भारतकोश
संग्रह पर लौटें

प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)

Prabandha Chintamani with Hindi Translation

मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished181 पृष्ठ

प्रकरण १८४-१८६ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १२१ १८३) इसके बाद, यह वीर धवल क्षत्रिय, जब कुछ कुछ समझने लायक हुआ तो अपनी माताका यह वृत्तान्त जान कर लज्जित हुआ और अपने ही पिताकी सेनामें आ कर रहा । वह जन्मसे ही 'उदारता, गंभीरता, स्थिरता, नीति, विनय, औचित्य, दया, दान और चतुरता आदि गुणोंसे युक्त था। उसने अपनी शालीनतासे किसी कंटक ग्रस्त भूमिको अपने अधिकारमें किया और फिर पिताने भी कृपा करके कुछ देश दे दिया । चाहड नामक ब्राह्मणको मंत्री बना कर वह राजकारभार चलाने लगा। वहाँ पर, उस समय, आये हुए प्राग्वाटवंशी पत्तन निवासी मंत्री तेजपाल के साथ उसकी मित्रता हुई। * मंत्रीश्वर वस्तुपाल तेजपालका प्रबन्ध । १८४) अब इस प्रकरणमें मंत्री तेजपालके जन्म वृत्तान्तका प्रबंध प्रस्तुत किया जाता है। एक बार, पत्तनमें भट्टारक श्री हरिभद्रसूरि का व्याख्यान हो रहा था। वहीं पर मंत्री आशराज बैठा हुआ था। उस समय एक कुमारदेवी नामकी अतीव रूपवती बालविधवा स्त्री वहा पर आई जिसको ये आचार्य बारंबार देखने लगे। इससे आशराजका चित्त उस पर आकर्षित हुआ । व्याख्यानके विसर्जन होनेके अनन्तर मंत्रीकी प्रार्थना पर गुरुने इष्ट देवताके आदेशसे कहा कि- ' इसके गर्भसे सूर्य और चंद्रमाके भावी अवतारको देखता हूं, इस लिये इसके सामुद्रिकको वारंवार देख रहा था।' गुरुसे इस तत्त्वको जान कर मंत्रीने उसको अपहरण करके उसे अपनी प्रेयसी (पत्नी) बनाया। क्रमशः उसके पेटसे ज्योतिषेन्द्र (सूर्य और चंद्र ) जैसे वस्तुपाल और तेजपाल नामक वे दोनों मंत्री अवतीर्ण हुए। वीरधवलका तेजपालको अपना मंत्री बनाना । १८५) किसी समय श्री वीरधवलने अपने राजकीय व्यापारके भारको ग्रहण करनेके लिये उस तेजपाल की अभ्यर्थना की, तो उसने पहले राजाको उसकी पत्नीके साथ अपने मकान पर भोजनके लिये निमंत्रित किया; और उस समय अनुपमाने राजपत्नी जयतल्लदेवी को कर्पूरके बने हुए अपने दोनों तांडङ्क (कर्णफूल) तथा सोनेके बने हुए और बीच बीचमें मोती और मणियोंसे जडे हुए कर्पूरमय, एकावली हारको उपहार रूपमें दिया । मंत्री जब उपहार देने लगा तो उसका निषेध करके, वीरधवल अपना राज्यकार्यभार उसके हाथोंमें समर्पण करता हुआ बोला कि- 'इस समय तुम्हारे पास जो धन है उसे, कुपित होने पर भी, मैं विश्वास पूर्वक कहता हूं कि कभी ग्रहण न करूंगा।' इस प्रकार पत्र पर प्रतिज्ञालेख लिख कर तेजपालको राज्यव्यापार संबंधी पञ्चाङ्ग-प्रसाद प्रदान किया। २१३. जो बिना करक्रे खजाना बढ़ाये, बिना मनुष्य-वध किये देश-रक्षा करे और बिना युद्ध किये देशवृद्धि करे वही मंत्री बुद्धिमान् कहलाता है। मंत्री तेजपालका धर्मभावसम्मुख होना । १८६) संपूर्ण नीतिशास्त्र और उपनिषत्में बुद्धिको निविष्ट रखने वाला वह मन्त्री अपने स्वामीकी यशोवृद्धि करता हुआ, सूर्योदय कालमें विधिपूर्वक श्री जिनकी पूजा करता, और फिर चंदन और कर्पूरसे गुरुकी पूजा करता । अनन्तर द्वादश आवर्तन करके यथाऽवसर प्रत्याख्यान ले कर रोज गुरुसे एक एक अपूर्व श्लोक पढ़ा करता। राजकार्य करनेके बाद ताजी बनी हुई रसोईका आहार करता। एक बार, मुडाल नामक महोपासक, जो उसका निजी लेखक (गुमास्ता ) था, एकान्तमें पूछने लगा कि- ' स्वामी सबेरे क्या ठंडी रसोई खाते हैं या ताजी ? ' उसके ऐसा पूछने पर वह मंत्री समझा कि यह गँवार है। दो तीन बार उसके ऐसा पूछने पर १६-३२

१२२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश एक बार बड़े क्रोधसे 'पशुपाल' कह कर उसे अपमानित किया । यह धैर्य धारण करके बोला- 'दोनोंमेंसे कोई एक तो होगा ही । (अर्थात् या तो मैं गँवार हूं या मेरी बातको नहीं समझने वाले आप गँवार होंगे ) उसकी वचनचातुरीसे चित्तमें चमत्कृत हो कर मंत्रीने कहा - 'विज्ञ ! तुम्हारे उपदेशकी ध्वनिको मैं समझ नहीं सका । अब यथार्थ बात बताओ ।' ऐसा आदेश पा कर वह वाग्मी बोला कि- 'जिस रसमय ताजी रसोईको आप खाते हैं वह पूर्वजन्मके पुण्यका फल है अतएव मैं उसे अत्यन्त शीतल समझता हूं । जो हो, ये तो मैंने गुरुके संदेश वाक्य ही कहे हैं । तत्त्व तो वे ही जानते हैं, अतः वहीं पधारिये ।' उसकी यह बात सुन कर तेजपाल मंत्री अपने कुलगुरु भट्टारक श्री विजयसेन सूरिके पास गया । गुरुसे गृहस्थ धर्मका विधि-विधान पूछा । उन्होंने उपासकदशा नामक सप्तमाङ्गसे जिनकथित देवपूजा, आवश्यक क्रिया, यतिदान आदि गृहस्थ धर्मका उपदेश दिया । तब उसने विशेषतापूर्वक देवपूजा, जैन मुनियोंको दान आदि देनेवाला धर्मकृत्य आरंभ किया । पूजाके समय चढ़ाये हुए तीन वर्षतकके द्रव्यको निकाला तो ३६ हजार हुआ उससे श्री नेमीनाथका प्रासाद बनवाया । ( यहाँ P प्रतिमें, निम्न लिखित, विशेष श्लोक लिखे हुए पाये जाते हैं-) [ १४८ ] मनुष्योंका अपहरण करने वाले समुद्रप्रयासी जनोंका निषेध करके जिसने पृथ्वी पर अपने धर्मका उदाहरण उपस्थित किया । [ १४९ ] छुआ-छूतके निवारणके लिये अलग अलग हदवाली वेदी बना कर जिस (मंत्री) ने इस ( स्तंभ तीर्थ ) नगरमें छाछके बेचनेका विप्लव दूर किया । [ १५० ] जिसने, जहाँ पर जो कुछ भी न्यून और जो कुछ भी नष्ट था उसे वहाँ पर पूरा किया । क्यों कि उत्तम पुरुषोंका जन्म रिक्त स्थानोंको पूरा करनेके लिये ही तो होता है । [ १५१ ] देवताओंके लिये जिसने ऐसे अनेक उपवन दान कर दिये थे जहाँ पर कामदेवको शिवके नेत्रोंकी अग्निका ताप स्मरण नहीं होता था । [ १५२ ] रंभा ( १ केला, २ अप्सरा विशेष ) से संभावित, नृपसे निषेवित तथा मनोज्ञ ( १ सुंदर, २ मनको जाननेवाले ) सुमनों ( १ फूलों, २ देवताओं ) के वर्गसे सुशोभित जिसके वनोंने स्वर्गके सौन्दर्यको ग्रहण किया था । [ १५३ ] हारीत ( १ पक्षी विशेष, २ स्मृतिकार ऋषि विशेष ) शुक ( १ तोता, २ भागवतका ऋषि ) चित्र-शिखण्डी ( १ मोर, २ महाभारतका एक वीर ) द्वारा संगृहीत जिसके उद्यान धर्मशास्त्रके सधर्मी हो कर सुशोभित हुए । [ १५४ ] इसने सुमनोभाव ( १ सुंदर मनोभाव, २ फूलका भार ) तथा अतुलनीय श्रीमत्ताको दिखाते हुए, स्वर्बंधुके वनोंको ( बन्धुकजातिके पुष्पोंके वनोंको ) अपने बन्धुओंकी नाईं कर दिया । [ १५५ ] जिसके बनाये हुए तालाबोंमेंसे पानी ग्रहण करते हुए कासारगण ( भैंस बैल आदि पशु ) समुद्रमेंसे पानी लेते हुए बादलकी नाईं शोभा देते थे । [ १५६ ] जिस क्रियानिष्ठ पुण्यात्माने ऐसी कितनी ही बावडियाँ बनवाईं जिनके मीठे जलोंने अमृतको भी तिरस्कृत कर दिया । [ १५७ ] उसने पानी पीनेके लिये ऐसे प्याऊ बनवाये कि जिनका जल पी कर पथिकोंके मुख तो तृप्त हो जाते थे किंतु उनकी शोभा देख कर आँखें कभी तृप्त नहीं होती थीं ।'

