शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
रुद्रसंहिता: द्वितीय (सती) खण्ड
रुद्रसंहिता, द्वितीय (सती) खण्ड
नारदजीके प्रश्न और ब्रह्माजीके द्वारा उनका उत्तर, सदाशिवसे त्रिदेवोंकी उत्पत्ति तथा ब्रह्माजीसे देवता आदिकी सृष्टिके पश्चात् एक नारी और एक पुरुषका प्राकट्य
नारदजी बोले—महाभाग! महाप्रभो! विधातः! आपके मुखारविन्दसे मंगलकारिणी शम्भुकथा सुनते-सुनते मेरा जी नहीं भर रहा है। अतः भगवान् शिवका सारा शुभ चरित्र मुझसे कहिये। सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मदेव! मैं सतीकी कीर्तिसे युक्त शिवका दिव्य चरित्र सुनना चाहता हूँ। शोभाशालिनी सती किस प्रकार दक्षपत्नीके गर्भसे उत्पन्न हुईं? महादेवजीने विवाहका विचार कैसे किया? पूर्वकालमें दक्षके प्रति रोष होनेके कारण सतीने अपने शरीरका त्याग कैसे किया? चेतनाकाशको प्राप्त होकर वे फिर हिमालयकी कन्या कैसे हुईं? पार्वतीने किस प्रकार उग्र तपस्या की और कैसे उनका विवाह हुआ? कामदेवका नाश करनेवाले भगवान् शंकरके आधे शरीरमें वे किस प्रकार स्थान पा सकीं? महामते! इन सब बातोंको आप विस्तारपूर्वक कहिये। आपके समान दूसरा कोई संशयका निवारण करनेवाला न है, न होगा।
ब्रह्माजीने कहा—मुने! देवी सती और भगवान् शिवका शुभ यश परम-पावन, दिव्य तथा गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय है। तुम वह सब मुझसे सुनो। पूर्वकालमें भगवान् शिव निर्गुण, निर्विकल्प,
१५८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
निराकार, शक्तिरहित, चिन्मय तथा सत् और असत्से विलक्षण स्वरूपमें प्रतिष्ठित थे। फिर वे ही प्रभु सगुण और शक्तिमान् होकर विशिष्ट रूप धारण करके स्थित हुए। उनके साथ भगवती उमा विराजमान थीं। विप्रवर! वे भगवान् शिव दिव्य आकृतिसे सुशोभित हो रहे थे। उनके मनमें कोई विकार नहीं था। वे अपने परात्पर स्वरूपमें प्रतिष्ठित थे। मुनिश्रेष्ठ! उनके बायें अंगसे भगवान् विष्णु, दायें अंगसे मैं ब्रह्मा और मध्य अंग अर्थात् हृदयसे रुद्रदेव प्रकट हुए। मैं ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हुआ, भगवान् विष्णु जगत्का पालन करने लगे और स्वयं रुद्रने संहारका कार्य सँभाला। इस प्रकार भगवान् सदाशिव स्वयं ही तीन रूप धारण करके स्थित हुए। उन्हींकी आराधना करके मुझ लोकपितामह ब्रह्माने देवता, असुर और मनुष्य आदि सम्पूर्ण जीवोंकी सृष्टि की। दक्ष आदि प्रजापतियों और देवशिरोमणियोंकी सृष्टि करके मैं बहुत प्रसन्न हुआ तथा अपनेको सबसे अधिक ऊँचा मानने लगा। मुने! जब मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, वसिष्ठ, नारद, दक्ष और भृगु—इन महान् प्रभावशाली मानसपुत्रोंको मैंने उत्पन्न किया, तब मेरे हृदयसे अत्यन्त मनोहर रूपवाली एक सुन्दरी नारी उत्पन्न हुई, जिसका नाम 'संध्या' था। वह दिनमें क्षीण हो जाती, परंतु सायंकालमें उसका रूप-सौन्दर्य खिल उठता था। वह मूर्तिमती सायं-संध्या ही थी और निरन्तर किसी मन्त्रका जप करती रहती थी। सुन्दर भौंहोंवाली वह नारी सौन्दर्यकी चरम सीमाको पहुँची हुई थी और मुनियोंके भी मनको मोहे लेती थी।
इसी तरह मेरे मनसे एक मनोहर पुरुष भी प्रकट हुआ, जो अत्यन्त अद्भुत था। उसके शरीरका मध्यभाग (कटिप्रदेश) पतला था। दाँतोंकी पंक्तियाँ बड़ी सुन्दर थीं। उसके अंगोंसे मतवाले हाथीकी-सी गन्ध प्रकट होती थी। नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान शोभा पाते थे। अंगोंमें केसर लगा था, जिसकी सुगन्ध नासिकाको तृप्त कर रही थी। उस पुरुषको देखकर दक्ष आदि मेरे सभी पुत्र अत्यन्त उत्सुक हो उठे। उनके मनमें विस्मय भर गया था। जगत्की सृष्टि करनेवाले मुझ जगदीश्वर ब्रह्माकी ओर देखकर उस पुरुषने विनयसे गर्दन झुका दी और मुझे प्रणाम करके कहा।
वह पुरुष बोला—ब्रह्मन्! मैं कौन-सा कार्य करूँगा? मेरे योग्य जो काम हो, उसमें मुझे लगाइये; क्योंकि विधाता! आज आप ही सबसे अधिक माननीय और योग्य पुरुष हैं। यह लोक आपसे ही शोभित हो रहा है।
ब्रह्माजीने कहा—भद्रपुरुष! तुम अपने इसी स्वरूपसे तथा फूलके बने हुए पाँच बाणोंसे स्त्रियों और पुरुषोंको मोहित करते हुए सृष्टिके सनातन कार्यको चलाओ। इस चराचर त्रिभुवनमें ये देवता आदि कोई भी जीव तुम्हारा तिरस्कार करनेमें समर्थ नहीं होंगे। तुम छिपे रूपसे प्राणियोंके हृदयमें प्रवेश करके सदा स्वयं उनके सुखका हेतु बनकर सृष्टिका सनातन कार्य चालू रखो। समस्त प्राणियोंका जो मन है, वह तुम्हारे पुष्पमय बाणका सदा अनायास ही अद्भुत लक्ष्य बन जायगा और तुम निरन्तर उन्हें मदमत्त किये रहोगे। यह मैंने तुम्हारा कर्म बताया है, जो सृष्टिका प्रवर्तक होगा और तुम्हारे ठीक-ठीक नाम क्या होंगे, इस बातको मेरे ये पुत्र बतायेंगे।
*रुद्रसंहिता * १५९
सुरश्रेष्ठ! ऐसा कहकर अपने पुत्रोंके लिये अपने कमलमय आसनपर चुपचाप मुखकी ओर दृष्टिपात करके मैं क्षणभरके बैठ गया। (अध्याय १-२) $\sim\sim\circ\sim\sim$
कामदेवके नामोंका निर्देश, उसका रतिके साथ विवाह तथा कुमारी संध्याका चरित्र—वसिष्ठ मुनिका चन्द्रभाग पर्वतपर उसको तपस्याकी विधि बताना
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! तदनन्तर मेरे अभिप्रायको जाननेवाले मरीचि आदि मेरे पुत्र सभी मुनियोंने उस पुरुषका उचित नाम रखा। दक्ष आदि प्रजापतियोंने उसका मुँह देखते ही परोक्षके भी सारे वृत्तान्त जानकर उसे रहनेके लिये स्थान और पत्नी प्रदान की। मेरे पुत्र मरीचि आदि द्विजोंने उस पुरुषके नाम निश्चित करके उससे यह युक्तियुक्त बात कही।
ऋषि बोले—तुम जन्म लेते ही हमारे मनको भी मथने लगे हो। इसलिये लोकमें ‘मन्मथ’ नामसे विख्यात होओगे। मनोभव! तीनों लोकोंमें तुम इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हो, तुम्हारे समान सुन्दर दूसरा कोई नहीं है; अतः कामरूप होनेके कारण तुम ‘काम’ नामसे भी विख्यात होओ। लोगोंको मदमत्त बना देनेके कारण तुम्हारा एक नाम ‘मदन’ होगा। तुम बड़े दर्पसे उत्पन्न हुए हो, इसलिये ‘दर्पक’ कहलाओगे और सदर्प होनेके कारण ही जगत्में ‘कंदर्प’ नामसे भी तुम्हारी ख्याति होगी। समस्त देवताओंका सम्मिलित बल-पराक्रम भी तुम्हारे समान नहीं होगा। अतः सभी स्थानोंपर तुम्हारा अधिकार होगा और तुम सर्वव्यापी होओगे। जो आदिप्रजापति हैं, वे ही ये पुरुषोंमें श्रेष्ठ दक्ष तुम्हारी इच्छाके अनुरूप पत्नी स्वयं देंगे। वह तुम्हारी कामिनी (तुमसे अनुराग रखनेवाली) होगी।
ब्रह्माजीने कहा—मुने! तदनन्तर मैं वहाँसे अदृश्य हो गया। इसके बाद दक्ष मेरी बातका स्मरण करके कंदर्पसे बोले—‘कामदेव! मेरे शरीरसे उत्पन्न हुई मेरी यह कन्या सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे सुशोभित है। इसे तुम अपनी पत्नी बनानेके लिये ग्रहण करो। यह गुणोंकी दृष्टिसे सर्वथा तुम्हारे योग्य है। महातेजस्वी मनोभव! यह सदा तुम्हारे साथ रहनेवाली और तुम्हारी
