प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
प्रबन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम ( ७ ) मंत्रीका मुसलमान सुलतानके साथ मैत्रीका सम्बन्ध बान्धना .... १२७ ( ८ ) अनुपमाकी दानशीलता .... .... .... .... १२८ ( ९ ) वीरधवलकी रणशूरता .... .... .... .... ,, ( १० ) वीरधवलकी मृत्यु .... .... .... .... १२९ ( ११ ) अनुपमाकी मृत्यु .... .... .... .... ,, ( १२ ) वस्तुपालकी मृत्यु .... .... .... .... ,,
- पञ्चम प्रकाश - ११ प्रकीर्णक प्रबन्ध .... .... , .... .... १३१-१५२ ( १ ) विक्रमादित्यकी पात्र परीक्षा .... .... .... .... १३१ ( २ ) मरे हुए नन्दका पुनर्जीवन .... .... .... .... ,, ( ३ ) राजा शिलादित्य और मल्लवादी सूरिका प्रबन्ध .... .... १३२ ( ४ ) बौद्ध और जैनोंमें वाद-विवाद .... .... .... ,, ( ५ ) वलभी नगरीके विनाशकी कथा .... .... .... १३३ ( ६ ) श्री पुंजराजकी उत्पत्ति .... .... .... .... १३४ ( ७ ) श्रीमाताकी उत्पत्तिका वर्णन .... .... .... १३५ ( ८ ) चोड देशके गोवर्धन राजाकी न्यायप्रियताका उदाहरण .... १३६ ( ९ ) पुण्यसार राजाका वृत्तान्त .... .... .... .... १३७ ( १० ) कर्मसार राजाका प्रबन्ध .... .... .... .... ,, ( ११ ) राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका प्रबन्ध .... .... १३८ ( १२ ) काशीके जयचन्द्र राजाका प्रबन्ध .... .... .... १३९ ( १३ ) जगदेव क्षत्रियका प्रबन्ध .... .... .... १४१ ( १४ ) पृथ्वीराजके तुंग सुभटका प्रबन्ध .... .... .... १४३ ( १५ ) पृथ्वीराजका म्लेच्छोंके हाथ मारा जाना .... .... १४४ ( १६ ) कौंकण देशकी उत्पत्ति कैसे हुई .... .... .... १४५ ( १७ ) ज्योतिषी वराहमिहिरका प्रबन्ध .... .... .... ,, ( १८ ) सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त .... .... .... १४७ ( १९ ) स्तंभनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव .... .... .... १४८ ( २० ) कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन .... .... .... ,, ( २१ ) वाग्भट वैद्यका प्रबन्ध .... .... .... .... १४९ ( २२ ) गिरनार तीर्थके निमित्त श्वेताम्बर-दिगम्बरमें लड़ाई .... .... १५० ( २३ ) सोमेश्वरका अपने भक्तोंकी परीक्षा करना .... .... १५१ ( २४ ) पूर्वजन्मका किया भोगना .... .... .... ,, ( २५ ) जिन पूजाका माहात्म्य .... .... .... १५२
- ग्रन्थकारकी प्रशस्ति .... .... .... १५३ परिशिष्ट-कुमारपालका अहिंसाके साथ पाणिग्रहणका रूपकात्मक प्रबन्ध १५३-१५६
प्रा स्ता विक वक्तव्य । श्री मेरुतुङ्गाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि नामक प्रसिद्ध ऐतिहासिक-प्रबन्ध-संग्रहात्मक संस्कृत ग्रन्थका यह हिन्दी भाषान्तर, आज सहर्ष हम हिन्दी भाषाभाषियोंकी सेवामें उपस्थित करते हैं । १. प्रबन्धचिन्तामणिका महत्त्व और प्रामाण्य । गुजरातके प्राचीन इतिहासकी विशिष्ट श्रुति और स्मृतिके आधारभूत जितने भी प्रबन्धात्मक और चरित्रात्मक ग्रन्थ-निबन्ध इत्यादि प्राकृत, संस्कृत या प्राचीन देशी भाषामें रचे हुए उपलब्ध होते हैं, उन सबमें इस प्रबन्धचिन्तामणिका स्थान सबसे विशिष्ट और अधिक महत्त्वका है । उस प्राचीन समयसे ही — जबसे इसकी रचना हुई है तबसे ही — इस ग्रन्थकी प्रतिष्ठा विद्वानोंमें खूब अच्छी तरह हो गई थी और जिनको कुछ ऐतिहासिक वृत्तान्तोंके जाननेकी उत्कण्ठा होती थी वे प्रायः इसका वाचन और अध्ययन किया करते थे । पिछले कई ग्रन्थकारोंने इस ग्रन्थका अपनी रचनाओंमें अच्छा उपयोग भी किया है, और आदरपूर्वक इसका उल्लेख भी किया है। इन ग्रन्थकारोंमें, सबसे पहले शायद जिनप्रभ सूरि हैं जो प्राय. इनके समकालीन थे । यद्यपि उन्होंने इनका कहीं नामोल्लेख नहीं किया है तथापि अपने महत्त्वके ग्रन्थ, विविधतीर्थकल्पमें, जैसा कि हमने उसकी प्रस्तावनामें (पृ० ३, पंक्ति ४-५ पर ) सूचित किया है, इस ग्रन्थका सर्व प्रथम उपयोग किया है। इसके बाद, इन जिनप्रभ सूरिके उत्तरावस्थाके समकालीन और इन्हींके पास कुछ गहन शास्त्रोंका अध्ययन भी करनेवाले मल्लधारी राजशेखर सूरिने, अपने प्रबन्धकोषमें, इस ग्रन्थका जैसा उपयोग किया है, उसका परिचय हमने, प्रबन्धकोषकी प्रस्तावनामें, 'प्रबन्ध-चिन्तामणि और प्रबन्धकोष ' इन शीर्षकोंके नीचे (पृ० २, कण्डिका ४ में) कराया है। राजशेखर सूरिने तो प्रकट रूपसे इस ग्रन्थका नामोल्लेख भी किया है। हेमचन्द्र सूरिके वृत्तान्तमें उन्होंने कहा है कि- 'इन आचार्यके जीवनके सम्बन्धमें जो जो बातें प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थमें लिखी गई हैं, उनका वर्णन हम यहा पर नहीं करना चाहते । ऐसा करना चर्वित-चर्वण मात्र होगा।' —इत्यादि । (देखो, प्र० को० पृ० ४७, प्रकरण ५७, पक्ति १२-१६) । संवत् १४२२ में समाप्त होनेवाले जयसिंह-सूरि-रचित कुमारपालचरितमें, तथा संवत् १४६४ के पूर्वमें लिखे गये कुमारपालप्रबोधप्रबन्धमें (-यह ग्रन्थ शीघ्र ही प्रस्तुत ग्रन्थमालामें प्रकाशित होनेवाला है ), और संवत् १४९२ में सकलित, जिनमण्डनोपाध्यायके कुमारपालप्रबन्धमें, इस ग्रन्थका खूब उपयोग किया गया है । सं० १४९७ में परिपूर्ण होनेवाले जिनहर्षगणिकृत वस्तुपालचरित्रमें भी इसका यथेष्ट आधार लिया गया है । सं० १५०० के बाद, प्रायः १०-१५ वर्षके बीचमें जिसकी रचना हुई जान पड़ती है, उस उपदेशतरंगिणी नामक ग्रन्थमें तो इस ग्रन्थमेंसे प्रायः सैंकडों ही पद्य उद्धृत किये गये हैं और इसके अने- प्रबन्धोंका बहुत कुछ सार लिया गया है। एक जगह तो ग्रन्थकारने इसका प्रकट नामनिर्देश भी कर दिया है और लिख दिया है कि—' सर्वेऽपि प्रबन्धाः प्रबन्धचिन्तामणितो ज्ञेयाः ।' ( बनारस आवृत्ति, पृ० ५८) । इसके बादके श्राद्धविधि, उपदेशसप्ततिका आदि १६ वीं शताब्दीमें बने हुए ग्रन्थोंमें, उनके कर्ताओंने भी अपने अपने ग्रन्थोंमें इस ग्रन्थका जहा-तहा आधार लिया है और इसमें वर्णित ऐतिहासिक उल्लेखोंका सार उद्धृत किया है। १७ वीं सदीमें, अकबरके समयमें होनेवाले हीरविजय सूरिके प्रसिद्ध सहपाठी और अनुगामी विद्वान् महोपाध्याय धर्मसागर गणीने अपनी सुप्रचलित तपागच्छपट्टावलि और अन्य ग्रन्थोंमें भी
ख ] प्रबन्धचिन्तामणि इस ग्रन्थके कई उल्लेखोंका आधार लिया है। इसी तरह १८ वीं शताब्दीमें बने हुए वस्तुपालरास, कुमारपाल- रास आदि भाषा ग्रन्थोंके रचयिताओने भी अपनी अपनी कृतियोंमें इस ग्रन्थका बहुत कुछ उपयोग किया है, जिनका विशेष वर्णन करना आवश्यक नहीं है। इस कथनसे ज्ञात होता है कि उस पुरातन समयसे ही मेरुतुङ्ग सूरिके इस महत्त्वके ग्रन्थकी अच्छी ख्याति और उपयोगिता स्थापित हो गई थी। २. प्रबन्धचिन्तामणिकी वर्तमान नवीन युगमें प्रसिद्धि और उपयोगिता । प्रवर्त्तमान नवीन कालके प्रारम्भमें, सबसे पहले अंग्रेज विद्वान् श्री एलेक्जेंडर किन्लॉक फोर्ब्स साहबको इसका परिचय हुआ और उन्होंने गुजरातके इतिहास विषयकी अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'रासमाला' में इसका सर्वप्रथम उपयोग किया। अपने ग्रन्थमें लिखे गये गुजरातके प्राचीन इतिहासका मुख्य ढांचा उन्होंने इसी ग्रन्थ परसे तैयार किया। वे अपने ग्रन्थमे, इस ग्रन्थका पद पद पर उल्लेख करते हैं और इसमें लिखी गई बातोंका संपूर्ण उपयोग करते हैं। उनके पीछे, भारतीय पुरातत्त्वके प्रखर पण्डित, जर्मन विद्वान्, डॉ० ब्यूहलरने इस ग्रन्थका खूब बारीकीके साथ अध्ययन किया और इसमें वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंका सविशेष ऊहापोह किया। 'इन्डियन ऐन्टीक्वेरी' नामक भारतीय-विद्या विषयक सुप्रसिद्ध पत्रिकाके सन् १८७७ के जुलाई मासके अंकमें उन्होंने 'अनहिलवाडके चालुक्योंके ११ दानपत्र' (Eleven land grants of the Chalukyas of Anhilvad) इस शीर्षक नीचे, अणहिलपुरके राजकीय इतिहास पर प्रकाश डालनेवाला एक महत्त्वका लेख लिखा जिसमें इस प्रबन्धचिन्तामणि कथित बातोंका अच्छा अवलोकन किया। फिर उसके बादमें, डॉ० ब्यूहलरने, जर्मन भाषामें Uber das Leben des Jaina Monches Hemacandra इस नामसे, आचार्य हेमचन्द्रका सविस्तार जीवनचरित्र लिखा, जिसमें उन्होंने प्रस्तुत प्रबन्धचिन्तामणिका पूरा पूरा उपयोग किया*। इसके बाद, बंबई सरकारने, बॉम्बे गेजेटियरके लिये जब गुजरातका प्राचीन इतिहास तैयार करवाया, तो उसके संकलनकर्त्ता प्रसिद्ध गुजराती पुरातत्त्वज्ञ डॉ० भगवानलाल इन्द्रजीने, इस ग्रन्थका बहुत सूक्ष्मताके साथ सांगोपाग निरीक्षण किया और गुजरातके राजकीय इतिहासके साथ सबन्ध रखने वाली प्राय सारी ऐतिहास उक्तियों और श्रुतियोंका जो जो इसमें निर्देश मिलता है उन सबका ठीक ठीक पर्यालोचन कर, यथायोग्य उनका उपयोग किया। तदुपरान्त, गुजरातके इतिहास विषयक भिन्न भिन्न प्रकारके पुस्तकों और निबन्धोंके रचयिता एतद्देशीय और विदेशीय सैंकडों ही विद्वानोंने जहा-तहा इस ग्रन्थका अनेकशः आधार लिया है और उल्लेख किया है। इस ग्रन्थकी ऐसी सार्वजनिक उपयोगिताको लक्ष्य कर, रासमालाके कर्ता विद्वान् फोर्ब्स साहबकी, और तदनुसार डॉ० ब्यूहलरकी भी, यह खास इच्छा रही कि विस्तृत टीका-टिप्पणियोंके साथ इस ग्रन्थका संपूर्ण अंग्रेजी अनुवाद किया जाय । डॉ० ब्यूहलरकी इस इच्छाको, कथासरित्सागर आदि प्रसिद्ध संस्कृत कथामन्थोंके सिद्धहस्त अंग्रेजी अनुवादक, अंग्रेज विद्वान्, श्रीयुत सी. एच्. टॉनी, एम्. ए. ने पूरा किया। उन्होंने इस ग्रन्थका सुन्दर और संपूर्ण अंग्रेजी अनुवाद किया जिसको कलकत्ताकी एशियाटिक सोसाइटीने सन् १९०१ में छपा कर प्रकाशित किया। डॉ० ब्यूहलरकी उत्कण्ठा थी कि वे टॉनीके इस भाषान्तरके साथ, ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी परि- चायक ऐसी अपनी टीका-टिप्पणियाँ दे कर, इस ग्रन्थकी उपादेयताका महत्त्व बढ़ावेंगे; पर दुर्देवसे इस कार्यके पूर्ण होनेके पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया और उनकी वह इच्छा यों ही अपूर्ण रह गई। विद्वान् टॉनीने अपने अंग्रेजी अनुवादकी प्रस्तावनाके प्रारम्भमें, जो इस बारेमें कुछ लिखा है, उसका भावार्थ यह है-