प्रकरण १८७ ] कुमारपालादि प्रबन्ध । [ १२३ [ १५८ ] जिसने यहाँ पर ( स्तंभतीर्थमें ) भवसागरको पार करनेके लिये नौकारूप ब्रह्मपुरी बनवाई जिसमें पुरुष तो सामगान करते थे और नारियाँ उसका यशोगान करती थीं । [ १५९ ] अपने शुभ्र ऐसे कीर्तिकूट रूप पटसे, दसों दिशाओंका वेष्टन करते हुए स्पष्ट रूपसे, इसने मानों दसों दिशाओंको श्वेताम्बर व्रती बनाया । [ १६० ] जिस तारितात्माने ऐसी पौषधशालायें बनाईं जो भीतरसे तो श्वेताम्बरोंसे ( श्वेताम्बर यतियोंके निवाससे ) और बाहर सुधा ( चूनापोती ) से विशुद्ध थीं । [ १६१ ] जिसकी पौषधशालाओंमें स्त्रीरहित ऐसे यति वास करते हैं जिनको आत्मभू ( पुनर्जन्म तथा पुनर्जन्म ) की कोई संभावना ही नहीं है । [ १६२ ] वाग्देवीने प्रसन्नतापूर्वक जिस मंत्रीको ज्ञानकी ऐसी आंख दी थी कि जिससे यह धर्मकी सूक्ष्म गतिको भी नित्य ही देखा करता था । वस्तुपालकी तीर्थयात्राका वर्णन । १८७) इसके बाद, सं० १२७७ सालमें सरस्वतीकण्ठाभरण, लघुभोजराज, महाकवि, महाऽमात्य श्री वस्तुपालने महायात्रा प्रारंभ की । गुरुके बताये हुए लग्नमें, उन्हींके द्वारा संघाधिपति रूपसे अभिषिक्त हो कर वह जब देवालयके प्रस्थानका उपक्रम कर रहा था, तब दाहिनी ओरसे दुर्गादेवीका स्वर सुनाई दिया, जिसे स्वयं बुद्ध समझ कर, शकुन शास्त्रके जानकारसे उसका विचार पूछा । मरुदेशके एक वृद्ध ( शाकुनिक ) ने कहा कि ' शकुन तो बड़ा भारी हुआ है ' । ' शकुनसे भी शब्द बलवान् होता है ' यह विचार करके नगरके बाहर आवास ( तंबू ) में देवालयको स्थापित किया । फिर उससे शकुनका विचार पूछने पर उस वृद्धने बताया कि, मार्गकी विषमतामें विपरीत शकुन श्रेष्ठ कहा जाता है । [ वर्तमानमें ] राजकीय अन्धाधुन्दीके कारण तीर्थ यात्राका मार्ग विषम हो रहा है । तथा जहां पर यह दुर्गा देख पड़ी थी, वहाँ किसी चतुर पुरुषको भेज कर उस प्रदेशको दिखलाइये । वैसा ही करने पर उस पुरुषने बताया कि-' यह जो बडी (बाडेकी भींत) नई बनाई जा रही है उसके १३॥ हवे थर पर यह दुर्गा बैठी थी ।' यह सुन कर उस मरुवृद्धने कहा कि-' देवी आपको साढी तेरह यात्रा करनेकी सूचना करती है।' अंतिम आधी यात्राका कारण पूछने पर उसने कहा कि-' इस अतुलनीय मगलके अवसर पर यह कहना ठीक नहीं है । यथा समय सब निवेदन करूँगा ।' इस वाक्यके अनन्तर संघके साथ मंत्रीने आगे प्रयाण किया । उस संघकी सब संख्या यों थी- ४॥ हजार वाहन, २१ सौ श्वेताम्बर, तीन सौ दिगम्बर, संघकी रक्षाके लिये १ हजार घोड़े, सात सौ ढाल सांडानिया और संघरक्षाके अधिकारी चार महासामन्त थे। इस प्रकार सारी सामग्रीके साथ मार्ग तै करके, श्रीपादलिप्तपुरके अपने ही बनाये हुए श्रीमन् महावीर देवके चैत्यसे अलंकृत ललिता सरोवरके मैदानमें डेरा दिया। उस तीर्थ पर यथाविधि तीर्थराधना करके मूल प्रासादमें सोनेका कलश, दो प्रौढ़ जिन मूर्तियाँ, श्री मोढेरपुरावतार श्री मन्म- हावीर चैत्य तथा उसके आराधक (यक्ष) की मूर्ति और देवकुलिका, मूल मण्डपके दोनों ओर दो दो चौकीकी कतार, शकुनिका विहार तथा सयपुरावतार चैत्यके सामने चौंरीके तोरण, श्रीसंघके योग्य कई मठ, सात बहनोंकी ७ देव कुलिकायें, नन्दीश्वरावतार-प्रासाद, इन्द्र मण्डप और उसमें हाथी पर चढ़े हुए लवण प्रसाद और वीरधवल की मूर्तियाँ, वहीं पर घोड़े पर चढ़ी सात पूर्वजोंकी मूर्तियाँ, सात गुरुमूर्तियाँ, उसीके निकटकी चौकीमें अपने दो बड़े भाई महं० मालदेव और लूनिग की आराधक मूर्तियाँ, प्रतोली, अनुगमा सरोवर, कपर्दि यक्ष-मण्डप और तोरण आदि बहुतसे धर्मस्थान बनवाये । इसी तरह नन्दीश्वरके कमठाने ( कारखाने ) के लिये कंटेठिया

[ ६२४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश

पाषाणके बने हुए सोलह खंबे पावक पर्वत परसे जलमार्ग द्वारा मँगवाये । जब ये खंबे समुद्रके किनारे उतारे जाने लगे तो उनमेंसे एक स्तंभ इस प्रकार कीचडमें डूब गया कि खोजने पर भी न मिला। उसके बदले अन्य पाषाणका स्तंभ लगा कर वह प्रासाद पूरा किया गया । दूसरे साल समुद्रके पानीकी भरतीके सबबसे वही खंबा कीचडसे बाहर निकल आया । मंत्रीकी आज्ञासे वह खंबा उसकी जगह पर लगाया जाने लगा तो किसी पुरुषने आ कर कहा कि - ' प्रासाद फट गया है'। यह निवेदन करनेको आये हुए पुरुषको भी उस मंत्रीने सोनेकी जीभ इनाममें दी। चतुर आदमियोंने पूछा कि 'यह क्या बात है?' इस पर मंत्रीने कहा कि 'इसके बाद अब धर्मस्थान ऐसे दृढ़ बनवाऊँगा कि युगांतरमें भी उनका पतन नहीं होगा । इसी लिये इसे परितोषिक दिया गया है।' फिर तीसरी बार मूल समेत उखाड कर यह प्रासाद बनाया गया जो [ अब भी ] वर्तमान है। श्री पालीताणा में भी उसने एक विशाल पौषधशाला बनवाई। फिर श्रीसंघके साथ वह मंत्री उज्ज्यन्त ( गिरनार) पहुँचा । वहा उसकी उपत्यकामें तेजलपुर में स्वयं एक नया वप्र (परकोटा) बनवाया और उसीमें श्रीमद् बाशराज विहार नामका मन्दिर तथा कुमार देवी नामका सरोवर भी बनवाया। उस निरुपम सरोवरको देखने बाद, जब नियुक्त पुरुषोंने कहा कि 'धवलगृह (महल) में पधारिये' तो मंत्रीने कहा कि श्री गुरुमहाराजके योग्य पौषधशाला भी है या नहीं ?' यह सुन कर कि वह बनाई जा रही है, तो वह विनयके अतिक्रमणमें भीरु गुरुके साथ, बाहर ही दिये गये आवास (डेरे) में ठहरा। प्रातःकाल उज्ज्यन्त पर आरोहण करके श्री शैवेय ( नेमिनाथ ) के चरणयुगलकी भली भाँति पूजा कर, स्वयं बनाये हुए श्री शत्रुं- जयावतार तीर्थमें खूब प्रभावनायें कर, तथा कल्याण त्रय चैत्यमें श्रेष्ठपूजोपचारसे अर्चना करके वह मंत्री जब नीचे उतरा तो इन दो दिनोंमें वह पौषधशाला तैयार हो चुकी थी। मंत्री गुरुको अपने साथ वहाँ ले आया। उन्होंने उन बनाने वालोंकी प्रशंसा की और पारितोषिक दान दे कर उनको अनुगृहीत किया। श्री पत्तन में प्रभासक्षेत्रमें चन्द्रप्रभ देवको प्रणाम करके प्रभावनाके साथ यथोचित पूजा की। फिर अपने बनाये हुए अष्टापद प्रासाद पर सोनेके कलशका समारोपण करके, देवके पुजारियोंको दान दिया। वहाँके ११५ वर्षकी अवस्था वाले वृद्ध पूजारीके मुँहसे यह सुन कर कि- ' यहाँ पर प्रभुश्री हेमाचार्य ने कुमारपाल नृपतिके सामने श्री सोमेश्वर देवको जगद्विदित रूपसे प्रत्यक्ष किया था' उन (प्रभु) के चरित्रसे मनमें चकित हो कर यहाँसे लौटा। रास्तेमें लिंगधारियोंके असदाचारको देख कर उन्हें अन्न देनेका निषेध किया। यह सुन कर वायटीय गच्छ के श्री जिनदत्तसूरिने इस बातसे उसका अपयश समझ कर, अपने उपासकके पाससे उन्हें अन्नदान दिलाया। यह सुन कर वह मंत्री उनके दर्शन और अनुनयके लिये आया तो उन्होंने उसे उपदेश दिया कि -

२१४. क्षार जलके समान इन लिंगधारियोंकी परिपूर्णतासे ही तो यह शासन (धर्म) रूप समुद्र गंभीरताको धारण कर रहा है। २१५. संविग्न साधु भी इन लिंगधारियोंकी अनुवन्दना करते ह तो फिर धार्मिक और भवभीरु पुरुषको उनकी पूजाकी चर्चा क्यों करनी चाहिए । २१६. प्रतिमाधारी (श्रावक) भी इनके सामने विषयका त्याग करते हैं इस लिये विषयवाले इन लिंगधारियोंकी पूजाका मना करना तो विरोधवाली बात है। २१७. जो लोग, लिंगोपजीवियोंकी अवधीरणा (तिरस्कार) करते हैं वे दुराशय दर्शन (संप्रदाय) के उच्छेदके पापसे लिप्त होते हैं।

प्रकरण १८७-१८८ ] कुमारपालादि प्रबन्ध , [ १२५ आवश्यक - वंदना निर्युक्तिमें कहा है कि- २१८. तीर्थंकरोंके गुण उनकी प्रतिमा ( मूर्ति ) में नहीं हैं, यह निःसंशय जानता हुआ भी यह तीर्थंकर है ऐसा मान कर उसको नमस्कार करने वाला विपुल कर्मनिर्जरा ( कर्मका नाश ) प्राप्त करता है। २१९. इसी प्रकार, जिन देवके प्रज्ञापन किये हुए लिंग (वेष) को नमस्कार करना भी विपुल निर्जराका हेतु है। यद्यपि यह गुणहीन होता है तथापि अध्यात्म शुद्धिके लिये उसे वन्दन करना उचित है। इस प्रकार उनके उपदेशसे अपने सम्यक्त्व रूप दर्पणको मांज कर विशेष रूपसे दर्शन ( संप्रदाय ) की पूजामें परायण हो, स्वस्थान पर आ कर ठहरा । मंत्री तेजपालका आबू पर मन्दिर बनवाना । १८८) ज्येष्ठ भ्राता मं० लूणिगने परलोक प्रयाणके अवसर पर यह धर्मव्यय माँगा था कि-'अर्बुद गिरि पर विमलवसहिकामें मेरे योग्य एक देवकुलिका बनवाना।' उसके मरने पर, वहाँके गोष्टियों (पुजारियों) से उस मंदिरमें भूमि न पा कर, विमलवसहिकाके समीप ही चन्द्रावतीके स्वामीसे नई भूमि ले कर वहीं पर तीनों भुवनके चैत्योंमें ( मन्दिरोंमें ) शलाका ( अग्रगण्य ) जैसा लूणिगवसहिका प्रासाद बनवाया । उसमें श्री नेमिनाथके बिंबकी स्थापना करके उसकी प्रतिष्ठा कराई । उस मन्दिरके गुण-दोषकी विचारणा करनेके लिये जाबालिपुरसे श्रीयशोवीर मंत्रीको बुला कर मंत्री तेजपालने प्रासादके विषयमें अभिप्राय पूछा। उसने प्रासादके बनानेवाले स्थपति ( कारीगर ) शोभनदेव से कहा- ' रंगमण्डपमें शालभंजिका ( पुतली ) की जोड़ीकी विप्रस-घटना, तीर्थंकरके प्रासादमें सर्वथा अनुचित और वास्तुशास्त्रसे निषिद्ध है। इसी तरह भीतरी गृहके प्रवेश द्वारमें सिंहोंका यह तोरण देवताकी विशेष पूजाका विनाश करने वाला है। तथा पूर्वज पुरुषोंकी मूर्तियोंसे युक्त हाथियोंके सम्मुख प्रासादका होना, बनाने वालेके भविष्यके विनाशका सूचक, होता है। इस विज्ञ कारीगरके हाथसे भी जो इस प्रकारके अप्रतीकार्य ये तीन दोष हो गये, यह भावी कर्मका दोष है।' ऐसा निर्णय करके वह जैसे आया था वैसे ही चला गया। उसकी स्तुतिके ये श्लोक हैं- २२०. हे यशोवीर, यह जो चंद्रमा है वह तुम्हारे यशरूपी मोतियोंका मानों शिखर है; और इसमे जो लांछन है वह इस यशकी रक्षाके लिये (किसीकी नजर न लग जाय इस लिये) किया गया रक्षा (राख) का ' श्री ' कार है। २२१. हे यशोवीर, शून्य जिनके मध्यमें हैं ऐसे ये बिन्दु यों तो निरर्थक ही हैं; पर तुम रूप एक ( अंक ) के साथ हो जानेसे ये संख्यावान बन जाते हैं। २२२. हे यशोवीर, जब विधाताने चंद्रमामें तुम्हारा नाम लिखना आरंभ किया तो उसके पहलेके दो अक्षर (यशः) ही भुवनमें नहीं समा सके । [ १६३ ] यशोवीरके निकट न कोई [कवि] माघकी प्रशंसा करता है न कोई अभिनंदका अभिनंदन करता है; और कालिदास भी उसके पास कलाहीन ( निस्तेज ) मालूम देता है। [ १६४ ] यशोवीर मंत्रीने सज्जनोंके साक्षात् ( सम्मुख ), मुखमें रही दातोंकी ज्योतिके बहाने ब्राह्मी (सरस्वती) को और हाथमें रही हुई सोनेकी मुद्राके बहाने श्री (लक्ष्मी) को प्रकाशित किया। [ १६५ ] इस चौहान नरेन्द्रके मंत्रीने वैसे गुण अर्जन किये जिनसे ब्रह्मा और समुद्रकी पुत्रियों ( लक्ष्मी और सरस्वती ) को भी नियंत्रित कर दिया ।