१६० * संक्षिप्त शिवपुराण *
रुचिके अनुसार चलनेवाली होगी। धर्मतः यह सदा तुम्हारे अधीन रहेगी।
ऐसा कहकर दक्षने अपने शरीरके पसीनेसे प्रकट हुई उस कन्याका नाम 'रति' रखकर उसे अपने आगे बैठाया और कंदर्पको संकल्पपूर्वक सौंप दिया। नारद! दक्षकी वह पुत्री रति बड़ी रमणीय और मुनियोंके मनको भी मोह लेनेवाली थी। उसके साथ विवाह करके कामदेवको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। अपनी रति नामक सुन्दरी स्त्रीको देखकर उसके हाव-भाव आदिसे अनुरंजित हो कामदेव मोहित हो गया। तात! उस समय बड़ा भारी उत्सव होने लगा, जो सबके सुखको बढ़ानेवाला था। प्रजापति दक्ष इस बातको सोचकर बड़े प्रसन्न थे कि मेरी पुत्री इस विवाहसे सुखी है। कामदेवको भी बड़ा सुख मिला। उसके सारे दुःख दूर हो गये। दक्षकन्या रति भी कामदेवको पाकर बहुत प्रसन्न हुई। जैसे संध्याकालमें मनोहारिणी विद्युन्मालाके साथ मेघ शोभा पाता है, उसी प्रकार रतिके साथ प्रिय वचन बोलनेवाला कामदेव बड़ी शोभा पा रहा था। इस प्रकार रतिके प्रति भारी मोहसे युक्त रतिपति कामदेवने उसे उसी तरह अपने हृदयके सिंहासनपर बिठाया, जैसे योगी पुरुष योगविद्याको हृदयमें धारण करता है। इसी प्रकार पूर्ण चन्द्रमुखी रति भी उस श्रेष्ठ पतिको पाकर उसी तरह सुशोभित हुई, जैसे श्रीहरिको पाकर पूर्णचन्द्रानना लक्ष्मी शोभा पाती हैं।
सूतजी कहते हैं—ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और भगवान् शंकरका स्मरण करके हर्षपूर्वक बोले—'महाभाग! विष्णुशिष्य! महामते! विधातः! आपने चन्द्रमौलि शिवकी यह अद्भुत लीला कही है। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि विवाहके पश्चात् जब कामदेव प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थानको चला गया, दक्ष भी अपने घरको पधारे तथा आप और आपके मानसपुत्र भी अपने-अपने धामको चले गये, तब पितरोंको उत्पन्न करनेवाली ब्रह्मकुमारी संध्या कहाँ गयी? उसने क्या किया और किस पुरुषके साथ उसका विवाह हुआ? संध्याका यह सब चरित्र विशेषरूपसे बताइये।
ब्रह्माजीने कहा—मुने! संध्याका वह सारा शुभ चरित्र सुनो, जिसे सुनकर समस्त कामिनियाँ सदाके लिये सती-साध्वी हो सकती हैं। वह संध्या, जो पहले मेरी मानस-पुत्री थी, तपस्या करके शरीरको त्यागकर
* रुद्रसंहिता *
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मुनिश्रेष्ठ मेधातिथिकी बुद्धिमती पुत्री होकर अरुन्धतीके नामसे विख्यात हुई। उत्तम व्रतका पालन करके उस देवीने ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरके कहनेसे श्रेष्ठ व्रतधारी महात्मा वसिष्ठको अपना पति चुना। वह सौम्य स्वरूपवाली देवी सबकी वन्दनीया और पूजनीया श्रेष्ठ पतिव्रताके रूपमें विख्यात हुई।
नारदजीने पूछा—भगवन्! संध्याने कैसे, किसलिये और कहाँ तप किया? किस प्रकार शरीर त्यागकर वह मेधातिथिकी पुत्री हुई? ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों देवताओंके बताये हुए श्रेष्ठ व्रतधारी महात्मा वसिष्ठको उसने किस तरह अपना पति बनाया? पितामह! यह सब मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। अरुन्धतीके इस कौतूहलपूर्ण चरित्रका आप यथार्थ-रूपसे वर्णन कीजिये।
ब्रह्माजीने कहा—मुने! संध्याके मनमें एक बार सकामभाव आ गया था, इसलिये उस साध्वीने यह निश्चय किया कि 'वैदिकमार्गके अनुसार मैं अग्निमें अपने इस शरीरकी आहुति दे दूँगी। आजसे इस भूतलपर कोई भी देहधारी उत्पन्न होते ही कामभावसे युक्त न हों, इसके लिये मैं कठोर तपस्या करके मर्यादा स्थापित करूँगी (तरुणावस्थासे पूर्व किसीपर भी कामका प्रभाव नहीं पड़ेगा, ऐसी सीमा निर्धारित करूँगी)। इसके बाद इस जीवनको त्याग दूँगी।'
मन-ही-मन ऐसा विचार करके संध्या चन्द्रभाग नामक उस श्रेष्ठ पर्वतपर चली गयी, जहाँसे चन्द्रभागा नदीका प्रादुर्भाव हुआ है। मनमें तपस्याका दृढ़ निश्चय ले संध्याको श्रेष्ठ पर्वतपर गयी हुई जान मैंने अपने समीप बैठे हुए वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान्, सर्वज्ञ, जितात्मा एवं ज्ञानयोगी पुत्र वसिष्ठसे कहा—'बेटा वसिष्ठ! मनस्विनी संध्या तपस्याकी अभिलाषासे चन्द्रभाग नामक पर्वतपर गयी है। तुम जाओ और उसे विधिपूर्वक दीक्षा दो। तात! वह तपस्याके भावको नहीं जानती है। इसलिये जिस तरह तुम्हारे यथोचित उपदेशसे उसे अभीष्ट लक्ष्यकी प्राप्ति हो सके, वैसा प्रयत्न करो।'
नारद! मैंने दयापूर्वक जब वसिष्ठको इस प्रकार आज्ञा दी, तब वे 'जो आज्ञा' कहकर एक तेजस्वी ब्रह्मचारीके रूपमें संध्याके पास गये। चन्द्रभाग पर्वतपर एक देवसरोवर है, जो जलाशयोचित गुणोंसे परिपूर्ण हो मानसरोवरके समान शोभा पाता है। वसिष्ठने उस सरोवरको देखा और उसके तटपर बैठी हुई संध्यापर भी दृष्टिपात किया। कमलोंसे प्रकाशित होनेवाला वह सरोवर
789 संक्षिप्त शिवपुराण—6 A
१६२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
तटपर बैठी हुई संध्यासे उपलक्षित हो उसी तरह सुशोभित हो रहा था, जैसे प्रदोषकालमें उदित हुए चन्द्रमा और नक्षत्रोंसे युक्त आकाश शोभा पाता है। सुन्दर भाववाली संध्याको वहाँ बैठी देख मुनिने कौतूहलपूर्वक उस बृहल्लोहित नामवाले सरोवरको अच्छी तरह देखा। उसी प्रकारभूत पर्वतके शिखरसे दक्षिण समुद्रकी ओर जाती हुई चन्द्रभागा नदीका भी उन्होंने दर्शन किया। जैसे गंगा हिमालयसे निकलकर समुद्रकी ओर जाती है, उसी प्रकार चन्द्रभागके पश्चिम शिखरका भेदन करके वह नदी समुद्रकी ओर जा रही थी। उस चन्द्रभाग पर्वतपर बृहल्लोहित सरोवरके किनारे बैठी हुई संध्याको देखकर वसिष्ठजीने आदरपूर्वक पूछा।
वसिष्ठजी बोले—भद्रे ! तुम इस निर्जन पर्वतपर किसलिये आयी हो? किसकी पुत्री हो और तुमने यहाँ क्या करनेका विचार किया है? मैं यह सब सुनना चाहता हूँ। यदि छिपानेयोग्य बात न हो तो बताओ।
महात्मा वसिष्ठकी यह बात सुनकर संध्याने उन महात्माकी ओर देखा। वे अपने तेजसे प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो ब्रह्मचर्य देह धारण करके आ गया हो। वे मस्तकपर जटा धारण किये बड़ी शोभा पा रहे थे। संध्याने उन तपोधनको आदरपूर्वक प्रणाम करके कहा।
संध्या बोली—ब्रह्मन्! मैं ब्रह्माजीकी पुत्री हूँ। मेरा नाम संध्या है और मैं तपस्या करनेके लिये इस निर्जन पर्वतपर आयी हूँ। यदि मुझे उपदेश देना आपको उचित जान पड़े तो आप मुझे तपस्याकी विधि बताइये। मैं यही करना चाहती हूँ। दूसरी कोई भी गोपनीय बात नहीं है। मैं तपस्याके भावको—उसके करनेके नियमको बिना जाने ही तपोवनमें आ गयी हूँ। इसलिये चिन्तासे सूखी जा रही हूँ और मेरा हृदय काँपता है।
