शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
विंश पटल ] [ ४७७ यह सब दश हुआ करते हैं । उनके नाम ये हैं-अहिंसा अर्थात् किसी भी प्राणी के मन तथा शरीर को चोट न पहुँचाना जो मन वाणी और कर्म के द्वारा होता है । सत्य, अस्तेय (चोरी न करना) ब्रह्मचर्य, कृपा अर्थात् दया आर्जव (सरलता)-क्षमा अर्थात् शक्ति होते हुए भी अपराध के लिये किसी भी प्रकार का दन्ड न देना, धृति अर्थात् धैर्य करना, मिताहार अर्थात् शरीर की रक्षा के लिये अल्प भोजन करना, शौच अर्थात् शुद्धि रखना, ये दश यम हुआ करते हैं ।७। सन्तोष, तप, आस्तिक्य अर्थात् ईश्वर की सत्ता में सत्य विश्वास रखना, दान—देव का पूजन—सिद्धान्तों का श्रवण करना—ह्रीं अर्थात् लज्जा—मत्ति अर्थात् सद्बुद्धि-जप अर्थात् मन्त्रों का जप करना— हुत अर्थात् होम-ये दश नियम होते हैं जो कि योग शास्त्र के विद्वानों द्वारा कहे गये हैं । पद्मासन-स्वास्तिक-वज्र— भद्रासन—वीरासन ये क्रम से पाँच आसन कहे गये हैं। ऊरुओं के ऊपर दोनों पाद तल क्रम से विन्यस्त किये जाते हैं और व्युत्क्रम से दोनों अनुष्ठों को हाथों से निवद्ध करे यही पद्मासन कहा गया है जो कि योगियों के लिये परम हृदयङ्गम होता है ।११। जानु और ऊरुओं के अन्तर में दोनों पाद तलों को भली भाँति करे । योगी ऋजु शरीर वाला होते हुये प्रविष्ट होवे-यह स्वास्तिक आसन कहा जाता है ।१२। सीवनी के पार्श्वों में दोनों गुल्फों को विन्यस्त करे । वृषणों के नीचे प द पाष्र्णियों को हाथों के द्वारा परिबद्ध करे ।१३। भद्रासनं समुद्दिष्टं योगिभिः पूजितं परम् । ऊर्वोः पादौ क्रमान्न्यस्येज्जान्वोः प्रत्यङ्मुखागुलीं ।१४ करौ निदध्यादाख्यातं वज्रासनमनुत्तमम् । एकपादमधः कृत्वा विन्यस्योरौ तथेतरम् ।१५ ऋजुकायो विशेद्योगी वीरासनमितीरितम् । इडयाऽऽकर्षयेद्वायुं बाह्यं षोडशमात्रया ।१६
४७८ ] [ श्रीशारदातिलक धारयेत्पूरितं योगी चतुः षष्ट्या तु मात्रया । सुषुम्णा मध्यगं सम्यक् द्वात्रिंशन्मात्रया शनैः ।१७ नाड्या पिङ्गलया चैनं रेचयेद्योगवित्तमः । प्राणायाममिमं प्राहुर्योगशास्त्रविशारदाः ।१८ भूयो भूयः क्रमात्तस्य व्यत्यासेन समाचरेत् । मात्रावृद्धिक्रमेणैव सम्यग्द्वादश षोडश ।१६ इसको योगियों के द्वारा परम पूजित भद्रासन कहा गया है । ऊरू और पादों को क्रम से न्यस्त करे तथा प्रत्यंग मुखागुलि वाले जानुओं को करे । करों को निर्धारित करे—यह परमोत्तम वज्रासन कहा गया है । एक पैर को नीचे करके तथा ऊरुओं को विन्यस्त करे । योगी को सीधे शरीर वाला होना चाहिये—इसको वीरासन बताया गया है ।१६। योगी चौसठ मात्रा से पूरक धारण करे और सुषुम्ना से मध्य में रहने वाले को भली भाँति बत्तीस मात्रा से शनैः शनैः पिंगला नाड़ी के योग के ज्ञाता को इसका रेचन करना चाहिए । योगशास्त्र के विद्वान् इस प्रकार से करने को प्राणायाम कहा करते हैं ।१७-१८। पुनः व्यत्यास से इस प्रकार समाचरण करे । मात्राओं की वृद्धि के क्रम से भली भाँति षोड़श और द्वादश करे ।१६। प्राणो ऽमो हि द्विविधः सगर्भोऽगर्भएव च । जपध्यानादियियुक्तं सगर्भं त विदुबुर्धाः ।२० तदपेतं विगर्भं च प्राणायामं परे विदुः । क्रमादभ्यस्यतः पुंसो देहे स्वेदोद्गमोऽधमः ।२१ मध्यमः कम्पसंयुक्तोभूमित्यागः परोमतः । उत्तमस्य गुणावाप्तिर्यविच्चीलनमिष्यते ।२२ इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु निरर्गलम् । बलादाहरणं तेभ्यः प्रत्याहारोऽभिधीयते ।२३ अंगुष्ठगुल्फजानूरुसीवनीलिङ्गानाभिषु । हृद्ग्रीवाकण्ठदेशेषु लम्बिकायां तोनसिः ।२४
