भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

रोगों की पहचान

47

यदि कफ के कारण जुकाम होगा तो सिर तो भारी होगा ही, साथ ही नाक से सफेद कफ भी निकलेगा। यदि पित्त के कारण जुकाम होगा तो प्यास तो अधिक लगेगी ही, साथ में नाक से पीला पदार्थ भी निकलेगा और यदि वायु के कारण जुकाम हुआ तो गला तो बँठेगा ही, साथ ही नाक से पतला-पतला मवाद भी निकलेगा।

साधारणतया नाक का बहना, उसका एक या दोनों तरफ से बंद हो जाना, सिर में भारीपन महसूस होना और अधिक छँके आना आदि बताते हैं कि रोगी को जुकाम हो गया है।

  • ❑ अदरक का रस निकालकर गर्म कर लें। अब उसे शहद में मिलाकर रोगी को चाटने को दें।
  • ❑ चाय में तुलसी के पत्ते डालकर रोगी को पिलाएँ।
  • ❑ तुलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाएँ। मिठास के लिए थोड़ी मिश्री डाल सकते हैं।
  • ❑ अजवायन का काढ़ा बनाकर उसमें थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर रोगी को दें।
  • ❑ कफ के जुकाम में भुने हुए चने खाना भी लाभदायक होता है।

सावधानी बरतें

  • ❑ यदि कब्ज है तो पेट की सफाई के लिए व्रत रखें।
  • ❑ ठंडे जल से मत नहाएँ।
  • ❑ सोते समय सिर के नीचे तकिया मत रखें। यदि रखना ही है तो पतला-सा रखें, जिससे सिर ज्यादा ऊँचा न होने पाए।
  • ❑ दही और घी मत खाएँ।
  • ❑ भोजन हल्का करें, जो जल्दी पच सके।

आँखों से दिखना कम हो जाने पर

  • ❑ 5 ग्राम भीमसेनी कपूर लें, 5 ग्राम केसर और 260 ग्राम गुलाब जल को लेकर अच्छी तरह घोंट ले। अब अच्छी तरह छानकर

48

साहिब बन्दगी

किसी बोटल में भर लें। इसका सेवन आँखों के लिए बहुत लाभकारी है।

पीपल, बहेड़े की गुठली का गूदा, बच, मिर्च, हर्र, शंखनाभि, कूठ, मनःशिला-सबको बकरी के दूध के साथ अच्छी तरह पीस लें। अब छोटी-2 बत्तियाँ बना लें। इन बत्तियों को शहद के साथ घिसकर आँख में लगाने से दृष्टि बढ़ती है।

बड़ा सौँफ, बादाम की गिरी, कूजे वाली मिश्री-सबको समान मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें और किसी शीशी में रख लें। 12 ग्राम यह चूर्ण रात को सोने के ठीक पहले पौन गिलास दूध के साथ प्रतिदिन डेढ़ महीने तक लें।

नीम कमल, मुलहटी, तमाल पत्र, कपूर, गेरू और नागकेशर-सबको पीसकर आँखों में अंजन की तरह लगाएँ।

ज्योतिष्मती के तेल की 3-4 बूँदों को मक्खन के साथ मिलाकर चाटना बड़ा ही हितकर होता है।

60 ग्राम कलमी शोरे को प्याज के रस में डालकर आग पर रखें। जब प्याज का रस जल जाए तो उसे उतार शीशी में बंद करके रख दें। यह नेत्रों का बेहतरीन सुरमा तैयार हो गया। इसे सुरमे की तरह ही लगाएँ।

आँख दुखने पर

सबसे पहले मँहदी की थैली बना लें। अब उस थैली में सुपारी, कपूर, फिटकरी, काठा और लोध डालकर थोड़ा पानी भी डाल दें, जिससे सब अच्छी तरह से तर हो जाएँ। अब उस थैली को आँखों में लगाएँ।

ग्वारपाटे का रस आँखों में लगाएँ।

बहेड़े को शहद में घिसकर लेप करें।

आमिया हल्दी और ग्वारपाटे का गूदा मिलाकर लेप बना लें।

रोगों की पहचान

49

यह लेप आँखों के ऊपर लगाएँ।

आँख आने पर

आँख आने पर आँखों में से बराबर कीच तो निकलती ही है, साथ ही आँखें लाल भी हो जाती हैं और दर्द भी होता है।

  • ❑ दारू हल्दी, रसौत, सेंधा नमक और हर्-सबको एक साथ जल के सहयोग से पीस लें। लेप तैयार हो जाने पर इसे आँखों के चारों तरफ लगाएँ।
  • ❑ सर्वप्रथम पेट की सफाई करें और फिर 10 ग्राम हालम में चीनी मिलाकर खाएँ।
  • ❑ दारू हल्दी को पानी में औटाएँ। फिर छानकर रोगी की आँखों में डालें।
  • ❑ 50 ग्राम गुलाब जल में 2-3 ग्राम फिटकरी मिला लें। अब किसी कपड़े से इसे छान लें। यह जल रोगी की आँखों में 2-2 बूँदें सुबह-शाम डालें।

