भारतकोश
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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

4729 सूचीपत्र । ( १ ) आदि पर्व्व । ( पृष्ठ १ से १८० तक ) पृष्ठ । आदिदेव, गुरु, वाणी, लक्ष्मीश, सुरनाथ और सर्वेश का मंगलाचरण ॥ ... ... १ धर्म्म-स्तुति ॥ ... ... ... ... ... ८ कर्म्म-स्तुति ॥ ... ... ... ... ... ६ मुक्ति-स्तुति ॥ ... ... ... ... ... १० पूर्व कवियों की स्तुति और उच्छिष्ट संज्ञा कथन ॥ ... ... ... ” चंद की स्त्री अपने पति के उच्छिष्ट संज्ञा कथन में शंका करती है ॥ ... ... १२ चंद अपनी स्त्री की शंका का समाधान करता है ॥ ... ... ... १३ चंद की स्त्री पुनश्च शंका करती है ॥ ... ... ... ... ” चंद अपनी स्त्री कि शंका का पुनश्च समाधान करता है ॥ ... ... १४ चंद अपनी स्त्री के आगे ईश्वर के ऐश्वर्य का वर्णन करता है ॥ ... ... ” चंद की स्त्री अपने पति से अष्टादश पुराणों की अनुक्रमणिका पूछती है ॥ ... ... १६ चंद अष्टादश पुराणों की अनुक्रमणिका का कथन करता है ॥ ... ... ... ” चंद अपनी लघुता वर्णन करता है ॥ ... ... ... ... १७ $\left.{l}चंद उत्तापित होकर अपने को पूर्व-कवियों का दास होना उन की उक्ति को कहना और अपनी को बकना कहता है ॥\right}$ १८ चंद खलों का स्वभाव वर्णन करके सुजनों के निमित्त अपना काव्य रचन करना कहता है ॥ ... ” सरस्वती की स्तुति ॥ ... ... ... ... ... ” गणेश की स्तुति ॥ ... ... ... ... ... ” गणपति की उत्पत्ति की कथा ॥ ... ... ... ... २० शंकर की स्तुति ॥ ... ... ... ... ... २१ कवि की आशा का स्वरूप वर्णन ॥ ... ... ... ... २२ चंद का काव्य समुद्र कैसा है ॥ ... ... ... ... ... ” कोई अशुद्ध पढ़नेवाला चंद को काव्य-संबन्धी-दोष न दे ॥ ... ... २३ इस ग्रंथ में चंद ने क्या क्या कथन किया है ॥ ... ... ... ” रासो को रसिया सरस उच्चारै ॥ ... ... ... ... ” रासो का तत्त्वज्ञान कैसे होगा ॥ ... ... ... ... २४ जो रासो को सुगुरु से पढ़ता है वह कुमति नहीं दरसाता ॥ ... ... ... ” रासो किस को अच्छा और किस को बुरा प्रतीत होता है ॥ ... ... २५ इस ग्रंथ के काव्य की संख्या का कथन ॥ ... ... ... ” रासो के ढँके हुए अर्थ के विषय में कवि का कथन ॥ ... ... ... ” इस ग्रंथ के विषयों का संक्षेप कथन ॥ ... ... ... ” राजा परीक्षित की तक्षक दंशन और जन्मेजय की सर्पसत्र कथा ॥ ... ... २६ उस तक्षक का आबू पर अपना अर्बुद नाम धर रहना ॥ ... ... ३३ गालव ऋषि के शिष्य उत्तङ्क का उपाख्यान ॥ ... ... ... ” वशिष्ठ ऋषि का आबू पर तप करना और उनकी नंदनी गौ का अथाह बिल में गिरना .. ३४

सूचीपत्र । ३ पृष्ठ । ७४ सारंगदेवजी की रानी गोरीजी का अनल गर्भ सहित रणथंभ पधारना ... ... ६० ७५ आना राजा का जन्म होना और उनका बालपन ॥ ... ... ६१ ७६ आना का बालपन व्यतीत होना और वीरत्व को प्राप्त हो माता से पूछना ॥ ... ६२ ७७ आना की माता का उनको सर तर और अक्षर विद्या का उपदेश करना ॥ .. ... " ७८ आना का माता से पूछना कि मैं किस वंश में उत्पन्न हुथा हूं ॥ ... ... " ७९ गोरी माता का कहना कि यह बात न पूछो उसके कहते मुझे भय और करुणा होती है ... " ८० आना का माता से अपने वंश की कथा हठ करके पूछना ॥ ... ... ६३ ८१ आना की माता का उसे कथा प्रगट न करने को कहना और ढँक करके संक्षेप में कहना ॥ ... " ८२ अन्य उपनत्यों के द्वारा आना का संभरी को पूर्व कथा संभारना ॥ ... ... ६४ ८३ आना का माता से पूछना कि नर अर्थात् वीसलदेव दानव केन हुआ ॥ ... ... " ८४ आना की मा का कहना कि दानव की कथा न सुन चित भंग होगा ॥ ... ... ६५ ८५ आना का उत्तर दे कहना कि ऐसे मुझे क्यों डराती हो ॥ ... ... " ८६ आना की मा का कहना कि जिससे कार्य सिद्ध न हो उसका कहना व्यर्थ है ॥ ... " ८७ आना का प्रत्युत्तर देना कि आगे कितने नर, ऋषि और राज दानव हुए हैं कथा सुनने से क्या होता है ॥ ६६ ८८ आना की माता का वीसलदेवजी की सविस्तर कथा कहना और वीसलदेवजी का जन्म होना ॥ ... " ८६ वीसलदेवजी का पाट बैठना ॥ ... ... ... ... " ९० वीमलदेवजी का अंत समय पट्टन विजय करने को छत्र धारणा करना ... ... ६६ ९१ वीसलदेवजी पाट बैठकर केने राज करते थे ॥ ... ... ... ७० ९२ वीसलदेवजी का अपने पुत्र सारंगदेवजी को उपदेश करके सांभर भेजना कि जो अपनी धा-बेन के
पति के विनाश से दुखित हो गए थे ॥ ... ... ... } " ९३ वीसलदेवजी का मगया से बकुरना एक तालाब बनाने की आज्ञा देना और दरबार करना ॥ ७३ ९४ वीसलदेवजी का रखवास में पधारकर विश्राम करना और उन की एक अप्रिय रानी का उन को
नपुंसक करना ॥ ... ... ... ... ... } ७४ ९५ वीसलदेवजी का पुरुषत्व नाश होने से दुखित हो गोकर्णेश्वर की यात्रा करने को गुजरात में जाना ॥ ७५ ९६ वीमलदेवजी का गोकर्णेश्वर महादेव की स्तुति करना ॥ ... ... ... ७७ ९७ वोसलदेवजी से गोकर्णेश्वर के सिद्ध का उनका नाम ग्रामादि पूछना ॥ ... ... ७६ ९८ वीसलदेवजी का नाम ग्राम आदि बताना ॥ ... ... ... " ९६ सिद्ध का गोकर्णेश्वर के तीर्थ की महिमा वर्णन करना ॥ ... ... " १०० वीसलदेवजी का तीन दिन निराहार उपवास कर घोटानादि करना और महादेव का अपछरा को
उन्हें उठाने भेजना ॥ ... ... ... ... } ८० १०१ अपछरा का वीमलदेवजी को महादेव के प्रसन्न होने और मन की कामना पूर्ण होने का कहना ॥ " १०२ वीसलदेवजी का अपने को पूर्ण पुरुषत्व प्राप्त होना देखकर वहां वीसलपुर बसाय महादेव का
देवल बनने का हुकुम देना ॥ ... ... ... ... } ८१ १०३ वीसलदेवजी का पीछे अजमेर आना और सब कथा प्रसंग पवांरजी राणो से कहना ॥ ... ८३ १०४ सब काम-लुब्धों को शोच होना कि शंभु ने ऐसा क्या वर दिया ॥ ... ... " १०५ वीसलदेवजी का कामान्ध हो अकर्तव्य कर्म करना ॥ ... ... ... " १०६ वीसलदेवजी के दुराचरणों से दुःखी होकर नगर के लोगों का प्रधान के पास पुकारने जाना ॥ ८४ १०७ सब का आपस में सलाह करके वीसलदेवजी को राजधर्म अरज करना ... ... ८५ १०८ वीसलदेवजी ने उत्तर दे कहा कि यह सब मैं जानता हूं पर काम ज्वाला के बढ़ने से मैं लाचार हूं
अब तुम जो कहोगे वह करूंगा ॥ ... ... ... } " १०६ इस पर वीसलदेवजी का किरपाल को बुलाना और उस का आना ॥ ... ... " ११० वीसलदेवजी का किरपाल को कहना कि तरवारि की पूछो है सो हम नव खंड की पढ़ग
खोसने को पढ़ग बांधते हैं तुम खजाना संग ले बीसल सरवर पर डेरा करो ॥ ... } ८६

