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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 161

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 161 देवदारु च कर्षांशं चूर्णं तैले विनिक्षिपेत्। वज्रतैलमिदं ख्यातमभ्यङ्गात् सर्वकुष्ठनुत्।। 186।। सेहुण्ड (थूहर) का दूध, आक (मदार) का दूध, धतूरे के पत्तों का रस, चीता के पत्तों का रस तथा भैंस के गोबर का रस (1-1 पाव लें) और सबके समान सरसों का तेल (1¼ सेर) मिलाकर पाक करें, तत्पश्चात् जब तेलमात्र शेष रह जाये तब उसमें चौगुना (5 सेर) गोमूत्र डालकर पाक करें। अन्त में गन्धक, चित्रक, मैनसिल, हरताल, वायविडंग, अतीस, विष (मीठा तेलिया), कड़वी तोरई, कूठ, वच, जटामांसी, सोंठ, पीपल, मरिच, दारुहल्दी, मुलेठी, सज्जीखार, सफेद जीरा तथा देवदारु प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण 1¼-1¼ तोला उक्त तैल में डालकर रख दें। इस तैल का नाम 'वज्री तैल' है। इसकी मालिश करने से सभी प्रकार के कुष्ठ रोग नष्ट हो जाते हैं। वक्तव्य-उक्त तैल में डालने के पूर्व गन्धक आदि द्रव्यों का चूर्ण कपड़छन कर लेना चाहिये और इसे धूप में रख देना चाहिये। एक मास के पश्चात् दद्रु, पामा आदि पर लगाना चाहिये। उक्त तैल में 'प्रस्थ' का अर्थ 'सेर' और इसी के अनुसार 'कर्ष' का अर्थ 'सवा तोला' किया गया है। यह तैल-निर्माण का हमारा दृष्टिकोण है। करवीरादि तैल करवीरशिखादन्तीत्रिवृत्कोशातकीफलम् । रम्भाक्षारोदके तैलं प्रशस्तं लोमशातनम्।। 187।। कनेर के पत्ते, चीता की जड़, दन्ती, कड़वी तोरई के फल, इन द्रव्यों का कल्क (1 पाव) कदलीक्षार-मिश्रित जल 4 सेर और तेल 1 सेर-सबको मिलाकर विधिपूर्वक पाक करें। यह तैल उत्तम रोमशातन (बाल सफा करने वाला) है। चन्दनादि तैल (चन्दनाम्बुनखैर्याम्यं यष्टीशैलेयपद्मकम्। मञ्जिष्ठा सरलं दारु सेव्यैलं पूतिकेसरम्।। 188।। पत्रकैलं मुरा मांसी कङ्कोलं वनिताम्बुदम्। हरिद्रा सारिवा तिक्ता लवङ्गागुरुकुङ्कुमम्।। 189।। त्वग्रेणुनलिका चेति तैलं मस्तु चतुर्गुणम्। लाक्षारसमसं सिद्धं ग्रहघ्नं बलवर्धनम्।। 190।। अपस्मारज्वरोन्मादकृत्यालक्ष्मीविनाशनम् । आयुःपुष्टिकं चैव वशीकरणमुत्तमम्।। 191।। विशेषात् क्षयरोगघ्नं रक्तपित्तहरं परम्।) श्वेतचन्दन, नेत्रबाला, नाखूना, कूठ, मुलेठी, छड़ीला, पद्माकाठ, मजीठ, सरल (चीड़) का बुरादा, देवदारु, खस, बड़ी इलायची, पूति (गन्धमार्जार का अण्डकोष जिसे जुन्दवेदस्तर कहा जाता है), नागकेसर, तेजपत्ता, छोटी इलायची, मरोड़फली, जटामांसी, शीतलचीनी, फूलप्रियंगु, नागरमोथा, हल्दी, सारिवा, तिक्ता (कुटकी अथवा मुश्कदाना), लौंग, अगरु, केशर, दालचीनी, रेणु (मेवड़ी के बीज) तथा नालुका (दालचीनी का-सा गन्धद्रव्य), प्रत्येक द्रव्य 1-1 तोला लेकर कल्क बनायें। कल्क की अपेक्षा चौथाई तेल तथा तेल की अपेक्षा चौगुना दही का पानी और तेल के समान भाग लाक्षारस (लाही का क्वाथ) इन सबको एक साथ मिलाकर पाक करना चाहिये। यह तेल ग्रह (भूत-प्रेत बाधा) नाशक है, बलवर्द्धक है, मिरगी, ज्वर, उन्माद, कृत्या (मारण-मोहन आदि तान्त्रिक क्रिया) तथा अलक्ष्मी (अशोभा या बदसूरती) का विनाशक है, आयुर्वर्द्धक, पुष्टिकारक तथा उत्तम वशीकरण (सुगन्धित होने के कारण दूसरों को मोहित करने वाला) है। विशेषरूप से यह क्षयरोग को नष्ट करता है और रक्तपित्त को हरता है। वक्तव्य-उक्त तेल अत्यन्त सुगन्धित होता है, परन्तु पकाने से सुगन्धि कुछ घट जाती है। अतः द्रवद्रव्यों में पहले तेल को पकाकर तत्पश्चात् सम्पूर्ण सुगन्धित द्रव्यों का चूर्ण डालकर अत्यन्त धीमी आँच से केवल इतना गर्म करना चाहिये जिससे सुगन्धि तेल में विलीन हो सके और पाक समाप्त होने के बाद भी उक्त द्रव्यों को तैल में ही पड़े रहने देना चाहिये, जिससे उनका सार तैल में घुलता रहे। दूसरे सुगन्धित तैल इसके सामने तुच्छ हैं, क्योंकि वे तैल प्रायः मिट्टी के तेल में बनाये जाते हैं और उन्हें सेण्ट डालकर सुगन्धित किया जाता है। इस तैल का प्रयोग नपुंसकता पर भी बहुत लाभदायक प्रमाणित हुआ है। वचा तैल (वचां शठीं हरिद्रे द्वे देवदारुमहौषधी।। 192।। हरीतकीमतिविषामुस्तकेन्द्रयवान् समान्। एतान् दशपलान् भागांश्चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत्।। 193।। चक्रमर्दरसैस्तैलं कटुकं मृदुनाऽग्निना। पादशेषे विनिक्षिप्य सिन्दूरमवतारयेत्।। 194।। एतत्तैलं निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।) वचा, कचूर, हल्दी, दारुहल्दी, देवदारु, सोंठ, हरड़,

162 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

अतीस, नागरमोथा तथा इन्द्रजौ इन सबको दस-दस पल (40-40 तोला) लेकर जौकुट करके चार द्रोण (51 सेर 16 तोला) जल में पकायें, चतुर्थांश शेष रहने पर कटुतैल (1 आढक या 3 सेर 16 तोला) तथा चक्रमर्द (पवाड़) का रस (1 आढक अर्थात् तैल के समान भाग) मिलाकर मन्द-मन्द अग्नि से विधिपूर्वक पाक करें और तेलमात्र शेष रह जाने पर छान लें। इस तेल में (तेल से चतुर्थांश) सिन्दूर डालकर थोड़ा पकायें। उसमें ज्योंही कालापन आ जाये त्योंही उतार लें। यह तेल भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही नष्ट करता है।

निर्गुण्डी लांगली तैल निर्गुण्डीस्वरसे तैलं लाङ्गलीमूलकल्कितम् ।। 195 ।। तैलं नस्यान्निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्। निर्गुण्डी (सम्भालू) का स्वरस (4 सेर), तेल (1 सेर) और कलिहारी का कल्क (9 पाव) इन सबको एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करना चाहिये। यह तेल नस्य-विधि से प्रयोग करने से भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही नष्ट कर देता है।

चक्रमर्द तैल (चक्रमर्दक मूलस्य कल्कं कृत्वा विपाचयेत् ।। 196 ।। केशराजरसे तैलं कटुकं मृदुनाग्निना। पाकशेषे विनिक्षिप्य सिन्दूरमवतारयेत् ।। 197 ।। एतत्तैलं निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।) चकवड़ की जड़ का कल्क (1 पाव) बनाकर भाँगरा के रस (4 सेर) में कड़वा तेल (1 सेर) डालकर तीनों को एक साथ मन्द अग्नि में पाक करें। जब तेल मात्र अवशिष्ट रह जाये तो तेल को छान लें। इस तेल में चतुर्थांश सिन्दूर डालकर थोड़ा पकाकर उतार लें (यह काले रंग का मलहम तैयार हो जाता है)। यह तेल भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही शान्त कर देता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रकार के छोटे-बड़े फोड़ों या घावों पर यह आश्चर्यजनक कार्य करता है। इसमें एक विशेषता यह है कि यह सूखा-सा रहता है और थोड़ा गर्म करने से ढीला हो जाता है, जिससे लगाने में सरलता होती है।

वक्तव्य-यह चक्रमर्द तेल अत्यन्त उपयोगी है। अतः हमने यहाँ इसे उद्धृत किया है।

धत्तूर तैल (धत्तूररसमादाय हयमारान्तिकारसम् ।। 198 ।। भृङ्गराजरसश्चैव सारिणी निम्बपत्रकम्। शोभाञ्जनश्वित्रकश्च अश्वगन्धा प्रसारिणी ।। 199 ।। शिरीषः कुटजोऽनन्ता शाल्मली नक्तपत्रकम्। रविप्रियो महानिम्बो डिण्डिघोषा महेरणा ।। 200 ।। बला ज्योतिष्मती चैव श्यामाकश्चक्रमर्दकः। एतैस्तु रसमादाय तैलतुल्यं च दीयते ।। 201 ।। देवदारु हरिद्रे द्वे मांसी कुष्ठं सचन्दनम्। मरिचं त्रिवृता दन्ती हरितालं मनःशिला ।। 202 ।। कम्पिल्लको गन्धकश्च खदिरः पिप्पली वचा। रसाञ्जनं च सिन्दूरं श्रीवासो रक्तचन्दनम् ।। 203 ।। इरिमेदस्तथा तुम्बी मञ्जिष्ठा सिन्दुवारकः। करवीरजटा रास्ना विश्वा श्रेष्ठा च पौष्करम् ।। 204 ।। शठी तालीसपत्रं न प्रियङ्गुः रेणुका तथा। चातुर्जातकसञ्झीरं कङ्कोलं जातिपत्रिका ।। 205 ।। ज्योतिष्मती च पलिका विषस्य द्विपलं भवेत्। आढकं कटुतैलस्य गोमूत्रं च चतुर्गुणम् ।। 206 ।। मृत्पात्रे लोहपात्रे च शनैर्मृद्वग्निना पचेत्। मज्जाश्रितं त्वग्गतं च वातं चास्थिगतं तथा ।। 207 ।। ऊरुग्रहं चाढ्यवातं कृच्छ्रं दण्डापतानकम्। कुब्जत्वं चाथ शोथं च पक्षाघातं तथार्दितम् ।। 208 ।। हनुस्तम्भं शिरःकम्पं मूर्च्छितं दृष्टिविभ्रमम्। अपस्मारं तथोन्मादं तथा चैवाऽपतन्रकम् ।। 209 ।। आक्षेपकं चास्थिभग्नं सन्धिभग्नं च नाशयेत्।)

इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे घृततैलकल्पना नाम नवमोऽध्यायः ।। 9 ।।

धतूरा के पत्तों का रस, कनेर के पत्तों का रस, भाँगरा का रस, रक्तवर्ण की पुनर्नवा, नीम के पत्ते, सहजन की छाल, चीता, असगन्ध, गन्धप्रसारिणी, सिरस, कुरैया, जवासा, सेमल, करञ्ज के पत्ते, लाल कमल, बकायन, ऐरण्ड की जड़, सलई वृक्ष की छाल, बरियारा, मालकंगुनी, काली निसोत तथा चक्रमर्द-इन द्रव्यों का रस तथा क्वाथ लेकर समान भाग तेल में मिला दें, फिर इसमें देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, जटामांसी, कूठ, सफेद चन्दन, मरिच, निसोत, दन्ती, हरिताल, मैनसिल, कबीला, गन्धक, खैरसार, पीपल, वच, रसवत, सिन्दूर,

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 163

नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 163

गन्धाविरोजा, लालचन्दन, दुर्गन्धित खैर, कड़वी तुम्बी, मजीठ, सम्भालू के पत्ते, कनेर की जड़, रास्ना, सोंठ, हरड़, पोहकरमूल, कचूर, तालीसपत्र, फूलप्रियंगु, रेणुका, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर, अंजीर, शीतलचीनी, जावित्री तथा मालकंगुनी प्रत्येक एक-एक पल और विष (मीठा तेलिया) दो पल (8 तोला) लेकर कल्क बनायें। कटुतैल एक आढक (3 सेर 16 तोला) और तेल की अपेक्षा चतुर्गुण गोमूत्र, इन सबको मिट्टी अथवा लोहे के पात्र में एक साथ मिलाकर धीरे-धीरे मन्द-मन्द अग्नि से पकाना चाहिये। यह तेल मज्जागत वायु, त्वचागत वायु, अस्थिगत वायु, ऊरुग्रह, आढ्यवात (आमवात), कष्टप्रद दण्डागतानक, कुबड़ापन, शोथ, पक्षाघात, अर्दित (मुख-प्रदेश का लकवा), हनुस्तम्भ (मुँह खुला अथवा बन्द रह जाना), शिरःकम्प, मूर्च्छा, दृष्टि की विकृति, अपस्मार, उन्माद, अपतन्त्रक (हिस्टीरिया), आक्षेपक, अस्थिभग्न तथा सन्धिभग्न को नष्ट करता है।

कटुतैल की मूर्च्छन-विधि—बड़ी हरड़, हल्दी, नागरमोथा, कच्चे बेल की गुदी, दाड़िम, नागकेसर, कालाजीरा, नेत्रबाला, नालुका तथा बहेड़ा (1-1 तोला), मजीठ आठ कर्ष, जल एक आढक, कटुतैल एक प्रस्थ, सबको मिलाकर पकायें। इससे तेल का 'आमदोष' दूर हो जाता है। सभी तेलों को यथासम्भव उक्त विधि से शुद्ध कर लें, उसके बाद तेल पाक करना चाहिये।

तेल की गन्धवृद्धि—कूठ आदि गन्ध द्रव्य, हींग आदि निर्यास द्रव्य और चमेली आदि के फूल यदि तेल में गन्धवृद्धि के लिए डालने हों, तो तेल का पाक हो जाने के बाद ही इन्हें डालना चाहिये। यह प्रक्षेप 'पत्रकल्क' कहा जाता है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का नवाँ अध्याय समाप्त।।9।।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

