भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

६०४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

रघुनन्दन ! तदनन्तर चेतनाकाशस्वरूप निर्विकार अनन्त एवं सर्वव्यापी ब्रह्मरूपसे स्थित हुए मैंने जब समाहित-चित्त होकर देखा तो अपने शरीरके भीतर ही मुझे सृष्टिरूपी वृक्ष एक अङ्कुरके रूपमें स्थित दिखायी दिया। जैसे डेहरीके भीतर रखा हुआ बीज वर्षाके जलसे भीग जानेपर अङ्कुरित हो जाता है, उसी प्रकार मेरे भीतर सृष्टि-बीज अङ्कुरित हुआ था। जैसे बीजके भीतर विद्यमान अङ्कुर सींचनेसे विकसित हो ऊपरकी ओर निकल आता है, उसी प्रकार मूर्त, अमूर्त, जड और चेतन सभी वस्तुओंमें जगत् विद्यमान है। जैसे सुषुप्तावस्थासे स्वप्नावस्थाको प्राप्त हुए चिन्मात्र पुरुषकी अपनी ही चेतनासे स्वप्नजगत्की दृश्य-लक्ष्मीका विकास होता है अथवा जैसे स्वप्नावस्थाके हट जानेपर जगे हुए पुरुषके समक्ष जाग्रत्-कालका दृश्य-प्रपञ्च विकासको प्राप्त होता है, उसी तरह जिसने सृष्टिके आरम्भमें अपने स्वरूपका पृथक् रूपसे अनुभव किया है, ऐसे आत्मामें इस सृष्टिका उदय होता है। हृदयाकाशमें उदित हुआ यह सर्ग चेतनाकाशसे पृथक् नहीं है।

तदनन्तर पृथ्वीकी धारणासे युक्त होकर मैं ध्यान करने लगा। पृथ्वीकी धारणा करनेपर उसके अभिमानी जीवकी स्वरूपता प्राप्त करके मैं द्वीप, पर्वत, तृण और वृक्षादिरूपी देहसे युक्त हो वहाँके जगत्का अनुभव करने लगा। मैं सम्पूर्ण भूमण्डल बन गया। नाना प्रकारके वन और वृक्ष मेरे शरीरके रोम हो गये। नाना प्रकारकी रत्नावलियाँ मेरे शरीरमें व्याप्त थीं और अनेकानेक नगर मेरे लिये आभूषणका काम दे रहे थे। पृथ्वीका रूप धारण करके मैं नदी, वन, समुद्र, दिगन्त, पर्वत तथा द्वीप नामक प्राणियोंके भोग्यस्थलों और जंगल-समूहोंसे व्याप्त हो गया। नाना प्रकारके पदार्थोंकी श्रेणियोंसे भरे हुए अनेकानेक मण्डल-कोश दृष्टिगोचर होने लगे तथा मैं लता, सरोवर, सरिता और कमलसमूहोंसे सुशोभित होने लगा।

(सर्ग ८६-८७)

श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जल और तेजस्-तत्त्वकी धारणासे प्राप्त हुए अनुभवका उल्लेख

श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! अब यह बताइये कि उस समय आपने विभिन्न भूभागोंके भीतर कहीं ब्रह्माण्डोंके दर्शन किये थे या नहीं ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! पहले शिलामें जैसे सम्पूर्ण जगत् देखा गया था, वैसे ही उस समय भूमण्डलके सभी स्थानोंमें मुझे जगत्का जाल-सा बिछा हुआ दिखायी दिया। वह सारा दृश्यमय प्रपञ्च द्वैतमय होता हुआ भी वास्तवमें शान्त अद्वैत ही है। सभी स्थानोंमें जगत् है और सर्वत्र सबके आधाररूपसे ब्रह्म विराजमान है। अतः सब कुछ परम शान्त चिदाकाश-स्वरूप ब्रह्म ही है और सभी अनेक प्रकारके आरम्भोंसे परिपूर्ण हैं। रघुनन्दन ! यद्यपि यह दृश्य 'सत्' और 'अहम्' इत्यादि रूपसे अनुभवमें आता है, तथापि उसका अस्तित्व परमार्थ-दशामें है ही नहीं और यदि है तो वह सब अजन्मा—निर्विकार ब्रह्म ही है।

मैंने धारणाद्वारा पृथ्वीका रूप धारण करके जैसे वहाँ नाना प्रकारके जगत् देखे थे, वैसे ही जलतत्त्वकी धारणासे जलरूप होकर वहाँ भी वैसे ही जगत्का दर्शन किया। जैसे काट-छाँटकर स्वच्छ किये गये इन्द्रनीलमणिके समान नील वर्णवाले भगवान् विष्णु शेषनागके अङ्गोंपर भगवती लक्ष्मीजीके साथ विश्राम करते हैं, उसी प्रकार श्याम-शरीरवाले मैंने भी बादलोंके आसनोंपर विद्युन्मयी वनिताके साथ विश्राम किया। रसरूप होनेके कारण मैंने जिह्वासम्बन्धी एक-एक अणुके साथ रहकर उत्तम अनुभव प्राप्त किया, जिसे मैं अपने शरीरका नहीं केवल ज्ञानरूप आत्माका, ही

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके द्वारा जल और तेजस्-तत्त्वकी धारणासे प्राप्त अनुभव * ६०५

अनुभव मानता हूँ। जलकणका' रूप धारण करके हवाके रथपर चढ़कर मैंने आकाशकी निर्मलगलियोंमें सुगन्धकी भाँति विचरण किया। जलकी समता प्राप्त करा देनेवाली उस जलमयी धारणाके द्वारा अजड होकर भी जड (जल)- सा बनकर तथा समस्त पदार्थोंके भीतर ज्ञातारूपसे रहता हुआ भी दूसरोंके द्वारा अज्ञात होकर रहा।

रघुनन्दन ! तत्पश्चात् मैं तेजस्तत्त्वकी बढ़ी हुई धारणाके द्वारा चन्द्रमा, सूर्य, तारा और अग्नि आदि विचित्र अवयवोंसे युक्त तेज बन गया। तेजके सदा सत्त्व-प्रधान होनेके कारण मैं प्रकाशरूप बनकर चमक उठा। संसारमें जितने भी रूप हैं, वे सब प्रकाशके ही अङ्ग हैं। अतः सदा प्रकाशकी गोदमें शयन करनेवाले शुक्ल, कृष्ण और अरुण आदि समस्त वर्णोंका मैं स्वरूपदाता पिता हो गया। अपने तेजःस्वरूपसे मैं दिग्वधुओंके लिये स्वच्छ दर्पण बन गया।-रात्रिरूपी कुहरेको नष्ट करनेके लिये वायु- स्वरूप हो गया। चन्द्रमा, सूर्य और अग्निका तो जीवन- सर्वस्व ही था। मैं स्वर्गलोकके लिये कुंकुमका आलेप बन गया। मैं तेज बनकर सुवर्ण आदि सुन्दर वर्ण (रंग) बन गया, मनुष्य आदिमें पराक्रम हो गया, रत्न आदिमें चकाचौंध पैदा करनेवाली कान्ति बन गया और वर्षाऋतुमें विद्युत्का प्रकाश हो गया। तेजकी धारणासे तेजोमय होकर मैं उन वृत्र आदि असुरोंके मस्तकपर वज्रका प्रहार बन गया; जो अपने थप्पड़से शत्रुओंका सिर फोड़ डालते थे। साथ ही सिंह आदिके हृदयमें पराक्रम बनकर बैठ गया। रणाङ्गणमें निर्भय विचरण करानेवाला जो उद्भट पराक्रम वीरपुरुषोंके भीतर प्रसिद्ध है, वह भी मैं ही बन गया। वह भी साधारण पराक्रम नहीं, अपितु जो कठोर लोह- कवचोंको तोड़नेवाले खड्गोंके परस्पर आघातोंसे उत्पन्न हुई टंकारध्वनिसे अत्यन्त पटु तथा महान् आडम्बरसे युक्त हो। सूर्यरूप होकर मैंने दसों दिशाओंमें फैले हुए किरणरूपी हाथोंसे जगतरूपी पक्षीको, जिसके बड़े- बड़े पर्वत अङ्ग थे, पकड़ लिया। उस समय मुझको यह सारा भूतल एक छोटेसे गाँवके समान दिखायी दिया। चन्द्रमाके रूपमें प्रकट होनेपर मेरा आकार अमृतसे भरी हुई झीलके समान हो गया। मैं द्युलोकरूपी सुन्दरीका मुख बन गया। निशारूपिणी निशाचरीके हास्य-सा लगने लगा और रात्रिमें यत्र-तत्र प्रवेश करनेवाले पुरुषोंके लिये प्रकाश-दीपका काम देने लगा। मैंने अग्नि बनकर दावानलकी ऐसी ज्वाला फैलायी, जिससे लकड़ियोंका तत्काल विदारण हो जाता था और मेरी दुर्निवार दीप्ति बढ़ जाती थी। बड़े-बड़े काष्ठोंके फूटने और फटनेसे अत्यन्त कठोर शब्द उत्पन्न होते थे। यज्ञाग्नि बनकर मैंने हविष्यादिका भी कल्याणकारी कार्य सम्पन्न किया। कहीं लोहार आदिकी प्रयोगशालाओंमें मैंने तप्त लोहपिण्ड आदिमें रहकर हथौड़े आदिसे ताड़ित होनेपर उन ताड़नकर्ताओंको जलानेके लिये आगकी चिनगारियाँ प्रकट की थीं।

श्रीरामजीने पूछा—मानदाता मुने ! उस अवस्थामें आपको सुखका अनुभव हुआ या दुःखका ? यह मुझे मेरी जानकारीके लिये बताइये।

श्रीवसिष्ठजीने कहा--रघुनन्दन ! जैसे सोया हुआ पुरुष चेतन होता हुआ भी जडताका अनुभव करता है, वैसे ही चेतनाकाश अपने संकल्पसे दृश्यभावको प्राप्त होकर जडताका-सा अनुभव करता है। जब ब्रह्म अपनेको पृथ्वी आदिके रूपमें समझता है, तब मृतकी भाँति जड-सा बनकर स्थित रहता है। इसका जो सचिदानन्दात्मक यथार्थ स्वभाव है, उसका कभी अन्यथाभाव नहीं होता।

(सर्ग ९०-९१)


सं० यो० व० अं० २१—

६०६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


धारणाद्वारा वायुरूपसे स्थित हुए वसिष्ठजीका अनुभव

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर मैं जगत्‌को देखनेके कौतूहलसे धीर-चित्तवृत्तिके द्वारा वायुमयी विस्तृत धारणा करके वायुरूप हो गया और लतावल्लीरूपिणी ललनाओंको नचाने लगा। कमल, उत्पल और कुन्द आदि पुष्पसमूहोंकी सुगन्धका संचय करके उसकी रक्षा करने लगा। नन्दनवनमें मेरा आना-जाना अत्यन्त मधुर और उदार होता था; क्योंकि वहाँ बड़ी मधुर सुगन्ध सुलभ होती थी। चन्द्रमण्डलमें जो श्रेष्ठ अमृत है, उसका चिरकालतक उपभोग करके पूर्णरूपसे घिरे हुए मेघोंकी घटारूप शय्यापर सोकर तथा कमलवनोको कम्पित करके मैं प्राणियोंके श्रमका निवारण किया करता था। आकाशरूपी पुष्पका मैं ही सौरभ था। अतएव उसके गुणभूत सभी शब्दोंका मैं सहोदर भाई बन गया। प्राणियोंके अङ्गों और उपाङ्गोंमें प्रेरक बनकर उनकी नाड़ीरूप नालियोंमें जलसा हो गया था। मैं सुगन्धरूपी रत्नोंका लुटेरा, विमानरूपी नगरोंकी आधारभूमि, दाहरूपी अन्धकारका निवारण करनेके लिये चन्द्रमा तथा शीतरूपी चन्द्रमाकी उत्पत्तिके लिये क्षीरसागर था। एक ही क्षणमें मैं समस्त पर्वतोंको उखाड़कर फेंकनेमें समर्थ था। वायुरूप बनकर मैंने छः प्रकारकी क्रियाएँ करते-करते प्रलयपर्यन्त कभी भी विश्राम नहीं लिया। मेरे वे छः कर्म इस प्रकार थे। हिम और घी आदिको जमा देना—उसका पिण्ड बनाना, कीचड़ आदिको सुखाना, मेघ आदिको धारण करना, तृण आदिमें हलचल पैदा करना, सुगन्धको इधर-उधर ले जाना तथा ताप हर लेना।

