रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
२० रसरत्नसमुच्चये—
पारदीयविमर्शः—
हमारे प्राचीन आचार्यों ने जिस विषय के ऊपर गवेषणा करके जो कुछ सूत्र रूप में लिख दिया वह अक्षरशः सत्य है। उनके ज्ञान को आजकल के नवयुग के प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक अथक परिश्रम करने पर भी अभीतक नहीं प्राप्त कर सके हैं। बहुत से सत्यप्रिय वैज्ञानिकों ने हमारे आचार्यों के सूत्राशयों को प्रत्यक्षादिकप्रमाणों से स्वयं प्रत्यक्ष करके सिद्ध करलेने पर अन्तः करण से उनकी चरण चञ्चरीकता को स्वीकार की है तथा उनकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा भी की है। इसके कई एक उदाहरण हैं। हमारे ऋषि महर्षि आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक इन तीनों प्रकार के ज्ञान के यथार्थ विज्ञानी थे। इस विषय में प्रायः वर्तमान समय के सब देशके विद्वानों का एक मत है किन्तु उन प्राचीन महर्षियों की शिष्य परम्परा के भी पश्चात् उप शिष्य परम्परा ने उन के सूत्रों का इस प्रकार की अलङ्कारिकसंस्कृत भाषा में वर्णन किया कि जिसके फलस्वरूपमें आधुनिक संस्कृत साहित्य के विद्वानों ने उन सूत्रस्थ द्रव्यों की विज्ञानता को खोकर केवल आप्तोक्त ही मानकर शनैः शनैः अपने शेष विज्ञान सूर्य को भी अपने आप अज्ञानाम्बर से ढक दिया। उधर आजकल के पाश्चात्य विद्वानों ने हमारे ही महर्षियों के सूत्रों के तत्व को भलीभांति समझ कर उसी के आधार पर प्रत्येक पदार्थ का अन्वेषण करना प्रारम्भ कर दिया जिसका फल यह निकला कि गुरुओं
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ इति मनु० अ० २
को शिष्य बनाकर पाश्चात्य विद्वानों ने अपने मस्तक को ऊंचा उठा लिया। इतना होने पर भी आजकल हम लोग अपने महर्षियों के इन
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम्।
अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥
स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् ।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ ( इति मनु० अ० २ )
श्लोकप्रतिपादित वचनों का सर्वथा अनादर करके खोये हुए अपने ही विज्ञान भास्कर के उदय के लिये इतस्ततः मनसा, वाचा, कर्मणा इन में से किसी एक भी उद्योग को नहीं कर रहे हैं। अस्तु "सब दिन रहत न एक समान, इस लोकोक्ति के अनुसार अब दैव ही गाढ निद्रा में सोये हुए हम लोगों के ऊपर से अज्ञान रूपी चादर को खींच रहा है। इससे आशा है कि वह दिन अब शीघ्र ही आयगा जब कि हमारे विशाल भारत में विज्ञान दिवाकर प्रतिदिन उदित हुआ करेगा। हमारा वैद्यक व्यवसाय सम्पूर्ण जगत् की रक्षा के लिये ही है जैसे कि कहा है—नात्मार्थं नापिकामार्थमथ भूतदयाम्प्रति ।
प्रथमोऽध्यायः ।
२१
अत एव हमें सर्व प्रथम अपने ज्ञान को सर्वसमुन्नत बनाना ही चाहिए। तथा रसचिकित्सा में कौन पदार्थ कैसा है, कहां प्राप्त होता है, किस रूप में प्राप्त होता है, आदि अनेक ज्ञान की पूर्णावश्यकता है। इस लिये इस रसग्रन्थ में प्रत्येक पदार्थ की समाप्ति के पश्चात् उसका पूर्ण परिचय कराना मेरा परम कर्तव्य है।
पारद = मर्करी । Mercury.—इस धरातल (संसार) में जितने भी खनिज द्रव्य हैं वे सब पृथ्वी के भीतर अर्थात् भूगर्भ में उत्पन्न होते हैं। उन में पारद ही एक ऐसा खनिज है जो साधारण तापक्रम (Normal Temperature) पर द्रवरूप में प्राप्त होता है। पारद का स्वरूप पिघली हुई चांदी के समान होता है इसी कारण रसकामधेनु में इसको गलद्रूप्यनिभम् (अर्थात् द्रुतचांदी के सदृश) कहा है। तथा सम्भव है कि पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी इसको क्विक्-सिल्वर (quick silver) इसी हेतु से कहा है। पारद का सङ्केत (सिम्बोल Symbol) Hg. है तथा इसका परमाणुभार(१) (एटोमिक वेट Atomic weight.) २०० है तथा इसको तत्व(२) (एलीमेण्ट Element) माना है। इसका आपेक्षिक घनत्व(३) (Relative Density) १३०५९ है।
यह ३९° सें० पर जमता है अर्थात् इसका हिमाङ्क(४) Freezing Point ३९° सें० है तथा ३५९° सें० पर उबलता है अर्थात् इसका क्वथनाङ्क(५) (Boiling Point) ३५९° सें० है।
पारद की उपस्थिति—
पारद कभी कभी मुक्तावस्था में या स्वतन्त्र रूप से प्रकृति में अत्यल्प मात्रा में
(१) किसी तत्त्व के परमाणुभार को एकाङ्ग (unit) मान कर उसकी तुलना से दूसरे तत्त्वों के परमाणुभार के जो अङ्क प्राप्त होते हैं उन्हें 'परमाणुभार' (Atomic weight) कहते हैं। प्रा० र०
(२) जिन्हें रासायनिक दृष्टि से दो वा दो से अधिक पदार्थों में विच्छिन्न (पृथक्) नहीं कर सकते हैं ऐसे पदार्थों को 'तत्व' (Elements) कहते हैं। प्रा० र०
(३) जब एक पदार्थ के घनत्व की किसी दूसरे पदार्थ के घनत्व से तुलना की जाती है तब इसे आपेक्षिकघनत्व (Relative Density) कहते हैं तथा किसी पदार्थ के इकाई आयतन (Unit Volume) में कितनी मात्रा (Mass) विद्यमान है इसी को घनत्व (Density) कहते हैं। प्रा० र०
(४) जिस तापक्रम पर द्रव पदार्थ घन बनते हैं उसे 'हिमाङ्क' (Freezing Point) कहते हैं।
(५) जिस तापक्रम पर द्रव उबलने लगता है वह तापक्रम उस द्रव का 'क्वथनाङ्क' (Boiling Point) कहाता है। प्रा० र०
२२ रसरत्नसमुच्चये—
पाया जाता है। यह प्राचीन काल से हिङ्गुल (सिनबार Hgs) ही से अधिकतर निकाला जाता है। इसके अन्य रस ग्रन्थों में तथा इसी ग्रन्थ (रसरत्नसमुच्चय) में अनेक प्रमाण हैं यथा—
दरदं ( हिङ्गुलं ) पातने यन्त्रे पातयेत् सलिलाशये ।
सत्त्वं सूतकसङ्काशं जायते नात्र संशयः ॥ ( रसार्णव )
तं सूतं योजयेद्योगे सप्तकञ्चुकवर्जितम् ।
ज्वरादिहरणं सर्वरसेषु विनियोजयेत् ॥ ( रसदर्पण )
पतितो दरदे देशे गौरवाद्बहिवक्त्रतः ।
स रसो भूतले लीनस्तत्तद्देशनिवासिनः ।
तां मृदं पातनायन्त्रे क्षिप्त्वा सूतं हरन्ति च ॥ ( रसरत्नसमुच्चय )
ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण हिङ्गुलादुत्थितो रसः ।
हिङ्गुलोत्थः स्मृतश्चैव हिङ्गुलाकृष्ट उच्यते ॥ ( र० त० )
अथवा हिङ्गुलात् सूतं ग्राहयेत् तन्निगद्यते ।
जम्बीरनिम्बुनीरेण मर्दितो हिङ्गुलो दिनम् ॥
ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण ग्राह्यः स्यान्निर्मलो रसः ।