४ सूचीपत्र । १११ बीसल सरवर पर बीसलदेवजी के आधीन तथा ... ... ... त्र के दिग्विजयार्थ ... श्रटन के लिये एकत्र होना और गुजरात चालु ... ... ना अतएव बीसलदेव का उस पर चढ़ाई करना और वालुकाराय का विजेपालजी को और करने को आना ॥ ११२ चालुक राव का आना सुनकर बीसलदेवजी का ... ... ... ११३ बीसलदेवजी की खबर सुन वालुक राय का जला २ उठ्ना ॥ ... ... ११४ चालुका राव का नित्य नेम करके लड़ने को तयार प्रतिदिन बढ़ना ॥ ... ... ११५ वालुका राव का बीसलदेवजी के पास श्रीकंठ भट्ट को भेजना लड़हा कहना ॥ ११६ यह सुनते ही बीसलदेवजी का लड़ने को आज्ञा देना ॥ ... ... ११७ बीसलदेवजी का चक्रव्यूह और बालुकाराय का अहिब्यूह रचना ॥ ... ... ११८ बीसलदेवजी और चालुकाराय की फौजों का परस्पर युद्ध करना ॥ ... ... ११९ चालुक का कहना कि रात में युद्ध नहीं करना प्रात भये युद्ध करेंगे ॥ ... १२० दोनों योद्धाओं का अपने २ डेरों पर आना और चालुक के मंत्रियों का एक झूठी पत्री बना १२१ चालुक के मंत्रियों का उसे एक झूठी पत्री देकर घर भेज देना ॥ ... १२२ चालुक के मंत्रियों का बीसलदेवजी के मंत्रियों से मिल संधि कर लेना ॥ ... १२३ पावासुर का बीसलदेवजी को संधिपत्र लेने के समाचार कहना ॥ ... १२४ बीसलदेवजी का संधि स्वीकार कर वहां महल बनाने और नगर बसाने को कहना ॥ १२५ माल मँगा कर बीसलपुर बसाना और वहां से पीछे फिरना ॥ ... १२६ एक दूती का बीसलदेवजी को एक बहुत सुन्दर बनिकसुता की खबर देना ॥ १२७ बीसलदेवजी का बीसलपुर में प्रविष्ट होना ॥ ... ... १२८ बीसलदेवजी का पीछे अजमेर आना और वहां उनका वास होना ॥ ... ... १२६ बनिकसुता गौरो का पुष्कर में तप करना और बीसलदेवजी का उस पर मोहित होना ॥ १३० पुष्कर की तपस्विनी की बीसलदेवजी के प्रति श्रद्धासि ॥ ... ... १३१ बीसलदेवजी का पुष्कर में बनिकसुता गौरी का सतीत्व भ्रष्ट करना और उसका उन को दा होने का शाप देना ॥ ... ... ... १३२ गौरी का बीसलदेवजी को भयभीत देखकर कहना कि तुम्हारा पोता तुम्हारी सुकीर्त्ति करे १३३ तपस्विनी के कोप से बीसलदेवजी का सांप के काटने से अलोप होना ॥ ... १३४ जिस तपस्विनी के शाप से बीसलदेवजी असुर हुए उस के तप का आना की मा सविस्तर वर्णन १३५ शाप से विमुक्त होने के विचार से बीसलदेवजी का गोकर्ण की यात्रा के लिये बीसल सरवर प्रस्थान करना ॥ ... ... ... १३६ तपस्विनी के शाप से बीसलदेवजी की बुद्धि का चल विचल होना ॥ ... १३७ बीसलदेवजी को सांप का काटना और उस से उन का मरना ॥ ... ... १३८ बीसलदेवजी के मरणा और असुर हो नर भक्षण करने की बात सुनकर सारंगदेवजी का अपन को रणार्थंभ भेजना और आप उनसे युद्ध करने को तयार होना ॥ ... ... १३६ सारंगदेवजी की राणी गवरी का चिंता करना ॥ ... ... ... १४० सारंगदेवजी का सेना लेकर ढूंढो राक्षस से युद्ध करने को अजमेर पहुंचना ॥ ... १४१ सारंगदेवजी का तीन दिन कोट में रहना, वहां असुर का न मिलना अजमेर को भ्रष्ट और भय दशा देखकर चिंता करना ॥ ... ... ... १४२ सारंगदेवजी और उनके पिता ढूंढो दानव का परस्पर युद्ध होकर सारंगदेवजी का मारा जाना ॥ १०३ १४३ आना की मा का उसे कहना कि मनुष्यों को ढूंढ २ कर खाने से ढूंढा नाम पड़ा और उसने रम्य } १०४ अजमेर को बेराम कर दिया ॥ ... ... १४४ आना का माता से कहना कि अभी जाकर मैं उसे मार आऊं ॥ ... ... " १४५ गवरी का आना को आमंत्रन मंत कहकर शिखा करना ॥ ... ... " १४६ आना का माता से कहना कि या तो मैं सिर समपूंगा या छत्र धारूंगा ॥ ... १०५ १४७ आना का माता से कहना कि सेवा ऐसी है कि जिस से सब कार्य सिद्धी होती है ॥ ... " १४८ आना की माता का तो उसे शत्रु न देखने को कहना किन्तु उस का अजमेर जाना ॥ ... १०६

। ५ सूचीपत्र । पृष्ठ । ४६ ढूँढा दानव का प्रश्च.. होकर रहना ॥ ... ... १०६ ५० अजमेर की नट भट दवा प्रेत के पास जाना ॥ ... १०६ ५१ आना का अपने मन में विच.. ) दशम सम ... ... १०७ ५२ आना का दानव की कंदरा में मारने पर दानव का गाजना ॥ ... १०८ ५३ इस पर दानव का आना से उठ १८१ से २५४ ता नाम पूछना ॥ ... ... " ५४ ढूँढा दानव का आना के सिर प. देना ॥ ... ... " ५५ आना का मन में चिंता करना कि क.. ..क निगलेगा तो मैं उसका पेट चीर कर निकलूंगा ॥ १०६ ५६ आना का उत्तर देना कि जिह से बीसलदेवजी का मन सैन होगया ॥ ... ... " ५७ दानव का आना से पूछना कि तू क्यों राज भ्रस्त है ॥ ... ... ११० ५८ आना का बीसलदेवजी दानव को उत्तर दे कहना ॥ ... ... " ५६ ढूँढा दानव का प्रसन्न होकर आना को अजमेर का राज देना ॥ ... ... १११ ६० ढूँढा का आना को राज देकर गंगा की ओर उड़कर जाना ॥ ... ... " ६१ ढूँढा का नेमऋषियों के उपदेश से गंगा की ओर जाते हुए दिल्ली पहुँचना ॥ ... ... " ६२ ढूँढा का शारिफ ऋषि से मिलना, और अपनी पूर्व कथा कहना और तीन सौ अस्सी वर्ष महा तप करके ऋषि से उपदेश ग्रहण करना ॥ } ११२ ६३ अनंगपाल राजा का दिल्ली बसाना ॥ ... ... ... ११४ ४ अनंगपाल की सुता का निगमबोध कालिंद्री तट पर गौरी पूजने जाना ॥ ... ... " ५ अनंगपाल की सुता का ढूँढा को पूजना और उस का कारण पूछना ॥ ... ... " ६ अनंगपाल की सुता का ढूँढा वर के चाहने को पूजने का कहना ॥ ... ... ११५ ७ ढूँढा का राज स्त्रियों की सेवा से संतुष्ट होना ॥ ... ... " ८ ढूँढा का वर देकर काशी को उड़ जाना ॥ ... ... " ६ ढूँढा का फिर जन्म लेना और उसका वृत्तान्त चंद का वर्णन करना ॥ ... ... " ७० ढूँढा का वर देना और काशी में यज्ञ कर तन त्यागना ॥ ... ... " १ ढूँढा के दानव शरीर का मान और स्वरूप वर्णन ॥ ... ... ... ११६ २ ढूँढा का दिल्ली में पाषाणरूप हो जाना और स्त्रियों का उसे पूजना ॥ ... ... " ३ ढूँढा का अनंगपालकी सुता को वीर पुत्र होने का वर देना ॥ ... ... " ४ ढूँढा का वर देकर काशी जाना, यहां दायत योनि से मुक्त हो अवतार लेना सोमेश्वर की परिग्रह के प्रबंध के लिये क्षत्रियों का उत्पत्न होना, जिन में से बीस अजमेर में और अन्य अन्यत्र हुए सोमेश के वीर पुत्र पृथ्वीराज हुए ॥ } ११७ ५ पृथ्वीराज जी के परिग्रह के सामंतों के नाम और जन्म स्थानादि का वर्णन ॥ ... १२० ६ आना राजा का उजड़ी हुई अजमेर को फिर बसाकर राज करना ॥ ... ... १२१ ७ जैसिंह जी का गद्दी पर विराज राज करना ॥ ... ... ... " ८ आनन्दमेवजी का राज करना ॥ ... ... ... ... १२२ ६ सोमेश्वरजी का सिंहासन पर विराज राज करना ॥ ... ... ... " ० सोमेश्वर जी की शूरता का संक्षेप वर्णन ॥ ... ... ... " १ दिल्ली के राजा अनंगपाल जी पर कमधज्ज का चढ़ना ॥ ... ... १२३ २ कमधज्ज की चढाई सुन अनंग का कालिन्दी उत्तर मुकाम करना ॥ ... ... " ३ कमधज्ज की चढाई सुन सोमेश का अनंग की सहायता को दिल्ली जाना और वहां पहुंच अनंग पालजी से एकान्त में मंत्रणा करना ॥ } १२४ १८४ अनंग की बात सुन सोमेश का रोस में आय लड़ने को तयार होना ॥ ... १२५ १८५ दोनों राजाओं का डेरों पर जाना और पिछली रात को युद्धारंभ होना ॥ ... ... १२६ १८६ सोमेश की सहायता से अनंग की विजयपालजी के साथ लड़ाई ॥ ... ... " १८७ सोमेश्वरजी का दिल्ली में बड़ा साहस करना ... ... ... १३१ १८८ कमधुज्ज का पराजित हो घर जाना और सोमेश का अजमेर को चलना ॥ ... ... १३२ १८६ अनंगपालजी का सोमेश्वर जी को कन्यादान करना ॥ ... ... " १६० सोमेश्वरजी का अजमेर आना और वहां बड़ा उत्सव होना ... ... "

६ सूचीपत्र । पृष्ठ । १६१ पृथ्वीराजजी की कथा का आरंभ करना ॥ ... ... ... १३३ १६२ सोमेश्वरजी का अपने तेज बल से तपना ॥ ... ... ... " १६३ अनंगपालजी का अपनी दो पुत्रियों में से सुन्दरी विजपालजी को और कमला सोमेश्वर जी को प्रदान करना ॥ ... ... ... ... १३४ १६४ जिस दिन सोमेश का विवाह हुआ उस दिन क्या २ हुआ ॥ ... ... " १६५ सोमेश्वरजी की रानी के गर्भ रहना और उस का प्रतिदिन बढ़ना ॥ ... ... १३५ १६६ सोमेश्वरजी की तुँअर रानी का पृथ्वीराजजी को जनना ॥ ... ... " १६७ सोमेशजी के प्रथम पुत्र ढूँढा के घर से होना स्मरण कर गंधर्वोटि का प्रसन्न होना और उत्सव मानना ॥,, १६८ जिस दिन पृथ्वीराजजी का जन्म हुआ उस दिन देशान्तरों में क्या २ हुआ ॥ ... ... १३६ १६६ अनंगपालजी का अपनी पुत्री के पुत्र को देखना और उत्सव करना ॥ ... ... १३७ २०० पृथ्वीराजजी का जन्म होना सुनकर सोमेशजी का उत्सव करना ॥ ... ... १३८ २०१ सोमेश जी का पृथ्वीराजजी को अपने घर लाने को कहना ॥ ... ... " २०२ सोमेशजी का पृथ्वीराजजी को अजमेर ले आना ॥ ... ... " २०३ पृथ्वीराजजी का जन्म संवत् और उनके प्रागट्य का हेतु ॥ ... ... " २०४ पृथ्वीराजजी के शक की संज्ञा का सूत्ररूप कवि का वाक्य ॥ ... ... " २०५ सोमेश्वरजी के अपूर्व तप से पृथ्वीराजजी उत्पन्न हुए ॥ ... ... १४५ २०६ सो' श्वरजी का राव (वेन) को बधाई देना ॥ ... ... " २०७ पृथ्वीराजजी के जन्मोत्तर गुणों का वर्णन ॥ ... ... १४६ २०८ सोमेशजी को पृथ्वीराजजी के जन्मोत्तर गुन सुनकर हर्ष और शोक होना ॥ ... ... " २०६ विक्रम के सदृश पृथ्वीराजजी हुए कि जिन की बुद्धि का वर्णन चंद करता है ॥ ... ... १४७ २१० पृथ्वीराजजी के जन्म संवत के ग्रहों की स्थिति ॥ ... ... " २११ सोमेश्वरजी का दरबार में बैठ ज्योतिषियों से पृथ्वीराजजी की जन्मपत्री का फल पूछना और पंडितों का फल वर्णन करना ॥ ... ... ... " २१२ पृथ्वीराजजी के जन्म होने पर क्या २ आश्चर्यदायक बातें हुईं ॥ ... ... १५१ २१३ पृथ्वीराजजी की बाल अवस्था के चरित्रों का वर्णन ॥ ... ... " २१४ पृथ्वीराजजी का गुरु राम से सब प्रकार की विद्या सीखना ॥ ... ... १५३ २१५ एक दिन रात्रि को चंद की स्त्री का रस में आकर पृथ्वीराजजी को आदि से अंत तक कीर्त्ति वर्णन करने के लिये चंद को कहना ॥ ... ... ... १५७ २१६ चंद का अपने घर में कथा कहना और स्त्री का उसे सुनते हुए जो स्मरण आवै वह पूछते जाना ॥ ... ... ... ... १५८ २१७ चंद की स्त्री का उस से पूछना कि केन दानव, मानव, और नृप कीर्त्ति करने के योग्य है ॥ ... " २१८ चंद का अपनी स्त्री को गूढ उपालंभों के द्वारा उत्तर दे कहना कि केवल हरि कीर्त्ति करने योग्य है क्योंकि उन की भक्ति के बिना मुक्ति नहीं है ॥ ... ... ... " २१६ चंद की स्त्री का उसे कहना कि चित्रनेवाले को चित्र कि जिससे तू दुस्तर के पार उतरे चहुवान की कीर्त्ति कहने से वह क्या रंजेगा ॥ ... ... ... १५६ २२० चंद का अपनी स्त्री को कहना कि मैं चहुआन का ऋण उतारता हूं ॥ ... ... " २२१ चंद की स्त्री का कहना कि राजा को ऋण देता है तो गोविन्द को क्यों नहीं सुमरता ॥ १६० २२२ चंद का उत्तर देना कि मैं कमलासन को देख कर अकुनाया हूं केवल भक्ति विंलब करनेवाली है ॥ " २२३ तथा चंद का कहना कि संसार में जो कुछ और सर्वव्यापी है वह कमलासन ही है उसी की उपमा करके मैं पृथ्वीराजजी की कीर्ति वर्णन करता हूं ॥ ... ... " २२४ चंद की स्त्री उसे कहती है कि ब्रह्म को ब्रह्म में देख जो उसे देखता है उसे वह टोकता है, नर की कीर्त्ति मत गा क्योंकि उस से और कोई बलवंत नहीं है ॥ ... ... १६१ २२५ चंद का अपनी स्त्री को उत्तर दे कहना कि अंग २ में हरि रूप रस हैं ॥ ... ... " २२६ चंद की स्त्री का उसे कहना कि अंग २ में हरि रूप रस वर्णन कर दिखाओ ॥ ... ... १६२ २२७ चंद का उत्तर दे कहना कि कान दे सुन मैं वर्णन कर दिखाता हूं ॥ ... ... " २२८ उपसंहारणी टिप्पण ॥ ... ... ... ... १६३

