भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चूडालाकी सिद्धिका वैभव, गुरूपदेशकी सफलतामें किरातका आख्यान * ४४९


चूडाला अपने स्वामी राजा शिखिध्वजको अनेक बार यत्नपूर्वक ज्ञानामृत का उपदेश करती, परंतु उनकी समझमें कुछ भी नहीं आता। जैसे बालकको विद्याके गुणका अनुभव नहीं होता, वैसे ही इतने लंबे कालतक सम्पर्कमें रहनेपर भी राजा शिखिध्वज यह न जान सके कि मेरी पत्नी चूडाला ऐसी गुणशालिनी है। चूडालाने भी अनधिकारी समझकर आत्मशान्तिकी प्राप्तिसे रहित राजाके सामने अपनी अणिमादि सिद्धियोंके ऐश्वर्यको उसी प्रकार प्रकट नहीं किया, जैसे शूद्रको यज्ञक्रिया नहीं दिखलायी जाती।

श्रीरामजीने पूछा— ऐश्वर्यशाली गुरुदेव ! इतनी बड़ी सिद्धयोगिनी चूडालाके प्रयत्नसे भी जब राजा शिखिध्वज ज्ञान नहीं प्राप्त कर सके, तब भला, अन्य साधारण व्यक्तिको ज्ञानकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुकुलभूषण राम ! गुरुद्वारा उपदेश प्राप्त करनेका क्रम केवल शास्त्र-मर्यादाका पालन-मात्र है। ज्ञान-प्राप्तिका कारण तो शिष्यकी विश्वासयुक्त विशुद्ध प्रज्ञा ही है; क्योंकि जाननेयोग्य ब्रह्म शास्त्रोंके श्रवणसे अथवा किसी पुण्यकर्मसे नहीं जाना जाता, उसे तो आत्मा ही जानता है।

श्रीरामजीने पूछा— मुनिश्रेष्ठ ! यदि ऐसी ही बात है कि गुरूपदेश आत्मज्ञानमें कारण नहीं है तो जगत्‌में जो यह क्रम प्रचलित है कि आत्मज्ञानका कारण गुरूपदेश है, यह कैसे उचित होगा ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा— राघव ! (मैं इस विषयमें एक दृष्टान्त देता हूँ, सुनो—) विन्ध्याचलके जंगली प्रदेशमें एक किरात रहता था। वह धन-धान्यसम्पन्न होनेपर भी अत्यन्त कृपण था। श्रीराम ! एक बार वह उस जंगली मार्गसे कहीं जा रहा था कि उसकी एक कौडी किसी घास-फूससे ढके हुए स्थानमें गिर पड़ी। कृपण-शिरोमणि तो वह था ही; अतः उस एक कौड़ीको वह तीन

सं० यो० वं० अं० १६—

दिनोंतक चारों ओर सारे घास-फूसोंको उलटकर खोजनेका प्रयत्न करता रहा। उसके मनमें बारंबार ऐसी कल्पना उठ रही थी कि यदि यह कौड़ी मिल जाती तो समयानुसार इस एकसे चार, चारसे आठ, आठसे सौ, सौसे हजार और हजारसे कई हजार कौड़ियों हो जातीं। उस समय सहस्रों मनुष्य उस कृपणका उपहास कर रहे थे; परंतु वह उनकी तनिक भी परवा न करके उस वनमें आलस्यरहित होकर रात-दिन खोजता ही रहा। तदनन्तर तीन दिनोंतक अथक परिश्रम करनेके पश्चात् उसे उस जङ्गलमें एक महान् चिन्तामणि प्राप्त हुई, जो पूर्णिमाके चन्द्रमण्डल-सी आकार-प्रकार एवं प्रकाशवाली थी। उसे पाकर किरातका हृदय प्रसन्न हो गया और वह आनन्दपूर्वक घर लौट आया। वह चिन्तामणि जगत्‌के सम्पूर्ण ऐश्वर्यके समान थी। उसकी प्राप्ति हो जानेसे वह सुख-शान्तिपूर्वक रहने लगा। निष्पाप राम ! यह सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे अतीत है और शास्त्रोपदेशसे इन्द्रियसम्बन्धी वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, इसलिये गुरूपदेशसे आत्मज्ञान नहीं

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प्राप्ति नहीं होती अर्थात् आत्मज्ञानमें उपदेश कारण नहीं है। फिर भी गुरूपदेशके बिना आत्मतत्त्वकी प्राप्ति हो भी नहीं सकती; वह कृपण कौड़ीकी खोज न करता तो चिन्तामणिकी उपलब्धि उसे कैसे होती ! इसलिये जैसे चिन्तामणिकी प्राप्तिमें कौड़ीकी खोज कारण है, वैसे ही इस महान् अर्थरूप आत्मतत्त्वकी प्राप्तिमें गुरूपदेश पूर्णतया कारण न होनेपर भी कारणताको प्राप्त है। क्योंकि श्रीराम ! पुरुष कार्य तो कुछ और ही करता है और उसे उस कार्यका फल अन्य ही मिलता है। यह बात तीनों लोकोंमें देखी-सुनी जाती है; इसलिये आत्मज्ञानके अनन्तर इस काल्पनिक जगत्‌को अनासक्ति और निष्कामभावसे वहन करना ही श्रेयस्कर है।

राघव ! तदनन्तर राजा शिखिध्वज तत्त्वज्ञानरूप परमपदकी प्राप्तिके बिना वैसे ही अत्यन्त मोहको प्राप्त हो गये, जैसे संतानहीन पुरुष पुत्र-अभावरूपी तमसे अंधा-सा हो जाता है। उनका मन दुःखाग्निसे संतप्त हो उठा। अतः प्रियवर्गद्वारा लायी गयी भोग-सामग्रियाँ उन्हें आगकी लपट-सी प्रतीत होने लगीं। वैराग्यके कारण उनका मन उनमें तनिक भी सुखका अनुभव नहीं करता था। उन्हें अब एकान्त प्रदेशोंमें, निर्झर-तटोंपर और गुफाओंमें ही निवास करना वैसे ही अधिक रुचने लगा, जैसे व्याधके बाणप्रहारसे मुक्त हुआ जन्तु एकान्तमें छिपना ही पसंद करता है। रघुनन्दन ! राजा शिखिध्वज सान्त्वनापूर्वक अनुनय-विनय करनेवाले एवं समझाने-बुझानेवाले भृत्योंके प्रार्थना करनेपर दिनका सारा कामकाज करते थे। परंतु उनका वैराग्य प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था। उनकी बुद्धि अत्यन्त शान्त थी। वे परिव्राजककी भाँति रहते थे। इसलिये विशाल विषयभोगों तथा राज्यश्रीका उपभोग करनेमें उनका मन खिन्न हो जाता था। दूसरोंको मान देनेवाले श्रीराम ! वे देवकार्यके निमित्त तथा ब्राह्मणों और स्वजनोंके लिये गौ, भूमि और सुवर्ण आदिका खुले हाथों दान करने लगे। वे तप करनेके

हेतु कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंका अनुष्ठान तथा तीर्थों, वनों और आश्रमोंमें भ्रमण करने लगे। इतनेपर भी, उन्हें तनिक-सी भी शोकशून्य स्थिति वैसे ही नहीं प्राप्त हुई, जैसे धनार्थी पुरुषको खानरहित भूमिके खोदनेसे निधिकी प्राप्ति नहीं होती। इस प्रकार महान् बुद्धिमान् होते हुए भी राजा शिखिध्वज चिन्तारूपी अग्निसे संतप्त होकर सूखते जा रहे थे। तब वे संसाररूपी व्याधिकी औषधिके विषयमें विचार करने लगे। यों चिन्तापरवश होकर वे दीन हो गये। उन्हें अपना राज्य विष-सा प्रतीत होने लगा। इस प्रकार उनकी बुद्धि विषयोंसे खिन्न हो गयी, अतः बहुमूल्य भोगपदार्थ सामने रखे जानेपर भी वे वैराग्ययुक्त राजा उनकी ओर ताकते भी नहीं थे। इसी स्थितिमें एक दिन चूडाला महलमें बैठी हुई थी, तब राजा उससे मधुर वाणीमें बोले।

शिखिध्वजने कहा—सूक्ष्माङ्गी प्रिये ! मैंने बहुत दिनोंतक राज्यका उपभोग किया और विभवपूर्ण पदोंको

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चूडालाकी सिद्धिका वैभव, गुरुपदेशको सरलतामें किरातका आख्यान *


भी भोग लिया। अब मुझे वैराग्य हो गया है, अतः मैं वन जाना चाहता हूँ; क्योंकि वनवासी मुनिपर सांसारिक सुख, दुःख, आपत्ति, सम्पत्ति—ये कोई भी अपना अधिकार नहीं जमा सकते। न तो उन्हें देशके विनाशसे मोहपूर्वक दुःख होता है और न संग्राममें प्रजाजनोंका क्षय ही करना-कराना पड़ता है; अतः मैं वनवासी मुनियोंके सुखको राज्य-सुखकी अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट मानता हूँ। वैराग्ययुक्त मन जैसा एकान्तमें सुखका अनुभव करता है, वैसा सुख उसे न तो चन्द्रवदनी रमणियोंके मुखमण्डलोंमें मिलता है और न ब्रह्मा एवं इन्द्रके भवनोंमें ही प्राप्त होता है। इसलिये सुन्दरि ! मैंने जो यह वनगमनका उत्तम विचार किया है, इसमें बाधा डालना तुम्हारे लिये उचित नहीं है; क्योंकि कुलीन स्त्रियाँ स्वप्नमें भी पतिकी इच्छाको भङ्ग नहीं करतीं।

चूडाला बोली—नाथ ! जैसे वसन्त ऋतुमें पुष्पकी शोभा होती है और शरद् ऋतुमें पुष्प भला मालूम देता है, उसी तरह जिस कार्यके करनेका अवसर प्राप्त हो, उसीका सम्पादन करनेसे उनकी शोभा होती है, अकालके कार्यमें नहीं। इसलिये जिनके शरीर वृद्धभावको प्राप्त हो गये हैं, उन्हींके लिये वनका आश्रय लेना शोभनीय है, आप जैसे युवकोंके लिये नहीं। इसी कारण आपका यह विचार मुझे पसन्द नहीं है। प्रियतम ! जब वृद्धावस्था आनेपर हम दोनोंके सिरके बाल श्वेत पुष्पोंके समान बिल्कुल सफेद हो जायँगे, उस समय हम दोनों एक साथ ही घरसे निकलकर वनको चले चलेंगे। राजन् ! बिना समयके ही प्रजापालन रूप कर्मका परित्याग कर देनेवाले राजाके राज्यका विनाश हो जाता है और उसे महान् पापका भागी होना पड़ता है। समयानुकूल अवसरके ही कार्य करनेवाले राजाको प्रजाएँ रीझती हैं। इसी प्रकार न करनेयोग्य कार्यसे नौकर स्वामीको और स्वामी नौकरको परस्पर मना करते ही हैं।

शिखिध्वजने कहा—कमलनयनी प्रिये ! मेरे अभीष्ट कार्यमें विघ्न मत डालो। अब तुम मुझे यहाँसे दूर एकान्त वनमें गया हुआ ही समझो। अनिन्दिते ! कठोर-से-कठोर अङ्गवाली स्त्रियाँ भी वनवासके लिये उपयुक्त नहीं हो सकतीं, फिर तुम्हारे अङ्ग तो बहुत कोमल हैं। तुम अभी नवयुवती हो, अतः तुम्हें तो वनमें नहीं जाना चाहिये। वनवास तो पुरुषोंके लिये भी बड़ा कठिन होता है; अतः तुम्हें तो प्रजाका पालन करते हुए इस उत्तम राज्यमें ही रहना चाहिये; क्योंकि पतिके बाहर जानेपर कुटुम्बका भार वहन करना स्त्रीका धर्म है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! अपनी उस कल्याणप्राणप्रियासे ऐसा कहकर जितेन्द्रिय राजा शिखिध्वज स्नान करनेके लिये उठकर चल दिये और स्नान करके उन्होंने अपने सम्पूर्ण दैनिक कार्योंका सम्पादन किया। जब सायंकाल हुआ, तब पुनः संध्योपासन सम्पन्न करके तथा भोजन पूरा करके वे अपनी प्रिय पत्नी चूडालाके साथ शय्यापर सो गये। तदनन्तर आधी रातके समय जब चारों ओर सन्नाटा छा गया, सारी जनता गाढ़ निद्रामें लीन हो गयी,