संध्याकी बात सुनकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीने, जो स्वयं सारे कार्योंके ज्ञाता थे, उससे दूसरी कोई बात नहीं पूछी। वह मन-ही-मन तपस्याका निश्चय कर चुकी थी और उसके लिये अत्यन्त उद्यमशील थी। उस समय वसिष्ठने मनसे भक्तवत्सल भगवान् शंकरका स्मरण करके इस प्रकार कहा।
वसिष्ठजी बोले—शुभानने ! जो सबसे महान् और उत्कृष्ट तेज हैं, जो उत्तम और महान् तप हैं तथा जो सबके परमाराध्य परमात्मा हैं, उन भगवान् शम्भुको तुम हृदयमें धारण करो। जो अकेले ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके आदिकारण हैं, उन त्रिलोकीके आदिस्रष्टा, अद्वितीय पुरुषोत्तम शिवका भजन करो। आगे बताये जानेवाले मन्त्रसे देवेश्वर शम्भुकी आराधना करो। उससे तुम्हें सब कुछ मिल जायगा, इसमें संशय नहीं है। ‘ॐ नमः शंकराय ॐ’ इस मन्त्रका निरन्तर जप करते हुए मौन तपस्या आरम्भ करो और जो मैं नियम बताता हूँ, उन्हें सुनो। तुम्हें मौन रहकर ही स्नान करना होगा, मौनालम्बनपूर्वक ही महादेवजीकी पूजा करनी होगी। प्रथम दो बार छठे समयमें तुम केवल जलका पूर्ण आहार कर सकती हो। जब तीसरी बार छठा समय आये, तब केवल उपवास किया करो। इस तरह तपस्याकी समाप्तितक छठे कालमें
789 संक्षिप्त शिवपुराण—6 B
* रुद्रसंहिता * १६३
जलाहार एवं उपवासकी क्रिया होती रहेगी।
देवि! इस प्रकार की जानेवाली मौन
तपस्या ब्रह्मचर्यका फल देनेवाली तथा
सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली
होती है। यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय
नहीं है। अपने चित्तमें ऐसा शुभ उद्देश्य
लेकर इच्छानुसार शंकरजीका चिन्तन
करो, वे प्रसन्न होनेपर तुम्हें अवश्य ही
अभीष्ट फल प्रदान करेंगे।
इस तरह संध्याको तपस्या करनेकी
विधिका उपदेश दे मुनिवर वसिष्ठ
यथोचितरूपसे उससे विदा ले वहीं
अन्तर्धान हो गये।
(अध्याय ३–५)
संध्याकी तपस्या, उसके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति तथा उससे संतुष्ट हुए शिवका उसे अभीष्ट वर दे मेधातिथिके यज्ञमें भेजना
ब्रह्माजी कहते हैं—मेरे पुत्रोंमें श्रेष्ठ महाप्राज्ञ नारद! तपस्याके नियमका उपदेश दे जब वसिष्ठजी अपने घर चले गये, तब तपके उस विधानको समझकर संध्या मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। फिर तो वह सानन्द मनसे तपस्विनीके योग्य वेष बनाकर बृहल्लोहित सरोवरके तटपर ही तपस्या करने लगी। वसिष्ठजीने तपस्याके लिये जिस मन्त्रको साधन बताया था, उसीसे उत्तम भक्तिभावके साथ वह भगवान् शंकरकी आराधना करने लगी। उसने भगवान् शिवमें अपने चित्तको लगा दिया और एकाग्र मनसे वह बड़ी भारी तपस्या करने लगी। उस तपस्यामें लगे हुए उसके चार युग व्यतीत हो गये। तब भगवान् शिव उसकी तपस्यासे संतुष्ट हो बड़े प्रसन्न हुए तथा बाहर-भीतर और आकाशमें अपने स्वरूपका दर्शन कराकर जिस रूपका वह चिन्तन करती थी, उसी रूपसे उसकी आँखोंके सामने प्रकट हो गये। उसने मनसे जिनका चिन्तन किया था, उन्हीं प्रभु शंकरको अपने सामने खड़ा देख वह अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गयी। भगवान्का मुखारविन्द बड़ा प्रसन्न दिखायी देता था। उनके स्वरूपसे शान्ति बरस रही थी। वह सहसा भयभीत हो सोचने लगी कि ‘मैं भगवान् हरसे क्या कहूँ? किस तरह इनकी स्तुति करूँ?’ इसी चिन्तामें पड़कर उसने अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये। नेत्र बंद कर लेनेपर भगवान् शिवने उसके हृदयमें प्रवेश करके
789 संक्षिप्त शिवपुराण—6 C
१६४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
उसे दिव्य ज्ञान दिया, दिव्य वाणी और दिव्य दृष्टि प्रदान की। जब उसे दिव्य ज्ञान, दिव्य दृष्टि और दिव्य वाणी प्राप्त हो गयी, तब वह कठिनाईसे ज्ञात होनेवाले जगदीश्वर शिवको प्रत्यक्ष देखकर उनकी स्तुति करने लगी।
संध्या बोली—जो निराकार और परम ज्ञानगम्य हैं, जो न तो स्थूल हैं, न सूक्ष्म हैं और न उच्च ही हैं तथा जिनके स्वरूपका योगीजन अपने हृदयके भीतर चिन्तन करते हैं, उन्हीं लोकस्रष्टा आप भगवान् शिवको नमस्कार है। जिन्हें शर्व कहते हैं, जो शान्तस्वरूप, निर्मल, निर्विकार और ज्ञानगम्य हैं, जो अपने ही प्रकाशमें स्थित हो प्रकाशित होते हैं, जिनमें विकारका अत्यन्त अभाव है, जो आकाशमार्गकी भाँति निर्गुण, निराकार बताये गये हैं तथा जिनका रूप अज्ञानान्धकारमार्गसे सर्वथा परे है, उन नित्यप्रसन्न आप भगवान् शिवको मैं प्रणाम करती हूँ। जिनका रूप एक (अद्वितीय), शुद्ध, बिना मायाके प्रकाशमान, सच्चिदानन्द-मय, सहज निर्विकार, नित्यानन्दमय, सत्य, ऐश्वर्यसे युक्त, प्रसन्न तथा लक्ष्मीको देनेवाला है, उन आप भगवान् शिवको नमस्कार है। जिनके स्वरूपकी ज्ञानरूपसे ही उद्भावना की जा सकती है, जो इस जगत्से सर्वथा भिन्न है एवं सत्त्वप्रधान, ध्यानके योग्य, आत्मस्वरूप, सारभूत, सबको पार लगानेवाला तथा पवित्र वस्तुओंमें भी परम पवित्र है, उन आप महेश्वरको मेरा नमस्कार है। आपका जो स्वरूप शुद्ध, मनोहर, रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित तथा स्वच्छ कर्पूरके समान गौरवर्ण है, जिसने अपने हाथोंमें वर, अभय, शूल और मुण्ड धारण कर रखा है, उस दिव्य, चिन्मय, सगुण, साकार विग्रहसे सुशोभित आप योगयुक्त भगवान् शिवको नमस्कार है। आकाश, पृथ्वी, दिशाएँ, जल, तेज तथा काल—ये जिनके रूप हैं, उन आप परमेश्वरको नमस्कार है।*
प्रधान (प्रकृति) और पुरुष जिनके शरीररूपसे प्रकट हुए हैं अर्थात् वे दोनों जिनके शरीर हैं, इसीलिये जिनका यथार्थ रूप अव्यक्त (बुद्धि आदिसे परे) है, उन भगवान् शंकरको बारंबार नमस्कार है। जो ब्रह्मा होकर जगत्की सृष्टि करते हैं, जो विष्णु होकर संसारका पालन करते हैं तथा जो रुद्र होकर अन्तमें इस सृष्टिका संहार करेंगे, उन्हीं आप भगवान् सदाशिवको बारंबार नमस्कार है। जो कारणके भी कारण हैं, दिव्य अमृतरूप ज्ञान तथा अणिमा आदि ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले हैं, समस्त लोकान्तरोंका वैभव देनेवाले हैं, स्वयं
* संध्योवाच—
निराकारं ज्ञानगम्यं परं यन्नैव स्थूलं नापि सूक्ष्मं न चोच्चम्। अन्तश्चिन्त्यं योगिभिस्तस्य रूपं तस्मै तुभ्यं लोककर्त्रे नमोऽस्तु॥
शर्वं शान्तं निर्मलं निर्विकारं ज्ञानगम्यं स्वप्रकाशेऽविकारम्। खाध्वप्रख्यं ध्वान्तमार्गात्परस्ताद् रूपं यस्य त्वां नमामि प्रसन्नम्॥
एकं शुद्धं दीप्यमानं विनाजां चिदानन्दं सहजं चाविकारि। नित्यानन्दं सत्यभूतिप्रसन्नं यस्य श्रीदं रूपमस्मै नमस्ते॥
विद्याकारोद्भावनीयं प्रभिन्नं सत्त्वच्छन्दं ध्येयमात्मस्वरूपम्। सारं पारं पावनानां पवित्रं तस्मै रूपं यस्य चैवं नमस्ते॥
