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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

५४० शतपथ ब्राह्मण

ऽश्रासा॒न्तं भ॑जाय॒ तस्मा॑दे॒तानि॑ नानादे॒वत्यानि सन्ति वायव्यानी॒त्याच॑क्षते॒ सो ऽस्यैष प्रथमवषट्कार॒श्च सो॒मस्य॒ राज्ञ ए॒तान्यु॒ऽनेन पात्रा॑ण्याचक्षते ॥ १०॥ इन्द्रो ह॒ वाऽई॒क्षां च॑क्रे । वायु॒र्वै नो॒ऽस्य य॒ज्ञस्य॒ भूयि॑ष्ठभाग॒स्य प्रथमवषट्कार॒श्च सो॒म- स्य॒ राज्ञ ए॒तान्यु॒ऽनेन पात्रा॑ण्याचक्षते हन्ता॒स्मिन्नप॑वमि॒भाऽइति॑ ॥ ११॥ स हो- वाच । वाय॒वा मा॒स्मिन्य॒ज्ञे भ॑जेति किं ततः स्या॒दिति॒ निरु॑क्तमेव वाग्व॑दे॒दिति॒ निरु॑क्तं चेद्वाग्व॑दे॒द्वा वा भ॑जामीति॒ तत एष ऐन्द्रवाय॒वो ग्रहो॑ऽभवद्वाय॒व्यो हैव ततः पुरा ॥ १२॥ स इन्द्रो॑ऽब्रवीत् । अ॒र्धं मेऽस्य॒ ग्रह॒स्येति तुरी॑यमेव त॒ऽइति॑ वायु॒रर्ध॒मेव म॒ऽइतीन्द्र॑स्तुरी॒यमेव त॒ऽइति॑ वायुः ॥ १३॥ तौ प्र॒जाप॑तिं प्रति॒प्रश्न- मेयतुः । स प्रजाप॑तिर्गृहं द्वेधा च॑कार स॒ होवा॑चे॒दं वायोरित्य॑थ पुन॒रर्धं द्वेधा॑ च- कार स॒ होवा॑चे॒दं वायोरिती॒दं तवेतीन्द्रं॑ तुरी॒यमे॒व भाज॑यां चकार॒ यद्वै चतुर्थं तन्तुरी॒यं तत॑ एष ऐन्द्रतुरी॒यो ग्रहो॑ऽभवत् ॥ १४॥ तस्य॒ वाऽए॒तस्य॒ ग्रह॑स्य । द्वे पुरो॒रुचौ॑ वाय॒व्यैव पूर्वेन्द्रवायव्युत्तरा द्वेऽऽनुवा॒क्ये वाय॒व्येव पूर्वेन्द्रवायव्युत्तरा द्वौ प्रैषौ वाय॒व्य एव पूर्व ऐन्द्रवायव उत्तरो द्वे या॒ज्ये वाय॒व्यैव पूर्वेन्द्रवायव्यु- त्त॒रैव॒मेनं॑ तुरीयं-तुरीयेणैव भाज॑यां चकार ॥ १५॥ स॒ होवाच । तुरीयं-तुरीयं चे- न्माम॑बीभजुस्तुरी॒यमेव तर्हि वाङ्निरु॑क्तं वदिष्यतीति॒ तदे॒तन्तुरी॒यं वा॒चो निरु॑क्तं यन्मनु॑ष्या व॒दन्त्यथैतन्तुरी॒यं वा॒चोऽनिरु॑क्तं॒ यत्प॒शवो॑ व॒दन्त्यथैतन्तुरी॒यं वा॒चोऽनि- रु॑क्तं यद्वया॑सि व॒दन्त्यथैतन्तुरी॒यं वा॒चोऽनिरु॑क्तं॒ यदि॒दं क्षु॒द्रं स॑रीसृ॒पं व॑दति ॥ १६॥ तस्मा॑दे॒तदृषि॑णाभ्य॒नूक्तम् । च॒त्वारि॒ वाक्परि॑मिता प॒दानि॒ तानि॑ विदु॒र्ब्राह्मणा ये म॑नी॒षिणः॑ । गुहा॒ त्रीणि॒ निहि॑ता॒ नेङ्ग॑यन्ति तुरी॒यं वा॒चो म॑नु॒ष्या व॑दन्तीति ॥ १७॥ अथातो गृह्णात्येव । आ वायो भूष शुचिपा उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववा- र । उपो तेऽन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वेति ॥ १८॥ अ- थापगृह्य पुनरानयति । इन्द्रवायूऽइमे सुता उप प्रयोभिरागतम् । इन्दवो वामु-

कां० ४, अ० १, ब्रा० ३, कं० १०-१६ शतपथब्राह्मण / ५४१ भी योग्य। इसलिए यह ग्रह भिन्न-भिन्न देवताओं के होते हुए भी वायु के ही कहे जाते हैं। सोम राजा का पहला वषट्कार भी वायु का है और ये ग्रह भी वायु के ही कहे जाते हैं ॥१०॥ इन्द्र ने सोचा—हमारे इस यज्ञ का सबसे बड़ा भाग तो वायु का हो गया, क्योंकि सोम राजा का पहला वषट्कार उसका है। इसके अतिरिक्त ये ग्रह भी उसी के नाम से पुकारे जाते हैं। इनमें से मैं भी भाग लूंगा ॥११॥ उसने कहा, 'वायु ! इस ग्रह में मुझे भी भाग दे ।' 'मुझे क्या लाभ ?' 'वाणी व्यक्त हो जायगी।' 'यदि वाणी व्यक्त हो जायगी तो मैं तुझे भाग दे दूंगा।' इसलिए इस ग्रह का नाम ऐन्द्रवायव पड़ा। पहले केवल इन्द्र का ही था ॥१२॥ इन्द्र ने कहा, 'इस ग्रह का आधा मेरा ।' वायु ने कहा, 'इस ग्रह का चौथाई तेरा।' इन्द्र ने कहा, 'आधा मेरा।' वायु ने कहा, 'चौथाई तेरा' ॥१३॥ वे दोनों फैसले के लिए प्रजापति के पास गये। उस प्रजापति ने ग्रह के दो भाग कर दिये। उसने कहा, 'यह वायु का।' फिर आधे के दो भाग किये, और कहा, 'यह वायु का और यह तेरा।' तब उसने अपने भाग का चौथाई इन्द्र को दिया। चतुर्थ और तुरीय का एक अर्थ है। इसलिए इसका नाम ऐन्द्र-तुरीय ग्रह हो गया ॥१४॥ इस ग्रह के दो पुरोरुच मन्त्र होते हैं—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु-सम्बन्धी; दो प्रैष—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु सम्बन्धी; दो याज्य—पहला वायु-सम्बन्धी, दूसरा इन्द्र-वायु-सम्बन्धी। इस प्रकार वह सदा इन्द्र के लिए चौथाई भाग रखता है ॥१५॥ उसने कहा कि अगर मुझे चौथाई भाग दिया है तो वाणी भी चौथाई भाग ही स्पष्ट बोलेगी। इससे केवल यही चौथाई वाणी समझ में आती है जो मनुष्य बोलता है, और जिस चौथाई को पशु बोलते हैं वह समझ में नहीं आती। वह चौथी वाणी समझ में नहीं आती जिसे पक्षी बोलते हैं और वह चौथाई वाणी भी समझ में नहीं आती जिसको क्षुद्र कीड़े बोलते हैं ॥१६ इसीलिए ऋषि ने कहा, “चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनी- षिणः। गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति” (ऋ० १।१६४।४५)— “वाणी से परिमित चार पद होते हैं। बुद्धिमान्, ब्राह्मण उनको जानते हैं। तीन गुहा में रक्खे हुए स्पष्ट नहीं होते हैं। चौथाई वाणी को मनुष्य बोलते हैं” ॥१७॥ अब उस (सोम) में से ग्रह को मारता है, इस मन्त्र से—“आ वायो भूष शुचिपा ऽ उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार। उपो ते ऽअन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वा” (यजु० ७।७, ऋ० ७।६२।१)—“हे शुद्ध व्यान करनेवाले वायु, आ। तेरे हजारों अश्व हैं। तू सब वरों का दाता है। हे देव, जिसका तू पहला घूंट पीता है वह आनन्द-युक्त रस तुझको अर्पण किया गया” ॥१८॥ इस ग्रह को लेकर फिर भरता है, इस मन्त्र से—“इन्द्र वायू ऽ इमे सुता ऽ उप प्रयो-

अध्याय-१, ब्राह्मण-४

५४२ शतपथ ब्राह्मण

श॒क्ति हि । उपयामगृ॒हीतो॑ऽसि वाय॒वऽइ॑न्द्रवा॒युभ्यां॑ त्वै॒ष ते॒ योनिः॑ स॒जोषो॑भ्यां त्वेति॑ सादयति स॒ यदा॒ह स॒जोषो॑भ्यां त्वेति॒ यो वै वायुः स इन्द्रो॒ य इन्द्रः॑ स वा- युस्तस्मा॒दाहै॒ष ते॒ योनिः॑ स॒जोषो॑भ्यां॒ त्वेति॑ ॥ ११॥ ब्राह्मणम् ॥ ३॥॥ क्रतू॒दक्षौ॑ ह॒ वाऽअ॑स्य मित्रावरुणौ । ए॒तन्म॒ध्या॒त्म स॒ यदे॒व मन॑सा कामय- तऽइ॒दं मे॑ स्यादि॒दं कु॑र्वी॒येति॑ स॒ एव क्रतु॒रथ॒ यदस्मै॒ तत्समृ॒ध्यते॑ स द॒क्षो मित्र॑ ए॒व क्रतु॑र्वरु॒णो दक्षो॒ ब्रह्मैव॑ मित्रः॑ क्ष॒त्रं व॑रु॒णोऽभिग॒न्तेव॒ ब्रह्म॑ क॒र्ता क्ष॒त्रियः॑ ॥ १॥ ते॒ हैतेऽग्रे॒ नानेवासतुः । ब्रह्म॑ च क्ष॒त्रं च॒ ततः॑ शशा॒कैव॒ ब्रह्म॑ मित्र ऋ॒ते क्ष॒त्राद्वरु॑णा॒त्स्थातुम् ॥ २॥ न क्ष॒त्रं वरु॑णः । ऋ॒ते ब्रह्म॑णो मित्रा॒द्यद् किं च॒ वरु॑णः कर्म॑ चक्रे॒ऽप्रसू॑तं॒ ब्रह्म॑णा मित्रे॑ण॒ न हैवास्मै॒ तत्समानृधे॑ ॥ ३॥ स क्ष॒त्रं वरु॑णः । ब्रह्म॑ मि॒त्रमुप॑मन्त्रयां च॒क्रऽउप॒ माव॑र्तस्व॒ सꣳसृ॒जाव॑है पु॒रस्ता॑ करवै त्वत्प्रसूतः॒ कर्म॑ करवा॒णीति॒ तथेति॒ तौ सम॑सृजेतां॒ तत ए॒ष मैत्रावरुणो ग्र॒होऽभ॑- वत् ॥ ४॥ सोऽए॒व पु॑रो॒धा । तस्मा॒न्न ब्रा॑ह्म॒णः॒ सर्व॑स्येव क्ष॒त्रिय॑स्य पुरो॒धां का- मयेत स॒ꣳ ह्ये॑तौ सृ॒जेते॑ सुकृ॒तं च॑ दुष्कृ॒तं च॒ नोऽए॒व क्ष॒त्रियः॑ सर्व॑मिव ब्राह्म॒णं पुरो॒दधी॑त स॒ꣳ ह्ये॑वैतौ सृ॒जेते॑ सुकृ॒तं च॑ दुष्कृ॒तं च॒ स यत्ततो वरु॑णः कर्म॑ चक्रे प्रसू॑तं॒ ब्रह्म॑णा मित्रे॑ण स॒ꣳ हैवास्मै॒ तदानृधे ॥ ५॥ तत्तदे॒वानु॑क्लृ॒प्तमेव॑ । य॒द्ब्राह्म॒णो ऽरा॒जन्यः॑ स्या॒द्यद्यु॒ राजा॑नं ल॒भेत॒ समृ॑द्धं॒ तदे॒तद्ध॒ त्वेवानव॑क्लृप्तं॒ यत्क्षत्रियो॒ऽब्राह्म- णो भव॑ति॒ यद्ध॒ किं च॒ कर्म॑ कुरु॒तेऽप्रसू॑तं॒ ब्रह्म॑णा मित्रे॑ण॒ न हैवास्मै॒ तत्समृ॑- ध्यते॒ तस्मा॒द् क्ष॒त्रिये॑ण कर्म॑ करिष्यमा॒णेनोप॑स॒र्त्य एव॑ ब्राह्म॒णः स॒ꣳ ह्यै॒वास्मै॑ तद्ब्रह्म॑प्रसूतं॒ कर्म॒ऽर्धते ॥ ६॥ अ॒थातो गृ॒ह्णात्येव॑ । अ॒यं वां॑ मित्रावरुणा सु॒तः सोम॑ ऋतावृधा । ममेदि॒ह श्रुतꣳ॒ हव॒म् । उपयामगृ॒हीतो॑ऽसि मित्रावरु॑णाभ्यां त्वेति॑ ॥ ७॥ तं पय॑सा श्रीणाति । तद्यत्पय॑सा श्रीणा॒ति वृ॒त्रो वै सोम॑ आसी॒त्तं यत्र॑ दे॒वा अ॒घ्नꣳस्तं॑ मि॒त्रम॑ब्रुवंस्त्वमपि जही॒तीति॑ स॒ न च॑कमे सर्व॑स्य वा॒ऽअ॒हं मि-

