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भारतकोश
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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

कां० ३, अ० ४, ब्रा० २-३, कं० १०-१६ व १-२ शतपथब्राह्मण / ४०३
चलता है, चारों ओर चलता है। इसीलिए कहा कि 'आपतये त्वा' आदि ॥१०॥
“तनूनप्त्रे शाक्वराय” (यजु० ५।५)-“बलवान् तनूनप्तृ के लिए।” 'तनूनप्तृ शाक्वर'
से तात्पर्य है वायु। यह आज्य उसी के लिए ग्रहण करता है, इसलिए कहा 'तनूनप्त्रे' इति ॥११॥
“शक्वनेऽओजिष्ठाय” (यजु० ५।५)-“शक्तिवाले और ओज के लिए।” वस्तुतः वही
(वायु) शक्तिवाला और ओजवाला है। उसी के लिए वह ग्रहण करता है, इसलिए कहता है-
'शक्वने' इति ॥१२॥
अब वे इसको छूते हैं। देवतागण इस बात पर एकमत हो गये थे कि जो हममें से इसका
उल्लङ्घन करेगा उसकी यह गति होगी। इसी प्रकार यह होता और यजमान भी इस बात पर
एकमत हो जाते हैं कि जो कोई हममें से इसका उल्लङ्घन करेगा उसकी ऐसी गति होगी ॥१३॥
वे इस मन्त्र को बोलकर छूते हैं-“अनाधृष्ट मस्यनाधृष्यं देवानामोजः” (यजु० ५।५)-
“तू अजेय है (कोई तुझको जीत नहीं सकता) क्योंकि देवताओं का ओज अजेय होता है।”
क्योंकि देवता-गण जब एक मिलकर बोलते और एक-साथ रहते हैं तो अजेय होते हैं, कोई उन-
पर आक्रमण नहीं कर सकता। 'देवों के ओज' का अर्थ है उनके प्यारे शरीर और धाम अर्थात्
शक्तियाँ। अब कहा-“अनभिशस्त्यभिशस्तिपा ऽअनभिशस्तेन्यम्” (यजु० ५।५)-“जिन पर
शाप नहीं लगा, जो शाप से रक्षा करते हैं और जिनपर शाप नहीं लग सकता।” क्योंकि सब देव
शाप को पार कर जाते हैं। “अञ्जसा सत्यमुपगेषम्” (यजु० ५।५)-“सीधा सच को प्राप्त हो
जाऊँ।” इसका तात्पर्य है कि सत्य ही बोलूँ और व्रत का उल्लङ्घन न करूँ। अब कहा-“स्वित्ते
मा धाः” (यजु० ५।५)-“मुझे कल्याण में स्थापित कर।” क्योंकि निश्चय ही देवों ने अपने को
कल्याण में स्थापित किया जब उन्होंने सत्य बोला और जो सत्य था उसी को किया। इसीलिए
कहा-‘स्वित्ते मा धाः’ ॥१४॥
देवों ने जिन प्यारे शरीरों और धामों को इकट्ठा किया था उनको उन्होंने इन्द्र में स्थापित
कर दिया। निश्चय करके इन्द्र वही है जो वह तपता है. (अर्थात् सूर्य)। यह पहले तपता
(चमकता) नहीं था। यह ऐसा ही काला (अन्धकारमय) था जैसे अन्य सब। यह वही (देवों
का दिया हुआ) पराक्रम है जिससे वह चमकता है। इसलिए यदि बहुत-से दीक्षित होते हों तो
इस (तानूनप्त्र आज्य) को दूध मिलाकर गृहपति को ही देना चाहिए, क्योंकि गृहपति ही इन्द्र
के तुल्य है; और यदि दक्षिणा के साथ दीक्षा हो तो इस (आज्य) को दूध मिलाकर गृहपति को
ही देना चाहिए क्योंकि कहा भी है कि 'यजमान ही इन्द्र है' ॥१५॥
देवों ने जिन प्यारे शरीरों और धामों (शक्तियों) को इकट्ठा किया वह सब मिलाया
गया और वह साम हो गया। इसीलिए कहा है 'साम सत्य है, साम देवज (देवों से उत्पन्न हुआ)
है' ॥१६॥
अध्याय ४-ब्राह्मण ३
जब देव आतिथ्य-इष्टि कर चुके तो उनमें झगड़ा हो गया। इसको उन्होंने तानूनप्त्र
द्वारा शान्त किया और इच्छा करने लगे कि यह जो हमने एक-दूसरे की बुराई की है, उसका
प्रायश्चित्त होना चाहिए। अवभृथ स्नान से पहले उन्होंने कोई और प्रायश्चित्त रखा नहीं था।
इसलिए उन्होंने अवान्तरा-दीक्षा निकाली ॥१॥
अग्नि के द्वारा उन्होंने त्वचा से शरीर को ढक लिया। अग्नि का अर्थ है 'तप' और दीक्षा

४०४ शतपथ ब्राह्मण
ग्निस्त॒पो दी॒क्षा त॒दवान्तरां दी॒क्षामुपायंस्तद्यदवान्तरां दी॒क्षामुपायंस्तस्मादवान्तरदी-
क्षा संतरा॒मङ्गुलीराचन्त संतरां मेखलां पर्य॒स्तामेवैनामेतत्सतं पर्य॒स्यन्त तथो
ऽहैवैष एतद्यद॒तः प्राचीनमव्र॒त्यं वा करोत्यव्र॒त्यं वा वद॑ति तस्यै॒वैतत्प्रायश्चित्तिं
कुरुते ॥२॥ सोऽग्निनेव॒ त्वचं विपल्या॒ङ्ग्यते । तपो वाऽअ॒ग्निस्तपो दी॒क्षा त॒दवा-
न्तरां दी॒क्षामुपैति संतरा॒मङ्गुलीरचते संतरां मेखलां पर्य॒स्तामेवैनामेतत्सतं पर्य्-
स्यते प्र॒जाम् हैव तद्देवा उपा॑यन् ॥३॥ तेऽग्निनेव त्वच॒ विपल्या॒ङ्ग्यन्त । अ॒ग्निर्वै
मिथुन॒स्य क॒र्ता प्रजनयिता तत्प्र॒जामुपायंत्संतरा॒मङ्गुलीराचन्त संतरां मेखलां तत्प्र-
जामात्म॑न्नकुर्वत तथोऽहैवैष एतत्प्र॒जामेवो॑पैति ॥४॥ सोऽग्निनेव॒ त्वचं विपल्य-
ङ्ग्यते । अ॒ग्निर्वै मिथुनस्य कर्ता प्रजनयिता तत्प्र॒जामुपैति संतरा॒मङ्गुलीरचते संत-
रां मेखलां तत्प्र॒जामात्मन्कुरुते ॥५॥ दे॒वानाम् ह स्म दीक्षितानाम् । यः समि-
न्धारो वा स्वाध्यायं वा विमृ॒जते त॒द्ध स्मैतरस्यैवेतरꣳ रूपेणेतरस्येतरमसुररक्ष-
सानि जिघाꣳसन्ति ते ह पापं वदत उपसमे॑युरिति वै मां त्वम॒चिकीर्षीरिति मा-
जिघाꣳसीरित्यग्नि॒र्हैव तथा नान्यमुवादाग्नि॑स्तथा नान्यः ॥६॥ ते होचुः । अ॒पीत्थं
त्वाम॒ग्नेऽवादिषू॒रिति नैवा॒हमन्यं न मामन्य इति ॥७॥ तेऽविदुः । अ॒यं वै नो
वि॒रक्षस्तमोऽ॒ग्न्येव रूपम॑साम॒ तेन रक्षाꣳस्यतिमोक्ष्यामहे तेन स्वर्गं लोकꣳ सम-
श्रविष्यामह॒ऽइति तेऽग्ने॒रेव रूपम॑भवंस्तेन रक्षाꣳस्यत्य॑मुच्यन्त तेन स्वर्गं लोकꣳ
समाश्रुवत तथोऽहैवैष एतदग्ने॒रेव रूपं भवति तेन रक्षाꣳस्यतिमुच्यते तेन स्वर्गं
लोकꣳ समश्नुते स वै समिधमेवाभ्यादधदवान्तरदीक्षामुपैति ॥८॥ स समिधमभ्या-
दधाति । अग्ने व्रतपा॒स्त्वे व्रतपा इत्य॒ग्निर्हि दे॒वानां व्रतपतिस्तस्मादाहाग्ने व्रतपा-
स्त्वे व्रतपा॒ इति या तव तनूरियꣳ सा मयि यो मम तनू॒रेषा सा त्वयि । सह
नौ व्रतपते व्रतानीति तद॒ग्निना त्वचं विपल्या॒ङ्ग्यतेऽनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्य-
तामनु तप॒स्तप॑स्पतिरिति त॒दवान्तरां दीक्षामुपैति संतरा॒मङ्गुलीरचते संतरां मे-

