सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
( ६६ ) वामदेवादिर्मुक्को नाद्वैतम् ॥ १५७ ॥ अर्थ—यद्यपि वामदेवादिक मुक्त होगये, लेकिन अद्वैत स्वरूप तो नहीं हुये ; क्योंकि यदि मुक्त जीव सब ही अद्वैतस्वरूप हो जाते तो आजतक सहज-सहज सब पुरुष अद्वैत होकर पुरुष का नाममात्र भी न रहता । प्र०—वामदेवादिकों का परम मोक्ष नहीं हुआ ? उ०—अनादावद्ययावदभावाद्भविष्यदप्येवम्।१५८ अर्थ—अनादि-काल से लेकर आजतक जो बात नहीं हुई है वह भविष्यत्-काल में भी न होगी, यही नियम है। इससे यह सिद्ध होता है, कि अनादि-काल से लेकर आजतक कोई भी पुरुष मुक्त होकर ब्रह्म नहीं हुआ ; क्योंकि पुरुषों की संख्या कमती देखने में नहीं आती, और नई पुरुषों की उत्पत्ति मानी नहीं गई है, तो भविष्यत्-काल में भी ऐसा ही होगा। अब मोक्ष के विषय में सांख्यकार अपना सिद्धान्त ( निश्चय ) कहते हैं। इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः ॥ १५६ ॥ अर्थ—इस वर्त्तमान-काल के दृष्टान्त से यह जानना चाहिये कि पुरुष के बन्धन का किसी समय में भी अत्यन्त उच्छेद नहीं हो सकता। इसका मतलब यह है, कि कोई भी पुरुष ऐसा मुक्त नहीं है, कि फिर उसका कभी बन्धन न हो सके और इससे यह भी मालूम होता है, कि मुक्त पुरुष का फिर भी जन्म होता है। प्र०—मोक्ष का क्या स्वरूप है ? उ०—व्यावृत्तोभयरूपः ॥ १६० ॥ अर्थ—मुक्ति संसार के दुःख-सुख दोनों ही से विलक्षण है, अर्थात् मुक्ति में पुरुष को शान्त सुख होता है, यह स्वरूप है। प्र०—जबकि पुरुष को साक्षी कह चुके वह साक्षीपन मोक्ष समय में नहीं रह सकता ; क्योंकि वहां मनादि का
( ६७ ) अभाव है, तो पुरुष सदा एक रूप रहता है, यह कहना भी असंगत हुआ ? उ०—साक्षात् संबंधात् साक्षित्त्वम् ॥ १६१ ॥ अर्थ—पुरुष को जो साक्षित्व कहा है, वह मन आदि के साथ साक्षात् सम्बन्ध में कहा है, किन्तु वास्तव में पुरुष साक्षी नहीं है ; क्योंकि पाणिनिमुनि ने साक्षी शब्द का ऐसा अर्थ किया है “साक्षाद्द्रष्टिर संज्ञायाम्” । इस सूत्र से साक्षी शब्द निपातन किया है, कि जितने समय में निरन्तर देखता है उतने ही समय में उसकी साक्षी संज्ञा है। इससे यह सिद्ध होता है, कि जितने समय तक पुरुष का मन से सम्बन्ध रहता है, उतने ही समय तक पुरुष की साक्षी संज्ञा रहती है, अथवा मन के संसर्ग ( मेल ) से पुरुष में दुःख-सुख आदि को माना जाय, तो पुरुष को वास्तव में दुःखादि से मुक्त होने में यह दोष होगा कि— नित्यमुक्तत्वम् ॥ १६२ ॥ अर्थ—यदि पुरुष को नित्यमुक्त मानें, तो मुक्ति का साधन करना व्यर्थ होता है, और मुक्ति प्रतिपादक जो श्रुतियाँ हैं उन- में भी दोषारोपण होगा, और इस सूत्र के अर्थ में जो विज्ञान- भिक्षु ने ( नित्यमुक्तत्वम् ) यह पुरुष को विशेषण दिया है, अर्थात् पुरुष को नित्य मुक्त माना है । यह कथन इस कारण अयोग्य है, कि “इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः” । इस सूत्र से पुरुष का अनित्य मुक्त कपिलाचार्य ने मानी है । इससे यहाँ विरोध होगा । उन टीकाकारों ने यह न सोचा, क्या उन ऋषियों की बुद्धि मनुष्यों की बुद्धि की तरह क्षणिक होती है, कि कभी कुछ कहें, कभी कुछ कहें, जबकि उक्त सूत्र “इदानीमित्यादि” से पुरुष को अनित्य मुक्त प्रतिपादन कर चुके, फिर नित्य-मुक्त कैसे कह सकते हैं और पूर्वोक्त टीकाकार के कथन में इस कारण से भी
