भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

जन्म-मरण का महारोग

जन्म-मरण का महारोग

हम सब छोटे-से-छोटे रोग से भी छुटकारा पाने के लिए बहुत सावधानी से प्रयत्न करते हैं। यदि हमें लगता है कि जिस डॉ० से हम अपना इलाज करवा रहे हैं, जिसकी दवा खा रहे हैं, उससे हमें तनिक भी आराम नहीं आ रहा है, कहीं भी ऐसा नहीं लग रहा कि हमारा रोग दूर हो पायेगा तो हम फौन दूसरे डॉ० की सलाह लेते हैं, उसकी दवा शुरू करते हैं।

रोगों को मिटाकर प्राण दान देने वाले डॉ० को भगवान भी कहा जाता है। ऐसे ही जन्म-मरण के महारोग को मिटाकर अमर-धाम में आत्मा को पहुँचाने वाले सदगुरु को भगवान से भी अधिक दर्जा संतों ने दिया है। पर अफ़सोस है कि इस महारोग से छुटकारा पाने के लिए हम बड़ी ही लापरवाही बरतते हैं। बार-बार जन्म-मरण का महारोग संसार के सब जीवों को लगा हुआ है। सब इस महारोग से ग्रसित हैं, कोई भी इसकी ठीक-ठीक दवा नहीं जान पा रहा है।

कोई इस रोग से बचने के लिए यज्ञ बता रहा है, कोई तप। कोई तीर्थ बता रहा है तो कोई मंत्र जाप। पर कोई भी इससे छूट नहीं पा रहा है। यह सब चीजें ऐसी ही हैं, जैसे अंग्रेजी दवा खाकर रोग से कुछ देर के लिए छूट गये, पर जड़ से रोग खत्म न हुआ। कुछ देर के लिए स्वर्ग में चले गये, कुछ देर के लिए ब्रह्म लोक में चले गये और कर्मों के छीन होने पर पुनः भवसागर में गिर पड़े। जैसे अंग्रेजी दवा ने रोग को दबा दिया तो बाद में वो किसी अन्य रूप में उभर आई, क्योंकि जड़ से समाप्त नहीं हुई। ऐसे ही कालांतर में संतों से पहले सदा के लिए इस भवसागर से छुटकारा कोई नहीं पाया। साहिब कह रहे हैं—

117

118

साहिब बन्दगी

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई ॥

वापिस आना ही पड़ा। सदा के लिए, जड़ से यह महारोग समाप्त न हुआ। बड़े-2 योगियों का भी यह रोग सदा के लिए समाप्त नहीं हुआ। तभी तो बड़े-बड़े योगी भी माया और निरंजन के वश में हो गये। बड़ी-बड़ी तपस्या करने के बाद भी माया ने सबको छल लिया। जहाँ देवराज इंद्र को छल लिया गया, जो गौतम की स्त्री के पास पहुँच गया, वहाँ अन्य की बात करना ठीक नहीं है। देवराज बड़ी तपस्या से बनता है। कहने का भाव है कितनी भी तपस्या कर लो, माया नहीं छोड़ेगी।

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।

गूह छोड़ भये संयासी, तऊ न पावत पारा ॥

इसलिए यह सही उपाय नहीं है। सही उपाय बता रहे हैं-

सत्य नाम निज औषधी, सतगुरु दीन बताय।

औषध खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय ॥

सच्चा नाम ही इस महारोग की औषधी है। पर इस औषधी की भी नक़ल हो गयी है। सब संत बनकर यह औषधी दे रहे हैं। तभी तो साहिब को कहना पड़ा-

कोटि नाम संसार में, तिनते मुक्ति न होय।

मूल नाम जो गुप्त है, जाने बिरला कोय ॥

कहने में सब संत बने हैं, पर भक्ति इस संसार में बार-बार आने की दे रहे हैं, नाम काल पुरुष का दे रहे हैं। खैर, जनता जनादन को भी सलाम है कि लगी है फिर भी।

...तो सदगुरु के सत्यनाम के बिना इस महारोग से कोई छूट नहीं सकता है। कुछ नाम की बात कर रहे हैं, अमर लोक की भी बात कर रहे हैं, पर वो वहाँ पहुँचे नहीं है, केवल पढ़ी-लिखी बातें कह रहे हैं, उन्हें उस अमर-लोक का सही-सही ज्ञान नहीं है। ऐसे लोगों के लिए साहिब कह रहे हैं-