पोथकी ( रोहें ) रोग होने पर

इसमें आँखों की पलकों के भीतर दाने तो निकलते ही हैं, साथ ही आँखों से पीब भी निकलती है।

  • ❑ फिटकरी को तवे पर भूनकर अच्छी तरह से पीस लें। अब इसे गुलाबजल में घोलें। इसकी दो-दो बूँदें आँखों में दिन में तीन बार डालें। पर डालने से पहले आँखों को साफ पानी से छींटे मारकर अच्छी तरह से धो लें।
  • ❑ त्रिफले को रात के समय पानी में डाल दें। सुबह किसी कपड़े से छानकर उसी पानी से आँखों पर छींटे मारकर धो लें।

अण्डकोषों में दर्द होने पर

  • ❑ 120 ग्राम कड़वी तूंबी की गिरी, 25 ग्राम साबुन-दोनों को

50

साहिब बन्दगी

पानी में डाल अच्छी तरह से मसल लें। अब इसे कड़बी तूँबी के ही पत्ते पर डालकर अण्डकोषों पर बाँध दें। विकल्प के तौर पर किसी बारीक पकड़े का सहारा भी ले सकते हैं। 4-5 दिन यह प्रयोग करें।

पीलिया होने पर

जब मुँह कड़वा रहने लगे, सिर में चक्कर आने लगे, मल काला आने लगे, कब्ज की शिकायत रहने लगे, उल्टियाँ होने लगे तो समझ लेना चाहिए कि शीघ्र ही पीलिया का रोग होने वाला है।

इसमें शरीर पीला तो होता ही है, शोच भी काली आती है। अनार के पत्तों को पीसकर चूर्ण बना लें। 5 ग्राम इस चूर्ण को छाछ (गाय के दूध की) के साथ रोगी को दें।

चिरायता और कुटकी दोनों समान मात्रा में लेकर अच्छी तरह घोंट लें। अब रात के समय उसे पानी में डाल दें। सुबह उठकर साफ कपड़े से छान लें। इस पानी में मिठास के लिए थोड़ी-सी मिश्री डालकर रोगी को पिलाएँ। यह दवा हररोज रोगी को पिलाएँ।

पीपल के 5 कोमल थोड़े छोटे साइज के पत्ते लेकर अच्छी तरह से साफ कर लें। फिर मिश्री के साथ कूट-पीस लें। अब पौन गिलास पानी में मिला लें। फिर छानकर वो पानी रोगी को पिला दें। यह प्रयोग सुबह-शाम तब तक करें, जब तक रोगी ठीक न हो जाए।

भोजन के बाद 25 मिली ग्राम रोहितकारिष्ठ चम्मच-भर पानी में मिलाकर रोगी को दें।

शंख भस्म, पुर्नवा, नवायस लौह और मण्डूर-सब 250-250 मि. ग्रा. और गिलोय सत्व 4 ग्राम लेकर अच्छी तरह पीस लें। फिर इसकी 8 पुड़ियाँ बना लें। 5 घण्टे के अन्तराल से जल

रोगों की पहचान

51

के साथ एक पूड़ी मिलाकर रोगी को पिलाते जाएँ।

सावधानी बरतें

  • ❑ तेलयुक्त पदार्थ, गर्म मसाले, खट्टी चीजें मत खाएँ।

लू लगने पर

इसमें सिर में दर्द तो होता ही है, साथ ही आँखों के सामने अँधेरा भी छा जाता है, घबराहट और उल्टियाँ भी होती हैं।

  • ❑ नींबू और प्याज के रस में काला नमक मिलाकर रोगी को चटाएँ।
  • ❑ प्यास लगने पर नींबू पानी दें।
  • ❑ आमरस में थोड़ा नमक मिलाकर रोगी को दें।

निमोनिया होने पर

इसमें रोगी की स्वाँस क्रिया तो तेज होती ही है, साथ ही पसलियों में दर्द और खाँसी भी होती है।

  • ❑ फिटकरी को आग पर रखकर लावा बनाने के बाद अच्छी तरह पीसकर उसका चूर्ण बना लें। 350 ग्राम इस चूर्ण को 120 मि. ग्रा. अन्नम भस्म और एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर रोगी को पिलाएँ। यह दवा रोगी को दिन में 3 बार अवश्य दें।

सावधानी बरतें

रोगी को स्वच्छ और हवादार कमरे में रखें, पर ठंड से बचाने के लिए गर्म कपड़े भी पहनाए रखें।

आँव आने पर

इसमें बार-बार मल त्याग की इच्छा होती है, पर मल में सफेद आँव आती है। कभी रक्त भी आता है और बाद में पेट में मरोड़ लगते हैं, जो कि दुखदायी होते हैं।

