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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

१२६ राजतरंगिणी राजा युधिष्ठिर को दरद देश निवासियों ने उपहार दिया था । ( सभा पर्व ५२:१३ ) वनवास काल में सुबाहु की राजधानी में जाते समय पाण्डव लोग दरद देश होकर गये थे । ( वन पर्व १७७:१२ ) दरदराजको पाण्डवों ने महाभारत युद्ध में भाग लेने के लिए आमन्त्रित किया था । ( उद्योग पर्व ४:१५ ) दुर्योधन के पक्ष में महाभारत युद्ध में दरद देश के योद्धाओं ने भाग लिया था। ( भीष्म पर्व ५१:१६ ) भगवान् श्रीकृष्ण ने दरद देश पर आक्रमण किया था । ( द्रोण पर्व ७०:११ ) महाभारत में दरद को एक जाति माना गया है। पूर्वकाल में क्षत्रिय थे कालान्तर में ब्राह्मणों के कोप के कारण शूद्र हो गये थे । ( अनुशासन पर्व ३५:१७-१८ ) एक भारतीय जनपद दरद का वर्णन शल्य पर्व में किया गया है । ( शल्य पर्व ५०:५० )

परिशिष्ट 'न' खस (तरंग : १ : ३१७ : पृष्ठ ३२० ) आजकल की खश जाति ही यहदृण वर्णित खश जाति है। खश का अपभ्रंश खस जाति- वाचक शब्द है। यह जाति पीर पंचाल पर्वतमाला के दक्षिण और पश्चिम रहती थी। ये सीमित क्षेत्र में रहते हैं। पीरपञ्चाल उपत्यका के दक्षिण-पश्चिम में वितस्ता की मध्य धारा और किश्तवार पूर्व के पर्वत के एक भाग में ये अपने को मुस्लिम राजपूत कहते हैं। हिन्दू खश जाति हिमालय के अन्य क्षेत्रों में रहती है। कुमायूँ की पहाड़ियों में बहुत लोग अपने को खश कहते हैं। राजपूत होने का दावा करते हैं। राजपुरी का खश सरदार राजपूतों में विवाह-शादी करता था। लोहर के खश सरदार सिंहराज ने काबुल के शाही राजाओं से विवाह सम्बन्ध स्थापित किया था ( रा० त० ६:१७५, १७७ ) । सिंहराज की कन्या दिद्दा रानी थी। उसने काश्मीर पर राज्य किया था। मनु ने ( १० : २२ ) में खशों को दूसरा नामकरण दिया है। उन्हें मनुस्मृति में ( १०.४ -४४ ) क्षत्रिय माना है। खश तथा खस दोनों पाठ मिलता है। नीलमत पुराण खश जाति का उल्लेख निम्न स्थानों पर करता है। गन्धर्व्या वाजिनः पुत्रा भद्राश्च सुरभेः सुताः । यक्षांश्च राक्षसांश्चैव खशायास्तनयाः स्मृताः ॥ 48 = ७२ × × × कद्रूः क्रोधा इरा श्वाषा विनता सुरभिः खशा । मुग्धाश्चैव तथा पूज्याः सुप्रभा च तथा जरा ॥ 583 = ७०३-७०४ × × × दार्वाभिसारगान्धारजुहुण्डरशकान् खशान् । तंगणान् पाण्डवान् मद्राञ्छन्तर्गिरिबहिर्गिरीन् ॥ 80 = १२२ × × × दार्वाभिसारगांधारजालन्धरशकाः खसाः । तंगणा भाण्डवाश्चैव आन्तर्गिरियहिर्गिरिः ॥ 139 = १८२ नीलमत में 'खशा' तथा 'खस' एक ही शब्द एवं अर्थवानक है। कल्हण ने खशों का प्रचुर वर्णन किया है। इस समय उन्हें खवशा कहते हैं। खखश मुसलमान भी हैं। वे राजपूत मुसलमान भी कहे जाते हैं। नीलमत में वर्णन किया गया है कि ब्रह्मा से वर मिलने पर जलोद्भव असुर दार्वाभिसार, गान्धार, जुहुण्डर, शक तथा खसों का नाश करने लगा। यह सब कश्मीर के सीमावर्ती जातियां एवं क्षेत्र हैं। एक मत है कि 'कस' शब्द से कश्मीर शब्द बना है यह ठीक नहीं है। 'कस' शब्द खश जाति के लिये व्यवहृत

१२८ राजतरंगिणी किया गया है । खश तथा कश्मीर जाति जिसे 'कश्मीराह' कहा गया है सर्वथा भिन्न है । नीलमत गश जाति का अलग तथा स्वतन्त्र रूप से उल्लेख करता है ( नी० ४० ) राजतरंगिणी में अनेक स्थानों पर राजौरी अर्थात् राजपुरी के शासक रूप में गशो को वर्णन किया गया है । उन्हें राजा नाम से सम्बोधित किया गया है। उसकी सेना खशा कही जाती थी । ( रा० त० ७:६७६, १२७१, १२७६, ८:८८७, १४६६ १८६८, १८६५ ) । राजपुरी के पूर्व अंचल के आम्स नदी की ऊर्ध्व उपत्यका मिलती है। इस नदी को आजकल पंजगब्बर कहते हैं। श्रीवर ने इसका उल्लेख (४.२१३) किया है । उसने इस नदी को पंचगह्वर लिखा है। उसे खशो का निवास-स्थान भी माना है। उमगे पूर्व के अंचल को वाजशाल कहते थे । यह वही आजकल का बनिहाल है। इसी के नीचे बनिहाल पास है । यहीं पर भिक्षाचर ने खश राजा भागिक के दुर्ग में शरण ली थी ( रा० त० ८.१६६५) । राजतरंगिणी ( ८.१७७ तथा १०७४ ) के वर्णन से प्रतीत होता है । वह उपत्यका जो बनिहाल और चन्द्रभागा नदी के मध्य है, उसे इस समय 'विचलारी' कहते हैं। पुरावृत्तकारो ने उसे विश्रालटा कहा है। यह क्षेत्र गशों से आबाद था । खशालय का भी वर्णन कल्हण ने ( रा० त० ४:५६, ५८, २८४, २६०, २६६ ) किया है । यहा खश जाति रहती थी । खशालय ही खेशल उपत्यका है। इसे कंदोर भी कहते हैं। वह दक्षिण-पूर्व में मारवल पास से कश्मीर के एक कोने से होतो किश्तवार तक चली जाती है। खशालय का पुराना नाम खशाली ( रा० त० ७:३०६ तथा थीवर ४:४५६ ) प्रतीत होता है । राजपुरी से पश्चिम घूमने पर पर्णोत्स अथवा राजतरंगिणी ( ६:३१२ ) में वर्णित प्रान्त है । उसमें एक व्यक्ति तुंग खश था । वह चरवाहा था । रानी दिद्दा के समय अत्यन्त शक्तिशाली मन्त्री बन गया था । ( रा० त० ७:७७३ ) तुंग के वंशज रानी दिद्दा के पश्चात् कश्मीर के राजा हुए थे । उन्हें निम्न खश समझा जाता था । आधुनिक खख्ख जाति और खश एक ही है । कश्मीर में वितस्ता उपत्यका के अधोभागीय सरदार प्रायः इसी जाति के थे । खख्ख शब्द खश का अपभ्रंश है । वितस्ता उपत्यका के खखा सरदार कश्मीर में सिख राज के पूर्व अर्ध स्वतंत्र हैसियत रखते थे । अपने पडोसी बोम्व कबीले के साथ वे कश्मीर के लिए समस्या हो गये थे । उनका भयंकर क्रूर कर्म जो शेख इमा- मुद्दीन के समय ( १८४६ ) मे उन्होने किया था अभी तक लोगों को याद है । खश लोगो ने मध्ययुग में लूटपाट में प्रसिद्धि प्राप्त की थी । ( रा० त० ४.३२६ और ८:१८४५, २३८९ ) से यह बात सिद्ध होती है । श्रीवर ने जैनराज तरंगिणी ४:४४३, ४५२, ४६४, ५६६, ६३३, ६४. में इसी बात की कुपुष्टि की है। कश्मीर की मर्डुमशमारी १८६१ के रिपोर्ट पृष्ठ १४१ पर खखो की आबादी ४१४६ लिखी है । उनकी जाति मुस्लिम पर्वतीय राजपूतो की एक उपजाति मानी गयी है । पृष्ठ २०१ । खश जाति को मार्कण्डेय पुराण में पर्वताश्रयी जाति कहा गया है । यह जाति पर्वत में रहती थी । अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये । नीहाराः हंसमार्गाश्च कुरवो गुर्मणाः खशाः ॥ x x v