( ६८ ) अयोग्यता है कि जो दोष कपिलाचार्य को अपने कहे हुये विशेषणों से दीखे, उनके दुरुस्त करने के लिये "साक्षात् सम्बन्धात् साक्षित्त्वम्" यह सूत्र फिर कहा, इसी प्रकार "नित्य मुक्तत्वम्" और "औदार्य सीत्वम्," यह दो तरह के दोष आवेंगे, उनका; समाधान इस अध्याय के अन्तिम से सिद्ध कर दिया गया है, इस ही कारण "नित्य मुक्तत्वम्" और "औदार्य सीन्यज्योति," यह दोनों सूत्र दोष के दिखानेवाले हैं। औदासीन्यज्योति ॥ १६३ ॥ अर्थ—और पुरुष को वास्तव में मुक्त मानैं तो औदासीन्य दोष होगा, क्योंकि पुरुष का किसी से सम्बन्ध ही नहीं है, तो वह किसी कर्म का कर्त्ता क्यों होगा। जब किसी कर्म का कर्त्ता तो रहा ही नहीं तो बन्धन आदि में क्यों पड़ेगा, तब उसमें औदासीन्य दोष होगा। इस सूत्र का भाव और पुरुष को कर्त्तृत्व अगले सूत्र से प्रतिपादन करेंगे। प्र०—"औदासीन्यज्योति" इस सूत्र में 'इति' शब्द क्यों है ? उ०—यह इस वास्ते है, कि पुरुष की सिद्धि में दोष आदि का खण्डन कर चुके। उपरागात्कर्त्तृत्वंचित्सान्निध्यात् चित्सान्नि- ध्यात् ॥ १६४ ॥ अर्थ—पुरुष में जो कर्त्तृत्व है, सो मन के उपराग से है, और मन में जो चित्-शक्ति है, वह पुरुष के संसर्ग से है। यहाँ- पर जो "चित्सान्निध्यात्" यह दो बार कहा है सो अध्याय की समाप्ति का जतानेवाला है और इस अध्याय में शास्त्र के मुख्य चार ही अर्थ कहे गये हैं "हेय" त्यागने के लायक, "हान" त्यागना। "हेय" और "हान" और इन दोनों के हेतु। इति सांख्यदर्शने प्रथमोऽध्यायः समाप्तः।
द्वितीयोऽध्यायः
( ६६ ) द्वितीयोऽध्यायः शास्त्र का तो विषय निरूपण कर चुके, अब पुरुष को अपरि- माणित्व ठहराने के वास्ते प्रकृति से सृष्टि का होना, विस्तार से द्वितीयोऽध्याय में कहेंगे और इसही दूसरे अध्याय में प्रधान के जो कार्य हैं, उनके स्वरूप को भी विस्तार से कहना है ; क्योंकि प्रकृति के कार्यों से पुरुष का ज्ञान अच्छी तरह से होता है। कारण यह है, कि प्रकृति के कार्यों के बिना ज्ञान हुए मुक्ति किसी प्रकार नहीं हो सकती, अर्थात् जब तक पुरुष, प्रकृति और प्रकृति के कार्य, इन तीनों का अच्छी तरह ज्ञान नहीं हो सकता तबतक मुक्ति भी न होगी; किन्तु उनके जानने ही से मुक्ति होती है। प्र०--अपरिमाणित्व किसको कहते हैं ? उ०--जो परिमाण को प्राप्त न हो। यदि अचेतन प्रकृति निष्प्रयोजन सृष्टि को उत्पन्न करती है, तो मुक्त को भी बन्ध की प्राप्ति हो सकती है। इस आशय को विचार करके सृष्टि के उत्पन्न होने का प्रयोजन इस सूत्र में कहते हैं। विमुक्तमोक्षार्थं स्वार्थं वाप्रधानस्य ॥ १ ॥ अर्थ—पुरुष में जो अहंकार के संबन्ध से दुःख मालूम पड़ता है, उसकी मुक्ति के वास्ते अथवा स्वार्थ अर्थात् पुरुष के सम्बन्ध से जो मन आदि को दुःख होते हैं, उनके दूर करने के लिये प्रधान अर्थात् प्रकृति को कर्तृत्व है, और इस सूत्र में कर्तृत्व शब्द पहिले सूत्र से लाया गया है।
( ७० ) प्र०—यदि मोक्ष के वास्ते ही सृष्टि होती है, तो एक बार की ही सृष्टि से सब पुरुषों को मोक्ष हो जाता, बारम्बार सृष्टि के होने का क्या कारण है ? उ०—विरक्तस्य तत्सिद्धेः ॥ २ ॥ अर्थ—एक बार की सृष्टि से मोक्ष नहीं होता, किन्तु बहुत से जन्म, मरण, व्याधि आदि नाना प्रकार के [ सैकड़ों ] दुःखों से अत्यन्त [ बहुत ] तप्त [ दुःखित ] होने पर जब प्रकृति पुरुष का ज्ञान पैदा होता है तब वैराग्य द्वारा मोक्ष होता है और वह वैराग्य एक बार की सृष्टि से आजतक किसी को उत्पन्न नहीं हुआ। इसमें यह सूत्र प्रमाण है— न श्रवणमात्रात् तत्सिद्धिरनादिवासनाया बल- वत्वात् ॥ ३ ॥ अर्थ—मुक्ति श्रवणमात्र से भी नहीं हो सकती । यद्यपि श्रवण भी बहुत जन्मों के पुण्यों से होता है तथापि श्रवणमात्र से वैराग्य की सिद्धि भी नहीं होती है, किन्तु विवेक के साक्षात्कार से मुक्ति होती है और साक्षात्कार शीघ्र नहीं होता । अनादि मिथ्यावासना के बलवान् होने से और उस वासना के रहते हुए पुरुष मुक्त नहीं हो सकता, किन्तु योग से जो विवेक साक्षात्कार होता है। उसके ही द्वारा मुक्त होता है और इस योग में सैकड़ों विघ्न पैदा हो जाते हैं। इस कारण यह योग भी बहुत जन्मों में सिद्ध होता है। इस कारण जन्मान्तर में वैराग्य को प्राप्त होकर किसी समय में कोई-कोई पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं, किन्तु सब मोक्ष को नहीं प्राप्त होते। प्र०—सृष्टि का प्रवाह (जन्म, मरण आदि) किस तरह चल रहा है ?