  • ❑ बेल-फल के अंदर के गूदे को पानी में अच्छी तरह मिला लें।

५२

साहिब बन्दगी

अब उसे छानकर उसमें सौँफ व शक्कर मिलाकर रोगी को दें। बायविडिंग को नींबू के रस में मिलाकर दें। काली गिलोय के फल, फूल या पत्तों में से जो भी मिल जाए, उसे पानी में मिलाकर रस तैयार करें। यह रस पौन चम्मच (छोटा) सुबह, दुपहर और शाम के समय रोगी को दें।

बवासीर होने पर

यह दो तरह की होती है—खूनी और वादी। खूनी बवासीर में मल-द्वार के मस्से बाहर निकल आते हैं, उनमें सूजन होती है और मल-त्याग के समय इनमें से खून निकलता है। दूसरी ओर वादी बवासीर में मस्से भीतर की ओर होते हैं।

18 मि. ग्रा. कुटजारिष्ठ चम्मच-भर पानी के साथ रोगी को दें। हारसिंगार के 20 ग्राम बीजों की मिंगी और 5 ग्राम काली मिर्च-दोनों को पानी के साथ पीसकर छोटी-छोटी गोलियाँ बना लें। यह गोली खाना बहुत ही लाभकारी है।

बेल के फल की 35 ग्राम गिरी, 6 काली मिर्च, 500 मि. ग्रा. इलायची, 12 ग्राम मिश्री-सबको कूट-पीसकर रोगी को दें। यह खूनी बवासीर में लाभदायक है।

10 ग्राम सफेद कथा, 10 ग्राम रीठे का जलाया गया छिलका-दोनों को अच्छी तरह से कूट-पीस लें। ढाई ग्राम यह दवा दिन में दो बार लें। बहुत लाभकारी है।

नीम के पत्ते, सोनापाठा, चित्रक की जड़ की छाल, कटकंज के बीजों की गिरी, सेंधा नमक, छोटी हरड, इंद्रयव, सोंठ, बेल के पत्ते-सब 110-110 ग्राम लेकर अच्छी तरह कूट-पीसकर छान लें और काँच की बोटल में रख दें। 3 ग्राम यह चूर्ण छाछ के साथ प्रातः लें।

2 ग्राम अजवायन को पीसकर छाछ में डालें। साथ में थोड़ा-सा

रोगों की पहचान

53

सेंधा नमक भी डाल लें। यह दवा दुपहर को भोजन के बाद लें।

❑ आम की गुठली को पीस लें। अब 2 ग्राम की मात्रा रोगी को दें।

❑ प्राणदा वटी की गोली दिन में तीन बार जल के साथ रोगी को दें।

नोट : शहद का सेवन नित्य करें।

अजीर्ण ( बदहज्मी ) होने पर

इसमें खट्टी डकारें आना और भूख का नहीं लगना, घबराहट का होना, पेट में दर्द का होना, उल्टी जैसा मन होना आदि स्थितियाँ बनी रहती हैं।

❑ पेट की सफाई करना इस रोग की पहली दवा है।

❑ 4 ग्राम नींबू के रस में इतना ही अदरक का रस मिलाकर उसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर सेवन करें।

❑ 12 ग्राम तेजाब गंधक, 600 ग्राम सिरका, 60 ग्राम जीरा, 60 ग्राम काला नमक-सबको किसी ढक्कन वाले बर्तन में डालकर ढाई दिन तक रहने दें। बाद में छाया में उस दवा को सुखा लें। अब 5 रती यह दवा रोज खाएँ।

❑ 12 ग्राम तुलसी के पत्तों का रस और पिप्पल चूर्ण-दोनों को शहद में मिलाकर रोगी को चटाएँ।

❑ ढाई ग्राम धनिए के चूर्ण और ढाई ग्राम ही सोंठ को गुनगुने पानी में मिलाकर रोगी को दें।

❑ मामूली-सी हींग को भून लें। अब उसमें सेंधा नमक मिलाकर जल के साथ रोगी को दें।

मूत्र न आने पर

❑ 35 ग्राम एरण्ड के तेल को गर्म पानी में डालकर सेवन करें।

❑ मूली के पत्तों का रस पिएँ। 50 ग्राम के लगभग लें।

54

साहिब बन्दगी

रुक रुक कर पेशाब आने पर

कटियाली के रस में शहद मिलाकर पिएँ।

ढाई ग्राम जीरे को इतनी ही मिश्री के साथ पीसकर शीतल जल से सेवन करें।

बार बार पेशाब आने पर

यदि रात को बार-बार पेशाब के लिए उठना पड़ता हो तो शाम के भोजन के बाद 40 ग्राम धुने हुए चने बिना छिलका उतारे ही खाएँ। फिर गुड़ खाकर पानी पीना चाहिए।