परिशिष्ट 'न' १२९ गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् । कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् खसान् ॥ नी० ५७:५६ खसों की उत्पत्ति के विषय में महाभारत में कथा मिलती है। नन्दिनी गऊ ने अपनी रक्षा निमित्त उन्हें अपने अंग से उत्पन्न किया था । मूत्रतश्चासृजत् कांश्चिच्छवरांश्चैव पार्श्वतः । पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ॥ आदिपर्व : १७४ : ३७ × × × असृजत् पल्लवान् पुच्छात् प्रस्त्रवाद् द्रविडान् शकान् । योनिदेशाच्च यवनान् शकृतः शबरान् बहून् ॥ ३५ ॥ मूत्रतश्चासृजन् कांश्चित् शवरांश्चैव पार्श्वतः । पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ॥ ३६ ॥ चिबुकांश्च पुलिंदांश्च चीनान् हूनान् सकेरलान् । ससर्ज फेनतः सा गौः म्लेच्छान् बहुविधानपि ॥ ३७ ॥ महाभारत आदिपर्व १७६ : ३६-३७ इस रूपक का यह अर्थ भी लगाया जा सकता है। खस गोरक्षक थे । क्षत्रियों का कार्य गो ब्राह्मण की रक्षा करना था । उन्हें युद्ध किंवा रक्षा हेतु नन्दिनी गाय ने उत्पन्न किया था। वे क्षत्री थे। उनके क्षत्री तथा क्षात्रधर्म व्रती होने में सन्देह नही रह जाता । वितस्ता उपत्यका के अधोभाग में बारहमूला के आगे खश रहते थे। वीरांका खशों का केन्द्र कहा गया है। राजतरंगिणी (रा० तं० ८:४०९) के वर्णन से मालूम होता है। यह स्थान प्राचीन द्वारावती के समीप था । द्वारावती को इस समय द्वारविडी कहते हैं। यह संस्कृत द्वारविद्या का अपभ्रंश है। वितस्ता उपत्यका का यह भाग कयाई तथा मुजफ्फराबाद के मध्य है। एक मत है। खश पीर पंतसाल के दक्षिण पश्चिम के निवासी है। महाभारत सभा पर्व में भी खश जाति का उल्लेख आता है। उन्हें शकों तथा दरद जातियों तुल्य अर्ध सभ्य जाति में परिगणित किया गया है। (सभापर्व ५२ : २-४) सभा पर्व में पुनः एक स्थान पर उल्लेख आता है कि ये मरु तथा मन्दर पर्वत के मध्य शैलोदा नदी की उपत्यका में रहते थे । मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् । ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥ १ ॥ खसा एकासना ह्यर्हाः प्रदरा दीर्घवेणवः । पारदाश्च कुलिन्दाश्च तङ्गणाः परतङ्गणाः ॥ ३ ॥ तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकैः । जातरूपं द्रोणमेयमहार्षुः पुञ्जशो नृपाः ॥ ४ ॥ महाभारत वन पर्व ५२:२-४

१३० राजतरंगिणी खसों की वीरता की प्रशंसा के लिए दुर्योधन ने शकुनीपुत्र उलूक को अपना दूत बना कर पाण्डवों के के पास भेजा था । और खसों के सम्बन्ध में निम्नलिखित बात कहने का आदेश दिया था । किं दर्दुरः कूपशयो यथैमां, न बुध्यसे राजचमूं समेताम् । दुराधर्षं देवचयप्रकाशां, गुप्तां नरेन्द्रैस्त्रिदशैरिव द्याम् ॥ १०२ ॥ प्राच्यैः प्रतीच्यैश्च दाक्षिणात्यै- रुदीच्यकाम्बोजशकैः खशैश्च ॥ १०३ ॥ महाभारतः उद्योग पर्वः १६०:१०२-१०३ शैलदा नदी पश्चिमी पर्वत के वरुण पर्वत से निकलती है और पश्चिम सागर में गिरती है । ( मत्स्य पुराण : १२० : ३३ ) । मनु ने उन्हें क्षत्री माना है । ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धा न होने के कारण वे पतित हो गये थे । ( मनुस्मृति १० : ४३ : ४ ) मनु ने स्पष्ट कहा है कि खश जाति क्षत्रिय थी । परन्तु क्रिया भ्रष्ट एवं ब्राह्मणों का दर्शन न पाने के कारण धीरे-धीरे स्थान च्युत हो गयी । निस्सन्देह खश जाति के क्षत्री होने में सन्देह नहीं किया जा सकता । शनकैस्तु क्रियालोपाद् क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ मनुस्मृति १० : ४३ × × × पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः कम्बोजा यवनाः शकाः । पारदाः पह्लवाः चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ मनुस्मृति १० : ४४ उन्हें काशगर से कुछ विद्वान् सम्बन्धित करते हैं । खशगिरि का अपभ्रंश काशगर कहा जाता है । मार्कण्डेय पुराण ( १४६ : ३५० ) में उन्हें शाल्व, शक और शूरसेन आदि जातियो के साथ रखा गया है । सेन तथा पाल वंश के शिलालेखों में इनका उल्लेख आता है । बृहद् संहिता खशों का कुलूत ( कुलू निवासी ) तंगणा, तथा काश्मीरा के साथ धर्मीकरण करती है ( १० : १२ ) । ऋग्वेद संहिता ( १ : ३१७ ) में खश जाति का उल्लेख मिलता है । ऋग्वेदकाल में गिलगित से करलो नदी तथा कालान्तर में नेपाल की पूर्वी सीमा तक खश जाति फैल गयी थी । खशा प्राचीनतम दक्ष प्रजापति तथा असिक्नी की कन्या थी । कश्यप प्रजापति को दी गयी थी । उससे यक्ष राक्षसादि हुए । मार्कण्डेय पुराण में 'कुरवो गुर्गणाः खशाः', 'वायु पुराण में 'क्षुपणास्तङ्गणाः खशाः', 'कुणपास्तंगणाः खशाः', 'शुथ्नास्तङ्गनाः खशाः' 'ध्रुवणास्तङ्गणाः रासाः' । ब्रह्माण्ड पुराण में 'कुपथास्तङ्गणाः खशाः', मत्स्य पुराण में 'कुपथा अप्यास्तथा', वामन पुराण में 'कुपथास्तङ्गणा खशाः', उल्लेख आता है । कुपथ किंवा अपथ : हिमालय में कोई स्थान था । खश देश का उल्लेख द्रोण पर्व में किया गया है । मत्स्य पुराण में बर्बर तथा

परिशिष्ट 'न' १३१ यवनों के साथ खशों का उल्लेख किया गया है। 'बर्बरान् यवनान् खशान्' वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में 'पारदान्, खसान्' 'पारदास्तङ्गणाखशान्', 'किम्पुरुषान् खशान्' का उल्लेख अर्थात् 'पारद, तङ्गण तथा किम्पुरुष' के साथ आया है। महाभारत द्रोण पर्व में खश जाति का उल्लेख आया है कि उन्होंने कुरु क्षेत्र के युद्ध में अयोद्दस्ता तथा शूलहस्ता खश गणों ने सात्यकि पर अश्म वर्षा की थी। ततः पुनर्व्यात्तमुखस्तेऽश्मवृष्टीः समन्ततः ॥ उद्योग पर्व = १६० : १०३ अयोद्दस्ता शूलहस्ता दरदास्तङ्गणा खशाः ॥ द्रोणपर्व १२१ : ४२ खाशीर जनपद का उल्लेख भीष्म पर्व में पूर्वोत्तर भारत के एक जनपद के लिए किया गया है। मार्कण्डेय पुराण में खश जाति स्थान मगध तथा लौहित्य के साथ पूर्व दिशा में रखी गयी है। परन्तु यह कश्मीर साहित्य में वर्णित जाति खस नहीं है। आसाम के खासी पर्वत में रहने वाली खासी जाति हो सकती है। खश एवं खस दोनों एक ही जाति के वाचक है। भागवत पुराण (२:४:१८) के अनुसार खस जाति पतित हो गयी थी। भगवत भक्ति के कारण शुद्ध हो गयी। ब्रह्माण्ड पुराण (२:३६:१४५ तथा ३:६६:१२०) के अनुसार विन्ध्य पर्वत में निवास करने वाली खस एक निम्न कोटि की क्षत्री जाति थी। उसे निषाद भी कहते थे। हरिवंश पुराण के अनुसार सगर ने उन्हें जीता था। उन्हें निम्न श्रेणी में रख दिया। वे म्लेच्छ माने गये । हरिवंश पुराण ( १४:७८४ ) ब्रह्माण्ड तथा मत्स्य पुराण ने उन्हें पूर्व का एक जनपद माना है। जिसमें होकर चक्षु नदी बहती है। ब्रह्माण्ड पुराण तथा मत्स्य पुराण (१२०:४३, १४४:५७ ) वायु पुराण में खश पर्वतीय खश जनपद कहा गया है। यहां खश के स्थान पर खस शब्द का प्रयोग किया गया है। वायु पुराण ( ४५:१३५ तथा ४७:४७ ) में दरद जाति को खस जाति का पड़ोसी माना गया है। बंगाल के पाल राजाओं के शिलालेख में हूण तथा खस जाति का उल्लेख मिलता है। निष्कर्ष निकाला जा सकता है। खस लोग बंगाल तक आते जाते थे। पूर्वोय भारत का उनको ज्ञान था। वहां वे किसी न किसी रूप में आबाद थे। हरिवंश पुराण ( १३:२३-३४) में उल्लेख आता है कि रघुवंशी राजा बाहू और उसके राज्य को हैहय तथा तालजंघ वंशीय राजाओं ने शक, यवन, कम्बोज, पारद तथा पह्लव की सहायता से नष्ट कर (१४:४) दिया था। यवन, पारद, काम्बोज, पह्लव तथा खस पांचगणो ने हैहय राजाओं के विजय निमित्त पराक्रम किया था। यहाँ स्पष्ट उल्लेख मिलता है। खसों की राज्य-व्यवस्था गणतन्त्रीय थी। खसो ने बाहू राजा तथा उसके राज्य को नष्ट करने में सम्भवतः प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया था क्योकि श्लोक ( १३:३० ) में खस का उल्लेख नही आता । हैहय तथा तालजंघ राजा के साथ शकों का उल्लेख है। उसने बाहू के राज्य को छीन लिया था। केवल यह उल्लेख आता है ( १४:४) कि पाँच गणराज्य जिनमें खस भी एक गण राज्य था, हैहयों के लिए पराक्रम किया था। खस लोग शकों की तरह बाहू के राज्य को लेते हुए दिखाई नहीं देते। एक मत है कि 'केदारे खसमण्डले' की उक्ति के अनुसार केदार खण्ड खस मण्डल का पर्याय है। यह मत उचित नहीं मालूम होता। केदार खण्ड में ही नहीं हिमालय के दक्षिणवर्ती पर्वतमाला में खश जाति फैली थी । अतएव खस जाति केदार खण्ड में भी आबाद थी । परन्तु इसके कारण खसमण्डल का पर्याय केदार खण्ड मान लिया जाय यह युक्ति पूर्ण दलील नहीं मालूम होती ।