विंश पटल ] । ४७६ भ्रू मध्ये मस्तके मूर्द्धिघ्न द्वादशान्ते यथाविधि । धारणं प्राणमरुतो धारणेति निगद्यते ।२५ समाहितेव मनसा चैतन्यान्तरवर्तिना । आत्मन्यभीष्टदेवानां ध्यान ध्यानमिहोच्यते ।२६ प्राणायाम सगर्भ ओर अगर्भ दो प्रकार का होता है । जप और ध्यान आदि से युक्त जो होता है उसको बुधगण सगर्भ प्राणायाम कहा करते हैं । इससे विमुक्त जो होता है उसको अगर्भ प्राणायाम कहा जाता है। क्रम से अभ्यास करने वाले पुरुष की देह स्वेद का उद्गम होता है जो अधम है ।२०-२१। मध्यम जो होता है वह कम्प से युक्त होता है। जो भूमि के त्याग करने वाला होता है वह उत्तम कहा गयाहै। उत्तमसे गुणों की अवाप्ति होतीहै जब तक इसका शीलन अभीष्ट होता है ।२२। विषयों में विना अर्गला के जो इन्द्रियों का विचरण होता है । उनका विषयों से बल पूर्वकजो आहरण किया जाता है उसे ही प्रत्याहार कहा जाता है ।२३। अंगुष्ठ - गुल्फ—जानु— ऊरु—सीवनी--लिङ्ग--नाभि—हृदय--ग्रीवा और कण्ठ देशों में-- तालुमूल--मस्तक भ्रूमध्य--मूर्धा द्वादशान्त में विधि पूर्वक प्राण वायु को धारण करना ही धारणा कही गई है ।२५। चैतन्यान्तर- वर्ती समाहित मन से आत्मा में अभीष्ट देवों का जो ध्यान किया जाता है उसी का नाम ध्यान है ।२६। समस्तभावना नित्यं जीवात्मगरमात्मनौः । समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमष्टाङ्गलक्षणम् ।२७ षण्णवत्यगलायाम शरीरमुभयात्मकम् । गुदध्वजान्तरे कन्दमुत्सेधाद्व्यंगुलं विदुः ।२८ तत्माद् द्विगुणविस्तारं वृत्त रूपेण शोभितम् ! नाड्यस्तत्र समुद्भूता मुख्यास्तिस्रः प्रकीर्तिताः ।२६ इडा वामें स्थिता नाडी पिङ्गला दक्षिणे मता । तयोर्मध्यगता नाडी सुषुम्णा वंशमाश्रिता ।३०
४८० ] [ श्रीशारदा तिलक पादांगुष्ठद्वये ।ता शिफाभ्यां शिरसा पुनः । ब्रह्मस्थानं समापन्ना सोमसूर्याग्निरूपिणी ।३१ तस्या मध्यगता नाडी चित्राख्या योगिवल्लभा । ब्रह्मरन्ध्रं विदुस्तस्यां पद्मसूत्रनिभि परम् ।३२ जीवात्मा और परमात्मा की नित्य समस्त भावना को ही मुनिगण अष्टांग लक्षण से युक्त समाधि कहा करते हैं ।२९। छियानवे अंगुलि के आयाम वाला उभयात्मक शरीर है । गुदा और ध्वज के अन्तर में कन्द है जो दो अंगुल होता है । उससे दुगुने विस्तार वाला वृत्त रूप से शोभित है । वहाँ पर उत्पन्न हुई नाड़ियाँ मुख्य तीन कही गई हैं ।२८। वाम भाग में स्थित नाड़ी इड़ा होती है और दक्षिण भाग में स्थित पिंगला गाड़ी है । उन दोनों के मध्य में रहने वाली नाड़ी वश के आश्रित सुषुम्ना होती है ।३०। दोनों शदों के अंगुष्ठों के साथ गई हुई पुनः शिर के साथ शिफाओं से ब्रह्म स्थान को समापन्न हुई है । यह सोम—सूर्य और अग्नि का रूप वाली है ।३१। उसके मध्य में गई हुई नाड़ी का नाम चित्रा है जो योगियों की परम प्रिया होती है । उसमें कमल के सूत्र के सदृश ब्रह्म रन्ध्र कहा जाता है ।३२। आधारांशचविदुस्तत्र मतभेदादनेकधा । दिव्यमार्गमिमं प्राहुरमृतानन्दकारणम् ।३३ इडायां सञ्चरेच्चन्द्रः पिङ्गलायां दिवाकरः । ज्ञातौ योगनिदानज्ञैः सुषुम्णायां तु तावुभौ ।३४ आधारकन्दमध्यस्थ त्रिकोणमतिसुन्दरम् । ज्योतिषां निलयं दिव्यं प्राहुरगमवेदिनः ।३५ तत्र विद्युल्लताकारा कुण्डली परदेवता । परस्फुरति सर्वात्मा सुप्ताहिसदृशाकृतिः ।३६ बभर्ति कुण्डलीशक्तिरात्मान हंसमाश्रिता । हंस प्राणाश्रयोनित्य प्राणो नाडीसमाश्रयः ।३७
विंश पटल ] [ ४८१ आधारादुद्गतो वायुर्यथावत्सर्वदेहिनाम् । देहं व्याप्य स्वनाडोभिः प्रयाणं कुरुते बहिः । ३८ वहाँ पर मतों के भेद से अनेक प्रकार के आधार कहे जाते हैं। अमृतानन्द के कारण इसको दिव्य माना जाता है । ३३। इडा में चन्द्र संचरण किया करता है और पिङ्गला में दिवाकर का संचरण होता है। जो योग के निदान के ज्ञाता हैं वे सुषुम्ना में इन दोनों का संचरण जानते हैं । ३४। आधार कन्द के मध्य में स्थित अत्यन्त सुन्दर त्रिकोण है। आगमवेत्ता इसकी ज्योतियों का दिव्य निलय कहते हैं । ३५। वहाँ पर विद्युल्लता के आकार वाली परम देवता कुण्डली है। सबकी आत्मा यह सोते हुये सर्प की-सी आकृति वाली परिस्फुरण किया करती है । ३६। आत्मा हंस के आश्रय में रहने वाली यह कुण्डली शक्ति का विभरण करता है। प्राणों के आश्रम वाला हंस नित्य ही नाड़ियों के समन्वय से युक्त प्राण है । ३७। समस्त देहधारियों के आधार से उद्भूत वायु यथावत् अपनी नाड़ियों के द्वारा देह में व्याप्त होकर बाहर प्रयाण करता है । ३८। द्वादशांगुलमानेन तस्मात्प्राण इतीरितः । रम्ये मृद्वासने शुद्धे पटाजिनकुशोत्तरे । ३६ बध्वैकमासनं योगी योगमार्गपरो भवेत् । ज्ञात्वा भूतोदयं देहे विधिवत्प्राणवायुना । ४० तत्तद्भूतं जपेद्देहं दृढत्वावाप्तये सुधीः । दण्डाकारा गतिर्भूमेः पुठयोरुभयोरधः ।४१ तोयस्य पावकस्योर्ध्वगतिस्तिर्यङ्नभस्वतः । गतिर्व्योम्नो भवेन्मध्ये भूतानामुदयः स्मृतः ।४२
