प्रबन्धचिन्तामणि (गुजरात, मालवा व चालुक्य ऐतिहासिक प्रबन्ध)
Prabandha Chintamani with Hindi Translation
मेरुतुङ्गाचार्य (१३०४ ई.) / पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा
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प्रकरण २५-२७ ] मूलराजका प्रबन्ध [ २१ [ १७ ] जिसने दानसे दारिद्र्यको नष्ट किया, शौर्यसे दुर्जनोंका दमन किया और कीर्तिसे रामचंद्रको भी म्लानकर दिया ऐसे उस राजाने चिरकाल तक राज्यका उपभोग किया । इत्यादि स्तुतियों द्वारा पंडित लोगोंसे प्रशंसित होता हुआ यह इस प्रकार साम्राज्य कर रहा था, तब किसी -अवसरपर सपादलक्ष देशका राजा, मूलराज पर चढ़ाई करनेके लिये गूर्जर देशकी सीमापर आया । दूसरी ओर, उसी समय तैलंग देशके राजाका बारप नामक सेनापति भी चढ़ आया । इन दोनोंमेंसे किसी एकके साथ जब युद्ध शुरू होगा, तब दूसरी ओरसे दूसरा शत्रु आक्रमण कर बैठेगा; ऐसी परिस्थितिमें क्या करना चाहिए इसका विचार मूलराज अपने मंत्रियोंके साथ करने लगा, तो उन्होंने कहा कि कुछ समय कन्या दुर्ग में बैठकर व्यतीत कर देना अच्छा है; और जब नवरात्र आनेपर सपादलक्षका राजा अपनी कुलदेवीकी आरा- धनाके लिये चला जाय, तब अवसर पाकर बारप नामक सेनापतिको जीत लिया जाय । और इसके बाद वापस आनेवाले सपादलक्ष के राजाका भी पराजय किया जाय । उनके इस प्रकारके विचार सुनकर राजा बोला कि ऐसा करनेपर क्या लोगोंमें मेरे भाग निकलनेकी निंदा न होगी ? । इसपर वे मंत्री बोले-- २५. [ परस्परके द्वन्द्व-युद्धमें ] भेडा जो पीछे हटता है वह प्रहार करनेके लिये है, और सिंह भी आक्रमण करते समय क्रोधसे संकुचित होता है । हृदयमें वैरभावको भर रखनेवाले और गूढ यंत्र चलानेवाले बुद्धिमान लोग किसी अवगणनाकी परवा न करके [ सब कुछ ] सह लेते हैं । इस प्रकार उनकी बात सुनकर मूलराजने कन्यादुर्ग में जाकर आश्रय लिया । इधर सपादलक्षके राजाने गूर्जर देशमें ही सारा वर्षाकाल बिताया और जब नवरात्रके दिन आए तो उस रणभूमिमें ही शाकम्भरी नगरकी स्थापना कर गोत्रदेवी भी वहीं मँगा ली और वहीं नवरात्रकी पूजाका समारम्भ किया । मूलराज ने यह हाल सुनकर मंत्रियोंके बतलाए हुए उपायको निरर्थक समझा । उसको तत्काल एक मति सूझ आई । राजकीय भेट-सौगात भेजनेके बहाने उसने अपने सत्र आसपासके सामंतोंको बुलावा भेजा और फिर जासूसी काम करनेवाले अधिकारियोंके पाससे सभी राजपूतों और सैनिकोंको, वंश और चरित्रसे, पहचान कर उन्हें यथोचित दान आदिसे सम्मानित किया और समयका संकेत बताकर उन सबको सपादलक्ष देशके राजाके शिबिरके आसपास तैनात कर दिया । निश्चित दिनपर स्वयं, अपनी प्रधान साँढनीपर बैठकर उसके पाठकके साथ बहुत सी भूमि पार करके, प्रातः काल जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सके उस तरह, सपादलक्ष नृपतिकी छावणीमें जा पहुँचा । साढनी परसे उतरकर हाथमें तलवार लेकर मूलराजने अकेले ही वहाँ पहुँचकर द्वारपालसे कहा-इस समय राजा किस काममें होते हैं ? । जाकर अपने स्वामीको कहो कि मूलराज राजद्वारमें प्रवेश कर रहा है । यह कहता हुआ [ द्वारपालने कुछ आनाकानी की तो ] अपने भुजदण्डके बलसे उसे द्वारपरसे हटा दिया । फिर जब यह ' यह श्रीमूलराज द्वारमें प्रवेश कर रहे हैं '-इस प्रकार पुकार ही रहा था कि उतनेमें तो यह, उस राजाके तंबूके भीतर प्रवेश करके, राजाके पलंग पर ही स्वयं जा बैठा। यह देखकर क्षणभर तो यह राजा भयभीत होकर मौन ही रहा । फिर कुछ भय दूर करके उसने पूछा कि-' क्या आप ही श्री मूलराज हैं' । मूलराजके मुँहसे 'हाँ' यह शब्द सुन कर जितनेमें यह कुछ समयोचित बोलना चाहता था, उतनेमें तो पूर्व संकेतित चार हजार सैनिकोंने उस राजाके बडे डेरे ( तंबू ) को चारों ओरसे घेर लिया । इसके बाद मूलराजने उस राजासे इस प्रकार कहा-इस भूमण्डलमें, ऐसा कोई युद्धवीर राजा, जो मेरे सामने लड़ाईमें टिक सके, है या नहीं-इसका मैं सोच किया करता था और कोई वैसा वीर निकल आये उसके लिये मैं सैंकड़ों मिन्नतें मनाता था । भाग्ययोगसे आप
२२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश उपस्थित हुए हैं । किन्तु भोजनके समय मक्खी पड़ जानेके समान, इस तैलङ्ग देश के तैलप नामक राजाके सेनापतिको, जो मुझे जीतनेके लिये आया है, जब तक शिक्षा न दे लूं तब तक आप पीछेसे हमला इत्यादि न करके रुक जाइये, यही अनुरोध करने मैं आपके पास आया हूं । मूलराज ने जब ऐसा कहा तो उस राजाने इस प्रकार कहा-राजा होकर भी अपने प्राणोंकी परवा न करके, सामान्य सैनिककी भाँति अकेले ही इस प्रकार शत्रुगृहमें प्रवेश करके चले आये इसलिये [ मैं तुम्हारे साहससे मुग्ध हूँ और ] जब तक जीऊंगा तब तक तुम्हारे साथ हमारी सन्धि बनी रहेगी । उस राजाके ऐसा कहने पर 'ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो' इस प्रकार निवारण करता हुआ, उसके द्वारा भोजनार्थ निमंत्रित होनेपर, अवज्ञापूर्वक अस्वीकार करके, वह हाथमें तलवार लेकर उठ चला और उसी साढनीपर सवार होकर, अपनी उस सेनासे परिवृत होकर उस बारप सेनापतिकी सेनापर टूट पड़ा । उसे मारकर उसके दस हज़ार घोड़े और १८ सौ हाथी छीन कर, जितनेमें पड़ाव डालनेकी तैयारी कर रहा था, उतनेमें तो अपने गुप्तचरोंसे यह सब हाल सुनकर वह सपादलक्ष का राजा वहाँसे भाग निकला । २६) उस राजाने पत्तन में श्रीमुलराज वस हिका [ नामक जैन मन्दिर ] और श्रीमुञ्जालदेव स्वामी (शिव) का प्रासाद बनवाया । वह प्रति सोमवारको शिवकी भक्ति करनेके निमित्त सोमेश्वर पत्तन (सोमनाथ पाटन) की यात्राको जाता था । उसकी इस प्रकारकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर सोमनाथ उपदेश देकर मण्डली नगरी में आये । उस राजाने वहाँ 'मूलेश्वर' नामका मन्दिर बनवाया । नमस्कार करनेकी इच्छासे हर्षित होकर वहाँपर नित्य आनेवाले उस राजाकी, उस प्रकारकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर, सोमनाथने यह कहा कि-मैं समुद्रके साथ तुम्हारे नगरमें अवतीर्ण हूँगा। यह कहकर सोमेश्वर अणहिल्ल- पुरमें अवतीर्ण हुए । आये हुए समुद्रकी सूचना मिले इसलिये नगरके सभी जलाशयोंका पानी खारा होगया । उस राजाने वहाँपर त्रिपुरुष प्रासाद नामक शिवका मन्दिर बनवाया । २७) इसके बाद, वह उस प्रासादके प्रबंधक होने योग्य किसी उचित, तपस्वीकी खोज करते हुए उसने एक कान्थडी नामक तपस्वीका नाम सुना, जो सरस्वती नदीके किनारे, एकान्तर दिनोंको उपवास किया करता था और पारणाके दिन अनिर्दिष्ट भिक्षाके पाँच ग्रासका आहार किया करता था । जब राजा उसकी वन्दना करने गया, तो उस समय उसे तीन दिनका ज्वर था । उसने अपने ज्वरको कंथामें संक्रा मित कर दिया । राजाने उसे देखकर पूछा कि-यह कंथा (गुदड़ी) काँप क्यों रही है ? । राजाके साथ बात करनेमें असमर्थ होनेके कारण मैने ज्वरको उसमें संक्रामित किया है-ऐसा कहनेपर, राजा बोला-यदि इतनी शक्ति है तो फिर ज्वरको सर्वथा दूर क्यों नहीं कर देते ? । राजाके यों कहनेपर उसने- २६. पूर्वजन्मके सञ्चित हमारे जो कोई भी रोग हों वे अब उपस्थित हों । मैं उनसे ऋण होकर शिवके उस परम पदको प्राप्त होना चाहता हूँ । शिवपुराण के इस वचनको कह कर बताया कि-' कर्म भोगे बिना क्षय नहीं होते' यह जानते हुए मैं इसे कैसे दूर कर सकूँ ? । राजाने फिर त्रिपुरुष धर्म स्थानक के प्रबंधक होनेके लिये उससे प्रार्थना की । २७. अधिकार मिलनेसे तीन महीनोंमें, और मठका महन्त बननेसे तीन दिनोंमें [ नरक प्राप्त होता है ]; और अगर शीघ्र ही नरकप्राप्तिकी इच्छा हो तो एक दिन पुरोहित बन जाओ । इस स्मृति-वाक्यके तत्त्वको जानते हुए, तपरूपी नौकासे संसार सागरको पार करके मैं फिर इस गोष्- दमें कैसे डूबना चाहूं । इस वाक्यसे निषिद्ध होकर राजाने [ और कोई उपाय न सोच कर ] ताम्र-शासनको