१३२ राजतरंगिणी कल्कि पुराण में भी खसों का उल्लेख मिलता है : खश काम्बोजकाञ्च सर्वान् शबरान् यवनानपि ॥ ३२ ॥ मरुः खशैश्च काम्बोजैः युयुधे भीमाविक्रमः । देवापिः समरे धीनैर्यवनैः संतणैरपि ॥ ४१ ॥ कल्कि पुराणः तृतीयोध्याः ६: ३२ तथा ४१ प्लीनी ( सन् ७६ ई० ) का मत है । सिन्धु तथा जमुना की मध्यवर्ती पर्वतीय जातियां राग अर्थात् केसी है । वे क्षत्री फेट्रीवोनी कही जाती थी । अरण्यवासी थे । अटकिन्सन का मत है—प्लीनी के अनुसार उस समय खस कमायूँ तथा नेपाले के घुर पश्चिम में निवास करते थे । तालमो ( ८७-१६५ ई० ) का उद्धरण देते हुए वह पुनः लिखता है—दरद जाति सिन्धु उद्गम के समीप कस्पेरोई झेलम, रावी, चनाब के समीप रहते थे । उनके देश को कुलिन्द कहते थे । इस समय दरद अस्तोर तथा गिलगिट में रहते है । कस्पेरोई कश्मीर उपत्यका तथा सतलज के मध्य निवासी थे । कुलिन्द सतलज तथा गंगा के बीच में रहते थे । गिलगित से लेकर जोजिला पास का कश्मीरी भूखण्ड जिसका अधिक भाग अनधिकृत रूप से के इस समय पाकिस्तान आधीन है, दरद जाति आज भी रहती है । उसे दरदिस्तान कहते हैं । नेपाल से कश्मीर तथा पामीर तक खस जाति बिखरी थी । एक समय था जब तिब्बतवासी कश्मी- रियों को खद्दे कहते थे । इस समय तिब्बती खद्दे लोगो को मुसलमान कहते थे । कश्मीर के लोग मुसलमान हो गये तो खद्दे शब्द मुसलमानों के लिये तिब्बतियों द्वारा प्रयुक्त होने लगा । तिब्बत सीमा मुस्लिम देश कश्मीर है । चित्राल कश्कर, पत्तन मस्तूज के इलाकों के निवासी खो कहे जाते हैं । खशों में मुसलमान तथा बौद्ध हो गये और शेष हिन्दू धर्म के रीति रिवाजों को मानते हुए पूर्ववत् क्षत्री रह गये ।

परिशिष्ट 'प' ३५ लुप्त राजा ( रा० त० १ : ८३ : पृष्ठ ११७ ) हसन ने ३५ लुप्त राजाओं की निम्नलिखित तालिका दी है। यह तालिका वह किस ऐतिहासिक आधार पर देता है, इस पर प्रकाश नहीं डालता। इस तालिका का ऐतिहासिक महत्त्व नगण्य है। रत्नाकर पुराण की बात प्रमाण तुला पर सत्य नहीं उतरती। ( १ ) हरण देव ३०३४-३००५ ईसा पूर्व ( पुत्र राजा परीक्षित ) ( २ ) रामदेव ३००५-२६३६ ( १३ ) चन्द्रदेव २५०६-२४५७ ( ३ ) व्यासदेव २९३६-२८८० ( १४ ) आनन्द २४५७-२४२६ ( ४ ) द्रुण २८८०-२८२२ ( १५ ) द्रुपद देव २४२६-२३७८ ( ५ ) सिंहदेव २८२२-२७६८ ( १६ ) हरनाम देव २३७८-२३२६ ( ६ ) गोपालदेव २७६८-२७५५ ( १७ ) सुखलन देव २३२९-२३११ ( ७ ) विजयानन्द २७५५-२७३० ( १८ ) सिनादित्य २३११-२२६४ ( ८ ) सुखदेव २७३०-२६८६ ( १९ ) मंगलादित्य २२९४-२२५५ ( ९ ) रामानन्द २६८६-२६२९ ( २० ) क्षेमेन्द्र २२५५-२१८९ ( १० ) सन्धिमान २६२६-२५६४ ( २१ ) भीमसेन २१८९-२१२८ ( ११ ) (क) मरणदेव २५६४-२५०६ ( २२ ) इन्द्रसेन २१२८-२०८२ ( १२ ) (ख) कामनदेव ( २३ ) सुन्दरसेन २०८२-२०४१ दो मास काश्मीर मण्डल राजा विहीन था। शेष १२ राजा शचीनर के पश्चात् हुए थे। उनकी तालिका निम्नलिखित है:— ( २४ ) जलगेन्द्र १७५७-१७१२ ( ३० ) प्रतापशील १५८९-१५५३ ( २५ ) बलदेव १७१२-१६६६ ( ३१ ) संग्रामचन्द्र १५५३-१५५२ ( २६ ) नलसेन १६६९-१६४४ ( ३२ ) लरिकचन्द्र १५५२-१५२१ ( २७ ) गोकर्ण १६४४-१६०८ ( ३३ ) बोरमचन्द्र १५२०-१४७६ ( २८ ) प्रह्लाद १६०८-१५६७ ( ३४ ) बभीखन १४७६-१४५९ ( २९ ) बम्बरू १५९७-१५८९ ( ३५ ) भगवन्त १४५९-१४५५ इतिहासकार बैउद्दीन कश्मीर का विचित्र इतिहास उपस्थित करता है :— "महात्मन् आदम सरन द्वीप ( सिंहल या लंका ) से कश्मीर आये। सेथ के वंश में कश्मीर का राज्य १११० वर्ष तक रहा। "महात्मन् सुलेमान ने कश्मीर को आबाद किया। अपने भतीजा इसौन को उसने कश्मीर का राजा बनाया। उसने कश्मीर पर २५ वर्ष तक शासन किया। तत्पश्चात् उसका पुत्र कस्सलघन इस्लामा- बाद में राजधानी बनाकर १९ वर्ष राज्य किया। उसके बाद उसका पुत्र महेरकज राजा हुआ। उसने ३० वर्ष राज्य किया।