कां० ४, अ० १, ब्रा० ३-४, कं० १६ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५४३ भिरागतम् । इन्दवो वामुशन्ति हि । उपयामगृहीतोऽसि वायव ऽ इन्द्र वायुभ्यां'' (यजु० ७।८, ऋ० १।२।४)—"हे इन्द्र-वायु, यह सोम है। आप दोनों इसके पान के लिए आइये। बूंदें आपको चाहती हैं। तू उपयाम के साथ लिया गया है। इन्द्र और वायु के लिए तू है।" अब वह यह कहकर रखता है कि 'यह तेरी योनि है। तुझको ही मिले हुओं के साथ लेता हूँ।' जो वायु है वह इन्द्र है; जो इन्द्र है सो वायु है, इसलिए कहा, 'यह तेरी योनि है।' दोनों मिले हुओं के साथ तुझको लेता हूँ' ॥१६॥ मैत्रावरुणग्रहः अध्याय १—ब्राह्मण ४ मित्र और वरुण इसके ऋतु और दक्ष हैं। यह इनका अध्यात्म है, अर्थात् ऋतु और दक्ष आत्मिक वृत्तियाँ हैं। जब वह मन में सोचता है कि 'मेरा ऐसा हो जाय, मैं यह करूँ' यही ऋतु अर्थात् मित्र है। और जब उसकी इच्छा पूरी हो जाती है तो यह दक्ष हुआ। मित्र ऋतु है और वरुण दक्ष। ब्रह्म मित्र हैं, क्षात्र वरुण । ब्राह्मण सोचता है और क्षत्रिय करता है ।।१।। आरम्भ में ये ब्राह्मण और क्षत्रिय अलग-अलग थे। तब मित्र अर्थात् ब्राह्मण वरुण अर्थात् क्षत्रिय बिना रह सकता था ॥२॥ लेकिन वरुण या क्षत्रिय मित्र अर्थात् ब्राह्मण के बिना नहीं रह सकता था। वरुण जो कुछ कर्म मित्र या ब्राह्मण की प्रेरणा के बिना करता उसी में असफलता हो जाती ।।३।। वह क्षत्रिय वरुण ब्राह्मण मित्र के पास आया और कहा, 'तू मेरी ओर आ कि हम दोनों मिल जायें। तुझी को आगे रक्खूँ। तेरी प्रेरणा से काम करूं।' उसने कहा, 'अच्छा।' वे दोनों मिल गये। इसीलिए यह मित्र और वरुण का ग्रह हुआ ॥४॥ यही पुरोहित है। इसलिए ब्राह्मण को चाहिए कि (बिना पता लगाये) हर किसी क्षत्रिय का पुरोहित न बने जिससे पुण्य और पाप मिल न जावें, और क्षत्रिय को चाहिए कि (बिना पता लगाये) हर ब्राह्मण को अपना पुरोहित न बना ले कि पाप और पुण्य मिल न जायँ। वरुण ने मित्र ब्राह्मण की प्रेरणा से जो कर्म किये उनमें उसकी सफलता हुई ॥५॥ यदि ब्राह्मण राजा के बिना रहे तो कोई दोष नहीं है। यदि राजा हो तो इसमें दोनों का भला है। परन्तु क्षत्रिय को बिना ब्राह्मण के नहीं रहना चाहिए। क्षत्रिय जो कुछ कर्म बिना मित्र ब्राह्मण की प्रेरणा के करता है उसमें उसकी सफलता नहीं होती। इसलिए क्षत्रिय जो कुछ करना चाहे उसमें वह ब्राह्मण के पास जाय, क्योंकि जो कुछ वह ब्राह्मण की प्रेरणा से करेगा उसमें उसे सफलता होगी ॥६॥ अब वह इसको इस मन्त्र से लेता है— "अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऽ ऋतावृधा । ममेदिह श्रुतं ु हवम् । उपयामगृहीतोऽसि मित्रावरुणाभ्यां त्वा" (यजु० ७।६, ऋ० २।४१।४) - "हे पवित्र मित्र और वरुण, यह सोम तुम दोनों के लिए निचोड़ा गया। मेरे निमन्त्रण को सुनो। तुमको उठाया गया है मित्र वरुण के लिए" ॥७॥ उसमें दूध मिलाता है। दूध इसलिए मिलाता है। सोम ही वृत्र था। जब देवों ने उसे मारा तो उन्होंने मित्र से कहा, 'तू भी मार।' उसने न माना- 'मैं सबका मित्र हूँ। मित्र होकर

अध्याय-१, ब्राह्मण-५

५४४ शतपथ ब्राह्मण त्र॒मस्मि॒ न॒ मित्रँ॑ स॒न्नमित्रो॑ भविष्या॒मीति॒ तं वै॑ वा यज्ञाद॒न्तरे॑ष्याम इत्यु॒तमे॒पि कु॒र्व्वीति॒ होवाच॒ तस्मा॒त्पश॒वोऽपा॑क्रामन्नमित्रँ॑ स॒न्नमित्रो॑ऽभूदिति॒ स प॒शुभि॒र्व्य्या॑- र्धय॒त्तमे॒ते दे॒वाः प॒शुभिः॒ सम॑ार्धय॒न्यत्पय॑साश्रीणाँ॒स्तद्यो॒ऽस्यै॒नमे॒ष ए॒तत्प॒शुभिः॒ स- र्मार्धयति॒ यत्पय॑सा श्री॒णाति॑ ॥८॥ तदाहुः । शश्व॒द् नैव॒ चकमे कॢप्त॒मिति॒ तद्य॒दे- वात्र॑ पय॒स्तन्मित्र॑स्य॒ सोम॑ ए॒व वरु॑णस्य॒ तस्मा॒त्पय॑सा श्रीणाति॒ ॥ ९॥ स॒ श्रीणा- ति । रा॒या वयँ॒ सस॑वा॒ँसो म॑देम ह॒व्येन॑ देवा॒ यव॑सेन॒ गावः॑ । तां धे॒नुं मि॑त्रा- वरुणा यु॒वं नो॒ विश्वा॑हा धत्तम॒नप॑स्फुरन्तीमे॒ष ते॒ योनि॑र्ऋ॒तायुभ्यां॒ त्वेति॑ सादय- ति॒ स यदा॒ह॒र्त्तायु॑भ्यां॒ त्वेति॒ ब्रह्म॒ वाऽऋ॒तं ब्रह्म॒ हि मित्रो॒ ब्रह्मो॒ त्ऋ॒तं वरु॑ण ए॒वायुः सं॑वत्स॒रो हि वरु॑णः संवत्सर॒ आयु॒स्तस्मा॑दाहै॒ष ते॒ योनि॑र्ऋता॒युभ्यां॑ त्वेति॑ ॥१०॥ ब्राह्मणम् ॥४॥॥ श्रोत्रँ॑ ह॒ वाऽअ॒स्याश्विनः॑ । तस्मा॒त्सर्व्वतः परिहारं॒ भज॑यति॒ सर्व्व॑तो ह्ये॒नेन श्रोत्रे॑ण शृणोति॒ यत्र॒ वै भृग॑वो वाऽङ्गि॑रसो वा स्व॒र्गं लो॒कँ समा॑श्नुवत तच्च्यव॑- नो वा भा॒र्गवश्च्यव॑नो वाऽङ्गि॑रसस्तद्दे॒व जी॒र्णिः कृत्व्या॑रूपो जहे ॥१॥ शर्या॑तो ह॒ वाऽइ॒दं मान॑वो ग्रामे॑ण चचार । स त॒देव प्रति॑वेशो निवि॑विशे॒ तस्य कुमा॒राः क्रीड॑न्त इ॒मं जी॒र्णिं कृत्व्या॒रूपमनर्थ्यं॑ मन्य॑माना लो॒ष्टैर्वि॑पिपिषुः ॥२॥ स॒ शर्या॑ति॒- र्भ्यचु॑क्रोध । तेभ्यो॒ऽसंज्ञां॑ चकार॒ पितेव॒ पुत्रे॑ण युयुधे॒ भ्राता भ्रात्रा॑ ॥३॥ शर्या॑तो ह॒ वाऽई॒क्षां चक्रे । यत्किमक॑रं॒ तस्मा॑दिदमाप॒दीति॒ स गो॒पालाँ॒श्चावि॒पालाँ॒श्च सँ॒हूयित्वा॑ऽउवाच ॥४॥ स होवाच । को वो॒ऽद्येह किं॑चिदद्राक्षी॒दिति॒ ते हो- चुः पुरु॑ष ए॒वायं जी॒र्णिः कृत्व्या॑रूपः शेते॒ तमन॑र्ध्यं मन्य॑मानाः कुमा॒रा लो॒ष्टैर्व्वि॑- पिपन्तीति॒ स वि॒दां च॑कार स वै च्यव॑न॒ इति॑ ॥५॥ स रथं॑ युक्त्वा । सुक॒न्याँ॒ शार्या॒तीमु॑पाधा॒य प्रति॑ष्यन्द॒ स आ॒जगाम॒ यत्र॒ऽर्षिरा॑स॒ तत् ॥६॥ स होवाच । ऋषे॒ नम॑स्ते यन्नावे॑दिषं॒ तेनाहिँ॑सिषमियँ॒ सुक॒न्या तया॑ तै॒ऽपह्नु॑वे॒ संजा॑नीतां मे