प्रकरण २७-२९ ] मूलराजका प्रबन्ध [ २३ मण्डफ (परोठे) में वेष्टित करके भिक्षाके लिये आये हुए उस तपस्वीके पर्णपुटमें छोड़ दिया। वह उसे न जानता हुआ लेकर वहाँसे लौट गया। यद्यपि सरस्वती नदीने पहलेतो उसे मार्ग दे दिया था, पर इस बार बढ़ जानेसे जब उसे मार्ग नहीं मिला, तो वह जन्मकालसे लेकर अपने दोषोंका विचार करने लगा। तात्कालिक भिक्षा सम्बंधी दोषको जाननेके लिये जब उसे देखता है, तो उसमें उस राजाका दिया हुआ ताम्र-शासन मालूम दिया। इससे तपस्वीको क्रुद्ध जानकर, राजा वहाँ आया और उसकी सान्त्वनाके लिये यह जब अनुनय विनय करने लगा, तो उसने यह कह कर कि-मैंने स्वयं जो दाहिने हाथसे दान ग्रहण किया है यह अन्यथा कैसे होगा; अपने शिष्य वयजल्लदेवको राजाको सौंपा । उस वयजल्लदेवने कहा कि-शरीरमें उबटनके लिये हमको प्रतिदिन आठ पल उत्तम जातिका चंदन, चार पल कस्तूरी, एक पल कपूर तथा बत्तीस वारांग- नाएँ, और जागीरके साथ श्वेत छत्र प्रदान करो, तो मैं प्रग्रहरूपका पद स्वीकार करूँगा । राजाने सब देनेका स्वीकार कर, त्रिपुरुष धर्मस्थान में उसे 'तपस्वियोंका राजा' के पदपर अभिषिक्त किया। वह 'कंकूखोल' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकारके भोगोंको भोगते हुए भी वह अकुटिल भावसे ब्रह्मचर्य व्रतमें निरत रहा। एक बार रातको मूलराजकी रानी उसकी परीक्षा लेने लगी तो उसे पानका बीड़ा मार कर कुट्टिनी बना दिया और फिर अनुनीत होकर उसे अपने उबटनके लेपसे और स्नानके मैले जलसे स्नान करवा, कर नीरोग किया। यहांपर लाखारूकी उत्पत्ति और त्रिपदिका प्रबंध भी दिया जाता है- २८) प्राचीन कालमें, किसी परमार वंशमें, राजा कीर्तिराज देवकी कामलता नामकी लड़की थी। वह बाल्यकालमें, सखियोंके साथ, किसी महलके आगनमें खेल रही थी। सखियोंने कहा कि अपना अपना वर वरण करो। घोर अन्धकारमें उस कामलताकी आँखोंका मार्ग बंद हो जानेसे, उसने फूहड़ नामक पशुपालका, जो उस महलके एक खंभेकी ओटमें खड़ा हुआ था और जिसे यह कुछ भी वृत्तान्त मालूम नहीं था, वरण कर लिया। इसके अनन्तर, कुछ वर्षोंके बाद, जब किसी अच्छे वरोंकी खोज उसके लिये की जाने लगी, तो पतिव्रता-व्रतके निर्वाहके विचारसे, उसने अपने माता पितासे अनुज्ञा लेकर उसी (पशुपाल) से विवाह किया। उन दोनोंका पुत्र लाखाक हुआ। वह कच्छदेशका राजा बना। यशोराजको उसने [ अपने पराक्रमसे ] खुश किया था और उसकी बड़ी कृपासे वह सबसे अजेय हो गया था। उसने ग्यारह वार मूल- राज की सेनाको त्रासित किया था। एक बार, जब कि वह लाखा, कपिलकोट के किलेमें रहा हुआ था उसी समय, राजा (मूलराज) ने स्वयं जाकर उसे घेर लिया। वह लक्ष (लाखाक) अपने माहेच नामक एक परम साहसी सुभटके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा-जिसको कि उसने कहीं थाह पाइनेके लिये भेजा था। यह बात जानकर मूलराजने उसके आगमनके मार्ग घेर लिये। कार्य समाप्त करके आते हुए उस भृत्यसे राजपुरुषोंने कहा 'हथियार रख दो 1'। अपने स्वामीके कार्यकी सिद्धिके लिये उसने वैसा ही करके युद्धके लिये प्रस्तुत लाखाक के पास आकर प्रणाम किया। इसके बाद सग्रामके अवसरपर- २८. 'उगे हुए सूर्यने जो प्रताप नहीं बताया तो हे लाखा ! वह दिन निकृष्ट कहा जाता है। गिनती करनेसे तो आठ कि दस दिन मिल सकते हैं । १ इस वचनका भावार्थ यह मालूम देता है कि सूर्यका उदय होनेपर भी यदि जिस दिन उसका तेज नहीं दिखाई देता-अर्थात् कुहासा छाया रहता है तो लोक उस दिनको निकृष्ट=दुर्दिन मानते हैं। वीर पुरुष या तेजस्वी पुरुष उत्पन्न होकर भी यदि अपना कोई तेज नहीं बतलावें तो उसका उत्पन्न होना निरर्थक ही समझा जाता है। २ इस दूसरे वचनका भावार्थ यह ज्ञात होता है कि-वीर पुरुषको समय प्राप्त होनेपर शीघ्र ही अपना पराक्रम बतलानेके लिये उद्यत हो जाना चाहिए। दिनोंकी गिनती करते रहनेसे तो कुछ लाभ नहीं होता।
२४ ] 'प्रबन्धचिन्तामणि , [ प्रथम प्रकाश , इत्यादि प्रकारके बहुतसे बोध-वाक्य उस भृत्यके सुनकर और उसकी उत्कट धीरता देखकर लक्षका साहस खूब बढ़ा और उसने मूलराजके साथ बराबर तीन दिन तक द्वन्द्व-युद्ध किया । मूलराजने उसकी अजेयता देखकर चौथे दिन सोमेश्वरका स्मरण किया । रुद्रकी कला जब उसके अन्दर अवतीर्ण हुई, तो [ उसके प्रभावसे ] उसने लाखाको मार डाला । बादमें लाखाकी देह जब पृथ्वीपर गिरी हुई पड़ी थी तब हवाके संचारसे उसकी हिलती हुई दाढ़ीको मूलराजने पैरसे छुआ । इसपर लक्ष की माताने कुपित होकर यह शाप दिया कि तुम्हारा वंश द्यूति (कुष्ठ) रोगसे मरा करेगा । २९. मूलराजने अपने प्रतापाग्निमें लक्ष को होम करके उसकी स्त्रियोंके आँसुओंकी धाराको उन्मुक्त किया ।*, ३०. सहसा डूबे जालमें आये हुए लक्षरूपी कच्छप (कछुआ और कच्छका राजा) को मारकर जिसने संग्रामरूपी सागरमें अपनी धीवरताका परिचय दिया + । , ३१. हे मूलराज ! दानरूपी लता बलिके समयमें पृथ्वीमें पैदा हुई, दधीचिके समय उसकी जड़ जमी, राम के होनेपर उसमें अंकुर उगे, कर्णके समय उसमें डाल और टहनिया निकलीं, नागार्जुन के समय कलियाँ प्रकट हुई, विक्रमादित्य के समय फली और तुम्हारे समयमें आमूल फलवती हुई । ३२. तुम्हारे शत्रुओंके [सूने] महल, जो वर्षाकालमें, बादलोंके पानीसे स्नान करते हैं, उनके ऊपर जो तृण उग आये हैं उसके बहाने मानों वे कुश लिये हुए हैं, नालोंके पानीसे मानों श्राद्धकी अञ्जलि दे रहे हैं, और दीवालके ढोंकोंके गिरनेके मिससे पिण्डदान करते हैं; इस प्रकार अपने स्वामीके प्रेतके लिये ये प्रतिदिन श्राद्ध कर रहे हैं । -इस प्रकार लाखा फूलोतकी उत्पत्ति और विपत्ति का यह प्रबंध है ॥ ११॥ २९) इस प्रकार उस राजाने पचपन वर्ष तक निष्कण्टक राज्य किया । एक बार सायंकालकी आरतीके अनन्तर राजाने एक दासको इनाममें पानका बीड़ा दिया। उसने हाथमें लेकर देखा तो उसमें कृमि दिखाई दिये। राजाके आग्रह पूर्वक पूछनेपर उसने यह बात कही । इससे राजाको वैराग्य आया और उसने सन्यास ग्रहण किया और दाहिने पैरके अंगूठेमें अग्नि प्रज्वलित कर, आठ दिनतक गज दान इत्यादि महादान देता रहा । ३३. एकमात्र विनय भावके वशी भूत होकर उसने पैरमें लगी हुई उधूमकेश अग्निको सहन किया । अन्य प्रतापियोंकी तो बात ही क्या है, उसने सूर्यके मण्डलको भी भेद दिया । इस प्रकारकी स्तुतियोंसे स्तुत होते हुए उसने स्वर्गारोहण किया । स० ९९८ से लेकर ५५ वर्ष श्री मूलराजने राज्य किया । ॥ श्रीमूलराज प्रबंध समाप्त ॥ १ यह श्लोक श्लेषार्थवाला है-लक्षहोम के दो अर्थ होते हैं-लक्ष=लाखा राजाका होम, और लक्ष=एक लाख बार होम । आकाशमें बादलोंकी वृष्टिका किसी कारणसे जब रुकाव हो जाता है तो उसके प्रतिकारके लिये एक लाख आहुतियों वाला होम करनेका वैदिक शास्त्रोंमें विधान है। इधर, लाखाकी रानिया, जो कभी रुदन नहीं करती थीं, उनके आँसूरूपी वृष्टिका प्रवाह चालू करनेके लिये, मूलराजने अपने प्रतापरूपी अग्निमें लाखाको होम दिया-भस्म कर दिया ।
- इस श्लोकमें 'कच्छपलक्ष' और 'धीवरता' शब्द पर श्लेष है । मूलराजने कच्छप=कच्छपति लक्षराजको मारकर अपनी धीवरता=श्रेष्ठ बुद्धिमत्ताका परिचय दिया । दूसरा अर्थ कच्छपलक्ष यानि एक लाख कछुए, और उस अर्थमें धीवरका अर्थ मच्छीमार ऐसा किया गया है ।
प्रकरण ३०-३४ ] मूलराजादिका प्रबन्ध मूलराजके वंशज । [ १८ ] अपने सारे शत्रुओंको समाप्त करके जब वह-( मूलराज )-कथाशेष होगया ( मृत्युंको प्राप्त हुआ ) तो उसके बाद पृथ्वीमण्डलका आभूषण ऐसा चामुण्डराज राजा हुआ । [ १९ ] उसकी सेनाका साज, शत्रुओंकी स्त्रियोंके मनको संतप्त होनेकी विद्या सिखानेमें निपुण पण्डित था और उसके सैन्यने इन्द्रको भी भयभीत कर दिया था । [ २० ] उसके हाथरूपी कमलमें रहनेवाली, कोश ( १ म्यान; २ कमल ) में विलास करनेसे चमकती हुई तलवार रूपी भौंरोंकी श्रेणीने राजाओंके वंशोंको भिन्न कर दिया । ३०) संवत् १०५३ से लेकर १३ वर्षतक चामुण्डराजने राज्य किया । [ २१ ] जिसकी कीर्ति तीनों लोकोंमें प्रकाशित हो रही है, और जो महीपतियोंमें श्रेष्ठ माना जाता है ऐसा वल्लभराज नामक उसका पुत्र राजा हुआ । [ २२ ] वह दृढ़ पौरुषवाला राजा शत्रुओंकी नगरियोंको घेरे रहता था इसलिये विशेषज्ञोंने उसका नाम 'जगत्-झम्पन' रखा था । ३१) सं० १०६६ से लेकर ६ महीने तक राजा वल्लभराज ने राज्य किया । [ २३ ] जिसमें रजोगुण और तमोगुणका अभाव था और जिसके जैसा यश प्राप्त करना औरोंके लिये अत्यंत दुर्लभ था, ऐसा दुर्लभराज नामका उसका छोटा भाई [ उसके बाद ] राजा हुआ । [ २४ ] साँपकी भाँति, काल करवाळ ( कठिन तलवार ) से सुरक्षित