आसवारिष्टकल्पना

दशमोऽध्यायः आसवारिष्टकल्पना [बायाँ स्तम्भ / Left Column] सन्धान-कल्पना द्रवेषु चिरकालस्थं द्रव्यं यत्सन्धितं भवेत्। आसवारिष्टभेदैस्तु प्रोच्यते भेषजोचितम्॥१॥ जल आदि द्रवपदार्थ में गुड़, धाय के फूल आदि द्रव्यों के चिरकाल (जितने समय में सन्धान हो) तक पड़े रहने से सन्धान (विशेष प्रकार के रस एवं गन्ध आदि की उत्पत्ति) होने के कारण जो सन्धित द्रव प्रस्तुत होता है, उसके आसव, अरिष्ट, सीधु एवं सुरा आदि नाम हैं और ये द्रव औषधियों (जिनके योग से ये आसव-अरिष्ट आदि बनाये जाते हैं) के अनुसार कार्य करते हैं। वक्तव्य-उक्त सभी द्रव मादक होने के कारण 'मद्य' कहे जाते हैं, क्योंकि सभी में मादक तत्त्व अवश्य होता है। आजकल उपलब्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इनके 'अर्क' निकालने की विधि का उल्लेख नहीं पाया जाता। केवल 'भैषज्यरत्नावली' नामक संग्रह-ग्रन्थ में 'मृतसञ्जीवनी सुरा' के निर्माण की विधि में 'मृन्मये मोचिकायन्त्रे मयूराख्येऽपि यन्त्रके'। (ज्वराधिकार), कहकर अर्क निकालने का विधान किया गया है। मोचिकायन्त्र तथा मयूरयन्त्र वे ही यन्त्र हैं, जिनकी सहायता से अर्क निकाले जाते हैं। उपयोगी तथा आवश्यक द्रव्यों का सन्धान करके उक्त यन्त्रों द्वारा जो 'अर्क' या 'सारद्रव' निकाला जाता है, उसी को 'शराब' या 'मद्य' कहा जाता है। सन्धान कितने समय में हो जाता है, इसका निश्चित निर्देश नहीं किया जा सकता। अतः आचार्य शार्ङ्गधर ने केवल 'चिरकालस्थ' कहना ही उचित समझा, क्योंकि देश तथा काल के भेद से सन्धान का समय भी भिन्न-भिन्न होता है। यथा-शीतदेश में यदि एक मास में सन्धान होता है, तो उष्ण देश में वही 15 दिनों में हो जाता है। एलोपैथी तथा होमियोपैथी पद्धति के अनुसार 'मद्यसार' [दायाँ स्तम्भ / Right Column] (स्प्रिट) में औषधियाँ डालकर और कुछ समय तक पड़ी रहने देकर औषध (टिंचर) तैयार किये जाते हैं और आयुर्वेद की पद्धति के अनुसार औषधि तथा द्रव के संयोग से सन्धान करके अर्थात् मद्यसार उत्पन्न करके औषधियाँ (आसव, अरिष्ट आदि) तैयार कर ली जाती हैं। आसव, अरिष्ट तथा मद्य के योग से निर्मित औषध मध्यांश के कारण शीघ्र ही अपना प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। यथा-'आशुत्वाच्चाशुकर्मकृत्' देखें-सु० उ० अ० 47, श्लोक 5। आसव तथा अरिष्ट का भेद यदपक्वौषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः। अरिष्टः क्वाथसाध्यः स्यात् तयोर्मानं पलोन्मितम्॥२॥ अपक्व (कच्चे) औषध एवं जल के योग से सन्धान करके जो मद्य तैयार किया जाता है, वह 'आसव' कहलाता है और औषध एवं जल का क्वाथ करके जो मद्य तैयार किया जाता है, वह 'अरिष्ट' कहलाता है। इन दोनों की साधारण मात्रा एक पल (4 तोला) है। वक्तव्य-आसव एवं अरिष्ट के नामकरण सम्बन्धी उक्त परिभाषा की आज्ञा का पालन चरक तथा सुश्रुत में नहीं किया गया है। सम्भव है कि उक्त संहिताओं के निर्माताओं ने उस पर ध्यान न दिया हो, अस्तु! उक्त संहिताओं में इस परिभाषा के विरुद्ध बहुत से उदाहरण मिलते हैं। चरक तथा सुश्रुत में आसव एवं अरिष्टों के पान का समय तथा विधि वही है, जो मद्यपान की कही गयी है। देखें-च० चि० अ० 24। अरिष्टों में जल, गुड़ तथा मधु का मान अनुक्तमानारिष्टेषु द्रवद्रोणे तुलां गुड़म्। क्षौद्रं क्षिपेद् गुडादर्धं प्रक्षेपं दशमांशकम्॥३॥ जिन अरिष्टों (आसव, सुरा आदि) में द्रव्यों के मान (तौल) का उल्लेख न हो, उनमें इस प्रकार द्रव्यों का योग

दशमोऽध्यायः ] आसवारिष्टकल्पना 165

करना चाहिये। यथा-एक द्रोण (12 सेर, 3 पाव, 4 तोला) द्रव में एक तुला (5 सेर) गुड़, मधु आधा (2½ सेर) और प्रक्षेप द्रव्य द्रव की अपेक्षा दशमांश (1¼ सेर 2½ तोला)।

वक्तव्य-अरिष्ट क्वाथ रस द्वारा बनाये जाते हैं, इसलिये क्वाथ द्रव्यों के अतिरिक्त उसमें जो द्रव्य डाले जाते हैं, उनका मान दशमांश होना चाहिये, क्योंकि उन्हीं को 'प्रक्षेप' कहा जाता है। अरिष्ट को (अरिष्टो द्रव्यसंयोगसंस्कारादधिको गुणैः। सु०सू०अ० 45.194) उत्तम मानने का कारण भी यही है कि उसमें क्वाथ्य द्रव्य का सार बहुत अधिक रहता है। आसव तथा सुरा आदि में भी प्रधान द्रव्यों के अतिरिक्त प्रक्षेप द्रव्यों का मान द्रव का दसवाँ भाग ही होना चाहिये। प्रधान द्रव्य तो द्रव की अपेक्षा चतुर्थांश डालना चाहिये।

सीधु का लक्षण ज्ञेयः शीतरसः सीधुरपक्वमधुरद्रवैः । सिद्धः पक्वरसः सीधुः सम्यक्वमधुरद्रवैः ॥4॥

अपक्व (अग्नि से न पकाये हुये), मधुर (मीठे) द्रवों (ईख का रस आदि) के सन्धान से बना हुआ द्रव 'शीतरस सीधु' (कच्चा सिरका) कहलाता है और पकाये हुये मधुर द्रव्यों का सन्धित द्रव 'सीधु' कहा जाता है।

वक्तव्य-ईख के रस तथा अंगूर आदि के रस को बर्तन में डालकर रख दिया जाता है। प्रत्येक दो-तीन सप्ताह के पश्चात् छानकर दूसरे बर्तन में रख लिया जाता है। इसी प्रकार बार-बार जाला पड़ने पर छान लेना चाहिये, जब जाला पड़ना बन्द हो जाये और द्रव इतना निर्मल हो जाये कि उसमें दर्शक का प्रतिबिम्ब दिखलायी पड़ने लगे, तो समझना चाहिये कि सिरका तैयार हो गया है। अब इसे धीरे से छानकर बोतलों में भरकर रख दें।

सुरा आदि का लक्षण परिपक्वान्नसन्धानसमुत्पन्नां सुरां जगुः । सुरामण्डः प्रसन्ना स्यात् ततः कादम्बरी घना ।।5।। तदधो जगलो ज्ञेयो मेदको जगलाद् घनः । पक्वोऽसौ हृतसारः स्यात् सुराबीजं च किण्वकम् ।।6।।

परिपक्व (पके हुये) अन्न (चावल तथा जौ आदि) के सन्धान से (खमीर उठने से) बनी हुई मद्य को 'सुरा' कहा जाता है। सुरा के निम्नलिखित भेद हैं, यथा-1. सुरा का मण्ड (शत प्रतिशत मद्यांश) प्रसन्ना (स्प्रिट्) कहलाता है, 2. कादम्बरी प्रसन्ना की अपेक्षा घनी या गाढ़ी या जलीयांश युक्त होती है, इसमें मद्यांश कुछ कम होता है। 3. कादम्बरी की अपेक्षा निम्न श्रेणी के मद्य को 'जगल' कहा जाता है, 4. जगल से भी घन या गाढ़ी मद्य को 'मेदक' कहा जाता है। 5. जिसमें मद्य की थोड़ी गन्धमात्र रहती है और सुरा के बीज (जिनसे सुरा बनायी जाती है) को 'किण्वक' कहा जाता है।

वक्तव्य-सुरा सामग्री का सन्धान हो जाने पर जब यन्त्र द्वारा मद्य निकाली जाती है, तो उसमें से पहले जो अर्क (सार द्रव) प्राप्त होता है, वह बहुत स्वच्छ होता है। अतएव उसे प्रसन्ना कहते हैं। इसमें जलीयांश बिल्कुल नहीं होता अथवा बहुत कम होता है, अतः इसमें जल मिलाकर पीया जाता है। कादम्बरी आदि में कुछ-कुछ जल का अंश रहता है, अतएव वे निम्न श्रेणी की सुरायें कही जाती हैं। प्राचीनकाल में भले ही सुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस एवं मनुष्य इस उपद्रवकारिणी सुरा का आदर के साथ सेवन करते रहे हों (देखें-च० चि० अ० 24), किन्तु हम तो यही कहेंगे कि 'मद्यविक्रयसन्धान-दानादानानिनाचरेत्' (वा०सू०अ० 2.40)। अर्थात् मद्य का बनाना, बेचना, देना और लेना नहीं करना चाहिये।

वारुणी का लक्षण यत्तालखर्जूररसैः सन्धिता सा हि वारुणी।

जो मद्य ताल (ताड़) तथा खजूर के रस का सन्धान करके तैयार किया जाता है, उसे 'वारुणी' कहा जाता है।

वक्तव्य-ताड़ तथा खजूर पर जहाँ हरे पत्र लगे रहते हैं, वहाँ एक पात्र लटका दिया जाता है वह रात भर में उक्त वृक्षों के रस से भर जाता है। इस रस को वारुणी कहा जाता है। वृक्ष से उतारते समय यह रस मीठा होता है और चार-पाँच प्रहर के पश्चात् खट्टा हो जाता है।

शुक्त बनाने की विधि कन्दमूलफलादीनि सस्नेहलवणानि च ।। 7 ।। यत्र द्रवेऽभिषूयन्ते तच्छुक्तमभिधीयते ।

कन्द (सूरण या जिमीकन्द), आदि मूल (मूली, गाजर, आलू आदि) तथा फल (लौकी, सेम, किवाँच) आदि पदार्थों को तथा स्नेह युक्त (राई तथा तेल के बड़े, पकौड़े आदि) तथा नमक को द्रव (जल तथा इक्षुरस आदि) में डालकर जो सन्धान किया जाता है, उसे 'शुक्त' कहा जाता है।

वक्तव्य-यह शुक्त दो-तीन दिन में तैयार हो जाता है और इसे 'काञ्जी' कहा जाता है। जैसे-गाजर तथा आलू आदि की काञ्जी।

166 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे विनष्ट तथा चुक्र लक्षण विनष्टमम्लतां यातं मद्यं वा मधुरद्रवम् ।। ४ ।। विनष्टः सन्धितो यस्तु तच्चुक्रमभिधीयते । मद्य अथवा इक्षुरस आदि मधुर द्रव जब खट्टे हो जाते हैं तो उन्हें 'विनष्ट' (मर गया या बिगड़ गया) कहा जाता है, किन्तु यदि विनष्ट होने पर भी उसमें सन्धान (खमीर) हो जाये तो उसे 'चुक्र' कहा जाता है। मधुशुक्त बनाने की विधि जम्बीराणां फलरसः प्रस्थैकः कुडवोन्मितम् ।। ९ ।। माक्षिकं तत्र दातव्यं पलैका पिप्पली स्मृता। एतदेकीकृतं सर्वं मृद्भाण्डे च निधापयेत् ।। १० ।। यवाम्भो मधुसंयुक्तं शृङ्गबेरगुडान्वितम् । धान्यराशौ त्रिरात्रिस्र्थं मधुशुक्तमुदाहृतम् ।। ११ ।। जम्बीरी नींबूओं का रस एक प्रस्थ (64 तोला), मधु एक कुडव (16 तोला) और पिप्पली एक पल (4 तोला) इन सब को मिट्टी के पात्र में भरकर तीन अथवा सात दिन तक रख दें। इस प्रकार 'मधुशुक्त' तैयार हो जाता है। जौ का क्वाथ (एक प्रस्थ-64 तोला), मधु (एक कुडव=16 तोला), शृंगबेर तथा गुड़ दोनों एक-एक पल (4-4 तोला) मिट्टी के पात्र में डालकर उसका मुख बन्द करके तीन दिन तक धान्यराशि (गेहूँ आदि के ढेर अथवा भूसी में) दबाकर रख दें। इसे भी 'मधुशुक्त' कहा जाता है। वक्तव्य- उक्त दोनों विधियों से 'मधुशुक्त' बनाया जाता है। गुड़शुक्त का लक्षण गुदाम्बुना सतैलेन कन्दमूलफलैस्तथा। सन्धितं चाम्लतां यातं गुड़शुक्तं तदुच्यते ।। १२ ।। गुड़ (1 पाव), जल (2 सेर), तेल युक्त पदार्थ राई एवं बड़े आदि, कन्द (आलु, जिमीकन्द आदि) मूल (मूली, गाजर आदि) एवं फलों (लौकी आदि) के संयोग से जो सन्धान करके अम्लद्रव (खट्टा जल) तैयार किया जाता है, उसे 'गुड़शुक्त' कहा जाता है। वक्तव्य- यह भी एक प्रकार की काञ्जी ही है। इसमें यद्यपि नमक डालने की चर्चा नहीं की गयी, फिर भी नमक अवश्य डालना चाहिये। शुक्त का लक्षण एवमेवेक्षुशुक्तं स्यान्मृद्वीकासम्भवं तथा। इसी प्रकार ईख के रस, मुनक्का या अंगूर के रस का भी 'शुक्त' बनाया जाता है। तुषाम्बु तथा सौवीर का लक्षण तुषाम्बु सन्धितं ज्ञेयमामैर्विदलि तैरयवैः ।। १३ ।। यवैस्तु निस्तुषैः पक्ववैः सौवीरं सन्धितं भवेत् । कच्चे एवं दले हुये जौ का सन्धान करने से जो द्रव तैयार किया जाता है उसे 'तुषाम्बु' कहा जाता है। तुष रहित (छड़े हुये) परिपक्व जौ का सन्धान करने से जो द्रव तैयार किया जाता है, वह 'सौवीर' होता है। वक्तव्य- 'तुषाम्बु' तथा 'सौवीर' ये दोनों नाम जौ की मद्य के हैं। इसका प्रचार पर्वतीय प्रदेशों (नैनीताल, शिमला आदि) में बहुत अधिक देखने में आता है, किन्तु कुछ लोग इन्हें 'काञ्जी' का भेद मानते हैं। सुश्रुत ने कहा है- 'षड्रात्रात् सप्तरात्राद् वा ते च पेये प्रकीर्तिते'। (सु० सू० अ० 44 श्लोक 45)। अर्थात् ये दोनों मद्य छः-सात दिन में पीने योग्य हो जाते हैं। काञ्जिक का लक्षण कुल्माषधान्यमण्डादि सन्धितं काञ्जिकं विदुः ।। १४ ।। षण्डाकी सन्धिता ज्ञेया मूलकैः सर्षपादिभिः । कुल्माष (उबाले हुये गेहूँ तथा चना आदि) तथा धान्यों (चावल तथा जौ आदि) के माँड (राई, नमक, हल्दी आदि के सन्धान) से बना हुआ द्रव 'काञ्जिक' या 'काञ्जी' कहा जाता है। मूली तथा सरसों या राई आदि से बनायी हुई काञ्जी को 'षण्डाकी' जानना चाहिये। वक्तव्य- उक्त द्रवों का सन्धान दो-चार दिन में ही हो जाता है। आसव से षण्डाकी तक के सम्बन्ध में अधिक परिचय प्राप्त करने के लिए देखें-च० सू० अ० 26, च० चि० अ० 24 एवं सु० सू० अ० 45। सुरा या मद्य-योनि (जिन द्रव्यों से सुरा बनायी जाती है), संस्कार (जिन विधियों से तैयार की जाती है) और नाम (जिन संज्ञा) आदि भेदों के कारण सुरा बहुत प्रकार की होने पर भी एक ही प्रकार की कही जाती है, क्योंकि मद सबमें समान होता है। होमियोपैथिक में औषध-निर्माण विधि- तत्-तत् रोगनाशक औषध द्रव्यों को उत्तम सुरा (स्प्रिट) में डालकर रख दिया जाता है और कुछ समय के बाद छानकर उस सुरा का प्रयोग किया जाता है। इस विधि का उल्लेख च० चि०

