शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
३१२ शतपथ ब्राह्मण दत्त॒ पितरो यथाभागमावृ॑षायिषतेति यथाभागमाशिषुरित्ये॒वैतदाह ॥ ४०॥ अथो॑- दपात्र॒मादा॑य । पुनः प्रस॒व्यं त्रिः परि॑षिञ्चन्पर्य्येति स यज॑मानस्य पितॄ॒नन्वनेन- क्त्यसा॑ववनेनिक्तेत्यसा॑ववनेनिक्तेति पितामह॒मसा॑ववनेनिक्तेति प्रपितामहं त द्यथा॑ ऽनुषे॒कम॑भिषिञ्चे॒देवं तत्तद्यत्पुनः प्रस॒व्यं त्रिः परि॑षिञ्चन्पर्य्येति प्रस॒व्यं न इदं कर्मानु॑संतितिष्ठासा॒दिति॒ तस्मात्पुनः प्रस॒व्यं त्रिः परि॑षिञ्चन्पर्य्येति ॥ ४१॥ अथ नी॒विमु॒द्वृह्य॒ नम॑स्करोति । पितृदेवत्या वै नीवि॒स्तस्मान्नी॒विमु॒द्वृह्य॒ नम॑स्करोति यज्ञो वै नमो यज्ञिया॑ने॒वैना॑नेतत्क॑रोति षट् कृत्वो नम॑स्करोति षड्वाऽऋ॒तव॑ ऋ॒त- वः पितर॒स्तदृतुष्वे॒वैतं॒यज्ञं॒ प्रतिष्ठा॑पयति तस्मात्षट् कृत्वो नम॑स्करोति गृ॒हान्नः॑ पि- तरो दत्तॆति॑ गृ॒हाणां॑ ह पितर॒ ईशत॒ऽएषो॒ऽएतस्याशीः॒ कर्म॑णः ॥ ४२॥ ते सर्व्व ऽएव यज्ञोपवीतिनो भूत्वा । अनुयाजाभ्यां प्रचरिष्यन्त इत्याद्यजमानश्च ब्रह्मा च पश्चात्परीतः पुरस्तादग्नीदुपविशति होता होतृषदने ॥ ४३॥ अथाहा ब्रह्मन्प्रस्था- स्यामि । समिधमाधायाग्निमग्नीत्संमृड्ढ्रीति स्रुचावादाय प्रत्यङ्गतिक्रामत्यतिक्रम्याश्रा- व्याह देवान्यजेति सोऽपबर्हिषौ द्वावनुयाजौ यजति प्रजा वै बर्हिर्नेत्प्रजाः पि- तृषु दधानीति तस्मादपबर्हिषौ द्वावनुयाजौ यजति ॥ ४४॥ अथ सादयित्वा स्रुचौ॒ व्यूहति । स्रुचौ व्यूह्य परिधीन्त्सममृज्य परिधिमभिपद्याश्राव्याहाहेषिता दैव्या होता- रो भद्रवाच्याय प्रेषितो मानुषः सूक्तवाकायेति सूक्तवाकꣳ होता प्रतिपद्यते ना- ध्व॒र्य्युः प्रस्तरꣳ समुद्यम्यतीत्येवोपास्ते यदा होता सूक्तवाकमाह ॥ ४५॥ अथाग्नी- दाहाग्नी॒ननुप्रहरेति । स न किं चनानुप्रहरति तूष्णीमेवात्मानमुपस्पृशति ॥ ४६॥ अ- थाह संवद॒स्वेति॑ । अगानग्नीदगुंश्चावद्य॒ श्रौष॑ट् स्वगा॒ दैव्या॒ होतृ॑भ्यः स्व॒स्तिर्मा॑नु॒षे- भ्यः शं योर्ब्रूहीत्युपस्पृशत्येव परिधीन्नानुप्रहरत्यथैतद्बर्हिरनुसमस्यति परिधींश्च ॥ ४७॥ तद्वैके । हविरुच्छिष्टमनुसमस्यन्ति तदु तथा न कुर्याद्हुतोच्छिष्टं वाऽएतन्नेद्हुतोच्छिष्टम- ग्नौ॒ जुहु॒वानी॑ति तस्मा॒दपो॒ वैवा॑भ्यव॒हरे॑युः प्रा॒श्नीयु॑र्वा ॥ ४८॥ ब्राह्म॑णम् ॥ २ [६-१.]॥ ॥
कां० २, अ० ६, ब्रा० १, कं० ४०-४८ शतपथब्राह्मण / ३१३ है—"अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत" (यजु० २।३१)—"पितरों ने खा लिया। बैलों के समान वे अपने-अपने भाग को ले गये।" इससे तात्पर्य यह है कि उन्होंने अपना-अपना भाग खाया ॥४०॥ अब वह जल के पात्र को लेता है और छिड़कता हुआ फिर तीन बार बाईं ओर से दाहिनी ओर को लौटता एवं 'आप धोइये' कहकर यजमान के पिता के लिए जल छोड़ता है, 'आप धोइये' कहकर यजमान के बाबा के लिए, 'आप धोइये' कहकर यजमान के परबाबा के लिए। जैसे अतिथि के सत्कार के लिए, जो खाना खाता है, जल दिया जाता है वैसे ही यहाँ भी किया जाता है। और तीन बार बाईं ओर से दाहिनी ओर जल छिड़कते हुए चलने के विषय में वह सोचता है कि 'हमारा यह काम इसी प्रकार (?) पूरा हो जायगा।' इसलिए वह तीन बार बाईं ओर जल छिड़कता हुआ चलता है ॥४१॥ अब नीवि अर्थात धोती के निचले भाग को नीचे खींचकर नमस्कार करता है। नीवि पितरों की है, इसलिए उसे खींचकर नमस्कार करता है। नमस्कार यज्ञ है। इस प्रकार वह उनको यज्ञ का अधिकारी बनाता है। छः बार नमस्कार करता है, क्योंकि छः ऋतुएँ होती हैं। ऋतुएँ पितर हैं। इस प्रकार ऋतुओं में ही इस यज्ञ की स्थापना करता है। इसलिए छः बार नमस्कार करता है। अब कहता है—'पितरो ! हमको घर दो।' क्योंकि पितर घर के रक्षक हैं, और इस यज्ञ में यह आशीर्वाद है ॥४२॥ वे सब यज्ञोपवीत धारण करके (बायें कन्धे पर जनेऊ लाकर) तैयारी करते हैं। इस प्रकार यजमान और ब्रह्मा पश्चिम की ओर आते हैं और आग्नीध्र पूर्व की ओर, और होता होता के स्थान पर बैठ जाता है ॥४३॥ अब वह कहता है—'हे ब्रह्मा ! मैं आगे चलूंगा।' अब वह समिधा रखकर कहता है— 'आग्नीध्र ! आग ठीक कर।' अब दोनों स्रुकों को लेकर पश्चिम की ओर जाता है। वहाँ जाकर और 'श्रौषट्' कहकर कहता है—'देवों के लिए आहुति दे।' वह दो अनुयाज देता है, बर्हि का अनुयाज छोड़कर। बर्हि प्रजा है। इसलिए बर्हि का अनुयाज छोड़कर दो अनुयाज ही करता है जिससे प्रजा पितरों के हवाले न हो जाय ॥४४॥ अब दोनों स्रुकों को रखकर अलग-अलग कर देता है। उनको अलग करके और परिधियों को घी में भिगोकर एक परिधि को लेता है और 'श्रौषट्' कहकर कहता है--'भद्र कहने के लिए दिव्य-होता बुलाये गये और स्तुति के लिए मनुष्य-होता बुलाया गया। होता सूक्तवाक् या स्तुति कहता है। अध्वर्यु प्रस्तर को नहीं उठाता; केवल देखता रहता है जब कि होता स्तुति करता है ॥४५॥ अब आग्नीध्र कहता है-'छोड़।' अध्वर्यु कुछ छोड़ता नहीं। केवल चुपचाप अपने शरीर को छू लेता है ॥४६॥ अब आग्नीध्र कहता है—'संवाद कर।' अध्वर्यु पूछता है—'हे आग्नीध्र ! वह गया ?' (उत्तर देता है) 'वह गया।' 'देव सुनें।' 'दैवी-होता विदा हों।' 'मनुष्य-होता का कल्याण हो।' 'कल्याण के वाक्य कह।' यह कहकर वह केवल परिधियों को छूता है, परन्तु अग्नि में डालता नहीं। बर्हि और परिधियों को पीछे से छोड़ता है ॥४७॥ कुछ लोग बची-खुची हवि को भी (अग्नि में) डाल देते हैं; परन्तु ऐसा न करना चाहिए, क्योंकि यह आहुति का उच्छिष्ट (जूठा) है। इसलिए ऐसा न हो कि आहुति की जूठन छोड़ दी जाय। इसलिए उसे या तो जल में छोड़ देना चाहिए या खा लेना चाहिए ॥४८॥
अध्याय-६, ब्राह्मण-२