होकर उसका राज्य, निधानके समान, अन्यों ( शत्रुओं )का भोग न हो सका । [ २५] सौभाग्यसे प्रकाशमान उस राजाका कर ( १ हाथ; और २ मालगुजारी ) सर्वथा अनुपभोग्य ऐसी परस्त्री पर और ब्राह्मणोंको प्रदान की हुई भूमिपर, कभी नहीं पड़ा । ३२) सं० १०६६ से लेकर ११ साल ६ महीने तक श्रीदुर्लभराजने राज्य किया । इस राजा दुर्लभने पत्तन में 'दुर्लभ सर' नामक सरोवर बनवाया । [ २६ ] फिर, उसके भाईका लड़का 'भीम' नामक राजा हुआ जिसकी प्रवृत्ति तीनों जगत्को अभीष्ट फल देनेवाली हुई । * [ यहाँ A आदर्शका अनुसरण करनेवाली मुद्रित पुस्तकमें, यह समय-सूचक पाठ इस प्रकार है-] [ इसके बाद सं० १५० (? १०५२ ) श्रावण सुदी ११ शुक्रवारको पुष्य नक्षत्र और वृष लग्नमें श्रीचामुण्डराज का राज्यारोहण हुआ। इसने पत्तन में चन्द्रनाथ देव और चाचिणेश्वर के मन्दिर बनाये । सं० ५५ (? १०६५) आश्विन सुदी ५से लेकर १३ वर्ष १ मास २४ दिन राज्य किया । सं० १०५५ (? १०६५) आश्विन सुदी ६ मंगळवार, ज्येष्ठा नक्षत्र, मिथुन लग्नमें श्रीवल्लभ राजदेव गद्दी पर बैठा । इस राजाने जब मालवा देशकी धारानगरी के प्राकार (किलेको) घेर रक्खा था उसी समय शीतली, रोगसे इसकी मृत्यु हुई । इसके दो विरुद थे-'राज मदन शंकर' ( राजारूपी कामदेवके लिये शिव ) और 'जगज्झम्पन' । सं० १० (? १०६६) चैत्र सुदी ५ से लेकर ५ महीने २९ दिन तक इस राजाने राज्य किया । ७-८
सं० १५५ (१०६६) चैत्र सुदी ६ गुरुवारको, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र और मकर लग्नमें, दुर्लभराज नामक उसका भाई राज्यपर अभिषिक्त हुआ। इसने पत्तन में व्यकरण (कचहरी), हस्तिशाला और घटी- गृह युक्त सात तल्लेवाला धवलगृह (राजप्रासाद) बनवाया। अपने भाई वल्लभराज के कल्याणार्थ मदनशङ्कर प्रासाद बनवाया और दुर्लभसर नामक सरोवर भी बनवाया। इस तरह बारह वर्ष इसने राज्य किया।] [प्रबन्धचिन्तामणिकी इस A सञ्ज्ञावाली प्रतिमें चौलुक्य वंश के इन राजाओंका कालक्रम आदि कुछ भिन्न क्रमसे लिखा हुआ मिलता है जिसका भी संग्रह करना ऐतिहासिक दृष्टिसे कुछ उपयोगी होगा ऐसा समझ कर हमने इन कोष्ठकान्तर्गत कण्डिकाओंमें उसे मुद्रित किया है। यह कालक्रम सूचक पाठ भी चायडोके कालक्रम सूचक उस द्वितीय पाठके समान अपूर्ण और अव्यवस्थित है। हमारा अनुमान होता है कि ग्रंथकारने पहले पहल जब यह कालक्रमके बतलानेवाले उल्लेखों और खवतोंका संग्रह करना शुरू किया होगा और वृद्ध जनोंसे तथा अन्यान्य लेखोंसे इस विषयके प्रमाण एकत्रित करने प्रारंभ किये होंगे, उस समयका लिखा हुआ जो प्राथमिक असंशोधित आदर्श रहा होगा उस परसे यह A संज्ञक आदर्श (तथा उसके समान जातीय अन्य आदर्श) की प्रतिलिपि हुई होगी और इसीलिये इनमें यह असंशोधित कालक्रमवाला पाठ वैसाका वैसा नकल होता हुआ चला आया हुआ होना चाहिए। संशोधित पाठ वही है जो ऊपर मूलमें दिया गया है।] * ३३) इसके बाद [AD प्रतिके अनुसार 'सं० १०५ (१०७८) ज्येष्ठ सुदी १२ मंगलवारको अश्विनी नक्षत्र, मकर लग्नमें '] श्री भीम नामक अपने पुत्रका राज्याभिषेक करके स्वयं तीर्थोपासनाकी वास- नासे वाणारसीके प्रति प्रस्थान किया। मालवक मण्डलमें पहुँचनेपर वहाके महाराजा मुञ्जने रोक कर इस प्रकार कहा कि-' छत्रचामरादि राज-चिन्होंका परित्याग करके कार्पटिक (संन्यासी) की भाँति आगे जाओ, नहीं तो युद्ध करो'। बीच ही में उत्पन्न ऐसा इसे धार्मिक विघ्न समझकर, यह वृत्तान्त भीमराज को कहलाया और स्वयं कार्पटिकका वेश पहन कर तीर्थयात्रा की; और वहींपर परलोक साधन किया। ३४) इसके बाद मालवाके राजाओंके साथ गुजरात के राजाओंका दृढमूल ऐसा विरोधका बंधन बंध गया।
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⁻ प्रकरण ३५-३७ ] मुञ्जराज प्रबन्ध [ २७ ६. मुञ्जराज प्रबन्ध । ३५) अब यहांपर प्रसङ्गसे आया हुआ, मालवामण्डल के मण्डनरूप श्री मुञ्जराजका चरित्र वर्णन किया जाता है—प्राचीन कालमें, उस मण्डलका परमारवंशी राजा, जिसका नाम श्री सिंहभट था, राजपाटी निमित्त परिभ्रमण करते हुए, उसने मुंजके वनमें एक सद्यःजात अति रूपवान् बालकको देखा और स्वकीय पुत्रके समान वात्सल्य भाव धारण करके उसे उठा लिया और महलमें लाकर रानीको समर्पण किया। मुंजके वनमें प्राप्त होनेके कारण उसका नाम मुञ्ज रखा। बादमें उसके एक सीन्धल नामक ओरस पुत्र भी पैदा हुआ। [ एक समय ] निःशेष राजगुणोंके समूहसे भूषित ऐसे उस मुञ्जका राज्याभिषेक करनेकी इच्छासे राजा उसके महलमें गया। मुञ्ज अपनी स्त्रीको, जो उस समय वहां उपस्थित थी, किसी एक वेत्रासनकी ओटमें बिठाकर, प्रणाम पूर्वक राजाकी सेवा करने लगा। राजाने उस प्रदेशको निर्जन देखकर प्रारंभसे लेकर उसके जन्म आदिका वृत्तान्त कह सुनाया और फिर कहा कि-तुम्हारी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर अपने ओरस पुत्रको छोड़कर, तुम्हें राज्य दे रहा हूँ; पर इस सीन्धल नामक भाईके साथ पूरे प्रेमके व्यवहारके साथ वर्तना। इस प्रकारकी आज्ञा देकर राजाने उसका अभिषेक किया। कहीं, अपने जन्मका यह गुप्त वृत्तान्त बाहर न फैल जाय इस आशंकासे उसने अपनी उस स्त्रीको मार डाला। बादमें उसने अपने पराक्रमसे सारे भूतलको आक्रान्त किया और समस्त विद्वज्जनोंके चक्रवर्ती जैसे रुद्रादित्य नामक पंडितको महामंत्री बनाकर अपने राज्यकी चिन्ताका समस्त भार उसे सौंपा। उस सीन्धलनामक भाईको, जिसने अपने उत्कट स्वभावके कारण राजाका कुछ आज्ञाभंग किया था, स्वदेशसे निर्वासित कर, चिरकाल तक निष्कंटक राज्य करता रहा। ३६) वह सीन्धल गुजरातदेशमें आकर, अर्बुद पर्वतकी तलहटीमें काशह्रद नगरके निकट अपना एक छोटा सा गाँव बसा कर रहने लगा। दीवालीकी रातको शिकार खेलने निकला। चोरोंको वध करनेवाली भूमिके निकट एक सूअरको चरते देख, उसने सूलीपरसे गिरे हुए एक चोरके शवको न देख कर, उसे घुटनोंसे दबा कर, जब वह अपना बाण चलाने लगा, तो उस शवने [ मारनेका ] संकेत किया। उसे हाथ लगा कर मना करते हुए, उस बाणसे सूअरको मार गिराया। बादमें जब सूअरको अपनी ओर खींचने लगा तो वह शव जोरोंका अट्टहास करके उठ खड़ा हुआ। इस पर सीन्धुलने कहा-तुम्हारे किये हुए संकेतके समय सूअरपर प्रहार करना उचित था, या समझ बूझकर जो मैंने प्रहार किया वह ठीक था!” उसके इस वाक्यके पूरा होनेपर, वह छिद्रान्वेषी प्रेत, उसके ऐसे निःसीम साहससे सन्तुष्ट होकर बोला कि 'वरदान माँगो।' ऐसा कहनेपर-' मेरे बाण जमीनपर न गिरें' ऐसा माँगा; उस शवने कहा 'और भी कुछ माँगो।' इसपर उसने कहा कि 'मेरी भुजाओंमें सारी लक्ष्मी स्वाधीन हो।' उसके साहससे चकित होकर उस प्रेतने कहा कि-तुम मालवमण्डल में जाओ। यहाँ मुञ्ज राजाका विनाश निकट है, इसलिये तुम वही जाकर रहो। तुम्हारे ही वंशमें यहाँ राज्य रहेगा। इस प्रकार उसके कथनानुसार वह यहाँ गया और मुञ्ज राजाने कोई एक संपन्न शाली प्रदेश प्राप्त कर, कुछ काल बाद, फिर उसी प्रकार उद्धत भावसे बर्तने लगा। एक बार एक तेलीसे कुश माँगी। उसने नहीं दी। इसपर कुपित होकर, बलात्कार पूर्वक छीन कर, और उसे मरोड कर उसके गठेमें डाल दी। तेलीने राजाके आगे पुकार की। राजाने समझा बुझाकर उसे सीधी करवाई। उसके ऐसे उत्कट बलसे राजा मुञ्ज भयभीत हो गया। इसके बाद, मालिश करनेमें बड़े कुशल ऐसे कुछ कलावन्त विदेशसे वहाँपर आये। वे राजासे मिले। राजा उनसे अपने शरीरमें मालिश कराने लगा। वे भी अपनी कलासे हाथ पैर आदि अंग