- डॉ० ब्यूहलरका यह बड़े महत्त्वका ग्रन्थ है। इसका अंग्रेजी अनुवाद The Life of Hemacandracarya इस नामसे, हमने अपने सहपाठी मित्र डॉ मणिलाल पटेल Ph. D ( मारबुर्ग-जर्मनी) द्वारा करवा कर, इसी सिंधी जैन ग्रन्थ- मालाके १२ वें नंबर में प्रकाशित किया है। अंग्रेजी ज्ञाता विद्वानोंके लिये यह ग्रन्थ अवश्य पठनीय है।
प्रास्ताविक वक्तव्य [ ग “ राजतरंगिणीके अकेले अपवादको याद किया जाय तो, संस्कृत साहित्यमें ऐतिहासिक कहलाने लायक एक भी कोई ग्रन्थ नहीं है-ऐसा जो आक्षेप बारंबार किया जाता है, वह इस प्रबन्धचिन्तामणि जैसे ग्रन्थके अस्तित्त्वसे, किसी अंशमें भोंटा पाडा जा सकता है। इस आक्षेपका निःसार सिद्ध करना यह स्वर्गगत हो प्राय प्रोफेसर ब्यूह्लरकी जीवन भरकी अभिलाषा थी। ग्रन्डरिस्स् डेर इन्डो-आरिशेन् फिलोलोजी (Grundriss der Indo-Arischen Philologie) नामक ग्रन्थ- मालाके लिये, डॉ० ब्यूह्लरकी रसप्रद जीवन कथाका आलेखन करनेवाले प्रो० जोलीने (Jolly), ई० स० १८७७ में श्रीयुत न्योल्डेके (Noldeke) नामक विद्वान् पर लिखे हुए ब्यूह्लरके एक पत्रमेंसे अवतरण दिया है, जिसमें उन्होंने लिखा था कि- ‘भारतवासियोंके पास कुछ भी एतिहासिक साहित्य नहीं है इस प्रकारकी मान्यता रखनेमें आपलोग, वर्तमान समयसे कुछ थोड़ेसे पिछड़े हुए मालूम दे रहे हैं। पिछले बीस वर्षोंमें ठीक ठीक विस्तृत ऐसे पाँच ऐतिहासिक ग्रन्थ मिल आये हैं, जो उनमें वर्णित घटनाओंके समकालीन ग्रन्थकारोंके बनाये हुए हैं। इनमेंसे ४ तो, जिनके नाम विक्रमाकचरित, गउडवहो, पृथ्वीराज- दिग्विजय और कीर्तिकौमुदी हैं, खुद मैंने खोज निकाले हैं। और एक दर्जनसे भी अधिक अन्य और ग्रन्थ खोज निकालनेकी तलाशमें हूँ।' यह प्रोफेसर ब्यूह्लर ही-के श्रमका फल है कि जो इतने सारे ऐतिहासिक वृत्तांत, इतने ऐतिहासिक काव्य और इतनी ऐतिहासिक कथाएँ संपादित हो सकीं। इस ग्रन्थके इंग्रजी अनुवादके करनेका काम जो मैंने हाथमें लिया यह भी डॉ० ब्यूह्लर-ही-की सूचनाका परिणाम है, और जो कोई पाठक मेरी टिप्पणियोंके पढ़नेका कष्ट उठायेगा उसे स्पष्ट ज्ञात हो जायगा, कि उन्द्रींक उत्तेजन और साहाय्यके बिना मेरा यह काम अपने अन्तको न प्राप्त कर सकता। इस अनुवादके साथ ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी पूर्ति करनेवालीं टिप्पणियाँ लिखनेका उनका खास इरादा था। अगर यह बन पाता तो इस ग्रन्थकी उपयोगितामें खूब महत्त्वकी वृद्धि हो पाती, पर इस विचारके, कार्यरूपमें परिणत होनेके पहले ही, दुर्देवसे उनका अवसान हो गया और अब यह बात ‘मनकी बात मनमें ही रही' जैसी कहावतके योग्य हो गई। भारतके इतिहास विषयक साहित्यके बारेमें और उसमें भी खास करके गुजरातके इतिहासके साथ सबद्ध साहित्यके सम्बन्धमें, हरएक इंग्रेंज विद्यार्थीको एक और नामका स्मरण हो आना चाहिए और वह नाम है रासमालाके कर्ता श्री एलेक्सेंडर किन्लौक फोर्बस्का। मि. ए. जे. नैर्ने, बी. सी. एस. (Mr. A. J. Nairne, B. C. S) ने फोर्बस् साहबका जीवनचरित लिखा है, जो कर्नल वॉटसन् द्वारा संपादित और सन् १८७८ में प्रकाशित, रासमालाकी आवृत्तिके प्रारम्भमें मुद्रित है। श्री फोर्बस् साहब एक ऐसे इण्डियन सिविलियन थे, जिनको अपन भाग्यका पासा जिन लोगोंके साथ डाल गया हो उन लोगोंक इतिहास, वाङ्मय और पुरातत्त्वके विषयमें पूरा रस रहता हो। इस विषयकी उनकी, उत्कण्ठा और सत्यनिष्ठापूर्ण अध्ययनशीलताकी प्रतीति, रासमालाके प्रत्येक पृष्ठ पर होती रहती है। जिन अनेक मूलभूत आधारोंके ऊपरसे उन्होंने अपना ग्रन्थ तैयार किया, उनमेंका यह एक प्रबन्धचिन्तामणि है। इस ऐतिहासिक ग्रन्थका उन्होंने इतना तो सपूर्ण उपयोग किया है कि जिसे देख कर मेरे मनमें, अपने इस अनुवादके करते समय, बारबार यह उठ आता था कि मैं निरर्थक ही यह श्रम कर रहा हूँ। किन्तु प्रो० न्यूह्लरने मुझसे कहा था कि इस ग्रन्थका सपूर्ण इंग्रजी अनुवाद हो ऐसी इच्छा स्वय फोर्बस्ने अनेक बार प्रदर्शित की थी*। और यही मेरे इस परिश्रमकी उपयोगिताका आधार है। लेकिन, मैं अपने मनको इस तरह भी प्रोत्साहित रखना चाहता हूँ कि-मध्यकालीन इस जैन यतिने लिख रखी हुई इन श्रुतपरपराओंमें, जिनका विवरण या स्पष्टीकरण करनेसे इनके मूलमें रही हुई आधी मोहमता नष्ट हो जाती है, न केवल भारतके इतिहासके अभ्यासियों- ही को, किन्तु तदुपरान्त लोककथाओंके शताओको और मानव-नीति-शास्त्रके विद्वानोंको भी, रस प्राप्त होगा। ग्रन्थकार स्वयं भी कहता है कि-इस रचनाके करनेमें मेरा उद्देश जनमन रञ्जन करनेका है।” इत्यादि। * ३. प्रबन्धचिन्तामणिके मूल संस्कृत ग्रन्थका प्रथम प्रकाशन और गुजराती भाषान्तर। जैसा कि हमने, अपनी मूल आवृत्तिके प्रारम्भमें दिये हुए 'किंचित् प्रास्ताविक' शीर्षक वक्तव्यमे लिखा है, इस ग्रन्थके संस्कृत मूलका प्रथम प्रकाशन, गुजरातके शास्त्री रामचन्द्र दीनानाथ नामक विद्वान्ने, सवत्
- फोर्बस् साहबकी ऐसी इच्छा ही नहीं थी, बल्कि उन्होंने तो इसका पूरा इंग्रजी अनुवाद खुद ही सबसे पहले कर लिया था और फिर उसका उपयोग रासमालामें किया था, ऐसा बम्बईकी फोर्बस् सभा में जो उनका ग्रन्थसग्रह विद्यमान है उससे मालूम होता है। बम्बईके इस सग्रहमें फोर्बस् साहबकी हाथकी लिखी हुई एक नोटबुक है जिसमें इस ग्रन्थक २,४ और ५ वें प्रकाशका इंग्रजी भाषान्तर लिखा हुआ है। पहले दो प्रकाशोंका भाषान्तर, शायद किसी दूसरी नोटबुकमें लिखा हुआ होगा जो अब उपलब्ध नहीं है। श्री टॉनीको इसकी खबर न होनेसे, शायद उन्होंने वैसा लिखा होगा। अथवा यह भाषान्तर वैसा पूर्ण और शुद्ध न होगा जिससे फोर्बस्को सन्तोष रहा हो, और इसीलिये उन्होंने इसका एक उत्तम भाषान्तर, योग्य सस्कृतज्ञ पण्डितके हाथसे हो, ऐसी इच्छा डॉ० ब्यूह्लरके आगे प्रदर्शित की हो।
घ ] प्रबन्धचिन्तामणि १९१४ में, बम्बईसे किया था । उसीके साथ उन्होंने, इसका गुजराती भाषामें अनुवाद भी छपवा कर प्रकाशित किया था। शास्त्रीजीका यह अनुवाद – जिसे अनुवाद नहीं लेकिन एक तरहका विवरण कहना चाहिए – पुराने ढंगसे और पुरानी शैलीकी भाषामें किया गया था और इसमें उन्होंने अपनी तरफसे भी बहुतसे वाक्य और विचार, जो मूलमें सर्वथा नहीं थे, खूब फैला फैला कर लिख दिये थे। परन्तु साथमें कोई ऐतिहासिक पर्यालोचनकी दृष्टिसे उपयुक्त ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया था। अनुवादमें – खास करके प्राकृत गाथाओं और सुभाषित रूपसे उद्धृत पद्योंके भाषान्तरमें – तो अनेकानेक बड़ी बड़ी भद्दी भूलें भी की गई हैं, जिनका यहाँ पर दिग्दर्शन कराना निरर्थक है। यहाँ पर इतना यह अवश्य कहना चाहिये कि इस उपयोगी ग्रन्थको सर्वसाधारणके लिये सुलभ बनानेका श्रेयस्कर कार्य, सबसे प्रथम उन्हीं शास्त्रीजीने किया और तदर्थ उनकी स्मृति सदैव आदरकी दृष्टिसे की जानी चाहिए। जैसा कि, प्रथम भागरूप मूल ग्रन्थकी प्रस्तावनामें सूचित किया है, गुजरातके इतिहासकी दृष्टिसे इस ग्रन्थका महत्त्व लक्ष्यमें रख कर, हमने अहमदाबादके गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरकी ओरसे – जिसके कि हम सर्व प्रधान संचालक और नियामक थे – इसकी एक सर्वांगपूर्ण सुविस्तृत आवृत्ति, विशुद्ध मूल और उत्तम गुजराती भाषान्तर आदिके साथ, प्रकट करनेका प्रयत्न करना शुरू किया था। यथानुक्रम, मूलका कुछ भाग संशोधित और संपादित कर, बम्बईके सुप्रसिद्ध कर्णाटक प्रेसमें छपनेको भी भेज दिया था और उसमें प्राय प्रथमके दो प्रकाश जितना भाग छप भी चुका था। उसी बीचमें हमारा युरोप जाना हुआ और वह कार्य कुछ समयके लिये स्थगित रहा। करीब दो वर्षके बाद, वहाँसे हम जब वापस आये तो, देशमें राष्ट्रीय आन्दोलन बड़े जोरोंसे शुरू हुआ और हम भी उसमें संलग्न हो गये। सन् १९३० के अप्रेलमें, धारासणाके विख्यात नमक-सत्याग्रहमें सम्मीलित होनेके लिये, अहमदाबादसे ६०–७० जितने सत्याग्रहियोंकी एक जबर्दस्त टोली ले कर हमने प्रस्थान किया। पर अहमदाबादसे दूसरे ही स्टेशन पर, सरकारने हमको गिरफ्तार कर लिया और वहीं जगह ही-में मैजिस्ट्रेटने हमको छ महीनेकी सजा दे कर, पहले बम्बई और फिर वहाँसे नासिक जेलमें भेज दिया। इधर पीछेसे, गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरको भी – गुजरात विद्यापीठके साथ – सरकारने कब्जे कर, उसके विशाल ग्रन्थसमूहको जब्त कर लिया और उसकी वह सब स्थिति छिन्न-भिन्न हो गई। इस तरह प्रबन्धचिन्तामणिके विस्तृत प्रकाशनका जो आयोजन हमने गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरकी ओरसे किया था, वह एक प्रकारसे उन्मूलित हो गया। इस परिस्थितिको जान कर, बम्बईकी 'फोर्बस गुजराती साहित्य सभा'ने, जिसका भी प्रधान ध्येय गुजरातकी प्राचीन संस्कृतिके विविध साधनोंको प्रकाशमें लानेका है, इस ग्रन्थके प्रकाशनका कार्य हाथमें लिया और हमारे विद्वान् मित्र एवं गुजरातके इतिहासके एक विशिष्ट अभ्यासी, साक्षर श्रीदुर्गाशंकर केवलराम शास्त्रीको वह कार्य सौंपा गया। यह जान कर हमने शास्त्रीजीको हमारे मूलके छपे हुए उक्त उन दो प्रकाशोंके एडवान्स फार्म भी उनके उपयोगके लिये भेज दिये। शास्त्रीजीने यथाशक्ति परिश्रम कर, पहले ग्रन्थका मूलभाग तैयार कर उसे प्रकट करवाया और फिर उसका शुद्ध गुजराती भाषान्तर, कितनीक ऐतिहासिक टीका-टिप्पणियोंके साथ संपादित कर, उक्त सभाकी ही ओरसे प्रकाशित कराया। ४. प्रबन्धचिन्तामणिका हमारा प्रकाशन । जेलनिवाससे मुक्त होने पर कैसे दानवीर बाबू श्री बहादुरसिंहजीकी प्रियकर प्रेरणासे हमारा जाना शान्ति- निकेतन – विश्वभारतीमें हुआ और वहाँ पर रहते हुए कैसे इस 'सिंघी जैन ग्रन्थमाला' के प्रकाशनका कार्य प्रारम्भ किया गया – इत्यादि बातें हमने, संक्षेपमें, इसके पहले भागमें उल्लिखित कर दीं हैं जिनको यहाँ पर दुहरानेकी आवश्यकता नहीं है।
