फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
४२४ फलदीपिका यदि धनेश लाभेश- दोनों जहाँ बैठे हों वहाँ हों तो धन योग को वृद्धि करेंगे-कमी नहीं करेंगे। ३. यदि दूसरे और ग्यारहवें घर के स्वामी पाँचवें या नवें घर के स्वामी से सम्बन्ध करें तो विशेष धन योग होता है किन्तु यदि दुःस्थानों के स्वामी (६. ८-१२ दुःस्थान माने जाते हैं) धनेश लाभेश तथा त्रिकोणेश से सम्बन्ध करें तो वह योग नष्ट होता है। ४. यदि दूसरे और ग्यारहवें घर के मालिक बारहव घर के मालिक के साथ बैठे हों या उससे सम्बन्ध करते हों तो धन योग नष्ट होता है। ५. यदि धनकारक बृहस्पति का धनाधीश (दूसरे घर के स्वामी) से सम्बन्ध हो अथवा बृहस्पति का बुध से भी सम्बन्ध हो तो धन योग होता है। ६. यदि लग्नेश लग्न में, धनेश धन में और लाभेश लाभ में बैठा हो तो विशेष धन योग होता है। ७. दूसरे और ग्यारहवें घर के मालिक दोनों लग्न में बैठे हों तो भी धन योग है। ८. यदि उन-उन भावों में उन-उन भावों के कारक बैठे हों तो जिस भाव में कारक बैठा हो उस भाव का फल थोड़ा होता है। * सर्वेषु भावस्थानेषु तत्तद्भावादिकारकः । विद्यते तस्यभावस्य फलम् स्वल्पमुदीरितम् ॥ ९. यदि चन्द्रमा सातवें का मालिक हो कर दूसरे घर में बैठा हो और चन्द्रमा के साथ अन्य कोई ग्रह न बैठा होतो नष्ट धन गया हुआ वापस आ जाता है
- किस भाव का कौन ग्रह कारक है—या कौन से ग्रह कारक यह फलदीपिका के अध्याय १५ श्लोक १७ में बताया गया है।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२५ निर्धन योग विचार १. यदि प्रथम, चतुर्थ तथा नवम घर के मालिक ८वें घर में बैठे हों तो जन्म से ही दरिद्र होता है । २. दूसरे घर का स्वामी १२वें हो, १२वें घर का स्वामी दूसरे हो । ३. दूसरे का स्वामी बारहवें हो और बारहवें का स्वामी लग्न में और उनको मारक ग्रह देखता हो ४. पांचवें घर का मालिक छठे हो, नवें का मालिक अष्टम में हो और इन दोनों को मारक ग्रह देखते हों । ऊपर लिखे चारों योगों में जातक निर्धन होता है । विद्या विचार १. चतुर्थ में शुक्र हो तो गान विद्या विशारद होता है । २. यदि चौथे घर में बुध हो तो ज्योतिष शास्त्र विशारद हो । ३. यदि पांचवें घर में सूर्य हो या पाँचवें घर में राहु बुध हों तो जातक ज्योतिष में निपुण होता है या विष की चिकित्सा करने वाला चतुर वैद्य होता है। ४. (क) यदि दूसरे घर में सूर्य और बुध हो तो ज्योतिष विद्या विशारद हो, (ख) यदि इन दोनों ग्रहों को शनि देखता हो तो गणित शास्त्र में प्रवीण होता है । ५. यदि दूसरे गृह में सूर्य और मंगल हो तो तर्क शास्त्र विशारद हो । ६. यदि पाँचवें घर में सूर्य, बुध, शनि हों तो वेदान्त शास्त्र का अच्छा ज्ञाता हो । ७. यदि सूर्य और बुध एक साथ किसी केन्द्र कोण या लाभ
४२६ फलदीपिका में बैठे हों तो गणित शास्त्र में प्रवीण होता है। मूल में गणक शब्द आया है। इसका यह भी अर्थ होता है कि ज्योतिषी हो। ८. यदि दूसरे घर में शुक्र हो तो काव्य प्रेमी या कवि होता है। ९. यदि राहु पंचम में हो तो गूढ़ भाव जानने वाला हो अर्थात् ऐसी विद्याओं में पारंगत हो जो बहुत दुरूह हों यानी इतनी कठिन हो कि साधारणतया उनका मार्मिक अर्थ समझ में न आता हो। १०. चौथे घर में राहु हो तो माता की दीर्घ आयु होती है। ११. दूसरे घर में बृहस्पति हो तो जातक वेद और वेदान्त का अच्छा ज्ञाता हो। यदि कक या धनु या मीन का वृहस्पति हो तो अवश्य ही ऐसा होता है और ऐसे जातक का उसकी विद्वत्ता के कारण सभा, सोसाइटियों (समाज) में अच्छा आदर होता है। १२. यदि दूसरे घर का स्वामी और वृहस्पति केन्द्र या कोण में हो तो जातक विविध विद्याओं में विद्वान् हो । १३. दूसरे घर में मंगल हो तो जातक