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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ११ ]

  • साधक-संजीवनी *

६०७

व्याख्या —‘अव्यक्तादव्यक्तयः’……… तत्रैवाव्यक्त-सञ्ज्के—‘मात्र प्राणियोंके जितने शरीर हैं, उनको यहाँ ‘व्यक्तयः’ और चौदहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें ‘मूर्तयः’ कहा गया है। जैसे, जीवकृत सृष्टि अर्थात् ‘मैं’ और ‘मेरापन’ को लेकर जीवकी जो सृष्टि है, जीवके नींदसे जगनेपर वह सृष्टि जीवसे ही पैदा होती है और नींदके आ जानेपर वह सृष्टि जीवमें ही लीन हो जाती है। ऐसे ही जो यह स्थूल समष्टि सृष्टि दीखती है, वह सब-की-सब ब्रह्माजीके जगनेपर उनके सूक्ष्मशरीरसे अर्थात् प्रकृतिसे

परिशिष्ट भाव —सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि ब्रह्मलोकतक सभी लोक पुनरावर्ती हैं। वे पुनरावर्ती क्यों हैं? इसके उत्तरमें भगवान् सत्रहवें-अठारहवें श्लोकोंमें बताते हैं कि ऊँचे-से-ऊँचा ब्रह्मलोक भी कालकी अवधिमें है। उस अवधिका विवेचन करते हुए भगवान् बताते हैं कि ब्रह्मलोककी अवधि कितनी ही बड़ी क्यों न हो, है वह कालके अन्तर्गत ही। परन्तु भगवान् कालकी अवधिमें नहीं हैं।

जैसे हम रातको सोते हैं तो संसारको भूल जाते हैं और प्रातः जागते हैं तो संसार पुनः याद आ जाता है ऐसे ही ब्रह्माजीके रातमें सम्पूर्ण सृष्टि लीन हो जाती है और दिनमें पुनः उत्पन्न हो जाती है। यह रात और दिनकी आखिरी हद है। ब्रह्माजीके दिन और रात सूर्यसे नहीं होते, प्रत्युत प्रकृतिसे होते हैं।

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।

रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ ११ ॥

पार्थ= हे पार्थ !अवशः= प्रकृतिके परवश( और )
सः, एव= वहीहुआरात्र्यागमे = ब्रह्माकी रात्रिके
अयम्= यहअहरागमे = ब्रह्माके दिनेकेसमय
भूतग्रामः= प्राणिसमुदायसमयप्रलीयते = लीन
भूत्वा, भूत्वा= उत्पन्न हो-होकरप्रभवति = उत्पन्न होता हैहोता है।

व्याख्या —‘भूतग्रामः स एवायम्’—अनादिकालसे जन्म-मरणके चक्करमें पड़ा हुआ यह प्राणिसमुदाय वही है, जो कि साक्षात् मेरा अंश, मेरा स्वरूप है। मेरा सनातन अंश होनेसे यह नित्य है। सर्ग और प्रलय तथा महासर्ग और महाप्रलयमें भी यही था और आगे भी यही रहेगा। इसका न कभी अभाव हुआ है और न आगे कभी इसका अभाव होगा। तात्पर्य है कि यह अविनाशी है, इसका कभी विनाश नहीं होता। परन्तु भूलसे यह प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। प्राकृत पदार्थ (शरीर आदि) तो बदलते रहते हैं, उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं, पर यह उनके सम्बन्धको पकड़ रहा है। यह कितने आश्चर्यकी बात है कि सम्बन्धी (सांसारिक पदार्थ) तो नहीं रहते, पर उनका सम्बन्ध रहता है; क्योंकि उस सम्बन्धको स्वयंने पकड़ा है। अतः यह स्वयं जबतक उस सम्बन्धको नहीं

पैदा होती है और ब्रह्माजीके सोनेपर उनके सूक्ष्मशरीरमें ही लीन हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि ब्रह्माजीके जगनेपर तो ‘सर्ग’ होता है और ब्रह्माजीके सोनेपर ‘प्रलय’ होता है। जब ब्रह्माजीकी सौ वर्षकी आयु बीत जाती है, तब ‘महाप्रलय’ होता है, जिसमें ब्रह्माजी भी भगवान्में लीन हो जाते हैं। ब्रह्माजीकी जितनी आयु होती है, उतना ही महाप्रलयका समय रहता है। महाप्रलयका समय बीतनेपर ब्रह्माजी भगवान्से प्रकट होते हैं तो ‘महासर्ग’का आरम्भ होता है (गीता—नवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक)।

छोड़ता, तबतक उसको दूसरा कोई छुड़ा नहीं सकता। उस सम्बन्धको छोड़नेमें यह स्वतन्त्र है, सबल है। वास्तवमें यह उस सम्बन्धको रखनेमें सदा परतन्त्र है; क्योंकि वे पदार्थ तो हरदम बदलते रहते हैं, पर यह नया-नया सम्बन्ध पकड़ता रहता है। जैसे, बालकपनको इसने नहीं छोड़ा और न छोड़ना चाहा, पर वह छूट गया। ऐसे ही जवानीको इसने नहीं छोड़ा, पर वह छूट गयी। और तो क्या, यह शरीरको भी छोड़ना नहीं चाहता, पर वह भी छूट जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्राकृत पदार्थ तो छूटते ही रहते हैं, पर यह जीव उन पदार्थोंके साथ अपने सम्बन्धको बनाये रखता है, जिससे इसको बार-बार शरीर धारण करने पड़ते हैं, बार-बार जन्मना-मरना पड़ता है। जबतक यह उस माने हुए सम्बन्धको नहीं छोड़ेगा, तबतक यह जन्म-मरणकी परम्परा चलती ही रहेगी, कभी मिटेगी नहीं।

६०८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

भगवान्के द्वारा अकेले खेल नहीं हुआ (‘एकाकी न रमते’) तो खेल खेलनेके लिये अर्थात् प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये भगवान्ने इस प्राणिसमुदायको शरीर-रूप खिलौनेके सहित प्रकट किया। खेलका यह नियम होता है कि खेलके पदार्थ केवल खेलनेके लिये ही होते हैं, किसीके व्यक्तिगत नहीं होते। परन्तु यह प्राणिसमुदाय खेल खेलना तो भूल गया और खेलके पदार्थोंको अर्थात् शरीरोंको व्यक्तिगत मानने लग गया। इसीसे यह उनमें फँस गया और भगवान्से सर्वथा विमुख हो गया।

‘भूत्वा भूत्वा प्रलीयते’—ये पद शरीरोंके लिये कहे गये हैं, जो कि उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं अर्थात् जिनमें प्रतिक्षण ही परिवर्तन होता रहता है। परन्तु जीव उन शरीरोंके परिवर्तनको अपना परिवर्तन और उनके जन्मने-मरनेको अपना जन्म-मरण मानता रहता है। इसी मान्यताके कारण उसका जन्म-मरण कहा जाता है।

यह स्वयं सत्स्वरूप है—‘भूतग्रामः स एवायम्’ और शरीर उत्पत्ति-विनाशशील हैं—‘भूत्वा भूत्वा प्रलीयते’, इसलिये शरीरोंको धारण करना अर्थात् जन्म-मरणका होना परधर्म है और मुक्त होना स्वधर्म है।

‘रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहगामे’—यहाँ ‘अवशः’ कहनेका तात्पर्य है कि अगर यह जीव प्रकृतिकी वस्तुओंमेंसे किसी भी वस्तुको अपनी मानता रहेगा तो उसको वहम तो यह होगा कि ‘मैं इस वस्तुका मालिक हूँ’, पर हो जायगा उस वस्तुके परवश, पराधीन। प्राकृत पदार्थोंको यह जितना ही अधिक ग्रहण करेगा, उतना ही यह महान् परतन्त्र बनता चला जायगा। फिर इसकी परतन्त्रता कभी छूटेगी ही नहीं। ब्रह्माजीके जगने और सोनेपर अर्थात् सर्ग और प्रलयके होनेपर (आठवें

परिशिष्ट भाव—एक विभाग बदलनेवाले संसारका है और एक विभाग न बदलनेवाली चिन्मय सत्ताका है। जो अनादिकालसे जन्म-मरणके प्रवाहमें पड़ा हुआ है, वही यह जीव-समुदाय बार-बार उत्पन्न और लीन होता है। ब्रह्माके दिन और रातके बीचमें भी जीव निरन्तर जन्म लेता और मरता रहता है। तात्पर्य है कि जो बार-बार उत्पन्न और लीन होता है, वह संसार है और जो वही रहता है (जो पहले सर्गावस्थामें था), वह जीवका असली स्वरूप अर्थात् चिन्मय सत्ता है, जो परमात्माका साक्षात् अंश है। ब्रह्माजीके कितने ही रात-दिन बीत जायें, पर जीव स्वयं वही-का-वही रहता है।

चिन्मय सत्ता (चितिशक्ति) अर्थात् स्वयंमें स्वीकार अथवा अस्वीकार करनेकी सामर्थ्य है। इस सामर्थ्यका दुरुपयोग करनेसे अर्थात् जड़ताको स्वीकार करनेसे ही वह जन्मता-मरता है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिजन्मसु’ (गीता १३।२१)। यदि वह इस सामर्थ्यका दुरुपयोग न करे तो उसका जन्म-मरण हो ही नहीं सकता। अतः जीवका खास पुरुषार्थ है—जड़ताको स्वीकार न करना अर्थात् अपने स्वरूपमें स्थित होना अथवा अपने अंशों भगवान्के शरण होना। जड़तामें अर्थात् देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, अवस्था, परिस्थितियोंमें परिवर्तन होता है, अपनेमें (अपने होनेपनमें) कभी परिवर्तन नहीं होता—यह मनुष्यमात्रका अनुभव है। परन्तु ऐसा अनुभव होते हुए भी मनुष्य सुखासक्तिके कारण जड़तासे बँधा रहता है, जिससे

अध्यायका अठारहवाँ श्लोक), ब्रह्माजीके प्रकट और लीन होनेपर अर्थात् महासर्ग और महाप्रलयके होनेपर (नवें अध्यायका सातवाँ-आठवाँ श्लोक) तथा वर्तमानमें प्रकृतिके परवश होकर कर्म करते रहनेपर (तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक) भी यह जीव ‘जन्मना और मरना तथा कर्म करना और उसका फल भोगना’—इस आफतसे कभी छूटेगा ही नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, बोध नहीं होता और यह प्रकृतिके सम्बन्धको नहीं छोड़ता, तबतक परतन्त्र होनेके कारण यह दुःखरूप जन्म-मरणके चक्करसे छूट नहीं सकता। परन्तु जब इसकी प्रकृति और प्रकृतिजन्म पदार्थोंकी परवशता मिट जाती है अर्थात् इसको प्रकृतिके सम्बन्धसे सर्वथा रहित अपने शुद्ध स्वरूपका बोध हो जाता है, तो फिर यह महासर्गमें भी उत्पन्न नहीं होता और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होता—‘सर्गोऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च’ (गीता १४।२)।

मूलमें परवशता प्रकृतिजन्म पदार्थोंको महत्त्व देने, उनको स्वीकार करनेमें ही है। इस परवशताको ही कहीं कालकी, कहीं स्वभावकी, कहीं कर्मकी और कहीं गुणोंकी परवशताके नामसे कहा गया है।

इस प्राणिसमुदायकी यह परवशता तभीतक रहती है, जबतक यह प्राकृत पदार्थोंके संयोगसे सुख लेना चाहता है। इस संयोगजन्म सुखकी इच्छासे ही यह पराधीनता भोगता रहता है और ऐसा मानता रहता है कि यह पराधीनता छूटती नहीं, इसको छोड़ना बड़ा कठिन है। परन्तु यह परवशता इसकी ही बनायी हुई है, स्वतः नहीं है। अतः इसको छोड़नेको जिम्मेवारी इसीपर है। इसको यह जब चाहे, तभी छोड़ सकता है।