का० ३, अ० ४, ब्रा० ३, कं० २-६ शतपथब्राह्मण / ४०५
'तप' है। इस प्रकार उन्होंने अवान्तरा-दीक्षा को प्राप्त किया; और चूंकि अवान्तरा-दीक्षा
को प्राप्त किया इसलिये अवान्तरा-दीक्षा की जाती है। उन्होंने अँगुलियों को कड़ा करके मोड़
लिया (मुट्ठी बाँध ली) और मेखला को कस लिया, जैसा कि पहले था। इसी प्रकार वह भी
प्रायश्चित्त करता है, उस सबके लिए जो व्रत के विरुद्ध उसने किया हो या कहा हो ॥२॥
उन्होंने अग्नि के द्वारा त्वचा को शरीर के चारों ओर लपेटा। अग्नि तप है। दीक्षा तप
है। इस प्रकार वह अवान्तरा-दीक्षा को प्राप्त करता है। अँगुलियों को भीतर की ओर मोड़ता है
और मेखला को कसता है जैसे पहले था। देवों ने इसके द्वारा प्रजा की प्राप्ति की थी ॥३॥
अग्नि के द्वारा उन्होंने शरीर पर त्वचा लपेटी। अग्नि मिथुन (जोड़े) का कर्त्ता या
जनक है। इससे उनको सन्तान की प्राप्ति हुई। उन्होंने अपनी मुट्ठी बाँध ली और मेखला कस
ली और अपने लिए सन्तान उत्पन्न की। इसी प्रकार यजमान भी सन्तान की प्राप्ति करता
है ॥४॥
अग्नि के द्वारा वह त्वचा को शरीर पर लपेटता है। अग्नि मिथुन (स्त्री-पुरुष के प्रसंग)
का कर्त्ता और जाननेवाला है। वह मुट्ठी को बाँधता और मेखला को कसता है। इस प्रकार
सन्तान को प्राप्त करता है ॥५॥
जब देव दीक्षित हो गये तो उनमें जो कोई समिधा लाता या स्वाध्याय का मन्त्र पढ़ता
उसका ही वह-वह रूप धारण करके असुर राक्षस उसको मारते। और देवता-गण आपस में कहते
कि तुमने मेरा अहित किया, तुमने मुझे मारा। केवल अग्नि ने किसी से ऐसा नहीं कहा, न किसी
ने अग्नि से कहा ॥६॥
उन्होंने पूछा—'हे अग्नि, क्या तुझसे भी उन्होंने ऐसा कहा ?' उसने उत्तर दिया कि 'न
मैंने किसी से ऐसा कहा, न किसी ने मुझसे ऐसा कहा' ॥७॥
उन्होंने जान लिया कि यही हमारे बीच में ऐसा है जो राक्षसों को मार सकता है। हमको
इसी का रूप धारण करना चाहिए। इससे हम राक्षसों से बच सकेंगे और स्वर्ग को प्राप्त कर
सकेंगे। उन्होंने अग्नि का रूप धारण कर लिया और राक्षसों से बच गये और स्वर्ग प्राप्त कर
लिया। इसी प्रकार यह भी अग्नि का रूप धारण करता, राक्षसों से बचता और स्वर्ग की प्राप्ति
करता है। वह समिधा को (आहवनीय अग्नि पर) रखकर अवान्तरा-दीक्षा को प्राप्त करता
है ॥८॥
वह यह मन्त्र पढ़कर समिधा रखता है—"अग्ने व्रतपास्त्वे व्रतपाः” (यजु० ५।६)—"हे
अग्नि, व्रत के पालनेवाले, तुझ पर, हे व्रत के पालनेवाले !" अग्नि देवों का व्रतपति है, इसलिए
कहा—"अग्ने व्रतपा' इत्यादि। "या तव तनूरियं सा मयि यो मम तनूरेषा सा त्वयि । सह नौ
व्रतपते व्रतानि" (यजु० ५।६)—"जो तेरा शरीर है, वह मेरा हो। जो मेरा शरीर है, वह तेरा
हो। हे व्रतपते ! हम दोनों के व्रत एक-से हों।" इस प्रकार वह अग्नि के द्वारा अपने को त्वचा से
ढकता है। "अनु मे दीक्षां दीक्षापतिर्मन्यतामनु तपस्तपस्पतिः" (यजु० ५।६)—"दीक्षा-पति मेरी
दीक्षा को स्वीकार करे और तप का पति मेरे तप को स्वीकार करे।" इस प्रकार वह अवान्तरा-

!
Yes! 'यै' + 'क' = 'यैक' (looks like 'धिक' because the top matras of 'यै' combine with 'क').
And before that: 'ꣳशुमꣳशुमेवाप्याययन्तीन्द्रायैकधनविदऽइतीन्द्रो वै य-'!
Wait, in line 21, let's transcribe exactly what is printed:
It has: "तदस्याꣳशुमꣳशुमेवाप्याययन्तीन्द्रायैकधनविदऽइतीन्द्रो वै य-"
Wait, does it have double underline under 'तदस्या'?
Under 'तदस्या': there is an anudatta under 'स्या': "तदस्या॒"? No, under 'स्या' there is an underline (anudatta). Under 'ꣳशुमꣳशुमेवाप्याययन्तीन्द्रा' there is an anudatta under 'न्द्रा': 'न्द्रा॒'!
Under 'यक' there is double horizontal line (pluta / svarita / anudatta): 'यै॒'?
Under 'वि': 'वि॒'.

Line 22:
ज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्रा॒यैत्येकधनविद॒ऽइति शतꣳ-शतं ह स्म वाऽए॒ष दे-
Let's check svaras:
"ज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्रा॒

कां० ३, अ० ४, ब्रा० ३, कं० ९-१८ शतपथब्राह्मण / ४०७
दीक्षा को करता है। मुट्ठी को कड़ा बाँधता हैऔर मेखला को कसता है जैसे वह पहले था ॥९॥
अब वे उसका मदन्ती जल (गरम जलों) से सत्कार करते हैं। अग्नि तप है, मदन्ती
जल तप हैं। इसलिए मदन्ती जलों से सत्कार करता है ॥१०॥
मदन्ती जलों को छूकर वे सोम राजा को सम्पुष्ट करते हैं। वे मदन्ती जलों को छूकर
सोम राजा को क्यों सम्पुष्ट करते हैं ? इसलिए कि घी वज्र है और सोम वीर्य। मदन्ती जलों को
छूकर वे सोम राजा को इसलिए सम्पुष्ट करते हैं कि कहीं वज्ररूपी घी से वीर्यरूपी सोम को
हानि न पहुँचे ॥११॥
कुछ लोग कहते हैं कि पहले सोम को सम्पुष्ट करना चाहिए जिसके लिए आतिथ्य किया
जाता है, फिर अवान्तर दीक्षा, फिर तानूनप्त्र। परन्तु ऐसा न करना चाहिए। यज्ञ का कर्म
ऐसा ही था। उसमें झगड़ा हो गया। पहले पुरानी शान्ति मिली, फिर अवान्तरा दीक्षा, फिर
सम्पुष्टि ॥१२॥
वे उसकी सम्पुष्टि क्यों करते हैं ? सोम देव है। सोम द्यौलोक में है। सोम वृत्र था। जो
पहाड़ और पत्थर थे, वे उसके शरीर थे, क्योंकि उसपर उशान औषध उगती है। उद्दालक के
पुत्र श्वेतकेतु ने कहा—'वे इसको लाते और निचोड़ते हैं और दीक्षा, उपसद, तनूनप्त्र और
सम्पुष्टि द्वारा वे इसका सोम बनाते हैं' ॥१३॥
कहते हैं कि यह मक्खियों का शहद है। यज्ञ ही मक्खियों का शहद है; बनानेवाली
मक्खियाँ ऋत्विज हैं। जैसे मक्खियाँ मधु की पुष्टि करती हैं उसी प्रकार ऋत्विज यज्ञ की पुष्टि
करते हैं ॥१४॥
यज्ञ के द्वारा ही देवों ने वह विजय पाई जो उनको प्राप्त है। उन्होंने सोचा कि यह कैसे
हो कि मनुष्य हमारे इस स्थान तक न चढ़ सके ? उन्होंने यज्ञ के रस को इस प्रकार चूस लिया
जैसे शहद की मक्खियाँ शहद को चूस लेती हैं और यज्ञ को यूप के द्वारा बिखेरकर अन्तर्धान हो
गये। यूप को यूप इसलिए कहते हैं कि इसके द्वारा यज्ञ को बिखेरा गया ॥१५॥
ऋषियों ने इसको सुन लिया। उन्होंने यज्ञ को इकट्ठा किया। इसी प्रकार वह भी यज्ञ
को इकट्ठा करता है जो दीक्षित होता है। वाणी ही यज्ञ है। इस प्रकार यज्ञ का जो भाग चूस लिया
गया था उसकी पूर्ति कर देता है ॥१६॥
वे छः होकर [अर्थात् ब्रह्मा, उद्गाता, होता, अध्वर्यु, आग्नीध्र और यजमान] (सोम
की) पुष्टि करते हैं। छः ऋतुएँ बनकर वे इसकी पुष्टि करते हैं ॥१७॥
वे इस मन्त्र को पढ़कर पुष्टि करते हैं—"अँ॒शुरँ॒शुष्टे देव सोमाप्यायताम्" (यजु०
५।७)—"हे देव सोम, तेरा अंशु-अंशु (प्रत्येक डण्ठल) पुष्ट हो।" ऐसा कहकर वे सोम का प्रत्येक
डंठल पुष्ट करते हैं।" 'इन्द्रायैकधनविदे" (यजु० ५।७)—"एक-धन प्राप्त करनेवाले इन्द्र के
लिए।" (या तो इसका अर्थ यह है कि सोम-मात्र जो धन है उसको लेनेवाला, या उस घड़े का
नाम भी 'एक-धन' है जिसमें सोम मिलाने के लिए जल होता है, उसको प्राप्त करनेवाला)। इन्द्र
ही यज्ञ का देवता है, इसलिए कहा 'एक-धन इन्द्र के लिए।' क्योंकि देवों के प्रति एक-एक डेण्ठल
सौ-सौ या दस-दस 'एक-धन' घोड़ों को भर देता है। "आ तुभ्यमिन्द्रः प्यायताम् त्वमिन्द्राय

अध्याय-४, ब्राह्मण-४

वानप्रत्येकै॒कमे॒वाᳪ॒शुरेक॑धनाना॒माप्या॑यते दश॑-दश वा तुभ्य॒मिन्द्रः॒ प्याय॑ता॒मा त्वमि॒-
न्द्रा॑य प्याय॒स्वेतीन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ सा यै॒व य॒ज्ञस्य॑ दे॒वता॒ तामे॒वैतदाप्या॑यय-
त्या॒ त्वमिन्द्राय प्याय॒स्वेति॒ तदे॒तस्मिन्नाप्या॑यनं दधात्याप्या॑यया॒स्मान्त्सखी॒न्त्सन्त्या मे॒-
धयेति॒ स यत्स॒नोति॒ तत्तदा॑ह॒ यत्सन्त्ये॑त्यथ॒ यदनु॑ब्रूते॒ तडु॒ तदा॑ह॒ यन्मे॒धयेति स्व॒-
स्ति ते॑ देव सोम सुत्यामशी॒येत्येका॒ वाऽए॒तेषामा॒शीर्भवत्यृत्विजां॑ च॒ यज॑मानस्य
च य॒ज्ञस्योदृचं॑ गहेमेति य॒ज्ञस्योदृचं॑ गछानी॒त्येवैतदा॑ह ॥ १८॥ अथ॒ प्रस्त॑रे॒ निह्व॑-
वते । उ॒त्तरत॒उपचा॑रो॒ वै य॒ज्ञोऽथै॒तद्दक्षिणेनान्वित्याप्या॑ययन्त्य॒भिर्वै य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञं
पृ॒ष्ठतः कुर्वन्ति॒ तन्मिथ्या॑कुर्वन्ति दे॒वेभ्य॒ आव्र॑श्च्यन्ते य॒ज्ञो वै प्र॒स्तर॒स्तद्य॒ज्ञं पुन॒रार॑-
भन्ते॒ तस्यो॒ हैषा प्राय॑श्चित्तिस्तथो॒ हैषामेतन्मिथ्या॑कृतं भवति॒ न दे॒वेभ्य॒ आव्रि॑-
श्च्यन्ते॒ तस्मा॒त्प्रस्त॑रे॒ निह्व॑वते ॥ १९॥ तदाहुः । ऋ॒क्ते निह्नुवी॒राᳪ॒शनक्ताᳪ॒ऽइत्य॑नृ-
क्ते ह्येव नि॒ह्नुवी॑र॒न्ननु॒प्रकरण॒ᳪ ह्ये॑वा॒क्तस्य॑ ॥ २०॥ ते निह्व॑वते । दृष्टा रायः प्रेषे
भगा॒यऽऋ॒तमृ॑तवा॒दिभ्य॒ इति॑ स॒त्यᳪ॑ सत्यवा॒दिभ्य॒ इत्ये॒वैतदा॑ह नमो॒ द्यावा॑पृथि॒-
वीभ्या॒मिति॒ तदा॑भ्यां॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॑ नि॒ह्व॑वते ययो॒रिद॒ᳪ सर्व॒मधि॑ ॥ २१॥ अथा-
तृ॒ समु॑ह्य॒ प्रस्त॑रम् । अ॒ग्नीन्म॒द्वत्त्याऽऽहु॑ति॒ मुद॑तीत्य॒ग्नीदाह॒ ताभि॑रे॒हीत्युप॑र्युप॒-
र्य॒ग्निमति॑हरति॒ स यन्नानु॒प्रह॑रत्येतेन॒ ह्येत ऊर्ध्वान्यहानि॑ प्रचरि॒ष्यन्भव॑त्यथ॒ यदु॑-
पर्युप॒र्य्यग्निमति॑हरति॒ तद्देवा॒स्यानु॑प्रहृतभा॒जनं॑ भवति तम॒ग्नीधे प्रय॑छति तम॒ग्नीन्नि॒द-
धाति ॥ २२॥ ब्राह्मणम् ॥ ४ [४. ३.] ॥ ॥
ग्री॒वा वै य॒ज्ञस्योप॒सदः॒ शिरः॑ प्र॒वर्ग्यः॑ । तस्मा॒द्यदि॑ प्र॒वर्ग्यवा॒न्भव॑ति प्र॒वर्ग्ये॑ण
प्र॒चर्या॒थोपसद्भिः॑ प्रचरन्ति॒ तद्ग्री॒वाः प्रति॑दधति ॥ १॥ तद्याः पूर्वा॒ह्नेऽनु॑वा॒क्या भ॑व-
न्ति । ता अ॒परा॒ह्ने या॒ज्या या या॒ज्यास्ता अनु॑वा॒क्यास्तद्व्यति॑षजति॒ तस्मा॑दि॒मानि॑
ग्री॒वाणां॑ प॒र्वाणि॒ व्यति॑षक्तानी॒मान्यस्थी॑नि ॥ २॥ दे॒वाश्च॒ वाऽअ॑सु॒राश्च॑ । उ॒भये॑
प्राजाप॒त्याः पस्पृ॑धिरे॒ ततो॒ऽसुरा ए॒षु लो॒केषु पु॒रश्च॑क्रिरे॒ऽयस्मयी॑मि॒वास्मिँल्लो॒के