( ७१ ) उ०—बहुभृत्यवद्वा प्रत्येकम् ॥ ४ ॥ अर्थ—जैसे एक गृहस्थ से सैकड़ों नौकर बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष आदि का क्रम से भरण-पोषण ( भोजन, वस्त्र आदि ) होता है, इसी प्रकार प्रकृति के सत्त्वादि गुण प्रत्येक सैकड़ों पुरुषों को क्रम से मुक्त कर देते हैं, इसवास्ते कोई-कोई मुक्त हो भी जाते हैं; लेकिन और जो बाक़ी मनुष्य हैं उनकी मुक्ति के वास्ते सृष्टिप्रवाह की आवश्यकता है, क्योंकि पुरुष अनन्त है । प्र०—प्रकृति सृष्टि की कारण है, इसमें क्या हेतु है ? क्योंकि पुरुष को ही कारण सब मानते हैं ? उ०—प्रकृतिवास्तवे च पुरुषस्याध्याससिद्धिः॥५ अर्थ—यद्यपि वास्तव में ( निस्सन्देह ) प्रकृति ही सृष्टि का कारण है तथापि ( तौ भी ) सृष्टि के करने में पुरुष की अध्यास सिद्धि है । प्र०—अध्यास किसको कहते हैं ? उ०—अध्यास उसे कहते हैं कि काम दूसरा करे और नाम दूसरे का हो, जैसे कि—लड़ाई में योद्धा ( वीर लोग ) अपनी शक्ति से जीत और हार करते हैं; लेकिन वह जीत-हार सब राजा ही की गिनी जाती है. इसको ही अध्यास कहते हैं । प्र०—वास्तव में प्रकृति ही सृष्टि करनेवाली कैसे है ? क्योंकि सृष्टि को अनित्य शास्त्रों ने प्रतिपादन ( सबूत ) किया है । यदि ऐसा है तो उस सृष्टि का कारण, जो प्रकृति है, वह भी अनित्य होगी ? उ०—कार्यतस्तत्सिद्धेः ॥ ६ ॥ अर्थ—कार्यों के देखने ही से प्रकृति के वास्तव कारणत्व ( कारण होने ) की सिद्धि हो सकती है, क्योंकि यह सृष्टिरूपी
( ७२ ) कार्य प्रकृति के सिवाय और किसका हो सकता है ? यदि पुरुष का कहें तो पुरुष में परिणामित्व की प्राप्ति आती है, और यदि प्रकृति कान कहें तो किसका—यह सन्देह पैदा होता है ? इस कारण प्रकृति ही को वास्तव में कारणत्व है और जो सृष्टि के अनित्यत्व में स्वप्न का दृष्टान्त देते हैं, सो भी ठीक नहीं ; क्योंकि स्वप्न भी अपनी अवस्था में सत्य ही होता है। इस कारण सृष्टि नित्य है, और उसका कारण भी नित्य है । प्र०—प्रकृति अपने मोक्ष के वास्ते सृष्टि करने में क्यों तैयार होती है ? उ०—चेतनोद्देशान्नियमः कण्टकमोक्षवत् ॥ ७ ॥ अर्थ—विवेकी पुरुष के लिए प्रकृति का यह नियम है कि वह प्रक्रित विवेकी पुरुष के द्वारा अपना मोक्ष करे, जैसे— ज्ञानवान् पुरुष बड़ी बुद्धिमानी के साथ काँटे से काँटे को निकालता है, उसका ही सहारा और अज्ञानी मनुष्य भी लेते हैं ; इस तरह से प्रकृति को भी जानना चाहिये । प्र०—पुरुष में कारणत्व का होना गिनने ही मात्र कहा है सो ठीक नहीं है, क्योंकि प्रकृति के मेल से पुरुष भी महदादिकों के परिणाम को धारण कर लेता है, जैसे—काठ जमीन के ही समान हो जाता है, उसी तरह पुरुष को भी होना चाहिये ? उ०—अन्ययोगेऽपितत्सिद्धिर्नाञ्जस्ये नायोदा- हवत् ॥ ८ ॥ अर्थ—प्रकृति के साथ पुरुष का योग होने पर भी पुरुष वास्तव में सृष्टि का कारण नहीं हो सकता, यह प्रत्यक्ष ही है, जैसे— लोहे और अग्नि के संयोग होने पर लोहा अग्नि नहीं हो सकता । यद्यपि इस दृष्टांत से दोनों में परिणामित्व हो सकता
( ७३ ) है, क्योंकि अग्नि और लोहे ने अपनी पहली अवस्था को छोड़ दिया है, तो भी एक ही परिणामी होना चाहिये ; क्योंकि दोनों परिणामी होने से गौरव होता है, और जो दोनों ही को परिणामी माना जाय तो स्फटिकमणि में लाल या पीले रंग की परछाईं पड़ने से जो उसमें लाली वा पीलापन आता है वो भी वास्तविक मानना पड़ेगा, लेकिन वैसा माना नहीं जाता ? प्र०—सृष्टि का मुख्य निमित्तकारण क्या है ? उ०—रागविरागयोर्योगः सृष्टिः ॥ ९ ॥ अर्थ—जिसमें राग और विराग इन दोनों का योग ( मेल ) हो, उसे सृष्टि कहते हैं । इन दोनों का योग होना ही सृष्टि करने का निमित्त-कारण है । प्र०—सृष्टि प्रक्रिया ( होना ) किस तरह होती है ? उ०—महदादिक्रमेण पञ्चभूतानाम् ॥ १० ॥ अर्थ—महत्तत्वादिकों से आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, यह पंचभूत पैदा हुये । यद्यपि प्रकृति का सृष्टित्व अपनी मुक्ति के वास्ते हो क्योंकि वह प्रकृति नित्य है ; किन्तु महदादिकों का अपने- अपने विकार का सृष्टत्व अपनी मुक्ति के वास्ते नहीं हो सकता, क्योंकि वह अनित्य है । अतएव महदादिकों का सृष्टत्व पराये वास्ते है । और भी प्रमाण है । आत्मार्थत्वात् सृष्टेर्नैषामात्मार्थआरम्भः ॥११॥ अर्थ—इन महदादिकों का कारणत्व पुरुष के मोक्ष के वास्ते है, किन्तु अपने वास्ते नहीं है ; क्योंकि महदादि विनाशी हैं अर्थात् नाशवाले हैं । प्र०—यदि महदादिकों का कारणत्व ( बनाने वालापन ) पराये वास्ते है, तो प्रकृति के वास्ते होना चाहिये । पुरुष के वास्ते क्यों है ?