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और कोमल बिछावनसे युक्त पलंगपर सोयी हुई चूडाला भी गाढ़ निद्रामें निमग्न हो गयी, तब जिस पलंगके आधे बिस्तरपर पत्नी सोयी हुई थी, उस पलंगसे राजा उठ खड़े हुए और 'हे राजलक्ष्मि ! तुम्हें नमस्कार है' यों कहकर अकेले ही अपने राजमहलसे चल पड़े ।

चलते-चलते वे महासागरमें प्रवेश करनेवाले नदकी तरह एक भयंकर अरण्यमें जा पहुँचे। पुनः प्रातःकाल होनेपर राजा शिखिध्वज वेगपूर्वक वहाँसे आगे चले और बारह दिनोंमें बहुत-से नगरों, देशों, पर्वतों और नदियोंको लाँघ गये ।

तत्पश्चात् वे मन्दराचलके तटवर्ती एक काननमें जा पहुँचे, जो मनुष्यके लिये अति दुर्गम था। वहाँसे मनुष्योंकी बस्ती और नगर अत्यन्त दूर पड़ते थे। वहाँ उन्होंने एक चौरस एवं शुद्ध स्थानमें, जो जलसे घिरा हुआ, शीतल, हरी-हरी घासोंसे आच्छादित होनेके कारण श्याम, स्निग्ध तथा फलोंसे लदे हुए वृक्षोंसे सम्पन्न था, मञ्जरीयुक्त लताओंसे बाँधकर अपने लिये एक पर्णशाला बना ली। फिर राजाने अपनी उस कुटियामें बाँसका चिकना डंडा, फलाहारके लिये पात्र, अर्घ्यपात्र, पुष्पपात्र, कमण्डलु, रुद्राक्षकी माला, शीतका निवारण करनेके लिये गुदड़ी, चटाई और मृगचर्म आदि लाकर यथास्थान रख दिये। इनके सिवा और भी जो कोई वस्तु तापस-कर्मोपयोगी प्रतीत हुई, राजाने उसे भी लाकर वहाँ रख लिया। फिर दिनके प्रथम प्रहरमें प्रातःकाल उन्होंने संध्यापूर्वक. जप और दूसरे प्रहरमें पुष्प आदिका संचय कर लेनेके बाद स्नान और देवार्चन किया। तत्पश्चात् कुछ जंगली फल, कन्दमूल और कमलदण्ड आदि खाकर उन जितेन्द्रिय नरेशने जपपरायण हो अकेले ही वह रात बितायी। इस प्रकार मन्दराचलकी तलहटीमें अपने द्वारा बनायी गयी पर्णशालाके भीतर बैठकर जप करते हुए मालव-नरेश शिखिध्वज खेदरहित होकर दिन बिताने लगे। वे अपने पूर्वानुभूत नित्य नूतन राजसी भोगविलासौंका कुछ भी स्मरण नहीं करते थे। भला, जिसके हृदयमें विवेकपूर्वक वैराग्यका उदय हो जायगा, उसके मनका अपहरण राज्यलक्ष्मियाँ कैसे कर सकती हैं !
( सर्ग ८३-८४)


सोकर उठी हुई चूडालाके द्वारा राजाकी खोज, वनमें राजाके दर्शन और राजाके भविष्यका विचार करके चूडालाका लौटना, नगरमें आकर राज्य-शासन करना, तदनन्तर कुछ समय बाद राजाको ज्ञानोपदेश देनेके लिये ब्राह्मणकुमारके वेषमें उनके पास जाना, राजाद्वारा उसका सत्कार और परस्पर वार्तालापके प्रसंगमें कुम्भद्वारा कुम्भकी उत्पत्ति, वृद्धि और ब्रह्माजीके साथ उसके समागमका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार राजा शिखिध्वज वनमें, एक तापसको जिन-जिन

वस्तुओंकी आवश्यकता पड़ती है, उन पदार्थोंका संग्रह करके कुटियामें रहने लगे । इधर घरपर चूडालाने क्या

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * सोकर उठी हुई चूडालाके द्वारा राजाकी खोज * ४५३

किया—अब उसे सुनो। आधी रातके समय जब राजा शिखिध्वज महलसे निकलकर दूर चले गये, तब अकस्मात् चूडालाकी नींद टूटी। वह तत्काल उठकर शय्यापर बैठ गयी और चिन्ताग्रस्त होकर यों विचार करने लगी—

'दुःखकी बात है, जो मेरे पतिदेव राज्यका परित्याग करके घरसे वनको चले गये; अतः अब मेरा यहाँ रहना किस कामका ! मैं भी उनके समीप ही जाऊँगी; क्योंकि ब्रह्माने स्त्रियोंके लिये पतिको ही एकमात्र गति निर्धारित किया है।' यों सोच-विचारकर चूडाला पतिका अनुगमन करनेके लिये उठ खड़ी हुई और झरोखेके रास्ते निकलकर आकाशमें जा पहुँची। वहाँ आकाशमण्डलमें स्थित होकर उसने अपने पतिको निर्जन वनमें भटकते देखा। फिर वह उनके भविष्यके विषयमें पूर्णरूपसे विचार करने लगी। राघव ! उसने अपने योगबलसे राजाको जैसे, जिस निमित्तसे, जिस देश और कालमें जितने कार्यका जिस रीतिसे सम्पादन तथा जिस प्रकार निर्वाणकी प्राप्ति आदि करनी होगी, उन सभी अवश्यंभावी विषयोंका योगके द्वारा अनुभव किया और फिर उन्हींके अनुकूल आचरण करनेके लिये वह ऐसा सोचकर आकाशसे लौट पड़ी कि दैवका यही निश्चित विधान मालूम पड़ता है कि कुछ कालके बाद ही मैं इनके समीप जाऊँ, अतः अभी मेरा वनमें जाना ठीक नहीं है। इस प्रकार निश्चय करके चूडालाने वहाँसे लौटकर पुनः अपने अन्तःपुरमें प्रवेश किया।

दूसरे दिन उसने ऐसी घोषणा करा दी कि 'किसी विशेष कारण वश महाराज इस समय बाहर गये हुए हैं।' इस प्रकार समस्त पुरवासी जनोंको आश्वासन देकर सुन्दरी चूडाला वहाँ रहने लगी। जैसे धानकी रखवाली करनेवाली स्त्री समयानुसार पके हुए धानके खेतकी रक्षा करती है, वैसे ही वह समतापूर्वक अपने स्वामीकी शासनप्रणालीके अनुसार राज्यकी देख-भाल करने लगी। इस प्रकार वनमें राजा शिखिध्वजके और अपने महलमें चूडालाके क्रमशः दिन, पक्ष, मास, ऋतु और वर्ष बीतने लगे। यों सुन्दरी चूडालाको राजमहलमें और शिखिध्वजको जंगली लताकुञ्जोंमें निवास करते अठारह वर्ष बीत गये। तदनन्तर बहुत वर्षोंतक उस महाशैलकी तलहटीमें निवास करते हुए राजा शिखिध्वज वृद्धावस्थाको प्राप्त हो गये। इधर चूडाला अपने पतिकी रागादि वासनाओंके परिपाकको लक्ष्य करके उतने कालतक प्रतीक्षा करती रही। जब वनमें रहते हुए जरावस्थासे युक्त राजा शिखिध्वजके बहुत-से वर्ष व्यतीत हो गये, तब पतिके प्रति अपने कर्त्तव्यकी भावनासे प्रेरित होकर चूडालाके मनमें ऐसा विचार उदय हुआ कि अब मेरे लिये पतिके समीप जानेका समय आ गया है। यों सोचकर वह मन्दराचलकी उपत्यकामें जानेके लिये तैयार हो गयी और रात्रिके समय अन्तःपुरसे निकलकर आकाशमार्गसे उड़ चली। यह वायुमण्डलमें होकर यात्रा कर रही थी। जब वह आकाशके मध्यमें पहुँची, तब उसने बादलोंमें चमकती हुई बिजलियोंका बारंबार अवलोकन किया। उस समय वह मन-ही-मन कहने लगी—'अहो ! प्राणियोंका स्वभाव जीवनपर्यन्त शान्त नहीं होता, इसी कारण आज मेरा भी मन उत्कण्ठित हो ही गया। किंतु सखे चित्त ! यह तुम्हारा कोई दोष नहीं है; क्योंकि तुम्हारी उत्कण्ठा तो अपने स्वामीके प्रति है न। फिर भी तुम उत्कण्ठासे परिपूर्ण होकर स्थित रहो, तुम्हारे भलीभाँति उत्कण्ठित होनेसे मेरा क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है; क्योंकि मेरे स्वामी तो अब तपस्वी हैं। अतः वे क्षीणकाय एवं वासनाशून्य हो गये होंगे। मैं तो ऐसा समझती हूँ कि उनका मन सब राज्य आदि भोगोंकी ओरसे उपरत हो गया होगा। जैसे वर्षाकालकी क्षुद्र नदी महानदमें मिलकर उसीमें विलीन हो जाती है, वैसे ही उनकी वासनालता महान् आत्मामें एकमेक हो गयी होगी। वे एकात्मा होकर एकान्तमें ही रम रहते होंगे तथा उन वीतरागकी वासनाएँ शान्त हो गयी होंगी।

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मेरे विचारमें तो ऐसा आता है कि अब मेरे स्वामीकी स्थिति सूखे वृक्षकी-सी हो गयी होगी। तथापि चित्त ! तुम्हें उत्कण्ठित होनेकी क्या आवश्यकता है। मैं स्वयं अपने योगबलसे पतिदेवकी बुद्धिको उद्बुद्ध करके उन्हें उत्कण्ठित कर दूँगी और फिर तुम्हारे साथ मिला दूँगी। मैं अपने मुनिरूप स्वामीके इच्छारहित मनको समतायुक्त बनाकर राज्यमें ही नियुक्त करूँगी और फिर हम दोनों चिरकालतक सुखपूर्वक निवास करेंगे । अहो ! निश्चय ही चिरकालके पश्चात् मैं इस शुभ मनोरथको प्राप्त करूँगी।