का० ३, अ० ४, ब्रा० ३-४; कं० १८-२२ व १-३ शतपथब्राह्मण / ४०६
ध्यायस्व” (यजु० ५।७)-"इन्द्र तेरे लिए पुष्ट हो और तू इन्द्र के लिए पुष्ट हो।" इन्द्र यज्ञ का
देवता है। इस प्रकार वह इस यज्ञ के देवता की पुष्टि करता है। 'इन्द्र के लिए तू पुष्ट हो' ऐसा
कह उसमें पुष्टि का निर्धारण करता है। "आप्याययास्मान्त्सखीन्त्सन्ध्या मेधया" (यजु० ५।७)-
“हम मित्रों को लाभ और बुद्धि से भरपूर कर।" जो उसको लाभ मिलता है उसके लिए वह
कहता है 'सन्ध्या' (लाभ से) और जो वह पाठ करता है उसके लिए कहता है 'मेधया' (बुद्धि
से)। "स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीय" (यजु० ५।७)-"हे देव सोम, तेरे लिए स्वस्ति हो और
मैं सोम भोग को खाऊं।" यजमान और ऋत्विज का एक ही आशीर्वाद होता है अर्थात् यज्ञ के
अन्त को पा जावें। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि मैं यज्ञ के अन्त को प्राप्त कर लूं ॥१८॥
अब वे प्रस्तर पर प्रायश्चित्त करते हैं। यज्ञ में उत्तर की ओर उपस्थित रहना चाहिए
था, परन्तु सोम की पुष्टि करने के लिए दक्षिण की ओर जाना पड़ा। अग्नि ही यज्ञ है, और
यज्ञ की ओर पीठ कर लेनी पड़ी। यह मिथ्याचार हो गया और देवों से वियोग हो गया। प्रस्तर
भी यज्ञ का ही भाग है। इसलिए प्रस्तर को छूकर फिर यज्ञ की प्राप्ति होती है। यही उस
मिथ्याचार का प्रायश्चित्त है। इस प्रकार मिथ्याचार का निवारण हो जाता है और देवों से
वियोग नहीं होता। इसलिए प्रस्तर पर प्रायश्चित्त किया जाता है ॥१९॥
इस पर प्रश्न उठता है 'अक्त (घृत-युक्त) प्रस्तर पर या अनक्त (जिस पर घृत न लगा
हो) प्रस्तर पर ?' उत्तर यह है कि अनक्त पर ही, क्योंकि अक्त को तो अग्नि के समर्पित किया
जाता है ॥२०॥
वे इस मन्त्र को पढ़कर प्रायश्चित्त करते हैं— "एष्टा रायः प्रेषे भगायऽऋतमृतवा-
दिभ्यः" (यजु० ५।७) - "इच्छित धन शक्ति के लिए मिले, ऋतवादियों के लिए ऋत।" इसका
अर्थ यह है कि सत्यवादियों के लिए सत्य । "नमो द्यावापृथिवीभ्याम्” (यजु० ५।७) - "द्यौ और
पृथिवी के लिए नमस्कार ।" इस प्रकार वे द्यौ और पृथिवी के लिए प्रायश्चित्त करते हैं जिन पर
सबकी स्थिति है ॥२१॥
अब प्रस्तर को उठाकर वह कहता है— 'अग्नीध्र, क्या जल खौल गया ?' अग्नीध्र कहता
है—'हाँ, खौल गया।' 'इसको यहाँ ले आओ।' वह (प्रस्तर को) अग्नि के पास ले आता है।
वह प्रस्तर को आग में इसलिए नहीं डालता कि अगले दिनों में उससे काम लेना है; और आग के
ऊपर इसलिए ले आता है कि वह अग्नि में डालने के लगभग बराबर हो जाय। वह इस अग्नीध्र
को दे देता है और अग्नीध्र इसको (सुरक्षित) रख देता है ॥२२॥
अध्याय ४—ब्राह्मण ४
उपसद यज्ञ की गर्दन है। प्रवर्ग्य सिर है। इसलिए यदि यज्ञ प्रबर्ग्य के साथ किया जाता
है तो प्रबर्ग्य के पीछे उपसद करते हैं। इससे गर्दन अपने स्थान पर आ जाती है ॥१॥
पूर्वाह्न में अनुवाक्य होते हैं और अपराह्न में याज्य । जो याज्य हैं वही अनुवाक्य हैं।
इस प्रकार वह जोड़ों को मिला देता है जैसे गर्दन की हड्डियाँ और जोड़ मिले होते हैं ॥२॥
देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तान लड़ पड़े। तब असुरों ने इन तीनों लोकों में
अपने लिए किले (पुर) बनाये—लोहे का इस लोक में, चाँदी का अन्तरिक्ष में और सोने का

र॒जताम॒न्तरि॑क्षे हरि॑णीं दि॒वि ॥ ३ ॥ तद्वै देवा॒ अस्पृ॑णवत । तऽए॒ताभिरुप॒सद्भि॒रु-
पासी॑दंस्तद्युदुपासी॑दंस्तस्मादुप॒सदो॒ नाम॑ ते पुरः प्रभि॒न्दन्नि॒माँल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तस्मा-
दा॒ह्युरूपस॒दा पुरं॑ जयतीति॒ यदु॒होपा॑सते तेने॒मां मानुषीं॒ पुरं॑ जयति ॥ ४ ॥ ए॒ता-
भि॒र्वै दे॒वा उप॒सद्भिः॑ । पुरः॑ प्रभि॒न्दन्नि॒माँल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तन्ना॑ष्ट्रो॒त्रा-
स्मा॒ऽअ॒स्मिँल्लो॒के कश्च॒न पुरः॑ कुरुत॒ऽइमा॑ने॒वैतँल्लो॒कान्प्रभि॑नत्ती॒माँल्लो॒कान्प्रज॑यति
तस्मादुप॒सद्भि॑र्यजते ॥ ५ ॥ ता वाऽआज्य॑हविषो भवन्ति । व॒ज्रो वाऽआज्यं॒नेते॑न
वै दे॒वा वज्रे॑णा॒ज्येन पुरः॑ प्रभि॒न्दन्नि॒माँल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तेन॒ वज्रे॑णा-
ऽज्येने॒माँल्लो॒कान्प्रभि॑नत्ती॒माँल्लो॒कान्प्रज॑यति तस्मा॒दाज्य॑हविषो भवन्ति ॥ ६ ॥ स वा
ऽअ॒ष्टौ कृत्वो॑ जुह्वां गृह्णाति । च॒तुरु॑पभृत्यथो॒ऽइत॑रथा॒ऽअथ॒तुरेव कृत्वो॑ जुह्वां गृ-
ह्णीयाद॒ष्टौ कृत्व॒ उप॒भृतीति॑ ॥ ७ ॥ स वाऽअ॒ष्टावेव कृत्वो॑ जुह्वां गृह्णाति । चतु॒रु-
पभृति॒ तद्व॑ज्रमभिभा॒रं करोति तेन॒ वज्रे॑णाभिभा॒रेणे॒माँल्लो॒कान्प्रभि॑नत्ती॒माँल्लो॒का-
न्प्रज॑यति ॥ ८ ॥ अ॒ग्नीषोमौ॒ वै दे॒वाना॒ꣳ सयुजौ॑ । ताभ्या॒ꣳ सार्धं गृह्णाति विप्लव
ऽए॒काकिने॒ऽन्यत॑रमेवा॒धार॒माघा॑रयति य॒ꣳ स्रुवे॑ण प्रति॒क्राम॑ति वा॒ऽउत्तर॒माघा॑र-
माघा॒र्याभि॑जित्या॒ऽअभि॑जयान्यीति तस्माद॒न्यत॑रमेवा॒धार॒माघा॑रयति य॒ꣳ स्रुवे॑ण ॥ ९ ॥
अथाश्राव्य॑ न होता॑रं प्रवृणीते । सीद॒ होत॒रित्ये॒वाहो॑पविशति होता होतृष-
दन॒ऽउप॑विश्य प्रसौति प्रसूतॊऽध्व॒र्युः स्रुचा॒वाद॑त्ते ॥ १० ॥ स आहातिक्रामन्न॒ग्नयेऽनु॑-
ब्रूहीति॑ । आश्रा॒व्याहा॒ग्निं यजेति॑ वषट्कृते जुहोति ॥ ११ ॥ अथाहा॑ सोमा॒यानु॑ब्रू-
हीति॑ । आश्रा॒व्याह॒ सोमं॑ यजेति॒ वषट्कृते जुहोति ॥ १२ ॥ अथ यदु॒पभृत्या॒ज्यं
भव॑ति । तत्समानयमान आह विष्णवे॒ऽनु॑ब्रूहीत्याश्रा॒व्याह॒ विष्णुं॑ यजेति॒ वषट्-
कृते जुहोति ॥ १३ ॥ स यत्समानत्र तिष्ठ॑ञ्जु॒होति॑ । न य॒थेदं प्रच॑रत्संचरत्यभि-
जित्या॒ऽअभि॑जयानीत्यथ यदे॒ता दे॒वता॒ यज॑ति व॒ज्रमे॒वैतत्संस्करोत्य॒ग्निमनीकं॒ सो-
मं॒ शल्यं॒ विष्णुं॑ कुल्मलं॒ ॥ १४ ॥ संवत्सरो हि वज्रः॑ । अ॒ग्निर्वा॒ऽग्रः॑ सोमो रा-

