समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
४. पुण्य-पाप अधिकार (द्वैत मुक्ति निरूपण)
अध्याय - 4 ज्ञान निर्वाण का कारण है - परमट्ठो खलु समओ सुद्धो जो केवली मुणी णाणी। तम्हि ट्ठिदा सहावे मुणिणो पावंति णिव्वाणं॥ (4-7-151) निश्चय से जो परमार्थ (आत्मा) है, वह समय (शुद्ध गुण-पर्यायों में परिणमन करने वाला) है, शुद्ध (समस्त नयपक्षों से रहित एक ज्ञानस्वरूप होने से शुद्ध) है, केवली (केवल चिन्मात्र वस्तुस्वरूप होने से केवली) है, मुनि (केवल मननमात्र भावस्वरूप होने से मुनि) है, ज्ञानी (स्वयं ही ज्ञानस्वरूप होने से ज्ञानी) है। उस परमात्मस्वभाव में स्थित मुनिजन निर्वाण को प्राप्त करते हैं। Undoubtedly, the divine state of the soul is absolute consciousness (samaya), pure (free from all viewpoints, only knowledge consciousness), omniscient (having attained its innate attributes), ascetic (absorbed only in the Self), and the knower (being knowledge by itself). The ascetics who position themselves in this divine state of the soul attain liberation (nirvāṇa). अज्ञानी का व्रत, तप निष्फल है - परमट्ठम्मि दु अट्ठिदो जो कुणदि तवं वदं च धारयदि। तं सव्वं बालतवं बालवदं विंति सव्वण्हू॥ (4-8-152) जो परमार्थ में तो स्थित नहीं है, किन्तु तप करता है और व्रत धारण करता है, उसके उस समस्त तप और व्रत को सर्वज्ञदेव बालतप और बालव्रत कहते हैं। Anyone who has not positioned himself in the divine state of the 73
अध्याय - 4 अज्ञानी को निर्वाण नहीं है - वदणियमाणि धरंता सीलाणि तहा तवं च कुव्वंता। परमट्ठबाहिरा जे णिव्वाणं ते ण विंदंति॥ (4-9-153) व्रत और नियमों को धारण करते हुए तथा शील और तप करते हुए भी जो परमार्थ से बाह्य हैं (जिन्हें परमार्थभूत ज्ञानस्वरूप आत्मा की अनुभूति नहीं है), वे निर्वाण को प्राप्त नहीं करते। पुण्य संसार का कारण है - परमट्ठबाहिरा जे ते अण्णाणेण पुण्णमिच्छंति। संसारगमणहेदुं वि मॉक्खहेदु अयाणंता॥ (4-10-154) जो परमार्थ से बाह्य हैं (शुद्ध आत्मस्वरूप का जिन्हें अनुभव नहीं है), वे मोक्ष के हेतु को न जानते हुए अज्ञान से संसार-गमन के भी कारण पुण्य को चाहते हैं। 74
अध्याय - 4 Those who are not anchored to the divine state of the soul (not living through pure consciousness), since they are not aware of the path to liberation, out of ignorance, they desire virtue (puṇya) which is the cause of the cycle of births and deaths (saṁsāra). मोक्षमार्ग - जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं तेसिमधिगमो णाणं। रागादीपरिहरणं चरणं एसो दु मॉक्खपहो॥ (4-11-155) जीवादिक नौ पदार्थों का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। उन्हीं पदार्थों का संशय, विमोह और विभ्रम से रहित ज्ञान सम्यग्ज्ञान है। रागादिक का परित्याग सम्यक्चारित्र है। यही मोक्ष का मार्ग है। Belief in the nine substances as they are is right faith (samyagdarṣana). Knowledge of these substances without doubt, delusion or misapprehension, is right knowledge (samyagjñāna). Being free from attachment etc. is right conduct (samyakchāritra). These three, together, constitute the path to liberation. यति कर्मों का क्षय करता है - मॉत्तूण णिच्छयट्ठं ववहारेण विदुसा पवट्टंति। परमट्ठमस्सिदाण दु जदीण कम्मक्खओ होदि॥ (4-12-156) 75