ᳬन्त्काह्विषा ह॒ वै दे॒वा वृ॒त्रं ज॑घ्नुः । तेनो॑ऽए॒व व्य॑जयन्त॒ येय॑मेषां वि॒जिति॒स्ता- मथ॒ याने॑वेषां तस्मिन्त्स॑ङ्ग्रामेऽशव॒ आर्च्छंस्ताने॒तेरे॒व शल्या॑न्निर॑हर॒न्त॒ तान्व्य॑वृञ्ज्त यत्त्र्य॑म्ब॒कैर॒यज॑न्त ॥१॥ अथ॒ यदे॒ष ए॒तैर्यज॑ते । तन्मा॒नू ष्ये॑वैतस्य तथा कं चनेषु- र्ऋच्छतीति॑ दे॒वा अ॑कुर्व॒न्निति॒ त्वेवैष ए॒तत्क॑रोति॒ याश्च॒ त्वे॒वास्य॑ प्र॒जा जा॒ता याश्चा- जा॑तास्ता॒ उभयी॑ रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चति ता अ॒स्यानमी॒वा अ॑किल्वि॒षाः प्र॒जाः प्र॒जाय॑न्ते तस्मा॒द्वाऽए॒ष ए॒तैर्यज॑ते ॥२॥ ते वै रौ॒द्रा भव॑न्ति । रु॒द्रस्य॒ ही॑षू॒त्तस्मा॑द्रौ॒द्रा भव॑- न्त्ये॑ककपाला भव॒न्त्ये॑कदे॒वत्या॒ अस॒न्निति॒ तस्मा॑देककपाला भव॑न्ति ॥३॥ ते वै प्र॒तिपु॑रुषं । याव॑न्तो गृ॒ह्याः स्युस्ताव॑न्त एके॒नाति॑रिक्ता भव॑न्ति तत्प्र॒तिपु॑रुषमे॒- वैतदे॒कैकेन॒ या अ॒स्य प्र॒जा जा॒तास्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चत्येके॒नाति॑रिक्ता भव॑न्ति तया॑ ह॒वास्य प्र॒जा अ॑जा॒तास्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चति॒ तस्मा॑देके॒नाति॑रिक्ता भव॑न्ति ॥४॥ स ज॒घने॑न गार्ह॑पत्यं । य॒ज्ञोप॑वी॒ती भू॒त्वोद॒ङ्ङासी॑न ए॒तान्गृ॑ह्णाति॒ स तत ए॒वोत्था॑- योद॒ङ्तिष्ठ॒न्नवे॑क्ष्य॒दीचौ॑ दृष॒दुप॑लेऽउपदधात्युत्तरार्धे गार्हपत्यस्य कपा॒लान्युप॑दधा- ति तद्य॑दे॒व ता॒मुत्त॑रां दिश॑ꣳ सच॑त॒ऽए॒षा ह्ये॑तस्य दे॒वस्य॒ दिक्स्तस्मा॑देता॒मुत्त॑रां दि॒- शंꣳ सच॑न्ते ॥५॥ ते वा॒ अक्ताः स्युः । अ॒क्तꣳ हि ह॒विस्त्व॑ऽउ वाऽअन॑क्ता ए॒व स्यु॒रभि॑मानुको ह रु॒द्रः प॒शून्त्स्याद्यद॒ञ्ज्यात्तस्मा॑दन॒क्ता ए॒व स्युः ॥६॥ तान्त्सार्धं पा- त्राꣳ समुद्रा॑स्य । अन्वा॒हार्य॑पचनादु॒ल्मुकमादा॑योदङ् परे॒त्य जु॑होत्ये॒षा ह्ये॑तस्य दे॒वस्य॒ दिक् पथि॑ जुहोति पथा हि स दे॒वश्च॑रति चतुष्पथे जुहोत्येतद्द् वा॒ऽअस्य शथि॑तं प्रज्ञातमवसानं यच्चतुष्पथं तस्माच्चतुष्पथे जुहोति ॥७॥ पलाशस्य पला- शेन मध्यमेन जुहोति । ब्रह्म वै पलाशस्य पलाशं ब्रह्म॑णैवैतज्जु॑होति स सर्वे- वानेवावद्यत्येकस्यैव नावद्यति य एषोऽतिरिक्तो भवति ॥८॥ स जुहोति । एष ते रुद्र भागः सह॒ स्वस्रा॑म्बिकया॒ तं जु॑षस्व स्वाहेत्य॑म्बिका ह॒ वै ना॒मास्य॒ स्वसा तया॒स्यैष॒ सह॒ भागस्तद्यदेष॒ स्त्रिया॒ सह॒ भागस्तस्मा॒त्त्र्य॑म्बका नाम तथा॒ अस्य
कां० २, अ० ६, ब्रा० २, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / ३१५ अध्याय ६-ब्राह्मण २ देवों ने महाहवि के द्वारा ही वृत्र को मारा था। उसी से उनको वह विजय मिली जो उनको प्राप्त है। उनमें से जिनके शरीर में उस युद्ध में वाण लगे थे उनको निकाला। उनको उन्होंने त्र्यम्बक यज्ञ करके निकाला ॥१॥ इसलिए जो कोई इस प्रकार यज्ञ करता है वह या तो इसलिए करता है कि उसके लोगों के कोई तीर न लगेगा; या इसलिए कि देवताओं ने ऐसा किया था। इस प्रकार वह उस सन्तान को जो उत्पन्न हो चुकी है और उस सन्तान को भी जो अभी उत्पन्न नहीं हुई, रुद्र के फन्दे से छुड़ा देता है और उसकी सन्तान रोगरहित और दोषरहित उत्पन्न होती है। इसीलिये वह यज्ञ करता है ॥२॥ (त्र्यम्बक यज्ञ) रुद्र के लिए किया जाता है। वाण रुद्र के ही हैं। इसलिए रुद्र की ही आहुतियाँ होती हैं। यह एक कपाल (का पुरोडाश) होता है। एक देवता के लिए ही होती है, इसलिए वे एक कपाल की ही होती हैं ॥३॥ प्रति पुरुष के लिए एक-एक। जितने घर के लोग हों उनके लिए एक-एक और एक अधिक। एक-एक के लिए एक-एक। इससे वह उत्पन्न हुई सन्तान को रुद्र के वश से छुड़ाता है। और जो एक अधिक हुई उसके सहारे से जो सन्तान अभी उत्पन्न नहीं हुई उसको रुद्र के वश से छुड़ाता है। इसीलिए वे इतने होते हैं और एक अधिक ॥४॥ यह यज्ञोपवीत धारण किये हुए उत्तराभिमुख गार्हपत्य के पीछे बैठकर (पुरोडाश के लिए चावलों को) निकालता है। वहाँ से वह उठता है और उत्तराभिमुख खड़ा होकर पछोरता है। अब दृषद और उपल (चक्की के पाट) उत्तर की ओर रखता है और गार्हपत्य के उत्तरार्द्ध में कपालों को रखता है। उत्तर की ओर ही क्यों रखता है? इसलिए कि उत्तर देव की दिशा है। इसलिए उत्तर की दिशा में रखते हैं ॥५॥ (कुछ की राय में) उनमें घी मिलाना चाहिए। हवि में घी मिला होता है, परन्तु घी न मिलाना ही अच्छा है। यदि घी मिला दिया जायगा तो रुद्र यजमान के पशुओं के पीछे पड़ेगा। इसलिए घी नहीं मिलाना चाहिए ॥६॥ एक पात्र में सब (पुरोडाश) को करके दक्षिणाग्नि से एक जलती लकड़ी लेकर उत्तर की ओर जाकर आहुति दे देता है, क्योंकि उत्तर की दिशा इस देव की है। मार्ग में ही आहुति देता है, क्योंकि वह देव (रुद्र) मार्ग में ही चलता है। चौराहे पर ही देता है, क्योंकि चौराहे पर ही (रुद्र का) प्राचीन स्थान है। इसलिए चौराहे पर ही आहुति देता है ॥७॥ पलाश पत्र के बीच के पत्ते से आहुति देता है। पलाश ब्रह्म है। इसलिए ब्रह्म के द्वारा ही आहुति देता है। वह सब (पुरोडाशों में से) एक-एक टुकड़ा काटता है, केवल अधिक पुरोडाश (जो एक अधिक था) में से नहीं काटता ॥८॥ वह इस मन्त्र को पढ़कर आहुति देता है—"एष ते रुद्र भागः सह स्वस्राम्बिकया तं जुषस्व स्वाहा” (यजु० ३।५७)—"हे रुद्र, तेरी बहिन अम्बिका के साथ यह तेरा भाग है, तू इसे ग्रहण कर; स्वाहा ।" उसकी बहिन का नाम अम्बिका है। उसके साथ मिला हुआ उसका यह भाग है। और चूंकि एक स्त्री उस भाग में शरीक है, अतः उन आहुतियों का नाम पड़ा 'अम्बिका'। इन
३१६ शतपथ ब्राह्मण प्रजा जातास्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑ञ्चति ॥ ९॥ अथ॒ य ए॒ष एको॑ऽतिरिक्तो॒ भव॑ति । तमा- खूत्क॒रऽउ॑पकिरत्ये॒ष ते॑ रुद्र भा॒गऽआ॒खुस्ते॑ प॒शुरि॑ति॒ तद॒स्मा॒ऽआखु॑मे॒व प॑शूना॒म- न्वि॑दिशति तेनो॒ऽइतरा॒न्पशू॒न्न हि॑नस्ति तद्य॒दुप॑किरति ति॒र् इ॑व॒ वै गर्भास्ति॒र् इ- वैतद्यदुपकीर्णं त॒स्मादा॒ऽउप॑किरति त॒या ए॒वास्य॑ प्र॒जा अ॒जाता॑स्ता रु॒द्रिया॒त्प्रमु॑- ञ्चति ॥ १०॥ अथ॒ पुन॒रेत्य॑ जपन्ति । अव॑ रु॒द्रम॑दीम॒ह्यव॑ दे॒वं त्र्य॑म्बकम् । य॒था नो॒ वस्य॑सस्क॒रद्यथा॑ नः॒ श्रेय॑सस्क॒रद्यथा॑ नो॒ व्यवसा॑ययात् ॥ भेष॒जम॑सि भेष॒जं ग- वे॒ऽश्वाय॒ पुरु॑षाय भेष॒जं सु॒खं मे॒षाय॑ मे॒ष्या॒ऽइत्या॒शीरे॒वैषैतस्य॒ कर्म॑णः ॥ ११॥ अथापसलवि त्रिः प॑रियन्ति । स॒व्यानूरूनुपघ्नाना॒स्त्र्य॑म्बकं यजामहे सुग॒न्धिं पु॑ष्टि- वर्ध॑नम् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नान्मृ॒त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॒दित्या॒शीरे॒वैषैतस्य॒ कर्म॑ण आ॒शिष॑मे॒वैतदाशा॑सते तद्य॒ क्षेव॒ शमिव॒ यो॑ मृत्योर्मुच्य॑ते॒ नामृ॒तात्तस्मा॑दाह म्- त्योर्मु॑क्षीय॒ मामृता॒दिति॑ ॥ १२॥ तडु हापि कुमा॒र्यः प॑रीयुः । भग॑स्य भजामहा॒ऽइ- ति या ह॒ वै सा रु॒द्रस्य॒ स्वसा॑म्बिका॒ नाम॒ सा ह॒ वै भग॒स्येष्टे॒ तस्मा॑दु ह्वापि कु- मार्यः॒ परी॑युर्भग॑स्य भजामहा॒ऽइति॑ ॥ १३॥ तासा॑मुतासां॒ नल्लो॒ऽस्ति॑ । त्र्य॑म्बकं य- जामहे सुग॒न्धिं प॑तिवे॒दन॑म् । उ॒र्वा॒रु॒कमि॑व॒ बन्ध॑नादितो॑ मुक्षीय॒ मामुत॒ इति॑ सा यदि॑त॒ इत्या॑ह ज्ञातिभ्य॒स्तदा॑ह॒ मामुत॒ इति॒ पति॑भ्यस्तदाह॒ पत॑यो॒ ह्येव॒ स्त्रिये॑ प्र- ति॒ष्ठा तस्मा॑दाह॒ मामुत॒ इति॑ ॥ १४॥ अथ॒ पुनः॑ प्रसल॒वि त्रिः प॑रियन्ति । द॒क्षि- णानूरूनुपघ्नाना॒ ए॒तेनै॑व॒ मन्त्रे॑ण तद्यत्पुनः॑ प्रसल॒वि त्रिः प॑रियन्ति प्रसल॒वि न॒ इदं कर्मानु॒संत॑तिष्ठाता॒ऽइति॒ तस्मा॑त्पुनः प्रसल॒वि त्रिः प॑रियन्ति ॥ १५॥ अथैतान्य्- ज॑मानो॒ऽञ्जलौ॑ समो॒प्य । ऊ॒ध्वानुदस्यति यथा गौर्नीदाद्युपात्तादात्मभ्य ए॒वैतत्कल्या- णम॒भिमि॑मीते तान्विलिप्सन्त उप॒स्पृश॑न्ति भेष॒जमे॒वैतत्कुर्वते तस्मा॑द्विलिप्सन्त उप॒स्पृ- शन्ति ॥ १६॥ तान्द्र्योर्मुत्क॒योरुप॑नह्य । वेणुय॒ष्ट्यां वा कूपे वोभयत आबध्योदङ् परे॒त्य यदि॑ वृ॒क्षं वा स्थाणुं॑ वा वे॒णुं वा वल्मी॒कं वा विन्दे॒त्तस्मि॒न्नास॑ञ्जयत्ये॒ते
कां० २, अ० ६, ब्रा० २, कं० ६-१७ शतपथब्राह्मण / ३१७ आहुतियों के द्वारा, उसके जो सन्तान हुई है उसको रुद्र के पंजे से छुड़ा देता है ॥६॥ और एक जो (पुरोडाश की टिकिया) उसको चूहे के बिल में गाड़ देती है, यह मन्त्र पढ़कर— “एष ते रुद्र भागऽआखुस्ते पशुः” (यजु० ३।५७)— “हे रुद्र ! यह भाग है और चूहा तेरा पशु है।” इस प्रकार वह चूहे को ही (रुद्र का पशु) नियत कर देता है और वह (रुद्र) किसी अन्य पशु को नहीं सताता । गाड़ता क्यों है ? इसलिए कि गर्भ गुप्त होते हैं। और जो गड़ा हुआ होता है वह भी गुप्त होता है। इसीलिए वह उसको गाड़ता है। इसके द्वारा वह अपनी उस सन्तान को जो अभी उत्पन्न नहीं हुई रुद्र के पंजे से छुड़ा देता है ॥१०॥ अब वे लौटकर यह मन्त्र जपते हैं— “अव रुद्रमदीमह्यव देवं त्र्यम्बकम् । यथा नो वस्य- सस्करद्यथा नः श्रेयसस्करद्यथा नो व्यवसाययात् ॥ भेषजमसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुषाय भेषजम् । सुखं मेषाय मेष्यै” (यजु० ३।५८, ५६)— “हम त्र्यम्बक देव रुद्र को सन्तुष्ट करते हैं कि वह हमको घर आदि से युक्त करे, हमको कल्याण दे, और हमको व्यवसायी बनावे” (यजु० ३।५८)— “हे रुद्र ! आप औषध हैं— गाय, घोड़े, पुरुष के लिए औषध हैं। भेड़ और भेड़ी के लिए सुख हैं (अर्थात् सब प्राणियों के लिए सुख के दाता हैं), इस यज्ञ में यह आशीर्वाद है” (यजु० ३।५६) ॥११॥ अब वे तीन बार वेदी के चारों ओर (बाईं ओर से) फिरते हैं, बाईं जांघों को पीटते हुए और यह मन्त्र जपते हुए— “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो- र्मुक्षीय माऽमृतात्” (यजु० ३।६०) — “सुगन्धयुक्त और पुष्टि को बढ़ानेवाले त्र्यम्बक की हम स्तुति करते हैं कि वह हमको मौत के बन्धन से इस प्रकार छुड़ा ले जैसे उर्वारुक (लौकी) अपने डण्ठल से; परन्तु मोक्ष से नहीं” ॥१२॥ कुमारियां भी परिक्रमा करें, इसलिए कि उनका कल्याण हो । रुद्र की बहिन अम्बिका भाग्य की अधिष्ठात्री है। इसलिए कुमारियों को भी परिक्रमा देनी चाहिए, इस इच्छा से कि उनका भाग्य जागे ॥१३॥ उनके लिए यह मन्त्र है — “त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धना- दितो मुक्षीय मामुतः” (यजु० ३।६०) — “हम सुगन्धयुक्त पतियों को प्राप्त करानेवाले त्र्यम्बक की स्तुति करती हैं कि वह हमको इस (लोक) से लौकी के डण्ठल की भाँति छुड़ा दे, न कि उस (लोक) से” (यजु० ३।६०) । 'इस (लोक) से' का तात्पर्य है 'मेरे माता-पिता आदि से ।' 'वहाँ से नहीं' का तात्पर्य है — 'पति से नहीं' । (अर्थात् वधू अपने माँ-बाप को छोड़कर पति के घर में नित्य रहने की प्रार्थना करती है) पति ही स्त्री की प्रतिष्ठा है । इसलिए कहती है 'वहाँ से नहीं' ॥१४॥ अब वे फिर वेदी के चारों ओर दाहिनी ओर से फिरते हैं, दाहिनी जांघों को पीटते हुए और वही मन्त्र जपते हुए । वे दाहिनी ओर घूमकर तीन बार क्यों फिरते हैं ? इसलिए कि वे समझते हैं कि ऐसा करने से हमारे दाहिनी ओर काम सिद्ध होगा । इसलिए वे तीन बार दाहिनी ओर से परिक्रमा देते हैं ॥१५॥ अब यजमान इन बचे हुए पुरोडाश की टिकियों को अंजलि में लेकर ऊपर को इस प्रकार फेंकता है कि गौ न छू सके, और फिर हाथ में लेता है। जो पकड़ में नहीं आते और गिर पड़ते हैं उनको केवल छू लेता है। इस प्रकार वे उनको औषध के समान बनाते हैं। इसलिए यदि वे पकड़ में नहीं आते तो छू लेता है ॥१६॥ अब इनको दो टोकरियों में रखकर और या तो बाँस के दो सिरों से या तराजू की डण्डी के दो सिरों से बाँधकर उत्तर की ओर चलता है । और रास्ते में कोई वृक्ष, ठूंठ, बाँस या चिटोहर
अध्याय-६, ब्राह्मण-३
३१८ शतपथ ब्राह्मण
रु॒द्राव॒सं तेन॒ परो॒ मूज॒वतो॒ऽतीहीत्यव॒सेन॒ वा॒ऽअध्वानं॒ यन्ति॒ तदेन॑ꣳ सावस॒मे- वान्त्व॒वार्त्तित॒ यत्र॑-यत्रास्य॒ चरणं॒ तद॒न्वत्र॒ ह वा॒ऽअस्य॒ परो॒ मूज॒वद्भ्यश्च॑रणं॒ तस्मा॑- दाह॒ परो॒ मूज॒वतो॒ऽतीहीत्य॑व॒ततधन्वा॒ पिना॑कावस॒ इत्यहि॑ꣳसन्नः शि॒वो॒ऽतीही॑- त्ये॒वैतदा॑ह॒ कृत्तिवासा॒ इति॒ निष्षापयत्ये॒वैनमेतत्स्वप॒न्न हि॒ न कं च॒न हिन॒स्ति तस्मा॑दाह॒ कृत्तिवासा॒ इति॑ ॥ १७॥ अथ॒ दक्षि॑णाम्बा॒हुमन्वा॑व॒र्त्तन्ते॑ । ते॒ प्रती॑चं॒ पुन॒राय॑न्ति॒ पुन॒रेत्या॒प उप॑स्पृशन्ति रुद्रि॒येणैव॒ वा॒ऽएतद्व्य॑चारिषुः शान्तिराप॒स्तद॒द्भिः शान्त्या॑ शमयन्ते ॥ १८॥ अथ॒ केशश्म॒श्रु व॑पते । स॒मारो॒प्याग्नी॒ऽउद॑व॒सायि॒व श्वो॒तेन॑ यज॑ते॒ न हि॒ तद॒वक॑ल्पते॒ यदु॑त्तरवे॒दाव॒ग्निहोत्रं॑ जुहु॒यात्तस्मा॑दु॒द्वस्य॑ति गृ॒हानिवा॑- निर्मि॒थ्याग्नी॑ पौर्णमा॒सेन॑ यजत॒ऽउत्स॑न्नय॒ज्ञ-इव॒ वा॒ऽएष॒ यच्चातुर्मा॒स्यान्यथैष॒ कॢप्तः॑ प्रति॑ष्ठितो य॒ज्ञो यत्पौ॑र्णमा॒सं तत्कॢप्ते॒नैवैतद्य॒ज्ञेना॒न्तः प्रति॑तिष्ठति॒ तस्मा॑दु॒द्वस्य॑- ति॒ ॥ १९॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [६.२.] ॥ ॥ अ॒क्षय्यं॑ꣳ ह॒ वै सु॒कृतं॒ चातुर्मास्यया॒जिनो॑ भवति । संवत्सरं॑ꣳ हि॒ त्रय॑ति॒ ते- मा॒स्यान्नाय्यं॒ भव॑ति॒ तं वै॒ त्रेधा॒ विभ॑ज्य॒ यज॑ति॒ त्रेधा॒ विभ॑ज्य॒ प्रजय॑ति॒ सर्वं॒ वै सं॑- वत्सरः॒ सर्वं॒ वा॒ऽअक्षय्य॑मे॒तेनो॒ हास्याक्षय्यं॑ꣳ सु॒कृतं॒ भवत्यृतू॒ꣳ हैव॒ तद्देवा॑ दे॒वान- प्येत्य॒न्नाद्यं॒ वै दे॒वाना॑मृ॒तेनो॒ हैवा॒स्यान्नाद्यं॑ꣳ सु॒कृतं॒ भवत्ये॒तन्नु॒ तद्यस्मा॑च्चातुर्मा॒- स्यैर्यज॑ते ॥ १॥ अथ॒ यस्मा॑च्छुनासी॒रीये॑ण॒ यजे॑त । या वै दे॒वाना॑ꣳ श्रीरासी॑त्साकमे॒धे- रीजा॒नानां॑ विजिग्या॒नानां॑ तहु॒नमथ॒ यः सं॑वत्स॒रस्य॑ प्र॒जित॑स्य॒ रस॒ आसी॑त्तत्सीरं॑ꣳ सा या हैव दे॒वाना॑ꣳ श्रीरासी॑त्साकमे॒धेरीजा॒नानां॑ विजिग्या॒नानां॒ य उ॑ च सं॑व- त्स॒रस्य॑ प्र॒जित॑स्य॒ रस॒ आसी॑त्तमे॒वैतदु॒भयं॑ प॒रिगृह्या॒त्मन्कु॑रुते॒ तस्मा॑च्छुनासी॒रीये॑ण य- ज॑ते ॥ २॥ तस्या॒वृत् । नोप॑किर॒त्युत्त॑रवे॒दिं न गृह्णा॑ति पृषदा॒ज्यं न म॑न्थ॒त्यग्निं॒ पञ्च॑ प्रया॒जा भव॑न्ति॒ त्रयो॑ऽनुया॒जा एकं॑ꣳ समिष्टयजुः ॥ ३॥ अथैतान्येव॒ पञ्च॑ ह॒- वीꣳषि॒ भव॑न्ति । ए॒तैर्वै ह॒विर्भिः॑ प्र॒जाप॑तिः प्र॒जा असृ॑जतै॒तैरू॒भय॑तो वरुणापा॒शा-