श्लोक २०]

  • साधक-संजीवनी *

६०९

उसको अपने सहज स्वरूपका अनुभव नहीं होता, प्रत्युत वह पशु-पक्षी आदिकी तरह अपने स्वरूपको भूला रहता है।

‘अवशः’ अपरा प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे जीव परवश, पराधीन हो जाता है—‘भूतग्राममिमं कृतन्मवशं प्रकृतेर्वशात् ’ (गीता ९।८)*। अतः प्रकृतिके साथ माना हुआ सम्बन्ध छूटनेपर यह स्वाधीन अर्थात् मुक्त हो जाता है।

हमारी सत्ता अपरा प्रकृतिके अर्थात् वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके अधीन नहीं है। प्रत्येक वस्तुकी उत्पत्ति और विनाश होता है, प्रत्येक व्यक्तिका जन्म (संयोग) और मरण (वियोग) होता है तथा प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और अन्त होता है। परन्तु इन तीनों-(वस्तु, व्यक्ति और क्रिया-) को जाननेवाली हमारी चिन्मय सत्ता-(होनेपन-) का कभी उत्पत्ति-विनाश, जन्म-मरण (संयोग-वियोग) और आरम्भ-अन्त नहीं होता। यह सत्ता नित्य-निरन्तर स्वतः ज्यों-की-त्यों रहती है—‘भूतग्रामः स एवायम् ’। इस सत्ताका कभी अभाव नहीं होता—‘नाभावो विद्यते सतः ’ (गीता २।१६)। इस सत्तामें स्वतः-स्वाभाविक स्थितिके अनुभवका नाम ही मुक्ति (स्वाधीनता) है।

मनुष्यको यह वहम रहता है कि अमुक वस्तुकी प्राप्ति होनेपर, अमुक व्यक्तिके मिलनेपर तथा अमुक क्रियाको करनेपर मैं स्वाधीन (मुक्त) हो जाऊँगा। परन्तु ऐसी कोई वस्तु, व्यक्ति और क्रिया है ही नहीं, जिससे मनुष्य स्वाधीन हो जाय। प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्ति और क्रिया तो मनुष्यको पराधीन बनानेवाली हैं। उनसे सर्वथा असंग होनेपर ही मनुष्य स्वाधीन हो सकता है। अतः साधकको चाहिये कि वह वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना अपनेको अकेला अनुभव करनेका स्वभाव बनाये, उस अनुभवको महत्त्व दे, उसमें अधिक-से-अधिक स्थित रहे। यह मनुष्यमात्रका अनुभव है कि सुषुप्तिके समय वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके बिना भी हम स्वतः रहते हैं; परन्तु हमारे बिना वस्तु, व्यक्ति और क्रिया नहीं रहती। जब जाग्रतमें भी हम इनके बिना रहनेका स्वभाव बना लेंगे, तब हम स्वाधीन (मुक्त) हो जायेंगे। प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्ति और क्रियाके सम्बन्धकी मान्यता ही हमें स्वाधीन नहीं होने देती और हमारे न चाहते हुए भी हमें पराधीन बना देती है।

परमात्मामें अनन्त शक्तियाँ हैं, जो चित्स्वरूप हैं। माया-(प्रकृति-) में भी अनन्त शक्तियाँ हैं, पर वे जड़स्वरूप तथा परिवर्तनशील हैं—‘मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूर्यते सचराचरम् ’ (९।१०)। सबसे विलक्षण शक्ति भगवत्प्रेममें है। परन्तु मुक्ति-(स्वाधीनता-) में सन्तोष करनेसे वह प्रेम प्रकट नहीं होता। जड़ताके सम्बन्धसे ही परवशता होती है और मुक्त होनेपर वह परवशता सर्वथा मिट जाती है और जीव स्वाधीन हो जाता है। परन्तु प्रेम इस स्वाधीनतासे भी विशेष विलक्षण है। स्वाधीनता-(मुक्ति-) में अखण्ड आनन्द है, पर प्रेममें अनन्त आनन्द है।

ज्ञानयोगी तो स्वाधीन होता है और भक्त प्रेमी होता है। भक्तियोगमें भक्त भगवान्के पराधीन नहीं होता; क्योंकि भगवान् परकीय नहीं हैं, प्रत्युत स्वकीय (अपने) हैं। स्वकीयकी अधीनतामें विशेष स्वाधीनता होती है।

भगवान् तो स्वाधीन-से-स्वाधीन हैं। जीव ही जड़ताके पराधीन हो जाता है। उस पराधीनताको मिटानेसे वह स्वाधीन हो जाता है। परन्तु भगवान्के शरण होनेसे वह स्वाधीनतापूर्वक स्वाधीन अर्थात् परम स्वाधीन हो जाता है। भगवान्की अधीनता परम स्वाधीनता है, जिसमें भगवान् भी भक्तके अधीन हो जाते हैं—‘अहं भक्तपराधीनः ’ (श्रीमद्भगवद्गीता १।४।६३)।

सम्बन्ध—अनित्य संसारका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें जीवोंके प्रापणीय परमात्माकी महिमाका विशेष वर्णन करते हैं।

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽन्यत्कोऽन्यत्कात्सनातनः ।

यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्यस्मृ न विनश्यति ॥ २० ॥

तु= परन्तुसनातनः= अनादिसः= वह
तस्मात्= उसपरः= अत्यन्त श्रेष्ठसर्वेषु= सम्पूर्ण
अन्यत्कात्= अन्यत्क-(ब्रह्माके सूक्ष्मशरीर-) सेभावः= भावरूपभूतेषु= प्राणियोंके
अन्यः= अन्य (विलक्षण)यः= जोनश्यत्यस्मृ= नष्ट होनेपर भी
अन्यत्कः= अन्यत्क (ईश्वर) है,न, विनश्यति= नष्ट नहीं होता।
  • यहाँ (८।१९ में) और नवें अध्यायके आठवें श्लोकमें—दोनों जगह ‘भूतग्राम’ और ‘अवश’ शब्द आये हैं। फर्क इतना है कि यहाँ सर्ग तथा प्रलयका वर्णन है, वहाँ (९।८ में) महसर्ग तथा महाप्रलयका वर्णन है।

६१०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

व्याख्या—‘परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्-सनातनः’ —सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक ब्रह्मलोक तथा उससे नीचेके लोकोंको पुनरावर्ती कहा गया है। परन्तु परमात्मतत्त्व उनसे अत्यन्त विलक्षण है—यह बतानेके लिये यहाँ ‘तु’ पद दिया गया है।

यहाँ ‘अव्यक्तात्’ पद ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरका ही वाचक है। कारण कि इससे पहले अठारहवें-उन्नीसवें श्लोकोंमें सर्गके आदिमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे प्राणियोंके पैदा होनेकी और प्रलयमें ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरमें प्राणियोंके लीन होनेकी बात कही गयी है। इस श्लोकमें आया ‘तस्मात्’ पद भी ब्रह्माजीके उस सूक्ष्मशरीरका द्योतन करता है। ऐसा होनेपर भी यहाँ ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीर- (समष्टि मन, बुद्धि और अहंकार-) से भी पर अर्थात् अत्यन्त विलक्षण जो भावरूप अव्यक्त कहा गया है, वह ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीरके साथ-साथ ब्रह्माजीके कारण-शरीर- (मूल प्रकृति-) से भी अत्यन्त विलक्षण है।

ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे पर दो तत्त्व हैं—मूल प्रकृति और परमात्मा। यहाँ प्रसंग मूल प्रकृतिका नहीं है, प्रत्युत परमात्माका है। अतः इस श्लोकमें परमात्माको ही पर और श्रेष्ठ कहा गया है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता। आगेके श्लोकमें भी ‘अव्यक्तोऽक्षर’

परिशिष्ट भाव— एक अपरिवर्तनशील (स्थायी) तत्त्व ‘परा’ है और एक परिवर्तनशील (अस्थायी) तत्त्व ‘अपरा’ है। परामें कभी परिवर्तन होता ही नहीं और अपरामें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। अपरा कभी परिवर्तनके बिना रहती ही नहीं, रह सकती ही नहीं। सर्ग और प्रलयमें तो परिवर्तन होता रहता है, महासर्ग और महाप्रलयमें भी परिवर्तन होता रहता है।

अगर परा और अपरा—दोनों ही तत्त्व अपरिवर्तनशील हों तो जन्म-मरण मिट जाय अथवा दोनों ही परिवर्तनशील हों तो जन्म-मरण मिट जाय! परन्तु स्वयं अपरिवर्तनशील होते हुए भी जीव- (परा-) ने परिवर्तनशील अपरासे सम्बन्ध जोड़ लिया, इसीसे वह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ गया। जगत्से अपना सम्बन्ध जोड़कर वह भी जगत् हो गया (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। जैसे कोई चलती हुई गाड़ीमें बैठकर चल पड़े, ऐसे ही परिवर्तनशील संसारको पकड़कर जीव भी परिवर्तनशील बन गया—अनेक योनियोंमें भटकने लग गया!

परमात्माको ‘पर’ अर्थात् अत्यन्त श्रेष्ठ कहनेका तात्पर्य है कि ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरसे भी श्रेष्ठ मूल प्रकृति (कारणशरीर) है और मूल प्रकृतिसे भी श्रेष्ठ परमात्मा है।

सम्बन्ध—अभीतक जो परमात्मविषयक वर्णन हुआ है, उस सबकी एकता करते हुए अनन्यभक्तिके विशेष महत्त्वका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्भ्राम परमं मम ॥ २१ ॥

आदि पदोंसे उस परमात्माका ही वर्णन आया है।

गीतामें प्राणियोंके अप्रकट होनेको अव्यक्त कहा गया है—‘अव्यक्तादीनि भूतानि’ (२।२८); ब्रह्माजीके सूक्ष्मशरीरको भी अव्यक्त कहा गया है (८।१८); प्रकृतिको भी अव्यक्त कहा गया है—‘अव्यक्तमेव च’ (१३।५) आदि। उन सबसे परमात्माका स्वरूप विलक्षण, श्रेष्ठ है, चाहे वह स्वरूप व्यक्त हो, चाहे अव्यक्त हो। वह भावरूप है अर्थात् किसी भी कालमें उसका अभाव हुआ नहीं, होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। कारण कि वह सनातन है अर्थात् वह सदासे है और सदा ही रहेगा। इसलिये वह पर अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है। उससे श्रेष्ठ कोई हो ही नहीं सकता और होनेकी सम्भावना भी नहीं है।

‘यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति’ —अब उत्तरार्धमें उसकी विलक्षणता बताते हैं कि सम्पूर्ण प्राणियोंके नष्ट होनेपर भी अर्थात् उन सम्पूर्ण शरीरोंका अभाव होनेपर भी उस परमात्मतत्त्वका कभी अभाव नहीं होता—ऐसा वह परमात्माका अव्यक्त स्वरूप है।

‘न विनश्यति’ कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें कार्यरूपसे अनेक तरहके परिवर्तन होनेपर भी वह परमात्मतत्त्व ज्यों-का-त्यों ही अपरिवर्तनशील रहता है। उसमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तन होता ही नहीं।

श्लोक २२]

  • साधक-संजीवनी *

६११

तम्= उसीकोपरमा्= परमन, निवर्तन्ते= फिर लौटकर
अव्यक्तः= अव्यक्त (और)गतिम्= गति(संसारमें) नहीं आते,
अक्षरः= अक्षर—आहुः= कहा गया है (और)तत्= वह
इति= ऐसायम्= जिसकोमम= मेरा
उक्तः= कहा गया है (तथा
उसीको)प्राप्य= प्राप्त होनेपर
(जीव)परमम्= परम
धाम= धाम है।