मेथी का साग खाएँ।

पेट में दर्द होने पर

नौशादर, गेरु मिट्टी और काली मिर्च-सबको बराबर मात्रा में लेकर बहुत ही बारीक पीस लें। 260 मि. ग्रा. इस चूर्ण का गर्म की हुई सौफ के साथ सेवन करें।

काली मिर्ची, सोंठ और काल नमक को पीसकर चूर्ण बना लें। अब ढाई ग्राम यह चूर्ण फॉककर गुनगुना पानी पी लें।

आक का दूध दें। यह अत्यंत लाभकारी औषधी है।

हींग, अजवायन, सेंधा नमक और हरड मिलाकर सेवन करें।

पेट में सूजन होने पर

मकोय के रस में थोड़ी सोंठ डालकर उसका लेप करें।

नाभि स्थान में दर्द होने पर

22 ग्राम सौफ, 22 ग्राम गुड़ दोनों को मिलाकर सुबह खाली पेट खाना लाभकारी है।

पेट में कीड़े होने पर

200 मि. ग्रा. बच दूध में मिलाकर रोगी को पिलाएँ।

रोगों की पहचान

55

  • ❑ अंकोल की जड़ का रस काढ़ा करके पिएँ।
  • ❑ बेल के पत्तों का रस पिएँ।
  • ❑ 600 मि. ग्रा. अजवायन के चूर्ण में इतना ही गुड़ मिलाकर गोली बनाकर सुबह-शाम खिलाएँ।
  • ❑ दो किलो पानी में 60 ग्राम अनार के जड़ की छाल को डालकर उबालें। जब पानी आधे से थोड़ा कम रह जाए तो उतार लें। ठंडा होने पर रोगी को 15-15 मिनट बाद एक कप पानी पिलाते जाएँ।

मंदाग्नि होने पर

इसमें खायो हुआ पदार्थ बिना पचे ही बाहर आ जाता है। फिर जी मचलना, भूख कम लगना, खट्टी डकारें आना आदि भी होता ही है।

  • ❑ दिन के भोजन के बाद 5 ग्राम लवणभास्कर चूर्ण पानी के साथ लें।
  • ❑ 300 मि. ग्रा. अग्निरस को शहद में मिलाकर रोगी को चटाएँ।

पेट में गैस होने पर

  • ❑ दूध में छोटी पीपल डालकर उबालें और फिर यह दूध पिएँ।
  • ❑ बैंगन की सब्जी खाएँ।
  • ❑ सुबह-2 रोजाना आधे नींबू को एक गिलास पानी में निचोड़कर पिएँ।
  • ❑ दिन में दो बार भोजन के बाद एक काली हरड चूसने से बहुत लाभ मिलता है।
  • ❑ पाँच लींग पीस लें। अब पौन कप पानी में डालकर उन्हें उबालें। जब ठंडा हो जाए तो पी लें। सुबह-शाम यह दवा लें।

गुर्दे की पथरी होने पर

  • ❑ 45 ग्राम कलमी शोरे को किसी बर्तन में बिछाकर आग पर रखें।

56

साहिब बन्दगी

ऊपर से 34 ग्राम काली मिर्च डालें। जब काली मिर्च अच्छी तरह उसमें मिल जाएँ तो उतारकर ठंडा कर लें। अब उसे पीसकर किसी बर्तन में रख लें। यह दवा आधा ग्राम की मात्रा में पानी के साथ रोगी को देनी चाहिए। बहुत लाभकारी है।

100 ग्राम कलमी शोरा, 50 ग्राम बेर पत्थर और ढाई सेर मूली रस लेकर रख लें। सबसे पहले एक बर्तन में 100 ग्राम कलमी शोरा डालें। तब उस पर 50 ग्राम बेर पत्थर डालें। फिर आधा सेर मूली रस डालकर आग पर रखें। भली-भाँति गर्म करके ठंडा होने के लिए रखें। जब ठंडा हो जाए तो पुनः आधा सेर मूली रस डालकर आग पर रखें। फिर अच्छी तरह गर्म करके ठंडा होने के लिए रखें। ऐसे ही आधा-आधा सेर मूली रस डालकर बार-बार गर्म करते जाएँ। यानी पाँच बार आपको गर्म करके ठंडा करना पड़ेगा। तो अंतिम बार ठंडा करने के बाद दवा तैयार हो जायेगी। अब 1 रत्ती जवाखार, 1 रत्ती मूली क्षार और एक रत्ती बनायी हुई दवा पानी में डालकर दिन में दो बार रोगी को दें। यह बहुत ही लाजवाब दवा है। पथरी रेत बनकर मूत्र-मार्ग से बाहर आ जाती है।