कां० २, अ० ६, ब्रा० २-३, कं० १७-१६ व १-४ शतपथब्राह्मण / ३१६ मिल जाय तो इस मन्त्र से उसमें बांध देता है—"एतत् ते रुद्रावसं तेन परो मूजवतोऽतीहि" (यजु० ३।६१)—"हे रुद्र! यह तेरा तोशा है। इसे लेकर तू मूजवत के उस पार जा।" तोशा लेकर ही लोग यात्रा को चलते हैं। इसलिए जहाँ जाना हो वहाँ तोशा लेकर विदा करता है। इस प्रसंग में उसकी यात्रा मूजवत के उधर है, इसलिए कहता है कि मूजवत के उधर। अब कहता है—"अवततधन्वा पिनाकावसः" (यजु० ३।६१)—"बिना खिंचे हुए धनुष और वज्र से युक्त ।" इससे तात्पर्य है 'हिंसा न करते हुए, कल्याण करते हुए जाओ।' अब कहता है— "कृत्तिवासा" (यजु० ३।६१) "चमड़ा पहने हुए।" इससे वह उसे सुला देता है। सोते हुए कोई किसी को हानि नहीं पहुँचा सकता। इसलिए कहा 'चमड़ा पहने हुए' ॥१७॥ अब वे दक्षिण की ओर फिरते हैं, बिना पीछे देखते हुए। लौटकर जल का स्पर्श करते हैं। अब तक रुद्र यज्ञ कर रहे थे। जल शान्ति है। इसलिए शान्तिरुपी जल से अपने को पवित्र करते हैं ॥१८॥ अब वह केश और दाढ़ी मुंडवाता है, और (उत्तर वेदी की) अग्नि लेता है, क्योंकि जगह बदलकर ही तो वह (पौर्णमास) यज्ञ कर सकता है। यह ठीक नहीं है कि उत्तर वेदी पर अग्निहोत्र करे, इसलिए वह जगह बदल लेता है। घर जाकर और अग्नियों का मन्थन करके वह पौर्णमास यज्ञ करता है। चातुर्मास्य यज्ञ अलग होते हैं, परन्तु पौर्णमास यज्ञ नियत और प्रतिष्ठित है। इसलिए वह उस नियत यज्ञ को करके अपने को प्रतिष्ठित करता है। इसलिए जगह बदल देता है ॥१९॥ अध्याय ६-ब्राह्मण ३ जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है उसका पुण्य कभी नाश नहीं होता। वह संवत्सर को जीत लेता है, इसलिए वह नाश नहीं होता। वह इसके तीन भाग करके यज्ञ करता है। वह इसके तीन भाग करके जीतता है। 'संवत्सर' का अर्थ है 'सम्पूर्ण'। 'सम्पूर्ण' नाश नहीं होता। इसलिए उसका सुकृत भी अक्षय होता है। वह ऋतु हो जाता है और देवों को प्राप्त होता है। देवों में तो 'क्षय' है ही नहीं। इसलिए उसके लिए अक्षय सुकृत होता है। यही प्रयोजन है कि वह चातुर्मास्य यज्ञ करता है ॥१॥ अब शुनासीर यज्ञ क्यों करना चाहिए ? साकमेध करनेवाले और (वृत्र पर) विजय पानेवाले देवों की जो 'श्री' थी वह है 'शुनम्' और प्राप्त हुए 'संवत्सर' का जो रस था वह है 'सीर'। साकमेध करनेवाले और (वृत्र पर) विजय पानेवाले देवों की जो 'श्री' थी और प्राप्त हुए संवत्सर का जो 'रस' था, उन दोनों को ग्रहण करके अपना बना लेता है, इसलिए 'शुनासीर यज्ञ' करता है ॥२॥ इसकी यह विधि है - उत्तरवेदी नहीं बनाते। नौनी घी नहीं लेते। अग्नि का मन्थन नहीं करते। पाँच प्रयाज होते हैं, तीन अनुयाज और एक समिष्ट यजुः ॥३॥ पहले ये साधारण पाँच हवियाँ होती हैं। इन्हीं हवियों से प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न की।
३२० शतपथ ब्राह्मण त्त्र॒ताः प्रामु॒खदन्तैरे॒वै देवा॒ वृत्रम॒घ्नन्ने॒तैरै॒व व्य॒जयन् येये॑मे॒षां वि॒त्रित्ति॒स्तां तयोऽहृ॒- वेष॒ तेषां चैव दे॒वाना॒ꣳ श्रीरासी॑त्साकमे॒धैरी॑जानानां॒ विजि॑ग्यानानां॒ य उ॑ च सं॒- वत्सर॑स्य प्र॒जितस्य॒ रस॒ आसी॒त्तमे॒वैतदु॒भयं॒ परि॒गृह्या॒त्मन्कु॑रुते॒ तस्मा॒द्वा ए॒तानि॑ पञ्च॒ ह॒वीꣳ॑षि भवन्ति ॥४॥ अथ शुनासी॒रीयो॑ द्वादशकपालः पुरो॒डाशो॑ भवति । स बन्धु॑: शुनासी॒र्य॑स्य॒ यं पूर्व॑मवोचाम ॥५॥ अथ वाय॒व्यं॑ पयो॑ भवति । पयो॒ ह वै प्र॒जा जाता॒ अभि॒संज्ञा॑नते विजिग्या॒नं मा॒ प्रजा॑: श्रिये॒ यश॑सेऽन्ना॒द्याया॒भिसंज्ञा॑- न
का० २, अ० ६, ब्रा० ३, कं० ४-१३ शतपथब्राह्मण / ३२१ इन्हीं के द्वारा दोनों ओर से वरुण के पाश से प्रजा को छुड़ाया। इन्हीं से देवों ने वृत्र को मारा। इन्हीं से उनको यह विजय मिली जो उनको प्राप्त है। इन्हीं के द्वारा साकमेध यज्ञ करनेवाले और (वृत्र को) जीतनेवाले देवों की जो श्री थी और जो प्राप्त हुए संवत्सर का रस था, उन दोनों को ग्रहण करके अपना बना लेता है। इसीलिए इन पाँच हवियों से यज्ञ करता है ॥४॥ अब शुनासीर्य पुरोडाश बारह कपालों का होता है। शुनासीर्य यज्ञ के विषय में पहले कह ही दिया गया ॥५॥ वायु के लिए दूध की आहुति होती है। प्रजा उत्पन्न होते ही दूध पीती है। वह सोचता है कि मुझ जीते हुए को प्रजा प्राप्त होवे। श्री, यश, अन्न, मेरा हो। इसलिए दूध की आहुति होती है ॥६॥ वायु के लिए क्यों आहुति होती है ? यह जो चलता है यह वायु ही तो है। इसी के द्वारा तो वर्षा होती है। वर्षा से औषध होती हैं। औषध खाकर और जल पीकर ही तो जल में से दूध होता है। इसलिए (वायु से) ही दूध होता है, इसलिए वायु के लिए आहुति देता है ॥७॥ अब एक कपाल का पुरोडाश सूर्य के लिए। यह सूर्य ही तो है जो तपता है। यही तो सबकी रक्षा करता है; कभी साधु द्वारा, कभी असाधु द्वारा। यही सबको धारण करता है; कभी साधु द्वारा, कभी असाधु द्वारा। यह सोचता है कि 'मैं विजयी हो गया। अब वह प्रसन्न होकर 'साधु' द्वारा मेरी रक्षा करे। साधु द्वारा धारण करे।' इसलिए सूर्य का एक कपाल का पुरोडाश होता है ॥८॥ इसकी दक्षिणा है सफेद घोड़ा। इसलिए उस तपनेवाले सूर्य के रूप की होती है। यदि सफेद घोड़ा न मिले तो सफेद गौ ही होवे। इस प्रकार वह तपनेवाले सूर्य के रूप की होती है ॥६॥ जब यह साकमेध यज्ञ करे तभी शुनासीर यज्ञ करे। वर्ष में तीन बार करने से सम्पूर्णता मिल जाती है। इसलिए कभी कर ले ॥१०॥ कुछ लोग रात्रि को लेना चाहते हैं। यदि वह रात्रि को लेना चाहे तो जब सामने आकाश में फाल्गुनी पूर्णमासी दिखाई पड़े उस समय शुनासीर यज्ञ को करे ॥११॥ अब वह दीक्षा लेवे कि कहीं फाल्गुनी पूर्णमासी बिना यज्ञ के न रह जाय, क्योंकि यदि फाल्गुनी पूर्णमासी बिना यज्ञ के गुजर जायगी तो उसको फिर प्रयोग करना पड़ेगा। इसलिए फाल्गुनी पूर्णमासी बिना सोम यज्ञ के नहीं गुजरनी चाहिए। यह उसके लिए जो (चातुर्मास्य आहुतियों को) छोड़ बैठता है ॥१२॥ जो (चातुर्मास्य यज्ञ) फिर करना चाहता है, उसे फाल्गुनी पूर्णमासी के पहले दिन शुनासीर यज्ञ करना चाहिए, दूसरे दिन वैश्वदेव यज्ञ, फिर पौर्णमास यज्ञ। यह उसके लिए है