कञ्चुकैर्नागवङ्गाद्यैर्निर्मुक्तो रसकर्मणि
विना कर्माष्टकेनैव सूतोऽयं सर्वकर्मकृत् ॥ ( र० सा० सं० )
इन सब अवतरणों को पढ़ने से यह सिद्ध होता है कि पुराण काल ही से हिङ्गुल से विशेष रूप से पारद निकाला जाता है ।
भारत से इतर देशों मे भी हिङ्गुल ही से पारद निकाला जाता है । थियो फ्रास्टस ( Theo Phrastus ) नाम के विद्वान ने ईसा के पूर्व की ३०० शताब्दि के लगभग लिखा है कि ताम्रचूर्ण और हिङ्गुल को सिरके के साथ पीस कर उसे उड़ाकर पारद पृथक् करते थें । इसी प्रकार डायस्कोरोडीज ( Dioscorides ) नामक विद्वान् ने भी लौह चूर्ण के साथ हिङ्गुल मिलाकर उड़ाके पारद निकाला था । यही विधि ऊंचे दर्जे के हिङ्गुल से पारद निकालने के लिये कहीं २ अब तक भी काम में लाई जाती है ।
सोना चांदी बनाने वाले कीमियागर लोगों ने पारद पर अनेक प्रकार के परीक्षण किये तथा उन्हीं के अनुभव से पारद-मिश्रक (Amalgams) का ज्ञान व्यवहार में सर्वप्रथम प्रचलित हुआ। इसके पूर्व कालमें कुछ लोगोंकी धारणा थी कि लोहे अथवा पारद जैसी हीन धातुएं स्वर्ण या चांदी के रूप में परिणत हो सकती है। लोग ऐसा समझते थे की पारस मणि की सहायता से यह कार्य हो सकता है।
"पारस परसि कुधातु सुहाई"
प्रथमोऽध्यायः ।
प्रथमोऽध्यायः । २३
इसलिये इस पारस मणि के अन्वेषण करने के लिये कितने ही पुरुषों ने अपना समग्र जीवन दे दिया किन्तु वे उसको प्राप्त नहीं कर सके । धीरे धीरे इस निरर्थक खोज की ओर से लोगों ने मन को हटाकर ऐसी क्रियाओं के अन्वेषण में लगे जो लोहे वा पारे को चांदी या स्वर्ण में परिणत कर दे । कुछ लोग यह समझते थे कि मिश्र देश वालों को इस क्रिया का ज्ञान था जिससे वे हीन धातुओं को स्वर्ण सदृश सुन्दर धातुओं में परिणत कर देते थे । पाश्चात्य देशों में सबसे प्रथम सन् १६६६ ई० में पेरू (Peru) देश के हुवान्कावेलिका (Huancavelica) नामक स्थान में हिङ्गुल का अस्तित्व विदित हुआ और सन् १६३३ ई० में लोपेज़—सावेद्रा-बार्वा Lopez Saavedra Barba नामक व्यक्ति ने पारद निकालने के लिये अल्युडेल (Aludel मडकल़ों वालो) नामक भट्टी तैयार की। इसी भट्टी को १६४६ ई० में बुस्टामेण्ट (Bustamente) नाम के किसी रसायन शास्त्रवेत्ता ने स्पेन (Spain) देशीय पारदीयखनिज प्राप्ति के प्रसिद्ध अल्माडन (Almaden) स्थान की खानों में प्रचलित की पारद निकालने के लिये यह भट्टी दो शताब्दियों से भी अधिक समय तक उक्त दोनों देशों में प्रयुक्त होती रही । किन्तु अब नवीन उत्तम भट्टियों के बन जाने से इसका व्यवहार बन्द हो गया है ।
खनिज से पारद निकालने की विधि अत्यन्त सरल है । खनिज को खुले स्थान में फूंकते हैं जिससे हिङ्गुल का गन्धक सल्फर डाइआक्साइड (Sulphur Dioxide) में बदल जात है और पारद मुक्त हो जाता है । कभी २ हिङ्गुल को चूने के साथ मिलाकर बन्द रिटोर्ट में स्रावित करते हैं जिससे केलसियम सल्फाइड और सल्फेड बनता है तथा पारद मुक्त हो जाता है । विधिपूर्वक निकाले हुए पारद के अन्दर बहुत सी अशुद्धियां रह जाती हैं । तथा इस पारद के साथ बहुत से यन्त्रवाहित (Mechanically carried) अपद्रव्य मिले रहते हैं । इन में से कुछ तो केमोयास चमड़े के द्वारा छानने से दूर हो जाते हैं और कुछ यशद (zinc) वङ्ग (tin) सीस (Lead) सदृश पदार्थ मिले रहते हैं जो कि पारद का ऊर्ध्वादिक पातन करने से दूर हो जाते हैं । अशुद्ध पारद को तनु नाइट्रिक अम्ल (Dilut Nitric Acid) में घुलाने से अन्य धातुएं उसमें घुल जाती हैं तथा शुद्ध पारद को निकाल कर जल से धो के कपडे से छान लेना चाहिए ।
पारद की सर्व प्रथम प्राप्ति—
भूगर्भविज्ञों के मतानुसार संसार में पारद आर्कियन से क्वार्टनरी आयु प्रदर्शित करने वाले शिलान्यूहों में पाया गया है । यह आयु एक करोड़ पचहत्तर लाख वर्ष के लगभग मानी जाती है तथा पारद अनेक प्रकार के रङ्गरूप वाले विभिन्न जातीय जलज और आग्नेय पाषाणखण्डों में व्याप्त मिलता है। उदाहरण के लिये रेणु-
२४ रसरत्नसमुच्चये-
शिला ( Sand stone ), मृत्तिकापाषाण ( Shales ), सुधापाषाण ( lime-stone, ) स्फटिकशिला ( quartzite) आदि जलज और ज्वालामुखी की लावा आदि आग्नेय पाषाणों के नाम लिखे जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त उक्त उभय गुणधर्मरहित रूपान्तरितपाषाणखण्डों (Schists) में भी यह पाया जाता है, किन्तु अधिकतर आग्नेय पाषाणखण्डों के ही समीप मिलता है।
पारदीय खनिजों के जमाव का देखने से यह भी विदित होता है कि भूगर्भ में जब आग्नेय पाषाण क्रमशः शीतल होते हुए अपनी द्रवावस्था से घनावस्था में परिणत होने लगे उस समय उड़नशील खनिज जो कि उनके भीतरी भाग में विद्यमान थे वे वाष्परूप में उड़कर ऊपर के समीपवर्ती पाषाण खण्डों की दरारों में जमा हो गये । उनमें पारदीय खनिज भी अन्यतम है। सम्भवतः इसी कारण उष्ण जल के स्रोतों के समीप में पारद आजकल भी पाया जाता है।
अमेरिका के प्रसिद्धभूगर्भविज्ञ रेन्ससम ( Ransome ) और स्पर ( Spurr ) नाम के विद्वानों का विचार है कि पारद सदा ज्वालामुखी आग्नेय पाषाणों के सिलसिले में ही पाया जाता है, क्योंकि इस का अस्तित्व अधिकांश में अर्वाचीन ज्वालामुखी पाषाणों में ही पाया गया है। किन्तु इस सिद्धान्त का स्थित करने में अपवाद यह है कि स्पेन देश की बड़ाखानें जो अल्माडन नामक स्थान में विद्यमान हैं वे भूगर्भकाल के निर्णयानुसार अत्यन्त प्राचीन हैं और उनमें पारद् १३०० फीट की गहराई पर पाया जाता है। इसी प्रकार अमेरिका प्रदेश की केलिफोनिया ( California ), न्यू इड्रिया (New Idria) और न्यू अल्माडन ( New Almaden ) की खाने हैं जिनका सम्बन्ध ज्वालामुखी के उद्गम से नहीं है। इन खानों में २२०० फीट की गहराई पर पारद् मिलता है।
इस प्रकार अनेक मतभेद रहते हुए भी इस बात पर सब भूगर्भ विज्ञों का एकमत है कि पारद भूगर्भ के अन्तराल से उष्ण जल के साथ ही बाहर पृथ्वी पर प्रगट हुआ है और इसीलिये यह अपने खनिजों के साथ भूभाग के ऊपरी तल में ही अधिकतर जमा हुआ मिलता है। जिस उष्ण जल के साथ पारद निकलता है वह जल चाहे वर्षा द्वारा पृथ्वी के अन्तराल के उष्णभाग में जाकर पुनः उष्णस्रोत के रूप में बाहर निकला हो, चाहे पातालिक आग्नेय पाषाणों से निकलकर बाहर आया हो किन्तु यह अनेक प्रमाणों से सिद्ध है कि पारद् उष्ण जल के साथ ही क्षारीय घोलों में घुला हुआ पृथ्वी की ऊपरी दरारों में या खुले भूभाग में आकर प्राकृतिक पारद और पारदीय खनिज हिङ्गुल आदि के रूप में जमा हुआ है।