रोगों की पहचान

119

बिन देखे उस देश की, बात करे सो क्रूर। आप तो खारही खात है, बेचत फिरे कपूर ॥

इसलिए ऐसे लोगों से तो बहुत सावधान रहने की जरूरत है। कुछ कह रहे हैं कि सत्लोक में धुनें हो रही हैं। वो शब्द को ही परमात्मा कह रहे हैं। नहीं, साहिब ने तथा संतों ने कभी शब्द को परमात्मा नहीं कहा। वो तो कह रहे हैं-

जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, वाको काल न खाय ॥

कह रहे हैं कि जाप भी मर जाता है। जाप यानी मुँह से जो उच्चारण हुआ, वो जाप है। फिर अजपा भी मर जाता है। जो मन से जाप हुआ, वो अजपा है, वो तुरिया की स्थिति में होता है। वो भी मर जाता है। फिर अनहद भी महाशून्य तक जाता है, आगे नहीं जा पाता, इसलिए वो भी मर जाता है।

आवाज दो के बिना नहीं हो सकती है। इसलिए जहाँ आवाज है, वहाँ द्वैत है और जहाँ द्वैत है, वहाँ माया है। तो वो कह रहे हैं कि सत्लोक में धुनें हो रही हैं। यानी उन्होंने कहीं निचले देशों को ही अमर-लोक मान लिया है, वो वहाँ पहुँचे नहीं हैं। इसलिए उनके पास सच्चा नाम भी नहीं हैं। इसलिए यह भी सावधानी बरतनी है। जन्म-मरण के महारोग से छूटना है तो सच्चे सद्गुरु की खोज करनी होगी, क्योंकि उन्हीं से तो सच्चा नाम मिलेगा। इसलिए-

सतगुरु खोजो संत, जीव काज को चाहहु। मेटो भव को अंक, आवागमन निवारहु ॥

सत्यपुरुष का पाँचवा पुत्र निरंजन है

जो तीन लोक का राजा और चौरासी लाख योनियों व अनहद का रचयिता भी है

  1. 1. मैं सिरजों में मारऊँ, मैं जारी में खाऊँ। जल थल नभ मैं रहूँ, मोर निरंजन नाऊँ॥
  2. 2. सात शून्य सातहि कमल, सात सुरति स्थान। इक्षीस ब्रह्माण्ड लग, काल निरंजन ज्ञान॥
  3. 3. एक पाट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लगे, सवा लाख की धानी॥
  4. 4. गुप्त भयो हैं संग सबके, मन ही निरंजन जानिये॥
  5. 5. अनहद की धुन भँवरगुफा में, अति घनघोर मचाया है। बाजे बजे अनेक भाँति के, सुनि के मन ललचाया है॥ ..... यह सब काल जाल को फँदा, मन कल्पित ठहराया है॥
  6. 6. तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार हैं। लग रहे सिद्ध साधु न पावत पार हैं॥
  7. 7. मन ही निराकार निरंजन जानिए॥
  8. 8. ज्योति निरंजन लग काल पसारा। मन माया भई किया सृष्टि विस्तारा॥
  9. 9. बिना जाने जो नर भक्ति करई। सो नहीं भवसागर से तरई॥
  10. 10. मन ही सरूपी देव निरंजन तोहि रहा भरमाई। हे हँसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई॥
  11. 11. निराकार जो वेद वखाने, वोही काल कोई भेद न जाने॥

