रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
पञ्चमोऽध्यायः । | १७९
भस्त्राभ्यां सुदृढं ध्मात्वा त्रिशुलीनिर्गमावधि ।
अथोद्धृत्य क्षिपेत्क्वाथे त्रिफलागोजलात्मके ॥ १२२ ॥
तस्मादाहृत्य सन्ताड्य मृतमादाय लोहकम् ।
पुनश्च पूर्ववद् ध्मात्वा मारयेदखिलायसम् ॥ १२३ ॥
खण्डयित्वा ततो गन्धगुडत्रिफलया सह ।
पुटेत्त्रिंशतिवाराणि निरुत्थं भस्म जायते ॥ १२४ ॥
सर्व प्रकार के लौह चूर्ण को बड़हल के फल के रस से पीसे हुए गण्डदूर्वा, गन्धक, हींग, इन पदार्थों से लिप्तकर, फिर गण्डदूर्वा के कल्क को ऊपर नीचे रखकर लौह का गोला बना कर सुखा लें, फिर धौंकनी द्वारा जब तक विविध रंग की ज्वाला न निकले तब तक फूँकता रहे, बाद में पत्रों को निकाल कर त्रिफला क्वाथ और गोमूत्र में उन्हें बुझावें, फिर उसमें से निकालकर चूर्ण करके पूर्वानुसार फूँक के बुझाकर खरल में चूर्ण कर लें, पश्चात् लौह चूर्ण के समान गन्धक, गुड़ और त्रिफला चूर्ण ले कर सबको खरल में घोटकर के गोला बनाकर गजपुट में फूँक देवें, इस प्रकार ३० पुट देने से लौह की निरुत्थ भस्म हो जाती है॥१२१-१२४॥
अन्यविधिः—
समगंधमयश्चूर्णं कुमारीवारिभावितम् ।
पुटीकृतं कियत्कालमवश्यं म्रियते ह्ययः ॥ १२५ ॥
अथवा गन्धक और लौह चूर्ण बराबर २ लेकर घृत कुमारी के स्वरस में घोटकर के सम्पुट में बन्द कर आठ या दस पुट देने से अवश्य ही भस्म हो जाती है ॥१२५॥
अन्यविधिः—
जम्बीररससंयुक्तं दरदे तप्तमायसम् ।
बहुवारं विनिक्षिप्तं म्रियते नात्र संशयः ॥ १२६ ॥
निम्बू के रस में कुछ हिङ्गुल मिलाकर घोल बनालो, फिर इस घोल ( विलयन ) में लौह को प्रतप्त कर बुझावें, इस तरह २० या २५ बार बुझाने से लौह की भस्म हो जाती है ॥ १२६ ॥
अन्यविधिः—
गोमूत्रस्त्रिफला काथ्या तत्कषायेण भावयेत् ।
त्रिःसप्ताहं प्रयत्नेन दिनकं मर्दयेत्पुनः ॥ १२७ ॥
१८० रसरत्नसमुच्चये—
रुद्ध्वा गजपुटे पच्याद्दिनं क्वाथेन मर्दयेत् ।
दिवा मर्द्यं पुटेद्रात्रावेकविंशदिनावधि ।
एकविंशत्पुटैरेवं म्रियते त्रिविधं ह्ययः ॥ १२८ ॥
गोमूत्र में त्रिफला का क्वाथ बनाकर उससे २१ दिन तक लौह को भावित करें, फिर उसी क्वाथ से उस लौह को एक दिन तक खूब घोट करके सम्पुट कर गजपुट द्वारा रात्रि में पुट दे देवें, फिर निकालकर उसी क्वाथ से दिन में घोटकर रात्रि में पुट देवें इस तरह २१ पुट देने से तीनों प्रकार के लौह की भस्म हो जाती है ॥ १२७-१२८ ॥
अथ कान्तलोहस्य रामराजीप्रोक्तशोधनम्—
यत्पात्राध्युषिते तोये तैलबिन्दुर्न सर्पति ।
तारेणावर्तते यत्तत्कान्तलोहं तनूकृतम् ॥ १२६ ॥
अयसामुत्तमं सिञ्चेत्तप्तं तप्तं वरारसे ।
एवं शुद्धानि लोहानि पिष्टान्यम्लेन केनचित् ॥ १३० ॥
मृतसूतस्य पादेन प्रलिप्तानि पुटानले ।
पचेत्तुल्यस्य वा ताप्यगन्धाश्महरतेजसा ॥ १३१ ॥
तप्तं क्षाराम्लसंलिप्तं शशरक्तेन भावितम् ।
कान्तलोहं भवेद्भस्म सर्वदोषविवर्जितम् ॥ १३२ ॥
जिस लौह के जल से भरे हुए पात्र में तैल की बूंद छोड़ने पर वह फैले नहीं और जो लौहचूर्ण रजत चूर्ण के साथ मिश्रित हो जाय या उसको चारों ओर घेरले उस सर्वलौहो में उत्तम कान्त लौह के छोटे २ पत्र या टुकड़े बना करके प्रतप्त कर त्रिफला के क्वाथ में सात वार बुझाकर शुद्ध करलें, पश्चात् उसे निम्बू के रस या किसी अम्लरस से घोट करके चतुर्थांश पारदभस्म से मर्दनद्वारा लिप्तकर पुट देने से उसकी भस्म हो जाती है। अथवा लौह चूर्ण या पत्र को अम्लरस में घोटे हुयेक्षार से लिप्त करके तपाकर खरगोश के रुधिर में सातवार बुझालें, पश्चात् लौह के बराबर सुवर्णमाक्षिक, गन्धक और पारद इनके साथ लौह पत्रों को घोटकर सम्पुट में बन्द कर गजपुट में फूंक दें, इस तरह लौह को सर्वदोष रहित भस्म हो जाती है ॥ १२९-१३२ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । १८१
अन्यविधिः— शुद्धं सूतं द्विधा गन्धं खल्लेन कृतकज्जलम् । द्वयोः समं लौहचूर्णं मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ १३३ ॥ यामद्वयात्समुद्धृत्य यद्गोलं ताम्रपात्रके । आच्छाद्यैरण्डपत्रैश्च यामार्धेऽत्युष्णतां व्रजेत् ॥ १३४ ॥ धान्यराशौ न्यसेत्पश्चात्रिदिनान्ते समुद्धरेत् । सम्पेष्य गालयेद्वस्त्रे सत्यं वारितरं भवेत् । कान्तं तीक्ष्णं च मुण्डं च निरुत्थं जायते मृतम् ॥ १३५ ॥ स्वर्णादीन्मारयेदेवं चूर्णं कृत्वा च लौहवत् । सिद्धयोगो ह्ययं ख्यातः सिद्धानां सुमुखांगतः ॥ १३६ ॥ अनुभूतं मया सत्यं सर्वरोगजरापहम् । त्रिफलामधुसंयुक्तं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ १३७ ॥