सूचीपत्र । ७ (२) दसम समय । ( पृष्ठ १८१ से २५४ तक ) पृष्ठ हरि रूप का मंगलाचरण ॥ ... ... ... ... १८१ दशावतार का नाम स्मरण ॥ ... ... ... ... ” दशावतार की स्तुति ॥ ... ... ... ... ” ग्रन्थोक्ति । ... ... ... ... ... १८६ मत्स्यावतार की कथा ॥ ... ... ... ... १८७ कच्छपावतार की कथा ॥ ... ... ... ... १८६ ७ वराहावतार की कथा ॥ ... ... ... ... १६३ ८ नृसिंहावतार की कथा ॥ ... ... ... ... १६६ ६ वामनावतार की कथा ॥ ... ... ... ... २०२ १० परशुरामावतार की कथा ॥ ... ... ... ... २०५ ११ रामावतार की कथा ॥ ... ... ... ... २१० १२ कृष्णावतार की कथा ॥ ... ... ... ... २१८ १३ बौद्धावतार की कथा ॥ ... ... ... ... २५२ १४ कल्कि अवतार की कथा ॥ ... ... ... ... २५३ १५ उपसंहार का कथन ॥ ... ... ... ... २५४

( ३ ) दिल्ली किल्ली कथा । ( पृष्ठ २५५ से पृष्ठ २७४ तक ) १ मंगलाचरण ॥ ... ... ... ... २५५ २ चंद का अपनी स्त्री को कहना कि अनंगपाल की पुत्री को पुत्र उत्पन्न होने से दिल्ली की पूर्व कथा का प्रसंग प्राप्त हुआ है ॥ ... ... ... ... ” ३ बालकपन में पृथ्वीराज का दिल्ली प्राप्त करने का स्वप्न देखना ॥ ... ... २५६ ४. पृथ्वीराज की माता का उससे स्वप्न का वृत्तान्त पूछना ॥ ... ... ” ५ पृथ्वीराज का माता को स्वप्न का वृत्तान्त कहना ॥ ... ... ” ६ पृथ्वीराज की माता का स्वप्न वृत्तान्त सुन अद्भुत रस में रंजित होना ॥ ... ... २५७ ७ उसका ज्योतिषियों को बुला स्वप्न का सत्यफल पूछना ॥ ... ... ” ८ ज्योतिषियों का उत्तर देना कि पृथ्वीराज दिल्ली का राजा होगा ॥ ... ... ” ६ ज्योतिषियों को विदा कर माता और पुत्र का एक गृह में जा बैठना ॥ ... ... २५८ \Bigg} १० अनंगपाल की पुत्री का अपने पुत्र के आगे दिल्ली की पहिली किल्ली की पूर्व कथा का कहना और \atop - राजा कल्हन का वनक्रीडा करते सृसा और स्वान के चरित्र से भूमि का धीरत्व देखना ॥ ... ” ११ उस वीर भूमि में व्यास का कील्ली गाड़ना ॥ ... ... ” १२ वहां कल्हन का कल्हनपुर बसा कर राज करना और फिर उसके कितनोक पीढ़ी पीछे अनंगपाल का होना २५६ १३ इतनी कथा सुनकर पृथ्वीराज के मन में अचरज होना ॥ ... ... ” १४ विपरीत समय का आना देख कर सकल सभा का संकित होना ॥ ... ... ” \Bigg} १५ अनंगपाल की पुत्री का अपने पुत्र ( पृथ्वीराज ) के आगे अपने पिता के फिर से दिल्ली बसाने के \atop लिये पाषाण और किल्ली गाड़ने की कथा का कहना ॥ ... ... ... ” \Bigg} १६ व्यास का कहना कि पांच घड़ी तक पाषाण को हाथ न लगाने से वह शेष के सिर पर दृढ़ हो \atop जायगा परन्तु राजा का इसे अनर्थ कर मानना ॥ ... ... ... २६० १७ साठ अंगुल की किल्ली गाड़ना अर्थात् शंकुघात कर्म करना ॥ ... ... ... ”

८ सूचीपत्र । १८ सब के वरजने पर भी उस किल्ली को उखाड़ डालना ॥ ... ... ... १६ पापाण के उखाड़ते ही रुधिर की धार चलना और आश्चर्य होना ॥ ... ... २० पाषाण का उखाड़ लेना सुन व्यास का दुखित हो राजा के पास आना ॥ '.. ... २१ अनंगपाल का पश्चात्ताप करना और व्यास का आगम कहना ॥ ... ... ... २२ व्यास का अनंगपाल को खेद न करने का उपदेश करना ॥ ... ... ... २३ अनंगपाल के पीछे जो जो दिल्ली के राजा होंगे उनके विषय में व्यास का भविष्य कथन करना । } तुंश्वरों का नाश और चौहानों का राज्य होगा ॥ ... ... ... २४ चौहानों के पीछे मुसलमान और उनके पीछे फिर हिन्दुओं का राज्य होगा ॥ ... " २५ फिर मेवातपति सं० १६७७ में दिल्ली जीत लेंगे ॥ .... ... ... " २६ व्यास का कहा हुआ भविष्य नहीं टरेगा ॥ ... ... ... २६ २७ माता का दान और होम करना ॥ ... ... ... ... " २८ मातुल का अपने मन में मोह करना ॥ ... ... ... ... २६६ २६ पृथ्वीराज का स्वप्नफल सुन आनन्द में फूले न समाना ॥ ... ... ... " ३० स्वप्नफल सुन कर पृथ्वीराज की सर्वस्व वृद्धि कैसे होने लगी ॥... ... ... " ३१ पृथ्वीराज का ऋद्धि अवतार होना ॥ ... ... ... २६७ ३२ लोहाना का गोख में से कूदना और आजानबाहु नाम और जागीर पाना ॥ ... " ३३ दिल्लो किल्ली कथा का उपसंहार ॥ ... ... ... २६८ ३४ उपसंहारार्थं टिप्पण ॥ ... ... ... ... २६६ (४) लोहाना आजान बाहु समय । ( पृष्ठ २७५ से पृष्ठ २८० तक ) १ पृथ्वीराज का अपने सामन्तों को बत्तीस हाथ ऊंची गोख से कूदने की उत्तेजना ॥ ... २७५ २ लोहाना का कूदना ॥ ... ... ... ... " ३ लोहाने के कूदने की प्रशंसा ॥ ... ... ... ... २७६ ४ पृथ्वीराज का दौड़ कर लोहाना के पास आना और उसे हिये लगाना ॥ ... ... " ५ उसे आप उठाकर अपने घर लेजाना और इलाज करना ॥ ... ... " ६ हकीमों का लोहाना को दवा के लिये लेजाना और नवें दिन उसका अच्छा हो कर पृथ्वीराज } के पास आना ॥ ... ... ... " ७ पृथ्वीराज का प्रसन्न हो कर लोहाना को ग्वालियर, रणथम्भोर, ओड़छा आदि पांच हज़ार गांव देना ॥ २७७ ८ आजानुबाहु का आना और पृथ्वीराज का हाथी घोड़े आदि देना ॥ ... ... " ६ लोहाना के वीरत्व का वर्णन ॥ ... ... ... २७८ १० लोहाना का पांच हज़ार सेना लेकर ओड़छा के राजा जसवन्त पर चढ़ाई करना ॥ ... " ११ ओड़छा पर चढ़ाई की शोभा का वर्णन ॥ ... ... ... २७६ १२ ओड़छा के राजा जसवन्त का सामना करने के लिये प्रस्तुत होना ॥ ... ... " १३ लड़ाई होना और लोहाना का जीतना ॥ ... ... ... " १४ लोहाना का गढ़ पर अधिकार कर लेना ॥ ... ... ... २८० (५) कन्हपट्टी समय । ( पृष्ठ २८१ से पृष्ठ २८८ तक) १ पृथ्वीराज के भोरा भीमंग से बैर होने का कारण ॥ ... ... ... २८१ २ पृथ्वीराज के कुंअरपन का तपतेज वर्णन ॥ ... ... ... २८२ ३ गुजरात के राजा भोरा भीम का तपतेज वर्णन ॥ ... ... ... "