४८२ ] [ श्रीशारदा तिलक धरणेरुदये कुर्यात्स्तम्भनं वश्यमात्मवित् । शान्तिकं पौष्टिकं कर्म तोयस्य समये वसोः ।४३ मारणादीनि मरुतो विपक्षोच्चाटनादिकम् । क्ष्वेदादिनाशनं शान्तमुदये च विहायसः ।४४ अंगुलीर्दृढं बध्वा करणानि समाहितः । अंगुष्ठाभ्यामुभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां विलोचने ।४५ नासारन्ध्रे मध्यमाभ्यामन्त्याभिर्वदनं दृढम् । वध्वात्मग्रणामनसामेकत्व ममनुस्मरन् ।४६ धारयेन्मारुतं सम्यग्योगोऽयं योगिबल्लभः । नादः सञ्जायते तस्य क्रमादभ्यसतः शनैः ।४७ द्वादश अङ्गुलों के मान से यह स्थित है, । इसी से प्राण यह नाम से पुकारा जाता है । रम्भ और शुद्ध मृदु आसन पर जो पट्- अजिन् और कुशा का होता है । उस पर योगी आसन बाँधकर योग मार्ग में परायण हुआ करता है । देह में भूतोदय का ज्ञान प्राप्त होता है जोकि विधि पूर्वक कठोर वायु द्वाराकिया जाता है ।३६-४०। विद्वान् पुरुष को तद्भूत देह की दृढ़ता की प्राप्ति के लिये जाप करना चाहिये । दोनों पुटों के नीचे दन्ड के आकार वाली भूमि की गति है ।४१। जल और पावक के ऊपर नभस्वान की तिर्यक् गति है । मध्य में व्योम की गति है-इस रीति से भूतों का उदय बताया गया है ।४२। आत्मवेत्ता की धरणी के उदय में स्तम्भन और वैश्य करना चाहिये । वसु के समय तोव (जल) का शान्तिक और पौष्टिक कर्म करने चाहिये ।४३। आकाश के उदय में धरणादिक शरे और मरुत से विमक्ष का उच्चाटन आदि करे, क्षेडा का विनाशन शान्त करे ।४४। परम सावधान होकर शङ्गुलियों से श्रवणेन्द्रिय को दृढ़ता से बद्ध करके दोनों अंगूठों से दोनों कानों को तर्जनी
विश पटल ] [ ४८३ अङ्गुलियों से, दोनों नेत्रों को मध्यमाओं से, नासिका के दोनों छिद्रों को तथा अन्य अङ्गुलियों से मुख को दृढ़ता से वद्ध करके आत्मा-प्राण और मन के एकत्व का स्मरण करते हुये वायु को भली-भाँति धारण करे—यह योग योगियों का परम प्रिय होता है। क्रम से शनैः अभ्यास करने वाले के नाद समुत्पन्न हुआ करता है ।४५-४७। मत्तभृङ्गाङ्गनागीतसदृशः प्रथमोध्वनिः । वंशिकास्याविलापूर्णवंशध्वनिनिभाऽपरः ।४८ घण्टारवसमः पश्चाद् घनमेघस्वनोऽपरः । एवमम्यसतः पुंसः संसारध्वान्तनाशनम् ।४६ ज्ञानमुत्पद्यते पूर्वं हंसलक्षणमव्ययम् । पुम्प्रकृत्यात्मको प्र.क्तौ बिन्दुसर्गौ मनीषिभिः । ५० ताभ्यां क्रमात्समुद्भूतौ बिन्दुसर्गोवसानकौ । हंसौ तौ पुम्प्रकृत्याख्यो ह पुमान्प्रकृतिस्तु सः ।५१ अजपा कथिता ताभ्यां जीवोयमुपतिष्ठति । पुरुष स्वाश्रय मत्वा प्रकृतिर्नित्यमोत्मना ।५२ यदा तद्भावप्राप्नोति तदा सोऽहमिसं भवेत् । सकारार्ण तवार्णं लोपयित्वा तत परम् ।५३ सन्धि कुर्यात्पूर्वरूपन्तदासौ प्रणवो भवेत् । परानन्दमयं नित्यंचैतवेक गुणात्मकम् । आत्माभेदस्थितं योगी प्रणव भावयेत्सदा ।५४ आम्नायवाचामतिदूरमाद्यं वेद्यं स्वसंवेद्यगुणेन सन्तः । आत्मानमानन्दरसैकसिन्धुं पश्यन्ति तारात्मकमत्मनिष्ठाः५५