इसी (रसरत्नसमुच्चय) ग्रन्थ में पारद के उत्पत्ति के विषय में निम्न विचार प्रगट किये गये हैं।
प्रथमोऽध्यायः । २४
प्रथमोऽध्यायः । २४
शैलेऽस्मिञ्छिवयोः प्रीत्या परस्परजिगीषया ।
सम्पवृत्ते च सम्भोगे त्रिलोकक्षोभकारिणि ॥
विनिवारयितुं वह्निः सम्भोगं प्रेषितः सुरैः ।
कपोतरूपिणं प्राप्तं हिमवत्कन्दरेऽनलम् ॥
अपक्षिभावसंक्षुब्धं स्मरलीलाविलोकिनम् ।
तं दृष्ट्वा लज्जितः शम्भुर्विरतः सुरतात्तदा ॥
प्रच्युतश्चरमो धातुर्गृहीतः शूलपाणिना ।
प्रक्षिप्तो वदने वह्नेर्गङ्गायामपि सोऽपतत् ॥
वह्निः क्षिप्तस्तया सोऽपि परिदंदह्यमानया ।
सञ्जातास्तन्मलाद्धानाद्धातवः सिद्धिदायकाः ॥
यावदग्निमुखाद्रेतो न्यपतद्भूभुवि सर्वतः ।
शतयोजननिम्नास्ते जाताः कूपास्तु पञ्च च ।
तदाप्रभृति कूपस्थं तद्रेतः पञ्चधाऽभवत् ॥
( रसरत्नसमुच्चय पूर्वखण्ड प्र० अध्याय )
इन पारदोत्पत्ति विषयक श्लोकों की प्राचीनानुमत शब्दानुकूल व्याख्या ( स्पष्ट भावार्थ ) मैने प्रकरण में लिख दी है। किन्तु प्राचीनपारदोत्पत्ति की तुलना यदि आधुनिक विज्ञान के अनुसार करनी हो तो निम्न रूप से करनी चाहिए।
इस अवतरण का तात्त्विक भावार्थ यह विदित होता है कि हिमालय में जब जड़ और चैतन्य शक्ति के अन्दर संघर्षंण होता है तब पृथ्वी के अन्तराल में आग्नेय पदार्थ ज्वालामुखों के रूपमें प्रगट होने लगते हैं। उस समय त्रैलोक्य में क्षोभ उत्पन्न करने वाला भूकम्प पैदा होता है। संसार के हिम प्रदेशों में ही प्रायः ज्वालामुखी प्रगट होते हैं। अर्थात् "शैलेऽस्मिन्" आदि प्रथम श्लोक में इसी अभिप्राय का रूपक है। जहां भूकम्प के उपरान्त ज्वालामुखी का उद्गम होता है वहां पर पृथ्वी शतधा विदीर्ण हो जाती है जिसमें से प्रथम धूम्र वर्ण की गैस निकलती है। यह वृत्तान्त प्रायः (कपोतरूपिणं प्राप्तं हिमवत् कन्दरे स्थितम्) इस रूपकालङ्कार से दिखाया है। धुएं के निकलने के पश्चात् अग्नि की ज्वाला निकलने लगती है यह (अपक्षिभावसंक्षुब्धम् ) आदि दूसरे श्लोक का तात्पर्य हो सकता है। जब ज्वालामुखी का उद्गम हो जाता है तब भूकम्प होना बन्द हो जाता है इस प्रकार का अभिप्राय "तं दृष्ट्वा लज्जितः शम्भु विरतः सुरतात्तदा" इस पद्य के साथ मिल सकता है।
जब ज्वाला मुखो के आग्नेय पाषाण क्रमशः शीतल होने लगते हैं तब उसके अन्तराल के उड़नशील खनिज उष्ण जल के साथ मिल कर वाष्परूप में ऊपर आकर शीत होने पर जम जाते हैं। इसो बात के द्योतक अन्य दो श्लोक हैं। जो
२६ रसरत्नसमुच्चये—
खनिज इस प्रकार निकल कर जमा होते हैं उनके जमने का क्रम डा० सी० जी केलिस प्रोफेसर इम्पीरियल कालेज लण्डन के मतानुसार यह है—सब के नीचे पातालिक आग्नेय पाषाण ग्रेनाइट ( Granite ) और उसके ऊपरी भाग में एक ओर जलज, पारद, तुरमलीन, पुखराज, वंग और टगस्टन रहते हैं तथा दूसरी ओर भारी धातु जैसे ताम्र, नाग, यशद, सुवर्ण, रजत, और रौप्यमाक्षिक आदि रहते हैं। इसका नक़्शा वे इस प्रकार बनाते हैं।
पारद के खनिज
—तुरमलीन
पुखराज
वंग
टंगस्टन
ताम्र
नाग
यशद
सुवर्ण
चांदी
माक्षिक
जो लोग ऐसी खानों को खनते हैं वे प्रायः एक के बाद दूसरे खनिज को निकाल कर लाभ उठाते हैं; सम्भवतः इसी का मूल ग्रन्थ के पाठ में (सञ्जातास्तन्मलाद्धाता- द्धातवः सिद्धिदायकाः) इस प्रकारका वर्णन है। यह भी निश्चित है कि जहां पर पारद की खाने हैं वहां पर किसी किसी स्थान पर नल के आकार के कूप भी मिलते हैं। यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका में भी पारद के खनिजों में जलाकार कूप मिलते हैं जिनकी समानता “शतयोजननिम्नास्ते (विस्तीर्णाः) जाताः कूपास्तु पञ्च च” इस प्राचीनोक्ति में अक्षरशः सत्य मिलती जुलती है। उन देशों में पारद के कूप २४५० फीट तक गहरे हैं। नीचे के अङ्ग्रेजी अवतरण से ज्ञात होता है कि भूगर्भ के अन्दर सौ मील की खुदाई पारद निकालने की हुई है। प्राचीन पारदोत्पत्ति के अन्दर पांच कूपों का उल्लेख है परन्तु वहां पर इस समय अठारह कूप ( Shafts ) हैं जिनसे पारद निकाला जाता है। यह सम्भव है कि उस समय में पाञ्च कूपों का ही पता लगा हो।
ITALY
"In the Montebuono mine, according to R. Rosenlecher Miocene sands overlie and conceal Nummulitic Limestone. At a depth of 100 ft. a great vertical crevice about 6 ft. wide was struck, filled with Miocene sands and clays, impregnated with cinnabar in an extremely fine state of division. In the immediately neighbouring
प्रथमोऽध्यायः । [२७]
rock are several funnel-shaped cavities, also filled with metalliferous sands and clays, the proportion of cinnabar increasing with the depth. These funnel-shaped cavities appear to bear some analogy to the vertical pipes or holes (Trajas) in gypsum at the mercury mines of Huitzuco Guerrero, Mexico. Broadly speaking, the whole deposit forms a large funnel, position of which is marked on the surface by distinct depression.”
• UNITED STATES.
“Santa Clara County—The new Almaden group of mines was discovered in Santa Clara County by two Mexicans in 1824, but the ore was not recognized as cinnabar until 1845. The large output of mercury from the mine has already been mentioned. Altogether 18 shafts have been sunk, and there are nearly 100 miles of under-ground workings, a large proportion of which have of course, caved in. The greatest depth in 1917 was 2,450 ft. below the top of mine Hill (1, 600 ft. altitude) so it is the deepest and most extensive mercury mine in the world.”
Monographs on Mineral Resources, Imperial Institute London
Mercury Ores. By Edward Halse A. R. S. M. page 45 & 75.