नोट : गुर्दे की पथरी में यदि औषधियों से लाभ न मिले तो जर्मनी में ऐसी मशीन का अविष्कार हुआ है, जिससे आप्रेशन की जरूरत नहीं पड़ती और वो मशीन बाहर से ही ऐसी तरंगे छोड़ती है कि गुर्दे की पथरी टूटकर मूत्र-मार्ग से बाहर आ जाती है। अभी यह भारत में भी आ गयी है। इसलिए आप्रेशन से बचें। इसमें रोगी को बेहोश करने की भी जरूरत नहीं होती और न ही शरीर के किसी अन्य अंग को हानि पहुँचती है। अस्पताल में रुकने की भी रोगी को जरूरत नहीं रहती है।

अन्य उपचार

☐ छाछ का सेवन करते रहें।

☐ मूली का सेवन करें।

रोगों की पहचान

57

❑ मूली के बीजों का काढ़ा पिएँ। बहुत ही लाभकारी है।

❑ शहद का सेवन करें।

❑ 22 ग्राम मूली के रस में 1 ग्राम यवक्षार मिलाकर दिन में दो बार सेवन करें।

❑ चुकंदर को उबालकर उसका 35 ग्राम पानी पिएँ। यह दवा दिन में तीन बार लें। बहुत ही लाभकारी दवा है।

❑ 10 मि. ग्रा. यवक्षार तथा 60 ग्राम टिंडे का रस सुबह-शाम लें।

माथे में दर्द होने पर

❑ चंदन के तेल में थोड़ा कपूर मिलाकर माथे पर लगाएँ।

अम्ल पित्त होने पर

इसमें छाती और गले में जलन होना, खट्टी डकारें आना, जी मचलना, पेट में भारीपन, प्यास का अधिक सताना आदि स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।

❑ जीरे को तवे पर भूनकर उसमें जरा-सा सेंधा नमक डाल दें। अब इसे संतरे के रस में मिलाकर रोगी को पिलाएँ।

❑ बेलगिरी के ताजा पत्ते तोड़ लाएँ। अब इन्हें जल की सहायता से पीस लें। मिठास के लिए मिश्री भी डाल दें। यह दवा रोगी को दें।

❑ अडूसे के पत्ते और नीम के पत्ते लेकर उनका रस निकाल लें। इस रस में शहद मिलाकर रोगी को पिलाएँ।

पायरिया होने पर

इसमें मसूड़ों में सूजन तो होती ही है, साथ ही उनमें से पीब भी निकलती है।

❑ नीम की पत्तियों को पानी में उबाल कर कुछे करें। यह दवा दिन

58

साहिब बन्दगी

में 4-5 बार जरूर करें।

खाँसी होने पर

खाँसी को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है—सूखी खाँसी और बलगमी खाँसी।

  • ❑ कफयुक्त खाँसी हो तो कपूर, कर्कट शृंगी और हरीतकी—सबको पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को गर्म पानी के साथ रोगी को दें।
  • ❑ त्रिफला, बायबिडंग, गिलोय, पीपल, सोंठ, चित्रक, राक्षा, मिर्चस मिश्री—सबको समान मात्रा में लेकर अच्छी तरह से पीस लें। यह दवा 3 ग्राम रोज सेवन करें।
  • ❑ अडुसे के पत्तों का रस निकालकर उसमें थोड़ा नमक मिलाकर रोगी को दें।
  • ❑ बेहेड़े की छाल का छोटा-सा टुकड़ा रोगी को चूसने के लिए दें।

दमा होने पर

इसमें श्वास क्रिया में तकलीफ होती है। आयुर्वेद वायु और कफ की गड़बड़ी को इसका मुख्य कारण मानता है। जब कफ और वायु दोनों की मात्रा बहुत बड़ा जाए तो बड़ी हुई वायु कफ को सुखाने लगती है, जिससे कफ सूखकर श्वास नली में जमकर श्वास क्रिया में कष्टकारक सिद्ध होता है।

  • ❑ सनाय के 100 ग्राम पत्ते, 15 ग्राम आँवला—दोनों को पीनी के साथ अच्छी तरह से पीसकर छोटी-2 गोलियाँ बना लें। एक गोली रोज खाएँ।
  • ❑ आँवला, सुहागा, भारंगी, बंसलोचन, मुलहठी, पीपल—सबको 25 ग्राम मात्रा में लेकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें।

अब अडुसे की छाल का रस, मुनके का काढ़ा, चिचिड़ी का रस, कटेली का रस, मिश्री-सब 450 ग्राम लेकर गर्म कर

रोगों की पहचान

59

लें। गाढ़ा हो जाने पर उतार लें।

अब ऊपर का चूर्ण इस काढ़े में डाल दें। जब ठंडा हो जाए तो उसमें 450 ग्राम शहद की मात्रा डालें। आपकी दमे की दवा तैयार है। सुबह-शाम 10 ग्राम यह दवा रोगी को चटाकर बकरी का दूध पिला दें।