कां० ४, अ० १, ब्रा० ४-५, कं० ८-१० व १-७ शतपथब्राह्मण / ५४५ अमित्र नहीं होना चाहता।' 'तो हम तुझे यज्ञ से निकाल देंगे।' तब उसने कहा 'अच्छा, मैं भी मारूँगा।' तब पशु उसके पास से चले गये कि यह मित्र था, अमित्र हो गया। तब वह पशुओं से वंचित रह गया। सोम में दूध मिलाने से देवों ने उसको पशुओं से युक्त कर दिया। इसी प्रकार यह भी सोम में दूध मिलाकर इस यजमान या मित्र को पशुओं से युक्त कर देता है ॥८॥ इस पर कुछ लोग कहते हैं कि उसने तो मारना नहीं चाहा था। इसलिए इसमें जितना दूध है वह मित्र का है और जितना सोम है वह वरुण का। इसलिए सोम में दूध मिलाता है ॥६॥ वह इस मन्त्र से मिलाता है—“राया वयँ॒ ससवाꣳ॑सो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः । तां धेनुं मित्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमपस्फुरन्तीमेष ते योनिर्ऋतायुभ्यां त्वा” (यजु० ७।१०, ऋक् ४।४२।१०)—“जो सम्पत्ति हमको मिली है उससे हम आनन्दित हों। देव हव्य से और गायें घास से। हे मित्र-वरुण, तुम हमको यह सदा दूध देनेवाली गाय दो।” यह कहकर वह उस ग्रह को रख देता है—“यह तेरी योनि है। ऋत और आयु के लिए तुझको।” 'ऋत और आयु के लिए' क्यों कहा ? अह्म ऋत है। अह्म मित्र है। वरुण आयु है। संवत्सर वरुण है, संवत्सर आयु है। इसलिए कहा कि 'यह तेरी योनि है, ऋत और आयु के लिए तुझको' ॥१०॥ आश्विनग्रहः अध्याय १—ब्राह्मण ५ आश्विन ग्रह इसका श्रोत्र हैं। इसलिए चारों ओर घुमाकर पीता है। इस श्रोत्र से चारों ओर की बात सुनता है। जब अङ्गिरा-वंशी भृगु लोग स्वर्ग को गये, च्यवन भार्गव या च्यवन आंगिरस जीर्ण और आकृति-मात्र पीछे छूट गया ॥१॥ उसी समय मनुवंशी शर्याति अपने स्वजनों के साथ उधर आया और वहीं बस गया। उसके कुमारों ने खेलते हुए इस जीर्ण भयानक पुरुष को देखा और उसको अनर्थ्य या नाचीज समझकर उस पर ढेले मारने लगे ॥२॥ उसने शर्याति वालों पर क्रोध किया और उनमें उसने विद्रोह उत्पन्न कर दिया। बाप बेटे से और भाई भाई से लड़ने लगा ॥३॥ शर्याति ने सोचा कि मैंने कुछ किया है जिससे ऐसी आपत्ति आई है। उसने ग्वालों और गडरियों को बुलाकर कहा—॥४॥ उसने कहा, 'अरे तुमने आज कोई नई बात देखी है?' उन्होंने उत्तर दिया कि 'एक जीर्ण और दीन पुरुष लेटा हुआ है, उसको नाचीज समझकर कुमारों ने उस पर ढेले फेंके थे।' वह समझ गया कि यह च्यवन है ॥५॥ उसने रथ जोतकर उसमें अपनी सुकन्या नामक लड़की को बिठाया और वहाँ आया जहाँ वह ऋषि था ॥६॥ और कहा, 'ऋषि, नमस्ते ! मैंने जाना नहीं इसलिए आपको दुःख दिया। यह सुकन्या है.

५४६ शतपथ ब्राह्मण ग्रा॒म इति॒ तस्य॑ ह॒ तत॑ ए॒व ग्रामः॒ संज॑ज्ञे॒ स ह॒ तत॑ ए॒व शर्या॑तो मान॒व उच्चु॑- यु॒जे नेद॒पर॑ꣳ हि॒नसा॒नीति॑ ॥ ७॥ अ॒श्विनौ॑ ह वाऽइ॒दं भि॒षज्य॑न्तौ चेरतुः। तौ सु॒- क॒न्या॑मुपेयतु॒स्तस्यां॑ मिधु॒नमी॑षाते॒ तन्न ज॑ह्रौ ॥ ८॥ तौ॒ होच॑तुः। सुकन्ये॒ कनिमं जी॒र्णिं कृ॒त्यारू॑पमु॒पशे॒षऽश्रावा॒मनु॒प्रेहीति॒ सा हो॑वाच॒ यस्मै॒ मां पि॒तादा॒न्नैवाहं तं जी॒वन्त॑ꣳ हास्या॒मीति॒ तद्धायमुषि॒राज्ञौ॑ ॥ ९॥ स॒ होवा॑च । सुकन्ये॒ किं वैत॒- द॑वोचता॒मिति॒ तस्मा॑ऽए॒तद्व्या॑चचक्षे॒ स ह॒ व्या॑ख्यात उवाच॒ यदि॑ वैत॒त्पुन॑र्ब्रूवतः॒ सा त्वं॒ ब्रूता॒न्न वै सु॒सर्वा॑विव स्थो॒ न सु॒समृ॑द्धावि॒वाथ॑ मे॒ पतिं॑ निन्दथ॒ इति॒ तौ यदि॑ वा ब्रूवतः॒ केनाव॒मस॑र्वौ स्वः॒ केनासमृ॑द्धावि॒ति सा त्वं॑ ब्रूतात्प॒तिं नु मे॒ पु- न॑र्युवाणं कुरुत॒मथ॑ वां वक्ष्या॒मीति॒ तां॒ पुन॒रुपे॑यतु॒स्ताꣳ हैत॒द्वेवो॑चतुः ॥ १०॥ सा॒ हो॑वाच । न वै सु॒सर्वा॑विव स्थो॒ न सु॒समृ॑द्धावि॒वाथ॑ मे॒ पतिं॑ निन्दथ॒ इति॒ तौ॒ हो॑चतुः॒ केनाव॒मस॑र्वौ स्वः॒ केनासमृ॑द्धावि॒ति सा॒ हो॑वाच॒ पतिं॑ नु मे पुन॑र्युवाणं कुरुत॒मथ॑ वां वक्ष्या॒मीति॑ ॥ ११॥ तौ॒ हो॑चतुः । ए॒तं ह्र॒दम॒भ्यव॑हर॒ स येन॒ व- यसा कमि॒ष्यते॒ तेनोदे॒ष्यतीति॒ तꣳ ह्र॒दम॒भ्यव॑जहार॒ स येन॒ वय॑सा चक॒मे तेनो- दे॑याय ॥ १२॥ तौ॒ हो॑चतुः । सुकन्ये॒ केनाव॒मस॑र्वौ स्वः॒ केनासमृ॑द्धावि॒ति तौ ह॒र्- षिरि॑व प्र॒त्युवा॑च कुरु॒क्षेत्रे॑ऽमी दे॒वा य॒ज्ञं त॑न्वते॒ ते वां य॒ज्ञाद॒न्तर्य॑न्ति॒ तेनासर्वौ॑ स्थ॒स्तेनासमृ॑द्धावि॒ति तौ ह॒ तत॑ ए॒वाश्विनौ॑ प्रेयतु॒स्तावा॑जग्मतु॒र्देवान्य॒ज्ञं त॒न्वाना- ꣳस्तु॑ते ब॒हिष्प॑वमाने ॥ १३॥ तौ॒ हो॑चतुः । उप॒ नौ व्ह॑यध्व॒मिति॒ ते ह॒ देवा॑ ऊ- चुर्न॑ वामुप॒ह्वयि॑ष्यामहे॒ बहु म॑नु॒ष्येषु॒ सꣳसृ॑ष्टमचारिष्टं भि॒षज्य॑न्ताविति॑ ॥ १४॥ तौ॒ हाचतुः । वि॒शीर्णा॒ वै य॒ज्ञेन य॒ज्ञधु॒ऽइति॒ कथं॑ वि॒शीर्णेत्युप॒ नु नौ व्हय॑ध्व॒मथ॑ वो वक्ष्याव॒ इति॒ तथेति॑ ताऽउपा॒ह्वयन्त ताभ्यामे॒तमा॑श्वि॒नं ग्र॒हम॑गृह्ण॒न्तावध्व॒र्यू प- ज्ञ॒स्याभ॑वतां॒ तावेतद्य॒ज्ञस्य॒ शिरः॒ प्रत्य॑धत्तां॒ तद्गद॑स्तद्दिवाकीर्त्यानां॒ ब्राह्म॑णे व्या- ख्यायते॒ यथा॒ तद्य॒ज्ञस्य॒ शिरः॒ प्रति॑दधु॒स्तस्मा॑दे॒ष स्तु॒ते ब॒हिष्प॑वमाने ग्र॒हो गृ-