व्याख्या —‘अव्यक्तोऽक्षर’”तद्भाम परमं मम’—भगवान्ने सातवें अध्यायके अठ्ठाईसवें, उन्तीसवें और तीसवें श्लोकमें जिसको ‘माम्’, कहा है तथा आठवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें ‘अक्षरं ब्रह्म’, चौथे श्लोकमें ‘अधियज्ञः’, पाँचवें और सातवें श्लोकमें ‘माम्’, आठवें श्लोकमें ‘परमं पुरुषं दिव्यम्’, नवें श्लोकमें ‘कविं पुराणमनुशासितारम्’ आदि, तेरहवें, चौदहवें, पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें ‘माम्’, बीसवें श्लोकमें ‘अव्यक्तः’ और ‘सनातनः’ कहा है, उन सबकी एकता करते हुए भगवान् कहते हैं कि उसीको अव्यक्त और अक्षर कहते हैं तथा उसीको परमगति अर्थात् सर्वश्रेष्ठ गति कहते हैं; और जिसको प्राप्त होनेपर जीव फिर लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है अर्थात् मेरा सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है। इस प्रकार जिस प्रापणीय वस्तुको अनेक रूपोंमें कहा गया है, उसकी यहाँ एकता की गयी है। ऐसे ही चौदहवें अध्यायके सताईसवें श्लोकमें भी ‘ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकात्मिक सुखका आश्रय मैं हूँ’ ऐसा कहकर भगवान्ने प्रापणीय वस्तुकी एकता की है।

लोगोंकी ऐसी धारणा रहती है कि सगुण-उपासनाका फल दूसरा है और निर्गुण-उपासनाका फल दूसरा है। इस धारणाको दूर करनेके लिये इस श्लोकमें सबकी एकताका

परिशिष्ट भाव —अव्यक्त, अक्षर आदि नामोंकी पहुँच उस प्रापणीय तत्त्वतक नहीं है। कारण कि वह अव्यक्त-व्यक्त, अक्षर-क्षर, गति-स्थिति दोनोंसे रहित निरपेक्ष तत्त्व है। उसको प्राप्त होनेपर जीव लौटकर नहीं आता; क्योंकि उसकी अवधि नहीं है।

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।

यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥

पार्थ | = हे पृथानन्दन अर्जुन! | येन | = जिससे | परः | = परम ---|---|---|---|---|--- भूतानि | = सम्पूर्ण प्राणी | इदम् | = यह | पुरुषः | = पुरुष परमात्मा यस्य | = जिसके | सर्वम् | = सम्पूर्ण संसार | तु | = तो अन्तःस्थानि | = अन्तर्गत हैं (और) | ततम् | = व्याप्त है, | अनन्यया, भक्त्या | = अनन्य भक्तिसे | | सः | = वह | लभ्यः | = प्राप्त होनेयोग्य है।

६१२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

व्याख्या —‘यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं तत्तम्’—सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने निषेधरूपसे कहा कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं, पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं। यहाँ भगवान् विधिरूपसे कहते हैं कि परमात्माके अन्तर्गत सम्पूर्ण प्राणी हैं और परमात्मा सम्पूर्ण संसारमें परिपूर्ण हैं। इसीको भगवान्ने नवें अध्यायके चौथे, पाँचवें और छठे श्लोकमें विधि और निषेध—दोनों रूपोंसे कहा है। तात्पर्य यह हुआ कि मेरे सिवाय किसीकी भी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। सब मेरेसे ही उत्पन्न होते हैं; मेरेमें ही स्थित रहते हैं और मेरेमें ही लीन होते हैं, अतः सब कुछ मैं ही हुआ।

वे परमात्मा सर्वोपरि होनेपर भी सबमें व्याप्त हैं अर्थात् वे परमात्मा सब जगह हैं; सब समयमें हैं; सम्पूर्ण वस्तुओंमें हैं, सम्पूर्ण क्रियाओंमें हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंमें हैं। जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंमें पहले भी सोना ही था, गहनारूप बननेपर भी सोना ही रहा और गहनोंके नष्ट होनेपर भी सोना ही रहेगा। परन्तु सोनेसे बने गहनोंके नाम, रूप, आकृति, उपयोग, तौल, मूल्य आदिपर दृष्टि रहनेसे सोनेकी तरफ दृष्टि नहीं जाती। ऐसे ही संसारके पहले भी परमात्मा थे, संसाररूपसे भी परमात्मा ही हैं और संसारका अन्त होनेपर भी परमात्मा ही रहेंगे। परन्तु संसारको पांचभौतिक, ऊँच-नीच, बड़ा-छोटा, अनुकूल-प्रतिकूल आदि मान लेनेसे परमात्माकी तरफ दृष्टि नहीं जाती।

‘पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वन्नन्यथा’ —पूर्वश्लोकमें जिसको अव्यक्त, अक्षर, परमगति आदि नामोंसे कहा गया है, उसीको यहाँ ‘पुरुषः स परः’ कहा गया है। ऐसा वह परम पुरुष परमात्मा अनन्यभक्तसे प्राप्त होता है।

परमात्माके सिवाय प्रकृतिका यावन्मात्र कार्य ‘अन्य’ कहा जाता है। जो उस ‘अन्य’ की स्वतन्त्र सत्ता मानकर उसको आदर देता है, महत्त्व देता है, उसकी अनन्य भक्ति नहीं है। इससे परमात्माकी प्राप्तिमें देरी लगती है। अगर वह परमात्माके सिवाय किसीकी भी सत्ता और महत्ता न माने तथा भगवान्के नाते, भगवान्की प्रसन्नताके लिये प्रत्येक क्रिया करे, तो यह उसकी अनन्यभक्ति है। इसी अनन्य-भक्तिके वह परम पुरुष परमात्माको प्राप्त हो जाता है। परमात्माके सिवाय किसीकी भी सत्ता और महत्ता न

माने—यह बात भी प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारको सत्ता देकर ही कही जाती है। कारण कि मनुष्यके हृदयमें ‘एक परमात्मा है और एक संसार है’—यह बात जँची हुई है। वास्तवमें तो सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदिके रूपमें एक परमात्मतत्त्व ही है। जैसे बर्फ, ओला, बादल, बूँदे, कोहरा, ओस, नदी, तालाब, समुद्र आदिके रूपमें एक जल ही है, ऐसे ही स्थूल, सूक्ष्म और कारण-रूपसे जो कुछ संसार दीखता है, वह सब केवल परमात्मतत्त्व ही है। भक्तकी मान्यतामें एक परमात्माके सिवाय अन्य कुछ रहता ही नहीं, इसलिये उसकी खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जगना आदि सभी क्रियाएँ केवल उस परमात्माकी पूजाके रूपमें ही होती हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका छियालीसवाँ श्लोक)।

विशेष बात

आप अन्तकालमें कैसे जाननेमें आते हैं? (८।२)—यह अर्जुनका प्रश्न बड़ा ही भावपूर्ण मालूम देता है। कारण कि भगवान्को सामने देखते हुए भी अर्जुनमें भगवान्की विलक्षणताको जाननेकी उत्कण्ठा पैदा हो गयी। उत्तरमें भगवान्ने अन्तकालमें अपने चिन्तनकी और सामान्य कानूनकी बात बताकर अर्जुनको सब समयमें भगवच्चिन्तन करनेकी आज्ञा दी। उसके बाद आठवें श्लोकसे सोलहवें श्लोकतक सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-साकारकी प्राप्तिके लिये क्रमशः तीन-तीन श्लोक कहे। उनमें भी सगुण-निराकार और निर्गुण-निराकारकी प्राप्तिमें (प्राणोंको रोकनेकी बात साथमें होनेसे) कठिनता बतायी; और सगुण-साकारकी उपासनामें भगवान्का आश्रय लेकर उनका चिन्तन करनेकी बात होनेसे सगुण-साकारकी प्राप्तिमें बहुत सुगमता बतायी।

सोलहवें श्लोकके बाद सगुण-साकार स्वरूपकी विशेष महिमा बतानेके लिये भगवान्ने छः श्लोक कहे। उनमें भी पहलेके तीन श्लोकोंमें ब्रह्माजीकी और उनके ब्रह्मलोककी अवधि बतायी और आगेके तीन श्लोकोंमें ब्रह्माजी और उनके ब्रह्मलोकसे अपनी और अपने लोककी विलक्षणता बतायी। तात्पर्य है कि ब्रह्माजीके सूक्ष्म-शरीर (प्रकृति)-से भी मेरा स्वरूप विलक्षण है। उपासनाओंकी जितनी गतियाँ हैं, वे सब मेरे स्वरूपके अन्तर्गत आ जाती हैं। ऐसा वह मेरा सर्वोपरि स्वरूप केवल मेरे परायण होनेसे अर्थात् अनन्यभक्तिके प्राप्त हो जाता है। मेरा स्वरूप प्राप्त होनेपर

श्लोक २३ ]

  • साधक-संजीवनी *

६१३

फिर साधककी न तो अन्य स्वरूपोंकी तरफ वृत्ति जाती है और न उनकी आवश्यकता ही रहती है। उसकी वृत्ति केवल मेरे स्वरूपकी तरफ ही रहती है।

इस प्रकार ब्रह्माजीके लोकसे मेरा लोक विलक्षण है,

ब्रह्माजीके स्वरूपसे मेरा स्वरूप विलक्षण है और ब्रह्मलोककी गतिसे मेरे लोक-(धाम-) की गति विलक्षण है। तात्पर्य है कि सब प्राणियोंका अन्तिम ध्येय मैं ही हूँ और सब मेरे ही अन्तर्गत हैं।

परिशिष्ट भाव —भक्तिको ‘अनन्य’ कहनेका तात्पर्य है कि भक्तिके साथ थोड़ा भी जड़ताका अंश, अहम्का संस्कार, अपने मतका संस्कार न रहे अर्थात् किसी भी तरफ किंचिन्मात्र भी खिंचाव न रहे। सब कुछ भगवान् ही हैं—ऐसा अनुभव करना अनन्यभक्ति है।

सुखकी वासना तो एक ही है, पर सुख-सामग्रीकी तारतम्यता अनेक लोकोंमें है। ब्रह्मलोकतकका सुख भी आकृष्ट न करे, यहाँतक कि अपनी स्वाधीनता-(मुक्ति-) का सुख भी सन्तुष्ट न कर सके, तब भक्ति प्राप्त होती है।

सातवें अध्यायमें भगवान्ने कहा था—‘मत्तः परतरं नात्यक्तिकिचिदस्ति ’ (७।७), उसी बातको यहाँ ‘यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ’ पदोंसे कहा है। इसीको आगे नवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें विस्तारसे कहेंगे। इन सबका तात्पर्य है कि एक भगवान्के सिवाय कुछ भी नहीं है अर्थात् सब कुछ भगवान् ही हैं।

सम्बन्ध—सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि ब्रह्मलोकतकको प्राप्त होनेवाले लौटकर आते हैं और मेरेको प्राप्त होनेवाले लौटकर नहीं आते। परंतु किस मार्गसे जानेवाले लौटकर नहीं आते और किस मार्गसे जानेवाले लौटकर आते हैं? यह बताना बाकी रह गया। अतः उन दोनों मार्गोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उपक्रम करते हैं।

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः।

प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥

तु= परन्तुयोगिनः= योगीहोते हैं अर्थात् पीछे
भरतर्षभ= हे भरतवंशियोंमेंअनावृत्तिम्= अनावृतिकोलौटकर आते हैं,
श्रेष्ठ अर्जुन!यान्ति= प्राप्त होते हैं अर्थात्तम् = उस
यत्र= जिसपीछे लौटकर
काले= काल अर्थात्नहीं आतेकालम् = कालको अर्थात्
मार्गमेंच, एव= और (जिस मार्गमेंदोनों मार्गोंको
प्रयाता= शरीर छोड़करगये हुए)
गये हुएआवृत्तिम्= आवृतिको प्राप्तवक्ष्यामि = मैं कहूँगा।