वारुणी (सुरा) में आसव बनायें। क्या उक्त चिकित्सापद्धति

दशमोऽध्यायः] आसवारिष्टकल्पना 167 अ० 15 श्लोक 99 में मिलता है। जैसे 'देवदारुव- चामुस्तनागरातिविषाऽभयाः। वारुण्यामासुताः'। अर्थात् देवदारु, बालवच, नागरमोथा, सोंठ, अतीस एवं हरड़ का वारुणी (सुरा) में आसव बनायें। क्या उक्त चिकित्सापद्धति का मूल आधार यही तो नहीं है? उशीरासव निर्माण-विधि उशीरं बालकं पद्मं काश्मरीं नीलमुत्पलम्। प्रियंगुं पद्मकं लोध्रं मञ्जिष्ठां धन्वयासकम् ।। 15 ।। पाठां किराततिक्तं च न्यग्रोधोदुम्बरं शठीम्। पर्पटं पुण्डरीकं च पटोलं काञ्चनारकम् ।। 16 ।। जम्बूशाल्मलिनिर्यासं प्रत्येकं पलसम्मितान्। भागान् सुचूर्णितान् कृत्वा द्राक्षायाः पलविंशतिम् ।। 17 ।। धातकीं षोडशपलां जलद्रोणद्वये क्षिपेत्। शर्करायास्तुलां दत्त्वा क्षौद्रस्यैकतुलां तथा ।। 18 ।। मासैकं स्थापयेद् भाण्डे मांसीमरिचधूपिते। उशीरासव इत्येष रक्तपित्तविनाशनः ।। 19 ।। पाण्डुकुष्ठप्रमेहार्शःकृमिशोथहरस्तथा । खस, नेत्रबाला, लाल कमल, गम्भार की छाल, नीलकमल (नीलोफर), फूल प्रियंगु, पद्माकाष्ठ, लोध, मजीठ, धमासा, पाठा, चिरायता, बरगद की छाल, गूलर की छाल, कचूर, पित्तपापड़ा, सफेदकमल, परबल की पत्ती, कचनार की छाल, जामुन की छाल तथा सेमल की गोंद (मोचरस) प्रत्येक द्रव्य का 4-4 तोला चूर्ण, द्राक्षा (मुनक्का) बीस पल (80 तोला या 1 सेर), धाय के फूल सोलह (64 तोला), जल दो द्रोण (25 सेर 2 पाव 8 तोला), शर्करा (खाँड़) एक तुला (5 सेर) तथा मधु आधी तुला (2½ सेर)-इन सब द्रव्यों को जटामांसी तथा मरिच से धूप दिये हुये पात्र में डालकर एक मास-पर्यन्त रख छोड़ना चाहिये (इसके पश्चात् निर्मल द्रव को छानकर बोतलों में भर दें)। इस औषध का नाम 'उशीरासव' है। यह रक्तपित्त का विनाश करता है और पाण्डुरोग, कुष्ठ, प्रमेह, अर्श, कृमि तथा शोथ को हरता है। कुमार्यासव (सुपक्वरससंशुद्धं कुमार्याः पत्रमाहरेत् ।। 20 ।। यत्नेन रसमादाय पात्रे पाषाणमृन्मये। द्रोणे गुडतुलां दत्त्वा घृतभाण्डे निधापयेत् ।। 21 ।। माक्षिकं पक्वलोहं च तस्मिन्नर्धतुलां क्षिपेत्। कटुत्रिकं लवङ्गं च चातुर्जातकमेव च ।। 22 ।। चित्रकं पिप्पलीमूलं विडङ्गं गजपिप्पली। चविकं हपुषा धान्यं क्रमुकं कटुरोहिणी ।। 23 ।। मुस्ता फलत्रिकं रास्ना देवदारु निशाद्वयम्। मूर्वा मधुरसा दन्ती मूलं पुष्करसम्भवम् ।। 24 ।। बला चातिबला चैव कपिकच्छूस्त्रिकण्टकम्। शतपुष्पा हिङ्गुपत्री आकल्लकमूटिङ्गणम् ।। 25 ।। पुनर्नवाद्वयं लोध्रं धातुमाक्षिकमेव च। एषां चार्धपलं दत्त्वा धातक्यास्तु पलाष्टकम् ।। 26 ।। पलं चार्धपलं चैव पलद्वयमुदाहृतम् । वपुर्वयःप्रमाणेण बलवर्णाग्निदीपनम् ।। 27 ।। बृंहणं रोचनं वृष्यं पक्तिशूलनिवारणम्। अष्टावुदरजान् रोगान् क्षयमुग्रं च नाशयेत् ।। 28 ।। विंशतिं मेहजान् रोगानुदावर्तमपस्मृतिम् । मूत्रकृच्छ्रमपस्मारं शुक्रदोषं तथाश्मरीम् ।। 29 ।। कृमिजं रक्तपित्तं च नाशयेत् तु न संशयः।) घीकुआर के परिपक्व रसयुक्त तथा साफ सुथरे पत्तों का संग्रह करें, प्रयत्न के साथ उनका रस निकालकर पत्थर अथवा घृतलिप्त मृत्तिका पात्र में डाल दें। उक्त रस एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला), गुड़ एक तुला (5 सेर), मधु आधा तुला (2½ सेर), लोहभस्म आधी तुला (2½ सेर), सोंठ, मरिच, पीपल, लौंग, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर, चीता का जड़, पीपलामूल, वायविडंग, गजपीपल, चाव, हाऊबेर, धनियाँ, सुपारी, कुटकी, नागरमोथा, हरड़, बहेड़ा, आँवला, रासना, देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, मरोड़फली, मुलेठी, दन्ती, पोहकरमूल, बरियारा, अतिबला, कंची, किवाँच के बीज, गोखरू, सौंफ, हिङ्गपत्री, अकरकरा, उतंगण, पुनर्नवा, रक्तपुनर्नवा, लोध, सोनामाखी की भस्म (भस्म-निर्माण-विधि शा० सं० म० खं० अ० 11 में देखें) प्रत्येक द्रव्य आधा-आधा पल (2-2 तोला) तथा धाय के फूल आठ पल (32 तोला) इन सब द्रव्यों को उक्त घीकुआर के रस में घोलकर और पात्र का मुख बन्द करके एक मास-पर्यन्त पड़ा रहने दें। जब तैयार हो जाये तो स्वच्छ द्रव छानकर बोतलों में भर दें। इसका नाम 'कुमार्यासव' है। इसकी मात्रा एक पल (4 तोला), आधा पल (2 तोला) अथवा दो पल (8 तोला) तक रोगी के शरीर और आयु को देखकर निश्चित की जाती है। यह आसव बल, वर्ण तथा अग्नि को बढ़ाता है, धातुवर्द्धक है, रुचिकर है, शुक्रवर्द्धक है, परिणामशूल का विनाशक है, आठ प्रकार के उदररोगों, भयानक क्षयरोग, बीस प्रकार के

168 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ मध्यमखण्डे

168शार्ङ्गधरसंहिता[ मध्यमखण्डे

प्रमेहों, उदावर्त, अपस्मृति (स्मरण-शक्ति की न्यूनता) मूत्रकृच्छ्र, मिरगी, शुक्रधातु के विकारों, पथरी, कृमिरोग तथा रक्तपित्त को विनष्ट करता है। इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। वक्तव्य—उक्त आसव में लोह-मिश्रण के विषय में दो मत हैं—(1) कुछ लोगों का कथन है कि इसमें अत्यन्त सूक्ष्म लोह-चूर्ण डालना चाहिये। एक मास में जितना आवश्यक होता है उसमें घुल जाता है और (2) दूसरे लोगों का कथन है कि इसमें लोहभस्म डालनी चाहिये। दोनों ही मत युक्तियुक्त हैं और प्रचलित भी हैं। सच बात यह है कि तेरह सेर द्रव में ढाई सेर लोह डाला जाता है और वह उतना ही या उससे कुछ कम पात्र का पेंदी में पड़ा हुआ मिल जाता है। भले ही भस्म डाली गयी हो अथवा लोहचूर्ण—इससे प्रमाणित होता है कि इतने द्रव में इतना लोह घुल नहीं सकता। कषायरस में लोह को अपने में विलीन करने की शक्ति होती है। अतः उक्त आसव में जितना कषायरस (त्रिफला आदि) होता है, उसके अनुसार उतना-सा लोह विलीन हो जाता है। उक्त आसव अपतन्त्रक या हिस्टीरिया रोग का परमोत्तम औषध है।

पिप्पल्यासव

पिप्पली मरिचं चव्यं हरिद्रा चित्रको घनः॥३०॥ विडङ्गं क्रमुको लोध्रः पाठा धात्र्येलवालुकम्। उशीरं चन्दनं कुष्ठं लवङ्गं तगरं तथा॥३१॥ मांसी त्वगेलापत्रं च प्रियङ्गुर्नागकेशरम्। एषामर्धपलान् भागान् सूक्ष्मचूर्णीकृताञ्शुभान्॥३२॥ जलद्रोणद्वये क्षिप्त्वा दद्याद् गुडतुलात्रयम्। पलानि दश धातक्या द्राक्षा षष्टिपला भवेत्॥३३॥ एतान्येकत्र संयोज्य मृद्भाण्डे च विनिक्षिपेत्। ज्ञात्वाऽऽगतरसं तस्य पाययेदग्न्यपेक्षया॥३४॥ क्षयं गुल्मोदरं कार्श्यं ग्रहणीं पाण्डुतां तथा। अर्शांसि नाशयेच्छीघ्रं पिप्पल्याद्यासवस्त्वयम्॥३५॥

पीपल, मरिच, चव्य, हल्दी, चीता की जड़, मोथा, वायविडंग, सुपारी, लोध, पाठा, आँवला, एलवालुक, खस, श्वेतचन्दन, कूठ, लौंग, तगर, जटामांसी, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, फूलप्रियंगु तथा नागकेशर प्रत्येक उत्तम द्रव्य आधा-आधा पल (2-2 तोला) लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को दो द्रोण ($2\frac{1}{2}$ सेर 8 तोला) जल में डाल दें और उसमें गुड़ तीन तुला (15 सेर), धाय के फूल दस पल (40 तोला) और द्राक्षा (दाख) साठ पल (3 सेर) इन सभी द्रव्यों को मिट्टी के एक पात्र में भर दें। जब आसव तैयार हो जाये तो उसे छानकर रख लें। इस आसव को रोगी की जठराग्नि का विचार करके पिलाना चाहिये। यह आसव क्षयरोग, गुल्म, उदर, कृशता, ग्रहणीरोग, पाण्डुरोग, तथा बवासीर को शीघ्र ही नष्ट करता है। इसका नाम 'पिप्पल्यासव' है।

लोहासव

लोहचूर्णं त्रिकटुकं त्रिफलां च यवानिकाम्। विडङ्गं मुस्तकं चित्रं चतुःसङ्ख्यापलं पृथक्॥३६॥ धातकीकुसुमानां तु प्रक्षिपेत् पलविंशतिम्। चूर्णीकृत्य ततः क्षौद्रं चतुःषष्टिपलं क्षिपेत्॥३७॥ दद्याद् गुडतुलां तत्र जलद्रोणद्वयं तथा। घृतभाण्डे विनिक्षिप्य निदध्यान्मासमात्रकम्॥३८॥ लोहासवममुं मर्त्यः पिबेद् वह्निकरं परम्। पाण्डुश्वयथुगुल्मानि जठराण्यर्थशांसि रुजम्॥३९॥ कुष्ठं प्लीहामयं कण्डूं कासं श्वासं भगन्दरम्। अरोचकं च ग्रहणीं हृद्रोगं च विनाशयेत्॥४०॥

लोहचूर्ण, सोंठ, मरिच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, अजवायन, बायविडंग, मोथा तथा चीता की जड़ प्रत्येक द्रव्य चार-चार पल (16-16 तोला) और धाय के फूल बीस पल (1 सेर) लेकर सबका चूर्ण बना लें। मधु साठ पल (3 सेर) गुड़ एक तुला (5 सेर) और जल दो द्रोण ($25\frac{1}{2}$ सेर 8 तोला), उक्त सब द्रव्यों को घृतलिप्त पात्र में डालकर एक मास-पर्यन्त सुरक्षित रखें। तैयार हो जाने पर छानकर बोतलों में भर दें। इस आसव का नाम 'लोहासव' है। इसका पान करने से जठराग्नि दीप्त होती है। यह आसव पाण्डुरोग, शोथ, गुल्म, उदररोग, अर्श की पीड़ा, कुष्ठ, प्लीहारोग, कण्डू (खुजली), कास, श्वास, भगन्दर, अरुचि, ग्रहणीरोग तथा हृद्रोग को विनष्ट करता है। वक्तव्य—इस आसव में भी लौह चूर्ण अथवा भस्म डाली जाती है।

मृद्वीकारिष्ट

(मृद्वीकायाः पलशतं चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत्। द्रोणशेषे सुशीते च पूते तस्मिन् प्रदापयेत्॥४१॥ तुले द्वे क्षौद्रखण्डाभ्यां धातक्याः प्रस्थमेव च। कङ्कोलकं लवङ्गं च फलं जात्यास्तथैव च॥४२॥ पलांशकं च मरिचत्वगेलापत्रकेसरम्। पिप्पली चित्रकं चव्यं पिप्पलीमूलरेणुके॥४३॥