का० ३, अ० ४, ब्रा० ४, कं० ३-१५ शतपथब्राह्मण / ४११
द्यौलोक में ॥३॥
अब देवों की जीत हुई। देवों ने इन किलों को उपसदों के द्वारा घेरा (उपासीदन्);
उपासीदन् से 'उपसद' नाम पड़ा। उन्होंने किलों को तोड़ डाला और लोकों को जीत लिया।
इसलिए कहते हैं कि 'उपसदों के द्वारा किले जीते जाते हैं।' वस्तुतः घेरा डालकर ही मनुष्य के
किले जीते जाते हैं ॥४॥
देवों ने इन उपसदों के द्वारा ही किलों को तोड़ा और लोकों को जीत लिया। (यजमान
भी) ऐसा ही करता है। यह सच है कि कोई उसके विरुद्ध अपने किले नहीं बनाता। वह इन्हीं
लोकों को भेद देता है। वह इनको जीत लेता है। इसीलिए उपसदों के द्वारा यज्ञ करता है ॥५॥
ये आहुतियां घृत की होती हैं। घी वज्र है। इस वज्र-घी से देवों ने किलों को तोड़कर
इन लोकों पर विजय पाई। इसी प्रकार यह यजमान वज्र-घी द्वारा इन लोकों का भेदन करता
है, इन लोकों को जीतता है। इसलिए ये घी की आहुतियां दी जाती हैं ॥६॥
वह आठ बार जुहू में भरता है और चार बार उपभृत् में। कुछ उलटा भी करते हैं
अर्थात् चार बार जुहू में और आठ बार उपभृत् में ॥७॥
वह आठ बार जुहू में भरता है और चार बार उपभृत में। इससे वह वज्र के आगे के
भाग को भारी कर देता है। वज्र के इस भारी भाग से इन लोकों को तोड़ देता और इन पर
विजय प्राप्त कर लेता है ॥८॥
देवताओं में अग्नि और सोम का जोड़ा है। इनके लिए एक-साथ लेता है। विष्णु के
लिए अकेली। एक ही आघार देता है जो स्रुवा में भरी जाती है, क्योंकि जब पीछे की आघार दे
देता है तो चल देता है यह कहकर कि 'जीतकर विजयी बनूं।' इसलिए स्रुवा से एक ही आघार
देता है ॥९॥
श्रौषट् कहने के पीछे होता का वरण नहीं करता। इतना ही कहता है कि 'हे होता,
बैठ।' होता अपने स्थान पर बैठ जाता है। अब वह अध्वर्यु को प्रेरणा करता है और अध्वर्यु दो
चमचे भर लेता है ॥१०॥
(वेदी के दक्षिण की ओर) जाते हुए वह (होता से) कहता है 'अग्नि को आवाहन
कर।' और श्रौषट् कहकर कहता है 'अग्नि की स्तुति कर।' और वषट्कार के पीछे आहुति दे
देता है ॥११॥
अब कहता है—'सोम का आवाहन कर।' फिर श्रौषट् कहकर कहता है—'सोम की
स्तुति कर।' फिर वषट्कार के पीछे आहुति दे देता है ॥१२॥
अब उपभृत में जो घी होता है उसको (जुहू के बचे घी में) मिलाकर कहता है—'विष्णु
का आवाहन कर।' फिर श्रौषट् कहकर कहता है 'विष्णु की स्तुति कर।' फिर वषट्कार के पीछे
आहुति दे देता है ॥१३॥
वह एक ही स्थान पर खड़ा रहता है। और जैसा चलना-फिरना चाहिए, चलता-फिरता
नहीं। इसका कारण यह है कि वह सोचता है कि 'जीतकर विजयी बनूं।' इन देवताओं के लिए
आहुति इसलिए देता है कि वज्र बना सकूं। अग्नि को वज्र का 'अनीक' या सिरा बनाता है,
सोम को शल्य और विष्णु को कुल्मल (ये वज्र के भाग हैं) ॥१४॥
संवत्सर ही वज्र है। अग्नि दिन है और सोम रात तथा बीच का भाग विष्णु। इस

४१२ शतपथ ब्राह्मण

त्रिरथ॒ यदु॑त्तरेण तद्वि॒श्चरे॒तद्वै परि॒प्लवमानꣳ सं॑वत्स॒रं करोति ॥ १५॥ सं॑वत्स॒रो
वज्रः॑ । ए॒तेन॒ वै दे॒वाः सं॑वत्स॒रेण॒ वज्रे॑ण पुरः॒ प्रभिन्द॒न्त्रिमांल्लो॒कान्प्राज॑यंस्तथो
ऽ॒ह्यै॑ष ए॒तेन सं॑वत्स॒रेण॒ वज्रे॑णे॒मांल्लो॒कान्प्र॒भिनत्तीमांल्लो॒कान्प्र॒जयति॒ तस्मा॑दे॒ता
दे॒वता॒ यज॑ति ॥ १६॥ स वै॑ ति॒स्र उप॒सद॒ उपे॑यात् । त्रयो वाऽऋ॒तवः॑ संवत्स॒रस्य॑
संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते संवत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति द्विरे॒कया प्रचरति द्विरे॒कया
॥ १७॥ ताः षट्स॒म्पद्य॑न्ते । षड्वाऽऋ॒तवः॑ संवत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते सं-
वत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति ॥१८॥ यद्यु॑ द्वाद॒शोप॒सद॒ उपे॑यात् । द्वाद॑श॒ वै मासाः॑ सं-
वत्स॒रस्य॑ संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते संवत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति द्विरे॒कया प्रचर॑ति
द्विरे॒कया ॥ १९॥ ताश्चतुर्वि॑ꣳशतिः सम्पद्य॑न्ते । चतुर्वि॑ꣳशति॒र्वै सं॑वत्स॒रस्यार्ध॑मासाः
संवत्स॒रस्यै॒वैतद्रू॒पं क्रि॑यते संवत्स॒रमे॒वैतत्स॒ꣳस्करोति ॥२०॥ स य॒त्सायम्प्रा॒तः प्रच॑-
रति । त॒या ह्ये॑व॒ सम्प॑त्सम्पद्य॑ते स यत्पूर्वाह्णे॒ प्रचर॑ति तद्यु॒ध्यत्यथ॒ यद॑पराह्णे॒ प्र-
चर॑ति सु॒जितमसदित्यथ॒ यज्जु॒होतीदं वै पुरं॑ यु॒ध्यन्ति॒ तां जि॒त्वा स्वाꣳ सतीं॑ प्रप-
द्यन्ते ॥ २१॥ स यत्प्रचर॑ति । तद्यु॒ध्यत्यथ॒ यत्सन्ति॑ष्ठते तज्जयत्यथ॒ यज्जु॒होति स्वा-
मे॒वैतत्स॒तों॑ प्रपद्यते ॥ २२॥ स जु॒होति । य॒या द्विरे॒कस्या॒ह्नः प्रच॑रिष्य॒न्भव॑ति॒ या
ते॑ऽअग्नेऽयःशया॒ तनूर्व॑र्षिष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उग्रं वचो॒ऽअपा॑वधीत्त्वेषं॒ वचो॒ऽअपा॑व-
धी॒त्स्वाहेत्ये॒वꣳरू॑पा हि सासीद॒यस्मयी हि सासी॑त् ॥ २३॥ अथ॑ जुहोति । य॒या
द्विरे॒कस्या॒ह्नः प्रच॑रिष्य॒न्भव॑ति या ते॑ऽअग्ने॒ रजः॑शया तनूर्व॑र्षिष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उग्रं॑
वचो॒ऽअपा॑वधीत्त्वेषं॒ वचो॒ऽअपा॑वधी॒त्स्वाहेत्ये॒वꣳरू॑पा हि सासीद्रज॒ता हि सासी॑त्
॥ २४॥ अथ॑ जुहोति । य॒याद्विरे॒कस्या॒ह्नः प्रच॑रिष्य॒न्भव॑ति॒ या ते॑ऽअग्ने॒ हरिशया
तनूर्व॑र्षिष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उग्रं वचो॒ऽअपा॑वधीत्त्वेषं॒ वचो॒ऽअपा॑वधी॒त्स्वाहेत्ये॒वꣳरू॑पा
हि सासीद्ध॑रिणी हि सासीद्यद्यु द्वादशोप॒सद॒ उपे॑याच्च॒तुर॒ह्नेकया प्रच॑रेच्चतु॒रहू-
न्नेकया ॥ २५॥ अथातो व्रतोपसदामेव । परोऽव॑र्त्ति॒र्वाऽअ॒न्या उप॒सदः॑ प॒रोऽक्षीर-