यत्वाकारं शुद्धरूपं मनोज्ञं रत्नाकल्पं स्वच्छकर्पूरगौरम्। इष्टाभीती शूलमुण्डे दधानं हस्तैर्नमौ योगयुक्ताय तुभ्यम्॥
गगनं भूर्दिशश्चैव सलिलं ज्योतिरेव च। पुनः कालश्च रूपाणि यस्य तुभ्यं नमोऽस्तु ते॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ६। १२—१७)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—6 D
* रुद्रसंहिता * १६५
प्रकाशरूप हैं तथा प्रकृतिसे भी परे हैं, उन परमेश्वर शिवको नमस्कार है, नमस्कार है। यह जगत् जिनसे भिन्न नहीं कहा जाता, जिनके चरणोंसे पृथ्वी तथा अन्यान्य अंगोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ, सूर्य, चन्द्रमा, कामदेव एवं अन्य देवता प्रकट हुए हैं और जिनकी नाभिसे अन्तरिक्षका आविर्भाव हुआ है, उन्हीं आप भगवान् शम्भुको मेरा नमस्कार है। प्रभो! आप ही सबसे उत्कृष्ट परमात्मा हैं, आप ही नाना प्रकारकी विद्याएँ हैं, आप ही हर (संहारकर्ता) हैं, आप ही सद्ब्रह्म तथा परब्रह्म हैं, आप सदा विचारमें तत्पर रहते हैं। जिनका न आदि है, न मध्य है और न अन्त ही है, जिनसे सारा जगत् उत्पन्न हुआ है तथा जो मन और वाणीके विषय नहीं हैं, उन महादेवजीकी स्तुति मैं कैसे कर सकूँगी ?$^१$
ब्रह्मा आदि देवता तथा तपस्याके धनी मुनि भी जिनके रूपोंका वर्णन नहीं कर सकते, उन्हीं परमेश्वरका वर्णन अथवा स्तवन मैं कैसे कर सकती हूँ? प्रभो! आप निर्गुण हैं, मैं मूढ़ स्त्री आपके गुणोंको कैसे जान सकती हूँ? आपका रूप तो ऐसा है, जिसे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी नहीं जानते हैं। महेश्वर! आपको नमस्कार है। तपोमय! आपको नमस्कार है। देवेश्वर शम्भो! मुझपर प्रसन्न होइये। आपको बारंबार मेरा नमस्कार है।$^२$
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! संध्याका यह स्तुतिपूर्ण वचन सुनकर उसके द्वारा भलीभाँति प्रशंसित हुए भक्तवत्सल परमेश्वर शंकर बहुत प्रसन्न हुए। उसका शरीर वल्कल और मृगचर्मसे ढका हुआ था। मस्तकपर पवित्र जटाजूट शोभा पा रहा था। उस समय पालेके मारे हुए कमलके समान उसके कुम्हलाये हुए मुँहको देखकर भगवान् हर दयासे द्रवित हो उससे इस प्रकार बोले।
महेश्वरने कहा—भद्रे! मैं तुम्हारी इस उत्तम तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। शुद्ध बुद्धिवाली देवि! तुम्हारे इस स्तवनसे भी मुझे बड़ा संतोष प्राप्त हुआ है। अतः इस समय अपनी इच्छाके अनुसार कोई वर माँगो। जिस वरसे तुम्हें प्रयोजन हो तथा जो तुम्हारे मनमें हो, उसे मैं यहाँ अवश्य पूर्ण करूँगा। तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारे व्रत-नियमसे बहुत प्रसन्न हूँ।
१-प्रधानपुरुषौ यस्य कायत्वेन विनिर्गतौ। तस्मादव्यक्तरूपाय शङ्कराय नमो नमः॥
यो ब्रह्मा कुरुते सृष्टिं यो विष्णुः कुरुते स्थितिम्। संहरिष्यति यो रुद्रस्तस्मै तुभ्यं नमो नमः॥
नमो नमः कारणकारणाय दिव्यामृतज्ञानविभूतिदाय। समस्तलोकान्तरभूतिदाय प्रकाशरूपाय परात्पराय॥
यस्यापरं नो जगदुच्यते पदात् क्षितिर्दिशः सूर्य इन्दुर्मनोजः। बहिर्मुखा नाभितश्चान्तरिक्षं तस्मै तुभ्यं शम्भवे नमोऽस्तु॥
त्वं परः परमात्मा च त्वं विद्या विविधा हरः। सद्ब्रह्म च परं ब्रह्म विचारणपरायणः॥
यस्य नादिर्न मध्यं च नान्तमस्ति जगद्यतः। कथं स्तोष्यामि तं देवमवाङ्मनसगोचरम्॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ६। १८—२३)
२-यस्य ब्रह्मादयो देवा मुनयश्च तपोधनाः। न विवृण्वन्ति रूपाणि वर्णनीयः कथं स मे॥
स्त्रिया मया ते किं ज्ञेया निर्गुणस्य गुणाः प्रभो। नैव जानन्ति यद्रूपं सेन्द्रा अपि सुरासुराः॥
नमस्तुभ्यं महेशान नमस्तुभ्यं तपोमय। प्रसीद शम्भो देवेश भूयो भूयो नमोऽस्तु ते॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० ६। २४—२६)
१६६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
प्रसन्नचित्त महेश्वरका यह वचन सुनकर अत्यन्त हर्षसे भरी हुई संध्या उन्हें बारंबार प्रणाम करके बोली—महेश्वर! यदि आप मुझे प्रसन्नतापूर्वक वर देना चाहते हैं, यदि मैं वर पानेके योग्य हूँ; यदि पापसे शुद्ध हो गयी हूँ तथा देव! यदि इस समय आप मेरी तपस्यासे प्रसन्न हैं तो मेरा माँगा हुआ यह पहला वर सफल करें। देवेश्वर! इस आकाशमें पृथ्वी आदि किसी भी स्थानमें जो प्राणी हैं, वे सब-के-सब जन्म लेते ही कामभावसे युक्त न हो जायें। नाथ! मेरी सकाम दृष्टि कहीं न पड़े। मेरे जो पति हों, वे भी मेरे अत्यन्त सुहृद् हों। पतिके अतिरिक्त जो भी पुरुष मुझे सकामभावसे देखे, उसके पुरुषत्वका नाश हो जाय—वह तत्काल नपुंसक हो जाय।
निष्पाप संध्याका यह वचन सुनकर प्रसन्न हुए भक्तवत्सल भगवान् शंकरने कहा— देवि! संध्ये! सुनो। भद्रे! तुमने जो-जो वर माँगा है, वह सब तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट होकर मैंने दे दिया। प्राणियोंके जीवनमें मुख्यतः चार अवस्थाएँ होती हैं—पहली शैशवावस्था, दूसरी कौमारावस्था, तीसरी यौवनावस्था और चौथी वृद्धावस्था। तीसरी अवस्था प्राप्त होनेपर देहधारी जीव कामभावसे युक्त होंगे। कहीं-कहीं दूसरी अवस्थाके अन्तिम भागमें ही प्राणी सकाम हो जायँगे। तुम्हारी तपस्याके प्रभावसे मैंने जगत्में सकामभावके उदयकी यह मर्यादा स्थापित कर दी है, जिससे देहधारी जीव जन्म लेते ही कामासक्त न हो जायें। तुम भी इस लोकमें वैसे दिव्य सतीभावको प्राप्त करो, जैसा तीनों लोकोंमें दूसरी किसी स्त्रीके लिये सम्भव नहीं होगा। पाणिग्रहण करनेवाले पतिके सिवा जो कोई भी पुरुष सकाम होकर तुम्हारी ओर देखेगा, वह तत्काल नपुंसक होकर दुर्बलताको प्राप्त हो जायगा। तुम्हारे पति महान् तपस्वी तथा दिव्यरूपसे सम्पन्न एक महाभाग महर्षि होंगे, जो तुम्हारे साथ सात कल्पोंतक जीवित रहेंगे। तुमने मुझसे जो-जो वर माँगे थे, वे सब मैंने पूर्ण कर दिये। अब मैं तुमसे दूसरी बात कहूँगा, जो पूर्वजन्मसे सम्बन्ध रखती है। तुमने पहलेसे ही यह प्रतिज्ञा कर रखी है कि मैं अग्निमें अपने शरीरको त्याग दूँगी। उस प्रतिज्ञाको सफल करनेके लिये मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ। उसे निस्संदेह करो। मुनिवर मेधातिथिका एक यज्ञ चल रहा है, जो बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला है। उसमें अग्नि पूर्णतया प्रज्वलित है। तुम बिना विलम्ब किये उसी अग्निमें अपने शरीरका उत्सर्ग कर दो। इसी पर्वतकी उपत्यकामें चन्द्रभागा नदीके तटपर तापसाश्रममें मुनिवर मेधातिथि महायज्ञका अनुष्ठान करते हैं। तुम स्वच्छन्दतापूर्वक वहाँ जाओ। मुनि तुम्हें वहाँ देख नहीं सकेंगे। मेरी कृपासे तुम मुनिकी अग्निसे प्रकट हुई पुत्री होओगी। तुम्हारे मनमें जिस किसी स्वामीको प्राप्त करनेकी इच्छा हो, उसे हृदयमें धारणकर, उसीका चिन्तन करते हुए तुम अपने शरीरको उस यज्ञकी अग्निमें होम दो। संध्ये! जब तुम इस पर्वतपर चार युगोंतकके लिये कठोर तपस्या कर रही थी, उन्हीं दिनों उस चतुर्युगीका सत्ययुग बीत जानेपर त्रेताके प्रथम भागमें प्रजापति दक्षके बहुत-सी कन्याएँ हुईं। उन्होंने अपनी उन सुशीला कन्याओंका यथायोग्य वरोंके साथ विवाह कर दिया। उनमेंसे सत्ताईस कन्याओंका