श्रीराम ! इस प्रकार उस समय पृथ्वी आदि पाँच भूतोंका रूप धारण करके मैने उस त्रिलोकीरूप कमलके उदरमें भलीभाँति विहार किया। पृथ्वी, जल, वायु और तेजके समूहरूप वृक्षोंके शरीरोंमें निवास करते हुए मैंने मूल-जालके द्वारा पृथ्वीका रस पीया और उसके स्वादका अनुभव किया। अमृतसे पूर्ण घनीभूत अङ्गवाले तथा चन्दन-द्रवके समान शीतलता आदि गुणोंसे सुशोभित चन्द्रबिम्बोंपर जो बर्फकी बनी हुई शय्याओंके समान थे, मैंने अच्छी तरह लोट-पोट किया है। उपभोगके बाद बचा हुआ पुष्परस भ्रमरको देते हुए मैंने सभी दिशाओं और सभी ऋतुओंमें समस्त वनसमूहोंके भीतर नाना प्रकारकी सुगन्धोंसे परिपूर्ण पुष्पराशियोंका अच्छी तरह सेवन किया है। कुमुद, कह्लार और कमलोंसे पूर्ण नलिनी-वनमें मैंने मधुर बोली बोलनेवाली हंसियोंके साथ लीला-पूर्वक कोमल कलकल नाद किया है। रघुनन्दन ! मेरी कृपासे प्रसन्न हुए सूर्य आदि देवताओंने शरीरसे कृष्ण, रक्त, श्वेत, अश्वेत, पीत एव हरित वर्णोंसे हरे वृक्षोंकी भाँति मेरे शरीरमें स्थिति प्राप्त की थी। समुद्रोंसे घिरी हुई तथा सात द्वीपोंके कारण मानो सात रूप धरनेवाली इस भूमिको मैने अपनी कलाईमें कंगनकी भाँति धारण कर लिया था। श्रीराम ! समस्त ब्रह्माण्डरूप होनेके कारण यद्यपि सारे पाताल मेरे चरण बन गये थे, मैं भूतलको उदरके रूपमें धारण कर रहा था और आकाश मेरा मस्तक था, तथापि मैंने अपनी परम सूक्ष्म चिन्मात्रस्वरूपताका कभी त्याग नहीं किया था। इस प्रकार चिदाकाशरूपसे स्थित हुए मैंने भूमि, जल, अग्नि और वायुका स्वरूप धारण किया। जैसे प्रसिद्ध चिति शक्ति स्वयं ही स्वप्नमें नगर आदिका रूप धारण करती है, उसी प्रकार मेरेद्वारा भूमि आदिका स्वरूप-धारण माया शक्तिका विस्तार ही था। (सर्ग ९२)

निर्वाण-प्रकरण उ०] * कुटीमें लौटनेपर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन * ६०७


कुटीमें लौटनेपर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन, उनके संकल्पकी निवृत्तिसे कुटीका उपसंहार, सिद्धका नीचे गिरना और वसिष्ठजीसे उसका अपने वैराग्यपूर्ण जीवनका वृत्तान्त बताना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस प्रकार धारणाके द्वारा सिद्ध हुए पृथ्वी आदिके रूपसे जगत्-शरीरका अवलोकन करनेके बाद पूर्वोक्त कौतुकदर्शनके संकल्प और प्रयत्नसे निवृत्त हो मैं पुनः पहलेके समाधि-स्थान आकाश-कुटीके प्रदेशकी ओर लौट आया । वहाँ आनेपर देखता हूँ कि मेरा अपना शरीर कहीं भी स्थित नहीं दिखायी देता है । वहाँ अपने सामने बैठे हुए किसी दूसरे ही सिद्धपुरुषको मैं देख रहा हूँ, जो अकेला है । वह सिद्ध समाधिनिष्ठ होकर बैठा था और अभीष्ट परम पदको प्राप्त हो चुका था । उसने पद्मासन बाँध रखा था । वह परम शान्त था और समाधिमें चित्तके स्थिर हो जानेसे उसका शरीर हिलता-डुलता नहीं था । भस्मनिर्मित त्रिपुण्ड्रकी रेखाओंसे युक्त, सौम्य तथा समान विस्तारवाले कंधोंसे उसकी ग्रीवा बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी । उसका मन उदार ब्रह्मतत्त्वमें विश्राम ले रहा था । इसलिये उसका शरीर सुस्थिर और मुख अत्यन्त प्रसन्न था । उस प्रसन्न मुखसे सुशोभित उसके मस्तककी जो निश्चल अवस्था थी, उसके कारण वह सिद्ध बड़ा सुन्दर दिखायी देता था । नाभिके निकट उत्तानभावसे रखे हुए उसके दोनों हाथोंकी शोभा दो प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाके समान जान पड़ती थी । उन हाथोंकी शोभाके रूपमें मानो हृदय-कमलके प्रकाश ही बाहर प्रकट हो गये हों—ऐसा जान पड़ता था । उन कर-कमलोंकी प्रभासे वह सिद्धपुरुष प्रकाशित हो रहा था । उसके दोनों नेत्रोंकी पलकें बंद थीं। उसकी बाह्येन्द्रियोंके सारे व्यापार क्षीण हो गये थे । विक्षोभसे रहित तथा पूर्णरूपसे शान्त, अन्तःकरणरूपिणी गुफाको उसने अपनी धीर मनोवृत्तिके द्वारा इस तरह धारण कर रखा था, मानो समस्त उत्पातोंसे रहित शान्त आकाशको धारण किया हो । उस कुटीमें जब मैंने अपना शरीर नहीं देखा और सामने उस मुनिको ही देखा, तब मैंने अपने शुद्ध चित्तके द्वारा वहाँ यों विचार किया ।

"जान पड़ता है ये कोई महान् सिद्ध महात्मा हैं, जो मेरी ही तरह सोच-विचारकर एकान्त महाकाशमें विश्राम लेनेकी इच्छासे इस दिगन्तमें आ पहुँचे हैं । 'मैं समाधिके योग्य एकान्त स्थान पा जाऊँ, इस चिन्तामें ही पड़कर ये सत्यसंकल्पशाली महात्मा इधर आये हैं और इन्हें यह कुटी दिखायी दी है । उसके बाद दीर्घकालतक जब मैं नहीं लौटा हूँ, तब मेरे पुनः आगमनकी बात इनके ध्यानमें नहीं आयी है और इन्होंने शवरूपमें पड़े हुए मेरे शरीरको यहाँसे हटाकर स्वयं इस कुटियामें आसन जमा लिया है । मेरा वह शरीर तो अब नष्ट हो गया । अतः अब इस आतिवाहिक देहसे ही मैं अपने सप्तर्षिलोकको चलूँ'—ऐसा निश्चय कर मैं ज्यों ही वहाँसे चलनेको उद्यत हुआ, त्यों ही मेरे पूर्वसंकल्पका क्षय हो जानेसे वह कुटी अदृश्य हो गयी और वहाँ केवल आकाशमण्डल रह गया । फिर तो समाधिमें स्थित हुए वे सिद्धबाबा निराधार होकर नीचेकी ओर गिरने लगे ।

मैंने पहले यह संकल्प किया था कि जबतक मैं यहाँ रहूँ, तबतक यह कुटी भी रहे, परंतु अब वह संकल्प क्षीण हो जानेसे कुटिया नष्ट हो गयी और सिद्ध महात्मा क्षण-भरमें वहाँसे गिर पड़े । तब सुजनता या कौतुकवश मैं उन गिरते हुए सिद्धपुरुषके साथ उस मनोमय (आतिवाहिक) शरीरसे ही आकाशसे भूतलकी ओर चला । गिरते समय उनका पैर पूर्ववत् पृथ्वीसे जा लगा और

६०८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मस्तक ऊपरकी ओर ही उठा रहा। वे पद्मासन लगाये हुए ही वहाँ गिरे थे। उनके प्राणने अपान वायुको ऊपरकी ओर खींच रखा था। इसीलिये वे पहले जिस प्रकार बैठे थे, उसी अवस्थामें आकाशसे नीचे आ गये। वे सिद्धपुरुष इतने ऊँचेसे गिरनेपर भी समाधिसे जगे नहीं; क्योंकि चित्तके परमात्मामें दृढ़तापूर्वक लगे रहनेके कारण वे अचेतन-से हो रहे थे। साथ ही उनका कोई अङ्ग भी भग्न नहीं हुआ; क्योंकि वे योगके प्रभावसे रूईके ढेरकी भाँति बहुत ही हल्के बन गये थे। तब मैंने उन्हें समाधि-से जगानेके लिये प्रयत्न आरम्भ किया और बादलका रूप धारण करके आकाशमें गर्जन-तर्जनके साथ वर्षा आरम्भ कर दी। ओले और वज्र गिरने लगे। जैसे बादल या वर्षा मोरको जगाती है, उसी प्रकार मैंने अपने बुद्धि-कौशलसे उस दिगन्तमें उन सिद्धपुरुषको जगाया। समाधिसे जागनेके बाद उनके समस्त अङ्गोंकी शोभा प्रकाशित होने लगी और उनके नेत्र भी विकसित हो उठे। उस समय वे ऐसे लगते थे, मानो वर्षाकालमें धारावाहिक वृष्टिसे विकसित हुआ कमलोंका वन हो। समाधिसे जागनेपर मैंने उनसे शुद्ध भावसे पूछा—'मुनीश्वर ! आप कहाँ हैं और यह क्या कर रहे हैं? आप कौन हैं? इतनी दूरीसे आप नीचे गिरे हैं, फिर भी आप अपने चित्तमें उसका अनुभव क्यों नहीं कर रहे हैं?' मेरे इस प्रकार पूछनेपर उन्होंने मेरी ओर देखा। फिर अपनी पूर्वगतिका स्मरण करके वे मुझसे उसी तरह सुन्दर वचन बोले, जैसे चातक मेघसे बोलता है।

सिद्धने कहा—ब्रह्मन् ! जबतक मैं अपने वृत्तान्तका स्मरण न कर लूँ, तबतक आप मेरे उत्तरके लिये प्रतीक्षा कीजिये। मैं आपसे अपना सारा पिछला वृत्तान्त कहूँगा।

इतना कहकर उन्होंने अपने पूर्व वृत्तान्तको शीघ्र ही स्मरण कर लिया। इसके बाद वे चन्द्रमाकी किरणोंके समान शीतल एवं मनोहर वाणीमें मुझसे बोले।