सूचीपत्र । ६ पृष्ठ ४ उसके काका और चचेरे भाइयों की वीरता का वर्णन ॥ ... ... ... ... ” ५ पाट बैठने पर प्रतापसी को गर्व होना ॥ ... ... ... ... २८३ ६ प्रतापसी के देश उजाड़ने की पुकार भीमंग के पास होना ॥ ... ... ... ... ” ७ भोरा भीम की उनसे लड़ाई ॥ ... ... ... ... ... ” ८ उन सातों भाइयों का चलचित्त होना ॥ ... ... ... ... ... २८५ ६ पृथ्वीराज का उन चलचित्त सातों भाइयों को जागीर और सिरोपाय देना ॥ ... ... ” १० पृथ्वीराज का दर्वार करके बैठना उसमें प्रतापसी का आना और उसे मूँछ मरोड़ने पर कन्ह का मारना ॥ ... ... ... ... ... ... ” ०१ भाई के मारे जाने पर अरिसिंह का क्रोध करना और कन्ह चौहान पर वार करना ॥ ... २८६ १२ पृथ्वीराज का महल में जाना और अरि सिंहादि की लड़ाई का होना ॥ ... ... २८७ १३ सूरसिंह का युद्ध ॥ ... ... ... ... ... ... २८८ १४ नरसिंह का युद्ध ॥ ... ... ... ... ... ... ” १५ कैमास का युद्ध ॥ ... ... ... ... ... ... ” १६ माधव खवास का युद्ध ॥ ... ... ... ... ... २८६ १७ कन्ह का युद्ध ॥ ... ... ... ... ... ... ” १८ चालुक्यों के मारे जाने से दर्बार में कोलाहल होना ॥ ... ... ... ... २६० १६ सांझ हो गई परन्तु लड़ाई न रुकी ॥ ... ... ... ... ... २६१ २० कन्ह चौहान का युद्ध जीतना ॥ ... ... ... ... ... ” २१ प्रतापसिंह आदि के मारे जाने का समाचार सुनकर पृथ्वीराज का अप्रसन्न होना ॥ ... २६४ २२ पृथ्वीराज की अप्रसन्नता सुनकर कन्ह चौहान का घर बैठ रहना तीन दिन तक अजमेर में हड़ताल पड़ना ॥ ... ... ... ... ... ... ” २३ सात दिन तक कन्ह के न आने पर पृथ्वीराज का उनके घर मनाने को जाना और कहना कि संसार में यह बुराई हुई कि घर बुलाकर चालुक्यों को मार डाला ॥ ... ... २६५ २४ कन्ह का कहना कि मेरे सामने दूसरा कौन सभा में बैठकर मोछ पर ताव रख सकता है ॥ ... ” २५ पृथ्वीराज का कहना कि तो आप आंख में पट्टी बांधे रहा कीजिए ॥ ... ... ” २६ पृथ्वीराज का जड़ाऊ पट्टी बनवाकर अपने हाथ से कन्ह के आंख में बांध देना ॥ ... ” २७ पट्टी रात दिन बँधी रहती थी ॥ ... ... ... ... ... २६६ २८ कन्ह चौहान की प्रशंसा ॥ ... ... ... ... ... २६७ २६ चालुक्य राजा भीम का अपने भाइयों के मारे जाने का समाचार सुन कर बहुत दुखी होना ॥ ... ” ३० भीम का पृथ्वीराज से भाइयों के पलटे में लड़ाई मांगना ॥ ... ... ... ” ३१ पृथ्वीराज का उत्तर देना कि हम तयार हैं जब चाहे आओ ॥ ... ... ... २६८ ३२ भीम का चढ़ाई के लिये तयार होना पर सरदारों के कहने से वर्षा ऋतु भर ठहर जाना ॥ ... ” ३३ - उपसंहार का कथन ॥ ... ... ... ... ... ” [ ६ ] आखेटक वीर बरदान वर्णन समय । ( पृष्ठ २६६ से पृष्ठ ३२८ तक ) १ पृथ्वीराज के कुंअरपने के तपतेज का वर्णन ॥ ... ... ... ... २६६ २ - पृथ्वीराज की दिनचर्या का वर्णन ॥ ... ... ... ... ... ३०० ३ पृथ्वीराज का आखेट के लिये निकलना ॥ ... ... ... ... ... ३०१ ४ अकेले कवि चंद का वन में भूल जाना ॥ ... ... ... ... ... ” ५ एक आम के पेड़ के नीचे एक ऋषि से उसकी भेंट होना ॥ ... ... ... ” ६ कवि चंद का ऋषि के पास जाकर पूछना कि आप कौन हैं ॥ ... ... ... ३०२ ७ ऋषि का पूछना कि तुम कौन हो, इस बीहड़ वन में कैसे आए ॥ ... ... ... ” ८ चंद का अपना परिचय देना ॥ ... ... ... ... ... ” ६ जती का प्रसन्न होकर एक मंत्र बतलाना जिसके वश में बावन वीर हैं ॥ ... ... ३०३

१० सूचीपत्र । पृष्ठ ९० चन्द का मंत्र की परीक्षा करना और वीरों का प्रगट होना ॥ ... ... ,, ९१ वीरों के रूप आदि का वर्णन ॥ ... ... ... ३०४ ९२ चन्द का वीरों को देख कर प्रसन्न होना ॥ ... ... ... ३०६ ९३ चन्द का वीरों की पूजा करना ॥ ... ... ... ,, ९४ चन्द का पृथ्वीराज के लिये शत्रुशमन मंत्र ग्रहण करना ॥ ... ... ,, ९५ क्षेत्रपालों (वीरों) का पूछना कि हम लोगों को क्यों बुलाया है ॥ ... ... ,, ९६ चन्द का यह उत्तर देना कि हमने पृथ्वीराज की सहायता के लिये आप लोगों को बुलाया है ॥ ३०७ ९७ चन्द का प्रार्थना करना कि जैसे श्र प राम रावण आदि की लड़ाई में रक्षा करते आए ऐसे ही पृथ्वीराज की भी करना ॥ ... ... ... ,, ९८ वीरों का प्रसन्न होकर कहना कि जब गाढ़ पड़े तब स्मरण करना ॥ ... ... ,, ९६ भैरव का एक वीर को आज्ञा देना कि सब वीरों का नाम बतला कर चन्द को पहिचनवा दो ॥ ३०८ २० सब वीरों का नाम गुण कथन ॥ ... ... ... ,, २१ चन्द का बावनो वीरों को पहिचान कर प्रणाम करके विदा करना और आप पृथ्वीराज से मिलने के लिये आगे बढ़ना ॥ ... ... ... ३११ २२ चन्द का उस जङ्गल का वर्णन करना जहां पृथ्वीराज आखेट खेलता है ॥... ... ,, २३ पृथ्वीराज के शिकार की प्रशंसा ॥ ... ... ... ३१२ २४ कन्ह चौहान आदि सब सरदारों का आकर पृथ्वीराज से मिलना और कहना कि आज यहीं शिकार हो ॥ ... ... ... ३१५ २५ पृथ्वीराज का शिकार से घर की ओर लौटना ॥ ... ... ... ,, २६ गोठ (भोजन) के स्थान पर ठहरना ॥ ... ... ... ,, २७ चन्द वरदाई का आकर पृथ्वीराज से मिलना और पिछला सब वृत्तान्त एकान्त में लेजाकर कहना ,, २८ पृथ्वीराज का भोजन करना और फिर आगे बढ़ना ॥ ... ... ... ३१६ २६ सब सरदारों को एक एक घोड़ा बांट दिया उसी पर सब चढ़ कर चले ॥ ... ... ,, ३० कवि चन्द को एक हाथी देना जो महा बलवान था ॥ ... ... ... ,, ३१ कवि चन्द का पृथ्वीराज की स्तुति करना ॥ ... ... ... ३१७ ३२ सब लोगों को अपने अपने घर बिदा करना ॥ ... ... ... ३१८ ३३ वीरों के मिलने के समाचार से पृथ्वीराज का प्रसन्न होना ॥ ... ... ,, ३४ पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥ ... ... ... ,, ३५ दूसरे दिन सबेरे पृथ्वीराज का उठना और नित्य कृत्य करना ॥ ... ... २१६ ३६ महा कर दस गोदान दस तोला सोना और बहुत सा अन्नदान देना ॥ ... ... ,, ३७ महल में पृथ्वीराज का विराजना और सरदारों का आना ॥ ... ... ,, ३८ वीरों के वश होने की बात से पृथ्वीराज का पेट फूलता है पर किसी से कह नहीं सकता ॥ ३२० ३६ कैमास का हाथ जोड़ कर पूछना कि आपको मुख पर कुछ उत्साह दिखाई देता है पर आप खुल कर कहते क्यों नहीं ॥ ... ... ... ,, ४० पृथ्वीराज का चन्द के वीरों को वश करने का समाचार कहना ॥ ... ... ,, ४१ सरदारों का उपहास करके कहना कि भाट, नट, चारन, ये सब आरत हैं इनकी बात सत्य नहीं माननी चाहिए ॥ ... ... ... ३२१ ४२ कैमास ने कहा कि चन्द को देवो ने वरदान दिया है यह सचमुच कोई अवतार है ॥ ... ,, ४३ कन्ह ने कहा कि चन्द छूट गया था यह बात सच है, इसी पर उसने यह बात प्रसन्न करने के लिये गढ़ी है ॥ ... ... ... ,, ४४ पृथ्वीराज के मन में सन्देह हो जाना ॥ ... ... ... ३२२ ४५ इतने में चन्द का आकर आसीस देना ॥ ... ... ... ,) ४६ पृथ्वीराज का चन्द को पास बुलाकर वीरों की बात छेड़ना ॥ ... ... ,, ४७ पृथ्वीराज का चन्द की बड़ाई करके कहना कि हम लोगों की बड़ी अभिलाषा है सो आज वीरों का दर्शन करवाओ ॥ ... ... ... ,, ४८ कवि चन्द का मंत्र जपना और होम करना ॥ ... ... ... ३२३ ४६ वीरों का प्रगट होना ॥ ... ... ... ,,

