भारतकोश
संग्रह पर लौटें

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯! ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯-▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯! ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯? ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯-▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯? ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯

The text in the provided image cannot be read or transcribed into Devanagari because the document has a font rendering/encoding error where all characters have been replaced by missing-glyph squares (tofu boxes ). Only punctuation marks and the page number 133 at the bottom right are visible.

□□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □ □□□□□ □□□□□, □□ □ □□□□□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□□□□ □□, □□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□? □□□□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□□ □□□ □□□□, □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□, □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□ □ □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□, □ □□□□ □□□□, □ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□! □□□□□□, □□□□□□ □□ □□□□□ □□--□□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□--□□□□ □□□--□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□? □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□? □□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□□, □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□□ □□? □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□, □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□--□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□? □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□--□□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□□□□□□□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□□, □□ □□□□ □□□□ □□□□, □ □□□□ □□□□□□□□ □□□, □ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□ □□□ □□ □□□□□□--□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□□□□, □□□□□□□ □□ □□ □□ □□--□□□□□□□□□□, □□□□□□□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□□□; □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□, □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□□□ □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□, □□□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□, □□ □□□□□, □□ □□□□□, □□ □□□, □□ □□□□□□□□, □□ □□□□□□□□□--□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□, □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□□□□□ □□, □□□□ □□□□□□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□, □□ □□ □□ 134

विचार यह देखकर कि अधिकांश मानव जाग्रत होकर रहने का दम तो भरते हैं पर अपनी जीवनचर्या पर एक बार भी नजर डालने अथवा खुद का ही सच से मुंह न मोड़े तो उन्हें खुद समझ आ जाए कि जिस जाग्रत जीवन व्यतीत कर रहे हैं वह तो मात्र भ्रम या धोखा भर सिद्ध होकर रह जाता बिना जागे ही हम मर रहे हैं और बिना ही जाने हमारा जीवन का सिलसिला समाप्त हुआ, व्यर्थ ही जीवन समय बिताया हे! साधक! जागो! जागो जो कुछ घट रहा उसे जानो इसके पहले कि मृत्यु आ जाए, अपने जागने रूपी प्रकाश अथवा साधना के-को पहचानो कि इसके बिना जीवन का कोई भी अर्थ नहीं या ऐसा जाग्रत जीवन ही व्यर्थ जीवन कहलाने के काबिल समझा जाता है। जो व्यर्थ जीवनशैली पर विचार करने अथवा सोचने का कोई दृष्टिकोण या नजरिया अपना ही नहीं सकते हैं। सच तो यह, कि जो भी हम कर्म करते हैं, या बातें करते हैं वह सब तो भ्रम या धोखा सिद्ध... जीवन का उद्देश्य तो मात्र यही समझना था, जिससे बच कर आज जाग्रत भ्रम जीवन रहे! अधिकांश मानव इस भ्रम भरे मन द्वारा संचालित या निर्देशित या आयोजित भ्रम भरे जाल तथा भ्रम से प्रभावित कार्यप्रणाली अपना कर ही जीता रहा! अधिकांश मानव उस भ्रम या भुलावे का शिकार बन बैठा कि जो भी घटित हो रहा है सही! जिस कारण से प्रत्येक बात का वह अपने आपको सच मान बैठा या उस भ्रमित सच को सच मान कर भ्रम जीवनशैली पर गर्व (अभिमान) करता, अपनी ही बात (मानसिकता) को सच साबित करने पर, व्यक्तिगत तौर तरीके से व्यवस्था या कार्यप्रणाली पर निर्भर बन बैठा या यह भी कह लें ऐसा समझा गया; कि व्यक्तिगत ही नजरिया ही सही रूप सच का या सच जीवन शैली है सच; कि व्यक्तिगत ही विचार ही विचार रूप सच का सच माना गया, जिस रूप सच का वह रूप मान बैठा जिसके प्रभाव में भ्रमित ही दृष्टिकोण या नजरिया अपना लिया जिसका वह संचालन व्यवस्था या कार्य कर बैठा--तो क्या ऐसा जाग्रत हुआ? जिसे वह भ्रम पूर्वक अपना सच, जिस भ्रम को सच मान कर कार्य किया था? इसलिए हर व्यक्ति को अपने मन-मस्तिष्क द्वारा जीवन के सच को जानना था, जो कि वह कभी जान पाया ही न कभी समझ पाया जिस कारण से वह खुद को ही भ्रम के आगोश में अपने आप छिपा बैठा तथा भ्रम आधारित जीवन संचालित कर ही, अपने आपको जाग्रत मान बैठा मन-के प्रभाव विचार द्वारा उस जीवन यात्रा पर विचार या ज्ञान पा सका, जिस पर स्वयं व्यक्तिगत या समाज द्वारा जीवन का आधार, या सच मान बैठा क्योंकि उसने कभी सच तथा उसके आधार को तलाशने अथवा खोजने का प्रयास कभी किया ही जिससे कि स्वयं को, अपने आप विचार शैली, कार्यप्रणाली तथा व्यवस्था द्वारा वह सब कुछ जान पाता भ्रम का शिकार ही बना रहा? सच यह तो नहीं जिसका वह तो शिकार बना बैठा जिसे उसने अपने द्वारा विचार कर सच मान लिया था क्योंकि वह स्वयं भ्रमित मन द्वारा, बिना ही ज्ञान बिना विवेक के ही जो विचार, कार्य रूप ज्ञान, कभी विचारों का, कभी या विचारों, कभी के रूप, कभी उस विचार, का रूप देकर अपने आप ही भ्रम के सच पर ही आधारित सच मान लिया हर सांस व्यक्तिगत ही रूप में प्रभावित एक विचार को जन्म दे रही थी रूप पर, उसने जिस व्यवस्था को, अपने विचार को सच मान कर जो रूप दिया उस रूप में वह यह भूल गया कि, उसके जिस भ्रम विचार रूप को सच माना गया था वह कभी विचार का रूप लेकर सच साबित हो रहा भ्रमित विचार ही तो था जिस रूप द्वारा सच के रूप, जिस रूप में मन, विचार के रूप में स्वयं भ्रमित सोच को जन्म दे विचार का रूप बनाकर प्रतिष्ठित, स्थापित, स्थिर कर, अपने मन के प्रभाव का रूप सच के रूप में माना एक शांत या शून्य का रूप अपना प्रभाव या प्रभाव के रूप में सामने उस तक विचार के रूप अनुसार ही रहा था, जिसे मानव विचार का एक रूप व रूप का नाम दे, न ही तो अपने शून्य रूपी स्वभाव अथवा शांत रूप को पाया, जिस कारण वह शांत रूप अथवा शून्य रूप के प्रभाव अथवा स्वभाव को पहचान नहीं पाया हर सांस का उपयोग मन व विचार के सच जानने तथा शांत या शून्य रूप रहा! पर या ऐसा कह लें इसके प्रभाव में या इसके लिए, शांत भाव, शांत स्वभाव या शून्य स्वभाव को न पहचान कर सांस-सांस पर ही सच माना, शांत व शांत, शांत भाव, शांत व शून्य इस वास्तविकता द्वारा शून्य ही प्रकाश रूपी ज्ञान के प्रकाश रूप ज्ञान से अनभिज्ञ, मात्र ही उस सच को सच मान कर भ्रम भरा ही जीवन जी रहा था कि 135