४८४ ] [ श्रीशारदा तिलक सत्यं हेतुविवर्जितं श्रुतिगिरामाद्यं जगत्कारणम् । व्याप्तस्थावरजङ्गमं निरुपमं चैतन्यमन्तर्गतम् । आत्मानं रविवह्निचन्द्रवपुषं तारात्मकं सन्ततम् । नित्यानन्दगुणालयं सुकृतिनः पश्यन्ति रुद्धेन्द्रिया ।५६ मदमस्त भ्रमर की अङ्गना के समान प्रथम ध्वनि होती है । बाँस के छिद्र के पूर्ण होने पर जैसी ध्वनि हुआ करती है उसीके सदृश दूसरी ध्वनि होती है ।४८। फिर घण्टा की ध्वनि के तुल्य ध्वनि होती है, पीछे मेघ के गर्जन के सदृश ध्वनि होती है । इसी प्रकार ने अभ्य'स करने वाले पुरुष को संसार के ध्वान्त (अन्धकार ) का विनाश हो जाया करता है ।४६। हंस के लक्षण वाला अन्यय पहिले ज्ञान उत्पन्न होता है । मनीषियों ने विन्दु और सर्ग को पुम्प्रकृति के स्वरूप वाला बताया है । उन द्वीपों से क्रम से अवसानक विन्दु और सर्ग समुत्पन्न होते हैं । वे दोनों पुम्प्रकृति द्विनाम वाले हंस है । हे पुमान् है सौ प्रकृति है ।५०-५१। ये दोनों अजपा कहो गयी है । फिर यह बीज उपस्थित हुआ करता है । पुरुष को स्वाश्रय मानकर प्रकृति नित्य ही उसी के समाश्रित है यही इन दोनों का सम्बन्ध है ।५२। जिस समय में उस भाव को प्राप्त करता है तब मैं वहीं हूँ ऐसा भास हुआ करता है । प्रकृति और पुरुष के अभेद होने से मैं परमात्मा ही हूँ-इस रीति से यह जीव और ब्रह्म का ऐक्य होता है । अजपा के अभ्यास से इस प्रकार का ऐक्य उद्भूत हुआ करता है । सकारार्ण और प्रशारार्ण को योजित करके इसके पश्चात् सन्धि तथा पूर्वरूप करे तो यह प्रणव हो जाया करता है, यह परानन्दमय और एक जप के गुण से युक्त होता है आत्मा के अभेद में स्थित रहने वाला योगी सदा इस प्रणव की भावना किया करता है ।५४। जो आत्मनिष्ठ पुरुष होते हैं वे सदा प्रणव की भावना किया करते हैं । उस तारात्मक को देखते हैं जो आम्नाय के वचनों से अत्यन्त दूर है, आद्य, वेद्य तथा स्वसंवेद्य गुण से युक्त है और आनन्द रस के सागर आत्मा का दर्शन करते हैं ।५५। अपनी
विश पटल ] [ ४८५ इन्द्रियों को वश में रखने वाले मुकृती पुरुष रवि-चन्द्र और वह्नि के शरीर वाले-निरन्तर तार स्वरूप-नित्यानन्द गुण के निलय आत्मा को देखा करते हैं ।५६। तारस्य सप्तविभवैः परिचीयमानं मानैरगम्यमनिशं श्रुतिमौलिमृग्यम् । सच्चित्समस्तगमनश्वरमच्युतं तत्तं जः परं भजत सान्द्रसुधाम्बुराशिम् ।५७ हिरण्मयं दीप्तमनेकवर्णं त्रिमूर्तिमूलं अनगमादिबीजम् । अंगुष्ठमात्रं पुरुषं भजन्ते चैतन्यमात्रं रविमण्डलस्थ लम् ।५८ सुखदा दातृसुभगा शंकराद्ध शरीरिणी । ग्रन्थपुष्पोपहारेण प्रीता नः पार्वती सदा ।५६ ध्यायन्ति दुग्धाब्धिभुजङ्गभोगे शयानमाद्यं क लासहायम् । प्रफुल्लनेत्राम्बुजनाभं चतुर्मुखेनाश्रितनाभिपद्मम् ।६० द्याम्नायग्रन्थिवचनं घननीलनुद्यच्छी- वत्सकौस्तुभगदाम्बुशङ्ख्चक्रम् । हृत्पुण्डकरीकनिलयं जगदेकमूलमाल लोकयन्ति कृतिनः पुरुषं पुराणम् ।६१ बिन्दोर्नादसमुद्भवः समुदिते नादे जगत्कारणम् । तां तत्वमुखाम्बुजं पुरवितं वर्णात्मकैर्भूर्जजैः । आम्नायडिङ्ग्रचतुष्टयं पुरिरिपोरानन्दमूलं वपुः पायाद्भोमुकुटेन्दुखण्डविगलद्दिव्यामृतौघैः स् ।६२ तार के सप्त विभवों के द्वारा परिचीय मान-प्रमाणों के द्वारा अगम्य-निरन्तर श्रुति शिरोमणि के द्वारा खोजने के योग्य-सत्, चित्
४८६ ] [ श्रीशारदा तिलक समस्त के द्वारा ज्ञान, नश्वर, सान्द्र सुधाम्बु का समूह, अच्युत उस परम तेज का भजन अर्थात् सेवन करो ।५७। हिरण्यमय, देदीप्यमान, अनेक वर्णों वाला, त्रिमूर्ति का मूल, निगम का आदि बीज, चैतन्यमात्र, रविमण्डल में स्थित और अङ्गुष्ठमात्र पुरुष का सेवन किया करते हैं। ।५८। पार्वती देवी जो सुख प्रदान करने वाली है, दाताओं के लिये सुभगा है, भगवान् शङ्कर की अर्द्धाङ्गिनी है अन्य रूपी पुष्पों के उपहार से प्रसन्न होने वाली हैं, वह सर्वदा हम पर कृपा करे ।५९। क्षीरसागर में शेष की शय्या पर शयन करने वाले, सबके आदि रूप, लक्ष्मी के साथ विराजमान, विकसित नेत्र रूपी कमलों वाले, कमल को नाभि में धारण करने वाले तथा ब्रह्मा के द्वारा समाश्रय किया हुआ है नाभि में कमल जिनके ऐसे भगवान् लक्ष्मी नारायण प्रभुका ध्यान करते हैं ।६०। कृती लोग आम्नाय ग्रन्थि के वचन, घन के समान नील वर्ण वाले, श्रीवत्स के चिह्न से संयुत गदा शंख, कमल और चक्र आयुधों के शोभित, हृदय रूपी पुण्डरीक में निलय वाले, इस जगत्के एकमात्र मूल पुराण पुरुष का कृतीजन ही अवलोकन किया करते हैं ।