तर्क शास्त्र का पंडित हो। १४. अगर वहाँ (ऊपर के योग में) मंगल के साथ साथ चन्द्रमा हो तो जातक सूत्रों को जानने वाला हो । १५. यदि दूसरे घर में शनि हो तो जातक मूढ़ और दुष्ट होता है। वाणी १. यदि शनि दूसरे घर में हो तो जातक की वाणी स्पष्ट नहीं होती, उसकी भाषा भी शिष्ट नहीं होती । २. दूसरे घर में बृहस्पति हो या केतु हो तो चतुर और निपुण हो ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२७ ३. यदि दूसरे घर में सूर्य या मंगल हो तो जातक की वाणी प्रतिकूल हो । अर्थात् दूसरे की बात काटे । ४. चन्द्रमा दूसरे घर में हो तो जातक बहुत बोलता है । ५. दूसरे घर में बुध हो तो जानक युक्तियुक्त वाणी बोलेगा अर्थात् उसका भाषण चातुर्यपूर्ण होगा । ६. जिस जातक की जन्म कुण्डली में राहु दूसरे घर में होता है, उसकी वाणी में दीनता होती है । तीसरे भाव का विचार १. भाई बहन का विचार तीसरे घर के स्वामी, भ्रातृ कारक मंगल या मंगल के साथ बैठे हुये ग्रहों से करना चाहिए । २. यदि सूर्य, मंगल और तीसरे घर का स्वामी तीसरे में हो तो जातक साहसी और धीर होता है । ३. राहु, केतु तीसरे में हों तो जातक साहसी हो । ४. यदि तीसरे बुध हो तो मनुष्य धैर्यहीन हो । ५. यदि तृतीय भाव कमजोर हो लेकिन उसको बृहस्पति या मंगल देखते हों तो जातक के भाई होंगे । ६. बृहस्पति ग्यारहवें हो तो बड़े भाई से दुःख होता है ।* ७. यदि ग्यारहवें मंगल हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो बड़े भाई न होंगे । ८. तीसरे गृह का स्वामी छठे या आठवें हो तो भाइयों की समय से पहले मृत्यु हो अर्थात् भाई अल्पायु हों ।
- बड़े भाई से अनबन या खटपट हो या बड़ा भाई जातक की कोई हानि करे या बड़ा भाई अल्पायु हो—यह सब ज्येष्ठ भ्रातृ- जनित दुःख कहलाता है ।
४२८ फलदीपिका ९. यदि क्षत्रियों की जन्मकुण्डली में दसवें घर का स्वामी तीसरे घर में हो तो राजयोग में न्यूनता करता है (पं० जवाहर लाल की जन्म कुण्डली में दसवें का मालिक तीसरे में था। संभवतः केन्द्र या कोण में होता तो उनको जल्दी राजयोग प्राप्त हो जाता)। पंडित जी ब्राह्मण थे। पहिले क्षत्रिय ही राजा होते थे इसलिये क्षत्रिय कहा। १०. यदि दूसरे और तीसरे घर के स्वामी एक साथ बैठे हो तो जातक उदार होता है। ११. दूसरे और तीसरे घर के मालिक से शनि का सम्बन्ध हो तो मनुष्य बहुत लोभी होता है। १२. यदि तीसरे घर का मालिक छठे, आठवें या बारहवें तो भाइयों की मृत्यु हो। अर्थात् वे अल्पायु हों। यदि वहां (छठे, ८, वें १२वें) शुभ ग्रह से युक्त तृतीयेश हो तो भाइयों की मृत्यु करावेगा किन्तु दीर्घ काल के बाद। चतुर्थ भाव (वाहन) का विचार १. यदि चौथे और नवें घर के स्वामी लग्न में हों तो यह भाग्य वृद्धि तथा सवारी* का योग उत्पन्न करते हैं। २. यदि बृहस्पति चौथे घर में हो या चौथे को देखता हो तो जातक को बहुत सुख प्राप्त होता है। ३. यदि चौथे घर का स्वामी और बृहस्पति केन्द्र या कोण में एक साथ हों तो जातक को सुख प्राप्त होता है।
- पहिले सवारी का अर्थ होता था, हाथी, घोड़ा, पालकी, रथ इत्यादि अब सवारी का अर्थ है, स्कूटर, मोटर, जहाज़ आदि।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४२९ ४. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ शुक्र चौथे घर में बैठा हो तो स्वल्प वाहन योग होता है। ५. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ शुक्र नवम, दशम या एकादश स्थान में बैठा हो तो बहुत वाहन योग करता है । ६. यदि कर्क लग्न हो, बुध और शुक्र चौथे घर में हो तो बुध की दशा शुक्र की अन्तर्दशा में वाहन प्राप्त होता है । ७. यदि शुक्र सप्तम में हो तो जातक बहुत कामुक होता है । अर्थात् उसकी भोग लालसा प्रग्ल होती है । ८. यदि चौथे घर में शनि हो तो जातक कठोर हृदय होता है । किन्तु नये भवन में नहीं रहता और परदेश में रहता है। ९. यदि चौथे घर का स्वामी नवें घर में हो और नवें घर घर का स्वामी चौथे घर में हो तो यह भाग्य योग और वाहन योग भी उत्पन्न करते हैं । १०. यदि चौथे घर का स्वामी 'ग्यारहवें हो और ग्यारहवें घर का स्वामी चौथे हो तो भी ऊपर जो नं० ९ में फल बताया गया है वही फल होता है । ११. चौथे घर का मालिक पाँचवें और पाँचवें घर के मालिक चौथे हो तो भी भाग्य योग तथा वाहन योग होते हैं । १२. यदि चौथे घर का स्वामी लग्न में हो और लग्नेश चौथे घर में हो तो भी शुभ फल समझना चाहिए । १३. यदि पाँचवें घर का मालिक नवम में हो और नवम घर का मालिक पाँचवें हो तो भी यही फल हो । १४. यदि चौथे घर का मालिक चौथे और पाँचवें घर का मालिक पाँचवें हो तो भी भाग्य वाहन योग होता है । १५. यदि पाँचवें घर का मालिक लाभ में और लाभ का मालिक पाँचवें हो तो भी भाग्य योग करता है । लाभ ग्यारहवें घर को कहते हैं ।
४३० फलदीपिका १६. यदि पहले घर का स्वामी पहले घर में और नवम घर का स्वामी नवम में हो तो ऊपर लिखा हुआ शुभ योग होता है। १७. यदि पाँचवें घर का मालिक नवम में हो और नवम घर का मालिक दशम में हो तो भी यह योग होता है । पुत्र विचार १. यदि पाँचवें का स्वामी तथा बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो पुत्रों के लिए अच्छा योग है अर्थात् जातक के पुत्र होते हैं और उनसे सुख प्राप्त होता है । २. यदि पहले का स्वामी, पाँचवें का स्वामी और बृहस्पति केन्द्र या त्रिकोण में हों तो जातक को पुत्र सुख प्राप्त होता । शत्रु तथा रोग विचार जन्म कुण्डली में छठे घर से शत्रु और रोग का विचार किया जाता है, इसलिए भावार्थ रत्नाकर में "शत्रु रोगादितरंग" में निम्न- लिखित योग दिये हैं । पुस्तक का नाम भावार्थरत्नाकर है । रत्नाकर समुद्र को कहते हैं इसलिए विविध प्रकरणों को अध्याय या परिच्छेदों में न बाँटकर विविध विचारों को तरंगों में बाँटा है। १. अष्टमेश लग्न में हो तो शरीर रोगी रहे । २. यदि छठे घर का मालिक लग्न में हो तो अपनी जाति के लोग बाधा पहुँचाते हैं अर्थात् जातक से जाति के लोग शत्रुता की भावना रखते हैं और जातक को रोगों से भी बाधा रहती है । ३. यदि पहले तथा छठे के मालिक सूर्य के साथ हों तो ज्वर रोग से पीड़ित रहता है।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३१ ४. पहले और छठे के मालिक चन्द्रमा के साथ हों तो जल से भय हो । ५. पहले और छठे के, मालिक का मंगल से सम्बन्ध हों तो व्रण, घाव, शस्त्र से आघात, ग्रन्थि (ऐसा फोड़ा जिसमें गांठ पड़ जाय जैसे प्लेग आदि) का भय होता है । ६. पहले और छठे घर के मालिक बुध से युक्त हों तो पित्त रोग । ७. यदि पहले तथा छठे के मालिक बृहस्पति से युक्त हों तो शरीर स्वस्थ रहे, रोग न हो । ८. यदि पहले और छठे के मालिक शुक्र के साथ योग करें तो जातक की स्त्री के स्वास्थ्य के लिये खराब है । ९. यदि पहले और छठे के मालिक का शनि के साथ योग हो तो चोरों ओर चाण्डालों (नीच जाति के लोगों) से भय हो । १० यदि पहले और छठे के मालिक राह या केतु से सम्बन्ध करें तों सर्प, व्याघ्र आदि से भय हो । ११. यदि छठे का मालिक नीच ग्रह के साथ बारहवें घर में बैंठा हो और लग्न का स्वामी बलवान् हो तो रोग नाश होता है अर्थात् स्वास्थ्य उत्तम रहता है । १२. यदि छठे घर का स्वामी लग्नेश से कमजोर हो और उस षष्ठेश का शुभ ग्रहों से सम्बन्ध हो तो जातक के शत्रु उसके मित्र हो जावेंगे । पत्नी विचार इस तरंग में पत्नी विचार दिया गया है । यदि स्त्री की कुण्डली में विचार करना हो तो नीचे दिये गये सिद्धान्तों पर पति का विचार करना चाहिए । इसमें यह तारतम्य करना आवश्यक