अध्याय - 4 निश्चयनय के विषय को छोड़कर विद्वान व्यवहार के द्वारा प्रवृत्ति करते हैं; किन्तु निज शुद्धात्मभूत परमार्थ के आश्रित यतियों के ही कर्मों का क्षय होता है। Leaving aside the ultimate point of view, wise ones take on the empirical way, but the destruction of karmas takes place only to those ascetics who embrace the pure, ultimate nature of the Real Self. रत्नत्रय की मलिनता के कारण - वत्थस्स सेदभावो जह णासदि मलविमेलणोच्छण्णो। मिच्छत्तमलोच्छण्णं तह सम्मत्तं खु णादव्वं॥ (4-13-157) वत्थस्स सेदभावो जह णासदि मलविमेलणोच्छण्णो। अण्णाणमलोच्छण्णं तह णाणं होदि णादव्वं॥ (4-14-158) वत्थस्स सेदभावो जह णासदि मलविमेलणोच्छण्णो। कस्सायमलोच्छण्णं तह चारित्तं पि णादव्वं॥ (4-15-159) जैसे मैल से व्याप्त हुआ वस्त्र का श्वेतभाव नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मिथ्यात्वरूपी मैल से व्याप्त सम्यक्त्व निश्चय ही तिरोहित हो जाता है; ऐसा जानना चाहिये। जिस प्रकार मैल से व्याप्त हुआ वस्त्र का श्वेतभाव नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार अज्ञानरूपी मैल से व्याप्त ज्ञान तिरोहित हो जाता है; ऐसा जानना चाहिये। जिस प्रकार मैल से व्याप्त हुआ वस्त्र का श्वेतभाव नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार कषाय से व्याप्त हुआ चारित्र तिरोहित हो जाता है; ऐसा जानना चाहिये। 76
अध्याय - 4 Just as whiteness of linen gets destroyed when it is soiled with dirt, know that, in the same way, right faith gets destroyed when soiled with wrong belief. Just as whiteness of linen gets destroyed when it is soiled with dirt, know that, in the same way, right knowledge gets destroyed when soiled with nescience. Just as whiteness of linen gets destroyed when it is soiled with dirt, know that, in the same way, right conduct gets destroyed when soiled with passions. कर्म स्वयं ही बन्धस्वरूप है - सो सव्वणाणदरिसी कम्मरयेण णिेएणावच्छण्णो। संसारसमावण्णो ण विजाणदि सव्वदो सव्वं॥ (4-16-160) वह आत्मा (स्वभाव से) सर्वज्ञ और सर्वदर्शी है। (फिर भी वह) अपने कर्मरूपी रज से आच्छादित है (अतः वह) संसार को प्राप्त हुआ है। वह समस्त पदार्थों को सब प्रकार से नहीं जानता। The Self, by his own nature, is all-knowing and all-perceiving. Still, being covered with the dirt of karmas, he is in the worldly state of births and deaths (saṃsāra) and does not know all the substances and their various modes. 77
