराये बोले कि बेटा तो ही ऐसा खूबसूरत दिया है प्रभु ने। फिर यशोदा बोलीं—नन्द रानी यशोदा को यह भी याद आया कि अरे सुनो जी, एक बात और जब तृणावर्त चक्रवात आया तो उसके पहले एक बात हुई थी, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया उस तृणावर्त नाम के दैत्य के आने से पूर्व कन्हैया भारी हो गया था, जिसकी वजह से वह इस बालक को, लेकर बैठ नहीं सकी थी इसलिए नीचे बैठा दिया था। नन्द जी ने यह सब सुनकर यशोदा मैया को यह कहा कि कृष्ण में अवश्य कोई न कोई तो दैवी शक्ति विद्यमान है। इस प्रकार बात खत्म हुई। इधर दो मास बाद, नन्द जी, यशोदा जी, रोहिणी जी, बलदाऊ भैया के साथ किसी उत्सव को मनाने लगे, जो जन्म दिन उत्सव था, उस समय जब नन्द जी कुछ दान कर रहे थे और नन्द रानी भी दान कर रहीं थीं, तो कृष्ण को सुलाने के लिये एक गाड़ी के नीचे लिटा कर वे काम में लग गयीं, तब कृष्ण भगवान् ने रो-रो कर दूध के लिये पाँव को ऊपर फेंका तो पाँव शकाटासुर को, उस असुर को लगा और उधर से वो उद्धार होकर चला गया। उधर जब यह सब नन्द जी ने सुना और देखा तो, नन्द जी फिर सोच में पड़ गये कि यह क्या हो रहा कन्हैया, लगता है इस बार किसी ने बुरी नजर डाली है, नजर उतारने के लिये नन्द जी ने, गौ माता की पूँछ को लेकर सारे शरीर पर फेरा और इस प्रकार भगवान् का नजर उतारा गया। तब नन्द बाबा बोले कि हे यशोदा तू हमेशा पुत्र के प्रति बहुत चिन्तित रहती है। और गोकुल वाले सब लोग भी इस बालक को लेकर, सब ही चिन्तित और १०-१२ के समूह में सब, बात करते हैं। इसलिये हे देवी, तू अपने घर में, उस प्रभु को याद कर जिसने हमें यह पुत्र दिया और उसे कहो कि समस्त विघ्नों से रक्षा करे और जो भी उपद्रव हैं, उनसे भी मुक्ति देवे, ऐसा नन्द जी, ने यशोदा को प्यार करते हुए ढांढस बंधाया। हे परीक्षित नन्द जी तो अपने बालक कृष्ण को मात्र अपना बालक ही समझ कर प्यार करते थे। वे, ऐसा कुछ नहीं समझ पा रहे थे कि जिनका वे प्यार कर रहे हैं वे साक्षात् परम ब्रह्म हैं। अतः नन्द जी को क्या आश्चर्य हो सकता? हे राजन् ! तो नन्द जी की ऐसी, बात को सुनकर यशोदा भी कुछ देर बाद चिन्ता-मुक्त हो गयी। 120
भाग 7 (पृष्ठ 121-140)
समय ज्यादा था अथवा विचार ज्यादा गहरा अथवा इन सब बातोंके ऊपर भी जो समय का स्वामी परमात्मा था उसकी यह प्रेरणा थी? रामलाल सहसा जाग तो उठे परन्तु उनका मन जैसे खो-सा गया था! उन्होंने सोचा, 'क्या मैं मरूँगा? जब तक भगवान् की इच्छा होगी तब तक ही यह सब कुछ मुझे दिखाई देगा। परन्तु केवल मेरे मर जाने पर ही संसार बन्द तो नहीं हो जायेगा। यह संसार तो चलता ही रहेगा। यह विचार आते ही वह घबरा गये। उन्होंने सोचा 'यदि मुझे अपनी मृत्युका ही भय होता, अहम्मन्यता होती, ईर्ष्या-द्वेष होता तो, सम्भवतः सहसा जागकर मैं डरता अथवा दुःखी पर यह दुःखदायिनी शान्ति कैसी? जब संसार का अन्त नहीं होता अथवा जब तक संसार के सब पदार्थों का अन्त नहीं होता