इन अवतरणों का प्राचीन मत के साथ मिलान करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीनों का ज्ञान भी ठीक आज कल के ज्ञान के अनुसार पूर्ण वैज्ञानिक ढङ्ग ही का था । किन्तु वह अलङ्कारिक तथा तान्त्रिक भाषा में होने के कारण विना प्रत्यक्ष किये ठीक समझ में नहीं आ सकता है। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि वैद्यवर्ग इस पारद के वैज्ञानिक वर्णन को पढ़ कर इस
“एतां रससमुत्पत्तिं यो जानाति स धार्मिकः”
आचार्योक्ति का अवश्य ही पालन करेंगे।
अब नीचे जिन जिन खनिजों से पारद निकाला जाता है उन उन खनिजों का परिगणन किया जाता है।
पारद निकालने योग्य खनिज ।
( १ ) हिङ्गुल, हंसपाद (सिनावार Cinnabar Hgs) इसके भेद उत्पत्ति तथा निर्माण और प्राप्ति का विस्तृत वर्णन आगे यथा प्रसङ्ग किया जायगा ।
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( २ ) चर्मार: Metacinnabar ( Hgs )
यह कृष्णवर्ण का खनिज है। इसका रासायनिक सङ्घठन रक्त हिङ्गुल (जपाकुसुम-सङ्काश = Bright Red Sulphide) का ही सा है। यह मृत्तिका रूप में और रवों के रूप में पाया जाता है। यह मृत्तिका रूप में अधिक पाया जाता है। रवों के रूप में इसकी कठोरता ३ है तथा विशिष्ट गुरुत्व (Specific gravity. ७०८१ होता है। इसको चीनी मिट्टी की कसौटी पर रगड़ने से काली लकीर खिचती है। देखने में यह धातु की सी द्युतिवाला होता है। मृत्तिकाकृति में विशिष्ट गुरुत्व कुछ कम होता है इसी को रस कामधेनु नामक रसग्रन्थ में "चर्मारः कृष्णरूपः स्यात्" इस रूप में वर्णित किया गया है।
३ हीरकद्युति = केलोमल ( Calomel Hg 2 Cl 2 )
यह हीरे के समान द्युति ( कान्ति ) वाला ( 'हीरकद्युति सङ्काशम्, रस कामधेनु ) रवेदार पारद का खनिज है। इसे मरक्युरस क्लोराइड या केलोमल कहते हैं।
प्राप्ति— यह प्राकृतिक दशा में स्पेन देश के इड्रिया ( Idria ) अल्माडन ( Almaden ) नामक स्थान में स्वल्प मात्रा में पाया जाता है। यह रवों ( कण Crystals ) के रूप में ही प्रायः मिलता है। इसके रवे बहुत ही जटिल सङ्घठन के होते हैं। इसका रङ्ग श्वेत या पाण्डु होता है। चीनी मिट्टी की कसौटी पर रगड़ने से अल्पपीताभ-श्वेत लकीर खिंचती है। इसके रवे की चमक हीरे की सी होती है। इसका विशिष्ट गुरुत्व ६०५ होता है। भारतीय रसशास्त्रियों को इस पारदीय खनिज का पूर्ण ज्ञान था। रस कामधेनु ग्रन्थ में इसका जो वर्णन लिखा है वह बहुत ही सुन्दर तथा यथार्थ है। उसमें संक्षेप से इसके विषय की प्रायः सभी बातें आगई हैं।
"हीरकद्युतिसङ्काशं प्रमाणाद्धीरकात् क्वचित्" ( रसकामधेनु पृ० ५७३ )
इस खनिज का निम्न अङ्ग्रेजी वर्णन प्राचीन मत के साथ बहुत कुछ मिलता जुलता है।
Calomel ( Hg 2 Cl 2 )
This is Mercurous chloride and is found at Idria and at Almaden as one of the minor mercury minerals. It occurs in crystal so often highly complex of the tetragonal system.
Lustre adamantine (हीरकद्युतिसङ्काशम्) Fracture conchoidal (प्रमाणाद्धीरकात्क्वचित्) Colour white, or yellowish grey: Streak Pale, yellowish-White, hardness 1 to 2 specific gravity 6.5 Loc. Cit. Page.
इस अवतरण के शब्द जब रस कामधेनु के अवतरण के साथ मिलाये जाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन रस शास्त्रियों ने भली प्रकार खान पर बैठ कर नमूना
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प्रथमोऽध्यायः । २९
सामने रखकर खोज के साथ सारा वृत्त गागर में सागर की तरह भर दिया है। क्वचित् शब्द का प्रयोग अल्पमात्रा में मिलने के लिये और हीरकद्युति लस्टर एण्ड मॅन्टाइन तथा प्रमाणाद्धीरकात् यह वाक्य फ्रेक्चर कोन्कोइडल के लिये ऐसा जंचता है कि मानो पर्याय शब्द लिख दिये हैं। ऐसा वर्णन पढ़कर किस वैद्य को अभिमान न होगा कि हमारा शास्त्र वैसा ही वैज्ञानिक है जैसा आजकल के नवशिक्षित लोग वैज्ञानिक होने का दावा करते हैं। इस खनिज के कम मिलने से और इसकी उपयोगिता औषधि रूपमें अधिक देखकर सर्व प्रथम भारतीय रस शास्त्रियों ने रस कर्पूर के नाम से इसका रासायनिक विधि से निर्माण कर लिया। इसके बड़े कारखाने आज भी सूरत (गुजरात) में विद्यमान हैं। जहां पर प्रति वर्ष दो ढाई सौ मन माल तैयार होकर सारे देश में विक्रयार्थ जाता है। इसका भाव १२) से २४) प्रति सेर के लग भग रहता है। इसका भाव सदा पारद के भाव पर निर्भर रहता है। मद्रास, और हैदराबाद दक्षिण में भी इसके बनाने के कारखाने हैं। वहां प्रायः सभी लोग शीत के दिनों में इसका सेवन करते हैं। ये लोग सूरत का बना हुआ रस कर्पूर लेकर फिर से आतिशी शीशी में भर कर बालुकायन्त्र से अग्नि देकर उसे उड़ाकर पपड़ी की शक्ल में तैयार करते हैं और उसे शुद्ध समझते हैं। इन कारखानों में रस कर्पूर और हिङ्गुल बनाने वाले खास खास आदमी रहते हैं। उनका यह खानदानी रोजगार समझा जाता है। वे लोग बारी बारी से इसे बनाकर बेचते हैं। एक एक भठ्ठी में दो दो ढाई ढाई मन का घान उतारते हैं। ये घान पिण्डाकार बारीक चमकीले रवों के सम्मिलित कणों का समुदाय होता है। हाथ से दबाने पर इनका चूर्ण बारीक बारीक कणों में विभक्त हो जाता है।
रस कर्पूर की प्राचीन निर्माण विधि ।
शुद्धसूतसमं कुर्यात् प्रत्येकं गैरिकं सुधीः ।
इष्टिकां खटिकां तद्वत्स्फटिकां सिन्धुजन्म च ॥
वल्मीकं क्षारलवणं भाण्डरञ्जकमृत्तिकाम् ।
सर्वाण्येतानि सञ्चूर्ण्य वाससा चापि शोधयेत् ॥
एभिश्शूर्णैर्युतं सूतं यावद्यामं विमर्दयेत् ।
तच्चूर्णसहितं सूतं स्थालीमध्ये परिक्षिपेत् ॥
तस्याः स्थाल्या मुखे स्थालीमपरां धारयेत्समाम् ।
सङ्खकुट्टितमृदा मुद्रयेदनयोर्मुखम् ॥
संशोष्य मुद्रयेद् भूयो भूयः संशोष्य मुद्रयेत् ।
सम्यक् विशोष्य मुद्रां तां स्थालीं चुल्ल्यां विधारयेत् ॥
अग्निं निरन्तरं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम् ।
अङ्गारोपरि तद्यन्त्रं रक्षेद्यत्नादहर्निशम् ॥
३० रसरत्नसमुच्चये—
शनैरुद्घाटयेद्यन्त्रमूर्द्ध्वस्थालीगतं रसम् ।
कर्पूरवत्सुविमलं गृह्णीयाद् गुणवत्तरम् ॥ ( इति भावप्रकाश )