४३२ फलदीपिका है कि जहाँ एक से अधिक पत्नियाँ होने के योग बताए गये हैं वहाँ एक से अधिक पति होने का योग केवल उसी समाज की स्त्रियों को लागू होगा जिसमें बहु विवाह (जैसे पर्वतीय प्रदेशों में एक स्त्री के कई पति होते हैं) या जहाँ विधवा विवाह होता है वहीं लागू होगा। हिन्दू पुरुषों की कुण्डली में भी (अब एक पत्नी के रहते हुये पुरुष दूसरा विवाह नहीं कर सकता इस कारण) बहुत से योग अब लागू नहीं होंगे और बहुत सी जगह जहाँ बहुविवाह के योग दिये गये हैं विवाह न होकर एक से अधिक स्त्री से जातक का सम्बन्ध हो ऐसा योग घटित हो सकता है। प्राचीन ग्रन्थों में लिखे हुये फल, देश, काल, पात्र भेद से बदलते रहते हैं। १. यदि सातवें घर का मालिक शुक्र के साथ हो और क्रूर
- सम्बन्ध से रहित हो (सम्बन्ध चार प्रकार के होते हैं, दो ग्रहों का एक साथ बैठना, एक-दूसरे की राशि में बैठना, एक-दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखना, किसी ग्रह की राशि में बैठ कर उस ग्रह को पूर्ण दृष्टि से देखना) तो एक ही स्त्री होती है। २. यदि सातवें घर का मालिक पाप ग्रह से सम्बन्ध करे या दूसरे या सातवें घर में पाप ग्रह हों, या शुक्र लाभ में हो या नीच का हो या सातवें घर का मालिक छठे या बारहवें हों तो दूसरा विवाह होता है। ३. यदि लग्न में पाप ग्रह हो तो दूसरा विवाह हो। ४. यदि मंगल और शुक्र एक साथ दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें घर में बैठे हों और शुक्र कमजोर हो तो द्वितीय विवाह हो। ५. यदि मंगल दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें हो तो भी दो विवाह होते हैं। अन्य शास्त्रों में इसे मंगलीक दोष कहा गया है। इसलिए यदि जातक की स्त्री भी मंगलीक हो तो वह ज़िन्दा रहेगी और
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३३ पुरुष का दूसरा विवाह नहीं होगा, इस सामान्य सिद्धांत को नहीं भूलना चाहिए । ६. यदि बृहस्पति दूसरे घर में हो और जन्म कुण्डली में एक से अधिक विवाह का योग हो तो दूसरा विवाह प्रौढ़ावस्था में होता है । ७. यदि शनि दूसरे घर में हो और राहु सातवें घर में हो तो दो विवाह होते हैं । ८. यदि दूसरे व सातवें घर के मालिक या शुक्र दूसरे या सातवें घर में हों और दूसरे और सातवें घरों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो जितने शुभ ग्रहों की दृष्टि हो उतनी पत्नियाँ हों या उतनी स्त्रियों से सुख हो लेकिन यदि क्रूर ग्रह से युक्त ये स्थान या शुक्र हो तो यह योग घटित नहीं होता । ९. यदि शनि और शुक्र सप्तम में हों तो जातक अपनी स्त्री में आसक्त रहता है । १०. यदि सप्तम में बुध हो तो पर स्त्री में आसक्त हो । ११. यदि सातवें घर में बृहस्पति हो तो जातक की स्त्री पति- परायणा हो । १२. यदि दूसरे, सातवें और दसवें घर के मालिक चौथे घर में हों तो जातक पर-स्त्रियों में आसक्त हो । १३. सातवें घर में राहु हो तो जातक निपुण हो । १४. सातवें घर में केतु हो तो जातक की पत्नी धूर्ता हो । आयु-आरोग्य तरंग १. सम्पत्ति, शरीर स्वास्थ्य और पुत्रों का कारक बृहस्पति होता है । २. यदि बृहस्पति लग्नेश के साथ हो तो उत्तम आयु होती है ।