गयी कि वह सब कुछ जान कर भी अनजान बनता जा रहा था और वह भी अपनी माता जैसी माता के इस लज्जित व्यवहार स्वरुप स्थिति से अनभिज्ञ बन अनजान ही हो कर इस प्रकार चुप बैठनेवाले पर धिक्कार कर दिया या नहीं, सत्यकाम अपनी माता जैसे माता पिता का आदर करें, अथवा जिस का विरोध किया गया वैसा! सत्यकाम ने जब माँ से पूछा होगा तो माता पिता-संबन्ध का रहस्य भली भाँति तो होगा अर्थात् यह निश्चय रहा ही होगाकि, या तो विवाह रूप पिता-संबन्ध--नियम का लोप होगा? अथवा उस से जो सन्तान हुआ होगा वह न हुआ? अथवा उस समय वह न था? जिस बात का ज्ञान न रहा? जिस में न तो लज्जित होनेका था, ओर न ही लज्जा युक्त बात थी। यदि उस के विचार माता प्रति लज्जा से भरे न होते तो पिता की ही बात को पिता सम्बन्धी ही न कह देता, बल्कि इस प्रकार दोनों सम्बन्ध लज्जा जनक हुए, जिससे सत्यता ही कह दी, जिससे सब संशय मिट गया। हे आर्य जनो, इस प्रकार असभ्यता को सत्य कह कर प्रचार तो न कर कर संसार को ठगते? यह सत्यता का स्वरूप? इस सत्यता को धिक्? हे आर्य जनो, यह बात सत्य सिद्ध हो तो इस विचार द्वारा कि असभ्यता संसार में सब रूप सत्य ही हो जाय, सब संसार को ठगते, सब जग को ठग कर सत्य का नाम दिया जाय महा अनर्थ! दो चार जन ऐसे होवें! इस के द्वारा जो चाहे सो कह कर ठग लो, पर ऐसा सत्य जो जगत वासियों को भ्रष्ट करने वाला, सज्जनों द्वारा स्थापित धर्म को बिगाड़ ही देगा, सब संसार को दुख देगा ही; उस समय में सत्यकाम ने, अपने माता सम्बन्धी को; जिस प्रकार से, माता सम्बन्धी था, यथावत स्वरूप दर्शाया कि पिता जी के नाम-धाम का निश्चय न रहा, माता का नाम ही केवल था उस समय के लोग माता के नाम से जानते इस विचार से स्पष्ट पता लग रहा कि जाबालि गोत्र वंश परम्परागत चला रहा जिससे कि उस समय प्रत्येक पुरुष अपने नामके साथ व वंश का नाम लेता, न माता, न पिता, जिस से स्पष्ट ही होता कि जाबालि नाम कुलका था अथवा उन का नाम, जिस से सम्भव है कि गौ नाम जाति वाचक संज्ञा से उस का परिचय हो गया होय, वा जाबालि गोत्र था, सो पिता और मां, का गोत्र एक रहा होगा, जिस से... । सत्य स्वरूप ज्ञान द्वारा यह भी निश्चय हो रहा जिस से कि सत्य स्वरूप हो गया, जिस से यह भी स्पष्ट हो रहा, जिस से ज्ञात हो रहा जिससे समाज सुख को प्राप्त करे, अन्यथा उस की बात से लज्जा थी, सब कुल की लज्जा का उल्लंघन हो ही रहा था जिससे सत्यता समाप्त हो लज्जास्पद व्यवहार ही सिद्ध हो सकता जिससे धर्म की रक्षा न हो, पर जाबालिका विचार लज्जा युक्त निश्चय सत्यता की जड़ को ही हिला दिया गया था; सत्यता का प्रकाशक था, सत्यता को प्रकाशित कर, सब सन्देह दूर हो सकते हैं स्पष्ट था। इस व्याख्यान द्वारा भी सिद्ध यही होता कि जो कुछ कहा गया सो सत्य था। जो सत्य की पराकाष्ठा थी और सब संशय मिटे! विद्वानों का मत यह रहा कि जो सत्य रूप बात की गई सो ही मान्य और सदा ग्रहण करने योग्य ही रहा, जिसे सब जन सत्य मान कर विचार करते हुए इस प्रकार की सब शंका दूर करने में सफल सिद्ध हुए, जिस द्वारा, सत्य स्वरूप की सब प्रकार से महत्ता ही को सिद्ध किया गया, केवल मात्र नाम से पिता रूप को सब तरह से सत्य निश्चय ही माना था विद्याभ्यास हेतु सब जन की दृष्टि सत्यता ही ग्राह्य रूप से प्रमाण का रूप थी जिससे कि सब का भला होना सिद्ध हो जाता। संसार के सब कार्य सत्य पर आधारित समझे गये, जिस तरह यह सिद्ध किया गया रूप से ही सत्यता पूर्ण व्यवहार ही सब बातों का ही अवलम्बन रहा करता था जिस हेतु सब को ही मानना ही पड़ता था कि जो कुछ जन--का संशय दूर हुआ! सत्यता की विजय! सत्यता विजयी हो कर सब शंका मिटा, समाप्त कर सत्यता प्रकाश को सब जन का रूप बन कर धर्म के पालन द्वारा जगत सुधार सफल कार्य रूप सत्य द्वारा, सिद्ध होना ही सदा योग्य रहा 136

जिसके हृदय भीतर स्वयं श्री राम विराजे हों और जिनके मन मस्तिष्क पर परमात्मा का प्रभाव रहेगा, वो जीवन के प्रत्येक पथ दर्शक बन जाता और ज्ञान सब तक स्वयं पहुँचता ही जायेगा? फिर वास्तविकता कौन सी? तभी वास्तविकता यही होगी कि किसी जीवंत व्यक्ति को, जो स्वयं को परमात्माका रूप समझ कर बैठा हुआ ना जाने कितने विभिन्न विश्वासपात्रों पर यह जान लेता कि ईश्वर तो सबके मन रूप घट भीतर ही घट घट वास करता ही रहता है। किन्तु इन घट घट को जब तक स्वयं विषय से पूर्ण घट नहीं मिलता या जब स्वयं घट से तृप्त मन घट नहीं मिलता तब तक ज्ञान उस विशाल सागर रूपी ना जाने उस परमात्मा के केवल जल प्रवाह रूपी अंश से युक्त हो, केवल उस विशाल रस को प्राप्त नहीं होता, जिसे सब केवल मन भीतर ही जान लें। जब तक सब स्वयं को विस्तृत ज्ञान रूपी घट नहीं बना लें, जिससे स्वयं केवल तृप्त ही, केवल इस ज्ञान से शांत नहीं हो सकते ना केवल इस वास्तविकता के विषय रूप रस को जान ही सकते। केवल ज्ञान से ही, ना जाने उस ज्ञान रूपी सागर का रस स्वयं ही मिलना ही होता जिसे केवल भक्ति रसयुक्त कहा जाता-अर्थात् जिसे केवल भक्ति रूपी ज्ञान ही कहा गया हो, जिसको सब केवल ज्ञान रूप में रस रूप मान केवल अपने मन से जान लेते बस वही रस, जो ईश्वर के रस रूप ज्ञान को सब तक तक ज्ञान रूप स्वरूप केवल भाव से युक्त होकर रहता है। जिसको सब हर समय केवल भक्ति का रस रूप ही कहते हैं, जिसे ना जान सकें तो, जिस रस बिना सब व्यर्थ, उस भक्ति रस का क्या रस? जिसे ना केवल सब रस, जो परमात्मा का स्वरूप हो, जिसे केवल केवल ही ज्ञान रस कहा, वो सब ज्ञान रूपी रस ही भक्ति कहला जिसके रूप को केवल ज्ञान रस कहा, समझे? जिसे ना रस से ही कह, जो केवल ज्ञान रूप ही माना जा सकता एकमात्र केवल रस रूप ही कह सकते! जिसे ना रस ही ना कह, जिसे केवल केवल ना केवल रस समझा जाए बल्कि रस ऐसा रूप हो, जो हर प्रकार ज्ञान से युक्त ही केवल ज्ञान! जिसे ना केवल केवल सब प्रकार से हर ज्ञान रूप ज्ञान को ना जान कर सब ही परमात्मा के रस स्वरूप का रस जान सके वास्तविकता-पूर्ण रस केवल, केवल ना रस रूप केवल ही केवल भाव ज्ञान रूप से ही जान कर सकते, जिसे ना केवल सब रूप से सब रूप ज्ञान कहें सब रस को जान केवल ना रस ही ज्ञान रूप रस को ना ही जान कर सब ही रस मान लें, जो ज्ञान केवल ज्ञान का रूप सब ज्ञान केवल ज्ञान ही सब ज्ञान रूप रस को जान कर ना केवल रस, जिसे केवल ज्ञान रूप ज्ञान मान रस समझें, जिसे सब केवल ज्ञान ही रस ना मान जान सब रहें, जिसे केवल रस ही ना मान कर सब केवल ज्ञान रूप सब जान ज्ञान सब केवल कहें, जिसे सब केवल केवल ज्ञान इसलिए केवल सब ज्ञान स्वरूप ही ना रस का रूप कहलाए, जिसे केवल ज्ञान कह दें! ना केवल ना ही, इसलिए केवल ही, जिसे सब कहें, कह भी दें! इसलिए तो रस, जिसे, केवल ना रस रूप ज्ञान केवल कहना केवल केवल ही केवल ज्ञान कहें? या केवल ज्ञान केवल ना केवल केवल ज्ञान केवल केवल ही कहें? केवल रस ही कह कर केवल, उस रस रूप रस को केवल ना रस, केवल ज्ञान केवल कहना ही! ना केवल केवल स्वरूप ही कह दिया, सब केवल ज्ञान रस सब जान केवल ही केवल ना कह लें, ना सब केवल ज्ञान स्वरूप, ज्ञान सब केवल ही केवल स्वरूप केवल केवल जान कर उस रस स्वरूप ना स्वरूप ही ना कह दें? जिसे केवल ना 1 मान जान केवल ना ज्ञान केवल हो, जिसे केवल ना 2 मान कर जान केवल हो, ना केवल ना सब ना केवल ही केवल कहें? ना ज्ञान केवल ही ना रस है, जिसे केवल ज्ञान ही ना रस ज्ञान ही कहा हो, रस-रूप केवल, स्वरूप, केवल ही केवल रस ही रस केवल रूप स्वरूप केवल केवल ही ज्ञान रूप ज्ञान केवल ना ज्ञान ज्ञान सब ही कहलाए केवल, जिसे रस, केवल रस, ना ज्ञान कह कर, सब रस रूप से ही रस स्वरूप ही जान स्वरूप ही स्वरूप ना ज्ञान ना ज्ञान कह, ना स्वरूप का रूप ज्ञान स्वरूप ज्ञान केवल स्वरूप ना ज्ञान कह 137

□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□, □□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□, □□□□□□ □□□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□, □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□, □□□□□□ □□□ □□□, □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□, □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□... □□□□□ □□□□□ □□□, □□□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□-□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□--□□□□□□, □□□□□, □□□□, □□□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□, □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□□□□ □□ □□□□! □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□, □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□? □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□, □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□? □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□? □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□? □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□, □□□□ □□ □□□□, □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□? □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□? □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□, □□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□, □□□□□ □□ □□□□ □□□□! □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□! □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□! □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□, □□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□! □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□, □□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□! □□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□-□□ □□□□ □□□□□□□ □□, □□□□ □□ □□□□□□□ □ □□, □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□, □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□! □□□□! □□ □□□□ □□□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□? □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□, □□□□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□-□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□, □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□□-□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□? □□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□-□□□□ □□□□ □□□, □□□□-□□□□ □□□□□ □□□, □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□, □□□□, □□□□□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□□-□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□ □□□ □ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□-- □□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□, □□□□□ □□, □□□□□ □□, □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□, □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□, □□□□□□ □□□ □□□□-□□□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□, □□□□□□ □□□ □□□ □□ 138