कां० ३, अ० ४, ब्रा० ४, कं० १५-२६ शतपथब्राह्मण / ४१३
प्रकार वह वर्ष के चक्र को बनाता है ॥१५॥
संवत्सर वज्र है। इसी संवत्सर वज्र के द्वारा दोनों देवों ने किलों को तोड़ा और इन
लोकों को जीता। इसी प्रकार यह भी इसी संवत्सर वज्र की सहायता से इन लोकों को तोड़ता
और इन लोकों को जीतता है। इसीलिए वह इन देवतों का यजन करता है ॥१६॥
तीन उपसदों को करे। संवत्सर में तीन ऋतुएँ होती हैं। इस प्रकार संवत्सर का तद्रूप
आ जाता है। इस प्रकार वह संवत्सर को बनाता है। वह प्रत्येक क्रिया को दो बार करता
है ॥१७॥
यह छः के बराबर हो जाते हैं। वर्ष में छः ऋतुएं होती हैं। इस प्रकार वर्ष का तद्रूप हो
जाता है। वह इस प्रकार वर्ष को बनाता है ॥१८॥
या बारह उपसदों को करे। वर्ष में बारह मास होते हैं। इस प्रकार वर्ष का तद्रूप हो
जाता है। वह इस प्रकार वर्ष बनाता है। वह प्रत्येक क्रिया को दो बार करता है ॥१९॥
इस प्रकार चौबीस हो जाते हैं। वर्ष में चौबीस अर्द्धमास होते हैं। यह संवत्सर का रूप
हो जाता है। इस प्रकार वह संवत्सर को बनाता है ॥२०॥
वह सायं-प्रातः इसलिए करता है कि इसी से सम्पूर्णता आती है। प्रातःकाल की क्रिया
का अर्थ है जय, सायंकाल की क्रिया का 'सुजय' और आहुति का अर्थ है कि जीतकर किले को
अपना समझकर भीतर घुस जाना ॥२१॥
उपसदों के करने का अर्थ है युद्ध करना, क्रिया के पूर्ण होने का अर्थ है विजय पाना,
और आहुति देने का अर्थ है किले को अपना करके उसमें घुस जाना ॥२२॥
वह दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या ते ऽ अग्नेऽयःशया तनूर्वर्षिष्ठा
गह्नरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत् त्वेषं वचोऽपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८)-"हे अग्नि, यह
जो तेरा लोहे का शरीर है, गहरे में बैठा हुआ, इसने (शत्रु की) उग्र वाणी को मार डाला,
तीक्ष्ण वाणी को मार डाला।" वह ऐसी ही थी। वह लोहे के समान थी ॥२३॥
अब दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या ते ऽ अग्ने रजःशया तनूर्वर्षिष्ठा
गह्नरेष्ठा । उग्रं वचोऽपावधीत् त्वेषं वचोऽपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८)-"हे अग्नि, यह
जो तेरा चांद का शरीर है, गहरे में पैठा हुआ, इसने उग्र वाणी को मार डाला, तीक्ष्ण वाणी को
मार डाला।" इसका ऐसा ही रूप था। चांदी का रूप था ॥२४॥
अब दिन में दो बार इस मन्त्र से आहुति देता है— "या तेऽग्ने हरिशया तनूर्वर्षिष्ठा
गह्नरेष्ठा । उग्रं वचो अपावधीत् त्वेषं वचो अपावधीत् स्वाहा" (यजु० ५।८) - "हे अग्नि, यह
जो तेरा सोने का शरीर है, गहरे में पैठा हुआ, इसने उग्र वाणी को मार डाला, तीक्ष्ण वाणी को
मार डाला।" इसका ऐसा ही रूप था। सोने का रूप था। अगर वह बारह उपसदों को करे तो
हर एक को चार दिन करना चाहिए ॥२५॥
अब व्रत-उपसदों को लीजिये। कुछ उपसद चौड़े होते जाते हैं और कुछ तंग, जिनमें

अध्याय-५, ब्राह्मण-१

न्याः स या॒सामेकं॑ प्रथ॒माह॑न्दो॒ग्ध्यथ॒ द्वावथ॒ त्रीꣳस्ताः प॒राञ्ची॑र्य्य य॒ासां त्रीन्प्रथ॒मा-
ह॑न्दो॒ग्ध्यथ॒ द्वावथै॒कं ताः पु॒रोऽञ्ची॑र्या वै पु॒रोऽञ्ची॑स्ताः प॒राञ्ची॑र्याः प॒राञ्ची॑स्ताः
पु॒रोऽञ्चीः ॥ २६॥ तप॑सा॒ वै लो॒कं ज॑यति । तद्य॒स्यैतत्प॒रः-पर॑ एव॒ वरी॑यस्तपो॑
भव॑ति प॒रः-परः॒ श्रेयाꣳसं॑ लो॒कं ज॑यति वसी॑यानु॒ हैवा॒स्मिँल्लो॒के भ॑वति॒ य ए॒वं
वि॒द्वान्यु॒रोऽञ्ची॑रुप॒सद॒ उपै॑ति॒ तस्मा॑डु पु॒रोऽञ्ची॑रि॒वोप॒सद॒ उपे॑याद्य॒द्यु द्वाद॑शोप॒सद॒
उपे॒यात्तीꣳश्चतुरो॒हं दो॑हयेद्द्वौ॑ चतुर॒हमेकं॑ चतुर॒हम् ॥ २७॥ ब्राह्मणम् ॥ ५ [३.४] ॥
तृतीयः प्रपाठकः ॥ कण्डिकासंख्या १२१ ॥ ॥ चतुर्थोऽध्यायः [११] ॥ ॥
तद्य॒ ए॒ष पू॒र्वार्द्धे व॒र्षिष्ठ स्थूणा॒राजो भ॑वति । तस्मात्प्रा॒ङ् प्रक्रा॑मति॒ त्रीन्वि-
क्रमाꣳस्तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति॒ सोऽन्तःपातः ॥ १॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । दक्षि॑णा पञ्चदश
विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति सा दक्षि॑णा श्रोणिः ॥ २॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः ।
उदङ् पञ्चदश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति सोत्तरा श्रोणिः ॥ ३॥ तस्मान्म-
ध्यमाच्छु॒ङ्कोः । प्राङ् षट्त्रिꣳश॑तं विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति॒ स पू॒र्वार्धः ॥ ४॥
तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । दक्षि॑णा द्वादश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं निह॑न्ति॒ स दक्षि॑-
णा॒ꣳसः ॥ ५॥ तस्मान्मध्यमाच्छु॒ङ्कोः । उदङ् द्वादश विक्रमा॒न्प्रक्रा॑मति॒ तच्छु॒ङ्कं नि॒-
हन्ति॒ स उत्त॒रो॒ꣳस ए॒षा मा॒त्रा वेदेः ॥ ६॥ अथ यत्ति॒ꣳश॑त्प्रक्रमा प॒श्चाद्भव॑ति ।
त्रि॒ꣳशद॑क्षरा॒ वै वि॒राड्वि॒राजा॒ वै दे॒वा अ॒स्मिँल्लो॒के प्रत्य॑तिष्ठꣳस्तथो॒ ऽए॒वैष ए॒तद्वि॒-
राजा॒वास्मिँल्लो॒के प्रति॑तिष्ठति ॥ ७॥ अथोऽअपि॒ त्रय॑स्त्रिꣳशत्स्युः । त्रय॑स्त्रिꣳशदक्षरा
वै वि॒राड्वि॒रा॒ज्या॑वास्मिँल्लोके प्रति॑तिष्ठति ॥ ८॥ अथ यत्षट्त्रिꣳश॑त्प्रक्रमा प्राची भ॒-
वति । षट्त्रिꣳशद॑क्षरा॒ वै बृ॑ह॒ती बृ॑ह॒त्या वै दे॒वाः स्व॒र्गं लो॒कं स॒माश्नु॑वत त॒-
थो॒ऽए॒वैष ए॒तद्बृ॑ह॒त्यैव स्व॒र्गं लो॒कं स॑मश्नु॒ते सो॒ऽस्य दि॒व्याह॑वनी॒यो भ॑वति
॥ ९॥ अथ यच्चतुर्विꣳश॑तिविक्रमा पुर॒स्ताद्भव॑ति । चतु॑र्विꣳशत्यक्षरा॒ वै गा॑य॒त्री पू॒-
र्वार्धो वै य॒ज्ञस्य॑ गायत्री पू॒र्वार्ध॑ ए॒ष य॒ज्ञस्य॒ तस्माच्चतुर्विꣳश॑तिविक्रमा पुर॒स्ताद्भव॑-

का० ३, अ० ४-५, ब्रा० ४-१, कं० २६-२७ व १-१० शतपथब्राह्मण / ४१५
पहले दिन एक थन दुहता है, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन, वे चौड़े होते जाते हैं। और जिनमें
पहले दिन तीन थन दुहता है, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन एक, वे तंग हो जाते हैं। जो तंग होते
जाते हैं वह ऐसे ही हैं जैसे चौड़े । और जो चौड़े होते जाते हैं ऐसे ही हैं जैसे तंग ॥२६॥
लोकों को तप से जीतते हैं। जो इस रहस्य को समझकर उन उपसदों को लेता है जो
तंग होते जाते हैं, उसका तप बढ़ता जाता है और उसका श्रेय बढ़ता है और वह लोक में अच्छा
हो जाता है । इसलिए उन उपसदों को लेना चाहिए जो तंग होते जाते हैं। अगर बारह उपसदों
को लेवे तो चार दिन तक तीन थन दुहने चाहिएँ, चार दिन तक फिर दो थन, और फिर चार
दिन तक एक थन ॥२७॥
अध्याय ५—ब्राह्मण १
शाला के पूर्व की ओर का जो सबसे बड़ा खम्भा होता है उससे पूर्व की ओर तीन पग
चलता है । और वहाँ एक कील गाड़ देता है जिसको 'अन्तः-पात' कहते हैं ॥१॥
इस बीच की कील से दक्षिण की ओर पन्द्रह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता
है। उसको 'दक्षिणा श्रोणि' (दाहिना कूल्हा) कहते हैं ॥२॥
इस बीच की कीली से उत्तर की ओर पन्द्रह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता
है । उसको 'उत्तरा-श्रोणि' (बायाँ कूल्हा) कहते हैं ॥३॥
इस बीच की कील से पूर्व की ओर छत्तीस पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता है।
उसको 'पूर्वार्ध' कहते हैं ॥४॥
इस बीच की कील से दक्षिण की ओर बारह पग चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता
है । उसको 'दक्षिणोऽसः' (दायाँ कंधा) कहते हैं ॥५॥
इस बीच की कील से बारह पग उत्तर की ओर चलता है और वहाँ एक कील गाड़ता
है । उसको 'उत्तरोऽसः' (बायाँ कंधा) कहते हैं। यही वेदी की मात्रा (प्रमाण) है ॥६॥
यह पीछे तीस पग इसलिए होती है कि विराट् छन्द में तीस अक्षर होते हैं। और विराट्
छन्द के द्वारा ही देवों ने इस लोक में प्रतिष्ठा पाई । इसी प्रकार यह भी विराट् छन्द द्वारा इस
लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है ॥७॥
तैंतीस पग भी हो सकते हैं। क्योंकि विराट् में तैंतीस अक्षर भी होते हैं और विराट् के
द्वारा ही वह इस लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है ॥८॥
पूर्व में छत्तीस पग क्यों होते हैं ? बृहती छन्द छत्तीस अक्षर का होता है। बृहती के द्वारा
ही देव लोग स्वर्गलोक को प्राप्त हुए । इसी प्रकार यह भी बृहती छन्द द्वारा स्वर्गलोक को
प्राप्त करता है । उसकी आहवनीय अग्नि द्यौलोक में होती है ॥९॥
वेदी आगे की ओर २४ पग की क्यों होती है ? गायत्री चौबीस अक्षर की होती है ।
गायत्री यज्ञ का पूर्वार्ध है। इसलिए वह आगे को चौबीस पग चौड़ी होती है। वेदी की यही मात्रा