१२६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश [ १६६ ] जहाँ लक्ष्मी है वहाँ सरस्वती नहीं है, जहाँ ये दोनों हैं वहाँ विनय नहीं है । पर हे यशोवीर, यह बड़ा आश्चर्य है कि तुममें ये तीनों विद्यमान हैं । [ १६७ ] वस्तुपाल और यशोवीर ये दोनों सचमुच ही वाग्देवता ( सरस्वती ) के पुत्र हैं, नहीं तो फिर इन दोनोंका दान करनेमें एक ही जैसा स्वभाव कैसे होता । इस प्रकार श्री शत्रुंजयादि तीर्थोंकी यात्राका प्रबंध समाप्त हुआ । * वस्तुपालका शंखराजके साथ युद्ध करना । [८९] स्तंभतीर्थमें, सइद ( सय्यद ) नामक नौवित्तक ( जहाजी व्यापारी ) से श्रीवस्तुपाल की लड़ाई होने पर उसने भृगुपुर से शंख नामक महासाधनिकको वस्तुपाल के विरुद्ध वाठरूप फालको उठाया । वह समुद्रके किनारे डेरा डाल कर रहा । उसने देखा कि नगरका प्रवेशमार्ग शंकुसे ( जन समूहसे ) संकीर्ण है और व्यापारियोंके जहाज धनसे भरे हुए हैं । अपने बंदी ( दूत ) को भेज कर वस्तुपालके साथ लड़ाईके दिनका निश्चय किया । जब उसने चतुरंग सेना सजाई तो वस्तुपालने गूड जातिके भूर्णपाल नामक सुभटको आगे किया । भूणपाल ने प्रतिज्ञा की कि- 'शंख के सिवा यदि दूसरे पर प्रहार करूं तो मैं उसे कपिला गौपर ही प्रहार करना मानूंगा' । फिर बोला कि 'अरे शंख कौन है ?' इस वचनके उत्तरमें प्रतिभट ( शत्रुके सैनिक ) ने कहा कि 'मैं शंख हूं' तो उसे तलवारकी धारसे मार गिराया; फिर इसी रीतिसे दूसरे और तीसरेको भी गिरा देनेके बाद बोला कि- 'समुद्रके नजदीक होनेसे क्या शंखोंकी संख्या बढ़ गई है ?' तो महासाधनिक शंखने ही उसकी सुभटताकी प्रशंसा करते हुए बुलाया । उसने फिर भालेके अग्रभागसे उस पर प्रहार करते हुए एक ही प्रहारमें घोड़ेके साथ उसे मार डाला । इसके बाद, समरभूमिके प्रेमी श्रीवस्तुपालने, सिंहकिशोर जैसे गजयूथको त्रस्त करता है वैसे, शंखके सैन्यको त्रस्त बना कर दसों दिशाओंमें भगा दिया । [ पीछे सइद नौवित्तक भी मार डाला गया ।] फिर भूणपाल की मृत्युके स्थान पर मंत्रीने भूणपालेश्वर प्रासाद बनवाया । ( यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक अधिक पाये जाते हैं-) [ १६८ ] धनुषकी प्रत्यञ्चासे काण्डों ( बाणों ) की तो सन्धि ( सुलह और योग ) हुई पर उन वीरप्रकाण्डोंमें परस्पर विग्रह हुआ । [ १६९ ] बाणोंने स्पष्ट ही दुर्जनोंकी सी चेष्टा की । क्यों कि ये कानमें तो दूसरेके लगते थे और जीवननाश दूसरेका करते थे । [ १७० ] तरकसको छोड़ कर बाण वेगसे धनुष पर आ जाते थे । यही तो सपक्षोंका ( १ अपने पक्षवालोंका, २ पक्षसहितों - बाणोंका ) चिह्न है कि विपत्कालमें आगे रहते हैं । [ १७१ ] विपक्षीय बैरियोंके वक्षःस्थलमें लग कर बाण पार निकल गये । [ सो ठीक ही है ] क्यों कि धीरोंके हृदयमें निर्गुणोंको थिर अवस्थान नहीं प्राप्त होता । [ १७२ ] मंत्रीशके हाथके संसर्गसे तलवार भी मानो दानके लिये उद्यत हो कर, बद्धमुष्टि होते हुए भी, क्षण भरमें कोश ( १ म्यान, २ खजाना ) का उत्सर्ग ( १ त्याग, २ दान ) किया । [ १७३ ] वीरोंके चरण और हाथ रूपी कमलसे पूजित हो कर रणभूमि भी मानों दूर्वारूपी केशोंके साथ सिररूपी फलोंका दान करने लगी । *

प्रकरण १८९-१९१ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १२७ १९०) इसके बाद, एक दूसरे अवसर पर, श्रीसोमेश्वर कवि ने यह काव्य कहा - २२३. हे सचिव ! आपका [ बनाया हुआ ] तड़ाग जिसमें चक्रवाक पक्षी चल रहे हैं और आति ( एक प्रकारके पक्षी जिसको देशभाषामें आड कहते हैं) क्रीड़ा कर रहे हैं, वह, अत्यन्त प्रशंसित ऐसे हंसोंसे, कमल को छू कर हिलोले लेती हुई तरंगोंसे, अन्तर्गभीर जलोंसे, और चंचल बर्कोंके ग्रास होने के भयसे छिपे हुए मत्स्योंसे, तथा किनारे पर उगे हुए वृक्षोंके नीचे सुखपूर्वक शयन किये हुई स्त्रियोंके गाये हुए गीतोंसे शोभित हो रहा है । इसमें प्रयुक्त 'आति' शब्दके पारितोषिकमें¹ मंत्रीने कविको सोलह हजार द्रम्मका दान दिया । कभी फिर (किसी समय) मंत्री चिन्तातुर हो कर नीचे जमीनकी ओर देख रहे थे तब सोमेश्वर ने यह यह समयोचित पद्य पढ़ा - २२४. वाग्देवीके मुखकमलके तिलक समान हे वस्तुपाल ! 'तुम्ही एक मात्र भुवनके उपकारक हो' -ऐसी सज्जनोंकी बात सुन कर जो लज्जासे सिर झुका कर तुम पृथ्वीतलकी ओर देख रहे हो, सो मैं मानता हूं कि, अब स्वयं पातालसे बलिक उद्धार करनेके लिये कोई मार्ग ढूंढ रहे हो। मंत्रीने इस काव्यके पारितोषिकमें आठ हजार दिया। इसी तरह पंडितोंके बार बार इस श्लोकके ये तीन चरण पढ़ने पर कि- २२५. 'कर्णने दानमें चर्म दिया, शिविने मांस दिया, जीमूतवाहनने जीव और दधीचि ने अस्थि दिये'- इस पर पण्डित जयदेव ने समस्या पदकी नाईं-[ चौथा पद ] कहा-'और वस्तु पालने वसु (धन) दिया।' ऐसा कहने पर उसने ४ सहस्र पाया । इसी प्रकार सूरि (अपने धर्मगुरु) के शिष्योंकी प्रतिलाभनाके अवसर पर, किसी दरिद्र ब्राह्मणने याचना की, तो उसके नियुक्त आदमियोंसे उसे एक वस्त्र मिला; जिसे पा कर उसने मंत्रीके आगे यह समयोचित पद्य पढा- २२६. हे देव ! कहीं रूई, कहीं सूत, और कहीं कपासके बीज लगी हुई यह हमारी पटी (पिछोडी ) तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियोंकी कटीकी तरह दिखाई दे रही है । इसके पारितोषिकमें मंत्रीने १५ सौ दिया। इसी तरह बालचन्द्र नामक पंडितने मंत्रीके प्रति यों कहा- २२७. हे मंत्रीश्वर ! गौरी तुम्हारे ऊपर अनुरागवती है, वृष तुम्हारा आदर करता है, भूतिसे तुम युक्त हो और गुणवान् शुभगण तुम्हारे पास हैं। सो निश्चय ही ईश्वर (शिव) की सभी कलाओंसे युक्त ऐसे तुम्हें अब बालचंद्रको ऊंचास्थान देना उचित है। तुमसे बढ़ कर समर्थ और कौन है। [गौरी, वृष, भूति, गण, और बालचंद्र-इन शब्दोंके प्रसिद्ध अर्थके अतिरिक्त, गौर स्त्री, धर्म, वैभव, सेना और बोलने वाला कवि ये क्रमशः श्लेषके अर्थ हैं । ] कविके ऐसा कहने पर मंत्रीने उसके आचार्य पदकी स्थापनाके लिये चार हजार द्रम्म खर्च किया । मंत्रीका मुसलमान सुलतानके साथ मैत्री संबन्ध बांधना । १९१) किसी समय म्लेच्छराज (मुसलमान) सुलतानके गुरु माठिम (मौलवी) को मख (मक्का) तीर्थकी यात्राके लिये वहाँ आया हुआ जान कर उसे पकड़नेके इच्छुक श्री लवणप्रसाद और वीरधवलने मंत्री तेजपाल से सलाह पूछी । उसने इस प्रकार बताया- १ यह आति शब्द प्रायः संस्कृत साहित्यमें कहीं नहीं प्रयुक्त हुआ है इसलिये इसका अभिनव प्रयोग किया गया देख कर मंत्रीने यह दान दिया मालूम देता है ।