४३४ फलदीपिका ३. यदि आयु कारक शनि का आठवें घर के स्वामी से सम्बन्ध हो तो दीर्घायु हो । ४. आठवें घर में शनि हो तो दीर्घायु हो । ५. यदि आठवें घर का स्वामी केतु के साथ लग्न में हो तो अल्पायु हो । ६. पिता का कारक सूर्य यदि नवम घर के स्वामी से सम्बन्ध करे तो पिता की दीर्घायु हो । ७. नवें घर में सूर्य हो तो पिता स्वल्पायु हो ।* ८. चौथे घर में चन्द्रमा हो तो माता अल्पायु हो । ९. यदि सूर्य और नवें घर के मालिक दोनों नवें घर में बैठे हों तो पिता अल्पायु हो । किन्तु यदि नवें घर का मालिक ग्यारहवें में हो तो पिता दीर्घायु हो । १०. तीसरे घर में मंगल हो तो भाई अल्पायु हों। तीसरे घर में बृहस्पति हो तो भाइयों के लिए कष्टकारक होता है। ११. यदि धनु या मीन राशि का बृहस्पति तीसरे घर में हो तो जातक के केवल एक ही भाई होता है। १२. पंचम में बृहस्पति पुत्र की आयु में कमी करता है। १३. सातवें घर में शुक्र हो तो पत्नी की आयु कम करता है। नोट :-- ऊपर लिखे हुये योगों का निष्कर्ष यह है कि जिस भाव का जो कारक है उस भाव में यदि वह कारक बैठा हो तो शुभ फल में कमी करता है । केवल शनि के विषय में यह बात लागू नहीं होती क्योंकि वह आयु का कारक है और आठवें घर में बैठकर आयु को बढ़ाता है । *दक्षिण भारत में पिता का विचार नवम घर से किया जाता है। पिता का कारक सूर्य है । इसलिये कारक के (जिस स्थान का वह कारक है) उस स्थान मे बैठने से यह दोष हुआ ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३५ १४. यदि चन्द्रमा और चौथे घर का मालिक—५वें, ९ वें, १०वें, ११वें, इनमें से किन्हीं घरों में हों (यह ज़रूरी नहीं कि चन्द्रमा और चौथे घर का मालिक एक ही घर में हों) तो जातक की माता दीर्घायु होती है। यदि चतुर्थेश का चन्द्रमा से सम्बन्ध हो तो भी माता दीर्घायु हो। १५. यदि मूल त्रिकोण अंशों में सूर्य सिंह में, मंगल मेष में, बुध कन्या में, बृहस्पति धनु में, शुक्र तुला में या शनि कुम्भ में चौथे घर में बैठा हो तो माता दीर्घायु होती है। चौथे का मालिक चौथे में हो तो भी माता के लिए अच्छा है किन्तु यदि चौथे का मालिक मूल त्रिकोण अंशों में हो तो बहुत उत्तम है। किन-किन अंशों तक मूल त्रिकोण होते हैं और किन अंशों में स्वराशि होती है यह अध्याय १ श्लोक ७ की व्याख्या में बताया जा चुका है। १६. यदि चौथे घर का मालिक और चन्द्रमा प्रबल स्थान में बैठे हों किन्तु यदि चन्द्रमा क्षीण हो (कृष्ण पक्ष की दशमी से शुक्ल पक्ष की पंचमी तक चन्द्रमा क्षीण समझा जाता है*) और उन पर शनि की दृष्टि हो तो माता अल्पायु होती है। भाग्य योग तरंग अब भावार्थ रत्नाकर के अनुसार कतिपय भाग्य योग दिये जा रहे हैं :— १. यदि नवें का मालिक ग्यारहवें हो और ग्यारहवें का मालिक नवें में हो या नवें और ग्यारहवें के मालिक में सम्बन्ध हो। २. यदि दो-दो ग्रह एक-एक राशि में इस प्रकार बैठे हुए हों कि चार राशि में आठ ग्रह आ जावें।
- एक अन्य मत से कृष्ण चतुर्दशी और अमावास्या को चन्द्र क्षीण होता है।
४३६ फलदीपिका ३. यदि छः ग्रह तीन राशियों में, दो-दो एक साथ बैठे हों। ४. यदि चारों शुभ ग्रहों को (बुध, बृहस्पति, शुक्र और शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा) पाप ग्रह देखते हों तो बहुत भाग्यशाली तो नहीं होता लेकिन धन योग होता है। ५. यदि तीसरे, छठे और ग्यारहवें क्रूर ग्रह बैठे हों। ६. यदि कोई ग्रह लग्न से बारहवें घर में बैठा हो तो उस भाव का भाग्य उदय करता है जिस भाव का वह कारक है। किस भाव का कौन सा ग्रह कारक होता है यह इस पुस्तक में पहिले बताया जा चुका है। ७. यदि चौथे घर का मालिक, शुक्र और सातवें और नवें घर के मालिक नवें या ग्यारहवें इन दोनों घरों में (चाहे चारों एक साथ बैठे हों चाहे कुछ नवें कुछ ग्यारहवें बैठे हों) और शनि से सम्बन्ध करते हों तो शनि की दशा और अन्तर्दशा में अच्छा लाभ होता है और सवारी प्राप्त होती है। ८. यदि पहले, चौथे और नवें और दसवें घरों के मालिक पहले सातवें या दसवें घर में बैठे हों--चारों ग्रहों का इन तीनों केन्द्रों में से किसी एक केन्द्र में एक साथ बैठना आवश्यक है तो उनकी दशा और अन्तर्दशा में बहुत भाग्य उदय होता है। ९. यदि कोई ग्रह पाँचवें अथवा नवें घर में उच्च राशि का होकर बैठा हो तो भाग्य उदय होता है। १०. यदि सूर्य, बुध और शुक्र, पाँचवें हों और बृहस्पति ग्यारहवें हों तो बुध की दशा में विशेष धनागम होता है। ११. यदि नवें घर का मालिक और सूर्य दोनों एक साथ लग्न से बारहवें घर में हों तो पिता के ज़रिये भाग्य उदय होता है। १२. यदि सूर्य मेष राशि का हो तो जातक के पिता का भाग्य बढ़ता है।