—कबीर साहिब

120

रोगों की पहचान

121

योगमत और संतमत में अंतर

योगमतसंतमत
1. योगमत में काया का नाम है।1. संतमत में विदेह नाम है।
2. योग मत चाचरी, भूचरी, अगोचरी मुद्राओं के ईर्द-गिर्द घूमता है, जो शरीर में हैं।2. संतमत में पाँच मुद्राओं से आगे शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान रखने को कहा है।
3. यह नाम लिखने-पढ़ने में आता है। इनसे काल-पुरुष ने पाँच तत्व पैदा किये और शरीरों की रचना की।3. यह अकह नाम है जो लिखने-पढ़ने में नहीं आता है और पाँच तत्वों से बाहर है।
4. योगमत में अनहद धुनों को ही परमात्मा माना जाता है।4. संतमत में आत्मा किसी शब्द की मोहताज नहीं, क्योंकि आत्मा अपने आप में परिपूर्ण है।
5. योगमत करनी अथवा कर्माई का मार्ग है।5. यह सहज मार्ग है, गुरु कृपा का मार्ग है और भुंग-मता है।
6. योगमत में सुरति शब्द का अभ्यास किया जाता है।6. संतमत सुरति को चेतन करने का मार्ग है।
7. योगमत में काल का नाम लिया जाता है। यह नाम शरीर को दिया जाता है।7. संतमत जिंदा नाम प्रदान करता है जो कि शरीर को छोड़ आत्मा को दिया जाता है।
8. योगमत में गुरु की भूमिका न के बराबर होती है।8. संतमत में भक्ति का सार ही संत सदगुरु है।
9. योगमत सीमाबद्ध है, जिसमें साधक दसवें द्वार तक ही जाता है।9. संतमत असीम है जो कि ग्यारहवें द्वार की बात करता है, जो सुरति में है।

122

साहिब बन्दगी

योगमतसंतमत
10. योगमत निराकार निरंजन की ही सत्ता को सर्वश्रेष्ठ मानता है। 11. योगमत में कमाई का फल खत्म होने पर वापिस माता के पेट में आना पड़ता है। 12. योगमत वैशाखियों के सहारे चलता है जो कि शास्त्रों की साक्षी देकर अपने आप को स्थापित करता है। 13. इसमें रिद्धि-सिद्धि और दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, मगर आत्मा का ज्ञान नहीं होता है। 14. योगमत मीन और पपील मार्ग हैं।10. संतमत में निराकार सत्ता से आगे चौथे लोक अर्थात अमर लोक की बात की जाती है। 11. संतमत में जीव सदा के लिए आवागमन से मुक्त हो जाता है और अपने निजधाम सत्य लोक को चला जाता है। 12. संतमत में संत सद्गुरु अपने अनुभव से बोलता है जो किसी का मोहताज नहीं होता है। 13. संतमत में जीव को आत्मज्ञान होने से आध्यात्मिकशक्तियाँ मिलती हैं। 14. जबकि संतमत विहंगम मार्ग है।
  • □ पाँच शब्द औ पाँचों मुद्रा, सोई निश्चय माना। आगे पूर्ण पुरुष पुरातन, उसकी खबर न जाना ॥
  • □ नौ नाथ चौरासी सिद्ध लों, पाँच शब्द में अटके। मुद्रा साथ रहे घट भीतर, फिर औंधे मुँह लटके ॥
  • □ काया नाम सबहिं गुण गावैं, विदेह नाम कोई बिरला पावै। विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सद्गुरु साँचा होई ॥
  • □ जब तक गुरु मिले नहीं साँचा, तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥

रोगों की पहचान

123

संतों ने दिया 11वें द्वार का भेद

दशम द्वार से जीव जब जाई। स्वर्ग लोक में वासा पाई॥ 11वें द्वार से जीव जब जाता। परम पुरुष के लोक समाता॥

दसवें द्वार से न्यारा द्वारा। ताका भेद कहूँ मैं सारा॥

नौ द्वारे संसार सब, दसवें योगी साध। एकादश खिड़की बनी, जानत संत सुजान॥

—कबीर साहिब

.... आठ अटाकी अटारी मज्जारा, देखा पुरुष न्यारा। न निराकार आकार न ज्योति, नहीं तहाँ वेद विचारा। ओंकार कर्त्ता नहीं कोई, नहीं तहाँ काल पसार। वह साहिब सब संत पुकारा, और पाखण्ड है सारा। सदगुरु चीन्ह दीन्ह यह मारग, नानक नज़र निहारा॥

—गुरु नानक देव जी

पलटू कहै साँच कै मानो। और बात झूठ कै जानो॥ जहवाँ धरती नाहिँ अकासा। चाँद सूरज नाहिँ परगासा॥ जहवाँ ब्रह्मा विष्णु न जाहीं। दस अवतार न तहाँ समाहीं॥ आदि जोति ना बसै निरंजन। जहवाँ शून्य शब्द नाहिँ गंजन॥ निरंकार ना उहाँ अकारा। अक्षर शब्द नाहिँ विस्तारा॥ जहवाँ जोगी जाए न पावै। महादेव ना तारी लावै॥ जहवाँ हद अनहद नाहिँ जावै। बेहद वहाँ रहनी ना पावै॥ जहवाँ नाहिँ अगिनि परगासा। पाँच तत्व ना चलता स्वाँसा॥