सिद्धने कहा—ब्रह्मन् ! इस समय मैने आपको पहचान लिया है। अतः प्रणाम करता हूँ। अबतक ऐसा न करनेसे मेरेद्वारा जो अपराध बन गया है, इसे आप क्षमा करें; क्योंकि क्षमा सत्पुरुषोंका स्वभाव है। मुने ! जैसे कमलोंमें भौंरा भ्रमण करता है, उसी प्रकार मैंने सुदीर्घकालतक भोगरूपी सुगन्धसे पूर्ण मोहकारक देवोद्यान-भूमियोंमें चिरकालतक भ्रमण किया है। तदनन्तर चित्तरूपी जल-तरङ्गोंके हिलोरोंसे युक्त दृश्य-रूपिणी नदीमें उसके मण्डलाकार आवतों (भँवरों) द्वारा निरन्तर बहाये जाते हुए मैने दीर्घकालके बाद विवेकका आविर्भाव होनेपर संसारसे उद्विग्न हो इस तरह विचार किया—'अहो ! इस संसारमें शब्द, रूप, रस, स्पर्श और गन्धमात्रको छोड़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; अतः इतने ही मात्रमें—ऐसे तुच्छ विषय-भोगमें मै क्यों रमण करूँ ? विषयोंमें विषोंकी विषमता भरी है, सुन्दरी स्त्रियों कामरूप मोहको ही देनेवाली हैं तथा राग सरस पुरुषको भी विरसता प्रदान करनेवाले हैं; इनमें लोटनेवाला कौन पुरुष नष्ट नहीं हुआ ? इस शरीरमें शीघ्र प्राप्त होनेवाली जीर्ण-शीर्ण वृद्धावस्था एक विशाल बगुलीके समान है। वह यही सोचती रहती है कि मैने इस जीवनरूपी कीचड़ या सेवारमें बहुत बड़ी मछली पा ली है। इसी भावसे वह इस शरीरको तत्काल उदरस्थ कर लेना चाहती है। यह शरीर समुद्रमें दीखनेवाले बुलबुलेके समान शीघ्र ही नष्ट हो जानेवाला है। यह सामने स्फुरित होता हुआ ही सहसा दीपशिखाके समान बुझकर अदृश्य हो जाता है।

'यह जीवन एक महानदी है। इसमें नाना प्रकारके विक्षेप बड़ी-बड़ी लहरोंके समान हैं। काल-चक्र ही इसमें भँवर बनकर उठता है। जन्म और मरण ही इसके दो ऊँचे और विशाल तट हैं तथा इसमें सुख-दुःखकी छोटी-छोटी तरङ्गें उठती रहती हैं।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * कुटीमें लौटकर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन * ६०९


यौवनका उल्लास ही इसकी कीचड है। वृद्धावस्थाके सफेद केश ही इसके धवल फेन हैं। कभी काकतालीय संयोगसे इसमें सुखके बुद्बुद भी उठ जाते हैं। व्यवहार ही इसके महाप्रवाहकी रेखा है। इसमें नाना प्रकारके जड-रव (मूर्खोंके कोलाहल) ही जलरव (जलकी ध्वनि) हैं। राग-द्वेषरूपी बादल इसे बढ़ाते रहते हैं तथा भूतलपर इसका शरीर सदा ही चञ्चल रहता है। लोभ और मोहके महान् आवर्त इसमें उठते रहते हैं। पात और उत्पातसे इसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार यह जीवन नामक नदी शब्दमात्रसे तो अत्यन्त शीतल है; परंतु वास्तवमें त्रिविध तापोंसे अत्यन्त संतप्त रहा करती है। यह महान् खेदका विषय है। संसाररूपी नदीके जलस्थानीय जो इष्ट, मित्र, पुत्र आदिके समागम और धन है, उनमें पहले-पहलेके तो चले जाते हैं और नये-नये आते रहते हैं। (इस प्रकार यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं है।) यहाँ जो पदार्थ प्राप्त हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। अतः उन क्षणभङ्गुर पदार्थोंसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। जब प्राप्त हुई वस्तुओंकी यह दशा है, तब जो नये पदार्थ प्राप्त होते हैं, उनपर भी यहाँ कैसे आस्था हो सकती है? संसारमें जितनी नदियाँ हैं, उन सबका जल उद्गमस्थानसे आता और समुद्रकी ओर जाता रहता है। परंतु इस शरीररूपी नदीका जो आयुरूपी जल है, वह केवल जाता ही है, फिर आता नहीं । भयंकर शत्रुभूत विषयरूपी चतुर चोर चारों ओर विचरते रहते हैं, वे विवेकरूपी सारा धन हर ले जाते हैं। अत मुझे निरन्तर जागते रहना चाहिये। यहाँ मैं सो कैसे रहा हूँ? आज यह हुआ, कल यह होगा, यह इसका है और यह मेरा है—इस प्रकार संकल्प-विकल्प करता हुआ मनुष्य बीती हुई आयु और आयी हुई मौतको नहीं जान पाता है। यह कैसी आश्चर्यकी बात है! खूब खा-पी लिया, अनन्त वनभूमियोंमें विचरग कर लिया और बहुत-से सुख-दुःख भी देख लिये। अब यहाँ और क्या करना या पाना शेष रह गया है? मैंने ऊँचे शिखरोंवाले मेरु पर्वतकी उद्यान-भूमियोंमें अच्छी तरह भ्रमण किया। लोकपालोंके श्रेष्ठ नगरोंमे भी मैं घूम लिया। परंतु वहाँ भी कौन-सा स्वाभाविक सुख प्राप्त हुआ?

'धन, मित्र, सुख और भाई-बन्धु कोई भी कालग्रस्त मनुष्यकी रक्षा नहीं कर सकते। मनुष्यका जीवन धूलि-राशिके समान अस्थिर है, उसकी स्थिति सुदृढ नहीं है। जैसे पर्वतशिखरोपर गिरा हुआ वर्षाका जल प्रतिक्षण व्यर्थ नष्ट होता है, वैसे ही भीतरसे विषयोंमें आसक्त मनुष्य क्षण-क्षणमें क्षीण हो अन्तमें पुरुषार्थशून्य रहकर ही अस्त (मृत्युको प्राप्त) हो जाता है। कोई भी भोग मेरे मनको नहीं लुभा रहे हैं। यहाँके वैभव भी मुझे सुन्दर नहीं लगते हैं। यह जीवन भी मदमत्त युवतीके कटाक्षपातकी भाँति चञ्चल एव क्षणभङ्गुर है। मुने! यहाँ कहाँ, किसको, किस तरह और किस उपायसे आश्वासन प्राप्त हो। पापिनी मृत्यु आज या कल मस्तकपर पैर रख ही देगी अथवा माथेपर विपत्तिका पहाड़ डाल ही देगी। यह शरीर एक दिन पत्तेके समान झड़ जानेवाला है। जीवनकी स्थिति भी जीर्ण-शीर्ण ही है। बुद्धि अधीरतासे ग्रस्त हैं और विषयोंके रस नीरस हो गये हैं। नीरस विषय और उनके मनोरथ मेरी विस्तृत आयुको ले बीते। इनसे मेरे लिये कोई चमत्कारजनक पुरुषार्थ नहीं सिद्ध हुआ। आज मेरा मोह मन्द पड गया है। इस शरीरका इस जगत्मे कोई उपयोग नहीं है। विषयोंमें आस्था या आसक्ति न करना ही ऊँची स्थिति है और जीवनके प्रति आस्था रखना ही सबसे अधम अवस्था है। अहो! यह सम्पत्ति क्या मिली, विपत्ति ही सिरपर आ पडी है, जो भारी मोहमे डालनेवाली है। विवेकी पुरुषको सदा ऐसा ही मानना चाहिये और इस संसारमे कभी आसक्त नहीं होना चाहिये।

**१—तीर्थयात्रासे लौटनेपर श्रीरामचन्द्रजीका स्वागत (प्रसंग वैराग्य-प्रकरण सर्ग ४)** ... **४८**

६१० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

जैसे समुद्रपत्नी सरिताएँ भूतलपर अपने शरीरको आन्दोलित करती हुई समुद्रकी ओर दौड़ रही हैं, उसी प्रकार जनता विषयोंकी ओर दौड़ी जा रही है। यहाँ आयु ही उत्पात-वायु है। मित्र ही बड़े भारी शत्रु हैं। बन्धु ही बन्धन हैं और धन ही बड़ी भारी मौत है। सुख ही अत्यन्त दुःख है। सम्पत्तियाँ ही भारी विपत्तियाँ हैं। भोग ही संसारके महान् रोग हैं तथा रति ही भारी अरति (दुःख) है। यहाँका सुख केवल दुःख देनेके लिये है और जीवन भी मृत्युकी धरोहर है। अहो ! यह मायाका विस्तार कितना दुःखद है !* विषय-सेवनरूप जो भोग हैं, उन्हें सर्पोंका फन ही समझना चाहिये; क्योंकि वे थोडा-सा भी स्पर्श होनेपर डँस ही लेते हैं। किंतु विचार-दृष्टिसे देखनेपर प्रतिक्षण विनाश-शील ही हैं। जो भोगोंकी अभिलाषासे उनके प्रति तृष्णा बाँधे बैठे हैं, उन लोगोंका उसी तरह पग-पगपर अपमान होता है, जैसे बन्धन-स्तम्भमें बँधे हुए जंगली हाथियोंका हुआ करता है।

'सम्पत्तियाँ और युवती स्त्रियाँ ये तरङ्गोंकी गोदके समान क्षणभङ्गुर हैं। इतना ही नहीं, वे सर्पके फनकी छाया हैं। कौन विवेकी पुरुष उनमें आसक्त होगा ? जो आरम्भमें रमणीय प्रतीत होनेवाले किंतु अन्तमें अत्यन्त नीरस सिद्ध होनेवाले विषयभोगोंमें रमते हैं, वे नरकोंमें ही गिरते हैं†। धन राग-द्वेषादि द्वन्द्व दोषोंसे आक्रान्त हैं। उनका उपार्जन करना भी अत्यन्त कठिन होता है तथा प्राप्त हो जानेपर भी वे स्थिर नहीं रहते हैं। अतः वे अधम पुरुषोंके लिये ही सेवन करने योग्य हैं। जो आरम्भमें मधुर लगती है, परंतु अन्तमें दुःख ही देनेवाली है, वह लक्ष्मी (लौकिक सम्पत्ति) जगत्‌को मोहमें ही डालती है*। उसका विलास क्षणभरके लिये ही होता है। कोई महान्-से-महान् पुरुष क्यों न हों, उनके जीवनमें भी एक दिन मृत्यु अवश्य उपस्थित होगी। देहधारियोंकी आयु शाखाके अग्रभागमें लटकी हुई ओसकी बूँदके समान शीघ्र ही नष्ट होनेवाली है। जरा अवस्थाको प्राप्त होते हुए पुरुषके केश पक जाते हैं, दाँत भी टूट जाते हैं। उसकी और सब वस्तुएँ भी जीर्ण होकर क्षीण हो जाती हैं। परंतु एकमात्र तृष्णा ही ऐसी है जो जीर्ण नहीं होती है, वह नित्य नयी ही बनी रहती है।† हाथकी अञ्जलिमें रखे हुए जलकी भाँति यह जीवन शीघ्र ही स्खलित हो जाता है। वह नदीके प्रवाहकी भाँति चला जाता है और लौटता नहीं है। इस जगत्‌में जो रमणीय जान पड़ते हैं, उन पदार्थोंमें मैंने अरमणीयता देखी है। स्थिर वस्तुओंमें भी अस्थिरताका दर्शन किया है और सत्य दीखनेवाले पदार्थोंमें भी मुझे असत्यता दिखायी दी है। इसीलिये मैं यहाँसे विरक्त हो उठा हूँ। मनके सर्वथा वासनाशून्य हो जानेपर जब परमात्मामें विश्रान्ति प्राप्त होती है, उस समय जो आनन्द मिलता है, वह पाताल, भूतल और स्वर्गके भी किन्हीं भोगोंमें नहीं मिल सकता।'