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३७ १३. यदि तुला का सूर्य हो तो जातक के पिता की भाग्य हानि होता है। १४. यदि जातक धनु लग्न हो तो जातक का अपने पिता के जरिये भाग्य उदय होगा। या जातक के पिता का भाग्य उदय होगा। चाहे तुला का सूर्य हो इस योग में फर्क नहीं होता। १५. यदि (i) सूर्य और नवें का मालिक और बारहवें का मालिक यह तीनों बारहवें घर में हों या (ii) बृहस्पति और बारहवें घर के मालिक बारहवें घर में हों तो जातक के पिता का भाग्य उदय होता है। १६. यदि बारहवें घर में शुक्र हो तो कलत्र भाग्य अर्थात् अपनी पत्नी के कारण भाग्य उदय होता है। १७. यदि चन्द्रमा बारहवें घर में हो तो माता के कारण भाग्य उदय होता है। १८. यदि मंगल बारहवें हो तो भ्रातृ भाग्य (भाइयों के सम्बन्ध में भाग्यशाली या भाई के कारण भाग्य उदय)। १९. यदि नवें घर का मालिक बारहवें घर में हो तो पिता का भाग्य उदय या पिता के कारण जातक का स्वयं का भाग्य उदय होता है। २० यदि नवें घर का मालिक सातवें में हो और सातवें घर का मालिक नवम में हो तो अपनी पत्नी के कारण भाग्य उदय होता है। २१. यदि दूसरे घर के मालिक और बुध छठें में बैठे हों तो जाति वालों का (चचेरे भाई आदि सम्बन्धी का) धन प्राप्त होता है। २२. यदि केवल बुध छठे हो तो भी यही फल है। २३. यदि पाँचवें घर का मालिक और बृहस्पति दोनों अपनी अपनी उच्च राशि में हो तो उसके बच्चे भाग्यशाली होते हैं।
४३८ फलदीपिका राजयोग तरंग नीचे कुछ राजयोग दिये जाते हैं । १. यदि (i) दूसरे घर का मालिक दूसरे घर में हो और पाँचवें घर का मालिक पाँचवें घर में हो या (ii) दूसरे का मालिक नवें और पाँचवें का मालिक दसवें घर में हों तो राजयोग है। २. यदि दूसरे और ग्यारहवें घर के मालिक दोनों एक साथ दसवें घर में हों और दोष से रहित हों तो उनकी दशा में राजयोग होता है । दोष दो प्रकार के होते हैं: (i) एक तो छठे आठवें आदि दुःस्थानों के स्वामियों से सम्बन्ध और (ii) दूसका नीच राशि या शत्रु राशि में बैठना, अस्त होना आदि । ३. यदि राहु चौथे, पाँचवें, दसवें या ग्यारहवें बैठा हो तो अपनी दशा या अन्तर्दशा में राजयोग देता है । ४. यदि केतु तीसरे घर में हो तो निश्चय ही योग देने वाला होता है । ५. यदि केतु पाँचवें या नवें घर में हो तो शुभ नहीं होता । निश्चय ही दोष कारक होता है ! ६. यदि चन्द्रमा और शुक्र दोनों एक साथ तीसरे घर में हों तो शुक्र योग देता है । शुक्र की दशा में इसका विशेष फल होगा । ७. यदि दसवें घर का मालिक तीसरे या ग्यारहवें घर में हो तो जीवन भर राजयोग नहीं होता, कभी किसी काल में राजयोग हो जावेगा। पंडित जवाहरलाल जी की कुण्डली में यह लागू नहीं होता । ९. यदि नवें घर का मालिक आठवें घर में हो तो उसकी दशा में योग नहीं होता । लेकिन यदि नवें घर का मालिक बृहस्पति हो और वह आठवें में हो तो भाग्य उदय होता है । १०. यदि आठवें और नवें घर के मालिकों का सम्बन्ध हो तो आठवें घर के मालिक की दशा में योग होता है । सम्बन्ध चार