६१। विन्दु से नाद की उत्पत्ति होती है, नाद में ही जगत् का कारण है, वर्णात्मक भूर्जंजों से तत्व मुखाम्बुज पूरित्त है, आम्नाय चतुष्टय अङ्घ्रिघ है। पुर- रिपु भगवान् का आनन्द मूल वपु है। वह वपु जिसके मस्तक में इन्द्र- खण्ड है जिससे विगलित होते हुये दिव्यामृत का समूह है, उससे वह वपु परिप्लुत हो रहा है। ऐसा भगवान् भव का वपु आपकी रक्षा करे ।६२। पिण्ड भवेत्कुण्डलिनी शिवात्मा पद तु हंसःसकलान्तरात्मा । रूपं भवेद्विन्दुरनन्तकान्तिरतीनरूपं शिवसामरस्यम् ।६३ पिण्डादियोगं शिवसामरस्यात्सबीजयोगं प्रवदन्ति सन्तः । शिवेलय नित्यगुणाभियुक्तो निर्बीजयोगं फलनिर्व्यपेक्षम् ।६४
विंश पटल ] [ ४५७ मूलोन्निद्रभुजङ्गराज महिषी यान्तीं सुषुम्नान्तरम् भित्त्वाधारस मूहमाशु विलसत्सौदामिनी सन्निभाम्। व्योमाम्भोजगतेन्दुमण्डलगलद्दिव्यामृतौघप्लुताम् । सम्भाव्य स्वगृहं गतां पुनरिमां सञ्चिन्तयेत्कुण्डलीम्॥६५ हंसं नित्यमनन्तमव्ययगुणं स्वाधारतोनिर्गता । शाक्तः कुण्डलिनी समस्तजननी हस्ते गृहीत्वा च तम् । याता शम्भुनिकेतनं परसुख तेनानुभूय स्वयम् । यान्ती स्वाश्रयमर्ककोटिरुचिरा ध्येया जगन्मोहिनी ॥६६ अव्यक्तं परबिन्दुमु ज्वलरुचि नीत्वा शिवस्यालयम् । शक्तिः कुण्डलिनी गुणत्रयवविद्युल्लतासन्निभा । दानन्दामृतमध्यग पुरभिदं चन्द्रार्ककोटिप्रभम् । सवीक्ष्य स्वपुरं गता भगवती ध्येयाऽनवद्या गुणैः ॥६७ मध्येवर्त्म समीरणाद्वयमिथः सङ्घट्टसंक्षोभजम् । शब्दस्तोममतीत्य तेजसि तडित्कोटिप्रभाभासुरे । डद्यन्तीं समुपास्महे नवजपासिन्दूरसन्ध्यारुणाम् सान्द्रानन्दसुधामयीं परशिवं प्राप्तांपरां देवताम् ॥६८ गमना गमनेषु जांधिकी सा तनुयाद्योगफलानि कुण्डली । मुदिताकुल का मसेनुरेशा भजतां काक्षितकल्पवल्लरी ॥६९
४८८ ] [ श्रीशारदा तिलक कुण्डलिनी पिण्ड होती है, सकल का अन्तरात्मा हंस शिवात्मा है। अनन्तकान्ति अतीतरूप शिव सामरस्य होता है । ६३ । सन्तगण शिवसामरस्य से पिण्डादि योग को सबीज योग कहा करते हैं । नित्या- गुणाभियुक्त शिव में फल निर्व्युपेक्ष निर्बीज योग होता है ।६४। इसके अनन्तर फिर कुण्डलिनी को चिन्तन करना चाहिये जो मूलोन्निद भुजङ्ग को राजमहिषी है और सुषुम्ना के अन्दर वमन करती हुई है । शीघ्र ही आधार समूह का भेदन करके विलसत्सौदामिनी सदृश होती है । व्योम कमल में स्थित चन्द्रमा के मण्डल से गलित हुये दिव्य अमृत के समूह से परिप्लुत है । ऐसी इसको स्वगृह में गयी हुई सम्भावित करके पुनः इस कुण्डलिनी का सचिन्तन करना चाहिये । ३५ । नित्य-अनन्त अव्यय गुण वाले हम स्वाधार से निकली हुई शक्ति समस्तों की जननी को हाथ में ग्रहण करके उसको प्राप्त हुई परममुख से पूर्ण शम्भु के निकेतन पहुँची है । उसके द्वारा अनुभव करके करोड़ों सूर्यों के समान रुचिर अपने आश्रय को गमन करती है ऐसी उसका जो जगत् का मोहन करने वाली है ध्यान करना चाहिये । ६६। अव्यक्त अजित रुचि युक्त पर बिन्दु शिव के आलय को लेकर वह रूपा कुण्डलिनी तीनों गुणों के वसुधारिणी विद्युल्लता के समान है । आनन्द रूपी अमृत के मध्य में स्थित-पुर का भेदन करने वाले-करोड़ों चन्द्र ओर सूर्य की प्रभा से संयुत सबीक्षण करके अपने पुर में गयी है, गणों के द्वारा अनवद्या भगवती का ध्यान करना चाहिये । ६७। मध्य में जो वर्त्म है वह दो वायुओं के परस्पर संग्रह से होने वाले क्षोभ से समुत्पन्न हैं, ऐसे शब्द स्तोम को अतीत करके करोड़ों तड़ित् के समान भासुर तेज में उदित होती हुई नूतन जया-सिन्दूर और सन्ध्या के समान अरुण सान्द्र आनन्द रूपी अमृत से परिपूर्ण प्राप्त परशिव परा देवता की समुपासना करते हैं । ३८। गमन और आगमन में जड़ि घकी वह कुण्डली योग के फलों का विस्तार किया करती है । यह आकुलोंके लिये मुदित कामधेनु है और इच्छित संकल्पों के लिये लता है, इसका सेवन करो ।६६।