१३४ राजतरंगिणी 'वह सन्तानहीन था । उसने पण्डू खा अथवा वन्दू खा को गोद लिया। इस राजा का विचित्र जन्म हुआ था । उसकी एक माता एक सरोवर में स्नान कर रही थी । सहसा गर्भवती हो गयी । उसकी मृत्यु भी उस सरोवर में स्नान करते समय हो गयी । उसका शरीर पानी मे फूल गया । उसमे १५ हजार सन्तानें हुईं । उन्हीं के वंशज भारतीय इतिहास वर्णित पाण्डव हैं । पण्डू खा का लड़का लादो खां हुआ ।' इस इतिहासकार के अनुसार वंशावली निम्नलिखित होती है । महारमन् सुलेमान ने अपने भतीजा इसोन को राजा बनाया उसके पश्चात् निम्नलिखित कश्मीर के राजा क्रमानुसार हुए । १. सुलेमान २ इसोन ३. कस्सलघन ४. महरकज ५. पेन्दू खा ६ लदो खा ७. सेदर खां ८. सुन्दर खा ९. कुन्दर खां १०. सुन्दर खा (द्वितीय) ११. तुन्दू खा १२. बेदू खा १३. महन्द खां १४. दरविश खा १५. देवासिर खा १६. तेहव खा १७. कलजू खा १८. सुरखब १९ शर्म बरम खा २० नोरंग खां २१ वारिध खा २२. गवशेहर खा २३. पण्डू खा (द्वितीय) २४. हरशिर खां २५ राजिल खां २६. अकबर खा २७. जबर खा २८. नोदर खा २९. शंकर खा ३०. बकराज । बकराज के वंशजो का नाम नही मालूम है । ओगनन्द पहला राजा हुआ जिसके समय से इतिहास क्रमबद्ध चलता है । बैउद्दीन के अनुसार राजाओं का संक्षिप्त विवरण ⸱ ८. सुन्दर खा—इस राजा के समय कश्मीर के हिन्दुओ में बुतपरस्ती अर्थात् मूर्ति पूजा आरम्भ हुई । युत- परस्ती रोकने के कारण राजा मार डाला गया । ९. कुन्दर खा—३५ वर्षों तक राज्य किया । १०. सुन्दर खा—इस राजा के समय में बुतपरस्तो पुन. जोर पकड गयी। इस राजा ने सदा शिव का मन्दिर निर्माण कराया । १२ बेदू खा—११५ वर्ष शासन किया । १६ तेहव खा—यह राजा अपने पडोसी तथा सम्बन्धी काबुल के राजा द्वारा मार डाला गया । काबुल का राजा कश्मीर की गद्दी पर कलजू खा के नाम से बैठा । १७. कलजू खा—सात वर्ष राज्य कर लेने पर कलजू खा को पाण्डवों ने गद्दी से उतार दिया और स्वयं राजा बन गये । १८. सुरखब—१९१ वर्ष राज्य किया । २०. नोरंग खा—महान् विजेता राजा था । इसका राज्य चीन की सीमा तक पहुँच गया था । ओगनन्द—[ मै समझता हूँ गोनन्द के लिए ओगनन्द नाम का प्रयोग किया गया है । ] २३. पण्डू खा—उसने कश्मीर राज्य के उन सब स्थानों पर कब्जा कर लिया जो कभी कश्मीर राज्य के अन्तर्गत थे । उसने राज्य भारतीय समुद्र की सीमा तक पहुँचा दिया । २४ हरशिर खा—२३ वर्ष राज्य किया । २८. नोदर खा—कश्मीर में इन्होंने आतिशपरस्ती अर्थात् अग्निपूजा का प्रचार किया । ( यह जरदस्तू अर्थात् पारसियो का धर्म था । ) २९. शंकर खां—बकराज ने इस पर आक्रमण कर मार डाला । वह एक पड़ोसी सरदार था । शंकर खां का लड़का कुछ घण्टों के लिए गद्दी पर बैठा । ३०. बकराज—बकराज राजा हुआ । उसने अपने वंशजों को राज्य दिया ।

परिशिष्ट 'प' १३५ श्री बैउद्दीन ने कश्मीर के इतिहास, वहाँ को परंपरा तथा धर्मादि को पुरातन बाइबिल एवं कुरान शरीफ में वर्णित महात्मन् सुलेमान से जोड़ा है। कश्मीर को भारतीय परंपरा, इतिहास एवं धर्म से सर्वथा अलग रखा है। उसने राजाओं की जो तालिका उपस्थित की है, वह कुछ विचित्र ध्वनि करती है। उसने संस्कृत नामो के आगे 'खां' पद जोड दिया है। यह 'खां' शब्द भारत में मंगोल मुसलिम आक्र- मण के पश्चात् प्रचलित हुआ था। इसका सम्बन्ध मंगोल से फिलस्तीन की अपेक्षा अधिक है। सुन्दर खां के पहले कश्मीर में मूर्ति पूजा नही थी। उसके समय में आरम्भ हुई और वह अपने इस कार्य के लिए जनता द्वारा मारा गया था। किन्तु सुन्दर खां द्वितीय के समय सदा शिव की पूजा आरम्भ हो गयी। बैउद्दीन पारसी धर्म आतिशपरस्ती का कश्मीर में आना कहता है। कश्मीर का सम्बन्ध, फिलस्तीन, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान तथा इस समय के मुसलिम जन बाहुल्य देशों से जोडने का प्रयत्न करता है।

अनुक्रमणिका [ अ ] अकरोत्स महाहर्म्यैः 2, 133 अथ पुर्य्यष्टिरुद्भाभ्यं° 2, 105 अकुण्ठुलङ्घ्याः पन्थानो 3, 224 अथ प्रतापादित्याख्यः 2, 5 अप्रहाराञ्जगृह्णिरे 1, 307 अथ प्राङ् मुरसोत्तीर्णं° 3, 239 अङ्गेन रक्ष कायस्य 3, 346 अथ भानुकरोच्चुष्टरू° 3, 398 अचिन्तयच्च धिङ्मां 3, 183 अथ भामर्थ्य माहात्म्यात् 2, 72 अचिन्तयच्च नाश्यं 3, 148 अथ म्लेच्छगणात्तीर्णे 1, 289 अचिन्तयच्च शास्त्रज्ञो 3, 222 अथ योगेश्वरी काचिद् 1, 331 अचिन्तयच्च सत्यं मे 2, 153 अथ रक्षः पतिर्लङ्का 3, 75 अचिन्तयच्च राज्ञान्त- 2, 92 अथ राजाज्ञया क्रूरं 2, 79 अटवीषु श्मशानेषु 2, 29 अथ राजाऽभ्यधात् षेन 3, 292 अत एव विशेषेतॄणा 1, 229 अथ वनसरसीतट° 2, 166 अत स्वाञ्प्रहाराणा 1, 314 अथ वाक्पुष्ट्या सार्धं 2, 11 अतः परुमप्यद्य 3, 310 अथवा रचनानिवि° 3, 95 अतिकारुण्यमिपत 3, 42 अथ वाराणसी गत्वा 3, 320 अतिक्रान्तप्रभावेयं 2, 35 अथ वार्ता विदित्वेमा 2, 114 अतिक्रामति कालेऽथ 3, 82 अथवा विद्यतेऽमुख्य 3, 195 अतिक्खन्तापदाज्जातः 1, 327 अयवाऽस्यैव सूक्तेन 3, 186 अत्यद्भुतमति शङ्कुध- 2, 67 अथ विगलिता गोनन्दोर्वी° 3, 530 अत्युदारगुणेष्वेषा 3, 304 अथ वेलावलोपान्तात् 3, 31 अत्यद्भुतं राज्यलाभम् 2, 142 अथ वैजनने मासि 1, 74 अथ कृत्याधर्मं कृत्वा 1, 147 अथ वैवस्वतीयेऽस्मिन् 1, 26 अथ कृत्वा क्षणाच्छ्लोकम् 3, 180 अथवाऽनादृतोऽन्येन 3, 201 अथ क्ष्माभृद्वरक्ष्मा 3, 97 अथ शस्त्रक्षतैैरङ्गै- 1, 63 अथ प्रपयितुं तस्मिन् 3, 261 अथ शिथिलितमुख्यामात्य° 3, 528 अथ प्राहमितुं भूपान् 3, 27 अथ सधिर्मति बुद्ध्वा 2, 82 अथ तं कृशसर्वाङ्गं 3, 160 अथ स्नाताङ्गुलित्साङ्गं 3, 241 अथ दूतेषु यातेषु 3, 190 अथ स्नायख्विशेषपाङ्गो 3, 408 अथ दीपोज्ज्वले धाम्नि 3, 371 अथाक्लेशोचितं क्षेम° 3, 211 अथ निष्कन्धस्ते संगद्वा 1, 366 अथानन्तचितालोक° 3, 339 अथ निर्भर्त्सनां तस्माद् 1, 256 अथापश्यत्तयाभूतः 3, 52 अथ निन्दन्परो राजा 1, 174 अथाऽपश्यत्तरुच्छन्नः 2, 102 अथ पदन्ठ भूगलः 3, 178 अथाभवत् लवो नाम 1, 84