व्याख्या —[जीवित अवस्थामें ही बन्धनसे छूटनेको ‘सद्योमुक्ति’ कहते हैं अर्थात् जिनको यहाँ ही भगवत्प्राप्ति हो गयी, भगवान्में अनन्यभक्ति हो गयी, अनन्यप्रेम हो गया, वे यहाँ ही परम संसिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं। दूसरे जो साधक किसी सूक्ष्म वासनाके कारण ब्रह्मलोकमें जाकर क्रमशः ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं, उनकी मुक्तिको ‘क्रममुक्ति’ कहते हैं। जो केवल सुख भोगनेके लिये ब्रह्मलोक आदि लोकोंमें जाते हैं, वे फिर लौटकर आते हैं। इसको ‘पुनरावृत्ति’ कहते हैं। सद्योमुक्तिका वर्णन तो पंद्रहवें श्लोकमें हो गया, पर क्रममुक्ति और पुनरावृत्तिका वर्णन करना बाकी रह गया। अतः इन दोनोंका वर्णन करनेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।]

यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं ..... वक्ष्यामि भरतर्षभ ’—पीछे छूटे हुए विषयका लक्ष्य करनेके लिये यहाँ ‘तु’ अव्ययका प्रयोग किया गया है।

ऊर्ध्वगतिवालोंको कालाभिमानी देवता जिस मार्गसे ले जाता है, उस मार्गका वाचक यहाँ ‘काल’ शब्द लेना चाहिये; क्योंकि आगे छब्बीसवें और सत्ताईसवें श्लोकमें इसी ‘काल’ शब्दको मार्गके पर्यायवाची ‘गति’ और ‘सृति’ शब्दोंसे कहा गया है।

अनावृत्तिमावृत्तिम् ’ कहनेका तात्पर्य है कि अनावृत ज्ञानवाले पुरुष ही अनावृत्तिमें जाते हैं और आवृत ज्ञानवाले पुरुष ही आवृत्तिमें जाते हैं। जो सांसारिक पदार्थों और भोगोंसे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख हो गये हैं, वे

६१४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

अनावृत ज्ञानवाले हैं अर्थात् उनका ज्ञान (विवेक) ढका हुआ नहीं है, प्रत्युत जाग्रत् है। इसलिये वे अनावृतिके मार्गमें जाते हैं, जहाँसे फिर लौटना नहीं पड़ता। निष्कामभाव होनेसे उनके मार्गमें प्रकाश अर्थात् विवेककी मुख्यता रहती है।

सांसारिक पदार्थों और भोगोंमें आसक्ति, कामना और ममता रखनेवाले जो पुरुष अपने स्वरूपसे तथा परमात्मासे विमुख हो गये हैं, वे आवृत ज्ञानवाले हैं अर्थात् उनका ज्ञान (विवेक) ढका हुआ है। इसलिये वे आवृतिके मार्गमें जाते हैं, जहाँसे फिर लौटकर जन्म-मरणके चक्रमें आना पड़ता।

परिशिष्ट भाव —जो परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखता है, उसको पीछे लौटकर आना पड़ता है। परन्तु जो परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ सम्बन्ध नहीं रखता, उसको पीछे लौटकर नहीं आना पड़ता।

सम्बन्ध—अब उन दोनोंमेंसे पहले शुक्लमार्गका अर्थात् लौटकर न आनेवालोंके मार्गका वर्णन करते हैं।

अग्निज्योतिरहः शुक्लः षणमासा उत्तरायणम्।

तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥

जिस मार्गमें—

ज्योतिः = प्रकाशस्वरूप अग्निः = अग्निका अधिपति देवता, अहः = दिनका अधिपति देवता, शुक्लः = शुक्लपक्षका अधिपति देवता,

षणमासाः = (और) छः महीनोंवाले उत्तरायणम् = उत्तरायणका अधिपति देवता है, तत्र = उस मार्गसे प्रयाताः = (शरीर छोड़कर) गये हुए ब्रह्मविदः = ब्रह्मवेता

जनाः = पुरुष (पहले ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर पीछे ब्रह्माके साथ) ब्रह्म = ब्रह्मको गच्छन्ति = प्राप्त हो जाते हैं।

व्याख्या —‘अग्निज्योतिरहः शुक्लः षणमासा उत्तरायणम्’—इस भूमण्डलपर शुक्लमार्गमें सबसे पहले अग्नि देवताका अधिकार रहता है। अग्नि रात्रिमें प्रकाश करती है, दिनमें नहीं; क्योंकि दिनेके प्रकाशकी अपेक्षा अग्निका प्रकाश सीमित है। अतः अग्निका प्रकाश थोड़ी दूरतक (थोड़े देशमें) तथा थोड़े समयतक रहता है; और दिनका प्रकाश बहुत दूरतक तथा बहुत समयतक रहता है। शुक्लपक्ष पंद्रह दिनोंका होता है, जो कि पितरोंकी एक रात है। इस शुक्लपक्षका प्रकाश आकाशमें बहुत दूरतक और बहुत दिनोंतक रहता है। इसी तरहसे जब सूर्यभगवान् उत्तरकी तरफ चलते हैं, तब उसको उत्तरायण कहते हैं, जिसमें दिनका समय बढ़ता है। वह उत्तरायण छः महीनोंका होता है, जो कि देवताओंका एक दिन है। उस उत्तरायणका प्रकाश बहुत दूरतक और बहुत समयतक

रहता है।

‘तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः’— जो शुक्लमार्गमें अर्थात् प्रकाशकी बहुलतावाले मार्गमें जानेवाले हैं, वे सबसे पहले ज्योतिःस्वरूप अग्नि देवताके अधिकारमें आते हैं। जहाँतक अग्नि देवताका अधिकार है, वहाँसे पार कराकर अग्नि देवता उन जीवोंको दिनेके देवताको सौंप देता है। दिनका देवता उन जीवोंको अपने अधिकारतक ले जाकर शुक्लपक्षके अधिपति देवताके समर्पित कर देता है। वह शुक्लपक्षका अधिपति देवता अपनी सीमाको पार कराकर उन जीवोंको उत्तरायणके अधिपति देवताके सुपुर्द कर देता है। फिर वह उत्तरायणका अधिपति देवता उनको ब्रह्मलोकके अधिकारी देवताके समर्पित कर देता है। इस प्रकार वे क्रमपूर्वक ब्रह्मलोकमें पहुँच जाते हैं। ब्रह्माजीकी आयुतक वे वहाँ रहकर महाप्रलयमें ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाते

श्लोक २५ ]

  • साधक-संजीवनी *

६१५

है—सच्चिदानन्दधन परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं। यहाँ ‘ब्रह्मविदः’ पद परमात्माको परोक्षरूपसे जाननेवाले मनुष्योंका वाचक है, अपरोक्षरूपसे अनुभव करनेवाले

ब्रह्मज्ञानियोंका नहीं। कारण कि अगर वे अपरोक्ष ब्रह्मज्ञानी होते, तो यहाँ ही मुक्त (सद्योमुक्त या जीवन्मुक्त) हो जाते और उनको ब्रह्मलोकमें जाना नहीं पड़ता।

परिशिष्ट भाव— पहले साधनावस्थामें जिनके भीतर ब्रह्मलोककी वासना अथवा अपने मतका आग्रह रहा है, वे क्रममुक्तिसे पहले ब्रह्मलोकमें जाते हैं और फिर महाप्रलय आनेपर ब्रह्माजीके साथ मुक्त हो जाते हैं—

ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे। परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम्॥

(कूर्मपुराण, पूर्व० ११। २८४)

‘ब्रह्माकी आयु पूर्ण होनेपर जब महाप्रलयकाल उपस्थित होता है, तब वे सम्पूर्ण शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष ब्रह्माके साथ ही परमपदमें प्रविष्ट हो जाते हैं।’

क्रममुक्तिमें ब्रह्मलोक मार्गमें आनेवाले एक स्टेशनकी तरह है, जहाँ सुखकी वासनावाले पुरुष उतरते हैं। परन्तु जिनमें सुखकी वासना नहीं है, वे वहाँ नहीं उतरते; जैसे—हमारा कोई प्रयोजन न हो तो मार्गमें स्टेशन आये या जंगल, क्या फर्क पड़ता है!

उपनिषदोंमें शुक्लमार्गके क्रमका अलग-अलग ढंगसे वर्णन आता है; जैसे—

छान्दोग्योपनिषद्के अनुसार—अर्चिका देवता, दिनका देवता, शुक्लपक्षका देवता, उत्तरायणका देवता, संवत्सर, आदित्य, चन्द्रमा, विद्युत् और फिर अमानव पुरुषके द्वारा ब्रह्मलोकमें (ब्रह्माके पास) ले जाना (४। १५। ५; ५। १०। १-२)।

बृहदारण्यकोपनिषद्के अनुसार—ज्योतिका देवता, दिनका देवता, शुक्लपक्षका देवता, उत्तरायणका देवता, देवलोक, आदित्य, विद्युत् (वैद्युत देव) और फिर मानस पुरुषके द्वारा ब्रह्मलोककी प्राप्ति (६। २। १५)।

कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद्के अनुसार—अग्निलोक, वायुलोक, सूर्यलोक, वरुणलोक, इन्द्रलोक, प्रजापतिलोक और ब्रह्मलोक (१। ३)।

ब्रह्मसूत्र (४। ३। २-३)-में भी इसपर विचार किया गया है।

शुक्लमार्गको उपनिषदोंमें देवयान, अर्चिमार्ग, उत्तरमार्ग, देवपथ और ब्रह्मपथ नामसे भी कहा गया है।

सम्बन्ध—अब आगेके श्लोकमें कृष्णमार्गका अर्थात् लौटकर आनेवालोंके मार्गका वर्णन करते हैं।

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्।

तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥ २५॥

जिस मार्गमें—

धूमः= धूमका अधिपति देवता,षण्मासाः= छः महीनोंवालेचान्द्रमसम्= चन्द्रमाकी
रात्रिः= रात्रिका अधिपति देवता,दक्षिणायनम्= दक्षिणायनका अधिपति देवता है,ज्योतिः= ज्योतिको
कृष्णः= कृष्णपक्षका अधिपति देवतातत्र= (शरीर छोड़कर) उस मार्गसे गया हुआप्राप्य= प्राप्त होकर
तथा= औरयोगी= योगी (सकाम मनुष्य)निवर्तते= लौट आता है अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त होता है।

व्याख्या—‘धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः’ ‘‘‘‘‘ प्राप्य निवर्तते’—’ देश और कालकी दृष्टिसे जितना अधिकार अग्नि अर्थात् प्रकाशके देवताका है, उतना ही अधिकार धूम अर्थात्

अन्धकारके देवताका है। वह धूमाधिपति देवता कृष्णमार्गसे जानेवाले जीवोंको अपनी सीमासे पार करारकर रात्रिके अधिपति देवताके अधीन कर देता है। रात्रिका

६१६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

अधिपति देवता उस जीवको अपनी सीमासे पार करारकर देश-कालको लेकर बहुत दूरतक अधिकार रखनेवाले कृष्णपक्षके अधिपति देवताके अधीन कर देता है। वह देवता उस जीवको अपनी सीमासे पार करारकर देश और कालकी दृष्टिसे बहुत दूरतक अधिकार रखनेवाले दक्षिणायनके अधिपति देवताके समर्पित कर देता है। वह देवता उस जीवको चन्द्रलोकके अधिपति देवताको सौंप देता है। इस प्रकार कृष्णमार्गसे जानेवाला वह जीव धूम्र, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायनके देशको पार करता हुआ चन्द्रमाकी ज्योतिको अर्थात् जहाँ अमृतका पान होता है, ऐसे स्वर्गादि दिव्य लोकोंको प्राप्त हो जाता है। फिर अपने पुण्योंके अनुसार न्यूनाधिक समयतक वहाँ रहकर अर्थात् भोग भोगकर पीछे लौट आता है।