१२८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश २२८. धर्मच्छलका प्रयोग करके जो राजालोक ऋद्धि प्राप्त करते हैं, वह मांके शरीरको बेंच कर पैसा कमानेके समान होती है । इस नीतिशास्त्रके उपदेशद्वारा, उन वृक (भेडियों) जैसोंके मुंहस उस छाग (बकरे) को छुड़ा कर और पाथेयादिसे सस्कृत कर, तीर्थयात्रा करनेके लिये रवाना किया । कुछ सालके बाद, वह जब वापस लौट कर आया तो मन्त्रीने फिर उचित सत्कारसे उसका आदर किया । इससे वह अपने स्थान पर पहुंच कर [अपने सुलतानके सामने] तीर्थ यात्राका बखान करनेके बदले श्रीवस्तुपालके गुणोंका ही बखान करने लगा । इसके बाद वह सुलतान प्रति- वर्ष मन्त्रीके पास यमलकपत्र (संधिपत्र) भेज कर अनुरोध करता रहा कि- 'हमारे देशके आप ही अध्यक्ष हैं, और हम तो आपके सेलभूत (सामंत) हैं। सो हमें किसी करणीय कार्यका आदेश दे करके सदा अनुगृहीत किया करें' । मंत्रीने शत्रुंजय तीर्थके भूमिगृहमें रखनेके लिये सुलतानकी अनुज्ञासे, उसके देशमेंकी मम्माणी नामक खानमेंसे, सैकड़ों प्रयत्न करके युगादि जिन की एक मूर्ति बनवा कर मगवाई। सुलतानने अपनेको धन्य मानते हुए वह कार्य करने दिया । वह मूर्ति जब पर्वत पर चढ़ाई जा रही थी तो मूलनायकके अमर्षसे पर्वत पर बिजली गिरी । इसके बाद मंत्रीश्वरको फिर जीवनांत तक शत्रुंजय देवके दर्शन नहीं हुए । अनुपमाकी दानशीलता । १९२) किसी पर्वके अवसर पर, अनुपमादेवी मुनियोंको यथेच्छ निरुपम दान दे रही थी । तब किसी राजकार्यकी उत्सुकताके कारण स्वयं वीरधवलदेव उस समय वहा आ पहुचा तो उसने देखा कि श्वेताम्बर साधु-यतियोंकी भीड़से मकानका दरवाजा मानो ढपा हुआ है । तब विस्मयसे मनमें चकित हो कर वह मंत्रीसे बोला - 'हे मंत्री, अभिमत देवताकी भाँति, सदा ही इन साधुओंका इस तरह सत्कार क्यों नहीं किया करते ? अगर तुमसे न हो सकता हो तो आधा हिस्सा मेरा रहे । मेरा ही सदा दिया जाय - ऐसा तो इस कारणसे नहीं कहता कि वैसा करने पर तो फिर तुमको यह वृथा ही परिश्रम करने जैसा लगे ।' उसके मुखचन्द्रसे इस प्रकार वाणीरूप किरणके निकलने पर मंत्रीके मनका संताप दूर हुआ और वह बोला- 'स्वामीका आधा हिस्सा क्या ? सब कुछ तो आप ही का है ।' यह कह कर उसने वस्त्र निछावर किया । १९३) एक दूसरी बार, यतिदानके अवसर पर, अनेक मुनियोंकी भीड़के कारण नमन करती हुई श्रीमती अनुपमाकी पीठ पर घीमे भरा हुआ एक पात्र गिर पड़ा । यह देख कर मंत्री तेजपाल बड़ा कुपित हुआ । उसे कुपित देख कर अनुपमाने यह कह कर सान्त्वना दी कि-'आप जैसे स्वामीके प्रभावसे ही तो मुनिजन द्वारा गिराये गये पात्रके घीसे मेरा यह अभ्यङ्ग (घृतस्नान) हुआ ।' इस प्रकार उसकी पूर्णदानकी विधिसे चमत्कृत हो कर, मंत्रीने पश्चाङ्ग प्रसाद पूर्वक उसकी इस उचित उक्तिसे प्रशंसा की- २२९. प्रिय वाणीपूर्वक दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शूरता और त्यागसहित धन, ये चार भद्र ( भले ) कार्य दुर्लभ हैं । इस प्रकारकी अनेक दानवार्ताओंसे प्रसिद्धी पाने वाली उस देवीकी जैनाचार्योने इस तरह स्तुति की- २३०. लक्ष्मी चञ्चला है, शिवा चण्डी (कोपना) है, शची सौतदोषसे दूषित है, गंगा निम्नगामिनी है और सरस्वती वाचाल है । इस लिये अनुपमा तो सब तरहसे अनुपमा ही है । * वीरधवलकी रणशूरता । १९४) एक दूसरी बार, लवणप्रसाद और वीरधवल पञ्चग्रामके [ स्वामीके ] साथ संग्राम करने पर जुड़े । तब श्री वीरधवल की पत्नी जयतलदेवी संधिविधानकी इच्छास अपने पिता प्रतीहार वंशीय श्री

प्रकरण १९१-१९७ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १२९ शोभनदेवके पास गई तो उसने कहा कि क्या- 'वैधव्यसे डर कर सन्धि कराने आई हो ?' तब अपने वीरचूड़ामणि पति वीरधवलको उन्नत बनाती हुई वह बोली-'केवल पितृकुलके विनाशकी आशंकासे मैं बारंबार ऐसा कह रही हूं। जब वह वीर घोडे पर चढ़ेगा तो ऐसा कौन सुभट है जो उसके सामने खड़ा रहेगा ?' यह कह कर वह सक्रोध चली गई। लड़ाई छिड़ने पर वीरधवलको [ एक सख्त ] प्रहार लग गया और उसकी व्यथासे व्याकुल हो कर वह जमीन पर गिर पड़ा। तब सुभटोंका दिल कुछ हिम्मत हारता हुआ देख, लवण- प्रसादने अपनी सेनाको यह कह कर उत्साहित किया कि- 'अरे ! यह तो केवल एक ही सैनिक गिरा है' ऐसा कह कर समस्त शत्रुसेनाका खेलमें ही समूल ध्वंस कर दिया। सत्त्वगुणसे दीप्त वह वीरधवल [ इस प्रकार ] रणरसिकताके वश हो कर इक्कीस बार अपने पिताके आगे गिरा था। वीरधवलकी मृत्यु । २३१. वह भीम जैसा पराक्रमशाली (वीरधवल ) पल्ल ग्राम की समरभूमिमें घावोंके लगने पर घोड़ेकी पीठ परसे गिरा, पर गर्वसे नहीं । १९५) वीरधवल की आयुके अन्तमें, प्रतितीर्थ ( परलोक ) को प्रस्थान करने वालेको दान करनेसे एकका हजार गुणा मिलता है, इस रूढ़िके अनुसार तेजपालने अपने सारे जन्मका पुण्य दान कर दिया । फिर जब वह स्वामी चल बसा तो उसके सौभाग्यके अतिशयसे १२० सेवकोंने सहगमन किया । तब तेजपालने प्रेतवनमें पहरेदारोंको बिठा कर लोगोंको उस आग्रहसे निवृद्ध किया । २३२. अन्यान्य ऋतु तो आती-जाती रहती हैं पर ये दो ऋतु आ कर फिर नही गईं। वीरधवल वीरके विना प्रजाओंकी आँखोंमें वर्षा और हृदयमें ग्रीष्म [ सदाके लिये रह गईं । ] १९६) इसके बाद, मंत्रीने वीरधवलके पुत्र वीसल देव को राजपद पर अभिषिक्त किया । * अनुपमाकी मृत्यु । श्री अनुपमादेवी की मृत्युके बाद श्री तेजपालके हृदयमें जो शोककी गांठ बंध गई वह किसी तरह छूटती नहीं जान कर, वहां पर आये हुए श्री विजयसेन सूरिसम समर्थ पुरुषके द्वारा वह विपत्ति शान्त कराई गई । कुछ चेतना होने पर लज्जित तेजपालसे सूरिने कहा-' हम इस अवसर पर तुम्हारी लीला देखने आये थे । तो वस्तुपालने पूछा कि-' वह क्या ?' इस पर गुरुने कहा-' हमने शिशु तेजपालको ब्याहने के लिये जब धरणिग के पाससे उसकी कन्या इस अनुपमा की मंगनी की थी, तब स्थिरपत्र-दानके पश्चात् एकान्तमें उस कन्याकी विरूपताकी बात सुन कर, इसने उसका संबंध भंग होनेके लिये चन्द्रप्रभके मन्दिरके आहातेमें प्रतिष्ठित क्षेत्राधिपतिको आठ द्रम्म का भोग चढ़ाना माना था। और इस समय उसके वियोगमें पागल हो गये हैं । इन दोनों वृत्तान्तोंमेंसे कौनसी बात सच्ची है ?' इस प्रकार उस पुराने संकेतसे तेजपालने अपने हृदयको दृढ़ किया । वस्तुपालकी मृत्यु । १९७) फिर दूसरी बार, जब मंत्री वस्तुपाल पूर्णायु हुए तो शत्रुंजय की यात्राकी इच्छा की। यह जान कर पुरोहित सोमेश्वर देव यहाँ आया । अमूल्य आसन देने पर भी जब वह नहीं बैठना चाहा तो कारण पूछने पर बोला- ३३-१४

१३० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश १३३. श्री वस्तुपालके अन्न-दान, जल-पान, और धर्मस्थानोंसे तो पृथ्वीतल, और यशसे सारा आकाश-मंडल ढंक गया है। इसलिये स्थानाभावके कारण नहीं बैठ रहा हूं। उसकी इस वाणीके निमित्त उचित पारितोषिक दे कर, उससे विदा मांग कर, मंत्रीने रास्तेमें प्रस्थान किया। आंकेवालीया ग्रामकी एक गंवारु झोंपड़ीमें दामकी चटाई पर बैठा हुआ, गुरुद्वारा आराधना करता हुआ आहारका त्याग करके, अन्तिम आराधनासे कलिमलका ध्वंस किया और अन्तमें युगादिदेवका ही जाप करता हुआ- २३४. सज्जनोंके स्मरण करने लायक ऐसा कुछ भी सुकृत नहीं किया। केवल मनोरथ ही करते हुए हमारी यह आयु चली गई। इस वाक्यके अन्तमें 'नमोऽर्हद्भ्यः नमोऽर्हद्भ्यः' (अर्हंतोंको नमस्कार) इन अक्षरोंके उच्चारणके साथ ही सप्तधातुबद्ध इस शरीरका त्याग करके, स्वकृत उत्तम पुण्यफलको भोगनेके लिये, उसने स्वर्ग लोकको अलंकृत किया। उसके संस्कार स्थान पर छोटे भाई तेजपाल और पुत्र जैत्रसिंहने श्री युगादि देवकी दीक्षावस्थाकी मूर्तिसे अलंकृत स्वर्गारोहण प्रासाद बनवाया। २३५. आज, मेरे पिताकी आशा फलवती हुई, माताके आशीर्वादका अंकुर उगा, जो मैं इस प्रकार अखिन्नभावसे युगादि देवकी यात्रा करनेवाले लोगोंको [अपनी शक्ति-भक्तिसे] संतुष्ट कर रहा हूं। २३६. जिन लोगोंने राजाकी सेवाके पापसे कुछ भी पुण्यार्जन नहीं किया उन्हें हम धूलिधावक (धूलके धोनेवाले) लोगोंसे भी अधमतर समझते हैं। ये तथा अन्य काव्य स्वयं वस्तुपाल महाकविके रचित हैं। २३७. स्वामिके गुणोंसे पूर्ण वह वीरधवल एक निस्सीम प्रभु हुआ, विद्वानों द्वारा भोजराजका विरुद प्राप्त करने वाला वस्तुपाल एक अद्वितीय कवि हुआ, प्रधानवर्गमें वह तेजपाल अद्वितीय मंत्रीश्वर हुआ और गुणोंसे अनुपम ऐसी अनुपमा उसकी स्त्री एक साक्षात् लक्ष्मी हुई। * इस प्रकार श्री मेरुतुंगाचार्यविरचित प्रबंधचिन्तामणिमें श्री कुमारपाल भूपाल प्रमुख-मंत्रीश्वर वस्तुपाल और तेजःपालतकके महापुरुषोंके यशका वर्णन करनेवाला यह चौथा प्रकाश समाप्त हुआ।