विंश पटल ] [ ४८६ आधारस्थितशक्तिबिन्दुनिलयां नीवारशूकोपमाम् । नित्यानन्दमयीं गलत्परसुधावर्षैः प्रबोधप्रदैः । सिक्तषट्सरसीरुहाणि विधिवत्कोदण्डमध्योदिताम् ध्यायेत्प्रास्वरबन्धुजीवरुचिरां सांवन्मयीं देवताम् ।७० हृत्पङ्केरुहभानुबिम्बानिलयां विद्युल्लतामत्सराम् । बालाकारुणतेजसा भगवता निर्भर्त्सयन्तीं तमः । नादाख्यं पदमर्द्धचन्द्रकुटिलं संविन्मय शाश्वतम् । यान्तीमक्षररूपिणीं विमलबोध्यत्येद्धिभुं तेजसाम् ।७१ भाले पूर्णं निशापतिप्रतिभटान्तोहारहारत्विषा । सिञ्चन्तीममृतेन देवममितनानन्दनी तनुम् । वर्णानां जननीं तदीयवपुषा संप्राप्य विश्वं स्थिताम् । ध्यायेत्सम्पगनाकुलेन मनसा संविन्मयोमम्बिकाम् ।७२ भूले भाले हृदि च विलसद्वर्णरूपा सावित्री । पोनोत्तुङ्गस्तनभरनमन्मध्यदेशा महेशी । चक्रे चक्रे गलितसुधया सिक्तगात्रा प्रकामां दद्यादाद्याश्रियर्मावकलां वाङ् मयी देवता नः ।७३ निजभवनिवासादुच्चरन्ती विलासैः । पथि पथि कमलानां चारुहासं विधाय । तरुणतरणि कान्तिः कुण्डली देवता सा । शिवसदनसुधाभिदांपयेदामातेजः ।७४
४६० ] [ श्रीशारदा तिलक आधारबन्धप्रमुख क्रियाभिः समुत्थिता कुण्डलिनी सुधाभिः त्रिधामबीजं शिवमर्चयन्ती शिवाऽङ्गना वा शिवमातनोतु ॥७५
- आधार में स्थित शक्ति बिन्दु के निलय वाली नीवार शुक के समान, नित्य आनन्द से पूर्ण, प्रबोधकी प्रदायक, गलित परम सुधा की वर्षाओं से षट् सरसी रुहों कं विधिपूर्वक करने वाली को दण्ड के मध्य में उदित-भास्वर बन्धु जीव के समान रुचिर सत और चित् से परिपूर्ण देवता का ध्यान करना चाहिये ।७०। हृदय रूपी कमल को भानुबिम्ब के समान ही निलय जिसका तथा विद्युल्लता के सदृण- बाल सूर्य के समान अरुण तेज वाले भगवान् के द्वारा अन्धकार का निर्भत्सन करती हुई, नाद नामक परम अर्ध चन्द्र के समान कुटिल तथा निरन्तर सम्बित् से पूर्ण, अक्षर रूप वाली, तेजों की विभु कों विमल बुद्धि वाला ध्यान करें ।७१। भाल में पूर्ण चन्द्र वाली, प्रतिभटों को नीहार की कान्ति से अमृत द्वारा देव का सिंचन करती हुई जो कि अपरिमित है, वपु की आनन्दित करने वाली, वर्णों के जनन करने वाली, उसके वपु से विश्व को प्राप्त करके स्थित ऐसी संवित् से परिपूर्ण अम्बिकादेवी का भलीभाँति अनाकुल मन से ध्यान करना चाहिये । ७२। मूल में भाल में और हृदय में विराजमान वर्ण रूप सवित्री-पीन (स्थूल) और उत्तुङ्ग (ऊँचे) स्तनों के भार से नमित शरीर के मध्य देश वाली महेशी देवी मक्रचक्र में घलित हुये अमृत से गात्र को प्रकाम रूप से सिक्त करने वाली देवी अविकल आद्य वाङ्मयी श्री को हमको प्रदान करे ।७३। अपने भवन में निवास से विवसों के द्वारा उच्चारण करती हुई, मार्ग में कमलों के सुन्दर विकास करके, तरुण सूर्य की कान्ति वह कुण्डली देवता शिव के सदन की सुधा से आत्म तेज को प्रदत्त करा देवे ।७४। आधार बन्ध की प्रदान क्रियाओं के द्वारा अमृत से समुत्थित कुण्डलिनी त्रिधाम के बीजस्वरूप भगवान्
विंश पटल ] [ ४६१ शिव का अर्चन करती हुई शिव की अर्द्धाङ्गिनी आपकी कल्याण का विस्तार करें ।७५। सिन्दूरपुञ्जनिभमिन्दुकलावतंसमानन्दपूर्णनयनत्रयशोभिवक्त्रम् आपीनतुङ्गकुचनम्रममङ्गतन्त्र शम्भोः कलत्रममितां श्रियमातनोतु ॥७६ नयनकमलैर्दीर्घादीर्घैरलङ्कृतदिङ्मुखम् । विनतमरुतां कोटीपाग्रैर्निघृष्टपदाम्बुजम् ॥ तरुणशकलं चान्द्रं बिभ्रद्घटस्तनमण्डलम् । स्फुरतु हृदये वन्धू कामं कलत्रमुमापतेः ॥७७ वर्णैरर्णवषड् दिशारविकलाचक्षुर्विभक्तैः कृपा- दाद्यै - सादिभिरावृताक्षहयुतैः षट्चक्रमध्यानिमान् डाकिन्यादिभिरक्षितान्परिचितान् ब्रह्मादिभिर्देवतै भिन्दाना परदेवता त्रिजगतां चित्ते विधत्तां मुदः ॥७८ सिन्दूर के समूह के समान चन्द्र की कला के आभूषण वाली, आनन्द से परिपूर्ण तीन नेत्रों के ज्ञाता सुशोभित मुख से संयुक्त, स्थूल और ऊंचे स्तनों के द्वारा नम्र ऐसी कामदेव की तन्त्र स्वरूप भगवान् शम्भु की भामिनी अपरिमित श्री का विस्तार करे ।७६। बड़े-बड़े नेत्ररूपी कमलों के द्वारा दिशाओं के मुख को अलंकृत करने वाली, विनम्र मरुतों के कोटीराग्रों द्वारा पदाम्बुजों को निघृष्ट तरने वाली, तरुण खन्ड वाले चन्द्रमा से घटस्तन मन्डल को धारण किये हुये बन्धूक के सदृश उमापति की भामिनी हृदय में स्फुरण करे ।७७। अर्णवषट् दिशाओं से रविकला रूपी चक्षु से विभक्त वर्णों से क्रमशः आद्यसादि