मुने ! इस तरह दीर्घकालतक विचार करनेसे अब अहंकारशून्य हो मैंने अपनी बुद्धिके द्वारा स्वर्ग और


* उत्पातवायुरेवायुर्मित्राण्येवातिशत्रवः ।
बान्धवो बन्धनान्येव धनान्येवातिनैधनम् ॥
सुखान्येवातिदुःखानि सम्पदः परमापदः ।
भोगा भवमहारोगा रतिरेव परारतिः ॥
आपदः सम्पदः सर्व्वाः सुखं दुःखाय केवलम् ।
जीवितं मरणायैव बत मायाविजृम्भितम् ॥
(निर्वाणप्रकरण उ० ९३ । ७१-७३)

† आपातरमणीयेषु रमन्ते विषयेषु ये ।
अत्यन्तविरमान्तेषु पतन्ति निरयेषु ते ॥
(नि० प्र० उ० ९३ । ८०)

* आपातमात्रमधुरा दुःखपर्यवसायिनी ।
मोहनायैव लोकस्य लक्ष्मीः क्षणविलासिनी ॥
(नि० प्र० उ० ९३ । ८२)

† जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः ।
क्षीयते जीर्यते सर्वं तृष्णैवैका न जीर्यते ॥
(नि० प्र० उ० ९३ । ८६).

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना * ६११


अपवर्गसे भी विरक्ति प्राप्त की है। इस कारण मै भी आपकी ही भाँति चिरकालतक एकान्तमें विश्रामके लिये आकाशके इस स्थानतक आया और यहाँ मुझे आपकी कुटी दिखायी दी। आपकी ही यह कुटी है और आप पुनः यहाँ पधारेंगे, यह बात उस समय मैंने नहीं सोची थी। यह सब तो मुझे आज ही ज्ञात हुआ है।

उस समय तो अनुमानसे मैंने यही जाना था कि यह कोई सिद्धपुरुष था, जो यहाँ अपना शरीर त्यागकर निर्वाण पदको प्राप्त हो गया है। भगवन् ! यही मेरा वृत्तान्त है और यह मै आपके सामने उपस्थित हूँ। मैंने सब बातें आपको बता दीं। अब आप जैसा उचित समझें, करें। (सर्ग ९३)


श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना, वसिष्ठजीका मनोमय देहसे सिद्धादि लोकोंमें भ्रमण करना, श्रीवसिष्ठजीका अपनी सत्य-संकल्पताके कारण सबके दृष्टिपथमें आना, व्यवहारपरायण होना तथा 'पार्थिव वसिष्ठ' आदि संज्ञाओंको प्राप्त करना, पाषाणोपाख्यानकी समाप्ति और सबकी चिन्मयब्रह्मरूपताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तत्पश्चात् मैंने सिद्धसे इस प्रकार कहा—'महात्मन् ! मैंने भी तो आपके विषयमें कोई विचार नहीं किया, इसीसे उस कुटीको आकाशमें स्थिर नहीं कर दिया। उसे स्थिर कर दिया होता तो आपकी स्थिति भी सुस्थिर हो गयी होती। आपको इस प्रकार नीचे नहीं गिरना पड़ता (अतः हम दोनोंसे परस्पर अपराध हुए हैं, इसलिये दोनों ही दोनोंको क्षमा कर दें)। उठिये, अब हम दोनों सिद्धलोकोंमें चलकर पूर्ववत् निवास करें।' तदनन्तर हम दोनों गुलेलसे फेंके गये दो पत्थरकी गोलियोंके समान एक साथ ही तीव्र गतिसे आकाशमें उड़े। उस समय हमारी स्थिति दो तारोंके समान हो रही थी। ऊपर जाकर हम दोनोंने एक दूसरेको प्रणामपूर्वक विदा किया। फिर वे सिद्ध महात्मा अपने अभीष्ट स्थानको चले गये और मैं अपने अभीष्ट स्थानमें आ गया।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! आपका वह शरीर तो पृथ्वीपर गिरकर धूलके परमाणुओंमें मिल गया होगा ! फिर आप किस शरीरसे सिद्ध लोकोंमें विचरे ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! हाँ, मुझे याद आ गया। उसके बादका मेरा वृत्तान्त सुनो। जगत्रूपी गृहमें, सिद्धोंके समूहोंमें तथा लोकपालोंकी पुरियोंमें भ्रमण करते हुए मुझ वसिष्ठकी आत्मकथा इस प्रकार है—एक दिन मैं इन्द्रपुरीमें गया, परंतु वहाँ स्थूल शरीरसे रहित हो आतिवाहिक (सूक्ष्म) देहसे गये हुए मुझको न तो किसीने देखा और न पहचाना ही। मनका मनन ही एकमात्र मेरा स्वरूप था। मैं पृथ्वी आदिसे सर्वथा रहित था। संकल्प-कल्पित पुरुषकी भाँति मेरा कोई दृश्य आकार नहीं था। मुझसे किसीका स्पर्श न होनेके कारण मैं घट-पट आदि पदार्थोंका अवरोधक नहीं था। जगत्के पदार्थ-समुदाय भी मुझे कहीं आने-जानेसे रोक नहीं पाते थे। मैं अपने अनुभवकी ओर ही उन्मुख था अर्थात् अपना अनुभव ही मेरा शरीर था तथा अपने समान स्थितिवाले मनोमय पुरुषोंके साथ ही मै व्यवहार करता था।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! यदि देहरहित एवं आकाशस्वरूप होनेके कारण आप किसीको दिखायी नहीं देते थे तो उस सिद्धने आपको उस सुवर्णमयी भूमिमें कैसे देखा था ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! मुझ-जैसा ज्ञानयोग-से सिद्ध हुआ पुरुष संकल्पकल्पित पदार्थोंका जिस तरह अवलोकन करता है, उस तरह असंकल्पित पदार्थोंको

६१२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

नहीं ग्रहण करता; क्योंकि उसका शरीर सत्यसंकल्पमय होता है। निर्मल अन्तःकरणवाला सूक्ष्म शरीरधारी पुरुष भी लौकिक व्यवहारोंमें मग्न होनेपर क्षणभरमें ही अपना सूक्ष्म शरीर भूल जाता है। उस समय मैंने यह संकल्प किया था कि यह सिद्धपुरुष मुझे देखे। इसलिये उसने मुझे देखा; क्योंकि वह मेरे संकल्पित अर्थका भाजन था। परस्पर सिद्ध एवं विरुद्ध मनोरथवाले दो सिद्धोंमें जो अधिक शुद्ध अन्तःकरणवाला और पुरुषोचित प्रयत्नसे युक्त होता है, वही अपने अभीष्ट-साधनमें विजयी होता है। जब मैं सिद्धसमूहों तथा लोकपालोंकी पुरियोंमें भ्रमण कर रहा था, उस समय व्यवहार-समूहोंके प्राप्त होनेसे मुझे अपनी आतिवाहिकता विस्मृत हो गयी थी—मैं अपने सूक्ष्म शरीरको भूल गया था। जब ऐसी स्थिति आ गयी, तब मैं उस महाकाशमें दूसरोंके साथ व्यवहार करनेमें प्रवृत्त हुआ। परंतु मेरा रूप ऐसा चञ्चल था कि वहाँ मुझे कोई देख नहीं पाता था। उस समय न तो मुझे सूर्य, चन्द्रमा तथा इन्द्र आदि देख पाते थे और न देवता, सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर एवं अप्सराओंकी ही मुझपर दृष्टि पड़ती थी। वे लोग मेरी बाततक नहीं सुन पाते थे। यह सब सोचकर किसीके हाथ बिके हुए सत्पुरुषकी भाँति मैं मोहमें पड़ गया—किंकर्तव्यविमूढ-सा हो गया। इसके बाद मैंने सोचा, 'मैं तो सत्यकाम हूँ। जो भी संकल्प करूँगा—सत्य होगा', यह बात ध्यानमें आते ही मैंने संकल्प किया—'ये देवतालोग मुझे देखें'। ऐसा संकल्प होते ही उस देवलोकमें मेरे सामने रहनेवाले सभी देवता मुझे तत्काल देखने लगे, जैसे नगरमें आये हुए इन्द्रजालमय वृक्षको सभी दर्शक शीघ्र ही देखने लगते हैं। तत्पश्चात् देवताओंके घरोंमें मेरा सब व्यवहार चलने लगा। मैं अपने यथोचित आचारका पालन करता हुआ निःसंकोच वहाँ रहने लगा जिन लोगोंको मेरे वृत्तान्तका ज्ञान नहीं था, उनमेंसे जिन्होंने सर्वप्रथम मुझे अपने आँगनमें आविर्भूत हुआ देखा, उन लोगोंने


पृथ्वीसे ही मेरी उत्पत्तिकी कल्पना करके मुझे 'पार्थिव वसिष्ठ' कहा—फिर इसी नामसे लोकमें मेरी प्रसिद्धि हुई। जो लोग आकाशमें रहते थे, उनमेंसे जिन महानुभावोंने मुझे आकाशमें भगवान् सूर्यदेवकी किरणोंसे प्रकट हुआ देखा, उन्होंने लोकमें 'तैजस् वसिष्ठ' नाम देकर मुझे प्रसिद्ध किया तथा जिन आकाशवासी सिद्धोंने वायुसे मेरा प्राकट्य देखा, उन्होंने मुझे 'वात-वसिष्ठ' की संज्ञा दी तथा जिन मुनीश्वरोंने मुझे जलसे उठते देखा, उन्होंने मुझे 'वारिवसिष्ठ' नाम दिया। इस प्रकार दृष्टिभेदसे मेरी यह जन्मपरम्परा कल्पित हुई है। तभीसे लोकमें मैं कहीं पार्थिव, कहीं जलमय, कहीं तैजस् और कहींपर मारुत-वसिष्ठ नामसे विख्यात हुआ।

इस तरह कहीं आकाश आदि पञ्चभूतरूपसे स्फुरित होनेपर भी मैं एकमात्र चिन्मय स्वभाववाला निराकार, चेतनाकाशरूप परब्रह्म ही हूँ तथा तुमलोगोंके बीच उपदेश आदि व्यवहारकी सिद्धिके लिये स्थूल आकारसे युक्त भी दिखायी देता हूँ। जैसे जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञानी पुरुष सारा व्यवहार करता हुआ भी ब्रह्माकाशरूपसे ही स्थित रहता है, उसी तरह विदेहमुक्त भी ब्रह्मरूपसे ही स्थित होता है। किंतु जिस पुरुषकी बुद्धि संसारवासनावश देह और इन्द्रियके द्वारा भोगनेयोग्य अयोग्य वस्तु—विषयभोगमें आसक्त होती है तथा जिसके मनमें कभी मोक्षकी आकाङ्क्षा नहीं जाग्रत् होती, वह मन्दबुद्धि मानव मनुष्य नहीं, कुत्ता अथवा कीड़ा है* (क्योंकि वह भोगरूपी गंदी चीजको पसंद करता है, मनुष्य तो वही है जो मोक्षके लिये प्रयत्नशील है)। श्रीराम ! चित्तका सर्वथा शान्त एवं शीतल होना मोक्ष है तथा उसका संतप्त होना ही बन्धन है। ऐसे मोक्षमें भी लोगोंकी


* ससारवासनामावरूपे सक्ता नु यस्य धीः ।
मन्दो मोक्षे निराकाङ्क्षी स श्वा कीटोऽथवा जनः ॥
(नि० प्र० उ० ९५ । २६)

कल्याण


राजा बलि और शुक्राचार्य

राजा बलि और शुक्राचार्य
(उपशम-प्रकरण सर्ग ४५-४६)

(इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ या सामग्री उपलब्ध नहीं है / This page contains no legible text or content.)