**अन्यविधि—**शुद्ध पारद से द्विगुण गन्धक लेकर खरल में कजली बनालें, इस कजली के बराबर लौह चूर्ण लेकर उसको घृत कुमारी के रस में दो प्रहर तक घोट करके गोला बनालेवें, पश्चात् उस गोले को ताम्र के पात्र में रख कर रेड़ी के पत्रों से ढककर आधे प्रहर तक अग्नि में या सूर्य की धूप में रहने दें, फिर उस गोले को तीन दिन तक धान्य के ढेर में गाड़ना चाहिए, चौथे दिन निकाल कर लौह चूर्ण को पीसकर वस्त्र से छान लें, इस तरह कान्त, तीक्ष्ण और मुण्ड लौह की जल में तैरने लायक निरुत्थ भस्म हो जाती है। इसी विधि से सुवर्णादि धातुओं की भी भस्म हो जाती है। यह योग सिद्धों के मुख से कहा हुआ है इसलिये उसको सिद्धयोग कहते हैं और मैंने भी इसकी सत्यता का अनुभव किया है। यह सर्व व्याधियों को नष्ट करता है। इसको त्रिफला और शहद के साथ सर्व रोगों में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १३३–१३७ ॥
अथ लौहप्रयोगः— एतत्स्यादपुनर्भवं हि भसितं लोहस्य दिव्यामृतं सम्यक् सिद्धरसायनं त्रिकटुकीवेल्लाज्यमध्वन्वितम् । हन्त्यान्निष्क-मितं जरामरणजन्याधींश्च सत्पुत्रदं दिष्टं श्रीगिरिशेन कालयवनोद्भूतौ पुरा तत्पितुः ॥ १३८ ॥
| १८२ | रसरत्नसमुच्चये— |
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लौहभस्म के गुण—यह निरुत्थ लौह भस्म अमृत के समान गुणकारी और सिद्ध रसायन है। इस भस्म को चार मासे की मात्रा में त्रिकटु, वायविडङ्ग, शहद और घृत के साथ सेवन करने से जरा, मरण तथा सर्व व्याधियां नष्ट हो जाती हैं और सत्पुत्र को देती है। किसी समय महादेवजी ने कालयवन के पिता को पुत्र की प्राप्ति के लिये इस भस्म के सेवन का उपदेश दिया था॥ १३८॥
अथ लौहानां रामराजीप्रोक्तगुणाः—
लौहं जन्तुविकारपाण्डुपवनक्षीणत्वपित्तामय-
स्थौल्यार्शोग्रहणीज्वरार्तिकफजिच्छ्लोफप्रमेहप्रणुत्।
गुल्मप्लीहविषापहं बलकरं कुष्ठाग्निमान्द्यप्रणुत्
सौख्यालं विरसायनं मृतिहरं किट्टं च कान्तादिवत् ॥१३६॥
मृतानि लोहानि रसीभवन्ति निघ्नन्ति युक्तानि महामयांश्च।
अभ्यासयोगाद् दृढदेहसिद्धिं कुर्वन्ति रुज्जन्मजराविनाशम् ॥ १४० ॥
लौहभस्म कृमि से उत्पन्न विकार, पाण्डु, वायुरोग, क्षीणता, पित्तजन्यरोग, स्थूलता, बवासीर, संग्रहणी, ज्वर, कफ, शोथ, प्रमेह, गुल्म, प्लीहा, विषबाधा, कुष्ठ और मन्दाग्नि को नष्ट करती है, बल को बढ़ाती है, सुखकारक, उत्तम रसायन है और मृत्यु को नष्ट करती है। लौह का किट्ट भी कान्त लौह के समान गुणकारक होता है।
सर्वप्रकार के मृत लौह रस के समान गुणकारी और बड़े-२ भयङ्कर रोगों को नष्ट करते हैं। इनके सेवन करने से देह दृढ और स्थिर हो जाती है और ये लौह रोग की उत्पत्ति और जरा को नष्ट करते हैं ॥ १३९–१४० ॥
अथ श्रेष्ठकान्तलौहस्य लक्षणम्—
पक्वजम्बूफलच्छायं कान्तलोहं तदुत्तमम् ॥ १४१ ॥
जो कान्तलोह पके हुए जामुन के समान वर्ण वाला हो वह श्रेष्ठ है ॥१४१॥
अथ लोहद्रुतिः—
त्रिःसप्तकृत्वो गोमूत्रे जालिनोभस्मभावितम्।
शोषयेत्तस्य वातेन तीक्ष्णं मूषागतं द्रवेत् ॥ १४२ ॥
सुरदालिभस्मगलितं त्रिःसप्तकृत्वोऽथ गोजले शुष्कम्।
वापेन सलिलसदृशं करोति मूषागतं तीक्ष्णम् ॥१४३ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । १८३
कड़वी तरोई की राख को २१ वार गोमूत्र से भावित कर के उसे सुखा लेवें फिर उस राख को मूषा में रखकर लौह भस्म को भर दें, ऊपर से लौह पर फिर शेष राख रखकर बन्द करके अग्नि से धमन करने से लौह का द्रवण हो जाता है। अथवा देवदाली की राख को २१ वार गोमूत्र से भावित कर सुखा लें, पश्चात् मूषा में वह भस्म रख कर के उस में लौहभस्म भर कर ऊपर से फिर लौह को देवदाली भस्म से ढक कर मूषा का मुख बन्दकर अग्नि से तपावे' । इस विधि से लौह की जल के सदृश द्रुति हो जाती है ॥ १४२-१४३ ॥
अथ कान्तलौहस्य विशेषमारणम्— सुरदालिभवं भस्म नरमूत्रेण गालितम् । त्रिःसप्तवारं तत्क्षारवापात्कान्तद्रुतिर्भवेत् ॥ १४४ ॥ देवदाली की राख को नरमूत्र से २१ वार भावितकर क्षारविधि से देवदाली भस्म का क्षार निकाल करके मूषायन्त्र में इस क्षार को और लौह भस्म को रख-कर बन्द करके तीव्र अग्नि देने से कान्तलौह की द्रुति हो जाती है ॥ १४४ ॥
अथाष्टलोहानां द्रावणम्— गन्धकं कान्तपाषाणं चूर्णयित्वा समं समम् । द्रुते लोहे प्रतीवापो देयो लोहाष्टकं द्रवेत् ॥ १४५ ॥ सुवर्णादि अष्ट प्रकारके किसी भी लोह को पिघला कर गन्धक और कान्तलौह या चुम्बक पत्थर का चूर्ण डालता जाय तो उन सब की द्रुति होजाती है॥१४५॥