❑ 120 ग्राम संखिया में ढाई ग्राम मीठा सोडा मिलाकर अच्छी तरह पीस लें। अब इसकी 15 पुड़ियाँ बना लें। अब सुबह-शाम पानी के साथ रोगी को एक पुड़िया की दवा लें। 6-7 हफ्ते रोगी को यह दवा दें।

❑ सतगिलोय, सोंठ, विधारा, बहेड़ा की छाल, बड़ी हरड की छाल, आँवले की छाल, अश्वगन्ध नागौरी, बायविडंग, सौंठ, छोटी पीपर, सफेद पुनर्नवा, काली मिर्च, चित्रक जड़ की छाल-सब 210-210 ग्राम की मात्रा में लेकर अच्छी तरह अलग-2 से खरल में पीस लें। फिर छानकर सबको मिला लें। फिर गुड़ की चासनी बनाकर सब दवाई उसमें मिला लें। अब 5-5 ग्राम की छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर छाया में सुखा लें। मरीज को ऐसी एक गोली रोज सुबह-सबेर कूटकर गाय के दूध के साथ दें।

सावधानी बरतें

❑ नमक बिलकुल न खाएँ।

ग्रहणी रोग होने पर

उदर और पक्काशय के बीज की आँत को ग्रहणी कहते हैं। जब उसमें खराबी हो जाती है, तो दस्त की बीमारी हो जाती है। सार रूप में ग्रहणी अंग जब सुचारू रूप से काम नहीं कर पाता तो ग्रहणी रोग होता है। इसकी गड़बड़ी में भी वात, पित्त और कफ को मुख्य कारण माना गया है।

जब भोजन के बाद कफ सहित मल आए और मीठी-2 डकारें

60

साहिब बन्दगी

आएँ तो समझना चाहिए कि यह कफ की गड़बड़ी के कारण ग्रहणी रोग है।

जब भोजन के बाद पीले-नीले रंग का टुकड़ों में मल आए और दर्द भी हो तो समझना चाहिए कि पित्त की गड़बड़ी से ग्रहणी रोग हुआ है।

जब भोजन के बाद मल के साथ गैस निकलती मालूम हो और बाद में पेट में वायु के कारण ऐंठन या दर्द हो तो समझना चाहिए कि यह वायु की गड़बड़ी का कारण होने वाला ग्रहणी रोग है।

▯ यदि वायु या पित्त की गड़बड़ी के कारण ग्रहणी रोग हो तो 18 ग्राम कुटजारिष्ट्र जल के साथ सेवन करें। दिन में दो बार भोजन के बाद ही यह दवा लें।

▯ यदि कफ की गड़बड़ी से ग्रहणी रोग हो तो ढाई ग्राम पिप्पलादि चूर्ण मक्खन के साथ सेवन करें।

▯ वात ग्रहणी में हिंगवाष्टक चूर्ण मक्खन के साथ सेवन करें।

प्रसव न होने पर

▯ गुलाबजल, अमलतास की फली की ऊपरी छाल, केसर, मिश्री-सबको एक साथ पीसकर दें।

प्रदर ( लकोरिया ) होने पर

▯ गूलर के सुखे फूलों को तोड़कर ले आएँ। उनको पीसकर चूर्ण बना लें। अब उसमें शहद और मिश्री मिलाकर छोटी-2 गोलियाँ बना लें। एक गोली रोज खाएँ। हफ्ता-भर यह गोली खाएँ।

▯ 10 ग्राम रसौल, 12 ग्राम चोराई का रस, 12 ग्राम शहद-सबको मिलाकर हफ्ता-भर पिएँ। बहुत लाभकारी है।

रक्त प्रदर होने पर

▯ जड़ सहित हरि दूब को अच्छी तरह से साफ करके उसको खरल में या सिल पर पीसकर उसका रस निकालकर पिलाएँ।

रोगों की पहचान

61

श्वेत प्रदर होने पर

  • ▣ हल्दी, मिजछ, आँवला और लौथ को पीसकर चूर्ण बना लें। अब उसे किसी बारीक कपड़े में लपेटकर योनि में रखें।
  • ▣ 40 ग्राम सीसम के पत्ते और फल, 3 इलायची, 10 काली मिर्च और थोड़ी मिश्री मिलाकर अच्छी तरह से कूट-पीस लें। यह दवा दिन में एक बार हफ्ता-भर लें।
  • ▣ शहद के साथ नवजीवन-रस का सेवन करें।
  • ▣ 25 ग्राम कच्चे गूलर को पीसकर उसमें इतना ही शहद और इतनी ही मिश्री मिलाकर खाएँ और ऊपर से गाय का एक कप दूध पी लें।
  • ▣ दूध में नवायस लोह (छोटे चम्मच का तीसरा हिस्सा) डालकर सुबह-शाम पिएँ।