दशमोऽध्यायः ] आसवारिष्टकल्पना 169 घृतभाण्डे विनिक्षिप्य चन्दनागरुधूपिते। कर्पूरवासितो ह्येष ग्रहण्या दीपनः परः।।44।। अर्शसां नाशने श्रेष्ठ उदावर्तस्य गुल्मनुत्। जठरक्रिमिकुष्ठानि व्रणांस्तु विविधांस्तथा।।45।। अक्षिरोगशिरोरोगगलरोगांश्च नाशयेत्।) मुनक्का सौ पल (5 सेर) लेकर चार द्रोण जल में पकाना चाहिये, जब एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल अवशिष्ट रह जाये तो क्वाथ को छान लें और जब यह क्वाथ शीतल हो जाये तो इसमें मधु एक तुला (5 सेर), खाँड़ एक तुला (5 सेर) धाय के फूल 3 पाव 4 तोला और शीतलचीनी, लौंग, जायफल, मरिच, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, नागकेशर, पीपल, चीता, चव्य, पीपलामूल तथा रेणुका प्रत्येक द्रव्य का एक-एक पल चूर्ण डालें। इन सब वस्तुओं को एक साथ घोलकर सफेद चन्दन तथा अगरु द्वारा सुधूपित पात्र में डालकर एक मास पर्यन्त मुख बन्द करके रख दें। तैयार हो जाने पर छानकर दूसरे पात्र में भर दें और उसमें दो तीन तोला शुद्ध देशी कर्पूर डाल दें। जब कपूर (एक सप्ताह के पश्चात्) घुल जाये और द्रव निर्मल हो जाये तो स्वच्छ वस्त्र से छानकर बोतलों में भर दें। यह अरिष्ट ग्रहणी (पाचकसंस्थान) की क्रिया का परम दीपक है। अर्श, उदावर्त, गुल्म, उदररोग, क्रिमिरोग, कुष्ठरोग, अनेक प्रकार के व्रण, नेत्ररोग, शिरोरोग तथा गलरोगों को नष्ट करता है। वक्तव्य-स्मरण रहे कि कपूर जल में नहीं घुलता, किन्तु मद्य में घुल जाता है। इसलिये उक्त अरिष्ट में मध्यांश उत्पन्न होने पर अन्त में कपूर डाला जाता है जिससे मद्य में वह घुल सके। कुटजारिष्ट तुलां कुटजमूलस्य मृद्वीकार्धतुलां तथा।।46।। मधूकपुष्पकाश्मर्यभागान् दशपलोन्मितान्। चतुर्द्रोणेऽम्भसः पक्त्वा क्वाथे द्रोणावशेषिते।।47।। धातक्या विंशतिपलं गुडस्य च तुलां क्षिपेत्। मासमात्रं स्थितो भाण्डे कुटजारिष्टसञ्जितः।।48।। ज्वरान् प्रशमयेत् सर्वान् कुर्यात् तीक्ष्णं धनञ्जयम्। कुरैया के जड़ की छाल 1 तुला (5 सेर), मुनक्का आधी तुला (2½ सेर), महुए के फूल तथा गम्भार के फल दस-दस पल (40-40 तोला)-इन सब द्रव्यों को जौकुट करके चार द्रोण जल में डालकर क्वाथ करे, जब एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल शेष रह जाये तो क्वाथ को छानकर रख लें। फिर इस क्वाथ में धाय के फूल बीस पल (1 सेर) और गुड़ एक तुला (5 सेर) मिट्टी के घड़े में भरकर और उसका मुख बन्द करके एक मास-पर्यन्त रख दें। तैयार हो जाने पर छानकर रख लें। इसका नाम 'कुटजारिष्ट' है। यह सभी प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है और अग्नि को दीप्त करता है। विडङ्गारिष्ट विडङ्गं ग्रन्थिकं रास्ना कुटजत्वक्फलानि च ।। 49 ।। पाठैलवालुकं धात्री भागान् पञ्चपलान् पृथक्। अष्टद्रोणेऽम्भसः पक्त्वा कुर्याद् द्रोणावशेषितम् ।। 50 ।। पूते शीते क्षिपेत् तत्र क्षौद्रं पलशतत्रयम् । धातकीं विंशतिपलां त्रिजातं द्विपलं तथा ।। 51 ।। प्रियङ्गुकाञ्चनाराणां सलोध्राणां पलं पलम्। व्योषस्य च पलान्यष्टौ चूर्णीकृत्य प्रदापयेत् ।। 52 ।। घृतभाण्डे विनिक्षिप्य मासमेकं निधापयेत्। ततः पिबेद् यथार्हं तु जयेद् विद्रधिमुत्थितम् ।। 53 ।। ऊरुस्तम्भामरीमेहान् प्रत्यष्ठीलाभगन्दरान्। गण्डमालां हनुस्तम्भं विडङ्गारिष्टसञ्ज्ञकम् ।। 54 ।। वायविडंग, पीपलामूल, रास्ना, कुरैया का छाल एवं फल (इन्द्रजौ), पाठा, एलवालुक एवं आँवला, प्रत्येक द्रव्य 1-1 पाव लेकर और उनको जौकुट करके आठ द्रोण जल में डालकर क्वाथ करें। जब एक द्रोण जल शेष रह जाये तो छान लें और शीतल हो जाने पर उसमें तीन सौ पल (15 सेर) मधु डालकर घोल दें। फिर उसमें धाय के फूल बीस पल (1 सेर), दालचीनी, बड़ी इलायची एवं तेजपत्ता दो-दो पल (8-8 तोला), 3 फूलप्रियंगु, कचनार की छाल एवं पठानी लोध (4-4 तोला), त्रिकटु (तीनों द्रव्य मिलाकर) आठ पल (32 तोला) लेकर उनका चूर्ण बनाकर उपर्युक्त क्वाथ तथा मधु के घोल में मिलाकर घृतलिप्त मिट्टी के पात्र में डालकर उसके मुख को बन्दकर एक मांस तक रख दें। तैयार होने पर छानकर रख लें। इसका उचित मात्रा में विधिपूर्वक सेवन करना चाहिये। यह भयानक विद्रधि, ऊरुस्तम्भ, अश्मरी (पथरी) प्रमेहों, प्रत्यष्ठीला (वातव्याधि), भगन्दरों, गण्डमाला एवं हनुस्तम्भ को जीतता है। इसका नाम 'विडङ्गारिष्ट' है। देवदार्वादि अरिष्ट तुलार्धं देवदारोः स्याद् वासा च पलविंशतिः। मञ्जिष्ठेन्द्रयवा दन्ती तगरं रजनीद्वयम् ।। 55 ।।

170 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे रास्ना कृमिघ्नं मुस्तं च शिरीषं खदिरार्जुनौ । भागान् दशपलान् दद्याद् यवान्या वत्सकस्य च ।। 56 ।। चन्दनस्य गुडूच्याश्च रोहिण्याश्चित्रकस्य च। भागानष्टपलानेतानष्टद्रोणेऽम्भसः पचेत् ।। 57 ।। द्रोणशेषे कषाये च पूते शीते प्रदापयेत्। धातक्याः षोडशपलं माक्षिकस्य तुलात्रयम् ।। 58 ।। व्योषस्य द्विपलं दद्यात् त्रिजातस्य चतुष्पलम् । चतुष्पलं प्रियङ्गोश्च द्विपलं नागकेशरम् ।। 59 ।। सर्वाण्येतानि सञ्चूर्ण्य घृतभाण्डे निधापयेत्। मासादूर्ध्वं पिबेदेनं प्रमेहं हन्ति दुर्जयम् ।। 60 ।। वातरोगान् ग्रहणीशोर्मूत्रकृच्छ्राणि नाशयेत्। देवदार्वादिकोऽरिष्टः कण्डूकुष्ठविनाशनः ।। 61 ।। देवदारु का बुरादा आधी तुला (2½ सेर), अडूसा की पत्ती बीस पल (1 सेर), मजीठ, इन्द्रजौ, दन्ती, तगर, हल्दी, दारुहल्दी, रास्ना, वायविडंग, मोथा, सिरस की छाल, खैरसार तथा अर्जुनवृक्ष की छाल-प्रत्येक दस-दस पल (40-40 तोला), अजवायन, कुरैया की छाल, श्वेतचन्दन का बुरादा, गिलोय, कुटकी तथा चीता की जड़-प्रत्येक द्रव्य आठ-आठ पल (32-32 तोला) लेकर उनको जौकुट करके आठ द्रोण जल में डालकर क्वाथ करे। जब एक द्रोण जल अवशिष्ट रह जाये तो छान लें। शीतल होने पर उसमें धाय के फूल सोलह पल (64 तोला) मधु तीन तुला (15 सेर), सोंठ, मरिच तथा पीपल दो पल (सब मिलाकर 8 तोला), त्रिजात (दालचीनी, बड़ी इलायची तथा तेजपत्ता मिलाकर) चार पल (16 तोला), फूलप्रियंगु चार पल (16 तोला) तथा नागकेसर दो पल (8 तोला) इन सबका चूर्ण बनाकर उक्त क्वाथ में मिला दें और मधु को भली-भाँति घोल दें, फिर इस घोल को घृतलिप्त भांड में डालकर और उसका मुख कपड़मिट्टी से बन्द करके रख दें, एक मास के पश्चात् जब अरिष्ट तैयार हो जाये तो छान लें। यह आसव दुःसाध्य प्रमेह, वातजनित रोगों, ग्रहणीरोग, अर्श तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है। इसका नाम 'देवदार्वादि अरिष्ट' है। यह कण्डू (खुजली) तथा कुष्ठ रोग को भी नष्ट करता है। खदिरारिष्ट खदिरस्य तुलार्धं तु देवदारु च तत्समम्। बाकुची द्वादशपला दार्बी स्यात् पलविंशतिः ।। 62 ।। त्रिफला विंशतिपला ह्यष्टद्रोणेऽम्भसः पचेत् । कषाये द्रोणशेषे च पूते शीते विनिःक्षिपेत् ।। 63 ।। तुलाद्वयं माक्षिकस्य तुलैका शर्करा मता। धातक्या विंशतिपलं कङ्कोलं नागकेशरम् ।। 64 ।। जातीफलं लवङ्गैलात्वक्पत्राणि पृथक्-पृथक्। पलोन्मितानि कृष्णाया दद्यात् पलचतुष्टयम् ।। 65 ।। घृतभाण्डे विनिक्षिप्य मासादूर्ध्वं पिबेन्नरः । महाकुष्ठानि हृद्रोगं पाण्डुरोगाबुर्दे तथा ।। 66 ।। गुल्मं ग्रन्थिं कृमीन् कासं श्वासप्लीहोदरं जयेत् । एष वै खदिरारिष्टः सर्वकुष्ठनिवारणः ।। 67 ।। खैरसार आधी तुला (2½ सेर), देवदारु का बुरादा आधी तुला (2½ सेर), बाकुची बारह पल (48 तोला), दारुहल्दी बीस पल (1 सेर) तथा त्रिफला बीस पल (1 सेर)-इन सब द्रव्यों को जौकुट करके आठ द्रोण जल में क्वाथ करें और एक द्रोण जल शेष रह जाने पर छान लें और जब शीतल हो जाये तो इसमें मधु दो तुला (10 सेर) और चीनी एक तुला (5 सेर) डालकर घोल दें। धाय के फूल बीस पल (1 सेर), शीतलचीनी, नागकेसर, जायफल, लौंग, बड़ी इलायची, दालचीनी तथा तेजपत्ता प्रत्येक एक-एक पल (4-4 तोला) तथा पिप्पली चार पल (16 तोला)-इन द्रव्यों को जौकुट करके उक्त घोल में मिला दें और घृतलिप्त मृत्तिका-पात्र में डालकर उसका मुख बन्द करके रख दें। एक मास के पश्चात् तैयार हो जाने पर इसे छानकर पीना चाहिये। यह आसव सात प्रकार के महाकुष्ठों, हृद्रोग, पाण्डुरोग तथा अर्बुद (रसौली), गुल्म, ग्रन्थि (लसीका ग्रन्थि) की विकृति, कृमियों, कास, श्वास एवं प्लीहोदर को जीतता है। इसका नाम 'खदिरारिष्ट' है और यह सब प्रकार के कुष्ठों को भी नष्ट करता है। बब्बूलारिष्ट तुलाद्वयं तु बब्बूल्याश्चतुर्द्रोणे जले पचेत्। द्रोणशेषे रसे शीते गुडस्य च तुलां क्षिपेत् ।। 68 ।। धातकीं षोडशपलां कृष्णां च द्विपलां तथा। जातीफलानि कङ्कोलमेलात्वक्पत्रकेशरम् ।। 69 ।। लवङ्गं मरिचं चैव पलिकान्युपकल्पयेत् । मासं भाण्डे स्थितस्त्वेष बब्बूलारिष्टको जयेत् ।। 70 ।। क्षयं कुष्ठमतीसारं प्रमेहश्वासकासकम्। बबूल (कीकर) की छाल दो तुला (10 सेर) लेकर उसको जौकुट करके चार द्रोण जल में डालकर क्वाथ करें। जब एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) जल शेष रह जाये तो छान लें। शीतल हो जाने पर उसमें गुड़ एक तुला (5