भावार्थ— शुद्ध पारद, गैरिक, ईंट का चूर्ण, खरिया मिट्टी, फिटकरी, सेंधा नमक, हिरमिजी (एक प्रकार की लाल मिट्टी जो मिट्टी के बर्तन रंगने में व्यवहृत होती है सब द्रव्य समान लेकर पारद के अतिरिक्त अन्य सब द्रव्यों को पीस कर कपड़छान करके पारद के साथ मिलाकर एक प्रहर (३ घण्टे) तक घोटें। तथा घोटे हुए द्रव्यों को एक मजबूत हाण्डी में रखें और उस पर ठीक जमने वाली दूसरी हाण्डी मुंह की ओर से ढक दें। बाद में कपड़ा और मिट्टी कूटकर मिलाकर जल में घोल के उससे उक्त दोनों इंडियों के मुख बन्द करके बाद में सुखावं । सूखने पर फिर कपरोटी कर दें। सन्धि इस प्रकार बन्द करें कि जिससे पारद वाष्पी भवन के समय निकल न सके । सन्धि लेप के भली प्रकार सूखने पर निरन्तर चार दिन तथा चार रात तक बबूल की लकड़ी की आंच दें । स्वाङ्ग शीतल होने पर सावधानी से सन्धि खोलकर ऊपर की हंडी में कर्पूर के जैसे लगे हुए द्रव्य को धीरे से निकाल लें। यह फिरङ्ग (सिफलिस) उपदंश आदि के लिये उत्तम योग है ।
रस कर्पूर की नव्य निर्माणविधि—
आधुनिक विधि में केवल पारद और खाने का साधारण नमक यथावश्यक मात्रा में लेकर और उड़ाकर रसकर्पूर बनाते हैं । आंच देने की प्राचीन विधि ही कुछ परिवर्तन के साथ व्यवहृत की जाती है । इसमें पारद १०० भाग के साथ नमक की गेस क्लोरिन १८ भाग मिली रहती है । इसको पाश्चात्य चिकित्सक औषधि में केलोमल के नाम से व्यवहार करते हैं इसे सब—क्लोराइड ऑफ मर्करी भी कहते हैं । इसका प्राचीन नाम रसकर्पूर था किन्तु आज कल 'पर—क्लोराइड आफ़ मर्करी' के लिये यह नाम व्यवहृत होता है, जिसमें पारद के साथ क्लोरीन की मात्रा ३५॥ होती है और इसका व्यवहार भी उपदंश, फिरङ्ग आदि में बहुतायत से होता है। यह बहुत उपयोगी औषध है । मेरे विचार में दोनों की निर्माणविधि साधारण दृष्टि से समान होने के कारण रसकर्पूर संज्ञा दोनों में व्यवहृत होती है; किन्तु यह भूल है। दोनों रासायनिक दृष्टि से भिन्न भिन्न गुण धर्म वाले द्रव्य हैं और एक दूसरे के स्थान पर कभी किसी का व्यवहार नहीं करना चाहिये । इनका नाम भी स्पष्ट रीति से अलग अलग कर देने आवश्यक हैं। आधुनिक रसकर्पूर 'पर क्लोराइट आफ़ मर्करी' या, कोरोसिब सब्लीमेण्ट, के लिये रसकर्पूर और केलोमल ( सब क्लोराइड आफ़मर्करी ) के लिये सुधानिधिरस या रसपुष्प नाम व्यवहार में लाने चाहिये, जिससे दोनों द्रव्यों का भ्रम दूर हो जावे और औषधि के व्यवहार में हानि न उठानी पड़े । इन नामों का उपयोग "रसतरङ्गिणी" कार ने किया है।
प्रथमोऽध्यायः । | ३१
रसपुष्पं रससुमं कुसुमो रसपूर्वकम् ।
मतं निरूच्यते कैश्चित्सुधानिर्झरसाह्वया ॥
विशेष के लिये पृष्ठ नं. ३९ से ४८ तक रस्तरङ्गिणी पढें ।
( ४ ) पारद का चौथा खनिज प्राकृतिक पारद ( Native Mercury.) है ।
यह बहुत अल्पमात्रा में प्राप्त होता है । कभी कभी इसके कण खनिज हिङ्गुल के साथ बिखरे हुए पाये जाते हैं । यह पारद प्राप्ति का गौण खनिज समझा जाता है तथा इटली और स्पेन की खानों में यह मिलता है ।
( ५ ) पारद रजत मिश्रक (Silver Amalgam. )
यह पारद का खनिज प्रकृति में पारद और रजत के भिन्न भिन्न परिणाम में बना पाया जाता है । यह अधिकतर चीनी ( Chile ) देश की खानों में पाया जाता है । इन खानों के अतिरिक्त जर्मनी स्पेन और यूनाईटेड स्टेट्स की खानों में भी पाया जाता है । यह पर्पटी जैसा है ।
( ६ ) टेट्राहीड्राइट या मर्क्युरियल फेहलोर ( Tetrahedrite or Mercurial Fahlore. )
इस खनिज में से भी व्यापार के योग्य पारद निकल सकता है किन्तु यह वास्तव में ताम्र का ही खनिज है और बहुत अल्प मात्रा में पाया जाता है । जर्मनी के बोसनिया ( Bosnia ) और पेलेटिनेट ( Palatinate ) नामक स्थानों में ही विशेषतः मिलता है ।
परीक्षा
ऊपर लिखे हुए किसी भी खनिज को पारद के लिये परीक्षा कर सकते हैं । एक कांच की परीक्षा नलिका ( Tastube ) में उक्त पारदीय खनिजों में से कोई भी (जिसकी परीक्षा करनी हो) पारद खनिज का चूर्ण तथा चूना या खाने का सोडा भर कर स्पिरिट लेम्प पर तपाने से नलिका के शीतल प्रदेश में पारद के कण जमे हुए नजर आवेंगे । यदि पारद का खनिज पारद और गन्धक का यौगिक ( हिङ्गुल ) हुवा तो नलिका के शीतल प्रदेश में लाल हिङ्गुल और पारद दोनों दिखाई देंगे तथा जलते हुए गन्धक की तीव्र गन्ध भी प्रतीत होगी ।
पारद प्राप्ति के कुछ गौण खनिज
उक्त खनिजों के अतिरिक्त अल्पमात्रा में प्राप्त होने वाले कुछ पारदीय खनिज ऐसे भी हैं जो किसी स्थान विशेष में ही प्राप्त होते हैं और उन से भी पारद निकाला जा सकता है ।
उनके निम्न नाम हैं ।
( १ ) लिविङ्गस्टोनाइट ( Livingstoneite 2 Sb₂ S₃ Hg S )
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यह हिङ्गुल और एण्टोमनी का फौलाद सा कृष्ण-वर्ण यौगिक है इसमें धातु की सी द्युति होती है। घिसने पर लाल लकीर खिंचती है। यह रवेदार वल्मीक शिखराकार पिंड सा होता है। कठोरता २, विशिष्ट गुरुत्व ५. ८१ होता है। मेक्सिको देश का पारद निकालने का यह मुख्य खनिज है। वहां पर चिरकाल तक इसकी खान का कार्य होता रहा है।
यह गन्धक और गोदन्ती के साथ भी पाया जाता है। इसका वर्णन रसरत्नसमुच्चय में लिखे "स्रोतोञ्जन" के साथ बहुत मिलता है-
यथा-वल्मीकशिखराकारं भङ्गे नीलोत्पलद्युति ।
घृष्टं तु गैरिकच्छायं स्रोतोऽजं लक्षयेद् ध्रुवम् ॥ ( र० र० स० प्र० अ० )
अर्थात् दीमक की बामी जैसा शिखराकार (कोलुमनरमॅस्सिव फार्म columnar Massive Form. ) तथा तोड़ने पर नील कमल के समान वर्ण का दिखाई दे तथा कसौटी पर घिसने से गैरिक की सी लाल लकीर पड़े वह अवश्य स्रोतोञ्जन है। साफ फौलाद का रङ्ग नील कमल के पत्ते के वर्ण के समान होता है। इस यौगिक में सुरमा है इस लिये इसको स्रोतोञ्जन मानना ठीक है।
( २ ) बासनाहट ( Barcenite )
यह बहुत जटिल मात्रा में पाया जाने वाला खनिज है। इसका प्रादुर्भाव उपर्युक्त लिविंग्स्टोनाइट से ही होता है। केवल मेक्सिको देश के हिजुको (Huitzuco) नामक स्थान पर ही प्राप्त होता है। सन् १८७८ ई० में जे० डब्ल्यु० मेलेट ( J. W. Mallet ) ने मेरियानो बार्सीना ( Merisno Baercena ) के नाम पर ही इस खनिज का नामकरण किया है। मेक्सिकल भूगर्भ-विज्ञों का मत है कि यह खनिज हिंगुल और एन्टिमनिऑक्साइड ( Antimony oxide Sb₂O₃ ) का यौगिक है। यह मृत्तिका के ढेले के आकार का कृष्ण वर्ण होता है। कसौटी पर घिसने से राख ( Ash grey ) और कुछ हरापन लिये हुए रंग की लकीर खिंचती है। कठोरत ६. ५, विशिष्ट गुरुत्व ५. ३४३.