२८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश उतार कर फिरसे वैसे चढ़ा देते थे । इस प्रकार दो तीन बार कराया । प्रसन्न होकर राजा सोम्ब लका भी इसी प्रकारका मर्दन करवाने लगा । उसके अंगोंके उतार लेनेपर जब वह निश्चेष्ट हो गया तो आँखें निकलवा लीं । [क्योंकि] सुसज्जित अवस्थामें तो उसकी आँख निकालनेमें कौन समर्थ हो सकता था ? । अतः इस प्रकार मुञ्जने उसकी आँखें निकलवा लीं और फिर उसे काठके पींजरेमें बंद करा दिया । उसके भोज नामक पुत्रका जन्म हुआ। उस पुत्रने सभी शास्त्रोंका खूब अभ्यास किया। छत्तीस प्रकारके आयुधोंका आकलन कर, बहत्तर कलारूपी समुद्रका पारगामी बना । इस तरह सभी लक्षणोंसे युक्त होकर वह बड़ा होने लगा । उसके जन्म समय किसी निमित्तज्ञ ज्योतिषीने जन्मकुण्डली बना कर दी [ जिसमें लिखा था कि-] ३४. पचपन वर्ष, सात मास, तीन दिनतक भोजराजा गौड़ देशके साथ दक्षिणापथका भोक्ता होगा । इस श्लोकके अर्थको जब मुञ्जराजने समझा, तो सोचा कि इसके रहनेपर मेरे लड़केको राज्य नहीं होगा; इस आशंकासे उसने भोजको, वध करनेके लिये अन्त्यजोंके सुपुर्द किया । उन्होंने रातको उसकी मधुर मूर्ति देखकर, अनुकम्पाके साथ कापते हुए कहा कि-अपने इष्ट देवताको याद करो। इसपर भोजने निम्नलिखित 'काव्य, पत्रपर लिखकर, मुञ्जराजको देनेके लिये समर्पण किया । ३५. सत्ययुगके अलंकारके समान वह राजा मान्धाता चला गया । जिस रावणके शत्रु रामचन्द्रने महासागरमें सेतु बांधा था वह भी आज कहां है? और फिर युधिष्ठिर प्रभृति अनेक राजा जो आपके समय तक हो गये हैं, सब चले गये; पर यह पृथ्वी किसीके भी साथ नहीं गई ! पर मैं समझता हूं, तुम्हारे साथ तो जायगी ! राजा उसे पढकर मनमें अत्यन्त खिन्न हुआ और बालहत्या करनेवाले अपने आपकी निन्दा करने लगा। [ २७ ] हाय, हे भोज ! मरण कालमें कहा हुआ तुम्हारा काव्य हृदय वेध रहा है । दौर्भाग्यके स्थान समान मुझ पापी, दुष्टको तुम्ही शरण हो । [ २८ ] हे गुणागार भोज ! तुझ बिना इस राज्यसे मुझे क्या काम है ! अरे कोई चिता सजा दो, ता- कि मैं मरकर जाकर भोजसे मिलूं । तत्र मंत्रियोंने राजाको प्रबोधित करते हुए यह वाक्य कहा- [ २९ ] हे स्वामिन् ! यह अति अज्ञान सूचक है जो इस तरह अब आप बोल रहे हैं। जानना वही प्रमाण है जो ऐसी कदर्थनाका कारण न हो । -इस प्रकार बारंबार विलाप करने लगा । ] ३७) बादमें, उनके पाससे अत्यन्त आदरके साथ बुलवाकर उसे युवराजकी पदवी देकर सम्मानित किया । तैलपदेव नामक तैलङ्ग देशके राजाने सेना भेज कर उस (मुञ्ज) पर आक्रमण किया । उस समय रुद्रादित्य नामक महामंत्री रोगग्रस्त था; उसके बारंबार निषेध करनेपर भी मुञ्जने उसके ऊपर चढ़ाई करना चाहा । [ मंत्रीने कहा- [ ३० ] हे महाराज ! हमारी सीख मान लीजिये, अवहेला न कीजिये । तुम्हारे उधर चले जानेपर इस (मुञ्ज) मंत्रीको भीख माँगनी पड़ेगी । [ ३१ ] तुम्हारे बैठे रहनेपर और मेरे डाँघ (चले ) जानेपर राजाका राज्य रूठ जायगा । ऐसा होनेपर बडा ही अकाज होगा और उसकेलिये तुम मालमके धनी जानो ।
प्रकरण १७ ] मुञ्जराज प्रबन्ध [ २९ [ ३२ ] हे स्वामिन् ! यह महेता (महत्तम=महामात्य) विनति करता है कि-अब हमारा यह आखिरी जुहार (नमस्कार) हो। हमें [ जानेका ] आदेश हो। क्यों कि हम तुम्हारे सिरपर राख पडती देख रहे हैं। इस प्रकार मंत्रीके निषेध करने पर भी वह सेनाके साथ चला ।] [ मंत्रीने आखिरमें कहा कि-] गोदावरी नदीको सीमा मान उसे लाँघकर आगेप्रयाण न कीजियेगा । इस प्रकार मंत्रीने शपथ देकर आगे न जानेके लिये रोका था; तथापि मुञ्ज ने यह विचार कर कि पहले छ चार उसे जीता है, जोशमें आकर उस नदीको पार करके, सामने किनारे जाकर पड़ान डाला । रुद्रादित्य ने जब राजाके उस वृत्तान्तको सुना, तो उसकी अनियमशीलताके कारण कोई भारी विपद आनेवाली है, यह सोचकर स्वयं चिताग्निमें प्रवेश किया । इसके अनन्तर तैलपने छल और बलसे उसकी सेनाको तितर-बितर कर मुञ्जराजा को गिरफ्तार कर लिया और मूंजकी रस्सीसे बाँध उसे कारागारमें बन्द कर दिया । काठके पिंजड़ेमें उसे रक्खा गया था और राजा तैलपकी बहन मृणालवती उसकी परिचर्या करती रहती थी । मुञ्ज का उसके साथ पत्नीका-सा स्नेह सम्बन्ध हो गया। उधर पीछे रहे हुए उसके मंत्रियोंने एक सुरंग खुदवाई और उसके जरिये मुञ्ज को संकेत करवाया । इतनेमें, एक बार जब वह दर्पणमें अपना प्रतिबिंब देख रहा था, तो उसी समय मृणालवती, अनजानमें, पीछे आ खड़ी हुई । उसने भी दर्पणमें अपने बुढ़ापेके जर्जर मुखको देखा और फिर देखा किं युवक मुञ्जराज के मुँहके पास उसका मुँह अत्यन्त मद्दा दिखाई दे रहा है। इसलिये उसे उदास होते देख मुञ्ज ने कहा- ३६. मुञ्ज कहता है कि-ऐ मृणालवती ! गये हुए यौवनको झुरो मत; यदि सकरकी डली पीसी जा कर सैकड़ों टुकडोंमें छिन्न भिन्न हो जाय, तो भी वह मीठी चूर ही लगती है । इस प्रकार कह कर [ उसे शान्त बनानेका प्रयत्न किया ], बादमें अपने स्थानको जानेकी इच्छा- वाला होते हुए भी मृणालवतीका विरह वह नहीं सह सकता था, और भयसे उसे वह वृत्तान्त भी कह नहीं सकता था । बार बार [ मृणालवती के ] पूछनेपर भी, अपनी चिन्ता न कह सका । बिना नमककी और अधिक नमक दी हुई रसोई खाकर भी जब वह उसका स्वाद नहीं जान सका तो, मृणालवती ने अत्यंत आग्रह और प्रेमपूर्वक पूछा; तब बोला कि मैं इस सुरंगके रास्ते अपने घर जानेवाला हूँ । यदि तुम भी यहाँ चलो तो मैं तुम्हें पटरानीके पदपर अभिषिक्त करके अपने प्रसादका फल दिखाऊं । इसपर उसने कहा कि क्षणभर प्रतीक्षा करो; तब तक मैं अपने गहनोंकी सन्दूक ले आऊ । यह कहकर उस कात्यायिनी (ढलती उमरकी विधवा ) ने सोचा कि यह वहाँ जाकर मुझे छोड़ देगा, अपने भाई राजासे वह वृत्तान्त जाकर कह दिया । इस पर यह राजा, उसकी विशेष विडम्बना करनेके लिये, उसको बन्धनमें बाँधकर प्रतिदिन भिक्षाटन कराने लगा । वह घर घर घूमता हुआ, खिन्न होकर उदासीके इन वचनोंको बोला करता । जैसे कि- ३७. वे नर मूर्ख है जो स्त्रीपर विश्वास करते हैं; जिस स्त्रीके चित्तमें सौ, मनमें साठ, और हृदयमें बचीस आदमी बसा करते हैं । और भी- ३८. यह मुञ्ज जो इस प्रकार रस्सीमें बन्धा हुआ बंदरकी तरह घुमाया जा रहा है, वह बचपन-ही-में झोलीके टूट जानेसे गिरकर क्यों न मर गया, या आगमें जल कर राख क्यों न हो गया । तब किन्हीं सज्जन पुरुषोंने दिलासा देते हुए कहा कि-
३० ] प्रबन्धचिन्तामणि ˙ [ प्रथम प्रकाश [ ३३ ] हे रत्नाकर, हे गुणपुञ्ज मुञ्ज ! चित्तमें इस प्रकार विषाद न करो । क्यों कि जिस प्रकार विधाता ढोल बजाता है उसी तरह मनुष्यको नाचना पड़ता है । फिर किसी और दयार्द्रचित्त सज्जनने कहा- [ ३४ ] हे मुञ्ज ! इस प्रकार खेद न करो ।' क्यों कि भाग्यक्षय होनेपर वह रावण भी नष्ट हो गया, जिसका गढ़ तो लंका था और जिस गढ़की खाई खुद समुद्र था और उस गढ़का मालिक खुद रावण दस माथेवाला था । इसी प्रकार- ३९. हाथी गये, रथ गये, घोड़े गये, पायक और भृत्य भी चले गये । महत्ता ( महामात्य) रुद्रादित्य भी स्वर्गमें बैठा आमन्त्रण कर रहा है ! बादमें, एक अवसरपर, किसी गृहस्थके घरपर वह भिक्षाके लिये ले जाया गया । उसकी स्त्री उस समय छोटे पाड़ेको छास पिला रही थी । उसने उसको भिक्षाके लिये खड़ा देख कर गर्वसे कन्धा ऊँचा किया और भीख देनेका इन्कार किया । इसपर मुञ्ज बोला- ४०. हे भोली मुग्धे ! इन छोटेसे पाडों ( भैंसके बच्चों) को देख कर ऐसा गर्व न कर । मुञ्जके तो चौदह सौ और छहत्तर हाथी थे, पर ये भी चले गये । उसने इस प्रकार उत्तर दिया- [ ३५ ] जिसके घर चार बैल हैं, दो गायें हैं और मीठा बोलने वाली ऐसी [मैं] स्त्री हूँ, उस कुटुंबी ( कणबी=किसान) को अपने घरपर हाथी बाँधनेकी क्या जरूरत है ? एक दूसरी बार जब कि मुञ्जको इस प्रकार इधर उधर घुमाया जा रहा था, तब, राजा किसी बावडी पर बैठा हुआ उसे देख कर हँसने लगा । इस पर वह बोला- , [ ३६ ] ऐ धनके अन्धे मूढ़ ! मुझे विपत्तिग्रस्त देखकर हँसता क्या है !-लक्ष्मी कभी कहीं स्थिर- होती देखी है ? तू क्या इस जलयन्त्र-चक्र ( अरहंट) की घटियोंको नहीं देखता जो क्रमसे खाली होती हैं, भरती हैं और फिर खाली होती हैं ! इसी तरह पीछे लगकर चिढ़ानेवाले आदमियोंको देखकर उसने कहा- [ ३७ ] मैं उन पर वारी जाता हूँ जो गोदावरी नदीके ऊपर ही अटक गये ( मर गये ), जिन्होंने न इन दुर्जनोंकी ऋद्धि देखी और न इस विह्वल मुञ्जको देखा । फिर अपनी मन्दबुद्धिताका स्मरण करता हुआ इस प्रकार बोला- [ ३८ ] दासीको कभी प्रेम नहीं होता यह निश्चित जानना चाहिए । देखो, दासीने राजा मुञ्जेश्वरको घर घर भीख माँगता करवाया । [ ३९ ] और जो लोग अपना बड़प्पन छोड़कर वेश्या और दासियोंमें रचते हैं वे मुञ्जराजाके समान बहुत ही अनादर सहन करते हैं । [ ४० ] हे * मर्कट (बंदर) ! इसलिये तुम अफसोस न करो कि मैं इस स्त्रीके द्वारा खंडित किया जा रहा हूँ । राम, रावण, और मुञ्ज आदि कैसे कैसे लोग स्त्रियोंसे खंडित नहीं हुए ?