यहाँ एक ध्यान देनेकी बात है कि यह जो चन्द्रमण्डल दीखता है, यह चन्द्रलोक नहीं है। कारण कि यह चन्द्रमण्डल तो पृथ्वीके बहुत नजदीक है, जब कि चन्द्रलोक सूर्यसे भी बहुत ऊँचा है। उसी चन्द्रलोकसे अमृत इस चन्द्रमण्डलमें आता है, जिससे शुक्लपक्षमें ओषधियाँ पुष्ट होती हैं।

अब एक समझनेकी बात है कि यहाँ जिस कृष्णमार्गका वर्णन है, वह शुक्लमार्गकी अपेक्षा कृष्णमार्ग है। वास्तवमें तो यह मार्ग ऊँचे-ऊँचे लोकोंमें जानेका है। सामान्य मनुष्य मरकर मृत्युलोकमें जन्म लेते हैं, जो पापी होते हैं, वे आसुरी योनियोंमें जाते हैं और उनसे भी जो अधिक पापी होते हैं, वे नरकके कुण्डोंमें जाते हैं—इन सब मनुष्योंसे कृष्णमार्गसे जानेवाले बहुत श्रेष्ठ हैं। वे चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होते हैं—ऐसा कहनेका यही तात्पर्य है कि संसारमें जन्म-मरणके जितने मार्ग हैं, उन सब मार्गोंसे यह कृष्णमार्ग (ऊर्ध्वगतिका होनेसे) श्रेष्ठ है और उनकी अपेक्षा प्रकाशमय है।

कृष्णमार्गसे लौटते समय वह जीव पहले आकाशमें आता है। फिर वायुके अधीन होकर बादलोंमें आता है और बादलोंमेंसे वर्षाके द्वारा भूमण्डलपर आकर अन्नमें प्रवेश करता है। फिर कर्मानुसार प्राप्त होनेवाली योनिके पुरुषोंमें अन्तके द्वारा प्रवेश करता है और पुरुषसे स्त्री-जातिमें जाकर शरीर धारण करके जन्म लेता है। इस प्रकार वह जन्म-मरणके चक्करमें पड़ जाता है।

यहाँ सकाम मनुष्योंको भी 'योगी' क्यों कहा गया है? इसके अनेक कारण हो सकते हैं; जैसे—

(१) गीतामें भगवान्ने मरनेवाले प्राणियोंकी तीन गतियाँ बतायी हैं—ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति (गीता—चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इनमेंसे ऊर्ध्वगतिका वर्णन इस प्रकारणमें हुआ है। मध्यगति और अधोगतिसे ऊर्ध्वगति श्रेष्ठ होनेके कारण यहाँ सकाम मनुष्योंको भी योगी कहा गया है।

(२) जो केवल भोग भोगनेके लिये ही ऊँचे लोकोंमें जाता है, उसने संयमपूर्वक इस लोकके भोगोंका त्याग किया है। इस त्यागसे उसकी यहाँके भोगोंके मिलने और न मिलनेमें समता हो गयी है। इस आंशिक समताको लेकर ही उसको यहाँ योगी कहा गया है।

(३) जिनका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका है, पर अन्तकालमें किसी सूक्ष्म भोग-वासनाके कारण वे योगसे विचलितमना हो जाते हैं, तो वे ब्रह्मलोक आदि ऊँचे लोकोंमें जाते हैं और वहाँ बहुत समयतक रहकर पीछे यहाँ भूमण्डलपर आकर शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेते हैं। ऐसे योगभ्रष्ट मनुष्योंका भी जानेका यही मार्ग (कृष्णमार्ग) होनेसे यहाँ सकाम मनुष्यको भी योगी कह दिया है।

भगवान्ने पीछेके (चौबीसवें) श्लोकमें ब्रह्मको प्राप्त होनेवालोंके लिये 'ब्रह्मविदो जनाः ' कहकर बहुवचनका प्रयोग किया है और यहाँ चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होनेवालोंके लिये 'योगी ' कहकर एकवचनका प्रयोग किया है। इससे ऐसा अनुमान होता है कि सभी मनुष्य परमात्माकी प्राप्तिके अधिकारी हैं और परमात्माकी प्राप्ति सुगम है। कारण कि परमात्मा सबको स्वतः प्राप्त हैं। स्वतःप्राप्त तत्त्वका अनुभव बड़ा सुगम है। इसमें करना कुछ नहीं पड़ता। इसलिये बहुवचनका प्रयोग किया गया है। परन्तु स्वर्ग आदिकी प्राप्तिके लिये विशेष क्रिया करनी पड़ती है, पदार्थोंका संग्रह करना पड़ता है, विधि-विधानका पालन करना पड़ता है। इस प्रकार स्वर्गादिको प्राप्त करनेमें भी कठिनता है तथा प्राप्त करनेके बाद पीछे लौटकर भी आना पड़ता है। इसलिये यहाँ एकवचन दिया गया है।

विशेष बात

(१)

जिनका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका है; परन्तु सुखभोगकी सूक्ष्म वासना सर्वथा नहीं मिटी है, वे शरीर छोड़कर ब्रह्मलोकमें जाते हैं। ब्रह्मलोकके भोग भोगनेपर उनकी वह

श्लोक २५ ]

  • साधक-संजीवनी *

६१७

वासना मिट जाती है तो वे मुक्त हो जाते हैं। इनका वर्णन यहाँ चौबीसवें श्लोकमें हुआ है।

जिनका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका ही है और जिनमें न यहाँके भोगोंकी वासना है तथा न ब्रह्मलोकके भोगोंकी; परन्तु जो अन्तकालमें निर्गुणके ध्यानसे विचलित हो गये हैं, वे ब्रह्मलोक आदि लोकोंमें नहीं जाते। वे तो सीधे ही योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं अर्थात् जहाँ पूर्वजन्मकृत ध्यानरूप साधन ठीक तरहसे हो सके, ऐसे योगियोंके कुलमें उनका जन्म होता है। वहाँ वे साधन करके मुक्त हो जाते हैं (गीता—छठे अध्यायका बयालीसवाँ-तैत्तालीसवाँ श्लोक)।

—उपर्युक्त दोनों साधकोंका उद्देश्य तो एक ही रहा है, पर वासनामें अन्तर रहनेसे एक तो ब्रह्मलोकमें जाकर मुक्त होते हैं और एक सीधे ही योगियोंके कुलमें उत्पन्न होकर साधन करके मुक्त होते हैं।

जिनका उद्देश्य ही स्वर्गादि ऊँचे-ऊँचे लोकोंके सुख भोगनेका है, वे यज्ञ आदि शुभ-कर्म करके ऊँचे-ऊँचे लोकोंमें जाते हैं और वहाँके दिव्य भोग भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर पीछे लौटकर आ जाते हैं अर्थात् जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं (गीता—सातवें अध्यायके बीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक, आठवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक और नवें अध्यायका बीसवाँ-इक्कीसवाँ श्लोक)।

जिसका उद्देश्य तो परमात्मप्राप्तिका ही रहा है; पर सांसारिक सुखभोगकी वासनाको वह मिटा नहीं सका। इसलिये अन्तकालमें योगसे विचलित होकर वह स्वर्गादि लोकोंमें जाकर वहाँके भोग भोगता है और फिर लौटकर शुद्ध श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है। वहाँ वह जबर्दस्ती पूर्वजन्मकृत साधनमें लग जाता है और मुक्त हो जाता है (गीता—छठे अध्यायका इकतालीसवाँ, चौवालीसवाँ और पैतालीसवाँ श्लोक)।

—उपर्युक्त दोनों साधकोंमें एकका तो उद्देश्य ही स्वर्गके सुखभोगका है, इसलिये वह पुण्यकर्मके अनुसार वहाँके भोग भोगकर पीछे लौटकर आता है। परन्तु जिसका उद्देश्य परमात्माका है और वह विचारद्वारा सांसारिक भोगोंका त्याग भी करता है, फिर भी वासना नहीं मिटी, तो अन्तमें भोगोंकी याद आनेसे वह स्वर्गादि लोकोंमें जाता है। उसने जो सांसारिक भोगोंका त्याग किया है, उसका बड़ा भारी माहात्म्य है। इसलिये वह उन लोकोंमें बहुत समयतक भोग भोगकर यहाँ श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है।

(२)

सामान्य मनुष्योंकी यह धारणा है कि जो दिनमें, शुक्लपक्षमें और उत्तरायणमें मरते हैं, वे तो मुक्त हो जाते हैं, पर जो रातमें, कृष्णपक्षमें और दक्षिणायनमें मरते हैं, उनकी मुक्ति नहीं होती। यह धारणा ठीक नहीं है। कारण कि यहाँ जो शुक्लमार्ग और कृष्णमार्गका वर्णन हुआ है, वह ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करनेवालोंके लिये ही हुआ है। इसलिये अगर ऐसा ही मान लिया जाय कि दिन आदिमें मरनेवाले मुक्त होते हैं और रात आदिमें मरनेवाले मुक्त नहीं होते, तो फिर अधोगतिवाले कब मरेंगे? क्योंकि दिन-रात, शुक्लपक्ष-कृष्णपक्ष और उत्तरायण-दक्षिणायनको छोड़कर दूसरा कोई समय ही नहीं है। वास्तवमें मरनेवाले अपने-अपने कर्मके अनुसार ही ऊँच-नीच गतियोंमें जाते हैं, वे चाहे दिनमें मरें, चाहे रातमें; चाहे शुक्लपक्षमें मरें, चाहे कृष्णपक्षमें; चाहे उत्तरायणमें मरें, चाहे दक्षिणायनमें—इसका कोई नियम नहीं है।

जो भगवद्भक्त हैं, जो केवल भगवान्के ही परायण हैं, जिनके मनमें भगवद्दर्शनकी ही लालसा है, ऐसे भक्त दिनमें या रातमें, शुक्लपक्षमें या कृष्णपक्षमें, उत्तरायणमें या दक्षिणायनमें, जब कभी शरीर छोड़ते हैं, तो उनको लेनेके लिये भगवान्के पार्षद आते हैं। पार्षदोंके साथ वे सीधे भगवद्दाममें पहुँच जाते हैं।

यहाँ एक शंका होती है कि जब मनुष्य अपने कर्मके अनुसार ही गति पाता है, तो फिर भीष्मजीने, जो तत्त्वज्ञ जीवनमुक्त महापुरुष थे, दक्षिणायनमें शरीर न छोड़कर उत्तरायणकी प्रतीक्षा क्यों की?