११. प्रकीर्णक प्रबन्ध । अब, यहाँपर पूर्वोक्त महापुरुषोंके चरित्रके वर्णनमें जो रह गये हैं उन तथा [वैसे ही] अन्य चरित्रोंका वर्णन इस प्रकीर्णक-प्रकाशमें प्रारंभ किया जाता है । वे इस प्रकार हैं- विक्रमादित्यकी पात्रपरीक्षा । १९८) उस अवन्तीपुरी में, जिसके निकट ही सिप्रा नदी बह रही है, प्राचीन कालमें श्री विक्रमादित्य राजा राज्य करता था। उसने सुना कि उसके सत्रागारमें विदेशी लोग भोजनके अनन्तर जो सो जाते हैं वे फिर नहीं उठ पाते (अर्थात् मर जाते हैं); इससे विस्मयसे मनमें चकित हो कर राजाने कारण जानना चाहा । उन सभी पथिकोंको दूसरे दिन वस्त्रसे ढँकरा दिया और उस चिरनिद्राकी बातको गुप्त रखनेकी आज्ञा दी। फिर दूसरे दिन आये हुए अन्य पथिकोंको उसी तरह भोजन कराया और सायंकाल उनको उष्ण जल तथा चरणोंमें लगानेके लिये तेल दिया गया । जब वे सब सो गये तो, महानिशामें राजा अपने हाथमें कृपाण ले कर स्वयं एकान्त जगहमें छिप कर खडा रहा । वहाँ कोनेमें पहले धुआँ निकला, फिर आगकी लपट और फिर प्रकाशित फणाकी रत्नप्रभासे अलंकृत सहस्रफण ऐसे नागको निकलते देखा । आश्चर्यसे चमत्कृत हो कर राजा जब सन्नि- स्धय उसे देखता है, तो वह फणींद्र उस दिनके सोये हुए प्रत्येक पथिकसे पूछने लगा कि—यह किस चीजका पात्र है ? उनमेंसे प्रत्येकने, किसीने अपनेको धर्म-पात्र, गुण-पात्र, तप-पात्र, रूप-पात्र, काम-पात्र या कीर्ति-पात्र इत्यादि इत्यादि बताया । अज्ञान और यदृच्छावश उसके शापसे उन्हें मरते देख श्री विक्रमने आगे बढ़ कर हाथ जोड़ कर कहा - २३८. हे भोगीन्द्र (नागराज), पृथ्वीपर बहुधा गुणके योगसे पात्र हुआ करते हैं। किन्तु शुद्ध श्रद्धा- से जो पवित्र बना हुआ मन है वही परम पात्र है । इस प्रकार नागराजने अपने ही आशयको कहनेवाले विक्रमादित्य के प्रति कहा कि ‘ वर माँगो ’ । श्री विक्रमादित्यने कहा कि ‘ इन पथिकोंको जीवित बनाओ’। इस प्रकारका वरदान माँगने पर उसने फिर विशेष भागसे उसे संतुष्ट किया । इस प्रकार श्री विक्रमकी पात्रपरीक्षाका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * मरे हुए नंदका पुनर्जीवन । १९९) एक बार, पाटलीपुत्र नगरमें, अत्यन्त आनन्दपरायण ऐसे नंद राजाकी मृत्यु होनेपर, उसी समय एक कोई ब्राह्मण वहाँ आया और दूसरेके शरीरमें प्रवेश करनेवाली विद्याके द्वारा राजाके शरीरमें प्रवेश कर गया । उसीके संकेतसे एक दूसरा ब्राह्मण राजाके द्वारपर आ कर वेदोच्चार करने लगा, जिससे राजा जी उठा और फिर उसने अपने कोषाध्यक्षोंसे उसको एक लाख स्वर्ण दिलाया । इस वृत्तान्तको जान कर महामंत्री ने सोचा कि यह नंद पहले तो बड़ा कृपण था और इस समय बड़ा उदार हो रहा है सो यह बात चिंतनीय है । ऐसा जान कर उस ब्राह्मणको पकड़ा दिया और पर-काय-प्रवेशकारी विदेशीको सर्वत्र ढूँढ़वाया तो यह मालूम पड़ा कि, कहीं पर एक मुर्देकी, कोई एक आदमी रखवाली कर रहा है। तो उसे चितापर चढ़ा कर भस्म करवा दिया। अपने अतुलनीय मतिवैभवसे उस पूर्व नंदको ही अपने महान् साम्राज्यमें फिर निभा लिया । इस तरह यह नंद प्रबंध समाप्त हुआ । *

१३२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश राजा शिलादित्य और मल्लवादी सूरिका प्रबन्ध। २००) खेडा नामक महास्थानमें, देवादित्य नामक ब्राह्मणकी अति रूपवती बालविधवा सुभगा नामक पुत्री, प्रातःकाल सूर्यको अर्घ्यकी अञ्जलि दान किया करती थी। तब, अज्ञातरूपसे सूर्यसे उसका संयोग हो गया और वह भोगरूप होकर उससे उसको गर्भ रह गया। माँ बापके किसी तरह इस असमंजस कार्यको जब जाना तो उसे कुछ कह-सुन कर अपने स्वजनोंद्वारा वलभी नगरीके पास छुड़वा दिया। वहाँ उसको पुत्र पैदा हुआ, जो क्रमशः बड़ा हो कर, समवयस्क शिशुओंके साथ खेलते समय, इस प्रकार अपमानित किया जाने लगा कि, वह बिना बापका है। तब, माँके पास आ कर उसने अपने पिताके बारेमें पूछा तो उसने कहा कि 'मैं कुछ नहीं जानती'। इससे अपने जीवनसे विरक्त हो कर उसने मर जाना चाहा, तो फिर सूर्यने प्रत्यक्ष होकर हाथमें कंकड़ दे कर उसकी सान्त्वना की। उन्होंने कहा कि -'तुम्हारी मातासे सम्पर्क करनेवाला मैं सूर्य तुम्हारा पिता हूँ। यह कंकड़ अगर अपने किसी पराभव-कारीपर फेंकोगे तो शिलारूप हो कर उसको लगेगा; पर किसी निरपराधको मारोगे तो फिर तुम्हारा ही अनर्थ करेगा। यह कह कर सूर्य तिरोधान हो गये। फिर अपने कितने एक पराभवकारियोंको मारता हुआ यह 'शिलादित्य' इस सार्थक नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस नगरके राजाने उसकी परीक्षा करनी चाही। तो उसी शिलासे उसे मार कर वह स्वयं राजा बन गया। सूर्य नारायणके प्रसादसे प्राप्त ऐसे अश्वपर चढ़ कर वह सदैव आकाश-चारीकी नाईं स्वेच्छया विहार करता हुआ अपने पराक्रमसे दिगन्तको आक्रान्त कर रहा। फिर चिर कालतक राज्य करके, जैन मुनियोंके संसर्गसे उसने सम्यक्त्व रत्नको प्राप्त किया और श्री शत्रुञ्जय तीर्थकी अपरिमित महिमाको जान कर उसका जीर्णोद्धार किया। बौद्धों और जैनोंमें वाद-विवाद। २०१) एक बार, उस शिलादित्यके सभापतित्वमें, बौद्धों और [जैन] श्वेताम्बरोंने परस्पर इस शर्तपर शास्त्रार्थ किया कि-जो [पक्ष] पराजित होगा उसको देश-त्याग करना पड़ेगा। श्वेताम्बरोंके पराजित होनेपर शिलादित्यने उन सबको अपने देशसे निकाल दिया, पर अपरिमित गुणवान् ऐसे उसके भानजे मल्लनामक क्षुल्लकको उपेक्षा दृष्टिसे देखते हुए बौद्धोंने उसे वहीं रहने दिया। और इस प्रकार अपनेको विजयी मानते हुए वे शत्रुञ्जय तीर्थपरके श्रीयुगादि देवको बौद्ध रूपसे पूजने लगे। क्षत्रिय कुलमें उत्पन्न होनेके कारण उस मल्लके दिलमें वह वैरभाव बस रहा, और वह उसका प्रतीकार सोचता रहा। जैन दर्शन (आचार्यों) के अभावमें उन्हींके पास वह अध्ययन करने लगा और दिन रात उसीमें चित्त लवलीन रखने लगा। एक बार, बड़ी गर्मीकी अर्द्ध रात्रिको, जब समस्त नागरिक लोग नींदसे आँखें बद किये हुए थे, वह दिनमें अभ्यस्त शास्त्रको जोर-जोरसे याद करने लगा। उसी समय आकाशमार्गसे जाती हुई श्री भारती देवीने पूछा कि-'मीठे क्या हैं?' उसने चारों ओर देख कर, बोलनेवालेको न पा कर उत्तर दिया 'बल्ल'। फिर ६ महीनेके बाद उसी समय लौटती हुई वाग्देवीने फिर पूछा 'किसके साथ!'; तब पुरानी बातको स्मरण करके उसने प्रत्युत्तर दिया कि 'घी और गुड़के साथ'। उसकी स्मरण रखनेकी इस अद्भुत शक्तिसे चमत्कृत होकर [भारती ने] आदेश दिया कि 'वर माँगो'। उसने इस शास्त्रकी याचना की कि 'सौगतों (बौद्धों) को पराजित करनेके लिये किसी प्रमाण शास्त्रके देनेकी कृपा करो।' इसपर भारती ने 'नय-चक्र' ग्रन्थ अर्पण करके उसे अनुगृहीत किया। इसके बाद भारतीके प्रसादसे तत्त्व समझ कर शिलादित्य की अनुज्ञासे, बौद्धोंके मठमें 'तृणोदक' फेंक कर, राजसभामें पूर्वोक्त शर्तके साथ उनसे शास्त्रार्थ किया। जिसके कण्ठपीठमें वाग्देवता अवतीर्ण हुई थी ऐसे उस श्रीमल्ल ने शीघ्र ही उन्हें निरुत्तर कर दिया। बादमें राजाज्ञासे उन सब बौद्धोंको देशमेंसे निकाला गया और जैनाचार्योंको बुलाया गया। इस प्रकार बौद्धोंको जीतनेके बाद वह मल्ल 'वादी' कहलाने लगा और फिर राजाकी प्रार्थनापर