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना * ६१३


रुचि नहीं हो रही है। अहो ! यह संसार कितना मूढ़ है ? यह मानव-समुदाय स्वभावसे ही विषयोंके वशीभूत है । इसीलिये एक दूसरेकी स्त्री और धनका अपहरण करनेके लिये लोलुप हो रहा है। जब वह मुमुक्षु होकर शास्त्रोंके अर्थका विचार करता है, तब यथार्थ दृष्टि ( तत्त्व-साक्षात्कार ) प्राप्त करके सदाके लिये सुखी हो जाता है ।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब वसिष्ठ मुनि इतना उपदेश दे चुके, तब वह दिन बीत गया। भगवान् सूर्य अस्ताचलको चले गये । इधर उस राज-सभाके लोग सायंकालिक कृत्यके हेतु स्नान करनेके लिये मुनिवर वसिष्ठको नमस्कार करके उठ गये तथा रात बीतनेपर सूर्यदेवकी किरणोंके उदयके साथ ही फिर उस सभामें लौट आये ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—कर्त्तव्यका ज्ञान रखनेवाले रघुनन्दन ! यह मैंने तुमसे पाषाणोपाख्यान कहा । इस आख्यायिकासे जो विज्ञानदृष्टि प्राप्त होती है, उससे यही समझना चाहिये कि सारी सृष्टियाँ चेतनाकाशमें ही स्थित हैं। यहाँ जो कुछ भी दीखता है, उसे चिन्मय ब्रह्म ही समझना चाहिये । जैसे स्वप्न-दर्शनके समय जो नगर प्रकट होता है, वह अपने चिन्मय स्वरूपसे कदापि भिन्न नहीं है। वस्तुतः यह सृष्टि नहीं है, एकमात्र चैतन्य-शक्ति ही विराज रही है। जैसे सोनेके आभूषणोंमें सोना ही सत्य है, अंगूठी आदिके नाम और आकार नहीं। जैसे स्वप्नमें निर्विकार चिति-शक्ति ही पर्वतके रूपमें प्रकाशित होती है, उसी तरह निराकार ब्रह्म ही सृष्टिके रूपमें भासित हो रहा है। ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। यह सारा दृश्य चिन्मय आकाशरूप, अनन्त, अजन्मा और अविनाशी ब्रह्म ही है। वस्तुतः सहस्रों महाकल्पोंमें भी न तो यह उत्पन्न होता है और न इसका नाश ही होता है। पुरुष चेतनाकाश-रूप ही है। यह जो आप पुरुषोत्तम बैठे हैं, चेतना-काशरूप ही हैं। मैं भी अजर-अमर चेतनाकाश ही हूँ

और ये तीनों लोक चेतनाकाश ही हैं । 'मैं अद्वितीय चिन्मात्र ब्रह्म ही हूँ । ये शरीर आदि मेरे नहीं हैं।' जब ऐसा बोध प्राप्त हो जाता है, तब जन्म-मरण आदि अनर्थ कहाँ रह सकते हैं ? मैं 'चिन्मात्र निर्मल ब्रह्म हूँ।' इस आत्मानुभवको जो स्वयं ही कुतर्कोंद्वारा खण्डित करते हैं वे आत्महत्यारे हैं। उन्हें विपत्तियोंके महासागरमें डूबना पड़ता है। 'मैं आकाशसे भी स्वच्छ, नित्य अनन्त एवं निर्विकार चेतन हूँ, ऐसी दशामें क्या मेरा जीना, क्या मरना अथवा क्या सुख-दुःख भोगना है ? मैं परमाकाशस्वरूप चेतन ब्रह्म हूँ। ये शरीर आदि मेरे कौन होते हैं !' इस तरह विद्वानोंके द्वारा अन्त:करणमें किये गये अनुभवका जो कुतर्कोंद्वारा अपलाप या खण्डन करता है, वह पुरुष आत्मघाती है। उसे बारंबार धिक्कार है। 'मैं स्वच्छ चेतनाकाश हूँ।' जिस पुरुषका यह स्पष्ट अनुभव नष्ट हो गया हो, उसे विद्वान् पुरुष जीवित शव समझते हैं अर्थात् वह जीता हुआ भी मुर्देके समान है। 'मैं ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा हूँ। देह और इन्द्रियाँ मेरी कौन होती हैं।' इस प्रकार अपरोक्षज्ञानके द्वारा जिसने आत्माको उपलब्ध कर लिया है, अविद्या आदि मलोंसे रहित उस विशुद्ध पुरुषको मृत्यु आदि आपदाएँ विमोहित नहीं कर पातीं। जो शुद्ध चिन्मय परमात्माका आश्रय लेकर सुस्थिर हो गया है, उस महापुरुषको मानसिक चिन्ताएँ उसी तरह मोहित नहीं कर पाती हैं, जैसे महान् पत्थरको तुच्छ बाण । जिन पुरुषोंने अपने चिन्मय स्वभावको भुलाकर नश्वर शरीरपर ही आस्था बाँध रखी है, उन्होंने वास्तवमें सुवर्णको त्यागकर भस्मको ही सोना मानकर ग्रहण किया है । 'मैं देहरूप ही हूँ' इस भावनासे पुरुषके बल, बुद्धि और तेजका नाश हो जाता है तथा 'मैं चेतन आत्मा हूँ' इस दृढ़ निश्चयसे उसके बल, बुद्धि और तेजकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है । 'मैं न तो छेदा जाता हूँ और न जलाया ही जाता हूँ; क्योंकि मैं वज्रके समान सुदृढ़ चिन्मय परमात्मा हूँ । मेरी

६१४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ।

अपने चिन्मय स्वरूपमें ही नित्य स्थिति है। मैं देहाभिमानी नहीं हूँ।' जिस पुरुषको ऐसा निश्चय हो गया है, उसके लिये यमराज भी तृणके समान तुच्छ है। चेतनपुरुष इस जगत्में जिस-जिस वस्तुको जिस रूपसे देखता या समझता है, उस वस्तुका उसी रूपसे अनुभव करने लग जाता है। यह अनुभवसिद्ध बात है। इसलिये ये सब पदार्थ विषामृत (विषको अमृत-) दृष्टिसे देखे गयेके समान स्थित हैं। अतः कोई भी वस्तु चेतन आत्मासे भिन्न नहीं है, यह बात पूर्णतः सिद्ध हो चुकी है।

(सर्ग ९४—९६)


परमपदके विषयमें विभिन्न मतवादियोंके कथनकी सत्यताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! 'यह जगत् परमात्माका स्वप्न है, इसलिये चिन्मय है, ब्रह्माकाशरूप है, अतः सब कुछ ब्रह्म ही है।' इस दृष्टिसे सबको सत्य जगत्का ही अनुभव होता है, असत्यका नहीं। 'पुरुष चिन्मय एवं अकर्ता है। अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आदि-के क्रमसे इस जगत्की उत्पत्ति होती है।' ऐसी दृष्टि रखनेवाले आचार्य महानुभावोंके मतको भी सत्य ही समझना चाहिये; क्योंकि इस भावका चिन्तन करनेसे ऐसा ही अनुभव होता है। 'यह सारा दृश्य ब्रह्मका विवर्त है—ब्रह्म ही इस दृश्यजगत्के रूपमें भासित हो रहा है' ऐसी बातें कहनेवाले महापुरुषोंका मत भी सत्य ही है; क्योंकि इस तरह आलोचना करनेपर इसी रूपमें समस्त पदार्थोंका अनुभव होता है। इसी प्रकार जो लोग 'सम्पूर्ण जगत्को परमाणुओंका समूहरूप' ही मानते हैं, उनका वह मत भी सत्य ही है; क्योंकि उन्हें जिस-जिस पदार्थके विषयमें जैसा-जैसा अनुभव हुआ, उस-उस अनुभवके अनुसार की गयी उनकी कल्पना भी ठीक ही है। 'इस लोक या परलोकमें जो कुछ जैसा देखा गया है, वह वैसा ही है। उसे न सत् कह सकते हैं, न असत्। वास्तविक तत्त्व इन दोनोंसे विलक्षण एवं अनिर्वचनीय है।' इस तरहका जो प्रौढ आध्यात्मिक मत है, वह भी सत्य ही है; क्योंकि वे वैसा ही अनुभव करते हैं। कुछ लोगोंका कहना है कि 'बाह्य—पृथ्वी आदि चार भूतोंका समुदाय ही जगत् है। इससे भिन्न अन्तर्यामी आत्माकी सत्ता नहीं है।' ऐसा कहनेवाले जो नास्तिक हैं परंतु वे भी अपनी दृष्टिसे ठीक ही कहते हैं; क्योंकि वे इन्द्रियातीत आत्माको अपने स्थूल देहमें ही ढूँढ़ते हैं, परंतु उसे पाते नहीं हैं। क्षणिक विज्ञानवादी जो 'प्रत्येक पदार्थको क्षणभङ्गुर' बताते हैं, उनका वह मत भी युक्ति-संगत ही है; क्योंकि सभी पदार्थोंका निरन्तर परिवर्तन एवं उलट-फेर देखनेमें आता है।

परमपद सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त है। इसलिये उसके विषयमें जो जैसा कहता है, वह सभी सम्भव है। 'जैसे घड़ेके भीतर बंद हुआ गौरैया घड़ेका मुँह खोल देनेपर उड़कर बाहर चला जाता है, वैसे ही देहके भीतर बंद और देहके बराबर आकारवाला जीव कर्मक्षय हो जानेपर उड़कर परलोकमें चला जाता है।' इस मतको माननेवाले लोगोंकी कल्पना भी उनके मतानुसार ठीक है। इसी तरह म्लेच्छोंका यह मत है कि 'जीव देहके बराबर ही बड़ा है। उसे ईश्वरने उत्पन्न किया है। जहाँ शरीर गाड़ा जाता है, वह वहीं रहता है। ईश्वर कालान्तरमें उसके विषयमें विचार करते हैं। तब उन्हीं-की इच्छासे उसकी मुक्ति होती है अथवा वह स्वर्ग या नरकमें डाला जाता है।' आत्मसिद्धिके लिये की हुई म्लेच्छोंकी यह कल्पना उनके भावके अनुसार ठीक कही जा सकती है और उनके देशोंमें वह दूषित नहीं मानी जाती है। जो संत महात्मा हैं, वे 'ब्राह्मण, अग्नि, विष, अमृत, मरण और जन्म आदिमें भी समभाव' रखते हैं। यह भी ठीक ही है; क्योंकि विभिन्न विचारधाराके विद्वानोंका जो मत है, वह सब सर्वात्मा ब्रह्मसे भिन्न नहीं है।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * तत्त्वज्ञानी संतोंके शील-स्वभावका वर्णन तथा सत्संगका महत्त्व * ६१५