बंध्यत्व होने पर

  • ▣ पसाल का एक पत्ता पीस कर दूध में डालकर पिएँ।
  • ▣ दो-ढाई चम्मच घी सुबह-शाम खाली पेट दूध के साथ सेवन करें।
  • ▣ कैथ के गोद को पीसकर दूध में डाल पिएँ।

गर्भ धारण के समय पीड़ा होने और गर्भ गिरने की शंका होने पर

  • ▣ यदि पहला महीना हो तो कमल की डण्डी, सिंघाड़ा, नीलकमल और कसेरू-सबको जल के साथ कूट-पीस लें। अब इस दवा को दूध में मिलाकर पिएँ।
  • ▣ यदि दूसरा महीना हो तो खजूर, बेलपत्र, कसेरू, जीरा, सिंघाड़ा-सबको जल के साथ कूट-पीस लें। अब इस दवा को दूध के साथ लें।

७२

साहिब बन्दगी

यदि तीसरा महीना हो तो चंदन, पद्माख, तगर, खस-सबको जल के साथ कूट-पीस लें। अब इस दवा को बकरी के दूध के साथ लें।

यदि चौथा महीना हो तो सिंघाड़ा, केले की जड़, केले के पत्ते, अनारदाना, दाख-सबको जल के साथ कूट-पीस कर छान लें। अब इस दवा को बकरी के दूध के साथ लें।

यदि पाँचवाँ महीना हो तो नीलोफर, कमलगट्टा, कमल की डण्डी, नागकेसर-सबको कूट-पीस लें। इस दवा को बकरी के दूध के साथ लें।

यदि छठा महीना हो तो कमलगट्टा, बच, नागकेसर, दाख, इलायची, मुनक्का-सबको जल में कूट-पीसकर जल के साथ ही लें।

यदि सातवाँ महीना हो तो साठी की जड़, बड़ की जड़, सूर्यमुखी की जड़, पीपल की जड़, लाल चंदन, भौंगरा-सबको कूट-पीसकर बकरी के दूध के साथ लें।

यदि आठवाँ महीना हो तो कमल का फूल, गज पापरि, कमलगट्टा की गिरी, धनिया-सबको कूट-पीसकर शीतल जल में डालकर छान लें। इस दवा को दूध में मिलाकर पी लें।

यदि नौवाँ महीना हो तो गज पीपरि, बायबिडंग, जीरा, ढाक के पत्ते, सोंठ, इलायची-सबको कूट-पीसकर बकरी के दूध के साथ लें।

यदि दसवाँ महीना हो तो केसर, केले की जड़, कमलगट्टा, मुलहटी, पद्माख, कमल का दूध, मिश्री-सबको जल के साथ पीस लें। इस दवा को भी दूध में मिलाकर पी लें।

कान के बहने पर

शहद में नीम के पत्तों का रस बराबर मात्रा में मिलाकर रोगी के कान में डालें।

रोगों की पहचान

63

कान में दर्द होने पर

  • ▣ शहद में अदरक का रस, तेल और थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर रोगी के कानों में डालें।
  • ▣ गोमूत्र को गर्म करके रोगी के कानों में डालें।

बहरापन होने पर

  • ▣ शहद में अदरक का रस, तेल और थोड़ा सेंधा नमक मिलाकर रोगी के कानों में डालें। यह दवा बहरेपन में भी लाभदायक है।

गला बैठने पर

  • ▣ अड़सू की जड़, पीपल, छोटी हरड, ब्राह्मी और बच-सबको पीसकर चूर्ण बना लें। 3 ग्राम यह चूर्ण एक चम्मच शहद में मिलाकर चाटें।
  • ▣ यदि बोलने से आवाज बैठी हो तो आधा ग्राम सुहागा मुँह में रखकर चूसें।
  • ▣ यदि खान-पान की गड़बड़ी से गला बैठा हो तो 1 ग्राम मुलहठी के चूर्ण को मुँह में रखकर चूसें।

दांतों में दर्द होने पर

  • ▣ ज्वार के दानों को जला लें। अब उनमें थोड़ा सेंधा नमक डालकर अच्छी तरह पीस लें। यह दवा दांतों पर वहाँ मलें, जहाँ दर्द हो रहा हो।
  • ▣ नौशादर, गेरू मिट्टी और काली मिर्च-सबको बराबर मात्रा में लेकर बहुत ही बारीक पीस लें। अब इस चूर्ण से मंजन करें और बाद में इसी को पानी में डालकर कुले भी करें।
  • ▣ अड़ुसे के पत्तों को उबालकर उस पानी से कुले करें।
  • ▣ विजयसार के पत्तों को सुखाकर अच्छी तरह पीस लें। अब