- मदारी लोग बंदर और बदरियाका जब खेल करते हैं तब, बदरिया रूठकर बंदरका अपमान करती है और बंदरसे पानी भरवाना चक्की चलवाना आदि काम करवाती है । बंदर अपमानित होकर मुँह फेर बैठ जाता है और हाथसे अपने सिरको पीटता है । इस अवसरपर किसीकी यह उक्ति है ।
प्रकरण ३७-३८ ] . मुञ्जराज प्रबन्ध [ ३१ [ ४१ ] ऐ यन्त्र, +चरखा ! तुम इसलिये न रोओ कि मैं इस स्त्री द्वारा भ्रमाया ( घुमाया ) जा रहा हूँ । ' ये तो कटाक्ष फेंक कर ही ( मनुष्योंको ) घुमाया करती हैं, तो फिर हाथसे खींचने पर की बातका तो कहना ही क्या है ! [ ४२ ] मुञ्ज कहता है कि, हे गुणाढ्यवती ! जो बुद्धि पीछे उत्पन्न होती है, वह अगर पहले ही हो जाय तो कोई विघ्न आकर घेर नहीं सकता । [ ४३ ] जो राजा दशरथ देवताओंके राजा ( इन्द्र ) के तो मित्र थे, और यज्ञ पुरुषके तेजःअंशके समान रामके पिता थे, वही पुत्रविरहके दुःखसे शय्यापर ही पडे पडे मर गये, उनका शरीर जलते हुए तेलके मटकेमें रक्खा गया और बहुत दिनोंके बाद उसका संस्कार हुआ । हाय, कर्मकी गति टेढ़ी है ! [ ४४ ] सिरपर विधु x ( चंद्रमा और विधाता ) के वक्र हो कर आ बैठने पर, शिवके सदृश जो सब देवताओंके गुरु हैं उनका भी कैसा हाल हो गया है सो तो देखो । उनके पास अलंकारमें तो मात्र नर-कपाल है जिसे देखते ही डर लगता है, परिवारमें जिसका सारा शरीर छिन्न भिन्न है ऐसा एक भृंगी है, और सम्पत्तिमें एक ढलती उमरका बूढ़ा बैल है ! फिर हम लोगोंके सिरपर जो विधि यानि विधाता वक्र हो कर आ बैठे तो क्या क्या हाल न हो । इस प्रकार चिरकाल तक भिक्षा मँगवाने बाद राजाकी आज्ञासे मुञ्ज को वध्य-भूमिमें ले गये । वहाँ पहले पहिनेका उसका वस्त्र ले लिया गया । तब वह बोला- [ ४५ ] यह कमर जो हमेशां मतवाले हाथीके ऊपर ही बैठकर चलनेवाली थी, जो सदा विचित्र सिंहासनपर ही बैठती थी और जो अनेक रमणियोंके जघनस्थल पर लालित होती थी; वह आज इस प्रकार विधिवश बिना वस्त्रकी कर दी गई ! तब मुञ्ज ने पूछा कि-' किस प्रकार मुझे मारोगे ?' [ उत्तर मिला ] ' वृक्षकी शाखा में लटका कर ।' तब वह बोला- [ ४६ ] कहाँ तो यह महावनमें रहा हुआ वृक्ष है और कहाँ हम संसारका पालन करनेवाले राजाओंके पुत्र ! अहो, कभी न घट सकनेवाली बातको घटानेमें पटु ऐसा यह विधिका चरित्र बड़ा दुरबोध है ! उन्होंने कहा कि 'इष्ट देवताको याद करो' इस पर वह बोला- ४७. इस यशके पुंजके समान मुञ्ज के गत होनेपर, लक्ष्मी है सो तो विष्णुके पास चली जायगी और वीरश्री है यह वीर मन्दिरमें चली जायगी; किन्तु [ और कोई आश्रयस्थान न मिलनेसे ] सरस्वती है सो निराश्रित हो जायगी ।
- स्त्री जब चरखा चलाती है तब उसमेंसे हूँ...हूँ... इस प्रकारकी आवाज निकलती है । उस आवाजपर यह किसीकी अन्योक्ति है । स्त्री अपने हाथसे चरखेको खूब घुमा रही है इसलिये मानो चरखा रो रहा है । कवि कहता है कि, भाई चरखा तूं रो मत ! स्त्रीके तो कटाक्ष मात्रसे भी मनुष्य घूमने लगते हैं, तो फिर तुझे तो यह अपने हाथसे फिरा रही है । x यहापर 'विधौ वक्रे मूर्ध्नि' इस वाक्यांश पर श्लेष है । संस्कृतमें 'विधु' शब्द चंद्रका वाचक है और 'विधि' विधाताका । इन दोनों शब्दोंका सप्तमी विभक्ति के एक वचनमें 'विधौ' ऐसा रूप बनता है । शिवके पक्षमें 'विधुके वक्र होनेपर;' और दूसरे पक्षमें 'विधिके वक्र होनेपर' ऐसा अर्थ घटाया गया है ।
३२ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश इस तरहके उसके अन्य बहुत वाक्य हैं जो परम्पराके अनुसार जानने चाहिये* । बादमें उस मुञ्ज को मारकर उसका सिर सूलीमें पिरोकर अपने आँगनमें रखवाया और उसमें रोज दही लगवा लगवाकर अपने अमर्षका पोषण करता रहा । ४२. जो मुञ्ज यशका पुञ्ज था, हाथियोंका पति था, अवन्ती का स्वामी था, सरस्वतीका पुत्र था, प्राचीन कालके जैसा कृती पुरुष था; वही कर्णाट देश के राजाके द्वारा अपने नेत्रोंकी दुर्बुद्धिसे पकड़ा गया और सूलीपर चढ़ा दिया गया । हाय, कर्मकी गति कैसी विषम है ! * ३८) उसके बाद, मालवा मण्डल के मंत्रियोंने जब यह वृत्तान्त सुना तो, उन्होंने फिर उसके भतीजे भोज को राज्य पदपर अभिषिक्त किया । इस प्रकार श्रीमेरुतुङ्गाचार्य रचित प्रबन्धचिन्तामणि ग्रन्थका 'राजा श्रीविक्रमादित्य प्रभृति महासाहसिक और परोपकार-आदि गुणरूपी रत्नोंसे अलंकृत राजाओंके चरित्र' नामक यह पहला प्रकाश समाप्त हुआ।
- मालूम होता है मुञ्जकी यह करुण कथा उस जमानेमें बहुत लोक प्रसिद्ध और लोक साहित्यकी विशिष्ट वस्तु बनी हुई थी । मेरुतुङ्गासूरिने जो यहाँ पर ये कुछ सस्कृत, प्राकृत और देश्य पद्य दिये हैं वे या तो भिन्न भिन्न कर्तृक मुञ्ज विषयक प्रबन्धोंमेंसे उद्धृत किये गये हैं; या परम्परासे सुनकर लिख लिये गये हैं । मुञ्जकी इस कथामें एक तो लक्ष्मीकी अस्थिरता और दूसरी स्त्रीकी अविश्वसनीयता और तीसरी मुञ्ज जैसे महाबुद्धिमान् शक्तिमान् राजाकी, दुश्मनके द्वारा की गई त्रासोत्पादक विडंबना- इन तीन बातोंका विचित्र संघटन हो जानेसे उपदेशकोंको अपने उपदेशकेलिये यह एक वास्तविक घटनाका बतलानेवाला करुण रसका बोधदायक आख्यान ही मिल गया । अभी तक निश्चय नहीं हो सका कि इस कथामें ऐतिहासिक तथ्य कितना है और ग्रन्थकर्ताओंकी बनावट कितनी है । यहाँपर जो पद्य दिये गये हैं वे तो प्रबन्धकर्ताओंकी उपदेशात्मक उक्तियाँ मात्र हैं। कुछ पद्य तो मेरुतुङ्गासूरिके भी पीछेके बने हुए हैं और किसीने प्रसङ्गोचित समझकर इस ग्रंथमें प्रक्षिप्त कर दिये हैं । १. दही लगवानेका मतलब यह कि उसे देखकर कौए आवें और उस मस्तकपर बैठें । किसी दुश्मनका बहुत ही बुरा चाहना होता है तब लोग बोला करते हैं कि-उसके सिरपर तो कौए बैठेंगे । उसी लोकोक्तिका सूचक यह कथन है ।
द्वितीय प्रकाश: मुंजराज व तैलप संघर्ष प्रबन्ध
प्रकरण ३९-४२ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३३ ७. भोज और भीमका प्रबन्ध । ३९) इसके बाद [सं० १०७८ के साठ] जब मालवमण्डल में श्री भोजराज राज्य करता था, तब इधर गुर्जरभूमि में चौलुक्य चन्द्रजाति भीम पृथित्राका शासन करता था। एक रात्रिके अतमें राजा भोजने, अपने चित्तमें लक्ष्मीकी अस्थिरताको विचारते हुए और अपने जीवनको भी तरंगकी भाँति चञ्चल समझते हुए, प्रात कृत्यके बाद, दानमण्डपमें बैठकर नौकरोंके द्वारा याचकोंको बुला, यथेच्छ सुवर्ण टंकोंका (सोनेकी मोहिरोंका) दान देना प्रारंभ किया। ४०) इस पर, रोहक नामक उसके मंत्रीने, खजानेका नाश होता देख, राजाके औदार्य गुणको दोष समझते हुए उसे रोकनेके लिये अन्य उपायोंसे समर्थ न होकर, एक दिन सर्वावसर (न्याय सभा) के उठ जाने बाद सभामण्डपके भारेपर खडियासे इन अक्षरोंको लिख दिया-आपत्ति कालके लिये धनकी रक्षा करनी चाहिए। प्रातः काल यथा समय राजाने उन अक्षरोंको पढ़ा। सभी परिजनोंमेंसे किसीने भी जब उस कार्यके करनेका स्वीकार नहीं किया तो राजाने उसके साथ यह लिख दिया-भाग्यवान्को आपत्ति कहा है। इस पर मंत्रीने जवाबमें लिखा कि-कभी दैव कुपित हो जाय तो ?। इस पर राजाने फिर उसके सामने लिख दिया कि-[तब तो] सञ्चित भी विनष्ट हो जायगा। इससे निरुत्तर होकर उस मंत्रीने अभय वचन माँगकर उस कथनको अपना लिखा बताया। बादमें राजाने कहा, कि मेरे मनरूपी हाथीको ज्ञानरूप अंकुशसे वशमें रखनेके लिये महामात्रके समान ५०० पण्डितोंका यह समूह यथेच्छ रूपसे अपना अपना ग्रास प्राप्त किया करें¹। राजाने अपने जीवनका ध्येय सूचित करनेवाली ऐसी चार आर्याओंको अपने कङ्कणपर खुदवाईं² जिनका अर्थ यह है- ४४. यही उपकार करनेका अवसर है, जब तक कि स्वभावत ही चञ्चल ऐसी यह सम्पत्ति विद्यमान है। फिर वह विपत्ति कि जिसका उदय भी निश्चित है, उसके आनेपर उपकार करनेका अवसर कहाँ रहेगा²। ४५. हे पूर्णिमाके चन्द्रमा ! अपने किरण-समूहकी समृद्धिसे अभी आज इस सारे भुवनको उज्ज्वल कर दे। [फिर यह मौका न मिलेगा, क्यों कि] निर्दय विधाता चिरकाल तक किसीका सुस्थिर होना सह नहीं सकता। ४६. ऐ सरोवर ! दिन और रात याचकोंका उपकार करनेका यही अवसर है। यह जल तो उन पुराने बादलोंके उदय होनेपर फिर सर्व सुलभ ही है। ४७. ऐ किनारेके वृक्षोंको गिरा देनेवाली नदी ! यह सुदूर तक उन्नत दिखाई देनेवाला पानीका पूर तो कुछ ही दिनों तक ठहरेगा, पर यह एक पातक (पेड़का गिरा देना) तो चिरस्थायी होकर रहेगा। और फिर- १ इसका मतलब यह है कि राजा भोजने अपन पास ५०० पंडित रखे थे जिनके निर्वाहके लिय राज्यकी ओरसे स्थायी ग्रासका प्रबन्ध कर दिया गया था। २ पुरातन जमानेमें यह एक प्रथा थी कि-विचारशील लोग, जिस किसी सद्विचारको अपना जीवन ध्येय बना लेते थे उसका सतत स्मरण रहा करे इसलिये उस विचारके सूत्रको अपने हाथके कंकणपर उत्कीण करा (खुदा) लेते थे और उसका सदैव अवलोकन किया करते थे। वस्तुपाल आदि अन्य भी महापुरुषोंने अपने जीवनसूत्र कंकणपर खुदवा रक्खे थे। ९-१०