मतान्तरम्— देवदाल्याद्रवैर्भाव्यं गन्धकं दिनसप्तकम् । तेन प्रवापमात्रेण लोहं तिष्ठति सूतवत् ॥ १४६ ॥ अथवा गन्धक को सात दिन तक देवदाली (हस्तीघोषक) के रस से भावित करके चूर्ण करलें, फिर लौहों के अग्नि में पिघलते समय इस चूर्ण का प्रतिवाप (प्रक्षेपण) देने से वे पारद की तरह सर्वदा द्रुत अवस्था में ही रहते हैं ॥१४६॥
अशुद्धापक्वलोहदोषाः— अशुद्धलोहं न हितं निषेवणादायुर्बलं कान्तिविनाशि निश्चितम् । हृदि प्रपीडां तनुते ह्यपाटवं रुजं करोत्येव विशोष्य मारयेत् ॥१४७॥ अशुद्ध लोह का सेवन करना हितकर नहीं है, यह कान्ति, आयु और बल को
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नष्ट करता है और हृदय में पीड़ा उत्पन्न करता है, शरीर को शिथिल कर देता है और रोग उत्पन्न करता है, इसलिये प्रथम लौह का उत्तम शोधनकर पश्चात् मारण करना चाहिए ॥ १४७ ॥
अथोत्तरोत्तरमधिकगुणकरं लोहम्—
किट्टाद्दशगुणं मुण्डं मुण्डात्तीक्ष्णं शतोन्मितम् ।
तीक्ष्णाल्लक्षगुणं कान्तं भक्षणात्कुरुते गुणान् ।
तस्मात्कान्तं सदा सेव्यं जरामृत्युहरं नृणाम् ॥ १४८ ॥
आयुष्प्रदाता बलवीर्यकर्ता रोगप्रहर्ता मदनस्य कर्ता ।
अयःसमानं न हि किञ्चिदन्यद्रसायनं श्रेष्ठतमं हि जन्तोः ॥ १४९ ॥
किट्ट लौह से मुण्ड दसगुना लाभ कारक है और मुण्ड से तीक्ष्ण सौगुना अधिक लाभ करता है और तीक्ष्ण से कान्त लौह के सेवन के करने से लक्षगुणाधिक फल करता है, इसलिये सर्वदा जरा और मृत्यु को हरण करने वाले कान्त लौह का ही मनुष्यों को सेवन करना चाहिए । कान्त लौह आयु को बढाता है, बल, वीर्य और काम शक्ति को उत्पन्न करता है, रोगों को नष्ट करता है, इसलिये प्राणिमात्र के लिये लौह के समान गुणकारी अन्य कोई रसायन नहीं है ॥ १४८–१४९ ॥
अथ मण्डूरम्—
मण्डूरशोधनम्—
अक्षाङ्गारैर्धमेत्किट्टं लोहजं तद्गवां जलैः ।
सेचयेत्तत्पात्रान्तः सप्तवारं पुनः पुनः ।
मण्डूरोऽयं समाख्यातश्चूर्णं श्लक्ष्णं प्रयोजयेत् ॥ १५० ॥
लौह से उत्पन्न किट्ट (मल) को बहेड़े की अग्नि में प्रतप्त कर गोमूत्र से भरे हुए बहेड़े के पात्र में सात वार बुझाने से मण्डूर शुद्ध होजाता है पश्चात् इसका महीन चूर्ण करके भस्म बनाकर योगों में प्रयोग करे ॥ १५० ॥
मतान्तरम्—
गोमूत्रैस्त्रिफला काथ्या तत्क्वाथे सेचयेच्छनैः ।
लोहकिट्टं सुसन्तप्तं यावज्जीर्यति तत्स्वयम् ।
तच्चूर्णं जायते पेष्यं मण्डूरोऽयं प्रयोजयेत् ॥ १५१ ॥
अथवा गोमूत्र में त्रिफला का क्वाथ बनाकर इस क्वाथ में मण्डूर को अत्यन्त
पञ्चमोऽध्यायः । | १८५
प्रतप्त कर तब तक बुझावैं जबतक वह स्वयं चूर्ण न हो जाय, बाद में इसे पीसकर भस्म बनाकर प्रयोग करें, यही मण्डूर भस्म है ॥ १५१ ॥
लौहमण्डूरयोर्गुणसाम्यता—
ये गुणा मारिते मुण्डे ते गुणा मुण्डकिट्टे ।
तस्मात्सर्वत्र मण्डूरं रोगशान्त्यै प्रयोजयेत् ॥ १५२ ॥
इत्ययोऽधिकारः ।
जो गुण भस्म किये हुये मुण्ड लोह के सेवन से होते हैं वे ही गुण मुण्ड के किट्ट (मण्डूरभस्म) के सेवन से होते हैं, इसलिये सब जगह रोग की शान्ति के लिये मण्डूरभस्म का प्रयोग करना चाहिए ॥ १५२ ॥
अथ वङ्गनिरूपणम्—वङ्गस्य द्वैविध्यनिर्देशः—
खुरकं मिश्रकं चेति द्विविधं वङ्गमुच्यते ।
खुरं तत्र गुणैः श्रेष्ठं मिश्रकं न हितं मतम् ॥ १५३ ॥
खुरक और मिश्रक भेद से वङ्ग दो प्रकार का होता है, इन दोनों भेदों में से खुरक नाम का वङ्ग श्रेष्ठ है, किन्तु मिश्रक नाम का वङ्ग औषध कार्य में हितकर नहीं है ॥ १५३ ॥
अथ खुरकवङ्गस्य मिश्रकवङ्गस्य च लक्षणम्—
धवलं मृदुलं स्निग्धं द्रुतद्रावं सगौरवम् ।
निःशब्दं खुरवङ्गं स्यात् ; मिश्रकं श्यामशुभ्रकम् ॥ १५४ ॥
जो वङ्ग श्वेत, कोमल, स्निग्ध, वजन में भारी और अग्नि में तपाने पर शीघ्र द्रवित होने वाला तथा औषधियों के स्वरस में तपाकर बुझाने के समय अधिक शब्द न करे वह खुरक नाम का वङ्ग होता है । जो वङ्ग उक्त लक्षणों से विपरीत और श्वेत तथा काले रङ्ग का हो वह मिश्रक कहलाता है ॥ १५४ ॥
अथ वङ्गगुणाः—
वङ्गं तिक्तोष्णकं रूक्षमीषद्वातप्रकोपनम् ।
मेहश्लेष्मामयघ्नं च मेदोघ्नं कृमिनाशनम् ॥ १५५ ॥
वङ्ग तिक्त, उष्ण, रूक्ष और कुछ वात को कुपित करने वाला है तथा प्रमेह, श्लेष्मा (कफ) के विकार, क्रिमिजन्यरोग और मेदा को नष्ट करता है ॥ १५५ ॥
१८४ | रसरत्नसमुच्चये—
अथ खुरकवङ्गशोधनम्—
द्रावयित्वा निशायुक्ते क्षिप्तं निर्गुण्डिकारसे ।
विशुद्ध्यति त्रिवारेण खुरवङ्गं न संशयः ॥ १५६ ॥
खुरक वङ्ग को अग्नि पर स्थित कड़ाही के अन्दर पिघला (द्रुत) कर हरिद्रा के चूर्ण से युक्त निर्गुण्डी के रस में तीन वार बुझाने से शुद्ध हो जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १५६ ॥