कां० ४, अ० १, ब्रा० ५, कं० ७-१५ शतपथब्राह्मण / ५४७ इससे मैं उसका प्रतीकार करता हूँ । अब मेरे लोग ठीक रहें।' तब से वे लोग ठीक रहे । लेकिन मनुवंशी शर्याति वहाँ से चलता बना कि कहीं मैं इसे फिर अप्रसन्न न कर दूँ ॥७॥ उसी समय चिकित्सा करते-करते अश्विन आ निकले । उन्होंने सुकन्या को ग्रहण करना चाहा परन्तु वह राजी न हुई ॥८॥ वे दोनों बोले, 'सुकन्या, तू किस जीर्ण नाचीज पुरुष के पास रहती है ? हमारे पास आ।' वह बोली, 'मेरे पिता ने मुझे जिसके साथ ब्याहा है उसी के पास रहूँगी, जब तक यह जीवित है।' ऋषि को यह बात मालूम हो गई ॥६॥ वह बोला, 'सुकन्या, इन दोनों ने तुझसे क्या कहा ?' उसने उससे सब-कुछ कह दिया । यह सुनकर उसने कहा, 'अगर तुझसे ये फिर कहें तो उनसे कहना कि तुम दोनों पूर्ण तो हो नहीं फिर मेरे पति की क्यों निन्दा करते हो ? यदि वे पूछें कि किस बात में हम कम हैं या निर्बल हैं तो कहना कि पहले मेरे पति को युवा कर दो तब कहूँगी।' वे फिर उसके पास आये और उससे वही बात कही ॥१०॥ वह बोली, 'तुम न तो पूर्ण हो, न समृद्धवान् । फिर मेरे पति की क्यों निन्दा करते हो ?' वे दोनों बोले, 'हम किस बात में कम हैं ? किस बात में निर्बल हैं ?' वह बोली, 'मेरे पति को युवा कर दो तब मैं बताऊँ' ॥११॥ वे बोले, 'उस तालाब में इसको ले जा, यह जिस अवस्था की कामना करेगा उसी अवस्था का होकर निकलेगा।' वह उसको तालाब पर ले गई। उसने जिस आयु की कामना की, उसी आयु का होकर निकला ॥१२॥ वे बोले, 'सुकन्या, हम किस बात में अधूरे हैं, किसमें कम हैं?' तब ऋषि ने स्वयं उत्तर दिया, 'कुरुक्षेत्र में देव यज्ञ करते हैं और तुमको बाहर निकाल दिया है। यही तुममें अधूरापन है, यही कमी है।' यह सुनकर ये दोनों अश्विन लौट गये । वे वहाँ पहुँचे जहाँ देवों ने बहिष्पवमान स्तुति करने के पश्चात् यज्ञ रच रक्खा था ॥१३॥ वे बोले, 'हमको भी यज्ञ में बुलाओ।' देव बोले, 'हम नहीं बुलाते। तुम तो चिकित्सा करते-करते सब प्रकार मनुष्यों में फिरते रहे हो' ॥१४॥ वे बोले, 'अरे तुम तो बे-सिर के यज्ञ को करते हो?' 'बे-सिर का कैसे?' 'हमको बुलाओ तब हम बतायेंगे।' 'अच्छा।' उन्होंने उन अश्विनों का आवाहन कर लिया और उनके लिए इस आश्विन-ग्रह को लिया । ये दोनों यज्ञ के अध्वर्यु हो गये । उन्होंने यज्ञ को सिर-वाला बना दिया । 'दिवाकीत्यों' के ब्राह्मण में लिखा है कि उन्होंने यज्ञ के सिर को किस प्रकार सम्पादित किया । इसलिए बहिष्पवमान की स्तुति के पश्चात् यह ग्रह लिया जाता है, क्योंकि बहिष्पवमान

अध्याय-२, ब्राह्मण-१

५४८ शतपथ ब्राह्मण ष्यति स्तु॒ते हि ब॑हिष्पवमा॒नेऽआ॑ग॒हताम् ॥ १५॥ तौ हो॑चतुः । मु॒ख्यौ वा॒ऽआवा॑- ञ्द्य॒ज्ञस्य॒ स्वो याव॑ध॒र्युङ्ङ॒हू नावि॒मं पु॒रस्ता॒दहं पर्येाहर॒ताभि॑ द्विदे॒वत्या॑नीति॒ ता- भ्यामे॒तं पु॒रस्ता॒दहं पर्याज॑हुर॒भि द्विदे॒वत्यां॑स्तस्मादे॒ष द॑श॒मो ग्र॒हो गृ॑ह्यते तृती॑य एव वषट्क्रियतॆऽथ यद॑श्विना॒विती॒मे ह॒ वै द्यावा॑पृथि॒वी प्र॒त्यक्ष॑मश्वि॒नावि॒मे ही- दꣳ सर्व॒माश्नु॑वातां पुष्करस्रजा॒वित्य॒ग्निर्हैवास्यै॒ पुष्क॑रमादि॒त्योऽमुष्यै॑ ॥ १६॥ अथा॑- तो गृ॒ह्णात्ये॒व । या वां॑ क॒शा मधु॑मत्यश्विना सू॒नृता॑वती । तया॑ य॒ज्ञं मि॑मिक्षतम् । उ॒पया॒मगृ॑हीतोऽस्य॒श्विभ्यां॑ त्वै॒ष ते॒ योनि॒र्माध्वीभ्यां॒ त्वेति॑ सादयति॒ तं वै मधु॑मत्य॒- ऽर्चा गृ॑ह्णाति माध्वीभ्यां॒ त्वेति॑ सादयति तद्यन्मधु॑मत्य॒ऽर्चा गृ॑ह्णाति माध्वीभ्यां॒ त्वेति॑ साद॒यति॑ ॥ १७॥ दध्यङ् ह वा॒ऽआ॑भ्या॒माथा॑र्वणः । मधु॒ नाम॑ ब्रा॒ह्मण॑मुवाच॒ तद्दे॒- नयोः प्रि॒यं धाम॒ तद्दे॒वेनयोरे॒तेनो॑पग॒ह्यत॒ तस्मान्मधु॑मत्य॒ऽर्चा गृ॑ह्णाति माध्वीभ्यां॑ त्वेति॑ सादयति ॥ १८॥ तानि वा॒ऽए॒तानि॑ । षड्ढानि पात्रा॑णि भवन्ति॒ राज्ञाव- मैन्द्रवायवपात्रं तत्तस्य द्वितीयꣳ रूपं तेन तद्विदेवत्यमथैकाग्रं मैत्रावरुणपात्रं त- त्तस्य द्वितीयꣳ रूपं तेन तद्विदेवत्यमौष्ठमाश्विनपात्रं तत्तस्य द्वितीयं रूपं तेन त- द्विदेवत्यमथ यदश्विना॒विति मुख्यौ वा॒ऽअ॒श्विनावौष्ठमिव वा॒ऽइदं मुखं तस्मादौ- ष्ठमाश्विनपात्रं भवति ॥ १९॥ ब्राह्मणम् ॥ ५॥ प्रथमोऽध्यायः [६५.] ॥ ॥ चक्षु॑षी ह वा॒ऽअ॒स्य शुक्रा॒मन्थिनौ॑ । तद्या॒ऽए॒ष ए॒व शुक्रो य॒ एष॒ तपति त- द्येदे॒ष एतत्तप॑ति तेनै॒ष शु॒क्रश्च॒न्द्रमा ए॒व मन्थी॑ ॥ १॥ तꣳ सक्तुभिः श्रीणाति । तदेनं मन्थं करोति तेनोऽएष मन्ध्येतौ ह वाऽआसां प्रजानां चक्षुषी न यदिदौ नोदियातां न हैवेह स्वौ चन पाणी निर्जानीयुः ॥ २॥ तयोरत्तैवान्यतरः । आ- द्योऽन्यतरोऽत्तैव युक्त आद्यो मन्थी ॥ ३॥ तयोरत्तैवान्यतरमनु । आद्योऽन्यत- रमन्वतैव शुक्रमन्वाद्यो मन्थिनमनु तौ वाऽअन्यस्मै गृह्येतेऽअन्यस्मै हूयेते श- ण्डामर्कावित्यसुररक्षसे ताभ्यां गृह्येते देवताभ्यो हूयेते तद्यत्तथा ॥ ४॥ यत्र वै

कां० ४, अ० १-२, ब्रा० ५-१, कं० १५-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ५४६ की स्तुति के पश्चात् ही वे आये थे ॥१५॥ वे बोले, 'हम अध्वर्यु हैं, हमीं यज्ञ में मुख्य हैं । हमारे इस पहले ग्रह को द्विदेवतों के लिए दे दो ।' उन्होंने उस पहले ग्रह को द्विदेवतों को दे दिया । इसलिए यह दसवाँ ग्रह है और तीसरा वषट्कार होता है । ये अश्विन कौन हैं ? द्यौ और पृथिवी । यही दो तो हैं जो सबको अश्नुवातां या प्राप्त करते हैं । यह पुष्कर स्रज अर्थात् पुष्कर की माला वाले हैं, क्योंकि पृथिवी का पुष्कर अग्नि है और द्यौ का सूर्य ॥१६॥ वह अश्विन ग्रह को इस मन्त्र से लेता है— “या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनूतावती । तया यज्ञं मिमिक्षतम्” (यजु० ७।११, ऋ० १।२२।३) — 'हे अश्विन, यह जो तुम्हारी मीठी और प्रसन्न करनेवाली कशा या वाणी है उससे यज्ञ को मिलाओ ।' "उपयामगृहीतोऽस्यश्विभ्यां त्वा” (यजु० ७।११) — 'तुझे आश्रय के लिए ग्रहण किया है। दोनों अश्विनों के लिए तुझको ।' इस मन्त्रांश से उसको रख देता है— “एष ते योनिर्मध्वीभ्यां त्वा” (यजु० ७।११) — 'यह तेरी योनि है, मधु-प्रियों के लिए तुझे ।' 'मधु' शब्द वाली ऋचा के साथ क्यों उठाता है और 'मधु- प्रियों के लिए तुझे' ऐसा कहकर क्यों रख देता है ? ॥१७॥ दध्यङ् अथर्वा ने 'मधु-ब्राह्मण' को अश्विनों को बताया था । यह इनका प्रिय धाम है । उनके इसी प्रिय से वह उनके पास जाता है। इसलिए मधु शब्द वाली ऋचा से उठाता है और 'मधुप्रियों के लिए तुझको' यह कहकर रखता है ॥१८॥ ये पात्र चिकने होते हैं । इन्द्र और वायु के पात्र के बीच में मेखला होती है । यह इसका दूसरा रूप है । इसलिए यह दो देवों का होता है। मित्र-वरुण का पात्र बकरी की आकृति का होता है। यह इसका दूसरा रूप है। इसलिए यह दो देवताओं का है। आश्विनों का ग्रह होंठ की आकृति का होता है। यह उसका दूसरा रूप है, इसलिए यह दो देवताओं का है। यह पात्र अश्विनों का इसलिए होता है कि अश्विन यज्ञ का मुख (मुख्य) हैं और मुख में होंठ होते हैं । इसलिए आश्विन-ग्रह होंठ की आकृति का होता है ॥१९॥ शुक्रामन्थि ग्रहौ अध्याय २–ब्राह्मण १ शुक्र और मन्थिन् ग्रह उसकी आँख हैं। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, वह शुक्र है। चूँकि तपता है इसलिए इसका नाम सूर्य है । चन्द्रमा मन्थी है ॥१॥ उसमें सत्तू मिलाता है। यह जो मथता है इसलिए इसका नाम मन्थी है। ये दोनों सूर्य और चाँद इन प्रजाओं की आंख हैं, क्योंकि यदि दोनों उदय न हों तो लोगों को अपने दोनों हाथ भी न दीखें ॥२॥ इनमें एक खानेवाला है और एक खाद्य । शुक्र खानेवाला है और मन्थी खाद्य ॥३॥ एक इनमें से खानेवाले के अनुकूल है, दूसरा खाद्य के—शुक्र खानेवाले के, मन्थिन् खाद्य के । ये ग्रह एक के लिए जाते हैं और दूसरे के लिए इनकी आहुति दी जाती है । शण्ड और मर्क दो असुर राक्षस हैं । इनके लिए ग्रह लिये जाते हैं और देवों के लिए इनकी आहुति दी जाती है । यह इस प्रकार से—॥४॥