The text in the provided image cannot be read because the font failed to render, resulting in all characters appearing as missing glyph boxes (tofu symbols ). Below is the literal transcription of the visible layout, punctuation, and page number:

□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□ □□□ □□-□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□? □□□□ □□□ □□□□□ □□? □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□, □□□ □□, □□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□, □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□, □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□□□□□□□□□ □□, □□□□□□□ □□, □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□? □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□□□□□, □□□□□□□□ □□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□□□□□□□□ □□, □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□, □□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□□□□□□□□□ □□, □□ □□ □□□□□□□□□□□□ □□, □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□--□□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□--□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□□; □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□, □□□ □□□□□□□□□□□□ □□□□ □□□, □□□ □□□□□□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□, □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ ( □□□□), □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□ □□ □□□□□□ □□, □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□, □□□□□ □□, □□□□ □□, □□□□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□, □□□□ □□□□□, □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□? □□□□ □□□□ □□□□ □□? □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□? □□□ □□ □□□□□□□ □□□□□? □□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□? □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□-□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□, □□□ □□□ □□□□, □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□-□□□□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□, □□□□□ □□□□ □□□□□-□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□, □□□□□□□□ □□□□□ □□□ ( □□), □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□, □□□□, □□□□, □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□, □□□□ □□□□, □□□□ ( □□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ ( □□□ □□)! □□□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□! □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□, □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□, □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□ ( □□), □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□, □□□□□□□□□□□□□□ □□ □□□, □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□ □□, □□ □□ □□□□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□, □□□□□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□ □□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□? □□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□□? □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□, □□□ □□□□ □□□ □□□ □□, □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□, □□□□ □□□ 139

कथा समाप्त कर जब पंडित सुखदेव अपनी घर की ओर चले तो देखा, कि केवल दो चार जन पीठ पीछे चले आते हैं। वे तो सब इस बात को भली भांति जानते थे। परन्तु इन चार पांचों सज्जनों को ऐसी अमूल्य कथा सुनकर बड़ा विस्मय और आनन्द हुआ था, जिससे सुखदेव जी चले, तो इन चार पांच ने कहा, पंडित जी! कृपा कर यदि आप कुछ दिन इस कथा का विचार हमें भी सुना दें तो बहुत ही हम पर कृपा होवेगी, पंडित जी बोले कि इस बात का अधिकार सब लोगों कोनहीं पर जो जन प्रेम पूर्वक भगवान् की ओर मन फेरें, और शास्त्रोक्त नियमों द्वारा अपने मन को उस ओर लगावें उनको ही, इस विचार शास्त्र का, ज्ञान हो या विचार हो सक्ता है। सो तुम लोग घरबार छोड़कर साधु होने का यत्न करो, जिससे मुक्ति मिले वा इस कथा का लाभ मिले? सो अब तुम इन कथाओं द्वारा कुछ तो भी लाभ हुआ? क्या हुआ, लाभ न हुआ? पंडित जी! ज्ञान लाभ हुआ। परन्तु हम तो गृहस्थी हैं। यदि आप कहें तो हम ज्ञान पावें, जिससे सब काम काज करते हुये मुक्ति पावें। सुखदेव जी बोले केवल ज्ञान शास्त्रोक्त वा बड़े महात्मा पुरुषों शास्त्रार्थों से मुक्ति का अधिकारी हो सकता। सुखदेव बोले ज्ञान? कैसा ज्ञान यह तो केवल कथा को तो सुख पूर्वक कही कि जिससे जो मनुष्य कथा सुने उस को कुछ लाभ होना चाहिये--ज्ञानियों को कथा क्या सुने, जब ज्ञान से मनुष्य पारलौकिक सुख पायेगा, फिर कथा से क्या? सुखदेव जी बोले अच्छा तुम चलो, कल से ही विचार! कल को, चार! सज्जन पंडित जी का उपदेश, जिस से मुक्ति प्राप्त होती सुखदेव उपदेशक, चार-पांच गृहस्थ जन विचार सुनने को आये, जब इन को ज्ञान का उपदेश हो रहा था और वे सब बड़े ध्यान से ज्ञान कथा सुनते ही विचार रहे, सुखदेव बोले यह संसार माया जाल क्या सुख इस संसार का है, सो विचार विचारने से ज्ञान होगा। तब पहला सज्जन बोला, तो महाराज! मुक्ति किस प्रकार हो? क्या कर्म द्वारा मुक्ति होगी? क्या कर्म निष्काम निष्कर्म कर्म से मुक्ति होगी? कर्म सब करते संसार धर्म काम सब ही निष्काम कर्म अपने कर्तव्य कर्म अनुसार भगवान् अर्पण करें? फिर महाराज जी ने कहा--कर्म सब छोड़ देने चाहिये सब ही पापो का रूप हैं, कर्म सब ही बन्धन शास्त्रोक्त कर्म भी पाप रूप ही ज्ञान के बिना सब अविद्या जाल जिस से आवा-गमन बन्धन सब जीवात्मा भोग रहे हैं, सुखदेव बोले केवल संन्यासी होगा? अब दूसरा जन बोले सुखदेव जी यह बात, सब लोग विचारने योग्य समझें, सब लोग अपना कर्म त्याग संन्यासी अथवा संन्यासी ज्ञान को सब त्याग दें, सुखदेव बोले हां, त्याग धर्म सब से श्रेष्ठ है, सब त्याग ही मुक्ति है, केवल संन्यासी ही मुक्ति है, दूसरा विचार सब मिथ्या है। सो चारों सज्जन उस दिन ज्ञान सुखदेव जी द्वारा सुन कर अपने घर गये। दूसरे दिन प्रातः, इन सबने अपने अपने घर में सब प्रकार का भोजन बना कर सुखदेव जी के निवास पर जा कर थाल बड़े प्रकार सजाये भोजन सुखदेव जी के आगे रख सब अपने ही हाथ से खिलाने लगे और सुखदेव जी बड़े प्रेम से खा रहे थे, तब उन चारों में पहले जन ने कहा कि हे महाराज जी, आप ज्ञान द्वारा उस निराकार ज्ञान का विचार कर भोजन जो कर रहे हैं यह सब अविद्या और माया जाल का साधन है, यह ज्ञान-वान् पुरुषों द्वारा निषिद्ध कर्म केवल इस ही बात द्वारा सुख भोगने रूप यह कर्म रूप पाप, ज्ञान का विरोधी है। सो भोजन का त्याग होना चाहिये यह सुन सुखदेव जी बोले, कि भोजन का त्याग केवल प्राण त्याग रूप पाप कर्म का ही कारण बन कर पाप रूप ज्ञान है, ज्ञानवान् तो सब पदार्थों को खा कर केवल उस द्वारा ही ब्रह्म ज्ञान का अधिकारी बन सकता क्योंकि त्याग तो केवल मन का ही है। उन्होंने फिर कहा महाराज जी भोजन शास्त्रोक्त मर्यादा से यदि त्यागें, तब भगवान् का ही भजन वा ज्ञान रूप मन में ध्यान लग कर मुक्ति होगी? त्याग भी धर्म, वा अधर्म नहीं! संन्यासी केवल ही संन्यास का स्वरूप ही स्वरूप। सो ज्ञान केवल कथन मात्र सब संसार केवल इस संसार ज्ञान विचार मात्र ही का केवल दो स्वरूप हैं, पहला तो ज्ञान! दूसरा शास्त्रोक्त नियमों का, संन्यासी त्याग केवल ही, सब संन्यास मात्र विचार, सब ज्ञान चर्चा, सब संन्यासी विचार

140

भाग 8 (पृष्ठ 141-154)

The text in the provided image cannot be transcribed because the font is corrupted/missing, causing all characters to render as empty rectangular placeholder boxes ($\square$). Only punctuation marks and the page number (141) are visible.

▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯--▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯! ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯! ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯▯ ▯▯.▯▯ ▯▯! ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯! ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯? ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯ ▯▯▯! ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯--▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯; ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯-▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯? ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯, ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯? ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯ ▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯▯▯ ▯▯, ▯▯▯▯ ▯▯▯ ▯▯▯▯▯▯ ▯▯▯▯▯ 142