प्रकरण २००-२०३ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध । [ १३३ गुरुने उसे सूरिपद दिया । तबसे उनका नाम हुआ श्री मल्लवादी सूरि । गणभृतके समान वे प्रभावक हुए । अतएव श्री संघने, नवाङ्गवृत्तिकार श्री अभयदेव सूरिने जिसको प्रकट किया उस स्तम्भनक तीर्थकी निशेष उन्नतिके लिये, उनको चिन्तायक ( व्यवस्थापक ) रूपमें नियुक्त किया। इस प्रकार यह मल्लवादि प्रबंध समाप्त हुआ। * वलभी नगरीके विनाशकी कथा । २०२) मरुमण्डलके पल्लीग्राममें काकू और पाताक नामक दो भाई रहते थे । उनमें जो छोटा था वह धनवान् था और जेठा उसीके घर नौकर था। किसी समय, वर्षा ऋतुके निशीथ कालमें, दिनभरमें किये हुए कामसे थक कर काकू सोया हुआ था । छोटेने कहा - 'भैया, अपनी [खेतकी] क्यारियोंमें पानी भर गया है, उनकी मेंड टूट गई है और तुम निश्चिंत बैठे हो' यह कह कर उसे फटकारा । वह उसी समय, बिछौना छोड़ कर और कंधेपर कुदाल रख कर, अपने नसीबकी निंदा करता हुआ जब वहाँ पहुँचा, तो देखा कि कई मजदूर टूटी हुई मेंडोंकी मरम्मत कर रहे हैं। उन्हें ऐसा करते देख उसने पूछा कि 'तुम लोग कौन हो ?' उन्होंने कहा कि 'आपके भाईके चाकर हैं।' इसपर उसने पूछा कि 'भला मेरे भी कोई चाकर कहीं है ?' तो उन्होंने कहा कि 'वलभी नगरी में हैं।' यह फिर अवसर पा कर अपने सर्वस्वको गट्ठड़में बाँध कर, उसे सिरपर उठा कर, वलभी में आया। वहाँ सदर दरवाजेके समीपवर्ती अमीरोंके पास निवास करने लगा। उन्होंने अत्यन्त गरीब समझ कर उसे 'रंक' कहना शुरू किया। रंक घासकी झोंपड़ी बना कर, और घासहीसे उसे छा कर रहने लगा। उसी समय कोई कार्पटिक (जोगी) कन्थ-पुस्तकके आदरसे, रैवत शैलसे एक तूंबेमें सिद्धरस ले कर, मार्ग अतिक्रम करता हुआ [चला आ रहा था। अचानक] उस तूंबेमेंसे 'काकस्य तुम्बडी' (काकूकी तुम्बड़ी) इस प्रकारकी अशरीरिणी वाणी हुई; जिसे सुन कर वह बड़ा विस्मित हुआ; और फिर डरता हुआ उस छिपे हुए बनियेके घरमें, यह सुन कर कि वह एक रक है, निश्शङ्क-भावसे उस रसवाले तूंबेको थातीके रूपमें रख दिया। वहाँसे वह सोमेश्वरकी यात्राके लिये चला गया। एक दिन [रंकने] किसी पर्वके अवसरपर देखा कि, पाक करनेके लिये चूल्हेपर चढ़ाई हुई कड़ाहीमें, तूंबेसे निकले हुए रसके गिरनेसे वह सोनेकी हो गई है। इससे उस बनियेने मनमें निर्णय किया कि यह सिद्धरस है। तब उसने उस तूंबेके साथ अपने घरका सब कुछ सामान अन्यत्र पहुँचा कर घरको आग लगा कर भस्म कर दिया। नगरके दूसरे दरवाजेपर बड़ा मकान बनवा कर वहीं रहने लगा। एक बार, किसी घी बेंचनेवालीसे घी खरीद रहा था। खुद ही तौल करते हुए उसने देखा कि उसमेंसे घी खूटता ही नहीं है। नीचे देखा तो घीके पात्रके नीचे वृद्धचित्रक [लता] की कुण्डलिया नज़र आई। फिर किसी प्रकार छल करके उसे उठा लिया और इस प्रकार उसे चित्रकसिद्धि प्राप्त हो गई। इसी तरह अगणित पुण्यके प्रभावसे उसे सुवर्णपुरुषकी सिद्धि भी प्राप्त हुई। इस प्रकार तीनों प्रकारकी सिद्धिसे कोटि-कोटि संख्या धन एकत्र करके भी, उसने अत्यन्त कृपणतावश, किसी सत्पात्र या तीर्थमें उदारता पूर्वक उसका खर्च करना तो दूर रहा, बल्कि सब लोगोंके सर्वस्वके हरण करनेकी इच्छासे, उस लक्ष्मीको सकल विश्वके लिये कालरात्रिके समान प्रकट किया। २०३) ऐसेमें, राजाने अपनी लड़कीके लिये, उसकी लड़कीकी रत्नखचित सुवर्णकी कंघीको जबर्दस्ती उससे छिनवा ली। इससे विरोधी हो कर वह स्वयं म्लेच्छ मण्डलमें गया और वलभीके राज्यका नाश करानेके लिये, करोडोंका सोना दे कर, वहाँके बलवान् राजाको देशपर चढ़ा लाया। उस (रंक) के द्वारा अनुस्यूत, उस राजाके एक छत्रधरने, रात्रिके शेष भागमें, जब कि राजा सुप्त-जाग्रत अवस्थामें था, पहलेसे ही ठीक किये हुए,

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प्रकरण २०३-५ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १३५

' नहीं महाराज, हम लोग सुखी नहीं हैं।' उनके ऐसा कहनेपर विभ्रमसे भ्रान्तचित्त हो कर उनको विदा किया; और फिर कभी किसी बातकी विचारणाके समय नगरके प्रधान जनोंको बुला कर पूछा कि 'आप लोग क्यों सुखी नहीं हैं?' और साथ ही काठके पात्रके साथ उस कुदालको ऊंचा करके वैसे रखनेका कारण भी पूछा। उन्होंने कहा कि-'जहाँपर स्वामीने काष्ठपात्र आदि देखा है वह धनी, अपने धनकी गिनती न जान कर, कठौतसे ही उसकी नापको जतानेका संकेत करता है। और हम लोग सुखी नहीं हैं सो तो आपके सन्तानाभावसे । यह नगर कोटिध्वजोंसे भरा है। आपने चिर कालतक इसका लालन किया है, पर अब कौन इसे उन्नत बनायेगा ?' यह सुन कर राजाने अपने अन्तःपुरकी पुरानी रानियोंको बंध्या समझ कर नई रानीके करनेकी इच्छा की। तब उसकी अनुमति पा कर वे लोग, पुष्य नक्षत्रवाले रविवारके दिन, पुष्यार्क योगमें, किसी बडे शकुन शास्त्रज्ञके साथ शकुनागारमें गये। वहाँ पर, एक मात्र लकड़ीका बोझ उठा कर अपना पेट भरनेवाली ऐसी कंगालिन स्त्रीको देखी जिसके सिरपर दुर्गा बैठी थी और जो आसन्नप्रसवनाली स्थितिमें थी। शकुनज्ञने उसकी अक्षतादिसे पूजा की। उन लोगोंने कारण पूछा तो उसने कहा कि-'अगर बृहस्पतिका मंतव्य सच है, तो इसके गर्भमें जो कोई लड़का है वही यहाँका भावी राजा होगा'। इस बातको असंभव समझ कर उन्होंने लौट कर मानोन्मत्त उस राजाको, ज्यों की त्यों, वह सब बात कह सुनाई। राजाने इससे मनमें खिन्न हो कर, अपने निजी मनुष्योंको भेज कर, उस स्त्रीको जमीनमें गाड़ देनेकी आज्ञा की। उन्होंने जा कर उससे कहा कि 'इष्ट देवताका स्मरण कर लो'। उनके ऐसा कहनेपर वह मरणभयसे व्याकुल हो उठी। इतनेमें संध्याके हो जानेसे उनकी अनुज्ञा ले कर वह शौच जानेके लिये गई, तो वहीं उसको पुत्रका प्रसव हो गया। वह उसे वहीं छोड़ कर लौट आई। फिर उसको जमीनमें गाड़ कर उन मनुष्योंने राजाको उसकी सूचना दी। इधर एक हिरनी उस बालकको, नित्य दोनों शाम दूध पिला कर, बड़ा करने लगी। उस समय, महालक्ष्मी देवीके सामनेकी टकशालामें जो नया सिक्का पडने लगा उसमें हिरनीके चार पैरके नीचे एक बालककी प्रतिकृति पडती हुई देखी गई, जिसके कारण लोगोंमें यह बात फैलने लगी कि कोई नया राजा उत्पन्न हुआ है। इससे उस रत्नशेखरने पता लगवा कर उस बच्चेको मरवा डालनेके लिये चारों ओर अपने सैनिक भेजे। उन्होंने प्रयत्न करके उस बालरूको प्राप्त किया। लेकिन बाल-हत्याके भयसे स्वयं उसे न मार कर, नगरके सदर दरवाजेके रास्तेमें इस तरह रख दिया, कि जिससे सायंकालके समयमें, उस मार्गसे निकलनेवाली गायोंकी खुरोकी चोटोंसे आप ही आप वह मर जाय और लोकमें कोई अपवाद न हो। उसे वहाँ छोड़ कर, कुछ दूर खड़े हुए, वे जब देखने लगे तो उतनेमें वहाँ गायोंका एक झुंड आता उन्हें दिखाई दिया। पर, मानों मूर्तिमंत पुण्यके पुंजकी नाईं उस बालकको देख कर वे सब गायें, पैरोंसे स्तंभितकी नाईं, खड़ी रह गई। इसके बाद, पीछेसे आगे आ कर एक साँडने, वृषभ जैसे ही तेजस्वी उस बालकको, अपने पैरोंके बीचमें रख कर, सब गायोंको आगे चलनेके लिये प्रेरित किया। बादमें, इस वृत्तान्तको सुन कर, राजा उन सामन्त और नगर लोकोंके द्वारा, उस बालकको मँगा कर, अपने पुत्रकी नाईं उसका पालन करने लगा। 'श्रीपुञ्ज' ऐसा उसका नाम रखा गया।

श्रीमाताकी उत्पत्तिका वर्णन । २०५) इसके बाद, जब वह रत्नशेखर राजा स्वर्गगामी हुआ तो श्रीपुञ्जका अभिषेक हुआ। कुछ दिन राज्य करनेपर उसके एक पुत्री पैदा हुई। यद्यपि वह सर्वांग सुन्दर थी पर मुँह उसका बानरका-सा था। इससे वह विषयविमुख हो कर वैराग्यके साथ रहने लगी और श्रीमाताके नामसे प्रसिद्ध हुई। एक बार उसे अपने पूर्व जन्मका स्मरण हो आया। पिताके सामने उसने उसे निवेदन किया कि-'मैं पूर्व जन्ममें अर्बुद