दे॒वाः । असुर॒रक्ष॒सान्यप॑जघ्निरे तदे॒तावेव न॒ शेकु॒रपह॑न्तुं यद्ध स्म दे॒वाः किं च कर्म॒ कुर्व॑ते॒ तद्ध॒ स्म मो॒हयि॒त्वा क्षिप्र॒ऽएव पुन॒रप॑द्रवतः ॥५॥ ते ह॒ देवा॑ ऊचुः । उप॑जानीत यथे॒मावपह॑नामहा॒ऽइति॒ ते होचुर्गृहा॑वे॒वाभ्यां॒ गृहाम॒ ताव॒भ्यवै॑ष्यत- स्तौ स्वी॒कृत्या॒पह॑निष्यामहा॒ऽइति॒ ताभ्यां॒ ग्रहौ॑ जगृहू॒स्ताव॒भ्यवै॑तां तौ स्वी॒कृत्या॑- पाघ्नत॒ तस्मा॑च्छण्डा॒मर्का॑भ्या॒मिति॑ गृह्येते दे॒वता॑भ्यो हूयेते ॥६॥ अ॒पि होवाच याज्ञवल्क्यः । नो स्त्वि॑द्दे॒वता॑भ्य ए॒व गृह्णीयामा३ विजि॑तरूपमिव॒ हीद॒मिति॒ तद्धे स तन्मीमाꣳसा॑मेव॒ चक्रे नेत्तु चकार ॥७॥ इ॒मामु॒ हैके शुक्रस्य पुरोरुचं कुर्व- न्ति । अ॒यं वे॒नश्चोद्य॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒मान॒ऽइति॒ तदे॒तस्य रू॒पं कुर्मो य ए॒ष तप॑तीति॒ यदा॒ह ज्योति॑र्जरा॒युरिति॑ ॥८॥ इमां त्वे॒व शुक्रस्य॑ पुरो॒रुचं कुर्या॒त् । तं प्र॒त्नथा॒ पूर्व॑था वि॒श्वथे॒मथाᳵ ज्येष्ठता॑तिं बर्हि॒षद॒ꣳ स्व॑र्वि॒दमित्ये॒ता ह्ये॑- तम॒न्वत्ता हि ज्येष्ठस्तस्मादाह॒ ज्येष्ठता॑तिं बर्हि॒षद॒ꣳ स्व॑र्विदम् प्रती॒चीनं॑ वृज॒नं दोहसे धुनि॒माशुं जय॑न्त॒मनु॒ यासु॒ वर्ध॑से । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ शण्डा॑य त्वै॒ष ते॒ योनि॑र्वी॒रतां पा॒हीति॑ सादयत्ये॒ता ह्ये॑तम॒न्वत्ता हि वी॒रस्तस्मा॒दाहै॒ष ते॒ योनि॑- र्वी॒रतां पा॒हीति॒ दक्षि॑णार्धे सादयत्ये॒ताꣳ ह्ये॑ष दि॒शम॑नु॒ संचर॑ति ॥९॥ अथ म- न्थि॒नं गृह्णा॑ति । अ॒यं वे॒नश्चोद॑य॒त्पृश्नि॑गर्भा॒ ज्योति॑र्जरायू॒ रज॑सो वि॒माने॑ । इ॒मम॒- पाꣳ स॑ङ्ग॒मे सूर्य॑स्य॒ शिशुं न विप्रा॑ म॒तिभी रिहन्ति । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि म॒र्काय॑ त्वेति॑ ॥१०॥ तꣳ स॒क्तुभिः॑ श्रीणाति । तद्यत्स॒क्तुभिः॑ श्रीणा॒ति वरु॑णो ह॒ वै सो- मस्य॒ राज्ञो॒ऽभीवा॒द्धि प्र॑तिपि॒पेष॒ तद॒श्वय॑त्ततो॒ऽश्वः॒ सम॑भवत्तद्य॒ङ्कूय॒यात्स॒मभ॑वत्त- स्मादश्वो॒ नाम॒ तस्या॒श्रु प्रास्क॑न्दत्ततो॒ यवः॒ सम॑भवत्तस्मादाहु॒र्वारु॒ण्यो॒ यव॒ इति॑ तद्यद्दे॒वाःस्यात्र॑ चक्षुषो॒ऽमीयत॒ तेनै॒वैनमेतत्सम॑र्धयति कृ॒त्स्नं क॑रोति॒ तस्मात्स॒क्तु- भिः॑ श्रीणाति ॥११॥ स॒ श्री॑णाति । मनो॒ न येषु॒ हव॑नेषु ति॒ग्मं विपः॒ शच्या॑ वनुथो द्र॒वता॑ । आ यः शर्या॑भिस्तुविनृ॒म्णोऽअ॒स्याश्रीणीता॒दिशं॒ गभ॑स्तावे॒ष ते॒

का० ४, अ० २, ब्रा० १, क० ५-१२ शतपथब्राह्मण / ५५१ जब देवों ने असुर राक्षसों को मार भगा दिया तो वे इन दोनों को न भगा सके। देवता जो कुछ करते, ये दोनों उनमें विघ्न डालते और फिर झट से भाग जाते ॥५॥ तब देवों ने कहा-‘क्या तुम कोई उपाय कर सकते हो कि इन दोनों को भगा सकें?’ वे कहने लगे-‘इन दोनों के लिए दो ग्रह लें। वे इन दोनों को लेने के लिए आवेंगे। हम इनको पकड़कर मार भगायेंगे।’ उन दोनों के लिए ग्रह लिये और जब वे आये तो उनको पकड़कर मार भगाया। इसलिए षण्ड और मर्क के लिए ये दो ग्रह लिये जाते हैं और देवताओं के लिए इनकी आहुति दी जाती है ॥६॥ याज्ञवल्क्य ने यह भी कहा है कि हम इनको देवताओं के लिए ही क्यों न न लें। यह तो जीत का चिह्न है। परन्तु उन्होंने इतनी मीमांसा मात्र की है। व्यवहार में इसको कभी नहीं लाये ॥७॥ कुछ लोग इस ऋचा को शुक्र की पुरोरुक् या स्तुति में लाते हैं, “अयं वेनश्चोदयत् पृश्नि- गर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने” (यजु० ७।१६)—यहाँ ‘ज्योतिर्जरायुः’ (प्रकाश है जरायु जिसका) कहा, इससे तात्पर्य यह है कि वह इसको तपनेवाले सूर्य के समान करता है ॥८॥ परन्तु शुक्र की पुरोरुक् या स्तुति इस मन्त्र से होनी चाहिए, “तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्व- थेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषद॑ स्व॒र्विदम्” (यजु० ७।१२, ऋ० ५।४४।१)—“पुरानी रीति से, पहली रीति से, सब रीति से, आजकल की रीति से बड़े, यज्ञधारी, स्वर्ग विद्या के जाननेवाले यजमान को।” यह शुक्र खानेवाला है, और खानेवाला ही बड़ा है। इसलिए कहा कि ‘बड़े, यज्ञ- धारी, स्वर्ग विद्या के जाननेवाले को’। “प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे। उपयामगृहीतोऽसि षण्डाय त्वैष ते योनिर्वीरतां पाहि” (यजु० ७।१२)—“जो उपस्थित है, बलवान् है, शत्रुओं को जीतनेवाला और शीघ्रगामी है, ऐसे यजमान को तू दुहता है उन यज्ञ- क्रियाओं में जिनमें तू बढ़ता है। तुझे रक्षा के लिए ग्रहण किया गया है। षण्ड के लिए तुझे। यह तेरी योनि है। तू वीरता की रक्षा कर।” यह पढ़कर वह रख देता है। यह खानेवाला है। खाने- वाला वीर होता है। इसलिए कहा कि ‘यह तेरी योनि है, तू वीरता की रक्षा कर।’ दक्षिण के कोने में इसको रखता है, क्योंकि इसी दिशा में सूर्य चलता है ॥६॥ अब इस मन्त्र से मन्थी को लेता है, “अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने। इममपा॑७ संगमे सूर्यस्य, शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति। उपयामगृहीतोऽसि मर्काय त्वा” (यजु० ७।१६)—“यह वेनः (चन्द्र) पृश्निगर्भा (द्यौलोक या सूर्य के सहारे स्थित) ज्योतिर्ज- रायु (ज्योति से लिपटा हुआ), (विमाने) अन्तरिक्ष में (रजसः) जलों को (चोदयत्) प्रेरणा करता है। विद्वान् लोग शिशु के समान इसकी सूर्य के जलों के साथ संगम के समय में बुद्धियुक्त वाणियों से स्तुति करते हैं। रक्षार्थ लिया. गया है। मर्क के लिए तुझको” ॥१०॥ उसमें सत्तू मिलाता है। सत्तू इसलिए मिलाता है कि वरुण ने सोम राजा की आँख में मारा और वह सूज गई (अश्वयत्)। उसमें से अश्व (घोड़ा) निकला। चूंकि यह सूजन में से निकला इसलिए इसका ‘अश्व’ नाम पड़ा। उसका एक आँसू गिरा। उसमें से जौ उत्पन्न हुए। इसलिए जौ (वरुण) वरुण का समझा जाता है। इस प्रकार आँख का जितना भाग उस समय दुख गया था उसी की पूर्ति करता है। उसे चंगा करता है। इसलिए सत्तूओं को मिलाता है ॥११॥ वह इस मन्त्र से मिलाता है, “मनो न येषु हवनेषु तिग्मं विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता। आ यः शर्याभिस्तु विन्दुमणो ऽ अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तौ” (यजु० ७।१७, ऋ० १।६१।३) “जिन