इसलिये अपने-अपने मतके अनुसार साधन करनेपर उन्हें तदनुसार सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। आस्तिकोंके मतमें 'जैसे यह लोक है, वैसे परलोक भी है। अतः पारलौकिक लाभके लिये किये गये तीर्थ-स्नान और अग्निहोत्र आदि निष्फल नहीं हैं।' ऐसी जो उनकी भावित भावना है, उसे सत्य ही समझना चाहिये। 'यह जगत् न तो शून्य है और न अशून्य ही है, किंतु अनिर्वचनीय है' इस प्रकार माननेवाले वादियोंका मत भी असत्य नहीं है; क्योंकि सर्वशक्तिमान् ब्रह्मकी जो मायाशक्ति है, वह न तो शून्यरूप है और न सत्य ही है किंतु उसे अनिर्वचनीय समझना चाहिये। इसलिये जो अपने जिस निश्चयमें दृढ़तापूर्वक स्थित है, वह यदि बालोचित चपलता या मूढ़ताके कारण उस निश्चयसे हटे नहीं तो उसका फल अवश्य पाता है।

बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि सबसे पहले श्रेष्ठ वस्तुके विषयमें विद्वानोंके साथ विचार कर ले, विचारके बाद जो निश्चित सिद्धान्त स्थापित हो, उसीको ग्रहण करे। दूसरे जैसे-तैसे निश्चयको नहीं ग्रहण करना चाहिये। शास्त्रोंके स्वाध्याय और सद्व्यवहारकी दृष्टिसे जिस देशमें जो भी उत्तम बुद्धिसे युक्त हो, उस देशमें वही विद्वान् या पण्डित है। अतः सद्ज्ञानकी प्राप्तिके लिये उसीका आश्रय लेना चाहिये। उत्तम शास्त्रके अनुसार व्यवहार करनेवाले तथा तत्त्वज्ञानके लिये परस्पर वाद-विवाद करनेवाले सत्पुरुषोंमें जो सबको आह्लाद प्रदान करनेवाला और अनिन्दनीय हो, वही श्रेष्ठ है। अतः उसीका आश्रय लेना चाहिये। रघुनन्दन ! प्रत्येक जातिमें कुछ ऐसे नामी विद्वान् होते हैं, जिनके सूर्यतुल्य प्रकाशसे दिन प्रकाशित एवं सार्थक होते हैं। जो मूढ़ हैं, वे सभी मोहरूपी महासागरमें संसारचक्रके आवर्तन-प्रत्यावर्तन-से ऊपर-नीचे होते हुए तृणके समान बहते रहते हैं।

(सर्ग ९७)


तत्त्वज्ञानी संतोंके शील-स्वभावका वर्णन तथा सत्संगका महत्त्व

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जो विवेकी पुरुष संसारसे विरक्त हो परम पद परब्रह्म परमात्मामें विश्राम कर रहे हैं, उनके लोभ, मोह आदि शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं। वे तत्त्वज्ञानी महात्मा न कोई अनुकूल वस्तु पाकर हर्षित होते हैं, न किसीके प्रतिकूल बर्तावसे कुपित होते हैं। न आवेशमें आते हैं, न आहारका संग्रह करते हैं, न लोगोंसे उद्विग्न होते हैं और न स्वयं ही लोगोंको उद्वेगमें डालते हैं। वे किसी भी बुरी-अच्छी कामनासे हठपूर्वक कष्टसाध्य वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानमें नहीं प्रवृत्त होते हैं। उनका आचरण मनोरम और मधुर होता है। वे प्रिय और कोमल वचन बोलते हैं। चन्द्रमाकी किरणोंके समान अपने सङ्गसे अन्तःकरणमें आह्लाद प्रदान करते हैं। कर्तव्योंका विवेचन करते और क्षणभरमें ही विवादका निर्णय कर देते हैं। उनका आचरण दूसरोंको उद्वेगमें डालनेवाला नहीं होता है। वे सबके प्रति बन्धुभाव रखते हैं और बुद्धिमानोंके समान समुचित बर्ताव करते हैं। बाहरसे उनका आचरण सबके समान ही होता है, किंतु भीतरसे वे सर्वथा शीतल होते हैं। तत्त्वज्ञानी महात्मा शास्त्रोंके अर्थोंमें बड़ा रस लेते हैं। जगत्में क्या उत्तम, अधम अथवा भला-बुरा है, इसका उन्हें अच्छी तरह ज्ञान होता है। त्याज्य और ग्राह्यका भी वे ज्ञान रखते हैं तथा प्रारब्धवश जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसका अनुसरण करते हैं। लोक और शास्त्रके विरुद्ध कार्योंसे वे सदा विरत रहते हैं। सज्जनोंके बीच रहने या सत्संग करनेके रसिक होते हैं। घरपर आये हुए याचकरूपी भ्रमरका वे प्रफुल्ल कमलोंके समान अपने ज्ञानका अनावृत सुगंध फैलाकर तथा उत्तम आश्रय एवं सुखद भोजन

६१६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

,देकर आदर-सत्कार करते हैं । जनताको अपनी ओर खींचते हैं और लोगोंके पाप-ताप हर लेते हैं । वर्षाकालके मेघोंकी भाँति वे स्निग्ध एवं शीतल होते हैं । धीर स्वभाववाले ज्ञानी पुरुष राजाओंके नाशक और देशको छिन्न-भिन्न करनेवाले व्यापक जन-क्षोभको उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे पर्वत भूकम्पको ।

ज्ञानी पुरुष चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर अङ्गवाली गुणशालिनी पत्नीके समान विपत्तिकालमें उत्साह एवं धैर्य प्रदान करते हैं और सम्पत्तिके समय सुख पहुँचाते हैं । साधुपुरुष वैशाख मास या वसन्तके समान अपने सुयशरूपी पुण्यसे सम्पूर्ण दिशाओंको निर्मल बनाते, उत्तम फलकी प्राप्तिमें कारण बनते और कोकिलके समान मीठी वाणी बोलते हैं । आपदाओंमें, बुद्धिनाशके अवसरोंपर भूख-प्यास, शोक-मोह तथा जरा-मरण—इन छः ऊर्मियोंके प्राप्त होनेपर, व्याकुलताकी दशामें तथा घोर संकट आनेपर साधु पुरुष ही सत्पुरुषोंके आश्रयदाता होते हैं । काल-सर्पसे भरे हुए अत्यन्त भयंकर संसार-सागरको सत्संगरूपी जहाजके बिना दूसरी किसी नौकासे पार नहीं किया जा सकता । उपर्युक्त उत्तम गुणोंमेंसे एक भी गुण जिसमें उपलब्ध हो, उसके उसी गुणको सामने रखकर उसमें दीखनेवाले सब दोषोंकी उपेक्षा करके उसका आश्रय लेना चाहिये । सारे कामोंको छोड़कर सत्पुरुषोंका सङ्ग करे; क्योंकि यह सत्संगरूपी कर्म निर्वाधरूपसे इहलोक और परलोक दोनोंका साधक होता है । किसी समय कहीं भी सत्पुरुषसे अधिक दूर नहीं रहना चाहिये । विनययुक्त बर्ताव करते हुए सदा साधुपुरुषोंका सेवन करना चाहिये; क्योंकि सत्-पुरुषके समीप जानेवाले मनुष्यका उसके शान्ति आदि प्रसरणशील उत्तम गुण अनायास ही स्पर्श करते हैं, जैसे सुगन्धित पुष्पवाले वृक्षके निकट जानेसे उसके पुष्प-पराग बिना यत्नके ही सुलभ हो जाते हैं ।

(सर्ग ९८)

सत्‌का विवेचन और देहात्मवादियोंके मतका निराकरण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो वस्तु शास्त्रीय विचारसे उपलब्ध होती है तथा जिसकी सत्ता हेतुओ और युक्तियोंद्वारा सिद्ध है, वही सत् कही गयी है । शेष सभी वस्तुएँ प्रतीतिमात्र हैं । जो तीनों कालोंमें कभी हुई ही नहीं, वह वस्तु सत् कैसे हो सकती है ? मूर्खोकी दृष्टिमें इस संसारका जैसा स्वरूप है, उसे वही जानता है । हमलोगोंको उसका अनुभव नहीं है । मृग-तृष्णाकी नदीके जलमें जो मछली रहती है, वही उसकी मिथ्या चञ्चल लहरोंके आवर्तन-प्रत्यावर्तनको जानती होगी । तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें तो केवल एकमात्र चेतनाकाश ही बाहर-भीतर, तुम-मैं इत्यादि सब कुछ बनकर प्रकाशित हो रहा है ।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जिन लोगोंका यह पक्ष (मत) है कि 'जबतक जीवे, तबतक सुखसे जीवे, मृत्यु अप्रत्यक्ष नहीं है । जो शरीर जलकर भस्म होकर बुझ गया, उसका पुनः आगमन कहाँसे हो सकता है ?' उनके लिये इस संसारमें दुःख-शान्तिका क्या उपाय है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! संवित्‌का जो-जो निश्चय होता है, वह अपने भीतर अखण्डरूपसे उसीका अनुभव करती है । इस बातका सब लोगोंको प्रत्यक्ष अनुभव है । अन्तःकरणमें नित्य-निरन्तर जैसी बुद्धिका उदय होता है, मनुष्य वैसा ही हो जाता है । यदि संवित्‌के बोधसे पुरुष दुखी हुआ है तो जबतक यह विरुद्ध बोध रहेगा, तबतक जीव दुःखमय बना रहेगा । यह जगत् सच्चिदानन्दरूप ब्रह्माकाशका स्फुरणमात्र ही है, ऐसी भावना दृढ़ हो जाय तो वह दुःखका बोध कैसे हो सकेगा ? जो जगत् वस्तुतः कूटस्थ अद्वितीय चेतनाकाशरूप

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सबकी चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन * ६१७


है, उस जगत्से किसको कैसे दुःखका बोध हो सकता है । जीवकी जैसी दृढ़ भावना होती है, उसीके अनुसार वह सुखी या दुखी होता है, ऐसा निश्चय है । जिनके मतमें चेतनसे शरीरोंकी कल्पना हुई है, वे श्रेष्ठ पुरुष वन्दनीय हैं; परंतु जिनके मतमें शरीरसे चेतनकी उत्पत्ति होती है, उन नराधमोंसे बाततक नहीं करनी चाहिये । ( ऐसे लोग दुःखसे कैसे छूट सकते हैं । )

( सर्ग ९९-१०० )