३४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ४८. सूर्यके अस्त होनेके पहले जो धन याचकोंको नहीं दे दिया गया, मैं नहीं जानता, वह धन प्रातःकाल किसका होगा । इस प्रकार अपना ही बनाया हुआ यह श्लोक जो मेरे कण्ठका आभरण-सा होगया है उसको इष्ट मंत्रकी तरह जपता हुआ, हे मन्त्रिन् ! मैं आप जैसे प्रेतके समान [ लोभी ] पुरुषसे कैसे ठगा जा सकता हूँ । ४१) एक दूसरे अवसरपर, राजा राजपाटिका में घूमता हुआ नदीके किनारे जा खड़ा हुआ । वहाँ सिरपर काठका भारा उठाए हुए और पानीको लाँघ कर आते हुए किसी दरिद्री ब्राह्मणको देखा । उससे उसने पूछा कि- ४९. ' कितना है पानी ब्राह्मण !' उसने कहा-' घुटने तक हे राजा ।' राजाने फिर पूछा-' तेरी अवस्था ऐसी क्यों ? ' वह बोला-' आप जैसे सब कहीं नहीं !' उसके इस वाक्यको सुनकर राजाने जो पारितोषिक उसे दिया, मंत्रीने धर्म-खातेमें इस प्रकार लिख रखा- ५०. " जानुदघ्न " ( जानुत क ) कहनेवाले ब्राह्मणको सन्तुष्ट होकर भोजने एक लाख, फिर एक लाख, फिर एक लाख; और उसपर दस मतवाले हाथी; इस प्रकार दान दिया । ४२) एक दूसरी बार रातमें, आधीरातको राजाकी अचानक नींद खुली । उस समय आकाशमण्डल में चंद्रमा नया ही उदित हुआ था। उसे देखकर वह अपने विचाररूपी समुद्रके उठते हुए तरंगके जैसा यह काव्यार्थ बोलने लगा- ५१. यह चंद्रमाके भीतर, बादलके टुकड़ेकी-सी जो लीला कर रहा ह लोग उसे शशक ( खर- गोश ) कहते हैं, किन्तु मुझे वह ऐसा नहीं मालूम देता । राजाके बारवार ऐसा कहनेपर, कोई चोर जो उसी समय सेंध मारकर, कोशगृहमें घुसा था, अपने प्रतिभाके वेगको रोकनेमें असमर्थ होकर बोल उठा- ' मैं तो चंद्रमाको ऐसा समझता हूँ कि तुम्हारे शत्रुओंकी विरहाक्रान्त तरुणियों (स्त्रियों) के कटाक्षरूपी उल्कापातके सैकड़ों व्रणके चिन्हसे वह अंकित हो रहा है ।' उसके ऐसा बोल पड़ने पर, अंगरक्षकोंने उसे पकड़ लिया और कारागारमें बद कर दिया । इसके बाद प्रातःकाल, सभामें ले आये हुए उस चोरको राजाने जिस पारितोषिकसे पुरस्कृत किया, उसे धर्म-खाताके काममें नियुक्त अधिकारीने इस प्रकार लिखा- ५२. उस चोरको, जिसे मृत्युका भय लगा हुआ था, राजाने ऊपर लिखे दो चरणोंके लिये प्रसन्न होकर यह दान दिया-दस करोड़ सुवर्ण मुद्रायें और ऊपर आठ हाथी, जो दाँतोंके आघातसे पर्वतका भेदन करते थे और जिनके मदसे मुदित हो कर भौरे गुजारथ किया करते थे । [ फिर एक बार खिड़कीकी जालीसे आते हुए चंद्रमाको देख कर बोला- [ ४७ ] हे सुध्रु ! खिड़कीकी जालीमेंसे प्रवेश करनेके कारण जिसकी चाँदनी खंड खंड हो गई है, वह चंद्रमा, तुम्हारे वक्षःस्थल पर आकर विराज रहा है । उसी समय घरमें प्रवेश करनेवाले चौरने कहा- ' यह चन्द्रमा मानों तुम्हारे स्तनके संगकी आसक्तिके वश होकर आकाशमेंसे झंपापात कर नीचे कूदा है और दूरसे गिरनेके कारण खड खंड हो गया है ।' इस चोरको भी उसी तरहका दान दिया गया और उसे धर्म-बहीमें लिख दिया गया । ]
प्रकरण ४३-४४ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३५ ४३) इसके बाद, एक बार, जब वह बही [ राजाके आगे ] बाची जाने लगी तो राजा अपनेको बड़ा उदार दानी मानकर घमंडरूपी भूतसे आविष्ट होनेकी भाँति- ५३. मैंने वह किया जो किसीने नहीं किया, वह दिया जो किसीने नहीं दिया, वह साधना की जो असाध्य थी; इसलिये [ अब ] हमारा चित्त दुःखित नहीं है । इस प्रकार बारबार अपने भाग्यकी प्रशंसा करने लगा । तब किसी पुराने मन्त्रीने, उसके अभिमानको दूर करनेकी इच्छासे, श्री विक्रमादित्य की धर्म-बही राजाको दिखाई । उसके ऊपरवाले विभागमें शुरूमें ही पहला काव्य इस प्रकार था- ५४. तुम्हारे मुखकमलमें 'सरस्वती' बसती है, 'शोण' तो तुम्हारा अधर ही है, और रामचन्द्रके वीर्यकी स्मृति दिलानेमें पटु ऐसी तुम्हारी दक्षिण भुजा 'समुद्र' है। ये वाहिनियाँ (सेना और नदियाँ) सदा तुम्हारे पास रहती हैं; क्षणभर भी तुम्हारा साथ नहीं छोड़तीं; और फिर तुम्हारे अंदर ही यह स्वच्छ मानस (मानसरोवर, मन) है; तो फिर हे राजन्, तुम्हें जलपानकी अभि- लाषा क्यों हो ? १ इस काव्यके पारितोषिकमें राजाने इस प्रकार दान दिया था- ५५. आठ करोड़ स्वर्णमुद्रा, ९३ तुला मोती, मदमत्त भौरोंके कारण क्रोधसे उद्धत ऐसे ५० हाथी, चलनेमें चतुर ऐसे दस हजार घोड़े और सौ वेश्यायें;-यह सब जो पाण्ड्य राजाने दण्डके स्वरूपमें विक्रम राजाको भेंट किया था; वह उसने उस वैतालिकको दानमें दे दिया । २ इस प्रकार उस काव्यके अर्थको जानकर, विक्रमकी उदारतासे अपने सारे गर्व सर्वस्वको पराजित मानकर, उस बही की पूजा करके उसे यथास्थान रखवा दिया । ४४) एक समय, प्रतीहारने आकर सूचित किया-'महाराजके दर्शनके लिये उत्सुक ऐसा एक सरस्वती-कुटुम्ब द्वारपर खड़ा है । 'शीघ्र प्रवेश कराओ' राजाकी ऐसी आज्ञा होनेपर पहले उसकी दासीने प्रवेश करके कहा- ५६. बाप भी विद्वान् है, बापका बेटा भी विद्वान् है, माँ भी विदुषी है, माँकी लड़की भी विदुषी है; जो उनकी बिचारी कानी दासी है यह भी विदुषी है; इसलिये हे राजन् ! मैं समझती हूँ कि यह सारा कुटुम्ब ही विद्याका एक पुञ्ज है । उसके इस हास्यकर वचनसे राजाने जरा हँसकर, उनमेंके सबसे बड़े पुरुषको बुलाया और यह समस्या दी-'असारसे सारका उद्धार करना चाहिये ।' [ उसने इसकी पूर्ति इस तरह की-] ५७. धनसे दान, वचनसे सत्य, और वैसे ही आयुसे धर्म और कीर्ति तथा शरीरसे परोपकार-इस प्रकार असारसे सारका उद्धार करना चाहिये । १ किसी समय विक्रम राजाने अपने नौकरसे पीनेको पानी मांगा तब पासमें बैठे हुए किसी कविने यह पद्य बनाया और राजाको सुनाया । इसमें, सरस्वती, शोण, दक्षिण समुद्र, मानस और वाहिनी इतने शब्दारौर श्लेष हैं । ये सब शब्द द्वयर्थक हैं, जिनमें एक अर्थ प्रसिद्ध जलाशय वाचक है और दूसरा अन्यार्थ वाचक है । यथा-सरस्वती=१ नदी, २ विद्यादेवी, शोण= १ नद, २ रक्तवर्ण, दक्षिण समुद्र=१ महासागर, २ मुद्रारत्नमय हाथ, वाहिनी=१ सेना, २ नदी, मानस=१ सरोवर, २ मन । २ इस पद्यमें जो सामग्री वर्णित की गई है यह विक्रम राजाको दक्षिणके पाण्डय राजाने दण्डके रूपमें दी थी और उसी सामग्रीको विक्रमने किसी वैतालिक यानि स्तुतिपाठक कविको, उक्त श्लोकके कहनेपर पारितोषिकके रूपमें-दानमें दे दिया, यह इसका तात्पर्य है ।