उक्त रीतिसे फोर्बस् सभाकी ओरसे इस ग्रन्थका, गुजराती भाषान्तर समेत, प्रकाशन होना चालू था, तब भी हमारे मनमें इसके प्रकाशनकी वह जो पूर्व कल्पना थी और इसके लिये जो साधन-सामग्री हमने बीसों वर्षोसे इकट्ठी करनी शुरू की थी, उसका ख्याल कर, हमने अपने उसी ढंगसे, इस ग्रन्थका पुनः संपादन करना प्रारम्भ किया । और चूंकि इसका गुजराती भाषान्तर, हमारे साक्षरमित्र श्री दुर्गाशंकर शास्त्री कर चुके हैं, इसलिये हमने इसका हिन्दी भाषान्तर प्रकट करनेका मनोरथ किया। हिन्दी भाषा, यों भी सबसे अधिक व्यापक भाषा है और फिर अब तो यह राष्ट्रकी सर्व प्रधान भाषा बन रही है, इसलिये सिंधी जैन ग्रन्थमालाके कार्यका लक्ष्य हिन्दीकी ओर ही अधिक रखा गया है । अंग्रेजी और गुजरातीमें एकसे अधिक भाषान्तर होने पर भी हिन्दीमें इसका कोई भाषान्तर आज तक नहीं हुआ था; और इसकी कमी कई हिन्दी भाषाभाषी विज्ञजनोंको बहुत अर्सेसे खटक भी रही थी। हिन्दीके स्वर्गवासी प्रसिद्ध पण्डित और पुरातत्त्वज्ञ विद्वान्, चन्द्रधर शर्मा गुलेरीने बहुत वर्ष पहले हमसे अनुरोध किया था, और शायद नागरीप्रचारिणी पत्रिकाके एक लेखमें उन्होंने लिखा भी था, कि इस ग्रन्थका हिन्दी अनुवाद होना आवश्यक है । आशा है गुलेरीजीकी स्वर्गस्थित आत्मा आज इसे देख कर प्रसन्न होगी । * ५. प्रस्तुत हिन्दी भाषान्तर । पाठकोंके हाथमें जो हिन्दी भाषन्तर उपस्थित किया जा रहा है, इसका प्राथमिक कच्चा खर्दा, जब हम शान्तिनिकेतनमें थे तब (सन् १९३२ में), वहाँके हिन्दी शिक्षापीठके विद्वान् आचार्य और हमारे सहृदय मित्र पं० श्रीहजारी प्रसादजी द्विवेदीने किया था, जिसको हमने अपने ढंगसे यथेष्ट रूपमें संशोधित-परिवर्तित कर वर्तमान रूप दिया है। इससे संभव है कि विज्ञ पाठकोंको इसमें कहीं कहीं भाषाविषयक शैलीका कुछ सूक्ष्म भिन्नत्व मालूम दे । हमारा प्रयत्न इस बातकी ओर रहा है कि भाषा जहाँ तक हो, सरल और सबको सुबोध हो; और जिनकी मातृभाषा खास हिन्दी न हो उनको भी इसके समझनेमें कोई कठिनाई न हो। इसलिये हमने इसमें ऐसे शब्दोंका बहुत ही कम प्रयोग किया है कि जो खास हिंदीका विशेष परिचय न रखनेवाले- राजस्थानी या गुजराती भाषाभाषी-जनोंको विल्कुल अपरिचित मालूम दे । इस ग्रन्थके संस्कृत मूलकी लेखशैली कुछ संकीर्ण और समास-बहुल है । वाक्य बड़े लंबे लंबे और कुछ जटिलसे हैं। क्रियापदोंका व्यवहार इसमें बहुत कम किया गया है। रचना कहीं तो शिथिलसी और कहीं निविड़ बन्धवाली है। इसलिये भाषान्तरमें भी हमें कही कहीं, मूलके अनुसार, कुछ लंबे वाक्य रखने पड़े हैं । भाषान्तरको हमने प्रायः संपूर्ण मूलानुसारी बनानेका लक्ष्य रखा है । मूलका कोई एक शब्द भी प्रायः छोड़ा नहीं गया है और ना-ही विशेष स्पष्टीकरणकी दृष्टिसे कोई अधिक शब्द या वाक्यांश बढाया गया है। जहाँ कहीं मूलके संक्षिप्त सूचन या अध्याहृत कथनमें, पाठकोंके स्पष्टावबोधके लिये, किसी अधिक शब्द या वाक्यांशके पूर्तिकी विशेष आवश्यकता मालूम दी, वहाँ उसे [ ] ऐसे पूरक ब्रैकेटमें समाविष्ट किया गया है। किसी खास शब्दका पर्याय वाचक दूसरा विशेष परिचित शब्द या उसका अर्थ बतलानेकी कहीं जरूरत दिखाई दी उसे ( ) ऐसे गोल ब्रैकेटमें दिया गया है। प्रकरणोंकी कण्डिकाओंके प्रारंभमें जो ‘१) २) ३)’ ऐसे इकेरे गोल ब्रैकेटके साथ क्रमांक दिये गये हैं वे, हमारी मूल ग्रन्थकी आवृत्तिमें, इस ग्रन्थका अर्थानुसन्धान बतलानेवाली कण्डिकाओंके जो क्रमांक हमने दिये हैं, उसीके बोधक हैं । मूलमें जो संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाके अनेकानेक प्राचीन पद्य उद्धत किये गये हैं उनको हमने दो भागोंमें विभक्त किया है । एक थे जो प्रायः सब प्रतियोंमें समान संख्यामें मिलते हैं और दूसरे थे जो खास कोई एकाध ही प्रतिमें
च ] प्रबन्धचिन्तामणि मिलते हैं। इस पिछले प्रकारके पद्योंको हमने पीछेसे लिखे गये अर्थात् प्रक्षिप्त माना है; और बाकीको मौलिक। इन दोनों तरहके पद्योंके लिये हमने दो प्रकारके क्रमांक दिये हैं। जो मौलिक हैं वे ‘१. २. ३.’ इस प्रकारके चालू अंकोंसे सूचित किये गये हैं और जो प्रक्षिप्त हैं वे ‘[१]-[२]-[३]’ इस प्रकार चौकोनी डबल ब्रेकेटवाले अंकोंसे बताये गये हैं। पद्योंकी तरह, मूल ग्रन्थमें, कुछ गद्य प्रकरण कण्डिकायें भी प्रक्षिप्त हैं, जिनको हमने अपनी उस मूलावृत्तिमें तो जुदा तरहके टाईपोंमें और { } ऐसे अथवा [ ] ऐसे ब्रैकेटोंके बीचमें मुद्रित कीं हैं। यहाँ, इस भाषान्तरमें वे कण्डिकायें जुदा टाईपोंमें न छाप कर, सिर्फ उनके ऊपर, ब्लैक टाईपमें ( ) ऐसे गोल ब्रैकेटमें, अथवा चालू टाईपमें [ ] ऐसे चौकोनी ब्रैकेटमें, उसकी ज्ञापक पंक्तियाँ लिख कर, उल्लिखित कर दी हैं। (—देखो, पृष्ठ १६, २०, ४८, ४९ इत्यादि ।) । इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ, जो प्रसङ्गोचित पद्य उद्धृत किये गये हैं उनमेंसे कुछ तो ऐतिहासिक घटना बताने- वाले हैं और कुछ सुभाषित स्वरूप हैं। इनमेंके कुछ पद्य द्विअर्थी अर्थात् श्लेषार्थक हैं जिनका स्वारस्य संस्कृत या प्राकृत भाषा-ही में ठीक आस्वादित हो सकता है। हिन्दीमें उसका अर्थ ठीक अनूदित नहीं हो पाता। ऐसे पद्योंके अर्थके विषयमें जहाँ तक हो सका, तदन्तर्गत मुख्य भावार्थ बतलानेका ही प्रयत्न किया गया है। कोई कोई पद्य ऐसे भी दुरवबोध मालूम देते हैं जिनका तात्पर्य ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ऐसे स्थानोंमें जो अर्थ दिये गये हैं वे शङ्कित ही समझे जायें—जैसा कि पृ. ७७ आदि पर सूचित किया गया है। कहीं कहीं गद्य कथनमें भी ऐसी दुरवबोधता और अस्पष्टार्थता प्रतीत होती है और उसका ठीक ठीक तात्पर्य नहीं जाना जा सकता—जैसा कि पृ. ९४ परकी टिप्पणीमें सूचित किया गया है। ग्रन्थकारने कहीं कहीं ऐसे अपरिचित शब्दोंका प्रयोग किया है जो शुद्ध संस्कृतके न होकर देश्य भाषाके हैं और जिनका अर्थ ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ऐसे शब्दोंके दिये गये अर्थ भी सर्वथा निर्भ्रान्त नहीं कहे जा सकते। इन सब शङ्कित स्थानों और अर्थोंके विषयमें पाठक हमें कोई दोष न दें ऐसी विज्ञप्ति है। जब यह भाषांतर छपाना शुरू किया गया तब हमारी इच्छा थी, कि हम इसके साथ, इस ग्रन्थमें वर्णित विशेष विशेष ऐतिहासिक और भौगोलिक नामोंके बारेमें, अन्यान्य साधनोंद्वारा उपलब्ध या ज्ञात बातोंका परिचय करानेवाली विस्तृत टिप्पणियाँ दें, और इसमें जो कुछ पारिभाषिक शब्दसमूह और लोकोक्तिरूप वाक्य-विन्यास उपलब्ध होते हैं उनको स्फुट करनेवाली व्याख्यात्मक पंक्तियाँ भी लिखें। किन्तु, जब हमने कुछ ऐसी टिप्प- णियाँ और पंक्तियाँ लिखनीं प्रारंभ कीं तो उनका कलेवर इतना बढ़ता हुआ दिखाई देने लगा जो मूल ग्रन्थसे भी कहीं अधिक बढ़ जानेकी आशङ्का कराने लगा। और ये सब टिप्पणियाँ लिखनेका तो हमारा उत्कट लोभ है। क्यों कि इन्हीं टिप्पणियों द्वारा तो इस ग्रन्थका सारा महत्त्व प्रकट होनेवाला है। इसलिये फिर हमने यह विचार किया कि इन टिप्पणियों आदिका सङ्कलनवाला एक पर्यालोचनात्मक पूरा भाग ही अलग निकाला जाय, जिससे भाषान्तरवाला यह भाग अनपेक्षित रूपसे विस्तृत न हो, और जिनको केवल प्रबन्धचिन्तामणिका मूलगत ग्रन्थसार मात्र ही पढ़ना-समझना अपेक्षित हो उनको इसके पढ़नेमें कोई कठिनता प्रतीत न हो। इसीलिये हमने पृष्ठ २, ११, १८ आदि पर जो टिप्पणियाँ दी हैं उनमें यह सूचित कर दिया है कि इन बातोंका विशेष विवेचन या ऊहापोह इसके अगले भागमें किया जायगा—इत्यादि। यह अगला भाग, पुरातनप्रबन्धसंग्रह नामक, मूल ग्रन्थके पूरकात्मक द्वितीय भागके, इसी तरहके