—पलटू साहिब

124

साहिब बन्दगी

भक्ति को कबीर साहिब जी ने

तीन भागों में बाँटा

सगुण भक्ति, निर्गुण भक्ति, परा भक्ति सगुण भक्ति करे संसारा। निर्गुण योगेश्वर अनुसारा॥ इन दोनों के पार बताया। मेरो चित्त एको नहीं आया॥ आपने इन दोनों के पार बताया। दादू दयाल जी ने कहा-

कोई सगुण में रीझ रहा, कोई निर्गुण ठहराय। अटपट चाल कबीर की, मौसे कही न जाय॥

जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, उसको काल न खाय॥

अंदर धुनें हैं। कुछ इसे सुरति शब्द अभ्यास भी कह रहे हैं और उनमें खो जाते हैं। कुछ धुनों को ही परमात्मा कह रहे हैं। पर इससे तुरीयातीत की अवस्था से पार नहीं जा सकते हैं। सबका अपना वजूद है। धुनें खत्म हो जाती हैं। फिर यह कौन-सा शब्द हुआ! यानी धुनात्मक शब्द भी नहीं है, वर्णनात्मक शब्द भी नहीं है। साहिब कह रहे हैं- 'सो तो शब्द विदेह॥' आवाज रहित धुन (Sound less sound) है वो, क्योंकि - 'दो बिन होय न अधर अवाजा॥' आवाज दो के बिना नहीं होती और जहाँ आवाज है, वहाँ माया है।

हद टप्पे सो औलिया, बे-हद टप्पे सो पीर। हद-बेहद दोनों टप्पे, तिसका नाम कबीर॥

रोगों की पहचान

125

अमर लोक का विदेह नाम

काया नाम सबहिं गुण गावै, विदेह नाम कोई बिरला पावै ॥ विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सदगुरु साँचा होई ॥

पाँच तीन यह साज पसारा, न्यारा शब्द विदेही हो। पाँच कहो तो छटवें हम हैं, आठ कहो नौ आई हो ॥

पाँच तीन अधीन काया, न्यार शब्द विदेह हो। सुरति माहिं विदेह दरशै, गुरु मता निज एह हो ॥

छिन इक ध्यान विदेह समाई। ताकी महिमा बरनिन न जाई ॥ सार नाम सदगुरु से पावे। नाम डोर गहि लोक सिधावे ॥ सार शब्द विदेह स्वरूपा। निःअक्षर वह रूप अनुपा ॥ तत्व प्रकृति भाव सब देहा। सार शब्द निःतत्व विदेहा ॥

बावन अक्षर में संसारा। निःअक्षर सो लोक पसारा ॥ सोई नाम है अक्षर बासा। काया ते बाहर परकासा ॥

शब्द शब्द सब कोई कहे, वह तो शब्द विदेह। जिभ्या पर आवे नहीं, निरख परख के लेह ॥

—साहिब कबीर जी

पिण्ड ब्रह्माण्ड और वेद कितेबै, पाँच तत्त्व के पारा। सतलोक यहाँ पुरुष विदेही, वह साहिब करतारा ॥

—दादू दयाल

आरती

आरति करहुँ संत सदगुरु की, सदगुरु सत्यनाम दिनकर की। काम, क्रोध मद, लोभ नसावन, मोह रहित करि सुरसरि पावन। हरहिं पाप कलिमल की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....

तुम पारस संगति पारस तब, कलिमल ग्रसित लौह प्राणी भव। कंचन करहिं सुधर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....

भुलेहुँ जो जिव संगति आवें, कर्म भर्म तेहि बाँधि न पावें। भय न रहे यम घर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....

योग अग्नि प्रगटहि तिनके घट, गगन चढ़े श्रुति खुले वज्रपट। दर्शन हों हरिहर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....

सहस्र कैवल चढ़ि त्रिकुटी आवें, शून्य शिखर चढ़ि बीन बजावें। खुले द्वार सतघर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....

अलख अगम का दर्शन पावें, पुरुष अनामी जाय समावें। सदगुरु देव अमर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....