३६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रभाव इसके बाद राजाने उसके पुत्रको [ यह समस्या दी ]—‘ हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है !’— ‘प्रवाल (तृणाङ्कुर) की शय्याको शरीरका शरण’ बनाया। राजाके इस वाक्यको सुनकर उसने उत्तर दिया— ५८. वह जो हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है, तुम्हारे प्रतापरूपी अग्निसे पिघल रहा है; और विरहसे आतुर बनी हुई मेना ( हिमालय-पत्नी मेनका ) अपने शरीरको प्रवाल (तृणाङ्कुरों ) की शय्याके शरण कर रही है। इस प्रकार उसके समस्या पूरी कर देनेपर, ज्येष्टकी पत्नीको राजाने समस्याका यह पद अर्पित किया— किससे पिलाऊँ दूध ? ५९. जब रावण पैदा हुआ तो उसने एक शरीरपर दस मुँह देख कर उसकी माता बड़ी विस्मित हुई और सोचने लगी कि कौनसे मुँहसे इसे दूध पिलाऊँ ? —उसने इस प्रकार यह समस्या पूरी की। इसके बाद राजाने दासीसे भी इस प्रकारका पद समस्याके लिये दिया—‘कंठमें काऊ लटक रहा है!’ ६०. पतिविरहसे कराल बनी हुई किसी स्त्रीने उस बेचारे कौवेको उडाया तो, बड़ा आश्चर्य मैंने हे सखि ! यह देखा कि वह काक उसके कठमें लटक रहा *। उसने इस तरह पूरा किया। राजाने उस कुटुम्बमेंकी लड़कीको भूलकर, अन्य सबको सत्कार करके बिदा किया। बादमें राजाने जब सर्वोवसर ( राजसभा ) का विसर्जन किया और स्वयं चन्द्रशाला ( चाँदनी=महलके ऊपरकी छत ) की भूमिमें छत्र धारण करके टहल रहा था, तत्र द्वारपालने उस लड़कीका वृत्तान्त कहा। राजाने उसे [ बुलाकर ] कहा—‘कुछ बोलो’—तो वह बोली कि— ६१. हे राजन्, हे मुञ्जकुलके दीपक, हे समस्त पृथ्वीके पालक, राजाओंके चूड़ामणि ! इस भवनमें रातमें भी, तुम इस प्रकार छत्र धारण करते हो वह उचित ही है। इससे न तो तुम्हारे मुखकी कांतिको देखकर चन्द्रमाको लज्जित होना पड़ता है ओर न भगवती अरुन्धतीको ( पर पुरुषके मुखदर्शनसे ) दुःशीलताका भाजन होना पड़ता है। उसके इस वाक्यके अनन्तर राजाने, जिसके चित्तको उसके सौन्दर्य और चातुर्यने हरण कर लिया था, उससे विवाह करके अपनी भोगिनी बनाया।
- इस पद्यमें ‘काउ’ इस देश्य शब्दपर श्लेष है। काउ काग-काक-कौआ वाचक तो प्रसिद्ध है ही-इसके सिवा गलेमें जो एक लटकता हुआ छोटासा मासपिंड है उसका नाम भी काक-काग ( गुजराती-कागडो ) है। कोई विरहिणी स्त्रीका शरीर इतना कृश होगया है कि जिससे उसके कठमें लटकता हुआ काग स्पष्टतया बहार दिखाई देता है। उसके घरके सामने आ आकर कौआ बोलता है, जिसका यह अर्थ समझा जाता है कि, उसका स्वजन आनेवाल है। लेकिन उसके वारवार ऐसा बोलने पर भी वह जब नहीं आता मालूम देता है तो फिर वह विरहिणी चिढकर उस कौवेको उडा देती है। इस कौवेके उडाते समय उसके पासमें बैठी हुई सखिने उसके दुर्बल कठमेंका वह काग नजर आया। इस अर्थकी घटना बतलानेके लिये कविने इस पद्यमें ‘काउ’ शब्दका प्रयोग कर उसकी समस्यापूर्ति बनाई है। इस ग्रथके गुजराती और इंग्रजी भाषान्तरकारोंने इन पद्योंक कुछके कुछ ऊटपटांग अर्थ किये है।
प्रकरण ४५-४६ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३७ भोजकी गुजरातके राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्द्धा । ४५) इसके बाद, एक समय, संधिपत्रके होते हुए भी, संधिमें दोष उत्पादनके विचारसे भोज राजाने गूर्जर देशकी बुद्धिमत्ताका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने सान्धिविग्रहिकके हाथ, भीमके पास यह [ प्राकृत ] गाथा लिख भेजी- ६२. क्रीडा मात्रमें जिसने हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण किया हो और चारों दिशामें जिसका प्रताप फैल रहा हो उस सिंहका, मृगके साथ न तो विग्रह ही [शोभता है] और न सन्धि ही [रहती है]। भीमने इस गाथाका उत्तर देनेके लिये सब महाकवियोंसे गाथा माँगी। पर उनकी बनाई सब गाथाओंको निःसारार्थक देखकर यह सोचमें पड़ गया। उसी समय नगरमेंके जैन मन्दिरके अन्दर नाचनेके लिये सज बजी हुई नर्तकीको खम्भेके पास खड़ी हुई देखकर मंत्रीने वहीं बैठे हुए किसी आचार्य-शिष्यसे स्तंभ-वर्णनके लिये कहा । यह बोला- [४८] हे स्तंभ ! तुम जो इस मृगनयनी नवयौवनाकी, कंकणाभरण आदिसे सज्जित बाहुलतासे [वेष्टित होकर भी ] न स्वेद-युक्त होते हो, न हिलते हो और न काँपते हो; सो सचमुच ही तुम पत्थरके बने हो यह निश्चित होता है। [आचार्य-शिष्यकी विद्वत्ताकी यह बात जब मंत्रीने राजासे कही तो राजाने [उसके गुरु ] आचार्यको बुलाकर उस विषयमें पूछा- ६३. विधाताने भीमको अन्धकके * पुत्रोंको मारनेके लिये ही निर्माण किया है। जिस भीमने सौ [ अन्धक पुत्रों ] को कुछ नहीं गिना उसके सामने तुझ अकेलेकी क्या गणना है ! ' इस प्रकार गोविन्दाचार्यकी बनाई हुई चित्तको चमत्कृत कर देनेवाली इस गाथाको दूतके हाथ भेजकर, सन्धिका दोषको दूर किया । ४६) बादमें किसी एक रातको, जाड़ेके दिनोंमें, राजा जब वीरचर्यामें घूम रहा था, तो किसी मन्दिरके सामने, किसी पुरुषको यह पढ़ते सुना- ६४. मेरा पेट भूखसे व्याकुल है, ओंठ फट गये हैं, ऐसी अवस्थामें फूंकते फूंकते आग ठंडी हो गई है, चिन्ताके समुद्रमें डूब रहा हूँ, शीतसे मापके फलकी तरह सिकुड़ गया हूँ। निद्रा अपमानिता स्त्रीकी भाँति कहीं दूर चली गई है; और सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मीकी भाँति रात भी खतम नहीं हो रही है। यह सुनकर रात बिताकर सबेरे उसे बुलाकर पूछा-'किस प्रकार तुमने रात्रिशेषमें शीतका अत्यन्त उपद्रव सहन किया ?'। 'सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मी ' इत्यादि कथनकी ओर संकेत करके उसने कहा था। [ यह बोला- ] 'महाराज ! मैं खूब गाढ़े तीन वस्त्रोंसे जाड़ा काटता हूँ।' राजाने पूछा कि तुम्हारे ये तीन वस्त्र क्या हैं ? तब उसने फिर कहा- ६५. रातमें घुटने, दिनमें सूर्य और दोनों शामको आग, इस प्रकार हे राजन्! घुटने, सूर्य और आगके बलपर मैं शीत काटता हूँ। जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने उसे तीन लाखका दान देकर सन्तुष्ट किया। ६६. तुमने अपनी आत्माको धारण करके बलि, कर्ण आदि उन त्यागमूर्ती धनवान पुरुषोंको मुकुरून्
- यहाँपर 'अन्धक' इस शब्दपर श्लेष है। कौरवोंका पिता धृतराष्ट्र अन्धा था इसलिये उनको अन्धक कहा है। भोजका पिता सिंधुल भी अन्धा था इसलिये उसका विशेषण भी अन्धक सार्थक है।
३८ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश दिया, जो सज्जनोंके चित्तरूपी कैदखानेमें आबद्ध थे । इस प्रकार जब वह सारवान् काव्यका उद्गार प्रकट कर रहा था तो राजाने उसका परितोषिक देनेमें अपनेको असमर्थ समझ कर अनुरोधपूर्वक रोक दिया। [ यहाँ P. B. नामक प्रतिमें निम्नांकित वर्णन अधिक पाया जाता है-] [ ४९ ] शीतसे रक्षा करनेके लिये पटी ( वस्त्र ) नहीं है, आग सुलगानेके लिये सगड़ी नहीं है । कमर भूमिपर घिस गई है-सोनेको शय्या नहीं है, कुटियामें हवाके रोकनेका कोई उपाय नहीं है, खानेको मुट्ठीभर चावल नहीं है, घड़ीभर भी मनमें संतोप नहीं है, शृंगार की कोई वृत्ति नहीं है, मनको प्रसन्न करनेवाली कोई प्रिया नहीं है, लेनदारोंसे संकटमें पढा हूँ; ऐसी दशामें हे भोजराज ! तुम्हारे कृपारूपी हाथी द्वारा ही मेरी इस आपदाकी तटीका नाश हो सकता है । इस श्लोकमें आई हुई ग्यारह टी' के हिसाबसे भोजराजने उसे ११ लाखका दान दिया। एक बार, किसी विद्वत्कुलके निवासके लिये घर देखे जा रहे थे। उनके न मिलनेपर राजाने कहा कि जुलाहों और मच्छीमारोंको उजाड़ दिया जाय । जब राजपुरुष उन्हें उजाड़ने लगे तो एक जुलाहा उन्हें रोककर राजाके पास गया, और बोला कि-महाराज ! क्यों हमें उजाड़ रहे हैं ? तो राजाने पूछा-क्या तू कविता करता है ? वह बोला- [ ५० ] जिसके चरणोंपर राजाओंके मुकुटके मणि लोटते रहते हैं ऐसे हे साहसांक महाराज,! मैं काव्य तो करता हूँ पर सुन्दर नहीं कर पाता । जैसा तैसा करता हूँ पर सिद्ध नहीं होता । मैं उसका क्या करूँ ? मैं कविता करता हूँ, कपडा बुनता हूँ और अन्न जाता हूँ । धीवरकी बहू भी हाथमें मांस लेकर राजाके पास गई और बोली- [ ५१ ] 'महाराज, तुम्हारी जय हो !'-' तू कौन है ?'