अथ मिश्रकवङ्गशोधनम्—
अम्लतक्रविनिक्षिप्तं वर्षाभूविषतिन्दुभिः ।
कट्फलाम्बुगतं वङ्गं द्वितीयं परिशुद्ध्यति ॥ १५७ ॥
मिश्रक वङ्ग को कड़ाही में पिघलाकर श्वेत पुनर्नवा और कुचले के चूर्ण से मिले हुए खट्टी तक्र (मट्ठे) में अथवा कायफल के क्वाथ में बुझाने से शुद्ध हो जाता है ॥ १५७ ॥
अथ नागवङ्गकांस्यताम्राणां सामान्यशोधनम्—
शुद्ध्यति नागो वङ्गो घोषो रविरातपेऽपि मुनिसङ्ख्यैः ।
निर्गुण्डीरससेकैस्तन्मूलरजःप्रवापैश्च ॥ १५८ ॥
नाग, वङ्ग, कांसे और ताम्र को निर्गुण्डी के रस से भरे हुए पात्र में डाल कर सात दिन तक धूप में रखना चाहिए अथवा उपर्युक्त नागादिकों को कड़ाही में अग्नि से द्रुत कर निर्गुण्डीचूर्ण में पकावें, इस तरह सात वार करने से वे शुद्ध हो जाते हैं ॥ १५८ ॥
अथ वङ्गभस्म—
सतालेनार्कदुग्धेन लिप्त्वा वङ्गदलानि च ।
बोधिचिञ्चात्वचःक्षारैर्दद्याल्लघुपुटानि च ।
मर्दयित्वा चरेद्भस्म तद्रसादिषु शस्यते ॥ १५६ ॥
शुद्ध वङ्ग के छोटे २ पत्र बनाकर उन्हें मदार के दुग्ध से पीसी हुई हरताल से लिप्त करदें, फिर उन्हें सकोरे में रखकर ऊपर और नीचे पीपल और इमली की छाल का क्षार रखकर दूसरे सकोरे के साथ कपड़ मिट्टी कर पुट देवें फिर इस को निकाल करके चूर्णकर भस्म बनालें, यह भस्म सर्वरसायनादि कार्यों में श्रेष्ठ है॥ १५९ ॥
मतान्तरम्—
प्रद्राव्य खर्परे वङ्गं षोडशांशं रसं क्षिपेत् ।
पञ्चमोऽध्यायः । १८७
स्वल्पस्वल्पाऽऽलकं दत्त्वा भारद्वाजस्य काष्ठतः । मर्दयित्वा चरेद्भस्म तद्रसादिशु शस्यते ॥ १६० ॥
अथवा किसी खर्पर (लौहपात्र) में वङ्ग को अग्निद्वारा पिघाल (द्रुत) करके उसमें षोडशांस शुद्ध पारद डालकर फिर उस में थोड़ा २ शुद्ध हरताल का चूर्ण डालताजाय और जङ्गली कपास के डण्डे से घोटता रहे, भस्म हो जाने पर उसका रसादिकायाँ में प्रयोग करे ॥ १६० ॥
मतान्तरम्— पलाशद्रवयुक्तेन वङ्गपत्रं प्रलेपयेत् । तालेन पुटितं पश्चान्प्रियते नात्र संशयः ॥ १६१ ॥
अथवा वङ्ग के पत्रों को पलाशपुष्प अथवा पलाशजड़ के स्वरस से लिप्त कर समान भाग शुद्ध हरताल का चूर्ण. मिलाकर के सम्पुट कर फूंकने से निश्चय हो वङ्ग की भस्म हो जाती है ॥ १६१ ॥
मतान्तरम्— भल्लाततैलसंलिप्तं वङ्गं वस्त्रेण वेष्टितम् । चिञ्चापिप्पलपालाशाकाष्ठाग्नौ याति पञ्चताम् ॥ १६२ ॥
अथवा शुद्ध वङ्ग के पत्रों को भिलावां के तैल से लिप्त करके ऊपर से साफ वस्त्र को लपेट दें, फिर उन्हें पीपल, इमली, पलाश, इन में से किसी एक की लकड़ियों की अग्नि में फूंकने से भस्म होजाती है ॥ १६२ ॥
अथ वङ्गरसायनम्— वङ्गभस्मसमं कान्तं व्योमभस्म च तत्समम् । मर्दयेत्कनकाम्भोभिर्निम्बपत्ररसैरपि ॥ १६३ ॥ दाडिमस्य मयूरस्य रसेन च पृथक् पृथक् । भूपालावर्तभस्माथ विनिक्षिप्य समांशकम् ॥ १६४ ॥ गोमूत्रकशिलाधातुजलैः सम्यग्विमर्दयेत् ॥ ततो गुग्गुलुतायेन मर्दयित्व दिनाष्टकम् ॥ १६५ ॥ विशोष्य परिचूर्ण्याथ समभागेन योजयेत् । घृष्टं बन्धुकनिर्या सैर्नकुलीबीजचूर्णकैः ॥ १६६ ॥ ततः क्षिपेत्करण्डान्तर्विधाय पटगालितम् ।
१८८ | रसरत्नसमुच्चये—
गोतक्रपिष्टरजनीसारेण सह पाययेत् ॥ १६७ ॥
चतुभिर्वल्लकैस्तुल्यं रम्यं वङ्गरसायनम् ।
निश्चितं तेन नश्यन्ति मेहा विंशतिभेदकाः ॥ १६८ ॥
शालयो मुद्गसूपं च नवनीतं तिलोद्भवम् ।
पटोलं तिक्ततुण्डीरं तक्रं पथ्याय शस्यते ॥ १६९ ॥
इति वङ्गाधिकारः ।
वङ्ग भस्म के बराबर कान्त लौहभस्म और उतनी ही अभ्रक भस्म लेकर इन सब को खल्व में डालकर एक २ दिन तक धत्तूर और निम्बपत्र के स्वरस में मर्दन करना चाहिए, फिर इसी तरह दाड़िम के रस और अपामार्ग के रस से क्रमशः भावना देवें, पश्चात् इसमें वङ्ग के बराबर लाजवर्त की भस्म का एक भाग मिला कर के गोमूत्र और शिलाजीत के पानी से घोटें, फिर आठ दिन तक गूगल के पानी ( क्वाथ ) से घोट करके सुखालें, पश्चात् बन्धूकपुष्प ( गुलदपहरिया ) के स्वरस या गोंद से घोट कर भावना दें, फिर इसमें तुल्य रास्ना बीज या सेमल बीज का चूर्ण मिला कर के खल्व में घोटकर वस्त्र से छान शीशी में भर लें। फिर इस सुन्दर वङ्ग रसायन को ४ वल्ल की मात्रा से हल्दी के चूर्ण और गाय के तक्र के साथ सेवन करने से निश्चय ही बीस प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते हैं। इस रसायनसेवन के साथ २ साठीचांवलों का भात, मूंग की दाल, नवनीत, (मक्खन) तिलतैल, परवर का शाक, करेले का शाक, कड़वी कन्दूरी या बिम्बीफल और तक्र ये पथ्य में लेना चाहिए ॥ १६३–१६९ ॥