योनि॒: प्र॒जाः पा॒हीति॑ सादयत्या॒व्यो ह्ये॑त॒मन्वा॒द्या ह्यी॒माः प्र॒जा विश॒स्तस्मा॑दाहै॒ष ते योनि॒: प्र॒जाः पा॒हीति॑ ॥ १२॥ द्वौ प्रोक्षि॑तौ यूपशकलौ भवतः । द्वावप्रोक्षितौ प्रोक्षि॑तं चै॒वाध्व॒र्युराद॒त्तेऽप्रोक्षि॑तं चै॒वमे॒व प्र॑तिप्रस्था॒ता प्रोक्षि॑तं चै॒वाद॒त्तेऽप्रोक्षि॑तं च शुक्रमै॒वाध्व॒र्युराद॒त्ते म॒न्थिनं॑ प्रतिप्रस्था॒ता ॥ १३॥ सोऽध्व॒र्युः। अप्रॊक्षितेन यूप- शकलेनापमार्ष्ट्यपमृष्टः शण्ड इत्येवमेव प्रतिप्रस्थातापमृष्टो मर्क इति तदाददा- नावेवासुररक्षसेऽपघ्नतो देवास्त्वा शुक्रपाः प्रणयन्त्वित्येवाध्वर्युर्निष्क्रामति देवा- स्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्त्विति प्रतिप्रस्थाता तदेतौ देवताभ्य एव प्रणयतः ॥ १४॥ तौ जघनेनाहवनीयमरत्नी संधत्तः । तावुत्तरवेदी सादयतो दक्षिणायामेव श्रो- णावध्वर्युः सादयत्युत्तरायां प्रतिप्रस्थाताननुसृजन्तावेवानाधृष्टासीति तद्रक्षोभिरेवै- तदुत्तरवेदिमनाधृष्टां कुरुतो विपर्येष्यन्तौ वाऽएतावग्निं भवतोऽत्येष्यन्तौ तस्मा ऽएवैतन्निह्नुवाते तथो हैनौ विपरीयन्तावग्निर्न हिनस्ति ॥ १५॥ सोऽध्वर्युः पर्यै- ति । सुवीरो वीरान्प्रजनयन्यरीहीत्येता ह्येतमन्वक्ता हि वीरस्तस्मादाह सुवीरो वीरान्प्रजनयन्यरीहीत्यभि रायस्पोषेण यजमानमिति तद्यजमानायाशिषमाशास्ते यदाहाभि रायस्पोषेण यजमानमिति ॥ १६॥ अथ प्रतिप्रस्थाता पर्यैति । सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन्यरीहीत्याव्यो ह्येतमन्वाद्या ह्यीमाः प्रजा विशस्तस्मादाह सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन्यरीहीत्यभि रायस्पोषेण यजमानमिति तद्यजमानायाशिषमाशास्ते यदाहाभि रायस्पोषेण यजमानमिति ॥ १७॥ तावपिधाय निष्क्रामतः । तिर ऽ वैनावितत्कुरुतस्तस्मादिमौ सूर्याचन्द्रमसौ प्राञ्चौ यन्तौ न कश्चन पश्यति तौ पु- रस्तात्परीत्यापोर्णुतः पुरस्तात्तिष्ठन्तौ जुहुत आविरेवैनावितत्कुरुतस्तस्मादिमौ सू- र्याचन्द्रमसौ प्रत्यञ्चौ यन्तौ सर्व एव पश्यति तस्मात्पराचेतः सिच्यमानं न कश्चन पश्यति तदु पश्चात्प्रजायमान सर्व एव पश्यति ॥ १८॥ तौ जघनेन यूपमरत्नी संधत्तः । यद्य॒ग्नि॒र्नाद्रि॑येत यद्यु॑ऽअ॒ग्नि॒रुद्रि॑येतोपा॒य्ये॑नैव यूप॑मर॒त्नी संद॑ध्याताꣳ संज्ञ-

का० ४, अ० २, ब्रा० १, कं० १२-१६ शतपथब्राह्मण / ५५३ हवनों में विचार के समान तेज तुम दोनों अध्वर्यु कर्म के द्वारा जाते हो। जिस बहुत धनवाले अध्वर्यु ने अंगुलियों से हाथ में लिये हुए (मन्थि में) सत्तू मिलाये हैं।" इस मन्त्र से रख देता है, “एष ते योनिः प्रजाः पाहि” (यजु० ७।१७) - "यह तेरी योनि है। प्रजा को पाल।" यह ग्रह खाद्य है। यह प्रजा भी खाद्य है। इसलिए कहा कि यह योनि है, तू प्रजा को पाल ॥१२॥ यूप के दो टुकड़े प्रोक्षित (जल छिड़के) होते हैं और दो अप्रोक्षित (बिना जल के छिड़के)। अध्वर्यु एक प्रोक्षित और एक अप्रोक्षित लेता है। इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता भी एक प्रोक्षित और अप्रोक्षित लेता है। अध्वर्यु शुक्र को लेता है और प्रतिप्रस्थाता मन्थि को ॥१३॥ अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता दोनों राक्षसों को इस प्रकार निकालते हैं कि अध्वर्यु अप्रोक्षित यूप-शकल से उस ग्रह को मांजता है और कहता है 'अपमृष्टः शंडः' (शंड भगा दिया गया) और इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता कहता है 'अर्क भगा दिया गया'। अध्वर्यु यह कहकर बाहर जाता है, “देवास्त्वा शुक्रपाः प्रणयन्तु"- "शुक्र पीनेवाले देव तुझे ले जावें।" प्रतिप्रस्थाता यह कहकर बाहर जाता है, “देवास्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्तु"- "मन्थि पीनेवाले देव तुझे ले जावें।" इस प्रकार ये दोनों देवताओं के निमित्त हवियों को ले जाते हैं ॥१४॥ वे दोनों आहवनीय के पीछे उत्तर वेदी पर (दाहिनी हाथ की) कुहनी मिलाकर उन ग्रहों को रखते हैं। दक्षिण श्रोणी में अध्वर्यु रखता है और उत्तर में प्रतिप्रस्थाता बिना छोड़े हुए, यह कहकर, “अनाधृष्टाऽसि" (यजु० ७।१७) - "तू आक्रमण से सुरक्षित है।" इस प्रकार ये दोनों वेदी को राक्षसों से सुरक्षित करते हैं। ये अग्नि की परिक्रमा करनेवाले हैं। इसलिये इनको प्रसन्न करता है। इस प्रकार जब वे परिक्रमा करते हैं तो अग्नि इनको नहीं सताती ॥१५॥ अध्वर्यु इस मंत्र से परिक्रमा करता है, "सुवीरो वीरान् प्रजनयन्" (यजु० ७।१३)— "वीर वीरों को उत्पन्न करता हुआ।" यह हवि खानेवाले की स्थानी है और खाने वाला वीर है। इसलिए कहा कि वीरों को उत्पन्न करता हुआ। "परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्” (यजु० ७।१३)-"यजमान को धन से युक्त कर।" यह जो कहा कि यजमान को धन से युक्त कर, इससे यजमान को आशीर्वाद देता है ॥१६॥ प्रतिप्रस्थाता इस मन्त्र से परिक्रमा करता है, "सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन्” (यजु० ७।१८) - "अच्छी प्रजावाले, प्रजाओं को उत्पन्न करते हुए।" यह हवि खाद्य का स्थानी है, और ये प्रजा के लोग खाद्य हैं। इसलिए कहा कि प्रजा को उत्पन्न करते हुए। "परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्" (यजु० ७।१८)- "यजमान को धन से युक्त कर।" यह जो कहा कि यजमान को धन से युक्त कर, इससे यजमान को आशीर्वाद देता है ॥१७॥ वे दोनों ग्रहों को (हाथ से) ढककर ले जाते हैं। वह इनको छिपा लेता है। इसीलिए जब सूर्य और चन्द्र आगे की ओर चले जाते हैं तो छिप जाते हैं। (यूप के) सामने जाकर वे (ग्रहों को) खोल देते हैं और सम्मुख खड़े होकर आहुति देते हैं। इससे वे उनको 'दृष्ट' बनाते हैं। इसीलिए जब सूर्य और चन्द्र पीछे लौटते हैं तो उसको सब कोई देखता है। इसीलिए जब वीर्य सींचा जाता है तो कोई नहीं दिखता, परन्तु जब उत्पत्ति होती है तो सब देखते हैं ॥१८॥ वे यूप के पीछे अपनी कुहनियां रखते हैं कि कहीं आग भड़क न उठे। लेकिन अगर आग भड़क उठे तो यूप के सामने कुहनी कर लें— अध्वर्यु इस मन्त्र से, "संजग्मानो दिवा पृथिव्या

५५४ शतपथ ब्राह्मण ग्म॒ानो दि॒वा पृ॑थि॒व्या शु॒क्रः शु॒क्रशो॑चिषे॒त्येवा॑ध्व॒र्युः सं॒ग्मानो॑ दि॒वा पृ॑थि॒व्या म- न्थी म॑न्थि॒शोचि॑षेति प्रतिप्रस्थाता॒ चक्षु॑षोरे॒वैत॒दाऽऽर॑मणे कुरुतश्चक्षुषी॒ऽएवैत- त्संधत्त॒स्तस्मा॑दि॒मे॒ऽअभितो॒ऽस्थिनी॒ चक्षु॑षी स॒ꣳहि॑ते ॥१९॥ सोऽध्व॒र्युः । अ॒प्रोक्षि॑तं यूपशकलं॒ निर॑स्यति॒ निर॑स्तः॒ शण्ड॒ इत्ये॒वमे॒व प्रतिप्रस्थाता॒ निर॑स्तो॒ मर्क॒ इति॑ तत्पु॒राहु॑तिभ्यो॒ऽसुर॑रक्ष॒से॒ऽअप॑हतः ॥ २०॥ अथा॑ध्व॒र्युः । प्रोक्षि॑तं यूपशकल॒माहव॑- नी॒ये प्रास्य॑ति शु॒क्रस्या॑धिष्ठानमसी॒त्येव॑मे॒व प्रतिप्रस्थाता॒ मन्थि॒नो॒ऽधिष्ठानमसीति॑ चक्षु॑षोरे॒वैते॒ समि॑धौ चक्षुषी॒ऽएवैतत्स॑मिन्धे॒ तस्मा॑दि॒मे समि॑द्धे चक्षु॑षी ॥२१॥ त- त्र॒ जपति॑ । अ॒हिन्र॑स्य ते देव सोम सुवीर्य॑स्य रायस्पोष॑स्य ददि॒तारः स्यामेत्या॒शी- रे॒वैषा॑तस्य॒ कर्म॑ण आ॒शिष॑मे॒वैतदाशा॑स्ते ॥ २२॥ अथा॑श्रा॒व्याह॑ । प्रातः-प्रातः स- व॒स्य शु॒क्रव॑तो मधुश्चुत॒ इन्द्रा॑य सोमा॒न्प्रस्थि॑तान्प्रे॒ष्येति॒ वष॑ट्कृते॒ऽध्व॒र्युर्जु॑होति त- दनु॑ प्रतिप्रस्थाता॒ तद॑नु चमसाध्व॒र्यवः॑ ॥ २३॥ तौ वै पु॒रस्ता॑त्ति॒ष्ठन्तौ॑ जुहुतः । च- क्षुषी॒ वा॒ऽए॒तौ तत्पु॒रस्ता॑दे॒वैतच्चक्षु॑षी धत्त॒स्तस्मा॑दि॒मे पु॒रस्ता॑च्चक्षु॑षी ॥ २४॥ अ॒- भितो॒ यूपं॒ तिष्ठ॑न्तौ जुहुतः । य॒था वै ना॑सि॒कैवं यूप॒स्तस्मा॑दि॒मे॒ऽअभितो॒ नासि॑कां चक्षु॑षी ॥ २५॥ तौ वै॒ वष॑ट्कृतौ सन्तौ म॒लेन॑ हूयेते । ए॒तेनो॒ हैतौ तद्य॑द॒क्षुवा॑ते य॑दे॒नौ सर्वꣳ॒ सव॑नम॒नुहूयेते॒ यद्धैवैतौ॒ सर्वꣳ॒ सव॑नम॒नुहूयेते॒ऽए॒तौ वै प्र॒जाप॑तेः प्रत्य॑क्षतमां॒ चक्षु॑षी ह्ये॒तौ स॒त्यं वै चक्षुः॑ स॒त्यꣳ हि प्र॒जाप॑ति॒स्तस्मा॑दे॒नौ सर्वꣳ॒ सव॑नम॒नुहूयेते ॥ २६॥ स जु॑होति । सा प्र॑थ॒मा सं॑स्कृ॒तिर्विश्व॑वारा॒ स प्र॑थ॒मो व- रु॑णो मि॒त्रोऽअ॒ग्निः । स प्र॑थ॒मो बृह॒स्पति॑श्चिकि॒त्वाꣳस्तस्मा॒ऽइन्द्रा॑य सु॒तमाजु॑होत स्वाहेति॑ ॥ २७॥ स यज्जुहो॑ति । सा प्र॑थ॒मा स प्र॑थम॒ इति॑ शश्व॒द्व वै रेत॑सः सि- क्तस्य॒ चक्षु॑षी॒ऽएव प्रथ॑मे॒ सम्भव॑तस्त॒स्माज्जुहो॑ति सा प्र॑थ॒मा स प्र॑थम॒ इति॑ ॥ २८॥ अथ॒ सम्प्रेष्य॑ति । प्रेतु॒ होतु॑श्चम॒सः प्र ब्रह्म॑णः॒ प्रोद्गातॄणां॒ प्र यज॑मानस्य॒ प्रय॑न्तु सद॒स्यानाꣳ॑ होत्रा॒णां च॑मसाध्वर्यव॒ उपाव॑र्तध्वꣳ शु॒क्रस्याभ्यु॑न्नयध्व॒मिति॒ सम्प्रेष॑ ऽए॒वैष