( ३ ) ग्वाडालकाज़़ाराइट ( Guadalcazarite )
यह खनिज प्रायः कृष्ण हिंगुल की ही जाति का है। इस में थोड़ा सा यशद ( २ से ४% ) और अत्यल्प मात्रा में सेलेनियम् (Selenium १%) मिला रहता है ! ( यह धातु गन्धक का सा होता है और आज कल वायरलेस टेलिग्राफी में फोटो भेजने के कार्य में उपयोगी है) इसके सहयोगी खनिज रक्त हिंगुल, बेराइटस (Barytes) और स्फटिक ( quartz ) हैं। यह मेक्सिको प्रान्त के ग्वाडलकाजार ( Guadalcazar ) स्थान में प्राप्त होने के कारण इस का नाम ग्राम नाम पर ही अन्य खनिजों से पृथक् समझने के लिये रख दिया गया है।
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अब पारद के वे खनिज लिखे जाते हैं जो अत्यल्प मात्रा में पाये जाते हैं किन्तु ब्रिवस्टर कौन्टी (Brewster county), टेक्सास (Texas) में इतनी मात्रा में मिलते हैं कि जिनसे खान का व्यवसाय किया जा सकता है—
( १ ) टेर्लिङ्ग्वाइट (Terlinguaite Hg 2 clo) यह खनिज पारद, क्लोरिन और ओक्सिजन का यौगिक (Oxychloride of Mercury) है। यह गन्धक के से पीले रवों में पाया जाता है। वायु में रखने से इसका रङ्ग पीले से गहरा जैतून जैसा हरा (Olive Green) हो जाता है। इसकी कठोरता २ से ३ तक तथा विशिष्ट गुरुत्व ८.७२५. है।
( २ ) इग्लेस्टोनाइट (Eglestonite Hg 4 Cl 2 O) यह छोटे २ भूरे पीले रङ्ग के रवों में पाया जाता है। इसके कणों में रोजन (सूखा गन्धा विरोजा) की सी द्युति नजर आती है। यह धूप में रखने से शीघ्र काला पड़ जाता है। इसकी कठोरता २ से ३ तक तथा विशिष्ट गुरुत्व ८.३२७.।
( ३ ) क्लेनाइट (Kleinite MercuryAmmoniumchloride.) यह पारद और नौसादर का प्राकृतिक यौगिक है। इसके रवे गन्धक जैसे पीले होते हैं और उनमें विकृत स्थानों पर नारंगी के वर्ण के दाग होते हैं। इसकी कठोरता ३ से ४ तक तथा विशिष्ट गुरुत्व ७.९८. है। यह भी टेर्लिङ्ग्वाइट के साथ ही पाया जाता है।
( ४ ) मोजेसाइट (Mosesite) यह खनिज भी प्राकृतिक पारद और नौसादर का यौगिक है। एवं टेर्लिङ्ग्वाइट के साथ ही पाया जाता है।
( ५ ) मान्ट्रोयडाइट (Montroydite) यह नारङ्गी के से लाल रवों में पाया जाता है जिनमें कांच की सी चमक रहती है। इसकी कठोरता २ से भी कम है। यह खनिज उपर्युक्त चारों खनिजों के साथ पाया जाता है। उक्त पांचों खनिज रस शास्त्रोक्त “सुपीतः शुकतुण्डकः” इस जाति के पारदीय खनिजों के साथ समता रखते हैं। ये गन्धक से पीले और नारंगी से लाल वर्ण के होते हैं। सभी ये खनिज पारद प्राप्ति के साधन हैं। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी पारदीय खनिज हैं जो बहुत ही अत्यल्पाल्प मात्रा में पाये जाते हैं। उनके नाम ये हैं-
( १ ) टिमेनाइट (Tiemanite Hg Se.) यह सिलेनियं और पारद का खनिज है।
( २ ) ओनोफ्राइट (onofrite HgS, Se.) यह गन्धक, सिलेनियं और पारद का यौगिक है।
( ३ ) कोलोरेडोआइट (Coloradoite Hg Te.) यह टेलुरियं नामक खनिज और पारद का यौगिक है।
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-रसरत्नसमुच्चये-
( ४ ) लेहर बेकाइट ( Lehrbachite a Selenide of Lead and mercury ) यह सेलेनाइड, सीसा ( नाग Lead ) और पारद का यौगिक है ।
( ५ ) आयोडोराइट ( Iodyrite ) यह अत्यल्प मात्रा में चीली ( Chile ) नामक स्थान पर आयोडाइड, रजत, और पारद का यौगिक पाया जाता है । आयुर्वेद के रस-शास्त्रों में हिंगुल के शीर्षक में जो वर्णन मिलता है वह समस्त पारद के खनिजों के विषय में समझना चाहिये । पारद के मुख्य खनिज तो स्पष्ट रूप से लिख दिये हैं और गौण खनिज उन्हीं के अन्तर्गत करने का प्रयत्न किया गया है । आज कल भी प्रधान खनिजों से ही पारद निकालने का व्यवसाय चलता है । शेष खनिज किसी देशविशेष के स्थानविशेष में मिलते हैं । उनका उपयोग पारद निकालने के लिये कभी २ किया जाता रहा है ।
इसका वर्णन रस शास्त्रियों ने एक श्लोक के अर्धभाग में कर दिया है ।
“पिण्डरूपमिदं साक्षात् दृश्यते दृष्टि सौख्यदम्।” ( रसकामधेनु पृ० २७३ )
इन सब अवतरणों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राप्य रसग्रन्थों में हिंगुल के वर्णन में जितना भी साहित्य मिलता है वह सब ठीक है, केवल ग्रन्थ संग्राहात्मक होने के कारण सिलसिले वार खनिजों का स्वरूप समझना कठिन हो गया है । तथापि जितनी सामग्री उपलब्ध है उससे यह निर्णय सहज में निकाला जा सकता है कि प्राचीन भारतीय रस-शास्त्रियों को पारद प्राप्ति के प्रायः सारे खनिज विदित थे ।
उन्होंने उनका इतना ही वर्णन किया है कि जितना औषधि निर्माता के ज्ञान के लिये आवश्यक है । आधुनिक काल में भी औषधियों के गुणधर्म बतलाने वाली पुस्तकों ( मेटेरिया मेडिका आदि ) में औषधि निर्माणोपयोगी खनिजों का वर्णन संक्षेप में दिया गया है । परन्तु खनिज सम्बन्धी वैज्ञानिक ग्रन्थों में बहुत विस्तार के साथ सूक्ष्मातिसूक्ष्म वर्णन पाया जाता है । सम्भवतः इसी प्रकार यहां के खनिज शास्त्रों में भी विशद वर्णन रहा हो पर दैव दुर्विपाक से आज कल उपलब्ध नहीं है ।
रस शास्त्रियों ने औषधोपयोगी खनिजों का संक्षेप में परिचय देकर उनके शोधन मारण और औषधि गुण धर्म पर विशेष प्रकाश डालने का प्रयास किया है । वैद्यों का यह अभिमान ठीक हो सकता है कि गत भारतीय संस्कृति के समय में जब देश की उन्नत दशा रही हो, सर्वत्र ज्ञान प्रसार करने का कार्य यहाँ के विद्वान् करते रहे हों, पर आज कल की पारतन्त्र्य दशा में उक्त अभिमान छोड़कर रसशास्त्रोक्त खनिजों का वर्तमान कालिक उपलब्ध ज्ञान प्राप्त करना वैद्य मात्र के लिये परमावश्यक है । क्योंकि जो औषधि के द्रव्य बाज़ार में आ रहे हैं वे प्रायः कृत्रिम और अशुद्ध मिलते हैं । पन्सारी उनमें अनेक वाह्य अशुद्धियां मिलाकर बेचते हैं । ऐसी दशा में पूर्णतया
प्रथमोऽध्यायः। ३५
प्रथमोऽध्यायः। ३५
द्रव्य ज्ञान के बिना शुद्ध औषधि बनाना अत्यन्त कठिन हो गया है; जिसका फल यह हो रहा है कि शास्त्रोक्त गुण, प्रभाव औषधियों में नहीं देखे जाते हैं। इसी कठिनाई को दूर करने के लिये पारद के समस्त प्राप्य खनिजों का वर्णन कर दिया गया है।
पारदीय खनिज प्राप्ति के स्थान
ब्रिटिश बोर्नियो ( British Borneo ) इस प्रान्त में रक्त हिङ्गुल ( हंसपाद ), प्राकृतिक पारद और रसपुष्प ( कैलोमल Calomel ) अल्प मात्रा में पाया जाता है।