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हिन्दी भाषान्तरके प्रकट होनेके बाद, (जो अब शीघ्र ही प्रेसमें जानेवाला है) प्रकट होगा-अर्थात् हमारी सङ्कल्पित योजनाके अनुसार, वह इस प्रबन्धचिन्तामणिका ५ वाँ भाग होगा। * ६. प्रबन्धचिन्तामणि वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंके विषयमें कुछ स्वाभिप्राय ज्ञापन । इस ग्रन्थके पढ़नेवाले पाठकोंको यह बात लक्ष्यमें रखनी चाहिये कि- यद्यपि ग्रन्थ प्रधानतया ऐतिहासिक प्रबन्धोंका सङ्ग्रहात्मक है, तथापि इसके सब-के-सब प्रबन्ध ऐतिहासिक नहीं हैं। खास करके अन्तिम प्रकाशमें जो पुण्यसार, कर्मसार, वासना, कृपाणिका इत्यादि शीर्षक ५-७ प्रबन्ध हैं वे पौराणिक ढंगके कथात्मक रूप हैं। उनमें ऐतिहासिकता खोज निकालना निरर्थक है। बाकीके अन्य बहुतसे-प्राय सब ही-ऐतिहासिक माने जा सकते हैं, पर इनमेंसे भी कुछ प्रबन्धोंमें वर्णित व्यक्तियोंके विषयमें, अभी तक इतिहासविदोंमें थोड़ा बहुत मतभेद अवश्य है। दृष्टान्तके तौरपर, प्रथम प्रकाशमें प्रारम्भ-ही-में दिये गये विक्रमार्क राजाके व्यक्तित्वके विषयमें विद्वानोंमें अभी तक कोई एक निर्णयात्मक विचार स्थिर नहीं हो पाया। वह राजा कौन था और कब हो गया इसके विषयमें अभी तक अनेक तर्क-वितर्क किये जा रहे हैं। नामके अतिरिक्त प्रबन्ध कथित और सब बातें तो एक कहानीकी अपेक्षा अन्य कोई अधिक महत्त्व नहीं रखतीं। यही बात सातवाहनवाले प्रबन्धके विषयमें कही जा सकती है। सातवाहन राजाका नाम यद्यपि शिलालेखों वगैरहमें उपलब्ध होता है, पर इस नामके कई राजा हो जानेसे और प्रबन्धमें वर्णित घटनाका कोई ऐतिहासिकत्व प्रतीत न होनेसे उसके विषयमें भी नामके अतिरिक्त प्रबन्धकथित समूचा वर्णन कल्पनात्मक ही मानना चाहिए। सातवाहनके बाद भूयराजका जो प्रबन्ध है, उसके अस्तित्वके विषयका अभीतक अन्य कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हुआ है, पर उसके ऐतिहासिक पुरुष होनेका सम्भव माना जा सकता है। इस तरह इन कुछ दो चार नामोंकी व्यक्तियोंको छोड़ कर, बाकी जितने भी नाम इस ग्रन्थमें आये हुए हैं वे सब प्राय ऐतिहासिक पुरुष हैं। हाँ उनमेंसे कुछ कुछ व्यक्तियोंका सम्बन्ध, परस्पर एक दूसरेके साथ, इस तरह जोड दिया गया है जो भ्रमात्मक है। उदाहरणके तौरपर, भोज-भीमके वर्णनवाले दूसरे प्रकाशमें, धाराके परमार राजा भोजदेवके साथ खास करके महाकवि बाण, मयूर, मानतुङ्ग और माघ आदिका जो परस्पर सम्बन्ध और समकालीनत्व वर्णन किया गया है वह सर्वथा भ्रान्त और निराधार है। ग्रन्थकारके पूर्ववर्ती और प्रसिद्ध विद्वान् प्रभाचन्द्र सूरिने, अपने प्रभावकचरित्रमें, इन व्यक्तियोंका वर्णन और ही राजाओंके समयमें दिया है और वह कुछ प्रमाणभूत भी सिद्ध होता है। तब फिर न मालूम मेरुतुङ्ग सूरिने किस आधार पर, ऐसा भ्रान्तिपूर्ण यह वर्णन अपने इस महत्त्वके ग्रन्थमें ग्रथित कर डाला है, सो समझमें नहीं आता। भोजप्रबन्धकी ये बहुतसी बातें कल्पनाप्रसूत और लोककथायें जैसी प्रतीत होतीं हैं। ग्रन्थकारने ये बातें किसी पुरातन प्रबन्ध आदिके आधार पर लिखीं हैं या किसीके मुखसे सुन कर लिखीं हैं इसके जाननेका कोई साधन अभीतक ज्ञात नहीं हुआ। सिद्धराज और कुमारपालके समयके जितने वर्णन इसमें ग्रथित हैं वे प्राय सब-के-सब ऐतिहासिक और आधारभूत हैं। उनके घटनाक्रममें कुछ आगे-पीछे पनका सम्भव हो सकता है पर उनमेंका कोई वर्णन सर्वथा निर्मूल हो ऐसा नहीं माना जा सकता। मेरुतुङ्ग सूरिके इस ग्रन्थमें, ऐतिहासिक दृष्टिसे, जो सबसे अधिक विशेष महत्त्वका उल्लेख पाया गया है
ञ ] प्रबन्धचिन्तामणि वह है अणहिलपुरके राजाओंके समयका कालक्रम-ज्ञापक निश्चित निर्देश। अणहिलपुरके राज्यसिंहासन पर, कौन राजा कब गद्दीपर बैठा और उसने कितने वर्ष राज्य किया इसका जो उल्लेख इस ग्रन्थमें किया गया है वैसा उल्लेख, पूर्वके अन्य किसी ग्रन्थमें नहीं मिलता। यद्यपि इस उल्लेखमें चावडा (चापोट्कट) वंशके जो संवत्सर निर्दिष्ट किये गये हैं उनकी निश्चितिके निर्णायक और समर्थक अन्य कोई वैसे प्रमाण अभीतक उपलब्ध नहीं हो पाये, तथापि उनके बाधक भी वैसे कोई प्रमाण अभीतक उपस्थित नहीं हुए। और चौलुक्य वंशके राजाओंके राज्यकालकी जो संवत्सरावलि इसमें दी गई है वह तो शिलालेख आदि अन्यान्य अनेक प्रमाणोंसे प्रायः सर्वथा निर्भ्रान्त सिद्ध हो चुकी है। इसलिये इसमें दी गई यह राजसंवत्सरावलि बडे ही महत्त्वकी और एक अद्वितीय ऐतिह्य वस्तु साबित हुई है। ७. प्रबन्धचिन्तामणिकी रचना कब और क्यों की गई। मेरुतुङ्ग सूरिने यह ग्रन्थ कब और कहा बनाया इसका उल्लेख उन्होंने ग्रन्थके अन्तमें स्पष्ट कर ही दिया है। इस उल्लेखसे ज्ञात होता है, कि वि० सं० १३६१ में, काठियावाडके वर्तमान वढवान शहरमें उन्होंने इस ग्रन्थको पूर्ण किया। यह वह समय है, जब गुजरातके स्वाधीनता और स्वराज्यका सर्वनाश हुआ और विधर्मी यवनराज्य और पारवश्यका प्रादुर्भाव हुआ। मेरुतुङ्गके सामने ही अणहिलपुरका वह चौलुक्य वंश नामशेष हुआ, जिसके स्थापक पुरुषसे ले कर अन्तिम पुरुषके समय तककी गुजरातके राजकीय, सामाजिक और धार्मिक जीवनकी कुछ विशिष्ट स्मृतियां लिपिबद्ध करनेका उन्होंने इस ग्रन्थमें मौलिक प्रयत्न किया है। मेरुतुङ्ग सूरिके विचारसे, गुजरातमें - अणहिलपुर पाटनमें - वीरप्रकृति राजा वीरधवल और उसके विचक्षण मंत्री वस्तुपाल-तेजपालके बाद और कोई वैसा स्मरणीय पुरुष पैदा नहीं हुआ जिसका नामनिर्देश वे अपने इस ग्रन्थमें करते। यद्यपि वीरधवलके बाद उसके वंशजोंने प्रायः ५०-५५ वर्षतक अणहिलपुरमें राज्यसिंहासनका उपभोग किया, पर उनका शासन प्रायः निष्प्राण और निस्तेजसा ही रहा। मेरुतुङ्ग सूरिको उस शासनकालमें कोई महत्त्व नहीं मालूम दिया और इसलिये उन्होंने उस समयकी किसी भी घटनाका उल्लेख अपने ग्रन्थमें नहीं आने दिया। उनके अभिप्रायमें, वीरधवल और वस्तुपाल-तेजपालके साथ गुजरातके ज्योर्तिमय जीवनकी समाप्ति हो गई। चाहे मेरुतुङ्ग सूरिको, इतिहासके आत्माका दिव्य दर्शन हुआ हो या न हुआ हो, पर इसमें कोई शक नहीं कि उनका यह ग्रन्थलेखन, सचमुच, इतिहासदर्शनकी एक अस्पष्ट पर सूक्ष्म कलाके आभासका उत्तम सूचन करता है। जब हम गुजरातके भूतकालीन राष्ट्रीय जीवन पर एक गहरी दृष्टि डालते हैं, तब हमें यह बहुत स्पष्टताके साथ दिखाई देता है, कि यथार्थ ही, गुजरातके भाग्याकाशमें वीरधवल और वस्तुपाल-तेजपालके बाद, अब तक, वैसा कोई ज्योतिर्धर तेजस्वी तारक उदित नहीं हुआ। और जब तक गुजरातमें पुन वैसा पूर्ण स्वराज्य स्थापित नहीं हो पाता तब तक हम इस अन्तर्दाहक अनुभूतिका मिटा नहीं सकते। * मेरुतुङ्ग सूरिने इस ग्रन्थकी रचना किस लिये की-यह भी उन्होंने ग्रन्थके प्रारम्भमें और अन्तमें, सक्षिप्त रूपमे सूचित किया है। वे कहते हैं कि-“ बारवार सुनी जानेके कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानोंके मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पातीं। इसलिये मैं निकटवर्ती सत्पुरुषोंके वृत्तान्तोसे [ सज्जित ऐसे ] इस प्रबन्ध- चिन्तामणि ग्रन्थकी रचना कर रहा हूं।” (-देखो पृ० २, पत्र ६ का अनुवाद) । इस कथनके भावको स्पष्ट करनेके लिये, इसके नीचे एक टिप्पणी दे कर हमने उसमें कहा है कि-" पुराने जमानेमें व्याख्यानकार और कथाकार प्राय. सदा उन्ही कथा-वार्ताओंको सुनाया करते थे जो महाभारत और रामायण आदि पुराण ग्रन्थोंमें
प्रास्ताविक वक्तव्य [ क्ष प्रसिद्ध हैं। एक-की-एक ही कथा बारंबार सुननेमें विज्ञ मनुष्योंके मनको विशेष आनन्द नहीं आता यह सर्वानुभव सिद्ध बात है। मेरुतुङ्ग सूरिने इस बातका विचार कर, लोगोंका मनोरंजन करनेके लिये, कथाकारोंको, कुछ नई सामग्री प्राप्त हो इस उद्देशसे, कितनेएक इतिहास-वृत्तान्तोंसे अलंकृत ऐसे इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक ग्रन्थकी रचना की।" ग्रन्थके अन्तमें वे, इस रचनाके करनेमें एक दूसरा भी कारण बतलाते हुए लिखते हैं कि- "बहुश्रुत और गुणवान् ऐसे वृद्धजनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है और शिष्योंमें भी प्रतिभाका वैसा योग न होनेसे शास्त्र प्रायः नष्ट हो रहे हैं। इस कारणसे तथा भावी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषोंके प्रबन्धोंका संघटन रूप यह ग्रन्थ मैंने बनाया है।" मेरुतुङ्ग सूरिका यह कथन बहुत अनुभवपूर्ण और भावि परिस्थितिका द्योतक है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि मेरुतुङ्ग सूरि इस ग्रन्थकी रचना द्वारा, इन पुरातन ऐतिह्य श्रुतियोंका, यह विशिष्ट संग्रह न कर जाते तो, आज हमें, उस जमानेकी इन इनीगिनी बातोंके जाननेका भी और कोई साधन उपलब्ध नहीं होता। यह सब-किसीको मंजूर करना पड़ेगा कि जैन धर्मके उस मध्यकालीन इतिहासकी जो अनेकानेक विश्वसनीय और प्रमाणभूत बातें, इस ग्रन्थमें उपलब्ध होती हैं और उसके साथ ही गुजरातके समूचे राष्ट्रीय इतिहासकी भी बहुत आधारभूत जो कथायें इसमें दृष्टिगोचर होती हैं, वैसी और किसी ग्रन्थमें विद्यमान नहीं हैं। ८. प्रबन्धचिन्तामणिके उल्लेखों पर कुछ विद्वानोंके मिथ्या आक्षेप । कुछ कुछ विद्वानोंका खयाल है कि- ग्रन्थकार जैनधर्मी होनेसे, उसने इस ग्रन्थमें अपने धर्मका प्रभाव बतलानेकी दृष्टिसे, बहुत कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कथन किया है; और उसके साथ अन्य धर्मकी-खास करके शैवधर्म और ब्राह्मण संप्रदायकी-लघुता बतानेका भी प्रयत्न किया है। इस ग्रन्थके उक्त अंग्रेजी अनुवादक मि. टॉर्नीने अपनी प्रस्तावनामें, इस बारेमें लिखा है कि- 'जिस तरह, एक्झीटर स्ट्रीटके एक छप्परके नीचेके कोनेमें बैठ कर, पार्लियामेंटके संभाषणोंको लेखबद्ध करते समय, डॉ० ज्योनसन् इस बातकी पूरी सावचेती रखता था कि 'व्हीगके प्रतिपक्षी उसमेंसे किसी तरहका कोई लाभ न उठा पावें'-इसी तरह सभी शकास्पद स्थानोंमें, यह अमर्षशील जैन ग्रन्थकार, स्पष्ट रूपसे महावीरके धर्मके दृढ़ श्रद्धालु अनुयायियों (अर्थात् जैनों) के पक्षकी ओर झुकता है; और जैन लोक, शैवोंकी तुलनामें कहीं नीचे न दिखाई दें इसकी सावधानी रखता है।' इत्यादि। इसमें कोई शक नहीं कि-ग्रन्थकार जैन धर्मका एक विद्वान् धर्माचार्य है और इस ग्रन्थकी रचनामें उसका प्रधान उद्देश जैन धर्मकी पुरातन महत्ता और गौरव गाथाको, कालके कुटिल और प्रबल प्रवाहके कारण नष्ट होनेसे बचा रखनेका है। अतएव वह इसमें अपने धर्मका उत्कर्ष बतानेवाली श्रुतियों और उक्तियोंका यथेष्ट उपयोग करे, यह स्वाभाविक ही है। उस पुराने जमानेमें, जब धार्मिक वाद-विवादकी बड़ी प्रतिष्ठा थी और उसका खूब जोरदार प्रचार था; एवं सभी धर्मोंके और संप्रदायोंके अग्रणी विद्वान् गण अपनी अपनी विद्याका प्रभाव और पराक्रम बतलानेके लिये, राजसभाओंमें, नामी पहलवानोंके मुष्टि-प्रहारोंकी नाईं, वाक्प्र- हारोंकी बड़ी सख्त कुश्ती किया करते थे, तब उन विद्वान् ग्रन्थकारोंकी तद्विषयक रचनाओंमें, ऐसी अमर्षशील भावना और लेखन-शैलीका दृष्टिगोचर होना नितान्त स्वाभाविक ही है। केवल जैन ग्रन्थकार ही इसमें अधिक उल्लेखनीय हैं सो बात नहीं है। संसारके सभी धर्मों, संप्रदायों, मतों और मन्तव्योंके लेखक इससे मुक्त नहीं हैं। मेरुतुङ्ग सूरि भी उन्हींमेंका एक धर्मप्रिय लेखक है, अतः उसके लेखमें, अपने धर्मको नीचा दिखाने-