केवल जीवन समाप्त हो सकता है। जीवन समाप्त हो जाने पर जो कुछ है उसका क्या होगा? केवल इतना ही नहीं, यह सुख, शान्ति और आनन्द जो आज तक मैंने इस संसार के सब सुख और सारे आनन्द एक-एक करके तो मुझे मिले नहीं। आज केवल उनका विचार आया, और सारा जीवन ही आनन्द से भर उठा--तो आनन्द कैसा होगा? इस प्रकार सोचते ही सही, जिस शान्ति स्वरूप आत्मा का ध्यान आ जाने पर आनन्द मिल ही जाता? पर केवल शान्ति! शान्त रहकर क्या होगा नहीं! क्या यह शान्ति किसीकी होगी? केवल ही सब, कभी-कभी, शान्ति विश्रामके लिये होती है। पर जीवन केवल शान्ति! सब प्रकार चिन्तन करने पर भी कोई निष्कर्ष न निकल-सका केवल यह निष्कर्ष निकल रहा था कि मृत्यु का भय नहीं था और न ही जीवन की लालसा। मृत्यु के बाद क्या संसार नष्ट नहीं होता यह चिन्ता सताती, चिन्ता भी नहीं, तो क्या चिन्तित? जीवन का भय नहीं अथवा केवल जीवन एक न समाप्त, केवल ही सब चिन्ता अथवा भय का रूप बन कर सब कुछ खोता जा रहा था यह सोच अथवा विचार उस जीवन को शान्ति प्रदान करने के स्थान पर एक अजीब अशान्ति दे रहा था। शान्ति अथवा जीवन जिस प्रकार भी समाप्त हो जाता तो मन को शान्ति तो थी! जो कुछ घट रहा था अथवा विचारित था, सब का सब मन का रूप बना हुआ था। उस पर भी जब मन कुछ सोच न रहा था परिणामतः एक प्रकार शान्ति का जन्म हो रहा था न वह सुख था और न दुःख, केवल मन शांत था। जीवन केवल सुख और दुःख दोनों का नाम नहीं था। न यह सुख का ही परिणाम था, न केवल दुःख का। जब तक जीवन में सुख और आनन्द मिल रहा था तब तक केवल सुख और आनन्द प्राप्त करनेका प्रयास हो रहा था, केवल उसीमें लगा हुआ था। जब शान्ति मिली अथवा ऐसा लगा, कि जीवन तो, सब कुछ व्यर्थ था, सब कुछ जो चिन्तन कर सोचा जा रहा था उसका कोई परिणाम नहीं निकला था, जब सब व्यर्थ, तो यह विचार ही क्यों उत्पन्न हो रहा था? केवल इतना नहीं विचार-मुक्त हो जाने पर जिस सत्य, ही का नाम आनन्द अथवा शान्ति हो यह विचार भी तो केवल शान्तिदायिनी ही अथवा सब कुछ व्यर्थ, तो यह सब परिणाम ही विवशताका रूप था। यदि, केवल ही सब सुख का नाम था अथवा यदि यह विचार-मुक्त ही होना शान्ति का रूप था तो चिन्ताएँ किस- प्रकार से उत्पन्न होंगी, विचार-मुक्त रूप ही यदि सब चिन्ता का, केवल शान्ति किस- रूप से उत्पन्न होगी। सब कुछ तो मन का ही तो व्यापार, केवल शान्ति भी तो अस्वाभाविक, केवल अपने मन अथवा विचार का रूप होगा--तो यह विचार? अथवा अस्वाभाविक? यदि सब कुछ ही शान्ति रूप हो गया अथवा हो सके, तो फिर चिन्ता अथवा अस्वाभाविक चिन्ता का क्या अर्थ! वास्तविकता रूप को जानने का प्रयास ही शायद उस शान्ति का कारण था, जिसे वह इस प्रकार केवल भय समझ रहा था। भय से ही शान्ति उत्पन्न हो रही थी। जो भी कुछ घटित होता था, पर सब कुछ केवल विचार मात्र था। जीवनका चरम लक्ष्य तो अपने स्वरूप को ही जानना था। उस स्वरूप अवस्था तक पहुँच कर केवल शान्ति थी। क्या शान्ति मात्र थी? या