यों सोचकर चूडाला आकाशमार्गसे उड़ती हुई पर्वतों, देशों, मेघों तथा दिग्दिगन्तोंको लाँघकर मन्दराचलकी उस कन्दराके निकट जा पहुँची । वहाँ वह अदृश्यरूपसे आकाशमें ही स्थित रही । फिर वृक्षों और लताओंके स्पन्दनसे गमनागमनको सूचित करनेवाली वायुकी तरह उसने वनके भीतर प्रवेश किया। वहाँ उसने वनके किसी एक प्रदेशमें पर्णशाला बनाकर उसमें बैठे हुए अपने पतिको देखा । जो पहले हार, बाजूबंद, कड़े और कुण्डल आदिसे विभूषित होकर सुमेरुके समान कान्तिमान् दीखते थे, उन्हींको आज चूडालाने कृशकाय, कृष्णवर्ण तथा जीर्ण-शीर्ण पत्तेकी तरह शुष्क शरीरवाला देखा । उनके सिरपर जटाएँ बँध गयी थीं तथा शरीरपर वल्कल-वस्त्र शोभा दे रहा था । शान्त तो वे थे ही; अतः अकेले ही भूमिपर बैठकर पुष्पोंकी माला गूँथ रहे थे । उन्हें देखकर सर्वाङ्गसुन्दरी चूडालाका मन कुछ खिन्न हो गया; फिर वह मन-ही-मन कहने लगी—'अहो ! मेरे पतिकी यह कैसी अज्ञानभरी मूर्खता है। इसी मूर्खताके प्रसादसे ही ऐसी दशाएँ आया करती हैं । ये शोभाशाली नरेश मेरे परम प्रिय पति हैं। इनका हृदय गाढ़ मोहसे आहत हो गया है, इसी कारण ये इस दशाको प्राप्त हो गये हैं। अतः अब मैं इन्हें सर्वोत्तम ज्ञान प्रदान करनेके लिये अपने इस रूपका परित्याग करके किसी अन्य रूपसे इनके समीप जाऊँगी; क्योंकि यदि मैं इसी रूपसे जाती हूँ तो 'यह बाला मेरी प्रेयसी प्रिया है' यों समझ-कर ये मेरे कथनपर भलीभाँति ध्यान नहीं देंगे, इसलिये तपस्वीका वेष धारण करके इनके सामने उपस्थित होकर मैं क्षणभरमें इन्हें प्रबुद्ध कर दूँगी। इस समय मेरे स्वामीकी बुद्धि रागादि वासनाओंके परिपाक-से परिपक्व हो गयी है, अतः अब इनके निर्मल चित्तमें आत्मतत्त्व भलीभाँति प्रकट हो सकता है।' यों मन-ही-मन विचार करके चूडाला थोड़ी देरतक ध्यानमग्न हो गयी। फिर, तत्काल ही जल-तरङ्गकी तरह उसका रूप बदल गया और वह एक ब्राह्मणकुमारके रूपमें परिवर्तित हो गयी । फिर तो वह उसी रूपसे उस जङ्गलमें उतर पड़ी और अपने पतिदेवके सामने जाकर खड़ी हो गयी । उस समय उसका मुख मन्द मुसकानसे सुशोभित हो रहा था ।

उस द्विजपुत्रका शरीर तपाये हुए सुवर्णके समान गौरवर्णका था, कंधेपर शुक्ल यज्ञोपवीत लटक रहा था और

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वह दो निर्मल स्वच्छ वस्त्रोंसे आच्छादित था। इस प्रकार वह दूसरे वनसे आया हुआ मूर्तिमान् तप-सा ही प्रतीत होता था। उस शोभाशाली द्विजकुमारको अपने सामने देखकर राजा शिखिध्वजने समझा कि यह कोई देवपुत्र आया हुआ है, अतः वे अपनी खड़ाऊँ छोड़कर तुरंत ही उठ खड़े हुए और बोले—'देवपुत्र ! आपको नमस्कार है। आइये, इस आसनपर विराजिये।' यों कहकर उन्होंने अपने हाथसे उसके सामने एक पत्तेका आसन रख दिया। तब ब्राह्मणकुमारने भी कहा—'राजर्षे ! आपको प्रणाम है।'

शिखिध्वजने कहा—महाभाग देवपुत्र ! कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है ? आज मुझे जो आपका दर्शन प्राप्त हो गया, इससे मैं आजका दिन सफल समझता हूँ। मानद ! आपका कल्याण हो। आपके लिये यह अर्घ्य है, यह पाद्य है, ये पुष्प हैं और यह गूँथी हुई माला है--इन्हें आप ग्रहण करनेकी कृपा करें।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं-निष्पाप राम ! ऐसा कहकर राजा शिखिध्वजने ब्राह्मणकुमारके वेषमें आयी हुई अपनी उस प्रियतमा पत्नीको शास्त्रविधिके अनुसार अर्घ्य, पाद्य, पुष्प और माला आदि समर्पित किये।

तत्पश्चात् (ब्राह्मणकुमारके वेषमें) चूडाला बोली-सज्जनशिरोमणे ! आपने शान्त मनसे निर्वाण-प्राप्तिके लिये फलकी कामनासे रहित उत्कृष्ट तपका संचय तो कर लिया है न ? क्योंकि सौम्य ! आपने जो धन, धान्य-सम्पन्न राज्यका परित्याग करके महावनका आश्रय लिया है, आपका यह शान्त व्रत तलवारकी धारके समान है।

शिखिध्वजने कहा-भगवन् ! आपके लोकोत्तर चिह्न-स्वरूप सौन्दर्यसे ही ज्ञात हो रहा है कि आप कोई देवता हैं, इसीसे सब कुछ जानते हैं। इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है ? सौन्दर्यशाली देव ! अभी मेरी प्रियतमा भार्या वर्तमान है। आजकल वह मेरे राज्यका संचालन कर रही है। उसीके सारे अङ्गोंकी तरह आपके अङ्ग उद्भित हो रहे हैं। अभ्यागतका आदर-सत्कार करनेसे अपना जीवन सफल हो जाता है, इसलिये सत्पुरुष अभ्यागत-को देवतासे भी बढ़कर पूज्य मानते हैं। (इसी कारण मैंने आपका आतिथ्य किया है।) निर्मल चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखवाले देवपुत्र ! अब मेरे मनमें एक संशय है, उसका आप निवारण कीजिये। वह संशय यह है कि आप कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ! और मुझपर कृपा करके कहाँसे और किस लिये यहाँ पधारे हैं ?

ब्राह्मणकुमार बोला—राजन् ! आपके प्रश्नानुसार मैं सारी बातें कहता हूँ, सुनिये। इस जगन्मण्डलमें मुनिवर नारद रहते हैं। उनका हृदय परम विशुद्ध है। उनके शरीरका वर्ण पुण्यलक्ष्मीके कमनीय मुखमें सुशोभित कर्पूर-के तिलकके सदृश गौर है । किसी समय वे देवर्षि मेरुगिरिकी कन्दरामें स्नानार्थस्थित थे । उस गुहाके समीप ही उत्ताल तरङ्गोंवाली गङ्गाजी बह रही थीं, जिनका जल मेरुगिरिके सौन्दर्यसे उल्लसित हो रहा था, जिसमें वे

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हारकी तरह सुशोभित हो रही थीं। उसी गङ्गा नदीके तटपर एक बार ध्यानसे विरत होनेपर नारद मुनि बैठे थे, तबतक उन्हें कङ्कणोंकी झनकारसे युक्त जलक्रीडाकी कल-कल ध्वनि सुनायी पड़ी। सुनते ही उनके मनमें कुछ कुतूहल उत्पन्न हो गया और उन्होंने यह जानना चाहा कि यह क्या है। फिर तो कौतुकवश चारों ओर दृष्टि दौड़ानेपर उन्हें नदीमें रम्भा, तिलोत्तमा आदि अप्सराओंका दल दिखायी पड़ा, जो जलक्रीडासे निवृत्त होकर बाहर निकल रहा था। भींग जानेके कारण उनके समस्त अङ्ग ऊपरसे नीचेतक दीख रहे थे और ये परस्पर एक दूसरेमें प्रतिबिम्बित हो रहे थे, जिससे वे एक दूसरीके लिये दर्पण-सी बन गयी थीं। एक ही स्थानपर एकत्रित किये गये चन्द्रमण्डलके कलापुञ्जकी भाँति उस कमनीय नारीदलको देखकर जब सहसा नारदमुनिका चित्त क्षुब्ध हो उठा, तब उनका वीर्य स्खलित हो गया।

तदनन्तर नारदमुनिने अपने मनरूपी उन्मत्त गजराज-को विशुद्ध बुद्धिरूपी रस्सेसे विवेकरूपी सुदृढ़ आलानमें बाँध दिया और उस स्खलित हुए वीर्यको, जो प्रलय-कालीन अग्निके तापसे पिघले हुए चन्द्रद्रवके सदृश तथा पारद और सुवर्ण आदि शम्भुके दिव्य वीर्यके समान था, अपने पास ही पड़े हुए एक अद्भुत कान्तिमान् स्फटिक कुम्भमें स्थापित कर दिया। फिर उन्होंने उस कुम्भको अपने संकल्पजनित दूधसे परिपूर्ण कर दिया, कुछ ही दिनोंमें वह घटस्थित शुभ गर्भ वृद्धिको प्राप्त हो गया। फिर तो जैसे मास चन्द्रमाको तथा वसन्त ऋतु पुष्पोंको उत्पन्न करती है, उसी प्रकार समय आनेपर उस घटने एक कमलदल-सदृश नेत्रोंवाले बालकको जन्म दिया। कुम्भ-से वह बालक सम्पूर्ण अङ्गोंसे परिपूर्ण होकर निकला था। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो क्षीरसागरसे दूसरा क्षयरहित पूर्ण चन्द्रमा निकला हो। शुक्लपक्षके चन्द्रमाके समान वह कुछ ही दिनोंमें बढ़कर बडा हो गया। उसका शरीर अनुपम सौन्दर्यसे युक्त था। जब वह जातकर्म आदि सभी संस्कारोंसे सम्पन्न हो गया, तब मुनिवर नारदने अपना सारा विद्याधन उस बालकमें उसी प्रकार स्थापित कर दिया, जैसे एक पात्रमें रखा हुआ धन दूसरे पात्रमें उँडेल दिया जाता है। थोड़े ही दिनों-में वह सम्पूर्ण वाङ्मयका विशिष्ट ज्ञाता हो गया। इस प्रकार मुनिवर नारदने उसे अपना प्रतिबिम्ब-सा बना दिया।

तदनन्तर नारदजी अपने पुत्रको साथ लेकर ब्रह्मलोक-को गये और वहाँ उससे अपने पिता ब्रह्माजीके चरणोंमें अभिवादन करवाया। प्रणाम कर चुकनेके बाद ब्रह्माजीने अपने पौत्रसे परीक्षार्थ वेदादि शास्त्रोंके विषयमें प्रश्न किये और उनका समुचित उत्तर पानेपर उन्होंने उसे पकड़कर अपनी गोदमें बैठा दिया। फिर तो, उन कमलयोनिने उस कुम्भ नामवाले पौत्रको केवल आशीर्वाद देकर सर्वज्ञ तथा ज्ञानका पारगामी विद्वान् बना दिया। साधुशिरोमणे! वह कुम्भ मैं ही हूँ। कुम्भसे उत्पन्न होनेके कारण मेरा ही नाम कुम्भ पड़ा है। मैं नारदमुनिका पुत्र और पद्मजन्मा ब्रह्माका पौत्र हूँ। ब्रह्मलोक ही मेरा घर है। वहीं मैं अपने पिताजीके साथ सुखपूर्वक निवास करता हूँ। चारों वेद मेरे सुहृद् हैं। मैं किसी कार्यवश नहीं, बल्कि कौतुकवश स्वेच्छानुसार सभी लोकोंमें विचरता हूँ। जब मैं भूलोकमें विचरण करता हूँ, उस समय मेरे पैर भूतलपर नहीं पड़ते, धूलिकण अङ्गोंका स्पर्श नहीं करते और मेरा शरीर कभी मलिन नहीं होता। आज मैं आकाशमार्गसे जा रहा था कि सामने आप दिखायी पड़ गये, इसलिये यहाँ चला आया हूँ। वनवासके गुणों तथा तज्जन्य फलोंके ज्ञाता साधो ! इस प्रकार अपने अनुभवके अनुसार मैंने सारा-का-सारा वृत्तान्त आपको बतला दिया।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—मुने ! महर्षि वसिष्ठके इस प्रकार कहते-कहते वह दिन समाप्त हो गया। जब भगवान् सूर्य अस्ताचलकी ओर जाने लगे, तब वह सभा

निर्वाण-प्रकरण पू०] * राजा शिखिध्वजद्वारा कुम्भकी प्रशंसा, राजाद्वारा कुम्भका शिष्यत्व-स्वीकार * ४५९


विसर्जन हुई और सभी सभासद् मुनिवर वसिष्ठको नमस्कार करके सायंकालीन विधिका सम्पादन करनेके लिये स्नान करने चले गये और रात्रि व्यतीत होनेपर पुनः सूर्योदय होते-होते सभामें जुट गये । (सर्ग ८५-८६)