अध्याय-६, ब्राह्मण-४
३२२ शतपथ ब्राह्मण यु॒ञ्जा॒नस्य॑ ॥ १३॥ अथातः॑ । प॒रि॒वर्त॑नस्यैव॒ सर्व॑तोमुखो वाऽअ॒सावा॑दि॒त्य ए॒ष वा॒- ऽइ॒दꣳ सर्वं॒ निर्द॑हति॒ यदि॒दं किं च॒ शुष्य॑ति॒ तेनै॑ष॒ सर्व॑तोमुखस्तेनान्ना॒दः ॥ १४॥ सर्व॑तोमुखोऽय॒मग्निः॑ । यतो॒ ह्ये॑व कुत॑श्चा॒ग्नाव॒भ्याद॑धति॒ त्तन॑ ए॒व प्र॒दह॑ति॒ तेनै॑ष॒ सर्व॑तोमुखस्तेनान्ना॒दः ॥ १५॥ अ॒थायमन्य॒तोमु॑खः पु॒रुषः॑ । स ए॒तत्सर्व॑तोमुखो भ॒- वति॒ यत्प॒रिव॑र्तयते॒ स ए॒वमे॒वान्ना॒दो भ॑वति॒ यथै॒तावे॒तद् य ए॒वं वि॒द्वान्प॒रिव॑र्तयते॒ तस्मा॑द्वि॒ परिव॑र्तयेत ॥ १६॥ त॒द् हो॒वाचा॑सुरिः॑ । किं नु तत्र॑ मु॒खस्य॒ यदपि॒ सर्वा॑- ण्येव॒ लोमा॑नि वपे॒त यद्वे त्रिः सं॑वत्स॒रस्य॒ यज॑ते॒ तेनै॑व॒ सर्व॑तोमुखस्तेनान्ना॒दस्त॒- स्मान्ना॑द्रियेत प॒रिव॑र्तयितु॒मिति॑ ॥ १७॥ ब्राह्म॒णम् ॥ ४ [६. ३.] ॥ ॥ तद्यदाहुः॑ । सा॒क॒मे॒धैर्दे॒वा वृ॒त्रम॑घ्नꣳस्तै॒र्विश्व॒ व्य॑जयन्त॒ येय॑मे॒षां वि॒जिति॒स्तामि॒- ति॒ सर्वै॒र्ह त्वे॑व दे॒वाश्चा॑तुर्मा॒स्यैर्वृ॒त्रम॑घ्नन्स॒र्वैर्विश्व॒ व्य॑जयन्त॒ येय॑मे॒षां वि॒जिति॒स्ताम् ॥ १॥ ते हो॑चुः । केन॒ राज्ञा॒ केनानी॑केन योत्स्याम॒ इति॒ स हा॒ग्निरु॑वाच॒ मया॒ रा- ज्ञा मयानी॑के॒नेति॒ तेऽग्नि॑ना॒ राज्ञा॒ग्निनानी॑केन च॒तुरो॒ मासः॒ प्राज॑यंस्ता॒न्ब्रह्म॑णा च॒ त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ पर्य॑गृह्णन् ॥ २॥ ते हो॑चुः । केने॑व॒ राज्ञा॒ केनानी॑केन योत्स्याम इति॒ स ह॒ वरु॑ण उवाच मया॒ राज्ञा॒ मयानी॑के॒नेति॒ ते वरु॑णेनैव॒ राज्ञा॒ वरु॑णेना- नीके॒नाप॑राꣳश्च॒तुरो॒ मासः॒ प्राज॑यंस्ता॒न्ब्रह्म॑णा चैव॒ त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ पर्य॑गृह्णन् ॥ ३॥ ते हो॑चुः । केने॑व॒ राज्ञा॒ केनानी॑केन योत्स्याम॒ इति॒ स हेन्द्र॑ उवाच मया॒ राज्ञा॒ मयानी॑के॒नेति॒ तऽइन्द्रे॑णैव॒ राज्ञेन्द्रे॑णानीके॒नाप॑राꣳश्च॒तुरो॒ मासः॒ प्राज॑यंस्ता॒न्ब्रह्म॑णा चैव॒ त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ पर्य॑गृह्णन् ॥ ४॥ स यद्वैश्र्व॑दे॒वेन॒ यज॑ते । अ॒ग्निने॒वैतद्राज्ञा॒ग्नि- नानी॑केन च॒तुरो॒ मासः॒ प्रज॑यति॒ तच्छ्ये॒नी श॑ल॒ली भ॑वति लो॒हः क्षु॒रः सा या॒ श्ये॒नी श॑ल॒ली सा त्रय्यै॑ वि॒द्यायै॑ रू॒पं लो॒हः क्षु॒रो ब्रह्मणो॑ रू॒पम॒ग्निर्हि ब्रह्म॑ लो॒हित॑ इव॒ ह्यग्नि॑स्त॒स्माल्लो॒हः क्षु॒रो भ॑वति॒ तेन॑ प॒रिव॑र्तयते॒ तद्ब्रह्म॑णा चै॒वैन॑- मे॒तत्त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ परि॑गृह्णाति ॥ ५॥ अथ॒ यद्व॑रुणप्रघा॒सैैर्यज॑ते । वरु॑णेनै॒वैतद्रा-
कां० २, अ० ६, ब्रा० ३-४, कं० १३-१७ व १-६ शतपथब्राह्मण / ३२३ जो चातुर्मास्य को फिर शुरू करना चाहता है ॥१३॥ अब सिर मुंडाना। यह सूर्य तो सब ओर मुख किये रहता है। वह जो कुछ सूखता है उसे सूर्य ही तो पीता है। इसलिए यह (यजमान भी) (सिर मुंडाने से) सर्वतोमुख और अन्न पचाने- वाला हो जाता है ॥१४॥ यह अग्नि भी सर्वतोमुख है। क्योंकि जो कुछ अग्नि में जिधर से भी डाला जाय भस्म हो जाता है, इसलिए यह (यजमान) भी (सिर मुंडाने से) सर्वतोमुख और अन्न पचानेवाला हो जाता है ॥१५॥ यह पुरुष तो एक ही ओर मुख रखता है। परन्तु सिर जो मुंडाता है वह सर्वतोमुख हो जाता है। और जो इस रहस्य को समझकर सिर मुंडाता है वह दोनों (अग्नि और सूर्य) के समान अन्न पचानेवाला होता है। इसलिए उसको बिल्कुल सिर मुंडाना चाहिए ॥१६॥ इस विषय में आसुरि की राय थी कि 'चाहे सब लोम मुंडा लें, तो भी इससे और मुख से क्या सम्बन्ध ? वर्ष में तीन बार यज्ञ करने से ही सर्वतोमुख और अन्न पचानेवाला होता है। इसलिए सिर मुंडाने की कोई आवश्यकता नहीं ॥१७॥ अध्याय ६-ब्राह्मण ४ यह जो कहा गया है कि देवों ने साकमेध यज्ञ के द्वारा वृत्र को मारा और उस विजय को पा लिया जो उनको प्राप्त है, यह सभी चातुर्मास्य यज्ञों के द्वारा ऐसा हुआ कि देवों ने वृत्र को मारा और जो विजय उनको प्राप्त है वह सभी के द्वारा हुई है ॥१॥ उन्होंने कहा, 'किस राजा के द्वारा और किस नेता की सहायता से हम लड़ेंगे ?' अग्नि ने कहा- 'मुझ राजा और मुझ नेता की सहायता से।' अग्नि राजा और अग्नि नेता की सहायता से उन्होंने चारों महीनों को जीता, और ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से उन (महीनों) को घेरा ॥२॥ उन्होंने कहा- 'किस राजा और किस नेता की सहायता से हम लड़ेंगे ?' वरुण ने कहा- 'मुझ राजा और मुझ नेता की सहायता से।' उन्होंने वरुण राजा और वरुण नेता की सहायता से दूसरे चार महीनों को जीता, और ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से उनको घेरा ॥३॥ उन्होंने कहा- 'किस राजा और किस नेता की सहायता से हम लड़ेंगे ?' इन्द्र ने कहा- 'मुझ राजा और मुझ नेता की सहायता से।' इन्द्र राजा और इन्द्र नेता की सहायता से उन्होंने शेष चार महीनों को जीता, और उनको ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से घेरा ॥४॥ जब वह वैश्वदेव यज्ञ करता है तो इसी अग्नि राजा और अग्नि नेता की सहायता से चारों महीनों को जीतता है। (सिर मुंडाने के लिए) त्र्येनी शलली (साही का कांटा जिसमें तीन धब्बे हों) और तांबे का क्षुरा होता है। त्र्येनी शलली तीन विद्याओं का रूप है और क्षुरा ब्रह्म का रूप है। अग्नि ब्रह्म है, अग्नि लाल है इसलिए तांबे का क्षुरा होता है। उससे चारों ओर मुंडवाता है। इस प्रकार वह (अध्वर्यु को) ब्रह्म और तीन विद्याओं से घेरता है ॥५॥ जब वह वरुण-प्रघास यज्ञ करता है तो वरुण राजा और वरुण नेता के द्वारा दूसरे चार