प्रथम प्रकाश: विक्रमादित्य, सातवाहन व वनराज चावड़ा
घ] प्रबन्धचिन्तामणि वाली किसी उक्तिने न आने देनेकी सावचेतीका रखना, उसका कर्त्तव्य है । ब्राह्मण और शैव ग्रन्थकारोंने भी वैसा ही किया है; मुसलमान और ईसाई इतिहास-लेखकोंने भी वैसा ही किया है — और अब भी सब वैसा ही करते रहते हैं । इसलिये इसमें जैनधर्मके महत्त्वके प्रतिपादनका होना कोई खास दूषण नहीं है । रही बात अति- शयोक्तिकी — सो विशुद्ध इतिहासकी दृष्टिसे किमी भी प्रकारकी अतिशयोक्ति अवश्य ही आलोचनीय है और उसकी प्रामाणिकता विचारणीय है । पर जैसा कि हमने पहले ही सूचित कर दिया है, यह ग्रन्थ कोई विशुद्ध इतिहास ग्रन्थ नहीं है । यह तो कुछ पुरातन प्रकीर्ण पोथियोंमें यत्र तत्र लिखित और कुछ कुछ वृद्ध जनोंके मुखसे यथा-तथा सुन ऐसी इतिहासविषयक कथा-वार्त्ताओंका एकत्र सङ्कलनवाला एक संग्रह मात्र है । अतः इसमेंकी कुछ उक्तियाँ अथवा घटनाएँ, विशुद्ध इतिहासकी दृष्टिसे, यदि भ्रान्तिपूर्ण, अतिशयोक्तिपूर्ण अथवा निर्मूलप्राय भी सिद्ध हों तो उसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । और खुद ग्रन्थकारको भी इस विषयमें कुछ आशंका हुई है, कि उनके इस सङ्कलनमें, विद्वानोंको कुछ बातें संदिग्ध या भिन्नभाववाली मालूम दें । इसलिये उन्होंने ग्रन्थारंभमें यह बात भी इस तरह कह दी है कि—" यद्यपि विद्वानों द्वारा अपनी बुद्धि [ सङ्कलना ] से कहे गये प्रबन्ध [ कुछ कुछ ] भिन्न भिन्न भावोंवाले अवश्य होते हैं, तथापि इस ग्रन्थकी रचना सुसंप्रदाय (योग्य परम्परा) के आधार पर की गई है; इसलिये चतुर जनोंको [ इसके विषयमें ] वैसी चर्चा न करनी चाहिए ।" इस कथनको स्पष्ट करनेके इरादेसे इसके नीचे जो टिप्पणी हमने दी है उसमें लिखा है कि — " मेरुतुङ्ग सूरिने इस ग्रन्थकी सङ्कलना करनेमें कुछ तो पुराने प्रबन्ध-ग्रन्थोंकी सहायता ली और कुछ परंपरासे चली आती हुई मौखिक बातोंका आधार लिया । इस प्रकार परंपरासे सुनी हुई बातोंका परस्पर मिलान करनेमें विद्वानोंको अवश्य ही उनमें कुछ-न-कुछ भिन्न भाव मालूम पड़ता रहता है । मेरुतुङ्ग सूरिको भी अपनी इस रचनामें कहीं कहीं ऐसा भिन्न भाव मालूम हुआ है । इस भिन्न भावके निराकरण करनेका या खुलासा करनेका उनके पास न तो कोई साधन था और न कोई उनको उसकी वैसी आवश्यकता थी । उन्होंने सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त समझा कि हमने जो बातें इस ग्रन्थमें संकलित कीं हैं वे एक सुसंप्रदाय द्वारा प्राप्त की हुई हैं । इसलिये इनके तथ्यातथ्यके बारेमें चतुर मनुष्योंको चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं । प्रबन्धचिन्तामणिकी कुछ बातें ऐतिहासिक दृष्टिसे सर्वथा भ्रान्त भी मालूम होतीं हैं लेकिन मेरुतुङ्ग सूरि उनके लिये निष्पक्ष और निराग्रह हैं।" यद्यपि यह बात ठीक है कि मेरुतुङ्ग सूरिका मुख्य लक्ष्य जैन धर्मके महत्त्वकी ओर रहा है; तथापि उन्होंने अन्य धर्मोंकी निन्दा करनेकी दृष्टिसे या अन्य धार्मिक जनोंकी हीनता बतानेकी भावनासे इसमें कुछ भी नहीं लिखा है । बल्कि प्रसङ्गोपात्त अन्य-धर्म-विषयक कुछ महत्त्वकी बातें भी उन्होंने उसी आदरकी दृष्टिसे लिखी हैं, जैसी अपने धर्मकी लिखीं हैं । उदाहरणके तौरपर, मूलराजके पुत्र-धर्म जो शिवपूजाका प्रभाव और श्वेताचार्य कण्ठडी नामक तपस्वीके तपकी महिमाका वर्णन किया गया है, वह सर्वथा वैसा ही आदरयुक्त पंक्तियोंमें लिखा गया है, जैसा जिनपूजा या किसी जैन आचार्यके बारेमें लिखा गया हो । इसी तरह सिद्धराजकी माता मयणल्लाकी शिवभक्तिके विषयमें जो उल्लेख किया गया है वह भी वैसा ही निष्पक्ष भावसे भरा हुआ है । अगर मेरुतुङ्ग सूरिको शिवधर्मकी महत्ताके बारेमें अनादर होता तो ये इन उल्लेखोंको इसमें स्थान ही क्यों देते । मुख्यतया जैन श्रोताओं (श्रावकों) के सम्मुख, व्याख्यान सभामें, जैन साधुओं-यतियोंके वाचने निमित्त, इस ग्रन्थकी रचना की गई है, इसलिये इसमें जैन व्यक्तियोंका और उनके कार्यकलापोंका ही अधिक वर्णन होना स्वाभाविक है । पर, उसके साथ ही मेरुतुङ्ग सूरिको, गुजरातके सर्व सामान्य प्रजाकीय और राष्ट्रीय जीवनकी उन्नायक इतर व्यक्तियों और उनकी कार्य स्मृतियोंके तरफ भी अनुराग है; और इसलिये उन्होंने अपने इस संग्रहमें, उन इतर व्यक्तियोंकी जीवन-स्मृतियोके भी, यथाश्रुत और यथाज्ञात वृत्तान्तोंको, जहाँ-वहाँ प्रथित
कर लेनेमें कोई संकोच नहीं किया। भोज-भीमप्रबन्धकी बहुतसी स्मृतियाँ इसी दृष्टिसे संगृहीत की गई हैं। सिद्धराजके प्रबन्धमेंकी भी बहुतसी बातें इसी आशयसे लिखी गई हैं। * ९. मेरुतुङ्ग सूरिकी इतिहास-प्रियता। मालूम देता है कि मेरुतुङ्ग सूरिको ऐतिहासिक बातोंमें कुछ अधिक रस था और ऐतिहासिक तथ्यपर पक्षपात था। इसलिये उन्होंने सिद्धराज और कुमारपालके जीवन विषयकी वैसी भी कुछ तथ्यभूत बातें उल्लिखित कर दी हैं जिससे उन व्यक्तियोंके, कुछ चरित्र दुर्बलता और स्वभाव-कृपणता आदि दोषोंकी भी, हमको झांकी हो जाती है। हेमचन्द्र सूरि आदि विद्वानोंने अपनी रचनाओंमें ऐसे दोषोंका बिल्कुल भी आभास नहीं आने दिया है। * इस विषयमें, मेरुतुङ्ग सूरिने सबसे अधिक महत्त्वकी जो सत्य ऐतिहासिक बात लिख डाली है वह है मन्त्रीवर वस्तुपाल-तेजपालकी माता कुमारदेवीके पुनर्लग्नकी। तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक नीतिकी भाव- नाकी दृष्टिसे कुमारदेवीका वह पुनर्लग्न अवश्य निन्दनीय और हीन कार्य समझा जाता था। वैसे कार्यको समाज बड़ी हलकी दृष्टिसे देखता था और उस कार्यके करनेवाली व्यक्तिको बड़े कठोर भावसे समाजसे बहिष्कृत और तिरस्कृत किये करता था। यह तो उस एक-अद्वितीय भाग्यवती कुमारदेवीका लोकोत्तर पुण्यकर्म ही था, जिसके प्रभावसे उसकी कुक्षीमें ऐसे प्रभावशाली पुत्ररत्न पैदा हुए जिनकी समता रखनेवाले पुरुष, सारे संसारके इतिहासमें भी इने गिने ही दिखाई देंगे। इन पुत्र-पुङ्गवोंके प्रतापके कारण कुमारदेवी तत्कालीन समाजमें बड़ी भारी प्रतिष्ठाकी पुण्यभूमि बन सकी और सारे देशके जनोंसे बड़ी श्रद्धाके साथ पूजी और प्रशंसी गई। बड़े-से-बड़े धर्माचार्योंने, बड़े-से-बड़े कवियोंने, बड़े-से-बड़े राष्ट्रपुरुषोंने उसकी प्रतिमाकी पूजा की और उसके नामकी स्तुतियाँ गाईं। पर उसके जीवनका वह महत् प्रेमकार्य, जिसके वश हो कर उसने, अणहिलपुरके एक बड़े खानदानके प्राग्वाट कुटुम्बके पराक्रमी युवक ठाकुर आसराजके साथ पुनर्लग्न किया था, उसकी स्मृतिका किंचित् आभास भी उन समकालीन कवियों और ग्रन्थकारोंने अपनी कृतियोंमें न आने दिया। क्यों कि यह कार्य समाज और धर्मको नापसन्द था। उसकी स्मृतिको जीवित रखना अप्रिय था। श्रद्धेय और पूजनीय माता कुमारदेवीके पुण्य जीवनकी उस मानी गई कृष्णफलताका सूचन करना उन कवियोंके लिये बड़ा पातक कार्य था। महामात्य वस्तुपाल-तेजपाल जैसे जगत्श्रेष्ठ, पुण्यप्रभावक और धर्मोद्धार नरशिरोमणि विधवा-विवाहसे प्रसूत पुत्ररत्न थे, इस विचारको स्मृतिमें लाना भी उन ग्रन्थकारोंके लिये, शायद बड़ा दुखद और दुर्निवारक कर्तव्य था। इसलिये उन्होंने अपनी कृतियोंमें इसकी कहीं भी स्मृति नहीं होने दी। उन्हींका अनुगमन करनेवाले, वस्तुपाल-तेजपालके अन्यान्य पिछले प्रसिद्ध चरित्रकारोंने भी उस बातका कहीं सूचन नहीं होने दिया। परंतु मेरुतुङ्गने अपने ग्रन्थमें इस बातका बहुत ही संक्षेपमें पर बड़े स्पष्ट रूपसे उल्लेख कर दिया। ऐसा ही एक दूसरा स्पष्ट उल्लेख उन्होंने राणा वीरधवलकी माताके विषयमें भी किया है, जो भी इसी तरहका एक सामाजिक अपराधका ज्ञापक हो कर भी ऐतिहासिक तथ्य था। इन उल्लेखोंसे मेरुतुङ्ग सूरिकी सच्ची इतिहास प्रियताका हमको अच्छा आभास हो जाता है। बाकी उस समयके ग्रन्थकारोंके विषयमें, इससे अधिक विशुद्ध इतिहास-दृष्टिकी अपेक्षाकी कल्पना करना और उनमें धार्मिक या साम्प्रदायिक भावनाके पोषक विचारोंका दोषारोप कर, उनके अवाञ्छित कथनोंको भी उपेक्षा- की दृष्टिसे देखना, एक प्रकारकी निजकी ऐतिहासिक दृष्टिकी विपर्यासताका बोध कराना है। *