दशमोऽध्यायः ] आसवारिष्टकल्पना 171

दशमोऽध्यायः ] आसवारिष्टकल्पना 171 [बायाँ स्तम्भ] सेर), डालकर घोल दें। धाय के फूल सोलह पल (64 तोला), पीपल दो पल (8 तोला), जायफल, शीतलचीनी, बड़ी इलायची, दालचीनी, तेजपत्ता, नागकेसर, लौंग एवं मरिच प्रत्येक एक-एक पल (4-4 तोला) लेकर और उनका चूर्ण बनाकर उपर्युक्त घोल में मिला दें। तत्पश्चात् इसे घृतलिप्त मृत्तिकापात्र (घड़ा) में डालकर एक मास पर्यन्त पड़ा रहने दें और तैयार हो जाने पर छानकर रख लें। इसका नाम 'बब्बूलारिष्ट' है। यह क्षयरोग, कुष्ठ, अतिसार, प्रमेह, श्वास एवं कास को जीतता है। द्राक्षारिष्ट द्राक्षातुलाधं द्विद्रोणे जलस्य विपचेत् सुधीः।।71।। पादशेषे कषाये च पूते शीते विनिक्षिपेत्। गुडस्य द्वितुलां तत्र त्वगेलापत्रकेशरम्।।72।। प्रियङ्गुर्मरिचं कृष्णा विडङ्गं चेति चूर्णयेत्। पृथक्पलोन्मितैर्भागैस्ततो भाण्डे निधापयेत्।।73।। समन्ततो घट्टयित्वा पिबेज्जातरसं ततः। उरःक्षतं क्षयं हन्ति कासश्वासगलामयान्।।74।। द्राक्षारिष्टाह्वयः प्रोक्तो बलकृन्मलशोधनः। द्राक्षा (दाख) आधी तुला (2½ सेर) लेकर और पीसकर दो द्रोण जल में डालकर क्वाथ करें और चतुर्थांश रहने पर छान लें। जब यह क्वाथ शीतल हो जाये तो इसमें गुड़ दो तुला (10 सेर) डालकर घोल दें और दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर, फूलप्रियंगु, मरिच, पीपल एवं वायविडंग प्रत्येक द्रव्य 4-4 तोला लेकर और इनका चूर्ण बनाकर उक्त घोल में मिला दें। तत्पश्चात् घृतलिप्त मृत्तिकापात्र में डालकर पात्र के मुख को बन्द करके सुरक्षित स्थान में रख दें। जब तैयार हो जाये तो उचित मात्रा में सेवन करें। यह अरिष्ट उरःक्षत (वक्षःस्थल के भीतरी घाव), क्षयरोग (यक्ष्मा), कास, श्वास एवं गले के रोगों को नष्ट करता है। इसका नाम 'द्राक्षारिष्ट' है। यहाँ बलकारक एवं मलशोधक है। वक्तव्य-उक्त अरिष्ट में द्रव अर्थात् द्राक्षा क्वाथ बहुत कम कहा गया है, क्योंकि लगभग 6¼ सेर द्रव में दस सेर गुड़ बहुत अधिक हो जाता है। अतः चतुर्थांश शेष न करके आधा शेष रहने पर अर्थात् 12-13 सेर जल शेष रहे तभी उसमें गुड़ घोलकर मिला देना चाहिये। रोहीतकारिष्ट रोहीतकतुलामेकां चतुर्द्रोणे जले पचेत्।।75।। [दायाँ स्तम्भ] पादशेषे रसे शीते पूते पलशतद्वयम्। दद्याद् गुडस्य धातक्याः पलषोडशिका मता।।76।। पञ्चकोलं त्रिजातं च त्रिफलां च विनिक्षिपेत्। चूर्णयित्वा पलाशेन ततो भाण्डे निधापयेत्।।77।। मासादूर्ध्वं च पिबतां गुदजा यान्ति सङ्क्षयम्। ग्रहणीपाण्डुहृद्रोगप्लीहगुल्मोदराणि च।।78।। कुष्ठशोफारुचिहरो रोहितारिष्टसंज्ञकः। रोहिड़ा की जड़ की छाल एक तुला (5 सेर) लेकर और उसको जौकुट करके चार द्रोण जल में पकायें जब एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला) शेष रह जाये तो छान लें। जब यह क्वाथ शीतल हो जाये तो इसमें गुड़ दो तुला (10 सेर) डालकर घोल दें और धाय के फूल सोलह पल (64 तोला), पिप्पली, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, हरड़, बहेड़ा तथा आँवला प्रत्येक द्रव्य एक-एक पल (4-4 तोला) लेकर और उनका चूर्ण बनाकर उक्त घोल में मिला दें और उपर्युक्त सभी द्रव्यों के घोल को घृत से स्निग्ध मृत्तिकापात्र में डालकर रख दें। एक मास के पश्चात् निर्मल द्रव छान लें। इस अरिष्ट को पीने वाले रोगियों के गुदांकुर (अर्श के मस्से) समाप्त हो जाते हैं और ग्रहणीरोग, पाण्डुरोगों, हृद्रोग, प्लीहारोग, गुल्मरोग तथा उदररोग विनाश को प्राप्त हो जाते हैं। यह अरिष्ट कुष्ठ, शोथ (सूजन) तथा अरुचि को भी हरता है। इसका नाम 'रोहीतकारिष्ट' है। दशमूलारिष्ट (पष्ण्यौ बृहत्यौ गोकण्टो बिल्वोऽग्निमन्थकोऽरलुः ।।79।। पाटला काश्मरी चेति दशमूलमिहोच्यते।) दशमूलानि कुर्वीत भागैः पञ्चपलैः पृथक्।।80।। पञ्चविंशत्पलं कुर्याच्चित्रकं पौष्करं तथा। कुर्याद् विंशत्पलं लोध्रं गुडूची तत्समा भवेत्।।81।। पलैः षोडशभिर्धात्री रविसङ्ख्यैर्दुरालभा। खदिरो बीजसारश्च पथ्या चेति पृथक्पलैः।।82।। अष्टभिर्गणितैः कुष्ठं मञ्जिष्ठा देवदारु च। विडङ्गं मधुकं भार्ङ्गी कपित्थ्योऽक्षः पुनर्नवा।।83।। चव्यं मांसी प्रियङ्गुश्च सारिवा कृष्णजीरकम्। त्रिवृता रेणुकं रास्ना पिप्पली क्रमुकः शठी।।84।। हरिद्रा शतपुष्पा च पद्मकं नागकेशरम्। मुस्तमिन्द्रयवः शृङ्गी जीवकर्षभकौ तथा।।85।। मेदा चान्या महामेदा काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके। कुर्यात् पृथग् द्विपलिकान् पचेदष्टगुणे जले।।86।।

172 \hfill शार्ङ्गधरसंहिता \hfill [मध्यमखण्डे

172 \hfill शार्ङ्गधरसंहिता \hfill [मध्यमखण्डे

चतुर्थांशं शृतं नीत्वा मृद्भाण्डे सन्निधापयेत्। चतुःषष्टिपलां द्राक्षां पचेन्नीरे चतुर्गुणे ।। 87 ।। त्रिपादशेषं शीतं च पूर्वक्वाथे शृतं क्षिपेत्। द्वात्रिंशत्पलिकं क्षौद्रं दद्याद् गुडचतुःशतम् ।। 88 ।। त्रिंशत्पलानि धातक्याः कङ्कोलं जलचन्दनम्। जातीफलं लवङ्गं च त्वगेलापत्रकेशरम् ।। 89 ।। पिप्पली चेति सञ्चूर्ण्य भारङ्गिद्विपलिकैः पृथक्। शाणमात्रां च कस्तूरीं सर्वमेकत्र निक्षिपेत् ।। 90 ।। भूमौ निखातयेद् भाण्डं ततो जातरसं पिबेत्। कतकस्य फलं क्षिप्त्वा रसं निर्मलतां नयेत् ।। 91 ।। ग्रहणीमरुचिं श्वासं कासं गुल्मं भगन्दरम्। वातव्याधिं क्षयः छर्दिं पाण्डुरोगं च कामलाम् ।। 92 ।। कुष्ठान्यर्शांसि मेहांश्च मन्दाग्निमुदराणि च। शर्करामश्मरीं मूत्रकृच्छ्रं धातुक्षयं जयेत् ।। 93 ।। कृशानां पुष्टिजननो वन्ध्यानां गर्भदः परः। अरिष्टो दशमूलाख्यस्तेजःशुक्रबलप्रदः ।। 94 ।। इति श्रीदामोदरसूनूना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे आसवारिष्टकल्पना नाम दशमोऽध्यायः ।। 10 ।।

शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कंटकारी, बनभण्टा, गोखरू, बेलगिरी, अरणी, टेण्टू, पाढल तथा गम्भार इन सम्मिलित दस द्रव्यों को 'दशमूल' कहा जाता है। उक्त दस द्रव्यों को पृथक्-पृथक् पाँच-पाँच पल (20-20 तोला) लें; चीता की जड़ 25 पल (1¼ सेर), आँवला 16 पल (64 तोला), धमासा 12 पल (48 तोला), खैरसार, विजयसार तथा हरड़ प्रत्येक आठ-आठ पल (32-32 तोला), कूठ, मजीठ, देवदारु, वायविडंग, मुलेठी, भारंगी, कैथ का फल, बहेड़ा, पुनर्नवा, चव्य, जटामांसी, फूलप्रियंगु, सारिवा, काला जीरा, निसोत, रेणुका, रास्ना, पिप्पली, सुपारी, कचूर, हल्दी, सौंफ, पद्माकाष्ठ, नागकेसर, नागरमोथा, इन्द्रजौ, सोंठ, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि तथा वृद्धि प्रत्येक द्रव्य दो-दो पल (8-8 तोला) लेकर सभी द्रव्यों को जौकुट करके आठ गुने जल में डालकर क्वाथ करें और चतुर्थांश अवशिष्ट रहने पर छानकर क्वाथ को मृत्तिकापात्र में डालकर रख दें और साठ पल (3 सेर) द्राक्षा (दाख) को चौगुने जल में पकायें, जब तीन भाग (9 सेर) शेष रह जाये तो ठंडा हो जाने पर पहले बनाये गये क्वाथ में डाल दें और मधु तीस पल (1 सेर 8 तोला), गुड़ चार सौ पल (20 सेर) डालकर भली प्रकार मिला दें। धाय के फूल 30 पल (1½ सेर), शीतलचीनी, नेत्रवाला, श्वेतचन्दन, जायफल, लौंग, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर तथा पीपल प्रत्येक द्रव्य दो-दो पल (8-8 तोला) लेकर उनका चूर्ण बनाकर तथा कस्तूरी एक शाण (4 आना भर) को पीसकर उक्त घोल में मिला दें और इस घोल को भूमि में गाढ़े हुये मिट्टी के पात्र में डाल दें और उसका मुख बन्द करके मिट्टी से ढक दें। एक मास के बाद जब तैयार हो जाये तो निर्मली के फलों का चूर्ण डालकर द्रव के निर्मल बना लें। यह अरिष्ट ग्रहणीरोग, अरुचि, श्वास, कास, गुल्म, भगन्दर, वातव्याधि, क्षयरोग, छर्दि (कै) रोग, पाण्डुरोग, कामलारोग, कुष्ठ, अर्श, प्रमेह, मन्दाग्नि, उदररोग, शर्करा (मूत्ररोग), अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र तथा धातुक्षय को जीतता है और कृशों को पुष्टि, वन्ध्याओं को गर्भ तथा सबको तेज, शुक्र तथा बल देता है। इसका नाम 'दशमूलारिष्ट' है।

वक्तव्य—उक्त अरिष्ट प्रसूति रोग एवं प्रसूता स्त्री के लिए उत्तम औषध है। निर्मली द्वारा दूसरे आसव, अरिष्टों को भी स्वच्छ कर लेना चाहिये। इसमें कस्तूरी भी डाली जाती है। इसका प्रयोग अपतन्त्रक (हिस्टीरिया) में भी किया जाता है।


इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का दसवाँ अध्याय समाप्त ।। 10 ।।

धातुशोधनमारणकल्पना

एकादशोऽध्यायः धातुशोधनमारणकल्पना

धातुओं की संख्या स्वर्णतारारताम्राणि नागवङ्गौ च तीक्ष्णकम्। धातवः सप्त विज्ञेयास्ततस्तान् शोधयेद् बुधः॥१॥ स्वर्ण (सोना), तार (चाँदी), आर (पीतल), ताम्र (ताँबा), नाग (सीसा), वंग (राँगा) तथा तीक्ष्णक (लोह, फौलाद एवं उसके अन्यान्य भेद) ये सात पदार्थ 'धातु' कहे जाते हैं। विद्वान् वैद्य को औषधार्थ प्रयोग करने के लिए इनका शोधन करना चाहिये। वक्तव्य-उक्त धातुओं को सभी जानते हैं, किन्तु 'आर' की सभी टीकाकारों ने पीतल लिखा है। आप ध्यान दें-पीतल को धातु नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह एक भाग ताँबा तथा दो भाग यशद इन दो धातुओं के योग से बनाया जाता है। यथा-'रीतिरप्युपधातुः स्यात् ताम्रस्य यशदस्य च। पित्तलस्य गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिसदृशा बुधैः॥' (आयुर्वेद-प्रकाश अ० ४)। यही बात श्री भावमिश्र ने भी स्वीकार की है। देखें-भा० नि० धातुवर्ग। उक्त दोनों ग्रन्थकारों ने पीतल को उपधातु माना है, यही उचित भी है। यदि इसको धातु मान भी लिया जाये तो कांस्य आदि अन्यान्य मिश्रित पदार्थों को भी धातु मानना पड़ेगा, जो कदापि उचित नहीं है। प्रामाणिक वचन देखें-'सुवर्णे रूप्यकं ताम्रं वङ्गं जसदशीसके। लोहं चैते मताः सप्त धातवो गिरिसम्भवाः॥' (आ०प्र०अ० ३) तथा-'स्वर्णं रूप्यं च ताम्रं च रङ्गं जसद्मेव च। सीसं लोहं च सप्तैते धातवो गिरिसम्भवाः'॥ (भा०प्र०नि० धातुवर्ग)। सात धातुओं में जसद् अर्थात् जस्ता को धातु माना है, जो उचित है। इसलिये आर को धातु मानना चाहिये अथवा नहीं, इसका निर्णय बुद्धिमान् स्वयं कर सकते हैं। यदि कोई दुराग्रही मनुष्य कहे कि पीतल में यशद होता है, अतः उसे धातु मानने में कोई हानि नहीं है, वे भली-भाँति विचार करें।


धातुओं के शोधन की विधि स्वर्णतारारताम्रायः पत्राण्यग्नौ प्रतापयेत्। निषिञ्चेत् तप्तप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके॥२॥ गोमूत्रे च कुलत्थानां कषाये च त्रिधा त्रिधा। एवं स्वर्णादिलोहानां विशुद्धिः सम्प्रजायते॥३॥ नागवङ्गौ प्रतप्तौ च गालितौ तौ निषेचयेत्। त्रिधा त्रिधा विशुद्धः स्याद् रविदुग्धेन च त्रिधा॥४॥ सोना, चाँदी तथा लोह के पत्रों को अग्नि में तपायें और उनको गर्म-गर्म ही तिलतेल में तक्र (मट्ठा) में, काञ्जी में, गोमूत्र में तथा कुलथी के क्वाथ में तीन-तीन बार बुझायें, इस प्रकार स्वर्ण आदि लोहों (धातुओं) की शुद्धि हो जाती है। नाग (सीसा) तथा वंग (राँगा) को तपाकर (गलाकर) उक्त तेल आदि द्रवों में तीन बार तथा आक के दूध में तीन बार बुझायें। इस प्रकार नाग तथा वंग भी शुद्ध हो जाते हैं। वक्तव्य-सुवर्ण आदि धातुओं के पत्र तो तपाये जा सकते हैं, किन्तु नाग तथा वंग तपते ही पिघल जाते हैं, अतएव इनको पिघलाने का विधान किया गया है। इन्हें पिघलाकर द्रवों में डालते समय अत्यन्त सावधानी की आवश्यकता होती है, अन्यथा वे उछलकर शोधनकर्त्ता के शरीर पर पड़कर हानि पहुँचा सकते हैं, अतः उनका द्रव एक चौड़े मुखवाले पात्र में डाल दें और उसके मुख पर एक ऐसा ढकना रखें, जिसमें कनिष्ठिका अंगुली जाने योग्य छिद्र हो, फिर लोहे की कड़छुल में वंग अथवा सीसा को डालकर अग्नि द्वारा पिघला कर उक्त छिद्र में से धीर-धीरे द्रव में बुझायें। जिस किसी धातु की भस्म बनानी हो उसे उक्त विधि से अवश्य शुद्ध कर लेना चाहिये।

सुवर्ण भस्म की विधि स्वर्णाच्च द्विगुणं सूतमम्लेन सह मर्दयेत्। तद्गोलकसमं गन्धं निदध्यादधरोत्तरम्॥५॥