अथ नागः—
शुद्धसीसकलक्षणम्—
द्रुतद्रावं महाभारं छेदे कृष्णसमुज्ज्वलम् ।
पूतिगन्धं बहिः कृष्णं शुद्धं सीसमतोऽन्यथा ॥ १७० ॥
जो सीस अग्नि में गर्म करने से शीघ्र पिघल ( द्रुत ) जाय, तोल में भारी, तोड़ने पर चमक लिये हुए कृष्ण वर्ण का हो, कुछ दुर्गन्ध युक्त हो, बाहर से देखने में काला हो वह औषध कार्य में श्रेष्ठ है इन लक्षणों से विपरीतलक्षण का नाग त्याज्य है ॥ १७० ॥
पञ्चमोऽध्यायः । १८९
पञ्चमोऽध्यायः । १८९
सीसकगुणाः— अत्युष्णं सीसकं स्निग्धं तिक्तं वातकफापहम् । प्रमेहतोयदोषघ्नं दीपनं चामवातनुत् ॥ १७१ ॥ सीसा अत्यन्त उष्ण, स्निग्ध और तिक्तरसयुक्त होता है, तथा वात, कफ, प्रमेह, जल से जन्य रोग अथवा उदकमेह और आमवात को नष्ट करता है तथा अग्नि प्रदीप्त करता है ॥ १७१ ॥
अथ नागशुद्धिः— सिन्दुवारजटाकौन्तीहरिद्राचूर्णकं क्षिपेत् । द्रुते नागेऽथ निर्गुण्ड्यास्त्रिवारं निक्षिपेद्रसे ॥ नागः शुद्धो भवेदेवं मूर्च्छास्फोटदिनाचरेत् ॥ १७२ ॥ नाग को कड़ाही में डालकर अग्नि पर कड़ाही को रख दें, जब नाग द्रवित हो जाय तब उसमें निर्गुण्डी की जड़ का चूर्ण, रेणुका का चूर्ण और हरिद्रा का चूर्ण डालकर कुछ देर तक घोटना चाहिए, पश्चात् निर्गुण्डीपत्र के स्वरस या क्वाथ में बुझावें, इस तरह तीन बार करने से नाग की शुद्धि हो जाती है और वह मूर्च्छा तथा फोड़े फुन्सी आदि विकारों को उत्पन्न नहीं करता है ॥ १७२ ॥
अथ नागभस्म— तिर्यगाकारचुल्ल्यान्तु तिर्यग्वक्त्रं घटं न्यसेत् ॥ तं च वक्त्रं विना सर्वं गोपयेद्द्लतो मृदा ॥ १७३ ॥ भ्रष्ट्रयन्त्राभिधे तस्मिन् पात्रे सीसं विनिक्षिपेत् । पलविंशतिकं शुद्धमधस्तीव्रानलं क्षिपेत् ॥ १७४ ॥ द्रुते नागे क्षिपेत्सूतं शुद्धं कर्षमितं शुभम् । घर्षयित्वा क्षिपेत्क्षारमेकैकं हि पलं पलम् ॥ १७५ ॥ अर्जुनस्याक्षवृक्षस्य महाराजगिरेरपि । दाडिमस्य मयूरस्य क्षिप्त्वा क्षारं पृथक् पृथक् ॥ १७६ ॥ एवं विंशतिरात्राणि पचेत्तीव्रेण वह्निना । विघट्टयन्दृढं दोर्भ्यां लोहदर्य्या प्रयत्नतः ॥ १७७ ॥ रक्तं तज्जायते भस्म कपोतच्छायमेव वा । नागं दोषविनिर्मुक्तं जायतेऽतिरसायनम् ॥ १७८ ॥
१९० रसरत्नसमुच्चये—
टेढ़े आकार वाले बने हुए चूल्हे पर एक घड़े को तिर्यक् मुख करके रख दें, फिर उस घड़े के मुख को छोड़कर सर्वाङ्ग पर चिकनी मिट्टी का लेप कर दें, यही आष्ट्रसंज्ञकयन्त्र कहलाता है। इस यन्त्र में २० पल ( १ सेर ) शुद्ध सीसा डाल-कर नीचे तेज आंच लगानी चाहिए। जब सीस द्रुत हो जाय तब उस यन्त्र में एक कर्ष श्रेष्ठ तथा शुद्ध पारद डालकर लोहे की कलच्छु से घोटें, कुछ देर बाद उस यन्त्र में अर्जुन वृक्ष की छाल, बहेड़े की छाल, अमलतास या शाकविशेष, दाड़िम ( अनार ) और अपामार्ग, इन सबका एक २ पल ( ४ तोला ) क्षार डाल कर तीव्र अग्नि से २१ दिन तक पकाना चाहिए। साथ में लोहे की कलच्छू द्वारा दोनों हाथों से खूब घोटते रहना चाहिए। इस विधि से नाग की लाल या कबूतर के वर्ण ( धूसर वर्ण ) के समान भस्म हो जाती है। इस विधि से नाग सब दोषों से रहित होकर निरुत्थ भस्म के रूप में अत्यन्त गुणकारक रसायन हो जाता है ॥ १७३-१७८ ॥
मतान्तरम्— हतमुत्थापितं सीसं दशवारेण सिध्यति । तन्मृतं सीसकं सर्वदोषमुक्तं रसायनम् ॥ १७४ ॥
सीस की उपर्युक्तविधि से भस्म बनाकर ऊर्ध्वपातनयन्त्र में उसका उत्था-पन करें, इस तरह दस बार करने से सीस की सब दोषों से रहित रसायन के उपयोगी निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ १७९ ॥
अथ नागस्य निरुत्थभस्मीकरणम्— अश्वत्थचिञ्चात्वग्भस्म नागस्य चतुरंशतः । क्षिपेन्नागं पचेत्पात्रे चालयेल्लोहचाडुना ॥ १८० ॥ यावद्भस्म तदुद्धृत्य भस्मतुल्यां मनःशिला । जम्बोरैरारनालैर्वा पिष्ट्वा रुद्ध्वा पुटे पचेत् ॥ १८१ ॥ स्वाङ्गशीतं पुनः पिष्ट्वा विंशत्यंशशिलायुतम् । अम्लेनैव तु यामैकं पूर्ववत्पाचयेत्पुटे ॥ एवं षष्टिपुटैः पक्को नागः स्यात्सुनिरुत्थकः ॥ १८२ ॥
शुद्ध नाग को कड़ाही में द्रवित कर के उसमें नाग से चतुर्थांश पीपल और इमली की त्वचा की राख डालकर लौह दण्ड से एक प्रहर तक खूब घोटना
पञ्चमोऽध्यायः । १९१
पञ्चमोऽध्यायः । १९१
चाहिए। एक प्रहर के बाद भस्म को निकाल कर, उसमें बराबर शुद्धमनः शिला मिला- कर केजम्बीररस या काञ्जी से घोटकर सम्पुट में बन्दकर के फूंक दें। एक प्रहर के पश्चात् स्वाङ्गशीत होने पर पुट से निकालकर फिर बीसवें भाग की मात्रा में मनः- शिला मिला कर किसी अम्ल से घोटकर सम्पुट कर के एक प्रहर तक पकाना चाहिए। इस तरह प्रत्येक पुट में बीसवां भाग मनःशिला मिला कर ६० पुट देने से नाग की अत्यन्त गुणकर निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ १८०-१८२ ॥