( ७४ ) उ०—महदादिक प्रकृति के ही कार्य हैं, इस कारण 'पर' शब्द से पुरुष का ही ग्रहण होगा । प्र०—दिशा और काल की सृष्टि किस प्रकार से हुई ? उ०—दिक्कालावाकाशादिभ्यः ॥ १२ ॥ अर्थ—दिशा और काल यह दोनों आकाश से उत्पन्न हुये, इस कारण यह दोनों आकाश के समान नित्य हैं, अर्थात् आकाश में जो व्यापकता है, वह व्यापकता इन दोनों में भी है, इस कारण यह दोनों नित्य हैं। और जो खण्ड दिशा और काल हैं, सो उपाधियों के मेल से आकाश से उत्पन्न होते हैं, वे अनित्य होते हैं। अब बुद्धि का स्वरूप और धर्म दिखाते हैं। अध्यवसायोबुद्धिः ॥ १३ ॥ अर्थ—निश्चयात्मक ज्ञान का नाम बुद्धि है, और अध्यवसाय नाम निश्चय का है, उस निश्चय को ही बुद्धि कहते हैं। तत्कार्यं धर्म्मादि ॥ १४ ॥ प्र०—उस बुद्धि के कार्य धर्मादिक हैं तो मूर्ख पुरुषों की बुद्धि में ज्ञानादि निन्दित क्यों प्रबल ( बलवान्. ) होते हैं ? उ०—महदुपरागाद्विपरीतम् ॥ १५ ॥ अर्थ—मन के संयोग होने से यदि मन में मिथ्याज्ञान के संस्कार हैं तो धर्मादिक विपरीत ( उलटे ) होजाते हैं, अर्थात् अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य, यह सब विपरीत होजाते हैं। अब महत्तत्व के कार्य अहंकार को दिखाते हैं। अभिमानोऽहंकारः ॥ १६ ॥
( ७५ ) अर्थ—अहं करने वाले को अहंकार कहते हैं, जैसे—कुम्हार को कुम्भकार कहते हैं, और यह अहंकार शब्द अन्तःकरण का नाम है। अहंकार और अभिमान यह दोनों एक ही वस्तु के नाम हैं। अब अहंकार का कार्य दिखाते हैं। एकादश पंचतन्मात्रं यत् कार्यम् ॥ १७ ॥ नेत्र को आदि लेकर १० इन्द्रियाँ, शब्द को आदि लेकर पंचतन्मात्रा, सब अहंकार के कार्य हैं। सात्विकमेकादशकं प्रवर्तते वैकृतादहङ्कारात् । १८ अर्थ—विकार को प्राप्त हुए अहंकार से सात्विक मन होता है, और यह भी समझना चाहिये कि राजस रजोगुण वाले अहंकार से केवल दश इन्द्रियाँ, और तामस तमोगुण वाले अहं- कार से पंचतन्मात्रा होती हैं, और मन सत्वगुण से होता है, इस कारण उनसे ही ग्यारह इन्द्रियाँ दिखाते हैं। कर्मेन्द्रियबुद्धीन्द्रियैरान्तरमेकादशकम् ॥ १९ ॥ अर्थ—वाणी, हाथ, पाँव, गुदा, उपस्थ ( मूत्रस्थान ), यह कर्मेन्द्रिय कहलाती हैं। नेत्र, कान, त्वचा ( खाल ), रसना ( जीभ ), घ्राण ( नाक ), यह पाँचों ज्ञानेन्द्रिय कहलाती हैं। प्र०—इन्द्रियों की उत्पत्ति पंचभूतों से है ? उ०—अहङ्कारिकत्वश्रुतेर्नभौतिकानि ॥ २० ॥ अर्थ—बहुत-सी श्रुतियां ऐसी देखने में आती हैं, जो अहङ्कार से ही इन्द्रियों की उत्पत्ति को कहती हैं, जैसे— ( एकाऽहं बहुस्याम् ) एक में बहुत रूपों को धारण करता हूँ इत्यादि। इस कारण आकाशादि पञ्चभूतों से इंद्रियों की उत्पत्ति कहना ठीक नहीं।
( ७६ ) प्र०—"अग्निःवागप्येति वातं प्राणः ।" अग्नि में वाणी लय होती है, और पवन में प्राण लय होता है। जबकि अग्नि इत्यादि श्रुतियाँ कहती हैं कि अग्नि में वाणी लय होजाती है और वायु में प्राण लय होजाता है, तो उत्पत्ति भी इन से ही क्यों न मानी जाय ? उ०—देवतालयश्रुतिर्नारम्भकस्य ॥ २१ ॥ अर्थ—अग्नि आदि श्रेष्ठ गुण से युक्त पदार्थों में लय दीखता है, लेकिन उत्पत्ति नहीं दीखती और यह कोई नियम भी नहीं है; कि जो जिसमें लय हो वह उससे ही उत्पन्न भी हो, जैसे—जल की बूँद पृथिवी में लय होजाती है, लेकिन उससे उत्पन्न नहीं होती। इस कारण इन्द्रियों की उत्पत्ति अहङ्कार ही से है, किन्तु पंचभूतों से नहीं है। प्र०—इन्द्रियों से सम्बन्ध रखने वाला मन नित्य है व अनित्य ? उ०—तदुत्पत्तिश्रुतेर्विनाशदर्शनाच्च ॥२२॥ अर्थ—नित्य नहीं है, किन्तु अनित्य है, क्योंकि "एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च" इससे ही सब इन्द्रियाँ और मन पैदा होते हैं, इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध है कि मन का नाश भी देखने में आता है, क्योंकि बुढ़ापे में चक्षु (तेज) आदि इन्द्रियों की तरह नाश भी होता है। इससे मन नित्य नहीं है। प्र०—नासिका आदि इन्द्रियों के गोलक (चिह्नों) को ही इन्द्रिय माना है ? उ०—अतीन्द्रियमिन्द्रियं भ्रान्तानामधिष्ठाने।२३ अर्थ—हाँ ! भ्रान्त मनुष्यों की बुद्धि ने गोलक का नाम इन्द्रिय माना है, लेकिन इन्द्रियाँ तो अतीन्द्रिय हैं, अर्थात् इन्द्रियों से इन्द्रियों का ज्ञान नहीं होता।
( ७७ ) प्र०-इन्द्रिय एक ही है, उसकी ही अनेक शक्तियाँ अनेक विलक्षण काम करती रहती हैं ? उ०—शक्तिभेदेऽपि भेदसिद्धौ नैकत्वम् ॥२४॥ अर्थ—एक इन्द्रिय की भी अनेक शक्तियों के मानने से इन्द्रियों का भेद सिद्ध हो गया, क्योंकि उन शक्तियों में ही इन्द्रियत्व का स्थापन हो सकता है । प्र०-एक अहङ्कार से अनेक प्रकार की इन्द्रियों की उत्पत्ति होना यह बात तो न्याय से विरुद्ध है, क्योंकि एक वस्तु से एक ही वस्तु उत्पन्न होनी चाहिये ? उ०-न कल्पनाविरोधः प्रमाणदृष्टस्य ॥ २५ ॥ अर्थ-जो वस्तु प्रमाण ही से सिद्ध है, उसके विरुद्ध कल्पना करना न्याय से विरुद्ध है, क्योंकि महदादिकों में जो गुण दीखते हैं वे महदादिकों के कार्यों में भी दीखते हैं । इस प्रकार प्रत्यक्षादि प्रमाणों से जो सिद्ध है वह न्याय से विरुद्ध नहीं हो सकता । कारण वास्तव में तो मन एक ही है, लेकिन उस कारण की शक्तियों के भेद से दस इन्द्रियाँ अपने-अपने कार्य के करने में तत्पर ( लगी ) रहती हैं और इस ही बात को अगला सूत्र भी पुष्ट करता है । उभयात्मकं मनः ॥ २६ ॥ अर्थ—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ-इन दशों इन्द्रियों से मन का सम्बन्ध है, अर्थात् मन के बिना कोई भी इन्द्रिय अपने किसी काम के करने में नहीं लग सकती । अब इस कहे हुए सूत्र का अर्थ इस सूत्र में विस्तार से कहते हैं । गुणपरिणामभेदान्नानात्वमवस्थावत् ॥ २७ ॥ अर्थ—गुणों के परिणाम भेद से एक मन की अनेक शक्तियाँ इस तरह होती हैं, जैसे-मनुष्य जैसी सङ्गति में बैठेगा उसके
( ७८ ) वैसे ही गुण हो जायेंगे ; यथा, कामिनी स्त्री की सङ्गति से कामी, और वैराग्य-शील वाले के साथ वैराग्य-शील वाला हो जाता है । इस ही तरह मन भी नेत्र आदि को लेकर जिस इन्द्रिय से सङ्गति करता है, उसी इन्द्रिय से मन का मेल हो जाता है । अब ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय इन दोनों के विषय में कहते हैं । रूपादि रसमलान्तउभयोः ॥ २८ ॥ अर्थ—रूप को आदि लेकर और मल-त्याग पर्यन्त ज्ञाने- न्द्रिय और कर्मेन्द्रियों के विषय हैं, जैसे-नेत्र का रूप जिह्वा [ जीभ ] का रस, नाक का गंध, त्वचा [ खाल ] का स्पर्श, कानों का शब्द, मुख का वचन, हाथ का पकड़ना, पैरों का चलाना, लिंग का पेशाब करना, गुदा का विष्ठा करना—यह दशों विषय भिन्न-भिन्न हैं, और जिसका आश्रय लेकर यह इन्द्रिय संज्ञा को प्राप्त होती हैं उस हेतु को भी कहते हैं । द्रष्टृत्वादिरात्मनः करणत्वमिन्द्रियाणाम् ॥ २६ अर्थ—इन्द्रियों का करणत्व आत्मा है अर्थात् जो-जो इन्द्रियाँ अपने-अपने काम के करने में लगती हैं वे आत्मा के समीप होने से कर सकती हैं, इससे आत्मा को परिणामित्व की प्राप्ति नहीं हो सकती, जैसे—चुम्बक पत्थर के संसर्ग से लोह खिंच आता है, ऐसे ही आत्मा के संसर्ग से नेत्र आदि इन्द्रियों में देखने आदि की शक्ति होजाती है । अब अन्तःकरण की वृत्तियों को भी कहते हैं । त्रयाणां स्वालक्षण्यम् ॥ ३० ॥ अर्थ—मन की तीन वृत्तियाँ जो चित्त, अहङ्कार और बुद्धि हैं, उनका पृथक् २ लक्षण विदित होता है । अभिमान के समय अहङ्कार, विचार के समय चित्त, और ज्ञान के समय बुद्धि स्वतः विदित होती है ।