[ट] प्रबन्धचिन्तामणि १०. ग्रन्थकारके जीवनके विषयमें । ग्रन्थकार मेरुतुङ्ग सूरिके जीवन आदिके विषयमें कोई विशेष वस्तु ज्ञात नहीं होती । ये नागेन्द्र गच्छके आचार्य थे और इनके गुरुका नाम चन्द्रप्रभ सूरि था । धर्मदेव नामक विद्वान् - जो शायद इनके वृद्ध गुरुभ्राता या अन्य कोई गच्छवासी स्थविर साधु-पुरुष थे- उनके पाससे इन्होंने, इस ग्रन्थकी रचनामें बहुत कुछ ऐतिह्य सामग्री प्राप्त की थी । गुणचन्द्र नामक इनका प्रधान शिष्य था जिसने इस ग्रन्थकी पहली सम्पूर्ण प्रतिलिपि लिख कर तैयार की थी । इनकी एक और ग्रन्थकृति उपलब्ध होती है जिसका नाम महापुरुषचरित है । इस ग्रन्थमें, ऋषभदेव, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर - इस प्रकार पाँच तीर्थंकरोंका संक्षिप्त चरित वर्णन है । इसके अतिरिक्त और कोई इनकी कृति हमें अभीतक ज्ञात नहीं हुई । * अन्तमें हम आशा करते हैं कि हिन्दी-भाषा-भाषी जिज्ञासु जन, इस ग्रन्थके वाचन-मननसे अपने प्राचीन इतिहास विषयक ज्ञानमें उचित वृद्धि करेंगे; और खुद ग्रन्थकारने, ग्रन्थान्तमें जो नम्र निवेदन किया है उसकी तरफ लक्ष्य रखनेकी सूचना कर, उसी कथनको उद्धृत करते हुए, हम अपना यह प्रास्ताविक वक्तव्य समाप्त करते हैं । यथाश्रुतं सङ्कलितः प्रबन्धैर्ग्रन्थो मया मन्दधियापि यत्नात् । मात्सर्यमुत्सार्य सुधीभिरेष मङ्गोद्धुरैरुन्नतिमेव नेयः ॥ मार्गशीर्षपूर्णिमा, वि० सं० १९९७ भारतीय विद्या भवन आन्ध्रगिरि (अन्धेरी), बम्बई. -जिनविजय
श्रीमेरुतुङ्गाचार्यविरचित प्रबन्धचिन्तामणि ॥ ॐ नमः सर्वज्ञाय ॥ श्रीनाभिभूर्जिनः पातु परमेष्ठी भवान्तकृत् । श्रीभारत्योश्चतुर्द्वारमुचितं यच्चतुर्मुखी ॥ १ ॥ नृणामुपलतुल्यानां यस्य द्रावकरः करः । ध्यायामि तं कलावन्तं गुरुं चन्द्रप्रभं प्रभुम् ॥ २ ॥ गुम्फान् विधूय विविधान् सुखेवाधाय धीमताम् । श्रीमेरुतुङ्गस्तद्द्वयवन्धाद् ग्रन्थं तनोत्यमुम् ॥३॥ रत्नाकरात् सद्गुरूसम्प्रदायात् प्रवन्धचिन्तामणिमुद्दिघीर्षोः । श्रीधर्मदेवः शतधोदितेतिवृत्तैश्च साहाय्यमिव व्यधत्त ॥ ४ ॥ श्रीगुणचन्द्रगणेशः प्रवन्धचिन्तामणिं नवं ग्रन्थम् । भारतमिवाभिरामं प्रथमादर्शोऽत्र दर्शितवान् ॥ ५ ॥ भृशं श्रुतत्वान्न कथाः पुराणाः प्रीणन्ति चेतांसि तथा बुधानाम् । वृत्तैस्तदासन्नसतां प्रबन्धचिन्तामणिग्रन्थमहं तनोमि ॥ ६ ॥ बुधैः प्रबन्धाः स्वधियोच्यमाना भवन्त्यवश्यं यदि भिन्नभावाः । ग्रन्थे तथाप्यत्र सुसम्प्रदायाद् दब्धे न चर्चा चतुरैर्विधेया ॥७॥ ॥ ॐ सर्वज्ञको नमस्कार हो ॥ जिनकी चतुर्मुखी ( चार मुख ) लक्ष्मी और सरस्वतीका उचित द्वार है, और जो भवका अन्त करनेवाले हैं ऐसे श्रीनाभिभू, परमेष्ठी जिन ( ऋषभनाथ ) रक्षा करे १ ॥ १ ॥ उस कलावान् प्रभु चन्द्रप्रभ नामक गुरुका मैं ध्यान करता हूं जिनका कर (= हाथ, किरण ) पत्थरके समान मनुष्योंको भी द्रवित करनेवाला है २ ॥ २ ॥ १ इस श्लोकमें ग्रन्थकारने ब्रह्मा और जिनदेव ऋषभनाथकी एक साथ स्तुति की है। ब्रह्माके चार मुख होनेसे वे चतुर्मुखके नामसे प्रसिद्ध हैं। जैन शास्त्रोंमें वर्णन है कि भगवान् ऋषभदेव जब धर्मोपदेश देते थे तब वे भी श्रोताओंको चार मुखवाले दिखाई देते थे। इस लिये जिन भगवानको भी चतुर्मुखका विशेषण दिया जाता है। ब्रह्मा भी परमेष्ठी पदसे प्रसिद्ध हैं और जिन भगवान् भी परमेष्ठी कहलाते हैं। ब्रह्मा विष्णुके नाभिकमलसे पैदा हुए ऐसी पुराणोंमें प्रसिद्धि है इस लिये वे नाभिभू कहे जाते हैं और जिनदेव ऋषभनाथके पिताका नाम नाभिराज था इस लिये ये भी नाभिभू कहे जाते हैं। २ इस श्लोकमें ग्रन्थकारने अपने गुरुको नमस्कार किया है जिनका नाम चन्द्रप्रभथा। चन्द्रप्रभ शब्दका श्लेषार्थ करते हुए गुरुकी तुलना चन्द्रमाके साथ की है। चन्द्रमा अपनी १६ कलाओंके कारण कलारन्त कहलाता है, ग्रन्थकारके गुरु भी अनेक विद्या-कलाओंसे अलंकृत होनेके कारण कलावन्त थे। चन्द्रमाके कर याने किरण चन्द्रकान्त मणिको-जो एक प्रकारका पत्थर ही है-द्रवित ( जलविन्दु युक्त ) करते हैं; वैसे ही चन्द्रप्रभ गुरुके कर याने हाथ यदि पत्थरतुल्य मनुष्यके मस्तिष्क ऊपर भी पड़ते हैं तो उसको भी ये द्रवित ( आर्द्र,-कोमलचित्त ) बनाते हैं।
२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश विविध प्रकारके ग्रंथों और प्रबन्धोंको छोड़ कर बुद्धिमानोंको सुखसे जिनका बोध हो सके इसलिये गद्यरचना द्वारा ही मैं मेरुतुंग इस ग्रन्थकी रचना करना चाहता हूँ ३ ॥ ३ ॥ रत्नाकर ( समुद्र ) समान सद्गुरु संप्रदायसे, जब मेरी इस प्रबंधरूप चिन्तामणि (रत्न) के उद्धार करनेकी इच्छा हुई तो धीधर्मदेव ने सैकडो वार इतिहासकी बातें कह कहकर मानों मेरी सहायता की ४॥४॥ जिस प्रकार महाभारत ग्रन्थका प्रथम आदर्श ( पहली नकल ) गणेश ( गजाननने ) तैयार किया, उसी प्रकार इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक नये ग्रंथका प्रथम आदर्श गुणचन्द्र नामक गणेश ( गच्छपति ) ने सुन्दर रीतिसे तैयार किया ५ ॥ ५ ॥ बारंबार सुनी जानेके कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानोंके मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पातीं । इस लिये मैं निकटवर्ती सत्पुरुषोंके वृत्तान्तोंसे [ संकलित ऐसे ] इस प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थकी रचना कर रहा हूँ । ६ ॥ यद्यपि विद्वानों द्वारा अपनी बुद्धि [ संकलना ] से कहे गये प्रबंध [ कुछ कुछ ] भिन्न भिन्न भावों वाले अवश्य होते हैं; तथापि इस ग्रंथकी रचना सुसम्प्रदाय ( योग्य परंपरा ) के आधारपर की गई है; इसलिये चतुर जनोंको [ इसके विषयमें ] वैसी चर्चा न करनी चाहिये ७ ॥ ७ ॥
३ मेरुतुंग सूरिने इस ग्रंथकी रचना की उसके पूर्व, कुछ गद्य और कुछ पद्यमें, कुछ प्राकृत और कुछ संस्कृतमें,
कुछ पुरातन अपभ्रंश और कुछ अर्वाचीन देश्य भाषामें, इस प्रकारके कई छोटे बडे प्रबन्धात्मक ग्रन्थ विद्यमान थे । उन
ग्रन्थोंमैस अपनी मनोवृत्तिके अनुसार कितने एक विषय चुनकर मेरुतुंगने सरल सस्कृत गद्य रचना द्वारा इस ग्रन्थका संकलन किया ।
४ ग्रन्थकार मेरुतुंगसूरिके धर्मदेव नामक कोई वृद्ध गुरुभ्राता अथवा गुरुजन थे जिन्होंने समय समय पर
इतिहासकी सैकड़ों पुरानी बातें सुना सुनाकर इस ग्रन्थकी रचना सामग्रीमें यथेष्ट सहायता दी । इस लिये ग्रन्थकारने अपने गुरुके
बाद उनका भी सम्मानपूर्वक इस श्लोक द्वारा स्मरण और उपकृत भाव प्रदर्शित किया है ।
५ जैन ग्रन्थोंमें यति मुनियोंके समुदायको गण नामसे भी उल्लिखित किया जाता है। गणका नायक जो यति-
आचार्य होता है उसे गणेश-गणपति-गणनायक-आदि शब्दोंसे सम्बोधित किया जाता है। प्रबन्धचिन्तामणिका प्रथम आदर्श
तैयार करनेवाले गुणचन्द्र नामक गणी थे जो शायद मेरुतुंगसूरिके प्रधान शिष्य हों और उनके बाद उनके पट्टपर गणनायक बने
हों । गणेश शब्दसे, ग्रन्थकारने पुराण प्रसिद्ध देव गणपति ( गजानन विनायक ) जिन्होंने वेद व्यास कथित महाभारतकी
प्रथम नकल की, उसके साथ यहां पर श्लेषार्थ कर अर्थ घटना बताई है।
६ पुराने जमानेमें व्याख्यानकार और कथाकार प्राय सदा उन्हीं कथा-वार्ताओंको सुनाया करते थे जो महाभारत और
रामायण आदि पुराण ग्रन्थोंमें प्रसिद्ध हैं। एकही एकही कथा बारबार सुनकर विज्ञ मनुष्योंके मनको विशेष आनन्द नहीं आता
यह सर्वानुभव सिद्ध बात है। मेरुतुंगसूरिने इस बातका विचार कर, कथाकारोंको, लोगोंका मनोरंजन करनेके लिए कुछ नई
सामग्री प्राप्त हो इस उद्देश्यसे, कितने एक इतिहास प्रसिद्ध और निकट समयवर्ती श्रेष्ठ पुरुषोंके ऐतिहासिक वृत्तान्तोंसे अलंकृत
ऐसे इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक ग्रन्थकी रचना की । ग्रन्थकारका यह कथन खास ध्यान देने योग्य है ।
७ मेरुतुंगसूरिने इस ग्रन्थकी संकलना करनेमें कुछ तो पुराने प्रबन्ध-ग्रन्थोंकी सहायता ली और कुछ परंपरासे चली
आती हुई मौखिक बातोंका आधार लिया। इस प्रकार परंपरासे सुनी हुई बातोंका परस्पर मिलान करनेमें विद्वानोंको अवश्य ही उनमें
कुछ न कुछ भिन्नभाव मालूम पड़ता रहता है। मेरुतुंगसूरिको भी अपनी इस रचनामें और दूसरी अन्यकृत रचनामें कहीं कहीं ऐसा
विभिन्नभाव मालूम हुआ है। इस विभिन्नभावका निराकरण करनेका या खुलासा करनेका उनके पास न तो कोई साधन था और
न कोई उनको उसकी आवश्यकता थी। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त समझा कि- इनमें जो बातें इस ग्रन्थमें संकलित
की हैं वे एक सुसम्प्रदाय द्वारा प्राप्त की हुई हैं। इस लिये इनके तथ्यातथ्यके बारेमें चतुर मनुष्योंको चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं।
प्रबन्धचिन्तामणिकी कुछ बातें ऐतिहासिक दृष्टिसे सर्वथा भ्रान्त भी मालूम होती हैं लेकिन मेरुतुंगसूरि उनके लिये निष्पक्ष और
निराग्रह हैं-यह बात इस श्लोकगत कथनसे सूचित होती है ।