राजा शिखिध्वजद्वारा कुम्भकी प्रशंसा, कुम्भका ब्रह्माजीके द्वारा किये हुए ज्ञान और कर्मके विवेचनको सुनाना, राजाद्वारा कुम्भका शिष्यत्व-स्वीकार

राजा शिखिध्वजने कहा— 'देवकुमार ! मैं तो ऐसा समझता हूँ कि जैसे आँधी मेघोंको उड़ाकर पर्वतपर पहुँचा देती है, उसी प्रकार मेरी संचित पुण्यराशिने अप्रकटरूपसे फलदानोन्मुख होकर आपको यहाँ भेजा है। साधो ! आपके वचनोंसे तो मानो अमृत टपक रहा है, अतः आपके साथ आज जो मेरा समागम हो गया, इससे अब मैं धर्मात्माओंकी गणनामें सर्वप्रथम गिना जाऊँगा । प्रभो ! साधु-समागमसे चित्तको जैसी शान्ति उपलब्ध होती है, वैसी शान्ति राज्य-लाभ आदि कोई भी पदार्थ नहीं दे सकते; क्योंकि सत्सङ्ग होनेपर सामान्यरूपसे अपरिमित ब्रह्मानन्दरूप सुख प्रकट होने लगता है, जिससे कल्पनाजनित सुख प्रदान करनेवाले रागादि दोषोंका विचार ही नष्ट हो जाता है।

(देवपुत्रके वेषमें) चूडाला बोली— 'साधुश्रेष्ठ ! सुनिये इस कथाको । मैंने तो आपके प्रश्नानुसार अपना सारा वृत्तान्त आपको बता दिया । अब आप मुझे अपना परिचय दीजिये— आप कौन हैं ? इस पर्वतपर क्या कर रहे हैं ? आपको अरण्यवास करते कितना समय बीत गया और इससे आप अब कौन-सा कार्य सिद्ध करना चाहते हैं ?— यह सब बताइये ।

शिखिध्वजने कहा— भगवन् ! आप तो स्वयं ही देवकुमार हैं, अतः लोकवृत्तान्त और परमार्थतत्त्वके पूर्ण ज्ञाता हैं। मेरे विषयमें भी आप सब कुछ यथार्थ रूपसे जानते ही हैं, फिर, इसके अतिरिक्त मैं और क्या कहूँ। आर्य ! यद्यपि आप मुझे जानते हैं, फिर भी मैं आपसे अपना परिचय संक्षेपमें दे रहा हूँ, सुनिये । मैं शिखिध्वज नामका राजा हूँ और अपने राज्यका परित्याग करके यहाँ चला आया हूँ। मैं नाना-भयसे भीत हो गया हूँ, अतः इस वनमें निवास करता हूँ। तत्त्वज्ञ ! मुझे सबसे बड़ा भय तो इस बातका है कि कहीं संसारमें मेरा पुनर्जन्म न हो जाय । यद्यपि मैं दिग्दिगन्तोंमें भ्रमण कर रहा हूँ और कठोर तप भी कर रहा हूँ, तथापि मुझे अभी आन्तरिक शान्ति प्राप्त नहीं हुई है, शास्त्रोक्त प्रक्रियाका समुचित रूपसे सम्पादन करनेपर भी मुझे दुःख-पर-दुःख ही मिलते जा रहे हैं और मेरे लिये अमृत भी विषवत् हो गया है। (भगवन् ! इसका क्या कारण है ?)

(देवपुत्रके रूपमें) चूडाला बोली— सखा ! पहले किसी समय मैंने अपने पितामह ब्रह्माजीसे ऐसा प्रश्न किया था— 'प्रभो ! ज्ञान और कर्म— इन दोनोंमें जो एकमात्र श्रेयस्कर हो, उसे मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ।'

५५८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तब ब्रह्माजीने कहा— बेटा ! ज्ञान और कर्ममें ज्ञान ही परम श्रेयस्कर है; क्योंकि उससे भलीभाँति कैवल्य-स्वरूप परमात्माका साक्षात् अनुभव हो जाता है; परंतु पुत्र ! जिन्हें ज्ञान-दृष्टिकी प्राप्ति नहीं हुई है, उनके लिये कर्म ही सबसे बढ़कर है; क्योंकि जिसके पास रेशमी शाल नहीं है, वह क्या साधारण कम्बलको भी छोड़ देता है ? अज्ञानीके सभी कर्म सफल हैं अर्थात् जन्म-मरणरूप फल प्रदान करते हैं; क्योंकि कर्मोंकी सफलतामें प्रयोजक वासनाएँ उसमें बनी हुई हैं; परंतु जो ज्ञानसम्पन्न है, उसके सभी कर्म निष्फल हैं अर्थात् वे जन्म-मरणरूप फल नहीं देते; क्योंकि उसकी सारी वासनाएँ नष्ट हो चुकी हैं। जैसे ऋतु-परिवर्तनके समय पहली ऋतुके गुणोंका आगामी ऋतुमें विनाश हो जाता है, उसी तरह वासनाका क्षय हो जानेपर कर्मफल भी नष्ट हो जाता है। वत्स ! वास्तवमें वासना कार्यवस्तु है ही नहीं, किंतु जैसे मरुस्थलमें असत्यरूपसे जल प्रतीत होता है, उसी प्रकार वह मूर्खताके कारण अज्ञानीमें अहंकार आदिका रूप धारण करके असत्यरूपसे प्रकट होती है। परंतु 'सर्वं ब्रह्म—सब कुछ ब्रह्म ही है' ऐसी भावना करनेसे जिसके अज्ञानका नाश हो गया है, उसके मनमें वासना उत्पन्न ही नहीं होती। ठीक उसी तरह, जैसे बुद्धिमान् पुरुषको मरुस्थलमें जलकी भ्रान्ति नहीं होती। अपने भीतरसे वासनामात्राका पूर्णतया परित्याग कर देनेसे जीव जरा-मरणरहित एवं पुनर्जन्मशून्य परमपदको प्राप्त हो जाता है।

(देवपुत्रके रूपमें) चूडाला कहती है— राजर्षे ! इस प्रकार जब वे ब्रह्मा आदि महापुरुष भी ज्ञानको ही परमोत्कृष्ट श्रेय बतलाते हैं, तब आप उस ज्ञानसे रहित क्यों हैं ? भूपाल ! 'इधर कमण्डलु है, इधर दण्डकाष्ठ है, इधर कुशकी चटाई है'—ऐसे अनर्थोंसे परिपूर्ण इस संसारमें क्यों सुख मान रहे हैं ? राजन् ! मैं कौन हूँ ? यह जगत् कैसे उत्पन्न हुआ है और किस उपायसे इसकी शान्ति होगी ?— इन प्रश्नोंपर किसलिये आप विचार नहीं करते ? क्यों अज्ञानी बने बैठे हैं ? नरेश ! जो सगुण-निर्गुणरूप परमात्माके तत्त्वको जाननेवाले हैं, ऐसे महात्माओंके पास जाकर 'बन्धन कैसे हुआ और मोक्षका उपाय क्या है ?' यों प्रश्न करते हुए आप उनके चरणोंकी सेवा क्यों नहीं करते ? यहाँ पर्वतकी कन्दरामें बैठे इस कठोर तपस्यामें आप अपना जीवन क्यों बिता रहे हैं ? जिस युक्तिसे संसार-बन्धनसे मुक्ति मिलती है, वह तो समतापूर्ण दृष्टिवाले महात्माओंके पास जाकर उनसे पूछनेसे, उनकी सेवासे तथा उनके समागमसे ही उपलब्ध होती है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! उस देव-रूपिणी कान्ता चूडालाने जब इस प्रकार ज्ञानोपदेश किया, तब राजा शिखिध्वजकी आँखोंसे अश्रुधारा बहने लगी और वे इस प्रकार बोले।

शिखिध्वजने कहा—देवकुमार ! बहुत कालके पश्चात् आज आपने मुझे प्रबुद्ध कर दिया। अहो ! इतने दिनोंतक साधु समागमका परित्याग करके मैं इस वनमें निवास करता रहा, यह मेरी मूर्खताका परिचायक है। आप जो स्वयं ही यहाँ पधारकर मुझे ज्ञानोपदेश कर रहे हैं, इससे तो मैं समझता हूँ कि निश्चय ही मेरे सम्पूर्ण पापोंका विनाश हो गया। सुमुख ! अब आप ही मेरे गुरु हैं, आप ही मेरे पिता हैं और आप ही मेरे मित्र हैं। मैं आपका शिष्य हूँ और आपके चरणोंमें नतमस्तक हूँ, मुझपर कृपा कीजिये। भगवन् ! जिसे आप सर्वोत्तम समझते हों और जिसे जान लेनेपर फिर शोक नहीं करना पड़ता तथा जिसको प्राप्त करके मैं मुक्त हो जाऊँगा, उस परब्रह्म-तत्त्वका मुझे शीघ्र ही उपदेश दीजिये।

(देवपुत्रके रूपमें) चूडाला बोली—राजर्षे ! यदि आप मेरे वचनोंको उपादेय मानते हों अर्थात् उन्हें सुननेकी श्रद्धा रखते हों तब तो मैं अपनी जानकारीके अनुसार

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चिरकालकी तपस्यासे प्राप्त हुई चिन्तामणिका त्याग * ४५९

उस ब्रह्मका उपदेश करूँगा, अन्यथा कुछ भी नहीं कहूँगा; क्योंकि अश्रद्धालुके सामने कुछ कहना निरर्थक होता है । साथ ही जिनके वचनोंमें श्रोताकी श्रद्धा नहीं होती और जिससे कौतूहलसे प्रश्न किया जाता है, उस वक्ताके वचन निष्फल हो जाते हैं ।

शिखिध्वजने कहा—गुरुदेव ! मैं आपसे यह सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप जो कुछ उपदेश देंगे, मैं उसे वेदके विधि-वाक्यकी भाँति निश्चय ही तुरंत ग्रहण कर लूँगा ।

(देवपुत्रके रूपमें) चूडाला बोली—राजन् ! जैसे छोटा शिशु अपने पिताके वचनको बिना ननु-नच किये प्रमाणबुद्धिसे स्वीकार कर लेता है, वैसे ही आप भी मेरे इन वचनोंको ग्रहण कीजिये । राजन् ! सुनिये, मैं एक ऐसे मनोहर कथानकका वर्णन करूँगा, जो आपके चरित्रके सदृश है। वह चिरकालके पश्चात् उन्नति को प्राप्त होती हुई मन्दमतियोंकी बुद्धिको उद्बुद्ध करनेवाला है तथा उत्कृष्ट बुद्धिवालोंको शीघ्र ही भवभयसे उद्धार करनेवाला है । (सर्ग ८७)


चिरकालकी तपस्यासे प्राप्त हुई चिन्तामणिका त्याग करके मणिबुद्धिसे काँचको ग्रहण करनेकी कथा तथा विन्ध्यगिरिनिवासी हाथीका आख्यान

(देवपुत्रके रूपमें) चूडाला कहती है—राजन् ! एक श्रीसम्पन्न पुरुष था, जो कलाओंका ज्ञाता, अस्त्र-विद्यामें निपुण और व्यवहार करनेमें भी चतुर था । वह जिन-जिन कार्योंके करनेका संकल्प करता, उन्हें पूरा करके ही छोड़ता था । इतना होनेपर भी उसे परमपदका ज्ञान नहीं था । तब वह अनन्त प्रयत्नोंसे उपलब्ध होनेवाली चिन्तामणिकी प्राप्तिके लिये तपश्चर्यामें प्रवृत्त हुआ । उस दृढ़निश्चयी पुरुषके कुछ कालतक महान् प्रयत्न करनेपर चिन्तामणि प्रकट हुई । भला, उद्योगी पुरुषोंके लिये ऐसी कौन-सी वस्तु है जो सुलभ नहीं हो सकती, क्योंकि यदि अकिंचन भी कष्टकी परवा न करके अपनी बुद्धिके सहारे कार्यमें प्रवृत्त होकर उद्यम करता है तो उसे भी उस कार्यको निर्विघ्नतापूर्वक सम्पन्न करनेकी शक्ति प्राप्त हो जाती है । इस प्रकार उस उत्तम मणिराजके प्राप्त होनेपर वह यह निश्चय नहीं कर सका कि यह चिन्तामणि ही है । तब घोर दुःख और परिश्रमसे उपलब्ध हुई उस चिन्तामणिकी उपेक्षा करके वह अपने विस्मययुक्त मनसे यों विचार करने लगा—'यह चिन्तामणि है या नहीं है, क्योंकि यदि चिन्तामणि होती तो यह मेरे सामने प्रत्यक्ष नहीं

होती । मैं इसका स्पर्श करूँ या न करूँ ? कहीं ऐसा न हो कि यह मेरे छूनेसे अदृश्य हो जाय । निश्चय ही इतने ही समयमें उस वास्तविक मणिराजकी प्राप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि शास्त्रोंका कथन है कि उसके लिये जीवनपर्यन्त प्रयत्न करना पड़ता है । भला, मेरी ऐसी उत्कृष्ट भाग्य-सम्पत्ति कहाँ हो सकती है, जो इतने थोड़े कालमें सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्रदान करनेवाली उस चिन्तामणिको मैं पा लूँ । मेरी तपस्या तो बहुत थोड़ी है। मैं साधुओंमें एक तुच्छ मनुष्य हूँ और दुर्भाग्यका एकमात्र पात्र हूँ। ऐसी स्थितिमें सिद्धियाँ मेरे निकट कैसे आ सकती हैं ?'