अनुक्रमणिका १३७ अथाभवन्स्वनामाङ्क° १, १६८ अपश्यत्स फणाकोटी ३, २२१ अथाभ्यधान्महात्मा स ३, ३८ अपश्यदथ केनापि ३, ३३ अथार्धरात्रे निन्निद्रः २, ९४ अपश्यन्निर्जलात्स्यानाद् १, १२६ अथाऽऽर्यराजो विज्ञाय २, १५२ अपि च स्पृहयालुः स्यां ३, ३१५ अथाऽशोककुलोत्पन्नो १, १५३ अपूर्वो यत्प्रतापाग्निः ३, ३८९ अथाश्रूयत वाक्तासां २, १०९ अप्यल्पकालसंदृष्ट° १, २७४ अथाश्वपादेनेशेन° ३, ३६६ अप्रियेरपि निष्पिष्टै ३, २८३ अथाऽऽसोत्सुत्परिक्षाम° २, २० अबुध्वाज्जनुतिष्ठन्त १, ७९ अथाहूयापरान्भृत्यान् ३, २५० अभवन्निर्मलं व्योम २, ५४ अथेन्द्रदेवीभवनम् ३, १३ अभिमानवतां श्लाघ्य° १, २२६ अथोत्पन्नभयो राजा १, ३६३ अभुक्ते मन्त्रिभिर्द्रव्ये १, २३४ अथोदतिष्ठन् गर्तेभ्यो ३, ४०० अभूद्भीतजनता° ३, २८ अथोपसिन्धु गान्धारैः १, ६६ अमारमादिदेशाथ ३, २५६ अथोल्लसत्पृथुश्लाघ° ३, २ अमृतप्रभया तस्य ३, ४६३ अथापि तत्पुरं दग्धं १, २७० अयमेतद्गृहीतेषु ३, २१६ अनन्तरज्ञः क्षोण्योऽस्माद् ३, २१७ अरण्यगहनाल्लब्धम् ३, ३७ अनद्यदिनयोदात्तः २, ३ अराजान्वयिने दत्ता ३, ४८८ अनर्घमहिमा दीर्घ° १, ९१ अर्चालिङ्गमुपादाय २, १६१ अनात्मज्ञ किमेतत्ते ३, ३४ अर्चनां शासितुं राष्ट्रं २, ११६ अनाप्नुवद्भिः सावद्य° ३, १३५ अर्चितेन स्वयं त्रातुं ३, २४२ अनेन सह संजातः ३, १४२ अर्थे यद्विक्षवः शिक्षा° ३, १२ अन्तरज्ञतया तस्य ३, २६२ अर्वस्कालोद्भवस्यापि ३, १५ अन्तरज्ञतया श्लाघ्यः ३, ३०१ अलोलकीतिकल्लोल° २, ६४ अन्तर्दध्यौ च कर्तव्यं ३, १९२ अवतारयतस्तस्य १, ३१८ अन्तर्ये सततं लुठन्त्य° ३, २०२ अवध्योऽहं पशुत्वेन ३, ३३४ अन्तर्वत्नीं तस्य पत्नीं १, ७० अवन्त्यदर्शने छिन्द्ये ३, ३९४ अन्यस्यापि क्रोधहेतुं ३, ५०९ अबालम्बिव्यत छत्रं ३, ६५ अन्यरक्षानीय देशेभ्यः १, ३४३ अविज्ञाताशयो राज्ञः ३, २०९ अन्याभिः खादनात्सम्मा° ३, १४ अभ्यांजोदार्यधैर्यस्य ३, ३०८ अन्येद्युर्विस्मयस्मेरैः ३, ७१ अशून्यजन्मा भूयासं ४, ४३० अन्येद्युर्भुवमुत्सृज्य ३, २८७ अशेषमेकेनैवाह्ला १, १६६ अन्येद्युर्विधिबदुपास्य २, १६९ अश्लीलालापिनोऽन्योन्यं ३, १४० अन्येद्युः प्रकृतीः सर्वाः २, १५९ अष्टषष्ट्यधिकामब्द° १, ४८ अन्योत्कर्षानपि वदन् ३, १५८ असंतापाह्वतां जानन् १, ४१ अन्योन्यं साभिमानानाम् ३, ३२३ असम्पूर्णेऽपि तैर्नोवी २, ८ अन्वैष्यत नृपस्ताभिः २, १४४ असाधारणमौदार्य° ३, ३१४

अनुक्रमणिका [ अ ] अकरोत्स महाहर्म्यं. 2, 133 अथ पुर्यन्तरिच्छाम्यं 2, 105 अकृच्छ्रलङ्घ्याः पन्थानो 3, 224 अथ प्रतापादित्याख्यः 2, 5 अग्रहाराञ्जगृहिरे 1, 307 अथ प्राङ् मुरगोवर्णं 3, 239 अङ्गेन रक्ष कायस्य 3, 346 अथ भामुरुरोच्छुष्कं 3, 398 अचिन्तयच्च धिङ्मां 3, 183 अथ भाश्वर्य माहात्म्यात् 2, 72 अचिन्तयच्च नाद्यं 3, 148 अथ म्लेच्छगणार्योनं 1, 289 अचिन्तयच्च शास्त्रज्ञो 3, 222 अथ योगेश्वरी काचिद् 1, 331 अचिन्तयच्च सत्यं मे 2, 153 अथ रक्षः पतिर्लङ्का 3, 75 अचिन्तयच्च सम्भ्रान्त 2, 92 अथ राजाज्ञया क्रूरै 2, 79 अटवीषु श्मशानेषु 2, 29 अथ राजाऽभ्यधात् नैन 3, 292 अत एव विवेक्तॄणा 1, 229 अथ वनसरसोतटं 2, 166 अत एवाग्रहाराणा 1, 314 अथ वाक्पुष्या सार्धं 2, 11 अतः परमुपम्यद्य 3, 310 अथवा रचनानिवि० 3, 95 अतिकारुण्यमिपतः 3, 42 अथ वाराणसीं गत्वा 3, 320 अतिकान्तप्रभावोयं 2, 35 अथ वार्त्ता विदित्येमां 2, 114 अतिक्रामति कालेऽथ 3, 82 अथवा विद्यतेऽमुख्य 3, 195 अतिसन्तापदाज्जात. 1, 327 अथवाऽस्यैव सूक्तेन 3, 186 अत्यद्भुतमति शङ्कथ 2, 67 अथ विगलिता गोनन्दोर्वी 3, 530 अत्युदात्तगुणेष्वेषा 3, 304 अथ वेलावनोपान्तात् 3, 31 अत्यद्भुतं राज्यलाभम् 2, 142 अथ वैजनने मासि 1, 74 अथ कृत्याश्रमं कृत्वा 1, 147 अथ वैवस्वतीयेऽस्मिन् 1, 26 अथ कृत्वा क्षणान्छ्लोकम् 3, 180 अथवाऽनादृतोप्येन 3, 201 अथ क्ष्माभृद्रसं दमां 3, 97 अथ शस्त्रक्षतैरङ्गे 1, 63 अथ प्रययितुं तस्मिन् 3, 261 अथ शिथिलितमुख्यामात्य 3, 528 अथ ग्राहयितुं भूपाम् 3, 27 अथ संधिमतिं बुद्ध्या 2, 82 अथ तं नृपसर्वाङ्गं 3, 160 अथ स्नातानुलिप्ताङ्ग 3, 241 अथ दूतेषु यातेषु 3, 190 अथ स्नाव्यवशिष्टेषाऽङ्गो 3, 408 अथ दीपोज्ज्वले पाम्नि 3, 371 अथाक्लेशोचितं क्षेमं 3, 211 अथ निरुपद्रुस्ते संगद्वा 1, 366 अथानन्तचितालोक 3, 339 अथ निर्मग्गंनां तस्माद् 1, 256 अथापश्यत्तथामूतः 3, 52 अथ निष्कण्टको राजा 1, 174 अथाऽपश्यत्ततच्छत्त्र. 2, 102 अथ पप्रच्छ भूपालः 3, 178 अथाभवत् लवो नाम 1, 84