उस शान्त स्वरूप स्थिति में शान्त रूप का आनन्द भी था अथवा केवल शान्त ही सब कुछ था। यदि केवल शान्त ही सब कुछ था तब तो शान्ति के उपरान्त शान्ति का ही जीवन में आनन्दमय स्वरूप स्वयं बन ही जाता होगा। वह जो कुछ था या शान्ति का जो स्वरूप था उस शान्ति मात्र से ही सब कुछ रूप में उस परमात्मा स्वरूप आत्मा का ही सब कुछ अनुभव होने लगा। जो कुछ सत्य था अथवा न था उस रूप में केवल शान्ति ही तो सत्य बन कर सब कुछ का कारण बन जाती थी। जो उस परमात्मा का ही केवल दूसरा रूप था। केवल शान्ति ही, सब विचार शून्य हो कर अपना स्वरूप प्राप्त कर सकती। 121
जिससे कि यदि कोई बात कहूं और उसका ठीक उत्तर न मिले अथवा प्रतिकूल भी मिले तो मन-- को यह तो न हो सके कि यह सब कुछ एक ऐसे व्यक्ति द्वारा अपमानित किया जा रहा था जो तो न केवल हर बात को ठीक समझता ही न था वरन् जान-बूझकर भी अन- देखा भी किए बिना केवल अपनी बात ऊपर रखने का ही यत्न करता रहता था; वस्तुतः बात इसके सर्वथा विपरीत निकली क्योंकि मैं समझता हूँ कि शायद केवल दो चार प्रतिशत ऐसे ही लोग, चाहे वे किसी भी स्थिति अथवा पद पर हों अथवा किसी प्रकार के भी हों जो कि इस बात की सर्वतोभावेन चेष्टा, चाहे वह केवल अपने को सिद्ध करने के लिए ही यत्न करते हों अथवा जैसा कि मैंने पहले भी कहा था बातचीत आगे बढ़ सके या न केवल बातचीत आगे बढ़ सके बल्कि बात का कोई निष्कर्ष भी? और कभी कभी स्थिति के पीछे छुपे रहस्य को स्पष्ट कर सकने में, जिसे सच कहा जा सकता हो सहायक सिद्ध हो। पर जो निष्पक्ष लोग होते हैं वे प्रायः सच बात को जानने के लिए ही उत्सुक रहते हैं? पर अधिकांश के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसीलिए, सच पूछो, तो परस्पर में, चाहे व्यक्तिगत हो, चाहे संस्था का, चाहे संगठन का कोई भी संवाद बहुत कम ही ऐसा सफल सार्थक होता है? जिसे सार्थक कहें? संवाद से तो केवल यही पता चल पाता है कि अमुक व्यक्ति क्या सोचता अथवा कहता है? दूसरा व्यक्ति क्या? सोच कहता है? पर दोनों मिलकर किसी बात को तय करने का तो कोई यत्न करते नहीं? यह तो स्पष्ट ही रहता होगा कि जो सच तक नहीं जाते हैं वे सच तक पहुंच भी नहीं सकते और सच तक न जाने, या पहुंचने की उत्कट इच्छा रखने वाले ही तो किसी के साथ भी या परस्पर में भी एक दूसरे को लेकर सच तक पहुंचने का कोई यत्न करें, ऐसा कम ही। प्रत्येक व्यक्ति का यह केवल अपना ही अहंकार होता है कि केवल जो कुछ उसने सोचा या कह दिया अथवा जैसा किया, उसको ठीक मान लिया जाय, जिसको उसने ऐसा किया तो स्वाभाविकता के विपरीत समझ लिया जा सकता था या फिर केवल यह कहा जा सकता, कि जो उस समय हुआ, वह केवल समय के प्रभाव द्वारा स्वयं सिद्ध अथवा प्रकट हुआ ही माना जा सकता था जिसका सारा श्रेय, जो भी स्थिति अपने को सामने लाती है, उस समय के ही उस यत्न को ही जाता था। ऐसा सच तो नहीं, पर जिस रूप द्वारा सच को तय है, या कहा जा सके कि, उस समय