इस प्रकार वह मूर्ख तर्क-वितर्कोंके हिंडोलेमें झूलता हुआ बहुत देरतक विचार करता रहा । अन्ततो-गत्वा उसने उस मणिके ग्रहण करनेका विचार छोड़ दिया; क्योंकि मूर्खताके कारण उसकी बुद्धि नष्ट हो गयी थी । ऐसा नियम भी है कि जो वस्तु जिसे जिस समय (प्रारब्धके कारण) प्राप्तव्य नहीं होती, वह उसे उस समय पा नहीं सकता । देखो न, उस दुर्बुद्धिने प्राप्त हुई चिन्तामणिकी भी उपेक्षा कर दी । इस प्रकार जब वह तर्क-वितर्क करता ही रह गया, तब वह मणि उड़कर वहाँसे अदृश्य हो गयी, क्योंकि

४६० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ


अवहेलना करनेवालेको सिद्धियाँ उसी प्रकार छोड़ देती हैं, जैसे धनुषसे छोड़ा हुआ बाण प्रत्यञ्चाका परित्याग कर देता है । सिद्धियाँ जब आती हैं, तब वे सभी अभीष्ट पदार्थोंको देती रहती हैं, परंतु अवहेलना करनेपर जब वे वापस जाने लगती हैं, उस समय वे उस पुरुषकी बुद्धिका विनाश कर डालती हैं ।

इस प्रकार उस चिन्तामणिके अदृश्य हो जानेपर वह पुनः उस उत्तम रत्नकी प्राप्तिके लिये यत्न- पूर्वक चेष्टा करने लगा; क्योंकि अटल निश्चयवाले मनुष्य अपने कार्यसे उद्विग्न नहीं होते । कुछ समयके बाद उसे अत्यन्त कान्तिमान् एक काँचका टुकड़ा दिखायी पड़ा । फिर तो, जैसे मोहग्रस्त अज्ञानी पुरुष मिट्टीको सुवर्ण समझने लगता है, उसी प्रकार उस मूर्खने 'यही चिन्तामणि है' यों निश्चय करके उसकी उपादेयता स्वीकार कर ली । उस काँचकी मणिको लेकर उसने सोचा कि अब तो इस चिन्तामणिके प्रभावसे मुझे सारी अभीष्ट वस्तुएँ अनायास ही मिल जायँगी, फिर इन धन- सम्पत्तियोंको लेकर क्या करना है—ऐसा विचारकर उसने अपनी पहली सम्पत्तिका त्याग कर दिया । उसे विश्वास हो गया कि 'अब तो घरसे दूर जाकर इच्छानुसार सम्पत्ति-सम्पन्न होकर मैं सुखपूर्वक जीवन-यापन करूँगा— ऐसी धारणा करके वह मूर्ख निर्जन काननमें चला गया । वहाँ पहुँचनेपर, उसे उस काँच-खण्डसे कुछ मिलना- जुलना तो था ही नहीं, वह भारी विपत्तिमें फँस गया । मूर्खताके कारण जैसे दुःख मनुष्यके सामने आते हैं, वैसे दुःख तो भीषण आपत्तियोंमें फँसनेपर, बुढ़ापेसे तथा मृत्युसे भी नहीं प्राप्त होते । अतः एकमात्र मूर्खता ही सम्पूर्ण दुःखोंकी प्राप्तिमें कारण है ।

भूपाल ! अब यह दूसरा मनोहर उपाख्यान सुनो । साधो ! यह आपके वृत्तान्तके ही अनुरूप है और बुद्धिको परमोत्कृष्ट ज्ञान प्रदान करनेवाला है । राजन् ! विन्ध्यगिरिके किसी वनमें एक हाथी रहता था, जो बड़े-बड़े यूथपतियोंके यूथका भी अधिपति था । उसके दोनों दाँत बहुत सफेद और लंबे थे तथा वज्रकी ज्वालाके समान चमकीले एवं तीक्ष्ण थे । एक बार एक महावतने उसे चारों ओरसे लोहेकी शृङ्खलासे जकड़कर वैसे ही बाँध दिया, जैसे मुनिवर अगस्त्यने विन्ध्याचलको और उपेन्द्रने असुरराज बलिको बाँध दिया था । बँधा तो वह था ही, ऊपरसे उसके गण्डस्थलोंपर शङ्खोंकी मार भी पड़ रही थी, जिससे वह धैर्यशाली गजराज भीषण यन्त्रणा भोग रहा था । उसे बड़ी पीड़ा हो रही थी । इस प्रकार लोहेकी जंजीरमें बँधे हुए उस गजराजको जब तीन दिन बीत गये, तब उसे बड़ा खेद हुआ और उस बन्धनको तोड़ डालनेके लिये तैयार होकर उसने चिग्घाड़ना शुरू किया । फिर तो चार ही घड़ीमें घोर प्रयास करके उस हाथीने अपने दोनों दाँतोंसे बन्धनको छिन्न-भिन्न कर दिया । उसका शत्रु महावत दूरसे ही उसकी बन्धन-छेदन-क्रियाको देख रहा था । जब उस हाथीका बन्धन टूट गया, तब वह महावत पहले एक ताड़वृक्षपर चढ़कर वहींसे अंकुशद्वारा उस हाथीको वशमें करनेके लिये उसके सिरको लक्ष्य करके कूद पड़ा; परंतु उसके पैर हाथीके सिरपर नहीं पहुँच सके, जिससे वह घबराकर भूमिपर गिर पड़ा ।

राजन्यै ! तिर्यग्-योनिमें भी प्रकाशमान एवं विशुद्ध गुणोंसे युक्त साधु-स्वभाववाले जीव देखे जाते हैं, इसीलिये अपने शत्रुभूत महावतको सामने गिरा हुआ देखकर उस गजराजके हृदयमें करुणा उत्पन्न हो गयी । वह सोचने लगा—'यदि मैं इस गिरे हुएको पैरोंसे कुचल दूँ तो इससे मेरा कौन-सा पुरुषार्थ सिद्ध होगा ।' यों विचारकर हाथीने अपने शत्रुभूत उस महावतके प्राण नहीं लिये । जब वह हाथी वहाँसे जंगलकी ओर चला गया, तब महावत उठ बैठा । उसका शरीर और बुद्धि—दोनों स्वस्थ थे । हाथीके जानेके साथ-ही-साथ

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * कुम्भद्वारा चिन्तामणि और काँचके तथा हाथीके रहस्यका वर्णन * ४६१

उसकी व्यथा भी दूर हो गयी। इतने ऊँचे ताड़वृक्षकी चोटीसे गिरनेपर भी उसका अङ्ग-भङ्ग नहीं हुआ था। वह पैदल चलनेमें बड़ा उत्साही था। इस प्रकार जब उस हाथीके शत्रु महावतका प्रयोजन सिद्ध नहीं हुआ और हाथी उसके हाथसे निकल गया, तब उसे महान् दुःख हुआ। वह पुनः यत्नपूर्वक वनमें झाड़ियोंमें छिपे हुए उस हाथीकी खोज करने लगा। चिरकालके पश्चात् उसे वही गजराज मिला, जो एक जंगलमें वृक्षके नीचे बैठकर विश्राम कर रहा था। तब उस धूर्त महावतने, जहाँ वह हाथी बैठा था, उसके समीप ही हाथीके फँसाने योग्य एक गोलाकार गड्ढा खोदकर तैयार किया और ऊपरसे उसे कोमल लताओंसे ढक दिया।

कुछ ही दिनोंके बाद जब वह हाथी वनमें विहार कर रहा था कि यकायक उसी गड्ढेमें जा गिरा। तब उस महावतने गड्ढेमें गिरे हुए उस हाथीको पुनः सुदृढ़रूपसे बाँध दिया, जो आज भी भूगर्भमें पड़ा दुःख भोग रहा है। यदि वह हाथी अपने सामने गिरे हुए शत्रुको पहले ही मार डाले होता तो आज उसे शत्रु-द्वारा गर्तबन्धनरूप दुःखकी प्राप्ति नहीं हुई होती। जो मनुष्य मूर्खतावश वर्तमान क्रियाओंद्वारा आगामी कालका शोधन नहीं कर लेता, वह विन्ध्यगिरिनिवासी गजराजकी भाँति ही दुःखका भागी होता है। वह हाथी 'मैं शृङ्खलाबन्धनसे मुक्त हो गया हूँ' इतने मात्रसे ही संतुष्ट हो गया; परंतु दूर चले जानेपर भी वह पुनः अज्ञानवश बन्धनमें पड़ गया। भला, मूर्खता कहाँ नहीं बाधा पहुँचाती अर्थात् सर्वत्र बाधा देती ही है। महात्मन् ! 'बद्ध हुआ भी मैं बन्धनरहित हूँ' इस प्रकारकी चित्तगत मूर्खताको ही परम बन्धन समझना चाहिये। अतः उससे छुटकारा पानेके लिये परमात्माके स्वरूपसे उत्पन्न सम्पूर्ण त्रिलोकीको परमात्माका स्वरूप समझना चाहिये। जिसे इस प्रकारका ज्ञान नहीं है और जो मूर्खतामें स्थित है, उसके लिये वह स्वयं ही सहसा समस्त बन्धनोंका कारण बन जाता है। (सर्ग ८८-८९)


कुम्भद्वारा चिन्तामणि और काँचके आख्यानके तथा विन्ध्यगिरिनिवासी हाथीके उपाख्यानके रहस्यका वर्णन

राजा शिखिध्वजने कहा—देवपुत्र ! आपने चिन्ता-मणिकी प्राप्ति तथा विन्ध्यगिरिनिवासी गजराजके बन्धन आदिका जो कथाप्रसङ्ग मुझे सुनाया है, उसका अब स्पष्टीकरण कीजिये।

(देवपुत्रके रूपमें) चूडाला बोली—राजन् ! मैंने आपको जो विचित्र कथा सुनायी थी, उसका रहस्य भी सुनिये। महीपते ! उसमें जो वह शास्त्रार्थकुशल किंतु तत्त्वज्ञानमें मूर्ख चिन्तामणिका साधक बतलाया गया है, वह तो आप ही हैं। साधो ! अकृत्रिम सर्वस्व-त्यागको चिन्तामणि समझिये, जो सम्पूर्ण दुःखोंका अन्त करने-वाली है। शुद्ध बुद्धिपूर्वक आप उसीका साधन कर रहे हैं। किंतु निष्पाप राजन् ! वास्तविक शुद्ध सर्व-त्यागसे ही सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, कृत्रिम त्यागसे नहीं। यद्यपि आपने स्त्री-पुत्र धन-दौलत और बन्धु-बान्धवोंसहित सम्पूर्ण राज्यका परित्याग कर दिया है और अपने देशसे बहुत दूर आकर इस आश्रममें अपना निवासस्थान बनाया है तथापि आपके इस सर्वस्व-त्यागमें अभी अहंकारका त्याग शेष रह गया है। अभी आपके मनमें ऐसी धारणा बनी हुई है कि यह सर्वस्व-त्याग वह महान् अभ्युदयशाली परमानन्द नहीं है। वह तो इससे भी उत्कृष्ट कोई दूसरी महान् वस्तु है, जो चिरकालकी साधनासे उपलब्ध होती है। ऐसी चिन्ता करनेसे धीरे-धीरे जब आपके स्वरूप-ग्रहणमें पर्याप्त वृद्धि हो गयी, तब वह त्याग कहीं कटकर नष्ट-

५६२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

गया। जैसे वायुके स्पन्दनसे युक्त वृक्षका निश्चल रहना असम्भव है, वैसे ही जो थोड़ी-सी भी चिन्ता-को अपने हृदयमें स्थान देता है, उसका त्याग कैसे सिद्ध हो सकता है !