सूचीपत्र । ११ पृष्ठ ५० वीरों के शब्द से सामंतों का डरकर सोचना कि बिना काम उनको बुलाना ठीक नहीं हुआ ॥ " ५१ दो मत्त हाथी दर्बार के बाहर बांधे थे वीरों का भयानक शब्द सुनकर चौंके ॥ ... ३२४ ५२ दोनों हाथियों का तुड़ाकर लड़जाना और दर्बार में खलबली मचना ॥ ... " ५३ सरदारों का बहुत उपाय करना पर हाथियों का वश में न आना ॥ ... ३२५ ५४ चन्द का बावन वीरों से प्रार्थना करना कि आप लोग इन हाथियों को छुड़ाकर बांध दीजिये ॥ " ५५ भैरव की आज्ञा से वीरों का हाथियों को जंजीर में बांध देना ॥ ... " ५६ यह कौतुक देख कर सरदारों का आश्चर्य में होना और सबका दर्बार में आकर बैठना ... ३२६ ५७ पृथ्वीराज का सब वीरों को प्रणाम करना, चन्द का नाम ले लेकर सब वीरों को पहिचनवाना ॥ " ५८ चन्द का पृथ्वीराज से कहना कि बिना कारण इन को बुलाया है इससे इनको बलि दो पृथ्वीराज का ५ वन घड़ा मदिरा बावन बकरे मंगाकर बलि देना और भैरव आदि की पूजा करना॥,, ५६ वीरों का प्रसन्न होकर पृथ्वीराज से कहना कि वर मांगो सो हमदें और अब हमको विदा करो ३२७ ६० पृथ्वीराज की ओर से चन्द का कहना कि लड़ाई के समय हमारी सहायता कीजियगा ॥ " ६१ भैरव का चन्द को बुलाकर कहना कि जब तुम्हें टेढ़ा समय आवे तब हमको याद करना ॥ " ६२ बचन देकर वीरों का विदा होना, सरदारों का चन्द की बात पर प्रतीत करना और पृथ्वीराज का चन्द पर अधिक प्रेम बढ़ना ॥ ... ... ३२८ ६३ पृथ्वीराज का चन्द से कहना कि सब सरदारों को मन्त्र बतला दो चन्द का सबको मन्त्र बतलाना " ६४ चन्द को बीस गांव और एक घोड़ा पृथ्वीराज ने दिया ॥ ... ... " [७] नाहर राय कथा वर्णन । ( पृष्ठ ३२६ से पृष्ठ ३६८ तक) १ सोमेश्वर देव का शिवरात्रि व्रत जागरण करके सोने की तुला दान करना और उसे बांट देना ॥ ३२६ २ शिवजी की स्तुति करना ॥ ... ... ... ३३० ३ शिवजी की स्तुति करके सोमेश्वर देव का अपने कुमार के विवाह के लिये नाहर राय के पास दूत भेजना ॥ ... ... ... ३३१ ४ शामदामादि में निपुण दूत का पत्र दरसाना ॥ ... ... ... " ५ कवि का सनोघरी दृष्टि के योग पर से भुंचव्य में बैर दोष होने का कथन करना ॥ ... " ६ कवि का कहना कि स्त्री के कारण से बैर दोष आगे रामादि बड़ों बड़ों को हो चुका है ॥ ३३२ ७ कामधेनु का चरित्र ॥ ... ... ... " ८ प्रात समय जगते ही दूत का पत्र पढ़ना ॥ ... ... ... " ६ उस पत्र में वीर रूप देवस्थान हिंगुलाज के प्रभाव से पृथ्वीराज के बलवान होने और नाहर राय के बल प्रताप का वर्णन ॥ ... ... ... ३३३ १० पट्टन में चौलुक्य भीमदेव, आक पर जेत (सलख, ) पंवार, मेवाड में समरसिंह, दिल्ली में अनङ्गपाल जैसे-बलवानों में मण्डोवर में नाहरराय के राज्य करने का वर्णन ॥ ... ३३४ ११ पृथ्वीराज का आठ वर्ष की अवस्था में दिल्ली ननिहाल में आना, दिल्लीश अनङ्ग पाल के आधीन राजाओं का वर्णन ॥... ... ... ... " १२ मंडोवर के नाहर राय का दिल्लीश्वर की भेट को दिल्ली आना, पृथ्वीराज का रुप देख कर प्रसन्न होना और माला पहिरा कर कहना कि जब पृथ्वीराज सोलह वर्ष का होगा तब मैं अपनी कन्या इसको विवाह दूंगा ॥ ... ... ... ३३५ १३ नाहर राय का मत पलट जाना अर्थात् कन्या देना अस्वीकार करना ॥ ... ... " १४ नाहर राय का उत्तर लिखना कि तुम्हारा कुल आदि हमारे योग्य नहीं है ॥ ... ३३६ १५ दूत का यह पत्र लाकर पृथ्वीराज के हाथ में देना ॥ ... ... ... " १६ पृथ्वीराज का क्रोध करना, सोमेश्वर देव का समझाना ॥ ... ... ... " १७ सरदारों का पत्र सुन कर क्रोध करना ॥ ... ... ... ३३७ १८ पृथ्वीराज का चढ़ाई के लिये सेना सजना ॥ ... ... ... "

१२ सूचीपत्र । पृष्ठ पृष्ठ १९ सेना का वर्णन ॥ ... ... ... ... ... ३३८ " २० पिता की आज्ञा लेकर अष्टमी को पृथ्वीराज का लड़ाई के लिये यात्रा करना ॥ ... २४० " २१ नाहरराय के दूतों का पृथ्वीराज की चढ़ाई और सेनाबल का समाचार नाहर राय को देना ॥ " ३०४ २२ पृथ्वीराज का प्रताप सुन कर नाहर राय का चौकन्ना होना ॥ ... ३४१ ३०६ २३ अपने सरदारों से नाहर राय का कहना कि अब क्या करना चाहिये पहिले चौहानों से हमसे और बात थी पर अब तो बिगड़ गई ॥ ... ... ... " " २४ सरदारों का कहना कि लड़ना चाहिए ॥ ... ... ... ३४२ " २५ नाहर राय का कहना कि आगे से बढ़कर एक बारगी उन पर चढ़ाई करना चाहिये नहीं ३०७ तो जीत न होगी ॥ ... ... ... ... " " २६ नाहर राय का सेना सजना ॥ ... ... : ... ... " " २७ पृथ्वीराज की सेना की प्रशंसा ॥... ... ... ... ३४३ " २८ पृथ्वीराज का आगे से बढ़कर लड़ने के लिये सोभनराय को आज्ञा देना ॥ " ३०८ २६ सोभन राय का उत्तर दे कहना कि नाहरराय का पथ बांधा सो वह रणभूमि को तिरछी छोड़ कहीं चला गया ॥ ... ... ... " " ३० सबेरे नाहरराय के भग जाने पर सांझ को पृथ्वीराज का पहुंचना और उसकी खोज करना ॥ ३४४ ३११ ३१ चालुक के प्रधान (टीथान) के घर नाहरराय का पता मिलना और सामन्त सहित पृथ्वीराज का नदी उतरना ॥ ... ... ... " ३१५ ३२ सुभट सहित सेना में पृथ्वीराज कैसा शोभता है ॥ ... ... ३४५ " ३३ पृथ्वीराज के पास पहुंचने का समाचार नाहरराय का सुनना और सेना इकट्ठी करना ॥ " ३१५ ३४ घाटी पर पर्षतराव को रास्ता रोकने के लिये भेजना ॥ ... ... " " ३५ पर्षतराय का घाटी रोकना ॥ ... ... ... ... " " ३६ पर्षतराय कैसे घाटी रोक कर बैठा है ॥ ... ... ... ३४६ " ३७ घाटी रुकने का समाचार पृथ्वीराज को मिलना ॥ ... ... ... " ३१६ ३८ क्रोध करके पृथ्वीराज का पर्षतराय से लड़ने को कन्ह चौहान को भेजना ॥ ... " " ३६ कन्ह का पर्षत से युद्ध और उसमें पर्षत राय का मारा जाना ॥ ... ... ३४७ " ४० पर्षत के मारे जाने पर नाहरराय का स्वयं टूट पड़ना ॥ ... ... ३४८ ३१७ ४१ पृथ्वीराज का भी चढ़ चलना ॥ ... ... ... ... " ३१८ ४२ इधर पृथ्वीराज इधर नाहर राय का सन्मुख युद्ध ॥ ... ... ... ३४६ " ४३ उसमें पृथ्वीराज का नाहरराय के घोड़े को मार डालना ॥ ... ... ३५० " ४४ रनबीर का सन्नुख हो पृथ्वीराज से जुद्ध करना ॥ ... ... ... " २१६ ४५ मोछन परिहार और पवांर का सम्मुख हो लड़ना ॥ ... ... ... " " ४६ चामंड का युद्ध ॥ ... ... ... ... ३५१ " ४७ नाहर से नाहर राय का लड़ना ॥ ... ... ... ... ३५२ ३२० ४८ बलराय का खेत में मँडना ॥ ... ... ... ... ३५३ ४६ घोर युद्ध वर्णन ॥ ... ... ... ... ... " " ५० लोहाना आजानु बाहु के युद्ध वर्णन ॥ ... ... ... ३५४ " ५१ कन्ह चौहान के युद्ध का वर्णन ॥ ... ... ... ३६६ ५२ नाहरराय का भागना और पृथ्वीराज का पीछा करना ॥ ... ... ३६२ ३२१ ५३ पट्टन में पृथ्वीराज का राज्याभिषेक होना ॥ ... ... ... ३६३ " ५४ नाहर राय का हार कर अपनी कन्या का विवाह का लग्न लिखवा कर भेजना ॥ ३६४ ५५ पृथ्वीराज का ब्याहने को जाना ॥ ... ... ... ३६५ ५६ पृथ्वीराज का तोरन की वंदना करना ॥ ... ... ... " ३२२ ५७ पृथ्वीराज का नाहर राय की कन्या से विवाह होना ॥ ... ... " " ५८ नाहर राय का कहना कि आपके काम में सीस देने के सिवाय और कुछ देने के योग्य हम नहीं हैं ॥ ३६६ " ५६ नाहर राय की कन्या का गुण और रूप वर्णन ॥ ... ... ... " " ६० पृथ्वीराज का जीत कर स्त्री के साथ लौटना ॥ ... ... ... " " ६१ पृथ्वीराज का ग्यारह डोलों सहित होना ॥ ... ... ... ३६७ ३२३

सूचीपत्र । १३ पृष्ठ ६२ पृथ्वीराज का विश्राध कर घर पहुंचना ॥ ... ... ... ... ३६७ ६३ पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥ ... ... ... ... " [ ८ ] मेवाती मुगल कथा ॥ (पृष्ठ ३६६ से पृष्ठ ३८४ तक) १ सोमेश्वर के मंडोवर जीतने और लूट को सरदारों में बांट कर प्रचल प्रताप के साथ राज्य करने का वर्णन ॥ ... ... ... ... ३६६ २ सोमेश्वर के गुणों और उसकी गुणग्राहकता का वर्णन ॥ ... ... " ३ सोमेश्वर का मेवात के राजा मुगल (मुद्गल राय) के पास कर लेने के लिये दूत भेजना ॥ ३७० ४ राजा मुद्दल का यह पत्र पाकर क्रोध प्रगट करके दूत को लोटा देना और सोमेश्वर का पत्रोत्तर पाकर क्रोध करना और उन पर चढ़ाई करने की आज्ञा देना ॥ ... ... ५ ज्योतिषियों से मुहूर्त्त दिखाकर पुष्य नक्षत्र में चढ़ाई के लिये निकलना ॥ ... ... ३७१ ६ घर की रक्षा के लिये पृथ्वीराज को घर पर छोड़ा ॥ ... ... ... " ७ यात्रा के समय अच्छे शगुन मिलने ॥ ... ... ... ३७२ ८ पृथ्वीराज को राज्य में छोड़कर सोमेश्वर का मेवात पर चढ़ाई करना और उसकी सूचना पत्र द्वारा मुद्दल राय को दे कहना कि लड़ो वा दंड दे आधीन हो ॥ ... " ६ मुद्दलराय का पत्रोत्तर देकर सोमेश्वर और पृथ्वीराज दोनों से लड़ाई मांगना ॥ ... ३७३ १० सोमेश्वर का अपने लड़के के वध के विषय में संशय करना ॥ ... ... " ११ और पृथ्वीराज के पास मुद्दल राय के पत्र का संदेसा भेजना और उसका रोष में आकर पिता के पास रण में आ मिलना ॥ ... ... ... ... " १२ पृथ्वीराज का पिता के पास पहुंच कर सब सेना को सोते हुए पाना और सोमेस का उससे न बोलना ॥ ... ... ... ... ३७४ १३ उसका पिता को निद्रा में और शत्रु की सेना को देख भाल कर उत्तापित होना ॥ ... " १४ और उसका शत्रु की सेना पर झपटना ॥ ... ... ... " १५ पृथ्वीराज और मुद्दल राय का युद्ध ॥ ... ... ... " १६ ऐसे पृथ्वीराज के अन्य सूर मुद्दल के योद्धाओं से लड़े ॥ ... ... ३७५ १७ कन्ह का मेवातियों से युद्ध ॥ ... ... ... " १८ कैमास का पठान वाजीद खां से युद्ध ॥ ... ... ... ३७६ १६ लूंभ से राम गूजर का युद्ध ॥ ... ... ... " २० इतने में पृथ्वीराज का रण के बीच में अचानक जा पहुंचना और घोर युद्ध का होना ॥ ... " २१ मुद्दलराय की फौज का तितर बितर होना और उसका पकड़ा जाना ॥ ... ... ३७७ २२ कवि का सोमेश्वर की सेना और घोड़े हाथी की यज्ञादि अनेक उपमाओं के साथ प्रशंसा करना ॥ " २३ रण में मरे और घायल कैसे दीखते थे और कौन कौन योद्धा किस किस से घायल हुए और मारे गए ॥ ... ... ... ... ३७६ २४ जयजयकार का उपमाओं के सहित वर्णन ॥ ... ... ... ३८१ २५ पृथ्वीराज की विजय ॥ ... ... ... ... ३८३ ( ६ ) हुसेन कथा ॥ (पृष्ठ ३८५ से पृष्ठ ४२४ तक) १ मभरि नरेश (पृथ्वीराज) और गज़नी के शाह (शहाबुद्धीन) से कैसे बेर हुआ इसका वर्णन ॥ " २ शहाबुद्दीन के भाई मीर हुसेन के गुणों और उसकी वीरता की प्रशंसा ॥ ... ... ३८५ ३ शहाबुद्दीन की पातुर चित्ररेषा की प्रशंसा, शहाबुद्दीन का उसपर प्रेम, मीर हुसेन का भी उसपर आसक्त होना और चित्ररेषा का भी मीर को चाहना ॥ ... ... ... ३८६