अध्याय - 4 रत्नत्रय के प्रतिबन्धक कारण - सम्मत्तपडिणिबद्धं मिच्छत्तं जिणवरेहिं परिकहिदं। तस्सोदयेण जीवो मिच्छादिट्ठि त्ति णादव्वो॥ (4-17-161) णाणस्स पडिणिबद्धं अण्णाणं जिणवरेहिं परिकहिदं। तस्सोदयेण जीवो अण्णाणी होदि णादव्वो॥ (4-18-162) चारित्तपडिणिबद्धं कसायमिदि जिणवरेहिं परिकहिदं। तस्सोदयेण जीवो अचरित्तो होदि णादव्वो॥ (4-19-163) सम्यक्त्व का प्रतिबन्धक (रोकने वाला) मिथ्यात्व है, यह जिनेन्द्रदेव ने कहा है। उसके उदय से जीव मिथ्यादृष्टि होता है, ऐसा जानना चाहिये। ज्ञान का प्रतिबन्धक (रोकने वाला) अज्ञान है, यह जिनेन्द्रदेव ने कहा है। उसके उदय से जीव अज्ञानी होता है, ऐसा जानना चाहिये। चारित्र का प्रतिबन्धक (रोकने वाला) कषाय है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है। उसके उदय से जीव चारित्ररहित होता है, ऐसा जानना चाहिये। इदि चउत्थो पुण्णपावाधियारो समत्तो 78
अध्याय - 5 पंचमो आसवाधियारो INFLUX OF KARMAS दो प्रकार के आस्रव - मिच्छत्तं अविरमणं कसायजोगा सण्णसण्णा दु। बहुविहभेदा जीवे तस्सेव अणण्णपरिणामा॥ (5-1-164) णाणावरणादीयस्स ते दु कम्मस्स कारणं होंति। तेसिं पि होदि जीवो रागद्दोसादिभावकरो॥ (5-2-165) मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग (भावप्रत्यय और द्रव्यप्रत्यय के रूप में) चेतन और अचेतन दो प्रकार के होते हैं। (जो चेतन के विकार हैं वे) जीव में अनेक प्रकार के भेद वाले हैं और वे जीव के ही अनन्य परिणाम हैं। जो मिथ्यात्व आदि पुद्गल के विकार हैं, वे ज्ञानावरण आदि कर्मों के निमित्त हैं। उन मिथ्यात्व आदि अचेतन विकारों का निमित्त राग-द्वेष आदि भावों का कर्त्ता जीव होता है। Wrong belief (mithyātva), non-abstinence (avirati), passions (kaṣāya), and actions of the body, the organ of speech and the mind (yoga) are of two kinds – psychical (chetana) and material (achetana). Psychical modifications are of various kinds and they are modes exclusively of the Self. Material modifications, like wrong belief, lead to karmas, like knowledge-obscuring karma. The cause of material modifications, like wrong belief, is the Self when he gets involved in psychic states like attachment and aversion. 79
अध्याय - 5 सम्यग्दृष्टि के आस्रवों का अभाव है - णत्थि दु आसवबंधो सम्मादिट्ठिस्स आसवणिरोहो। संते पुव्वणिबद्धे जाणदि सो ते अबंधंतो॥ (5-3-166) सम्यग्दृष्टि के आस्रवनिमित्तक बन्ध नहीं है; किन्तु आस्रव का निरोध है। नवीन कर्मों को न बाँधता हुआ वह सत्ता में विद्यमान पूर्व में बाँधे हुए कर्मों को जानता है। The right believer has no bondage due to influx of karmas; the influx is blocked. While free from bondage of new karmas, he is aware of the still existing, past bondage of karmas. रागद्वेष ही आस्रव है - भावो रागादिजुदो जीवेण कदो दु बंधगो होदि। रागादि-विप्पमुक्को अबंधगो जाणगो णवरि॥ (5-4-167) जीव के द्वारा किया हुआ रागादियुक्त भाव तो नवीन कर्मों का बन्ध करने वाला होता है और रागादि से रहित भाव बन्ध नहीं करता। वह मात्र ज्ञायक है। Psychic modes, like attachment etc., of the Self result into bondage of fresh karmas. However, the Self devoid of such psychic modes is free from bondage; he is of the nature of the knower. 80