प्रकरण १ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [ ३ १. विक्रमार्क राजाका प्रबन्ध । १. इस पृथ्वीतल पर विक्रमादित्य [ कालक्रमसे ] अन्तिम राजा होते हुए भी, अपने शौर्य औदार्य आदि गुणोंसे वह प्रथम और अद्वितीय राजा हुआ¹। श्रोताओंके कानोंमें अमृतकासा आसिंचन करनेवाला उस राजाका इतिवृत्त बहुत कुछ विस्तृत है । हम यहा पर, ग्रंथकी आदिमें उसीका संक्षेपमें कुछ वर्णन करते हैं * । २) वह इस प्रकार है—अवन्ति देशके² सुप्रतिष्ठान³ नामक नगरमें असम साहसका एक मात्र निधि; दिव्य लक्षणों ( चिह्नों ) से लक्षित; सत्कर्म, पराक्रम इत्यादि गुणोंसे भरपूर ऐसा एक विक्रम नामक राजपूत ( राजपुत्र ) था । आजन्म दरिद्रतासे तंग होता हुआ भी वह अति नीति-परायण था; सैंकड़ों उपाय करके भी जब धन नहीं प्राप्त कर सका तो एक बार भट्ट मात्र नामक मित्र के साथ रोहण पर्वत को चला । उसके निकटवर्ती प्रवर नामक नगरमें [ एक ] कुम्हारके घर विश्राम करके प्रातःकाल उस कुम्हारसे भट्ट मात्र ने कुदाल मांगा । उसने कहा—इस जगह खानके भीतर जाकर प्रातःकाल पुण्यात्मक नामका श्रवण करके, ललाटको हथेलीसे स्पर्श कर 'हा दैव !' ऐसा कहकर चोट मारनेसे, दुर्भागी मनुष्यको भी अपनी प्रानिके अनुसार रत्न मिलते हैं । उस भट्टमात्रने कुम्हारसे इस वृत्तान्तको भली भाँति सुन लिया पर विक्रम से इस प्रकारकी दीनता करानेमें वह असमर्थ था । उन साधनोंको साथ लेकर विक्रम जब उस स्थानमें कुदालका प्रहार करनेको उद्यत हुआ तो उस उसम उसने [ अकस्मात् ] विक्रमसे इस प्रकार कहा कि—'अवन्ती से आए हुए किसी वैदेशिकसे घरका कुशल समाचार पूछने पर उसने आपकी माताका मरण बताया है !' इस तरह वज्र-सूची ( हीरा छेदनेकी सुई—हीराकणी ) के समान वचनको सुनकर विक्रम ने हथेलीसे माथा ठोंककर 'हा दैव !' ऐसा कहा और कुदालको हाथसे फेंक दिया । उस कुदालके अग्रभागसे फटी हुई जमीनमेंसे सवा लाख मूल्यका चमकता हुआ रत्न ( हीरा ) प्रादुर्भूत हुआ । भट्ट मात्र उसे लेकर १ मध्यकालीन प्रबन्धकारोंकी यह मान्यता थी कि विक्रमादित्यके बाद उसके जैसा पराक्रमी, शूर, वीर, उदार चेता और कोई राजा नहीं हुआ । उसके पहलेके युगमें यद्यपि पुराणप्रसिद्ध अनेक राजा हुए जो इन गुणोंसे यथेष्ट अलंकृत थे, तथापि ये भी विक्रमके जैसे संपूर्ण आदर्श नृपति नहीं थे । इसलिये इन गुणोंकी दृष्टिसे विक्रम उन राजाओंमें भी सर्व प्रथम स्थान प्राप्त करता है और इसीलिये इस पद्ममें, ग्रंथकारने उसको कालक्रमसे अन्तिम होनेपर भी गुणक्रममें वह सर्व प्रथम था, ऐसा कहा है । प्रबन्धचिन्तामणिका अंग्रेजी भाषामें जो अनुवाद टॉनी नामक अंग्रेज विद्वानने किया है, उसमें उसने अन्त्य इस शब्दका अर्थ अन्त्यज-हीन जातीय ( of Lowest rank ) ऐसा किया है, लेकिन यह भ्रमात्मक है । विक्रम हीन जातीय था ऐसा कहीं भी कोई उल्लेख नहीं मिलता । प्रबन्धोंमें विक्रमका कहीं तो राजपूत जातिके परमारवंश में उत्पन्न होना लिखा है और कहीं हूणवंश में; ये दोनों ही प्रसिद्ध राजवंश है । इस विषयकी विशेष चर्चा हम अगले भागमें करेंगे ।
- इस प्रबन्धचिन्तामणिकी रचनाके पूर्व, विक्रमविषयक कई चरित्र और प्रबन्ध बने हुए विद्यमान थे । ये चरित्र प्रबन्ध बहुत कुछ विस्तृत और विविध वर्णनवाले थे । उनमेंसे कुछ थोड़ेसे वर्णन, संक्षेप करके, मेरुतुंगसूरिने यशानर ग्रथित किये हैं । विक्रम विषयक इस विविध साहित्यका विशेष परिचय हम यथास्थान अगले ग्रन्थमें लिखेंगे । २ वर्तमान मालवेका प्राचीन नाम अवन्ती था । ३ मालवा याने अवन्तीमें सुप्रतिष्ठान नामक कोई नगरका उल्लेख कहीं नहीं मिलता । अवन्तीकी राजधानी प्राचीन काल ही से उज्जयिनी प्रख्यात है और विक्रमकी राजधानी यही उज्जयिनी थी । इसलिये संभव है कि ग्रंथकारने इसी उज्जयिनी को सुप्रतिष्ठान-जिसका प्रतिष्ठान=स्थानम् खूब दृढ है-इस विशेषणसे उल्लिखित किया हो । उज्जयिनीके विशाला आदि और भी उपनाम थे, इसलिये यह भी सम्भव है कि यह सुप्रतिष्ठान भी उसका एक उपनाम हो । दक्षिण अर्थात् महाराष्ट्रकी पुरानी राजधानी प्रतिष्ठान नगरी थी-जो वर्तमानमें निजाम राज्यमें गोदावरी के काँटेपर पैठण नामक कस्बेसे प्रसिद्ध है- उसकी प्रतिस्पर्धा में भी शायद उज्जयिनीको सुप्रतिष्ठान नाम प्रदान किया गया हो ।
४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश विक्रमके साथ लौट आया । फिर उसके शोकरूपी शंकुकी शंकाको दूर करनेके लिये, भट्टमात्रने खानका वृत्तान्त बताते हुए, तत्काल ही उसकी माताका कुशल समाचार कहा । विक्रमने इसे भट्टमात्रकी सहज लोलुपता समझकर उसके हाथसे रत्न छीन लिया, और फिर खानके पास पहुँचा और बोला- २०. गरीबोंके दरिद्रतारूप घावको भरनेवाले इस रोहणगिरिको धिक्कार है जो [ इस प्रकार ] अर्थिजनों [ याचकों ] से 'हा देन !' ऐसा कहलाकर फिर रत्न देता है । यह कह कर उसने सब लोगोंके सामने उस रत्नको वहीं फेंक दिया । फिर देशान्तर भ्रमण करता हुआ अवन्ती की सीमामें पहुँचा । वहा पर, नगरेकी मनोरम ध्वनि सुनकर और उसके कारणका वृत्तान्त जानकर उसका स्पर्श किया१ । फिर उस भट्टमात्रके साथ वह राजमन्दिरमें आया । [ज्योतिषीसे ] बिना पूछे हुए उसी मुहूर्तमें दिनभरके लिये मंत्रियोंने उसे राज-पदपर अभिषिक्त किया । उसने अपनी दूरदर्शितासे समझ लिया कि इस राज्यपर कोई प्रबल राक्षस या देवता क्रुद्ध होकर प्रतिदिन एक एक राजाका संहार करता है और राजाके अभावमें देशका विनाश करता है । इसलिये भक्ति या शक्तिसे उसका अनुनय करना उचित है । यह सोच, नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य आदि बनवाकर, सायंकाल चन्द्रशाला (राजमहलका ऊपरी हिस्सा) में सब कुछ सजा कर रखा । रातकी आरती हो जानेके बाद, अङ्गरक्षकोंसे भारशृङ्खलामें लटकते हुए पलँगपर अपने पट्ट-दुकूल आदिसे आच्छादित तकियाको रखवाकर, स्वयं प्रदीपच्छायामें-अर्थात् ऐसी जगहपर जहाँ प्रदीपका प्रकाश नहीं पड़ता था,-जाकर बैठ गया । हाथोंमें तलवार धारण किये हुए, और धैर्यमें जिसने तीनों लोकको जीत लिया वैसा वह चारों ओर [ तीक्ष्ण दृष्टिसे ] देखता रहा । एकाएक घोर अर्द्धरात्रिको खिड़कीके रास्ते पहले धुआँ उठा, फिर ज्वाला निकली और बादको साक्षात् प्रेतकी प्रतिमूर्तिके समान एक विकराल बेतालको उसने आते देखा । भूखसे उस बेतालका पेट फक हो रहा था, [ इसलिये पहले ] उसने खूब इच्छापूर्वक उन भोज्य द्रव्योंको खाया, फिर गध द्रव्योंको शरीरमें लगाया और पान खाकर सन्तुष्ट होकर फिर वहीं पलँगपर वह बैठ गया और विक्रमादित्य से बोला-' अरे मनुष्य ! मेरा नाम अग्निबेताल है, देवराज (इन्द्र) के प्रतीहार रूपसे में प्रसिद्ध हू । मैं प्रतिदिन एक एक राजाको मारता हू । पर [ आज ] तुम्हारी इस भक्तिसे संतुष्ट होकर मैंने तुम्हें अभयदानपूर्वक यह राज्य दे दिया है । पर इतना भक्ष्य-भोज्य मुझे सदैव देना । इस प्रकार दोनोंमें तै होनेके बाद, कुछ काल बीतनेपर, विक्रमराजाने [उसमे] अपनी आयु पूछी । तब वह यह कहकर चला गया कि-' मैं तो नहीं जानता पर स्वामी (इन्द्र) से जानकर तुम्हें बताऊँगा ।' फिर दूसरी रातको वह आया और विक्रमसे बोला कि-'इन्द्रने तुम्हारी आयु सौ सालकी बताई है ।' राजाने अपने मित्रधर्मका अधिक आरोप करके इस प्रकार अनुरोध किया कि-'इन्द्रसे मेरी आयु सौ वर्षसे एक वर्ष अधिक या कम करा दो !' उसने यह अंगीकार किया और फिर दूसरे दिन आकर यह बात कही-'महेन्द्रके किये भी [ तुम्हारी आयु ] निन्यानवे या एक सौ एक वर्ष नही होगी।' इस निर्णयके जान लेनेपर, राजा दूसरे दिन उसके लिये भक्ष्य-भोज्य न बनवाकरके, लडाईके लिये सज्जित होकर रातमें तैयार रहा । वह वेताल भी यथारीति आकर उन भक्ष्य- भोज्योंको न पाकर क्रुद्ध हुआ और उसने राजा ऊपर आक्रमण किया । बड़ी देरतक उन दोनोंमें युद्ध होता १ प्राचीन कालमें यह प्रथा थी कि राज्यकी ओरसे किसी साहस या दुष्कर कार्यके करने-करवानेकी घोषणा जब कराई जाती थी, तब एक विशिष्ट राजपुरुष, कुछ अन्य राजकर्मचारियों-सैनिकों आदिको साथ लेकर, नगरके प्रधान प्रधान राजमार्गोंसे ढोल या नगाडा बजवाता हुआ घूमता फिरता और मुख्य मुख्य स्थानोंपर खड़ा होकर जो कार्य करना करवाना हो उसकी उद्घोषणा करता । जिस मनुष्यको वह कार्य करना अभीष्ट होता वह उस घोषणाके बाद उस ढोल या नगाड़ेको अपना हाथ लगाता, जिससे वे राजकर्मचारी यह समझ लेते कि इस मनुष्यको यह कार्य करना सम्मत है । फिर उस मनुष्यको वे सम्मानके साथ प्रधान या राजाके पास ले जाते ।
प्रकरण २ ] विक्रमाकॅराजाका प्रबन्ध [ ५ रहा । बादको पुण्यबलके सहायसे राजाने उसे पृथ्वी तलपर पटक दिया, और उसकी छातीपर पैर रखकर कहा कि- ' इष्ट देवताका स्मरण करो ! ' तब वह बोला कि-' मैं तुम्हारे अद्भुत साहससे संतुष्ट हूँ । तुम जो करनेको कहो उस आदेशका पालन करनेवाला मैं अग्नि नामक बेताल तुम्हें¹ सिद्ध हुआ । ' ऐसा होनेपर उसका राज्य निष्कंटक हुआ । इसी तरह अपने पराक्रमसे दिगमण्डलको आक्रान्त करनेवाले उस राजाने छानवे प्रतिद्वन्दी राजाओंके राज्यको अपने अधिकारमें किया । ३. जंगली हाथी, तुम्हारे शत्रुओंके [ उजड पड़े हुए ] घरोंकी स्फटिक निर्मित दीवालपर दूरसे अपनी परछाई देखकर, उसे प्रतिद्वंद्वी हाथी समझकर, क्रोधसे आघात करता है । [उस आघातके कारण ] फिर जब उसका दाँत टूट जाता है तो उसे ही हथिनी समझकर धीरे धीरे साहस¹ के साथ उसका स्पर्श करता है । ² इस प्रकार, कालिदासादि महाकवियों द्वारा की हुई स्तुति ( प्रशंसा ) से अलंकृत होते हुए उसने चिरकाल तक विशाल साम्राज्यका उपभोग किया ।
अब यहाँपर प्रसंगसे महाकवि कालिदास की उत्पत्ति संक्षेपमें कहते हैं-
२) अवन्ती नामक नगरीमें राजा विक्रमादित्य की लड़की प्रियंगुमंजरी थी । वह अध्ययनके
लिये वररुचि नामक पंडितको समर्पण की गई । बुद्धिमती होनेके कारण सभी शास्त्रोंको उसने उस पंडितसे
कुछ ही दिनोंमें पढ़ लिया । वह पूर्ण यौवनावस्था प्राप्त कर चुकी थी, और नित्य अपने पिताकी सेवा करती
थी । किसी समय, वसन्त कालमें दोपहरको-जब कि सूर्य सिरपर आगया था, वह खिड़कीके सामने एक
सुखासन ( सोफा ) पर बैठी हुई थी; इसी समय उपाध्याय ( वररुचि ) रास्तेमें चलते हुए खिड़कीकी छायामें
कुछ विश्राम लेने खड़े रहे । कुमारीने उन्हें देखा और खूब पके हुए आमके फलोंको दिखाया । उसने समझा