अथ मतान्तरम्— शिलया रविदुग्धेन नागपत्राणि लेपयेत् । मारयेत्पुटयोगेन निरुत्थं जायते तथा ॥ १८३ ॥ अथवा शुद्धनाग के पत्रों पर मदार के दुग्ध में घोटी हुई मनःशिला की पिट्ठी का लेप कर पुटकी विधि से १० या १५ पुट देने से नाग की निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ १८३ ॥
अथ नागरसायनम्— एवं नागोद्भवं भस्म ताप्यभस्माधभागिकम् । पादं पादं क्षिपेद्भस्म शुल्वस्य विमलस्य च ॥ १८४ ॥ कान्ताभ्रसत्त्वयोश्चापि स्फटिकस्य पृथक् पृथक् । सर्वमेकत्र सञ्चूर्ण्य पुटेत्त्रिफलवारिणा ॥ १८५ ॥ त्रिंशद्वनगिरिण्डैश्च त्रिंशद्वारं विचूर्ण्य तत् । व्योषवेल्लकरचूर्णैश्च समांशैः सह मेलयेत् ॥ १८६ ॥ मध्वाज्यसहितं हन्ति प्रलीढं वल्लमात्रया । अशीतिवातजान्रोगान्धनुर्वातं विशेषतः ॥ १८७ ॥ कफरोगानशेषांश्च मूत्ररोगांश्च सर्वशः । श्वासं कासं क्षयं पाण्डुंश्वयथुं शीतकज्वरम् ॥ १८८ ॥ ग्रहणीमामदोषं च वह्निमान्द्यं सुदुर्ज्जरम् । सर्वानुदकदोषंश्च तत्तद्रोगानुपानतः ॥ १८९ ॥
उपर्युक्तविधि से बनाई हुई सीसे की भस्म एक भाग तथा सुवर्णमाक्षिकभस्म अर्द्धभाग तथा ताम्रभस्म, विमलभस्म कान्तलौहभस्म, अभ्रकसत्व, स्फटिकभस्म, ये प्रत्येक सीस भस्म से चतुर्थांश लेना चाहिए इन सबको खरल में एकत्र कर
१९२ || रसरत्नसमुच्चये—
त्रिफला के काथ से घोटकर तीस जंगली उपलों के अन्दर पुट देना चाहिए, फिर स्वाङ्गशीत होने के बाद निकालकर खरल में त्रिफलाक्वाथ से घोटकर पुट देवे। इस तरह तीस वार पुट देकर भस्म बनाले, फिर इसभस्म की एक वल्ल ( दो रत्ती ) की मात्रा में समानभाग त्रिकटुचूर्ण और वायविडङ्गचूर्ण मिलाकर शहद और मक्खन के साथ सेवन करने से अस्सी प्रकार के वातरोग, विशेष कर धनुर्वात, सम्पूर्ण कफ के रोग, मूत्र के रोग, श्वास, कास, क्षय, पाण्डु, शोथ, शोत-ज्वर, ग्रहणी, आमदोष, मन्दाग्नि तथा सर्व प्रकार के जलदोष से उत्पन्न रोग भिन्न २ अनुपान के साथ सेवन से नष्ट हो जाते हैं ॥ १८४-१८९ ॥
अथ पित्तलम्—
पित्तलभेदाः—
रीतिका काकतुण्डी च द्विविधं पित्तलं भवेत् ॥ १९० ॥
पीतलधातु दो प्रकार की होती है, एक को रीतिका तथा द्वितीय भेद को काकतुण्डी कहते हैं ॥ १९० ॥
रीतिकालक्षणम्—
सन्ताप्य काञ्जिके क्षिप्ता ताम्राभा रीतिका मता ॥ १९१ ॥
पीतल को अग्नि में तपाकर काञ्जी में बुझाने से यदि वह ताम्बे के रङ्ग की हो जाय तो वह रीतिका पित्तल कहलाता है ॥ १९१ ॥
काकतुण्डी लक्षणम्—
एवं या जायते कृष्णा काकतुण्डीति सा मता ॥ १९२ ॥
पीतल को अग्नि में प्रतप्त कर काञ्जी में बुझाने से यदि वह कृष्णवर्ण की हो जाय तो काकतुण्डी पित्तल कही जाती है ॥ १९२ ॥
अथ रीतिकाया गुणाः—
रीतिस्तिक्तरसा रूक्षा जन्तुघ्नी सास्रपित्तनुत् ।
पाण्डुकुष्ठहरा योगात्सोष्णवीर्या च शीतला ॥ १९३ ॥
रीतिका नाम की पीतल स्वाद में तिक्त, रूक्ष, जन्तुनाशक, रक्तपित्त और कुष्ठ को नाश करनेवाली और पाण्डुरोग नाशक है। शीतल पदार्थों के साथ सेवन करने से शीतवीर्य और उष्ण पदार्थों के साथ उष्णवीर्य है ॥ १९३ ॥
पञ्चमोऽध्यायः ।
१४३
अथ काकतुण्ड्या गुणाः—
काकतुण्डी गतस्नेहा तिक्तोष्णा कफपित्तनुत् ।
यकृत्प्लीहहरा शीतवीर्या च परिकीर्तिता ॥ १६४ ॥
काकतुण्डी नामक पीतल रूक्ष, कटु, उष्णवीर्य, कफपित्तनाशक और यकृत और प्लीहावृद्धि को नष्ट करती है तथा यह शीतवीर्य होती है ॥ १६४ ॥
अथ शुभरीतिका लक्षणम्—
गुर्वी मृद्वी च पीनाभा साराङ्गो ताडनक्षमा ।
सुस्निग्धा मसृणाङ्गी च रीतिरेतादृशी शुभा ॥ १६५ ॥
जो पीतल वजन मे' भारी, मृदु, पीतवर्णयुक्त, आघात से नहीं टूटने वाली और दृढ, अत्यन्त स्निग्ध तथा मसृण होतो वह पीतल औषध कर्म में श्रेष्ठ है॥ १६५॥
अशुभरीतिका लक्षणम्—
पाण्डुपीता खरा रूक्षा बर्बरा ताडनक्षमा ।
पूतिगन्धा तथा लघ्वी रीतिर्नेष्टा रसादिषु ॥ १६६ ॥
जो पीतल पाण्डुता तथा पीलेवर्ण वाली, खर, रूक्ष, आघात से टूटने वाली, लघु और दुर्गन्ध युक्त हो वह रसादि कर्म मे' श्रेष्ठ नहीं है ॥ १६६ ॥
रीतिकाशोधनम्—
तप्त्वा क्षिप्त्वा च निर्गुण्डीरसे श्यामारजोऽन्विते ।
पञ्चवारेण संशुद्धिं रीतिरायाति निश्चितम् ॥ १६७ ॥
पीतल को अग्नि मे' प्रतप्त कर हरिद्राचूर्ण से युक्त निर्गुण्डी के रस में ५ वार बुझाने से वह निश्चय ही शुद्ध हो जाती है ॥ १६७ ॥
रीतिका मारणम्—
निम्बूरसशिलागन्धवेष्टिता पुटिताऽष्टधा ।
रीतिरायाति भस्मत्वं ततो योज्या यथायथम् ॥ १६८ ॥