अध्याय - 5 निर्जरित कर्म का पुनः बन्ध नहीं - पक्के फलम्मि पडिदे जह ण फलं बज्झदे पुणो विंटे। जीवस्स कम्मभावे पडिदे ण पुणोदयमुवेदि॥ (5-5-168) जैसे पके हुए फल के (वृक्ष से) गिरने पर वह फल पुनः डंठल में नहीं जुड़ता, उसी प्रकार जीव के पुद्गल कर्मों की निर्जरा होने पर पुनः वे उदय को प्राप्त नहीं होते (पुनः वे जीव के साथ नहीं बँधते)। As the ripened fruit, once fallen (from tree), does not get re- attached to the stalk, similarly, karmas (karmic matter), once dissociated from the Self, do not come to fruition again (do not again get bonded with the Self). ज्ञानी के द्रव्यास्त्रव का अभाव है - पुढवीपिंडसमाणा पुव्वणिबद्धा दु पच्चया तस्स। कम्मसरीरेण दु ते बद्धा सव्वे वि णाणिस्स॥ (5-6-169) उस ज्ञानी के पहले (अज्ञान अवस्था में) बँधे हुए सभी (मिथ्यात्वादि द्रव्य) प्रत्यय तो पृथ्वी के ढेले के समान हैं (अकिंचित्कर हैं); और वे (अपने पुद्गलस्वभाव से) कार्मण शरीर के साथ बँधे हुए हैं। In the Self with right knowledge, all previously bonded karmas (wrong belief etc., which got bonded when the Self was in the state of nescience), are like a lump of earth (i.e., practically inconsequential) and these (due to their physical nature), remain incorporated with the karmic body (kārmaṇa śarīra). 81
अध्याय - 5 ज्ञानगुण से कर्म-बन्ध - चहुविह अणेयभेयं बंधंते णाणदंसणगुणेहिं। समये समये जम्हा तेण अबंधो त्ति णाणी दु॥ (5-7-170) क्योंकि (मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग) ये चार प्रकार के द्रव्यास्त्रव ज्ञान-दर्शन गुणों के द्वारा प्रतिसमय अनेक प्रकार के कर्मों को बाँधते हैं, अतः ज्ञानी तो अबन्ध ही है। ज्ञानगुण कर्म-बन्ध का कारण क्यों है - जम्हा दु जहण्णादो णाणगुणादो पुणो वि परिणमदि। अण्णत्तं णाणगुणो तेण दु सो बंधगो भणिदो॥ (5-8-171) क्योंकि ज्ञानगुण ज्ञानगुण के जघन्य भाव (क्षायोपशमिक ज्ञान) के कारण पुनः अन्तर्मुहूर्त के पश्चात् अन्य रूप से परिणमन करता है, इसी कारण वह (ज्ञानगुण का जघन्य भाव - यथाख्यात चारित्र की प्राप्ति से पूर्व तक) कर्म का बन्ध कराने वाला कहा गया है। 82
अध्याय - 5 one muhūrta*, in alternative modes, therefore, this cognitive quality (from the level of destruction-cum-subsidence to the level just before perfect conduct) has been said to be the cause of bondage of karmas. रत्नत्रय का जघन्य भाव कर्म-बन्ध का कारण है - दंसणणाणचरित्तं जं परिणमदे जहण्णभावेण। णाणी तेण दु बज्झदि पोग्गलकम्मेण विविहेण॥ (5-9-172) दर्शन, ज्ञान और चारित्र जघन्य भाव से जो परिणमन करते हैं, उसके कारण ज्ञानी जीव अनेक प्रकार के पुद्गल कर्मों से बन्ध को प्राप्त होता है। The knowledgeable jīva, due to the modifications of knowledge, faith, and conduct, in their lowest stage of disposition (destruction-cum-subsidence), gets bondages of various kinds of karmic matter. सम्यग्दृष्टि के कर्मबन्ध नहीं होता - सव्वे पुव्वणिबद्धा दु पच्चया संति सम्मदिट्ठिस्स। उवओगप्पाओगं बंधंते कम्मभावेण॥ (5-10-173) * muhūrta is a measure of time equal to 48 minutes. 83