१४ सूचीपत्र । पृष्ठ ४ शाह का यह समाचार सुन कर क्रोध करना ॥ ... ... ... ३८६ ५ हुसेन का शाह की बात न मानना और शाह का आज्ञा देना कि या तो मेरा राज्य छोड़ दो नहीं मारे जाओगे ॥ ... ... ... ... " ६ मीर हुसेन का देश छोड़ कर परिवार आदि के साथ नागौर की ओर आना ॥ ... ३८७ ७ मीर हुसेन का पृथ्वीराज के यहां आना ॥ ... % ... " ८ मीर हुसेन को आदर के साथ पृथ्वीराज का बुलाना और मीर का आकर सलाम करना ॥ " ९ पृथ्वीराज का शिकार खेलना और मीर हुसेन का सुन्दरदास को पृथ्वीराज के पास भेजना ॥ ३८८ १० सुन्दर छाया का स्थान देख कर मीर का डेरा डालना ॥ ... ... ... " ११ हरम (स्त्रियों) का डेरा पीछे की ओर डालना ॥ ... " १२ सुन्दर दास का पृथ्वीराज के पास जाना, पृथ्वीराज का मीर का कुशल समाचार पूछना और उसका सब हाल कहना ॥ ... ... ... " १३ मंत्री, कैमास, चन्द, पुंडीर आदि को बुलाकर पृथ्वीराज का पूछना कि क्या करें क्योंकि दोनों तरह विपत्ति है एक शाह का कोप दूसरे शरण आए को न रखना धर्म विरुद्ध है ॥ ३८६ १४ चन्द का सलाह देना कि जैसे शरणागत होने पर विष्णु भगवान ने मत्स्य रूप धर कर पृथ्वी को अपनी सींग पर रक्खा था वैसेही आप भी कीजिए ॥ ... ... ... " १५ जैसे शिवजी गले में विष धारण किए हैं वैसे ही मीर को आप भी रखिए ॥... ३६० १६ सुन्दरदास से पूछना कि सब स्त्रियां तो सुख से हैं और शाह से झगड़ा होने की बात क्या सच है ॥ " १७ सुन्दरदास का कहना कि घूर की ऐसी एक पातुर शहाबुद्दीन के पास थी उस को लेकर हुसेन यहां चौहान की शरण में आया है ॥ ... ... ... " १८ चन्द का पृथ्वीराज की प्रशंसा करना कि जैसे मोरध्वज के यहां अर्जुन ब्राह्मण बनकर शरण में गया, भगवान ने सिंह बन कर मांस मांगा, शरणागत द्रोपदी का चीर बढ़ाया, वैसेही तुमने शरणागत को रखकर क्षत्रिय धर्म की रक्षा की तुम्हारे माता पिता धन्य हैं ॥ ... ... " १९ शाहहुसेन का पृथ्वीराज से मिलना, पृथ्वीराज का आदर देना ॥ ... ... ३६१ २० हुसेन को दक्षिण की ओर नागौर की जागीर देना ॥ ... ... ... " २१ पृथ्वीराज का हुसेन को घोड़े हाथी आदि देना और दोनों का परस्पर प्रेम बढ़ना ॥ ... " २२ शहाबुद्दीन का चार दूत अजमेर भेजना ॥ ... ... ... ३६२ २३ पृथ्वीराज का हुसेन को कैथल हांसी हिसार का पर्गना देना और शिकार में साथ रखना, यह सब समाचार दूतों का शहाबुद्दीन से कहना ॥ ... ... ... ३६२ २४ शहाबुद्दीन का क्रोध करना और अरबखां को पृथ्वीराज के पास भेजना कि भला चाहो तो हुसेन को निकाल दो ॥ ... ... ... ... ३६३ २५ अरबखां से कहना कि पहिले हुसेन के पास जाना जो वह पातुर को दे दे तो हम क्षमा कर देंगे, जो वह गर्व करके न माने तो पृथ्वीराज के पास जाकर हमारा पत्र देकर समझाना ॥ " २६ तीन सौ सवार और रथ देकर अरबखां को रवाना करना ॥ ... ... ... ३६४ २७ एक महीने में अरबखां का नागौर पहुंचना ॥ ... ... ... " २८ अरबखां का हुसेन से मिलकर समझाना, हुसेन का न मानना ॥ ... ... " २९ अरबखां का पृथ्वीराज के पास जाना ॥ ... ... ... " ३० पृथ्वीराज का सुलतान की कुशल पूछना ॥ ... ... ... " ३१ अरबखां का कहना कि हुसेनखां को निकाल देने के लिये सुलतान ने कहा है ॥ ... ३६५ ३२ शहाबुद्दीन का संदेसा सुनकर पृथ्वीराज का मुख लाल होगया भौहें चढ़ गईं ॥ ... " ३३ कैमास ने डपट कर कहा कि आर्य लोगों का धर्म सुलतान नहीं जानता इससे ऐसा कहता है, हुसेन पृथ्वीराज के शरणागत है, चत्री का धर्म उसे छोड़ने का नही है ॥ ... ... " ३४ कन्ह चौहान, सूरसिंह, गोयंदराज चन्द, पुंडीर आदि का भी यही कहना और सुलतान से लड़ने को हम प्रस्तुत हैं यह कहना ॥ ... ... ... ... " ३५ अ. रखां. का अपना निरादर होता देख उठ आना और ग़ज़नौ को कूच करना तथा शहाबुद्दीन से सब समाचार कहना ॥ ... ... ... ... ३६६ ३६ दर्बार करके शहाबुद्दीन का तातारखां, अरबखां, मीरजमाम, कमाम, खुरासाखां, रचनमद्दनखां,

सूचीपत्र । १५

पृष्ठ रुस्तमखां, हाजीखां, गाज़ीखां ज़म्मनखां ग़ज़नीखां, मुहव्यतखां, मीरखां, आदि सरदारों को बुलाकर सलाह करना ॥ ... ... ३६६ ३७ तातारखां का कहना कि तुरन्त पृथ्वीराज पर चढ़ाई करनी चाहिए ॥ ... ... ३६७ ३८ खुरासानखां का तातारखां से कहना कि उसके बल को भी विचार लो, जल्दी न करो ॥ ... ,, ३९ अक़बरखां का कहना कि उसका बल अतुल है तुम लोगों ने देखा नहीं है इससे ऐसा कहते हो ॥ ,, ४० शाह का बल पराक्रम का हाल पूछना ॥ ... ... ... ,, ४१ अरब खां का पृथ्वीराज के बल की प्रशंसा करना ॥ ... ... ३६८ ४२ तातार खां का अरब खां की बात को हंसी में उड़ा देना, अरब खां का कहना कि अपनी आंख से न देखने से ऐसा कहते हो ॥ ... ... ... ,, ४३ शाह का क्रोध करके तातार खां को चढ़ाई के लिये प्रस्तुत होने की आज्ञा देना ॥ ... ,, ४४ शाह के जी में रात दिन चौहान की चिंता लगी रहना ॥ ... ... ३६६ ४५ सेना के साथ चढ़ाई के लिये शाह का तयार होना ॥ ... ... ,, ४६ अशकुन होना ॥ ... ... ... ... ,, ४७ अरब खां का कहना कि आज ठहर जाइये, शकुन अच्छा नहीं है ॥ ... ४०० ४८ सुलतान का कहना कि काफ़िर चौहान को जीतना कौन बड़ी बात है जो इतना विचार करते हो ,, ४९ शाह का चौहान की ओर जाना और दूतों का यह समाचार नागोर में हुसैन को देना ॥ ,, ५० पृथ्वीराज का चढ़ाई का समाचार सुन कर सरदारों को बुला कर सिंध तक शाह के पहुंचने का हाल कहना ॥ ... ... ... ... ,, ५१ लड़ने के लिये प्रस्तुत होने का सब का मत होना ॥ ... ... ४०१ ५२ युद्ध की तयारी होना ॥ ... ... ... ... ,, ५३ गुरुराम ब्राह्मण का आकर आशीर्वाद देना, बहुत कुछ दान करना और वेद मंत्र से तिलक करना ,, ५४ भगवान का स्मरण कर यात्रा करना ॥ ... ... ... ४०२ ५५ हुसैन का भी अपनी सेना के साथ पृथ्वीराज से आ मिलना ॥ ... ... ,, ५६ दस कोस पर डेरा देना ॥ ... ... ... ... ,, ५७ दूतों का सुलतान को पृथ्वीराज के चढ़ आने का समाचार देना ॥ ... ... ४०३ ५८ सुलतान का चढ़ाई के लिये धूम धाम से चलना ॥ ... ... ,, ५९ सुलतान की चढ़ाई का वर्णन ॥ ... ... ... ,, ६० सारुंड अचल पुर में सुलतान का डेरा डालना ॥ ... ... ४०४ ६१ कैमास का यह समाचार घड़ी रात रहते पृथ्वीराज को देना ॥ ... ... ,, ६२ पृथ्वीराज का उसी समय चढ़ाई करने को तयार होना ॥ ... ... ४०५ ६३ चढ़ाई की तयारी, भगवत् स्मरण तथा दान देना ॥ ... ... ,, ६४ पृथ्वीराज का सवार होना ॥ ... ... ... ४०६ ६५ पृथ्वीराज का मीर हुसैन के डेरे में आना, मीर हुसैन का अपने साथियों के साथ तयार होकर पृथ्वीराज को सलाम करना ॥ ... ... ... ,, ६६ पृथ्वीराज और मीर हुसैन के मिल कर चलने का वर्णन ॥ ... ... ,, ६७ सुलतान के चरों का सुलतान को जाकर समाचार देना कि शत्रु की सेना एक योजन पर आ गई ४०७ ६८ सुलतान की सेना की तयारी का वर्णन ॥ ... ... ४०८ ६९ सारुंडे के वाद्य और सजकर सुलतान का खड़ा होना ॥ ... ... ४०६ ७० सुलतान की सेना देखकर पृथ्वीराज का मीर हुसैन की ओर देखना, हुसैन का अपने सरदारों के साथ तयार होकर पृथ्वीराज को सलाम करना ॥ ... ... ,, ७१ मीर हुसैन का कहना कि आपने हमारे लिये कष्ट उठाया है तो हमारा सिर भी आपके लिये तयार है देखिए कैसी लड़ाई लड़ता हूं, पृथ्वीराज का कहना कि इसमें आश्चर्य क्या है मैं भी तुम्हें ग़ज़नी का सुलतान बनाता हूं ॥... ... ४१० ७२ मीर हुसैन का सलाम करके बाईं ओर सेना सजना, पृथ्वीराज का अपने सरदारों को आज्ञा देना कि तुम लोग मीर हुसैन की सहायता करो और सामन्तों का आज्ञा पालन करना ॥ ,, ७३ कैमास आदि सामन्तो का चार सहस्र सेना के साथ पृथ्वीराज के दक्षिण ओर सेना सजना ॥ ४११ ७४ पृथ्वीराज के आगे की ओर गोविन्दराय आदि सरदारों का पांच सहस्र सेना के साथ खड़े होना ॥ ,,