त्‍वे॒षा मा॒त्रा वे॒देः ॥१०॥ अथ॒ यत्प॒श्चाद्वरी॑यसी भवति । प॒श्चाद्वरी॑यसी पृ॒थुश्रोणि-
रिति॒ वै योषां॑ प्रशंसन्ति॒ यद्वै॒व प॒श्चाद्वरी॑यसी भवति प॒श्चाद्देवैतद्वीर्यं॑ प्र॒जननं॑ क-
रोति॒ तस्मा॑त्पश्चाद्वरी॑यसः प्र॒जननादि॒माः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते ॥११॥ नासिका ह वा॒
ऽए॒षा य॒ज्ञस्य यदु॑त्तर॒वेदिः॑ । अथ॒ यदे॑नामुत्तरां॒ वेदे॑रुपकिर॑ति॒ तस्मा॑दुत्तरवेदिर्नाम॑
॥१२॥ द्वय्यो ह वाऽइ॒दमग्रे॑ प्र॒जा आ॑सुः । आ॒दि॒त्याश्चैवाङ्गि॑रसश्च॒ ततो॒ऽङ्गि॑रसः
पूर्व्वे॑ य॒ज्ञꣳ स॑म॒भरं॒स्ते य॒ज्ञꣳ सं॑भृत्योचु॑र॒ग्निमि॒मां नः श्वःसु॒त्यामा॑दि॒त्येभ्यः॒ प्रब्रू॑ह्यनेन॑
नो य॒ज्ञेन या॑जय॒तेति॑ ॥१३॥ ते ह॒ादित्या॑ ऊचुः । उप॑जानत यथा॒स्मानि॒वाङ्गि॑रसो
याज॒यान् वयमङ्गि॑रस॒ इति॑ ॥१४॥ ते होचुः । न वाऽअन्येन य॒ज्ञादप॑क्रम॒णम॒स्त्य-
त्रा॒मेव॑ सु॒त्यां क्रि॑यामहा॒ऽइति॑ ते य॒ज्ञꣳ सं॑ज॒ह्रुस्ते य॒ज्ञꣳ सं॑भृत्योचुः श्वःसु॒त्यां॑ वै
त्वम॒स्मभ्य॒मग्रे॒ प्रावो॑चो॒ऽथ व॒यम॒द्यसु॒त्या॑मेव॒ तुभ्यं॒ प्रब्रू॒मोऽङ्गि॑रोभ्यश्च तेषां॑ नस्त्वꣳ
होतासीति॑ ॥१५॥ ते॒ऽन्यमे॒व प्र॑तिप्रनि॒न्युः । अ॒ङ्गिर॑सो॒ऽह ते ह्वाप्यङ्गिरसो॒ऽग्नये
ऽन्वाग॑त्य चुक्रुधुरिव क॒थं नु नो दूतश्च॒रन् प्रत्या॑द॒था इति॑ ॥१६॥ स होवाच ।
अनि॑न्द्या वै माव॑दूत॒ सो॒ऽनिन्द्यैर्वृ॒तो नाश॑कमप॒क्रमितु॒मिति॒ तस्मा॑ड ह्नानिन्द्य-
स्य वृ॒तो नाप॑क्रामेत्स॒द्येन सद्यःक्रिया॒ङ्गिर॑स आ॒दि॒त्यानया॑जय॒त्स स॒द्यःक्रीः॑ ॥१७॥
तेभ्यो वाचं॒ दक्षि॑णामानयन् । तां न प्रत्य॑गृह्ण॒न्हास्यामहे॒ यदि॑ प्रतिग्रही॒ष्याम
इति॒ तद्व तद्य॒ज्ञस्य॒ कर्म॒ न व्य॑मुच्यत॒ यद्वा॒क्षिणामासी॑त् ॥१८॥ अथैभ्यः॒ सूर्यं॒ दक्षि॑-
णामानयन् । तं प्रत्य॑गृह्णं॒स्तस्मा॑डु ह् स्माहुर॒ङ्गिर॑सो वयं वाऽअ॒र्वाञ्चो॒ऽनाः स्मो
वयं॒ दक्षि॑णीया॒ ऋषि वाऽअ॒स्माभि॑रिश प्रति॒गृही॑तो य॒ एष तप॑तीति॒ तस्मा॑त्स॒द्यः-
क्रियो॒ऽश्वः श्वेतो दक्षि॑णा ॥१९॥ तस्य रु॒क्मः पु॒रस्ता॑द्भवति । तदे॒तस्य रू॒पं क्रि॑-
यते॒ य एष तप॑ति॒ यद्यश्वं॑ श्वे॒तं न वि॒न्देदपि गौरै॒व श्वेतः॑ स्यात्तस्य रु॒क्मः पु॒र-
स्ता॑द्भवति तदे॒तस्य रू॒पं क्रि॑यते॒ य एष तप॑ति ॥२०॥ तेभ्यो ह वा॒चुक्रोध । के-
न मदैष॒ श्रेया॒न्बन्धु॑ना॒३ केना३ यदे॒तं प्रत्य॑ग्रहीष्ट॒ न मामि॑ति॒ सा हैभ्यो॒ऽपचक्रा-

कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० १०-२१ शतपथब्राह्मण / ४१७
है ॥१०॥
यह पीछे चौड़ी क्यों होती है ? स्त्रियों की प्रशंसा करते हैं कि इनकी श्रोणी (पिछला
भाग) चौड़ी है । पिछले भाग के चौड़े होने से कोख बड़ी हो जाती है । कोख से ही सब प्रजा
उत्पन्न होती है ॥११॥
उत्तर वेदी यज्ञ की नाक है। यह ऊपर को उठी होती है इसीलिए इसका नाम 'उत्तर
वेदी' है ॥१२॥
पहले दो प्रकार की प्रजा थी—आदित्य और अंगिरा । सबसे पहले अंगिरों ने यज्ञ का
आरम्भ किया और अग्नि से बोले, 'आदित्यों से कह दो कि कल हमारे सोम-भाग में शामिल
हों' ॥१३॥
आदित्य बोले, 'ऐसी तरकीब करो कि अंगिरा लोग हमारे यज्ञ में आवें, न कि हम उनके
में' ॥१४॥
उन्होंने कहा, 'इसकी तरकीब केवल यज्ञ ही हैं। हम दूसरा सोम-यज्ञ करें।' उन्होंने
यज्ञ की सामग्री इकट्ठी की, "हे अग्नि, तूने तो हमको कल के सोम-याग का बुलावा दिया है,
हम तो तुझको और अंगिरों को आज के ही सोम-याग का न्योता देते हैं। तू हमारे लिए होता
बन' ॥१५॥
उन्होंने किसी को अंगिरों के पास भेजा । परन्तु अंगिरों ने अग्नि का पीछा किया और
इस पर क्रुद्ध होकर बोले कि जब तू हमारा दूत थी तो तूने हमारा आदर क्यों नहीं किया ॥१६॥
उसने कहा कि 'अनिन्द्य' अर्थात् निर्दोष लोगों ने मेरा वरण किया । निर्दोषों से वरी
जाकर मैं उनका कहना टाल न सकी।' इसलिए अगर कोई निर्दोष मनुष्य किसी (होता) का
वरण कर ले तो उसको इनकार नहीं करना चाहिए। तब अंगिरों ने आदित्यों के सोमयाग को
उसी दिन कराया । उसका नाम है 'सद्यः-क्री' ॥१७॥
उन्होंने उनको वाणी की दक्षिणा दी। उन्होंने उस (वाणी) को स्वीकार नहीं किया,
क्योंकि यदि इसे स्वीकार करेंगे तो हमको हानि होगी। इसलिए यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ क्योंकि उसमें
दक्षिणा की कमी रह गई ॥१८॥
इस पर वे दक्षिणा के लिए उनके पास सूर्य को लाये । उन्होंने सूर्य को स्वीकार कर
लिया । इसीलिए अंगिरा लोग कहते हैं, 'हम याज्ञिक होने के योग्य हैं; हम दक्षिणा लेने के योग्य
हैं। यह जो तपता है अर्थात् सूर्य, उसका हमने ग्रहण किया है।' इसलिए 'सद्यः-क्री' यज्ञ की
दक्षिणा सफेद घोड़ा होता है ॥१९॥
इस घोड़े के आगे एक सोने का आभूषण होता है। इस प्रकार वह उसका प्रतिरूप हो
जाता है जो ऊपर तपता है (अर्थात् सूर्य) ॥२०॥
अब वाणी उनसे नाराज हो गई—'वह मुझसे किस बात में अच्छा है ? उन्होंने उसको
क्यों स्वीकार किया, मुझे क्यों न स्वीकार किया ?' ऐसा कहकर वह वहाँ से चली गई। और