शुद्ध पीतल के छोटे छोटे पत्र बनाकर उनकी बराबर शुद्ध गन्धक और मन शिला को निम्बू के रस मे' पीसकर पत्रों पर लेप कर देना चाहिए । फिर सम्पुट मे' बन्द कर पुट देवे', इस तरह आठ पुट देने से पीतल की श्रेष्ठ भस्म हो जाती है । इसको शास्त्रानुसार योगों में प्रयुक्त करना चाहिए ॥ १६८ ॥
रस० १३
१९४ रसरत्नसमुच्चये—
मतान्तरम्—
ताम्रवन्मारणं तस्याः कृत्वा सर्वत्र योजयेत् ॥ १८६ ॥
अथवा ताम्रभस्म विधि से पीतल की भस्म बना कर सब जगह उसका प्रयोग करें ॥ १९९ ॥
पित्तलरसायनम्—
मृतारकूटकं कान्तं व्योमसत्त्वं च मारितम् ।
त्रयं समांशकं तुल्यं व्योषं जन्तुघ्नसंयुतम् ॥ २०० ॥
ब्रह्मबीजाजमोदाऽग्निभल्लाततिलसंयुतम् ।
सेवितं निष्कमात्रं हि जन्तुघ्नं कुष्ठनाशनम् ।
विशेषाच्छ्वेतकुष्ठघ्नं दीपनं पाचनं हितम् ॥ २०१ ॥
पीतलभस्म, कान्तलौहभस्म, मारित अभ्रकसत्त्व, इन तीनों को समान भाग ले कर खरल में घोट कर बराबर सोंठ, मिर्च, पीपल, वायविडङ्ग, ढाक के बीज, अजमोद और चित्रक के चूर्ण के साथ एक निष्क (४ मासे) की मात्रा के सेवन करने से कृमि, कुष्ठ और विशेषकर श्वेतकुष्ठ को नष्ट करती है तथा दीपन और पाचन है ॥ २००-२०१ ॥
पित्तलद्रुतिः—
सुवर्णरीतिकाचूर्णं भक्षितं वेष्टितं पुनः ।
छागेन कृष्णवर्णेन मत्तेन तरुणेन च ॥ २०२ ॥
तल्लिप्तं खर्परे दग्धं द्रुतिं मुञ्चति शोभनाम् ।
चतुर्दशलसद्वर्णसुवर्णसदृशच्छविः ।
देहलोहकरी प्रोक्ता युक्ता रसरसायने ॥ २०३ ॥
इति पित्तलाधिकारः ।
सुवर्ण के समान उत्तम पीतवर्ण के शुद्ध पित्तल चूर्ण को किसी खाद्य पदार्थ के साथ मिलाकर काले और हृष्ट पुष्ट जवान बकरे को खिला देना चाहिए, फिर बकरे की विष्ठा (मींगणियां) को द्रावक वर्ग की औषधियों के साथ पीस कर मिट्टी के खर्पर में लिप्तकर अग्नि में जला देने से चौदह प्रकार के वर्ण से युक्त सुवर्ण के समान चमकदार उत्तम पीतल की द्रुति हो जाती है, इसका रस और रसायन कर्म में प्रयोग करने से देह लोह के समान दृढ और स्थिर हो जाती है ॥ ३०२-२०३ ॥
पञ्चमोऽध्यायः । : १९५
अथ कांस्यम्—
कांस्योत्पत्तिवर्णनम्—
अष्टभागेन ताम्रेण द्विभागखुरकेण च ।
विद्रुतेन भवेत्कांस्यं तत्सौराष्ट्रभवं शुभम् ॥ २०४ ॥
आठभाग ताम्र, दो भाग खुरक वङ्ग, इनदोनों को अग्नि में द्रुत करके मिलाने से कांस्य (कृत्रिम) बनता है। इसी विधि से खानों के अन्दर भी इसकी उत्पत्ति होती है, सौराष्ट्र देश का बना कांसा शुभ होता है ॥ २०४ ॥
अथ प्रशस्तकांस्यलक्षणम्—
तीक्ष्णशब्दं मृदु स्निग्धमीषच्छ्यामलशुभ्रकम् ।
निर्मलं दाहरक्तं च षोढा कांस्यं प्रशस्यते ॥ २०५ ॥
जो कांसा बजाने से तेज शब्द करता हो और मृदु, स्निग्ध तथा कुछ श्यामता युक्त शुभ्र (श्वेत) वर्ण का हो, निर्मल तथा अग्नि में तपाने से रक्तवर्ण का हो जाय इन लक्षणों वाला कांसा श्रेष्ठ होता है ॥ २०५ ॥
त्याज्यकांस्यलक्षणम्—
तत्पीतं दहने ताम्रं खरं रूक्षं घनासहम् ।
मन्दनादं गतज्योतिः सप्तधा कांस्यमुत्सृजेत् ॥ २०६ ॥
जिस कांसे का वर्ण पीला हो तथा अग्नि में तपाने से ताम्बे के समान वर्ण हो जाय तथा खर, रूक्ष, पीटने से टूटने वाला, ताड़न करने पर मन्द शब्द करने वाला और कान्ति रहित हो, इन सात लक्षणों वाला कांस्य औषध कर्म में त्याज्य है ॥ २०६ ॥
अथ कांस्यगुणाः—
कांस्यं लघु च तिक्तोष्णं लेखनं दृक्प्रसादनम् ।
कृमिकुष्ठहरं वातपित्तघ्नं दीपनं हितम् ॥ २०७ ॥
घृतमेकं विना चान्यत्सर्वं कांस्यगतं नृणाम् ।
भुक्तमारोग्यसुखदं हितं सात्म्यकरं तथा ॥ २०८ ॥
कांस्य लघु, तिक्त, उष्ण और लेखन होता है तथा कृमि, कुष्ठ, वात, पित्त का नाशक, अग्नि को दीप्त करने वाला और दृष्टि को बढ़ाता है तथा हितकर है।
कांसे के बने पात्र में घृत को छोड़कर अन्य भोज्य पदार्थ रखकर खाने से मनुष्यों ।
१९६ | रसरत्नसमुच्चये—
के लिये आरोग्य और सुख प्रद है और शरीर के या प्रकृति के लिये सात्म्य होता है ॥ २०७-२०८ ॥
अथ कांस्यशोधनम्—
तप्तं कांस्यं गवां मूत्रे वापितं परिशुध्यति ॥ २०९ ॥
कांसे को अग्नि में प्रतप्त कर गोमूत्र में सातवार बुझानेसे वह शुद्ध होजाता है॥२०९॥
अथ कांस्यमारणम्—
म्रियते गन्धतालाभ्यां निरुत्थं पञ्चभिः पुटैः ॥ २१० ॥
कांस्य के पत्रोंपर निम्बूरस से घोटे हुए गन्धक और मनःशिला का लेपकर पांच पुट देने से उसको निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ २१० ॥
मतान्तरम्—
त्रिक्षारं पञ्चलवणं सप्तधाऽम्लेन भावयेत् ॥
कांस्याऽऽरकूटपत्राणि तेन कल्केन लेपयेत् ।
रुद्ध्वा गजपुटे पक्कं शुद्धभस्मत्वमाप्नुयात् ॥ २११ ॥
इति कांस्याधिकारः ।