174 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

174 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

गोलकं च ततो रुन्ध्याच्छरावदृढसम्पुटे। त्रिंशद् वनोपलैर्दद्यात् पुतान्येवं चतुर्दश।।6।। निरुत्थं जायते भस्म गन्धो देयः पुनः पुनः। शुद्ध सुवर्ण से दुगुना पारद लेकर दोनों को नींबू का रस डालकर घोटना चाहिये, घुटते-घुटते जब गोला बन जाये तो इस गोले के समान भाग शुद्ध गन्धक को पीसकर आधी गन्धक एक सिकोरे में रख दें, फिर दूसरे सिकोरे में बिछाकर रख दें, तदनन्तर गोला रखकर ऊपर से अवशिष्ट गन्धक रख दें, फिर दूसरे सिकोरे से ढाँककर कपड़मिट्टी से सम्पुट बनाकर सुखा लें, तत्पश्चात् तीस उपलों की अग्नि में पुट दें। इस प्रकार चौदह पुटें देने से सुवर्ण की 'निरुत्थ भस्म' हो जाती है और गन्धक हर एक पुट में बार-बार डालनी चाहिये। वक्तव्य-1 तोला सुवर्ण के पत्रों को उक्त विधि से शुद्ध करके चावलों के से टुकड़ों में काट लिया जाता है। फिर जब उन्हें पारद में डालकर घोटा जाता है, तो पीठी-सी बन जाती है। इस पीठी का गोला नहीं, अपितु टिकिया बनानी चाहिये, जिससे गन्धक चूर्ण से भली प्रकार ढाँकी जा सके। और 'गन्धोदेयः पुनः पुनः' इस कथन के अनुसार बार-बार गन्धक ही नहीं पारद भी देना चाहिये तथा सुवर्ण तथा पारद की पिष्टि तैयार हो जाने पर गन्धक को भी उसके साथ पीस देना चाहिये। तीस उपलों या कण्डों की संख्या का निर्देश सम्भवतः 1 से 4 तोला तक सुवर्ण की भस्म बनाने के लिए है। एक बात स्मरण रखनी चाहिये कि चौदह पुटों के पश्चात् भी कभी-कभी सुवर्ण के कण चमकते हुये दिखलायी पड़ते हैं, ऐसी स्थिति में और भी पुटें देनी चाहिये। इस विधि से बनी हुई 'सुवर्णभस्म' बादामी रंग की या धूसर वर्ण की होती है। निरुत्थभस्म - भस्मीभूत धातु फिर किसी प्रकार भी जीवित न हो, अर्थात् अपने रूप को धारण न कर सके, किन्तु देखा गया है कि उक्त विधि से बनी हुई सुवर्ण भस्म को सुहागा तथा नौसादर के संयोग से तपाने पर पुनरपि सुवर्ण बन जाता है। अतः श्रीआढमल्ल ने कहा है-'निरुत्थता- ऽत्रात्यर्थं मूर्च्छना कथ्यते ननु स्वर्णस्य मृतिर्भवति' अर्थात् निरुत्थ शब्द का अर्थ है-अत्यन्त मूर्च्छित होना, स्वरूपतः सुवर्ण कहलाने योग्य न रह जाना। क्योंकि सुवर्ण की मृत्यु (सदेव के लिए स्वरूप का परित्याग) नहीं होती। यह कथन विश्वसनीय है। कुछ लोगों का कथन है कि 'सुवर्ण एवं चाँदी के बरक या तबक का प्रयोग भारतीय नहीं है, वे ध्यान दें- महर्षि सुश्रुत ने बालक को सुवर्ण चूर्ण चटाने की आज्ञा दी है। यथा-'सौवर्णं सुकृतं चूर्णं कुष्ठं मधु घृतं वचा।' देखें-सु० शा० अ० 10। और-'अपक्वं हेमसङ्घृष्टं शिलायां जलयोगातः। द्रवरूपं तु तत्पेयं मधुना गुणदायकम्।। यद्यपि तवकारव्यं तु स्वर्णपत्रविचूर्णितम्। मधुना सङ्गृहीतं चेत् सद्यो हन्ति विषादिकम्।। देखें-आ० प्र० अ० 3। अर्थात् सुवर्ण को जलयोग से घिसकर मधु के साथ चाटना चाहिये। इसके सेवन करने से विष आदि के विकार नष्ट हो जाते हैं।

सुवर्ण भस्म की दूसरी विधि काञ्चने गालिते नागं षोडशांशेन निक्षिपेत्।।7।। चूर्णयित्वा तथाम्लेन घृष्ट्वा कृत्वा च गोलकम्। गोलकेन समं गन्धं दत्त्वा चैवाधरोत्तरम्।।8।। शरावसम्पुटे धृत्वा पुटेत् त्रिंशद्वनोपलैः। एवं सप्तपुटैर्हेम निरुत्थं भस्म जायते।।9।। सुवर्ण को गलाकर उसमें सोलहवाँ भाग शुद्ध सीसा डाल दें। जब दोनों पिघलकर मिल जाये तो अग्नि पर से उतार कर शीतल हो जाने पर फिर इसका चूर्ण बनाकर नींबू के रस के साथ तब तक घोटें, जब तक कि काला पानी निकलता रहे, तत्पश्चात् गोला या टिकिया बना लें। अब उक्त गोलक के समान भाग गन्धक का चूर्ण सिकोरे में गोलक के नीचे तथा ऊपर रखकर और दूसरे सिकोरे से ढाँककर तथा कपड़मिट्टी से सम्पुट बना लें और सूख जाने पर तीस वनोपलों (वनकण्डों) में रखकर पुट दें। इस प्रकार सात पुटें देने से सुवर्ग की निरुत्थभस्म बन जाती है। वक्तव्य-सोना 4 तोला, सीसा 4 आना भर तथा गन्धक 11 तोला लेना चाहिये।

तीसरी विधि काञ्चनाररसैर्घृष्ट्वा समसूतकगन्धयोः। कज्जल्या हेमपत्राणि लेपयेत् सममात्रया।।10।। काञ्चनारत्वचः कल्कैर्मूषायुग्मं प्रकल्पयेत्। धृत्वा तत्सम्पुटे गोलं मृन्मूषासम्पुटे पचेत्।।11।। निधाय सन्धिरोधं च कृत्वा संशोष्य कोकिलैः। वह्निं खरतरं कुर्यादेवं दद्यात् पुटत्रयम्।।12।। निरुत्थं जायते भस्म सर्वकार्येषु योजयेत्। समान भाग पारद-गन्धक की कज्जली बनाकर कचनार की छाल के रस अथवा क्वाथ के साथ घोंटे। जब लेई-सी हों

एकादशोऽध्यायः] धातुशोधनमारणकल्पना 175

एकादशोऽध्यायः] धातुशोधनमारणकल्पना 175

जाये तो समान भाग सुवर्ण के पत्रों पर उसका लेप कर दें और कचनार की छाल का कल्क (चटनी) बनाकर उसकी दो मूषा (सिकोरा) बनाकर सुखा लें। फिर इनमें उक्त सुवर्ण- पत्रों के गोलक को दूसरे दो मिट्टी के सिकोरों में रखकर कपड़मिट्टी से भली-भाँति सन्धि-बन्ध करके सुखा लें और बबूल के कोयलों की तीव्र अग्नि में रखकर पुट दें, इसी प्रकार तीन पुटें देनी चाहिये। इस विधि से सुवर्ण की निरुत्थ भस्म बन जाती है। इसे सभी कार्यों में प्रयुक्त करना चाहिये।

चौथी विधि काञ्चनारप्रकारेण लाङ्गली हन्ति काञ्चनम्।।13।। ज्वालामुखी यथा हन्यात् तथा हन्ति मनःशिला। जिस प्रकार उपर्युक्त विधि से कचनार के संयोग से सुवर्ण की भस्म की जाती है, ठीक उसी विधि से लांगली (कलहारी) भी सुवर्ण को मारती है और उसी विधि से ज्वालामुखी द्वारा भी भस्म बनायी जाती है और उसी विधि से मैनसिल भी सुवर्ण को मारती (भस्म करती) है। वक्तव्य-आज ज्वालामुखी नामक औषधि का परिचय सन्देह में पड़ गया है। सुवर्णपत्रों पर उक्त द्रवों का लेप प्रथम बार ही किया जा सकता है। दूसरी, तीसरी बार में उन रसों के साथ ही पीसना पड़ता है।

पाँचवीं विधि शिलासिन्दूरयोश्चूर्णं समयोरर्कदुग्धकैः।।14।। सप्तैव भावना दद्याच्छोषयेच्च पुनः पुनः। ततस्तु गालिते हेमि कल्कोऽयं दीयते समः।।15।। पुनर्धमेदितरतां यथा कल्को विलीयते। एवं वेलात्रयं दद्यात् कल्कं हेममृतिर्भवेत्।।16।। समान भाग (4-4 तोला) मैनसिल तथा रससिन्दूर को आक के दूध की सात भावनायें देकर सुखा लें। इसके पश्चात् कड़छुल में सुवर्ण (4 तोला) गलाकर उसमें उपर्युक्त मैनसिल तथा रससिन्दूर का चूर्ण डाल दें। जब ये आपस में मिल जायें तो धौंकनी से अत्यन्त तीव्र अग्नि करके उस चूर्ण को विलीन कर दें। इसी प्रकार तीन बार चूर्ण को विलीन करने से सुवर्ण की भस्म तैयार हो जाती है। वक्तव्य-उक्त विधि से मैनसिल तो उड़ जाता है, किन्तु सिन्दूर जो कि सीसक-निर्मित पदार्थ है, नहीं उड़ता। अतः सुवर्ण में ही रह जाता है और तपाने से वह सीसक सुवर्ण भस्म से पृथक् हो जाता है और सुवर्ण भस्म पृथक् हो जाती है।

छठी विधि पारावतमलैर्लिम्पेदथवा कुक्कुटोद्भवैः। हेमपत्राणि तेषां च प्रदद्यादन्तरान्तरम्।।17।। गन्धचूर्ण समं दत्त्वा शरावयुग्मसम्पुटे। प्रदद्यात् कुक्कुटपुटं पञ्चभिर्गोमयोपलैः।।18।। एवं नवपुटान् दद्याद् दशमं च महापुटम्। त्रिंशद् वनोपलैर्देयं जायते हेमभस्मकम्।।19।। शुद्ध सुवर्ण के पत्रों पर कबूतर की अथवा मुरगा की बीट (जल में सानकर) का लेप करे और उनके बीच-बीच में सुवर्ण के समान भाग गन्धक का चूर्ण देकर तथा दो सिकोरों के सम्पुट में रखकर पाँच उपलों का कुक्कुट पुट दें और इसी प्रकार नौ पुटें दें और दसवीं महापुट तीस उपलों की देनी चाहिये। इस विधि से सुवर्ण की भस्म बन जाती है। वक्तव्य-कुक्कुटपुट का लक्षण-'वितस्तिमात्रे गर्त्ते यत् पुटयेत् तन्तु कौक्कुटम्। अर्थात् एक बालिस्त चौकोर गड्ढे में जो पुट दी जाती है उसे 'कुक्कुटपुट' कहा जाता है। और-'घने वेदास्त्रके गर्त्ते हस्ते द्वितयमात्रके। पुटं यद् दीयते प्राज्ञैस्तद्वि प्रोक्तं महापुटम्।।' अर्थात् दो हाथ गहरे तथा चौड़े चौकोर गड्ढे में जो पुट दी जाती है, उसे महापुट कहा जाता है।

सुवर्ण भस्म के गुण (सुवर्णं च भवेत् स्वादु तिक्तं स्निग्धं हिमं गुरु। बुद्धिविद्यास्मृतिकरं विषहारि रसायनम्।।20।।) सुवर्ण स्वादु (मधुर) है, अनुरस से तिक्त है, स्निग्ध, हिम (शीत), गुरु, बुद्धि, विद्या तथा स्मरणशक्ति को बढ़ाता है, विष को हरता है और रसायन है। वक्तव्य-सुवर्ण आकरों (खानों) एवं नदियों की बालू में से प्राप्त किया जाता है। इसके पत्र अन्य सभी धातुओं के पत्रों की अपेक्षा अधिक पतले बनाये जा सकते हैं। इसका गुरुत्व जल की अपेक्षा लगभग 19¼ गुना भारी है और इसका द्रवणांक 1064° से० है।

रजत भस्म की विधि भागैकं तालकं मर्द्यं याममम्लेन केनचित्। तेन भागतत्रयं तारपत्राणि परिलेपयेत्।।21।। धृत्वा मूषापुटे रुद्ध्वा पुटेत् त्रिंशद्वनोपलैः। समुद्धृत्य पुनस्तालं दत्त्वा रुद्ध्वा पुटे पचेत्।।22।। एवं चतुर्दशपुटैस्तारं भस्म प्रजायते।