१६ सूचीपत्र । पृष्ठ ७५ दोनों सेनाओं का सामना होना और निशान बज उठना ॥... ... ... ४१८ ७६ हुसेन और तातार खां की सेनाओं की लड़ाई होना अंत को तातार खां की फौज का भागना ॥ ... ,, ७७ खुरासान खां का आगे बढ़कर लड़ना ॥ ... ... ... ४१४ ७८ खुरासान खां की फौज का भागकर सुलतान की फ़ौज के साथ मिलना और कैमास का चढ़ाई करना ४१५ ७६ बाई ओर से जमान, दाहिनी ओर से कैमास और सामने से पृथ्वीराज का चढ़ना ॥ ... ,, ८० युद्ध का वर्णन ॥ ... ... ... ... , ८१ पृथ्वीराज की सेना का बढ़ना और मण्डलीक का मारा जाना ॥ ... ... ४१७ ८२ शहाबुद्दीन की सेना का भड़कना और पृथ्वीराज की सेना का पीछा करना ॥ ... ४१८ ८३ घोर युद्ध का वर्णन ॥ ... ... ... ... ,, ८४ पृथ्वीराज के सामन्तों का शहाबुद्दीन का पीछा करना ॥ ... ... ४१६ ८५ सुलतान का पकड़ा जाना, उसकी सेना का भागना और पृथ्वीराज की विजय ॥ ... ४२० ८६ सूर्योदय से एक घड़ी पांच पल पर लड़ाई श्रारम्भ हुई और चार घड़ी दिन रहे सुलतान पकड़ा गया, बीस हज़ार मीर और सात हज़ार हाथी घोड़े मारे गए, हिन्दू तेरह सौ मरे, तीन कोस में लड़ाई हुई, सुलतान को अपने डेरे में लाए ॥ ... ... ,, ८७ रणक्षेत्र में ढूंढकर पृथ्वीराज का मीर हुसेन की लाश निकलवाना ॥ ... ... ४२१ ८८ पातुरि का जीते जी हुसेन के क़ब्र में गड़ जाना ॥ ... ... ,, ८६ पृथ्वीराज का शहाबुद्दीन को पांच दिन आदर के साथ रख कर, तीन शेर सलाम कराके मीर हुसेन के बेटे ग़ाज़ी को उसको सौंप कर यह प्रण कराके कि अब हिन्दुओं पर न चढूंगा, छोड़ना. शाह का ग़ाज़ी को लेकर कुशल से गज़नी पहुंचना ॥ ... ... ,, ६० अमीरों का सुलतान के जीते जागते लौटने पर बधाई देना और कुशल पूछना ॥ ... ४२२ ६१ उपसंहारणी टिप्पण ॥ ... ... ... ... ४२३. (१०) आखेटक चूक वर्णन । (पृष्ठ ४२५ से ४३८ तक ) १ एक वर्ष बीत गया, परन्तु शहाबुद्दीन के हृदय में पृथ्वीराज का वैर सालता रहा ॥ ... ४२५ २ एक महीना पांच दिन गजनी में रह कर फिर हुसैन का पृथ्वीराज के पास आप आना ॥ ... ,, ३ फिर पृथ्वीराज का आखेटक माड़ना और शहाबुद्दीन का चूक करने को आना ॥ ... ,, ४ नीतिराव क्षत्रिय का शहाबुद्दीन को पृथ्वीराज के आखेट का समाचार देना ॥ ... ४२६ ५ आखेट का अच्छा अवसर पाकर शहाबुद्दीन का भेद लेने को दूत भेजना, दूत का समाचार देना, शाह का सरदारों को आज्ञा देना कि छिप कर पृथ्वीराज पर चढ़ाई करो ॥ ... ... ,, ६ हाजी खां आदि का तयारी करना ॥ ... ... ... ४२७ ७ शहाबुद्दीन का आज्ञा देना कि इस बात का भेद लो कि कितनी सेना चौहान के साथ है क्योंकि बिना भेद कुछ काम नहीं बनता ॥ ... ... ... ,, ८ सब सरदारों का मत होना कि बिना धोखा दिये चौहानो को जीतना कठिन है ॥ ... ,, ६ पृथ्वीराज कां वेशटंक आनन्द से आखेट खेलना ॥ ... ... ४२८ १० पृथ्वीराज के आखेट का वर्णन ॥ ... ... ... ,, ११ आठ हजार सेना और सरदारों के साथ शहाबुद्दीन का दट्टूवन में छिप कर पहुंचना ॥ ४२६ १२ सबेरे के समय चढ़ाई करने का विचार करना ॥ ... ... ,, १३ पांच सरदारों जो साथ लेकर आखेट को पृथ्वीराज का निकलना ॥ ... ४३० १४ कवि चन्द का कहना कि हमें शहाबुद्दीन के आने का सन्देह है और खोज करने पर चारों ओर यवनो को पाना ॥... ... ... ... ,, १५ शाह की ओर से आक्रमण प्रारम्भ होना ॥ ... ... ... ३१

सूचीपत्र । १० पृष्ठ १६ युद्धारम्भ, युद्ध वर्णन ॥ ... ... ... ... ... ... ४३१ १७ पांच सरदारों का पृथ्वीराज की रक्षा में चारों ओर हो जाना और इन सभों का यवनों के बीच में घिर कर युद्ध करना ॥ ... ... ... ... ... ... " १८ पृथ्वीराज का कमान सँभाल कर यवन सरदारों को गिराना ॥ ... ... ... ४३२ १९ पृथ्वीराज का तलवार लेकर यवनों का विनाश करना ॥ ... ... ... " २० सुलतान की ७७५ सेना का कट कर आगे गिरना ॥ ... ... ... ... " २१ चानुका का घोर युद्ध करके वीरता के साथ मारा जाना ॥ ... ... ... " २२ क्रोध करके पृथ्वीराज का तलवार से युद्ध करना, पृथ्वीराज को सब सेना का इकट्ठा होजाना ॥ ४३२ २३ सुलतान का बढ़कर लड़ना दो घड़ी युद्ध करना ॥ ... ... ... ... ४३४ २४ यवन सरदारों का माराजाना, पृथ्वीराज की विजय ॥ ... ... ... " २५ हारकर शहाबुद्दीन का गज़नी की ओर लौटजाना ॥ ... ... ... " २६ चौहान की विजय पर चन्द कवि का जे जे कार करना ॥ ... ... ... ४३५ २७ उपसंहारकी टिप्पणी ॥ ... ... ... ... ... ४३६

[११] चित्ररेखा समय । ( पृष्ठ ४३६ से ४४५ तक ) १ चित्ररेखा की उत्पत्ति पूछना ॥ ... ... ... ... ... ४३६ २ शहाबुद्दीन के विक्रम का वर्णन ॥ ... ... ... ... " ३ शहाबुद्दीन का अरव खां पर चढ़ाई करने की इच्छा कर सरदारों से पूछना ॥ ... " ४ अरव खां नमता नहीं है इसलिये उस पर चढ़ाई होनी चाहिये यह आज्ञा देना ॥ ... ४४० ५ चढ़ाई की सेना की संख्या ॥ ... ... ... ... ... " ६ सेना की धूम का वर्णन ॥ ... ... ... ... " ७ शाह का निसुरति खां को अरबखां के पास भेजना कि चित्ररेखा को देकर पैर पर गिरे तो हम क्षमा करदें ॥ ... ... ... ... ४४१ ८ अरब खां का सादर आज्ञा मानना और चित्ररेखा को देना स्वीकार करना ॥ ... " ९ निसुरति खां का अरब खां को शाबसी दे कहना कि तुमने शाह के वचन माने और हिंदू धर्म को ⎬ ४४२ न मान कर म्लेच्छ कुल कर्म को धारण किया सो ठीक किया ॥ ⎭ १० शहाबुद्दीन का सेना समेत सजकर चलना ॥ ... ... ... " ११ चलते समय शाह का चित्त चित्ररेखा में मत्त गयंद की भांति लगा हुआ था ॥ ... " १२ सेना की शोभा का वर्णन ॥ ... ... ... ... ४४३ १३ शाह की सेना की प्रबलता देखकर अरब का अपना बल भंग होना बाहना ॥ ... " १४ अरव खां का आज्ञा मानकर चित्ररेखा को भेंट में देना ॥ ... ... ... ४४४ १५ चित्ररेखा वेश्या के रूप का वर्णन ॥ ... ... ... " १६ विना युद्ध चित्ररेखा को देखकर गोरी का लौट आना ॥ ... ... ... " १७ चित्ररेखा के साथ शाह के आदर और प्रेम का वर्णन ॥ ... ... ... " १८ चित्ररेखा के सुलतान को वश करने का वर्णन ॥ ... ... ... ४४५ १९ चित्ररेखा को कथा सुनकर कवि का आनन्दित होना ॥ ... ... ... "