इसका समाधान यह है कि भीष्मजी भगवद्दाम नहीं गये थे। वे 'द्यौ' नामक वसु (आजान देवता) थे, जो शापके कारण मृत्युलोकमें आये थे। अतः उन्हें देवलोकमें जाना था। दक्षिणायनके समय देवलोकमें रात रहती है और उसके दरवाजे बंद रहते हैं। अगर भीष्मजी दक्षिणायनके समय शरीर छोड़ते, तो उन्हें अपने लोकमें प्रवेश करनेके लिये बाहर प्रतीक्षा करनी पड़ती। वे इच्छामृत्यु तो थे ही; अतः उन्होंने सोचा कि वहाँ प्रतीक्षा करनेकी अपेक्षा यहाँ प्रतीक्षा करनी ठीक है; क्योंकि यहाँ तो भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन होते रहेंगे और सत्संग भी होता रहेगा, जिससे सभीका हित होगा, वहाँ अकेले पड़े रहकर क्या करेंगे? ऐसा सोचकर उन्होंने अपना शरीर दक्षिणायनमें न छोड़कर उत्तरायणमें ही छोड़ा।

६१८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय ८

परिशिष्ट भाव—निष्कामभाव प्रकाश है और सकामभाव अँधेरा है।

उपनिषदोंमें कृष्णमार्गके क्रमका अलग-अलग प्रकारसे वर्णन आता है; जैसे—

छान्दोग्योपनिषदके अनुसार—धूमका देवता, रात्रिका देवता, कृष्णपक्षका देवता, दक्षिणायनका देवता, पितृलोक,

आकाश, चन्द्रमा (सोम) और फिर पुनरागमनको प्राप्त होना (५।१०।३-४)।

बृहदारण्यकोपनिषदके अनुसार—धूमका देवता, रात्रिका देवता, कृष्णपक्षका देवता, दक्षिणायनका देवता, पितृलोक,

चन्द्रमा और फिर पुनरागमनकी प्राप्ति (६।२।१६)।

कृष्णमार्गको उपनिषदोंमें पितृयान, धूममार्ग और दक्षिणमार्ग नामसे भी कहा गया है।

सम्बन्ध—तेईसवें श्लोकसे शुक्ल और कृष्ण-गतिका जो प्रकरण आरम्भ किया था, उसका आगेके श्लोकमें उपसंहार

करते हैं।

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।

एकया यात्यनावृत्तिमन्त्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥

हि = क्योंकि जगतः = जगत्-(प्राणिमात्र-) अनावृत्तिम्, याति=जानेवालेको लौटना

शुक्लकृष्णे = शुक्ल और कृष्ण- के साथ नहीं पड़ता (और)

एते = ये दोनों (सम्बन्ध रखनेवाली) अनया = दूसरी गतिमें

गती = गतियाँ मते = मानी गयी हैं। जानेवालेको

शाश्वते = अनादिकालसे एकया = (इनमेंसे) एक गतिमें पुनः, आवर्तते = पुनः लौटना पड़ता है।

व्याख्या—'शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते देना चाहिये। तात्पर्य यह हुआ कि परमात्मप्राप्तिके लिये

मते'—शुक्ल और कृष्ण-इन दोनों मार्गोंका सम्बन्ध किसी भी लोकमें, योनिमें कोई बाधा नहीं है। इसका

जगत्के सभी चर-अचर प्राणियोंके साथ है। तात्पर्य है कि कारण यह है कि परमात्माके साथ किसी भी प्राणीका

ऊर्ध्वगतिके साथ मनुष्यका तो साक्षात् सम्बन्ध है और कभी सम्बन्ध-विच्छेद होता ही नहीं। अतः न जाने कब

चर-अचर प्राणियोंकी परम्परासे सम्बन्ध है। कारण कि और किस योनिमें वह परमात्माकी तरफ चल दे-इस

चर-अचर प्राणी क्रमसे अथवा भगवत्कृपासे कभी-न- दृष्टिसे साधकको किसी भी प्राणीको घृणाकी दृष्टिसे

कभी मनुष्य-जन्ममें आते ही हैं और मनुष्यजन्ममें किये देखनेका अधिकार नहीं है।

हुए कर्मोंके अनुसार ही ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति चौथे अध्यायके पहले श्लोकमें भगवान्ने 'योग'को

होती है। अब वे ऊर्ध्वगतिको प्राप्त करें अथवा न करें, अव्यय कहा है। जैसे योग अव्यय है, ऐसे ही ये शुक्ल

पर उन सबका सम्बन्ध ऊर्ध्वगति अर्थात् शुक्ल और और कृष्ण-दोनों गतियाँ भी अव्यय, शाश्वत हैं अर्थात् ये

कृष्ण-गतिके साथ है ही। दोनों गतियाँ निरन्तर रहनेवाली हैं, अनादिकालसे हैं और

जबतक मनुष्योंके भीतर असत् (विनाशी) वस्तुओंका जगतके लिये अनन्तकालतक चलती रहेंगी।

आदर है, कामना है, तबतक वे कितनी ही ऊँची भोग- 'एकया यात्यनावृत्तिमन्त्ययावर्तते पुनः'—एक

भूमियोंमें क्यों न चले जायँ, पर असत् वस्तुका महत्त्व मार्गसे अर्थात् शुक्लमार्गसे गये हुए साधनपरायण साधक

रहनेसे उनकी कभी भी अधोगति हो सकती है। इसी तरह अनावृत्तिको प्राप्त होते हैं अर्थात् ब्रह्मलोकमें जाकर

परमात्माके अंश होनेसे उनकी कभी भी ऊर्ध्वगति हो ब्रह्माजीके साथ ही मुक्त हो जाते हैं, बार-बार जन्म-मरणके

सकती है। इसलिये साधकको हरदम सजग रहना चाहिये चक्करमें नहीं आते; और दूसरे मार्गसे अर्थात् कृष्णमार्गसे

और अपने अन्तःकरणमें विनाशी वस्तुओंको महत्त्व नहीं गये हुए मनुष्य बार-बार जन्म-मरणके चक्करमें आते हैं।

सम्बन्ध—अब भगवान् दोनों मार्गोंको जाननेका माहात्म्य बतानेके लिये आगेके श्लोक कहते हैं।

श्लोक २७-२८ ]

  • साधक-संजीवनी *

६१९

नैते सूती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन !योगी= योगीसर्वेषु= सब
एते= इन दोनोंन, मुह्यति= मोहित नहीं होता।कालेषु= समयमें
सूती= मार्गीकोतस्मात्= अतःयोगयुक्तः= योगयुक्त (समतामें स्थित)
जानन्= जाननेवालाअर्जुन= हे अर्जुन ! (तू)भव= हो जा।
कश्चन= कोई भी

व्याख्या—‘नैते सूती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन’— शुक्लमार्ग प्रकाशमय है और कृष्णमार्ग अन्धकारमय है। जिनके अन्तःकरणमें उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व नहीं है और जिनके उद्देश्य, ध्येयमें प्रकाशस्वरूप (ज्ञानस्वरूप) परमात्मा ही हैं, ऐसे वे परमात्माको तरफ चलनेवाले साधक शुक्लमार्गी हैं अर्थात् उनका मार्ग प्रकाशमय है। परन्तु जो संसारमें रचे-पचे हैं और जिनका सांसारिक पदार्थोंका संग्रह करना और उनसे सुख भोगना ही ध्येय होता है, ऐसे मनुष्य तो घोर अन्धकारमें हैं ही, पर जो भोग भोगनेके उद्देश्यसे यहाँके भोगोंसे संयम करके यज्ञ, तप, दान आदि शास्त्रविहित शुभ कर्म करते हैं और मरनेके बाद स्वर्गादि ऊँची भोग-भूमियोंमें जाते हैं, वे यद्यपि यहाँके भोगोंमें आसक्त मनुष्योंसे ऊँचे उठे हुए हैं, तो भी आने-जानेवाले (जन्म-मरणके) मार्गमें होनेसे वे भी अन्धकारमें ही हैं। तात्पर्य है कि कृष्णमार्गवाले ऊँचे-ऊँचे लोकोंमें जानेपर भी जन्म-मरणके चक्करमें पड़े रहते हैं। कहीं जन्म गये तो मरना बाकी रहता है और मर गये तो जन्मना बाकी रहता है—ऐसे जन्म-मरणके चक्करमें पड़े हुए वे कोल्हूके बैलकी तरह अनन्तकालतक घूमते ही रहते हैं।

—इस तरह शुक्ल और कृष्ण दोनों मार्गोंके परिणामको जानेवाला मनुष्य योगी अर्थात् निष्काम हो जाता है, भोगी

परिशिष्ट भाव— कामनावाला मनुष्य ही मोहित होता है अर्थात् जन्म-मरणमें जाता है। शुक्ल और कृष्णमार्गको जानेवाला मनुष्य निष्काम हो जाता है, इसलिये वह जन्म-मरणमें नहीं जाता अर्थात् कृष्णमार्गको प्राप्त नहीं होता। इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्सर युध्य च’ और यहाँ कहते हैं—‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।’ तात्पर्य है कि भगवत्स्मरण करना अर्थात् भगवान्में लगना भी ‘योग’ है और समतामें स्थित होना अर्थात् संसारसे हटना भी ‘योग’ है। दोनोंका परिणाम एक ही है।

सम्बन्ध—अब भगवान् इस अध्यायमें वर्णित विषयको जाननेकी महिमा बताते हैं।

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।

अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥

६२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ८ ]

योगी= योगी ( भक्त )तपःसु= तपोमेंसर्वम्= सभी पुण्यफलोंका
इदम्= इसको ( इस
अध्यायमें वर्णित
विषयको )च, एव= तथाअत्येति= अतिक्रमण कर
जाता है
विदित्वा= जानकरदानेषु= दानमें= और
वेदेषु= वेदोंमें,यत्= जो-जोआद्यम् स्थानम्= आदिस्थान
यज्ञेषु= यज्ञोंमें,पुण्यफलम्= पुण्यफलपरम्= परमात्माको
प्रदिष्टम्= कहे गये हैं,उपैति= प्राप्त हो जाता है ।
तत्= उन

व्याख्या —‘वेदेषु यज्ञेषु तपःसु ..... स्थानमुपैति चाद्यम्’—यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि जितने भी शास्त्रीय उत्तम-से-उत्तम कार्य हैं और उनका जो फल है, वह विनाशी ही होता है। कारण कि जब उत्तम-से-उत्तम कार्यका भी आरम्भ और समाप्ति होती है, तो फिर उस कार्यसे उत्पन्न होनेवाला फल अविनाशी कैसे हो सकता है? वह फल चाहे इस लोकका हो, चाहे स्वर्गादि भोग-भूमियोंका हो, उसकी नश्वरतामें किंचिन्मात्र भी फरक नहीं है। जीव स्वयं परमात्माका अविनाशी अंश होकर भी विनाशी पदार्थोंमें फँसा रहे, तो इसमें उसकी अज्ञता ही मुख्य है। अतः जो मनुष्य इस अध्यायमें वर्णित विषयके रहस्यको समझ लेता है, वह यज्ञ, तप, दान आदि सभी पुण्यफलोंका अतिक्रमण कर जाता है। कारण कि वह यह समझ लेता है कि भोग-भूमियोंकी भी आखिरी हद जो ब्रह्मलोक है, वहाँ जानेपर भी लौटकर पीछे आना पड़ता है; परन्तु भगवान्को प्राप्त होनेपर लौटकर नहीं आना पड़ता (आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक); और साथ-साथ यह भी समझ लेता है कि मैं तो साक्षात् परमात्माका अंश हूँ तथा ये प्राकृत पदार्थ नित्य-निरन्तर अभावमें, नाशमें जा रहे हैं, तो फिर वह नाशवान् पदार्थोंमें, भोगोंमें न फँसकर भगवान्के ही आश्रित हो जाता है। इसलिये वह आदिस्थान* परमात्माको प्राप्त हो जाता है, जिसको इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें ‘परमगति’ और ‘परमधाम’ नामसे कहा गया है।

नाशवान् पदार्थके संग्रह और भोगोंमें आसक्त हुआ मनुष्य उस आदिस्थान परमात्मतत्त्वको नहीं जान सकता। न जानेकी यह असामर्थ्य न तो भगवान्की दी हुई है, न प्रकृतिसे पैदा हुई है और न किसी कर्मका फल ही है अर्थात् यह असामर्थ्य किसीकी देन नहीं है; किन्तु स्वयं जीवने ही