सबकी चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! चिन्मात्र ही पुरुष है, वही इस प्रकार नाना रूपोंमें अवस्थित है । उस चिन्मात्र परम पुरुष परमात्माके सिवा दूसरी किम वस्तुकी सत्ता यहाँ सम्भव हो सकती है ? मेरे सारे अङ्ग चूर-चूर होकर परमाणुके तुल्य हो जायँ अथवा बढ़कर सुमेरु पर्वतके समान विशाल हो जायँ, इससे मेरी क्या क्षति हुई अथवा क्या वृद्धि हुई ? क्योंकि मेरा वास्तविक स्वरूप तो सच्चिदानन्दमय है । हमारे पितामह आदिके शरीर मर गये, किंतु उनका चैतन्य तो नहीं मरा है । यदि वह भी मर जाता तो मृत आत्मावाले उनका तथा हमलोगोंका फिर जन्म नहीं होता । किंतु पुरुष अविनाशी चिन्मय ही है । वह आकाशके समान नित्य है । उसका कभी नाश नहीं होता है । 'मैं नष्ट होता हूँ या मरता हूँ' इस तरहका जो शोक है, वह सर्वथा व्यर्थ है । इसलिये न तो मरण दुःखरूप है और न जीवित रहना सुखरूप । यह सब कुछ नहीं है । केवल अनन्त चेतन परमात्मा ही इस तरह स्फुरित हो रहा है ।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! आदि और अन्तसे रहित परमतत्त्व परमात्माका भलीभाँति ज्ञान हो जानेपर उत्तम पुरुष कैसा—किन-किन लक्षणोंसे सम्पन्न हो जाता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जिसे ज्ञेय वस्तु परमात्माका भलीभाँति ज्ञान हो गया है, ऐसा जीवन्मुक्त श्रेष्ठ पुरुष कैसा होता है तथा वह जीवनपर्यन्त कैसे स्वभावसे युक्त हो किस आचारका पालन करता रहता है, यह बताया जाता है, सुनो । ऐसा पुरुष यदि जंगलमें रहता हो तो वहाँ पत्थर भी उसके मित्र हो जाते हैं । वनके वृक्ष बन्धु-बान्धव और वन्य मृगोंके बच्चे उसके स्वजन बन जाते हैं । यदि वह विशाल राज्यमें रहता हो तो वहाँ जनसमुदायसे भरा हुआ स्थान भी उसके लिये शून्य-सा ही हो जाता है । विपत्तियाँ बड़ी भारी सम्पत्तियों हो जाती हैं और नाना प्रकारके व्यसन ही उसके लिये सुन्दर उत्सव बन जाते हैं । उसके लिये असमाधि भी समाधि है । दुःख भी महान् सुख ही है । वाणीका व्यवहार भी मौन है और कर्म भी अकर्म ही है । वह जाग्रत्-अवस्थामें रहकर भी सुषुप्तिमें ही स्थित है (क्योंकि निर्विकल्प आत्मामें उसकी सुदृढ़ स्थिति है) । वह जीवित रहता हुआ भी देहाभिमानसे शून्य होनेके कारण मृतकके ही तुल्य है । वह समस्त आचार-व्यवहारका पालन करता है, तो भी कर्तृत्वके अभिमानसे रहित होनेके कारण कुछ भी नहीं करता है । वह रसिक होकर भी अत्यन्त विरक्त है । करुणारहित होकर भी सबको अपना बन्धु मानकर सबके प्रति स्नेह रखता है । निर्दय होकर भी अत्यन्त करुणासे भरा हुआ है और स्वयं तृष्णासे शून्य होकर भी पराये हितके लिये तृष्णा रखता है । उसके आचारका सभी अभिनन्दन करते हैं तथापि वह सभी आचारोंसे बहिष्कृत है । शोक, भय और आयाससे शून्य होनेपर भी वह दूसरोंका दुःख देखकर शोकयुक्त-सा दिखायी देता है । उस पुरुषसे जगत्के प्राणियोंको कभी उद्वेग नहीं प्राप्त होता तथा वह भी उनसे कभी उद्विग्न नहीं होता । संसारमें (ब्रह्मा-

६१८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

नन्दका ) रसिक होकर भी वह संसारी मनुष्योंसे अत्यन्त विरक्त होता है । वह प्राप्त हुई वस्तुका न तो अभिनन्दन करता है और न अप्राप्त वस्तुकी अभिलाषा ही । अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थका अनुभव होनेपर भी वह हर्ष और विषादमें नहीं पड़ता । वह दुखी पुरुषके पास दुखियोंकी ही चर्चा करता है, सुखीके पास सुखकी ही कथा कहता है और स्वयं सभी अवस्थाओंमें हार्दिक दुःख-सुखसे पराजित न होकर सदा एक-सा स्थित रहता है । शास्त्रविहित शुभकर्मसे भिन्न दूसरा कोई निषिद्ध कर्म उसे किंचिन्मात्र भी अच्छा नहीं लगता । महात्मा पुरुषोंका यह स्वभाव ही है कि वे शास्त्रविपरीत चेष्टा कभी नहीं करते हैं ।

जीवन्मुक्त महात्मा न तो कहीं आसक्त होता है और न किसीसे अकस्मात् विरक्त ही होता है । वह धनके लिये याचक होकर नहीं घूमता है और भीतरसे वीतराग होकर भी ऊपरसे रागयुक्त-सा जान पड़ता है । शास्त्रके अनुसार व्यवहार करते हुए क्रमशः जो सुखदुःख प्राप्त होते हैं, उनसे वस्तुतः वह अछूता रहता है तो भी उनका स्पर्श-सा करता जान पडता है । वह उन सुख-दुःखोंसे हर्ष और विषादके वशीभूत नहीं होता । अवश्य ज्ञानी महात्मा दूसरोंके सुखसे प्रसन्न और दूसरोंके ही दुःखसे दुखी देखे जाते हैं, परंतु वे भीतरसे अपने समतापूर्ण स्वभाव-का परित्याग कभी नहीं करते; क्योंकि वे संसाररूपी नाट्यशालाके नट हैं । अपने कहे जानेवाले पुत्र आदि जितने पदार्थसमूह हैं, वे सब वस्तुतः पानीके बुलबुलोंके समान मिथ्या हैं । अतः तत्त्वदर्शी महात्माका उनके प्रति ( मोहरूप ) स्नेह नहीं होता है । पर वह ज्ञानी महात्मा स्नेहरहित होनेपर भी घनीभूत स्नेहसे आर्द्र हृदयवाले पुरुषकी भाँति यथायोग्य वात्सल्य-वृत्तिका दर्शन कराता हुआ व्यवहार करता है । वह बाहरसे समस्त शिष्टाचारोंके पालनमें संलग्न रहकर भी भीतर सर्वथा शान्त बना रहता है । उसके अन्तःकरणमें किसी प्रकारका आवेश नहीं होता तो भी बाहरसे कभी-कभी आविष्ट-सा दिखायी देता है ।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—मुनीश्वर ! अन्धके सदृश ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए कलुषित चित्तवाले दम्भी मनुष्य भी तो झूठमूठमें अपनी तपस्याकी दृढ़ता दिखलानेके लिये ऐसे लक्षणोंसे युक्त हो सकते हैं । फिर, कौन सच्चे महात्मा हैं और कौन दम्भी, इसे कौन जान सकता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! ये लक्षण सत्य हों या असत्य, किंतु ऐसे लक्षणोंसे युक्त स्वरूपका होना हर हालतमें अच्छा ही है ( इन लक्षणोंसे सम्पन्न पुरुष दम्भी हो तो भी आदरणीय ही है ) । जो वेदार्थ-तत्त्व—परमात्माके ज्ञाता हैं, उनमें तो ये गुणसमूह स्वाभाविक अनुभवके बलसे ही प्रतिष्ठित रहते हैं । वे जीवन्मुक्त पुरुष वीतराग तथा क्रियाके फलोंमें आसक्तिसे शून्य होते हुए ही रागयुक्त पुरुषोंके समान चेष्टा करते हैं । वे दुखियोंको देखकर सहसा करुणासे भर जाते हैं । चित्त-रूपी दर्पणमें प्रतिबिम्बित हुए समस्त दृश्यप्रपञ्चको वे कपटभूमिके समान असत् देखते हैं । स्वप्नमें हस्तगत हुए सुवर्णको जैसे जाग्रत्कालमें असत् माना जाता है, वैसे ही वे इस जगत्को असत् समझते हैं ।

जिन्हें ज्ञेय पदार्थ—परमात्माका भलीभाँति ज्ञान हो चुका है और जो उन ज्ञानी महात्माओंके समान ही पवित्र अन्तःकरण-वाले हैं, वे ही उन महात्माओंके महत्त्वको ठीक-ठीक जान पाते हैं, जैसे साँपके पदचिह्नोंको साँप ही समझ पाते हैं । श्रेष्ठ पुरुष तो अपने सर्वोत्तम भावको छिपाये फिरते हैं । भला, गाँव और नगरोंके धनोंसे जिसका खरीदा जाना असम्भव है, ऐसी कौन-सी चिन्तामणि बाजारमें बिकनेके लिये आती है ? उन तत्त्वज्ञानी महात्माओंका भाव अपने गुणोंको छिपाये रखनेमें ही होता है, दूसरोंके सामने प्रदर्शन करनेमें नहीं; क्योंकि वे वासनासे शून्य, द्वैत-

[ निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सब की चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन * ६१९

हीन एवं अभिमानसे रहित होते हैं।* श्रीराम ! उन महात्माओंको एकान्तसेवन, असम्मान, बुरी स्थिति तथा साधारण लोगोंद्वारा की गयी अवहेलना—ये सब चीजें जैसा सुख पहुँचाती हैं, वैसा सुख उन्हें बड़ी-बड़ी समृद्धियाँ भी नहीं दे सकतीं।

तत्त्वज्ञानका सारभूत जो निरतिशय आनन्द है, वह एकमात्र अपने अनुभवसे ही जाननेयोग्य है, उसे दूसरेको दिखाया नहीं जा सकता । तत्त्वज्ञ पुरुष भी उसे नहीं देखता, केवल स्वप्रकाशरूपसे उसका अनुभव करता है। 'लोग मेरे इस गुणको जानें और मेरी पूजा करें' ऐसी इच्छा अहंकारियोंको ही होती है। जिनका चित्त अहंकारसे मुक्त है, उनके भीतर ऐसी इच्छाका उदय नहीं होता है।† रघुनन्दन ! आकाशमें गमन आदि जो क्रियाफल हैं, वे तो मन्त्र और औषधके प्रभावसे अज्ञानियोंके लिये भी सिद्ध (सुलभ) हो जाते हैं। कोई ज्ञानी हो या अज्ञानी, जो लक्ष्यसिद्धिके लिये जैसा क्लेश सहन करनेमें समर्थ हो, वह वैसा ही फल कर्मानुसार अवश्य प्राप्त कर लेता है। चन्दनकी सुगन्धकी भाँति विहित और निषिद्ध कर्मोंका फल सभीके हृदयमें अपूर्व रूपसे विद्यमान है। समय पाकर प्रकट हुए उस फलको उसका अधिकारी जीव अवश्य पाता है। 'यह आकाशगमन आदि फल कुछ भी नहीं है—अत्यन्त तुच्छ है अथवा मनका भ्रममात्र है, या अधिष्ठानभूत चिदाकाशमात्र है'—जिसे ऐसा ज्ञान हो गया है, वह वासनाशून्य तत्त्वज्ञ


* भावं निगूहन्त्येते तमुत्तममनुत्तमाः ।
ग्राम्यैर्धनैः किलानर्थ्यः कश्चिन्तामणिरापणे ॥
तस्मिन्निगूढने भावो यतस्तेषा न दर्शने ।
निर्वासना गतद्वैता गतमानाः किलाङ्गते ॥
(नि० प्र० उ० १०२ । २७-२८)

† गुणं ममेमं जानातु जनः पूजां करोतु मे ।
इत्यहंकारिणामीहा न तु तन्मुक्तचेतसाम् ॥
(नि० प्र० उ० १०२ । ३१)


पुरुष कर्मके बवंडररूप उन मन्त्रौषधि-साध्य क्रियाओंका साधन कैसे करेगा ? उस महापुरुषका इस विश्वमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंके न करनेसे ही किसी भी प्राणीमें उसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता । इस पृथ्वीपर, स्वर्गमें अथवा देवताओंके यहाँ भी कहीं कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो उस उदारचेता परमात्मज्ञानीको लुभा सके।* जिसके लिये सारा संसार ही तिनकेके समान तुच्छ हो गया है, जिसमें रजोगुणका लेश भी नहीं है, उस ज्ञानी महात्माके लिये एकमात्र परमात्मासे भिन्न दूसरी कौन-सी वस्तु उपादेय हो सकती है ?