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THE PRITHÍVÍRÁJ RÁSÁU. पृथ्वीराजरासौ। मोहनी टिप्पणी सहित । आदि पर्व। ॥ आदिदेव, गुरू, वाणी, लक्ष्मीश, सुरनाथ और सर्वेश का ॥ ॥ मंगलाचरण ॥ साटक-छँ ॥ आदी देव प्रमत्थ नम्य गुरयं, वानीय बंदे पयं । सिष्टं धारन धारयं वसुमती, लच्छीस चर्नाग्रयं ॥ तं गुं तिष्ठति ईस दुष्ट दछनं, सुरनाथ सिद्धिग्रयं । थिर्चजंगल जीव चंद नमयं, सर्वैस वर्दामयं ॥ छंद ॥ १ ॥ रूपक ॥ १ ॥ १ यह मंगलाचरण जिस छंद में चंद कवि ने कहा है उस का नाम उन ने साटक प्रयोग किया है और इस नाम से यह छंद आज कल जो छंद ग्रंथ प्रायः उपलब्ध हैं उन में नहीं मिलता। यद्यपि उस की परीक्षा करने से वह निःसंदेह शार्दूलविक्रीड़ित नामक छंद मालूम होता है परंतु जब तक उस का लक्षण अथवा नामान्तर होने का कोई प्रमाण नहीं दिखलाया जावे तब तक पुरातत्त्ववेत्ता विद्वान संतुष्ट नहीं हो सक्ते। अतएव बहुत खोज करने से मेरी मातृभाषा गुजराती के काव्यों में इस नाम के छंद मुझे मिले और The Revd. Joseph Van. S. Taylor साहब अपने गुजराती भाषा के व्याकरण के पद्यबंध अथवा छंदविन्यास नामक प्रकरण के पृष्ठ २२३ में उसको साटका नाम से कुल्ल ३८ अक्षर के दो तुक का छंद होना लिखते हैं कि जिसके प्रत्येक तुक में १२ + ७ = १९ अंतर होते हैं। इस के सिवाय प्राकृतभाषा के किसी छंदग्रंथ से अनुवाद होकर सं० १७७६ में जो एक रूपदीप पिंगल नामक छंद ग्रंथ बना है उस में केवल ५२ छंदों के लक्षण कहे हैं उस में भी साटक का यह लक्षण लिखा हैः- ॥ साटक छंद लक्षण ॥ फर्में द्वादश अंक आद संग्या, मांचा खिवो सागरे । दुज्जी वी करिके कलाष्ट दस वी, अर्को विरामाधिकं ॥ १ ॥ अंते गुर्वे निहार धार सब के, औरों कछू भेद ना। तीखां मत्त उन्नीस अंक चरने, सेखो भणै साटिकं ॥

२ पृथ्वीराजरासौ। [ आदि पर्व

मैं इस साटक छंद को पिंगल छंद सूत्रम् नामक ग्रंथ में कहे शार्दूलविक्रीडित छंद का नामान्तर होना मानता हूं और उस का लक्षण बहुत प्राचीन अमर और भरत कृत छंद ग्रंथों में अवश्य होना अनुमान करता हूं क्योंकि चंद कवि ने भी अपने इसी ग्रंथ के आदि पर्व के रूपक ३७ में जो कुछ कहा है उस से स्पष्ट मालूम होता है कि उस ने अपने इस महाकाव्य के रचन में पिंगल अमर और भरत के छंद ग्रंथों का आश्रय किया है ॥ इस छंद के लक्षण का पता लगाकर अब मैं इस रूपक के पाठ को शोधता हूं । उस की पहिली पंक्ति का पाठ A. S. B. की छापी हुई पुस्तक की Fasiculus I जिस को Mr. John Beames साहब ने शोध कर छपाई है उस में "आदि प्रनम्य नम्य गुरयं वानीय वंदे परं" ऐसा पाठ है और जो Mr. F. S. Growse C. S. M. A. ने रासे के प्रारंभ के छंदों का अनुवाद करने में पाठ लिखा है वह भी ऐसा ही है । निदान साटक के लक्षण के अनुसार इस तुक में १२+७=१९ अक्षर होने चाहिये परंतु उस में १०+७=१७ अक्षर हैं। अब यह अत्यावश्यक है कि घटते हुए दो अक्षरों का पता लगाया जावे । जिस में यह कल्पना करना कि चंद कवि अथवा उस के नाम से कोई यह जाली ग्रंथ बनानेवाला छंद ग्रंथों में भले प्रकार व्युत्पन्न न होने के कारण मूल में ही भूल गया है सर्वरीत्या अयोग्य और आश्चर्यदायक बात है । क्योंकि वर्तमान् पृथ्वीराजरासे का बिगड़ा हुआ काव्य भी अपने कर्त्ता का एक बड़ा व्युत्पन्न कवि होना स्वयम् स्पष्ट प्रकाश करता है अतएव उस का ऐसी भूलों का करना निर्मल प्रज्ञावाले विद्वानों के ध्यान में सर्वथा असंभव है । इस प्रथम तुक में जो दो अक्षर घटते हैं वे पंक्ति भर में किस स्थान में लेखक अथवा शोधक की भूल से लोप हो गये हैं। इस बात को शोध लेने के लिये यह एक बड़ी सरल युक्ति है कि हम इस तुक के अर्थ को ध्यान में लेकर उस के वाक्यखंडों को पृथक् २ कर दें कि जिस से अपूर्ण वाक्यखण्ड अपने आप हम को घटते हुए अक्षर बतला देवे जैसे कि वानीय वंदे परं और नम्य गुरयं और आदि प्रनम्य । ऐसा करने से हम को मालूम हो गया कि आदि प्रनम्य वाक्यखंड अपूर्ण है और उस में कोई संज्ञावाचक शब्द घटता है । अब विचारना चाहिये कि वह संज्ञा- वाचक शब्द आदि शब्द के पहिले घटता है अथवा पीछे । जो हम आदि शब्द के पहिले उस का होना कल्पना करें तो 'आदिः पदान्ते गण सूचकः" से दोष प्राप्त होकर हमारी कल्पना अन्यथा हो जाती है अतएव मानना चाहिये कि आदि शब्द के पीछे कोई संज्ञावाचक शब्द है क्योंकि ऐसा मानने में आदि शब्द उस शब्द के साथ मिलकर हम को कर्म्मधारयः समास का होना स्पष्ट विदित करता है। जब कि यह निश्चय हो गया कि आदि शब्द के पीछे अर्थात् आदि और प्रनम्य के बीच में कोई संज्ञावाचक शब्द गया है तब हम को फिर सूक्ष्म विचार में निमग्न होना चाहिये कि वह संज्ञावाचक शब्द कौन सा है कि जिस को चंद कवि ने प्रयोग किया था। मैं निःसंदेह कल्पना करता हूं कि यहां देव शब्द था अर्थात् आदि देव ऐसा पाठ चंद ने प्रयोग किया था क्योंकि प्रथम तो "आदिः कारणं स च देवश्चेति कर्म्मधारयः" तथा "जग दुपादानादिगुणवान् नारायणः" दूसरे आदिदेव शब्द हमारी संस्कृतभाषा के प्रामाणिक ग्रंथों में मंगलाचरणों तथा ईश्वर की स्तुति तथा ईश्वर के ध्यान के वाक्यों में बहुधा प्रयोग किया गया है कि हम उदाहरण के लिये केवल दोही प्रमाण यहां दिखाते हैं जैसे :- "परं ब्रह्म परं धाम । पवित्रं परमं भवान् ॥ पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुं" ॥ तथा "त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण । स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानं" ॥ तीसरे चंद कवि ने स्वयम् अपने इस महाकाव्य में इस आदि देव शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों में किया है जैसा कि:- "प्रनम्य प्रथम मंम आदि देवू । ॐकार

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ३ शब्द जिन करि अच्छेव' ॥ चौथे इस तुक में प्रथम मगण होने के कारण तीनों अक्षर दीर्घ होने चाहियेँ, अतएव कवि ने आदी देव ऐसा पाठ कहा है। आदि शब्द संस्कृत में इकारान्त है परंतु उसे कवि ने यहां मगण होने के कारण के अतिरिक्त गानविद्या संबंधी दोष दूर करने के अभि- प्राय से भी ईकारान्त किया है क्योंकि चंद गानविद्या में भी निपुण था और साटक के गाने में तुक की पहिली चौथी मात्रा पर ताल आता है। यद्यपि मेरी कल्पना तौ यह है परंतु जब मैंने इस ग्रंथ का कुछ भाग कोटा राज्य के विद्वान कविराज श्री चंडीदानजी से पढा था तब उनों ने यह बतलाया था कि आदि के पहिले ओ३म् शब्द का प्रयोग कवि चंद ने किया था और उस का अर्थ आदि ओ३म् प्रनम्य अर्थात "पहिले ओंकार को नमन करके" किया था। यद्यपि यह प्रयोग भी कुछ बैठ जाता है और ठीक सा मालूम होता है और जितनी पुस्तकें रासे की मेरे देखने में आईं हैं उन में प्रायः ऐसा ही पाठ मिलता भी है परंतु मैं इस की अपेक्षा मेरी कल्पना को अधिक बलवान और युक्त मानता हूं और आशा करता हूं कि यदि वे अब विद्यमान होते तौ मेरी इस कल्पना को प्रसन्नतापूर्वक मान लेते। यदि कोई ओ३म् आदि प्रनम्य ऐसा भी पाठ मानें तथापि कुछ हानि नहीं है। और जब तक कि किसी बहुत प्राचीन पुस्तक में हमारे इस मानने के विरुद्ध कोई अन्य पाठ न मिल जावे तब तक मैं इस को मानना अयोग्य नहीं समझता हूं ॥ अब दूसरी पंक्ति का पाठ "सिट्टं धारन धारयं वसुमती लच्छीस चरनाश्रयं" है । इस में १२ + ८ = २० अक्षर हैं किं यहां चरनाश्रयं शब्द को मैंने चरणाश्रयं किया है क्योंकि कोई छंद गान से खाली नहीं है और साटक की छांन के अनुसार उच्चारण में यहां रकार स्वर रहित हो जाता है और जैसा उच्चारण और गान में रूप हो वैसा काव्य में लिखने में भी कोई दोष नहीं है । जो कवि गान के नियमों से अपरिचित हैं उन के काव्य में ऐसे स्थलों में अनेक दोष रह जाते हैं क्योंकि गान छंद के लिये एक कसौटी है और ऐसे ही मौकों को कवि का अधिकार अर्थात् Poetical Licence कहते हैं । कोई २ विद्वान कवि के अधिकार की छूट अर्थात् Poetical Licence को दोष मानते हैं परंतु वह एक भ्रम है क्योंकि सस्वर अक्षर का खोड़ा कर देना और खोड़े को सस्वर कर देना व्याकरणादि भिन्न शास्त्रों में दोष समझना चाहिये परंतु छंद रचन और गान में तौ यह दोष नहीं कहाता है देखेः चंद के इन वचनों के भीतरी आशयों से भी हम यही अनुमान कर सक्ते हैं :- लघु गुर मंडित खंडिय हि । पिंगल अमर भरत्थ ॥ ३७ ॥ १ चरन नींम अच्छिर सुरंग । पाट लघु गुरु विधि मंडिय ॥ सुर विकास जारी सु मुष । उक्ति रस गौरब नि छंडिय ॥ ४० ॥ १ तीसरी पंक्ति के पाठ तम गुन तिष्ठति ईस दुष्ट दहनं । सुरनाथ सिद्धिश्चर्यं में १४ + ८ = २२ अक्षर हैं । इस में उपर कही हुई युक्तियों के सिवाय थोड़ा सा और ध्यान देने से ज्ञात हो सक्ता है कि ग्रंथकर्त्ता ने तम गुन और सुरनाथ पाठ नहीं प्रयोग किये थे किन्तु जैसे हम ने अनुमान कर शुद्ध किये हैं तं गुं और सुरनाथ क्योंकि प्रथम तौ इस साटक छंद में मगण होने के कारण तं और गुं ही होने चाहियेँ और दूसरे चंद के ऐसे प्रयोग इस काव्य में बहुत से स्थलों पर दृष्टि आवेंगे । यह भी हमारे देखने में आवेगा कि त्वम् और अहम् के स्थान में तं और हुं जैसे प्रयोग चंद ने किये हैं । इस में हम को कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये क्योंकि चंद के इस नीचे लिखे वाक्य से हम अच्छी तरह समझ सक्ते हैं कि उस ने अपने इस महाकाव्य की भाषा में षट भाषा और कुरान की भाषा का आश्रय किया है:-