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176 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे एक भाग (4 तोला) हरिताल को आसी भी अम्लद्रव (नींबू आदि के रस) के साथ एक प्रहर-पर्यन्त पीसना चाहिये, तत्पश्चात् जब लेई-सी हो जाये तो तीन भाग (12 तोला) तार अर्थात् चाँदी के पत्तों पर उसका लेप करना चाहिये। फिर इन पत्रों को दो सिकोरों के सम्पुट में रखकर तीस वनोपलों की अग्नि में पुट देना चाहिये। सर्वथा शीतल हो जाने पर इसे संपुट से निकालकर और एक भाग शुद्ध हरिताल डालकर किसी खटाई से पीटकर तथा सम्पुट में बन्द कर पुट दें। इसी प्रकार क्रमशः चौदह पुटें देने से चाँदी की भस्म हो जाती है। वक्तव्य-उक्त विधि से चाँदी की भस्म आसमानी रंग की बनती है। इसमें से हरिताल उड़ जाता है, अतः चाँदी भस्म की तौल भी नहीं बढ़ती है। रजत भस्म की दूसरी विधि स्नुहीक्षीरेण सम्पिष्टं माक्षिकं तेन लेपयेत् ।। 23 ।। तालकस्य प्रकारेण तारपत्राणि बुद्धिमान्। पुटेच्चतुर्दशपुटैस्तारं भस्म प्रजायते ।। 24 ।। चार तोला स्वर्णमाक्षिक (सोनामाखी) को सेहुण्ड (थूहर) के दूध के साथ पीसकर उपर्युक्त हरिताल की विधि से बारह तोला शुद्ध चाँदी के पत्रों पर लेप करें और पुट दें। इसी प्रकार चौदह पुटें देने से चाँदी की भस्म हो जाती है। वक्तव्य-उक्त विधि से बनायी गयी भस्म में स्वर्णमाक्षिक की भस्म भी मिली रहती है, अतः उसकी तौल बढ़ जाती है। चाँदी भस्म के गुण-'रूप्यं शीतकषायाम्लं स्वादु पाकरसं सरम्। वयसः स्थापनं स्निग्धं लेखनं वातपित्तजित्' ।। अर्थात् चाँदी शीतल, कषाय एवं अम्ल है; पाक में स्वादु है, सर (विसरणशील) है, आयु को स्थायी रखने वाली है, स्निग्ध है, लेखन है एवं वात, पित्त को जीतती है। खानों में उक्त धातु ताम्र एवं सीसक के साथ मिला हुआ पाया जाता है और कहीं-कहीं पृथक् भी पाया जाता है। इसका गुरुत्व 10. 4 है तथा द्रवणांक 960° से० है। आर भस्म की विधि अर्कक्षीरेण सम्पिष्टो गन्धकस्तेन लेपयेत्। समेनारस्य पत्राणि शुद्धान्यम्लद्रवैर्मुहुः ।। 25 ।। ततो मूषापुटे धृत्वा पुटेद् गजपुटेन च। एवं पुटद्वयेनैव भस्मारं भवति ध्रुवम् ।। 26 ।। आरवत् कांस्यमप्येवं भस्मतां याति निश्चितम् । आक के दूध के साथ गन्धक (10 तोला) को पीस लें और अम्लद्रव (काञ्जी आदि) में 3 अथवा 7 बार शुद्ध किये हुये पीतल के पत्रों पर उस (गन्धक) का लेप करें, तत्पश्चात् सम्पुट में रखकर गजपुट द्वारा पुट दें। इस प्रकार दो पुटें देने से आर (पीतल) की भस्म हो जाती है। आर की विधि से कांस्य (काँसा) की भी भस्म बनती है। वक्तव्य-उक्त विधि से पीतल की भस्म बनाने का यत्न किया गया, किन्तु पीतल पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ा अर्थात् सर्वथा कच्चा रह गया, भस्म नहीं बनी। फिर हरताल के योग से भस्म बन गयी, किन्तु उक्त विधि से कांस्य की भस्म बन गई। पीतल और काँसा दोनों ही प्रसिद्ध एवं मिश्रित पदार्थ हैं। यथा-'अष्टभागेन ताम्रेण द्विभागं कुटिलं मतम् । एकत्र द्रावितं तत् स्यात् कांस्यं सौराष्ट्रजं शुभम् ।। (आ० प्र० अ० 4)।' अर्थात् आठ भाग तांबा तथा दो भाग वंग (रांगा) को एक साथ पिघलाने से 'कांस्य' नामक द्रव्य तैयार हो जाता है और 'रीतिरप्युपधातुः स्यात् ताम्रस्य यशदस्य च।' (आ०प्र० अ० 4)। अर्थात् 12 भाग तांबा, एक भाग यशद (जस्ता) दोनों को एक साथ पिघलाने से पीतल तैयार हो जाता है। इनके गुण भी इनकी उपादान धातुओं के समान ही होते हैं। पीतल का गुरुत्व 8.05 है। पीतल एवं कांस्य के साथ 'भर्त्त' नामक पदार्थ को जानना भी आवश्यक है। उसकी भस्म भी बनायी जाती है। यथा-'कांस्यं रीतिस्तथा ताम्रं नागो वङ्गश्च पञ्चमः। एकत्र द्रावितैरेतैः पञ्चलोहं प्रजायते ।। पञ्चलोहे पञ्चरसं वर्तुलं भर्त्तमित्यपि । व्यञ्जनं सूपमन्यच्च तद्भाण्डे साधितं शुभम् ।। (आ० प्र० अ० 4.78-79) अर्थात्-कांसा, पीतल, तांबा, सीसा एवं रांगा को एक साथ पिघलाने से पञ्चलोह बनता है। उसके नाम ये हैं-पञ्चरस, वर्तुल एवं भर्त्त। इसके पात्र में शाक एवं दालें उत्तम तैयार होती हैं। यद्यपि वर्तमान शार्ङ्गधरसंहिता में यशद धातु का कोई भी उल्लेख नहीं है, तथापि हमारा विश्वास है कि आचार्य शार्ङ्गधर ने अपनी मूल पुस्तक में उसका अवश्य उल्लेख किया होगा। अतएव हमने यहाँ उसका उल्लेख कर दिया है। यथा-'यशदं रङ्गसङ्काशं रीतिहेतुश्च तन्मतम् । यशदं गिरिजं तस्य दोषाः शोधनमारणे ।। वङ्गस्येव हि बोद्धव्या गुणांस्तु प्रवदाम्यहम्। जशदं तुवरं तिक्तं शीतलं कफपित्तहृत्। चक्षुष्यं परमं मेहान् पाण्डुं श्वासं च नाशयेत् ।।' (आ० प्र०अ० 3) अर्थात्-जस्ता रांगा जैसा होता है और वह पीतल का हेतु (कारण) है। यशद पर्वतों की खानों में उत्पन्न होता है। उसके दोष, शोधन एवं मारण (भस्मीकरण) वंग के ही CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

एकादशोऽध्यायः ] धातुशोधनमारणकल्पना 177

एकादशोऽध्यायः ] धातुशोधनमारणकल्पना 177 समान मानने चाहिये। उसके गुण ये हैं-यशद धातु कसैला, तिक्त, शीतल, कफ एवं पित्त को हरता है, अत्यन्त चक्षुष्य (नेत्र के लिए हितकारक) है। प्रमेहों, पाण्डुरोगों तथा श्वासरोगों को नष्ट करता है। यशद एक अत्यन्त उपयोगी धातु है। इसी से बनाया हुआ 'जिंक' पदार्थ जल में अथवा गुलाब जल में घोलकर दुखती हुई आँखों (नेत्राभिष्यन्द) में डाला जाता है। इसकी अत्यन्त सफेद भस्म जो 'सफेदा' नाम से प्रसिद्ध है, वह रोहों की परमौषध है, अतएव इसे 'चक्षुष्यं परमम्' कहा गया है। खपरिया के सन्दिग्ध होने के कारण अथवा अलभ्य होने के कारण यह आयुर्वेद की परमोत्तम औषध 'वसन्तमा लती' में शताब्दियों से प्रयुक्त किया जा रहा है। यक्ष्मा जैसे भीषण रोगों से पीड़ित रोगियों का अत्यन्त उपकार कर रहा है। इसका गुरुत्व 7.1 है और द्रवणांक 433 से० है। ताम्र, पीतल, कांस्य भस्म-विधि अर्कक्षीरं वटक्षीरं निर्गुण्डी क्षीरिका तथा ।। 27 ।। ताम्ररीतिध्वनिवधे समगन्धकयोगतः । आक के दूध में, बरगद के दूध में, सम्भालू (मेवड़ी) के पत्तों के कल्क में तथा क्षीरिका (चिरौंजी) के कल्क में पीसी हुई समान भाग गन्धक के संयोग से ताम्र (तांबा), रीति (पीपल) तथा ध्वनि (काँसा) की भस्म हो जाती है। वक्तव्य-उक्त श्लोक की प्रथम पंक्ति का पाठभेद इस प्रकार उपलब्ध होता है-'अर्कक्षीरवदाजं स्यात् क्षीर- निर्गुण्डिका तथा'। इसका अर्थ होगा-मदार के दूध के बराबर बकरी का दूध तथा निर्गुण्डी (मेवड़ी) के रस से ....। प्रयोग कर देखें कि आपको कौन-सी विधि उत्तम लगती है। ताम्र भस्म की विधि सूक्ष्माणि ताम्रपत्राणि कृत्वा संस्वेदयेद् बुधः । वासरत्रयमम्लेन ततः खल्वे विनिक्षिपेद् ।। 28 ।। पादांशं सूतकं दत्त्वा याममम्लेन मर्दयेत् । तत उद्धृत्य पत्राणि लेपयेद् द्विगुणेन च ।। 29 ।। गन्धकेनाम्लघृष्टेन तस्य कुर्याच्च गोलकम् । ततः पिष्ट्वा च मीनाक्षीं चाङ्गेरीं वा पुनर्नवाम् ।। 30 ।। तत्कल्केन बहिर्गोलं लेपयेदङ्गुलोन्मितम् । धृत्वा तद्गोलकं भाण्डे शरावेण च रोधयेत् ।। 31 ।। बालुकाभिः प्रपूर्याथ विभूतिलवणाम्बुभिः । दत्त्वा भाण्डमुखे मुद्रां ततश्चुल्ल्यां विपांचयेत् ।। 32 ।। क्रमवृद्धाग्निना सम्यग्यावद् यामचतुष्टयम् । स्वाङ्गशीतममुद्धृत्य मर्दयेत् सूरणद्रवैः ।। 33 ।। दिनैकं गोलकं कुर्यादर्धगन्धेन लेपयेत् । सघृतेन ततो मूषां पुटे गजपुटे पचेत् ।। 34 ।। स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य मृतं ताम्रं शुभं भवेत् । वान्तिं भ्रान्तिं क्लमं मूर्च्छां न करोति कदाचन ।। 35 ।। ताँबा के अत्यन्त पतले पत्र बनवाकर और उनके चावलों जैसे टुकड़े बनाकर विद्वान् औषध-निर्माता तीन दिन तक अम्ल (काञ्जी) में डालकर दोलायन्त्र द्वारा स्वेदित करें, तत्पश्चात् उन ताम्रखण्डों को खरल में डाल दें, ताँबे का चौथाई पारद डालकर अम्ल (नींबू के रस) के साथ एक पहर तक इस प्रकार मर्दन करें, जिससे सम्पूर्ण पारदताम्र खण्डों पर चढ़ जाये। इसके पश्चात् ताम्रपत्रों को नींबू के रस में पीसी हुई ताम्रपत्रों की अपेक्षा दुगुनी गन्धक मिलाकर उनका गोला या टिकिया बना लें तथा मीनाक्षी (मछेंछी) अथवा चांगेरी (खटकल) अथवा पुनर्नवा को पीस कर कल्क बनायें और इस कल्क का उक्त ताम्रगन्धक गोलक पर एक अंगुल मोटा लेप कर दें। फिर इस गोलक को बड़े मृतपात्र के भीतर रखकर शराव (सकोरा) से ढँक दें और उस मृतपात्र को बालू डालकर भर दें तथा पात्र के मुख पर ढँकना देकर राख 10 तोला तथा सेंधा नमक 4 तोला जल में सानकर इससे उस पात्र का मुख बन्द कर दें। फिर इसे चूल्हे पर चढ़ाकर एक पहर तक धीमी आँच देकर पाक करें, फिर क्रमशः अग्नि को तीव्र करते जायें। इस प्रकार चार प्रहर-पर्यन्त आँच दें। जब उक्त पात्र सर्वथा शीतल हो जाये तो उतार कर सावधानी के साथ पहले ढँकना उतारें और फिर धीरे-धारे बालू निकालकर तथा सिकोरा उतार कर ताम्रगोलक को निकाल लें, तदनन्तर उक्त ताम्रगोलक को सूरण (जिमीकन्द) के रस के साथ एक दिन तक पीस कर फिर गोला बना लें और उस पर घी में सानी हुई ताँबे की अपेक्षा अर्द्धभाग गन्धक का लेप कर दें, फिर उसे सम्पुट में रखकर गजपुट दें। सर्वांग शीतल हो जाने पर उसे पुट से निकालकर पीस लें। इस प्रकार ताम्र की उत्तम भस्म बन जाती है। इसका सेवन करने पर कभी भी वमन, चक्कर आना, सुस्ती तथा मूर्च्छा उत्पन्न नहीं होती। वक्तव्य-उक्त विधि से निर्मित 'ताम्र भस्म' आकाश के वर्ण से युक्त हो जाती है। भस्म बनाने के लिए 'नेपाली' ताम्र उत्तम होता है। उक्त विधि से बनी हुई ताम्रभस्म पूर्णरूप से वान्ति, भ्रान्तिरहित नहीं हो पाती, अतः सूरण के रस की दस-बीस पुटें और दे देनी चाहिये। इसका गुरुत्व 8.95 है और द्रवणांक 1057° से० है।

178 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे नाग भस्म ताम्बूलीरससम्पिष्टशिलालेपात् पुनः पुनः॥ ३६॥ द्वात्रिंशद्भिः पुटैर्नागो निरुत्थो याति भस्मताम्। बार-बार पान के रस से पीसी हुई तथा मैनसिल के संयोग से बत्तीस पुटें देने से नाग (सीसा) की निरुत्थ भस्म हो जाती है। वक्तव्य- प्रथम बार मैनसिल नाग के समान ही ली जाती है और फिर अष्टमांश। इस विधि से सीसा की भस्म आसमानी रंग की बनती है। इसको थोड़ी गोहरी की आँच देनी चाहिये, अन्यथा सीसा पिघलकर मण्डूर-सा बन जाता है। अन्त में इसे तौलकर देखिये, यदि तौल में कुछ भी बढ़ गया हो तो मैनसिल के बिना ही पान के अथवा अडूसा के रस में घोटकर तब तक पुटें देनी चाहिये जब तक तौल पूर्ववत् न हो जाये। नाग भस्म की विधि अश्वत्थचिञ्चात्वक् चूर्णं चतुर्थांशेन निक्षिपेत्॥ ३७॥ मृत्पात्रे द्राविते नागे लोहदर्व्या प्रचालयेत्। यामैकेन भवेद् भस्म तत्तुल्यां च मनःशिलाम्॥ ३८॥ काञ्जिकेन द्वयं पिष्ट्वा पचेद् दृढपुटेन च। स्वाङ्गशीतं पुनः पिष्ट्वा शिलया काञ्जिकेन च॥ ३९॥ पुनः पुटेच्छरावाभ्यामेवं षष्टिपुटैर्मृतिः। मिट्टी के पात्र में पिघलाये हुये सीसक में पीपल वृक्ष तथा इमली वृक्ष की छाल का चौथाई चूर्ण डालकर लोहे की कड़छुली से हिलाता रहे, एक पहर में वह सीसक भस्म जैसा हो जाता है। इसके बाद उसे खरल में डालकर और उसमें समान भाग मैनसिल डालकर काँजी के साथ पीसना चाहिये। बाद में उसे दो सिकोरों में बन्द करके पुट दें देनी चाहिये। स्वांग शीतल होने पर फिर से मैनसिल (अष्टमांश) डालकर काँजी से पीसकर पुट दे दें। इस प्रकार साठ पुटें देने से सीसक की भस्म तैयार हो जाती है। वक्तव्य- इसका गुरुत्व 11.3 है और द्रवणांक 328° से० है। यह प्रमेह की उत्तम औषध है। वंग भस्म की विधि मृत्पात्रे द्राविते वङ्गे चिञ्चाश्वत्थत्वचो रजः॥ ४०॥ क्षित्त्वा क्षित्त्वा चतुर्थांशमयोदर्ध्या प्रचालयेत्। ततो द्वियाममात्रेण वङ्गभस्म प्रजायते॥ ४१॥ अथ भस्मसमं तालं क्षिप्त्वाम्लेन प्रमर्दयेत्। ततो गजपुटे पक्त्वा पुनरम्लेन मर्दयेत्॥ ४२॥ तालेन दशमांशेन याममेकं ततः पुटेत्। एवं दशपुटैः पक्वो वङ्गस्तु म्रियते ध्रुवम्॥ ४३॥ मिट्टी के पात्र में पिघलाये हुये वंग (राँगा) में इमली तथा पीपल के वृक्ष की छाल का चतुर्थांश चूर्ण डालकर लोहे की कड़छुली से हिलाते रहें। इस प्रकार दो पहर (6 घंटे) में वंग भस्म-सा हो जाता है। इसके पश्चात् उसमें समान भाग हरिताल डालकर काँजी के साथ मर्दन करे और टिकिया बनाकर सुखाकर गजपुट में पुट दे दें। स्वांगशीतल हो जाने पर दशमांश हरिताल डालकर और काँजी से एक प्रहर-पर्यन्त पीसकर पुट दें। इसी प्रकार दस पुटों में पकाया गया वंग अवश्यमेव मर जाता है, अर्थात् उसकी भस्म हो जाती है। वक्तव्य- उक्त विधि से बनी हुई 'वंग भस्म' अत्यन्त गुणवान् होती है। यह भी प्रमेह की उत्तम औषधि है। विद्वानों का कथन है कि नाग को मैनसिल के योग से और वंग को हरिताल के योग से ही भस्म करना चाहिये। खानों में से वंग के मिश्रित स्फटिकाकार काले पत्थर मिलते हैं। इनको तपाकर वंग प्राप्त किया जाता है। वंग का गुरुत्व 12.4 तथा द्रवणांक 230° से० है। लोह भस्म की विधि शुद्धं लोहभवं चूर्णं पातालगरुडीरसैः। मर्दयित्वा पुटेद् वह्नौ दद्यादेवं पुटत्रयम्॥ ४४॥ पुटत्रयं कुमार्या च कुठारच्छिन्निकारसैः। पुटषट्कं ततो दद्यादेवं तीक्ष्णमृतिर्भवेत्॥ ४५॥ पूर्वोक्त विधि से शुद्ध किये हुये लोहचूर्ण (तीक्ष्णलोह अर्थात् फौलाद के चूर्ण) को पातालगारुडी (जलजमनी) के रस में पीसकर गजपुट द्वारा पुट दें, इसी तरह तीन पुट दें, घीकुआर के रस की तीन पुट दें, कुठेरक की छाल तथा गिलोय के रस की (तीन-तीन अर्थात्) छः पुटें दें। इसी तरह बारह पुटें देने से तीक्ष्णलोह की भस्म हो जाती है। दूसरी विधि क्षिपेद् वा द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णतः। मर्दयेत् कन्यकाद्रावैर्यामयुग्मं ततः पुटेत्॥ ४६॥ एवं सप्तपुटैर्मृत्युं लोपचूर्णमवाप्नुयात्। रसैः कुठारछिन्नायाः पातालगरुडीरसैः॥ ४७॥ स्तन्येन चार्कदुग्धेन तीक्ष्णस्यैवं मृतिर्भवेत्। तीक्ष्णलोह (फौलाद) के चूर्ण की अपेक्षा द्वादशांश दरद (शिंगरफ) डालकर घीकुआर के रस में भली-भाँति दो प्रहर