64

साहिब बन्दगी

सरसों के तेल में मिलाकर दाँतों पर लगाएँ।

अनन्नास के रस को रूई के साथ दाँतों में लगाएँ।

अकरकरा को पीसकर छान लें। इसे दाँतों में जहाँ दर्द हो, वहाँ लगाएँ।

हल्दी को तवे पर भून कर दाँतों के नीचे दबाएँ।

दाँतों में बदबू आने पर

नीम की दातून करें। हफ्ते-भर में लाभ मिलेगा।

दाँतों में कीड़े होने पर

मूसाकर्णी के रस को शहद में मिलाकर कुछे करें।

मसूड़ों में सूजन होने पर

चमेली के पत्तों को पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इस पानी से फिर कुछे करें।

लीवर में वृद्धि होने पर

प्रवाल पिष्टी, गुरुचि और मंडूक भस्म सबको शहद में मिलाकर सेवन करें।

जामुन के ताजे पत्तों का रस निकालकर सेवन करें।

दिन में दो बार पुनर्नवा मण्डूर की गोली जल के साथ लें।

पित्ती की बीमारी होने पर

गेहूँ का सिरका तथा अजवायन-दोनों को पीसकर रोगी के शरीर पर लेप करें।

गाय का घी लेकर उसमें गेरू और जरा-सा सेंधा नमक डालकर रोगी के शरीर पर लेप करें। फिर उसे गर्म कपड़ों में मोटी चादर या कंबल देकर सुला दें।

रोगों की पहचान

65

दस्त होने पर

  • ❑ अतीस का चूर्ण ढाई ग्राम शहद में मिलाकर चाटें।
  • ❑ पोदीने के रस में थोड़ी सौंफ मिलाकर रोगी को दें।
  • ❑ कच्चे अमरूद को पीसकर उसमें मिश्री मिकाकर रोगी को खिलाएँ।

प्लीहा वृद्धि होने पर

  • ❑ भोजन के बाद 25 मि. ग्रा. रोहितकारिष्ट एक चम्मच पानी के साथ लें।
  • ❑ पपीते का सेवन करें।

सिर दर्द होने पर

  • ❑ अगस्त (हथिया) वृक्ष के पत्तों का रस निकालकर उसकी 2 बूँदें नाक में डालें।
  • ❑ नीम की छाल, त्रिफला, हल्दी, चिरायता, गुरुच-सबको उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े में योगराज गुग्गल और गुड़ मिलाकर रोगी को पिलाएँ।

आधे सिर में दर्द होने पर

  • ❑ गाय का ताजा घी लेकर उसमें रूई को आगे से तर करें। फिर 3 बूँद रोगी की नाक में डाल दें। यह काम दिन में दो बार (सुबह-शाम) करें। यह प्रयोग बहुत ही लाभकारी है।
  • ❑ रीठे के छिलकों को पानी में डाल अच्छी तरह से मलकर झाग पैदा करें। फिर आग पर रखकर गर्म करें और उतारकर गुनगुना रह जाने पर 3-3 बूँदें दोनों नथुनों में डालें।

लकवा होने पर

  • ❑ 10 ग्राम अश्वक्र भस्म, 5 ग्राम सोना भस्म, 5 ग्राम प्रवाल पिष्ठी,

66

साहिब बन्दगी

5 ग्राम मोती पिष्टी, 50 ग्राम रस सिंदूर-सबको घृतकुमारी रस में पीस लें। फिर चाँदी भस्म, लौह भस्म, वंग भस्म, जायफल, असगंध, शतावरी, जावित्री, लौंग-सब ढाई-ढाई ग्राम लें और मकोय के रस के साथ घोंट लें। इस सभी के चूर्ण की 230 मि. ग्रा. की छोटी-2 गोलियाँ बनाएँ। यह गोली रोगी को दूध के साथ प्रतिदिन दें।

□ एक पाव गेहूँ की भूसी, 100 ग्राम मेथी, 30 ग्राम सहजने की छाल, 120 ग्राम गुड़, सवा किलो गाय का दूध, 20 ग्राम लहसुन-सबको लेकर इनकी खीर तैयार करें और रोगी को खिलाएँ।

बच्चों के दाँत निकलते समय होने वाली पीड़ा

□ जरा-से पीपर चूर्ण को शहद में मिलाकर बच्चों के मसूड़ों पर मलें।

बिस्तर पर मूत्र करने पर

□ 175 मि. ग्रा. तारकेश्वर रस सुबह-शाम दें।

टॉसिल होने पर

□ गुनगुने पानी में फिटकरी घोलकर गररो करवाएँ।

हिचकियाँ आने पर

□ ग्वारपाठे का रस निकालकर उसमें सोठ मिलाकर लें।

काली खाँसी होने पर

□ श्वेत लाल भस्म और शृंग भस्म-दोनों को शहद में मिलाकर रोगी को चटाएँ।

□ 250 मि. ग्रा. फिटकरी को भूनकर उसमें इतनी ही मिश्री मिलाकर सुबह-शाम खाएँ। बच्चों को कम मात्रा में दें।