परमात्मतत्त्वसे विमुख होकर इसको पैदा किया है। इसलिये यह स्वयं ही इसको मिटा सकता है। कारण कि अपने द्वारा की हुई भूलको स्वयं ही मिटा सकता है और इसको मिटानेका दायित्व भी स्वयंपर ही है। इस भूलको मिटानेमें यह जीव असमर्थ नहीं है, निर्बल नहीं है, अपात्र नहीं है। केवल संयोगजन्य सुखकी लोलुपताके कारण यह अपनेमें असामर्थ्यका आरोप कर लेता है और इसीसे मनुष्यजन्यके महान् लाभसे वंचित रह जाता है। अतः मनुष्यको संयोगजन्य सुखकी लोलुपताका त्याग करके मनुष्यजन्यको सार्थक बनानेके लिये नित्य-निरन्तर उद्यत रहना चाहिये।

छठे अध्यायके अन्तमें भगवान्ने पहले योगीकी महिमा कही और पीछे अर्जुनको योगी हो जानेकी आज्ञा दी (छठे अध्यायका छिलीसवाँ श्लोक); और यहाँ भगवान्ने पहले अर्जुनको योगी होनेकी आज्ञा दी और पीछे योगीकी महिमा कही। इसका तात्पर्य है कि छठे अध्यायमें योगभ्रष्टका प्रसंग है, और उसके विषयमें अर्जुनके मनमें सन्देह था कि वह कहीं नष्ट-भ्रष्ट तो नहीं हो जाता? इस शंकाको दूर करनेके लिये भगवान्ने कहा कि ‘कोई किसी तरहसे योगमें लग जाय तो उसका पतन नहीं होता। इतना ही नहीं, इस योगका जिज्ञासुमात्र भी शब्दब्रह्मका अतिक्रमण कर जाता है।’ इसलिये योगीकी महिमा पहले कही और पीछे अर्जुनके लिये योगी होनेकी आज्ञा दी। परन्तु यहाँ अर्जुनका प्रश्न रहा कि नियतात्मा पुरुषोंके द्वारा आप कैसे जाननेमें आते हैं? इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान्ने कहा कि ‘जो सांसारिक पदार्थोंसे सर्वथा विमुख होकर केवल मेरे परायण होता है, उस योगीके लिये मैं सुलभ हूँ’, इसलिये पहले ‘तू योगी हो जा’ ऐसी आज्ञा दी और पीछे योगीकी महिमा कही।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

  • अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः। (गीता १०।२)

‘तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये’ (गीता १५।४)

श्लोक २८ ]

  • साधक-संजीवनी *

६२१

इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें 'अक्षरब्रह्मयोग' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥८॥

'अक्षर' और 'ब्रह्म' शब्द परमात्माके निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकार और सगुण-साकार—इन तीनों स्वरूपोंके वाचक हैं। इन तीनोंमेंसे किसी भी स्वरूपका चिन्तन करनेसे परमात्माके साथ योग (सम्बन्ध) हो जाता है। अतः इस अध्यायका नाम 'अक्षरब्रह्मयोग' रखा गया है।

आठवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच

(१) इस अध्यायमें 'अथाष्टमोऽध्यायः' के तीन, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके चार, श्लोकोंके तीन सौ सतहत और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग तीन सौ सत्तानबे है।

(२) 'अथाष्टमोऽध्यायः' के छः, 'अर्जुन उवाच' आदि पदोंके तेरह, श्लोकोंके नौ सौ पैतालीस और पुष्पिकाके सैंतालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग एक हजार ग्यारह है। इस अध्यायके अट्ठाईस श्लोकोंमेंसे नवों, ग्यारहवों और अट्ठाईसवों—ये तीन श्लोक चौवालीस अक्षरोंके तथा दसवों श्लोक पैतालीस अक्षरोंका

है। शेष चौबीस श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।

(३) इस अध्यायमें दो उवाच हैं—'अर्जुन उवाच' और 'श्रीभगवानुवाच'।

आठवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द

इस अध्यायके अट्ठाईस श्लोकोंमेंसे नवों, दसवों और ग्यारहवों—ये तीन श्लोक 'उपजाति' छन्दवाले हैं और अट्ठाईसवों श्लोक 'इन्द्रवज्रा' छन्दवाला है। बचे हुए चौबीस श्लोकोंमेंसे—दूसरे श्लोकके तृतीय चरणमें और चौदहवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'भगण' प्रयुक्त होनेसे 'भ-विपुला'; चौबीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें 'मगण' प्रयुक्त होनेसे 'म-विपुला'; सत्ताईसवें श्लोकके प्रथम चरणमें 'रगण' प्रयुक्त होनेसे 'र-विपुला' तथा तीसरे श्लोकके प्रथम और तृतीय चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'जातिपक्ष-विपुला' संज्ञावाले छन्द हैं। शेष उन्नीस श्लोक ठीक 'पध्यावक्त्र' अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।

गीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीतागीता

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ नवमोऽध्यायः

अवतरणिका-

सातवें अध्यायमें भगवान्‌के द्वारा विज्ञानसहित ज्ञान कहनेका जो प्रवाह चल रहा था, उसके बीचमें ही अर्जुनने

आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न कर लिये। उनमेंसे छः प्रश्नोंका उत्तर भगवान्‌ने संक्षेपसे देकर अन्तकालीन

गतिविषयक सातवें प्रश्नका उत्तर विस्तारसे दिया।

अब सातवें अध्यायमें कहनेसे बचे हुए उसी विज्ञानसहित ज्ञानके विषयको विलक्षण रीतिसे कहनेके लिये भगवान्

नवें अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं।

श्रीभगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले-

इदम्

= यह

ते

= तेरे लिये

ज्ञात्वा

= जानकर (तू)

गुह्यतमम्

= अत्यन्त गोपनीय

तु

= तो (मैं फिर)

अशुभात्

= अशुभसे अर्थात्

विज्ञानसहितम् = विज्ञानसहित

प्रवक्ष्यामि

= अच्छी तरहसे

जन्म-मरणरूप

ज्ञानम्

= ज्ञान

कहूँगा,

संसारसे

अनसूयवे

= दोषदृष्टिरहित

यत्

= जिसको

मोक्ष्यसे

= मुक्त हो जायगा।

व्याख्या-'इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे'-

भगवान्‌के मनमें जिस तत्त्वको, विषयको कहनेकी इच्छा

है, उसकी तरफ लक्ष्य करानेके लिये ही यहाँ भगवान्

सबसे पहले 'इदम्' (यह) शब्दका प्रयोग करते हैं। उस

(भगवान्‌के मन-बुद्धिमें स्थित) तत्त्वकी महिमा कहनेके

लिये ही उसको 'गुह्यतमम्' कहा है अर्थात् वह तत्त्व

अत्यन्त गोपनीय है। इसीको आगेके श्लोकमें 'राजगुह्यम्'

और अठारहवें अध्यायके चौंसठवें श्लोकमें 'सर्वगुह्यतमम्'

कहा है।

यहाँ पहले 'गुह्यतमम्' कहकर पीछे (गीता ९। ३४

में) 'मन्मना भव' कहा है और अठारहवें अध्यायमें

पहले 'सर्वगुह्यतमम्' कहकर पीछे (गीता १८। ६५ में)

'मन्मना भव' कहा है। तात्पर्य है कि यहाँका और

वहाँका विषय एक ही है, दो नहीं।

यह अत्यन्त गोपनीय तत्त्व हरेकके सामने नहीं कहा

जा सकता; क्योंकि इसमें भगवान्‌ने खुद अपनी महिमाका

वर्णन किया है। जिसके अन्तःकरणमें भगवान्‌के प्रति थोड़ी

भी दोषदृष्टि है, उसको ऐसी गोपनीय बात कही जाय,

तो वह 'भगवान् आत्मश्लाघी हैं-अपनी प्रशंसा करनेवाले

हैं' ऐसा उलटा अर्थ ले सकता है। इसी बातको लेकर

भगवान् अर्जुनके लिये 'अनसूयवे' विशेषण देकर कहते

हैं कि भैया ! तू दोष-दृष्टिरहित है, इसलिये मैं तेरे सामने

अत्यन्त गोपनीय बातको फिर अच्छी तरहसे कहूँगा अर्थात्

उस तत्त्वको भी कहूँगा और उसके उपायोंको भी

कहूँगा-'प्रवक्ष्यामि'।

'प्रवक्ष्यामि' पदका दूसरा भाव है कि मैं उस बातको

विलक्षण रीतिसे और साफ-साफ कहूँगा अर्थात् मात्र मनुष्य

मेरे शरण होनेके अधिकारी हैं। चाहे कोई दुराचारी-से-

दुराचारी, पापी-से-पापी क्यों न हो तथा किसी वर्णका,

किसी आश्रमका, किसी सम्प्रदायका, किसी देशका, किसी

६२४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

वेशका, कोई भी क्यों न हो, वह भी मेरे शरण होकर मेरी प्राप्ति कर लेता है—यह बात मैं विशेषतासे कहूँगा।

सातवें अध्यायमें भगवान्के मनमें जितनी बातें कहनेकी आ रही थीं, उतनी बातें वे नहीं कह सके। इसलिये भगवान् यहाँ ‘तु’ पद देते हैं कि उसी विषयको मैं फिर कहूँगा।

‘ज्ञानं विज्ञानसहितम्’—भगवान् इस सम्पूर्ण जगत्के महाकारण हैं—ऐसा दृढ़तासे मानना ‘ज्ञान’ है और भगवान्के सिवाय दूसरा कोई (कार्य-कारण) तत्त्व नहीं है—ऐसा अनुभव होना ‘विज्ञान’ है। इस विज्ञानसहित ज्ञानके लिये ही इस श्लोकके पूर्वार्धमें ‘इदम्’ और ‘गृह्यतम्’—ये दो विशेषण आये हैं।

ज्ञान और विज्ञान-सम्बन्धी विशेष बात

इस ज्ञान-विज्ञानको जानकर तू अशुभ संसारसे मुक्त हो जायगा। यह ज्ञान-विज्ञान ही राजविद्या, राजगुह्य आदि है। इस धर्मपर जो श्रद्धा नहीं करते, इसपर विश्वास नहीं करते, इसको मानते नहीं, वे मौतरूपी संसारके रास्तेमें पड़ जाते हैं और बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं (पहलेसे तीसरे श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने ‘ज्ञान’ बताया। अय्यक्तमूर्ति मेरेसे ही यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है अर्थात् सब कुछ मैं-ही-मैं हूँ; दूसरा कोई है ही नहीं (चौथेसे छठे श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने ‘विज्ञान’ बताया।

प्रकृतिके परवश हुए सम्पूर्ण प्राणी महाप्रलयमें मेरी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं और महासर्गके आदिमें मैं फिर उनकी रचना करता हूँ। परन्तु वे कर्म मेरेको बाँधते नहीं। उनमें मैं उदासीनकी तरह अनासक्त रहता हूँ। मेरी अध्यक्षतामें प्रकृति सम्पूर्ण प्राणियोंकी रचना करती है। मेरे परम भावको न जानते हुए मूढ़लोग मेरी अवहेलना करते हैं। राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेनेवालोंकी आशा, कर्म, ज्ञान सब व्यर्थ हैं। महत्मालोग दैवी प्रकृतिका आश्रय लेकर और मेरेको सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि मानकर मेरा भजन करते हैं। मेरेको नमस्कार करते हैं। कई ज्ञानयज्ञके द्वारा एकीभावसे मेरी उपासना करते हैं; आदि-आदि (सातवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने ‘ज्ञान’ बताया। मैं ही क्रतु, यज्ञ, स्वधा, औषध आदि हूँ और सत्-असत् भी मैं ही हूँ अर्थात् कार्य-कारणरूपसे जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ (सोलहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर ‘विज्ञान’ बताया।