कां० ४, अ० २, ब्रा० १, कं० १६-२६ शतपथब्राह्मण / ५५५ शुक्रः शुक्रशोचिषा" (यजु० ७।१३)-"शुक्र प्रकाशस्वरूप द्यौ और पृथिवी के साथ संयुक्त होकर।" और प्रतिप्रस्थाता इस मन्त्र से, "संजग्मानो दिवा पृथिव्या मन्थी मन्थिशोचिषा" (यजु० ७।१८)-"मन्थी मन्थी के समान दीप्तिवाले द्यौ और पृथिवी के साथ संयुक्त होकर।" इस प्रकार ये इन ग्रहों को आँखों के ठहरने का स्थान बनाते हैं। इनको आँखों के समान पास-पास जोड़कर रखते हैं। इसीलिए आँखें पास-पास हड्डियों द्वारा मिली होती हैं ॥१९॥ अध्वर्यु अप्रोक्षित यूप-शकल को यह कहकर फेंक देता है, "निरस्तः षण्डः" (यजु० ७।१३)-"षण्ड भगा दिया गया।" प्रतिप्रस्थाता यह कहकर फेंकता है, "निरस्तो मर्कः" (यजु० ७।१८)-"मर्क भगा दिया गया।" इस प्रकार आहुतियों के पहले इन दोनों राक्षसों को भगा देते हैं ॥२०॥ अध्वर्यु प्रोक्षित यूप-शकल को यह कहकर आहवनीय अग्नि में छोड़ता है, "शुक्र- स्याधिष्ठानमसि" (यजु० ७।१३)-"तू शुक्र का अधिष्ठान है।" इसी प्रकार प्रतिप्रस्थाता यह कहकर "मन्थिनोऽधिष्ठानमसि" (यजु० ७।१८)-"मन्थि का अधिष्ठान है तू।" ये दोनों को प्रकाश देनेवाले हैं। इससे वह आँखों को प्रकाश देता है। इसीलिए आँखों में प्रकाश है॥२१॥ अब जाप करता है, "अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम" (यजु० ७।१४) - "हे सोम देव, तेरे न नष्ट होनेवाले, वीर्यवान् धन के हम दाता होवें।" इस कर्म का यह आशीर्वाद है। इस आशीर्वाद को देता है ॥२२॥ श्रौषट् कहकर कहता है-- 'प्रातःसवन के चमकीले, मीठे सोमोँ को इन्द्र के लिए प्रेरित करो।' वषट्कार होने पर अध्वर्यु आहुति देता है। उसके पीछे चमसाध्वर्यु ॥२३॥ ये आगे खड़े होकर आहुति देते हैं। ये दोनों आहुतियाँ यज्ञ की आँखें हैं। इस प्रकार आँखों को आगे रखता है। इसीलिए तो आँखें आगे होती हैं ॥२४॥ ये यूप के दोनों ओर खड़े होकर आहुति देते हैं। यूप नासिका के समान है। नासिका के दोनों ओर आँखें होती हैं ॥२५॥ वषट्कार कहकर ये दोनों आहुतियाँ मन्त्र पढ़कर दी जाती हैं। इनमें यह विशेषता है कि इनके पश्चात् पूरे सवन की आहुतियाँ दी जाती हैं। इनके पीछे पूरे सवन की आहुतियाँ इसलिए दी जाती हैं कि ये आहुतियाँ प्रजापति की प्रत्यक्षतम आँखें हैं। सत्य चक्षु है, सत्य प्रजापति है। इसलिए इनके पीछे पूरे सवन की आहुतियाँ दी जाती हैं ॥२६॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है, "सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो मित्रो ऽअग्निः ॥ स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वाँस्तस्मा ऽ इन्द्राय सुतमाजुहोत स्वाहा" (यजु० ७।१४, १५) - "सबके ग्रहण करने योग्य यह पहली संस्कृति है। वह पहला वरुण, मित्र और अग्नि है। वह पहला चेतनावा बृहस्पति है। उस इन्द्र के लिए निचोड़े हुए सोम की आहुति दो" ॥२७॥ 'सा प्रथमा, स प्रथमः' यह कहकर वह जो आहुति देता है वह सदा सींचे हुए वीर्य के समान है। आँखें पहले होती हैं इसलिए वह 'सा प्रथमा, स प्रथमः' ऐसा कहकर आहुति देता है ॥२८॥ अब वह आदेश देता है, 'होता का चमसा आवे, ब्राह्मण का, उद्गाता का, यजमान का, सदस्यों के, होताओं के, अध्वर्युओं के। इन चमसों को शुद्ध सोमरस से भरो।' यह सब

अध्याय-२, ब्राह्मण-२

५५६ शतपथ ब्राह्मण पर्येत्य प्रतिप्रस्थातार्धयोः पात्रे सꣳस्रवमवनयत्यच्छ॑ण्वैतद॒ाद्यं बलिं॑ हारयति त॒मध्व॑र्यु॒र्होतृ॑चमसे॒ऽवनयति भक्षा॑य वषट्कर्तुर्हि भक्षः॑ प्रा॒णो वै वषट्का॒रः सो॒ऽस्मा- दे॒तद्वषट्कुर्वतः परा॒डिवाभूत्प्रा॒णो वै भ॒क्षस्तत्प्रा॒णं पुनरा॒त्मन्ध॑त्ते ॥ २९॥ अथ॑ य॒देते प्रतीची॒ पात्रे न हर॑न्ति । हर॒न्त्यन्या॒न्यक्षांश्च॒नूषी ह्येते सꣳस्रव॑मेव॒ होतृ॑- चमसे॒ऽवनयति ॥३०॥ अथ॑ हो॒त्राणां॑ चम॒सान॒भ्युन्न॑यन्ति । हुतोच्छिष्टा वा॒ऽएते सꣳस्रवा भवन्ति नालमाहु॑त्ये तान्निवे॑तत्पुनरा॒प्याय॑यन्ति तथालमाहु॑त्ये भवन्ति तस्मा॒द्धोत्राणां॑ चम॒सान॒भ्युन्न॑यन्ति ॥३१॥ अथ॑ हो॒त्राः संया॑जयन्ति । होत्रा॑ ह॒ वै॒ युक्ता दे॒वेभ्यो य॒ज्ञं वह॑न्ति ता॒ एवैतत्सं॑तर्पयन्ति तृप्ताः॑ प्रीता॒ दे॒वेभ्यो य॒ज्ञं वहा॒- निति तस्मा॒द्धोत्राः॑ संया॑जयन्ति ॥ ३२॥ स प्रथ॒मायां वा हो॒त्रायाम् । इ॒ष्टाया॑मुत्त॒- मायां वानुमन्त्रयते तृप्य॑न्तु होत्रा॒ मधो॒ याः स्वि॑ष्टा याः सु॒प्रीताः॑ सु॒हुता यत्स्वा- हेति॑ हो॒त्राणामे॒वैषा तृप्ति॑रे॒त्य प्रत्यङ्ङुपवि॑शत्य॒याड्ग्नीदित्य॒ग्नीध्रा॒त्र य॒ज्ञतामुत्त॒- मः सं॒यज॑ति तस्मा॒दाहा॒याड्ग्नीदिति॑ ॥ ३३॥ ब्राह्मणम् ॥ ६ [२. १.] ॥ प्रथमः प्रपा- ठकः ॥ कण्डिकासंख्या १३६ ॥ ॥ आ॒त्मा ह वा॒ऽआग्रयणः॑ । सो॒ऽस्यैष सर्व॑मेव॒ सर्व॒ꣳ ह्ययमात्मा तस्मा॒दन॑- या गृ॒ह्लात्यस्यै॒ हि स्थाली भव॑ति स्थाल्या ह्ये॑नं गृह्णाति॒ सर्वं वा॒ऽइयꣳ सर्व॑मेष ग्र॒हस्तस्मा॒दन॑या गृह्णाति ॥ १॥ पूर्णं गृ॒ह्लाति । सर्वं वै पूर्ण॒ꣳ सर्व॑मेष ग्र॒हस्त- स्मात्पूर्णं गृह्णाति ॥२॥ विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यो॑ गृह्णाति । सर्वं वै विश्वे॑ दे॒वाः सर्व॑मे- ष ग्र॒हस्तस्माद्विश्वे॑भ्यो दे॒वेभ्यो गृह्णाति ॥ ३॥ सर्वे॑षु सव॒नेषु॑ गृह्णाति । सर्वं वै सव॒नानि सर्व॑मेष ग्र॒हस्तस्मा॒त्सर्वे॑षु सव॒नेषु गृह्णाति ॥४॥ स यदि॒ रात्रोप॑द॒स्येत् । तमत एव तन्वीरंस्ततः प्रभावयेयुरात्मा वाऽआग्रयण आत्मा॑नं वा॒ऽइमानि स- र्वा॒ण्यङ्गानि प्रभवन्त्येतस्मा॒त्तत्तो हारियोज॒नं ग्र॒हं गृह्णाति॒ तदा॒त्मन्ये॒वास्यां प्रति- ष्ठायामन्त॒तो य॒ज्ञः प्रति॑तिष्ठति ॥५॥ अथ॒ यस्मा॑दाग्रय॒णो नाम॑ । यां वा॒ऽअमूं प्रा-