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४३९ प्रकार के होते हैं, दो ग्रहों का एक साथ एक घर में बैठना, एक- दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखना इत्यादि जो अन्यत्र बताया गया है । ११. यदि आठवें और नवें घर के मालिक का सम्बन्ध हो तो नवें घर के मालिक की दशा में योग नहीं होगा । किन्तु अष्टमेश की अन्तर्दशा में योग होता है। १२. यदि दसवें तथा ग्यारहवें घर के स्वामियों का सम्बन्ध हो तो ग्यारहवें घर के मालिक की दशा में राजयोग होगा । १३. यदि दसवें और ग्यारहवे घर के मालिकों का सम्बन्ध हो तो दसवें घर के मालिक की दशा में साधारण स्थिति रहेगी अर्थात् न बहुत अच्छा और न बहुत खराब । १४. यदि शुक्र दशम में हो तो उसकी दशा में कोई योग नही होता । १५. यदि शनि सातवें घर में हो तो उसकी दशा में राजयोगं होता है। १६. यदि सातवें घर में राहु हो तो निश्चय ही योग देने वाला होता है। १७. यदि शनि तीसरे या नवें घर में हो तो योग देता है । १८. यदि तीसरे, आठवें या नवें घर में बृहस्पति हो तो योग देता है । १९. यदि बृहस्पति बारहवें घर में हो तो जातक मृत्यु--इस जीवन-के बाद देवलोक (स्वर्ग) प्राप्त करता है। २०. यदि भाग्य (९) और राज्य (१०) के मालिक राज्य या भाग्य में बैठे हों तो बहुत उत्तम राजयोग होता है और बहुत यश प्राप्त होता है। २१. यदि नवें घर का मालिक दसवें हो और दसवें घर का मालिक नवें में तो भी वही फल जो नं० २० में बताया गया है।
४४० फलदीपिका
२२. यदि दसवें घर का मालिक दसवें; नवें घर का मालिक नवें, हो तो भी वही फल जो ऊपर २० में दिया गया है । २३. यदि दसवें और पाँचवें घर के मालिक दोनों, एक-एक या एक साथ दसवें या पाँचवें घर में बैठे हों तो राज योग और यश होता है । २४. यदि नवें और दसवें घर के मालिक सातवें और पहले घर में बैठे हों तो राज योग और यश प्राप्त करता है । २५. यदि पाँचवें, सातवें और दसवें के मालिक केन्द्र और कोण में हों तो जातक को राज योग और यश प्राप्त होता है। महादशा-फल तरंग अब महादशा सम्बन्धी कुछ योग बताये जाते हैं । १. शुक्र की महादशा में शनि का अन्तर या शनि की महादशा में शुक्र का अन्तर हो तो जातक योगहीन हो जाता है अर्थात् यह अन्तर्दशा कष्टकारक होती है। २. जिन व्यक्तियों का धनु या मीन लग्न में जन्म हो उनकी शनि की दशा में शुक्र की अन्तर्दशा में शनि उत्तम फल करता है और शुक्र की महादशा में शनि अच्छा फल देता है । ३. यदि आठवें घर का मालिक छठे, आठवें या बारहवें घर में बैठा हो और उसकी महादशा हो तो छठे आठवें या बारहवें घर के मालिक की अन्तर्दशा में मारक फल होगा । ४. यदि तीसरे तथा दसवें घर के मालिकों का सम्बन्ध हो तो दसवें घर के मालिक की दशा में योग नहीं होता बल्कि अवयोग होता है । किन्तु तीसरे घर के मालिक की दशा में उत्तम योग होता है । ५. यदि (i) कोई ग्रह लग्न या सातवें घर में हो या (ii) नवें घर का मालिक सातवें घर में हो तो ऐसे ग्रह की दशा में जातक अपने पुरुषार्थ से धन कमाता है ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४१ ६. यदि राहु की महादशा हो तो उसमें राहु केतु-शनि या सूर्य की अन्तर्दशा में पिता की मृत्यु हो सकती है । ७. यदि केतु की दशा हो तो उसमें मंगल, शनि, सूर्य या राहु की अन्तर्दशा जातक के पिता की मृत्यु कर सकती है । ८. यदि मंगल की दशा हो तो उसमें राहु, केतु या शनि की अन्तर्दशा में जातक के पिता का मरण हो सकता है । ९. यदि शनि की महादशा हो तो उसमें राहु, केतु, सूर्य या मंगल की अन्तर्दशा में पिता का मरण हो सकता है । १०. मंगल की महादशा का अन्त हो और राहु प्रारम्भ होने वाला हो तो पिता की मृत्यु हो सकती है । ११. यदि क्रूर ग्रह की महादशा हो और उसमें राहु की अन्तर्दशा हो तो पिता की मृत्यु हो सकती है । १२. यदि बृहस्पति और शुक्र वृश्चिक में हों और शुक्र की दशा