एक आस विश्वास तुम्हारा, पड़ा द्वार मैं सब विधि हारा। जय, जय, जय गुरुवर की, आरति करहुँ संत सदगुरु की ॥ सदगुरु सत्यनाम.....

126

आरती

जय सदगुरु देवा, स्वामी जय सदगुरु देवा, सब कुछ तुम पर अर्पण करहूँ पद सेवा।

जय गुरुदेव दया निधि, दीनन हितकारी, स्वामी भक्तन हितकारी, जय जय मोह विनाशक, जय जय तिमिर विनाशक, भय भंजन हारी। साहिब जय.....

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, गुरु मूर्ति धारी, स्वामी प्रभु मूर्ति धारी, वेद पुराण बखानत, शास्त्र पुराण बखानत, गुरु महिमा भारी। साहिब जय.....

जप तप तीर्थ संयम, दान विधि दीन्हे, स्वामी दान बहुत दीन्हे, गुरु बिन ज्ञान न होवे, दाता बिन ज्ञान न होवे, कोटि यत्न कीन्हे। साहिब जय.....

माया मोह नदी जल, जीव बहे सारे, स्वामी जीव बहे सारे, नाम जहाज बिठाकर, शब्द जहाज चढ़ाकर, गुरु पल में तारे। साहिब जय.....

काम क्रोध, मद, लोभ, चोर बड़े भारी, स्वामी चोर बहुत भारी, ज्ञान खड़ग दे कर में, शब्द खड़ग देकर में, गुरु सब संहारे। साहिब जय.....

नाना पंथ जगत में निज-निज गुण गावें, स्वामी न्यारे-न्यारे यश गावें, सब का सार बताकर, सब का भेद लखा कर, गुरु मार्ग लावें। साहिब जय.....

गुरु चरणामृत निर्मल, सब पातक हारी, स्वामी सब दोषक हारी, वचन सुनत तम नासे, शब्द सुनत भ्रम नासे, सब संशय टारी। साहिब जय.....

तन, मन, धन सब अर्पण, गुरु चरण कीजै, स्वामी दाता अर्पण कीजै, सदगुरु देव परमपद, सदगुरु देव अचलपद, मोक्ष गती लीजै। साहिब जय.....

127

पुस्तक सूची

हिन्दी में

  1. 1. परा रहस्या
  2. 2. मासिक पत्रिका सत्यकेतु
  3. 3. पावन प्रार्थनाएं
  4. 4. सदगुरु चालीसा
  5. 5. वार्षिक डायरी
  6. 6. सदगुरु भक्ति
  7. 7. कहाँ से तू आया और कहाँ तूझे जाना रे ?
  8. 8. सत्संग सुधा रस
  9. 9. नाम अमृत सागर
  10. 10. अमृत वाणी
  11. 11. सदगुरु नाम जहाज हैं
  12. 12. चल हंसा सतलोक
  13. 13. कोटि नाम संसार में तिनते मुक्ति न होय।
  14. 14. मूल नाम गुप्त है, जाने बिरला कोय ॥
  15. 15. गुरु सुमित्रे सो पार
  16. 16. तीन लोक से न्यारा
  17. 17. सेहत के लिए जरूरी
  18. 18. सहजे सहज पाइये
  19. 19. रोगों से छुटकारा
  20. 20. सदगुरु महिमा
  21. 21. भक्ति के चोर
  22. 22. अनुरागसागर वाणी
  23. 23. भक्ति सागर
  24. 24. हरि सेवा युग चार है, गुरु सेवा पल एक
  25. 25. सत्य नाम के सुमरते उबरे पतित अनेक
  26. 26. काग पलट हंसा कर दीना
  27. 27. कस्तूरी कुण्डल बसै मृग खोजे बन माहि
  28. 28. गुरु पारस गुरु परस है
  29. 29. गुरु अमृत की खान
  30. 30. शीश दिये जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान
  31. 31. मूल सुरति
  32. 32. भृंग मता होय जिहि पास, सो गुरु सत्य धर्मदासा ॥
  33. 33. मैं कहता हूँ आँखिन देखी
  34. 34. गुरु संजीवन नाम बतावे
  35. 35. नाम बिना नर भटक मरे
  36. 36. रोगों की पहचान
  37. 37. यह संसार काल का देश

128