राजन् ! चिन्ता ही चित्त कहलाती है । संकल्प तो उस चित्तका दूसरा नाम है । भला, उस चिन्ताके स्फुरित रहते हुए वस्तुतः चित्तका त्याग कैसे सम्भव है ? साधुशिरोमणे ! क्षणभरमें ही त्रिलोकीके आधार-भूत चित्तके चिन्ताग्रस्त हो जानेपर निरञ्जन सर्वत्यागकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? आपका प्राप्त किया हुआ चिन्ता-मणिरूप त्याग, अवहेलना कर देनेसे आपकी सारी उत्कृष्ट निश्चिन्तताको लेकर चला गया । कमलोचन ! इस प्रकार सर्वत्यागरूपी चिन्तामणिके चले जानेपर आपने अपने संकल्परूपी नेत्रोंसे देखकर तपरूपी काँचको ही चिन्तामणि समझ लिया । जैसे दृष्टिभ्रम हो जानेपर जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमामें वास्तविक चन्द्रमाकी भावना हो जाती है, वैसे ही आपने इस दुःखभूत तपस्यामें ही दृढ़ ग्राह्यभावना कर ली है । पहले तो आपने मनको वासनाशून्य करके अनासक्त भावसे सर्वत्यागका उपक्रम किया और पीछे वासनायुक्त होकर अनन्त तपस्याकी क्रिया स्वीकार कर ली । इस क्रियामें तो दुःख-ही-दुःख है। साधो ! अब तो आप वर्धमान दुःखोंसे परिपूर्ण राज्यरूपी फंदेसे निकलकर वनवास नामक एक दूसरे सुदृढ़ बन्धनसे बँध गये हैं। इस समय आपको शीत, वात और आतप आदिकी चिन्ता पहलेसे दुगुनी हो गयी है। मैं तो यह समझता हूँ कि वनवासके गुण-दोषकी जानकारी न रखनेवालोंके लिये वनवास बन्धनसे भी अधिक कष्टप्रद हो जाता है। आपको मिला तो है काँचका टुकड़ा, परंतु आप समझ रहे हैं कि मुझे चिन्तामणि मिल गयी। कमलोचन नरेश ! इस प्रकार मैंने मणि-प्राप्तिके प्रयत्नकी कथाके सदृश आपके चरित्रको सम्यक्रूपसे आपके सामने प्रकट कर दिया । अब आप स्वयं ही अपनी बुद्धिसे उस निर्मलबोध्य वस्तुका विचार कीजिये तथा सर्व त्याग और तपस्या—इन दोनोंमें आपको जो उत्तम प्रतीत हो, उसे हृदयमें धारण करके परिपक्व बनाइये ।

राजसिंह ! अब आप पूर्ण तत्त्वबोधके लिये विन्ध्य-गिरि-निवासी गजेन्द्रके वृत्तान्तकी व्याख्या सुनिये । वह बड़ी ही आश्चर्यजनक है । मैंने विन्ध्याचलके वनमें निवास करनेवाले जिस हाथीका वर्णन किया था, वही इस भूमिपर आप हैं । उसके जो दो श्वेतवर्णके दाँत थे, वे ही आपके वैराग्य और विवेक हैं । हाथीको आक्रान्त करनेमें तत्पर जो वह महावत था; वह आपका अज्ञान है, जो आपको दुःख दे रहा है । राजन् ! जैसे अत्यन्त बलशाली हाथीको निर्बल महावत दुःख दे रहा था, उसी प्रकार, यद्यपि आप अत्यन्त शक्ति-सम्पन्न हैं तथापि मूर्खतारूपी दुर्बल महावत आपको एक दुःखसे दूसरे दुःखमें तथा एक भयसे दूसरे भयमें पहुँचा रहा है । जिस वज्र-सदृश सुदृढ़ लोह-श्रृंखलासे वह हाथी बाँधा गया था, वह श्रृंखला आपका आशापाश है, जिससे आप सिरसे पैरतक बँधे हैं । राजर्षे ! आशा लोहकी जंजीरसे भी बढ़कर भयंकर, विशाल और सुदृढ़ होती है; क्योंकि लोह तो काल पाकर पुराना होनेपर नष्ट भी हो जाता है, परंतु आशा-तृष्णा तो दिनोंदिन बढ़ती ही चली जाती है। वहाँ पास ही छिपकर बैठा हुआ जो शत्रु महावत उस हाथीकी ओर देख रहा था, वह महावत आपका अज्ञान* है, जो एकाकी बँधे हुए आपकी ओर क्रीडाके लिये आँख लगाये हुए है । साधो ! हाथीने जो शत्रुद्वारा किये गये श्रृंखला-बन्धनको तोड़ डाला था, वह आपके भोग एवं अकण्टक राज्यके त्यागके समान है; क्योंकि शत्रु और श्रृंखलाबन्धनका तोड़ डालना तो कदाचित् आसान भी हो सकता है, किंतु मनसे भोगोंकी आशाका निवारण


* यह अज्ञानमें चेतनतत्त्वका आरोप करके कहा गया है।

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * कुम्भकी बातें सुनकर सर्वत्यागके लिये उद्यत शिखिध्वज * ९६३

करना अत्यन्त दुष्कर है। जैसे हाथीद्वारा बन्धन तोड़ दिये जानेपर महावत ऊपरसे गिर पड़ा था, उसी तरह आपके राज्यका परित्याग कर देनेपर अज्ञानका पतन हो गया था। जिस समय आप वनके लिये प्रस्थित हुए थे, उसी समय आपने अज्ञानको क्षत-विक्षत कर दिया था, परंतु घायल होकर सामने पड़े हुए उसका मनस्त्यागरूपी महान् खड्गद्वारा वध नहीं किया। यही कारण है कि वह पुनः उठ खड़ा हुआ और आपके द्वारा की गयी अपनी पराजयका स्मरण करके उसने आपको इस तपःप्रपञ्चरूपी भीषण गड्ढेमें ढकेल दिया। यदि आपने राज्य-त्याग करते समय ही वैसी दुरवस्थामें पड़े हुए अज्ञानका वध कर दिया होता तो वह उसी समय नष्ट हो गया होता, फिर वह आपको तपरूपी गर्तमें नहीं गिरा पाता। राजन् ! हाथीके वैरी उस महावतने जो गोलाकार गड्ढेका निर्माण किया था, वह आपके अज्ञानने तपरूपी सम्पूर्ण दुःखोंका गर्त बनाकर आपको समर्पित किया है। वह गड्ढा जो कोमल तृणोंसे आच्छादित किया गया था, वह आपका तपोवन ही स्वतः गुणों तथा सज्जनोंके समागमसे आवृत है। नरेश ! इस प्रकार आज भी आप इस अत्यन्त भयंकर तथा दुःखदायक तपरूपी गर्तमें बँधे हुए पड़े हैं। भूपाल ! आप गज हैं, आशाएँ जंजीर हैं, अज्ञान शत्रुभूत महावत है, उग्र तपस्याका आग्रह ही गर्त है, भूतह विन्ध्यगिरि है। इस प्रकार मैंने आपका वृत्तान्त हाथीके उपाख्यानद्वारा कह सुनाया, अब आप जैसा करना उचित समझें, वैसा ही कीजिये। (सर्ग ९०-९१)


कुम्भकी बातें सुनकर सर्वत्यागके लिये उद्यत हुए राजा शिखिध्वजद्वारा अपनी सारी उपयोगी वस्तुओंका अग्निमें झोंकना, पुनः देहत्यागके लिये उद्यत हुए राजाको कुम्भद्वारा चित्त-त्यागका उपदेश

(देवपुत्रके रूपमें) चूडालाने कहा—राजर्षे ! चूडाला बड़ी नीतिनिपुण तथा ज्ञेय वस्तुके ज्ञानसे सम्पन्न है, उसने उस समय जिस ज्ञानका उपदेश दिया था, उसे आपने क्यों नहीं स्वीकार किया ? वह तत्त्वज्ञानियोंमें सर्वश्रेष्ठ है तथा जो कुछ कहती और करती है, वह सब सत्य ही होता है; अतः आपको उसके कथनका आदर-पूर्वक पालन करना उचित था। नरेश्वर ! यदि आपने चूडालाके वचनका आदर नहीं किया तो सर्वत्यागका ही पूर्णरूपसे आश्रय क्यों नहीं लिया ?

राजा शिखिध्वज बोले—प्रियवर ! मैंने राज्य छोड़ा, घर छोड़ा, धन-धान्यसम्पन्न देश छोड़ा, पत्नी भी त्याग दी; फिर भी आप कहते हैं सर्वत्याग क्यों नहीं किया—इसका क्या कारण है ?

(देवपुत्रके रूपमें) चूडालाने कहा—राजन् ! धन, स्त्री, गृह, राज्य, भूमि, छत्र और बन्धुबान्धव—ये सब आपके तो हैं नहीं; फिर आपका सर्वत्याग हुआ कैसे ? आपका जो सबसे उत्तम भाग है, उसका त्याग तो अभी हुआ ही नहीं। उसका पूर्णरूपसे परित्याग कर देनेपर ही आप सर्वत्यागी शोकरहित हो सकेंगे।

राजा शिखिध्वज बोले--देव ! अच्छा, यदि आप ऐसा मानते हैं कि यह सारा राजपाट मेरा नहीं है तो पर्वत, वृक्ष और लताओंसे परिपूर्ण यह सम्पूर्ण वन तो मेरा है न ? मैं इसीका परित्याग कर रहा हूँ।

कुम्भने कहा--राजन् ! यह पर्वतका तट, वन, गर्त, जल और वृक्षके नीचेकी भूमि—ये सब आपके तो हैं नहीं; फिर आपका सर्वत्याग कैसे सम्पन्न हुआ ! आपका जो सबसे उत्तम भाग है, वह तो अभी बिना त्यागा हुआ ही पड़ा है। उसका पूर्णरूपसे त्याग कर

४६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

देनेपर ही आप परम अशोक-पदको प्राप्त कर सकेंगे।

शिखिध्वज बोले—अच्छा, यदि ये वन आदि सारी वस्तुएँ मेरी नहीं हैं तो बावली और चबूतरा आदिसे युक्त यह मेरा आश्रम ही मेरा सर्वस्व है। मैं इसका अभी त्याग किये देता हूँ।