लोकसंग्रहके लिये जिसने जगत्के व्यवहारोंका पूर्णरूपसे निर्वाह किया है, जिसका हृदय परिपूर्ण ( निष्काम ) है, वह मननशील जीवन्मुक्त पुरुष अपने स्वरूपमें ज्यों-का-त्यों स्थिर रहकर यथाप्राप्त शिष्टाचारका अनुसरण करता है । जो भीतरसे नित्य शान्त और मौनी है तथा जिसकी मनोभूमि सत्त्वगुणमय हो गयी है, वह महात्मा भरे हुए महासागरके समान सब ओरसे पूर्ण होता है। तथा उसका आशय गम्भीर होनेके साथ ही सुस्पष्ट होता है । तत्त्वज्ञानी पुरुष अमृतसे भरे हुए सरोवरके समान अपने आत्मामें स्वयं ही आनन्दकी हिलोरें लेता है तथा निर्मल एवं पूर्ण चन्द्रमाके समान दूसरोंको भी आह्लाद प्रदान करता है ।

'यह सारा विश्व भ्रममात्र है, मिथ्या इन्द्रजाल है'—ऐसे दृढ़ निश्चयके कारण ज्ञानी पुरुष इच्छाओंसे सर्वथा रहित हो जाता है । ज्ञानी महात्मा अपने शरीरके सर्दी-गरमी आदि दुःखोंको भी इस तरह अवहेलना-पूर्वक देखता है, मानो वे दूसरेके शरीरमें हों ।


* न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा क्वचित् ।
यदुदारमनोवृत्तेर्लोभाय विदितात्मनः ॥
(नि० प्र० उ० १०२ । ३८)

७७—विपश्चितोंके विहारका तथा जीवन्मुक्तोंकी सर्वात्मरूप स्थितिका वर्णन

६२० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

केवल परहितके लिये फल-फूल धारण करनेवाली लताके समान धीर वृत्तिसे तथा करुणाके कारण उदार वृत्तिसे वह महात्मा दुखी प्राणियोंका परिपालन करता है। वह संसारसे विरक्त होकर ऐसी सारभूत स्थितिको अपनाता है, जिसमें जलमात्र ग्रहण करके भी संतोष माना जाता है। साधारण लोगोंके समान यथाप्राप्त व्यवहारका सम्पादन करता हुआ वह महात्मा चराचर भूतोंके ऊपर (परब्रह्म परमात्मामें) ही स्थित होता है।

कोई महात्मा पर्वतकी गुफाको ही घर मानकर उसमें रहता है। कोई पवित्र आश्रममें निवास करता है। कोई गृहस्थाश्रमी होता है और कोई प्रायः इधर-उधर घूमता रहता है। कोई भिक्षाचर्यासे निर्वाह करता है, कोई एकान्तमें बैठकर तपस्या करता है, कोई मौनव्रत धारण किये रहता है, कोई परमात्माके ध्यानमें संलग्न होता है, कोई प्रख्यात पण्डित होता है, कोई श्रुतियोंका श्रोता होता है, कोई राजा, कोई ब्राह्मण और कोई मूढ़के समान स्थित रहता है, कोई सिद्ध गुटिका, अंजन और खङ्ग आदिसे सिद्ध होकर आकाशगामी बना रहता है, कोई शिल्पकलासे जीवन-निर्वाह करता है, कोई पामरके समान रूप धारण किये रहता है। कोई सारे वैदिक आचारोंका परित्याग कर देता है तो कोई कर्मकाण्डियोंका सरदार बना रहता है, किसीका चरित्र उन्मत्तोंके समान होता है और कोई संन्यास-मार्गका आश्रय लेता है।

शरीर आदि और चित्त आदि कुछ भी पुरुषका स्वरूप नहीं है। केवल चेतन-तत्त्व ही पुरुष है। उसका कभी नाश नहीं होता है। यह आत्मा अच्छेद्य है—इसे कोई काट नहीं सकता। यह अदाह्य है—इसे कोई जला नहीं सकता। यह अक्लेद्य है—इसे कोई पानीसे भिगो या गला नहीं सकता। यह अशोष्य है—इसे कोई सुखा नहीं सकता। यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है। तत्त्वज्ञ पुरुष पातालमें समा जाय, आकाशको लाँघकर उसके ऊपर चला जाय अथवा सम्पूर्ण दिशाओंमें वेगपूर्वक भ्रमण करे, जिससे पर्वत आदिसे टकराकर वह पिस जाय या चूर-चूर हो जाय, परंतु उसका जो चिन्मात्र स्वरूप है वह अजर-अमर बना रहता है, वह कभी नष्ट नहीं होता; क्योंकि वह आकाशके समान अनन्त सदा शान्त, अजन्मा और कल्याणमय परमात्मस्वरूप ही है।

(सर्ग १०१, १०२)


इस शास्त्रके विचारकी आवश्यकता तथा इससे होनेवाले लाभका प्रतिपादन, वैराग्य और आत्मबोधके लिये प्रेरणा तथा विचारद्वारा वासनाको क्षीण करनेका उपदेश

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! शम, दम आदि साधनसे सम्पन्न पुरुषको चाहिये कि वह उद्वेग छोड़कर प्रतिदिन गुरु-शुश्रूषा आदि नियमपूर्वक करता हुआ इस महारामायण नामक शास्त्रका विचार करे। यह शास्त्र इहलोक और परलोक दोनोंके लिये हितकर तथा कल्याणकारी है। आप सब सभासद् भाँति-भाँतिकी असम्भावना एवं विपरीतभावना आदिको अपने हृदयमें स्थान दिये हुए हैं। इसलिये मिल-जुलकर अभ्यास न करनेसे आप लोगोंका जाना हुआ भी यह आत्मज्ञान भूल जानेके कारण अनजाना-सा हो रहा है। जो जिस वस्तुको चाहता है, वह उसके लिये यत्न करता है। वह यदि थककर उस प्रयत्नसे निवृत्त न हो जाय तो अपनी अभीष्ट वस्तुको अवश्य प्राप्त कर लेना है। इस शास्त्रके सिवा कल्याणका सर्वश्रेष्ठ साधन आजतक न तो हुआ है और न आगे होगा ही। इसलिये परम श्रेयकी प्राप्तिके लिये इसीका बारंबार विचार एवं मनन करना चाहिये। इस शास्त्रका भलीभाँति विचार करके स्थित हुए पुरुषको स्वयं ही उत्तम परमात्मतत्त्वका बोध एवं अनुभव होने लगता है। वरदान और शापकी भाँति यह विलम्बसे अपना फल नहीं प्रकट करता।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण * ६२१

यह परमात्मबोध संसार-मार्गके भ्रमको हर लेनेवाला है। जो न तो पिताने, न माताने और न शुभ कर्मोंने ही अबतक सिद्ध किया है, वही आपका परम कल्याण यह महारामायण-शास्त्र तत्काल सिद्ध कर देगा, यदि आप अभ्यासपूर्वक इसे भलीभाँति जान लें। साधुशिरोमणे ! यह संसार-बन्धनमयी विषूचिका (हैजा) बड़ी भयंकर है और दीर्घकालतक टिकी रहनेवाली है। आत्मज्ञानके सिवा दूसरी किसी दवासे यह कभी शान्त नहीं होती।

मनुष्यो ! आपातमधुर, शून्य एवं निस्सार विषयोंका आस्वादन करते हुए तुमलोग खाली हवा चाटनेवाले सर्पोंके समान आकाशरूपी अनन्त संसारकी ओर पैर न बढ़ाओ। बड़े कष्टकी बात है कि तुम्हारे दिन केवल लौकिक व्यवहारमें ही इस तरह बीत रहे हैं कि वे कब आये और कब गये, इसका तुम्हें पता ही नहीं लगता। इन्हीं बीतते हुए दिनोंके द्वारा तुमलोग केवल अपनी मौतकी राह देख रहे हो। लोगो ! तुम मान और मोहसे रहित होकर तत्त्वज्ञानके द्वारा उत्तम मोक्ष-पदको प्राप्त करो। अधम संसार-गतिमें न पड़ो। आत्मज्ञानके द्वारा बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंका मूलोच्छेद कर दिया जाता है। जो आज ही मरणरूपी आपत्तिसे बचनेका उपाय नहीं करता है, वह मूढ़ रुग्णावस्थामें, जब मौत सिरपर सवार हो जायगी, तब क्या करेगा ?

आदरणीय सभासदो ! मैं न तो मनुष्य हूँ, न गन्धर्व हूँ, न देवता हूँ, न राक्षस ही हूँ, अपितु आप लोगोंका सूक्ष्म संविद्रूप विशुद्ध आत्मा हूँ और इस प्रकार उपदेश देनेके लिये यहाँ बैठा हूँ। आपलोग भी शुद्ध चैतन्यमात्र ही हैं। अत्यन्त निर्मल चिन्मात्रस्वरूप मैं आपलोगोंके पुण्यसे ही यहाँ उपस्थित हूँ। आपकी आत्मासे भिन्न नहीं हूँ। जबतक मौतके काले दिन नहीं आ रहे हैं, तभीतक सब वस्तुओंमें वैराग्यरूपी पहला सार पदार्थ समेटकर रख लो। जो इस शरीरमें रहते हुए ही नरकरूपी रोगकी चिकित्सा नहीं कर लेता, वह औषधशून्य प्रदेश (परलोक) में पहुँचकर उस रोगसे पीड़ित होनेपर क्या करेगा ? जबतक समस्त पदार्थोंकी ओरसे वैराग्य नहीं प्राप्त होता, तबतक उन पदार्थोंकी वासना क्षीण नहीं होती है। महामते ! आत्माका पूर्णरूपसे उद्धार करनेके लिये वासनाको क्षीण करनेके सिवा दूसरा कोई उपाय कभी सफल नहीं होता। पदार्थोंकी सत्ता होती है, तभी उनमें अनुकूलता बुद्धि होनेसे वासना होती है। किंतु ये पदार्थ तो खरगोशके सींग आदिकी भाँति हैं ही नहीं। (फिर उनमें वासना बनी रहनेका क्या कारण है ?) जगत्के सभी पदार्थ तभीतक मनोहर प्रतीत होते हैं, जबतक कि उनके स्वरूपपर सम्यक् विचार नहीं किया जाता। विचार करनेपर उनकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती। अतः वे जीर्ण-शीर्ण होकर न जाने कहाँ विलीन हो जाते हैं। (सर्ग १०३)

मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निर्मल आत्मस्वरूपका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर जो लौकिक दुःख और सुखसे रहित अक्षय परमानन्दरूपता प्राप्त होती है, वही मोक्ष है। वह शरीरके रहने या न रहनेपर भी समानरूपसे ही उपलब्ध होता है। उसी मोक्ष-सुखमें सबका पूर्ण विश्राम हो।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—स्वप्न और जाग्रत्-दोनों एक समान कैसे हो सकते हैं ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्नके संसारमें स्वप्नगत बन्धुजनोंके साथ विहार करनेके पश्चात् वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है। स्वप्न-शरीरकी निवृत्ति ही स्वप्नद्रष्टाकी मृत्यु है। स्वप्न-संसार