पञ्चम प्रकाश: वस्तुपाल-तेजपाल व ऐतिहासिक प्रबन्ध

गिरि पर बानरकी स्त्री थी । वहा पर किसी एक वृक्षकी, एक शाखासे दूसरी शाखापर कूदते हुए, कोई अगम्य शल्यसे तालुमें विद्ध हो कर मैं मर गई । उसीके नीचे कामिक नामक तीर्थका कुण्ड था जिसमें मेरा धड़ गिर पड़ा । उस तीर्थके पुण्य-प्रभावसे मेरा यह शरीर तो मनुष्यका हो गया; किन्तु वह मेरा मस्तक अभी तक वैसे ही पड़ा है इसलिये मैं बानरके मुखवाली हुई हू । श्रीपुज ने यह सुन कर अपने विश्वसनीय आदमियोंको [वहाँ भेज कर] उसके शिरको कुण्डमें डाल देनेके लिये आदेश दिया । उन्होंने जा कर चिर कालसे उसी प्रकार पड़े हुए मुखको वैसा ही देखा और फिर उसे कुण्डमें डाला । तब वह श्री माता मनुष्यके मुखवाली हो गई । फिर माता-पिताकी अनुज्ञा ले कर अर्बुदजितनी संख्यावाले गुणोंकी धारक यह, उस अर्बुदपर्वत पर जा कर तपस्या करने लगी । एक बार, एक आकाशचारी योगीने उसे देखा तो वह उसके सौन्दर्यसे हृत-हृदय हो कर आकाशसे नीचे उतरा और प्रेमालाप-पूर्वक उससे कहने लगा कि 'तुम मुझसे ब्याह क्यों नहीं कर लेती ?'। उसके ऐसा पूछनेपर वह बोली कि—' इस समय रात्रिका पहला पहर व्यतीत हुआ है, चौथे पहरमें—जब तक मुर्गा न बोल उठे तब तकमें—अगर किसी नियके बलसे तुम बड़ी सुन्दर ऐसी बारह पथा (पत्थरकी सीढियाँ) बनवा दो तो मैं तुमको वर दूँगी' । उसके ऐसा कहनेपर, तुरन्त हीं उस कार्यके लिये उसने अपने चेटकोंके झुंडको नियुक्त किया और दो ही पहरमें वे सब पथायें बनवा दीं । पर इधर श्री माता ने उतनेहीमें मुर्गेकी बनावटी आवाज कर दी । उसने आ कर कहा कि [पथा तैयार है इससे अब] 'विवाहके लिये तैयार हो जांओ' तो इसपर श्री माता ने कहा कि 'जब वे बन रही थीं तभी मुर्गेकी आवाज हो गई थी' । तो उसने कहा 'वह तो तुम्हारी मायाजालके बनाये हुए बनावटी मुर्गेकी ध्वनि थी; सो इसको कौन नहीं जानता' । ऐसा उत्तर देते हुए, नदीके किनारे अपनी बहनके द्वारा विवाहका उपहार उपस्थित कराया । श्री माता ने ' सब विद्याओका मूल जो यह त्रिशूल है इसे यहीं छोड़ कर विवाहके लिये तैयार रहो' ऐसा कह कर उसे वहा बुलाया । प्रेमके वशमें हतचित्त हो कर वह वैसा ही करके उसके समीप आया। श्रीमाता ने बनावटी कुत्ते बना कर उसके पैरों पर छोड़ दिये और हृदयमें त्रिशूलका आघात करके उसे मार डाला । इस प्रकार नि सीम शीलके साथ उसने अपनी सारी जिन्दगी बिताई । उस अखण्ड शीलाकी मृत्युके बाद, श्री पुञ्ज राजाने वहाँपर शिखरके बिनाका एक प्रासाद बनवाया । क्यों कि ६-६ महीनेके बाद, उस पर्वतके अधोभागमें रहनेवाला अर्बुद नाग जब हिलता है तो वह पहाड़ काँपने लगता है । इसलिये वहाँके सभी प्रासाद शिखर रहित [बनाये जाते] हैं । इस प्रकार श्री पुञ्जराज और उसकी पुत्री श्रीमाताका यह प्रबन्ध समाप्त हुआ । * चौडदेशके गोवर्धन राजाकी न्यायप्रियताका उदाहरण । २०६) चौड देशमें एक गोवर्धन नामक राजा हुआ । उसके वहाँ, सभामण्डपके सामनेके खंभेमें न्याय घटा बंधी हुई थी जो न्याय करानेके प्रार्थीजनोंके द्वारा बजाई जा कर निनाद किया करती । एकबार उसके इकलौते कुमारके रथारूढ़ हो कर कही जाते समय, रास्तेमें अज्ञातभावसे एक गौका बछड़ा मर गया । उसकी माता गायने, आँखोंसे अजस्र आँसू वर्षाते हुए, अपने पराभवके प्रतीकारार्थ सींगोंसे वह न्याय-घटा बजाई। अर्जुनके समान कीर्तिवाले उस राजाने, घटाका झंकार सुन कर, गायका समूल वृत्तान्त जाना और अपने न्यायकी प्रतिष्ठाके लिये, प्रातःकाल रथारूढ हो कर, उस अपने एकमात्र प्रिय पुत्रको, उसी रास्तेमें रख कर, उस धेनुके समक्ष उसपर अपना रथ घुमाया । उस राजाके ऐसे सत्व और परम भाग्यसे रथका चक्र (पहिया) ऊपर हो उठा और वह कुमार नहीं मरा । इस प्रकार यह गोवर्धननृपप्रबंध समाप्त हुआ । *

प्रकरण २०५-२०८ ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १३७ पुण्यसार राजाका वृत्तांत । २०७) कान्तीपुरी में, प्राचीन कालमें, कोई पुराण नृपति, निरभिमान भावसे राज्य कर रहा था । एक बार वह राजपाटिका में जानेके लिये निकला, तो उसके पीछे पीछे उसका परम-मित्र मतिसागर नामक महामात्य भी चला । रास्तेमें घोड़ा बिगड़ उठा और वह राजाको दूर ले भगा । साथकी चतुरंग सेना क्रमशः दूर दूर रह जाने लगी । पर अत्यंत वेगवाले घोड़ेपर चढ़ कर वह मंत्री उसके पीछे पीछे बहुत दूर तक चला गया । कितनी ही दूर चले जानेपर, राजा मार्ग लाँघनेके श्रमसे बिल्कुल थक गया और सुकुमारताके कारण रुधिरके दवारसे वहीं मर गया । मंत्रीने उसका अन्तष्ट्य करके, उसके घोड़ेको और उसके वेशको साथ ले आ कर सायंकाल नगरमें प्रवेश किया । सीमान्तमें रहे हुए शत्रु राजाओंके भयसे राज्यको निर्विघ्न रखनेकी इच्छासे, उस राजा-ही-की उम्रके और रूपके जैसे एक कुम्हारको राजाका वह पोशाक पहना कर और उसी घोड़ेपर चढ़ा कर महलमें प्रवेश कराया । फिर रानीको सारा हाल बता कर, सचिवने पुण्यसार नाम दे कर उसीको राजा बनाया । इस प्रकार कितनाक काल बीत जानेपर, वह मंत्री सेनाका बड़ा समूह ले कर किसी शत्रु राजाके ऊपर चढ़ाई ले गया और अपने एक खूब विश्वस्त सहायकको राजाकी सेवामें रख गया । बादमें यह राजा निरंकुश हो कर, वेश्यापतिकी तरह, स्वैर विहार करता हुआ 'समस्त कुम्हारोंको अपने पास बुला और मिट्टीके हाथी, घोड़े, बैल आदि बना कर उनके साथ चिर काल तक खेला करने लगा। ऐसा करनेपर समस्त राजलोक उसकी अवहेलना करने लगे जिसको सुन कर स्कंधागारसे ( लड़ाईके मैदानसे ) कुछ नौकरों को साथ ले कर मंत्री वहाँ आया और राजासे इस प्रकार बोला कि- 'यदि अपने स्वभावकी चल-विचलनाके कारण, तुम उस कुम्हारपनकी बातको न भूल कर किसी मर्यादाको नहीं मानोगे तो मैं तुम्हें देशसे निकाल कर किसी अन्य कुम्हारके बालकको राजा बना दूँगा' । उसकी इस उक्तिसे क्रुद्ध हो कर राजा बोला-' अरे, कौन है यहाँ ?' उसके ऐसा कहते ही वे मिट्टीके पुतले सजीव हो उठे और मंत्रीको चिपट पड़े । इस असंभव जैसे महान् आश्चर्यको देख कर और राजाके प्रकट प्रभावसे विस्मित हो कर मंत्री उसके चरणोंपर गिर पड़ा और अपने को छुड़ानेकी अभ्यर्थना करने लगा । फिर राजाके वैसा ही करने (छुड़ा देने) पर भक्ति-पूर्ण मंत्रीने कहा- 'आपको साम्राज्य देनेमें मैं निमित्त मात्र हूँ। आपके पुण्यप्रभावसे पुतले सचेतन हो कर इस प्रकार आज्ञाकारी हो रहे हैं, सो इसमें पूर्वजन्मके कर्म ही कारण हैं; और इसलिये आपका यह जो पुण्यसार नाम है वह सार्थक है। इस प्रकार यह पुण्यसारका प्रबंध समाप्त हुआ ।' * कर्मसार राजाका प्रबन्ध । २०८) प्राचीन कालमें, कुसुमपुर नगरका नंदिवर्धन नामक राजकुमार, देशान्तर भ्रमणके कौतुकसे माता-पितासे बिना पूछे ही अपने छत्रधरके साथ चल पड़ा । यदृच्छासे घूमता हुआ, एक प्रातः कालमें, किसी गाँवमें जा पहुँचा । वहाँ, पुत्रहीन राजा मर गया था, इससे सचिवोंने अभिरिक्त करके पहहस्तीको किसी नये राजाकी तलाशमें सारे नगरमें घुमाया । संयोगवश वह वहापर आया और उस निकटस्थ गुप्त कुमारको, दुःस्वप्नकी नाईं भूल कर, ससंभ्रम उस हाथीने छत्रधरका अभिषेक किया । प्रधानोंने बड़े महोत्सवके साथ उसको नगरमें प्रवेश कराया । उसने राजकुमारको भी वैसे ही ठाठके साथ अपने साथ ले कर, महलमें प्रवेश किया । बादमें- ' मैं राजलोकका स्वामी हूं; लेकिन तुम मेरे स्वामी हो' इस प्रकारके अन्तरंग वचनोंसे वह उस राजकुमारकी आराधना करता रहा । पर यह राजा राजगुणोंके अयोग्य था और बेहद बेवकूफ था। वर्णाश्रम धर्मके पालनके परिभ्रममें अनभिज्ञ और प्रजाका पीड़क हो कर ज्यों ज्यों यह राज्य करता था त्यों त्यों, शंखाके ३५-३६

१३८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश शिरमें रहे हुए चन्द्रमाकी तरह, वह प्रतिदिन क्षीण होता जाता था। उस कुमारको वैसा देख कर, किसी समय राजाने दुर्बलताका कारण पूछा तो उसने कहा कि-' दुर्बुद्धिके कारण तुम जो प्रजाको पीड़ा दे रहे हो यह अत्यन्त अनुचित कर्म है और इस कारण मैं कृश होता जा रहा हूं'। २४२. जिसे मूर्खोंके बीच वास करना पड़े तथा जिसके स्वामीके कानोंके पास दुर्जनोंकी जीभ लगती हो, उसका यदि जीवन बना रहे तो उसे ही लाभदायक समझना चाहिए, क्षीण होनेमें तो विस्मय ही काहेका। सो मैंने इस गाथाके अर्थको सत्य कर बताया है। उसके इस कथनके अनन्तर राजाने कहा कि-' इस पापनिरत प्रजाके अपुण्योदयने ही तो, निश्चय करके भविष्यमें इसको पीड़ित करनेके लिये, मुझे राजा बनाया है। यदि विधाता इस प्रजाके भाग्यमें परिपालना लिखता तो उस समय पट्ट हस्ती तुम्हारा ही अभिषेक करता।' उसकी इस उक्ति और युक्ति रूप औषधोंसे उस कुमारका वह रोग दूर हो गया और वह शरीरसे पुष्ट होने लगा। इस प्रकार यह कर्मसार प्रबंध समाप्त हुआ ! * राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका प्रबंध । २०९) गौडदेशकी लक्षणावती नगरीमें लक्ष्मणसेन नामक राजा अपने उमापतिधर नामक सर्वबुद्धिनिधान ऐसे सचिवके साथ, सारी राज्य व्यवस्थाका विचार करते हुए, राज्य करता था। बादमें वह, मानों अनेक मातंग (हाथी) के सैन्यके संगसे मदान्धता धारण करके, किसी वेश्याके संगरूप कलङ्कपंकमें डूब गया। उमापतिधरने यह व्यतिकर जाना तो, प्रकृतिसे क्रूर होनेके कारण स्वामीको बेकाबू समझ कर, प्रकारा- न्तरसे उसे समझानेके लिये, उसने सभामंडपके भारपट्टपर, गुप्त भावसे इन कविताओंको लिख दिया - २४३. हे जल ! शीतलता तो तुम्हारा ही गुण है, और फिर तुम्हारी स्वाभाविकी स्वच्छताकी तो बात ही क्या कही जाय -तुम्हारे ही स्पर्शसे अन्य अपवित्र वस्तुयें पवित्र होती हैं। इससे बढ़कर और तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है कि तुम्हीं तो शरीरधारियोंके जीव हो। फिर अगर तुम्हीं नीच पथसे जाते हो तो तुम्हें रोकनेमें कौन समर्थ है ? २४४. हे शिव ! तुम अगर छोटे बैल पर चढ़ते हो तो उससे दिग्गजोंकी क्या हानि है? तुम अगर साँपोंका आभूषण पहनते हो तो इससे सोनेका क्या नुकसान है? अगर अपने शिरपर इस जड़ किरण चन्द्रमाको धारण करते हो तो उससे त्रैलोक्यके दीपक सूर्यका क्या बिगड़ता है ? तुम जगत्के ईश हो तो फिर हम तुम्हें क्या कहें ? २४५. यद्यपि फटे हुए ब्रह्मशिरको वह धारण करता है, यद्यपि प्रेतोंसे उसकी मित्रता है, यद्यपि रक्ताक्ष हो कर मातृकाओंके साथ वह क्रीड़ा करता है, यद्यपि श्मशानमें वह प्रीति रखता है और यद्यपि सृष्टि करके वह उसका संहार कर देता है, तो भी, मैं उसमें मन लगा कर भक्ति-पूर्वक सेवा करता हूँ। क्यों कि त्रिलोक शून्य है और वह जगतका एक-मात्र ईश्वर है। २४६. इस महान् प्रदीपकालमें तुम्हीं एक मात्र राजा (चन्द्र) हो, और इसी लिये तो क्या कमलोंकी लक्ष्मीको बद्ध करके कुमुदोंकी श्रीको बढ़ा नहीं रहे हो ? पर इसमें जो ब्रह्माका निवास है और पुष्पोंकी पंक्तिमें इसकी जो प्रतिष्ठा है उसको दूर करनेवाले तुम कौन हो ? क्यों कि वह तो स्वयं विधाता भी करनेमें समर्थ नहीं है।