कुम्भने कहा—राजन् ! ये जो वृक्ष, बावली (जलाशय), चबूतरा, गुल्म, आश्रम और लताओंकी पंक्तियाँ हैं, इनमेंसे कुछ भी आपका नहीं है; फिर आपका सर्वत्याग कैसे सिद्ध हुआ ? अभी तो आपका सबसे उत्तम भाग पड़ा ही है, आपने उसका त्याग किया ही नहीं। उसका पूर्णरूपसे त्याग कर देनेपर ही आपको उत्कृष्ट अशोक-पद मिल सकेगा।

शिखिध्वज बोले—ठीक है, यदि ये सारी वस्तुएँ मेरी नहीं हैं तो ये पात्र आदि तथा मृगचर्म, दीवाल और कुटीर आदि ही मेरे सर्वस्व हैं। मैं इन्हींको छोड़ रहा हूँ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा कहकर राजा शिखिध्वजने भाण्ड आदि उन समस्त सामग्रियोंको आश्रमसे निकालकर एक जगह स्थापित किया, फिर सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करके अग्नि प्रज्वलित की और उन सभी वस्तुओंको उस आगमें डालकर वे पुनः अपने आसनपर बैठ गये। तत्पश्चात् उन्होंने अक्षमाला तथा मृगचर्मको भी उसी आगमें झोंक दिया और कमण्डलु एक श्रोत्रिय ब्राह्मणको दे दिया; क्योंकि ऐसा नियम है कि अपनी जो उत्तम वस्तु हो, उसे या तो किसी महात्माको दे दे अथवा अग्निमें जला दे। फिर राजाने अपनी कोमल चटाईको भी चित्तशुद्धि तथा चेतन ब्रह्ममें विश्राम प्राप्तिके लिये उसी धधकती आगमें फेंक दिया। फिर कुम्भको सम्बोधन करके वे बोले—'कुम्भ ! जो वस्तु त्याज्य है, उसे सदा शीघ्र-से-शीघ्र त्याग देना चाहिये। साधो ! मैं निष्क्रिय होनेके लिये अपनी क्रियोपयोगी सारी वस्तुओंका त्याग कर रहा हूँ; क्योंकि अयोग्य वस्तुको कौन ढोता फिरे।'

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तदनन्तर राजा शिखिध्वजने अपनी सूखी फूसकी कुटियाको, जो अपने अज्ञानी मनके मिथ्याभूत संकल्पद्वारा कल्पित थी, जलाकर भस्म कर दिया। उन मौनी राजाकी बुद्धि समतायुक्त हो गयी थी और मन उद्वेगरहित हो गया था, अतः उन्होंने वहाँ जो कुछ भी सामग्री शेष रह गयी थी, उस सबको क्रमशः जला दिया। यहाँतक कि उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक अपनी लँगोटी और भोजनपात्र तथा भोजन आदिको भी फूँक दिया। जब सूखी लकड़ीके साथ-साथ वे बर्तन आदि सारे पदार्थ आगमें जल रहे थे, उस समय जिनका देहमात्र शेष रह गया था वे राजा शिखिध्वज रागरहित हो प्रसन्नतापूर्वक बोले।

शिखिध्वजने कहा—देवकुमार ! आश्चर्य है, चिरकालके पश्चात् आपने अपने ज्ञानोपदेशद्वारा मुझे प्रबुद्ध कर दिया, जिससे अब मैं वस्तु-विषयक वासनाका परित्याग करके सर्वत्यागी होकर स्थित हूँ तथा केवल, शुद्ध, सुखसे सम्पन्न और ज्ञानवान् हो गया हूँ। जिसमें ममता-संकल्पप्रयुक्त संग्रहक्रम वर्तमान है, ऐसी यह सामग्री किस कामकी। अब तो नाना प्रकारके बन्धनोंके हेतुभूत विषय ज्यों-ज्यों प्रक्षीण होते जा रहे हैं, त्यों त्यों मेरा मन परमानन्दमें निमग्न होता जा रहा है। मुझे शान्ति मिल रही है। मैं परमानन्दरूपको प्राप्त हो रहा हूँ और विजयी हो रहा हूँ; अतः अब मैं पूर्ण सुखी हूँ। मेरे सम्पूर्ण बन्धन नष्ट हो गये; क्योंकि मैंने सर्वत्याग कर दिया। देवपुत्र ! महान् त्याग करनेके कारण अब दिशाएँ ही मेरे लिये वस्त्र हैं और दिशाएँ ही मेरे लिये घर हैं। यहाँतक कि मैं स्वयं ही दिशाओंके समान स्थित हूँ। अब बताइये और क्या शेष रह गया है !

कुम्भने कहा—महाराज शिखिध्वज ! अभी भी आपने सभी वस्तुओंका पूर्णतया त्याग नहीं किया है,

[ निर्वाण-प्रकरण पू० ] * कुम्भकी बातें सुनकर सर्वत्यागके लिये उद्यत शिखिध्वज * ४६५

'अतः सर्वत्यागजन्य परमानन्दकी प्राप्तिका व्यर्थ ही अभिनय मत कीजिये। अपने सर्वोत्तम भागका तो अभी आपने त्याग किया ही नहीं, जिसके पूर्णतः त्याग करनेसे ही आपको परम अशोक-पदकी प्राप्ति हो सकेगी।

शिखिध्वज बोले—देवतात्मज ! अब तो सर्वत्यागमें मेरा यह शरीर, जो रक्त-मांसमय तथा इन्द्रियसे युक्त है, शेष रह गया है; इसलिये अब मैं पुनः उठकर बिना किसी विघ्न-बाधाके इस शरीरको गड्ढेमें गिराकर विनष्ट कर दूँगा और सर्वत्यागी हो जाऊँगा।

कुम्भने कहा—राजन् ! इस बेचारे निरपराध शरीरको आप क्यों महान् गर्तमें गिराना चाहते हैं ? आप तो उस अज्ञानी बैलके सदृश प्रतीत होते हैं, जो कुपित होनेपर अपने बछड़ेको ही मारता है। यह बेचारा शरीर तो जड़, तुच्छ और मूकात्मा है। सदा ध्यानस्थ-सा बना रहता है। इसने आपका कोई अपराध भी नहीं किया है, अतः व्यर्थ ही आप इसका त्याग मत कीजिये। जैसे वायुद्वारा

स्पन्दन (फलादिका पतन) होनेपर फलवान् वृक्षका कोई अपराध नहीं माना जाता, उसी प्रकार सुख-दुःख आदिका अनुभव-स्थान होनेमात्रसे शरीरको अपराधी नहीं कहा जा सकता। स्पन्दनशील वायु ही बलपूर्वक फल, पल्लव और पुष्पोंको गिराती है, फिर बेचारे माधुर्यस्वभाव वृक्षका क्या अपराध ? इसी प्रकार साधु शरीरने साधु आत्माका कौन-सा अपराध किया है ! कमललोचन ! साथ ही, शरीरका त्याग कर देनेपर भी आपका सर्वत्याग निष्पन्न तो होगा नहीं; फिर व्यर्थ ही आप इस निरपराध शरीरको गड्ढेमें क्यों फेंक रहे हैं ! देहका त्याग कर देनेपर सर्वत्याग सिद्ध नहीं होता। जैसे उन्मत्त गजराज वृक्षको तहस-नहस कर देता है, उसी तरह जिसके द्वारा यह शरीर क्षुब्ध हो उठता है, उस पापात्माका यदि आप पूर्णतया त्याग करते हैं तभी आप महान् त्यागी हैं। भूपते ! उस पापात्माका परित्याग कर देनेपर देहादि समस्त पदार्थोंका अपने-आप त्याग हो जाता है। यदि उसका त्याग नहीं हुआ तो गर्तमें गिरकर नष्ट हुआ भी शरीर उस पापात्मासे बार-बार उत्पन्न होता रहेगा।

शिखिध्वज बोले—सौन्दर्यशाली देव ! इस शरीरका संचालन करनेवाला वह पापात्मा कौन है ? जन्मादि कर्मोंका बीज क्या है और किसका त्याग कर देनेपर सर्वत्याग सम्पन्न होता है ?

कुम्भने कहा—साधुस्वभाव नरेश ! शरीर अथवा राज्यका त्याग कर देनेसे तृणकुटिया जलाकर भस्म कर देनेसे सर्वत्याग सम्पन्न नहीं होता, वह तो सर्वात्मक एवं सर्वव्यापी सङ्कल्पद्वारा सबके एकमात्र कारणभूत सर्व भावका परित्याग कर देनेपर ही निष्पन्न होगा।

शिखिध्वज बोले—समस्त तत्त्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ कुम्भ ! अच्छा, यह बतलाइये आपने जिस सर्वथा एवं सर्वदा त्यागने योग्य, सर्वगत एवं सर्वात्मक वस्तुका नाम लिया है, वह सर्वात्मा किसे कहते हैं ?

कुम्भने कहा—नरेश्वर ! आप चित्तको ही भ्रम,

४६६* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चित्तको ही पापात्मा पुरुष और चित्तको ही जगज्जाल समझिये। यह चित्त ही 'सर्व' — सर्वात्मा कहलाता है। महीपाल ! जैसे वृक्षका बीज वृक्ष ही होता है, उसी तरह मन ही राज्य, देह और आश्रम आदि समस्त वस्तुओंका बीज है। अतः सबके बीजभूत उस मनका परित्याग कर देनेपर सबका त्याग स्वतः ही सिद्ध हो जाता है। भूपते ! उस मनके त्याग-अत्यागपर ही सर्वत्यागका होना-न-होना निर्भर करता है। राजन् ! ये राज्य अथवा कानन आदि सभी वस्तुएँ चित्तयुक्त अर्थात् चित्तके साथ सम्बन्ध रखनेवाले पुरुषके लिये केवल दुःखरूप हैं और जिसका चित्तके साथ सम्बन्धविच्छेद हो गया है, उसके लिये ये ही परम सुखरूप हैं। जैसे बीज समय पाकर वृक्षरूपमें परिणत हो जाता है, वैसे ही यह चित्त ही जगत् एवं देहादि आकार धारण करके सबमें व्याप्त हो रहा है। जैसे वायुसे वृक्ष, भूकम्पसे पर्वत और लोहारसे धौंकनी संचालित होती है, उसी प्रकार इस शरीरका संचालक चित्त है। राजन् ! इस चित्तको आप समस्त प्राणियोंके उपभोगोंका, जरा-मरण और जन्म आदि देहधर्मोंका तथा महामुनियोंके धर्मोंका अटूट खजाना ही समझिये। चित्त ही अपने संकल्पद्वारा जगत् तथा देहादि विविध आकार धारण करके सबमें व्याप्त हो रहा है। महीपते ! इस प्रकार चित्त ही सब कुछ बनता है; अतः उसका त्याग हो जानेपर सारी आधि-व्याधियोंकी सीमाका विनाश करनेवाला सर्वत्याग अपने-आप ही सिद्ध हो जाता है। त्यागके तत्त्ववेत्ताओंमें श्रेष्ठ राजन् ! चित्तत्यागको ही सर्वत्याग कहा जाता है। महाबाहो ! उसके सिद्ध हो जानेपर विज्ञानानन्दघन सत्य वस्तुका अनुभव अपने-आप ही अवश्य हो जाता है। चित्तका अभाव हो जानेपर द्वैत अद्वैत आदि सभी भावनाओंका सर्वथा विनाश हो जाता है और एकमात्र शान्त, निर्मल, अनामय परमपद ही शेष रह जाता है।

चित्तको इस संसाररूपी धानका खेत कहा जाता है। जैसे जल ही तरङ्गरूपसे दीख पड़ता है, वैसे विचित्र चेष्टाओंवाला चित्त ही अपने संकल्पसे भाव और अभावका आकार धारण करनेवाले पदार्थोंके रूपसे परिणत होता है। भूपते ! चित्तविनाशरूपी सर्वत्यागसे सर्वदा सभी वस्तुएँ वैसे ही सुलभ हो जाती हैं, जैसे साम्राज्यकी प्राप्तिसे सांसारिक पदार्थोंका समस्त अभाव मिट जाता है। जैसे राज्यादि समस्त वस्तुओंका त्याग कर देनेपर अकेले आप अवशेष रह गये हैं, वैसे ही सर्वत्याग कर देनेपर एकमात्र विज्ञानात्मा ही अवशिष्ट रह जाता है।