भारतवर्ष ( इण्डिया India ) यहां अब तक कोई निश्चित स्थान पारद या उसके खनिजों की प्राप्ति का विदित नहीं हुआ है। अभी हाल ही में चित्राल ( पंजाब ) की नदी की रेत में हिङ्गुल के अस्तित्व का पता लगा है। यह स्थान सावधानी पूर्वक सुरक्षित कर दिया गया है ( मानोग्राफ ऑनमर्क्युरी ओर्स पृष्ठ १२ )
इसके अतिरिक्त अदन ( Aden ), अफ़गानिस्तान ( Afghanistan ), अण्डमन आइलेण्ड ( Andaman Islands ) बर्मा ( Burma ), तिब्बत ( Tibet ) आदि पार्श्ववर्ती देशों में भी हिङ्गुल के मिलने की सन्दिग्ध सूचनाएँ समय समय पर प्रकाशित हुई हैं।
( बिब्लोग्राफी भाग २ पृष्ठ ३६३ )
अफ़्रीका ( Africa ) न्यासालेन्ड ( Nyasaland ) नामक स्थान में पारद का होना बताया गया है। किन्तु उसकी ब्योरेवार रिपोर्ट अभीतक प्रकाशित नहीं हुई है।
यूनियन आफ् साउथ अफ्रिका ( Union of South Africa ) ट्रान्सवाल जिले में स्फटिक के साथ मिला हुआ हिंगुल पाया जाता है। एवं इसी देश के अन्य स्थानों में गेलेना ( Galena ) or Lead Sulphide-लेड सल्फाइड) यशद (Zinc), स्फटिक, रेणुशिला आदि के साथ में मिलता है। एक स्थान पर प्राकृतिक पारद सुवर्ण के साथ भी पाया जाता है।
उत्तरीय अमेरिका ( North America ) केनाडा ( Canada ) के सब प्रान्तो में भिन्न भिन्न जातीय खनिज पाषाण और उष्ण स्रोतों में प्राकृतिक पारद और हिंगुल पाया जाता है।
आस्ट्रेलिया ( Australia ) इस देश में हिंगुल और प्राकृतिक पारद अनेक स्थानों में पाया जाता है। सन् १८९२ तक केवल क्वीन्सलेन्ड ( Queensland ) से १३७०० पाउण्ड (१ पाउण्ड आधा सेर के बराबर होता है ) पारद निकाला गया है। यहां ज्वालामुखी पाषाणों में भी
३६ रसरत्नसमुच्चये—
अधिकतर पारदीय खनिज मिलते हैं । पारद के खनिज निकालने के लिये यहां अनेक कूप खने गये हैं, जिनकी गहराई ५० से २४० फीट तक है ।
पापुआ ( Papua ) इस देश में भी पारद के खनिज पाए जाते हैं। किन्तु अभी तक पारद निकालने का काम प्रारम्भ नहीं हुआ है इसलिये यहां के खनिजों का व्यवहारिक मूल्य का पता नहीं लग सकता है ।
न्यूज़ीलैण्ड ( New Zealand ) इस देश में सोना, चांदी, माक्षिक आदि खनिजों के साथ अनेक स्थानों में पारदीय खनिज पाये जाते हैं । सन् १९१७ से १९२० ई० तक ५०० फ्लास्क पारद पुही पुही (Puhi Puhi) नामक स्थान से निकाला गया था । इस देश के एक स्थान पर उष्ण-स्रोत में हिंगुल प्राकृतिक गन्धक के साथ अन्य खनिजों के सहयोग में पाया जाता है ।
अल्वेनिया ( Albania ) यह विदित हुआ है कि इस देश में भी पारद के खनिज हिंगुल और प्राकृतिक पारद पाये जाते हैं । किन्तु ब्योरा अभी तक मालूम नहीं हो सका है ।
जोकोस्लोवेकिया ( Czechoslovakia ) इसके दो तीन प्रान्तों में हिङ्गुल, पारद-मिश्रक (Amalgam) माक्षिक, स्फटिक आदि के साथ पाया जाता है । खड़िया के रूपान्तरित स्लेट और लावा के तर ( Sheet ) के बीच में हिगुल, गेलेना और यशद भी पाये जाते हैं ।
फ्रान्स और कार्सिका ( France and corsica ) इस देश के अनेक प्रान्तों में हिङ्गुल और प्राकृतिक पारद चूने ( calcite ) की भूमि में माक्षिक, स्फटिक, यशद, खर्पर ( Calarmine ), गेलेना ( Galena ) पारदीय मिश्रक ( Amalgam ), एन्टिमनि, गन्धक, आर्सेनिक, प्लेटिनम् ( Plati-num ) आदि के साथ पाया जाता है । इस में प्लेटिनम् का अल्पांश ही मिलता है ।
जर्मनी ( Germany ) जर्मनी में पारद के खनिज अधिक नहीं प्राप्त होते हैं । जितने भी अब तक प्राप्त हुए थे वे सब काम में आगये हैं । तथापि किसी किसी स्थान विशेष पर अनेक अन्य खनिजों के साथ धागे की शकल के तार से हिङ्गुल के रेशे पाये जाते हैं । एक स्थान पर फोसिल मछियों में भी हिङ्गुल जमा हुआ पाया गया है ।
इस के अतिरिक्त प्राकृतिक पारद, रजत मिश्रक ( silver amalgam ), केलोमल ( रसपुष्प ), मेटे सिन्नावार ( कृष्ण हिङ्गुल ), मर्क्युरियल फेहलोर ( Mercurial Fehlore ताम्र मिश्रक ) भ. पाये जाते हैं । इन के साथ साथ माक्षिक, रक्त और पीत गैरिक, साइडराइट ( Siderite ), सुरमा ( Gelena ), टेट्रा हीड-
प्रथमोऽध्यायः । ३७
राइट ( Tetrahedrite ) सुवर्ण-रौप्यमाक्षिक, स्फटिक, एन्टिमनि, अयस्कान्त ( Pyrolusite ), सिलो मेलेन, ( Psilomelane ) आदि खनिज भी मिलते हैं । एक स्थान पर २७०० फुट और दूसरे स्थान पर १२०० फुट की बिस्तृत भूमि पर फैले हुए पारदीय खनिज पाये गये हैं । राइनलेन्ड ( Rhinland ) के ज़िले में ९० फ्लास्क पारद प्रतिवर्ष यशद खनिज के साथ निकलता है ।
हङ्गरी ( Hungary )
महायूद्ध के पूर्व हङ्गरी में वार्षिक ९० टन पारद निकलता था । अब उस के प्रान्त बदल गये हैं । हङ्गरी में एन्टिमनि के साथ पारदीय खनिज पाये जाते थे, जहां तक विदित हुआ है आज कल इस देश में पारद निकलने का व्यवसाय नहीं होता है ।
इटली ( Italy )
इटली में सर्वत्र पारदीय खनिज प्राप्त होते हैं । वहां पर कई एक पुरानी बड़ी बड़ी खानें हैं । पारदीय खानों का प्रबन्ध राजकीय तरफ से किया जाता है । इटली में पारद के मुख्य चार खनिज पाये जाते हैं ।
१—स्टील और दैस्ट्येन्डरफ ( Steel orestahlerz ) ।
इस में ७५ फीस दी पारद मिलता है।
२—लोवर ओर ( Liverore--Lebererz ) यकृदाकार हिङ्गुल या दरदः । यह मृत्तिका जाति का हिङ्गुल है। इस पर स्टेह लर्ज ( Stehlerz ) का कञ्चुक ( Kernels ) चढ़े रहते हैं ।
३—कोरे लाइन ( Coralline = corallenerz )
प्रवालाभ हिङ्गुल ( श्वेतेरेखः प्रवालाभः )
४—ब्रिक ( Brickore ) और गिरि सिन्दूर या रक्त हिङ्गुल ( जपाकुसुमसदृकाशः हंसपादो महोत्तमः ) यह पारदीय खनिजों के किनारे पाया जाता है । सम्भवतः इसी प्रकार के खनिजों को देखकर ऊपर के वाक्य प्राचीनों ने लिखे हैं । इटली के इड्रिया ( Idria ) नामक स्थान में सब से पुरानी पारद की बड़ी खाने हैं । इन खानों में एक स्थल पर फन्नेल (Funnel) की शक्ल के पाइप (नल या छिद्र) हैं । सम्भव है एसे ही कूपाकार छिद्र देख कर इस ग्रन्थ ( रसरत्न समुच्चय ) में 'जाताः कूपाश्च पञ्च च' वाक्य किसी महर्षि ने लिख दिये हों । इस विषय में मानो ग्राफ आफ मर्करी के पृष्ठ ४९ का निम्न लिखित अवतरण ध्यान में रखने योग्य है—
In the Immediately neighbouring rock are several funnel-shaped cavities also filled with metallif erous sands and Clays. The proportion of cinnabar mereasing with the depth.