४६२ ] [ श्रीशारदा तिलक से आवृताक्षह से संयुत इन षट्चक्रों के मध्यों को डाकिनी प्रभृति से आश्रित और ब्रह्मादि देवों से परिचित तीनों जगतों कें परदेवों का भेदन करती हुई, चित्त में आनन्द में करे ।७८। आधार से गुण वृत्त द्वारा शोभा युक्त वपु, सत्वर निर्गत्वरा, कमलों का भेदन करने वाली आनन्द प्रबोध के उत्तर चिन्मयघना, संक्षुब्ध ध्रुवमण्डल से अमृत करों द्वारा प्रस्पन्दमान अमृत का स्रोत, कन्दलिता अमन्द विद्युत् के समान आकार वालो भगवती भवानी की भावना करनी चाहिये ।७६। ➖➖ एकविंश पलट ॥ गायत्री महिमा ॥ प्रणवाद्या व्याहृतयः सप्त स्युस्तत्पदादिकाः ।१ चतुर्विंशत्यक्षरात्मा गायत्री शिरसान्विता ।२ सर्ववेदोद्धृतः सारौ मन्त्रोऽयं समुदाहृतः । ब्रह्मा देव्यादिगायत्री परमात्मा समीरिताः ।३ ऋष्याद्याः प्रणवस्यैते मुनिभिः परिकीर्तिताः ।४ जमदग्निभरद्वाजभृगुगौतमकश्यपान् । विश्वामित्रवसिष्ठाख्यौह व्या तीनामृषीन्विदुः ।
एकविंश पटल ] [ ४६३ गायत्र्युष्णिगथानुष्टुब्वृहतीपक्तयः पुनः । त्रिष्टुब् जगत्थश्छन्दांसि कथितानि मनीषिभिः । ६ सप्तार्चिरनिलः सूर्यो वात्रयतिर्वरुणोवृषः । विश्वेदेवाः क्रमादासां देवताः परिकीर्त्तिताः । ७ इसमें सब आहुतियाँ का ओर गायत्री का अर्थ बताया गया है। प्रणव जिनके आदि में होता है ऐसी उस गायत्री मन्त्र के आदि में रहने वाली सात व्याहृतियाँ होती है । वे भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् ये सात व्याहृतियां हैं । इनके पूर्व में प्रणव होता है । शिर से समन्वित गायत्री चौवीस अक्षरों वाली होती है । यह गायत्री मन्त्र समस्त वेदों का उद्धृत किया हुआ सार है— ऐसा ही उदाहृत किया गया है । ब्रह्मा देवी आदि गायत्री और परमात्मा कहे गये हैं । प्रणव के ऋषि आदि मुनियों के द्वारा कीर्त्तित किये गये हैं । ३-४ । व्याहृतियोंके ऋषि जमदग्नि, भरद्वाज, भृगु, गौतम, कश्यप, विश्वामित्र और वसिष्ठ होते हैं । ऐसा ही जान लेना चाहिये । ५। गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, वृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् और जगती ये छन्द हैं जो मनीषियों के द्वारा बनाये गये हैं । ६। सप्तार्चि, अनिल, सूर्य, वाक्यापति, वरुण, वृष और विश्वादेवा ये क्रम से इनके देवता कहे गये हैं । ७। गायत्र्या मुनिराख्यातो विश्वामित्रो महाद्युतिः । गायत्रीच्छन्द इत्युक्तं देवता सविता स्मृता । ८ शिरसोऽस्य मुनिर्ब्रह्मा छन्दो देव्यादिका स्मृता । गायत्री परमात्मास्य देवता कथिता बुधैः । ६ व्याहृतीः सप्तभूराद्या हृन्मुखाक्षोरुयुग्मके । जठरे न्यस्य मन्त्रज्ञो गायत्र्यर्णांस्तनौ न्यसेत् । १० पत्ससन्धिषु ध्वजे नाभौ हृत्कण्ठभुजसन्धिषु । आस्यनासाकपोलाक्षिकर्णभ्रू मस्तकं पुनः । ११
४६४ ] [ श्रीशारदा तिलक पाश्चात्त्योत्तरयाम्यप्रागूर्ध्ववक्त्रेषु साधकः । पदानि दश विन्यस्येदेषु स्थानेषु मन्त्रवित् ॥१२ शिरोभ्रू मध्यदृग्वक्त्रे कण्ठहृन्नाभि गुह्यके । जाननोः पादयोर्युग्मे तच्छिरः शिरसि न्यसेत् ॥१३ हृदयं ब्रह्मणे प्रोक्तं विष्णवे शिर ईरितम् । शिखा रुद्राय कवचमीश्वराय समीरिनम् ॥१४ गायत्री के मुनि विश्वामित्र, जो महतीद्युति वाले थे, बताये गये हैं। इसका गायत्री छन्द है और इसका देवता सविता कहा गया है ।८। इसके शिर का मुनि ब्रह्मा है-देव्यादिका छन्द कहा गया है । बुधों के द्वारा इसका परमात्मा गायत्री देवता कहा गया है ।६। भू आद्य सात व्याहृतियों का हृदय, मुख, अंस और अरु दोनों जठर में न्यास करके मन्त्र ज्ञाता को गायत्री के वर्णों का स्तनों में न्यास करना चाहिए ।१०। पदों की सन्धियों से, ध्वज में नाभी में, हृदय में, कण्ठ में और भुजाओं की सन्धियो में-मुख, नासिका, कपोल, नेत्र, भ्रू, मस्तक में में साधक पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, पूर्व और ऊर्ध्व वस्त्र में दश पदों का विन्यास करके मन्त्र के वेत्ताओं को इन स्थानों में न्यास करना चाहिये ।