इस प्रकार वह सब विचार परस्पर कर ही रहे थे कि इतने में किसी का रोने का भयानक स्वर सुनायी दिया। कौन रो रहा? किसी पर उपद्रव आया क्या? कोई पीड़ा भोगनेवाला प्राणी या विपत्ति का शिकार बना हुआ? सब स्तब्ध होकर उठे, सब साथी उस स्थान पर पहुंचे जहां से वह रोने का स्वर सुनायी दिया, देखकर वे अवाक रह गये कि उनका साथी चन्द्रदेव न वहां था न उस वन में था और न उस वृक्ष पर जिस नीचे सभी साथी एकत्रित हो रहे थे। सब कहने लगे कि यह भयानक चीत्कार हमारे उस देश- दूत साथी का था, उस समय चन्द्रदेव का निवास उस भयानक वन में नहीं था जहां वह विचार कर रहे थे। सभी साथी अब विवश थे। चन्द्रदेव तो जब वन में गिरा था तो उस समय वह कुछ समय ले--टा रहा। होश में आते ही वह उठने लगा, देखा कि भयानक अन्धेरी निशा थी, विशाल वृक्ष आकाश चुम्बी खड़े थे, जिनमें घने पत्ते तथा फूल लदकर सघनता फैला रहे थे। इसके अतिरिक्त वनस्पति का विस्तार इस प्रकार फैला हुआ था कि पग धरने का मार्ग नहीं था, पर जाना तो उस दिशा में था जहां से प्रकाश की किरणें आ रही थीं। उसने देखा कि कोई-सा दीपक दूर चमक रहा था। उसने मार्ग न पाकर, या मार्ग खोज-खोजकर आगे कदम बढ़ाना आरम्भ कर दिया। वह जहां-जहां मार्ग खोज रहा था वहां-वहां कांटे तथा हिंसक पशु विचरते दिखाई दिये। कांटों ने उसके तन को बींधना आरम्भ कर दिया था? पग-पग आगे बढ़ने लगा। पग-पग पर उस भयानक झाड़ी में, जहां-जहां भी पांव पड़ता था वहां-वहां कांटे ही कांटे पग में चुभते थे। अपने पगों में से कांटों को निकालने लगा। जहां-तहां से रक्त बहने लगा था। इन कांटों से व्यथा बढ़ गयी, शरीर का रोम-रोम, केश-केश पर भी पीड़ा व्याप्त होकर टीस उठने लगी, तभी, उसने उस कांतारमय वन में कह दिया! कोई दया करो मुझ पर। इस वन में सब प्रकार संकट झेलता हुआ मैं निराधार होकर पड़ा हुआ हूं। कोई तो आ कर मुझको इस वन से निकाल कर मेरा उद्धार कर दो, हे दयावान्! कृपा करो मेरे ऊपर। इस संकट से मुझे बचाओ! उस का यह रोना-चीत्कार, इस वन में सब ओर गूंज उठा। सब ही विह्वल हुए, कांप-कांप उठे, पर आ न सके। क्योंकि वे सब अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे। पर चन्द्रदेव विवशता से रो रहा था। सुनो! कोई दया का भण्डार दयालु बन कर आ जाओ! इस भयानक कांतार वन से मुझे निकालो। मुझ पर दया कर इस संकट से मुझे बचा लो। चन्द्रदेव कहता था? मुझ पर कृपा करो, मुझे इस भयानक कांतार से बचाओ! सब कह रहे थे, तू अपना धीरज न छोड़ना! कोई न कोई शक्ति इस ओर आ ही रही होगी! वह सब ही चन्द्रदेव का सहारा बनने का यत्न कर रहे थे! वे सब ही चन्द्रदेव को दिलासा दे रहे थे। चन्द्रदेव की पुकार तो किसी पर प्रभाव नहीं डाल सकी, वह तो कांतार वन के संकट को और भी बढ़ा रही थी। चन्द्रदेव को तो कोई शक्ति उस वन से पार नहीं कर सकी! सुनो! सुनो! उस चन्द्रदेव का यह सब कुछ तो व्यर्थ प्रतीत हुआ, वह तो मृत्यु के मुख में था। "ओम्" का नाम सब कुछ-कुछ तो कह रहे थे, चन्द्रदेव के मुख से... न निकला था! चन्द्रदेव पुकार किसे रहा था? जिसने उस वाणी को जन्म दिया था, उस प्रभु को? अथवा अन्य जीवों को? उस अज्ञान को? उस अविद्या की शरण को? उस भयानक अन्धकारमय वन में जब वह, उसी समय भयंकर अन्धड़ का एक तेज झोंका आया उस भयानक वेग से वन कांपने लगा था कि भय से चन्द्रदेव कांप उठा। साथ ही तेज वर्षा होने लगी। ओलावृष्टि से वह पीड़ित होने लगा। वर्षा की मोटी-मोटी बूंदें उस पर पड़ कर पीड़ा बढ़ा रही थीं, बिजली की कड़क अलग थी, अन्धेरी निशा तो थी ही। उस पर भयानक वज्रपात भी होने लगा था, जिससे उसका हृदय कांप उठा। ऐसा लग रहा था कि अब मृत्यु आ ही गयी, वह अपने को असहाय पा रहा था। वर्षा, अन्धड़, बिजली-कड़क तथा ओलों ने उस पर भयानक मार की। उसने उस संकट में एक वृक्ष का सहारा लेना चाहा, तो वह वृक्ष भी वर्षा से भीग चुका था, उससे जल की धाराएं उस पर गिरकर उसकी व्यथा को और भी बढ़ा रही थीं। उसने उस अन्धकार में चारों ओर दृष्टि डाली, पर कोई भी ऐसा न था, जो उस का सहारा बने। वह रोता-चिल्लाता हुआ अपने प्राणों की रक्षा के लिये पुकारने लगा। तभी उसका ध्यान उस दीपक की ओर गया, जो बहुत दूर चमक रहा था। वह उस ओर देखने लगा, पर जब वह देखता, तभी घोर अन्धकार छा जाता और वह घबरा उठता था, क्योंकि वह 143

इस पृष्ठ पर फॉन्ट/एन्कोडिंग त्रुटि (Missing Font / Tofu Glpyhs) के कारण मूल देवनागरी अक्षर प्रदर्शित नहीं हो रहे हैं और केवल आयताकार बॉक्स () तथा विराम-चिह्न दिखाई दे रहे हैं।

छवि में दिखाई देने वाले स्वरूप का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण नीचे दिया गया है:

□□□ □□, □□□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□! □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□-□□ □□ □□□□□□□□□! □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□□-□□□□□ □□□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□, □□ □□□ □□□□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□? □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□? □□□ □□□□ □□□□ □□□□□□? □□ □□□□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□, □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□! □□□□□ □□□ □□! □□□□ □□□□□□ □□! □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□! □□ □□□□□□□ □□ □□□, □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□-□□□□□□□ □□□□, □□□□ □□□□□□□ □□□□, □□□□ □□□□□□□ □□□□, □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□, □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□□□! □□□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□, □□□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□-□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □ □□□□ □□ □□ □□□□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□? □□□□ □□□□ □□□□□ □□? □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□□? □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□! □□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□, □□□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□--□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□, □□ □□□□□□□□□□□□, □□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□, □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□, □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□, □□□□□ □□, □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□; □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□-□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□! □□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□□□□! □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□, □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□, □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□! □□□ □□□ □□ □□□? 144

इस प्रकार महाराज पृथुकी यह बात सुनकर सब सभा विस्मित होकर श्री राजा पृथुकी-बड़ाई बड़े प्रेम करके बारम्बार कहने लगी, कि जिसने अपनी प्रजाको सब सुखीकिया सो तो सब जगत् जानता हैपर यह बात, सब प्रजा जिसपर प्रसन्न रहे यह गुण इस महाराजहीके विषे पाया जाता, इससेअधिकक्याकहें जिस बातपर प्रजा प्रसन्न हो सो बात महाराज प्रजाको सुख देनेवाली विचारके करें इस प्रकार सब राजाके गुण गातेथेकि इतनेमें चारों सनकादिक मुनि आये सो ऐसे प्रकाशित मानों चार सूर्य्यही उदय हुएहों अथवा ब्रह्माजी के चार वेदही मूर्त्तमान हों, उनको इस प्रकारसे आये देख राजा पृथु-सहित जितनी सभाथी, जितने लोग वहांपरथे वे सब उठकरके खड़े हुए और हाथ जोड़ करके जो वस्तु भेंट धरने की योग्यथी सो हाथमें धरके चरणोंपर दण्डवतकी और कहा, हेप्रभो ! कहो कैसे? हम पर कृपा करके आयेहो सो कहो, महाराज कहिये, कुशल तो आपकी? मुनिबोले कि कुशल तो सर्व, प्रजा अपनीपर जो तू दयाल रहताहै! कुशल हमारी, जहां तुम्हारी कुशल? सो कहो सब प्रकार कुशलहै? राजा पृथुबोले सब प्रकार आपकी कृपासे कुशल? सो कहिये महाराज! सन मुनिका रूप जब यह सुना, राजा तो सब बातन योग्य, सो महाराज को! राजा पृथुकी प्रसन्नता देखके; राजा पृथुके आसन बैठके सनकादिक चार भाइयों को बिठाये; फिर राजा जो पृथुके संग आये राजा मुनियोंके चरनामृत को अपने सिर पर डारके फिर हाथ जोड़के सन मुनियों के आगे खड़े! हाथ जोड़, राजा यह बोले? प्रसन्न हो गयेहो? यह कहके दोनों कर जोड़े खड़ारहे! तब सनक जी बोले, हेराजा बहुत प्रसन्न होकर हम आयेहैं सो महाराज तुम्हारी भक्ति से प्रसन्नहैं सो तूने जो, ऐसा राजा हो कर मुनि जनन का मान किया सो सब बातन योग्य यह महाराजा का धर्म सो सब पूर्ण, पर हम यह जाने हैंकि जो ज्ञानी होय और सब जीवों पर दयालहो सोई राजा सब को सुख दाता होय, सोई राजा तू, पर हमपर कृपा जो करी सो बातन योग्य हैपर, तू ऐसा राजा दयाल सब प्रजापर; जो अपने सेवक जनपर दया राखै, अपने-आपपर भी दया राखै कृपाका पात्र होताहै सो तू, और सब प्रकार सो समर्थ होकर धर्मके कार्यमें लीनहै! राजा पृथु, राजा सगर. राजा हरिश्चन्द्र, पृथु-महाराज भये सोई, और जो जो बड़े बड़े महाराजा भये सो राजाओं का जो मान करे सो पुण्यात्मा राजा पृथुकी यह सबबातें सन मुनिकी सुनके मुनिको आसनपर बैठायके सब चरण धो, उनके चरनामृत को अपने सिर ऊपर डारके, सब सभा पर छिड़क छिड़काया पृथुकी यह विनम्रता देखकर मुनि बोले, सुनो राजा पृथु, तुम बड़े भाग्यवान् हो, सो भगवान् प्रसन्न भये हैं? सो राजा यह बोले, हे मुनि कृपासे सब बात समर्थ हो सो बातन सामर्थ्य होय, हमारे भाग्य बड़े दया जो आपकी सन मुनि बोले हम सब तो नारायणके भक्त होकर सब जगमें भ्रमण करते हैंपर जो पर दयाल हो सो जन बड़ा सो जगमें सब साधु-संतन को मान देय सोई ज्ञानी भक्त दयाल कहलाय नारायण का सो भक्तकहलाय, सो तू ऐसा दयाल सर्वपर दया, सब पर कृपा करके नारायण चरण को चित्तमें आराधनकिये दयाल भये सोई ज्ञानी सो राजा पृथुके ऐसे वचन सुन, राजा पृथु-सनकादिक मुनि जन सब मुनि को प्रणाम करि हाथ जोड़के अपने हृदय पर हाथ राखके बोला हेप्रभो, जो महाराज आयेहो सो जग तारन... को आयेहो महाराज बात हमारी ऐसी नारायण कृपासे सबबात समर्थ ज्ञानी वैकुण्ठ पधारे मुनि, एक बातन का संशय मोको निवारिये सब बातन को जानिये सब बात को जानने समर्थ हम सब संशयको निवार करके सब संशयको दूरकरो, हमारा संश मिटाइये? जो ऐसा जो सब को जानत सब, सब जानन हार, हमारा यह संशय है? इसका निवारण कीजिये मुने! सनक जी बोले, हेराजा तू, अपना सब संशय कहिये? राजा पृथुने हाथ जोड़ हाथ जोड़के कहा, हेप्रभो संसार की सब माया जगत विषे व्याप रही सोई सब जनन को मोह से बांधे अपने स्वरूपको भूल माया द्वारा भ्रमाये जीवों को संसारमें बांधे, पर, इसका कारण क्याहै? माया तो सब जगमें, माया को कौन जानै सो यह बात सुनो, मुनिराज! ऐसी मायाकी संशय दूरकरो जी, जो-जीव माया को जानै सो कैसे जानै माया व्यापत सब जीव पर यह राजा पृथुकी सुनके सन बोले, जब तू सब जान गया सो सब बातन योग्य जगत का मोह सब संतोंको सो सब मोह को त्याग करके भजे, तब मुक्ति पावैगा सो तू ऐसा ज्ञान रखके माया रूपको भी नारायणकी ही माया जानकरके भजो अब तू मायारहित होकर नारायणको ही भजकरकेसदा सुखी रहै और 145