( ७६ ) सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पंच ॥३१ अर्थ—प्राण वायु आदि को लेकर समान पर्यन्त जो पाँच वायु हैं यह अन्तःकरण की साधारण वृत्ति कहलाते हैं, अर्थात् - जो वायु हृदय में रहता है, उसका नाम प्राण है ; और जो गुदा में रहता है, उसका नाम अपान है ; और जो कण्ठ में रहता है, उसका नाम उदान है ; जो नाभि में रहता है, उसका नाम समान है ; और जो सारे शरीर में रहता है, उसका नाम व्यान-वायु है—यह सब अन्तःकरण के परिणामी भेद हैं, और जो बहुत-से प्राण और वायु को एक मानते हैं, उनका मानना इस सबब से अयोग्य है कि “एतस्माज्जायते प्राणः मनःसर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापश्च पृथिवी विश्वस्य धारिणी” । इस में प्राण और वायु को भिन्न-भिन्न माना है । अब आचार्य अपने सिद्धान्त को प्रकाश करते हैं, कि जैसे कई पुरुष इन्द्रियों की वृत्ति क्रम से ( एक समय में एक ही इन्द्रिय काम करेगी ) मानते हैं, उसको अयुक्त सिद्ध करते हैं । क्रमशोऽक्रमशश्चेन्द्रियवृत्तिः ॥ ३२ ॥ अर्थ—इन्द्रियों की वृत्ति क्रम से भी होती है और बिना क्रम के भी होती है, क्योंकि संसार में दीखता है कि एक आदमी जब पानी पीने में तत्पर होता है, तब वह देखता भी है । प्र०-क्या न्याय ने जो एक ही इन्द्रिय के विषय का ज्ञान होना लिखा है, वह ठीक नहीं ? उ०—एक काल में दो ज्ञानेन्द्रियां काम नहीं करतीं, परन्तु एक कर्मेन्द्रिय और एक ज्ञानेन्द्रि साथ-साथ काम कर सकती हैं। मन की वृत्तियां ही संसार का निदान है, अर्थात् जन्म मरण आदि सब मन की वृत्तियों से ही होते हैं, इसको ही कहते भी हैं—
( ८० ) वृत्तयः पंचतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥ ३३ ॥ अर्थ—प्रमाण ( प्रत्यक्ष आदि ), विपर्यय ( झूठा ज्ञान ), विकल्प ( सन्देह ), नींद, स्मृति ( याद होना ) ; यह पाँच मन की वृत्तियाँ हैं, और इनसे ही सुख-दुःख उत्पन्न होता है । जब मन की वृत्तियाँ निवृत्त होजाती हैं तब पुरुष के स्वरूप में स्थित होजाती हैं । इस बात को इस आगे के सूत्र से सिद्ध करते हैं । तन्निवृत्तावुपशान्तोपरागःस्वस्थः ॥ ३४ ॥ अर्थ—मन की वृत्तियों के निवृत्त होने पर पुरुष का उपराग शान्त हो जाता है, और पुरुष स्वस्थ हो जाता है । यही बात योग सूत्र में भी कही गई है, कि जब चित्त की वृत्तियों का निरोध हो जाता है तब पुरुष अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है । पुरुष का स्वस्थ होना यही है, कि उसके उपाधिरूप प्रतिबिम्ब का निवृत्त हो जाना, इसको ही दृष्टान्त से भी सिद्ध करते हैं । कुसुमवच्चमणिः ॥ ३५ ॥ अर्थ—जैसे स्फटिक मणि में काले, पीले इत्यादि फूलों की परछाईं पड़ने से काले, पीले रङ्ग वाली वह स्फटिक मणि मालूम पड़ने लगती है, और जब उन काले, पीले फूलों को मणि के साथ से भिन्न कर देते हैं तब वह मणि स्वच्छ प्रत्यक्ष रह जाती है । इस ही तरह मन की वृत्तियों के दूर होने पर पुरुष राग रहित और स्वस्थ हो जाता है । प्र०—यह इन्द्रियाँ किसके प्रयत्न से अपने-अपने कार्यों के करने में लगी रहती हैं, क्योंकि पुरुष तो निर्विकार है और ईश्वर से इन्द्रियों का कोई भी सम्बन्ध नहीं है ? उ०—पुरुषार्थं करणोद्भवोऽप्यदृष्टोल्लासात् ।३६