अनुक्रमणिका १३७ अथाभवत्स्वनामाङ्क° १, १६८ अथाम्यधान्महात्मा स ३, ३८ अथार्धरात्र निर्निद्रः २, ९४ अथाऽऽर्यराजो विज्ञाय २, १५२ अथाऽशोककुलोत्पन्नो १, १५३ अथाऽश्रूयत वाक्तासां २, १०९ अथाश्वपादनेशान° ३, ३६६ अथाऽऽसीत्त्वत्परिक्षाम° २, २० अथाहूयापशम्भृत्यान् ३, २५० अथैन्द्रदेवीभवनम् ३, १३ अथोत्पन्नभयो राजा १, ३६३ अथोदतिष्ठन् गर्तेभ्यो ३, ४०० अथोपसिन्धु गान्धारैः १, ६६ अथोल्लसत्पृथुश्लाघ° ३, २ अद्यापि तत्पुरं दग्धं १, २७० अनन्तरङ्गः कोऽप्योऽस्माद् ३, २१७ अनयदि नयोदात्तः २, ३ अनर्घमहिमा दीर्घ° १, ९१ अनात्मज्ञ किमेतत्ते ३, ३४ अनाप्नुवद्भिः सावद्य° ३, १३५ अनेन सह संजातः ३, १४२ अन्तरङ्गतया तस्य ३, २६२ अन्तरङ्गतया श्लाघ्यः ३, ३०१ अन्तर्दध्यौ च कर्तव्यं ३, १९२ अन्तर्मे सततं लुठन्त्य° ३, २०२ अन्तर्वत्नी तस्य पत्नी १, ७० अन्यस्यापि क्रोधहेतुं ३, ५०९ अन्यांश्चानीय देशेभ्यः १, ३४३ अन्याभिः सादनासम्मा° ३, १४ अन्येद्युर्विस्मयस्मेरैः ३, ७१ अन्येद्युर्भूवमुत्सृज्य ३, २८७ अन्येद्युविधिबदुपास्य २, १६९ अन्येद्युः प्रकृतोः सर्वाः २, १५९ अन्योत्कर्पानपि वदन् ३, १५८ अन्योन्यं साभिमानानाम् ३, ३२३ अन्वैष्यत नृपस्ताभिः २, १४४ अपश्यतस फणाकोटो ३, २२१ अपश्यदथ केनापि ३, ३३ अपश्यन्निर्जलात्स्थानाद् १, १२६ अपि च स्पृहयालुः स्या ३, ३१५ अपूर्वो यत्प्रतापाग्निः ३, ३८९ अप्यल्पकालसंदृष्ट° १, २७४ अप्रियैरपि निष्पिष्टैः ३, २८३ अबुध्वाऽनुतिष्ठन्तः १, ७९ अभवन्निर्मलं व्योम २, ५४ अभिमानवतां ब्रह्म° १, २२६ अमुक्ते मन्त्रिकैरङ्गे १, २३४ अभूदगीतजनता° ३, २८ अमरमादिदेशाथ ३, २५६ अमृतप्रभया तस्य ३, ४६३ अयमेतद्गृहीतेषु ३, २१६ अरण्यगहनाल्लब्धम् ३, ३७ अराजान्वयिने दत्ता ३, ४८८ अर्चोलिङ्गमूपादाय २, १६१ अर्चनां शासितुं राष्ट्रं २, ११६ अयितेन स्वयं त्रातुं ३, २४२ अर्थे यद्विश्रवः शिक्षा° ३, १२ अर्वाक्कालोद्भवस्यापि ३, १५ अलोलप्रीतिकल्लोल° २ ६४ अवतारयतस्तस्य १, ३१८ अवश्योऽहं पशुत्वेन ३, ३३४ अवम्यद्दर्शनां विन्ध्ये ३, ३९४ अवालम्बिप्यत छत्रं ३, ६५ अविज्ञाताशयो राज्ञः ३, २०९ अग्यांजोदार्यचर्यस्य ३, ३०८ अशून्यजन्मा भूयासं ४, ४३० अशोपमेवेनँवाह्ला १, १६६ अश्लीलालापिनोऽन्योन्यं ३, १४० अष्टषष्ट्यधिका मन्द° १, ४८ असंतापार्हतां जानन् १, ४१ असपूर्वाऽपि तेनोवी २, ८ असाधारणमोदार्य° ३, ३१४

१३८ राजतरंगिणी असामान्यगुणांस्तस्य 3, 251 इति संचिन्त्यमद्गन्तः 2, 158 असारं च विचित्रं च 2, 113 इति संचिन्त्य राज्ञापि 3, 149 अस्मद्गिरा प्रेरणीयो 1, 142 इति संचिन्त्य सुभिरं 3, 92 अस्मद्राज्यदिव्यवपु. 2, 110 इति संचिन्त्य गूढं 3, 146 अस्य ग्लानस्य भेषज्यं 3, 164 इति संरम्भतः प्रोक्तैः 2, 50 अस्य वैकल्यकैलव्य° 3, 277 इति सोऽभीष्टमंत्रासो 3, 422 अहंपूर्विकयोद्यद्भि 3, 220 इत्यमाराधतत्कुलं 3, 79 अहरन्हृदयं तस्य 2, 121 इत्थं विलिम्पन्नाश्वा रा 3, 225 अहो नरेन्द्रवर्यस्येदं 3, 212 इत्थं स्विन्ने परं कंचित् 3, 245 [ आ ] इत्यर्थ्यमानोग्क्यद् 3, 69 आकृतेर्हा धिगीदृश्या 1, 212 इत्यागच्छत्तनस्वापि 3, 91 आक्रान्ते शारदैर्भौट्टै. 1, 312 इत्यासादितराज्यस्य 3, 264 आगच्छत प्रविशते° 3, 232 इत्युक्तवा वरुणाविष्टो 2, 43 आचान्ते शुचिता प्राप्ते 1, 214 इत्युक्त्वान्तर्हिते देवे 3, 280 आदिदेश च तान्यो वो 3, 189 इत्युक्तवा भाविनोऽर्थस्य 2, 97 आयेन चन्द्रदेवेन 1, 184 इत्युक्त्वार्पितलेखोऽसौ 3, 368 आ बाल्याद्व्यक्तविद्योक्ति 3, 433 इत्युक्त्या विरते तस्मिन् 3, 319 आम्यामम्यधिकं कर्तुं 2, 59 इत्युक्त्या स स्वयं देहम् 3, 50 आम्नायभङ्गास्निर्मेण्ट° 1 83 इत्युदीर्य निजं जानु 3, 345 आरोग्यशाला निरगा° 3, 461 इत्यूचुर्यं मते तेषा 1, 311 आर्यदेश्यान्स संस्थाप्य 1, 313 इत्येतत्प्रतिवृत्तान्तं 1, 189 आलोक्य शारदा देवी 1, 37 इत्येतस्मिन् जनाम्नाये 1, 316 आवेद्यमानं दिशुभिरस्तं 3, 116 इत्यौचित्यनिधेस्तस्य 3, 299 आशाः काञ्चन पुष्प° 2, 40 इदं संचिन्तयन्सोऽभूत् 3, 203 आभोकादांभिमन्योयं 1, 20 इदं स्वभेदविधुरं 2, 7 आसन्नप्रसवा भर्त्रा 3, 106 इन्द्रजिद्रावणावास्ता 1, 193 आसन्नपागु मुनय. 1, 56 इयं चान्यमते ख्यातिः 1, 323 आसन् येर्रिरमनोऽगाध° 3, 479 इयं नृपाणामुल्लासे 1, 21 आस्ता बालस्य संनद्धे 1, 77 [ इ ] [ ई ] इति काश्मीरको राजा 1, 82 ईशानस्तस्य देवीनां 2, 107 इति चिन्तयतस्तस्य 3, 167 ईशानोऽपि तमालिङ्ग्य 2, 112 इति तैस्तव्यमुक्तोऽपि 2, 246 ईशो नृपाणो निश्शेष° 3, 101 इति ध्यात्वार्गलसद्दर्शनि 3, 522 [ उ ] इति निश्चित्य चतुरं 3, 188 उचिता सत्क्रियां कर्तुं 2, 89 इति ब्रुवति साटोपं 3, 87 उच्चण्डलाडनादण्डो° 2, 99 इतिवृत्तं महदाश्चर्यं 1, 277 उज्झितं स्वेच्छया तच्च 2, 160

अनुक्रमणिका १३९ उत्तमो लोकपालोऽयम् १, ३14 एवं स भुवनैश्वर्य ३, ३77 उत्तानफललुब्धानां ३, 198 एवं स सेवमानस्तम् ३, 159 उत्सृष्ट यतिनामस्य २, 49 [ क ] उत्पलाक्ष इति ख्यातिं १, 286 कथं भस्मीकृतं दैत्यैः २, 96 उत्पिञ्जोत्पादनासङ्गे ३, 122 कथादैर्ध्यनिरोधेन १, 6 उत्साहन्ते हि संद्रष्टुं ३, 429 कदाचित्तस्य दूराध्व° १, 204 उदगर्जज्जिह्वजीमूत° १, 259 करम्भके कीर्यमाणे ३, 257 उद्घाटिततमोरजः २, 100 कर्णिकापद्मरागाब्ज° १, 208 उद्यद्रत्नस्तनिष्यन्द° १, 28 कर्तुं प्रभावजिज्ञासां ३, 455 उद्वेगोत्पादनादेषा ३, 518 कर्मणा तेन सिद्धाया १, 334 उन्मीलितेक्षणोऽद्राक्षीत् ३, 370 कर्मभिः स्वैरखातस्य ३, 246 उपकारं स्मरन्तस्तु ३, 295 कर्मस्थानि धर्म्याणि १, 120 उपनिन्ये च संगृह्य १, 213 कल्पद्रुमाश्च सन्तश्च ३, 64 उपलेभे च दानवैः ३, 500 कल्याणिना प्राणिवधे ३, 6 उपहारनिरोधेन ३, 36 कल्याणिनीभ्यां सातमा १, 216 उपहारीकरोम्येष ३, 46 काश्मीराः पार्वती तत्र १, 72 उपायं यं पुरस्कृत्य ३, 214 काश्मीरेन्द्रः स गोनन्दो १, 57 उपेक्षितस्य निस्स्नेहैः १, 360 काश्मीरैषु धनोदप्रम् ३, 481 उपेक्ष्य मोदां किं क्ष्माभृद ३, 274 कश्यपेन तदन्तःस्थं १, 27 उल्लसद्धरसंभोग° २, 203 कः कोऽत्र बध्यतां चोर ३, 17 [ ऊ ] कः कोऽत्र संविधातॄणाम् ३, 237 ऊष्मायमाणो विद्वेष° २, 76 कः शक्तः कत्थनः स्रष्टा २, 47 [ ऋ ] कः स्वभावगभीराणां १, 230 ऋक्षादक्षं शतेनाब्दैः १, 55 कार्कोटभवः प्रभुः स ३, 529 ऋणापर्णं राजपथैः १, 201 काले काले प्रजापुण्यैः १, 187 ऋद्धया जाज्वलितस्यो° १, 154 काले कियत्यपि ततो १, 352 [ ए ] कालेन सर्वनामन्त्र्य १, 242 एकदा सर्वतो भग्नाः १, 61 किं कर्तव्यतया मूढं ३, 442 एकमेकं स्वमङ्गं च २, 104 किन्नरापरनामाऽथ १, 197 एकस्तु तनयस्तस्य १, 275 किरात कातरो मा भूः ३, 39 एकहस्तधृतासिर्य° १, 248 कुबेर इव यो राज्ञाम् १, 156 एका तमूचे विद्वांसा° १, 217 कुम्भदासस्तया छत्रः ३, 456 एतावत्येव कर्तव्ये ३, 318 कुलालया दारको मातः ३, 120 एवं क्षुद्रोऽपि यद्राजा १, 324 कुशेशयाक्षास्तत्पुत्रः १, 88 एवं नागवराजात्त° १, 244 कृतप्रतिश्रवे राज्ञि १, 146