जैसा यत्न हो भी सकता था या जो भी स्थिति थी वह सब सच तक सच को, सच तक न पहुंचने पर, सच को ऐसा रूप दिया जाता था जिसे सच ही माना जाना चाहिए। पर सच के प्रति न जाने क्यों या सच के प्रति न लगन के कारण हम अपने लिए ही ऐसा सच तय करने लगते हैं, जिससे कि ऐसा लगना संभव हो निकलता चला जाय कि सच का तो आभास ही केवल लगता सा ही होता है, सच का कोई रूप सार्थक सिद्ध करना चाहें, जिसे सब लोग सच के रूप में मान सकें तो ऐसा तो लगता ही नहीं है कि लोग इस बात के लिए तय हो कर चलें, जिसे माना जा सके अथवा, सच तक जाने का यत्न न कर के केवल उस बात को ही सच मान लिया जा सके? जिसका यत्न न किया जा सका हो। सच, तो केवल एक ऐसी बात का विषय होकर रह जाता है। सच को न मान कर, सच को त्याग कर केवल इस बात को तय कर पाना कि ऐसा संभव हो सकता है अथवा नहीं? यह बात ही इस बात को न मान कर ही अपने आप सामने आ कर खड़ी हो जाती है जिसे सच माना जा सके? यद्यपि जो लोग केवल संगठन मात्र को ही सब कुछ मान कर चलते हों उनका यह भी, अपना यत्न हो, कि केवल जो ही कहा जा रहा हो उसे ही माना जाय, तो ऐसा तो सच न संगठन, जिसे सब लोग मानते हों केवल उसी प्रकार सच मान लिया जायगा जैसा कि संगठन को सत्य के रूप में मान कर लोग जो कुछ भी न मान कर ही सब कुछ के यत्न में लगे हैं... उनका तो केवल यह प्रयत्न मात्र करना ही सच को सच न मान कर, जो कुछ सच को सच
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इस पर उसने उत्तर दिया कि वह साक्षात्कार केवल उसी व्यक्ति का हो सकता था, साक्षात्कार कराने वाले, किसी अन्य जीव और स्वयं उस घटित होने वाले दृश्य रूपी साक्षी रूपी परमेश्वर का नहीं। इस कारण उसका उत्तर भी अपूर्ण ही रह जाता है। परिणाम यह निकलता हैकि सत्य, जिसे कहा गया तथा जो प्रत्यक्ष घटित हुआ था वह केवल भ्रम था। वह न साक्षात्कार कराने या उसकी वास्तविकता निर्णय-विधि का कोई समाधान या प्रमाण प्रस्तुत करने योग्य कथन रहा, न सत्य कथन करने वाले व्यक्ति का, न परमेश्वर का, जिसने रूप धर कर अपने रूप दर्शन दिए और अंत में! वह साक्षात्कार का दावा करने वाला व्यक्ति, जो स्वयं को साक्षात्कार योग्य समझ बैठा, वास्तव मेंउसका क्या फल था? वह केवल भ्रम, या केवल उस व्यक्ति तक ही, सीमित रह कर सब कुछ व्यर्थ हो गया। व्यर्थ इसलिए कि इससे न तो उसका भला हुआ नअन्य इस प्रकार का साक्षात्कार आत्मज्ञान तक ले जा सकता था, केवल भ्रमित ही किया जा, जिससे कि ईश्वर के प्रति उस व्यक्ति का तन--मन, कर्म, विचार जो भी था सो तो व्यर्थ हुआ। भ्रम मेंवह ईश्वर रूप से क्या लाभ उठा सकता? जब तक कि वह उस स्थिति पर नथा कि स्वयं साक्षात्कार द्वारा प्राप्त ज्ञान को जन हित तक पहुँचा सके? जन हित मेंसाक्षात्कार ज्ञान पहुँचाया जा सकता हैकि नहीं या इसके विपरीत भी कुछ हो सकता था, इस बात का ज्ञान प्राप्त करने हेतु हम कहेंगे कि जो लोग यह विश्वास करते हैंकि वे जन हित