एकादशोऽध्यायः] धातुशोधनमारणकल्पना 179

एकादशोऽध्यायः] धातुशोधनमारणकल्पना 179 पर्यन्त मर्दन करे और टिकिया बनाकर उन्हें सुखाकर पुट दें। इस प्रकार सात पुटें देने से लोह की भस्म बन जाती है। अथवा कुठेरक, गिलोय, छिलहिण्टा, स्तन्य (स्त्री का दूध) तथा आक के दूध के साथ पीसकर पुटें देने से लोह की भस्म हो जाती है। वक्तव्य-शिंगरफ के संयोग से जो लोह भस्म बनायी जाती है, वह अत्यन्त रक्तवर्ण की होती है, किन्तु वारितर (पानी के ऊपर तैरने वाली) नहीं होती। अतः अन्यान्य औषधियों के रसों की 100 अथवा इससे भी अधिक पुटें देनी चाहिये, जिससे वह वारितर हो जाये, क्योंकि लोहभस्म का वारितर होना परमावश्यक है। लोहभस्म यकृत-विकार की एवं पाण्डुरोग की परमौषध है। तीक्ष्णलोह वही होता है, जिसके चाकू, उस्तरे एवं तलवार आदि तीक्ष्ण धार वाले शस्त्र बनाये जाते हैं। भस्म बनाने के लिए यही लोहा सर्वोत्तम माना जाता है। लोह का गुरुत्व 7.5 और द्रवणांक 1550° से० है। तीसरी विधि सूतकाद् द्विगुणं गन्धं दत्त्वा कुर्याच्च कज्जलीम् ।।48।। द्वयोः समं लोहचूर्णं मर्दयेत् कन्यकाद्रवैः। यामयुग्मं ततः पिण्डं कृत्वा ताम्रस्य पात्रके ।।49।। घर्मे धृत्वा रुबूकस्य पत्रैराच्छादयेद् बुधः। यामार्धेनोष्णतां भूयाद्धान्यराशौ न्यसेत् ततः ।।50।। दत्त्वोपरि शरावं तु त्रिदिनान्ते समुद्धरेत्। पिष्ट्वा च गालयेद् वस्त्रादेवं वारितरं भवेत् ।।51।। एवं सर्वाणि लोहानि स्वर्णादीन्यपि मारयेत्। शिलागन्धाकदुग्धाक्ताः स्वर्णाद्याः सर्वधातवः ।।52।। म्रियन्ते द्वादशपुटैः सत्यं गुरुवचो यथा। पारद से दुगुनी गन्धक लेकर दोनों की कज्जली बनायें, फिर दोनों (पारद तथा गन्धक) के समान भाग लोहचूर्ण मिलाकर घीकुआर के रस के साथ दो प्रहर (6 घंटों) पर्यन्त भली-भाँति मर्दन करें। तत्पश्चात् एक पिण्ड बनाकर और ताम्र के पात्र में रखकर, एरण्ड के पत्तों से ढाँककर धूप में रख दें। आधे पहर (1½ घण्टा) में जब उष्ण हो जाये तो ऊपर से दूसरे शराव (सकोरे) से ढाँककर धान्यराशि (गेहूँ आदि के ढेर) में दबा दें और तीन दिन के पश्चात् निकाल लें तथा पीसकर कपड़े से छान लें। इस प्रकार लोह भस्म वारितर तैयार हो जाती है। उक्त विधि से सुवर्ण आदि सभी लोहों अर्थात् धातुओं की भस्म बनायी जा सकती है और मैनसिल, गन्धक तथा आक के दूध में उपर्युक्त विधि से मिलायी हुई स्वर्ण आदि सभी धातुएँ बारह पुटों में मर जाती हैं, अर्थात् उनकी भस्म हो जाती है। वक्तव्य-हमारा विचार है कि उपर्युक्त विधि में पारदगन्धक की कज्जली में लोहचूर्ण नहीं अपितु दस-बीस पुटें जिस लोह भस्म में दी जा चुकी हों, उस लोह भस्म को डालें और इस प्रकार भस्म में कज्जली मिली रहती है, जो किसी प्रकार पृथक् नहीं की जा सकती। इस प्रकार बनायी गयी लोह भस्म उत्तम मानी जाती है। उपधातु संख्या माक्षिकं तुत्थकाभ्रे च नीलाञ्जनशिलालकाः ।।53।। रसकश्चेति विज्ञेया एते सप्तोपधातवः। माक्षिक, तुत्थक (तूतिया या नीला थोथा), अभ्रक, नीलाञ्जन (काला सुरमा), शिला (मैनसिल), आलंक (हरिताल) तथा रसक ये सात द्रव्य उपधातु कहे जाते हैं। वक्तव्य-उक्त सात पदार्थ यौगिक हैं, अर्थात् ये कई पदार्थों के मिश्रण से भूगर्भ में निर्मित होते हैं। स्वर्णमाक्षिक शोधन-विधि माक्षिकस्य त्रयो भागा भागैकं सैन्धवस्य च ।।54।। मातुलुङ्गद्रवैरथ जम्बीरोत्थद्रवैः पचेत्। चालयेल्लोहजे पात्रे यावत् पात्रं सुलोहितम् ।।55।। भवेत् ततस्तु संशुद्धं स्वर्णमाक्षिकमृच्छति। माक्षिक (सोनामाखी) तीन भाग (3 सेर) तथा सेंधा नमक एक भाग (1 सेर) दोनों को पीसकर बिजौरा नीबू, जम्बीरी नीबू या कागजी नीबू के रस में मिलाकर तथा लोहे की कड़ाही में डालकर तब तक पकायें और खुरचने से तब तक चलाते रहें, जब तक पात्र का तलभाग रक्तवर्ण का न हो जाय। इस प्रकार स्वर्णमाक्षिक (सोनामाखी) शुद्ध हो जाती है। वक्तव्य-उक्त विधि से शुद्ध की हुई स्वर्णमाक्षिक का सेवन किया जा सकता है। स्वर्णमाक्षिक लोह ताम्र (इसमें ताम्र स्वल्पमात्रा में होता है) एवं गन्धक का यौगिक पदार्थ है, अत एव शुद्ध करते समय इसमें से जो धुआँ निकलता है, उसमें गन्धक की गन्ध होती है। यह गुजरात प्रान्त में बहने वाली 'ताप्ती' नदी के आसपास प्राप्त होती है, अतएव इसका नाम 'ताप्य' या 'तापीज' है। पीली चमकदार मक्खी के समान वर्णयुक्त होने के कारण इसे 'स्वर्णमाक्षिक' कहा जाता है। उक्त विधि से शोधित स्वर्णमाक्षिक का वर्ण अत्यन्त रक्तवर्ण होता है।

180 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे


[वाम स्तम्भ / Left Column]

स्वर्णमाक्षिक मारण-विधि कुलत्थस्य कषायेण घृष्ट्वा तैलेन वा पुटेत् ।। 56 ।। तक्रेण वाजमूत्रेण म्रियते स्वर्णमाक्षिकम्। कुलथी के क्वाथ के साथ, एरण्ड के तैल के साथ, तक्र (मट्ठा) के साथ अथवा बकरी के मूत्र के साथ पीसकर पुट देने से स्वर्णमाक्षिक मर जाती है, अर्थात् उसकी उत्तम भस्म बन जाती है। वक्तव्य—ध्यान रहे—एरण्ड तैल की पुट देने से स्वर्णमाक्षिक की काली एवं अन्य द्रवों की पुट देने से रक्त वर्ण का भस्म तैयार होती है। विमला शोधन विधि कर्कटीमेषशृङ्गीत्यैर्द्रवैर्जम्बीरजैर्दिनम् ।। 57 ।। भावयेदातपे तीव्रे विमला शुद्ध्यति ध्रुवम्। बाँझककोड़ा (खेखसा), मेढासिंगी तथा जम्बीरी नींबू के रस के साथ मिलाकर धूप में सुखा लेने से ही 'विमला' अवश्य शुद्ध हो जाती है। वक्तव्य—वर्ण-भेद से माक्षिक दो प्रकार की होती है—1. स्वर्णमाक्षिक और 2. विमला। यह विमला भी दो प्रकार की होती है—1. रजतमाक्षिक और 2. कांस्यमाक्षिक। इनमें पहली स्वर्णाभ अर्थात् चमकदार पीली-सी और दूसरी श्वेताभ अर्थात् काँसा के सदृश चमकदार सफेद होती है। विमला को रौप्यमाक्षिक (रूपामाखी) एवं कांस्यमाक्षिक (कांसामाखी) कहा जाता है। लोह, ताम्र एवं गन्धक का उचित परिमाण में मिश्रण होकर पार्थिव अग्नि द्वारा पृथ्वी के भीतर ही उचित परिपाक हो जाता है। अतएव विमलामाक्षिक को केवल भावना देकर ही शुद्ध करने का विधान किया गया है। इसी प्रकार स्वर्णमाक्षिक भी केवल नींबू के रस में अथवा गुलाबजल में पीसकर प्रयुक्त की जा सकती है, किन्तु ऐसे अवसरों पर शास्त्र की आज्ञा का पालन करना बहुत आवश्यक होता है। तुत्थ-शोधन-विधि विष्ठया मर्दयेत् तुत्थं मार्जारककपोतयोः ।। 58 ।। दशांशं टङ्कणं दत्त्वा पचेन्मृदुपुटे ततः। पुटं दध्ना पुटं क्षौद्रैर्देयं तुत्थविशुद्धये ।। 59 ।। तूतिया (नीला थोथा) को समान भाग बिल्ली तथा कबूतर के पुरीष (वीट) के साथ मिलाकर पीसना चाहिये और तूतिया की अपेक्षा दशमांश टंकण डालकर तथा पीसकर मृदुपुट (कुक्कुटपुट) में पुट दें। तत्पश्चात् दही से पीसकर


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

एक पुट तथा एक पुट मधु के साथ पीसकर देनी चाहिये। इस तरह तूतिया शुद्ध हो जाता है। वक्तव्य—तूतिया ताम्र-गन्धक का यौगिक है और यह नीलवर्ण वाला पदार्थ होता है तथा शीघ्र कै कराने वाला है। मोर के गले के सदृश वर्ण वाला होने के कारण यह 'शिखिग्रीव' कहा जाता है। निम्नलिखित विधि से तूतिया में से ताम्र को पृथक् किया जा सकता है। यथा—'तुत्थं टङ्कणसंयुक्तं निम्बूद्रवविमर्दितम्। अन्धमूषागतध्मातं सत्त्वं मुञ्चति ताम्रकम् ।। (आ० प्र० अ० 4.44)। अर्थात् तूतिया को टंकण (सोहागा) एवं नींबू के रस के साथ पीसकर एवं अन्धमूषा में रखकर तीव्र अग्नि देने से ताम्र का सत्त्व पृथक् हो जाता है। अभ्रक-शोधन-विधि कृष्णाभ्रकं धमेद् वह्नौ ततः क्षीरे विनिक्षिपेत्। भिन्नपत्रं तु तत्कृत्वा तण्डुलीयाम्लयोर्द्रवैः ।। 60 ।। भावयेदष्टयामं तदेवं शुद्ध्यति चाभ्रकम्। कृष्णाभ्रक (काले अभ्रक) को अग्नि में भली-भाँति तपाकर गाय के दूध में डाल दें और उसके पत्रों को अलग- अलग करके चौलाई तथा तिपतिया (खटकल) के रस में आठ प्रहर तक पड़ा रहने दें। इस प्रकार अभ्रक शुद्ध हो जाता है। अभ्रक मारण-विधि कृत्वा धान्याभ्रकं तत्त शोषयित्वाथ मर्दयेत् ।। 61 ।। अर्कक्षीरैर्दिनं खल्वे चक्राकारं च कारयेत्। वेष्टयेदर्कपत्रैश्च सम्यग्गजपुटे पचेत् ।। 62 ।। पुनर्मर्द्यं पुनः पाच्यं सप्तवारं प्रयत्नतः। ततो वटजटाक्वाथैस्तद्वद् देयं पुटत्रयम् ।। 63 ।। म्रियते नात्र सन्देहः सर्वयोगेषु योजयेत्। तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् ।। 64 ।। घृते जीर्णे तदभ्रं तु सर्वयोगेषु योजयेत्। मृतं त्वभ्रं हरेन्मृत्युं जरापलितनाशनम् ।। 65 ।। अनुपानैश्च संयुक्तं तत्तद् रोगहरं परम्। उक्त विधि से शुद्ध किये हुये अभ्रक को धान्याभ्रक बनाकर सुखा लें और खरल में डालकर आक के दूध के साथ एक दिन तक पीसकर टिकिया बना लें, तत्पश्चात् उन्हें मदार (आक) के पत्तों में लपेटकर (ऊपर से कपड़मिट्टी करके) गजपुट से पुट दें, फिर आक के दूध में पीसें और पूर्वोक्त विधि से पुट दें। इसी प्रकार प्रयत्न करके सात पुटें