कि ये ( उपाध्याय ) उन फलोंके लोलुप हैं, और बोली- ' आपको ये फल ठंडे रुचेंगे या गरम ? ' उसकी
इस बातकी चातुरीको न समझते हुए उस ( उपाध्याय ) ने कहा कि-' गरम ही चाहते हैं ' इस प्रकार
कह कर, उस उपाध्यायने अपना वस्त्र फैलाया जिसमें उसने ऊपरसे वे फल नीचे फेंके । लेकिन फल पृथ्वीपर
गिर पड़े और उससे उनमें धूल लग गई । वररुचि हाथ में लेकर मुँहसे फूंक फूंक कर उस धूलको झाड़ने
लगा । राजकन्याने उपहासके साथ कहा-' क्या ये बहुत गरम हैं कि जिससे मुंहसे फूंक कर ठंडा कर रहे
हो ? ' उसकी इस बातसे चिढ़कर उस ब्राह्मणने कहा-' ऐ अपनेको चतुर समझनेवाली अभिमानिनि ! तूं गुरुके
साथ ऐसा मज़ाक कर रही है; जा तुझको पशुपाल पति मिलो ' । इस प्रकार उनका शाप सुनकर उसने कहा--
' आप तो त्रैविद्य हैं, लेकिन मैं तो, आपसे अधिक विद्यावान् होनेके कारण जो आदमी आपका भी गुरु होगा,
उसीसे विवाह करूंगी । ' उसने इस प्रकार प्रतिज्ञा की । इसके बाद विक्रमादित्य जब कन्याके लिये उचित
श्रेष्ठ वर पाने की चिन्तारूपी समुद्रमें डूब रहे थे, तो वह पंडित जिसे राजाने अभिलषित वर की खोज
करनेका आग्रहपूर्वक आदेश कर रखा था, एक बार एक जंगलमें घूमता हुआ पिपासासे व्याकुल हुआ । जब
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१ मूलमें यहापर ' साहसाङ्कः ' ऐसा सविभक्तिक पाठ है इसलिये इसे हाथीका विशेषण मान कर यह अर्थ किया गया
है । प्रत्यंतरोंमें 'साहसाङ्क' ऐसा निर्विभक्तिक पाठ भी मिलता है जो अर्थदृष्टिसे संबोधनात्मक हो सकता है । उस अर्थमें यह ' हे
साहसाङ्क ! ' ऐसा विक्रमका विशेषण हो सकता है । विक्रम का उपनाम साहसाङ्क था, इसके यथेष्ट प्रमाण मिलते हैं ।
२ यह जो राजाकी स्तुतिका पद्य उद्धृत किया गया है वह महाकवि कालिदास का बनाया हुआ है, ऐसा
मेरुतुंगका मतव्य मालूम देता है ।
६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश चारों ओर कहीं जल नहीं मिला तो एक पशुपालको देखकर उससे जल मांगा । उसने जलके अभावमें दूध पीनेको कहा और बोला कि- 'करचडी' करो । उसके ऐसा कहने पर वररुचि बड़ी चिन्तामें पड़ गया, क्यों कि उसने इसके पहले यह शब्द किसी भी कोष ग्रन्थमें नहीं पढ़ा सुना था । उस पशुपालने उसके मस्तक पर हाथ रखकर और भैंसके नीचे बिठाकर, दोनों हथेलियों को जोड़कर 'करचडी' नामक मुद्रा बताकर, उसे पेट भर कर दूध पिलाया । उस (उपाध्याय) ने अपने मस्तक पर हाथ रखनेके कारण और एक 'करचडी' इस विशेष शब्दके बतानेके कारण, उसे गुरुके समान समझा और फिर उसको ही उस राजकुमारीका समुचित पति निश्चित किया । भैंसोंसे हटाकर उसे अपने महलमें ले आया और ६ महिने तक उसके शरीरकी शुश्रूषा करते हुए "ओं नम शिवाय" इस आशीर्वादको पढ़ाया । ६ महिने बाद जब पण्डितने समझ लिया कि ये अक्षर उसे कण्ठस्थ हो गये हैं तो एक दिन शुभ मुहूर्त्तमें उसको अच्छी तरह श्रृंगार कराके उसे राजसभामें ले गया । राजाको आशीर्वाद देते समय, बहुत बारका अभ्यस्त वह आशीर्वाद भी, सभाक्षोभके कारण "उ श र ट" इस प्रकारके शब्दोंमें बोल गया । उसकी इस ऊटपटांग बातसे राजा विस्मित हुआ । वररुचिने उसकी [मूर्खता छिपाने और] चतुरता बतानेके लिये राजाके सामने कहा- ४. उमाके साथ रुद्र जो, शङ्कर और शूलपाणि है । रक्षा करें तुम्हारी हे राजन्, टंकारके बलसे जो गर्वित है ॥ इस प्रसिद्ध श्लोकद्वारा [जिसके चारों चरणोंके प्रथमाक्षरोंसे 'उशरट' शब्द बनता है] वर रुचिने उसके पाण्डित्यकी गंभीरताका विस्तारपूर्वक विवेचन किया । उसकी बातसे प्रसन्न होकर, राजाने उस भैंस चरानेवालेसे अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया । पर पण्डितके सिखानेसे वह सदा मौन ही रहा करता । राजकन्याने उसकी चतुरता जाननेके लिये, कोई नई लिखी हुई पुस्तकके संशोधनका उससे अनुरोध किया । उसने उस पुस्तकको हथेलीपर रखकर, नखमी लेकर, सारे अक्षरोंको बिंदु और मात्रासे रहित कर दिया । उसे ऐसा करते देख राजपुत्रीने निर्णय किया कि यह तो मूर्ख है । तबसे सर्वत्र ही 'जामातृशुद्धि'१ की कहावत प्रचलित हुई। एक बार दीवाल परके चित्रमें भैंसोंका झुण्ड देखकर, आनदित होकर, वह अपनी प्रतिष्ठा भूल गया और उनके बुलानेकी विकृत बोली बोलने लगा । तब राजकुमारीने निश्चय किया कि यह निरा पशुपाल-भैंसोंका चरवाहा है । फिर यह (चरवाहा) राजकन्याकी अवज्ञा देखकर विद्वत्ताके लिये कालिकाकी आराधना करने लगा। अपनी पुत्रीके वैधव्यसे शंकित होकर राजाने२ रातके समय गुप्त वेशमें दासीको भेजा । उसने यह कहकर कि-'मै तुझे तुष्टमान हुई हूँ' ज्यों ही उठाने लगी त्यों ही विप्लवकी आशङ्कासे, स्वयं कालिका देवीने ही प्रत्यक्ष होकर उसे अनुगृहीत किया । इस वृत्तान्तको सुनकर राजकुमारी प्रमुदित हुई और आकर बोली कि-'क्या कुछ विशेष वाणी प्राप्त हुई है?' ३ उसके ऐसा कहनेपर वह तभीसे कालिदास नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसने कुमारसंभव प्रभृति ३ महाकाव्य और ६ प्रबंध बनाये । -इस प्रकार यह कालिदासकी उत्पत्तिका प्रबंध है ॥ १ ॥ १ 'जामातृ शुद्धि' की कहावत हिंदीमें या गुजराती भाषामें प्रचलित हा ऐसा ज्ञात नहीं हुआ, लेकिन मराठी भाषामें 'जावाइ शोध' नामकी कहावत प्रचलित है । विक्रमार्क और और कथाओंमें भी इसका उल्लेख मिलता है इससे ज्ञात होता है पुराने समयमें यह कहावत गुजरात आदि देशोंमें भी प्रचलित होगी । २ पुत्रीका वैधव्य प्राप्त होनेकी शंका राजाको इसलिये हुई कि वह पशुपाल आमरणान्त उपवास करनेकी प्रतिज्ञा करके देवीकी आराधना करने बैठा था । मेरुतुंगसूरिका यह ग्रन्थ बहुत ही संक्षिप्त शैलीमें लिखा हुआ है, इसलिये इसमें बहुतसी बातें अध्याहृत रहती हैं । दूसरे त्रिबन्धोंमें ये बातें खुलासेके साथ लिखी हुई मिलती हैं ।
प्रकरण ३-७ ] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [ ७ ३) एक वार, उस नगरका निवासी दाता नामक सेठ, हाथमें भेंट लेकर आया और सभामें बैठे हुए विक्रमादित्य को प्रणाम करके कहने लगा- ' महाराज, मैंने शुभ मुहूर्तमें प्रधान बड़इयोंसे एक धवलगृह (महल) बनवाया, और उसमें बड़े उत्सवके साथ प्रवेश किया। मैं जब रातको उसमें पलँग- पर पड़ा हुआ, आधा-सोया, आधा-जागा वाली अवस्थामें था उस समय ' गिरता हूँ' इस प्रकारकी मैंने आकस्मिक वाणी सुनी। मैं मारे डरके ' मत गिरो ' यह कहता हुआ उसी समय वहाँसे भाग निकला । उस मकानके बनवानेके संबंधमें ज्योतिषियों और कारीगरोंको समय समय पर जो धन दान किया गया है वह मेरे ऊपर वृथा दण्ड ही हुआ ! अब इस विषयमें महाराज जो उचित समझें करें ! ' राजाने उस सेठकी बात भली भाँति सुनकर, उस धवलगृहका मूल्य जो तीन लाख उसने बताया, वह उसे चुकाकर, उसको स्वायत्त कर लिया । सायंकाल होनेपर, सर्वावसर १ यानि राजसभामें बैठकर, तत्संबंधी सब कार्योंसे निवृत्त होकर, उस घरमें सुखपूर्वक जा सोया । उसी ' गिरता हूँ' इस वाणीको सुनकर वह असम साहसी राजा बोला कि ' जल्दी गिरो !' और उसके ऐसा कहते ही पास ही गिरे हुए सुवर्ण पुरुषको उसने प्राप्त किया । —इस तरह यह सुवर्ण पुरुषकी सिद्धिका प्रबन्ध है ॥ २ ॥ ४) एक दूसरे अवसरपर कोई अभागा पुरुष, अपने हाथसे बनाये हुए एक लोहेका दुबला पतला दरिद्र नामक पुतला लेकर द्वारपर आया । जब द्वारपाल उसे राजाके पास ले गया तो उसने कहा कि- ' महाराज, आप जैसे स्वामीसे शासित इस अवन्तीपुरीमें सभी चीजें जल्दी बिक जाती हैं और मिल जाती हैं, ऐसी प्रसिद्धि जानकर मैंने चौरासी चौहटोंपर विक्रयके लिये इस दरिद्र-पुतलेको घुमाया, लेकिन किसीने इसे नहीं खरीदा और उलटी मेरी भर्त्सना की गई। आपकी इस नगरीका यह कलंक यथार्थ रीतिसे आपको बताकर, क्या मैं जैसे आया था वैसे ही चला जाऊँ ? यह आपसे पूछने आया हूँ।' उसकी इस घटनाको पुरीका एक महान् कलंक समझकर राजाने उसी समय उसे एक लाख दीनार देकर, लोहेके उस दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया और अपने खजानेमें रखवा दिया । ऐसा करनेपर उसी रातको, सुख पूर्वक सोये हुए राजाके निकट, पहले पहरमें हाथियोंकी अधिष्ठात्री देवता, दूसरेमें घोड़ोंकी अधिष्ठात्री देवता और तीसरेमें लक्ष्मीने आविर्भूत होकर कहा कि - ' महाराजने जब दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया है तो, फिर हमारा यहाँ रहना उचित नहीं है'- यह कह, अनुज्ञा लेकर वे चले जानेको पूछने आये, तो राजाने अपना साहस भग्न न हो इसलिये उनको जानेकी अनुमति दे दी । चौथे पहरमें कोई दिव्य तेजःसम्पन्न उदार पुरुष प्रकट हुआ और बोला किं-' मैं सत्त्व (साहस) हूँ, जानेके लिये आपकी अनुज्ञा चाहता हूँ'। उसके ऐसा पूछनेपर राजा हाथमें तलवार लेकर जब आत्मघात करनेको उद्यत हुआ तो फिर उसने हाथ पकड़कर कहा कि- ' मैं तुष्टमान हुआ' और राजाको उस कृत्यसे रोका । सत्त्वके वहीं रहनेपर हाथी आदिकी तीनों अधिष्ठात्री देवतायें लौटकर राजासे बोलीं-'जानेके संकेतको नष्ट करके सत्त्वने हमें धोखा दिया है। इसलिये राजाको छोड़कर हम लोगोंका जाना अब उचित नहीं है। इस प्रकार वे भी बिना किसी यत्नके ही स्थिर होकर रह गई । [ १ ] तभीतक धन है, तभीतक गुण है, और तभीतक समुज्ज्वल कीर्ति है, जबतक हे सत्त्व (साहस) ! तुम चित्तरूपी नगरमें खेल रहे हो । १ सर्वावसर उस जगहका नाम है जहा राजा अपने मुख्य सिंहासन पर बैठकर सब कोई प्रजाजन और राजकीय पुरुषोंकी मुलाकात लेता देता है और राज्यके सब कार्योंका विचार करता है। दिवान-ए-आम या दरबार-ए-आम यह उर्दू शब्द इसका प्रायः समानार्थक हो सकता है ।