-' लुब्धक (धीवर) की बहू । '- ' हाथमें यह क्या है ? '- ' मास ! '- ' सूखा क्यों है ? '-' यों ही '- और यदि महाराज ! आपको कौतुक हो तो कहती हूँ कि-तुम्हारे शत्रुओंकी प्रियाओंके आँसूकी नदीके किनारे सिद्धोंकी स्त्रियाँ गान करती हैं। गीतमें अन्धे होकर हरिण चरते नहीं । इसलिये उनका यह मास दुर्बल हो गया है । इस प्रकार उक्ति प्रायुक्तियुक्त ये दो काव्य सुनकर राजाने उन्हें नगरके भीतर स्थापन किया । एक बार, कोई विद्वान्, जो गर्वोद्धत था, उस नगरके निवासियोंको घरमें ही गरजनेवाले समझकर अवज्ञापूर्वक वादके लिये आया । नगरके समीप किसी पुरुषसे (धोबीसे) जो वस्त्र धो रहा था बोला-' अरे साड़ीका मैल धोनेवाले ! नगरमें क्या हालचाल हो रहा है ?' वह बोला- [ ५२ ] घोड़े तोरण लगे हुए मकानोंको ढोते हैं, गायें केसरके सहित कमलोंको चरती हैं, दही यहाँ- पर पीला मिलता है, तिलोंमें यहाँ तैल नहीं होता और मकानोंके दरवाजेके शिखरपर हिरण चरा करते हैं । इसके बाद, किसी बालिकासे पूँछा-' तू कौन है ?' तो वह बोली- [ ५३ ] मरे हुए जहाँ जींदा होते हैं, जिनकी आयु बीत गई हे वे उच्छ्वसित होते हैं और अपने गोत्रमें जहाँ कलह होता है, मैं उस कुलकी बालिका हूँ । इसका अर्थ न समझकर उसने विचार किया, कि जहाँ बालिका भी इस तरहकी विधानादी है वहाँके विद्वान् कैसे होंगे, यह उल्टे पाँव लौट गया । १ इस श्लोकमें ' टी ' जिसके अन्तमें है ऐसे पटी, कटी, कुटी, घटी, तटी इत्यादि ११ शब्द आये हैं उन शब्दोंको गिनकर ११ लाखका मो जने उस कविको दान दिया ऐसा इसका तात्पर्य है।
प्रकरण ४७-५० ] भोज और भीमका प्रबन्ध [ ३९ ४७) इसके बाद, एक दूसरे अवसरमें, राजा राजपाटीमे भ्रमणार्थ हाथीपर चढ़कर नगरके भीतर जा रहा था । उस समय किसी भिक्षुकको, पृथिवीपर गिरे हुए अन्न-कणोंको चुनते हुए देखकर बोला— ६७. अपना पेट भरनेमें भी जो असमर्थ हैं उनके जन्म लेनेसे क्या है ? —इस प्रकार उसके पूर्वार्ध कहनेपर; सुसमर्थ होकर भी जो परोपकारी नहीं उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है ? ६८. 'उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है'—यह कहनेपर, दानशूर भोजनरेन्द्र ने उसको सौ हाथी और एक करोड़ सुवर्ण मुद्रायें दीं । उसके इस वचनके अन्तमें [ राजाने कहा ]— ६९. हे जननि ! ऐसा पुत्र न जन जो दूसरोंके आगे प्रार्थना किया करें । उसके इस वाक्यके पश्चात् [ भिक्षुक बोला ]— उसको भी उदरमें न धारण कर जो दूसरोंकी प्रार्थनाका भंग करें । जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने पूछा—' तुम कौन हो ?' इस पर नगरके प्रधान पुरुषोंने कहा, कि आपके यहाँ, नाना भाँतिके विद्वानोंकी घटामें जब अन्य किसी उपायसे प्रवेश न पा सका तो इसी प्रपञ्चसे स्वामिदर्शनकी इच्छा रखनेवाला यह [ व्यक्ति ] राजशेखर है। उसको उचित महादानोंसे पुरस्कृत करनेपर उस राजशेखर ने ये कवितायें पढ़ीं— [ ५४ ] अकुण्ठित मेघोंके नादसे नाचती हुई मयूरियोंकी उन्नत आवाज़से आकुल, मेघागमन कालमे ( वर्षा में ) तो जमीनपर भी जल सुविधासे मिल जाया करता है। लेकिन, इस भयानक उष्णता भरे ग्रीष्म कालमें करुणासे एक दूसरेकी ओर देखनेवाली और इधर उधर ताकती हुई मछलियोंका यदि तू पालन नहीं करता, तो, रे कासार ( तालाब ) तेरी फिर सारता ही क्या है!, ७०. जिस सरोवरमें, मेंढक मरे हुओंकी भाँति कोटरोंमें सो गये थे, कच्छप पृथ्वीमें छिप गये थे, और गाढ़े पंकके ऊपर लोटनेसे मछलियाँ बारंबार मूर्छित हो रही थीं, उसी तालाबमें, अकालके मेघने उतरकर ऐसा किया कि उसमें कुंभस्थल तक डूबे हुए हाथियोंके झुंड पानी पी रहे हैं । इस प्रकार अकालजलद राजशेखर की यह उक्ति है। * राजा भोजकी गुजरातपर आक्रमण करनेकी इच्छा । ४८) इसके बाद, किसी साल, वर्षा न होनेके कारण राजा भीम के देशमें ( गुजरात में ) जब, कण और तृण भी नहीं मिलता था ऐसे कुसमयमें, राजपुरुषोंने भोज का आना बताया ( अर्थात्—भोजराजाने गुजरात पर चढ़ाई करनेकी बात उठाई )। यह सुनकर भीम को चिन्ता हुई और उसने अपने दामर नामक सान्धि- विग्रहिकको आदेश किया कि कुछ दण्ड देकर इस साल भोज को यहाँ आनेसे रोको । उसका यह आदेश पाकर वह यहाँ गया। वह दामर अत्यंत कुरूप समझा जाता था। भोज ने [ उसका उपहास करनेकी दृष्टिसे ] कहा— ७१. ' हे ब्राह्मण ! तुम्हारे स्वामीके सन्धि-विग्रह पदपर तुम्हारे जैसे कितने दूत हैं ?' [ उत्तर—] 'यों तो बहुत ही हैं, हे मालव-नरेश ! पर वे सब गुणकी दृष्टिसे तीन प्रकारके हैं—अधम, मध्यम और उत्तम । [ इनमें ] जो जिस गुणके योग्य होता है उसीके अनुसार ये दूत उन उन
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४० ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश राज्यों में भेजे जाते हैं।' इस प्रकार भीतर ही भीतर हँसते हुए उत्तर देकर उसने धारा के स्वामी (भोज) को प्रसन्न किया। इस प्रकार उसकी वचन-चातुरी से राजा चमत्कृत हुआ। गूर्जर देश के प्रति प्रयाण करनेका राजाने नगाड़ा बजवाया। प्रयाण के समय बंदीने यह स्तुतिपाठ किया- ७२. चौल [ का राजा ] समुद्रकी गोद में प्रवेश कर रहा है और आन्ध्र [ पति ] पर्वत की खोह में निवास कर रहा है, कर्णाट का राजा पट्ट बंध (पगडी बाँधना) नहीं करता है, गूर्जर [ का राजा ] निर्झर का आश्रय लेता है, चेदि [ नरेश ] अब्जों से म्लान होगया है और राजाओं में सुभट समान कान्यकुब्ज कूबडा होगया है- हे भोज ! तुम्हारे मात्र सेनातन्त्र के प्रसार के भय से ही सभी राजा लोग व्याकुल हो रहे हैं। ७३. कोंकण [ का राजा ] कोने में, लाट (नरेश) दरवाज़े के पास, कलिङ्ग [ पति ] आँगन में सोया करते हैं। अरे कोशल [ नरेश ], तू अभी नया है, मेरे पिता भी इस आसन पर सोया करते थे। इस प्रकार जिस (भोज) के कारागृह में रात में प्रत्यार्थियों में स्थानप्राप्तिके लिये उठा हुआ पारस्परिक विरोध निरन्तर बढ़ता रहता है। प्रयाणके लिये नगाड़े बजवाये जानेके बाद, रातको समस्त राजाओंकी दुर्दशाका दृश्य दिखलानेवाला नाटक अभिनीत होने लगा। उसमें कोई क्षुद्र राजा, कारागारके भीतर सामनेकी जमीनपर सुस्थ भारसे सोये हुए तैलप राजाको उठाने लगा। तैलपने उससे कहा-'मै तो यहाँ पुश्त-दर-पुश्त से बास कर रहा हूँ, आप जैसे नये आये हुए राजाकी बातसे अपना पद कैसे छोड़ दूँ ?' राजा भोजने हँसकर डामर से नाटकके रसावतारकी प्रशंसा की। इसपर वह बोला-'महाराज ! यद्यपि नाटक में रसकी जमावट बहुत उत्तम है तथापि इस नटकी, कथानायकके वृत्तान्त से जो नितान्त अनभिज्ञता है वह धिक् है। क्यों कि राजा तैलपदेव सूलीपर चढ़ाये हुए मुण्ड के सिरसे पहचाना जाता है।' सभाके सामने जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाको उसकी निर्भर्त्सनापर क्रोध हो आया और उसी समय उस सामग्री के साथ, जो दूसरों के जुटाये न जुट सकती थी, तैलङ्ग देशके प्रति प्रयाण किया। ४९) बादमें तैलपदेव को बड़ी भारी सेनाके साथ आता हुआ सुनकर भोज व्याकुल हुआ। उतनेमें उसे डामर ने [अपने] राजाके यहाँसे आये हुए एक कल्पित (जाली) आदेशको दिखाकर कहा कि भीम भी चढ़कर भोगपुरतक आ गया है। जलेपर नमक छिड़कने के समान उसकी उस बात से राजा भोज खूब शंकित हो गया। उसने डामर से कहा- इस वर्ष किसी तरह तुम अपने स्वामीको यहाँ आने से रोको। उसने बार बार इस प्रकार दीनताके साथ कहा और उस अवसर के जाननेवाले [डामर] को हाथी के साथ हथिनी भेंट दी। उनको लेकर वह पत्तन में आया और भीमको परितुष्ट किया। ५०) एक बार, जब वह धर्मशास्त्र सुन रहा था, उस समय अर्जुन का राधा-वेध (मत्स्य-वेध) सुनकर सोचा कि 'अभ्यास करनेपर क्या कठिन है।' फिर बराबर अभ्यास करके उस विश्रुतित राधावेधको उसने सिद्ध किया और उसकी सारे नगरवासियों को जान हो इसलिये नगर में खूब सजावट कराई। किन्तु एक तेली और एक दर्जीके, अवज्ञासे उत्सवमें कोई भाग न लेने पर, राजाको उसकी खबर की गई। तेलीने चंद्रशाला (ऊपरी छत) पर खड़े होकर, पृथ्वीपर रखे हुए संकडे मुँहके पात्रमें तेल डालकर; और दर्जीने पृथ्वीपर खड़े होकर ऊपरकी ओर उठाये सूतके दोरेके अग्रभागको आकाशसे पड़ती हुई सुईके छेदमें