३८ रसरत्नसमुच्चये—
These funnel-shaped cavities appear to bear some analogy to the vertical pipes or holes (Trajas) in Gypsum-at the mercury mines of Huitzuco,-Gnerrero, Mexico. Broadly Speaking, the hole deposit forms a large funnel the position of which is marked on the surface By a distinct depression.
पोर्तुगाल ( Portugal )
कुछ वर्षों से इस देश में भी पारद की निकासी होने लगी है।
रूमानिया ( Rumania )
इस प्रदेश के जलाटना ( Zalatna ) नामक स्थान के पारदीय खनिजों से पारद निकालने का व्यवसाय किया जाता था। किन्तु व्यवसाय लाभ प्रद न होने के कारण प्रायः बन्दसा हो गया है।
रस्सिया ( Russia )
योरोप और एशिया के अन्दर युक्रेन ( Ukraine ) सहित इस देश में सन् १८९७ में ६१६ मेट्रिक टन पारद निकला था। सन् १९१० में तीन चार सौ मेट्रिक टन के लग भग पारद की निकासी हुई और उसके एक ही वर्ष के बाद सन् १९११ में केवल २६ मेट्रिक टन की उपज रह गई। अब बहुत अल्पमात्रा में इस देश में पारद का रोजगार होता है। सारे एशिया में हिङ्गुल, प्राकृतिक पारद आदि पारदीय खनिज प्राप्त होते हैं। माक्षिक, एन्टिमनी, गन्धक, गेलेना, स्फटिक, चूना आदि खनिजों के साथ साथ व पत्थर के कोयले के साथ भी हिङ्गुल मिला पाया जाता है।
स्केण्डिनेविया ( Scandinavia )
यहां पर प्राकृतिक रजत के साथ पारद् पाया जाता है। स्वीडन के साला ( Sala ) नामक स्थान पर पारदीय रजत-मिश्रक ( Silver Amalgam ), प्राकृतिक पारद और किसी किसी स्थान पर अल्प मात्रा में हिङ्गुल भी पाया जाता है।
स्पेन ( Spain )
इस समय संसार में स्पेन देशीय अलमाडन ( Almadan ) नामक स्थान की पारदीय खनिजों की खानें सर्व प्रधान हैं। संसार की पारद की माँग एक तिहाई इसी की खानों से पूरी होती है। इस स्थान की खानों में विशेषता यह है कि गहराई के साथ साथ ऊँचे दर्जे के उत्तम पारदीय खनिज निकलते जाते हैं। इस समय तक १३०० फुट की गहराई की खानें खुद चुकी हैं। इस देश में शताब्दियों से पारद् निकालने का व्यवसाय हो रहा है। यहां का मुख्य खनिज पारद निकालने योग्य रक्त हिङ्गुल ( cinnabar ) ही अधिकता से मिलता है। यह हिङ्गुल बहुत तेज लाल रङ्ग का
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होता है ( Cinnabar of Bright Red colour ) यहाँ से सम्भवतः रसशास्त्रियों का "जपाकुसुम सङ्काशो हंसपादो महोत्तमः" इस प्रकार का हिङ्गुल आता रहा है । यहाँ शुद्ध रवेदार हिङ्गुल अल्पमात्रा में पाया जाता है । जितना भी मिलता है वह स्फटिक, माक्षिक और बराइट के रवोंके साथ में मिलता है । ढेले की शक्ल का हिङ्गुल जिसमें ७५ से ८५ फीसदी पारद रहता है बहुतायत से पाया जाता है । इसके सहयोग में अन्य खनिज बहुत कम मिलें पाये जाते हैं । प्राकृतिक-पारद, केलोमल, बहुत कम मात्रा में मिलता है । स्पेन के एक प्रान्त में रक्त और कृष्ण हिङ्गुल, हरिताल, मनः शिला, आर्सेनिक ( Arsenic ), सुधा पाषाण ( Lime Stone ), रेणु पाषाण ( Sand stone ) आदि के साथ में पाया जाता है ।
अल्माडन की खानों में सन् १५६४ ई० से १९१९ ई० तक नीचे लिखो सारणी के अनुसार पारद की निकासी हुई है ।
| समय | मेट्रिक टन्स | वार्षिक निकासी |
|---|---|---|
| १५६४-१७०० | १७८६३ | १०३ |
| १७००-१८०० | ४२१४९ | ४२१ |
| १८००-१८७६ | ६०१६ | ८०२ |
| १८७६-१९१९ | ४३००० (अनुमान) | १००० (अनुमान) |
युगोस्लेविया ( Yugoslavia )
इस स्टेट में बोसनिया ( Bosnia ), सर्विया ( Servia ), स्लोवेनिया कार्नियुला ( Slovania-Carniala ) प्रान्तों में मुख्यतः पारद के खनिज पाये जाते हैं ।
एशिया माइनर ( Asiaminor )
इस देश में ३००० वर्षों से पारद निकालन का व्यवसाय हो रहा है। सन् १९०६ और १९०७ में वार्षिक ३००० फ्लास्क पारद कोनिया और केरो बुरम माइन्स् (खान) ( Konia And Karo Burum Mines ) में निकला था । इसी प्रकार एनाटोलिया ( Anotolia ) में ४००० से ५००० फ्लास्क प्रतिवर्ष निकलता रहा है । सन् १९०९ में तुर्क स्थानीय ( Turkish ) पारद की निकासी १४२ टन्स ( ३७८६ फ्लास्क ) हुई थी । महायुद्ध के समय एशियाटिक तुर्की की पारदीय खानें जर्मनी के अधिकार में आगई थीं ।
चाइना या चीन ( China )
चीन के अनेक स्थानों में पारदीय खनिजों के मिलने की सूचनायें समय समय पर प्रकाशित होती रही हैं । इस समय केवल युआनशानचङ्ग (yuanshanchang) नामक स्थान की खाने ही प्रसिद्ध हैं । यहां पर दो प्रकार का हिङ्गुल पाया जाता है । एक का रङ्ग तेज लाल ( Bright Red ) और दूसरे का गहरा लाल ( Dark Opequered ) होता है । यहां बहुत ही प्राचीन प्रणाली से हिङ्गुल एकत्रित किया