३२४ शतपथ ब्राह्मण ज्ञा व॒रुणेनानी॑केनापरांश्च॒तुरो॒ मासः॒ प्रण॑यति त॒त्त्येनी॑ शल॒ली भ॑वति लो॒हः क्षु॒रस्तेन॑ परिवर्तयते तल्ल॒क्ष्णया चै॒वैन॑मेत॒त्त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ परि॑गृह्णाति ॥६॥ अथ यत्साकमेधैर्यज॑ते । इन्द्रे॑णैवैतद्रा॒ज्ञेनेन्द्रा॒णानी॑केनापरांश्च॒तुरो॒ मासः॒ प्रण॑यति त॒त्त्येनी॑ शल॒ली भ॑वति लो॒हः क्षु॒रस्तेन॑ परिवर्तयते तल्ल॒क्ष्णया चै॒वैन॑मेत॒त्त्रय्या॑ च वि॒द्यया॒ परि॑गृह्णाति ॥७॥ स य॒द्वैश्वदेवेन यज॑ते । अ॒ग्निरेव तर्हि॑ भवत्य॒ग्नेरेव सायु॑ज्यꣳ स- लो॒कतां जयत्यथ यद्वरुणप्रघासैर्यज॑ते वरु॑ण एव॒ तर्हि॑ भवति वरु॑णस्यैव॒ सायु॑ज्यꣳ सलो॒कतां जयत्यथ यत्साकमेधैर्यज॑तऽइ॒न्द्र एव॒ तर्हि॑ भवतीन्द्र॑स्यैव सायु॑ज्यꣳ स- लो॒कतां जयति ॥८॥ स य॒स्मिन्नृ॒ता॑वमुं लो॒कमे॑ति । स॒ एनमृतुः पु॒रस्मा॒ऽऋत- वे॒ प्रय॑च्छति प॒र उ॑ पुरस्मा॒ऽऋत॑वे॒ प्रय॑च्छति स॒ पर॑मेव स्था॒नं प॑र॒मां ग॑तिं गच्छति चातुर्मास्ययाजी तद्वा॒ऽअ॒न्नं चातुर्मास्ययाजिनमनुविन्दन्ति पर॒मꣳ ह्येव खलु स स्था- नं पर॒मां ग॑तिं ग॒च्छतीति॑ ॥ १॥ ब्राह्मणम् ॥५[६.४.]॥ पञ्चमः प्रपाठकः ॥ क- ण्डिकासंख्या १०४ ॥ षष्ठोऽध्यायः [१५.] ॥ अस्मिन्काण्डे कण्डिकासंख्या ५४१ ॥ ॥ इति माध्यन्दिनीये शतपथब्राह्मणे एकपादिकानाम द्वितीयं काण्डं समाप्तम् ॥२॥
कां० २, अ० ६, ब्रा० ४, कं० ६-६ शतपथब्राह्मण / ३२५ महीनों को जीतता है। तब भी त्र्येनी शलली और तांबे का क्षुरा काम में आता है। उसी से सिर मुंडवाता है। इस प्रकार ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से उसको घेरता है ॥६॥ जब वह साकमेध यज्ञ करता है तो इन्द्र राजा और इन्द्र नेता की सहायता से शेष चार मासों को जीतता है। तब भी त्र्येनी शलली और तांबे के क्षुरे से मुण्डन होता है और ब्रह्म तथा तीन विद्याओं की सहायता से उसको घेरता है ॥७॥ जब वह वैश्वदेव यज्ञ करता है तो अग्नि ही हो जाता है और अग्नि के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है। जब वह वरुण-प्रघास यज्ञ करता है तो वरुण हो जाता है और वरुण के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है। जब वह साकमेध यज्ञ करता है तो इन्द्र हो जाता है और इन्द्र के ही सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है ॥८॥ वह जिस ऋतु में परलोक को जाता है वह ऋतु उसको दूसरे ऋतु के हवाले करता है, और वह अपने से आगेवाले ऋतु के हवाले करता है। जो चातुर्मास्य यज्ञ करता है वह परम धाम और परम गति को प्राप्त होता है, इसीलिए कहा है कि चातुर्मास्य यज्ञ करनेवाले को कोई नहीं पाते क्योंकि वह परम धाम और परम गति को प्राप्त हो जाता है ॥६॥ माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण की श्रीमत् पण्डित गंगाप्रसाद उपाध्याय कृत 'रत्नकुमारी-दीपिका' भाषा व्याख्या का एकपादिकानाम द्वितीय काण्ड समाप्त हुआ। द्वितीय—काण्ड प्रपाठक कण्डिका-संख्या प्रथम [२. २. २] ११४ द्वितीय [२. ३. २] १०३ तृतीय [२. ४. ३] ११३ चतुर्थ [२. ५. ३] ११५ पञ्चम [२. ६. ४] १०४ योग ५४६ पूर्व के काण्ड का ८३८ पूर्णयोग १३८७
०३-तृतीय काण्ड-०३
ओम्॒ । देव॒यज॑नं जोषयन्ते । स यद्दे॒व व॑र्षिष्ठꣳ स्यात्तज्जो॑षयेरन्यदन्यद्गु॒र्मेना॑- भिशयी॒तातो॒ वै दे॒वा दि॒वमुपोद॑क्रामन्दे॒वान्वा॒ऽए॒ष उ॒पोत्क्रा॑मति॒ यो दी॒क्षते॑ स तद्दे॒वे दे॑वयज॒ने यजते॒ स य॒द्वान्यद्गु॒र्मेर॑भिशयी॒तावत॑र-इव हे॒ष्ठा स्यात्तस्मा॒द्यद्दे॒व व॑र्षिष्ठꣳ स्यात्तज्जो॑षयेरन् ॥ १ ॥ तद्व॑र्ष्म स॒त्समꣳ॑ स्यात् । समꣳ॑ सद्द्विविभ्रꣳ॑शि स्या- द्विविभ्रꣳ॑शि सत्प्राक्प्रवणꣳ स्यात्प्राची॒ हि दे॒वानां॑ दिगथो॒ऽउद॑क्प्रवणमुदीची॒ हि मनु॒ष्याणां॑ दिग्दक्षि॒णतः॑ प्रत्युच्छ्रितमिव स्यादे॒षा वै दिक् पि॒तॄणाꣳ॑ स यद्दक्षि॒णा- प्रवणꣳ॑ स्यात्क्षि॒प्रे ह॒ यज॑मानो॒ऽमुं लो॒कमि॑यात्तथो ह॒ यज॑मानो ज्योग्जीवति त- स्माद्दक्षिणतः॑ प्रत्युच्छ्रितमिव स्यात् ॥ २ ॥ न॒ पुर॒स्ताद्दे॑वयजनमात्रम॒भ्यति॑रिच्येत । द्वि- षन्तꣳ॑ हास्य तद्भा॒तृव्य॑मभ्यतिरिच्यते कामꣳ॑ ह दक्षिणतः॑ स्यादे॒वमु॒त्तरत॑ एतद्व॒ ह्येव समृ॑द्धं देवयज॒नं यस्य॑ देवयज॑नमात्रं पश्चात्परिशिष्यते॑ क्षि॒प्रे ह्यैवे॑नमुत्त॒रा दे॒- वय॒ज्योप॒नमती॑ति नु देवय॒जनस्य॑ ॥ ३ ॥ तदु॑ होवाच याज्ञवल्क्यः॑ । वार्ष्याय॑ दे॒- वयज॑नं जो॒षयि॒तुम॑मै॒ तत्सात्यय॒ज्ञोऽब्र॑वीत्स॒र्वा वाऽइ॒यं पृ॑थि॒वी दे॒वी दे॑वयज॒नं यत्र॒ वाऽअ॒स्यै क्व॑ च य॒ज्ञेष्वे॑ परि॒गृह्य॑ या॒जये॒दिति॑ ॥ ४ ॥ ऋ॒त्विजो ह्यै॒व दे॑वयज॒- नं । ये ब्रा॑ह्म॒णाः शु॑श्रु॒वाꣳसो॑ऽनूचा॒ना वि॒द्वाꣳसो॑ या॒जय॑न्ति सैवाङ्कलेनैनेदिष्ठ॒- मामिव॒ मन्वामह॒ऽइति॑ ॥ ५ ॥ तच्छा॒लो वा विमि॑तं वा प्राची॒नवꣳ॑शं मिन्वन्ति । प्राची॒ हि दे॒वानां॒ दिक्पु॒रस्ता॒द्धि दे॒वाः प्रत्य॑ञ्चो मनु॒ष्यानु॒पावृ॑त्ता॒स्तस्मा॒त्तिष्ठ॑न्तः प्रा- ङ्तिष्ठ॑ञ्जुहोति ॥ ६ ॥ तस्मा॒द्दु ह॒ न प्रती॒चीन॑शिराः शयीत । नेद्दे॒वानभिप्र॒सार्य॑ श- या॒ऽइति॑ या दक्षि॑णा॒ दिक् सा पि॒तॄणां॒ या प्रती॑ची॒ सा स॒र्पाणां॒ यतो दे॒वा उच्च॑- ३२६
कां० ३, अ० १, ब्रा० १, कं० १-७ शतपथब्राह्मण / ३२७ तृतीय काण्ड अथाध्वर नाम तृतीयं काण्डम् [सोमयागो दीक्षाभिषवान्तः] अध्याय १-ब्राह्मण १ वे यज्ञ का स्थान तलाश करते हैं। जो सबसे ऊँचा स्थान हो उसे तलाश करें, जिससे ऊपर और कोई भूमि न हो। ऐसे ही स्थान से देवों ने द्यौलोक को प्राप्त किया था। जो दीक्ष लेता है वह देवों को प्राप्त होता है। वह देव-युक्त स्थान में यज्ञ करता है। यदि उससे अन्य भूमि ऊँची होगी तो वह यज्ञ करने में नीचा हो जायगा। इसलिए उनको ऐसा स्थान तलाश करना चाहिए जो सबसे ऊँचा हो ॥१॥ वह ऊँचा स्थान चौरस होना चाहिए, चौरस के साथ-साथ स्थिर हो। स्थिर के साथ- साथ पूर्व की ओर कुछ झुका हुआ हो, क्योंकि पूर्व देवों की दिशा है। या उत्तर की ओर झुका हुआ हो क्योंकि उत्तर मनुष्यों की दिशा है। वह दक्षिण की ओर कुछ उठा हुआ हो क्योंकि यह पितरों की दिशा है। यदि दक्षिण की ओर झुका हुआ होगा तो यजमान शीघ्र ही उस लोक को चला जायगा। परन्तु इस प्रकार यजमान दीर्घजीवी होता है। इसलिए यह दक्षिण की ओर उठा हुआ होना चाहिए ॥२॥ यज्ञ का स्थान पूर्व की ओर अधिक चौड़ा न हो। यदि अधिक होगा तो अहितकारी शत्रु के अनुकूल होगा। इसलिए दक्षिण में भी इतना ही हो और उत्तर में भी इतना ही। वह यज्ञ- स्थान अच्छा होता है जो पश्चिम में अधिक होता है, क्योंकि उसके लिए देवों की पूजा प्राप्त हो जाती है। इतना यज्ञ के स्थान के विषय में हुआ ॥३॥ अब याज्ञवल्क्य का कहना है—'हम वार्ष्ण्य के लिए यज्ञ का स्थान तलाश करने लगे।' सात्ययज्ञ बोला—'यह सब पृथिवी देवी यज्ञ का स्थान है। इसमें से जितने भाग को यजुः के द्वारा घेरकर यज्ञ करो वही यज्ञ-स्थान है ॥४॥ ऋत्विज ही यज्ञ का स्थान (देव-यजन) हैं। जो वेदपाठी विद्वान् ब्राह्मण जहाँ यज्ञ करते हैं वहाँ कोई त्रुटि नहीं होती। उसको हम (देवों से) निकटतम मानते हैं ॥५॥ वहाँ वे एक दालान या मकान बनाते हैं जो प्राचीन वंश हो (अर्थात् जिसकी धन्नियां पश्चिम से पूर्व को जाती हों)। पूर्व देवों की दिशा है। देव पूर्व से पश्चिम को चलकर ही मनुष्यों तक पहुँचते हैं। इसीलिए पूर्व की ओर मुँह करके खड़े होकर आहुतियाँ दी जाती हैं ॥६॥ इसीलिए पश्चिम की ओर सिर करके न सोना चाहिए, क्योंकि देवों की ओर टाँगें करके सोवेगा। दक्षिण दिशा पितरों की है। पश्चिम दिशा साँपों की है। अहीन (जो हीन न हो अर्थात्
अध्याय-१, ब्राह्मण-२
३२८ शतपथ ब्राह्मण क्रमः सैषा॑ङ्गीना योदी॑ची दिङ् सा मनु॒ष्याणां॒ तस्मान्मानुष॒ऽउदी॑चीनवꣲशामेव शालां वा विमितं वा मिन्वन्त्युदीची हि मनुष्याणां दिग्दीक्षितस्यैव प्राचीनवꣲ- शा नादीक्षितस्य ॥७॥ तां वाऽए॒तां परि॑श्रयन्ति । नेद॒भिर्व्वर्षा॒दिति॑ न्वेव वर्षा देवान्वाऽए॒ष उपा॒वर्त्तते यो दी॑क्षते स दे॒वतानामेको भवति तिर॒ऽइव वै देवा॒ मनु॒ष्येभ्यस्तिर॒ऽइवैतद्यात्परिश्रितं तस्मात्परिश्रयन्ति ॥८॥ तन्न सर्व्व-इवाभिप्रपद्येत । ब्राह्मणो॒ वैव राजन्यो वा वैश्यो वा ते हि यज्ञियाः ॥९॥ स वै न सर्व्वेणेव संव॑देत । दे॒वान्वाऽए॒ष उपावर्त्तते यो दीक्षते स दे॒वतानामेको भवति न वै दे- वाः सर्व्वेणेव संवदन्ते ब्राह्मणेन वैव राजन्येन वा वैश्येन वा ते हि यज्ञियास्त- स्माद्यद्ये॒नꣳ शूद्रेण संवा॒दो विन्दे॑दैतेषामेवै॒कं ब्रूयादिममिति विचक्ष्ममिति वि- चक्ष्वैत्येष उ तत्र दीक्षितस्योपचारः ॥१०॥ अथारणी पाणौ कृत्वा । शालामध्य- वस्यति स पूर्व्वार्द्ध्यꣳ स्थूणाराममभिपद्येतꣵजुराहेदमगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्र देवा॑सो॒ऽअजुषन्त विश्वे॒ऽइति॒ तदस्य विश्वे॑श्च दे॒वैर्जुष्टं भवति॒ ये चेमे ब्राह्मणाः शुश्रुवाꣵसो॒ऽनूचाना यद॒ह्नास्य ते॒ऽग्निभिर्याम॒ीजते॒ ब्राह्मणाः शुश्रुवाꣵसस्तद॒ह्नास्य तैर्जुष्टं भवति ॥११॥ यद्वाह । यत्र देवासो॒ऽअजुषन्त विश्वे॒ऽइति॒ तदस्य॒ विश्वैर्दे- वैर्जुष्टं भवत्यृक्सामार्भ्याꣳ संतरन्तो यजुर्भिरित्यृक्सामार्भ्यां वै यजुर्भैर्यज्ञस्योदृचं गच्छन्ति यज्ञस्योदृचं गछानीत्येवैतदाह रायस्पोषेण समिषा मदेमेति भूमा वै रा- यस्पोषः श्रियै॒ भूमाशिषमेवैतदाशास्ते समिषा॒ मदे॑मेतीषं मदतीति वै तमाहुर्यः श्रियमश्नुते यः परमतां गच्छति तस्मादाह समिषा मदेमेति ॥१२॥ ब्राह्मणम् १॥ ॥ अपराह्ने दीक्षेत । पुरा केशनश्मश्रुर्व्वपनाद्यात्कामयेत तदश्नीयाद्यद्वा सम्पद्येत व्रतं ह्येवास्यातो॒ऽशनं भवति यद्यु नाशि॑शिषे॒दपि कामं नाश्नीयात् ॥ १ ॥ ॥ श- तं १४०० ॥ ॥ अथोत्तरेण शालां परिश्रयन्ति । तदुदकुम्भमुपनिदधति तन्नापित उपतिष्ठते तत्केशश्मश्रु च वपते नखानि च निकृन्तते॒ऽस्ति वै पुरुषस्यामेध्यं य-
कां० ३, अ० १, ब्रा० १-२, कं० ७-१२ व १-२ शतपथब्राह्मण / ३२६ ठीक) दिशा वह है जहां से देव चढ़े थे। उत्तर की दिशा मनुष्यों की है। इसीलिए मनुष्यों के मकान या दालान उदीचीन वंश (अर्थात् दक्षिण से उत्तर की ओर जानेवाली धन्नियों के) होते हैं क्योंकि उत्तर मनुष्यों की दिशा है। केवल दीक्षित के लिए प्राचीन वंश मकान होवे; अदीक्षित के लिए नहीं ॥७॥ उसको घेर देते हैं कि कहीं वर्षा न हो। कम-से-कम वर्षा में (तो यह होना ही चाहिए)। जो दीक्षा लेता है वह देवों के निकट आ जाता है, वह देवों में से एक हो जाता है। देव मनुष्यों से छिपे हुए होते हैं। जो घिरा होता है वह भी छिपा हुआ होता है। इसलिए उसे घेर लेते हैं ॥८॥ इसमें सब कोई न घुसे; केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य ही। क्योंकि यही यज्ञ के अधिकारी हैं ॥६॥ वह सबसे बात न करे। जो दीक्षा लेता है वह देवों के समीप हो जाता है, वह देवताओं में से एक हो जाता है। देवता सबसे नहीं बोलते; केवल ब्राह्मण से, क्षत्रिय से और वैश्य से। क्योंकि यही यज्ञ के अधिकारी हैं। यदि शूद्र से बोलने की आवश्यकता पड़े तो (द्विजों से ही) एक को कहे- "इससे ऐसा कह दो ! इससे ऐसा कह दो।" दीक्षित पुरुष के लिए यही उपचार है ॥१०॥ अब दो अरणियों को हाथ में लेकर शाला को पसन्द करता है और पूर्व की ओर के विशेष आसन पर बैठकर यह यजुः पढ़ता है- "एदमगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्र देवासोऽअजुषन्त विश्वे" (यजु० ४।१)- "हम पृथिवी के उस यज्ञ-स्थान पर आये हैं जिसको सब देवताओं ने पसन्द किया।" इस प्रकार यह सब देवों तथा वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा पसन्द हो जाती है। और जिसको वेदपाठी ब्राह्मण आँखों से देख लेते हैं वह उनको पसन्द हो जाती है ॥११॥ और जब वह कहता है- 'यत्र देवासोऽअजुषन्त विश्वे' (जिसको सब देवों ने पसन्द किया) तो सब देवता उसकी खातिर उसको पसन्द कर लेते हैं। अब वह पढ़ता है- "ऋक् सामाभ्या॑ सन्तरन्तो यजुर्भिः" (यजु० ४।१) - "ऋक्, साम और यजुओं द्वारा तरते हुए।" ऋक् साम और यजुः द्वारा ही यज्ञ को पूरा करते हैं, इससे उसका तात्पर्य है कि मेरा यज्ञ पूर्णता को प्राप्त हो। अब कहता है- "रायस्पोषेण समिषा मदेम" (यजु० ४।१) - "धन और पुष्टि को पाकर आनन्द मनावें।" 'रायस्पोष' का अर्थ है 'बहुतायत' (भूमा)। बहुतायत ही 'श्री' है। इस प्रकार वह आशीर्वाद देता है। वह कहता है- 'समिषा मदेम' (इष अर्थात् ओज के साथ) क्योंकि जो कोई श्री वाला हो जाता है या बड़प्पन को प्राप्त होता है उसको लोग कहते हैं कि यह इष अर्थात् ओज को पाकर प्रसन्न हो रहा है। इसलिए कहा- 'समिषा मदेम' ॥१२॥ अध्याय १—ब्राह्मण २ अपराह्न अर्थात् दोपहर के बाद दीक्षा दे। केश और दाढ़ी मुंड़ाने से पहले जो मन चाहे या जो मिल सके उसे खा ले, क्योंकि इसके पीछे व्रत ही उसका भोजन होता है (अर्थात् दूध आदि) परन्तु यदि खाना न चाहे तो न खावे ॥१॥ [१४००] अब शाला के उत्तर में स्थान घेरते हैं। उसमें जल का एक घड़ा रखते हैं। इसके पास नाई बैठता है। अब (यजमान) बाल और दाढ़ी मुंडवाता है और नाखून कतरवाता है, क्योंकि पुरुष का वह भाग अमेध्य या अपवित्र समझा जाता है जहाँ पानी नहीं पहुँचता। उसके बाल,