४१८ शतपथ ब्राह्मण

म्॒ सो॒भया॒नन्त॒रेण॑ दे॒वासु॒रात्स॑य॒त्ताꣳत्सि॒ꣳही भू॒त्वाऽद॑दाना चचार॒ तामुपै॑व दे॒वा अ॑-
मन्त्र॑यन्तो॒पासु॑रा अ॒ग्निरे॒व दे॒वानां॑ दू॒त आस॒ सह्र॑क्षा इ॒त्यसु॑ररक्षस॒मसु॑राणाꣳ ॥२१॥
सा दे॒वानु॒पाव॑र्त्ते॒त्यु॑वाच । यद्व॑ उपा॒ब्रवै॑यं॒ किं मे॒ ततः॑ स्या॒दिति॒ पूर्व्व॑मेव॒ त्वयि॑-
राहु॑तिः॒ प्राप्स्यती॒त्यथ॒ हैषा॑ दे॒वानु॑वाच॒ यां मया॒ कां चाशि॑ष॒माशा॑सि॒ष्यध्वे॒ सा वः॑
सर्व्वा॒ समृ॑धिष्यत॒ऽइति॒ सैवं दे॒वानु॒पाव॑वर्त्त ॥२२॥ स य॒द्धार्य्य॑माणे॒ऽग्नौ॑ । उत्त॑रवे-
दिं॒ व्याधा॑रयति॒ यद्वै॒वैना॑म॒दो दे॒वा अ॑ब्रुवन्पूर्व्वी॒ त्वय्ये॒राहु॑तिः॒ प्राप्स्यतीति॒ तद्द्॒वै-
नामे॒तत्पूर्व्वा॑मग्रे॒राहु॑तिः प्राप्नोति॒ वाग्ये॒षा नि॒दाने॒नाथ॒ यदु॑त्तरवे॒दिमु॑प॒किर॑ति य॒-
ज्ञस्यै॒व सर्व॑त्वाय॒ वाग्धि य॒ज्ञो वाग् ध्येषा॒ ॥२३॥ तां वै यु॒गश॒म्येन॒ विमि॑मीते ।
यु॒गेन॒ यत्र॒ हर॑न्ति॒ शम्य॑या॒ यतो॒ हर॑न्ति यु॒गश॒म्येन॒ वै यो॒ग्यं यु॑ञ्जन्ति॒ सा यद्दे॒वाद्ः
सिꣳही॒ भूत्वा॒शान्ताव॑चर॒त्तद्द्॒वैना॑मे॒तद्य॒ज्ञे यु॑नक्ति ॥२४॥ तस्मा॑न्निवृ॒त्तद॑क्षिणां॒ न
प्र॒तिगृ॑ह्णीयात् । सिꣳही॒ ह्येनं॒ भूत्वा॒ क्षिणो॑ति॒ नो हा॑माकुर्व्विति सिꣳही॒ ह्यै॒वैनं॒ भू-
त्वा॒ क्षिणो॑ति॒ नो हान्य॑स्मै दद्याद्य॒शं तद॒न्यत्रा॒त्मनः॑ कुर्व्विति॒ तस्मा॒द्योऽस्यापि॑ पा-
प॒-इव॑ समा॒नबन्धुः॑ स्या॒त्तस्मा॒ऽएनां॑ दद्या॒त्स यद्ददा॑ति॒ तदेनꣳ॑ सिꣳही॒ भूत्वा॒ न
क्षिणो॑ति॒ यड्ड॑ समा॒नब॑न्धवे॒ ददा॑ति॒ तडु॒ नान्यत्रा॒त्मनः॑ कुरुत॒ऽएषो॑ निवृ॒त्तद॑क्षि-
णा॒यै प्रति॑ष्ठा ॥२५॥ अथ॒ शम्यां॑ च॒ स्फ्यं चा॑दत्ते । तय्य॒ एष पूर्व्वार्धः॑ उत्तरा॒र्धः॑
शङ्कु॒र्भव॑ति॒ तस्मा॒त्प्रत्य॑ङ् प्र॒क्राम॑ति॒ त्रीन्वि॑क्र॒मांस्तच्चा॑त्वालं॒ परि॑लिखति॒ सा चा॑वा-
लस्य॒ मात्रा॒ नात्र॒ मात्रा॑स्ति॒ यत्रै॒व स्वय॑म् मनसा॒ मन्ये॒ताग्रे॑णोत्क॒रं तच्चा॑त्वालं॒ प-
रि॒लिखे॑त् ॥२६॥ स वे॒द्यन्ता॑त् । उ॒दीचीꣳ॑ श॒म्यां निद॑धाति॒ स परि॑लिखति त-
प्तायनी मेऽसीतीमामे॒वैतदा॑हास्यान हि तप्त इति॒ ॥२७॥ अथ॑ पु॒रस्ता॑त् । उ॒दीचीꣳ॑
श॒म्यां निद॑धाति॒ स परि॑लिखति वित्तायनी मेऽसीतीमामे॒वैतदा॑हास्यान हि वि-
विदान॒ इति॑ ॥२८॥ अथा॑नुवे॒द्यन्त॑म् । प्राचीꣳ॑ श॒म्यां निद॑धाति॒ स परि॑लिखत्य-
वतान्मा नाथितेतीमामे॒वैतदा॑ह॒ यत्र॒ नायेत॑न्मावता॒दिति॑ ॥२९॥ अथो॑त्त॒रतः॑ ।

कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० २१-३० शतपथब्राह्मण / ४१६
सिंहिनी बनकर उन दोनों देव और असुरों के बीच में जो कुछ मिला उसको खाने लगी। देवों ने
उसको बुलाया और असुरों ने भी। देवों का दूत 'अग्नि' था और असुर-राक्षसों का 'सह-
रक्षा' ॥२१॥
देवों के पास आने की इच्छा करती हुई वह बोली, 'यदि मैं तुम्हारी ओर आ जाऊँ तो
मुझे क्या मिलेगा ?' 'तेरे लिए अग्नि से भी पूर्व आहुति मिलेगी।' तब उसने देवों से कहा,
'तुम मेरे आशीर्वाद द्वारा जो चाहोगे वह तुमको प्राप्त होगा।' अतः वह देवों के पास चली
गई ॥२२॥
इसलिए उत्तर वेदी में अग्नि का आधान करके जब वह आहुति देता है तो वह आहुति
वाणी को अग्नि से भी पूर्व पहुँच जाती है, क्योंकि देवों ने कहा था कि तुझे अग्नि से पहले ही
आहुति पहुँच जाया करेगी, क्योंकि जो उत्तर वेदी है वह वस्तुतः वाणी ही है। यह जो उत्तर वेदी
को बनाता है वह यज्ञ की पूर्णता के लिए ही बनाता है। वाणी ही यज्ञ है। वाणी ही यह उत्तर
वेदी है ॥२३॥
वह उस वेदी को युग और शम्या से नापता है—युग से उस स्थान को जहाँ मिट्टी लाते
हैं, और शम्या से उस स्थान को जहाँ से मिट्टी लाते हैं। (शायद युग का अर्थ है डण्डा या जुआ
और शम्या का कील ?) क्योंकि बैलों को जुए और कील से जोता जाता है। चूँकि वह सिंहिनी
बनकर अशान्ति से विचरती रही, इसलिए वह उसको यज्ञ में जोतता (बांधता) है ॥२४॥
इसलिए तिरस्कृत दक्षिणा को न ग्रहण करना चाहिए (अर्थात् यदि एक ऋत्विज् दक्षिणा
न ले तो उस दक्षिणा को दूसरा ऋत्विज न ले), नहीं तो वह सिंहिनी बनकर हानि पहुँचाती है।
न (यजमान) उसे घर वापस ले जाये, क्योंकि सिंहिनी होकर वह उसे हानि पहुँचाती है। वह न
किसी दूसरे को दे, नहीं तो अपने यज्ञ को दूसरे का बना देगा। यदि उसका कोई पापी
रिश्तेदार हो उसे दे दे। तब वह सिंहिनी होकर हानि न पहुँचायेगी। और चूँकि वह अपने ही
रिश्तेदार को देता है इसलिए यज्ञ को अपने से अलग नहीं करता। तिरस्कृत दक्षिणा का यही
निर्णय है ॥२५॥
अब वह शम्या और स्फ्या को लेता है। जहाँ पूर्वार्ध की उत्तरी कील (शंकु) होती है
वहाँ से तीन पग पीछे की ओर भरता है और वहाँ 'चात्वाल' का चिह्न बना देता है। चात्वाल
की मात्रा वही होती है जो उत्तर वेदी की। और कोई मात्रा नहीं है। जहाँ उसका मन चाहे उत्कट
अर्थात् कूड़े के चात्वाल बना दे ॥२६॥
वह वेदी के अन्त से उत्तर की ओर शम्या को रखता है और रेखा खींच देता है इस मन्त्र
को पढ़कर—"तप्तायनी मेऽसि" (यजु० ५।६)—"मेरे लिए तू वह स्थान है जहाँ पीड़ित लोग
सहारा पाते हैं।" इससे तात्पर्य इस भूमि से है जिस पर वह पीड़ित होकर चलता है ॥२७॥
अब वह आगे की ओर उत्तर को शम्या रखता है और रेखा खींचता है, यह पढ़कर—
"वित्तायनी मेऽसि" (यजु० ५।६)—"तू मेरा धन का स्थान है।" इससे तात्पर्य इस भूमि से है
क्योंकि यहीं वह धन प्राप्त करके चलता है ॥२८॥
अब वह वेदी के किनारे पर पूर्व की ओर शम्या रखता और रेखा खींचता है, यह पढ़-
कर—"अवतान् मा नाथितात्" (यजु० ५।६)—"मुझे दरिद्रता से बचा।" इससे भूमि से तात्पर्य
है अर्थात् जहाँ-जहाँ दरिद्रता हो वहाँ से मुझे बचा ॥२९॥
अब वह उत्तर की ओर पूर्व को शम्या रखता है और रेखा खींचता है यह मन्त्र पढ़कर-

४२० शतपथ ब्राह्मण
प्राचीᳵ शम्यां नि॒दधा॑ति स प॒रिलि॑ख्य॒त्रतान्मा व्यथि॑ता॒दिती॒मामे॒वैतदा॑ह॒ यत्र॑
व्यथे॒तन्मावता॒दिति॑ ॥ ३०॥ अथ हरति । यत्र॒ हर॑ति॒ तद॒ग्नीडुप॑सीदति॒ स वा॒ऽअ॒-
ग्नीनामेव॒ नामा॑नि गृ॒ह्वन्हर॑ति यान्वा॒ऽअ॒मून्ये॒वा अग्रे॒ऽग्नीन्होत्राय॒ प्रावृ॑णत ते
प्राध॑न्वंस्त॒ऽइमा॒ एव॒ पृथिवीमुप॑सर्पन्न्नि॒मामिव॒ ह्ये॒ऽअस्याः पू॒रे तेनै॒वैता॒न्निदा॑नेन
हर॑ति ॥ ३१॥ स प्रहरति । वि॒देद॒ग्निर्नभो॒ नामाग्ने॑ऽअङ्गिर॒ आयु॑ना॒ नाम्नेति॑ स
यत्प्राध॑न्वंस्तदायुर॑धाति॒ तत्स॒मीर॑यति॒ यो॒ऽस्यां पृ॑थिव्या॒मसीति॒ यो॒ऽस्यां पृ॑थिव्या-
मसी॑ति कृत्वा नि॒दधा॑ति प॒त्तेऽना॑धृष्टं॒ नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ वाध॒ध्वेति प॒त्तेऽना॑धृष्टᳵ
॒रक्षोभिर्नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ वाध॒ध्वेत्ये॒वैतदा॑हा॒नु वा देव॒वीतय॒ऽइति चतु॒र्थᳵ हर-
ति दे॒वेभ्य॑स्त्वा जु॒ष्टाᳵ हरामीत्ये॒वैतदा॑ह॒ तां वै च॑तुःस्र॒क्तिंश्वा॑वालाद्धरति च॒तस्रो
वै दिश॑ः सर्वाᳵभ्य ए॒वैनमेतद्दि॒ग्भ्यो हर॑ति ॥ ३२॥ अथानु॒व्यूह॑ति । सि॒ꣳह्य॑सि स-
प॒त्नसाही॑ दे॒वेभ्य॑ः कल्प॒स्वेति सा यद्देवा॒दः सि॒ꣳही॑ भू॒त्वाशा॑न्तेवाचर॒त्तद्धै॒वैनामेत-
दा॑ह सि॒ꣳह्य॑सीति सपत्नसाहीति॒ वया॒ वयꣳ स॑प॒त्नान्यापो॑यसः क्रि॒यास्मेत्ये॒वैतदा॑ह
दे॒वेभ्य॑ः कल्प॒स्वेति योषा वा॒ऽउत्तर॑वेदि॒स्तामे॒वैतद्दे॒वेभ्य॑ः कल्पयति ॥ ३३॥ तां
वै यु॑गमा॒त्रीं वा स॑र्व॒तः करो॑ति । यज॑मानस्य वा द॒श-द॑श प॒दानि॑ दशाक्षरा॒ वै
वि॒राड्वै वि॒राड्य॒ज्ञो म॑ध्ये नाभिकामिव करोति समा॒नन्नासीनो॒ व्याधा॑रया-
णीति॑ ॥ ३४॥ तामद्भि॒रभ्यु॑क्षति । सा॒ यद्देवा॒दः सिꣳही भू॒त्वाशा॑न्तेवाचर॒त्तन्नि॒राप-
स्ताम॒द्भिः श॑मयति॒ योषा वा॒ऽउत्तर॑वेदि॒स्तामे॒वैतद्दे॒वेभ्यो॑ हिन॒द्मि तस्मा॑दद्भि॒रभ्यु॑-
क्षति ॥ ३५॥ सोᳵऽभ्यु॑क्षति । सि॒ꣳह्य॑सि स॒पत्नसाही॑ दे॒वेभ्य॑ः शुन्ध॒स्वेत्य॑थ सि॒कता-
भिरनु॑वि॒किर॒त्यल॑ङ्कारो॒ न्वेव सि॑कता भ्रातृव्य॒ऽइव हि सि॑कता अ॒ग्नेर्वाऽए॒तद्वैश्या-
नर॒स्य भस्म॒ यत्सि॑कता अ॒ग्निं वा॒ऽअस्यामाधास्यन्भव॑ति॒ तथो है॑नाम॒ग्निर्न॑ हिन॒स्ति
त॒स्मात्सि॑कताभि॒रनु॑वि॒किर॑ति॒ सोᳵनु॑वि॒किर॑ति सि॒ꣳह्य॑सि सपत्नसाही दे॒वेभ्य॑ः शु-
म्भस्वेत्यथेनां छादयति सा हूनैताᳵ रात्रिं वसति ॥ ३६॥ ब्राह्मणम् ॥ १[५.१] ॥ ॥