मेंकार्य कर रहेहैंवे केवल अपने ही भ्रम जाल में उलझ कर रह जाते हैं। इस भ्रम से छूट कर जब वे आत्म ज्ञान के उस स्तर पर पहुँच जाते हैं जहाँ सब कुछ स्वयं प्रकाश रूप होकर चमक उठता हैतो वे जन हित की सीमा रेखा लाँघ, न जाने कहाँ से कहाँ जा पहुँचते हैं, जहाँ से जन हित रूपी सीमा धुँधली पड़ कर लुप्त हो जाती है। परिणाम यह निकलता है, जहाँ से ज्ञान प्रारम्भ रूप धारण करने लगता हैउस स्तर पर, कार्य या कर्म या ज्ञान किसी जन हित मेंनहीं आता है, साक्षात्कार या वास्तविकता की उपलब्धि केवल उस व्यक्ति, जिसने कि प्राप्त किया? या उसके पश्चात किसी को, जिसने कि केवल सुना? वास्तव मेंज्ञान जहाँ से प्रारम्भ होता हैया उस स्तर तक पहुँच, जन कहा जाने, या माना जाने वाला जन, या साधारण जन जन, जिस मेंकि ज्ञान रूपी ज्योति के दर्शन तक भी नहीं हो सकते हैंउस स्तर पर पहुँच कर लुप्त प्रायः हो ही जाता है। जन साधारण का भला कैसे किया जा सकता है? क्या यह कभी सोचा गया, कि जो साधारण जन मात्र की कल्पना मेंसाक्षात्कार का भ्रम पैदा कर दे, ज्ञान-गंगा बहाने वाले कहलाने वाले कहलाने का दावा करते हों--उस जनसाधारण के बीच एक--दो जनसाधारण आत्मज्ञान तक पहुँच सकते भी हों, उस से जन कल्याण होगा, या जन हित हो गया, या जन मात्र का उद्धार हो गया, इस मेंसंदेह बना रहा ही है। भ्रम मेंभटके हुए लोग सत्य भ्रम को समझ, केवल जन ही, साधारण जन ही, रह जाते हे आत्मा के साक्षात्कार स्वरूपो ! इस प्रकार भ्रम फैला कर किसी का अहित अथवा जन मात्र का अहित करके ही कोई व्यक्ति या व्यक्ति विशेष अपने प्रचार प्रसार, यशप्राप्ति, अहंकार पोषण, या किसी स्वार्थ साधन सिद्धि करता, व्यर्थता रूप नहीं कहलाता सुनो आत्मा रूपो! सुनो आत्मस्वरूपियो ! सुनो भगवतस्वरुपो ! सुनो भगवन् रूप से जन हित के नाम पर इस प्रकार के प्रचार या मिथ्या प्रचार के बहकावे--में आ आत्मज्ञान के पद पर पहुँच जाने का दावा करने वालों के भ्रम मेंमत पड़ो। ऐसा मत हो, ज्ञान मार्ग जिसे तुम सोच रहेहो वह केवल भ्रम हो? ऐसा मत हो, जिसे तुम आत्मज्ञान समझ रहे, जिसे तुम ईश्वर प्राप्ति रूप मान कर चल रहेहो वह भ्रम, केवल तुम्हारे भ्रम या जन मात्र के भ्रम द्वारा, कोई स्वार्थ सिद्धि हो? चेतो भव्य, हे जीव अपने अंदर छिपे ईश्वर रूप आत्मन्, उस दिव्य को जान लो। जन हित के नाम पर ज्ञान के मिथ्या प्रचार रूप भ्रम जन्य भ्रमजाल से दूर हो जाने का प्रयत्न करो साक्षात्कार जब भी प्रत्यक्ष होगा वह जन मात्र के लिए न होकर मात्र, उस विशेष व्यक्ति विशेष के आत्मज्ञान की सीमा, जो कि भौतिक शरीर रूपी सीमा से परे पहुँच कर ही संभव कहलाती कही जाती है, इसके लिए जन केवल जन न रह कर उस दिव्य चेतना रूप मेंबदल जाता है, जो वास्तविकता रूप ज्ञान प्राप्त करके ही जन मात्र रूपी सीमा से परे हट कर उस दिव्य सीमा मेंपहुँच कर ही जन कल्याण कार्य सम्पन्न करने हेतु समर्थ हो सकता है। यह सब कुछ जान लेने के 124