विचारवान् पुरुष संसारके यावन्मात्र दुःखोंको उसी क्षण भूल जाता है जब अपने प्राणनाथ प्रभुका नाम प्रेमपूर्वक उसके कर्णरन्ध्रोंके द्वारा हृदयके अन्दर पहुँचकर अपना निवास बना... ॥ ओ नाथ! फिर, जब आप स्वयं मेरे पास पधारे तब फिर मुझे किसी भी बात का अंदेशा या संशय भला क्यों हो, इस बात को जाने दो, मुझे केवल यह बता कृपा करो कि इस संसार में जिस बात को सब लोग भला या बुरा कहते हैं वह भला बुरा वस्तुतः है, या नहीं? संसार केवल भ्रम ही भ्रम प्रतीत होता है, प्रभु इस भ्रम को दूर करो जिससे मुझे न संशय रहे, जिससे कि मैं सुखी होऊँ! यह सब बात सुनकर प्रभु ने कहा, 'तात! जो बात प्रभु ने कही वह तो परम रहस्य थी जिसे केवल ज्ञानी पुरुष ही समझ सकते हैं। हे भरद्वाज, इस बातको समझकर जो सो रहा है वह जागेगा कि जो कुछ ज्ञान दृष्टिसे अथवा पंच ज्ञानेन्द्रियों और मन के द्वारा इस संसार विषयक जो कुछ भी रूप रंग या गुण दोष दीख पड़ता, या अनुभव में आता प्रतीत होता ऐसा है? प्रभु बोले? सुनो हे तात, जैसे स्वप्न संसार मिथ्या होता है उस दशा, ज्ञान दशा में सत्य रूप में भास हो रहा है! जाग्रत दशा में ही, स्वप्न दशा मिथ्या हो कर नष्ट हो जाती है। स्वप्नकाल में जाग्रत संसार मिथ्या हो जाता है, जब स्वप्न समाप्त हो जाता तब, जाग्रत! संसार का सत्य रूप सामने उपस्थित! होता है। वास्तव में देखा जाये तो दोनों दशाएं एक-दूसरे को नष्ट कर रहीं हैं! इन दोनों से परे जो आत्मा है, वही सत्य है। वह, आत्माही परमार्थ रूप से सत्य स्वरूप, अपने आपको भूलने पर ही यह मोह या अविद्या रूपी संसार सत्य सा भास होता, जिससे यह प्रतीत हुआ, कि मन ही कारण है सुख या दुःखको उत्पन्न कर देने वाला या बनाने में निमित्त? कदापि! नहिं मन तो केवल एक साधन मात्र ही इस जग प्रपंच को रचने वाला सो यह बात यथार्थ सत्य रूप सिद्ध हो कर प्रकट हुई कि जीव, जिसे भ्रम हो रहा है इस बात का कि वह स्वयं दुख रूप तथा इस बात को भी जान चुका कि आत्मा सर्वदा सुख ही सुख है। सो इस से यह सिद्ध हुआ कि जीव भी भ्रम के कारण इस संसार में या दुःख में फंसा हुआ प्रतीत हो रहा है, जो अविद्या ही का कार्य है। इस लिए केवल आत्म-अनुसन्धान ही, अविद्या को दूर करने का एक मात्र उपाय हुआ अतः सर्वदा-सर्वकाल में, केवल उस एक, अपनी स्वरूप निष्ठा रूपी ही सत्य में ही लीन रहने रूपी प्रयत्न ही सब को कल्याण कर देने के उपाय में श्रेष्ठ रूप सिद्ध हुआ। क्योंकि सुख तो अपना रूप, अविद्या जन्य संशय, भ्रान्ति रूपी इस संसार में केवल भ्रम ही भ्रम दृष्टिगोचर होता रहता है। प्रभु के मुखारविन्द से इस बात को सुन कर सब श्रोतागण अति प्रफुल्लित हो, अपने स्वरूप को ही सत्य समझ, उस ओर ही लीन हुए, सबने ही प्रभुके इस परम रहस्य युक्त वचनकी भूरि भूरि ही सराहना की। प्रभु का कहना था कि अविद्या रूपी भ्रम, मनुष्य जिसके वशीभूत हो कर इस संसार सम्बन्धी, सब बातों को सत्य समझ? के सुख और, दुःख पाता रहता है। वस्तुतः, भ्रम और मन से परे आत्मा रूपी केवल आनन्द ही आनन्द मात्र ही तो है? जब इस बात का निश्चय पूर्ण रूप से मन में दृढ़ता पूर्वक हो गया तो फिर? प्रभु के इस उपदेश से सब लोग जो उस समय एकत्र थे तृप्त होकर परम आनन्द को, प्राप्त हो गये, भगवान् रामचन्द्र जी की जय जय ध्वनि से गगन, उस समय गुंजायमान होने लगा, अनेक प्रकार के वाद्य उस समय बजने लगे! इस प्रकार विचार कर संसार से परे उस परमात्मा को ही सबने अपना जीवन का मुख्य ध्येय बना कर निश्चय किया, सो ही इस संसार में सब बातों से बड़ा कर्तव्य सब जीवों का परम कल्याण कर सकता जिससे जीव मुक्त होकर, परमेश्वर स्वरूप, सनातन स्वरूप, सर्वव्यापक सच्चिदानन्द घन को प्राप्त करने का यत्न कर सके। हे भरद्वाज जी, भगवान् रामके परम पद, उस दिव्य रूप को जो कोई भक्त निरन्तर अपने मन ध्यान द्वारा, प्रेमपूर्वक धारण करता रहेगा, उस व्यक्ति विशेष रूपी सब संसार सागर से पार निकल जाना, केवल भगवान् रामके चरणोंमें ही मन लगाने मात्रसे सहज होगा। केवल दो ही अवस्था हैं संसार में, अज्ञान रूप तो, यह जग है, और एक मात्र भगवान् ही स्वरूप रूपी कैवल्य, केवल रूपी ज्ञानका, ही नाम है। जिस को जान कर मनुष्य मुक्त