* रुद्रसंहिता * १६७
विवाह उन्होंने चन्द्रमाके साथ किया। चन्द्रमा अन्य सब पत्नियोंको छोड़कर केवल रोहिणीसे प्रेम करने लगे। इसके कारण क्रोधसे भरे हुए दक्षने जब चन्द्रमाको शाप दे दिया, तब समस्त देवता तुम्हारे पास आये। परंतु संध्ये! तुम्हारा मन तो मुझमें लगा हुआ था, अतः तुमने ब्रह्माजीके साथ आये हुए उन देवताओंपर दृष्टिपात ही नहीं किया। तब ब्रह्माजीने आकाशकी ओर देखकर और चन्द्रमा पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त करें, यह उद्देश्य मनमें रखकर उन्हें शापसे छुड़ानेके लिये एक नदीकी सृष्टि की, जो चन्द्र या चन्द्रभागा नदीके नामसे विख्यात हुई। चन्द्रभागाके प्रादुर्भावकालमें ही महर्षि मेधातिथि यहाँ उपस्थित हुए थे। तपस्याके द्वारा उनकी समानता करनेवाला न तो कोई हुआ है, न है और न होगा ही। उन महर्षिने महान् विधि-विधानके साथ दीर्घकालतक चलनेवाले ज्योतिष्टोम नामक यज्ञका आरम्भ किया है। उसमें अग्निदेव पूर्णरूपसे प्रज्वलित हो रहे हैं। उसी आगमें तुम अपने शरीरको डाल दो और परम पवित्र हो जाओ। ऐसा करनेसे इस समय तुम्हारी वह प्रतिज्ञा पूर्ण हो जायगी।
इस प्रकार संध्याको उसके हितका उपदेश देकर देवेश्वर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये।
(अध्याय ६)
संध्याकी आत्माहुति, उसका अरुन्धतीके रूपमें अवतीर्ण होकर मुनिवर वसिष्ठके साथ विवाह करना, ब्रह्माजीका रुद्रके विवाहके लिये प्रयत्न और चिन्ता तथा भगवान् विष्णुका उन्हें 'शिवा' की आराधनाके लिये उपदेश देकर चिन्तामुक्त करना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! जब वर देकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये, तब संध्या भी उसी स्थानपर गयी, जहाँ मुनि मेधातिथि यज्ञ कर रहे थे। भगवान् शंकरकी कृपासे उसे किसीने वहाँ नहीं देखा। उसने उस तेजस्वी ब्रह्मचारीका स्मरण किया, जिसने उसके लिये तपस्याकी विधिका उपदेश दिया था। महामुने! पूर्वकालमें महर्षि वसिष्ठने मुझ परमेष्ठीकी आज्ञासे एक तेजस्वी ब्रह्मचारीका वेष धारण करके उसे तपस्या करनेके लिये उपयोगी नियमोंका उपदेश दिया था। संध्या अपनेको तपस्याका उपदेश देनेवाले उन्हीं ब्रह्मचारी ब्राह्मण वसिष्ठको पतिरूपसे मनमें रखकर उस महायज्ञमें प्रज्वलित अग्निके समीप गयी। उस समय भगवान् शंकरकी कृपासे मुनियोंने उसे नहीं देखा। ब्रह्माजीकी वह पुत्री बड़े हर्षके साथ उस अग्निमें प्रविष्ट हो गयी। उसका पुरोडाशमय* शरीर तत्काल दग्ध हो गया। उस पुरोडाशकी अलक्षित गन्ध सब ओर फैल गयी। अग्निने भगवान् शंकरकी
* यज्ञभाग।
१६८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
आज्ञासे उसके सुवर्ण-जैसे शरीरको जलाकर शुद्ध करके पुनः सूर्यमण्डलमें पहुँचा दिया। तब सूर्यने पितरों और देवताओं-की तृप्तिके लिये उसे दो भागोंमें विभक्त करके अपने रथमें स्थापित कर दिया।
मुनीश्वर! उसके शरीरका ऊपरी भाग प्रातःसंध्या हुआ, जो दिन और रातके बीचमें पड़नेवाली आदिसंध्या है तथा उसके शरीरका शेष भाग सायंसंध्या हुआ, जो दिन और रातके मध्यमें होनेवाली अन्तिम संध्या है! सायंसंध्या सदा ही पितरोंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाली होती है। सूर्योदयसे पहले जब अरुणोदय हो— प्राचीके क्षितिजमें लाली छा जाय, तब प्रातःसंध्या प्रकट होती है, जो देवताओंको प्रसन्न करनेवाली है। जब लाल कमलके समान सूर्य अस्त हो जाते हैं, उसी समय सदा सायंसंध्याका उदय होता है, जो पितरोंको आनन्द प्रदान करनेवाली है। परम दयालु भगवान् शिवने उसके मनसहित प्राणोंको दिव्य शरीरसे युक्त देहधारी बना दिया। जब मुनिके यज्ञकी समाप्तिका अवसर आया, तब वह अग्निकी ज्वालामें महर्षि मेधातिथिको तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली पुत्रीके रूपमें प्राप्त हुई। मुनिने बड़े आमोदके साथ उस समय उस पुत्रीको ग्रहण किया। मुने! उन्होंने यज्ञके लिये उसे नहलाकर अपनी गोदमें बिठा लिया। शिष्योंसे घिरे हुए महामुनि मेधातिथिको वहाँ बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। उन्होंने उसका नाम 'अरुन्धती' रखा। वह किसी भी कारणसे धर्मका अवरोध नहीं करती थी; अतः उसी गुणके कारण उसने स्वयं यह त्रिभुवन-विख्यात नाम प्राप्त किया। देवर्षे! यज्ञको समाप्त करके कृतकृत्य हो वे मुनि पुत्रीकी प्राप्ति होनेसे बहुत प्रसन्न थे और अपने शिष्योंके साथ आश्रममें रहकर सदा उसीका लालन-पालन करते थे। देवी अरुन्धती चन्द्रभागा नदीके तटपर तापसारण्यके भीतर मुनिवर मेधातिथिके उस आश्रममें धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। जब वह विवाहके योग्य हो गयी, तब मैंने, विष्णु तथा महेश्वरने मिलकर मुझ ब्रह्माके पुत्र वसिष्ठके साथ उसका विवाह करा दिया। ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशके हाथोंसे निकले हुए जलसे शिप्रा आदि सात परम पवित्र नदियाँ उत्पन्न हुईं।
मुने! मेधातिथिकी पुत्री महासाध्वी अरुन्धती समस्त पतिव्रताओंमें श्रेष्ठ थी, वह महर्षि वसिष्ठको पतिरूपमें पाकर उनके साथ बड़ी शोभा पाने लगी। उससे शक्ति
- रुद्रसंहिता * १६१
आदि शुभ एवं श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए। मुनिश्रेष्ठ! वह प्रियतम पति वसिष्ठको पाकर विशेष शोभा पाने लगी। मुनि- शिरोमणे! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष संध्याके पवित्र चरित्रका वर्णन किया है, जो समस्त कामनाओंके फलोंको देनेवाला, परम पावन और दिव्य है। जो स्त्री या शुभ व्रतका आचरण करनेवाला पुरुष इस प्रसंगको सुनता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।
प्रजापति ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर नारदजीका मन प्रसन्न हो गया और वे इस प्रकार बोले।
नारदजीने कहा—ब्रह्मन्! आपने अरुन्धतीकी तथा पूर्वजन्ममें उसकी स्वरूपभूता संध्याकी बड़ी उत्तम दिव्य कथा सुनायी है, जो शिवभक्तिकी वृद्धि करनेवाली है। धर्मज्ञ! अब आप भगवान् शिवके उस परम पवित्र चरित्रका वर्णन कीजिये, जो दूसरोंके पापोंका विनाश करनेवाला, उत्तम एवं मंगलदायक है। जब कामदेव रतिसे विवाह करके हर्षपूर्वक चला गया, दक्ष आदि अन्य मुनि भी जब अपने-अपने स्थानको पधारे और जब संध्या तपस्या करनेके लिये चली गयी, उसके बाद वहाँ क्या हुआ?