कां० ३, अ० ५, ब्रा० १, कं० ३०-३६ शतपथब्राह्मण / ४२१
“अवतान् मा व्यथि॒तात्” (यजु० ५।६) – “मुझे व्यथा से बचा ।” इससे भी भूमि से तात्पर्य है
अर्थात् 'जहाँ कहीं व्यथा हो वहाँ से बचा' ॥३०॥
अब वह स्फ्या को फेंकता है। जहाँ स्फ्या को फेंकता है वहाँ आग्नीध्र बैठता है। जब वह
फेंकता है तो अग्नियों के नाम लेता जाता है। देवों ने जिन अग्नियों को पहले होत्र के लिए चुना
था वे चली गईं और पृथिवी में घुस गईं-एक इस पृथिवी में और दो उनमें जो इससे परे हैं। वह
उस अग्नि के साथ फेंकता है जो इस (पृथिवी) में घुसी थी ॥३१॥
वह इस मन्त्र को पढ़कर फेंकता है- “वि॒देद॒ग्निर्नभो॒ नामाग्नेऽअ॒ङ्गिर॒ऽआयु॑ना नाम्ना
एहि” (यजु० ५।६) – “नभ नामवाली अग्नि तुझे जाने, हे अङ्गिरा अग्नि, आयु नाम के साथ
जा ।” जिस आयु से वे गुजर गये उस आयु को दिलाता है। फिर प्राणों से सम्पन्न करता है।
नीचे लिखे मन्त्रांश से मिट्टी उठाता है - “योऽस्यां पृथिव्यामसि” (यजु० ५।६) – और नीचे के
मन्त्रांश से उस मिट्टी को उत्तर वेदी में रखता है - “यत्ते॒ऽनाधृ॑ष्टं नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॑ त्वा दधे”
(यजु० ५।६) – “जो तेरा आदर का नाम हो उससे तुझको रखता हूँ ।” इससे उसका तात्पर्य
यह है कि मैं तुझको उस नाम से रखता हूँ जिसे राक्षसों ने अपमानित नहीं किया। इस मन्त्रांश
से चौथी बार लेता है—"अनु॑ त्वा दे॒ववी॑तये” (यजु० ५।६) – “देवों की प्रसन्नता के लिए
तुझको ।” इससे तात्पर्य है कि तुझसे देव प्रसन्न हैं। इसको वह चौकोर चत्वाल से लेता है। चार
दिशाएँ हैं। अर्थात् वह चारों दिशाओं से लेता है ॥३२॥
अब वह मिट्टी को इस मन्त्रांश से अलग करता है - “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः
कल्पस्व” (यजु० ५।१०) – “तू सिंहिनी है। शत्रुओं पर विजयिनी। देवों के योग्य बन ।” चूंकि
वह पहले सिंहिनी बन गई और अशान्त विचरती रही, इसलिए वह उसको कहता है, 'तू सिंहिनी
है।' 'शत्रुओं पर विजयिनी' से तात्पर्य है कि 'तेरे द्वारा हम अपने शत्रुओं पर विजय पावें।' 'देवों
के योग्य बन' अर्थात् उत्तर वेदी स्त्री है, उसको देवों के योग्य बनाता है ॥३३॥
वे इसको चारों ओर से या तो 'युग' के बराबर बनाता है या यजमान के दस-दस पद के
बराबर । विराट् छन्द दश अक्षर का होता है। विराट् वाणी है और वाणी यज्ञ है। बीच में नाभि
के समान है कि एक ही स्थान पर बैठा-बैठा आहुति दे सकूँ ॥३४॥
वह इसे जल से सींचता है। चूंकि वह सिंहिनी होकर अशान्त विचरती रही, अतः जल
शान्ति है, इसलिए वह उसको जल से शान्त करता है। उत्तर वेदी स्त्री है। वह इसको देवों के
योग्य बनाता है, इसलिए वह उसको जल से सींचता है ॥३५॥
वह यह मन्त्रांश पढ़कर जल सिंचन करता है— “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुन्धस्व”
(यजु० ५।१०) – “तू सिंहिनी है, शत्रुओं पर विजयिनी, देवों के लिए पवित्र बन ।” अब वह
रेत डालता है। रेत अलंकार है क्योंकि रेत चमकता है। रेत अग्नि वैश्वानर की भस्म है। अब
वह इस पर अग्नि रखेगा, इसलिए अग्नि उसको हानि नहीं पहुँचाता। इसलिए वह उस पर रेत
डालता है। इस मन्त्रांश को पढ़कर - “सिँ॒ह्यसि सपत्नसाही देवेभ्यः शुम्भस्व” (यजु० ५।१०)
“तू सिंहिनी है, शत्रुओं पर विजयिनी, देवों के लिए सज ।” अब वह उसे ढक देता है। वह रात-
भर ढकी रहती है ॥३६॥

अध्याय-५, ब्राह्मण-२

इ॒ध्मम॒भ्याद॑धाति । उप॒यमनी॒रुप॑कल्पयन्त्या॒ज्यम॒धिश्रयति स्रुवं च॒ स्रुचं॑ च संमा॒-
र्ष्ट्योत्यू॒र्ध्व्याभ्यं॑ पञ्चगृहीतं गृ॑ह्णीते यदा प्रदी॑प्त इध्मो भव॑ति ॥ १॥ अथो॒द्यच्छ॑ती-
ध्मम् । उप॒यम॒न्युप॑यमन॒ीरथाह्वाग्नये॒ प्रह्रिय॑माणाय॒ानुब्रू॒ह्येक॑स्फ्यया॒नूदे॑हीत्यनूदे॑ति
प्रतिप्रस्थातैक॑स्फ्ययतस्मान्मध्यमाद्गोर्य एष वेदे॑र॒र्धनार्थे भव॑ति तद्यद्देवा॒त्रातः॑पा-
तेन गार्हपत्यस्य॒ वेदेर्व्यव॑च्छिन्नं॒ भव॑ति तद्द्वैवैतद॒नुसंत॑नोति ॥ २॥ तद्वैके॑ । श्रोत्त-
रवेदे॒रनूद्याय॑न्ति तदु॒ तथा न कुर्या॒द्धैवैतस्मान्मध्यमाद्गोरनू॑द्याया॒त्प्रायस्या॒गच्छ॑त्यु-
त्त॒रवेदिम् ॥ ३॥ ॥ शतम् १८०० ॥ ॥ प्रोक्षणी॑र॒ध्वर्युराद॑त्ते । स पु॒रस्ता॑देवाग्रे प्रो-
क्षत्युदङ् तिष्ठ॑न्निन्द्रघोष॒स्त्वा वसु॑भिः पुरस्तात्पात्वितीन्द्रघोष॒स्त्वा वसु॑भिः पुर॒स्ता-
द्गोपायत्वित्ये॒वैतदाह ॥ ४॥ अथ पश्चात्प्रोक्ष॑ति । प्रचेतास्त्वा रु॒द्रैः प॒श्चात्पात्विति
प्रचेतास्त्वा रु॒द्रैः पश्चा॑द्गोपायत्वित्ये॒वैतदाह ॥ ५॥ अथ दक्षिण॒तः प्रोक्ष॑ति । मनो॑-
जवास्त्वा पितृभि॑र्दक्षिण॒तः पात्विति मनोजवास्त्वा पितृभि॑र्दक्षिण॒तो गोपायत्वित्ये-
वैतदाह ॥ ६॥ अथोत्तर॒तः प्रोक्ष॑ति । विश्व॑कर्मा त्वादि॒त्यैरुत्तर॒तः पात्विति विश्व॑-
कर्मा त्वादि॒त्यैरुत्तर॒तो गोपायत्वित्ये॒वैतदाह ॥ ७॥ अथ याः प्रोक्षण्यः परिशिष्य॑-
न्ते । तद्येऽएते पूर्व्वे सक्ती तयो॑र्या द॑क्षिणा ता मन्तेन बहिर्वेदि निनयतीदम॒हं
ततं॒ वार्बल्बि॑थीं य॒ज्ञात्रिःसृ॑जामीति सा यद्वैवाहुः सिञ्ची भूवाशान्तेवा॒चरत्ता॒मेवा-
स्या एतच्छं॑ ब॒हिर्धा य॒ज्ञात्रिःसृ॑जति य॒द्वि नाभिचरे॒द्यद्यु॑ऽअभिचरे॒दादिशे॑दिदम॒हं
ततं॒ वारमुम॑भि निःसृ॑जामीति तमेतया॑ शु॒चा विध्यति स शौचंन्नेवामं लोकमेति
॥ ८॥ स य॒द्धार्य॑माणेऽग्नौ । उत्तरवेदिं॒ व्याघा॑रयति य॒द्वैवैनामदो देवा अब्रुवन्पूर्वा
त्वयि॒राहु॑तिः प्राप्स्यतीति तद्द्वैवैनामितत्पूर्वाम॒ग्नेराहु॑तिः प्राप्नोति यद्देषा देवा॒नब्र-
वोद्यां मया कां चाशिषमाशासिष्यध्वे सा वः सर्वा सम॑र्धिष्यत॒ऽइति तस्मि॒न्यत्रा
ऽर्त्विजो यज॑मानायाशिष॒माशा॑सते सास्मै सर्वा समृ॑ध्यते ॥ ९॥ तद्द्वाऽए॒तदेकं कुर्व-
न्द्वयं॑ करोति । यदु॑त्तरवेदिं व्याघा॒रयत्यथ यैषां म॒ध्ये नाभि॑केव भव॑ति तस्यै ये