कां० ४, अ० २, ब्रा० १-२, क० २६-३३ व १-६ शतपथब्राह्मण / ५५७ मिला-जुला आदेश है। प्रतिप्रस्थाता घूमकर अध्वर्युओं के पात्र में बचा-खुचा सोम डाल देता है। मानो खानेवाले के लिए खाद्यपदार्थ में से बलि दिलवाता है। अध्वर्यु उसको होता के चमसे में डाल देता है पीने के लिए। वषट्कार पढ़नेवाले का यह भक्ष्य है। वषट्कार-प्राण है। यह प्राण वषट् करने के समय निकल-सा गया। प्राण भक्ष है, अर्थात् प्राण को फिर उसमें धारण करता है ॥२६॥ इन पात्रों को वे पीछे क्यों नहीं ले जाते और दूसरे ग्रहों को क्यों पीछे ले जाते हैं ? इस- लिए कि ये दोनों आँखें हैं। वह बचे-खुचे को होता के चमसे में डाल देता है ॥३०॥ अब होताओं के चमसों को भरते हैं। ये बचे-खुचे भाग जो आहुतियों के अवशिष्ट हैं आहुतियों के लिए काफी नहीं हैं। इनको भर देता है तो ये आहुतियों के लिए काफी हो जाते हैं, इसलिए वह होताओं के चमसों को भर देता है ॥३१॥ अब होता लोग मिलकर ही देवों के लिए यज्ञ को ले जाते हैं। इन सबको वह एक साथ सन्तुष्ट करता है कि तृप्त होकर वे देवों के लिए यज्ञ को ले जावें। इसलिए होता लोग एक-साथ आहुति देते हैं ॥३२॥ पहले या पिछले होता की आहुति हो चुकने पर उनसे वह कहता है, "तृम्पन्तु होत्रा मध्वो याः स्विष्टा याः सुप्रीताः सुहुता यत्स्वाहा" (यजु० ७।१५)—"मीठे सोम को पीनेवाले, भलीभांति प्रसन्न होनेवाले होता लोग सन्तुष्ट होवें।" यह होताओं की सन्तुष्टि है। अब वह आता है और पश्चिमाभिमुख बैठ जाता है। "याऽग्नीत्" (यजु० ७।१५)—"अग्नीध्र ने आहुति दी।" अग्नीध्र सबसे पीछे आहुति देता है। इसलिए कहा, 'याड् अग्नीत्' अर्थात् अग्नीध्र ने आहुति दी ॥३३॥ आग्रयणग्रहः अध्याय २—ब्राह्मण २ आग्रयण ग्रह इसका आत्मा है। इस प्रकार यह उसका सर्वस्व है। आत्मा सर्वस्व होता है। इसलिए वह इस (पृथिवी) के द्वारा लेता है। स्थाली इसी (मिट्टी) की होती है। स्थाली में ही इस आहुति को निकालता है। यह पृथिवी सब-कुछ है, इसलिए यह ग्रह सब-कुछ है। इसलिए वह इसको इस पृथिवी के द्वारा लेता है ॥१॥ वह इसको पूरा भरकर लेता है। पूर्ण का अर्थ है सब। यह ग्रह 'सब' है। इसलिए पूरा भरता है ॥२॥ विश्वेदेवों के लिए लेता है। 'विश्वेदेवा' सब हैं। यह ग्रह भी सब है। इसलिए सब देवों के लिए ग्रहण करता है ॥३॥ सब सवनों में लेता है। सवन 'सब' हैं। यह ग्रह भी 'सब' है। इसलिए सब सवनों में लेता है ॥४॥ यदि सोम राजा चुक जावे, तो उसे इसी ग्रह में से भर देते हैं। इसी में से निकालते हैं। यह आग्रायण ग्रह आत्मा (शरीर) है। आत्मा (शरीर) से ही वे सब अंग निकलते हैं। इस- लिए अन्त में हारियोजन ग्रह को लेते हैं। इस प्रकार अन्त में यज्ञ इसी प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित हो जाता है ॥५॥ इसका आग्रयण नाम यों पड़ा। यह जो पत्थर (सोम निचोड़ने का) को लेते समय मौन

वाणामादानो वाचं प्र॒हृत्य॒त्र वै स॒ग्निऽव॑दत्त॒द्यत्स॒ात्राग्ने॒ऽवद॒त्तस्मा॑दाग्रयणो नाम ॥ ६॥ रक्षोभ्यो वै तां भीषा वाचमयछन्। षडाऽऋत॒वः प्राचो ग्रहान्गृह्णात्यैष सप्तमः षडाऽऋत॒वः संवत्सरस्य सर्वं वै संवत्स॒रः ॥ ७॥ तां देवाः। सर्वस्मि- न्विजितेऽभयेऽनाष्ट्रेऽत्राये वाचमव॑दंस्तथोऽए॒वैष एताꣳ सर्वस्मिन्विजितेऽभयेऽना- ष्ट्रेऽत्रये वाचं वदति ॥ ८॥ अथातो गृह्णात्येव। ये दे॒वासो॑ दि॒व्येका॑दश स्थ पृ- थिव्याम॒ध्येका॑दश स्थ। अप्सुक्षितो महि॒नैका॑दश स्थ ते दे॒वासो॑ य॒ज्ञमि॒मं जु॑षध्वम् । उपयामगृहीतोऽस्याग्रयणोऽसि स्वाग्रयण इति वाचमेवैत॒द्यतातयाम्नीं करोति तस्मादनया समानꣳ सद्विपर्यासं वदत्यनामितायै जामि न कुर्याद्यदाग्रयणो॒ऽस्याग्र॒- यणो॒ऽसीति॑ गृह्णीयात्तस्मादाग्रय॒णोऽसि॑ स्वाग्रय॒ण इति॑ ॥ ९॥ पाहि॒ यज्ञं॑ पाहि॒ यज्ञप॑तिमिति। वाचमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ गोपाय॒ यज्ञ॒मिति॒ पाहि॒ यज्ञप॑तिमिति वा- चमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ गोपाय॒ यज॑मानमिति॒ यज॑मानो हि॒ यज्ञप॑तिर्विष्णु॑स्त्वामिन्द्रियेण पातु॒ विष्णुं॒ त्वं पा॒हीति॑ वाचमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ यज्ञो वै विष्णु॑र्य॒ज्ञस्त्वां वी॒र्ये॑ण गो- पाया॒त्विति॒ विष्णुं॒ त्वं पा॒हीति॑ वाचमेवैतदुत्सृष्टामाह॒ यज्ञं॒ त्वं गो॑पायेत्य॒भि सव॑नां- नि पा॒हीति॒ तदे॒तं गृ॑ह्णाह॒ सर्वा॑णि ह्ये॒ष सव॑नानि॒ प्रति॑ ॥ १०॥ अथ दशापवि- त्रमुपगृह्य हिङ्करोति। सा हैषा वागनुद्यमाना तताम तस्यां देवा वाचि तान्ता- याꣳ हिङ्कारेणैव प्राणमदधुः प्राणो वै हिङ्कारः प्राणो हि वै हिङ्कारस्तस्मादपि- गृह्य नासिके न हिङ्कर्तुꣳ शक्नोति सैतेन प्राणेन संजानीते यदा वै तान्तः प्राणं लभतेऽथ स संजानीते तथोऽए॒वैष एतद्वाचि तान्तायांꣳ हिङ्कारेणैव प्राणं दधा- ति सैतेन प्राणेन संजानीते त्रिष्कृत्वो हिङ्करोति त्रिवृद्धि यज्ञः ॥ ११॥ अथाह सोमः॑ पवत॒ऽइति॑। स यामेवामूं भीषामसुररक्षसेभ्यो न निरब्रूवंस्तामेवैतत्सर्व- स्मिन्विजितेऽभयेऽनाष्ट्रेऽत्र निराह तामाविष्करोति तस्मादाह सोमः॑ पवत॒ऽइति॑ ॥ १२॥ अस्मै॒ ब्रह्म॑णेऽस्मै॒ क्ष॒त्रायेति॑। तद्ब्रह्म॑णे च क्ष॒त्राय॑ चाहास्मै॒ सुन्व॒ते

का० ४, अ० २, ब्रा० २, कं० ६-१३ शतपथब्राह्मण / ५५६ धारण किया था, इसके बाद अभी मुंह खोला गया। और चूंकि सबसे आगे वचन बोला, इसलिए आग्रयण नाम हुआ ॥६॥ राक्षसों के डर से मौन साधन किया था। इसके पहले वह छः ग्रह लेता है। यह सातवाँ है। वर्ष में छः ऋतुएं होती हैं। वर्ष सब है ॥७॥ सबके जीतने और भयरहित तथा हानिरहित होने पर पहले देवों ने वाणी बोली थी। यह भी सबके जीतने पर और भयरहित तथा हानिरहित होने पर वाणी को बोलता है ॥८॥ इसको वह इस मन्त्र से ग्रहण करता है, "ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश- स्थ। अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम् ॥ उपयामगृहीतोऽस्याग्रयणोऽसि स्वाग्रयणः” (यजु० ७।१६,२०, ऋ० १।१३६।११) —“जो आप देव लोग, द्यौलोक में ११ हैं, पृथिवी में ११ और जलों में (अन्तरिक्ष में) प्रकाशयुक्त ११ हैं। ये तेंतीसों देव मेरे यज्ञ को ग्रहण करें। तू रक्षा के लिए लिया गया है तो आग्रयण है। अच्छा आग्रयण है।” इस प्रकार वाणी जोरदार कर देता है कि एकार्थ होते हुए भी कुछ भेद कर देता है। यदि 'आग्रयणोऽसि, आग्र- यणोऽसि' दो बार कहेगा तो एक ही बात को दुहराने का दोष आ जायगा, इसलिए पहले 'आग्र- यणोऽसि' कहता है फिर 'स्वाग्रयणोऽसि' ॥६॥ “पाहि यज्ञं पाहि यज्ञपतिम्” (यजु० ७।२०) —अर्थात् “यज्ञ की रक्षा कर, यज्ञपति की रक्षा कर।” यज्ञपति से यजमान का तात्पर्य है, क्योंकि यजमान ही यज्ञपति है। “विष्णुस्त्वा- मिन्द्रियेण पातु विष्णुं त्वं पाहि” (यजु० ७।२०) —विष्णु नाम है यज्ञ का, अर्थात् “यज्ञ अपनी शक्ति द्वारा तेरी रक्षा करे। तू यज्ञ की रक्षा कर।” “अभि सवनानि पाहि” (यजु० ७।२०) — इससे तात्पर्य ग्रह का है क्योंकि यह (आग्रयण ग्रह) सभी सवनों में आता है ॥१०॥ (ग्रह को) छन्ने में लपेटकर हिंकार बोलता है। यह वाणी विना आश्रय के थक गई थी। देवों ने उस थकी हुई वाणी में हिंकार के द्वारा प्राण स्थापित किये। प्राण हिंकार है। प्राण ही हिंकार है। इसीलिए तो नाक बन्द करके हिंकार नहीं बोल सके। वह इस प्राण के द्वारा फिर ताजा हो गई। जब थका आदमी प्राण को पाता है तो प्राण के कारण ताजा हो जाता है। इसी प्रकार यह उस वाणी में हिंकार से प्राण को धारण कराता है। वह उस प्राण के द्वारा ताजा होती है। हिंकार तीन बार करता है क्योंकि यज्ञ त्रिवृत् (तीन लड़ी वाला) है ॥११॥ अब कहता है, "सोमः पवते” (यजु० २१) —“सोम पवित्र करता है।” असुर राक्षसों से डरकर उन्होंने अब तक यह वाणी न बोली थी। जब सबको जीत लिया और भय-रहित तथा हानि-रहित हो गये तब इस वाणी को स्पष्ट किया और कहा। इसलिए कहता है कि 'सोम पवित्र करता है' ॥१२॥ “अस्मै ब्राह्मणोऽस्मै क्षत्राय” (यजु० ७।२१) —“इस ब्राह्मण के लिए, इस क्षत्रिय के लिए।” क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए यह यज्ञ किया गया। “यजमानाय पवते” (यजु०