जो यज्ञ करके स्वर्गमें जाते हैं, वे वहाँपर सुख भोगते हैं और पुण्य समाप्त होनेपर फिर लौटकर मृत्युलोकमें आते हैं। अनन्यभावसे मेरा चिन्तन करनेवालेका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ। श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करनेवाले वास्तवमें मेरा ही पूजन करते हैं, पर करते हैं अविधिपूर्वक। जो मुझे सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी नहीं मानते, उनका पतन हो जाता है। जो श्रद्धा-प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प आदिको तथा सम्पूर्ण क्रियाओंको मेरे अर्पण करते हैं, वे शुभ-अशुभ कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं (बीसवेंसे अट्ठाईसवें श्लोकतक)—ऐसा कहकर भगवान्ने ‘ज्ञान’ बताया। मैं सम्पूर्ण भूतोंमें सम हूँ। मेरा कोई प्रेम या द्वेषका पात्र नहीं है। परन्तु जो मेरा भजन करते हैं वे मेरेमें और मैं उनमें हूँ (उन्तीसवें श्लोक)—ऐसा कहकर ‘विज्ञान’ बताया। इसके आगेके पाँच श्लोक (तीसवेंसे चौतीसवें श्लोकतक) इस विज्ञानकी व्याख्यामें ही कहे गये हैं*।

‘यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’—असत्के साथ सम्बन्ध जोड़ना ही ‘अशुभ’ है, जो कि ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है। असत्-(संसार-) के साथ अपना सम्बन्ध केवल माना हुआ है, वास्तविक नहीं है। जिसके साथ वास्तविक सम्बन्ध नहीं होता, उसीसे मुक्ति होती है। अपने स्वरूपसे कभी किसीकी मुक्ति नहीं होती। अतः मुक्ति उसीसे होती है, जो अपना नहीं है; किन्तु जिसको भूलसे अपना मान लिया है। इस भूलजनित मान्यतासे ही मुक्ति होती है। भूलजनित मान्यताको न माननेमात्रसे ही उससे मुक्ति हो जाती है। जैसे, कपड़ेमें मैल लग जानेपर उसको साफ किया जाता है, तो मैल छूट जाता है। कारण कि मैल आगन्तुक है और मैलकी अपेक्षा कपड़ा पहलेसे है अर्थात् मैल और कपड़ा दो हैं, एक नहीं। ऐसे ही भगवान्का अविनाशी अंश यह जीव भगवान्से विमुख होकर जिस किसी योनिये जाता है, वहाँपर मैं-मेरापन करके शरीर-संसारके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है अर्थात् मैल चढ़ा लेता है और जन्मता-मरता रहता है। जब यह अपने स्वरूपको जान लेता है अथवा भगवान्के सम्मुख हो जाता है, तब यह अशुभ सम्बन्धसे मुक्त हो जाता है अर्थात् उसका संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। इसी भावको लेकर भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि इस तत्त्वको जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा।

  • यहाँ ज्ञानके वर्णनमें विज्ञान और विज्ञानके वर्णनमें ज्ञान नहीं है—ऐसी बात नहीं है।

श्लोक २ ]

  • साधक-संजीवनी *

६२५

परिशिष्ट भाव-संसार 'प्रकट' है। कर्मयोग (निष्कामभाव) प्रकट न होनेसे 'गुह्य' है। उससे भी गुप्त होनेसे

ज्ञानयोग (आत्मज्ञान) 'गुह्यतर' है। ज्ञानयोगसे भी गुप्त होनेसे भक्तियोग (परमात्मज्ञान) 'गुह्यतम' है। गुह्य और गुह्यतर

तो लौकिक हैं, पर गुह्यतम अलौकिक है।

ब्रह्मलोकतकके सभी लोक पुनरावर्ती होनेसे 'अशुभ' हैं (गीता-आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। गुह्यतम

विषयको जान लेनेसे मनुष्य अशुभसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। अशुभसे मुक्ति तो कर्मयोग और ज्ञानयोगसे भी हो

जाती है, पर यहाँ अशुभसे मुक्ति होनेका तात्पर्य है-एक परमात्माके सिवाय अन्यकी किंचिन्मात्र भी सत्ता न रहे,

अहम्की वह सूक्ष्म गन्ध भी न रहे, जिससे दार्शनिक मतभेद पैदा होते हैं।

अपने स्वरूपको जानना 'ज्ञान' है और समग्र भगवान्को जानना 'विज्ञान' है। निर्गुणके अन्तर्गत तो सगुण (समग्र)

नहीं आ सकता, पर सगुणके अन्तर्गत निर्गुण भी आ जाता है, इसलिये सगुणका ज्ञान 'विज्ञान' अर्थात् विशेष ज्ञान है।

सम्बन्ध-पूर्वश्लोकमें विज्ञानसहित ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके उसका परिणाम अशुभसे मुक्त होना बताया। अब

आगेके श्लोकमें उसी विज्ञानसहित ज्ञानकी महिमाका वर्णन करते हैं।

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।

प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥ २॥

इदम्

= यह (विज्ञानसहित

पवित्रम्

= यह अति

धर्म्यम्

= यह धर्ममय है,

ज्ञान अर्थात्

पवित्र

अव्ययम्

= अविनाशी है (और)

समग्ररूप)

(तथा)

कर्तुम्

= करनेमें

राजविद्या

= सम्पूर्ण विद्याओंका

उत्तमम्

= अतिश्रेष्ठ है

सुसुखम्

= बहुत सुगम है

राजा (और)

(और)

अर्थात् इसको प्राप्त

राजगुह्यम्

= सम्पूर्ण गोपनीयोंका

प्रत्यक्षावगमम् = इसका फल भी

करना बहुत सुगम

राजा है।

प्रत्यक्ष है।

है।

व्याख्या-'राजविद्या'-यह विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्ण

विशेष गोपनीय बात है; क्योंकि वह नाटकमें जिस स्वाँगमें

विद्याओंका राजा है; क्योंकि इसको ठीक तरहसे जान

खेलता है, उसमें वह अपने असली रूपको छिपाये रखता

लेनेके बाद कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता।

है। ऐसे ही भगवान् जब मनुष्यरूपमें लीला करते हैं, तब

भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें कहा है कि 'मेरे

अभक्त लोग उनको मनुष्य मानकर उनकी अवज्ञा करते

समग्ररूपको जाननेके बाद जानना कुछ बाकी नहीं रहता।'

हैं। इससे भगवान् उनके सामने अपने-आपको प्रकट नहीं

पन्द्रहवें अध्यायके अन्तमें कहा है कि 'जो असम्मूढ़ पुरुष

करते (गीता-सातवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)। परन्तु

मेरेको क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम जानता है, वह

जो भगवान्के ऐकान्तिक प्यारे भक्त होते हैं, उनके सामने

सर्ववित् हो जाता है अर्थात् उसको जानना कुछ बाकी नहीं

भगवान् अपने-आपको प्रकट कर देते हैं-यह अपने-

रहता', इससे ऐसा मालूम होता है कि भगवान्के सगुण-

आपको प्रकट कर देना ही अत्यन्त गोपनीय बात है।

निर्गुण, साकार-निराकार, व्यक्त-अव्यक्त आदि जितने

'पवित्रमिदम्'-इस विद्याके समान पवित्र करनेवाली

स्वरूप हैं, उन सब स्वरूपोंमें भगवान्के सगुण-साकार

दूसरी कोई विद्या है ही नहीं अर्थात् यह विद्या पवित्रताकी

स्वरूपकी बहुत विशेष महिमा है।

आखिरी हद है। पापी-से-पापी, दुराचारी-से-दुराचारी भी

'राजगुह्यम्'-संसारमें रहस्यकी जितनी गुप्त बातें हैं,

इस विद्यासे बहुत जल्दी धर्मात्मा बन जाता है अर्थात् पवित्र

उन सब बातोंका यह राजा है; क्योंकि संसारमें इससे बड़ी

बन जाता है और शाश्वती शान्तिको प्राप्त कर लेता है (नवें

दूसरी कोई रहस्यकी बात है ही नहीं।

अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।

जैसे नाटकमें सबके सामने खेलता हुआ कोई पात्र

दसवें अध्यायमें अर्जुनने भगवान्को परम पवित्र

अपना असली परिचय दे देता है, तो उसका परिचय देना

बताया-'पवित्रं परमं भवान्' (१०। १२); चौथे

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय ९ ]

अध्यायमें भगवान्ने ज्ञानको पवित्र बताया—‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ’ (४।३८) और यहाँ राजविद्या आदि आठ विशेषण देकर विज्ञानसहित ज्ञानको पवित्र बताते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि पवित्र परमात्माका नाम, रूप, लीला, धाम, स्मरण, कीर्तन, जप, ध्यान, ज्ञान आदि सब पवित्र हैं अर्थात् भगवत्सम्बन्धी जो कुछ है, वह सब महान् पवित्र है और प्राणिमात्रको पवित्र करनेवाला है*।

उत्तमम् ’—यह सर्वश्रेष्ठ है। इसके समकक्ष दूसरी कोई वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि हैं ही नहीं। यह श्रेष्ठताकी आखिरी हद है, क्योंकि इस विद्यासे मेरा भक्त सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। इतना श्रेष्ठ हो जाता है कि मैं भी उसकी आज्ञाका पालन करता हूँ।

इस विज्ञानसहित ज्ञानको जानकर जो मनुष्य इसका अनुभव कर लेते हैं, उनके लिये भगवान् कहते हैं कि ‘वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ ’—‘मयि ते तेषु चाप्यहम् ’ (९।२९) अर्थात् वे मेरेमें तल्लीन होकर मेरा स्वरूप ही बन जाते हैं।

प्रत्यक्षावगमम् ’—इसका फल प्रत्यक्ष है। जो मनुष्य इस बातको जितना जानेगा, वह उतना ही अपनेमें विलक्षणताका अनुभव करेगा। इस बातको जानते ही परमगति प्राप्त हो जाय—यह इसका प्रत्यक्ष फल है।

धर्मीम् ’—यह धर्ममय है। परमात्माका लक्ष्य होनेपर निष्कामभावपूर्वक जितने भी कर्तव्य-कर्म किये जायें, वे सब-के-सब इस धर्मके अन्तर्गत आ जाते हैं। अतः यह विज्ञानसहित ज्ञान सभी धर्मोंसे परिपूर्ण है।

दूसरे अध्यायमें भगवान्ने अर्जुनको कहा कि इस धर्ममय युद्धके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयस्कर साधन नहीं है—‘धर्म्यादिं युद्धाच्छ्रेयोऽन्यक्षत्रियस्य न

परिशिष्ट भाव —कर्मयोग तथा ज्ञानयोग ‘राजविद्या’ है और भक्तियोग ‘राजगुह्य’ है। इसी अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें राजविद्याकी और चौतीसवें श्लोकमें राजगुह्यकी बात मुख्यतासे कही गयी है।

प्रत्यक्षावगमम् ’—इसका प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) फल होता है। कर्मयोगसे शान्ति, ज्ञानयोगसे मुक्ति और भक्तियोगसे प्रेम प्रत्यक्ष प्राप्त होता है। भगवान्के शरणागत होनेपर निभंयता, निःशोकता, निश्चिन्तता और निःशंकता प्रत्यक्षमें प्राप्त होती है। अपने स्वरूपकी सत्ता-स्फूर्ति (सत्-चित्), अपने होनेपनका ज्ञान (अनुभव) भी प्रत्यक्ष है।

धर्मीम् ’—यह धर्मसे रहित नहीं है, प्रत्युत धर्ममय है, धर्मसे ओतप्रोत है। इसको जाननेसे मनुष्यजीवन सफल हो जाता है अर्थात् मनुष्य कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है।

  • अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

(ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्म० १७।१७)