आवे तो शुक्र दशा राजयोग कारक होती हैं, इसमें संशय नहीं है । १३. यदि सूर्य और बुध एक साथ हों या कन्या का सूर्य, सिंह का बुध हो तो बुध की दशा प्रबल होती है; सूर्य की दशा मध्यम होती है । १४. यदि चन्द्रमा और मंगल का सम्बन्ध हो तो चन्द्र की दशा बहुत योग देने वाली होती है, मंगल की दशा मध्यम होती है । १५. यदि बृहस्पति और शनि का सम्बन्ध हो तो शनि की दशा विशेष योग प्रदान करने वाली होती है; बृहस्पति की महादशा मध्यम होती है । १६. यदि मंगल और बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो मंगल की दशा उत्तम होती है, बृहस्पति की दशा मध्यम होती है । १७. यदि चन्द्रमा और बृहस्पति का सम्बन्ध हो तो चन्द्र दशा विशेष योग प्रदान करने वाली होती है, बृहस्पति की दशा मध्यम होती है ।
४४२ फलदीपिका १८. यदि राहु केन्द्र या कोण में हो तो स्वतंत्र राजयोग है । जातक को बहुत यश प्राप्त होता है । १९. यदि बुध, बृहस्पति और शुक्र का सम्बन्ध हो तो यह विशेष धन योग है, जातक भाग्यवान् और यशस्वी होता है । २०. यदि शुक्र का बुध या बृहस्पति से सम्बन्ध हो, शुक्र की दशा में धन योग होता है । बृहस्पति की दशा में जातक धन हीन होता है और बुध की दशा मिला जुला फल देती है अर्थात् कभी धनागम कभी धन की हानि । २१. यदि सूर्य किसी ग्रह के साथ हो तो सूर्य की दशा में धनागम, अन्य ग्रह मध्यम फल देता है । २२. यदि राहु का अन्य ग्रहों से सम्बन्ध हो तो जो ग्रह सबसे प्रबल होगा राहु उसका फल देगा । २३. यदि राहु, सूर्य और शनि एक साथ तृतीय में हों तो राहु की दशा, अन्तर्दशा पराक्रम और भाग्योदय करती है । २४. यदि बुध तृतीय में हो तो राहु की दशा में जातक धैर्य हीन (कातर, या डरपोक) हो जाता है । ग्रह सामान्य योग तरंग १. यदि किसी भाव का स्वामी-उस भाव के कारक से संयुक्त हो तो उस भाव की प्रबलता होती है अर्थात् वह भाव पुष्ट होता है। किस भाव का कौन सा कारक होता है यह फलदीपिका के अध्याय १५ श्लोक १७ में बताया गया है। उदाहरण के लिये पंचम कारक बृहस्पति है और सप्तम कारक शुक्र है। यदि पंचमेश बृहस्पति के साथ हो या सप्तमेश शुक्र के साथ हो तो पंचम भाव या सप्तम भाव पुष्ट होगा ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४४३ २. तृतीय, अष्टम या ग्यारहवें घर का स्वामी होना. दोषयुक्त होता है । पंचम या नवम का स्वामी होना शुभ होता है । ३. तीसरे, छठे या आठवें का मालिक होने से बृहस्पति दोष- युक्त हो जाता है लेकिन आठवें घर का मालिक होने पर भी यह योग देने वाला होता है । ४. यदि शुक्र छठे स्थान में हो तो योग देने वाला होता दे । १२वें घर में भी शुक्र का यही फल है । ५. राहु यदि चतुर्थ, पंचम, दशम या एकादश में हो तो योग देता है ऐसा उत्तम ज्योतिषियों ने कहा है । ६. यदि सौम्य ग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो योग नहीं देते । केन्द्र में स्थित केन्द्रनाथ यदि क्रूर हों तो राजयोग देते हैं । ७. जिस भाव में शनि स्थित हो या जिस भाव को शनि देखता हो उस भाव की न्यूनता होती है । किन्तु शनि तृतीय या नवम को देखे तो उस भाव की (जिस को देखता हो) प्रबलता होती है । ८. यदि क्षीण चन्द्रमा लग्न में हो तो जातक मन्द बुद्धि होता है और अन्य लोगों से पोषित होता है । यदि पूर्ण चन्द्र लग्न में हो तो जातक गुणवान्, भाग्यवान् होता है। ९. यदि चन्द्रमा और मंगल लग्न में हों या चन्द्रमा और मंगल अष्टम में हों तो जातक भाग्यवान् होता है । १०. मंगल यदि चतुर्थेश के साथ हो तो निश्चय स्थावर सम्पत्ति (खेत, मकान) का मालिक होता है । ११. यदि चौथे घर के स्वामी के साथ वृहस्पति चौथे घर में हो तो वह गाय आदि चौपायों का मालिक होता है ।