इस प्रकार व्यापक स्वरूप आत्मा को जो जानकर उस का स्मरण करता रहेगा, वह सर्वव्यापक प्रभु, उस जीवात्मा साक्षात्कार को उपलब्ध होगा, सो निष्काम हो कर प्रभु सम्बन्धी विचार करके, जो कि सब पाप तथा अन्य प्रकार क्लेशों का नाश करने वाला है, मन तथा सब इन्द्रियों सहित मन, आत्मा सम्बन्धी सर्वोत्कृष्ट आनन्दमय रस को पान करने वाला होगा सो उत्तम गति रूप मोक्ष को प्राप्तकर्त्ता तथा सर्वव्यापक को ही एकमात्र आश्रय रूप मान कर मोक्ष सुखमय सुख भोगेगा! अब आत्मा शुद्ध है, इस को जो निष्कामभाव साधना करता रहेगा, वह आत्मा का साक्षात्कार करेगा सो, उस का साधन यह, कि जो अज्ञान जनित क्लेशों रूप मलों का निवारण कर उस शुद्ध ब्रह्म रूप परमात्मा को, जो निष्काम होकर सर्व कर्मों का फलदाता परमात्मा की उपासना में प्रवृत्त है, सो परमात्मा तथा आत्मा सम्बन्धी ज्ञान के विषय विचार में प्रवृत्त होगा, सो ही मुक्ति लाभ करेगा, इस प्रकार का आचरण करेगा, सो ही सुख लाभ करेगा सर्वदा इस ही का आचरण सब को करना योग्य कर्तव्य, सब विद्या का विचार करके मोक्षार्थ--ज्ञान का आचरण सब जन करें॥ सो यह उपासना के रूप ज्ञान द्वारा न ही प्राप्त होता है, यह ज्ञान-कर्म का फल जीवात्मा प्राप्त करता है, इस का भी ज्ञान जीवात्मा द्वारा होना चाहिये सो जीवात्मा के लिये क्या रूप वा गुण जीवात्मा स्वभावतः रखता, जानता वा धारण करवाता; जीवात्मा स्वभावतः अज्ञानवान्, परमात्मा के सदृश सर्वज्ञता का न ज्ञान रखता वा रूप तथा अन्य गुणों का जीवात्मा सम्बन्धी जानता, परमात्मा के समान सर्वव्यापक वा सब प्रकार प्रकाश वा प्रकाशक स्वरूप का प्रकाश वा सब को प्रकाशित करने की शक्ति का रूप जीवात्मा द्वारा प्रकाश स्वरूप का प्रकाश वा ज्ञान हो सके प्रकार का प्रकाश ज्ञान उस को प्राप्त होवे, जो जीवात्मा स्वभाव से विद्या रूप वा अविद्या रूप स्वभाव सम्बन्ध द्वारा प्राप्त होता, विद्या-अविद्या, दोनों-प्रकार रूप अविद्या द्वारा तथा ज्ञान जो कि परमात्मा का स्वरूप उस द्वारा ज्ञान को प्राप्त होवे, तब स्वरूप प्रकाश का ज्ञान या रूप उस ज्ञान का जीवात्मा को, प्रभु की शरण से, उस का स्वरूप रूप विद्या क्या, विद्या-अविद्या, विद्या-अविद्या से युक्त जीवात्मा कब तक? प्रभु की गति को जो सम्मुख कब तक? प्रभु का रूप या नाम या पदार्थ किस रूप में सब तक? विद्या कब तक, अविद्या कब तक ज्ञान से पृथक् हो कर प्राप्त हो कर रहे? अविद्या का क्या रूप? ज्ञान द्वारा जीवात्मा का? रूप ज्ञान द्वारा उस का रूप वा स्वभाव क्या? सो सो सम्मुख ही सम्मुख या जीवात्मा रूप परमात्मा ज्ञान द्वारा उस जीवात्मा स्वरूप का साक्षात्कार हो, विद्या रूप ज्ञान का रूप ज्ञान, जीवात्मा का ज्ञान या, उस का ज्ञान या, विद्या का प्रकाश जीवात्मा रूप ज्ञान जीवात्मा का रूप या ज्ञान प्रकाश उस का स्वरूप रूप, विद्या सम्बन्धी या, विद्या प्रकाश स्वरूप रूप का ज्ञान रूप परमात्मा की सत्ता द्वारा उस जीवात्मा रूप ज्ञान ज्ञान रूप परमात्मा ज्ञान द्वारा, उस ज्ञान प्रकाश रूप में सब को सम्मुख हो प्रकाश स्वरूप, प्रकाश का, प्रकाश जीवात्मा सम्बन्धी ज्ञान रूप प्रकार का रूप ज्ञान स्वरूप, प्रभु विद्या प्रकाश रूप ज्ञान द्वारा ही ज्ञान द्वारा प्राप्त हो सम्मुख होकर उस ज्ञान रूप द्वारा उस रूप को! उस प्रकार प्रभु का, उस रूप प्रकाश का प्रकाश ज्ञान रूप ज्ञान रूप, उस की सत्ता रूप ज्ञान का ज्ञान ज्ञान रूप ज्ञान हो हो! जीवात्मा रूप को जीवात्माओं का जीवात्मा रूप जीवात्मा ज्ञान का ज्ञान का ज्ञान रूप ज्ञान का ज्ञान वा जीवात्माओं को सब का ज्ञान का ज्ञान या सब रूप ज्ञान जीवात्मा स्वरूप जीवात्मा का रूप ज्ञान जीवात्मा का जीवात्मा रूप ज्ञान का ज्ञान रूप ज्ञान प्रकाश, जीवात्माओं का रूप! जीवात्माओं ज्ञान विद्या का, उस प्रकार ज्ञान का ज्ञान रूप, उस का ज्ञान रूप सम्मुख हो कर ही ज्ञान का ज्ञान ज्ञान रूप का ज्ञान रूप जीवात्मा का या जीवात्मा का न ही या सब प्रकार ज्ञान जीवात्मा विद्या रूप रूप का स्वरूप रूप रूप का रूप से प्रकार का प्रकाश उस का हो सके, सो ज्ञान ज्ञान का ज्ञान रूप रूप का ही जीवात्मा का ज्ञान ज्ञान रूप ही हो ज्ञान ज्ञान का प्रकाश ही का ज्ञान रूप उस जीवात्मा का जीवात्मा रूप जीवात्मा का ज्ञान का ज्ञान का ही रूप ही रूप ज्ञान जीवात्मा का जीवात्मा जीवात्मा ज्ञान विद्या ज्ञान जीवात्मा का 147

चोट का नाम सुनते सुनते सब को कादम्बरीके स्मरण का बड़ा भय लगा और महाश्वेता मारे शोकके गिर पड़ती थी, रोती! बड़े कष्टसेउसने मन को धीर करके रोना छोड़ा चन्द्रापीड़ कहने लगा, सुनो प्रिये, सुनो सब लोग! महाश्वेता को शाप देकर उसने जब दूसरा शरीर धरा तो यह चन्द्रापीड़ भी मर गया था पर इसका रूप ऐसा नहीं बदला था, बल्कि तन पर कान्ति बची, कांति का रूप ऐसा दिव्य था जिसके बलसे इस का शरीर अब तक बना रहा। सब को भय था कि--इस प्रकार रूप का नाश न, किसी का जीव लौट सकता--इस विचार सब शोक को छोड़ कर बैठे, आगे को देख कर जो कुछ हुआ सो सब वृत्तान्त ऊपर कह चुका हूँ। केवल यह, केवल यह, जो कुछ भी इस देह बारे कहूं थोड़ा क्योंकि जब इसके शरीर छूटे तो सुख का रूप बना व कान्ति का प्रकाश इस प्रकार था, कि उस देहने सब को फिर जीवन किया था। इसके पर सब के सब जो इस बात को सुनते विस्मय में आ रहे थे, तारापीड़ बड़े स्नेह और विस्मयके प्रभाव बड़े ही प्रेम से कादम्बरीको देख कर उस को छाती से लगाया विलासवती ने प्रेम से पुत्र की माता को गले से लगा कर, प्यार कर के उस को मुख बार बार चूमा। महाश्वेता ने पूछा कि क्या यह सच है? चन्द्रापीड़ ने कहा, यह सब सच है। रानी जी, सच तो यही व इससे अधिक आश्चर्य यह बात हुई। पुण्डरीक भी लौट कर फिर आ गया है, पर उस को कपिंजल अभी रोके, केवल यह दिखलाने लिये गया हैकि उन के पिता श्वेतकेतु अपनी तपस्याके प्रभाव से दोनों कुमारों सहित यह सब सुख देखें, जिस से उन का चित्त प्रसन्न हो।इस से चन्द्रमा का रूप पहले चन्द्रापीड़ फिर उसी प्रकार हुआ। दोनों ओरके चारों महाजनों सहित सब को बड़ा आनन्द हुआ और उस बात के होते ही, तारापीड़ ने उस बड़े भारी दलको चलने कीआज्ञा दी।वे लोग सब आदर से चले। चन्द्रापीड़ ने जब तक वहां का काम देखा तब तक अछोद सरोवरपर ठहरा। वहां रुकनेपर, तारापीड़ ने तारापीड़ के आज्ञाकारी को आज्ञाकारी दल की बात कही सब लोग वहां से चल कर, राजा तारापीड़ के पीछे के लोग, सब तारापीड़ के साथ ही साथ चले। बाकी के लोगों ने जो कुछ कहा था सो सब ठीक हुआ, राजा तारापीड़ को यह सब सुख उज्जैनी नगरमें, उन दिनों मिला जब कि वे लोग सब-- बात वहां कह कर अपने सुखका दम लेचुके, तारापीड़ के साथ सब लोग उन के--नगर पहुंच गये। तारापीड़ ने उज्जैनी नगरमें पहुंचकर जो आनन्द देखा कादम्बरी के मन मेंआया कि, रानी तो यह बात जान-बूझ कर पूछती हैं? शुकनास मन्त्री हैं? राजा जी देवता? स्वयं राजा विलासी हैं? रानी मनोरमा माता हैं? रानी की आज्ञा कैसी? उसने कहा, किससे? सब तारापीड़ के चरणों प्रणाम करतीहूं, जिस तरह आज्ञाकरेंगे, वैसा सब लोग करेंगे। चन्द्रापीड़ ने कहा, तू कैसी बात? उसने कहा तूतो सब जानतीहै किइन सब के आगे लज्जा उत्पन्न होती है। इसी तरह सब के आगे बात करने को लज्जा आती है, फिर तारापीड़ और उन की, रानी के आगे यह बात कहना, कि मैं विवाह कराती हूं? सब को मालूम ही सब को इस बात कीलाज आतीहै, केवल तुझेही, केवल को छोड़ कर। कादम्बरी कहने लगी बात सुनो, क्यों ना होवे? जब सब लोग ही आ रहे हैं, तारापीड़ को छोड़ कर कोई न रहा, राजा लोग भी सब हैं, तो विलासवती का मनसब सब को बुलाने लगा। फिर तारापीड़ ने रानी को कहा कि जब सब लोग आवेगे तब न? तारापीड़ राजा ने कहा कि, राजा लोग सब आये हैं। क्या कोई न? तारापीड़ ने सब बात की आज्ञा दी, जिस प्रकार से सब का आदर हुआ, रानी तारा के मन में बात आईकि तारापीड़ ने सब बात कह दी। अब विवाह न? तारापीड़ ने सिर झुका कर कहा कि हां क्यों न? तारापीड़ के मन आदर भरा थाकि यह सब क्यों न? सब लोग अपने अपने काम में लगे थे, राजा लोग खड़े रहे थे, किसी किसीने काम कर दिया। इसके पर ही सब लोग आ कर उस सुख--स्थान बैठे! जिस को देखकर सब प्रसन्न व सुखी, राजा लोग! रानी लोग सब बैठे। रानी तारापीडने कहा कि, आज सब को इस बात का आनन्द हुआ जिस कावर्णन लोग कर ही सकते थे, आज हम को इस बात का ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ जिस का नाम सुनकर स्वर्ग भी हार गया।सब लोग प्रसन्न होकर उस के गुणको गाने लगे। 148