( ८१ ) अर्थ—पुरुष के वास्ते इन्द्रियों की प्रवृत्ति भी उसी कर्म के वश से है, जो पहिले प्रकृति को कह आये हैं, और इसका दृष्टान्त भी ३५ वें सूत्र में दे चुके हैं, कि संयोग से जैसे एक का गुण दूसरे में मालूम होता है, उसी प्रकार प्रकृति का कर्म पुरुष संयोग से है, वही इन्द्रियों की प्रवृत्ति में हेतु है। इस सूत्र में 'अपि' शब्द से पूर्व कही हुई प्रकृति की याद दिलाकर पुरुष को कर्म से कुछ अंश में युक्त किया है, और फिर भी इसी पक्ष को पुष्ट करने के वास्ते दृष्टान्त देंगे। दूसरे के वास्ते भी अपने आप प्रवृत्ति होती है, इसमें दृष्टान्त भी देते हैं। धेनु वद्वत्साय ॥ ३७ ॥ अर्थ—जैसेकि बछड़े के वास्ते गौ स्वयं (आप ही) दूध उतार देती है, दूसरे की कुछ भी आवश्यकता नहीं रखती। इसी प्रकार अपने स्वामी (पुरुष) के वास्ते इन्द्रियों की प्रवृत्ति स्वयं होती है। प्र०—भीतर और बाहर की सब इन्द्रियाँ कितनी हैं ? उ०—करणं त्रयोदशविधमवान्तरभेदात् ॥३८ अर्थ—अवान्तर-भेद से इन्द्रियाँ तेरह तरह की हैं—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, एक बुद्धि, मन, और अहङ्कार, इन भेदों के होने से। प्र०—अवान्तर कहने का क्या प्रयोजन (मतलब) है ? उ०—मन सब इन्द्रियों से मुख्य है। प्र०—पुरुष के वास्ते इन्द्रियों की प्रवृत्ति में केवल मन ही मुख्य है, और सब इन्द्रियाँ गौण हैं, तो बुद्धि में वो कौन-सा मुख्य धर्म है ?
( ८२ ) उ०—इन्द्रियेषु साधकतमत्वगुणयोगात् । कुठारवत् ॥ ३६ ॥ अर्थ—जैसेकि पेड़ के काटने में चोट का मारना मुख्य कारण है, और उसके काटने का मुख्य साधन कुल्हाड़ा है, इस ही प्रकार इन्द्रियों को करणत्व और मन को साधकतमत्व ( जिस के बिना किसी तरह कार्य सिद्ध न हो ) का योग है। नोट—कपिलमुनि बुद्धि और चित्त को एक ही मानते हैं। प्र०—जबकि अहङ्कार भी इन्द्रिय माना गया है, तो मन ही मुख्य कारण है, ऐसा कहना अयोग्य है ? उ०—द्वयोः प्रधानं मनोलोकवद्भृत्यवर्गेषु ॥४० अर्थ—वाह्य ( बाहर ) की और आभ्यन्तर ( भीतर ) की, इन बारह प्रकार के भेद वाली इन्द्रियों में मन ही प्रधान है; क्योंकि संसार में यही बात दीखती है, जैसे—राजा के बहुत-से नौकर-चाकर होते हैं, तथापि उन सबके बीच में एक मन्त्री ही मुख्य होता है। छोटे-छोटे नौकर और ज़मींदार आदि सैकड़ों होते हैं, इसी तरह केवल मन प्रधान है और सब इन्द्रियाँ गौण हैं, और भी मन की प्रधानता को इन तीन सूत्रों से पुष्टि पहुँचती है। अव्यभिचारात् ॥ ४१ ॥ अर्थ—यद्यपि मन सब इन्द्रियों में व्यापक है तथापि अपने कार्य में उस मन का अव्यभिचार ( निश्चय ) दिखाई पड़ता है। तथाऽशेषसंस्काराधारत्वात् ॥ ४२ ॥ अर्थ—जितने भी संस्कार हैं सबको मन ही धारण करता है। यदि नेत्र आदि अहङ्कार अथवा मन इनको ही प्रधान मानें तो अंधे, बहरे, इत्यादिकों को स्मरण ( याद ) की शक्ति न होना चाहिये, लेकिन देखने में आता है, कि उन लोगों को स्मरण-
( ८३ ) शक्ति अच्छी तरह होती है, और तत्वज्ञान के समय में मन अहङ्कार का लय भी हो जाता है, तो भी स्मरण-शक्ति नष्ट नहीं होती जोकि स्वाभाविक बुद्धि का धर्म है । स्मृत्यानुमानाच्च ॥ ४३ ॥ अर्थ—स्मृति का अनुमान बुद्धि से ही होता है, क्योंकि चिन्ता-वृत्ति ( ध्यान की एक अवस्था ) सब अवस्थाओं से श्रेष्ठ है, और इस सूत्र से यह भी मालूम होता है, कि कपिलाचार्य बुद्धि और चित्त को एक ही मानते हैं, और मतवादियों की तरह मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार, इन चारों को अन्तःकरण चतुष्टय नहीं मानते हैं । प्र०—चिंतावृत्ति पुरुष को ही होनी चाहिये ? उ०—सम्भवेन्न स्वतः ॥ ४४ ॥ अर्थ—अपने आप पुरुष को स्मृति नहीं हो सकती, क्योंकि पुरुष कूटस्थ है । प्र०—जबकि मन को करण ( मुख्य इन्द्रिय ) माना है, तो और इन्द्रियों से क्या प्रयोजन है ? उ०—बिना नेत्रादि इन्द्रियों के मन अपना कोई भी काम नहीं कर सकता । यदि नेत्रादि इन्द्रियों के बिना भी मन इन्द्रियों का काम कर सकता है, तो अंधे आदमी को भी देखने की शक्ति होनी चाहिये । क्योंकि मन तो उसके भी होता है । परन्तु संसार में ऐसा देखने में ही नहीं आता, इससे प्रत्यक्ष सिद्ध होता है, कि मन मुख्य है और सब इन्द्रियाँ गौण हैं । प्र०—जबकि मन को ही मुख्य ( प्रधान ) माना है तो पहिले सूत्र में मन को उभयात्मक क्यों माना है ? उ०—आपेक्षिकोगुणप्रधानभावःक्रियाविशेषात् ४५ अर्थ—क्रिया के कमती-बढ़ती होने से गुणों का भी प्रधान-
( ८४ ) भाव ( बड़प्पन ) एक दूसरे की निस्बत से होता है, जैसे— नेत्र आदि के व्यापार में अहङ्कार मुख्य है, इसी तरह अहङ्कार के व्यापार में मन प्रधान है । प्र०—इस पुरुष की मन इन्द्रियाँ ही मुख्य हैं, अर्थात् अन्य इन्द्रियाँ गौण हैं ? उ०—तत्कर्मार्जितत्वात् तदर्थमभिचेष्टा लोक- वत् ॥ ४६ ॥ अर्थ—जैसेकि संसार में दीखता है, कि जो आदमी कुल्हाड़ी को खरीदता है, उस कुल्हाड़ी के व्यापार से खरीदने वाले को फल भी होता है, इस प्रकार मन भी पुरुष के कर्मों से पैदा होता है, अतएव मन आदि का फल पुरुष को मिलता है । इस कारण मनुष्य की मन इंद्रिय ही मुख्य है । यह समाधान पहले कर भी आये हैं, कि पुरुष कर्म से रहित है, लेकिन पुरुष में कर्म का आरोपण होता है । दृष्टान्त भी इस विषय का दे चुके हैं, जैसे—राजा के सेवक इत्यादि युद्ध करें और हार-जीत राजा की गिनी जाती है, इस प्रकार ही पुरुष में कर्म का आरोपण होता है । समानकर्मयोगे बुद्धेः प्राधान्यं लोकवल्लोकवत् ॥४७ अर्थ—यद्यपि सब इन्द्रियों के साथ पुरुष का समान कर्मयोग है, तथापि बुद्धि ही को मुख्यता है, जैसे—राज्य के रहने वाले चांडाल को आदि ले द्विजाति पर्यंत सब ही लोग राजा की प्रजा हैं तथापि जमींदार से मुख्य मंत्री ही गिना जाता है । इस दृष्टान्त को संसार परंपरा के समान यहाँ समझ लेना चाहिये । प्र०—लोकवत् यह शब्द दुबारा क्यों कहा ? उ०—यह दुबारा का कहना अध्याय की समाप्ति दिखाता है । प्र०—इस अध्याय में कितने विषय कहे गये हैं ?
तृतीयोऽध्यायः
( ८५ ) उ०—प्रकृति का कार्य, प्रकृति की सूक्ष्मता, दो प्रकार की इंद्रियाँ, अन्तःकरण आदि का वर्णन है । इतने विषय कहे गये हैं । इति सांख्यदर्शने द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥ तृतीयोऽध्यायः अब इस तीसरे अध्याय में प्रधान जो प्रकृति है उसका स्थूल कार्य और महाभूत ( पृथ्बी आदि ) और दो तरह के शरीर यह सब कहते हैं । अविशेषाद्विशेषारम्भः ॥ १ ॥ अर्थ—अविशेषात् अर्थात् जिससे छोटी और कोई वस्तु न हो सके ऐसे भूत सूक्ष्म अर्थात् पंचतन्मात्राओं से विशेष स्थूलमहाभूतों की उत्पत्ति होती है, क्योंकि सुखादिकों का ज्ञान स्थूलभूतों में हो सकता है, और सूक्ष्मभूत योगी महात्माओं के हृदय में प्रकाश होते रहते हैं । तस्माच्छरीरस्य ॥ २ ॥ तिन पूर्वोक्त [ पहिले कहे हुए ] बाईस तत्वों में से स्थूल सूक्ष्म शरीरों की उत्पत्ति होती है । प्र०—स्थूल शरीर किसको कहते हैं ? उ०—जिसका जाग्रतावस्था में अभिमान होता है । प्र०—लिङ्ग-शरीर किसको कहते हैं ? उ०—मन, अहङ्कार और इन्द्रियाँ, जिसके द्वारा अपने अपने काम करने में तत्पर रहते हैं, उसको लिङ्ग-शरीर कहते हैं । प्र०—कारण-शरीर किसको कहते हैं ?