१४० राजतरंगिणी कृतं कृत्यं महद्वृत्तं ३, ३७३ गणोऽयं मामकः सिद्धो ३, २७० कृतार्थता तीर्थतोयै. ३, २६५ गतानुगतिकत्वेन ३, १९३ कृतार्हणं सुखासीनं ३, २८९ गतिं प्रवीरसुलभां १, ६४ कृतार्हणैरथामात्यै ३, २३४ गम्भीरश्च गुणज्ञश्च ३, १४४ कृत्ये बहूनि नित्यायै २, १५४ गव्युतिमात्रमासन्ने ३, ४०७ कृत्वा सन्धिश्वरं देहं २, १३४ गिरं गभीरो गृह्णाति २, ७० कृत्वेष्टिकापथे कष्टं ३, ४६७ गुणरत्नाकरः शैलं ३; ७२ कृपामुदुरवादीत्तं ३, ४१९ गुणी च दृष्टकष्टश्च ३, २५८ केनाप्यनवधानेन १, १३ गुहोन्मुखी नागमुखां १, २९ कैश्चिन्निर्वासितो मा स्वित् ३, २८८ गूढं तस्य बहिःक्षेत्रं १, २३८ कोटित्रयं नरपति १, ३२२ गृहाङ्गनमिव क्षोणौ ३, १०० कोटिवेधिनि सिद्धे हि १, ११० गृहीतहारमुक्तार्घा ३, ४१४ कोऽप्य कालमतिक्रान्तं १, ४ गृह्यन्धयागुणं स्वान्तम् ३, १३७ को वेत्त्यद्भुतचेष्टाना १, ३०५ गोधर्णस्तत्सुतः क्षोणौ १, ३४६ कोऽस्याश्रयः किमशनं ३, १६२ गोपराहस्तिशालाख्यम् १, ९६ क्रमवर्नाभिधाने स ३, २२७ गोविन्दाख्यनिनामाद्यः १, १९१ क्रमात्प्रच्युते सोऽय १, २२२ ग्रामे ग्रामे स्थितैस्त्वेषैः १, ११४ क्रमोपचीयमानेन ३, १५१ [ घ ] क्रुद्धैर्वादेरनुद्ध्याता १, १४४ घोरं जनक्षयं कृता १, २६६ क्लमापायक्रियाभाजो ३, ६० क्वचिन्मडवराज्यान्तः २, १५ [ च ] क्षणभङ्गिनि जन्तून १, २३ चक्रभृद्विजयेशादिं १, ३८ क्षपापा क्षपापतिमथ ३, ९३ चकास्ते च महाभागी २, १४ क्षामं कण्ठगतप्राणं २, २५ चक्रे नटवने राज्ञो ३, ११ क्षुत्पापाद् व्यम्भरल्लज्जाम् २, २२ चक्रे पर्यस्तमर्यादः १, २५३ क्षुत्क्षामदिभिर्नाधु ३, ८१ चक्रे ब्रह्ममठं ब्रह्मा ३, ४७६ क्षुरपत्रामिन्येवादिं १, ३१५ चतुर्योजनस्त्यार्थम् ३, ४०५ क्षेपापि रसत्येवस्मिन् १, २३५ चतुःशाला मठस्यान्तः १, १९५ चत्वारिंशतमब्दान्त १, २७३ [ ख ] चन्द्राचार्यादिभिर्लब्ध्वा १, १७६ खिगोऽभूत्तत्प्रलापे ३, १३४ [ छ ] ख्यातिं रतपुरस्वामि' ३, ४६२ छन्दानुवर्तिनामेष ३, १४१ [ ग ] छत्रप्रेमसुलाभ्यास' ३, ४९४ गच्छत क्ष्मारवेन्द्रस्य ३, ३३८ [ ज ] गच्छतो मानुकूटस्य ३, २१९ जगत्परिवृढः प्रौढं ३, २७८ गणितं दुर्दिना हेन १, २८० जगद्विलक्षणं यस्य ३, ३८७

अनुक्रमणिका १४१ जनयित्र्याः कुलाख्याञ्च ३, १०८ तत्कालप्रबलप्रेद्ध° १, ११२ जनास्त्वलङ्घयन् यत्स ३, ४५८ तत्तत्कर्म व्यतिकरकृतः २, ९३ जनैर्लक्ष्यमाणेऽद्य ३, ५२३ तत्तुल्यगुणनिर्विण्णा ३, ५०३ जनैः स ददृशे गच्छन् ३, ३७५ तत्त्वं गुणवत्तामभ्यः ३, ३०५ जन्मान्तरे लब्धसिद्धिः ३, २६८ तत्प्रसीद प्रजानाथ ३, ४५ जयन्तेनाद्भुतोदन्त° ३, ३७६ तत्र कौरवकोन्तेय° १, ४४ जातः पद्मथियो देव्याः २, ७३१ तत्र तं वारुणं छत्रं २, १४८ जित्वोर्वी कान्यकुब्जाथा १, ११७ तत्र तस्योग्रनिगडैः २, ७४ जीर्णं श्रीविजयेशस्य १, १०५ तत्र तालीतरुवन° ३, ७३ जुगोप गोपादित्याख्यं २, १४५ तत्र तालीवनच्छाया ३, ३० जुगोप गोपादित्योऽथ १, ३३९ तत्र त्रिपष्टिवर्षाणां १, ३३० ज्येष्ठेऽथ कृष्णद्वादश्यां १, २२० तत्रानेहस्युज्जयिन्यां ३, १२५ ज्येष्ठेश्वरं प्रतिष्ठाप्यः १, ३४१ तत्रापि पूर्वसंस्कारात् १, ३२६ तत्रैकस्मिन्किलोद्याने १, २०३ [ त ] तत्सूनुर्जर्नको नाम १, ९८ तच्चुम्बने भुग्नकण्ठी ३, ५०४ तत्सेनाकुम्भिदानाम्भो° १, २९६ ततस्तयाविशःक्षुभ्यन् ३, ५११ तत्स्वदेहोपहारेण ३, ९१ ततस्तं वृत्तसंकेतः ३, ३७४ ततस्तस्य सुतः प्राप १, ८९ तथा कुरु यथा अश्येत् १, २३६ ततस्तस्यातिसंरम्भात् १, ६७ तथा साश्चर्यचर्यः स ३, ११५ ततः कथान्तरे क्वापि १, २२५ तदद्भुतंमहासत्त्व° ३, ४१ ततः कलकलोत्ताल° ३, २३८ तदनुप्राणिताः सर्वे १, ३६२ ततः कृततपाः स्वप्ने १, ३१९ तदमन्दरसस्यन्द° १, २४ ततः प्रचावितानेक° ३, २०५ तदमुष्य गुणित्वस्य ३, १६६ ततः प्रभृति तस्याज्ञा ३, ८० तदर्थमेव कथितस्वो° ३, ४३५ ततः प्रविश्य नगरं ३, २५३ तदस्मिन्नेतयोर्बाल्याद् १, २३१ ततः प्रहर्तुकामस्य ३, ५१ तदाकर्णनसंरम्भे १, ३०३ ततः प्रावर्तत स्फार° ३, १६८ तकाकर्ण्य महीपालः ३, १८२ ततः सुसोत्थित इव २, १०६ तदाकर्ण्याश्विदव्राजा ३, २५ ततो दिव्याम्बरः स्रग्वी २, १११ तदाऽऽक्रान्तासुहृच्चक्रः १, ६९ ततो निश्शेषितधनः २, ३० तदा स्वदशामात्रेण ३, २४ ततोऽन्यकुलजो राजा २, ६२ तदानीं तोयदा भूत्वा ३, २१ तोऽपनीतत्राग्वेषः ३, २२९ तदा प्रभावः कोऽप्यासीद् १, १८१ ततो भूभृदुपाधौनं ३, १७९ तदा भगवतः शाक्य° १, १७२ ततो महान्त्रासादोऽयम् ३, ७० तदाहवे विवाहोत्का १, ६८ ततो मुहुः प्रहरता ३, ४०४ तदिदं प्राप्तुकामेन ३, ५६ ततो विदितवृत्तान्तो ३, २८१