११।१२। शिर, भ्रूओं कामध्य भाग, लोचन, मुखमें तथा कण्ठ हृदय, नाभि और गुह्य भाग में, जानुओंमें, एवं दोनोंमें पादों में उसके शिर का न्यास करना चाहिए ।१३। हृदय ब्रह्माजी के लिए कहा गया है और भगवान् विष्णु के लिए शिर बताया गया है। शिखा रुद्रदेव के लिए और कवच ईश्वर के लिए समुदीरित किया गया है ।१४। नेत्रं सदाशिवायोक्तमस्त्रं सर्वात्मने स्मृतम् । षडङ्गान्तेवमुक्तानि यथा स्थानं प्र॒विन्यसेत् ॥१५
एकविंश पटल ] [ ४६५ मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणै- र्यक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुट तत्त्वात्मवर्णात्मिकाम् । गायत्रीं वरदाभयाङ्कुशकशाः शूलं कपाल गुणं शंखचक्रमथारविन्दगलं हस्तेवहन्ती भजे ॥१६ प्राणायामान्पुरा कृत्वा गायत्री सन्ध्योर्जपेत् । सप्तव्याहृतिसंयुक्तां गायत्री शिरसान्विताम् ॥१७ तिरुच्चरन्धिया प्राणान्धारयेद्यतमानसः । प्राणायामोऽयमाख्यातः समस्तदुरितापहः ॥१८ व्याहृतित्रयसंयुक्ता गायत्री दीक्षितो जपेत् । तत्त्वलक्षं विधानेन भिक्षाशी विजितेन्द्रियः ।१६ क्षीरौदनंतिलांन्दूर्वाक्षोरद्रुमसमद्भिदरान् । पृथक् सहस्रत्रितयं जुहुयान्मन्त्रसिद्धये ।२० विधाय मण्डलं विद्वान् त्रिकोणोज्ज्वलकर्णिकाम् । सौरं पीठं यजेत्तत्र दीप्तादिनवशक्तभिः ।६१ नेत्र सदाशिव भगवान् के लिए बताया गया है तथा अस्त्र सर्वात्मा के लिए कहा है । इसी प्रकार से छं अङ्गों को कहा गया है, अतएव छै अङ्गों को ठीक स्थान पर ही विन्यस्त करना चाहिए ।१५। अब ध्यान बताया जाता है—मुक्ता (मोती), विद्रुम हेम, नील और धवल छाया वाले मुखों और तीन नेत्रों से समन्वित, चन्द्र जिसमें निबद्ध है ऐसे रत्नों के निर्मित मुकुट (शिरोभूषण) से युक्त, तत्त्व स्वरूप वर्णों के आत्मा वाली करों में वरदान, अभयदान, अंकुश, कशा, शूल, कपाल गुण, शंख चक्र और छै अरविन्दो को धारण करने वाली गायत्री देवी का मैं भजन करता हूँ ।१६। सबसे पूर्व प्राणायामों को
४६६ ] [ श्रीशारदा तिलक करके (यहाँ पर जो प्राणायाम में बहुवचन दिया गया है इससे तीन बार ही प्राणायाम करनेका तात्पर्य है) फिर दोनों सन्ध्याओं में गायत्री का जप करना चाहिये । गायत्री सातों व्याहृतियों से युक्त और शिर समन्वित होनी चाहिये । ऐसी ही गायत्री का जप करें । उसका स्वरूप यह है-'ओ३म् भूः, ओ३म् भुवः, ओ३म् स्वः, ओ३म् महः, ॐ जनः, ॐ तपः, ॐ सत्य, ओ३म् तत्सवितुर्वरेण्य भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्, ओ३म् आपोज्योतीरसोऽमृत भूर्भुवः स्वरोऽम् ।" प्राणों को तीन बार उच्चारण करते हुये धी से यतमानस होकर ही धारण करना चाहिये । यही प्राणायाम कहा है जो समस्त दुरितों (पापों) का अपहरण करने वाला है ।१७-१८। जोदीक्षित है उसको (भूःभुवःस्वः) इन तीनों व्याहृतियाँ से युक्त हो गायत्री मन्त्र का जप करना चाहिये । चौबीस लाख जप के विधान से ही जप करे और भिक्षा के द्वारा अपनी अशन क्रिया का सम्पादन करे एवं इन्द्रियों का जीत लेने वाला ही रहे। ।१६। गायत्री मन्त्र की सिद्धि के लिये साधक की क्षीर, ओदन, तिल, दूर्वा, क्षीर द्रुमों की समिधाओं का पृथक् तीन सहस्र हवन करना चाहिये ।१६-२०। विद्वान् पुरुष मण्डल अर्थात् सर्वतोभद्र की रचना करे । उसकी कर्णिका में त्रिगुणित मन्त्र का लेखन करना चाहिये । उसमें सौर पीठ का अभ्यर्चन करे जो कि दीप्ताआदि नौ शक्तियों के सहित होवे ।२१। मूलमन्त्रेण क्लृप्तायां मूर्तीं देबी प्रपूजयेत् । कोणेषु त्रिषु सम्पूज्या ब्रह्माद्याः शक्तयोबहिः ।२२ आदित्याद्यास्ततः पूज्या उषादिसहिताः क्रमात् । ततः षडङ्गान्यभ्यर्चेत्केसरेषु यथाविधि ।२३ प्रह्लादिनीं प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वम्भरां पुनः। विलासिनीप्रभावत्यौ जयां शान्ति यजेत्पुनः ।२४