अध्याय - 5 संता दु णिरुवभोज्जा बाला इत्थी जहेव पुरिसस्स। बंधदि ते उवभोज्जे तरुणी इत्थी जह णरस्स॥ (5-11-174) होदूण णिरुवभोज्जा तह बंधदि जह हवंति उवभोज्जा। सत्तट्ठविहा भूदा णाणावरणादिभावेहिं॥ (5-12-175) एदेण कारणेण दु सम्मादिट्ठी अबंधगो भणिदो। आसवभावाभावे ण पच्चया बंधगा भणिदा॥ (5-13-176) सम्यग्दृष्टि जीव के पूर्व की सराग दशा में बाँधे हुए सभी द्रव्यास्त्रव सत्ता में विद्यमान हैं। वे उपयोग के प्रयोगानुसार कर्म भाव के द्वारा (रागादि भाव प्रत्ययों के द्वारा) बन्ध को प्राप्त होते हैं। सत्ता में विद्यमान रहते हैं फिर भी उदय से पूर्व वे भोगने योग्य नहीं होते। जैसे बाल स्त्री पुरुष के लिए भोग्य नहीं होती। वे ही कर्म उदयकाल में भोगने योग्य होने पर नये कर्मों को बाँधते हैं; जिस प्रकार तरुणी स्त्री पुरुष के लिए (भोग्य होती है और पुरुष को रागभाव में बाँध लेती है)। वे पूर्वबद्ध कर्म भोगने के अयोग्य होकर जैसे भोगने योग्य होते हैं, उसी प्रकार ज्ञानावरण आदि रूप से (आयु कर्म के बिना) सात प्रकार के और (आयु कर्म सहित) आठ प्रकार के कर्मों को बाँधते हैं। इसी कारण से सम्यग्दृष्टि जीव अबन्धक (कर्म-बन्ध न करने वाला) कहा गया है। रागादि भावास्रव के अभाव में द्रव्य प्रत्यय बन्धकारक नहीं होते हैं। In the right believer, all previously bonded karmas, which got bonded when the Self was in the state of attachment, remain existent. They get bonded due to the manifestation of conscious dispositions of the Self, involving attachment etc. They are existent but are not fit for enjoyment till they mature; just as a child-wife is not fit for enjoyment by the husband. The same bonded karmas, when they mature, are fit for enjoyment and, in 84
अध्याय - 5 भावप्रत्यय के बिना द्रव्यप्रत्यय नहीं होता - रागो दोसो मोहो य आसवा णत्थि सम्मदिट्ठस्स। तम्हा आसवभावेण विणा हेदू ण पच्चया होंति॥ (5-14-177) हेदू चदुव्वियप्पो अट्ठवियप्पस्स कारणं हवदि। तेसिं पि य रागादी तेसिमभावे ण बज्झंति॥ (5-15-178) राग, द्वेष और मोह ये आस्रव सम्यग्दृष्टि के नहीं होते। इसलिए रागादि भावास्रव के बिना द्रव्य प्रत्यय कर्म-बन्ध के कारण नहीं होते। मिथ्यात्व आदि चार प्रकार के हेतु आठ प्रकार के कर्मों के कारण होते हैं और उन चार प्रकार के हेतुओं के कारण जीव के रागादि भाव हैं। उन रागादि भावों का अभाव होने के कारण सम्यग्दृष्टि के कर्म-बन्ध नहीं होता।
अध्याय - 5 pertaining to attachment etc., the existent karmic matter cannot cause fresh bondages. Four kinds of karmic influxes, such as wrong belief, cause bondages of eight kinds of karmas, and these four kinds of karmic influxes are due to the psychic states of the Self, pertaining to attachment etc. Because of the absence of these psychic states pertaining to attachment etc., the Self with right belief does not get fresh karmic bondages. ──────── शुद्धनय से च्युत जीव के बन्ध होता है - जह पुरिसेणाहारो गहिदो परिणमदि सो अणेयविहं। मंसवसारुहिरादी भावे उदरग्गिसंजुत्तो॥ (5-16-179) तह णाणिस्स दु पुव्वं जे बद्धा पच्चया बहुवियप्पं। बज्झंते कम्मं ते णयपरिहीणा दु ते जीवा॥ (5-17-180) जैसे पुरुष के द्वारा ग्रहण किया हुआ आहार उदराग्नि का संयोग पाकर वह मांस, मज्जा, रुधिर आदि के रूप से अनेक रूप में परिणमन करता है; उसी प्रकार ज्ञानी के पूर्व में बद्ध जो द्रव्यास्त्रव थे, वे अनेक प्रकार के कर्मों को बाँधते हैं। वे जीव शुद्धनय से च्युत हैं (शुद्धनय से च्युत होने पर ही ज्ञानी जीव रागादि भावास्रव करता है। उससे द्रव्यास्त्रव और कर्म-बन्ध होता है)। Just as food eaten by a man, and acted upon by his digestive system, gets metabolized into flesh, bone-marrow, blood etc., in the same way, the earlier influxes of karmic matter associated with the Self of the knowledgeable, cause various kinds of fresh karmic bondages. Such a knowledgeable Self is away from the 86
अध्याय - 5 pure, transcendental point of view. (Only when the knowledgeable Self is away from the pure, transcendental point of view, he gets caught up in psychic states pertaining to attachment etc., which cause influxes and karmic bondages.) इदि पंचमो आसवाधियारो समत्तो 87
अध्याय - 6 छट्ठमो संवराधियारो भेदविज्ञान ही संवर का उपाय है - उवओगे उवओगो कोहादिसु णत्थि को वि उवओगो। कोहे कोहो चेव हि उवओगे णत्थि खलु कोहो॥ (6-1-181) अट्ठवियप्पे कम्मे णोकम्मे चावि णत्थि उवओगो। उवओगम्हि य कम्मं णोकम्मं चावि णो अत्थि॥ (6-2-182) एदं तु अविवरीदं णाणं जइया दु होदि जीवस्स। तइया ण किंचि कुव्वदि भावं उवओगसुद्धाप्पा॥ (6-3-183) उपयोग में उपयोग है, क्रोध आदि में कोई भी उपयोग नहीं है। और क्रोध में ही क्रोध है, निश्चय ही उपयोग में क्रोध नहीं है। आठ प्रकार के (ज्ञानावरणादि) कर्मों और (शरीरादि) नोकर्मों में भी उपयोग नहीं है और उपयोग में कर्म ओर नोकर्म भी नहीं है। जिस काल में जीव को ऐसा अविपरीत (सत्यार्थ) ज्ञान हो जाता है, तब उपयोग-स्वरूप शुद्धात्मा उपयोग के अतिरिक्त अन्य किसी भाव को नहीं करता। 88
५. आस्रव अधिकार (कर्म आगमन व निवृत्ति)
अध्याय - 6 discriminative knowledge, free from error, then the true nature of the Self, which is pure consciousness, manifests itself, and the Self then does not entertain any impure psychic dispositions. भावविज्ञान से शुद्धात्मा की प्राप्ति - जह कणयमग्गितवियं पि कणयसहावं ण तं परिच्चयदि। तह कम्मोदयतविदो ण जहदि णाणी दु णाणित्तं॥ (6-4-184) एवं जाणदि णाणी अण्णाणी मुणदि रागमेवादं। अण्णाणतमोच्छण्णं आदसहावं अयाणंतो॥ (6-5-185) जैसे अग्नि में तपाया हुआ सोना अपने सुवर्ण स्वभाव को नहीं छोड़ता, इसी प्रकार (तीव्र परीषह-उपसर्गरूप) कर्मोदय से तप्त होता हुआ ज्ञानी भी अपने ज्ञानीपने के स्वभाव को नहीं छोड़ता। इस प्रकार ज्ञानी जानता है और अज्ञानरूप अन्धकार से आच्छन्न अज्ञानी आत्मस्वभाव को न जानता हुआ राग को ही आत्मा मानता है। Just as gold, on being intensely heated, does not lose its inherent quality, in the same way, the Self with right knowledge does not abandon his nature of true knowledge on being burnt (by way of hardship or torment) as a consequence of the rise of karmas. Thus, the knowledgeable Self realizes the true nature of the Self, while the ignorant, being camouflaged by nescience, gets associated with impure psychic states such as attachment. 89