त्रा॒य्या॒यौ नो॒पति॑ष्ठन्ते कॆशश्म॒श्रौ च॒ वाऽअ॑स्य नखॆ॑षु चापो॑ नो॒प॑तिष्ठन्ते तद्यत्कॆ- शश्मश्रु॑ च॒ वप॑ते नखा॑नि च॒ निकृ॒न्तते॑ मॆध्यो॑ भूत्वा दीक्षा॒ऽइति॑ ॥२॥ तद्धै॑के । सर्व॑ऽए॒व व॑पन्ते सर्व॑ऽए॒व मॆध्या॑ भूत्वा दी॑क्षिषामहा॒ऽइति॒ तदु॒ तथा॒ न कु॑र्याद्यद्धै कॆशश्म॒श्रु च॒ वप॑ते नखा॑नि च॒ निकृ॒न्तते तदे॑व मॆध्यो॑ भवति तस्मा॒त् कॆशश्मश्रु॑ चैव वपे॑त नखा॑नि च॒ निकृ॒न्तेत॑ ॥३॥ स वै नखा॑न्ये॒वाग्रे॑ निकृ॒न्तते । दक्षि॑णा- स्यैवाग्रे॑ स॒व्यस्य॒ वाऽअग्रॆ॒ मानु॑षेऽथै॒वं दॆव॒त्राङ्गुष्ठयो॑रे॒वाग्रे॑ कनि॒ष्ठिकयो॑र्वा॒ऽअग्रॆ॒ मानु॑षेऽथै॒वं दॆव॒त्रा ॥४॥ स दक्षि॑णमेवाग्रे॑ गोदा॒नं वि॑तारयति । सव्यं॒ वाऽअग्रॆ॒ मानु॑षेऽथै॒वं दॆव॒त्रा ॥५॥ स दक्षि॑णमेवाग्रे॑ गोदान॒मभ्यु॑नत्ति । इ॒मा आपः॒ शुमु॑ मे सन्तु दॆवी॒रिति॒ स यदा॑हेमा॒ आपः॒ शुमु॑ मे सन्तु दॆवी॒रिति॒ वज्रो॒ वाऽआपो॒ वज्रो हि वाऽआप॒स्तस्मा॒द्यने॑ता य॒न्ति नि॒घ्नं कुर्व॑न्ति यत्रो॑प॒तिष्ठ॑न्ते निर्द॒हन्ति॒ तद्यदॆत॑मॆ- वैतद्वज्र॑ꣳ शमयति॒ तथो॒ ह्यैनमेष वज्रः॑ शान्तो॒ न हि॑नस्ति तस्मादाहेमा॒ आपः॒ शु- मु मे सन्तु देवी॒रिति॑ ॥६॥ अथ दर्भतरु॒णकम॒न्तर्द॑धाति । ओष॑धे त्राय॑स्वेति॒ वज्रो वै क्षु॒रस्तथो॒ ह्यैनमेष वज्रः॑ क्षु॒रो न हि॑नस्त्यथ क्षु॒रेणा॒भिनि॒दधा॑ति स्वधि॑ते मैनꣳ हिꣳसी॒रिति॒ वज्रो॒ वै क्षु॒रस्तथो॒ ह्यैनमेष वज्रः॑ क्षु॒रो न हि॑नस्ति ॥७॥ प्र॒क्ष्योद- पात्रे प्रास्य॑ति । तूष्णीमेवोत्त॑रं गोदान॒मभ्यु॑नत्ति तूष्णीं दर्भतरु॒णकम॒न्तर्द॑धाति तू- ष्णीं क्षु॒रेणा॒भिनि॑धाय प्र॒क्ष्योद॒पात्रे प्रास्य॑ति ॥८॥ अथ नापि॒ताय॒ क्षु॒रं प्रय॑च्छति । स केशश्म॒श्रु व॑पात स यदा॑ केशश्म॒श्रु वप॑ति ॥९॥ अथ स्नाति । अमेध्यो॒ वै पु- रुषो॒ यदनृ॑तं वद॑ति तेन पूतिरन्तरतो मेध्या वाऽआपो॑ मेध्यो भूत्वा दीक्षा॒ऽइति॑ प॒वित्रं॒ वाऽआपः॑ पवित्रपूतो दीक्षा॒ऽइति॒ तस्मा॒द्ध स्नाति॑ ॥१०॥ स॒ स्नाति॑ । आ- पो॑ऽअ॒स्मान्मा॒तरः॑ शुन्धयन्त्वित्यॆत॒दाह॒ शुन्धयन्त्विति घृ॒तेन॑ नो घृत॒प्वः॑ पुनन्त्विति तद्य॑त् सपूतं यं घृ॒तेनापुनं॒स्तस्मा॑दाह घृ॒तेन॑ नो घृत॒प्वः॑ पुनन्त्विति॒ विश्वꣳ॒ हि रि॒प्रं प्र॒वह॑न्ति देवी॒रिति॒ यद्वै॒ विश्वꣳ॒ सर्वं॒ तद्यद॒मेध्यꣳ॒ रि॒प्रं तत्सर्वं॒ क्स्माद॒मेध्यं॑ प्र॒व-
का० ३, अ० १, ब्रा० २, कं० २-११ शतपथब्राह्मण / ३३१ दाढ़ी और नाखूनों में जल नहीं पहुँच सकते । इसलिए बाल और दाढ़ी मुँडवाते हैं और नाखून कतरवाते हैं कि जिससे वह शुद्ध होकर दीक्षा ले ॥२॥ कुछ लोग सब बाल मुँडवा देते हैं जिससे सम्पूर्ण शुद्ध होकर दीक्षा लें । परन्तु ऐसा न करे, क्योंकि बाल और दाढ़ी मुँडवाने और नाखून कतरवाने से भी शुद्ध हो जाते हैं। इसलिए केश और दाढ़ी ही मुँड़वावे और नाखून कतरवा ले ॥३॥ पहले नाखून कतरवाता है । पहले दाहिने हाथ के । मनुष्यों में पहले बायें हाथ के नाखून कतरवाने का रिवाज है, परन्तु देवों में इस प्रकार (अर्थात् दाहिने हाथ के पहले कतरे जाते हैं) । पहले दोनों अँगूठों के । मनुष्यों में पहले कनिष्ठिका अँगुली के नाखून कतरने का रिवाज है, परन्तु देवों में इस प्रकार (अर्थात् पहले अँगूठों के नाखून काटना चाहिए) ॥४॥ पहले दाहिनी मूँछों में कंघी करता है। मनुष्यों में पहले बायें में की जाती है। देवों में इस प्रकार (अर्थात् पहले दाहिनी मूँछों में) ॥५॥ पहले वह दाहिनी मूँछों को भिगोता है यह मन्त्र पढ़कर - "इमा आपः शमु मे सन्तु देवीः” (यजु० ४।१) - "ये दिव्य जल मेरी शान्ति के लिए हों।" ऐसा वह क्यों कहता है कि ये दिव्य जल मेरी शान्ति के लिए हों ? जल वज्र हैं। वस्तुतः जल वज्र हैं। इसलिए ये जल जिधर को बहते हैं उधर को गड्ढा कर देते हैं, और जहाँ पहुँचते हैं वहाँ वे भस्म अर्थात् नष्ट कर देते हैं। इसलिए इस प्रकार वह वज्र को शान्त करता है। इस प्रकार शान्त हुआ वज्र उसको हानि नहीं पहुँचाता । इसीलिए कहा कि - 'ये दिव्य जल मेरी शान्ति के लिए हों' ॥४॥ अब दर्भ की बालों के साथ रखता है यह मन्त्र पढ़कर - "ओषधे त्रायस्व” (यजु० ४।१) - “हे ओषधि, तू रक्षा कर।" क्षुरा वज्र है। इस प्रकार यह क्षुरारूपी वज्र उसको नहीं हानि पहुँचाता । इसलिए वह क्षुरे को यह पढ़कर चलाता है - "स्वधिते मैनँ॒ हिंसीः" - "हे क्षुरे, इसको मत हानि पहुँचा।" क्योंकि क्षुरा वज्र है और इस प्रकार यह वज्ररूपी क्षुरा हानि नहीं पहुँचाता ॥७॥ काटकर पानी के पात्र में डालता है। बायीं तरफ के बालों को मौन होकर भिगोता है और मौन होकर ही उनपर दर्भ रखता है और मौन होकर ही क्षुरा चलाता है और बाल काट- कर जल के पात्र में छोड़ देता है ॥८॥ अब क्षुरा नाई को दे देता है। (नाई) बाल और दाढ़ी मूंडता है। जब केश और दाढ़ी मुँड जाते हैं - ॥६॥ तो स्नान करता है। पुरुष अपवित्र है क्योंकि झूठ बोलता है। इसलिए उसका भीतरी अंश अपवित्र है। जल पवित्र है। 'पवित्र होकर दीक्षा लूँ।' जल पवित्र है। 'पवित्र होकर दीक्षा लूँ' इसलिए स्नान करता है ॥१०॥ वह यह मन्त्र पढ़कर स्नान करता है - "आपोऽअस्मान् मातरः शुन्धयन्तु” (यजु० ४।२ या ऋ० १०।१७।१०) - "जल माताएँ हमको शुद्ध करें।" इससे तात्पर्य है कि वे शुद्ध करें। अब कहता है- “घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु” (ऋ० १०।७७।१० या यजु० ४।२) - "घी को पवित्र करनेवालें हमको घी से पवित्र करें।" जो घी से पवित्र होता है वह वस्तुतः पवित्र हो जाता है। इसलिए वह कहता है कि 'घी को पवित्र करनेवाले हमको घी से पवित्र करें।' "विश्वं॒ हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीः” (यजु० ४।२) - "ये दिव्य पदार्थ सब दोष को दूर कर देते हैं।" 'विश्व' का अर्थ है 'सब', 'रिप्र' का अर्थ है 'अमेध्य' या अपवित्र । वे उससे सब अपवित्र दोषों को दूर