ब्रह्माजीने कहा—विप्रवर नारद! तुम धन्य हो, भगवान् शिवके सेवक हो; अतः शिवकी लीलासे युक्त जो उनका शुभ चरित्र है, उसे भक्तिपूर्वक सुनो। तात! पूर्वकालमें मैं एक बार जब मोहमें पड़ गया और भगवान् शंकरने मेरा उपहास किया, तब मुझे बड़ा क्षोभ हुआ था। वस्तुतः शिवकी मायाने मुझे मोह लिया था, इसलिये मैं भगवान् शिवके प्रति ईर्ष्या करने लगा। किस प्रकार, सो बताता हूँ; सुनो। मैं उस स्थानपर गया, जहाँ दक्षराज मुनि उपस्थित थे। वहीं रतिके साथ कामदेव भी था। नारद! उस समय मैंने बड़ी प्रसन्नताके साथ दक्ष तथा दूसरे पुत्रोंको सम्बोधित करके वार्तालाप आरम्भ किया। उस वार्तालापके समय मैं शिवकी मायासे पूर्णतया मोहित था; अतः मैंने कहा—'पुत्रो! तुम्हें ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे महादेवजी किसी कमनीय कान्तिवाली स्त्रीका पाणिग्रहण करें।' इसके बाद मैंने भगवान् शिवको मोहित करनेका भार रतिसहित कामदेवको सौंपा। कामदेवने मेरी आज्ञा मानकर कहा— 'प्रभो! सुन्दरी स्त्री ही मेरा अस्त्र है, अतः शिवजीको मोहित करनेके लिये किसी नारीकी सृष्टि कीजिये।' यह सुनकर मैं चिन्तामें पड़ गया और लंबी साँस खींचने लगा। मेरे उस निःश्वाससे राशि-राशि पुष्पोंसे विभूषित वसन्तका प्रादुर्भाव हुआ। वसन्त और मलयानल—ये दोनों मदनके सहायक हुए। इनके साथ जाकर कामदेवने वामदेवको मोहनेकी बारंबार चेष्टा की, परंतु उसे सफलता न मिली। जब वह निराश होकर लौट आया, तब उसकी बात सुनकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। उस समय मेरे मुखसे जो निःश्वास वायु चली, उससे मारगणोंकी उत्पत्ति हुई। उन्हें मदनकी सहायताके लिये आदेश देकर मैंने पुनः उन सबको शिवजीके पास भेजा, परंतु महान् प्रयत्न करनेपर भी वे भगवान् शिवको मोहमें न डाल सके। काम सपरिवार लौट
१७० * संक्षिप्त शिवपुराण *
आया और मुझे प्रणाम करके अपने स्थानको चला गया।
उसके चले जानेपर मैं मन-ही-मन सोचने लगा कि निर्विकार तथा मनको वशमें रखनेवाले योगपरायण भगवान् शंकर किसी स्त्रीको अपनी सहधर्मिणी बनाना कैसे स्वीकार करेंगे। यही सोचते-सोचते मैंने भक्तिभावसे उन भगवान् श्रीहरिका स्मरण किया, जो साक्षात् शिवस्वरूप तथा मेरे शरीरके जन्मदाता हैं। मैंने दीन वचनोंसे युक्त शुभ स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति की। उस स्तुतिको सुनकर भगवान् शीघ्र ही मेरे सामने प्रकट हो गये। उनके चार भुजाएँ शोभा पाती थीं। नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान सुन्दर थे। उन्होंने हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म ले रखे थे। उनके श्याम शरीरपर पीताम्बरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वे भगवान् श्रीहरि भक्त-प्रिय हैं— अपने भक्त उन्हें बहुत प्यारे हैं। सबके उत्तम शरणदाता उन श्रीहरिको उस रूपमें देखकर मेरे नेत्रोंसे प्रेमाश्रुओंकी धारा बह चली और मैं गद्गद कण्ठसे बारंबार उनकी स्तुति करने लगा। मेरे उस स्तोत्रको सुनकर अपने भक्तोंके दुःख दूर करनेवाले भगवान् विष्णु बहुत प्रसन्न हुए और शरणमें आये हुए मुझ ब्रह्मासे बोले—‘महाप्राज्ञ विधात:! लोकस्रष्टा ब्रह्मन्! तुम धन्य हो। बताओ, तुमने किसलिये आज मेरा स्मरण किया है और किस निमित्तसे यह स्तुति की जा रही है? तुमपर कौन-सा महान् दुःख आ पड़ा है? उसे मेरे सामने इस समय कहो। मैं वह सारा दुःख मिटा दूँगा। इस विषयमें कोई संदेह या अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।’
तब ब्रह्माजीने सारा प्रसंग सुनाकर कहा—‘केशव! यदि भगवान् शिव किसी तरह पत्नीको ग्रहण कर लें तो मैं सुखी हो जाऊँगा, मेरे अन्तःकरणका सारा दुःख दूर हो जायगा। इसीके लिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ।’
मेरी यह बात सुनकर भगवान् मधुसूदन हँस पड़े और मुझ लोकस्रष्टा ब्रह्माका हर्ष बढ़ाते हुए मुझसे शीघ्र ही यों बोले— “विधातः! तुम मेरा वचन सुनो। यह तुम्हारे भ्रमका निवारण करनेवाला है। मेरा वचन ही वेद-शास्त्र आदिका वास्तविक सिद्धान्त है। शिव ही सबके कर्ता-भर्ता (पालक) और हर्ता (संहारक) हैं। वे ही परात्पर हैं। परब्रह्म, परेश, निर्गुण, नित्य, अनिर्देश्य, निर्विकार, अद्वितीय, अच्युत, अनन्त, सबका अन्त करनेवाले, स्वामी और सर्वव्यापी परमात्मा एवं परमेश्वर हैं। सृष्टि, पालन और संहारके कर्ता, तीनों गुणोंको आश्रय देनेवाले, व्यापक, ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामसे प्रसिद्ध, रजोगुण, सत्त्वगुण तथा तमोगुणसे परे, मायासे ही भेदयुक्त प्रतीत होनेवाले, निरीह, मायारहित, मायाके स्वामी या प्रेरक, चतुर, सगुण, स्वतन्त्र, आत्मानन्दस्वरूप, निर्विकल्प, आत्माराम, निर्द्वन्द्व, भक्तपरवश, सुन्दर विग्रहसे सुशोभित योगी, नित्य योगपरायण, योग-मार्गदर्शक, गर्वहारी, लोकेश्वर और सदा दीनवत्सल हैं। तुम उन्हींकी शरणमें जाओ। सर्वात्मना शम्भुका भजन करो। इससे संतुष्ट होकर वे तुम्हारा कल्याण करेंगे। ब्रह्मन्! यदि तुम्हारे मनमें यह विचार हो कि शंकर पत्नीका पाणिग्रहण करें तो शिवाको प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे शिवका स्मरण करते हुए
* रुद्रसंहिता * १७१
उत्तम तपस्या करो। अपने उस मनोरथको हृदयमें रखते हुए देवी शिवाका ध्यान करो। वे देवेश्वरी यदि प्रसन्न हो जायँ तो सारा कार्य सिद्ध कर देंगी। यदि शिवा सगुणरूपसे अवतार ग्रहण करके लोकमें किसीकी पुत्री हो मानवशरीर ग्रहण करें तो वे निश्चय ही महादेवजीकी पत्नी हो सकती हैं। ब्रह्मन्! तुम दक्षको आज्ञा दो, वे भगवान् शिवके लिये पत्नीका उत्पादन करनेके निमित्त स्वतः भक्तिभावसे प्रयत्नपूर्वक तपस्या करें। तात! शिवा और शिव दोनोंको भक्तके अधीन जानना चाहिये। वे निर्गुण परब्रह्मस्वरूप होते हुए भी स्वेच्छासे सगुण हो जाते हैं।
'विधे! भगवान् शिवकी इच्छासे प्रकट हुए हम दोनोंने जब उनसे प्रार्थना की थी, तब पूर्वकालमें भगवान् शंकरने जो बात कही थी, उसे याद करो। ब्रह्मन्! अपनी शक्तिसे सुन्दर लीला-विहार करनेवाले निर्गुण शिवने स्वेच्छासे सगुण होकर मुझको और तुमको प्रकट करनेके पश्चात् तुम्हें तो सृष्टि-कार्य करनेका आदेश दिया और उमासहित उन अविनाशी सृष्टिकर्ता प्रभुने मुझे उस सृष्टिके पालनका कार्य सौंपा। फिर नाना लीला-विशारद उन दयालु स्वामीने हँसकर आकाशकी ओर देखते हुए बड़े प्रेमसे कहा—विष्णो ! मेरा उत्कृष्ट रूप इन विधाताके अंगसे इस लोकमें प्रकट होगा, जिसका नाम रुद्र होगा। रुद्रका रूप ऐसा ही होगा, जैसा मेरा है। वह मेरा पूर्णरूप होगा, तुम दोनोंको सदा उसकी पूजा करनी चाहिये। वह तुम दोनोंके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाला होगा। वही जगत्का प्रलय करनेवाला होगा। वह समस्त गुणोंका द्रष्टा, निर्विशेष एवं उत्तम योगका पालक होगा। यद्यपि तीनों देवता मेरे ही रूप हैं, तथापि विशेषतः रुद्र मेरा पूर्णरूप होगा। पुत्रो! देवी उमाके भी तीन रूप होंगे। एक रूपका नाम लक्ष्मी होगा, जो इन श्रीहरिकी पत्नी होंगी। दूसरा रूप ब्रह्मपत्नी सरस्वती हैं। तीसरा रूप सतीके नामसे प्रसिद्ध होगा। सती उमाका पूर्णरूप होंगी। वे ही भावी रुद्रकी पत्नी होंगी।'
‘‘ऐसा कहकर भगवान् महेश्वर हमपर कृपा करनेके पश्चात् वहाँसे अन्तर्धान हो गये और हम दोनों सुखपूर्वक अपने-अपने कार्यमें लग गये। ब्रह्मन्! समय पाकर मैं और तुम दोनों सपत्नीक हो गये और साक्षात् भगवान् शंकर रुद्रनामसे अवतीर्ण हुए। वे इस समय कैलास पर्वतपर निवास करते हैं। प्रजेश्वर! अब शिवा भी सती नामसे अवतीर्ण होनेवाली हैं। अतः तुम्हें उनके उत्पादनके लिये ही यत्न करना चाहिये।’’
ऐसा कहकर मुझपर बड़ी भारी दया करके भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये और मुझे उनकी बातें सुनकर बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ।
(अध्याय ७—१०)
~~ o ~~
दक्षकी तपस्या और देवी शिवाका उन्हें वरदान देना
नारदजीने पूछा—पूज्य पिताजी! दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दक्षने तपस्या करके देवीसे कौन-सा वर प्राप्त किया तथा वे देवी किस प्रकार दक्षकी कन्या हुईं?