प्रकरण २०९-२१० ] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १३९ २४७. हे हार ! तुम सद्वृत्त, सद्गुण, महार्ह, और अमूल्य हो कर प्रियाके घन ऐसे स्तनतटके उपयुक्त तुम्हारी सुंदर मूर्ति है । किन्तु हाय, पामरीके कठोर कंठमें लग कर टूट जानेसे तुमने अपनी यह गुणिता खो दी है । किसी राजासभाके अवसरपर आये हुए राजाने इन कविताओंको देखा और उनका अर्थ समझ कर भीतर ही भीतर मंत्रीसे द्वेष धारण करने लगा । क्यों कि- २४८. आजकल प्रायः सन्मार्गका उपदेश करना, उसी तरह कोपका कारण होता है, जैसे नकटेको दर्पण दिखाना । इस न्यायसे कुपित हो कर राजाने उसे पदभ्रष्ट कर दिया । इसके बाद उस राजाने, एक बार, राज- पाटिकासे लौटते हुए रास्तेमें दुर्गतिग्रस्त, निरुपाय और एकाकी ऐसे उस उमापतिधरको देखा, तो क्रोधपूर्वक उसे मार डालनेके लिये, हस्तिपालके द्वारा उस पर हाथी चलवा दिया । तब उसने महावतसे कहा कि-'जब तक, मैं राजाके सामने कुछ कह पाऊँ तब तक, तुम वेगसे हाथीको जरा थाम रखो' । उसकी बात सुन कर उसने वैसा ही किया; तो फिर वह उमापतिधर बोला- २४९. जिसको, सज्जन ऐसे गुरु लोग उपदेश नहीं देते उस शिवका कैसा हाल हो रहा है ?-नंगा फिरता है, शरीरमें धूल लगाता है, बैलकी पीठपर चढ़ता है, साँपोंसे खेला करता है, और जिसमेंसे लोहू टपकता है ऐसे हाथीके चमडेको पहन कर नाचता है । इस प्रकारके आचारवाह्य तथा अन्य कई प्रकारके [ निंद्य ] आचरणोंसे यह प्रेम रखे करता है । इस प्रकार उसके विद्वानरूपी वचनानुशासे उस राजाका मनरूपी हाथी वश हुआ, और वह अपने चरित्रके विषयमें पश्चात्ताप करता हुआ अपनी खूब निंदा करने लगा । धीरे धीरे उस वासनासे मुक्त हो कर उसने फिरसे उसे अपना प्रधान बनाया । इस प्रकार लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका यह प्रबंध समाप्त हुआ । * काशीके जयचन्द्र राजाका प्रबन्ध । २१०) काशीनगरी में जयचन्द्र नामक राजा, महती साम्राज्य लक्ष्मीका पालन करता हुआ, पंगु ( लंगड़ा ) इस विरुदको धारण करता था । कारण यह था कि बड़े भारी सैन्य समूहसे व्याकुलित होनेके कारण, वह गंगा-यमुना नदीरूप लाठीके सहारे बिना कहीं आ-जा नहीं सकता था। वहाँ रहनेवाले किसी शालापतिकी सुह्य नामक पत्नी, जिसने अपने सौन्दर्यसे तीनों लोकके स्त्रीजनोंको जीत लिया था, किसी समय भयानक ग्रीष्म ऋतुमें जलकेलि करके गंगाके किनारे खड़ी थी । तब उस खञ्जननयनाने देखा कि एक साँपके शिरपर खंजन पक्षी बैठा है। वहीं पर नहानेके लिए आये हुए किसी ब्राह्मणके पैरों पड़ कर उसने उस असंभव शकुनका विचार पूछा । उस नैमित्तिकने कहा कि-'अगर मेरा सदा आदेश मानना मंजूर करो तो मैं इसका विचार निवेदन करूँ, नहीं तो नहीं' । उसने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की, तो ब्राह्मणने कहा कि-'आजसे सातवें दिन तुम इस राजाकी पटरानी होंगी '-ऐसा कह-सुन कर वे दोनों यथा-स्थान चले गये । जिस दिनके लिये निमित्तज्ञने निर्णय दिया था उसी दिन राजपाटिकासे लौटते हुए राजाने, किसी एक गढ़ीमें अगम्य २. थमे सुभग अंगवाली उस शालापतिकी स्त्रीको खड़े देखा। उसे अपने चित्तका मर्मम् चोरनेवाली १ इस पदमें प्रयुक्त सद्वृत्त, सद्गुण और गुणित्व ये शब्द प्रसिद्ध अर्थके अतिरिक्त रूपसे हारके पक्षमें इन अर्थोके वाचक हैं-सद्वृत्त=अच्छी गोलाईवाला; सद्गुण=अच्छे धागेवाला, गुणित्व=धागेकी बनावटवाला ।

१४० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ पञ्चम प्रकाश समझ कर उसने अपने पास रख लिया और पटरानी बनाया। इसके बाद उस कृतज्ञाने ब्राह्मणके प्रति की हुई अपनी प्रतिज्ञाका स्मरण करके राजासे उस विद्याधर नामक ब्राह्मणको बुलानेके लिये प्रार्थना की। राजाने डुग्गी पिटवा कर विद्याधर नामक ब्राह्मणको बुलवाया तो उस नामके सात सौ ब्राह्मण आ कर उपस्थित हुए। उनमेंसे उस एकको पहिचान कर अलग बैठाया और बाकी सबको यथोचित सत्कारके साथ बिदा किया गया। बादमें उस विपत्तिग्रस्त विद्याधर से राजाने कहा कि- 'जो इच्छा हो माँगो' । राजाके आदेशसे प्रमुदित हो कर उस ब्राह्मणने 'सदैव उसकी अंगसेवा' की प्रार्थना की। राजाने स्वीकार करके, उसके असीम चातुर्यकी पर्यालोचना करते हुए उसे सर्वाधिकारके भारका धारण करनेवाला धुन्धर पद दिया। यह क्रमशः सम्पत्तिशाली बन गया। अपने अन्तःपुरकी बत्तीस सुंदरियोंके लिये ऊँची जातिके कर्पूरके बने हुए नित्य नये आभरण बनवाता और यह कह कर कि पुराने आभरण निर्माल्य हैं उन्हें एक छोटी कुईमें डलवा देता। इस प्रकार साक्षात् देवता- वतारकी नाईं दिव्य भोगोंको भोगता हुआ [नित्य] अठारह हजार ब्राह्मणोंको यथेच्छ भोजन दान करनेके पश्चात् स्वयं भोजन करता। २११) इसके बाद, विदेशी राजाके ऊपर चढ़ाई करनेके लिये राजाकी आज्ञासे, चतुर्दश विद्याओंके ज्ञाता विद्याधरने नाना देशोंमें घूमते हुए, एकबार एक ऐसे देशमें जा कर डेरा दिया जहाँ जलानेके लिये इन्धन (लकड़ी आदि) नहीं था। तब उन ब्राह्मणोंकी रसोईके समय, रसोईयोंके वस्त्र तेलमें भिगो कर उन्हींको इन्धन बना कर नित्यकी भाँति ही उनको भोजन कराया। इस तरह शत्रुओंको जीत कर जब वह लोट कर वापस नगरके समीप आया तो मालूम हुआ कि, पिण्याक (भोजन) के बनानेकी इच्छासे जो दुकूल जलाये गये, उससे राजा कुपित हो गया है। इससे उसने अपने घरको तो याचकोंके द्वारा लुटवा दिया और स्वयं तीर्थयात्राके लिये निकल पड़ा। राजा भी फिर पीछे जा कर उसका अनुनय करने लगा, पर उसने स्वाभिमानवश, अपनी उस (भोजन बनानेकी) इच्छाके कारण राजाका वैसा आशय (क्रोधयुक्त भाव) हो गया था यह बता कर, जैसे तैसे उसकी अनुमति ले कर अपना अन्त साधन किया। २१२) अनन्तर, सूहबदेवीने राजासे अपने पुत्रके लिये युवराज पदवी माँगी। राजाने कहा कि- 'रलेतिनके लड़केको हमारे वंशमें राज्य नहीं दिया जाता'। इससे उसने राजाको मारनेके लिये म्लेच्छोंको बुलवाया। उस स्थान पर रहनेवाले पुरुषों (राजदूतों) से इस बातका हाल जान कर, राजाने एक दिगंबर भिक्षुकसे, जिसने पद्मावतीसे वर प्राप्त किया हुआ था, सादर निमित्त (कोई मांत्रिक उपाय) पूछा। उसने राजाको विश्वास पूर्वक कहा कि- 'पद्मावतीका आदेश म्लेच्छागमनके विरुद्ध है'। इसके अनन्तर कुछ दिनके बाद, यह सुन कर कि म्लेच्छ नजदीक आ गये हैं, राजाने उस दिगम्बरसे फिर पूछा कि यह 'क्या बात है !' तो उसने उसी रातको राजाके सामने ही पद्मावतीको होमादि देना आरम्भ किया। तब उसकी उस उत्तम आकर्षण-विद्याके बलसे, होमकुण्डकी ज्वालाओंमें प्रत्यक्ष हो कर, पद्मावतीने तुरुष्कों (तुरुकों) के आगमनका निषेध ही बताया। तब फिर उस क्रुद्ध दिगम्बरने उसके कान पकड़ कर अत्यन्त क्रोधसे कहा कि- 'म्लेच्छ सेनाके निकट आ जानेपर भी तू ऐसी मिथ्या बात बोल रही है'। इस तरह फटकारी जानेपर उसने कहा कि- 'तू जिस पद्मावतीको अति भक्तिके साथ यह पूछ रहा है वह तो हमारे प्रतापके बलसे कहीं भाग गई है। मैं तो उस म्लेच्छराजकी कुलदेवी हूँ। मिथ्या बोल कर लोगोंमें विश्वास पैदा करके, उन्हें म्लेच्छोंके द्वारा विश्वास (प्राण-रहित) कराती रहती हूँ'। ऐसा कह कर वह तिरोहित हो गई। बादमें प्रातःकालमें ही म्लेच्छ सेना द्वारा वाणारसी नगरीका घिर जाना राजाने जान पाया। उनके धनुषोंके टंकारोंमें, राजाके चौदह सौ नगाड़ोंकी आवाज कहीं डूब गई और म्लेच्छ सेनाके भयसे