१४२ राजतरंगिणी तदेवं विहितोदात्तं ३, ६७ तस्मिन्महाभये घोरे २, २६ तदेव गलितोपायो २, ४१ तस्मिन्विरजसि प्राज्यम् २, १२० तद्दिना नगरं कुत्र ३, ३६० तस्मिन्विश्वक्षयोद्युक्तं २, १९ तन्मतं पद्ममिहिरो १, १८ तस्मै कुलप्रणामाय ३, २०६ तपःस्थानपि ये जघ्नुः ३, ८६ तस्य पावन्तमुन्मत्तम् १, २५१ तपोविभूतयोऽचिन्त्या १, १६० तस्य पादार्पितदृशो २, १६२ तयाय.शङ्कुनेवान्तं ३, ३२ तस्य प्रत्यक्षता यातो १, १८३ तमथ प्रतिशब्देन ३, ३४२ तस्य भूपतिविद्वेषं २, ६९ तमन्तिकं पितुः प्राप्तं २, १५१ तस्य रत्नप्रभादेव्या ३, ३७९ तमभ्यधात्सा दुर्बुद्धे ३, ४२३ तस्य राज्याभिषेकादिं १, ७५ तमःप्रकाशावहयो. ३, ५९ तस्य राज्ये जिनस्येव ३, ७ तमित्यं कथयन्तं सा ३, ४२८ तस्य विन्ध्यतटव्यूढं ३, २४० तं कुलीनेश्च शूरैश्च ३, १११ तस्य सूनुर्हिरण्याक्षः १, २८७ तं च स्पृष्टान्तदारिद्र्यः १, २४० तस्य सूनु सुवर्णाख्यः १, ९७ तं च स प्रतिगृह्णन्तं ३, ६३ तस्यानुजो धरणिभृत् ३, ३८६ तं चामरमरुल्लोलं १, ४१ तस्याभिषेक एवाज्ञा ३, ५ तं चार्दस्योपमद्राक्षीत् २, ८५ तस्याभूदद्भुतोदन्तो २, ६५ तं प्रयान्तं समुद्यद्भि. ३, ५३० तस्यां कदाचित्सौधाग्रं १, २४६ तं वारयितुमाहूता १, २४७ तस्यावन्ध्यप्रसादत्वं १, ७८ तया तस्याज्ञया राज्ञो ३, २६ तस्यान्यपोह्यमाहात्म्या ३, ३९१ तया मनोहरैस्तंस्तैः १, ३३२ तस्योपकर्तुंरुचितं ३, ५२५ तयोन्मुल्योजसोपुंदे १, ६२ तादृशां नहि निर्व्याजं २, ५३ तयो. प्रतिष्ठा क्रियताम् ३, ४५० तानुज्ज्वलयितुं भूयान् ३, १७३ तयो. प्रभावमाहात्म्यं २, १७ तान्याणो गृह्णतैवाथ १, २०६ तस्मात्सरवातिरेकन्ते १, १४५ तापसंरंभसंरक्ताक्षं २, १२७ तस्मादनुगृहानास्मान् ३, ३०६ ताभ्यामभ्येत्य वृत्तान्ते १, २५८ तस्मिन्वशे नरो राजा १, २५० ता विभाव्यानवद्याङ्गी ३, ४१७ तस्मिन् ज्ञाने ध्रुवं तेषा १, ४५ ता विष्णूप्रतिमां तच्च ३, ४४६ तस्मिन्काले स्वसचिवान् १, ७१ ता विष्णोः प्रतिमा वीक्ष्य ३, ४४४ तस्मिन्नृत्रे न जायेत १, १४३ ता वीक्ष्य लक्षणोपेतां ३, ४८५ तस्मिन्नवसरे बौद्धा १, १७७ तामा संभ्रममालक्ष्य २, १०१ तस्मिन्नन्तं गते भुक्त्वा ३, ९६ तासु तासु कुलस्त्रीषु १, ३२१ तस्मिन्नहनि भूभर्ता ३, २८६ तासु तासु स वापीषु २, १३० तस्मिन्प्रियमन्तको राज्ञि १, ९५ ता. संधुवेप्सितास्तेन ३, १९ तस्मिन्पुत्रगणान्नि १, २५२ तिर्यक्तया ते कपयो ३, ४४८ तस्मिन्प्रदाने ज्ञातेभ्यः १, ३०१ तिष्ठन्ति ये पशुपते. ३, १९९

अनुक्रमणिका १४३ ते तत्राभ्रंलिहाः योधा 3, 359 दम्पत्तिभ्यामियं ताभ्याम् 2, 12 ते तमुच्छुष्कमूल्लेप 3, 401 दरदेशान्तिके कृत्वा 1, 93 ते तुरुष्कान्वयोद्भूता 2, 170 दर्पज्वरोष्मभूपाल° 1, 279 ते ध्यातमात्राः संग्रामा 3, 451 दाक्षिण्यात्प्राणदस्यास्य 3, 524 तेन क्रमागतं राज्यं 1, 351 दाढ्यं कियदिदं तस्माद् 1, 10 तेन जातु परीक्षार्थ 1, 128 दानेन सुदिनं कुर्वन् 3, 247 तेन तस्य निमित्तेन 2, 149 दायादादिवलैर्नष्टा 1, 161 तेन षोडशभिलंशैः 1, 86 दिग्जयोपार्जितैर्वित्तैः 1, 202 तेन स्वमण्डलेऽखण्ड° 1, 94 दिनद्वयेन सार्धेन 1, 129 तेनाप्यमर्च्यमानं तत् 3, 447 दिवारात्रं हतप्राणि° 1, 292 तेनोपकूलं कालिन्द्याः 1, 60 दिव्यानुग्रहभागुप्रा° 1, 348 तैर्विभज्य प्रमोल्लेखम् 3, 235 दिव्येन पाणिस्पर्शेन 2, 411 तै यत्रोज्झटितास्तेन 1, 116 दिव्यैः प्रसूनैः संवीतो 3, 452 तै वादिनः पराजित्य 1, 178 दिष्ट्या सदैव वैमुख्यम् 2, 157 तै शशाङ्कानने दृष्ट्वा 1, 210 दीपानुज्ज्वलयेद्युक्तो 3, 176 तेऽस्माकं पतयश्चौरः 3, 23 दीर्घदुर्दिनप्राक्तं 2, 61 तैर्नन्तुं स्वभुवो निवारित° 1, 367 दुग्धान्धिधवलं तेन 1, 267 तैर्गुहाग्रे कृतास्कन्दो 1, 257 दुराशया धृतक्लेशं 3, 213 तैः खण्ड्यमानमुच्चण्डैः 3, 403 दुर्गाया प्रार्थितं राजन् 3, 83 त्यागिनो निष्कलङ्कस्य 3, 196 दृढिचर्पदा साकं 1, 354 त्यागे वा पौरुषे वापि 3, 254 दूरात्सैन्यमालोक्य 1, 298 त्रिगर्तानां भुवं जित्वा 3, 285 दृग्गोचरं पूर्वसूरि° 1, 14 त्रिलोक्यां रत्नसूः श्लाघ्या 1, 43 दृष्टदोषान्त्विति प्रासो 1, 365 त्रैलोक्यजीवितेनापि 3, 43 दृष्टं दृष्टं नृपोदन्तं 1, 9 त्वदादियो व्यधाज्जन्तून् 3, 57 दृष्टैः क्रीडानगोऽप्यत्र 3, 361 त्वयाप्यस्मद्धितार्थाय 1, 232 दृष्टैश्च पूर्वभूभर्तृ° 1, 15 [ थ ] देव दिव्यप्रभावेन 3, 20 थेदां च भीमादेवीं च 2, 135 देवः शतकपालेशेो 1, 335 [ द ] देवी जगाद तं भद्र 3, 421 दक्षिणस्मिन्नेव पारे 3, 358 देवी भेडगिरेः शृङ्गे 1, 35 दक्षिणां सान्तकामाशा 1, 290 देवी तां जानतोऽप्यस्य 3, 424 दग्धप्राण्यङ्गविगलद्° 1, 260 देवी वा भव कान्ता वा 3, 427 दग्धाङ्गारकदम्बके 2, 78 देव्यस्मदपचारेण 2, 31 दत्त्वाऽऽहारं लेदयी 1, 87 देव्या कुलतरोः कन्दः 1, 336 ददर्श पुनरुत्थानं° 3, 413 देव्या शारिकयाऽष्ट्रेन 3, 349 दधती रूपमाधुर्यं° 3, 418 देशोन्नत्यानुसारेण 3, 249