राजन् ! सर्वत्यागरूपी रसका आस्वादन कर लेनेपर जरा-मरण आदि कोई भी भय पुरुषको बाधा नहीं पहुँचा सकता। निर्मल कान्तिवाले महत्त्वकी प्राप्तिका कारण भी सर्वत्याग ही है। अब आप सर्वत्याग करनेके लिये प्रस्तुत हो गये हैं, इसीसे आपको बृहत्तम बुद्धिस्थिरता प्राप्त हो रही है। नरेश्वर ! सर्वत्याग परमानन्दस्वरूप है। इसके अतिरिक्त अन्य सब अत्यन्त भीषण दुःखरूप हैं— यों विचारपूर्वक स्वीकार करके जैसा आप चाहते हों, उसीके अनुसार आचरण कीजिये। सर्वत्याग करनेवाले पुरुषके पास प्रारब्धानुसार सभी वस्तुएँ अपने-आप उपस्थित होती हैं। सर्वत्यागके अन्दर आत्मप्रसादक ज्ञान वर्तमान रहता है। महाराज ! सर्वत्याग सारी सम्पत्तियोंका आश्रयस्थान है, इसीलिये जो कुछ भी ग्रहण नहीं करता, उसे सब कुछ दिया जाता है। भूपते ! सर्वत्याग करके आप शान्त, स्वस्थ, आकाशके समान निर्मल एवं सौम्य आदि जिस रूपमें होना चाहते हैं, उस रूपमें हो जाइये। महीपाल ! पहले आप सारी वस्तुओंका परित्याग कर दीजिये ! तदनन्तर जिस मनसे उनका त्याग किया हैं, उस मनका भी लय कीजिये; फिर त्याग-अभिमानरूपी मलसे भी रहित होकर जीवन्मुक्तस्वरूप हो जाइये।

(सर्ग ९२-९३)

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकनेका उपाय * ४६७


चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकनेका उपाय और अविद्यारूप कारणके अभावसे देह आदि कार्यके अभावका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इस प्रकार चित्तके परित्यागका उपाय कुम्भ ऋषिके बतलानेपर अपने अन्तःकरणमें बार-बार विचार करते हुए वे सौम्य राजा शिखिध्वज यह वचन बोले।

राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! जाल जैसे व्याकुल मछलीको पकड़ लेता है, वैसे ही इस चित्तको पकड़ लेना तो मैं जानता हूँ, परंतु इसका त्याग मैं नहीं जानता। भगवन् ! सबसे पहले तो आप मुझे चित्तका क्या स्वरूप है, यह ठीक-ठीक कहिये। इसके बाद प्रभो ! चित्तके परित्यागकी यथावत् विधि बतलाइये।

कुम्भ बोले—महाराज ! वासनाको ही चित्तका स्वरूप समझिये। उसका त्याग अत्यन्त सुगम और सुखसाध्य है। राज्यकी अपेक्षा उस त्यागमें अधिक आनन्द है और पुष्पकी अपेक्षा वह अधिक सुन्दर है। मूर्खके लिये तो चित्तका परित्याग करना उतना ही दुःसाध्य है, जितना कि पामरके लिये साम्राज्य प्राप्त करना।

राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! आपके वचनसे चित्तका स्वरूप वासनामय है, यह तो जानता हूँ, परंतु उसका परित्याग वज्रको निगल जानेकी अपेक्षा भी अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ। यह चित्त संसाररूपी सुगन्धित पुष्प है, दुःखरूपी दाहजनक अग्नि है तथा शरीररूपी यन्त्रका संचालक है। इसका अनायास त्याग जिस तरह होता हो, वह बतलाइये।

कुम्भ बोले—साधो ! इस चित्तका सर्वथा नाश ही संसारका भी नाश है, वही चित्तका अच्छी प्रकारसे त्याग है—ऐसा दीर्घदर्शी महात्माओंने कहा है।

राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये मैं चित्त-त्यागकी अपेक्षा तो चित्तका विनाश ही विशेष अच्छा समझता हूँ, परंतु सैकड़ों व्याधियोंके मूल इस चित्तका अभाव कैसे होता है ?

कुम्भ बोले—राजन् ! शाखा, फल और पल्लवोंसे युक्त चित्तरूपी वृक्षका अहंकार ही बीज है। अतः आप उस वृक्षको मूलसहित उखाड़ फेंकिये और अपना हृदय आकाशके सदृश निर्मल बना डालिये।

राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! चित्तका मूल क्या है, अङ्कुर क्या है और इसका कौन-सा खेत है, इसकी शाखाएँ और स्कन्ध कौन हैं तथा यह मूलसहित कैसे उखाड़कर फेंक दिया जाता है ?

कुम्भ बोले—महामते ! यह अहंकार ही इस चित्तरूपी वृक्षका बीज (मूल) है, इसे आप जान लीजिये। परमात्माकी माया ही इस मायामय संसारका खेत है। इसलिये इस चित्तका भी वह परमात्माकी माया ही खेत है। इस प्रथम उत्पन्न मूलसे अज्ञान-देहमें आत्मविषयक निश्चय (बुद्धि) ही इसका अङ्कुर है। जो निराकार निश्चयात्मक समझ है, वही बुद्धि कही जाती है। इस बुद्धि नामक अङ्कुरकी जो सङ्कल्परूप स्थूलता उत्पन्न होती है, उसका चित्त और मन नाम पड़ा हुआ है। ये इन्द्रियाँ ही इस चित्तरूपी वृक्षकी दूरतक फैली हुई लंबी विस्तृत शाखाएँ हैं और जन्म-मरणरूप हजारों अनर्थोंके कारण शुभ और अशुभरूप फलोंसे परिपूर्ण जो तुच्छ विषयभोग हैं, वे इसकी बड़ी-बड़ी अवान्तर शाखाएँ हैं। इस तरहके इस कठिन चित्तरूपी वृक्षकी शाखाओंका (विषयभोगोंमें आसक्तिका) वैराग्यसे प्रतिक्षण छेदन करते हुए आप इसके उदयकारण मूलको उखाड़ फेंक देनेवाले सच्चिदानन्द परमात्माके चिन्तनमें पूर्ण प्रयत्न कीजिये।

राजा शिखिध्वजने कहा—मुने ! विद्वान् पुरुषों

४६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

शाखा आदिका छेदन करता हुआ मैं उसके मूलको अशेषरूपसे किस तरह उखाड़ फेंकूँ ?

कुम्भ बोले-राजन् ! फल और स्पन्दन आदिसे युक्त विविध वासनाएँ चित्तरूपी वृक्षकी शाखाएँ हैं। तीव्र विवेक-वैराग्यके द्वारा वे वासणारूपी शाखाएँ नष्ट हो जाती हैं; क्योंकि जिसका मन किसी विषयमें आसक्त नहीं है, जो मौनी और तर्क-वितर्कसे रहित है तथा जो न्यायसे प्राप्त हुए कार्यका शीघ्र सम्पादन कर लेता है, उस पुरुषका चित्त नष्ट हो जाता है। जो पुरुष अपने पुरुषार्थसे चित्तरूपी वृक्षकी शाखाओंको काटता रहता है, वह मूलका भी उच्छेद करनेमें समर्थ हो जाता है। चित्तवृक्षकी शाखाओंका छेदन करना तो गौण है और मूलका छेदन करना प्रधान है, इसलिये आप अहंकाररूप मूलका उच्छेद करनेमें तत्पर हो जाइये। महाबुद्धे ! मुख्यरूपसे इस चित्तरूपी वृक्षको मूलसहित जला डालिये। ऐसा करनेपर अचित्तता हो जायगी।

राजा शिखिध्वजने कहा-मुने ! अहंभावात्मक चित्तरूपी वृक्षके बीज (मूल) को जलानेमें कौन-सी अग्नि समर्थ होगी ?

कुम्भ बोले-राजन् ! 'मैं कौन हूँ' इस विषयका विवेक-विचारपूर्वक यथार्थ ज्ञान ही चित्तरूपी वृक्षके मूलको जलानेकी अग्नि कही गयी है।

राजा शिखिध्वजने कहा-मुने ! इस विषयमें मैंने अनेक बार अपनी बुद्धिसे अच्छी तरह विचार कर लिया है--मैं अहंकार नहीं हूँ और न पृथ्वी और उसके अन्तर्गत वनमण्डलादिसे मण्डित जगत् ही हूँ। जड होनेके कारण पर्वतका तट, विपिन, पत्र, स्पन्दन आदि और देहादि मैं नहीं हूँ तथा मांस, हड्डी और रक्त आदि भी मैं नहीं हूँ। मैं न तो कर्मेन्द्रिय हूँ और न ज्ञानेन्द्रिय हूँ। जड होनेके कारण मन-बुद्धि भी मैं नहीं हूँ। जैसे नेत्रदोषसे आकाशमें प्रतीत होनेवाला वृक्ष आकाशसे भिन्न नहीं है; वैसे ही परमात्माके संकल्पसे उत्पन्न होनेवाले सम्पूर्ण पदार्थ परमात्मासे भिन्न नहीं हैं, परमात्माके ही स्वरूप हैं। भगवन् ! इस तरह अहंकाररूपी मलका परिमार्जन जानता हुआ भी मैं अन्तर्यामी परमात्माको नहीं जान सका हूँ। इसलिये मैं रात-दिन चिन्तासे जल रहा हूँ। इस चित्तरूपी वृक्षके बीज अहंकाररूप मलका त्याग करना मैं नहीं जानता हूँ; क्योंकि बार-बार त्याग करनेपर भी मैं उससे छुटकारा नहीं पा सका हूँ। मुने ! शरीर आदिमें अहंताभिमानरूप जो दोष है उसका कारण शरीर आदिका परिज्ञान ही है, यह मैं जानता हूँ। मुनीश्वर ! वह जिस उपायसे शान्त हो जाय, वह उपाय मुझसे कहिये। यह अहंभाव जीवात्माको विषयोंकी ओर आकृष्ट करता है, जिससे दुःख ही प्राप्त होता है। इसलिये उस दुःखकी शान्तिके लिये विषयभोगरूपी दृश्यवर्गका जिस उपायसे अभाव होता हो, वह मुझसे कहिये। मुने ! जिस पदार्थका प्रत्यक्षात्मक कोई एक स्वरूप उपलब्ध हो रहा है, वह असत्-स्वरूप कैसे है ? हाथ, पैर आदिसे संयुक्त तथा क्रिया-फलरूप विलास आदिसे समन्वित हमलोगोंसे सदा अनुभूत होनेवाला यह शरीर मिथ्या कैसे है ?

कुम्भने कहा-भूमिपाल ! इस संसारमें वास्तवमें जिस कार्यका कारण विद्यमान नहीं है, वह कार्य भी अपना अस्तित्व नहीं रखता, फिर उसका ज्ञान तो विभ्रम ही है। बिना कारणके यह शरीररूपी कार्य नहीं रह सकता। जिस द्रव्यका बीज नहीं है, उसकी उत्पत्ति कहाँ कभी होती है ? अर्थात् कभी नहीं। बिना कारणके जो कार्य सामने सत्‌की भाँति प्रतीत होता है उसे मृगतृष्णाजलके सदृश, देखनेवाले मनुष्यके भ्रमसे उत्पन्न (मिथ्या) समझिये। मिथ्या भ्रमसे विद्यमान शरीर आदिको आप अविद्यमान ही जानिये; क्योंकि अत्यधिक यत्नशील मनुष्यको भी यह मृगतृष्णा-जल प्राप्त नहीं होता। राजन् ! शरीर आदि अस्थिपञ्जररूपी यह कार्य