अध्याय - 6 शुद्धात्मा के अनुभव से संवर होता है - सुद्धं तु वियाणंतो विसुद्धमेवप्पयं लहदि जीवो। जाणंतो दु असुद्धं असुद्धमेवप्पयं लहदि॥ (6-6-186) शुद्ध आत्मा को जानता हुआ जीव शुद्ध आत्मा को ही प्राप्त करता है और अशुद्ध आत्मा को जानता हुआ जीव अशुद्ध आत्मा को ही प्राप्त करता है। The Self who knows the pure nature of the soul, dwells in the pure nature of the soul, but the Self who knows the impure nature of the soul, dwells in the impure nature of the soul. संवर की विधि - अप्पाणमप्पणा रुंधिदूण दोपुण्णपावजोगेसु। दंसणणाणम्हि ठिदो इच्छाविरदो य अण्णम्हि॥ (6-7-187) जो सव्वसंगमुक्को झायदि अप्पाणमप्पणा अप्पा। ण वि कम्मं णोकम्मं चेदा चिंतेदि एयत्तं॥ (6-8-188) अप्पाणं झायंतो दंसणणाणमइओ अणण्णमओ। लहदि अचिरेण अप्पाणमेव सो कम्मपविमुक्कं॥ (6-9-189) आत्मा को अपनी आत्मा के द्वारा पुण्य और पाप इन दोनों शुभाशुभ योगों से रोककर दर्शन और ज्ञान में स्थित हुआ और अन्य देह-रागादि में इच्छा से विरत हुआ तथा 90
अध्याय - 6 समस्त बाह्य-आभ्यन्तर परिग्रह से रहित हुआ जो आत्मा अपनी आत्मा को अपनी आत्मा के द्वारा ध्याता है, (एवं) कर्म और नोकर्म को नहीं ध्याता है, ऐसा गुणविशिष्ट आत्मा एकत्व का चिन्तन (अनुभव) करता है। वह आत्मा अपनी आत्मा का ध्यान करता हुआ दर्शन-ज्ञानमय हुआ और अनन्यमय हुआ थोड़े ही काल में कर्मों से रहित आत्मा को प्राप्त कर लेता है। The Self, by his own enterprise, protecting himself from virtuous as well as wicked activities that cause merit and demerit, and stationing himself in right faith and knowledge, detached from body and desires etc., devoid of external and internal attachments, contemplates on the Self, through his own Self, and does not reflect upon the karmas and the quasi-karmic matter (nokarma); the Self with such distinctive qualities experiences oneness with the Self. Such a Self, contemplating on the Self, becomes of the nature of right faith and knowledge, and being immersed in the Self, attains, in a short span of time, status of the Pure Self that is free from all karmas. संवर का क्रम - तेसिं हेदू भणिदा अज्झवसाणाणि सव्वदरिसीहिं। मिच्छत्तं अण्णाणं अविरदिभावो य जोगो य॥ (6-10-190) हेदुअभावे णियमा जायदि णाणिस्स आसवणिरोहो। आसवभावेण विणा जायदि कम्मस्स दु णिरोहो॥ (6-11-191) 91
अध्याय - 6 कम्मस्साभावेण य णोकम्माणं पि जायदि णिरोहो। णोकम्मणिरोहेण य संसारणिरोहणं होदि॥ (6-12-192) सर्वज्ञदेव ने (रागादि विभाव कर्मरूप) भावास्रवों के कारण मिथ्यात्व, अज्ञान, अविरतिभाव और योग ये चार अध्यवसान कहे हैं। ज्ञानी के हेतुओं के अभाव में नियम से आस्रव का निरोध होता है। आस्रवभाव के बिना कर्म का भी निरोध हो जाता है और कर्म का अभाव होने से नोकर्मों का भी निरोध हो जाता है। नोकर्म का निरोध होने से संसार का निरोध होता है। इदि छट्टमो संवराधियारो समत्तो 92