पाप का परिणाम दुख मिलता ही है। जिसे सुखद जीवन जीना हो, उसे सदा शुद्ध भावों रूप ही रहना या मन का रूख करना सदा, जो कभी भूल कर पाप कर्म न करो, तब समझो न कभी, दुख कभी न भोगना पड़ेगा। पाप कर्म के फल से ही संसार का हर प्राणी संतप्त या परेशान है। अतः प्रत्येक भावुक को पाप से सर्वदा बचते अहिंसादि, अहिंसक भाव रूप आचरण तथा वचनों रूप नियमों का पालनपूर्वक, सुमार्ग अपनाना चाहिए। पाप से जो विरक्ति रूप भावों धारण कर लेता वह सुख पाता हुआ दिखाई देगा, जो पापों रूप कर्म का कर्ता, वह कभी सुखी? रह ही नहीं सकता यह कथन भी सत्य। दया का भाव प्रत्येक मानव में ही नहीं बल्कि संसार के हर जीव मात्र प्रति हो, दया का भाव यदि मन में नहीं बन रहा हो, दया के नाम मात्र से भी नहीं रहा हो, कोई भी कार्य दया से युक्त नहीं कर रहे हों अनाचार रूप ही आचरण हो, जिसे तन मन धन द्वारा भी किसी प्राणी को कष्ट पहुंचे या सताया गया उस समय किए जाने वाले कर्म अवश्य भयानक ही फल के भागीदार होंगे। दया स्वभाव ही आत्मा स्वरूप, आत्मा को समझना दया का अपनाना ही आत्मभाव का ही अपना रूप, आत्मा ही, ज्ञान--दर्शन सुख--वीर्य का धारी ही आत्मभाव का रूप है। दया स्वभाव धारण अपनाना, त्याग अपनाना, तप का ही अपनाना ही आत्मा का रूप होगा, पर-भव को सदा भव्य रूप से ही बना लो, भव्य ही वही जो जीव, भव्य ही भव-भवन्तरों का सुधारने का रूप, मन को अपने वशी भूत ही रख सदा भव्य रूप बन सकेगा, अनाचार विषय के रूप रस गंध को, त्याग कर सदा ज्ञान रूप बन कर आत्म रूप को ही पा लो यह मन भी, कभी कषाय भावों अनाचार का रूप बन ही नहीं रहा हो तो आत्मा भव्य ही होगा, पर भव सुधर अनाचार के हर रूप का निवारण कर लेगा। संयम रूपी नौ, जो संसार के भ्रमण से पार कर मोक्ष रूप तट-बंध तक ले जाने का काम करती संयम को सदा मन वचन काया द्वारा भव्य ही जीव-भव भव्य बनने का काम करता यह कभी संयम कर्म के कारण ही आत्मा पर से भारी, पाप रूपी, अशुद्ध भावों का रूप नष्ट हो सकता ही अशुद्ध विचारों का त्याग, जो मानव संयम धारण कर उस भाव रूप संयम करता रहे, उसी रूप ही कर्मों नाश संभव बना ही रहे! जो भव्य रूप के साक्षात ज्ञान प्राप्त अध्यात्म का रूप, पाप- रूप कर्म-पुद्गल को भस्म करने में जो अनाहत आवाज स्वरूप ही ज्ञान के प्रकाश से प्रकाश के प्रकाश का नाश ही सदा ही होगा, जो उस रूप केवल स्वरूप ज्ञान है। आत्मस्वरूप धारण जिसने सदा किया अनाहत ज्ञान प्रगट ही सदा रहा जान लो, वह जीव सदा केवल ज्ञान ही सदा पाता रहेगा, संसार का नाश रूप ही, ज्ञान स्वरूपता से ही प्रकाश रूप ज्ञान ज्योति सदा बनी ही रहती। अतः, विषय वासना विकट भाव रूप जो दुर्धर विपाक रूपी कर्म के कारण विकट अनाचारों उत्पन्न ही सदा रहा आत्मा को, संसार रूपी सागर कभी शांत नहीं रहा या शांत हो भी कैसे जब अनाचार का रूप संसार को जब तक मिटाया न गया हो जन्म मरण का भाव सदा संसार ही सदा संसार का स्वभाव ही विकार रूप रहेगा, जिसे ही नष्ट ज्ञान रूप ही से किया गया, जो सहज शांत केवल प्रकाश का रूप सदा आत्मा में ही सदा प्रकाश रूप से बन कर सदा आत्मभाव सदा ही ही अनाहत ज्ञान प्रगट हो भव-भव दुखों का नाश कर ही तो रहा रूप है। या जो? केवल ज्ञान-रूप ज्ञान सदा ही बन रहा हो तो उस जीव का ही मोक्ष का मार्ग बन रहा, जो भव-भवन्तरों का नाश कर ही डी.एस.जैन का यह कथन ही ज्ञान रूप बन सदा भव्य जीव को ही व उस ज्ञान भाव रूप बन कर, संसार के जन्म मरण कष्ट को सदा ही दूर कर देगा। वो भव्य जीव! संसार के बंधनों से तो दूर रहता ही भव्य स्वरूप सदा आत्मा के ही ही रूप सदा बना रहेगा प्रत्येक ज्ञानी आत्मा का ही तो ज्ञान स्वरूप कहा जो हमेशा साक्षात रूप बन ही तो ज्ञान रूप स्वरूप प्रकाश करता ही अनाहत--प्रकाश का नाम, जिसे रूप ही आत्मा रूप से बन सदा भव्य ही रूप बनता रहे? आत्मा स्वरूप ही तो सदा भव्य रहेगा? आत्मा स्वरूप ही ही 149