सजिखार, ज़वाखार, टङ्कण और पांचो नमक (सौवर्चल, सैन्धव, विड्, औद्भिद, सामुद्र) इनको किसी अम्लरस से सातवार भावित कर कांस्य तथा पीतल के पत्रों पर लेप करके सम्पुट में बन्द कर गज पुट में फूक देने से कांसे या पीतल की उत्तम भस्म हो जाती है॥ २११ ॥
अथ वर्तलोहम्—
वर्तलोहस्वरूपः—
कांस्यार्कर्रीतिलाहाऽहिजातं तद्वर्त्तलोहकम् ।
तदेव पञ्चलोहाख्यं लोहविद्भिरुदाहृतम् ॥ २१२ ॥
कांस्य, ताम्र, पित्तल, लोह, सीस इनको गला कर मिला देने से जो धातु बनती है उस को लोहके विशेषज्ञ वर्तलोह या लोहपञ्च या पञ्चलोह (भरत) कहते हैं॥२१२॥
अथ वर्तलोहगुणाः—
हिमाम्लं कटुकं रूक्षं कफपित्तविनाशनम् ।
रुच्यं त्वच्यं कृमिघ्नं च नेत्र्यं मलविशोधनम् ॥ २१३ ॥
तद्भाण्डे साधितं सर्वमन्नव्यञ्जनसूपकम् ।
पञ्चमोऽध्यायः । १९७
पञ्चमोऽध्यायः । १९७
अम्लेन वर्जितं चापि दीपनं पाचनं हितम् ॥ २१४ ॥
वर्तलोह ( भरत ) शीतवीर्य्य, अम्ल, कटु, रूक्ष, कफपित्त और कृमि को नष्ट करता है, त्वचा और नेत्र के विकारों में हितकर तथा रुचिकारक और मल-शोधक होता है तथा भरत के बने हुए पात्र में अम्ल पदार्थ के अतिरिक्त और अन्य सर्व प्रकार के अन्न, शाक, दाल इत्यादि बनाकर खाने से अग्नि अत्यन्त दीप्त होती है तथा पाचकशक्ति भी बढती है ॥ २१३-२१४ ॥
वर्तलोहशोधनम्— द्रुतमश्वजले क्षिप्तं वर्तलोहं विशुष्यति ॥ २१५ ॥
वर्तलोह को अग्नि पर पिघलाकर तुरन्त ही घोड़े के मूत्र में बुझाने से वह शुद्ध होजाता है ॥ २१५ ॥
वर्तलोहमारणम्— म्रियते गन्धतालाभ्यां पुटितं वर्तलोहकम् । तेषु तेष्विह योगेषु योजनीयं यथाविधि ॥ २१६ ॥ इति वर्तलोहाधिकारः ।
शुद्धवर्त लोह के छोटे २ पत्र या टुकड़े करके उन पर समानभाग गन्धक और शुद्ध हरताल को निम्बू के रस में घोटकर लेप कर देना चाहिए, पश्चात् सम्पुट में बन्द करके गजपुट में सात बार फूंक देना चाहिए, इस तरह बनी भस्म को यथाशास्त्र सर्वप्रयोगों में प्रयुक्त करनी चाहिए ॥ २१६ ॥
अथ रसोपरसलोहानां सूतसाधकत्वनिर्देशः— जातिमद्भिर्विशुद्धैश्च विधिना परिसाधितैः । रसोपरसलोहाद्यैः सूतः सिध्यति नान्यथा ॥ २१७ ॥
जो रस उपरस और लोह उत्तमजाति के हों तथा विधिपूर्वक शुद्ध और भस्म किये गये हों उन्हीं के संसर्ग से पारद सिद्ध होकर शरीर को अजर अमर बनाता है, इनके बिना पारद भी सिद्ध नहीं होता है ॥ २१७ ॥
रत्नादीनां सूतयोग्यत्वनिर्देशः— रत्नानि लोहानि वराटशुक्तिपाषाणजातं खुरशृङ्गशल्यम् । महारसाद्येषु कठोरदेहं भस्मीकृतं स्यात्खलु सूतयोग्यम् ॥२१८॥
सर्वप्रकार के रत्न, लोह (सप्त या अष्ट धातु) कौड़ी, शुक्ति, पाषाणजाति या
१९८ रसरत्नसमुच्चये—
'पाषाण से उत्पन्न होने वाले खनिज पदार्थ, खुर, सींग, शल्य (अस्थि) और महारसादियों में जो कठिन (दृढाङ्ग) पदार्थ वैक्रान्त, माक्षिक आदि हैं, उन्हें विधिपूर्वक शुद्ध करके भस्म के रूप में बनाने पर ही वे पारद के कार्य में उपयुक्त हो सकते हैं, अतः बुद्धिमान् को चाहिए कि यथाशास्त्र इनकी शुद्धि तथा भस्म करे' ॥ २१८ ॥
भूनागसत्त्वपातनम्—
वज्राणां द्रावणार्थाय सत्त्वं भूनागजं ब्रुवे ।
तदेव परमं तेजः सूतराजेन्द्रवज्रयोः ॥ २१९ ॥
धौतभूनागसम्भूतं मर्दयेद्भृङ्गजद्रवैः ।
निम्बूर्द्रवैश्च निर्गुण्ड्याः स्वरसैस्त्रिदिनं पृथक् ॥ २२० ॥
तद्द्रावणगणोपेतं सम्मर्द्य वटकीकृतम् ।
निरुध्य दृढमूषायां द्विण्डं प्रधमेद् दृढम् ॥ २२१ ॥
स्वतः शीतं समाहृत्य पट्टके विनिवेश्य तत् ।
रवकान् राजिकातुल्यानैशूनतिभरान्वितान् ॥ २२२ ॥
द्वादशांशार्कसंयुक्तानध्मित्वा रवकान्हरेत् ।
प्रक्षाल्य रवकानाशु समादाय प्रयत्नतः ॥ २२३ ॥
वज्रादिद्रावणं तेन प्रकुर्वीत यथेप्सितम् ।
खरसत्त्वमिदं प्रोक्तं रसायनमनुत्तमम् ।
द्वित्रिमूषासु चैकस्यां सत्त्वं भवति निश्चितम् ॥ २२४ ॥
भूनाग (केञ्चुआअर्थवर्म) का सत्त्व हीरकादि वज्रों के द्रावण करने में अत्यन्त उत्तम है तथा पारद और हीरक की शक्ति को बढाता है, इस लिये इस सत्त्व के पातन की विधि कहता हूं। जल से अच्छी प्रकार धोये हुए केञ्चुओं को सुखा कर उनका चूर्ण बना लेना चाहिए, फिर इस चूर्ण को भृङ्गराजरस (भांगरा), निम्बूरस और निर्गुण्डी स्वरस, से पृथक् २ तीन २ दिन तक मर्दनकरके द्रावक वर्ग के पदार्थ मिलाकर घोट लेना चाहिए। फिर टिकिया बनाकर एक मजबूत मूषा के अन्दर बन्द करके दो दण्ड (४८ मिनट) तक तेज अग्निद्वारा फूंकना चाहिए। स्वाङ्गशीत होने पर मूषा से उनको निकाल कर किसो पट्ट (काष्ठपट्ट या वस्त्र) पर डाल कर या वस्त्र से छान करके राई के बराबर मोटे २ तथा वजनी सत्त्व