१७२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
ब्रह्माजीने कहा—नारद! तुम धन्य हो! इन सभी मुनियोंके साथ भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनो। मेरी आज्ञा पाकर उत्तम बुद्धिवाले महाप्रजापति दक्षने क्षीरसागरके उत्तर तटपर स्थित हो देवी जगदम्बिकाको पुत्रीके रूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा तथा उनके प्रत्यक्ष दर्शनकी कामना लिये उन्हें हृदय-मन्दिरमें विराजमान करके तपस्या प्रारम्भ की। दक्षने मनको संयममें रखकर दृढ़तापूर्वक कठोर व्रतका पालन करते हुए शौच-संतोषादि नियमोंसे युक्त हो तीन हजार दिव्य वर्षोंतक तप किया। वे कभी जल पीकर रहते, कभी हवा पीते और कभी सर्वथा उपवास करते थे। भोजनके नामपर कभी सूखे पत्ते चबा लेते थे।
मुनिश्रेष्ठ नारद! तदनन्तर यम-नियमादिसे युक्त हो जगदम्बाकी पूजामें लगे हुए दक्षको देवी शिवाने प्रत्यक्ष दर्शन दिया। जगन्मयी जगदम्बाका प्रत्यक्ष दर्शन पाकर प्रजापति दक्षने अपने-आपको कृतकृत्य माना। वे कालिकादेवी सिंहपर आरूढ़ थीं। उनकी अंगकान्ति श्याम थी। मुख बड़ा ही मनोहर था। वे चार भुजाओंसे युक्त थीं और हाथोंमें वरद, अभय, नील कमल और खड्ग धारण किये हुए थीं। उनकी मूर्ति बड़ी मनोहारिणी थी। नेत्र कुछ-कुछ लाल थे। खुले हुए केश बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाली उन जगदम्बाको भलीभाँति प्रणाम करके दक्ष विचित्र वचनावलियोंद्वारा उनकी स्तुति करने लगे।
दक्षने कहा—जगदम्ब! महामाये! जगदीशे! महेश्वरि! आपको नमस्कार है। आपने कृपा करके मुझे अपने स्वरूपका दर्शन कराया है। भगवति! आद्ये! मुझपर प्रसन्न होइये। शिवरूपिणि! प्रसन्न होइये। भक्तवरदायिनि! प्रसन्न होइये। जगन्माये! आपको मेरा नमस्कार है।*
ब्रह्माजी कहते हैं—मुने! संयत चित्तवाले दक्षके इस प्रकार स्तुति करनेपर महेश्वरी शिवाने स्वयं ही उनके अभिप्रायको जान लिया तो भी दक्षसे इस प्रकार कहा—'दक्ष! तुम्हारी इस उत्तम भक्तिसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। तुम अपना मनोवांछित वर माँगो। तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं है।'
* प्रसीद भगवत्याद्ये प्रसीद शिवरूपिणि। प्रसीद भक्तवरदे जगन्माये नमोऽस्तु ते॥
(शि० पु० रु० सं० स० खं० १२।१४)
* रुद्रसंहिता * १७३
जगदम्बाकी यह बात सुनकर प्रजापति दक्ष बहुत प्रसन्न हुए और उन शिवाको बारंबार प्रणाम करते हुए बोले।
दक्षने कहा—जगदम्ब! महामाये! यदि आप मुझे वर देनेके लिये उद्यत हैं तो मेरी बात सुनिये और प्रसन्नतापूर्वक मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये। मेरे स्वामी जो भगवान् शिव हैं, वे रुद्रनाम धारण करके ब्रह्माजीके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए हैं। वे परमात्मा शिवके पूर्णावतार हैं। परंतु आपका कोई अवतार नहीं हुआ। फिर उनकी पत्नी कौन होगी ? अतः शिवे! आप भूतलपर अवतीर्ण होकर उन महेश्वरको अपने रूप-लावण्यसे मोहित कीजिये। देवि! आपके सिवा दूसरी कोई स्त्री रुद्रदेवको कभी मोहित नहीं कर सकती। इसलिये आप मेरी पुत्री होकर इस समय महादेवजीकी पत्नी होइये। इस प्रकार सुन्दर लीला करके आप हरमोहिनी (भगवान् शिवको मोहित करनेवाली) बनिये। देवि! यही मेरे लिये वर है। यह केवल मेरे ही स्वार्थकी बात हो, ऐसा नहीं सोचना चाहिये। इसमें मेरे ही साथ सम्पूर्ण जगत्का भी हित है। ब्रह्मा, विष्णु और शिवमेंसे ब्रह्माजीकी प्रेरणासे मैं यहाँ आया हूँ।
प्रजापति दक्षका यह वचन सुनकर जगदम्बिका शिवा हँस पड़ीं और मन ही-मन भगवान् शिवका स्मरण करके यों बोलीं।
देवीने कहा—तात! प्रजापते! दक्ष! मेरी उत्तम बात सुनो। मैं सत्य कहती हूँ, तुम्हारी भक्तिसे अत्यन्त प्रसन्न हो तुम्हें सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तु देनेके लिये उद्यत हूँ। दक्ष! यद्यपि मैं महेश्वरी हूँ, तथापि तुम्हारी भक्तिके अधीन हो तुम्हारी पत्नीके गर्भसे तुम्हारी पुत्रीके रूपमें अवतीर्ण होऊँगी— इसमें संशय नहीं है। अनघ! मैं अत्यन्त दुस्सह तपस्या करके ऐसा प्रयत्न करूँगी जिससे महादेवजीका वर पाकर उनकी पत्नी हो जाऊँ। इसके सिवा और किसी उपायसे कार्य सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि वे भगवान् सदाशिव सर्वथा निर्विकार हैं, ब्रह्मा और विष्णुके भी सेव्य हैं तथा नित्य परिपूर्णरूप ही हैं। मैं सदा उनकी दासी और प्रिया हूँ। प्रत्येक जन्ममें वे नानारूपधारी शम्भु ही मेरे स्वामी होते हैं। भगवान् सदाशिव अपने दिये हुए वरके प्रभावसे ब्रह्माजीकी भृकुटिसे रुद्ररूपमें अवतीर्ण हुए हैं। मैं भी उनके वरसे उनकी आज्ञाके अनुसार यहाँ अवतार लूँगी। तात! अब तुम अपने घरको जाओ। इस कार्यमें जो मेरी दूती अथवा सहायिका होगी, उसे मैंने जान लिया है। अब शीघ्र ही मैं तुम्हारी पुत्री होकर महादेवजीकी पत्नी बनूँगी।
दक्षसे यह उत्तम वचन कहकर मन-ही-मन शिवकी आज्ञा प्राप्त करके देवी शिवाने शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हुए फिर कहा—'प्रजापते! परंतु मेरा एक प्रण है, उसे तुम्हें सदा मनमें रखना चाहिये। मैं उस प्रणको सुना देती हूँ। तुम उसे सत्य समझो, मिथ्या न मानो। यदि कभी मेरे प्रति तुम्हारा आदर घट जायगा, तब उसी समय मैं अपने शरीरको त्याग दूँगी, अपने स्वरूपमें लीन हो जाऊँगी अथवा दूसरा शरीर धारण कर लूँगी। मेरा यह कथन सत्य है। प्रजापते! प्रत्येक सर्ग या कल्पके लिये तुम्हें यह वर दे दिया गया—मैं तुम्हारी पुत्री होकर भगवान्
१७४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
शिवकी पत्नी होऊँगी।'
मुख्य प्रजापति दक्षसे ऐसा कहकर महेश्वरी शिवा उनके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं। दुर्गाजीके अन्तर्धान होनेपर दक्ष भी अपने आश्रमको लौट गये और यह सोचकर प्रसन्न रहने लगे कि देवी शिवा मेरी पुत्री होनेवाली हैं।
(अध्याय ११-१२)
ब्रह्माजीकी आज्ञासे दक्षद्वारा मैथुनी सृष्टिका आरम्भ, अपने पुत्र हर्यश्वों और शबलाश्वोंको निवृत्तिमार्गमें भेजनेके कारण दक्षका नारदको शाप देना
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! प्रजापति दक्ष अपने आश्रमपर जाकर मेरी आज्ञा पा हर्षभरे मनसे नाना प्रकारकी मानसिक सृष्टि करने लगे। उस प्रजासृष्टिको बढ़ती हुई न देख प्रजापति दक्षने अपने पिता मुझ ब्रह्मासे कहा।
दक्ष बोले—ब्रह्मन्! तात! प्रजानाथ! प्रजा बढ़ नहीं रही है। प्रभो! मैंने जितने जीवोंकी सृष्टि की थी, वे सब उतने ही रह गये हैं। प्रजानाथ! मैं क्या करूँ? जिस उपायसे ये जीव अपने-आप बढ़ने लगें, वह मुझे बताइये। तदनुसार मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा, इसमें संशय नहीं है।
ब्रह्माजीने (मैंने) कहा—तात! प्रजापते दक्ष! मेरी उत्तम बात सुनो और उसके अनुसार कार्य करो। सुरश्रेष्ठ भगवान् शिव तुम्हारा कल्याण करेंगे। प्रजेश! प्रजापति पंचजन (वीरण)-की जो परम सुन्दरी पुत्री असिक्नी है, उसे तुम पत्नीरूपसे ग्रहण करो। स्त्रीके साथ मैथुन-धर्मका आश्रय ले तुम पुनः इस प्रजासर्गको बढ़ाओ। असिक्नी-जैसी कामिनीके गर्भसे तुम बहुत-सी संतानें उत्पन्न कर सकोगे।
तदनन्तर मैथुन-धर्मसे प्रजाकी उत्पत्ति करनेके उद्देश्यसे प्रजापति दक्षने मेरी आज्ञाके अनुसार वीरण प्रजापतिकी पुत्रीके साथ विवाह किया। अपनी पत्नी वीरिणीके गर्भसे प्रजापति दक्षने दस हजार पुत्र उत्पन्न किये, जो हर्यश्व कहलाये। मुने! वे सब-के-सब पुत्र समान धर्मका आचरण करनेवाले हुए। पिताकी भक्तिमें तत्पर रहकर वे सदा वैदिक मार्गपर ही चलते थे। एक समय पिताने उन्हें प्रजाकी सृष्टि करनेका आदेश दिया। तात! तब वे सभी दाक्षायण नामधारी पुत्र सृष्टिके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये पश्चिम दिशाकी ओर गये। वहाँ नारायण-सर नामक परम पावन तीर्थ है, जहाँ दिव्य सिन्धु नद और समुद्रका संगम हुआ है। उस तीर्थजलका ही निकटसे स्पर्श करते उनका अन्तःकरण शुद्ध एवं ज्ञानसे सम्पन्न हो गया। उनकी आन्तरिक मलराशि धुल गयी और वे परमहंस-धर्ममें स्थित हो गये। दक्षके वे सभी पुत्र पिताके आदेशमें बँधे हुए थे। अतः मनको सुस्थिर करके प्रजाकी वृद्धिके लिये वहाँ तप करने लगे। वे सभी सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे।
नारद! जब तुम्हें पता लगा कि हर्यश्वगण सृष्टिके लिये तपस्या कर रहे हैं, तब भगवान् लक्ष्मीपतिके हार्दिक अभिप्रायको जानकर तुम स्वयं उनके पास गये और आदरपूर्वक यों बोले—'दक्षपुत्र हर्यश्वगण! तुमलोग पृथ्वीका अन्त देखे
- रुद्रसंहिता * १७५
बिना सृष्टि-रचना करनेके लिये कैसे उद्यत हो गये ?'
ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! हर्यश्व आलस्यसे दूर रहनेवाले थे और जन्मकालसे ही बड़े बुद्धिमान् थे। वे सब-के-सब तुम्हारा उपर्युक्त कथन सुनकर स्वयं उसपर विचार करने लगे। उन्होंने यह विचार किया कि 'जो उत्तम शास्त्ररूपी पिताके निवृत्तिपरक आदेशको नहीं समझता, वह केवल रज आदि गुणोंपर विश्वास करनेवाला पुरुष सृष्टिनिर्माणका कार्य कैसे आरम्भ कर सकता है।' ऐसा निश्चय करके वे उत्तम बुद्धि और एकचित्तवाले दक्षकुमार नारदको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके ऐसे पथपर चले गये, जहाँ जाकर कोई वापस नहीं लौटता है। नारद! तुम भगवान् शंकरके मन हो और मुने! तुम समस्त लोकोंमें अकेले विचरा करते हो। तुम्हारे मनमें कोई विकार नहीं है; क्योंकि तुम सदा महेश्वरकी मनोवृत्तिके अनुसार ही कार्य करते हो। जब बहुत समय बीत गया, तब मेरे पुत्र प्रजापति दक्षको यह पता लगा कि मेरे सभी पुत्र नारदसे शिक्षा पाकर नष्ट हो गये (मेरे हाथसे निकल गये)। इससे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे बार-बार कहने लगे—उत्तम संतानोंका पिता होना शोकका ही स्थान है (क्योंकि श्रेष्ठ पुत्रोंके बिछुड़ जानेसे पिताको बड़ा कष्ट होता है)। शिवकी मायासे मोहित होनेसे दक्षको पुत्रवियोगके कारण बहुत शोक होने लगा। तब मैंने आकर अपने बेटे दक्षको बड़े प्रेमसे समझाया और सान्त्वना दी। दैवका विधान प्रबल होता है—इत्यादि बातें बताकर उनके मनको शान्त किया। मेरे सान्त्वना देनेपर दक्ष पुनः पंचजनकन्या असिक्नीके गर्भसे शबलाश्व नामके एक सहस्त्र पुत्र उत्पन्न किये। पिताका आदेश पाकर वे पुत्र भी प्रजासृष्टिके लिये दृढ़तापूर्वक प्रतिज्ञापालनका नियम ले उसी स्थानपर गये, जहाँ उनके सिद्धिको प्राप्त हुए बड़े भाई गये थे। नारायणसरोवरके जलका स्पर्श होनेमात्रसे उनके सारे पाप नष्ट हो गये, अन्तःकरणमें शुद्धता आ गयी और वे उत्तम व्रतके पालक शबलाश्व ब्रह्म (प्रणव)-का जप करते हुए वहाँ बड़ी भारी तपस्या करने लगे। उन्हें प्रजासृष्टिके लिये उद्यत जान तुम पुनः पहलेकी ही भाँति ईश्वरीय गतिका स्मरण करते हुए उनके पास गये और वही बात कहने लगे, जो उनके भाइयोंसे पहले कह चुके थे। मुने! तुम्हारा दर्शन अमोघ है, इसलिये तुमने उनको भी भाइयोंका ही मार्ग दिखाया। अतएव वे भाइयोंके ही पथपर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त हुए। उसी समय प्रजापति दक्षको बहुत-से उत्पात दिखायी दिये। इससे मेरे पुत्र दक्षको बड़ा विस्मय हुआ और वे मन-ही-मन दुःखी हुए। फिर उन्होंने पूर्ववत् तुम्हारी ही करतूतसे अपने पुत्रोंका नाश हुआ सुना, इससे उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे पुत्रशोकसे मूर्च्छित हो अत्यन्त कष्टका अनुभव करने लगे। फिर दक्षने तुमपर बड़ा क्रोध किया और कहा—'यह नारद बड़ा दुष्ट है।' दैववश उसी समय तुम दक्षपर अनुग्रह करनेके लिये वहाँ आ पहुँचे। तुम्हें देखते ही शोकावेशसे युक्त हुए दक्षके ओठ रोषसे फड़कने लगे। तुम्हें सामने पाकर वे धिक्कारने और निन्दा करने लगे।
दक्षने कहा—ओ नीच! तुमने यह क्या किया? तुमने झूठ-मूठ साधुओंका
१७६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
बाना पहन रखा है। इसीके द्वारा ठगकर हमारे भोले-भाले बालकोंको जो तुमने भिक्षुओंका मार्ग दिखाया है, यह अच्छा नहीं किया। तुम निर्दय और शठ हो। इसीलिये तुमने हमारे इन बालकोंके, जो अभी ऋषि$^१$-ऋण, देव$^२$-ऋण और पितृ$^३$-ऋणसे मुक्त नहीं हो पाये थे, लोक और परलोक दोनोंके श्रेयका नाश कर डाला। जो पुरुष इन तीनों ऋणोंको उतारे बिना ही मोक्षकी इच्छा मनमें लिये माता-पिताको त्यागकर घरसे निकल जाता है—संन्यासी हो जाता है, वह अधोगतिको प्राप्त होता है। तुम निर्दय और बड़े निर्लज्ज हो। बच्चोंकी बुद्धिमें भेद पैदा करनेवाले हो और अपने सुयशको स्वयं ही नष्ट कर रहे हो। मूढ़मते! तुम भगवान् विष्णुके पार्षदोंमें व्यर्थ ही घूमते-फिरते हो। अधमाधम! तुमने बारंबार मेरा अमंगल किया है। अतः आजसे तीनों लोकोंमें विचरते हुए तुम्हारा पैर कहीं स्थिर नहीं रहेगा अथवा कहीं भी तुम्हें ठहरनेके लिये सुस्थिर ठौर-ठिकाना नहीं मिलेगा।'
नारद! यद्यपि तुम साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित हो, तथापि उस समय दक्षने शोकवश तुम्हें वैसा शाप दे दिया। वे ईश्वरकी इच्छाको नहीं समझ सके। शिवकी मायाने उन्हें अत्यन्त मोहित कर दिया था। मुने! तुमने उस शापको चुपचाप ग्रहण कर लिया और अपने चित्तमें विकार नहीं आने दिया। यही ब्रह्मभाव है। ईश्वरकोटिके महात्मा पुरुष स्वयं शापको मिटा देनेमें समर्थ होनेपर भी उसे सह लेते हैं।
(अध्याय १३)
दक्षकी साठ कन्याओंका विवाह, दक्ष और वीरिणीके यहाँ देवी शिवाका अवतार, दक्षद्वारा उनकी स्तुति तथा सतीके सद्गुणों एवं चेष्टाओंसे माता-पिताकी प्रसन्नता
ब्रह्माजी कहते हैं—देवर्षे! इसी समय दक्षके इस बर्तावको जानकर मैं भी वहाँ आ पहुँचा और पूर्ववत् उन्हें शान्त करनेके लिये सान्त्वना देने लगा। तुम्हारी प्रसन्नताको बढ़ाते हुए मैंने दक्षके साथ तुम्हारा सुन्दर स्नेहपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कराया। तुम मेरे पुत्र हो, मुनियोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण देवताओंके प्रिय हो। अतः बड़े प्रेमसे तुम्हें
१-३. ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे ऋषि-ऋण, यज्ञ और पूजा आदिसे देव-ऋण तथा पुत्रके उत्पादनसे पितृ-ऋणका निवारण होता है।