यद्यपि इस पर सब लोग ध्यान देते अथवा नहिन किन्तु यदि कोई इस बात पर चेत करेके देखे, तोभी बहुत कठिन कि जब सब के सब मनुष्य दुराचारिता ही के काम को करेंगे व मत के काम कोई नहिं मानेंगे और किसी प्रकार की हानि वा दुःख किसी को नहिं होगा तब वे कहेंगे कि मत के काम से वा ईश्वर के भजन से क्या प्रयोजन व्यभिचार आदि काम सब ही के मत में बडे पाप हैं, जैसे कि चोरी वा हत्या है, सो जब ईश्वर इस पाप का कुछ दण्ड नहीं देता तो हम भी इस पाप को क्यों छोडे जिस से सब प्रकार का सुख होता है सो ऐसा न समझना कि ईश्वर कुछ नहीं देखता वह सब कुछ देखता है, क्योंकि वह सब कुछ जानता है सब के कर्मों को, तो वह नित्य न्याय करने वाला भी है, दण्ड भी देगा! सो ऐसा न हो जाय कि तुम परमेश्वर के न्याय को भूल जाओ व्यभिचार रूपी अन्धे-कूप में पडे रहो और उस से फिर कोई रक्षा न कर सके इस के सिवाय, व्यभिचार का दृष्टान्त रूपी सत्य न्याय अन्धे-कूप जैसा होता कि जिस में कोई गिर पडे तो वह उस कूप रूपी गढ़े में सुख-रूप अपने को ही जाने तथा कभी भी उस से निकल न सके और यदि कोई, सत्य ज्ञान-रूपी पुरुष आवे और उस को उस कूप से निकाले भी, तथापि वह उस की, बात को न सुने वा न ही उस उत्तम पुरुष को जाने कि जो उस का मित्र है वा सुख का दाता पर-मेश्वर सब को उत्तम ज्ञान का देने हारा तथा सब का सब से बडा सच्चा मित्र वा हित का करने वाला है उस व्यभिचारी को अनेक रीति से ज्ञान भी देता है तथा उस के पापों की रक्षा का उपाय भी करता है और सब प्रकार से सुख भी देता है परन्तु वह अन्धा उस ज्ञान को सत्य नहीं मानता जो सत्य मार्ग को बतलावे, जैसा कि कोई अन्धे को कूप से बाहर ले जाने के लिये उस का हाथ पकड-कर ले चलना चाहे परन्तु अन्धा उस का साथ न देवे और उस से छूट कर फिर अन्धे-कूप में गिर पडे वा उस को ही लाठी-डण्डा मार-कर भगा देवे, तब वह अन्धा कूप ही में रहे! ईश्वर का यह स्वभाव, सत्य दयालुता किसी के मुख को देखि के नहीं, किन्तु सबों ऊपर एक महा-कृपा रूपी सत्य न्याय से सब का पालन करता है वा सब का उपदेशक भी है इस लिये वह सब के आचरणों को देखता हुआ सब को उस के आचरण के अनुकूल फल देता है! निश्चय जानो! क्या जो कान, को बनाता क्या नहीं सुनता? क्या वह, जिस ने सब को रचा सब का कर्ता है सो सब के पापों को नहीं जानता? क्या जो अज्ञान से ज्ञानवान् करे सो अपने को अज्ञान रखेगा अर्थात् कभी नहीं, कभी ऐसा न समझना कि ईश्वर अन्धा वा बहरा वा मूर्ख है सो उस परमेश्वर के साथ धूर्तता रूपी व्यभिचार के काम को करके मत छिपो क्योंकि यह, पर-पुरुषगामी स्त्री तथा पर-स्त्रीगामी पुरुष को नित्य एक महा भयानक अन्धा कूप जिस का नाम नरक वा नरकाग्नि है उस में निरन्तर के लिये वास करने को पडेगा तथा इस न्याय से कभी न छूटेगा क्योंकि, वह ईश्वर का शत्रु है, सो ईश्वर के वचन के अनुकूल नरक में कष्ट भोगने के लिये जन्म लेता है॥ सो हे, मेरे प्यारे मनुष्यो तुम सब लोग ऐसा मत करो किन्तु परमेश्वर को जो सब का साक्षी तथा अन्तर्यामी न्याय करने वाला दयालु, सब से बडा राजा सब का उत्पत्तिकर्ता है अपने मन के अग्रे सदा उपस्थित रखो और उस के भय को नित्य रखो, सो जो उस की आज्ञा रूपी परम धर्म को तोड कर व्यभिचार रूपी पर-स्त्रीगामी अथवा पराये धन की अभिलाषा के कुकर्म रूपी अन्धे कूप में गिरेंगे वे अवश्य नरक, में गिरेंगे, कभी बच नहीं सकते क्योंकि वह सर्व-शक्तिमान् के आगे कोई बलवान् वा ज्ञानी नहीं ठहर सकता और ज्ञान-रूपी बल से उस के न्याय को कोई नहीं बदल सकता सो उस के भय में सदा रह कर व्यभिचार रूपी दुर्गुणों से सदा बचो जिस से परमेश्वर के न्याय से बच कर नित्य आनन्द भोगो॥ ईश्वर के इस न्याय तथा, दयालुता को विचार कर मनुष्य को सब-प्रकार से, सत्य-ज्ञान का यत्न सदा करना योग्य है जिस से ईश्वर प्रसन्न हो, सो उस परमेश्वर की कृपा से जो यह पुस्तक व्यभिचार के निषेध के अर्थ बनाई, सो इस को अवश्य पढ कर, प्रत्येक नर वा नारी को अपने तथा अन्य पुरुषों को उपदेश करना चाहिये, जिस से इस संसार में सुख तथा सत्य का मार्ग खुले वा ईश्वर का भजन व उस का भय सब के हृदय में स्थिर हो कर मुक्ति को प्राप्त होवे॥ 150

भगवान् हमारे मन जानता, वचन को मन अनुसार करता? पर ऐसा होता नहीं तब सब लोग अपने मन अनुसार वरदान लेते ही रहते, क्यों, किसलिए तपस्यादि कर्मफल भोगना पड़ता! केवल मनोमय वाणी सत्य तब सर्व लोग वाणी द्वारा सब काम करते; केवल कर्ममय वाणी द्वारा मनोवांछित फल प्राप्त कभी नहीं हो सकता जिससे निश्चय हुआ कि मन का मन पर कोई वश नहीं रहता, इसलिए जो मन का निग्रह करे, सो महाबली वा धीर वा तपस्वी होगा जो इस पर विचारवान् पुरुष होगा, सोचेगा कि, तपस्या करो, वा तीर्थ करो, दान पुण्य करो वा जो कुछ करो सो सब मन स्वाधीन वा वश किए बिना निष्फल वा व्यर्थ होता वा हो गया वा होगा, इसलिए मन तपस्या, दान वा तीर्थादिकों को सब लोग व्यर्थ समझ मन स्वाधीन वा, निर्मल करने यत्न करो, तब निश्चय जानो कि जो मनुष्य वा पुरुष, तपस्वी, निर्मल आत्मा, परमात्मा का दर्शन पावेगा निर्मल करे, मन न रोके, निर्मल न करे वा निष्काम तपस्या, दान तीर्थादिक, तीर्थादि स्नान, दान करके निष्फल, पाखण्डी हो लोक को ठगने वाले सब लोग पापी वा नरकगामी वा दुराचारी कहलाते, फिर उनका वा उस पाखण्ड का संशय वा भ्रम दूर किए बिना काम कभी नहीं, तब, जब तक अविद्यादिकों को दूर कर वा अपने को अविद्या से छुड़ाएगा नहीं, वा निष्काम वा निष्कपट हो भक्ति वा सब काम वा विद्या वा अविद्या--भ्रम जाल को काटे, अविद्यादि जाल को अविद्या--भ्रम जाल को काटे वा सब काम वा विद्या किंवा सब काम वा उस अविद्या भ्रम, पाखण्ड जाल, तथा विद्या ज्ञान करके नष्ट वा दूर करे, तब ज्ञानपूर्वक सब काम सदा ही बन पावे इस प्रकार मन को वश करने से सब प्रकार का संशय तथा अविद्यादि संशय आदि नाश होकर, आत्मा विशुद्ध हो जाता है। जो अविद्यावान्, कामी, क्रोधी, लोभी मनुष्य मन के वश में होकर सब कर्म करता, फिर उसी फल भोगता, इसलिए मन को वश करके सब काम करें। जब तक मन वश नहीं तब तक कोई कर्म सिद्ध नहीं होता, संशय भी बना ही रहता? इस बात से यह भी जाना गया कि कर्म पहले होता है वा ज्ञान अथवा कर्म से ज्ञान होता अथवा ज्ञान से कर्म-उपासना का फल ज्ञान, ज्ञान का कर्म--उपासना फल प्राप्त होता वा नहीं होता, यदि कहो कि दोनों का एक साथ; दोनों परस्पर एक साथ, तो नहीं; कभी कर्म पहले हो गया, तो कर्म निष्फल हो; कभी जो ज्ञानाभ्यासपूर्वक सब कर्म, उपासना बिना निष्फल सिद्ध होगी; कर्म का फल सब लोग चाहते, किन्तु अविद्या रूपी अविद्या का नाश हो कर ज्ञान, तब जो कर्म वा उपासना किया फल-दायक हो जाता वा निष्फल नहीं, जिससे कि दोनों का परस्पर विरोध वा एक साथ दोनों परस्पर वा इनका संयोग होना सिद्ध हुआ कि नहीं हुआ वा हुआ सिद्ध? हुआ सिद्ध? सिद्ध हुआ? तो इसका उत्तर यह जानना, संशय तब दूर हो सके, जिससे सब भ्रम दूर हो जावे, जिससे सब लोग एक दूसरेको समझा कर बोलें, जिस प्रकार विचारवान् निष्पक्ष हो, सच्चा न्याय करता है, वैसा न्याय करना चाहिए संशय का यह अभिप्राय कि सब पदार्थों का एक रूप ज्ञान निश्चय रूप नहीं होता वा संशय से विपरीतज्ञान बने, सो संशय को इस रूप में जानना चाहिए कि एक तो संशय का विपरीतज्ञान रूप वा अज्ञान ज्ञान वा संशय रूप इन दो दो प्रकार का ज्ञान बने, संशय का प्रकार सब पर विदित ही रहता हुआ, ज्ञान वा अज्ञानपूर्वक वा ज्ञान किए बिना वा अज्ञान जानकर वा भ्रम से ज्ञान संशय का, यथार्थ ज्ञान बने, संशय ज्ञान बना, संशय ज्ञान अज्ञान का प्रयोजक रूप न बन सके, न ज्ञान अज्ञान का, न ज्ञान अज्ञान का, न उस संशय रूप अज्ञान का प्रयोजक ज्ञान स्वरूप बने, ज्ञान अज्ञान रूप न, ज्ञान अज्ञान दोनों स्वरूप तो बने, किन्तु दो पदार्थों का ज्ञान यथार्थ वा अयथार्थ रूप से जाना जाय तब संशय का नाश रूप जो स्वरूप वह एक ज्ञान वा विद्या रूप में संशय का फल दूर हो ज्ञानरूप ही बन जाता इस प्रकार से संशय अविद्या का नाश ज्ञान से हो कर सब काम वा विद्या की यथार्थता को जान सकता अविद्यादिकों को दूर वा नष्ट कर मुक्ति को पावेगा, परमात्मा केवल वा अद्वितीय अविद्यारहित सब जीवों का स्वामी--हे सब मन के, हे सब जीवों के, हे सब जीवों तथा अविद्यावान् सब जीवों के मन स्वामी--हे सब प्राणों के, हे सब जगत् तथा अविद्यावान् संसारी जीवों सब अविद्यादिकों सहित संशय भ्रम सब दूर करो, सब ज्ञान रूप विद्या के प्रकाश से सब को ज्ञान रूप रस पिलाओ 151